शहनाज गिल को टोनी कक्कड़ के साथ डांस करता देख सिद्धार्थ शुक्ला ने दिया ऐसा रिएक्शन, देखें Video

टेलीविजन इंडस्ट्री के सबसे पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस सीजन 13 (Bigg Boss 13) के विनर सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) इन दिनों काफी चर्चा में बने हुए हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं कि सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) की फैन फौलोविंग अपने आप में ही काफी ज्यादा है और फैंस उनकी एक झलक पाने के लिए इंतजार करते रहते हैं.

 

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Turning fields into reels.. #Punjab

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इसी के साथ ही उनकी बिग बॉस 13 (Bigg Boss 13) की पार्टनर यानी की शहनाज गिल (Shehnaz Gill) भी उनके साथ साथ चर्चाओं का विषय बनी हुई हैं. फैंस को सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) और शहनाज गिल (Shehnaz Gill) की जोड़ी बेहद पसंद है और फैंस इस उम्मीद में रहते हैं कि कब ये दोनों एक साथ स्क्रीन पर नजर आएंगे. हाल ही में जाने माने सिंगर टोनी कक्कड़ (Tony Kakkar) ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर की है जिसे ‘सिडनाज’ (Sidnaaz) के फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

 

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#laila fever 🔥So much fun with @realsidharthshukla bhai @shehnaazgill 😄

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इस वीडियो में टोनी कक्कड़ (Tony Kakkar) अपने लेटेस्ट गाने ‘लैला’ (Laila) पर शहनाज गिल (Shehnaz Gill) के साथ डांस कर रहे हैं और तभी पीछे से सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) की एंट्री होती है. इस दौरान सिद्धार्थ शुक्ला (Siddharth Shukla) के फनी स्टेप्स फैंस को काफी इम्प्रेस कर रहे हैं. इस वीडियो के कैप्शन में टोनी कक्कड़ (Tony Kakkar) ने लिखा है कि, “#laila fever, So much fun with @realsidharthshukla bhai @shehnaazgill”

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#desistyle #punjabilife #sidharthshukla 💪🏻👌🏻

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इसी के साथ ही सिद्धार्थ शुकला (Siddharth Shukla) ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर की है जिसमें वे देसी स्टाइल में बैल गाड़ी चलाते दिखाई दे रहे हैं. ये वीडियो देख ऐसा कहा जा सकता है कि सिद्धार्थ और शहनाज जल्द ही एक पंजाबी गाने में भी नजर आ सकते हैं.

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भोजपुरी क्वीन मोनालिसा ने गोवा में दिखाया अपना हॉट अंदाज, सोशल मीडिया पर शेयर की फोटोज

भोजपुरी फिल्मों की जानी मानी एक्ट्रेस मोनालिसा (Monalisa) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर है. मोनालिसा (Monalisa) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और एक्टिव रहने के साथ साथ वे अपने फैंस के साथ काफी कनेक्टेड रहती हैं और अपनी लेटेस्ट फोटोज और वीडियोज शेयर कर सुर्खियां बटोरती नजर आती हैं.

 

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Sun ☀️ Rays… Sea 🌊, Waves, Beach , Messy Hair and Me…. #goodmorning #world

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भोजपुरी क्वीन मोनालिसा (Monalisa) इन दिनों गोवा में समुंद्र किनारे वैकेशन मना रही हैं और अपनी हॉट फोटोज अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए फैंस के साथ शेयर कर रही हैं. अपने हॉट फिगर से एक बार फिर मोनालिसा (Monalisa) ने फैंस का दिल जीत लिया है और उनके फैंस लगातार उनकी फोटोज पर लाइक्स और कमेट्स की बरसात कर रहे हैं.

 

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Start The Day Right With A Smile! Good Morning Everyone 🙏…. #goodmorning #friends #lovelyday #sunday #vibes #goodvibes

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गोवा में मोनालिसा (Monalisa) एक के बाक एक हॉट पोज देती नजर आ रही हैं. कभी समुंद्र किनारे तो कभी अपने होटल के रूम में मोनालिसा (Monalisa) अपने फैंस को आकर्षित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहीं. इन फोटोज में मोनालिसा (Monalisa) बेहद खूबसूरत लग रही हैं और उनके अलग अलग पोज देख फैंस के दिलों की धड़कने तेज हो रही हैं.

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🖤🖤🖤… #goodmorning #saturday #vibes #weekend

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इस दौरान मोनालिसा (Monalisa) अपने पति विक्रांत सिंह राजपूत (Vikrant Singh Rajpoot) के साथ गोवा में खूब मस्ती कर रही हैं और उनकी फोटोज से दिखाई दे रहा है कि वे वहां खूब एंजौय कर रहे हैं.

 

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Smell The Sea… Feel The Sky … #sunkissed #sunnyday #beach #vibes #beachlover #feelings #goa #diaries

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इससे पहले भी मोनालिसा (Monalisa) ने अपने कई फोटोशूट्स सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं जिसे देख फैंस के होश उड़ जाते हैं. मोनालिसा (Monalisa) दिखने में इतनी खूबसूरत है कि कोई भी उन्हें देख दीवाना हो जाता है. आपको बता दें मोनालिसा (Monalisa) टेलीविजन के पौपुलर रिएलिटी शो बिग बॉस के 10वें (Bigg Boss 10) सीजन का भी हिस्सा रह चुकी हैं.

नैपोटिज्म और मीटू चोंचले हैं -ज्योति त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर प्रतापगढ़ में जनमी ज्योति त्रिपाठी ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद मुंबई यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया. उन के पिताजी प्रेम कुमार त्रिपाठी पेशे से वकील हैं और माता माया त्रिपाठी गृहिणी.

2 बड़े भाइयों सौरभ और मयंक की लाड़ली और घर की सब से छोटी बेटी ज्योति त्रिपाठी अब मुंबई की मायानगरी से रुपहले परदे पर आ रही फिल्म ‘भुतहा’ में लीड रोल में दिखाई दे रही हैं. पेश हैं, इस फिल्म और उन के बारे में पूछे गए सवालजवाब के खास अंश :

आप को यह फिल्म कैसे मिली?

यह फिल्म मुझे अपने परिवार के सहयोग और आशीर्वाद से मिली. रूपेश कुमार सिंह के यकीन और हौसले ने मुझ से यह फिल्म करवाई.

यैलो फ्लेम्स एंटरटेनमैंट के बैनर पर बनी इस फिल्म के डायरैक्टर रूपेश कुमार सिंह हैं, जिसे प्रोड्यूस किया है मुकेश कुमार सिंह ने.

इस फिल्म की कहानी और अपने रोल के बारे में कुछ बताएं?

यह फिल्म एक जर्नलिस्ट लड़की की कहानी है, जो अपने ही औफिस में फंस जाती है और उस के बाद वहां पैरानौर्मल ऐक्टिविटी शुरू हो जाती हैं. वह लड़की किस तरह वहां से बाहर निकलती है, यह जानने के लिए फिल्म जरूर देखें.

एक आम आदमी इस फिल्म को देख कर अपनी कहानी से रिलेट करेगा, क्योंकि किसी भी जगह पर फंस जाना एक बहुत सामान्य सी घटना है.

आप कवयित्री से फिल्म कलाकार कैसे बनीं?

मैं लीक पर चलने वाली लड़की नहीं हूं. मुझे हमेशा कुछ अलग करना पसंद है. किसी के द्वारा बनाए हुए रास्ते पर चलने से बेहतर मैं मानती हूं कि खुद रास्ता बनाओ.

सच पूछो तो मेरे मन में ये कभी नहीं था कि मैं कवयित्री बनूं. मैं थोड़ा बहुत लिख लेती हूं. मंच पर कविताएं सुनाने से लोगों का प्यार मिलने लगा और कब मेरी पहचान कवयित्री के रूप में हुई, मुझे नहीं पता चला.

