Serial Story : मेरी मां का नया प्रेमी – भाग 1

श्वेता ने मां को फोन लगाया तो फोन पर किसी पुरुष की आवाज सुन कर वह चौंक गई…कौन हो सकता है? एक क्षण को उस के दिमाग में सवाल कौंधा. अमन अंकल तो होने से रहे. मां ने ही एक दिन बताया था, ‘तुम्हारे अमन अंकल को बे्रन स्ट्रोक हुआ था. अचानक ब्लडप्रेशर बहुत बढ़ गया था. आधे धड़ को लकवा मार गया. उन के लड़के आए थे, अपने साथ उन्हें हैदराबाद लिवा ले गए.’

‘‘हैलो…बोलिए, किस से बात करनी है आप को?’’ सहसा वह अपनी चेतना में वापस लौटी. संयत आवाज में पूछा, ‘‘आप…आप कौन? मां से बात करनी है. मैं उन की बेटी श्वेता बोल रही हूं.’’ स्थिति स्पष्ट कर दी.

‘‘पास के जनरल स्टोर तक गई हैं. कुछ जरूरी सामान लाना होगा. रोका था मैं ने…कहा भी कि लिख कर हमें दे दो, ले आएंगे. पर वह कोई स्पेशल डिश बनाना चाहती हैं शाम को. तुम्हें तो पता होगा, पास में ही सब्जी की दुकान है. वहां वह अपनी स्पेशल डिश के लिए कुछ सब्जियां लेने गई हैं…पर यह सब मैं तुम से बेकार कह रहा हूं. तुम मुझे जानती नहीं होगी. इस बीच कभी आई नहीं तुम जो मुझे देखतीं और हमारा परिचय होता… बस, इतना जान लो…मेरा नाम प्रभुनाथ है और तुम्हारी मां मुझे प्रभु कहती हैं. तुम चाहो तो प्रभु अंकल कह सकती हो.’’

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‘‘प्रभु अंकल…जब मां आ जाएं, बता दीजिएगा…श्वेता का फोन था.’’ और इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. न स्वयं कुछ और कहा, न उन्हें कहने का अवसर दिया.

श्वेता की बेचैनी उस फोन के बाद बहुत बढ़ गई. कौन हो सकते हैं यह महाशय? क्या अमन अंकल की तरह मां ने किसी नए…आगे सोचने से खुद हिचक गई श्वेता. कैसे सोचे? मां आखिर मां होती है. उन के बारे में हमेशा, हर बार, हर पुरुष को ले कर हर ऐसीवैसी बात कैसे सोची जा सकती है?

फिर भी यह सवाल तो है ही कि प्रभुनाथ अंकल कौन हैं? कैसे होंगे? कितनी उम्र होगी? मां से कब, कहां, कैसे, किन हालात में मिले होंगे और उन का संबंध मां से इतना गहरा कैसे बन गया कि मां अपना पूरा घर उन के भरोसे छोड़ कर पास के जनरल स्टोर तक चली गईं… सामान और स्पेशल डिश के लिए सब्जियां लेने…

इस का मतलब हुआ प्रभु अंकल मां के लिए कोई स्पेशल व्यक्ति हैं…लेकिन यह नाम पहले तो कभी मां से सुना नहीं. अचानक कहां से प्रकट हो गए यह अंकल? और इन का मां से क्या संबंध होगा…जिन के लिए मां स्पेशल डिश बनाती हैं…कह रहे थे कि जब वह आते हैं तो मां जरूर कोई न कोई स्पेशल डिश बनाती हैं…इस का मतलब हुआ यह महाशय वहां नहीं, कहीं और रहते हैं और कभीकभार ही मां के पास आते हैं.

अड़ोसपड़ोस के लोग अगर देखते होंगे तो मां के बारे में क्या सोचते होंगे? कसबाई शहर में इस तरह की बातें पड़ोसियों से कहां छिपती हैं? मां ने क्या कह कर उन का परिचय पड़ोसियों को दिया होगा? और उस परिचय पर क्या सब ने यकीन कर लिया होगा?

स्थिति पर श्वेता जितना सोचती जाती, उतने ही सवालों के घेरे में उलझती जाती. पिछली बार जब वह मां से मिलने गई थी तो उन की लिखनेपढ़ने की मेज पर एक नई डायरी रखी देखी थी. मां को डायरी लिखने का शौक है और महिला होने के नाते उन की वह डायरी अकसर पत्रपत्रिकाओं में छपती भी रहती है, अखबारों के साहित्य संस्करणों से ले कर साहित्यिक पत्रिकाओं तक में उन के अंश छपते हैं. चर्चा भी होती है. शहर में सब इसलिए भी उन्हें जानते हैं कि वहां के महाविद्यालय में हिंदी की प्रवक्ता थीं. लंबी नौकरी के बाद वहीं से रिटायर हुईं. मकान पिता ही बना गए थे. अवकाश प्राप्त जिंदगी आराम से वहीं गुजार रही हैं. भाई विदेश में है. श्वेता के पास आ कर वह रहना नहीं चाहतीं. बेटीदामाद के पास आ कर रहना उन्हें अपनी स्वतंत्रता में बाधक ही नहीं लगता बल्कि अनुचित भी लगता है.

इंतजार करती रही श्वेता कि मां अपनी तरफ से फोन करेंगी पर उन का फोन नहीं आया. मां की डायरी में एक अंगरेजी कवि का वाक्य शुरू में ही लिखा हुआ पढ़ा था ‘इन यू ऐट एव्री मोमेंट, लाइफ इज अबाउट टू हैपन.’ यानी आप के भीतर हर क्षण, जीवन का कुछ न कुछ घटता ही है…जीवन घटनाविहीन नहीं होता.

महाविद्यालय में पढ़ते समय भी श्वेता अपनी सहेलियों से मां की प्रशंसा सुनती थी. बहुत अच्छा बोलती हैं. उन की स्मृति गजब की है. ढेरों कविताओं के उदाहरण वह पढ़ाते समय देती चली जाती हैं. भाषा पर जबरदस्त अधिकार है. कालिज में शायद ही कोई उन जैसे शब्दों का चयन अपने व्याख्यान में करता है. पुरुष अध्यापक प्रशंसा में कह जाते हैं कि प्रो. कुमुदजी पता नहीं कहां से इतना वक्त निकाल लेती हैं यह सब पढ़नेलिखने का?

