गांव में फंसी एक्ट्रेस रतन राजपूत को खाने में मिली बासी रोटी, शेयर किया ऐसा वीडियो

कोरोना वायरस (Coroanvirus) के चलते इस समय देश में लॉकडाउन (Lockdown) का 3.0 बीत चुका है और लॉकडाउन (Lockdown)  4.0 को 31 मई तक बढ़ाया जा चुका है. इस चरण में लोगों को कई तरह की छूट भी दी गई है. लेकिन सिनेमा और टीवी इंडस्ट्री को आज भी शूटिंग के लिए छूट नहीं मिल पाई है. जिसके चलते जो एक्टर जहां है वहीं फंस कर रह गया है.

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इसी में एक नाम मशहूर टीवी एक्ट्रेस रतन राजपूत (Ratan Rajput) का भी है जो बिहार के किसी गांव में लॉक डाउन के पहले चरण से ही फंसी हुई है लेकिन उन्होंने अपनी प्राइवेसी को बनाए रखनें के लिए अभी उस गांव के नाम का खुलासा नहीं किया है जहां वह रुकी हुई हैं.

चूंकि वह गाँव में रुकी हैं ऐसे में उन्हें शहरों की तरह चमक दमक वाली सुविधाएं तो मिल नहीं रहीं हैं ऐसे में उन्हें काफी तरह की परेशानियों का समाना भी करना पड़ रहा है. लेकिन वह इन सब परेशानियों से परेशान न होकर उसे खूब इन्जाय करती नजर आती हैं जिससे जुड़े फोटोज और वीडियोज वह अक्सर अपने इन्स्टाग्राम और फेसबुक एकाउंट पर शेयर करती रहतीं हैं.

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इसी कड़ी में गांव में रहते हुए भी रतन राजपूत (Ratan Rajput) ने नाश्ते में बासी रोटी खाते हुए का एक मजेदार वीडियो शेयर किया है जिसमें उन्होंने सुबह उठनें से लेकर, बर्तन माजनें, कपड़ें धुलनें, ब्रश करने, बाथरूम में फ्रेस होने, झाड़ू पोंछा लगाने, का वीडियो भी शेयर किया.

उन्होंने वीडियों में नाश्ता करते हुए का वीडियो भी शेयर किया जिसमें वह बासी रोटी और अचार के साथ नजर आ रहीं हैं. उन्होंने इसे आचार के साथ लोकल रोल बना कर खाया. इस रोल को रतन राजपूत ने Local Roll नाम दिया. इस रोल में उन्होंने चना, मूंग और नमकीन भी मिला कर रोल किया. नाश्ता करने के बाद वह खुले में वह लकडियां भी बीननें गईं और गांव के खूबसूरती का जमकर बखान किया.

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गोबर के कंडे पर बनाया लिट्टी चोखा

रतन राजपूत (Ratan Rajput) नें इन सबके अलावा एक और वीडियो भी शेयर किया है जिसमें वह गोबर कंडे के आग पर लिट्टी और चोखा बनाती हुई नजर आ रहीं हैं. उन्होंने इसके कैप्शन में लिखा “LOCKDOWN  STORY” “The Last Dinner”  “लिट्टी-चोखा…बिहार की शान” “ Amazing experience” “लिट्टी चोखा” “बिहार की रसोई से” “रतन की रसोई”. इस पोस्ट में उन्होंने लास्ट डिनर लिख कर यह स्पष्ठ कर दिया की उनकी इस गांव से मुंबई वापसी हो रही हैं.

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उन्होंने अपने गाँव से शहर वापसी को लेकर पोस्ट किये गए अपने लेटेस्ट वीडियो में यह भी कहा की वह यहां से वापस जा रहीं है लेकिन मुझे यह नहीं पता की मै यहां से वापस जाने पर खुश हूं या दुखी. रतन नें शेयर किये अपने इस वीडियो में यह भी कहा की इस जगह का कोना कोना उनके दिलो दिमाग में बस चुका है. फिलहाल रतन राजपूत नें गांव से शहर जाने की जानकारी तो दे दी है लेकिन अभी भी उस गांव के नाम का खुलासा नहीं किया है जिसमें वह रुकी हुई थीं.

एक बार फिर Bhojpuri क्वीन रानी चटर्जी ने दिखाया बोल्ड अवतार, Photos देख उड़ जाएंगे होश

देश में कोरोना वायरस (Corona Virus) लॉकडाउन (Lockdown) के चलते सभी फिल्म और टीवी इंडस्ट्री से जुड़े एक्टर/एक्ट्रेसेस अपने अपने घरों में कैद हैं और इसी के साथ वे अपनी नई और अनोखी फोटोज और वीडियोज भी अपने फैंस के साथ सोशल मीडिया के जरिए शेयर कर रहे हैं. इसी कड़ी में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की बोल्ड और पौपुलर एक्ट्रेस रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट (Official Instagram Account) पर अपनी कुछ हॉट फोटोज फैंस के साथ शेयर की है.

 

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I like the black color because it can’t be adulterated #blackgirlmagic #lovers #loveforever❤️ #life #blacktattoo

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हाल ही में रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने ब्लैक आउटफिट (Black Outfit) में अपनी कुछ फोटोज शेयर की है जिसे उनके फैंस काफी पसंद कर रहे हैं. इन फोटोज में रानी कमाल के पोज़ देती दिखाई दे रही हैं और रानी के फैंस भी उनकी ये फोटोज देख दीवाने से हो गए हैं. रानी चटर्जी के फैंस लगातार उनकी इन फोटोज पर लाइक्स (Likes) और कमेंट्स (Comments) की बरसात कर रहे हैं.

 

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Ha ha ha Random click Black Cat🖤🖤🖤🖤🖤🖤 #picoftheday📷 #picture #photograpy #mood #masti

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रानी चटर्जी ने इन फोटोज के कैप्शन में लिखा है कि,- “I like the black color because it can’t be adulterated #blackgirlmagic #lovers #loveforever #life #blacktattoo”. रानी के इस कैप्शन को देख इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्हें ब्लैक कलर के कपड़े पहनना बेहद पसंद है. इससे पहले भी रानी ने अपनी एक पुरानी फोटो शेयर की थी जिसमें वे काफी हॉट नजर आ रही थीं.

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🌹🌹🌹🌹🦋🦋🦋🦋🦋 #throwback #picoftheday

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इस फोटो में रानी चटर्जी ने पिंक कलर की ड्रैस पहनी हुई है जिसमें वे बेहद सुंदर लग रही हैं. इस फोटो के कैप्शन में रानी ने हैशटैग थ्रोबैक (#throwback) लिखा है जिससे ये पता चल रहा है कि ये फोटो पुरानी है. चाहे नई फोटो हो या पुरानी रानी चटर्जी की पौपुलैरिटी इतनी है कि उनकी फोटो आते ही उनके फैंस जल्द से जल्द वायरल कर देते हैं.

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कृष्णकली ससुराल चली… ठीक है: भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- कृष्णकली ससुराल चली… ठीक है: भाग 1

लेखक- राजन सिंह

फूल संस्कृत विद्यालय पर पहुंचता और कृष्णकली साइकिल के पिछले कैरियर से बीच के हैंडल तक का सफर तय कर के कालेज जाने लग गई थी. कुल मिला कर कह सकते हैं, थोड़ा सा प्यार हो गया था, बस थोड़ा ही बाकी था.

हम को फिर से गांव जाना पड़ गया, धान फसल की कटाई के लिए. क्या करें? किस्मत ही खराब है अपनी तो पढ़ेंगे कैसे? फगुनिया कांड के बाद हमारे नाम के मुताबिक ही हम को सब खदेड़ते ही रहते हैं. अगर कटाई में नहीं जाएंगे तो बाबूजी खर्चापानी भी बंद कर देंगे.

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एक तो देर से पढ़ाना शुरू कराया था हमारे घर वालों ने, ऊपर से बचीखुची कसर हम ने फेल हो कर पूरी कर दी. पूरे 22 साल के हो गए हैं हम, लेकिन हैं अब तक इंटरमीडिएट में ही.

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि यह फगुनिया कहां से आ गई बीच में? पर क्या करें, न गाली देते बनता है और न ही अपना सकते हैं उस को हम. कभी हमारी जान हुआ करती थी वह. भैया की छोटकी साली. जबजब वह हम को करेजा कह कर बुलाती थी, तो लगता था जैसे कलेजा चीर कर उस को दिल में बसा लें.

बहुत प्यार करते थे हम फगुनिया को. उस को एक नजर देखते ही दिल चांद के फुनगी पर बैठ कर ख्वाब देखने लगता था. बोले तो एकदम लल्लनटौप थी हमारी फगुनिया. उस के तन का वजन तो पूछिए ही मत, 3 हाथी मरे होंगे तब जा कर हमारी फगुनिया पैदा हुई होगी, फिर भी जब वह ठुमुकठुमुक कर चलती थी तो हमारे पेट में घिरनी नाचने लगती थी और आटा चक्की के जैसे कलेजा धुकधुकाने लगता था.

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लेकिन मुंह झौंसी हमारी भाभी को फूटी आंख नहीं सुहाती थी हमारी फगुनिया. दुष्ट कहीं की.

नैहर से ले कर ससुराल तक ऐसा ढोल बजाया हमारी प्रेम कहानी का कि हम सब जगह से बुड़बक बन कर रह गए. इतने पर भी भाभी ने दम नहीं लिया, हम को हमारी फगुनिया से लड़वाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

जबजब हमारी फगुनिया हम से लड़ती थी तो ऐसा लगता था जैसे हमारे दिल का महुआ कच्चे में ही रस चुआने लगा हो. आंत ऐंठने लगती. हम तो न मरते थे, न जीते थे. बस, अंदर ही अंदर कुहुकते रहते थे.

पर, हम ने भी ठान लिया था कि ब्याह करेंगे तो फगुनिया से ही करेंगे, नहीं तो किसी से नहीं करेंगे. जब हम सब जगह से बदनाम हो ही गए हैं तो लिहाज किस का रखें. हम ने भी आव देखा न ताव, फगुनिया को भगा कर ब्याह कर ले जाने का प्लान बना लिया.