मैं इलाहाबाद में थिएटर करती थी. वहां ज्यादा स्कोप नहीं दिखा, इसलिए मुंबई आ गई. यहां 5 साल थिएटर किया. ‘परमावतार श्रीकृष्ण’ सीरियल में काम भी मिला, लेकिन पहचान नहीं बन पाई, इसलिए 3-4 महीने बाद वह सीरियल मैं ने छोड़ दिया. उस के बाद मुझे फिल्म ‘भुतहा’ मिली.

ओटीटी प्लेटफार्म पर कोई फिल्म रिलीज होने से कलाकार को क्या फायदा और नुकसान होता है?

देखिए, एक कलाकार के लिए उस का काम माने रखता है, बजाय उस के कि फिल्म रिलीज कहां पर हो रही है. सिनेमा अब पूरी तरह से बदल चुका है. पहले लोग सिनेमाघर में जा कर फिल्में देखते थे, अब वह दौर चला गया. आज के समय में एक छोटे से फोन में पूरी दुनिया समा गई है. ओटीटी प्लेटफार्म आने से बहुत सारे कलाकारों को काम मिला है. इस से नुकसान कुछ भी नहीं है, सिर्फ फायदा है.

क्या भविष्य में भी आप को फिल्में ही करनी हैं? अगर हां, तो कोई नया प्रोजैक्ट?

बिलकुल फिल्में करनी हैं. वैब सीरीज की भी कहानी मुझे अच्छी लगेगी, तो मैं करूंगी. कई प्रोजैक्ट पर बात चल रही है.

नाम से ही यह फिल्म डरावनी लग रही है. इस तरह की फिल्म से कैरियर शुरू करने से कहीं आप एक टाइप के किरदारों में ही तो बंध कर नहीं रह जाएंगी?

कैरियर की शुरुआत किसी भी जौनर फिल्म से हो, खास बात है शुरुआत होना. एक टाइप के किरदार में बंधना या न बंधना यह तो मेरी चौइस होगी. यह बात सच है कि आप जिस तरह के काम करते हैं भविष्य में आप को उसी तरह के काम औफर होते हैं. मैं बंध कर नहीं हर तरह के किरदार करना पसंद करूंगी.

छोटे शहर की लड़कियों के लिए फिल्म इंडस्ट्री में स्ट्रगल करने के क्या माने हैं? किस तरह के समझौते करने पड़ते हैं?

शहर भले छोटा हो पर सपने अगर आप ने बड़े देखे हैं, तो कुछ माने नहीं रखता. हम कौन से मांबाप के यहां जन्म ले रहे हैं, यह हमारे हाथ में नहीं है. हम किस शहर में पैदा हो रहे हैं, यह हमारे हाथ में नहीं है. हम गोरे पैदा हो रहें कि सांवले, यह हमारे हाथ में नहीं है. हमारे हाथ में है तो सिर्फ हमारी लगन, हमारी मेहनत, हमारा विश्वास हमारा दृढ़ संकल्प.

फिल्म दुनिया में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां छोटे शहर से आई लड़कियों ने अपना मुकाम बनाया है. रही बात समझौते की तो यह लोगों की गलतफहमी है कि लड़कियों को समझौते करने पड़ते हैं. अगर समझौतों से ही काम मिलता तो यहां हर लड़की आज स्टार होती. अगर आप में टैलेंट नहीं है तो आप कैमरे के सामने क्या दिखाएंगे? आप कैमरे के सामने अपनी ऐक्टिंग दिखाते हैं, समझौते नहीं.

कोरोना काल में कलाकारों के काम करने में क्या बदलाव आया है?

कोरोना की वजह से कई फिल्मों और सीरियल की शूटिंग रोक दी गई थी. ज्यादातर कलाकार बाहर के हैं तो तकरीबन सब वापस चले गए थे, पर अब धीरेधीरे सब लौट रहे हैं. काम भी अपनी रफ्तार पकड़ चुका है.

अमूमन यह माना जाता है कि किसी डरावनी फिल्म की हीरोइन के उस में हौट सीन होंगे? क्या इस फिल्म में भी ऐसा ही देखने को मिलेगा?

अभी तक क्या होता आया है हम सब इन से परे हैं. इस फिल्म के डायरैक्टर रूपेश कुमार सिंह ने लीक से हट कर हर मुद्दे पर काम किया है. उन का कहना है कि हौरर फिल्मों में क्या होता आया है, अगर हम भी वही करेंगे तो हम अलग कैसे हुए.

आज हर इनसान होशियार है. वह घिसीपिटी चीजें नहीं देखना चाहता है, बल्कि वह कुछ अलग देखना चाहता है. इस फिल्म में आप को हर वह चीज देखने को मिलेगी, जो अभी तक नहीं हुई.

दुनिया में कुछ फिल्में सिंगल करैक्टर को ले कर बनाई गई हैं, लेकिन फिल्म ‘भुतहा’ इसलिए अलग है कि इस में किसी एक तसवीर का भी इस्तेमाल नहीं किया गया. एक औफिस के अंदर ही पूरी कहानी है. बाकी फिल्मों में कहीं तसवीर दिखी है तो कहीं भीड़.

जहां एक तरफ लोग क्राइम और सैक्स परोस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘भुतहा’ एक साफसुथरी फिल्म है, जिसे आप अपने परिवार के साथ बैठ कर देख सकते हैं.

नैपोटिज्म और मीटू मुहिम जैसे मुद्दों पर आप की राय क्या है? क्या आप के सामने भी ऐसे हालात आए हैं?

मैं इन दोनों चीजों को कोई मुद्दा मानती ही नहीं. ये सब चोंचले हैं. नैपोटिज्म कहां नहीं है. हर इनसान अगर अपने लोगों को ही बढ़ाना चाहता है तो इस में गलत क्या है? हां, मैं यह गलत मानती हूं कि किसी का हक न छीना जाए.

रही बात मीटू कि तो ये पानी के बुलबुले हैं जिन का वजूद कुछ सैकंड बाद खत्म हो जाता है. यहां लोग सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए सालों बाद उठ कर आते हैं और आरोप लगाते हैं. अगर आप में हिम्मत है और आप को कुछ भी गलत लग रहा है तो आप तुरंत बोलिए खासकर फिल्मी दुनिया में मैं ऐसा नहीं मानती, क्योंकि इस दुनिया में लोग आप की मरजी के बिना आप को देखेंगे भी नहीं, मीटू तो बहुत दूर की बात है. मेरे साथ कभी ऐसा नहीं हुआ.

इन तकनीको से ज्यादा समय तक याद रखें !

सर्दियों में पढ़ाई पर विशेष ध्यान देना होगा, जल्द ही आपके बोर्ड परीक्षा होने वाले है , वहीं अगर आप टॉप कॉलेज में  नामांकन के लिए आयोजित होने वाले परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है, आप के लिए भी यह समय बहुत खास है, 3 महीने के उपरांत आप सभी का परीक्षा होने वाला है , तो आईए जानते है, 06 विंदुओ में  कैसे नए तकनीक के मदद से पढ़े और कम समय में अधिक टॉपिक याद रखे.

  1. अपना नोट्स खुद बनाये – आज सूचना क्रांति के इस युग में इंटरनेट ने शिक्षा को एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया है. जिसके चलते युवाओं की पढ़ाई के तरीके में काफी बदलाव आ गया है. पहले इतिहास, भूगोल, हिंदी जैसे किसी भी विषय को विद्यार्थी पहले बार बार पढ़कर बोल-बोलकर याद किया करते थे. वहीं अब इन विषयों को विद्यार्थी एक टेक्निकल एप्रोच के साथ पढ़ते हैं. जिसमें वे चार्ट बनाकर या फिर एक पूरा पैटर्न बनाकर विषयों को समझते और याद करते हैं. जिससे न तो उन्हें विषय बोरिंग लगते हैं और वे उन्हें लंबे समय तक भी याद रख पाते हैं.