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कुछ मुंहफट जड़ देते कि पति रेलवे में स्टेशन मास्टर हैं. अकसर इस स्टेशन से उस स्टेशन पर फेंके जाते रहते हैं. बाहर रहते हैं और महीने में दोचार दिन के लिए ही आते हैं. इसलिए पति को ले कर उन्हें कोई व्यस्तता नहीं है. रहे बच्चे तो वे अब बड़े हो गए हैं. बेटा आई.आई.टी. में पढ़ने बाहर चला गया है. कल को वहां से निकलेगा तो विदेश के दरवाजे उसे खुले मिलेंगे. लड़की पढ़ रही है. योग्य वर मिलते ही उस की शादी कर देंगी. फुरसत ही फुरसत है उन्हें…पढ़ेंगीलिखेंगी नहीं तो क्या करेंगी?

श्वेता एम.ए. के बाद शोधकार्य करना चाहती थी पर पिता को अपने एक मित्र का उपयुक्त लड़का जंच गया. रिश्ता तय कर दिया और श्वेता की शादी कर दी. बी.एड. उस ने शादी के बाद किया और पति की कोशिशों से उसे दिल्ली में एक अच्छे पब्लिक स्कूल में नौकरी मिल गई. पति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर थे. व्यस्तता के बावजूद श्वेता अपने संबंध और कार्य से खुश थी. छुट्टियों में जबतब मां के पास हो आती, कभी अकेली, कभी बच्चों के साथ, तो कभी पति भी साथ होते.

आई.आई.टी. के तुरंत बाद भाई अमेरिका चला गया था. इधर मंदी के चलते अमेरिका से भारत आना उस के लिए अब संभव न था. कहता है अगर नौकरी से महीने भर बाहर रहा तो कंपनी समझ लेगी कि बिना इस आदमी के काम चल सकता है तो क्यों व्यर्थ में एक आदमी की तनख्वाह दी जाए. वैसे भी अमेरिका में जौब की बहुत मारामारी चल रही है.

फिर भी भाई को पिता की एक हादसे में हुई मृत्यु के बाद आना पड़ा था और बहुत जल्दी क्रियाकर्म कर के वापस चला गया था. पिता उस दिन अपने नियुक्ति वाले स्टेशन से घर आ रहे थे लेकिन टे्रन को एक छोटे स्टेशन पर भीड़ ने आंदोलन के चलते रोक लिया था. टे्रन पर पत्थर फेंके गए तो कुछ दंगाइयों ने टे्रन में आग लगा दी. जिस डब्बे में पिताजी थे उस डब्बे को लोगों ने आग लगा दी थी. सवारियां उतर कर भागीं तो उन पर दंगाइयों ने ईंटपत्थर बरसाए.

पत्थर का एक बड़ा टुकड़ा पिता के सिर में आ कर लगा तो वह वहीं गिर पड़े. साथ चल रहे अमन अंकल ने उन्हें उठाया. सिर से खून बहुत तेजी से बह रहा था. लोगों ने उन्हें ले कर अस्पताल तक नहीं जाने दिया. रास्ता रोके रहे. हाथपांव जोड़ कर अमन अंकल ने किसी तरह पिताजी को कहीं सुरक्षित जगह ले जाने का प्रयास किया पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उन की मृत्यु हो गई थी.

भाई ने पिता के फंड, पेंशन आदि की सारी जिम्मेदारी अमन अंकल को ही सौंप दी थी, ‘‘अंकल आप ही निबटाइए ये सरकारी झमेले. आप तो जानते हैं, इन कामों को निबटाने में महीनों लगेंगे, अगर मैं यहां रुक कर यह सब करता रहा तो मेरी नौकरी चली जाएगी.’’

‘‘तुम चिंता न करो. अपनी नौकरी पर जाओ. यहां मैं सब संभाल लूंगा. इसी रेलवे विभाग में हूं. जानता हूं. ऊपर से नीचे तक लेटलतीफी का राज कायम है.’’

अमन अंकल ने ही फिर सब संभाला था. बाद में उन का ट्रांसफर वहीं हो गया तो काम को निबटाने में और अधिक सुविधा रही. तब से अमन अंकल का हमारे परिवार से संबंध जुड़ा. वह अरसे तक जारी रहा. उन का एक ही लड़का था जो आई.टी. इंजीनियर था. पहले बंगलौर में नौकरी पर लगा था. बाद में ऊंचे वेतन पर हैदराबाद चला गया.

अमन अंकल की पत्नी की मृत्यु कैंसर से हो गई थी. नौकरी शेष थी तो अमन अंकल वहीं रह कर नौकरी निभाते रहे. इस बीच उन का हमारे परिवार में आनाजाना जारी रहा. मां की उन्होंने बहुत देखरेख की. पिता की मृत्यु का सदमा वह उन्हीं के कारण सह सकीं. यह उन का हमारे परिवार पर उपकार ही रहा. बाकी मां से उन के क्या और कैसे संबंध रहे, वह अधिक नहीं जानती.

स्लिम फिट रहने के लिए करती हूं मेहनत : रूपा सिंह

भोजपुरी सिनेमा में अगर कामयाब हीरोइनों की बात की जाए, तो रूपा सिंह का नाम सब से ऊपर आता है. वे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की सब की चहेती हीरोइनों में शुमार हैं. उन्होंने दर्जनों हिट फिल्में दी हैं, जिन में ‘नरसिम्हा’, ‘मिशन पाकिस्तान’, ‘ग्रेट भइयाजी’ और ‘परदेश’ खास हैं.

भोजपुरी फिल्म ‘भोजपुरिया में दम बा’ के सैट पर रूपा सिंह से हुई मुलाकात में उन के फिल्मी सफर को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

भोजपुरी सिनेमा में चर्चित चेहरा बनने का आप का सफर कैसा रहा?

मेरी भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत बहुत अच्छी रही, क्योंकि मुझे स्ट्रगल नहीं करना पड़ा था. मुझे शुरू से ही बड़े बजट की लीड रोल वाली फिल्में मिलती गईं और मैं कामयाबी की सीढि़यां चढ़ती गई.

आप जितनी खूबसूरत हैं, उस से कहीं ज्यादा अपने काम के प्रति समर्पित रहती हैं. आप अपने काम और खूबसूरती का यह तालमेल कैसे बना पाती हैं?

जब मुझे फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई जाती है, तो सब से पहले मैं अपने किरदार को समझती हूं. मुझे लगता है कि फिल्म का कंटैंट भोजपुरी के चलन से हट कर है, जो दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में कामयाब रहेगी. मैं ऐसी ही फिल्मों को साइन करती हूं. रही बात काम और खूबसूरती के तालमेल की, तो मैं फालतू के मेकअप से दूर रहती हूं, क्योंकि मेकअप आप को जितना खूबसूरत बनाता है, उतना ही ज्यादा मेकअप आप के चेहरे की स्किन को बिगाड़ भी सकता है.

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आप ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में जो जगह बनाई है, उस के लिए आप को कितनी मेहनत करनी पड़ी?