फूल से सलाहमशवरा लिया तो उस ने भी कहा कि वह रुपएपैसे का इंतजाम कर देगा किसी से सूदब्याज पर. हम भी जोश में थे ही, उस की सभी शर्तें मंजूर कर लीं. फगुनिया को भी हम ने मना लिया भागने के लिए.

तय दिन हम रोसड़ा बाजार में जा कर फगुनिया का इंतजार करने लगे, वहीं फूल भी रुपएपैसे का इंतजाम कर के आने वाला था. वहां से हम थानेश्वर स्थान महादेव मंदिर समस्तीपुर जा कर ब्याह करते, उस के बाद गोरखपुर निकल जाने का प्लान था हमारा.

फगुनिया अपनी सहेली तेतरी को साथ ले कर पतलापुर गांव से रोसरा के दुर्गा मंदिर में आ गई. वहां हम पहले से ही मौजूद थे. तेतरी 3 भाई के बाद एकलौती बहन. फगुनिया की हमराज. एकदम पक्की वाली बहन. हम लोग फूल का इंतजार करते रहे, पर वह गधे के सिर से सींग के जैसे गायब हुआ, सो 3 महीने बाद जा कर मिला हम को. मर्द के नाम पर कलंक.

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उस समय मन तो कर रहा था कि एक बार फूल मिल जाता तो गरदन मरोड़ कर आंत में घुसा देता.

हम फिर भी फगुनिया पर जोर देते रहे भाग चलने के लिए. पर वह तो बहुत बड़ी वाली जालिम निकली. कहने लगी, बिना रुपएपैसे के भाग कर जाइएगा कहां? आप तो बकलोल के बकलोल ही रह गए. कम से कम इतने रुपएपैसे का इंतजाम तो कर लेते कि एकाध महीना सही से गुजारा हो जाता. हम तो ऐसे निखट्टू मरद के साथ नहीं जाएंगे, चाहे कुछ हो जाए. आप के चक्कर में हम अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करेंगे.

हम घिघियाते रहे, मनाते रहे, पर फगुनिया के कान पर जूं तक न रेंगी. आखिर में हम भी खिसिया कर वहां से चल दिए. जातेजाते हम तड़कभड़क दिखा कर कहते गए, ‘‘आज दिनभर थानेश्वर स्थान में इंतजार करेंगे. अगर तुम नहीं आए तो जिंदगीभर मुंह नहीं देखेंगे तुम्हारा,’’ साइकिल उठाई और हम स्पीड में वहां से निकल गए.

हम तो वहां से पहुंच गए थानेश्वर स्थान महादेव मंदिर, पर फगुनिया के कलेजे पर सांप लोटने लगा. वह सोचसोच कर डर से घबराने लगी. कहीं वह आत्महत्या तो नहीं कर लेगा.

फगुनिया को फैसला लेना पड़ा, तेतरी को हमारे पीछे भेजने का. कितनी बेचैन हो कर बोली थी हमारी फगुनिया, ‘‘ऐ तेतरी, जाओ खदेरन को सम झाबु झा दो. घर चला जाएगा बेचारा.’’

हम  झटपट समस्तीपुर के महादेव मंदिर तो पहुंच गए, पर फगुनिया नहीं आई. उस की जगह तेतरी हम को सम झानेबु झाने पहुंच गई. तेतरी हम को जितना सम झाती, हम और ज्यादा गुस्सा होते जाते. जोशजोश में हम गुस्से से लालपीले होते हुए मंदिर में रखे सिंदूर की थाली से मुट्ठीभर सिंदूर उठाया और तेतरी की मांग भर दी.

जब तक होश आया, तब तक तेतरी कुमारी, बाबा की दुलारी हमारी तेतरी देवी बन चुकी थी. एक तो फगुनिया का गम हम को पहले से ही था, ऊपर से तेतरी के सरपंच ने हमारा बोलबम निकलवा दिया. हमारा हाल सेमर की रुई की तरह हो गया था जो न पेड़ से ही लगा हो और न हवा के संग उड़ ही पा रहा हो. दिल से बस एक ही चीज निकल रही थी, ‘ऐ तेतरी, तुम न लात मारी, न मारी घूंसा, फिर भी करेजा को तड़तड़ा दी.’

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फगुनिया का फागुन कब बीत गया, पता ही नहीं चला. घरपरिवार, समाज की दुत्कार में. अब तो तेतरी के देह की देहरी पर जेठ अंगड़ाई लेने लगा. हम फगुनिया के गम में रेडियो पर दर्द भरे गाना सुनते हुए जंगल झाड़, खेतखलिहान में भटकते रहते. हमारा मन तो कर रहा था हैंडपंप में छलांग लगा कर डूब मरें, पर ससुरा कूदने का रास्ता ही नहीं था. अपने दर्द के वशीभूत हो कर हम उस दिन नहर किनारे वाले टूटे पुल पर बैठे रो रहे थे कि तभी वहां गांव के 3-4 संघाती पहुंच गए. हम को रोता देख कर बहुत सम झाया सब ने. पर हम को तनिक भी ढांढस न बंधा, हम और फूटफूट कर रोने लगे.

सत्संग : धर्म की आड़ में हवस का गंदा खेल

कुछ दिनों से गांव में हर रविवार के दिन एक सत्संग मंडली आना शुरू हो गई थी. मंडली में कुलमिला कर 3 लोग थे, एक मंडली के प्रमुख गुरु बाबा और बाकी 2 बूढ़ी बाईजी. गुरु बाबा की उम्र 45 साल के आसपास थी, लेकिन तंदुरुस्ती उन्हें जवान दिखाती थी. शुरुआत में गांव में केवल मीना का ही एक घर था, जिस में गुरु बाबा सत्संग करने आते थे, लेकिन कुछ ही दिनों में आधे गांव की औरतें गुरु बाबा की भक्त हो गईं.

गुरु बाबा इन दिनों शहर के किसी मंदिर में रहते थे और रविवार का दिन आते ही इस गांव में मीना के घर सत्संग करने आ पहुंचते थे. मीना का गुरु बाबा से परिचय अपने मायके में सत्संग के  दौरान हुआ था. उसी वक्त मीना ने गुरु बाबा की वाणी से प्रभावित हो कर उन्हें इस गांव में आने का न्योता दे डाला था. जिस दिन गुरु बाबा मीना के घर आए, उस दिन मीना ने अपनी शेखी बघारने के लिए पड़ोस की कुछ औरतों को भी वहां बुला लिया था.

मीना के घर पर पहले दिन ही गुरु बाबा ने ऐसा सत्संग किया कि सारी औरतें उन की मुरीद हो गईं. धीरेधीरे सब औरतों ने उन्हें अपना गुरु मान कर गुरु मंत्र भी ले लिया. गुरु बाबा केवल रविवार के दिन ही आते थे. यह बात अब उन के भक्तों को खासा अखरती थी.

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एक बार रविवार आने से पहले ही औरतों में इस बात पर चर्चा हुई कि गुरु बाबा को गांव के बाहर बने मंदिर में जगह दे दी जाए, जिस से उन का सत्संग रोज सुनने को मिल जाया करे. सभी औरतें इस बात पर एकमत थीं.

रविवार के दिन जब गुरु बाबा गांव में सत्संग के लिए आए, तो उन औरतों ने उन के सामने यह प्रस्ताव रख दिया. गुरु बाबा कुछ कहते, उस से पहले ही उन के साथ आने वाली बाईजी ने इस गांव के मंदिर में रुकने से मना कर दिया. वे कहती थीं कि साधुसंन्यासी को लालच के चलते कहीं नहीं रुकना चाहिए.

लेकिन बाईजी की सुनता कौन था. औरतों को तो वैसे ही बाईजी से कोई मतलब न था. वे तो गुरु बाबा के साथ आती थीं, इसलिए उन की इज्जत होती थी. गुरु बाबा इस बात को सुन कर जोश में थे, लेकिन बाईजी की वजह से कुछ कह न सके. वे आज जिस जगह पर थे, वहां तक लाने में बाईजी का बहुत बड़ा योगदान था.

पर गांव की औरतों द्वारा किया गया अनुरोध गुरु बाबा को बाईजी के खिलाफ बगावत करने के लिए मजबूर कर गया. जब गुरु बाबा ने बाईजी से अपनी दिली इच्छा जाहिर की, तो दोनों बाईजी उन से नाराज हो गईं और फिर कभी इस गांव में न आने को कह कर अपने आश्रम लौट गईं.

गुरु बाबा को इस बात से कोई फर्क न पड़ा. उन्हें इस गांव की औरतों से जो आश्वासन मिला था, वह बाईजी के साथ से कई गुना बड़ा था. उसी दिन औरतों ने खुद जा कर गांव के बाहर बने मंदिर के कमरे को झाड़पोंछ कर गुरु बाबा के रहने के लिए तैयार कर दिया.

शाम तक गुरु बाबा के लिए मंदिर में बढि़या भोजन बना कर भेज दिया गया. आज सालों बाद बाबाजी के लिए किसी ने इतना स्वादिष्ठ खाना भेजा था, जबकि बाईजी के आश्रम में तो हमेशा संन्यासियों वाला खाना ही मिलता था.

गुरु बाबा ने फैसला किया कि अब वे इसी गांव में रहेंगे. यह बात जब औरतों को पता चली, तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. अब हर रोज मंदिर में पूजा होने लगी थी. लोग इस बात से खुश हो कर मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने लगे थे. मर्द भी यह सोच कर खुश थे कि चलो मंदिर में गुरु बाबा के रहने से वहां का सूनापन खत्म हो जाएगा.

अब मीना के घर के बजाय मंदिर की धर्मशाला में ही सत्संग होना शुरू हो गया था. बड़ी जातियों के साथसाथ छोटी कही जाने वाली जातियों के लोग भी गुरु बाबा का सत्संग सुनने आने लगे थे. गुरु बाबा के पास चढ़ावे के पैसों का भी ढेर लगता जा रहा था. पिछड़ी जाति की एक लड़की रजनी को गुरु बाबा का सत्संग सुनने की ऐसी लत पड़ी कि घर के सब काम छोड़ कर वह रोज सत्संग में आ बैठती थी. रजनी की उम्र 19 साल थी, लेकिन जिस दिन उस ने गुरु बाबा का सत्संग सुना, तो भक्ति से सराबोर हो गई. घर में बूढ़ी दादी के अलावा कोई और नहीं था, जो उसे रोकता या टोकता. मांबाप उसे बचपन में ही छोड़ कर चल बसे थे.