2. चार्ट पैटर्न – बैंक परीक्षाओं की तैयारी करने वाली मनीषा का कहना है कि याद करने का सबसे बेस्ट तरीका चार्ट पैटर्न है. इसमें कम शब्दों में एक पेज में सारी महत्वपूर्ण जानकारी सही सही रूप में आ जाती है. जिससे दो-तीन बार ध्यान से पढ़ने पर सारी जानकारी याद हो जाती है. मै अपने सभी छात्रों का इसका सुझाव देती हूँ . अब छात्र एग्जाम के समय इसी पैटर्न से पढ़ाई करते हैं. इससे कम समय में मैं किसी भी टॉपिक का अधिक से अधिक पोर्शन कवर कर लेती हूं.

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3. शॉर्ट फार्म से होती आसानी- बॉयो सब्जेक्ट लेकर पढ़ाई कर रहे छात्रों को अक्सर यह परेशानी होती है कि उन्हें बॉटनी, जूलॉजी और केमेस्ट्री में टॉपिक्स को याद रखने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. सबसे ज्यादा दिक्कत होती है पौधों और पशु-पक्षियों के वैज्ञानिक नाम और केमेस्ट्री में केमिकल रिएक्शन से जुड़ी चीजों को याद रखने में. अब इन्हें याद रखने के लिए युवाओं ने एक नया रास्ता खोज लिया है. जिसमें किसी भी प्राणी के वैज्ञानिक नाम का पहले और आखिरी अक्षर को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म तैयार कर लेते हैं. जिससे वे नाम उन्हें आसानी से याद हो जाते हैं.

4. पीक्यूआरएसटी पैटर्न – पढ़ाई का सबसे बेस्ट तरीका है पीक्यूआरएसटी पैटर्न. जिसमें पी का अर्थ है प्रीव्यू मतलब पढ़ने से पहले विषय पर एक सरसरी नजर डालना. उसके पश्चात उस विषय से संबंधित क्वेश्चन तैयार करना. फिर उस टॉपिक को ध्यान से पढ़ते हुए निकाले गए प्रश्नों के उत्तर तैयार करना. इसके पश्चात तैयार उत्तरों का सेल्फ रेसीटेशन करना और अंत में याद किए हुए विषय का सेल्फ टेस्ट लेना.यह पैटर्न जहां पढ़ाई को रोचक बनाता है, वहीं इसके माध्यम से विद्यार्थी लम्बे समय तक विषय को याद रख सकते हैं. इसके लिए वह जो भी टॉपिक पढ़ रहे हैं उसे अपने आस-पास के माहौल से जोड़ते चलते है जिससे उन्हें उस विषय को याद रखने में आसानी होती है. तो वहीं थोड़ा सा भी क्लिक होने पर एग्जाम टाइम पर बेहतर ढंग से लिख पाते हैं.

5. पहले अक्षर से याद – कुछ शब्द बहुत कठिन होने है, लेकिन उन्हें भी याद रखना पड़ता है, इसके लिए आप नोट्स बनाते समय महत्वपूर्ण टॉपिक्स के पहले लेटर को कोड करते हुए एक स्पेशल वर्ड बना सकते हैं. जिससे हल्का रिवीजन करने से भी वह टॉपिक माइंड में सेट हो जाता है.

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6. स्पाइडर नोट टेक्निक – जब किसी विशालकाय टॉपिक के नोट्स बनाने होते हैं तो छात्र इस पैटर्न का उपयोग करते हैं. विद्यार्थी सोशलॉजी व हिस्ट्री के नोट्स तैयार करने में ज्यादातर इसका प्रयोग किया करते हैं, जिसके अंतर्गत वह किसी पाइंट को केंद्र में रखकर उससे संबंधित महत्वपूर्ण बिन्दुओं की एक श्रेणी तैयार कर लेते हैं, जिससे उस टॉपिक से संबंधित सारे महत्वपूर्ण बिन्दु दिमाग में बैठने के साथ ही शॉर्ट नोट्स के रूप में तैयार हो जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में कोरोना का ‘भयावह दंश’

छत्तीसगढ़ में राजनीतिक और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है कि कोरोना आज अपने उफान भयावह रूप में छत्तीसगढ़ में पैर पसार चुका है. सनद रहे कि जब देश में कोरोना वायरस फैला हुआ था छत्तीसगढ़ निष्कंटक था. मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और प्रशासनिक सूझ बूझ के अभाव  का परिणाम यह हुआ कि दीगर  प्रांतों में छत्तीसगढ़ के पलायन करने वाले लाखों श्रमिक मजदूर वापस लौट आए और कोरोना गांव गांव में फैल गया. आज स्थिति छत्तीसगढ़ में भयावह होती चली जा रही है उसका सीधा सीधा कारण है सरकार का लापरवाही भरा रूख. छत्तीसगढ़ शायद पहला प्रदेश है जहां सरकार शराब दुकानें खोलने के लिए लालायित दिखी यही नहीं अन्य दुकानों बाजारों पर प्रतिबंधात्मक धाराएं लगाई जा रही थी वहीं सरकार के वरदहस्त में  शराब दुकानें सुबह 10 बजे से लेकर देर शाम तक खुली रहती थी जहां भारी भीड़ उमड़ रही थी. लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि जब कोरोना वायरस शराब की सरकारी दुकानों में फैल और प्रसारित नहीं हो रहा है तो फिर दूसरी दुकाने बाजार क्यों बंद करवाए जा रहे हैं. इसी दो मुंही  नीति के कारण कोरोना वायरस छत्तीसगढ़ में फैलता चला गया और अब स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है. प्रदेश में लोगों पर कोरोना का दंश कुछ इस कदर तारी हो गया है कि लोग मर रहे हैं इलाज नहीं मिल रहा है मगर शासकीय स्तर पर जिस तरह पहले अलर्ट की स्थिति थी अब वैसी दिखाई नहीं देती और ऐसा लगता है मानो लोगों को उनके भाग्य के भरोसे पर छोड़ दिया गया है.

कोरोना: गंभीर आरोप( एक)

पूर्व  विधानसभा अध्यक्ष और प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं उन्होंने कहा है- प्रदेश सरकार कोरोना से जुड़ी जो मेडिकल बुलेटिन जारी करती है, वह झूठी है!. उन्होंने  दावा करते हुए कहा है कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने भी कोरोना को लेकर छत्तीसगढ़ के हालत पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने बताया कि पहले हर दिन विभाग द्वारा मेडिकल बुलेटिन जारी किया जाता था और जिलेवार कितनी मृत्यु कोरोना से हुई है, यह आंकड़ा दिया जाता था. लेकिन 10-12 दिन से जो बुलेटिन जारी हो रहे हैं, उसमें यह बताया जा रहा है कि पिछले 24 घंटे में और पुराने दिनों में कितनी मृत्यु हुई है.

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कौशिक ने जानना चाहा है कि प्रदेश की सरकार कोरोना से होनी वाली मृत्यु को क्यों छुपाना चाह रही थी, क्यों सरकार इन्हें रिपोर्ट में शामिल नहीं कर रही थी. जिन अधिकारियों ने पहले रिपोर्ट दी क्या उन्होंने गलत रिपोर्ट दी है या सरकार के बड़े अधिकारियों के निर्देश पर कोरोना से होने वाली मृत्यु को नहीं जोड़ा है. अगर ऐसा है तो सरकार, गलत जानकारी देने वालों पर क्या कार्रवाई करेगी.  सनद रहे कि छत्तीसगढ़ में कोरोना कोविड 19 से कुल संक्रमितों की संख्या में छत्तीसगढ़ देश में 14वें स्थान पर है. धरम लाल कौशिक ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है बुलेटिन सरकार की तरफ से जारी किया गया एक शासकीय दस्तावेज है

उसमें झूठी जानकारी देना निश्चित तौर पर जनता को गुमराह करने का आपराधिक काम है.