किसी भी क्षेत्र में पैर जमाने के लिए मेहनत तो करनी पड़ती है. अगर मैं एक कलाकार के तौर पर अपना अनुभव बताऊं, तो मुझे फिल्म के हिसाब से डांस, खानपान, ऐक्सरसाइज वगैरह पर बहुत ध्यान देना पड़ता है. मैं आप को बता दूं कि अब भोजपुरी में मोटी हीरोइनों का चलन कम हो गया है. ऐसे में खुद को स्लिम फिट रखने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है.

आप विनय आनंद जैसे सुपरस्टार के साथ बहुचर्चित फिल्म ‘भोजपुरिया में दम बा’ में काम कर रही हैं. आप को विनय आनंद कैसे इनसान लगे?

मेरे लिए स्टार के साथ काम करना बड़ी बात नहीं है. मेरे लिए छोटा कलाकार हो या बड़ा, मैं अपनी शर्तों पर काम करती हूं. मैं उसी फिल्म में काम करती हूं, जो साफसुथरी हो. ऐसे में मैं पहले तय कर लेती हूं, उसी के बाद फिल्म करती हूं.

जहां तक विनय आनंद का सवाल है, तो वे एक अच्छे इनसान हैं. वे सैट पर सभी का मनोरंजन करते रहते हैं.

इस फिल्म में आप का क्या रोल है?

फिल्म ‘भोजपुरिया में दम बा’ में आप मुझे एक बेहद ही नटखट, चुलबुली और सुलझी हुई लड़की के रूप में देखने वाले हैं.

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डायरैक्टर हेमराज वर्मा के साथ काम कर के क्या सीखा?

हेमराज वर्मा एक अच्छे और सुलझे हुए डायरैक्टर हैं. वे सैट पर सभी कलाकारों के साथ प्यार और इज्जत के साथ पेश आते हैं, साथ ही गलतियों को सुधारने के लिए बारबार मौका देते रहते हैं.

फिल्म ‘भोजपुरिया में दम बा’ में  किए गए आप के रोल में अलग क्या है?

मुझे जब इस फिल्म में काम करने का औफर आया था, तो डायरैक्टर हेमराज वर्मा ने मुझे औनलाइन फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई थी, जिस की कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी.

इस फिल्म में गरीबी के बीच जूझते हुए अपने फर्ज को निभाते हुए समाज को जागरूक करने की जिम्मेदारी पूरी करने वाले 2 भाइयों की दिल को छू जाने वाली कहानी को फिल्माया जा रहा है. यह फिल्म ऐक्शन, इमोशन, रोमांस और रोमांच से भरपूर है, जो पूरे परिवार के साथ देखने लायक है. इस फिल्म की कहानी दूसरी फिल्मों से अलग है. यह दर्शकों को देखने के बाद खुद एहसास होगा.

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लोग कहते हैं कि आप बहुत बातूनी भी हैं?

बहुत तो नहीं, हां, थोड़ीबहुत बातूनी जरूर हूं.

क्या आप को नहीं लगता कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में हीरोइनों को पैसा कम मिलता है?

यह सही है कि मेल ऐक्टर्स की अपेक्षा फीमेल ऐक्टर्स को समान काम का समान पैसा नहीं मिल पाता है, जबकि मेहनत दोनों की बराबर लगती है. यह भी सच है कि न ही बिना हीरो के फिल्म चल सकती है और न ही बिना हीरोइन के. इस हिसाब से पैसे भी दोनों को समान मिलने चाहिए.

कपिल शर्मा ने इस खास मौके पर भारती सिंह और हर्ष लिंबाचिया की फोटो शेयर कर लिखा ये मैसेज

कामेडी क्विन भारती सिंह और उनके पति हर्ष लिंबाचिया की शादी की एनिवर्सरी  कल यानि 3 दिसंबर को थी. उनके शादी के 3 साल पूरे हो गए. इस खास मौके पर कपिल शर्मा ने सोशल मीडिया पर भारती और हर्ष के लिए मैसेज लिखकर दोनों की तस्वीर शेयर की है. उन्होंने इंस्टाग्राम पर दोनों की  तस्वीर शेयर करते हुए लिखा,  हैप्पी एनिवर्सरी भारती और हर्ष. आप दोनों को ढेर सारा प्यार.

भारती सिंह ने भी इंस्टाग्राम पर अपने पति हर्ष के साथ ढेर सारी तस्वीरे शेयर की. उन्होंने तस्वीर शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा कि ‘प्यार का मतलब यह नहीं कि आप कितने दिन, कितने महीने और कितने साल से साथ हैं… प्यार का मतलब यह है कि आप हर दिन एक-दूसरे को कितना प्यार करते हैं, हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी माई लव…’

 

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तो हर्ष ने भी भारती के साथ फोटोज शेयर करते हुए लिखा- एक अच्छा विवाह कुछ ऐसा नहीं है जो आप पाते हैं, यह कुछ ऐसा है जिसे आप बनाते हैं और आपको इसे बनाते रहना है. हैप्पी एनिवर्सरी मेरा प्यार…”

 

इस तस्वीर में भारती और हर्ष की जोड़ी काफी प्यारी लग रही है. तस्वीर में आप देख सकते हैं कि भारती ने व्हाइट कलर का लहंगा पहना है तो वहीं हर्ष ने ब्लैक एंड व्हाइ शर्ट और ब्लैक जैकेट और पैंट पहनी है.

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बता दें कि ड्रग्स केस में भारती और हर्ष गिरफ्तार हुए थे. हालांकि बाद में दोनों को बेल मिल गई थी। इसके बाद भारती और हर्ष को काफी ट्रोल किया जा रहा है. हाल ही में भारती और हर्ष आदित्य नारायण की शादी में नज़र आए. आदित्य ने श्वेता अग्रवाल से शादी की है.

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आखिरकार रहस्य खत्म हुआ. ‘हाम्बले फिल्म्स’ ने आखिरकार विजय किरगंदूर द्वारा निर्मित और प्रशांत नील द्वारा निर्देशित तथा प्रभास के अभिनय से सजी अपनी बहुप्रतीक्षित नई फिल्म का शीर्षक घोषित कर दिया है. इसका नाम है-‘सलार’. इसमें पहली बार प्रभास एक हिंसक चरित्र का चित्रण करने वाले हैं, जो कि सिनेप्रेमियों को आश्चर्य चकित करने वाली बात होगी.

एक अंडरवर्ल्ड एक्शन थ्रिलर फिल्म ‘सलार‘ को 2021 की सबसे बड़ी प्रदर्शित होने वाली फिल्म माना जा रहा है. निर्माताओं द्वारा फिल्म के आधिकारिक पोस्टर को साझा करने के तुरंत बाद, प्रभास के प्रशंसकों ने उनकी उत्तेजना को साझा किया और उसी के लिए शुभकामनाएं दीं.

