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खबर पा कर राजीव के पिता धर्मवीर सिंह, भाई उपेंद्र , पत्नी शिखा समेत अन्य परिजन भी अस्पताल पहुंच गए. चिकित्सकों ने बताया कि राजीव कुमार को 4 गोलियां लगी हैं. उन की जान तो बच जाएगी लेकिन खून ज्यादा बहने के कारण उन के शरीर में फंसी चारों गोलियों को निकालने में वक्त लगेगा.

इस वारदात को सब से पहले कंपनी के 2 कर्मचारियों योगपाल और शुभम ने देखा था. लिहाजा सब से पहले पुलिस ने उन से ही पूछताछ कर घटना की जानकारी ली. उन से पूछताछ के बाद राजीव के परिजनों से पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ. जिस के पास जो भी जानकारी थी सबने पुलिस को दे दी.

लेकिन न तो कंपनी का कोई कर्मचारी और न ही कोई परिजन ये बता सके कि राजीव पर ये हमला किसने किया अथवा जान लेने की कोशिश किसने की. परिजन ये भी नहीं बता सके कि राजीव की किसी से कोई रंजिश थी. पुलिस के आला अधिकारियों ने अस्पताल के बाद घटनास्थल का भी निरीक्षण किया.

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बिल्डर और वहां काम करने वाले दूसरे कर्मचारियों से भी पूछताछ की लेकिन कोई भी घटना के पीछे के कारणों या फिर राजीव की किसी से रंजिश के बारे में जानकारी नहीं दे पाया. इंसपेक्टर मुनीष प्रताप सिंह को अब तक की छानबीन से इस बात का आभास जरूर हो गया था कि बदमाशों ने जिस तरीके से घटना को अंजाम दिया, उस से लगता था कि वे पेशेवर हैं.

उन्हें ये भी आशंका लग रही थी कि हो सकता है वारदात को अंजाम दिलाने के लिए भाडे़ के बदमाशों का इस्तेमाल किया गया हो. क्योंकि बदमाशों ने अपने चेहरे पूरी तरह ढक रखे थे और उन्हें राजीव के साइट पर पहुंचने की सटीक जानकारी थी, इसलिए वे शायद पहले ही बाइक से आ कर वहां खड़े हो गए होंगे.

ब्लाइंड मर्डर का नहीं मिला सुराग

मुनीष प्रताप ने बिल्डर की साइट के आसपास के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि बदमाश शायद पहले से ही कुछ दूरी पर घात लगा कर राजीव के आने का इंतजार कर रहे थे. तभी तो राजीव के कार से उतरते ही उस पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई थीं. राजीव जब गाड़ी से उतरा तो उस के एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में लंच बौक्स का बैग था.

एसएचओ मुनीष प्रताप ने मृतक राजीव के भाई उपेंद्र की शिकायत पर अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंस की धारा हत्या के प्रयास की धारा 307 में मुकदमा दर्ज कर लिया. इस की विवेचना की जिम्मेदारी एसएसआई दिलीप सिंह को सौंप दी गई.

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चूंकि केस पूरी तरह ब्लाइंड था, न तो परिजनों ने और न ही राजीव के औफिस वालों ने किसी पर शक जाहिर किया था इसलिए मामले का खुलासा करने के लिए एसएचओ मुनीष प्रताप सिंह ने 3 टीमों का गठन कर दिया.

एक टीम की अगुवाई खुद वे कर रहे थे जिस में उन्होंने एसआई विकास और हैडकांस्टेबल विनय को शामिल किया. दूसरी टीम में जांच अधिकारी एसएसआई दिलीप सिंह के साथ हैडकांस्टेबल साहब सिंह और सतीश शर्मा को रखा था. जबकि महिला एसआई सरिता सिंह को सर्विलांस टीम के कांस्टेबल नीरज के साथ राजीव वर्मा के मोबाइल की सीडीआर निकालकर इसे खंगालने के काम पर लगाया गया.

इस दौरान चश्मदीदों से पूछताछ करने पर पता चला था कि हमले के दौरान राजीव कुमार ने गोली चलाने वाले बदमाश से जान बख्शने की गुहार लगाते हुए कहा था ‘अरे भाई मुझे क्यों मार रहे हो, लगता है तुम को कोई गलतफहमी हो गई है. जिसे आप मारना चाहते हो वह मैं नहीं हूं.’

लेकिन इस के बावजूद बदमाश नहीं रुके और उन पर 3 गोलियां और दागी थीं. ये पता चलने के बाद एसएचओ मुनीष प्रताप को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाशों का निशाना कोई और हो और गलती से उन्होंने राजीव को गोली मार दी हो. इस शक की एक खास वजह ये थी कि राजीव के पास सफेद रंग की क्रेटा कार थी और उन के बिल्डर मालिक के पास भी उसी रंग की क्रेटा कार थी.