कोरोना : गंभीर आरोप ( दो)

विरोधी पक्ष के गंभीर आरोप के प्रत्युत्तर में भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने कहा है – हम कुछ नहीं छुपाते हैं हाल ही में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में  सरकार के द्वारा बताए जा रहे आंकड़ों पर सवाल उठे हैं दरअसल, राज्य के सभी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को कोरोना संक्रमण से हुई मृत्यु के आंकड़े शासन स्तर पर तत्काल भेजने के निर्देश समय पर दिए जाते हैं. लेकिन अस्पतालों द्वारा समय पर दस्तावेज उपलब्ध न कराए जाने के कारण भी जानकारी मिलने तथा उसकी पुष्टि करने में देर होती है. मीडिया बुलेटिन में मृत्यु की जानकारी ,जिलों से प्राप्त जानकारी एवं संबंधित दस्तावेजों से पुष्टि के बाद प्रकाशित की जाती है।.जैसे-जैसे संबंधित जिलों से मृत्यु की जानकारी मिलती है उसे मीडिया बुलेटिन में शामिल किया जाता है.विभाग द्वारा मृत्यु के आंकड़े छुपाए नही  जा रहे बल्कि जानकारी प्राप्त होने के बाद उन्हें बुलेटिन में शामिल किया जाता है. इस तरह अगर इस सफाई की विवेचना करें तो स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि सरकार की करनी और कथनी में कितना अंतर है उन्होंने जैसे गंभीर मामले में इस तरह की लापरवाही को क्षम्य नहीं माना जा सकता. दरअसल, सरकारी अमला कुंभकरण निद्रा में काम कर रहा है इस भयावह  समय में भी चिकित्सा और चिकित्सकीय अमला गंभीर लापरवाही  कर रहा है जो सुर्खियों में रहता है. सरकार के जिम्मेवार मंत्री और अधिकारी कोरोना के संदर्भ में आम लोगों अथवा मीडिया से आमने सामने दो-चार होने से भी कतराते रहते हैं जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार का अमला कितना लाचार होकर काम कर रहा है.

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छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ जीआर पंजवानी कहते हैं- कोरोना के संदर्भ में अच्छा होता कि मानवीय संवेदना का परिचय सरकार और चिकित्सा विभाग देता मगर इसमें भारी कमी दिखाई दे रही है.

सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर रमाकांत के अनुसार कोरोना में मृत लोगों के शव जिस तरह चिकित्सा विभाग द्वारा डिस्पोजल किए जाते हैं वह आपत्तिजनक है और मानव अधिकार के भी खिलाफ है. अच्छा हो सरकार इलेक्ट्रिक शव दाह गृह प्रदेश के प्रत्येक जिले में निर्मित करवाए ताकि लोगों को कम से कम अंतिम संस्कार सम्मान पूर्वक गरिमा पूर्वक हो सके.

स्वदेश के परदेसी : कहां दफन हुई अलाना की इंसानियत

स्वदेश के परदेसी : भाग 4

घटना वाले दिन जब एंड्रिया वहां नोट्स लेने पहुंची तो ट्यूटर के यहां उस का एक साथी भी मौजूद था. दोनों ने बारीबारी से एंड्रिया के साथ जोरजबरदस्ती की और अपने मोबाइल में उस का वीडियो भी बना लिया. उन्होंने एंड्रिया को धमकाया कि वह इस बारे में किसी से कुछ न कहे. बस, आगे भी ऐसे ही उन से मिलने आती रहे. अगर वह उन की बात नहीं मानेगी तो वे उस का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देंगे. उन के लाख समझाने पर भी एंड्रिया चिल्लाचिल्ला कर कहती रही कि वह चुप नहीं बैठेगी और उन दोनों को उन के किए की सजा दिलवा कर चैन लेगी. जब वह नहीं मानी तो उन्होंने गला दबा कर उस की हत्या कर दी और लाश के टुकड़े कर के एक ब्रीफकेस में भर कर यमुना नदी में फेंक आए.

मुजरिमों की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद ही यीरंग को आस्ट्रेलिया से एक अच्छा जौब औफर मिल गया. वह और अलाना एक नई शुरुआत करने के लिए वहां प्रवास कर गए. उन्हें आस्ट्रेलिया आए हुए अब तक करीब 5 साल हो चुके थे और मासूम एंड्रिया को दुनिया छोड़े हुए करीब 6 साल. मगर उस की मौत से मिले जख्म थे कि सूखने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जबजब इन जख्मों में टीस उठती, दिल का दर्द शिद्दत पर पहुंच कर दिन का चैन और रातों की नींद हराम कर के रख देता.

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एंड्रिया की सारी भौतिक यादें दिल्ली में ही छोड़ दी गई थीं पर क्या भावनात्मक यादों की परछाइयां पीछे छूट पाई थीं? कोई न कोई बात उत्प्रेरक बन कर यादों के बवंडर ले आती. आज मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल की खबर उत्प्रेरक बनी थी तो कल कुछ और होगा…कुल मिला कर जीवन में अमन नहीं था. दुनिया के लिए एंड्रिया 6 साल पहले मर चुकी थी पर अलाना के लिए आज तक वह उस के दिलदिमाग में रह कर उस की सभी दुनियावी खुशियों को मार रही थी.

‘‘मैडम, एनीथिंग एल्स?’’ बैरे की आवाज पर अलाना चौंकी और यादों के भंवर से बाहर आई. उस ने घड़ी पर नजर डाली. उसे कैफे में बैठेबैठे 2 घंटे से ज्यादा हो चुके थे. शुष्क मौसम की वजह से कौफी का खाली प्याला सूख चुका था. मेनलैंड के लोगों के व्यवहार की शुष्कता ने अलाना के अंदर की इंसानियत को भी सुखा दिया था. इस शुष्कता का प्रभाव इतना ज्यादा था कि आज मनमीत सिंह की हत्या की खबर भी आंखों में नमी नहीं ला पाई. खुद के साथ हुए हादसों ने मानवता के प्रति उस के दृष्टिकोण को संकुचित कर दिया था.

अब आंखें नम होती तो थीं पर केवल व्यक्तिगत दुख से. वह नफरत बांट रही थी नफरत के बदले. क्या वह समस्या का निदान कर रही थी या फिर जानेअनजाने में खुद समस्या का हिस्सा बनती जा रही थी?

अलाना ने एक और कैपीचीनो और्डर की. शायद दिमाग को थोड़ी सी ताजगी की जरूरत थी. वह सड़ीगली यादों से छुटकारा चाहती थी. वो यादें जो कि उस के वर्तमान को कैद किए बैठी थीं भूतकाल की सलाखों के पीछे.

कैपीचीनो खत्म करते ही वह तेज कदमों से कैफे से बाहर निकल आई. एक निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थी वह. एक ताजा हवा का झोंका उस के चेहरे को छूता हुआ गुजरा तो उस ने आकाश की ओर निहारा, जाने क्यों आकाश आज और दिनों की भांति ज्यादा स्वच्छ लग रहा था. उसे घर पहुंचने की जल्दी न थी, इसलिए उस ने स्वान नदी की तरफ से एक लंबा सा ड्राइव लिया. नदी, वायु, आकाश, पेड़पौधे, पक्षी सभी तो हमेशा से थे यहां. जाने क्यों कभी उस का ही ध्यान नहीं गया था अब तक इन खूबसूरत नजारों की ओर. उस ने सोचा, चलो कोई बात नहीं, जब आंख खुले उसी लमहे से एक नई सुबह मान कर एक नई शुरुआत कर देनी चाहिए.