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फिल्म के निर्माता विजय किरागंदूर ने कहा- ‘‘हाम्बेल फिल्म्स में हमने हमेशा अपने दर्शकों को जीवन के लिए सिनेमाई अनुभव प्रदान करने का लक्ष्य रखा है. यह हमारे लिए बहुत खास है. वास्तव में हम निर्देशक प्रशांत नील और अभिनेता प्रभास का साथ मिलने से बहुत खुश हैं. यह दोनों बहुत अच्छे हैं. हम जल्द ही शूटिंग शुरू करने वाले हैं.‘‘

निर्देशक प्रशांत नील ने कहा- ‘‘विजय किरगंदूर और प्रतिभाशाली प्रभास का साथ मिलने से बेहद रोमांचित हूं. हम इस फिल्म को लेकर लंबे समय से बातचीत कर रहे थे. यह एक खास तरह की एक्शन फिल्म होगी. दर्शकों ने अब तक प्रभास को इस अवतार में पहले कभी नहीं देखा होगा, जो मुझे विश्वास है कि सिनेमा प्रशंसकों को पसंद आएग.’’

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फिल्म ‘सलार’ के संदर्भ में प्रभास कहते हैं- ‘‘मैं हमेशा से हाम्बेल फिल्म्स के साथ काम करना चाहता था और हमारी फिल्म के लिए निर्देशक के रूप में प्रशांत नील हैं, मुझे नहीं लगता कि इसके लिए एक बेहतर और रोमांचक अवसर हो सकता है. यह एक बहुत ही रोमांचक फिल्म है और मेरा किरदार बेहद हिंसक है. इस तरह का किरदार मैंने पहले कभी नहीं किया है. यह पैन-इंडियन फिल्म है और मैं पहले से ही सेट पर आने का इंतजार नहीं कर सकता.‘‘

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मैट्रीमोनियल साइट्स ठगी से ऐसे बचें

डिजिटल तकनीक के इस दौर में हर काम औनलाइन करने का चलन बढ़ रहा है. शादीब्याह जैसे कामों के लिए बाकायदा कई मैरिज ब्यूरो और इंटरनैट पर मैट्रिमोनियल वैबसाइट हैं, जिन पर वरवधू के प्रोफाइल आसानी से मिल जाते हैं. इन वैबसाइटों पर दी गई जानकारी को सच मान कर बिना जांचपड़ताल किए रिश्ते तय करने का खमियाजा भी लोगों को उठाना पड़ रहा है.

मैट्रिमोनियल वैबसाइट पर ठगी का शिकार अकेली लड़कियां ही नहीं  होतीं, बल्कि लड़के भी होते हैं. अगस्त, 2020 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक जवान लड़की से जीवनसाथी डौटकौम पर फर्जी प्रोफाइल बना कर एक लाख, 92 हजार रुपए ऐंठने का एक ऐसा ही मामला सामने आया.

फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाले और खुद को एनआरआई डाक्टर बता कर जवान लड़कियों को शादी के  झांसे में फंसा कर पैसे ऐंठने वाले एक 46 साल के शातिर ठग को स्टेट साइबर सैल ने गिरफ्तार किया.

स्टेट साइबर सैल के एसपी अंकित शुक्ला ने बताया कि पुणे की एक नामचीन कंपनी में काम कर रही जबलपुर की रहने वाली एक लड़की ने मामले की शिकायत कर बताया था कि जीवनसाथी डौटकौम पर डाक्टर ब्रुशाल कर्वे नाम से एक जालसाज ने खुद का प्रोफाइल बना रखा है. इस्तांबुल, तुर्की में डाक्टर होने का हवाला दे कर उस ने पीडि़त लड़की को भारत में मिलने की इच्छा जताई और फिर कस्टम में फंसने का  झांसा दिया और अपने अकाउंट में औनलाइन एक लाख, 92 हजार रुपए ट्रांसफर करवा लिए.

पीडि़त लड़की की शिकायत पर जिस आरोपी को जबलपुर स्टेशन के पास से गिरफ्तार किया गया, वह मुंबई का रहने वाला वैभव सतीश कपले है.

वैभव मूल रूप से नागपुर का रहने वाला है. उस के मांबाप की बचपन में ही मौत हो चुकी है. मुंबई में होस्टल में रह कर पढ़ाई कर के वह लंदन में डैंटिस्ट असिस्टैंट का डिप्लोमा कर चुका है. इस के पहले वह मुंबई में डाटा एंट्री औपरेटर का काम करता था. इस वजह से वह फर्राटेदार इंगलिश, मराठी और हिंदी बोलता है.

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खुद की शादी के लिए उस ने मैरिज ब्यूरो साइट पर अपना फर्जी प्रोफाइल बनाया. एक लड़की ने उसे 5,000 रुपए की मदद कर दी, तभी से उसे ठगी का आइडिया आया और उस ने अलगअलग मैरिज ब्यूरो पर अलगअलग नाम, फोटो और देश से प्रोफाइल बना कर जवान लड़कियों को शादी के  झांसे फंसाने का काम शुरू कर दिया.

जबलपुर की लड़की को ठगने के लिए ने वैभव ने खुद को महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी औफ हैल्थ साइंस, नासिक का ग्रेजुएट बताया. लंदन में सर्जन के काम का अनुभव होने के साथ ही उस ने बताया कि उस की सालाना आमदनी डेढ़ लाख डौलर है. इस से पहले वह मुंबई, पुणे, जलगांव, खंडवा, इंदौर व देवास में रह कर ठगी की वारदातों को अंजाम दे चुका है. पुलिस को इन जगहों पर उस के बैंक खाते भी मिले हैं.

मैट्रिमोनियल साइट्स के जरीए ठगी का यह अकेला मामला नहीं है. इसी तरह के एक और मामले में पंजाब की मोगाअकालसर रोड की रहने वाली केवल कौर ने 13 अक्तूबर, 2017 को पुलिस को शिकायत में बताया कि उस की शादी  12 मार्च, 2015 को चूड़चक्क के मूल बाशिंदे और वर्तमान में कनाडा में रह रहे कमलदीप सिंह के साथ हुई थी.

शादी से पहले दोनों परिवारों के बीच 33 लाख रुपए में शादी की डील हुई थी, जिस के मुताबिक शादी के समय  29 लाख रुपए नकद दिए गए थे और  4 लाख रुपए शादी में खर्च किए गए थे.

केवल कौर ट्रिपल एमए थी और उस की 5 बहनें थीं. वह शादी कर विदेश जाने के चक्कर में ठगी की शिकार हुई थी. शादी के 2 महीनों के बाद पति कमलदीप अपने परिवार के साथ विदेश लौट गए. उस के बाद न तो वे वापस लौटे और न ही उसे विदेश बुलाया.