गुरु बाबा की खातिरदारी और रोब देख कर उस के मन में खयाल आता था कि वह भी साध्वी हो जाए. लेकिन उस की राह में एक अड़चन थी कि वह पिछड़ी जाति की थी. भला पिछड़ी जाति की लड़की को कौन साध्वी मानेगा? यह खयाल मन में दबाए रजनी रोज गुरु बाबा का सत्संग सुनने आती रही.

सर्दियों के दिन थे. गुरु बाबा ने आग जलाने के लिए उपले और लकडि़यों का इंतजाम करने की बात भक्तों से कही, तो रजनी उछल कर बोल पड़ी कि इन सब चीजों का इंतजाम वह खुद कर देगी. गुरु बाबा की नजर रजनी पर पड़ी, तो भरे बदन की ठीकठाक दिखने वाली रजनी उन के दिल को भा गई. लेकिन चाह कर भी वे कुछ न कह सके.

शाम के वक्त रजनी एक गठरी में उपले और लकड़ी भर कर मंदिर जा पहुंचीं. उस वक्त मंदिर में गुरु बाबा के अलावा कोई और नहीं था. रजनी ने सिर से गठरी उतारी ही थी कि गुरु बाबा मंदिर के  कमरे से बाहर निकल आए. रजनी ने गुरु बाबा को देखा तो हाथ जोड़ कर प्रणाम कर लिया. गुरु बाबा ने इधरउधर नजर घुमाई, फिर रजनी के सिर, कंधे और गाल पर बड़े प्यार से हाथ फेरा.

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गुरु बाबा जानते थे कि रजनी पिछड़ी जाति की है, लेकिन उन की वासना को जातबिरादरी की दीवार कतई मंजूर न थी.

गुरु बाबा खीसें निपोरते हुए बोले, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

वह बोली, ‘‘जी… रजनी.’’

गुरु बाबा फिर से बोले, ‘‘और कौनकौन लोग हैं घर में?’’

रजनी ने उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘मैं और मेरी दादी हैं… और कोई नहीं.’’

गुरु बाबा मन ही मन खुश हो उठे और बोले, ‘‘कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा. किसी बात की चिंता मत करो. चलो, तुम्हारी शादी में हम मदद कर देंगे.’’

रजनी शरमा कर बोली, ‘‘बाबाजी, मुझे अभी शादी नहीं करनी. मैं तो साध्वी बनना चाहती हूं.’’

गुरु बाबा खुश हो कर बोले, ‘‘अरे वाह, क्या बढि़या विचार है. तो फिर बन क्यों नहीं जातीं साध्वी? देर किस बात की है?’’

रजनी शरमाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, मैं पिछड़ी जाति की हूं न, इसलिए सोच कर रह जाती हूं.’’

गुरु बाबा खुद इस बात के खिलाफ थे कि कोई छोटी जाति का आदमी संत बने, लेकिन रजनी को पाने के लिए वे बेफिक्र हो कर बोले, ‘‘ऐसा कौन बोला? हम बनाएंगे तुम्हें साध्वी. आओ, अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

रजनी गुरु बाबा के कमरे में जाने से थोड़ा हिचक रही थी, लेकिन उन के दोबारा कहने पर वह अंदर चली गई. अंदर कमरे में गुरु बाबा के लिए सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. कमरे में पड़े तख्त पर गुरु बाबा ने खुद बैठते हए रजनी को भी बिठा लिया और उस के शरीर पर जहांतहां हाथ फिरा कर बोले, ‘‘देखो रजनी, हम तुम्हें साध्वी तो बना सकते हैं, लेकिन यह बनना इतना आसान नहीं होता. इस के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. पहले शिष्या बन कर मेरी सेवा करनी पड़ेगी.

‘‘मैं जो भी कहूंगा, वह आंख मूंद कर करते रहना होगा, तब जा कर तुम साध्वी बन पाओगी. अगर यह सब मंजूर हो तो बताओ, फिर मैं इस बारे में सोचूं भी.’’

रजनी को दुनियादारी की समझ नहीं थी. संतगीरी की चमक ने उसे दीवाना बना दिया था. इस सब के लिए वह कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार थी. रजनी बोली, ‘‘बाबाजी, आप जो कहो मैं वही करने को तैयार हूं. आप मेरी जान मांगो, तो वह भी मैं दे दूं. बस, आप मुझे साध्वी बना दो.’’

रजनी का साध्वी बनने के  प्रति इतना जोश देख कर गुरु बाबा खुश हो उठे. अब उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने से कोई नहीं रोक सकता था. गुरु बाबा ने रजनी को अपने करीब किया और उस का मुंह चूम लिया. रजनी को थोड़ा अटपटा तो लगा, लेकिन इसे उन का प्यार समझ कर सह गई. गुरु बाबा ने उठ कर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. रजनी के दिल की धड़कनें बढ़ गईं, लेकिन कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी.

गुरु बाबा ने रजनी को अपनी बांहों में भरा और चूम लिया. रजनी का सारा जिस्म डर से कांप उठा, मुंह से निकला, ‘‘बाबाजी, यह आप…’’

रजनी विरोध में बस इतना ही कह पाई, क्योंकि गुरु बाबा ने उसे यह बोल कर चुप कर दिया, ‘‘रजनी, हम ने तुम से क्या कहा था. तुम तो कहती थीं कि जान भी दे दूंगी. तुम्हें साध्वी बनना है या नहीं?’’

रजनी चुप हो कर सब सहती गई. बाबा अपनी हवस मिटा चुके थे. उन्होंने एक बार फिर से रजनी को साध्वी बनाने का आश्वासन दे कर घर भेज दिया. रजनी अपनी इज्जत लुटा कर घर को चल दी. उसे बुरा तो लग रहा था, लेकिन मन में साध्वी बनने का खयाल तसल्ली दिए जा रहा था. अगले दिनों में रजनी इसी तरह गुरु बाबा के पास आती रही और बाबा इसी तरह उस का शोषण करते रहे.

एक दिन रजनी ने गुरु बाबा से साध्वी बनने की जिद कर दी. बाबा रजनी को और ज्यादा दिनों तक टाल नहीं सके. उन्होंने अगले ही दिन रजनी को गेरुए कपड़े मंगवा कर दे दिए और विधिविधान से उसे साध्वी बना दिया.

रजनी के साध्वी बनने की बात सुन कर गांव के लोगों ने इस बात पर कड़ा एतराज दर्ज किया, लेकिन गुरु बाबा के आगे उन की एक न चली. कुछ दिन तक तो रजनी साध्वी के वेश में रात के वक्त अपने घर पर ही रही, लेकिन जल्दी ही गुरु बाबा के बारबार कहने पर उस के साथ ही मंदिर के दूसरे कमरे में रहने लगी.

गुरु बाबा के भक्तों को तो इस बात में कोई खराबी न दिखती थी, क्योंकि उन्हें अपने गुरु बाबा की नीयत पर पूरा भरोसा था. गांव के छिछोरे लड़के, जो दिनभर रजनी को ताका करते थे, वे अब दिनभर मंदिर में डेरा जमाए रहते. गुरु बाबा ने इस बात का फायदा भी उठाना शुरू कर दिया था. वे अब इन लोगों के लिए साध्वी रजनी का अलग से प्रवचन रखवाते और इन लोगों से मनमाना पैसा भी वसूलते थे.

धीरेधीरे प्रवचन छिछोरी बातों के प्रवचन में तबदील होता चला गया, साथ ही गुरु बाबा के पास पैसों की बरसात भी होती चली गई. एक शाम एक छिछोरे लड़के ने कैमरे से चुपके से गुरु बाबा और रजनी का आपत्तिजनक फोटो खींच लिया. जब गुरु बाबा को इस बात की खबर लगी, तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने तुरंत उस लड़के को बुलाया और उस के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि यह बात वह किसी को न बताए, इस के बदले वह उस लड़के को मुंहमांगी रकम भी देने को तैयार हो गए. लड़का चालाक था. उसे पता था कि इस बाबा ने खूब कमाया है. उस ने खींचे हुए फोटो वापस कर गुरु बाबा से मोटी रकम ऐंठ ली. यह रकम इतनी मोटी थी कि गुरु बाबा की जमापूंजी खत्म सी हो गई.

सत्संग के नाम से कमाया गया पैसा गुरु बाबा के शौक और ऐयाशियों को छिपाने के काम आ रहा था. गुरु बाबा ने पैसा कम होते देखा, तो भक्तों से और ज्यादा दान करने के लिए बोल दिया. लड़के को पैसा दे कर गुरु बाबा और साध्वी रजनी अभी चैन की सांस भी न ले पाए थे कि और भी लड़के इन लोगों के अश्लील फोटो लिए घूमने लगे.

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यह सब देख गुरु बाबा अधमरे हो गए. उन्होंने आननफानन सभी लड़कों को बुला कर इस सब को बंद करने की प्रार्थना कर डाली. गुरु बाबा ने इन सभी लड़कों को धर्म के नाम पर जम कर लूटा था, फिर ये लोग बाबा को इतनी आसानी से कैसे छोड़ देते. उन्होंने गुरु बाबा के सामने शर्त रख दी कि अगर वे अपनी साध्वी से उन लोगों को मस्ती करने देंगे, तो कोई कुछ नहीं कहेगा.

अब गुरु बाबा क्या करते, उन्होंने अपनी इज्जत बचाने की खातिर जैसेतैसे साध्वी रजनी को इस बात के लिए मना लिया. अब हालत यह हो गई कि भगवान के मंदिर के  ठीक बगल में दिनभर वासना का खेल चलने लगा.

रजनी साध्वी इसलिए बनी थी कि आराम से जिंदगी गुजार सकेगी, लेकिन यहां तो उस की जिंदगी ही नरक सी हो गई थी. गांव में इस बात की चर्चा जोरों पर थी, लेकिन गुरु बाबा के अंधभक्त लोग अब भी इस बात पर यकीन न करते थे. लेकिन अब कुछ घरों की औरतों ने सत्संग में आना बंद कर दिया था.

गुरु बाबा की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही थीं. एक रात गुरु बाबा चुपके से साध्वी रजनी को ले कर मंदिर से भाग गए. सोचते थे, अब दूर कहीं जा कर सत्संग किया करेंगे, जहां साध्वी रजनी उन की धर्मपत्नी के तौर पर रहा करेगी.