शाम को यीरंग के घर वापस आते ही अलाना ने उस को अपना फैसला सुनाया, ‘‘यीरंग, मैं भी कल मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल में चलूंगी तुम्हारे साथ. तुम ठीक ही कहते हो ‘टू रौंग्स कांट सेट वन राइट’.’’

‘‘मुझे तुम से ऐसी ही उम्मीद थी, अलाना. गलती तो हम भी करते हैं. जो थोड़े से फ्रैंड्स मैं ने और तुम ने दिल्ली में बनाए थे, क्या दिल्ली से चले आने के बाद हम ने उन से कोई संबंध रखा? दोस्ती के पौधे के दिल के आंगन में उग आने के बाद, उस की परवरिश के लिए मेलमिलाप के जिस खादपानी की जरूरत होती है क्या वह सब हम ने दिया? नहीं न, तो फिर हम पूरा दोष दूसरे पर मढ़ कर खुद का दामन क्यों बचा लेते हैं.

‘‘जब कोई परिवर्तन लाने का प्रयास करो तो यह अभिलाषा मत रखो कि परिवर्तन तुम्हें अपने जीवनकाल में देखने को मिल जाएगा. हां, अगर सच्चे मन से परिवर्तन लाने की चेष्टा करो तो बदलाव जरूर आएगा और उस का लाभ आने वाली पीढि़यों को अवश्य होगा.’’

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‘‘सही बात है, यीरंग. बहुत से वृक्ष ऐसे होते हैं जिन्हें लगाने वाले उन के फलों का आनंद कभी नहीं ले पाते. मगर फिर भी वे उन्हें लगाते हैं अपनी अगली पीढ़ी के लिए. शायद इसी तरह से कुछ इंसानी रिश्तों के फल भी देर में मिलते हैं. वक्त लगता है इन रिश्तों के अंकुरों को वृक्ष बनने में. एक न एक दिन इन वृक्षों के फल प्रेम की मिठास से जरूर पकते हैं. मगर, पहली बार किसी को तो बीज बोना ही होता है. तुम ने एक बार मुझ से कहा था कि ‘आज भी दुनिया में अच्छे लोगों की संख्या ज्यादा है, इसीलिए यह दुनिया चल भी रही है. जिस दिन यहां बुरे लोगों का प्रतिशत बढ़ेगा, यह दुनिया खत्म हो जाएगी.’ तुम सही थे, यीरंग, तुम बिलकुल सही थे.’’

और दूसरे दिन ‘स्वदेश के परदेसी’ अलाना और यीरंग आस्ट्रेलिया की भूमि पर पूर्णरूप से देसी बन कर अपने देसी भाई मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल में शामिल होने के लिए सब से पहले पहुंच गए थे.

गहरी पैठ

हाथरस, बलरामपुर जैसे बीसियों मामलों में दलित लड़कियों के साथ जो भी हुआ वह शर्मनाक तो है ही दलितों की हताशा और उन के मन की कमजोरी दोनों को दिखाता है. 79 सांसदों और 549 विधायक जिस के दलित हों, वह भारतीय जनता पार्टी की इस बेरुखी से दलितों पर अत्याचार करते देख रही है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि दलित आवाज नहीं उठाएंगे.

पिछले 100 सालों में पहले कांग्रेसी नेताओं ने और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने जम कर पौराणिक व्यवस्था को गांवगांव में थोपा. रातदिन पुराणों, रामायण, महाभारत और लोककथाओं को प्रवचनों, कीर्तनों, यात्राओं, किताबों, पत्रिकाओं, फिल्मों व नाटकों से फैलाया गया कि जो व्यवस्था 2000 साल पहले थी वही अच्छी थी और तर्क, तथ्य पर टिकी बराबरी की बातें बेकार हैं.

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जिन लोगों ने पढ़ कर नई सोच अपनाई थी उन्हें भी इस में फायदा नजर आया चाहे वे ऊंची जातियों के पढ़े-लिखे सुधारक हों या दलितों के ही नेता. उन्हें दलितों में कम पैसे में काम करने वालों की एक पूरी बरात दिखी जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते थे.

यही नहीं, दलितों के बहाने ऊंची जातियों को अपनी औरतों को भी काबू में रखने का मौका मिल रहा था. जाति बड़ी, देश छोटा की बात को थोपते हुए ऊंची जातियों ने दहेज, कुंडली, कन्या भ्रूण हत्या जम कर अपनी औरतों पर लादी. औरत या लड़की चाहे ऊंची जाति की हो या नीची, मौजमस्ती के लिए है. इस सोच पर टिकी व्यवस्था में सरकार, नेताओं, व्यापारियों, अफसरों, पुलिस से ले कर स्कूलों, दफ्तरों में बेहद धांधली मचाई गई.

हाथरस में 19 साल की लड़की का रेप और उस से बुरी तरह मारपीट एक सबक सिखाना था. यह सबक ऊंची जातियां अपनी औरतों को भी सिखाती हैं, रातदिन. अपनी पढ़ीलिखी औरतों को रातदिन पूजापाठ में उलझाया गया. जो कमाऊ थीं उन का पैसा वैसे ही झटक लिया गया जैसा दलित आदमी औरतों का झटका जाता है. जिन आदमियों को छूना पाप होता है, उन की औरतों, बेटियों के गैंगरेप तक में पुण्य का काम होता है. यह पाठ रोज पढ़ाया जाता है और हाथरस में यही सबक न केवल ब्राह्मण, ठाकुर सिखा रहे हैं, पूरी पुलिस, पूरी सरकार, पूरी पार्टी सिखा रही है.

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दलितों के नेता चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि जिन का उद्धार नहीं हुआ उन्हें तो पाप का फल भोगना होगा. मायावती जैसे नेता तो पहले ही उन्हें छोड़ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी के 79 सांसद और 549 विधायक अपनी बिरादरी से ज्यादा खयाल धर्म की रक्षा के नाम पर पार्टी का कर रहे हैं. दलित लड़कियां तो दलितों के हाथों में भी सुरक्षित नहीं हैं. यह सोच कर इस तरह के बलात्कारों पर जो चुप्पी साध लेते हैं, वही इस आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं.

सरकार की हिम्मत इस तरह बढ़ गई है कि उस ने अपराधियों को बचाने के लिए पीडि़ता के घर वालों पर दबाव डाला और हाथरस के बुलगढ़ी गांव को पुलिस छावनी बना कर विपक्षी दलों और प्रैस व मीडिया को जाने तक नहीं दिया. वे जानते हैं कि जाति शाश्वत है. यह हल्ला 4 दिन में दब जाएगा.

बिहार चुनावों की गुत्थी समझ से परे हो गई है. भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार का साथ भी दे रही है और उसी के दुश्मन चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी से भी मिली हुई है. इस चक्कर में हाल शायद वही होगा जो रामायण और महाभारत के अंत में हुआ. रामायण में अंत में राम के पास न सीता थी, न बच्चे लवकुश, न लक्ष्मण, न भरत. महाभारत में पांडवों के चचेरे भाई मारे भी जा चुके थे और उन के अपने सारे बेटेपोते भी.

लगता है कि हिंदू पौराणिक कथाओं का असर इतना ज्यादा है कि बारबार यही बातें दोहराई जाती हैं और कुछ दिन फुलझड़ी की तरह हिंदू सम्राट का राज चमकता है, फिर धुआं देता बुझ जाता है. बिहार में संभव है, न नीतीश बचें, न चिराग पासवान.