पहले तो कुछ दिन तक पति व उस के घर वालों के फोन आते रहे, फिर धीरेधीरे फोन आने बंद हो गए.

केवल कौर ने बताया कि उसे उम्मीद थी कि शायद विदेश से वीजा व दूसरे दस्तावेज पूरे करने में समय लग रहा होगा, मगर समय बीतने के बाद उसे अहसास हो गया कि वह शादी के नाम पर ठगी की शिकार हुई है.

एक तीसरे मामले की बात करें, तो छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले शख्स मुकेश ने मैट्रिमोनियल साइट्स पर शादी के लिए अपना अकाउंट बनाया और एक लड़की अस्मिता से मेलजोल किया. अस्मिता ने खुद को विदेश में रहना बताया. इस दौरान दोनों के बीच शादी की बातें भी होने लगीं.

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बातचीत के दौरान मुकेश ने अस्मिता को विदेश से कुछ उपहार भेजने की बात कही, इस के बाद मुकेश अस्मिता द्वारा तैयार किए जा रहे चक्रव्यूह में फंस गया.

मुकेश के पास कई बार विदेश से खुद को सरकारी अफसर बता कर और फिर कभी खुद को पार्सल औफिस से बता कर कई लोगों ने फोन कर के कहा कि आप का उपहार काफी महंगा है, इसे भेजने के लिए आप को पैसे देने होंगे. ऐसा करते हुए मुकेश से साढ़े 9 लाख रुपए जमा करवा लिए.

जब अस्मिता की मुकेश से लगातार पैसों की मांग जारी रही, तो मुकेश और उस के परिवार वालों को सम झ आया कि वे ठगी के शिकार हो गए हैं और उन्होंने क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई.

ये तीनों ही मामले बताते हैं कि किस तरह शादी के नाम पर ठगी के नएनए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि केवल वैबसाइट पर प्रोफाइल में दर्ज जानकारी को सच मान कर शादी के फेर में न पड़ कर सामने वाले के बारे में सही जानकारी हासिल कर ली जाए.

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सावधानी है जरूरी

* आंख बंद कर किसी भी वैबसाइट पर रजिस्ट्रेशन न करें. पहले तो वैबसाइट के बारे में पूरी जानकारी ले कर उस के जरीए तय हुए रिश्तों के रिव्यू देखें. रजिस्ट्रेशन करते समय नई ईमेल आईडी का इस्तेमाल कर डाटा की सेंधमारी से बच सकते हैं.

* मैट्रिमोनियल साइट के जरीए रिश्ते तय करते समय संबंधित लड़केलड़की के प्रोफाइल में बताई गई जानकारी के अलावा सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी जरूर हासिल कर लें. इस के साथ ही पारिवारिक बैकग्राउंड, पढ़ाईलिखाई और नौकरी की जांच के लिए उन के रिश्तेदारों या उन के पड़ोसियों से संपर्क कर हकीकत जानना बेहद जरूरी है. दोस्तों से भी जानकारी निकाली जा सकती है.

* शादी तय करते समय अगर पैसों की मांग की जा रही है, तो सावधान हो जाएं. मैट्रिमोनियल साइट्स के जरीए पैसों की मांग होने पर तुरंत साइबर पुलिस को इस की सूचना दे कर ठगी से बच सकते हैं.

* शादी से पहले अपने बैंक खाते की जानकारी सा झा न करें.

* शादी से पहले किसी भी तरह के पारिवारिक या खुद के फोटो व वीडियो सा झा न करें.

* मैट्रिमोनियल साइट्स पर संपर्क में आए शख्स से किसी भी तरह का उपहार व पैसे स्वीकार न करें, क्योंकि पहले ये आप को उपहार या तोहफा दे कर विश्वास हासिल करते हैं, बाद में परेशानियों का जिक्र कर पैसों की मांग कर के ठगी करते हैं.

* विदेशों में रह रहे लोगों से वैवाहिक रिश्ते बनाने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है. केवल वैबसाइट की जानकारी पर भरोसा न करें. उस देश में रह रहे किसी दूसरे शख्स से संबंधित के बारे में जानकारी जुटा लें और वीजा, पासपोर्ट की प्रक्रिया शादी के पहले ही निबटा लें.

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नाईजीरियन ने मैट्रिमोनियल साइट बनाई

शादी के न्योते की फर्जी साइट बना कर सोशल मीडिया के जरीए देशभर की लड़कियों और उन के परिवार वालों के लाखों रुपए ठगने का काम बड़े ही शातिराना अंदाज में जारी था. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, जांजगीर, सरगुजा जैसे अनेक शहरों में तमाम लड़कियां इस जाल में फंस कर ठगी की शिकार हो गईं.

ऐसे ही एक नाईजीरियन नौजवान ने बड़ी ही चालाकी और शातिराना अंदाज का परिचय देते हुए एक मैट्रिमोनियल साइट बनाई और लड़कियों को विदेशों में बसे अमीर लड़कों के फोटो और सपने दिखा कर ब्याह कराने का  झूठ फैला कर उन्हें ठगना और भारी रकम लेना शुरू कर दिया.

पुलिस ने बताया कि फर्जी नाम से प्रोफाइल बना कर देश के कई हिस्सों में लड़कियों को शादी का  झांसा दे कर लाखों रुपए की ठगी करने वाले एक विदेशी नौजवान को छत्तीसगढ़ की कोरिया पुलिस ने गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल कर ली.

ठगी के इस मामले का खुलासा करते हुए कोरिया पुलिस अधीक्षक चंद्र मोहन सिंह ने बताया कि तलवापारा बैकुंठपुर के सुदामा प्रसाद साहू के बेटे उपेंद्र साहू की लिखित शिकायत पर थाना बैकुंठपुर में मुकदमा कायम किया गया.

उपेंद्र साहू ने अपनी शिकायत में बताया कि जनवरी, 2020 को उस की छोटी बहन के साथ उक्त आरोपी ने रोहन मिश्रा के नाम से फर्जी वैबसाइट बनाई और शादी करने का  झांसा दे कर व भारत में सैटल होने के नाम पर पीडि़ता से 24,07,500 रुपए की ठगी की है.

मामला दर्ज कर अज्ञात आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस महानिरीक्षक रतन लाल डांगी, सरगुजा रेंज के मार्गदर्शन में पुलिस अधीक्षक कोरिया चंद्र मोहन सिंह की अगुआई में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डाक्टर पंकज शुक्ला व उपपुलिस अधीक्षक धीरेंद्र पटेल के साथ साइबर टीम कोरिया द्वारा मामले की जांचपड़ताल की जाने लगी.

नाईजीरियन आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने जब जांच शुरू की, तो पता चला कि तथाकथित आरोपी द्वारा ह्वाट्सएप का इस्तेमाल किया गया. साइबर टीम द्वारा मामले के सभी पहलुओं की जांच की, तो आरोपी की पहचान करने में कामयाबी मिल गई.