गुरु बाबा और साध्वी रजनी के मंदिर से भागते ही लोगों को पूरी कहानी समझ आ गई. लेकिन अब भी उन के भक्तों को लगता था कि गुरु बाबा जरूर किसी और वजह से इस तरह गए होंगे, क्योंकि जिस तरह से गुरु बाबा सत्संग में प्रवचन देते थे, उस हिसाब से वे ऐसा कर ही नहीं सकते थे.

प्रतीक्षा की गलती

यशवंत की जगह कोई दूसरा होता तो सुहागरात को ही प्रतिक्षा की कामेच्छाओं के वेग को समझ जाता, लेकिन यशवंत को इस बात का अहसास तक नहीं हुआ. पत्नी की खूबसूरती ने उसे कुछ भी सोचनेसमझने का मौका नहीं दिया, दिमाग कुंद हो गया था उस का.

सुहागरात को यशवंत कमरे में पहुंचा तो प्रतीक्षा पलंग पर लेटी थी. उस की आहट पाते ही उस ने सिर उठा कर दरवाजे की ओर देखा. पति को आया देख वह उठ कर बैठ गई और साड़ी के पल्लू को घूंघट बना कर मुंह ढक लिया.

मिलन की उमंगों से भरा यशवंत अपनी दुलहन प्रतीक्षा के पास जा बैठा. उसे उन शादीशुदा दोस्तों की बातें याद आ रही थी, जिन्होंने उसे सुहागरात को बीवी का तनमन जीतने का हुनर सिखाया था. उसे दोस्तों की पहली टिप्स याद आई. जब तुम दुलहन का घूंघट उठाओगे, तब उस के गाल शर्म से गुलाबी हो जाएंगे. उस के होठों पर मुसकान तो रहेगी, मगर लाज से नजरें झुक जाएंगी. हालांकि सुहागरात का यह दूसरा अनुभव था यशवंत का, फिर भी वह प्रतीक्षा के सामने पहली बार बने दूल्हे की तरह व्यवहार कर रहा था.

यशवंत ने उंगलियों से साड़ी का किनारा पकड़ा और अपनी दुलहन का घूंघट उलट दिया. चेहरे की दमक तो सामने आ गई, लेकिन न तो लाज से दुलहन की नजरें झुकीं और न होठों पर सौम्य मुसकान आई. कुछ देर तक वह यशवंत की आंखों में देखती रही, फिर खिलखिला कर हंसने लगी. हतप्रभ यशवंत प्रतीक्षा का मुंह ताकता रह गया.

पति के भावों को समझने की कोशिश करते हुए प्रतीक्षा शोखी से बोली, ‘‘ऐ ऐसे क्यों देख रहे हो, मैं पागल नहीं हूं.’’

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‘‘तुम हंस क्यों रही हो?’’ कुछ नहीं सूझा तो हैरानपरेशान यशवंत ने सवाल किया, ‘‘दूल्हा घूंघट उठाए तो इस तरह नहीं हंसना चाहिए.’’

‘‘यह क्या बात हुई’’ प्रतीक्षा की हंसी घट कर मुसकान में तबदील हो गई. ‘‘सुहागरात को दुलहन पति के लिए निर्वस्त्र हो सकती है, मगर हंस नहीं सकती. मैं हंस दी तो कौन सा पाप हो गया?’’

‘‘पाप तो नहीं हुआ,’ यशवंत ने धीमे से मुंह खोला, ‘‘लेकिन दुलहनें इस तरह नहीं हंसा करतीं.’’

‘‘मैं पुराने जमाने की नहीं, इक्कीसवी सदी की दुलहन हूं’’ प्रतीक्षा का लहजा बेबाक था, ‘‘मैं जानती हूं कि तुम मेरे पास क्यों आए हो. मैं जानती हूं कि तुम मेरे साथ क्याक्या करने वाले हो. मेरे मातापिता जानते हैं कि आज की रात दूल्हादुलहन कैसे खेलेंगे. तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें मेरे पास खेलने के लिए ही भेजा है. सब जानते हैं कि आज क्या होगा, फिर मैं क्यों लाज का आडंबर करूं.’’

यशवंत हैरत से प्रतीक्षा का मुंह देखता रह गया. प्रतीक्षा अपनी रौ में बोली, ‘‘मैं जिंदगी के हर पल को शिद्दत से जीना चाहती हूं. आज रात हमारी देहों का मिलन होना है. लाज संकोच के बजाय अगर सबकुछ हंसीखुशी हो तो उस का आनंद ही निराला होगा.’’ वह यशवंत की आंखों में देखते हुए मुसकराई. ‘‘होगा न?’’

यशवंत प्रतीक्षा के तर्कों से प्रभावित हुआ. सोचा, नए जमाने की लड़कियां शर्म की गुडि़यां थोड़े ही बनेंगी. पुराने जमाने की बात अलग थी, जब लड़कियां स्त्रीपुरूष के अंतरंग संबंध से अंजान होती थीं. शादी के पहले भावी दुलहनों को रिश्ते की भाभियां समझाती थीं कि सुहागरात को दूल्हादुल्हन के बीच क्या होता है. अब तो फिल्मों, केबल और इंटरनेट सब कुछ सिखा देते हैं. लड़केलड़कियों को होश संभालते ही इस सब की समझ आने लगती है. यही सब सोच कर यशवंत के होठों पर मुसकान आ गई.

‘‘तुम सही कहती हो प्रतीक्षा, एक घंटे बाद हमें बेशर्म होना है तो क्यों न पहले ही शर्म का लबादा उतार कर खूंटी पर टांग दें. मिलन का आनंद दूना हो जाएगा.’’

‘‘तो फिर दूर क्यों हो, करीब आओ.’’ प्रतीक्षा ने मुसकरा कर बांहे फैला दी. यशवंत सारी बातें भूल कर प्रतीक्षा की बांहों में समा गया. 40 वर्षीय प्रतीक्षा फतेहपुर जनपद के दुर्गा कालोनी, हरिहरगंज की रहने वाली थी. उस की मां का नाम कमला और पिता का नाम चंद्रभान था. चंद्रभान विकास भवन में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे. प्रतीक्षा के अलावा उन की कोई संतान नहीं थी.

प्रतीक्षा मांबाप की एकलौती संतान थी. इसलिए न तो उस के कहीं घूमने पर पाबंदी थी, और न ही उसे किसी चीज के लिए तरसना पड़ता था. फरमाइश करते ही मनचाही चीज हाजिर हो जाती थी. संभवत: परिवार में मिली आजादी का ही नतीजा था कि प्रतीक्षा जीवन के हर पल को खुल कर और मस्ती से जीने की आदी हो गई थी.

मांबाप भी प्रतीक्षा के खुल कर मस्ती से जीने के अंदाज को जानते थे. इसलिए जब वह जवान हुई तब उन्हें डर सताने लगा कि कहीं प्रतीक्षा जवानी को भी खुल कर एंजौय न करने लगे. यह अलग बात थी कि प्रतीक्षा ने न किसी से प्रेमिल संबंध बनाया, न किसी को अपने यौवन का अनमोल तोहफा दिया. उस ने अपना कौमार्य पति की अमानत समझ कर सहेजे रखा. हां, उस की यह तमन्ना जरूर थी कि शादी के बाद का जीवन वह खुल कर मस्ती से जीएगी और इस की शुरुआत वह सुहागरात से ही कर देगी.

क्रांतिकारी विचारधारा की पुत्री को मातापिता अधिक दिनों तक घर में बैठाए रखने के पक्ष में नहीं थे. जवानी का क्या भरोसा, कब बहक जाए. लेकिन सोचने भर से सब काम नहीं हो जाते. प्रतीक्षा के लिए कई रिश्ते देखे गए लेकिन बात नहीं बनी. शायद समय और किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.

बीतते समय के साथ प्रतीक्षा की उम्र बढ़ती जा रही थी, लेकिन कहीं भी उस का रिश्ता नहीं हो पा रहा था. ऐसे में उस के मांबाप को चिंता सताने लगी. जवान बेटी को अधिक दिनों तक घर में नहीं बैठाया जा सकता, लोग तरहतरह की बातें बनाने लगते हैं.

फतेहपुर के थाना हुसैनगंज क्षेत्र के गांव चांदपुर में भवानी शंकर सिंह रहते थे. वह एक स्कूल में अध्यापक थे. इस के साथ ही खेतीबाड़ी का काम भी करते थे. परिवार में पत्नी शिवरानी देवी और 3 बेटे थे. कालिका, रवींद्र और यशवंत. बेटे जवान हो गए तो उन्होंने अपनी जमीनजायदाद का बराबरबराबर बंटवारा कर दिया. बड़े बेटे कालिका का विवाह करने के बाद 1994 में भवानी शंकर दुनिया से चल बसे. रवींद्र शिक्षा पूरी करने के बाद सरकारी स्कूल में अध्यापक हो गया. सन 2000 में विवाह के बाद वह फतेहपुर शहर में शिफ्ट हो गया था.

सब से छोटा यशवंत सरल स्वभाव का था. बीएससी करने के बाद वह गांव में ही खेती करने लगा. 2003 में उस का विवाह फतेहपुर के मलौली थाना क्षेत्र की कुर्रा कनक गांव निवासी गुड्डन से हुआ. गुड्डन ने 2 बेटों को जन्म दिया लेकिन दूसरे बच्चे की डिलीवरी के समय उस की मृत्यु हो गई. गुड्डन की मौत के बाद दोनों बच्चों को उन की नानी अपने साथ ले गई.

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2013 में चंद्रभान अपनी बेटी प्रतीक्षा का रिश्ता ले कर आए तो यशवंत के घर वाले मना नहीं कर पाए क्योंकि यशवंत के सामने लंबी जिंदगी पड़ी थी. बिना हमसफर के जिंदगी काटना मुश्किल था.

शादी तय हो जाने के बाद दोनों का विवाह हो गया. प्रतीक्षा सुर्ख जोड़े में मायके से ससुराल आ गई. ससुराल में दूल्हादुलहन के मिलन की पहली रात थी, अरमानों की रात सुहागरात. सुहागशैया पर यशवंत के घूंघट उठाते ही जिस तरह प्रतीक्षा खुलेपन से पेश आई, उस से यशवंत स्तब्ध रह गया. यह अलग बात है कि प्रतीक्षा ने उसे गलत सोचने नहीं दिया. उस ने यशवंत को विश्वास दिला दिया कि वह इक्कीसवीं सदी की औरत है, बिंदास जिंदगी के हर पल का आनंद ले कर शिद्दत से जीने वाली.