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जो स्थिति अब दिख रही है उस के अनुसार चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार भाजपा की सहयोगी पार्टी सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ उम्मीदवार खड़ी करेगी. वे कितने वोट काटेंगे पता नहीं, पर चिराग पासवान के पास अगर अभी भी दलित व पासवान वोटरों का समर्थन है तो आश्चर्य की बात होगी, क्योंकि चिराग पासवान जाति के नाम पर वोट ले कर सत्ता में मौज उठाने के आदी हो चुके हैं. हो सकता है कि उन्हें एहसास हो गया हो कि नीतीश कुमार निकम्मेपन के कारण हारेंगे तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ गठबंधन करने में आसानी रहेगी और तब वे भाजपा को 2-4 बातों पर कोस कर अलग हो जाएंगे.

जो भी हो, यह दिख रहा है कि कम से कम नेताओं को तो बिहार की जनता की चिंता नहीं है. बिहार की जनता को अपनी चिंता है, इस के लक्षण दिख नहीं रहे, पर कई बार दबा हुआ गुस्सा वैसे ही निकल पड़ता है जैसे 24 मार्च को लाखों मजदूर दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु से पैदल ही बिहार की ओर निकले थे. वह हल्ला का परिणाम था, चुनावों में गुस्से का दर्शन हो सकता है.

बिहार के मुद्दे अभी तक चुनावी चर्चा में नहीं आए हैं. बिहार में बात तो जाति की ही हो रही है. बिहार की दुर्दशा के लिए यही जिम्मेदार है कि वहां की जनता बेहद उदासीन और भाग्यवादी है. उसे जो है, जैसा है मंजूर है, क्योंकि उसे पट्टी पढ़ा दी गई है कि सबकुछ पूजापाठी तय करते हैं, आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं है.

बिहार देश की एक बहुत बड़ी जरूरत है. वहां के मजदूरों ने ही नहीं, वहां के शिक्षितों और ऊंची जाति के नेताओं ने देशभर में अपना नाम कमाया है. बिहार के बिना देश अधूरा है पर बिहार में न गरीब की पूछ है, न पढ़ेलिखे शिक्षित की चाहे वह तिलकधारी हो या घोर नास्तिक व तार्किक. ऐसा राज्य अपने नेताओं के कारण मैलाकुचला पड़ा रहे, यह खेद की बात है और नीतीश कुमार जीतें या हारें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

स्वदेश के परदेसी : भाग 3

इस से आगे सबकुछ शून्य हो चुका था. अलाना को इंस्पैक्टर की आवाज किसी गहरे कुएं से आती सी प्रतीत हो रही थी. वह और यीरंग जिस हालत में बैठे थे, उसी में पुलिस थाने पहुंच गए. बौडी छोटेछोटे टुकड़ों में पड़ी मिली, लाश का चेहरा तेजाब छिड़क कर बिगाड़ दिया गया था. फिर भी बाएं हाथ पर बना बिच्छू का टैटू उस मृत मानव शरीर को एंड्रिया की लाश होने की पुष्टि साफसाफ कर रहा था.

सबकुछ प्रत्यक्ष था. फिर भी अलाना का दिल इस हृदयविदारक सच को झुठलाने की असफल कोशिश कर रहा था. वह जानती थी कि यह विक्षिप्त देह खूबसूरत एंड्रिया की ही है पर मन को सच स्वीकार नहीं था. डीएनए रिपोर्ट के आने में अभी 24 घंटे बाकी थे. लमहालमहा एकएक सदी सा प्रतीत हो रहा था. आखिर वक्त गुजरा और डीएनए रिपोर्ट भी आई, वह भी एंड्रिया की हत्या की पुष्टि के साथ.

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जब तक एंड्रिया जीवित थी, अलाना को उस से कुछ खास मोह न था. दोनों बहनों का परस्पर लगाव औसत दर्जे का ही था. अलाना ने यीरंग के साथ नईनई दुनिया बसाई थी. वे दोनों एकांत चाहते थे. परंतु एंड्रिया के साथ आ कर रहने से एकांत मिलना काफी हद तक नामुमकिन हो गया था. उन जैसों से मकान मालिक वैसे ही डेढ़दो गुना किराया वसूल करते थे, ऊपर से एंड्रिया की वजह से उन्हें एक बैडरूम ज्यादा लेना पड़ा था. इसलिए उन के खर्चे बढ़े थे. इस कारण भी अलाना को छोटी बहन महज एक जिम्मेदारी लगती थी.

वह मन ही मन मिन्नतें करती थी कि जल्दी से जल्दी एंड्रिया की पढ़ाई पूरी हो और वह उस की जिम्मेदारी से मुक्त हो कर चैन की सांस ले. अलाना को भान नहीं था कि उसे एंड्रिया की जिम्मेदारी से इतनी जल्दी, इस रूप में मुक्ति मिलेगी.

ग्लानिबोध से अलाना को अपनेआप से घृणा होती. वह घंटों एंड्रिया की तसवीर के आगे बैठी रहती, तो कभी वह एंड्रिया के वौयलिन के तारों को छूती उस की कोमल उंगलियों के स्पर्श को महसूस करने की कोशिश करती. वह बाथरूम में जा कर एंड्रिया के तौलिए से अपना चेहरा ढक कर तौलिए की खुशबू में छोटी बहन के एहसास के कतरों को ढूंढ़ने का प्रयास करती.

एंड्रिया जब तक थी तब तक अलाना के लिए कुछ खास नहीं थी, पर मरने के बाद वह उस के अंदर समा कर उस का हिस्सा बन गई. दिनरात छोटी बहन को याद कर के अलाना की आंखों से अविरल अश्रुधारा बहती रहती.

एंड्रिया के मर्डर की गुत्थी का कोई

सुराग नहीं मिल रहा था. मिजोरम सरकार केंद्र सरकार पर निरंतर दबाव डाल रही थी. जगहजगह सामूहिक प्रदर्शन और धरने हो रहे थे. मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. अलाना को अब दिल्ली से घृणा हो चुकी थी. वह सबकुछ छोड़ कहीं दूर चली जाना चाहती थी जहां इन रंजीदा यादों का कोई भी अवशेष न हो. उसे कहीं से पता चला कि आस्ट्रेलिया में डेटा साइंटिस्ट्स के पेशे में आगे बढ़ने के अच्छे अवसर हैं. इस तथ्य को केंद्र बना कर वह यीरंग पर आस्ट्रेलिया चलने के लिए दबाव डालने लगी.

‘आस्ट्रेलिया जा कर क्या करेंगे, अलाना, अपना देश, अपना देश होता है,’ यीरंग तर्क करता.

‘किस बात का अपना देश. पहले ही बहुतकुछ खो चुके हैं हम यहां. अब और क्या खोना चाहते हो तुम…सैप्टिक होता तो बौडी पार्ट भी काट देना पड़ता है. जब मेनलैंड के वासी हमें इंडियन नहीं मानते तो हम क्यों दिल जोड़ कर बैठे हैं सब से. कुछ नहीं हैं हम यहां, सिवा स्वदेश के परदेसी होने के.’

‘लोगों की सोच बदल रही है, अलाना. धीरेधीरे और बदलेगी. अब उत्तर भारत में से प्रोफैशनल लोग मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु में जाने लगे हैं और दक्षिण भारत से दिल्ली, गुड़गांव में आने लगे हैं. 30 साल पहले यह चलन इतना नहीं था. यह मेलजोल समय के साथ और मिलनेजुलने पर ही संभव हो पाया है.

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नौर्थईस्ट के लोगों का दिल्ली आना अभी नई शुरुआत है. वक्त के साथ इस संबंध में भी अनुकूलन बढ़ेगा और आपसी ताल्लुकात में सुधार आएंगे. टू रौंग्स कांट सेट वन राइट. अलाना समझने की कोशिश करो,’ यीरंग अलाना को समझाने का भरसक प्रयास करता.