30 साल के आरोपी का नाम एजिडे पीटर चिनाका है. उस के पिता का नाम एजिडे ओबिना है. वैसे तो एजिडे पीटर चिनाका नाईजीरिया का है, पर फिलहाल वह उत्तर प्रदेश के नोएडा में रहता था. वह रोहन मिश्रा, अरुण राय जैसे कई नाम से धोखाधड़ी किया करता था.

इस अपराध की विवेचना के दौरान विशेष टीम को दिल्ली और नोएडा रवाना किया गया था. टीम द्वारा आरोपी के ठिकाने पर दबिश दे कर उसे गिरफ्तार कर पूछताछ की गई. आरोपी द्वारा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश,  झारखंड, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी खुद को डाक्टर, इंजीनियर, कारोबारी बताते हुए लाखों रुपए की ठगी की गई.

उस के पास से 2 पासपोर्ट, 2 नाईजीरियन डैबिट कार्ड, एक एसबीआई डैबिट कार्ड, 4 मोबाइल फोन, 14 सिमकार्ड, एक वाईफाई डिवाइस, एक लैपटौप जब्त किया गया. आरोपी के पासपोर्ट और वीजा की मीआद खत्म हो चुकी है.

यहां यह भी अहम बात है कि सोशल मीडिया द्वारा ठगी किए जाने के चलते ज्यादातर मामलों में आरोपी पुलिस के शिकंजे से बच जाते हैं. ऐसे में यह पहली जरूरत होनी चाहिए कि हम ठगों के फरेब में न फंसें.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 2

‘यह सबकुछ सुन कर मैं धम्म से सोफे पर धंस गया तो विलियम मेरा आशय समझ मुसकरा कर कहने लगा, कि ‘डैडी, आप अकेले हो जाएंगे, इसलिए हम दोनों यह प्रस्ताव अस्वीकार कर देते हैं. वैसे तो यहां भी सबकुछ है.

‘मैं ने अपनेआप को संभाला और कहा कि वाह, मेरा बेटा और बहू इतने बड़े पद पर जा रहे हैं तो मेरे लिए यह गर्व की बात है. सच, मुझे इस से बड़ी खुशी क्या होगी?

‘जाने की तैयारियां होने लगीं. दिन तो बीत जाता पर रात में नींद न आती. कभी विलियम और जैनी तो कभी जार्ज के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती.

‘वह दिन भी आ गया जब लंदन एअरपोर्ट पर विलियम, जैनी और जार्ज को विदा कर भीगे मन से घर वापस लौटना पड़ा. विलियम और जैनी ने जातेजाते भी अपने वादे की पुष्टि की कि वे हर सप्ताह फोन करते रहेंगे और मुझ से आग्रह किया कि मैं उन से मिलने के लिए आस्टे्रलिया अवश्य आऊं. वे टिकट भेज देंगे.

‘मन में उमड़ते हुए उद्गार मेरे आंसुओं को संभाल न पाए. जार्ज को बारबार चूमा. एअरपोर्ट से बाहर आने के बाद वापस घर लौटने के लिए दिल ही नहीं करता था. कार को दिन भर दिशाहीन घुमाता रहा. शाम को घर लौटना ही पड़ा. सामने जार्ज की दूध की बोतल पड़ी थी. उठा कर सीने से चिपका ली और ऐथल की तसवीर के सामने फूटफूट कर रोया.

‘चार दिन बाद फोन की घंटी बजी तो दौड़ कर रिसीवर उठाया, ‘हैलो डैडी,’ यह स्वर सुनने के लिए कब से बेचैन था. मैं भर्राए स्वर में बोला, ‘तुम सब ठीक हो न, जार्ज अपने दादा को याद करता है कि नहीं?’ जैनी से भी बात की और यह जान कर दिल को बड़ा सुकून हुआ कि वे सब स्वस्थ और कुशलपूर्वक हैं.

‘विलियम ने टेलीफोन को जार्ज के मुंह के आगे कर दिया तो उस की ‘आउं आउं’ की आवाज ने कानों में अमृत सा घोल दिया. थोड़ी देर बाद फोन पर आवाजें बंद हो गईं.

‘3 महीने तक उन के टेलीफोन लगातार आते रहे, फिर यह गति धीमी हो गई. मैं फोन करता तो कभी विलियम कह देता कि दरवाजे पर कोई घंटी दे रहा है और फोन काट देता. बातचीत शीघ्र ही समाप्त हो जाती. 6 महीने इसी तरह बीत गए. कोई फोन नहीं आया तो घबराहट होने लगी.

‘एक दिन मैं ने फोन किया तो पता लगा कि वे लोग अब सिडनी चले गए हैं. यह भी कहने पर कि मैं उस का पिता हूं, नए किराएदार ने उस का पता नहीं दिया. उस की कंपनी को फोन किया तो पता चला कि उस ने कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी. यह जान कर तो मेरी चिंता और भी बढ़ गई थी.

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‘मेरा एक मित्र आर्थर छुट्टियां मनाने 3 सप्ताह के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था. मैं ने अपनी समस्या उसे बताई तो बोला कि वह 2 दिन सिडनी में रहेगा और यदि विलियम का पता कहीं मिल गया तो मुझे फोन कर के बता देगा. पर आर्थर का फोन नहीं आया. 3 सप्ताह की अंधेरी रातें अंधेरी ही रहीं.

‘3 सप्ताह के बाद जब आर्थर आस्टे्रलिया से वापस आया तो आशा दुख भरी निराशा में बदल गई. विलियम और जैनी उसे एक रेस्तरां में मिले थे किंतु वे किसी आवश्यक कार्य के कारण जल्दी में उसे अपना पता, टेलीफोन नंबर यह कह कर नहीं दे पाए कि शाम को डैडी को फोन कर के नया पता आदि बता देंगे.

‘उस के फोन की आस में अब हर शाम टेलीफोन के पास बैठ कर ही गुजरती है. जिस घंटी की आवाज सुनने के लिए इन 6 सालों से बेजार हूं वह घंटी कभी नहीं सुनी. हो सकता है कि उसे डर लगता हो कि कहीं बाप आस्टे्रलिया न धमक जाए.’

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जेम्स ने एक लंबी सांस ली. मुझ से पता पूछा तो मैं ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दे दिया और बोला, ‘मिस्टर जेम्स, किसी भी समय मेरी जरूरत हो तो अब बिना किसी झिझक के मुझे फोन कर देना. आइए, मैं आप को आप के घर छोड़ देता हूं. मेरी कार बराबर की गली में खड़ी है.’

‘धन्यवाद, मैं पैदल ही जाऊंगा क्योंकि इस प्रकार मेरा व्यायाम भी हो जाता है.’