नई और पुरानी का फर्क

यशवंत को भी अलग अनुभव हुआ. पहली पत्नी गुड्डन पुराने ढर्रे पर चलने वाली ठेठ परिवारिक युवती थी. उस के साथ यशवंत ने वहीं अनुभव किया था जो वह सोच रहा था. लेकिन प्रतीक्षा के साथ उसे एक अलग ही अनुभव मिला.

जो युवती पहली रात को खुल कर खेल सकती थी, वह आगामी रातों में क्या गजब करेगी कहना मुश्किल था. यही सोच कर सशवंत के मन में संदेह का कीड़ा कुलबुलाने लगा. वह सोचने लगा कि प्रतीक्षा शायद ऐसा अनुभव मायके से ले कर आई है. यशवंत ने उसे कटघरे में खड़ा भी किया, मगर उस का जवाब था कि वह जीवन के हर पल को आनंद से जीने की आदी है. खुलापन उस के जीने का अंदाज है, चरित्रहीनता का प्रमाण नहीं.

यशवंत उस समय तो चुप रहा, पर प्रतीक्षा की तरफ से उस का मन साफ नहीं हुआ. यशवंत ने किसी तरह प्रतीक्षा के मायके से जानकारी जुटाई तो उस पर उंगली उठाने लायक कोई बात पता नहीं चली. इस से यशवंत ने मान लिया कि प्रतीक्षा तबियत से शौकीन जरूर है, पर उस का चरित्र बेदाग है.

यह प्रतीक्षा का शौक ही था कि वह एक रात भी न तो यशवंत से अलग रहती थी और न उसे अलग सोने देती थी. फलस्वरूप प्रतीक्षा ने 5 वर्ष पूर्व एक पुत्र को जन्म दिया, जिस का नाम यतेंद्र रखा गया. उस के कुछ बड़ा होने पर दोनों ने उसे अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए उस के नाना के घर भेज दिया.

यशवंत की यह दूसरी शादी थी, उस की उम्र भी 40 के पार हो गई थी. अब उस में इतना दमखम नहीं रह गया था कि हर रोज प्रतीक्षा के बिस्तर का साथी बन कर रास रचाए. दूसरी ओर प्रतीक्षा को काफी देर से पुरूष सुख मिलना शुरू हुआ था, बढ़ती उम्र के साथ उस की कामेच्छाएं भी बढ़ गई थीं.

रात को यशवंत जब उस के पास नहीं आता तो वह झुंझला जाती. इस बात को ले कर दोनों में काफी बहस भी होती. प्रतीक्षा जिस तरह सुहागरात में यशवंत पर हावी हुई थी, उसी तरह समय के साथसाथ उस की जिंदगी पर भी हावी होती चली गई. उस के गलत व्यवहार के कारण ही यशवंत के भाई और परिवार उन दोनों से दूर हो गए थे. वे लोग उन से किसी तरह का संबंध नहीं रखते थे. यशवंत कभीकभी चोरीछिपे अपने भाइयों से बात कर लेता था.

दूसरी ओर प्रतीक्षा ने शादी से पहले तक अपने यौवन को किसी के हवाले नहीं किया था, अब वह पति की बेरुखी के चलते अपने यौवन के खजाने को दूसरों पर लुटाने को अमादा थी. यशवंत के ठंडेपन के चलते वह अपनी मर्यादा की सीमा को भी लांघने को तैयार थी. लेकिन इस के लिए उसे उपयुक्त साथी की जरूरत थी.

नवंबर 2018 में यशवंत के बड़े भाई कालिका की मुत्यु हो गई. उस की तेरहवीं में खाना बनाने के लिए एक व्यक्ति से बात की गई. पेसा वगैरह तय हो जाने के बाद उसे खाना बनाने का काम दे दिया गया. खाना बनाने के लिए आए कारीगरों में 30 वर्षीय संग्राम सिंह भी था. संग्राम सिंह फतेहपुर के थाना मलवां के गांव नसीरपुर बेलवारा निवासी कुंवर बहादुर सिंह का बेटा था. जो अविवाहित था.

खाना बनाने के दौरान संग्राम प्रतीक्षा के संपर्क में आया. प्रतीक्षा ने कुंवारे खूबसूरत जवान संग्राम को देखा तो वह उसे मन भा गया. कभी कोई सामान देने तो कभी खाना कैसे बनाना है, को ले कर प्रतीक्षा उसे अपने पास बुलाती और रिझाने की कोशिश करती.

प्रतीक्षा की चालढाल और उस की हरकतों से संग्राम को भी समझते देर नहीं लगी कि वह उस पर डोरे डाल रही है. संग्राम खुद से 10 साल बड़ी प्रतीक्षा की खूबसूरती पर फिदा हो गया. जब शिकार खुद शिकार होने को तैयार था तो शिकारी क्यों चिंता करता.

दोनों में हंसीमजाक, चुहलबाजियां हुई लेकिन लोगों की नजरों से बच कर. संग्राम जब अपना काम निपटा कर जाने लगा तो प्रतीक्षा की नजरों में बेचैनी झलकने लगी, जिसे संग्राम ने अच्छी तरह समझ लिया था. वह प्रतीक्षा से बोला, ‘‘अब हमारी इतनी जानपहचान तो हो ही गई है कि आगे भी मिलते रहें.’’

संग्राम खेलने के लिए कूदा प्रतीक्षा की पिच पर

प्रतीक्षा ने मुसकरा कर संग्राम को हरी झंडी दे दी. यशवंत के गांव चांदपुर से संग्राम के गांव की दूरी महज 8 किलोमीटर थी. उस दिन के बाद से संग्राम अपनी बाइक से प्रतीक्षा से मिलने आने लगा.

जब वह आता तो यशवंत खेतों पर होता. घर में प्रतीक्षा अकेली रहती थी. बारबार मिलते रहने से उन के बीच की झिझक खत्म होती गई. झिझक खत्म होते ही दोनों एकदूसरे से बेशर्मी से पेश आने लगे. उन के बीच अश्लील मजाक भी होने लगे.

एक दिन ऐसे ही अश्लील मजाक के दौरान संग्राम ने प्रतीक्षा को दबोच लिया. घबराने का नाटक करते हुए बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हो संग्राम?’’

जबकि मन ही मन वह संग्राम की इस हरकत से खुश थी. संग्राम ने उस के नाटक को भांप लिया था, क्योंकि वह यह सब दिखावे के लिए कर रही थी. संग्राम ने प्रतीक्षा को और ज्यादा कसके दबोचते हुए कहा, ‘‘मैं तो वही कर रहा हूं, जो तुम चाहती हो.’’

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‘‘मैं ऐसा चाहती हूं, यह मैं ने तुम से कहा?’’

‘‘हर बात जुबां से ही नहीं कही जाती, आंखों भी बहुत कुछ बता देती हैं. मुझे तुम्हारी खूबसूरत आंखों ने बता दिया कि तुम्हें मेरे प्यार की बेहद जरूरत है.’’

‘‘अच्छा जी, मेरी आंखों ने तुम्हें सब कुछ बता दिया. जब बता ही दिया तो मेरी देह की किताब के पन्ने भी खोल कर पढ़ लो.’’

प्रतीक्षा बेचैन हो कर संग्राम के बदन से लिपट गई. इस के बाद संग्राम ने उस की देह की किताब का एकएक पन्ना खोल कर ऐसा पढ़ा कि प्रतीक्षा उस की दीवानी हो गई. उस दिन के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया.

29 जनवरी, 2020 की सुबह साढ़े 9 बजे प्रतीक्षा घर से निकल कर चीखनेचिल्लाने लगी. उस की चीखपुकार सुन कर गांव के लोग घर के सामने इकट्ठा हो गए. प्रतीक्षा ने बताया कि कुछ बदमाशों ने घर में घुस कर उस के पति यशवंत की हत्या कर दी है. लगभग 10 बजे प्रतीक्षा ने 112 नंबर पर काल कर के पुलिस को घटना की सूचना दी. चूंकि घटनास्थल थाना हुसैनगंज क्षेत्र में आता था, सो कंट्रोल रूप से इस घटना की सूचना हुसैनगंज थाने को दे दी गई.

सूचना पा कर इंसपेक्टर निशिकांत राय पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक यशवंत के शरीर, सिर व गले पर किसी तेज धारदार हथियार के निशान थे. प्रतीक्षा से पूछताछ की गई तो उस ने कुछ लोगों द्वारा घर में घुस कर यशवंत को मारने की बात बताई.

प्रतीक्षा की बातें इंसपेक्टर राय के गले से नहीं उतर रही थीं. एक तो सुबह कोई घर में नहीं घुस सकता था. ऐसा होता तो हत्यारों के आते जाते या शोर मचने पर पड़ोसियों को पता चल जाता.

दूसरे बदमाशों ने यशवंत की तो हत्या कर दी थी, लेकिन प्रतीक्षा को छोड़ दिया, उसे एक खरोंच तक नहीं आई थी. इस से इंसपेक्टर निशिकांत राय का शक प्रतीक्षा पर ही गया. फिलहाल उन्होंने यशवंत की लाश को पोस्टमार्टम के लिए मौर्चरी भेज दिया.

मौके पर आए यशवंत के भाई रविंद्र और पड़ोसियों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर राय का शक प्रतीक्षा पर और गहरा हो गया.

रविंद्र ने अपनी लिखित तहरीर में प्रतीक्षा और उस के प्रेमी संग्राम सिंह पर हत्या का शक जताया था. रविंद्र की तहरीर मिलने के बाद इंसपेक्टर निशिकांत राय ने थाने में प्रतीक्षा और संग्राम सिंह के विरूद्ध भादवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

गिरफ्तार हुई प्रतीक्षा

31 जनवरी को इंसपेक्टर राय ने प्रतीक्षा को घर से गिरफ्तार कर लिया. महिला कांस्टेबल की उपस्थिति में जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने यशवंत की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस हत्या में उस का साथ उस के प्रेमी संग्राम सिंह ने दिया था.