‘भारतीय नागरिकता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. फिर हमें अपने ही देश में बारबार अपना पासपोर्ट क्यों दिखाना पड़ता है. क्यों हम से उम्मीद की जाती है कि हम अपने माथे पर ‘हम भारतीय ही हैं’ की पट्टी लगा कर घूमें. हम से निष्ठापूर्ण आचरण की आशा क्यों की जाती है जब हमारे इतिहास का कहीं किसी पाठ्यक्रम में जिक्र नहीं, हमारे क्षेत्र के विकास से सरकार का कोई लेनादेना नहीं. मेनलैंड में हमें छूत की बीमारी की तरह माना जाता है. कुछ नहीं मिला हमें यहां, मात्र उपेक्षा के. क्या हमारी गोरखा रेजीमैंट के जवानों का कारगिल युद्ध में योगदान किसी दूसरी रेजीमैंट्स से कम था?’ अलाना सचाई के अंगारे उगलती.

उन्हीं दिनों एंड्रिया का एक मित्र, जो एंड्रिया के गायब होने वाले दिन ही गुवाहाटी चला गया था, अचानक दिल्ली वापस आ गया. वापस आने पर उसे जैसे ही एंड्रिया के दूसरे मित्रों से उस की संदिग्ध मौत का समाचार मिला तो वह तत्काल ही अलाना से मिलने पहुंचा. उस ने अलाना को बताया कि उस दिन एंड्रिया कालेज आने से पहले रास्ते में कोचिंग वाले ट्यूटर के घर से कुछ नोट्स लेने जाने वाली थी, उन्होंने ही उसे अपने फ्लैट पर आ कर नोट्स ले जाने को कहा था.

एंड्रिया के मित्र के बयान के आधार पर पुलिस ने जब उस ट्यूटर के घर की तलाशी ली तो सारा सच सामने आ गया. बिल्डिंग में  लगे सीसीटीवी कैमरे के पुराने रिकौर्ड्स की जांच करने पर पाया गया कि उस दिन एंड्रिया सुबह करीब 9 बजे ट्यूटर के अपार्टमैंट में आई थी. मगर उस के वापस जाने का कहीं कोई रिकौर्ड नहीं था. हां, उसी दिन दोपहर करीब 1 बजे ट्यूटर और उस का एक साथी एक बड़ा सा ब्रीफकेस घसीटते हुए बाहर ले जा रहे थे. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया और पूछताछ के दबाव में उन्होंने जल्दी ही अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

बिहार में का बा : लाचारी, बीमारी, बेरोजगारी बा

जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के नाम अपने संदेश में लोगों को कोरोना से बचने के लिए आगाह कर रहे थे, उसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार विधानसभा चुनाव के सिलसिले में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उस भीड़ में न मास्क था और न ही आपस में 2 गज की दूरी. इसी साल के मार्च महीने में जब कोरोना की देश में आमद हो रही थी, तब 2,000 लोगों के जमातीय सम्मेलन को कोरोना के फैलने की वजह बता कर बदनाम किया गया था, पर अब बिहार चुनाव में लाखों की भीड़ से भी कोई गुरेज नहीं है.

बिहार चुनाव इस बार बहुत अलग है. नीतीश कुमार अपने 15 साल के सुशासन की जगह पर लालू प्रसाद यादव के 15 साल के कुशासन पर वोट मांग रहे हैं. इस के उलट बिहार के 2 युवा नेताओं चिराग पासवान और तेजस्वी यादव ने बड़ेबड़े दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं.

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बिहार चुनाव में युवाओं की भूमिका अहम है. बिहार में बेरोजगारी सब से बड़ा मुद्दा बन गई है. एक अनजान सी गायिका नेहा सिंह राठौर ने ‘बिहार में का बा’ की ऐसी धुन जगाई है कि भाजपा जैसे बड़े दल को बताना पड़ रहा है कि ‘बिहार में ई बा’ और नीतीश कुमार अपने काम की जगह लालू के राज के नाम पर वोट मांग रहे हैं.

बिहार की चुनावी लड़ाई अगड़ों की सत्ता को मजबूत करने के लिए है. एससी तबके की अगुआई करने वाली लोक जनशक्ति पार्टी को राजग से बाहर कर के सीधे मुकाबले को त्रिकोणात्मक किया गया है, जिस से सत्ता विरोधी मतों को राजदकांग्रेस गठबंधन में जाने से रोका जा सके.

जिस तरह से नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर के पिछड़ों की एकता को तोड़ा गया, अब चिराग पासवान को निशाने पर लिया गया है, जिस से कमजोर पड़े नीतीश कुमार और चिराग पासवान पर मनमाने फैसले थोपे जा सकें.

बिहार चुनाव में अगर भाजपा को पहले से ज्यादा समर्थन मिला, तो वह तालाबंदी जैसे फैसले को भी सही साबित करने की कोशिश करेगी. बिहार को हिंदुत्व का नया गढ़ बनाने का काम भी होगा.

बिहार के चुनाव में जातीय समीकरण सब से ज्यादा हावी होते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहले से ही यहां जातीयता और राजनीति में चोलीदामन का साथ रहा है. 90 के दशक से पहले यहां की राजनीति पर अगड़ों का कब्जा रहा है.

लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीति की दिशा को बदल दिया था. अगड़ी जातियों ने इस के खिलाफ साजिश कर के कानून व्यवस्था का मामला उठा कर लालू प्रसाद यादव के राज को ‘जंगलराज’ बताया था. उन के सामाजिक न्याय को दरकिनार किया गया था.

पिछड़ी जातियों में फूट डाल कर नीतीश कुमार को समाजवादी सोच से बाहर कर के अगड़ी जातियों के राज को स्थापित करने में इस्तेमाल किया गया था. बिहार की राजनीति के ‘हीरो’ लालू प्रसाद यादव को ‘विलेन’ बना कर पेश किया गया था.

भारतीय जनता पार्टी को लालू प्रसाद यादव से सब से बड़ी दुश्मनी इस वजह से भी है कि उन्होंने भाजपा के अयोध्या विजय को निकले रथ को रोकने का काम किया था. साल 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ ले कर भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी निकले, तो उन को बिहार में रोक लिया गया.

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भाजपा को लालू प्रसाद यादव का यह कदम अखर गया था. केंद्र में जब भाजपा की सरकार आई, तो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में उल झाया गया और इस के सहारे उन की राजनीति को खत्म करने का काम किया गया.

लालू प्रसाद यादव के बाद भी बिहार की हालत में कोई सुधार नहीं आया. बिहार में पिछले 15 साल से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस के बाद भी बिहार बेहाल है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव का ‘सामाजिक न्याय’ भी बड़ा मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, पर उन का मुद्दा चुनाव में मौजूद है.

नई पीढ़ी का दर्द

तालाबंदी के बाद मजदूरों का पलायन एक दुखभरी दास्तान है. नई पीढ़ी के लोगों को यह दर्द परेशान कर रहा है. नौजवान सवाल कर रहे हैं कि 15 साल तक एक ही नेता के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी बिहार की ऐसी हालत क्यों है? अब उसी नेता को दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए वोट क्यों दिया जाए?

मुंबई आ कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी रोजीरोटी के लिए तिलतिल मरते हैं. अगर उन के प्रदेशों में कामधंधा होता, रोजीरोटी का जुगाड़ होता, तो ये लोग अपने प्रदेश से पलायन क्यों करते?

फिल्म कलाकार मनोज बाजपेयी ने अपने रैप सांग ‘मुंबई में का बा…’ में मजदूरों की हालत को बयां किया है.  5 मिनट का यह गाना इतना मशहूर  हुआ कि अब बिहार चुनाव में वहां की जनता सरकार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’.

दरअसल, बिहार में साल 2005 से ले कर साल 2020 तक पूरे 15 साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे हैं. केवल एक साल के आसपास जीतनराम मां झी मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ पाए थे, वह भी नीतीश कुमार की इच्छा के मुताबिक.