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इसीलिए इंसपेक्टर मुनीष को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने कारोबारी रंजिश, लेनदेन के विवाद अथवा किसी दूसरे कारण से बिल्डर को मारने के लिए बदमाश भेजे हों और कार एक जैसी होने के कारण बिल्डर की जगह हमलावरों ने राजीव को निशाना बना लिया हो.

अपनी शंका का निवारण करने के लिए इंसपेक्टर मुनीष प्रताप ने बिल्डर को बुला कर कई बार उस से कुरेदकुरेद कर पूछताछ की. लेकिन उन्हें कहीं से भी ये जानकारी नहीं मिली कि ये मामला पहचान की गफलत में हुए हमले से जुड़ा है.

पुलिस को जांच में ये भी पता चला था कि बदमाशों ने जिस जगह वारदात को अंजाम दिया है, वहां सीसीटीवी कैमरा तो लगा था लेकिन वो कैमरा खराब था. अगर कैमरा काम कर रहा होता तो हमलावरों की पहचान करना आसान हो जाता.

इस जानकारी के बाद पुलिस को शंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमले में कंपनी का ही कोई आदमी शामिल हो और उसी ने सीसीटीवी कैमरा घटना से कुछ समय पहले बंद कर दिया हो. जांच पड़ताल की गई तो साफ हो गया कि कैमरा काफी दिनों से बंद था.

लेकिन एक बात साफ लग रही थी कि बदमाशों को इस बात की पक्की जानकारी थी कि राजीव वर्मा किस समय साइट पर आते हैं. ऐसे में मुनीष कुमार को ये भी शक हुआ कि कहीं बदमाश दिल्ली से ही तो राजीव की कार का पीछा नहीं कर रहे थे. हो सकता है उन्हें रोड पर वारदात करने का मौका न मिला हो. जिस के चलते उन्होंने साइट पर पहुंच कर कार से उतरते समय घटना को अंजाम दिया हो.

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लिहाजा मुनीष प्रताप ने उसी दिन दिल्ली  से बिल्डर साइट की तरफ आने वाले कई रास्तों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालवाई, लेकिन इस में कहीं से भी संदिग्ध  हमलावरों को पकड़ने का कोई सुराग नहीं लग सका.

कई दिन गुजर चुके थे. सीओ तनु उपाध्याय लगातार हमले की इस घटना की जांच पर नजर रख रही थीं. इस मामले में राजीव की किसी से रंजिश या लेनदेन के विवाद की कोई जानकारी सामने नहीं आई थी. इस के बाद पुलिस ने दूसरे बिंदुओं पर भी जांच शुरू कर दी.

पुलिस ने तफ्तीश की बदली थ्यौरी

आमतौर पर हत्या या हत्या के प्रयास की किसी वारदात में अगर पुरानी रंजिश या विवाद का कोई कारण सामने नहीं आता है तो पुलिस पुरानी पद्धति से तफ्तीश शुरू करती है. यानि जर, जोरू और जमीन की थ्यौरी को जांच का आधार बनाती है. मुनीष प्रताप ने भी इसी थ्यौरी से जांच को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया.

इंसपेक्टर मुनीष  महिला एसआई सरिता मलिक व कुछ दूसरे स्टाफ को ले कर खुद ही पड़ताल करने के लिए राजीव वर्मा के बुराड़ी स्थित घर पहुंच गए.

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इंसपेक्टर मुनीष ने राजीव के परिवार के प्रत्येक सदस्य के अलावा आसपड़ोस के लोगों से भी कुरेदकुरेद कर पूछताछ की. इस पूछताछ में कई महत्त्वपूर्ण जानकारी हाथ लग गई. दरअसल जिस दिन राजीव पर हमला हुआ, उस से अगले दिन उस के अपने इकलौते बेटे का बर्थडे मनाने के लिए पहले से ही एक बडे़ समारोह की योजना बनाई हुई थी.

होना तो ये चाहिए था कि राजीव के अस्पताल में होने के कारण इस समारोह को टाल देना चाहिए था. लेकिन राजीव की पत्नी  शिखा ने पति के अस्पताल में होने के बावजूद अगले दिन बड़े जोश के साथ धूमधाम से बेटे का जन्मदिन मनाया था. ये जानकारी काफी हैरान करने वाली थी.

इस के साथ ही ये भी पता चला कि एक डेढ़ साल से राजीव के अपनी पत्नी शिखा से संबध ठीक नहीं थे. दोनों के बीच अकसर झगड़ा होता था. हालांकि राजीव के परिजनों ने ऐसी किसी जानकारी से इनकार किया लेकिन आसपड़ोस के लोगों ने बताया कि राजीव वर्मा शिखा से सीधे मुंह बात नहीं करता था और उसे अकसर डांटता रहता था.

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जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

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