प्रतीक्षा ने बताया कि जब उस के संग्राम से नाजायज संबंध बने, तो फिर बेरोकटोक जारी रहे. लेकिन ऐसा कब तक चलता. लोगों की नजरों में उन के नाजायज संबंध छिपे नहीं रह सके. गांव में तरहतरह की बातें होने लगीं. यशवंत के कानों तक भी प्रतीक्षा की बेवफाई के किस्से पहुंच गए.

इस के बाद उस के और प्रतीक्षा के बीच काफी तीखी बहस होने लगी. लेकिन उस बहस का कोई नतीजा नहीं निकला, क्योंकि प्रतीक्षा पर उस का कोई असर नहीं हुआ था. यशवंत को उस के अवैध रिश्ते के बारे में पता चलने के बाद प्रतीक्षा संग्राम से खुल कर मिलने लगी. वह यशवंत की उपस्थित में भी आने लगा. वह पूरेपूरे दिन यशवंत के घर में पड़ा रहता.

यशवंत खून का घूंट पी कर रह जाता. जब उस से बर्दाश्त नहीं होता तो वह उन दोनों से भिड़ जाता था. लेकिन दोनों के सामने उस की एक नहीं चलती थी.

मिलन में यशवंत के बारबार व्यवधान डालने से प्रतीक्षा और संग्राम परेशान हो गए. इसलिए दोनों ने यशवंत नाम के कांटे को हमेशा के लिए हटाने का फैसला कर लिया.

28/29 जनवरी, 2020 की रात यशवंत के खाने में प्रतीक्षा ने कोई नशीला पदार्थ मिला दिया. खाना खाने के बाद यशवंत बेसुध हो कर बिस्तर पर लेट गया. संग्राम देर रात प्रतीक्षा के पास पहुंचा और बेसुध पड़े यशवंत पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ कई प्रहार कर दिए.

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यशवंत चीखचिल्ला भी न सका, उस ने दम तोड़ दिया. इस के बाद संग्राम वहां से चला गया. सुबह साढ़े 9 बजे प्रतीक्षा ने चीखचिल्ला कर बदमाशों द्वारा यशवंत को मार देने की झूठी कहानी लोगों को सुनाई, लेकिन वह अपने को बचाने में सफल नहीं हो सकी.

पुलिस ने प्रतीक्षा की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी बरामद कर ली. फिर कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पुलिस के दबाव के चलते संग्राम सिंह ने न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कृष्णकली ससुराल चली… ठीक है: भाग 1

लेखक- राजन सिंह

‘‘ऐ लड़के, जरा इधर तो सुनिए.’’

‘‘जी, कहिए.’’

‘‘यह क्या कर रहे हैं यहां आप?’’

‘‘क्या कर रहे हैं हम?’’

‘‘क्या कर रहे हैं सो आप को नहीं मालूम. ज्यादा बनने की कोशिश तो कीजिए मत… ठीक है.’’

‘‘हम क्या कर रहे हैं, जो आप इतना भड़क रही हैं.’’

‘‘इतने भी मासूम मत बनिए. आप को हम 15-20 दिन से देख रहे हैं कि हम जब भी छत पर आते हैं तो आप अपने कमरे की खिड़की से या बालकनी की रेलिंग से टुकुरटुकुर निहारते रहते हैं. आप के घर में मांबहन नहीं हैं क्या?’’

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‘‘हम कहां देखते हैं आप को? वह तो आप ही…’’

‘‘बड़े बेशर्म हैं जी आप. एक तो देखते भी हैं, ऊपर से मुंहजोरी भी करते हैं. लगता है, अपने भैया को बताना ही पड़ेगा,’’ इतना कह कर कृष्णकली मुंह बिचकाते हुए छत से नीचे चली गई.

फूल के तो गले के शब्द जीभ में ही उल झ कर रह गए. कितनी बोल्ड लड़की है… दिमाग  झन्ना कर चली गई.

एक महीने तक फूल की हिम्मत नहीं हुई कि कृष्णकली छत पर आए तो वह बाहर बालकनी में निकल कर आ सके या फिर खिड़की पर ही खड़ा रह सके. कौन आफत मोल ले. कहीं भाईबाप को कह आई तो बेमतलब की बात बढ़ जाएगी और बदनामी होगी सो अलग.

हम जैसे ही गांव से लौट कर आए तो फूल सब से पहले हम को यही कथा सुनाने लगा. तकरीबन डेढ़ महीने से पेट में खुदबुदा जो रहा था बताने के लिए.

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि हम कौन हैं? तो चलिए बता देते हैं. हम हैं खदेरन मंडल. फूल हमारा जिगरी दोस्त है. बचपन से कोई बात हमारे बीच छिपी नहीं थी, फिर यह कैसे छिप जाती. हम दोनों लंगोटिया यार जो ठहरे.

वैसे, एक बात और बता देते हैं. हम केवल बातचीत ही नहीं, बल्कि खानापीना, कपड़े वगैरह भी शेयर कर लेते हैं. यहां तक कि कच्छा और बनियान भी हम ने शेयर किए हैं.

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इत्तेफाक से हम एक ही गांव में, एक ही दिन और तकरीबन एक ही समय पर जनमे भी हैं. बस, फर्क यह है कि वह यादव वंश में जनमा है और हम मंडल

के घर में, वरना हम जुड़वां ही होते. फूल तनिक पढ़ने में ठीकठाक था, इसलिए इंटरमीडिएट के बाद मास्टर बनने के लिए टीचर ट्रेनिंग स्कूल में नाम लिखवा लिया और हम जरा भुसकोल हैं पढ़ने में, इसलिए अब तक इंटर में ही लटके हुए हैं. क्या करें करम में लिखा है नेड़हा, तो हम पेड़ा कहां से खाते.

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि हम क्या बकवास करने में लगे हैं, तो चलिए फूल के बारे में जानते हैं कि आगे क्या हुआ.

तकरीबन महीनेभर बाद फूल को नाका नंबर-5 पर फिर से कृष्णकली मिल गई. आटोरिकशे का इंतजार करते हुए. क्रेज डौल्बी से वह फिल्म देख कर लौट रही थी.

दरभंगा इंटर कालेज में वह पढ़ती है. कालेज बंक कर के सिनेमा देखने में तो मास्टरब्लास्टर. फूल कोचिंग सैंटर से पढ़ कर साइकिल टनटनाते स्पीड में नाका नंबर-5 से गुजरने ही वाला था कि कृष्णकली की नजर पड़ गई.

‘‘ऐ… लड़के, जरा रुको,’’ अचानक कृष्णकली की आवाज सुन कर फूल सकपकाते हुए रुक गया.

‘‘जी… जी, कहिए.’’

‘‘जरा भी दयाधरम है कि नहीं. एक अकेली लड़की कब से रिकेश के लिए इंतजार में यहां खड़ी है और आप हैं कि मस्ती में साइकिल टुनटुनाते हुए भागे जा रहे हैं. डर है कि नहीं है…’’

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‘‘अरे… नहींनहीं. ऐसी कोई बात नहीं है. हम आप को नहीं देखे थे, इसलिए…’’

‘‘इसलिए क्या…? आप हम को बु झाइएगा?’’

‘‘यह क्या बोल रही हैं आप? हम सच्ची में नहीं देखे थे आप को.’’

‘‘तो अब देख लिए हैं न.’’

‘‘जी…’’

‘‘जी… जी क्या कर रहे हैं आप? हमारा नाम कृष्णकली कुमारी है. आप हम को कृष्णकली कह सकते हैं.’’

‘‘जी.’’

‘‘फिर से जी… वैसे, अब चलिएगा भी या यहीं खड़े रहिएगा?’’

‘‘पर… पर, आप का रिकशा?’’

‘‘गोली मारिए रिकशे को. आप हैं न साथ में, फिर सफर यों ही कट जाएगा. आप चलेंगे न मेरे साथ?’’

‘‘हांहां… बिलकुल चलेंगे जी.’’

‘‘चलिए, तो चलते हैं.’’

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दोनों ने पैदल ही कदम बढ़ा दिए. फूल को ज्यादा बातें सू झ नहीं रही थीं. वह चुपचाप ही कदम बढ़ाता रहा.

थोड़ी दूर चलने के बाद कृष्णकली ही बोली, ‘‘हम ऐसे ही चलते रहेंगे तो रात हो जाएगी और हम रास्ते में ही रह जाएंगे.’’

‘‘फिर क्या करें हम? कोई रिकशा भी नहीं दिखाई दे रहा है, जो आप को बैठा देते उस पर.’’

‘‘तो फिर साइकिल किसलिए रखे हैं आप? डबल लोडिंग में चलाना नहीं आता है क्या आप को?’’

‘‘आप… आप हमारी साइकिल पर बैठिएगा?’’

‘‘तो क्या हुआ? हम साइकिल पर बैठ कर नहीं जा सकते हैं क्या? चिंता मत कीजिए, हम महल्ला आने से पहले ही उतर जाएंगे आप की साइकिल से.’’

फूल हैंडल को मजबूती से थाम कर साइकिल पर सवार हो गया. हौले से कृष्णकली भी साइकिल के पीछे कैरियर पर अपना दुपट्टा संभालते हुए बैठ गई. लेकिन बातचीत पर ब्रेक लग गया.

महल्ले के बाहर संस्कृत विद्यालय के सामने कृष्णकली साइकिल से उतर गई और फूल घंटी बजाते हुए तेजी से अपने रूम पर आ गया.

रूम पर आते ही सब से पहले 3-4 गिलास पानी गटागट पी गया. उस का हलक सूखा हुआ था. उस के बाद सारा किस्सा हमें सुनाने लगा.

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हम ने उसी टाइम कह दिया था कि बेटा सैट हो गई लड़की, पर वह मानने को राजी नहीं था. वैसे, उस के दिल में फुल झडि़यां तो जरूर छूटी थीं, लेकिन स्वीकारने की हिम्मत न थी उस में. एकदम डरपोक, भीगी बिल्ली.

पर कहानी भी यहीं नहीं अटकी. कृष्णकली जितनी मुंहफट थी, उतनी ही दिमाग की तेज भी थी. दूसरी मुलाकात के बाद पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि अकसर संस्कृत विद्यालय के पास वह फूल का इंतजार करने लग गई थी.