घर आने पर देखा तो डाक में कुछ चिट्ठियां पड़ी थीं. मैं ने कोर्बी टाउन के एक स्कूल में गणित विभाग के अध्यक्ष पद के लिए साक्षात्कार दिया था. पत्र खोला तो पता चला कि मुझे नियुक्त कर लिया गया है.

नए स्कूल के लिए मैं ने अपनी स्वीकृति भेज दी. जाने में केवल एक सप्ताह शेष था. जाते हुए जेम्स से विदा लेने के लिए उस के मकान पर गया पर वह वहां नहीं था. पड़ोसी से पता लगा कि वह अस्पताल में भरती है. इतना समय नहीं था कि अस्पताल जा कर उस का हाल देख लूं.

एक दिन की मुलाकात मस्तिष्क की चेतना पर अधिक समय नहीं टिकी. समय के साथ मैं जेम्स को बिलकुल भूल गया.

वकील के पत्रानुसार नियत समय पर जेम्स के घर पर पहुंच गया. उसी दरवाजे पर घंटी का बटन दबाया जहां से 30 साल पहले जेम्स से मिले बिना ही लौटना पड़ा था. आज बड़ा विचित्र सा लग रहा था. लगभग 45 वर्षीय एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 3

मैं ने अपना और सीमा का परिचय दिया तो वकील ने भी अपना परिचय दे कर हमें अंदर ले जा कर एक सोफे पर बैठा दिया. वहां 3 पुरुष और 1 महिला पहले ही मौजूद थे. तीनों ही अंगरेज थे.

मार्टिन ने हम सब का परिचय कराया. एक सज्जन आर.एस.पी.सी.ए. (दि रायल सोसाइटी फार दि प्रिवेंशन आफ क्रूएल्टी टु ऐनिमल्स) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. अन्य 3, विलियम वारन (जेम्स वारन का पुत्र), उस की पत्नी जैनी वारन तथा जेम्स का पौत्र जार्ज वारन थे, जो आस्टे्रलिया से आए थे.

बाईं ओर छोटे से नर्म गद्दीदार गोल बिस्तर में एक बड़ी प्यारी सी काली और सफेद रंग की बिल्ली कुंडली के आकार में सोई पड़ी थी, जिस का नाम ‘विलमा’ बताया गया.

मार्टिन ने अपनी फाइल से वसीयत के कागज निकाल कर पढ़ने शुरू किए. अपनी संपत्ति के वितरण के बारे में कुछ कहने से पहले जेम्स ने अपनी सिसकती वेदना का चित्रण इन शब्दों में किया था:

‘लगभग 4 दशक पहले मेरे अपने बेटे विलियम और उस की पत्नी जैनी ने लंदन छोड़ कर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया. मैं फोन पर अपने पोते और इन दोनों की आवाज सुनने को तरस गया. मैं फोन करता तो शीघ्र ही किसी बहाने से काट देते और एक दिन इस फोन ने मौन धारण कर यह सहारा भी छीन लिया. किसी कारण स्थानांतरण होने पर बेटे ने मुझे अपने नए पते या टेलीफोन नंबर की सूचना तक नहीं दी. मैं इस अकेलेपन के कारण तड़पता रहा. कोई बात करने वाला नहीं था. कौन बात करेगा, जिस का अपना ही खून सफेद हो गया हो.

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‘6 साल जीभ बिना हिले पड़ीपड़ी बेजान हो गई थी कि एक दिन एक भारतीय सज्जन राकेश वर्मा ने पार्क में मेरी इस मौन व्यथा को देखा और समझा. मेरे उमड़ते हुए उद्गारों को इस अनजान आदमी ने पहचाना. विडंबना यह रही कि वह भी व्यक्तिगत कारणों से लंदन से दूर चले गए.

‘राकेश वर्मा के साथ एक दिन की भेंट मेरे सारे जीवन की धरोहर बन यादों में सुकून देती रही. फिर इस भयावह अकेलेपन ने धीरेधीरे भयानक रूप ले लिया. आयु और शारीरिक रोगों के अलावा मानसिक अवसाद ने भी मुझे घेर लिया.

‘इस अभिशप्त जीवन में आशा की एक लहर मेरे मकान के बाग में न जाने कहां से एक बिल्ली के रूप में आ गई. कौन जाने इस का मालिक भी देश छोड़ गया हो और इसे भी इस के भाग्य पर मेरी तरह ही अकेला छोड़ गया हो. बिल्ली को मैं ने एक नाम दिया ‘विलमा.’

‘2-3 दिनों में विलमा और मैं ऐसे घुलमिल गए जैसे बचपन से हम दोनों साथ रहे हों. मैं उसे अपनी कहानी सुनाता और वह ‘मियाऊंमियाऊं’ की भाषा में हर बात का उत्तर देती. मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूं.

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जार्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था. मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा. अगले दिन वह वापस आ गई. बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा.

‘विलमा के संग रहने से मेरे मानसिक अवसाद में इतना सुधार हुआ जो अच्छी से अच्छी दवाओं से नहीं हो पाया था. उस ने मुझे एक नया जीवन दिया. वह कब क्या चाहती है, मैं हर बात समझ लेता था. यह सब वर्णन से बाहर है, केवल अनुभूति ही हो सकती है.’

विलियम, जैनी और जार्ज, तीनों के चेहरों पर उतारचढ़ाव कभी रोष तो कभी पश्चात्ताप के लक्षणों का स्पष्टीकरण कर रहे थे.

जेम्स ने अपनी वसीयत में मुख्य रूप से कहा था कि मेरी सारी चल और अचल संपत्ति में से समस्त टैक्स तथा हर प्रकार के वैध खर्च, बिल आदि देने के बाद शेष बची रकम का इस प्रकार वितरण किया जाए :

‘मिस्टर राकेश वर्मा, जिन का पुराना पता था : 23 रैले ड्राइव, वैटस्टोन, लंदन एन 20, को 2 हजार पौंड दिए जाएं और उन से मेरी ओर से विनम्रतापूर्वक कहा जाए कि यह राशि उन के उस एक दिन का मूल्य न समझा जाए जिस के कारण मेरे जीवन के मापदंड ही बदल गए थे. उन अमूल्य क्षणों का मूल्य तो चुकाने की सामर्थ्य किसी के भी पास न होगी. यह क्षुद्र रकम तो मेरे उद्गारों का केवल टोकन भर है.

‘मेरे उक्त वक्तव्य से, स्पष्ट है कि विलियम वारन, जैनी वारन या जार्ज वारन इस संपत्ति के उत्तराधिकारी होने के अयोग्य हैं.’