किसी भी प्रदेश के विकास के लिए 15 साल का समय कम नहीं होता. इस के बाद भी बिहार की जनता नीतीश कुमार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’ यानी बिहार में क्या है?

तालाबंदी के दौरान सब से ज्यादा मजदूर मुंबई से पलायन कर के बिहार आए. 40 लाख मजदूर बिहार आए. इन में से सभी मुंबई से नहीं आए, बल्कि कुछ गुजरात, पंजाब और दिल्ली से भी आए.

ये मजदूर यह सोच कर बिहार वापस आए थे कि अब उन के प्रदेश में रोजगार और सम्मान दोनों मिलेंगे. यहां आ कर मजदूरों को लगा कि यहां की हालत खराब है. रोजगार के लिए वापस दूर प्रदेश ही जाना होगा. बिहार में न तो रोजगार की हालत सुधरी और न ही समाज में मजदूरों को मानसम्मान मिला.

बीते 15 सालों में बिहार की  12 करोड़, 40 लाख आबादी वाली जनता भले ही बदहाल हो, पर नेता अमीर होते गए हैं. बिहार में 40 सांसद और 243 विधायक हैं. इन की आमदनी बढ़ती रही है. पिछले 15 सालों में  85 सांसद करोड़पति हो गए और 468 विधायक करोड़पति हो गए.

मनरेगा के तहत बिहार में औसतन एक मजदूर को 35 दिन का काम मिलता है. अगर इस का औसत निकालें तो हर दिन की आमदनी 17 रुपए रोज की बनती है. राज्य में गरीब परिवारों की तादाद बढ़ती जा रही है.

गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों की तादाद तकरीबन 2 करोड़, 85 लाख है. नीतीश कुमार के 15 सालों में गरीबों की तादाद बढ़ी है और नेताओं की आमदनी बढ़ती जा रही है.

जंगलराज या सामाजिक न्याय

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीतिक और सामाजिक हालत में आमूलचूल बदलाव हुआ. लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा बन कर उभरे. उन के योगदान को दबाने का काम किया गया.

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साल 1990 से साल 2020 के  30 सालों में बिहार पर दलितपिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ राजनीति पर हावी रहा है. अगड़ी जातियों का मकसद है कि  30 सालों में जो उन की अनदेखी हुई, अब वे मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएं.

भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में अगड़ी जातियां काफीकुछ अपने मकसद में कामयाब भी हो गई हैं. बिहार में भाजपा का युवा शक्ति के 2 नेताओं तेजस्वी यादव और चिराग पासवान से सीधा मुकाबला है.

भाजपा के पास बिहार में कोई चेहरा नहीं है, जिस के बल पर वह सीधा चुनाव में जा सके. सुशील कुमार मोदी भाजपा का पुराना चेहरा हो चुके हैं.

विरोधी मानते हैं कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के समय जंगलराज था. जंगलराज का नाम ले कर लोगों को डराया जाता है कि लालू के आने से बिहार में जंगलराज की वापसी हो जाएगी.

राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव कहते हैं, ‘मंडल कमीशन के बाद वंचितों को न्याय और उन को बराबरी की जगह दे कर सामाजिक न्याय दिलाने का काम किया गया था. अब आर्थिक न्याय देने की बारी है.

‘जो लोग जंगलराज का नाम ले कर बिहार की छवि खराब कर रहे हैं, वे बिहार के दुश्मन हैं. इन के द्वारा बिहार की छवि खराब करने से यहां पर निवेश नहीं हो रहा. लोग डर रहे हैं. अब हम आर्थिक न्याय दे कर नए बिहार की स्थापना के लिए काम करेंगे.’

वंचितों के नेता

लालू प्रसाद यादव की राजनीति को हमेशा से जातिवादी और भेदभावपूर्ण बता कर खारिज करने की कोशिश की गई. लालू प्रसाद यादव अकेले नेता नहीं हैं, जिन को वंचितों के हक की आवाज उठाने पर सताया गया हो. नेल्सन मंडेला, भीमराव अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जैसे अनगिनत उदाहरण पूरी दुनिया में भरे पड़े हैं.

लालू प्रसाद यादव सामंतियों के दुष्चक्र के शिकार हुए, जिन की वजह से उन का राजनीतिक कैरियर खत्म करने की कोशिश की गई. इस के बाद भी लालू प्रसाद यादव के योगदान से कोई इनकार नहीं किया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव साल 1990 से साल 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. साल 2004 से साल 2009 तक उन्होंने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यानी संप्रग सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम किया.

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो अदालत ने 5 साल के कारावास की सजा सुनाई. चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें लोकसभा से अयोग्य ठहराया गया.

लालू प्रसाद यादव मंडल विरोधियों के निशाने पर थे. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव ने राम रथ यात्रा के दौरान समस्तीपुर में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया.

मंडल विरोधी भले ही लालू प्रसाद यादव के राज को जंगलराज बताते थे, पर सामाजिक मुद्दे के साथसाथ आर्थिक मोरचे पर भी लालू सरकार की तारीफ होती रही है.

90 के दशक में आर्थिक मोरचे पर विश्व बैंक ने लालू प्रसाद यादव के काम की सराहना की. लालू ने शिक्षा नीति में सुधार के लिए साल 1993 में अंगरेजी भाषा की नीति अपनाई और स्कूल के पाठ्यक्रम में एक भाषा के रूप में अंगरेजी को बढ़ावा दिया.

राजनीतिक रूप से लालू प्रसाद यादव के जनाधार में एमवाई यानी मुसलिम और यादव फैक्टर का बड़ा योगदान है. लालू ने इस से कभी इनकार भी नहीं किया है.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने. उन के कार्यकाल में ही दशकों से घाटे में चल रही रेल सेवा फिर से फायदे में आई.

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भारत के सभी प्रमुख प्रबंधन संस्थानों के साथसाथ दुनियाभर के बिजनैस स्कूलों में लालू प्रसाद यादव के कुशल प्रबंधन से हुआ भारतीय रेलवे का कायाकल्प एक शोध का विषय बन गया.

अगड़ी जातियों की वापसी

राजनीतिक समीक्षक अरविंद जयतिलक कहते हैं, ‘जनता यह मानती है कि राज्य की कानून व्यवस्था अच्छी रहे. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के विरोधियों ने उन की पहचान को जंगलराज से जोड़ कर प्रचारित किया. उन के प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार के राज को सुशासन कहा गया.

‘इसी मुद्दे पर ही नीतीश कुमार हर बार चुनाव जीतते रहे और 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे. लालू प्रसाद यादव ने जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी और जो आर्थिक सुधारों के लिए काम किया, उस की चर्चा कम हुई.

‘लालू प्रसाद यादव की आलोचना में विरोधी कामयाब रहे. बहुत सारे काम करने के बाद भी लालू यादव को जो स्थान मिलना चाहिए था, नहीं मिला.’

बिहार में तकरीबन 20 फीसदी अगड़ी जातियां हैं. पिछड़ी जातियों में 200 के ऊपर अलगअलग बिरादरी हैं. इन में से बहुत कोशिशों के बाद कुछ जातियां ही मुख्यधारा में शामिल हो पाई हैं. बाकी की हालत जस की तस है. इन में से 10 से 15 फीसदी जातियों को ही राजनीतिक हिस्सेदारी मिली है.

1990 के पहले बिहार की राजनीति में कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार प्रभावी रहे हैं. दलितों की हालत भी बुरी है. बिहार की आबादी का 16 फीसदी दलित हैं. अगड़ी जातियों ने दलितों में खेमेबंदी को बढ़ावा देने का काम किया है.

साल 2005 में भाजपा और जद (यू) ने अगड़ी जातियों को सत्ता में वापस लाने का काम किया. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अब नीतीश कुमार को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रही है.

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