धीरेधीरे ही सही, पर फूल ने ‘ऐ लड़का’ से ‘फूलजी’ तक का सफर तय कर लिया था. अकसर का इंतजार अब रोजाना में तबदील होने लग गया था.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Best of Crime Stories : देवर को खेत में लाई भाभी

भाभी और देवर का रिश्ता हमेशा से पवित्र माना गया है, कहा जाता है कि देवर के लिए भाभी मां के समान होती है. लेकिन हाल ही में राजस्थान के श्रीगंगानगर से सबको हैरान कर देने वाले मामला सामने आया है. जिसने भाभी-देवर के पवित्र रिश्ते को शर्मसार करके रख दिया है. इस चौंकाने वाले मामले से पूरा गांव सकते में है.

स्थानीय लोगों के बताए अनुसार उन्होंने भरी दोपहर में पास ही के एक खेत में एक महिला और दो युवकों को आपत्तिजनक हालत में झाड़ियों के बीच पकड़ा. लोगों ने तुरंत पुलिस को इस बारे में खबर दी. पुलिस ने मौके से तीनों को गिरफ्तार कर लिया है.

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पुलिस के अनुसार पकड़े गए आरोपियों के नाम संजय कुमार और राजू हैं. पुलिस को उनके पास से शराब की बोतल और कंडोम मिले है. पकड़े जाने के दौरान महिला ने संजय को अपना देवर बताया और महिला ने पुलिस को बताया कि वह अपनी मर्जी से उसके साथ आई है.

पुलिस की मानें तो महिला काफी नशे में थी. वहीं दोनों युवकों ने भी शराब या किसी अन्य प्रकार का नशा किया हुआ था. पुलिस ने महिला का मेडिकल करवाकर उसके परिजनों को सौंप दिया है. इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में काफी गुस्सा है.

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चीनी सामान का बौयकाट : भक्तो को उकसाने का जरीया

चीनी सामान के बौयकाट के लिये आवाज देना एक साजिश का हिस्सा है. इसके जरीये समय समय पर भक्तों को दुश्मन से लडने के लिये उकसाया जाता है. जिससे भारत की परेशानियों पर बातचीत ना हो सके. कुछ दिन पहले तक चीनी कंपनियों को दावतें दी जा रही थी. एक साल भी नहीं बीता कि अब चीनी कंपनियों के बौयकाट की बात की जा रही है. ऐसा केवल चीन को लेकर ही हो यह सही बात नहीं है. नेपाल के साथ भी यही व्यवहार होता रहता है. दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति को भारत बुलाया. उनको भारत यहां घुमाया और यह दिखाने का प्रयास किया कि चीन और भारत के संबंध मजबूत होने से देश को लाभ होगा. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर खाना खाने भी प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी गये. उसके बाद पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध खराब हो गये.

केवल देश के बाहर ही नहीं देश के अंदर भी प्रधानमंत्री मोदी की सोच का यही हाल है. कश्मीर में महबूबा मुफ्रती के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई बाद में कश्मीर में धारा 370 खत्म करने से लेकर उसके विभाजन तक का फैसला ले लिया. व्यवहारिक तौर पर देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फैसले ऐसे ही होते है. देश की आर्थिक नीतियों को लेकर जीएसटी और नोटबंदी जैसी कामों में भी यही देखा गया कि उनका काम बेहद हडबडी वाला होता है. एक बार जो फैसला हो जाता है उसको ही आगे बढाया जा सकता है. नोटबंदी के समय यह कहा गया कि इससे भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर रोक लगेगी. नोटबंदी की तमाम मुसीबत के बाद भी भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर रोक नहीं लग सकी.

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चीन के राष्ट्रपति का अदभुत स्वागत

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अक्टूबर 2019 मे दो दिन के दौरे पर भारत आये थे. उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मादी ने उनका भव्य स्वागत किया था. दोनो नेताओ की मुलाकात के लिये महाबलीपुरम को चुना गया. तमिलनाडु का महाबलिपुरम समुद्र के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर है. महाबलिपुरम का महत्व पल्लव और चोलों के काल में भी बहुत था. यह शहर चीन और दक्षिण एशिया से व्यापार के लिए बड़ा केंद्र था. महाबलीपुरम समुद्र के रास्ते चीन से जुड़ा था. महाबलिपुरम के बंदरगाह से चीनी बंदरगाहों के लिए सामान जाता था. दक्षिण भारतीय समुद्रतटीय महाबलीपुरम शहर में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारत के प्रधानमंत्री की बैठक को इस तरह से दिखाया गया कि इस मुलाकात के बाद दक्षिण पूर्व एशिया और चीन से भारत के व्यापार संबंधों को और मजबूती मिलेगी.

महाबलीपुरम का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है. इस शहर को दिखाने के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महाभारत काल का वर्णन भी पूरी दुनिया को दिखाना चाहते थे. मीडिया के जरीये दोनो नेताओं की मुलाकात पूरी दुनिया के लोग देख सके इसका पूरा उपाय भी किया गया था. महाबलिपुरम में मुलाकात कम समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का स्वागत तमिल लिबास में किया. इस दौरान वह वेष्टि यानि सफेद धोती और आधे बाजू वाले सफेद शर्ट पहनी थी और कंधे पर अंगवस्त्रम लिया हुआ था. चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग कैजुएल पोशाक सफेद शर्ट और काले रंग का ट्राउजर पहने थे. दोनों नेताओं ने महाबलीपुरम के मनोरम दृश्यों को देखा इसके अलावा इन दोनो ने महाबलीपुरम में महाभारत कालीन अर्जुन की तपस्या स्थली देखा.

अर्जुन महाभारत काल के एक ऐसे पात्र हैं जिनको सत्ता के अन्याय के खिलाफ भारतीय आध्यात्मिक दर्शन का सबसे दृढ़ लेकिन मानवीय चेहरा माना जाता है. इसी जगह पर अर्जुन ने तपस्या की थी. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी एक टूरिस्ट गाइड की तरह चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग को सभी चीजों के बार में विस्तार से बता रहे थे. कौन सी आकृति अर्जुन की है कौन सी कृष्ण की और कौन सी युधिष्ठिर और भीम की. ऐसा लग रहा था मानो एक-एक पत्थर की आकृति से प्रधानमंत्री मोदी खुद परिचित हो. महाबलीपुरम में मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अर्जुन तपस्या स्थल के अलावा पंच रथ और शोर मंदिर घुमाया. पंच रथ को ठोस चट्टानों को काटकर बनाया गया है. ये सभी अंखड मंदिर के रूप में मुक्त तौर पर खड़े किए गए हैं. पंच रथ के बीच में एक विशाल हाथी और शेर की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को ‘कृष्ण का माखन लड्डू’ दिखाया. ‘कृष्ण का माखन लड्डू’ एक विशाल पत्थर है, जिसकी ऊंचाई 6 मीटर और चैड़ाई करीब 5 मीटर है. इसका वजन 250 टन है. इसी अनोखे गोल पत्थर को कृष्ण के माखन के गोले के नाम से भी जाना जाता है. यहां पर दोनो नेताओं ने तस्वीर भी खिंचाई. मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को लेकर शोर मंदिर भी गये. यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल है. माना जाता है कि शोर मंदिर सात मंदिरों या सात पैगोडा का हिस्सा है और उनमें से छह समुद्र के नीचे डूबे हुए थे.

पर्यटन स्थलों को घुमाने के बाद मोदी और शी जिनपिंग लोकनृत्य और डिनर का आनंद लिया और एक अच्छे मेजबान की तरह से मेहमान को उपहार भी दिया. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को उपहार में तंजावुर की पेंटिंग और नचियारकोइल-ब्रांच अन्नम लैंप दिया. तंजावुर की पेंटिंग में सरस्वती की तस्वीर खींची गई है. इस पेंटिंग को बी लोगनाथन ने तैयार किया है. इसको तैयार करने में 45 दिन का समय लगा. वहीं, नचियारकोइल-ब्रांच अन्नम लैंप को 8 मशहूर कलाकारों ने मिलकर बनाया है. इसको बनाने में 12 दिन का समय लगा. यह विशेष रूप से चीनी राष्ट्रपति के लिये तैयार किये गये थे.

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प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने शी जिनपिंग के सम्मान में तो डिनर रखा था. उसमें साउथ इंडियन थाली परोसी गई. मोदी ने इस नॉनवेज थाली के लिए विशेष निर्देश दिए थे. डिनर मीनू में राजमा, मालाबार लॉबस्टर, कोरी केम्पू, मटन युलरथियाडु, कुरुवेपिल्लई मीन वरुवल, तंजावुर कोझी करी, बीटरूट जिंजर चॉप, पच सुंडकाई, अरिका कोक्सहंबू, अर्चाविता सांभर, बिरयानी, इंडियन ब्रेड, अड प्रधामन, हलवा, आइसक्रीम, चाय और मसाला चाट जैसे लजीज व्यंजन शामिल रहे.

दोस्ती के बहाने कारोबार की बात

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलकात को एक बडा अवसर बताया गया. इस मुलाकात के बहाने अमेरिका को दायरे में रखने का बात कही गई. यह भी बताया गया कि चीन की दोस्ती से पडोसी पाकिस्तान को कमजोर किया जा सकता है. चीन के साथ सीमा विवाद हो हल करने का प्रयास भी बताया गया. यह कहा गया कि चीन भारतीय बाजार को खोना नहीं चाहता है. महाबलिपुरम में दोनों नेताओं के बीच व्यापार असंतुलन और सीमा विवाद पर बातचीत के साथ क्षेत्र मुक्त व्यापार समझौता है, जिसे जल्द से जल्द चीन लागू करवाना चाह रहा है.

इसमें भारत की सहमति होगी तो मंदी के मार झेल रहे चीनी उत्पाद भारतीय बाजार में डंप हो जाएंगे. मोदी सरकार ने देश की जनता को यह बताया था कि भारत का प्रभाव ज्यादा है. इस दोस्ती में भारत का पलडा भारी है. इस दोस्ती के बाद चीन अंतराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की बात नहीं करेगा. एक तरफ मोदी और उनकी टीम चीन के साथ नेहरू की दोस्ती पर सवाल उठाती है तो दूसरी तरफ खुद चीन के साथ दोस्ती की जरूरत के मायने बताती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘हमने मतभेदों को विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाने, एक दूसरे की चिंताओं के प्रति संवेदनशीन रहने और उन्हें विवाद का रूप नहीं लेने देने का निर्णय किया है. भारत और चीन पिछले 2,000 साल में ज्यादातर समय वैश्विक आर्थिक शक्तियां रहें हैं और धीरे-धीरे उस चरण की तरफ लौट रहे हैं. हमने मतभेदों को विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाने और उन्हें विवाद का रूप नहीं लेने देने का निर्णय किया है. हमने तय किया है कि हम एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति संवेदनशील रहेंगे. मोदी ने पिछले साल चीनी शहर वुहान में शी के साथ अपनी पहली अनौपचारिक शिखर वार्ता के परिणामों का जिक्र करते हुए कहा, ‘वुहान की भावना ने हमारे संबंधों को नयी गति एवं विश्वास प्रदान किया. ‘चेन्नई संपर्क’ के जरिए आज से सहयोग का नया युग शुरू होगा. वुहान में पहली अनौपचारिक वार्ता के बाद से दोनों देश के बीच रणनीतिक संचार बढ़ा है.

नवाज शरीफ और मोदी की मुलाकात

2014 से पहले विपक्ष के नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत पाकिस्तान संबंधों को लेकर कांग्रेस सरकार पर तमाम तरह के आरोप लगाते थे. 2014 का लोकसभा चुनाव जीत कर जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान की सरकार के प्रति उनके रूख मंे नरमी आ गई. नवाज शरीफ के साथ उनकी दोस्ती के चर्चे तो पूरी दुनिया में होने लगे थे. ऐसा होता भी क्यों नहीं आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काम ही ऐसा किया था. नवाज शरीफ के जन्मदिन पर 25 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रूस और अफगानिस्तान की यात्रा से वापस आ रहे थे. अचानक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विमान लाहौर के आलमा इकबाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरा. वहां से वह हेलीकाप्टर के जरीये नवाज शरीफ के रावलपिंडी स्थित घर गए थे. जहां पर नवाज शरीफ के जन्मदिन का सैलीब्रेशन हुआ. मादी ने नवाज शरीफ की मां के पैर छुये और उनसे आर्शिवाद भी लिया. उनको उपहार में कश्मीर की मशहूर पाशमीना शौल तक देकर आये थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस तरह अचानक नवाज शरीफ के घर जाने की घटना को विश्व भर में अलग अलग भाव से देखा गया था.

उस समय भारतीय जनता पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि इस मुलाकात के पीछे कहानी बडी लंबी है. नवाज शरीफ की मां चाहती थी कि भारत का कोई मजबूत नेता बने जो दोनो देशो क परेशानियांे को दूर कर सके. इस संबध में नवाज शरीफ की मां और सुषमा स्वराज इस घटना के पहले एक पार्टी में मिले थे. नवाज शरीफ की मंा और सुषमा स्वराज के बीच लबी बातचीत हुई थी. मोदी और नवाज शरीफ जिस मुलाकात को इतना अहम बताया जा गया था वह जल्द ही हवा हांे गई. कुछ दिनों में नवाज शरीफ और मोदी के संबंध खराब हो गये. नवाज शरीफ की बेटी मरियम ने मोदी की आलोचना करते कहा कि वह अपने समकक्ष लोगो का सम्मान नही ंदेते है.

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प्रधानमंत्री इमरान खान का फोन नहीं उठातें. एक तरफ आप बिना किसी तय कार्यक्रम के जन्मदिन की बधाई देने उनके घर पहुच जाये अगले ही दिन दूसरे प्रधानमंत्री का फोन नहीं उठाये.

मोदी शरीफ मुलाकात को बडी रणनीति के रूप में देखा गया था. मोदी ने नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी बुलाया था. नवाज शरीफ के साथ भी मोदी के संबंध अधिक दिनों तक अच्छे नहीं रहे. सार्क देशो की मीटिंग में जब नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ की मुलकात हुई तो मोदी ने उनको नजर अंदाज किया. नवाज शरीफ जब सामने से गुजरे तो मोदी जी किताबे पढने लगे. प्रधानमंत्री मोदी के साथ सबसे बडी बात यह होती है कि उनके संबंध कब बनते और कब बिगडते है का आकलन कोई नहीं कर सकता है.

महबूबा से रिश्ता पहले बना फिर टूटा

पीडीपी यानि पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट की नेता महबूबा मुफ्रती और भारतीय जनता पार्टी के बीच कभी मधुर संबंध नहीं रहे. वैचारिक स्तर पर कश्मीर की राजनीति को लेकर दोनो दलों में बहुत मतभेद रहे है. 2016 में जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला. जिसकी वजह से कोई भी पार्टी सरकार नहीं बना सकी. विधानसभा चुनाव में पीडीपी को सबसे अधिक 28 सीटें मिली. दूसरे दलो में भाजपा को 25 सीटे, नेशनल कांफ्रंेस 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिली. सरकार बनाने के लिये कई दलो का आपस में मिलना जरूरी था. किसी को भी इस बात का पता नहीं था कि भाजपा-पीडीपी आपस में मिलकर सरकार बना सकते है. दूसरे दल यही सोचते रहे और तमाम राजनीतिक आकलन को छोडते हुये भाजपा-पीडीपी आपस में मिलकर सरकार बना ली. भाजपा के समर्थन से महबूबा मुफ्रती मुख्यमंत्री बन गई. 2016 में जब यह सरकार बनी और 2018 में जब दोनो दलो का गठबंधन टूटा दोनो हालातों में बहुत फर्क था. सरकार बनाने के समय की मिठास और सरकार टूटने के समय की खटास देखने वाली थी.

जो महबूबा भाजपा को सबसे प्रिय हो गई थी वह अचानक खराब लगने लगी. धारा 370 के मसले पर किसी दल से कोई राय नहीं ली गई. जिस महबूबा के साथ भाजपा सरकार चला रही थी उनको ही कैद करना पड गया. ऐसे में यह बात बारबार साफ होती है कि भाजपा हर फैसला अपने हित में करती है. सहयोगी दलों के हित और संबंधो से उसका कोई मतलब नहीं होता है. भाजपा केवल अपने कार्यकर्ताओं को उकसाने के लिये ऐसे कदम उठाती रहती है. जिससे वह देश के आंतरिक हालातों के बारें में सोंच ना सके. धर्म, पाकिस्तान और चीन जैसे मुददों पर सोचते रहे.

आसान नहीं है चीनी सामानों का बहिष्कार

सोशल मीडिया के प्रचार के जरीये चीनी सामान का बहिष्कार नहीं किया जा सकता है.भारत और चीनी के बीच के कारोबारी रिश्ते विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के अनुसार है. ऐसे में बिना किसी कारण के भारत चीन से आयात करना मना नहीं कर सकता है. भारत से चीन का सालाना व्यापार करीब 55 अरब डॉलर का है. हर भारतीय औसतन बहुत सारी चीजों को अपने इस्तेमाल में लाता है. जो चीन से आयात होती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में अभी भी कई सामान ऐसे हैं. जिनका भारत में उत्पादन और बिक्री चीनी कंपनियों द्वारा की जाती है.

अगर भारत में चीनी उत्पादों को बेचने पर रोक लगा दी जाए तो एक आम भारतीय के जीवन में काफी मुश्किलें आ सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि दिन भर में एक आम भारतीय जो भी सामान अपने लिए प्रयोग में लाता है. उसमें से 80 फीसदी सामान चीन से आयात होता है या फिर भारतीय कंपनियां इनको बेचती हैं. यही नहीं भारत पाकिस्तान की तरह चीन से आयात होने वाले सामान पर 200 फीसदी की ड्यूटी भी नहीं लगा सकता है.

विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के अनुसार कोई भी देश बिना किसी कारण के दूसरे देश से अपने यहां आयात या फिर निर्यात होने वाले उत्पादों पर पूरी तरह से रोक नहीं लगा सकते हैं. इसके साथ ही भारत से चीन को निर्यात होने वाले सामान की मात्रा काफी कम है. अगर सरकार चीनी उत्पादों पर ड्यूटी को बढ़ाने का फैसला भी लेती है. तो इसका असर सबसे ज्यादा आम भारतीयों पर ही पड़ेगा.

व्यापक असर है चीन के कारोबार

2011 में भारत में विदेशी निवेश करने वाले देशों में चीन का स्थान 35 वां था. 2014 में 28 वां हो गया. 2016 मे चीन भारत में निवेश करने वाला 17 वां बड़ा देश बन गया. भारत में विदेश निवेश करने वाले बडे देशों में चीन 10 देशों में शामिल हो गया. भारत के लिए राशि बड़ी है मगर चीन अपने विदेश निवेश का मात्र 0.5 प्रतिशत ही भारत में निवेश करता है. 2011 में चीन ने कुल निवेश 102 मिलियन डॉलर का किया था. 2016 में एक बिलियन का निवेश किया. कई चीनी कंपिनयों के रीजनल अॉफिस अहमदाबाद में है. 2017 में के अनुसार चीन की सात बड़ी फोन निर्माता कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाई. चीन की एक कंपनी है चाइना रेलवे रोलिंग स्टॉक उसको नागपुर मेट्रो के लिए 851 करोड़ का ठेका मिला है. चाइना रोलिंग स्टॉक कंपनी को गांधीनगर-अहमदाबाद लिंक मेट्रो में 10,733 करोड़ का ठेका मिला.

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2016 में गुजरात सरकार ने चीनी कंपनियों से निवेश के लिए 5 बिलियन डॉलर का करार किया. 2015 में कर्नाटक सरकार चीनी कंपनियों के लिए 100 एकड़ जमीन देने के लिए सहमत हो गई. महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने चीन की दो मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी को 75 एकड़ जमीन देने का फैसला किया है. ये कंपनियां 450 करोड़ का निवेश लेकर आएंगी. हरियाणा सरकार ने चीनी कंपनियों के साथ 8 सहमति पत्र पर समझौता किया. यह कंपनियां 10 बिलियन का इंडस्ट्रियल पार्क बनाएंगी स्मार्ट सिटी बनाएंगी. ऐसे हाल में चीन के बहिष्कार की बात पूरी तरह बेमानी है. इससे केवल लोगों को ध्यान ही भटकाया जा सकता है.

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