वकील कहतेकहते कुछ क्षणों के लिए रुक गया. विलियम, जैनी और जार्ज की मुखाकृति पर एक के बाद एक भाव आजा रहे थे. वे कभी आंखें नीची करते हुए दांत पीसते तो कभी अपने कठोर व्यवहार का पश्चात्ताप करते.

विलियम अपने क्रोध को वश में न रख सका और खड़े हो कर सामने रखी मेज पर जोर से हाथ मार कर जाने को खड़ा हो गया तो जैनी ने उसे समझाबुझा कर बैठा लिया.

वकील ने पुन: वसीयत पढ़नी शुरू की तो यह जान कर सभी आश्चर्यचकित हो गए कि शेष समस्त संपत्ति ‘विलमा’ बिल्ली के नाम कर दी गई थी और साथ ही कहा गया था कि आर.एस.पी.सी.ए. को ‘विलमा’ के शेष जीवन के पालनपोषण का अधिकार दिया जाए और इसी संस्था को प्रबंधक नियुक्त किया जाए. साथ ही एक सूची थी जिस में ‘विलमा’ को जेम्स किस प्रकार रखता था, उस का पूरा वर्णन था. आगे लिखा था, ‘विलमा के निधन पर उस का एक स्मारक बनाया जाए. उस के बाद शेष धन को राह भटके हुए, प्रताडि़त पशुओं की दशा सुधारने पर व्यय किया जाए.’

मैं ने मार्टिन से कहा, ‘‘यदि आप अनुमति दें तो ये 2 हजार पौंड, जो वसीयत के अनुसार जेम्स वारन मुझे दे रहे हैं, इस राशि को भी ‘विलमा’ की वसीयत की राशि में ही मिला दें तो मुझे हार्दिक सुख मिलेगा.’’

वकील ने कहा, ‘‘इस को विधिवत बनाने में थोड़ी अड़चन आ सकती है. हां, इसी राशि का एक चैकआर.एस.पी.सी.ए. को अपनी इच्छानुसार देना अधिक सुगम होगा.’’

अंत में औपचारिक शब्दों के साथ मार्टिन ने वसीयत बंद कर बैग में रख ली. बिल्ली, जो अभी भी सारी काररवाई से अनजान सोई हुई थी, आर.एस.पी.सी.ए. के प्रतिनिधि को सौंप दी गई. इस प्रकार वकील का भी प्रतिदिन ‘विलमा’ की देखरेख का भार समाप्त हो गया. सब मकान से बाहर आ गए.

मैं ने सीमा से कहा कि मैं तुम्हें उस मकान पर ले चलता हूं जहां लंदन में विवाह से पहले मैं रहता था. कार 10 मिनट में 23 रैले ड्राइव के सामने पहुंच गई. कार एक ओर खड़ी की और न जाने क्यों बिना सोचेसमझे ही उंगली उस मकान की घंटी के बटन पर दबा दी.

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एक अंगरेज वृद्ध ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाजा खोला. कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया. मैं ने उस वृद्ध को बताया कि लगभग 30 वर्ष पहले मैं इस मकान में किराएदार था. बस, इधर से गुजर रहा था तो पुरानी याद आ गई…इस से पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना शुरू कर दिया.

‘‘यदि तुम इस मकान को खरीदने के विचार से आए हो तो वापस चले जाओ. इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं. चार्ल्स की मां, मेरी पत्नी तो मुझे कब की छोड़ गई…चार्ल्स अमेरिका से एक दिन अवश्य आएगा… हां, कहीं उस का फोन न आ जाए?’’

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इतना कहतेकहते उस ने दरवाजा बंद कर लिया. अंदर से कुत्ता अभी भी भौंक रहा था. सीमा की नजर दरवाजे पर अटकी हुई थी. कह रही थी.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 1

दरवाजा खोला तो पोस्टमैन ने सीमा के हाथ में चिट्ठी दे कर दस्तखत करने को कहा.

‘‘किस की चिट्ठी है?’’ मैं ने बैठेबैठे ही पूछा.

चिट्ठी देख कर सीमा ठिठक गई और आश्चर्य से बोली, ‘‘किसी सौलिसिटर की है. लिफाफे पर भेजने वाले का नाम ‘जौन मार्र्टिन-सौलिसिटर्स’ लिखा है.’’

यह सुनते ही मैं ने चाय का प्याला होंठों तक पहुंचने से पहले ही मेज पर रख दिया. इंगलैंड में मैं वैध रूप से आया था और 65 वर्ष की आयु में वकील का पत्र देख कर दिल को कुछ घबराहट सी होने लगी थी. उत्सुकता और भय का भाव लिए पत्र खोला तो लिखा था.

‘‘जेम्स वारन, 30 डार्बी एवेन्यू, लंदन निवासी का 85 वर्ष की आयु में 28 नवंबर, 2004 को देहांत हो गया. उस की वसीयत में अन्य लोगों के साथ आप का भी नाम है. जेम्स की वसीयत 15 दिसंबर, 2004 को 3 बजे जेम्स वारन के निवास पर पढ़ी जाएगी. आप से अनुरोध है कि आप निर्धारित तिथि पर वहां पधारें या आफिस के पते पर टेलीफोन द्वारा सूचित करें.’’

‘‘यह जेम्स वारन कौन है?’’ सीमा ने उत्सुकता से कहा, ‘‘मेरे सामने तो आप ने कभी भी इस व्यक्ति का कोई जिक्र नहीं किया.’’

मैं जैसे किसी पुराने टाइमजोन में पहुंच गया. चाय का एक घूंट पीते हुए मैं ने सीमा को बताना शुरू किया.

उस समय मैं अविवाहित था और लंदन में रहता था. मैं कभीकभी 2 मील की दूरी पर स्थित एवेन्यू पार्क में जाता था. वहां एक अंगरेज वृद्ध जिस की उम्र लगभग 55-60 की होगी, बैंच पर अकेला बैठा रहता और वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को हंस कर ‘गुडमार्निंग’ या ‘गुड डे’ इस अंदाज में कह कर अभिवादन करता, मानो कुछ कहना चाहता हो.

इंगलैंड में धूप खिलीखिली हो तो कौन उस बूढ़े की ऊलजलूल बातों में समय गंवाए? यह सोच कर लोग उसे नजरअंदाज कर चले जाते और वह बैंच पर अकेला बैठा होता था. मैं भी औरों की तरह अकसर आंखें नीची किए कतरा कर चला जाता था.

हर रोज अंधेरा शुरू होने से पहले बूढ़ा अपनी जगह से उठता और धीरेधीरे चल देता. मैं कभी अनायास ही पीछे मुड़ कर देखता तो हाथ हिला कर वह ‘हैलो’  कह कर मुसकरा देता. मैं भी उसी प्रकार उत्तर दे कर चला जाता.

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यह क्रम चलता रहा. एक दिन रात को ठीक से नींद नहीं आई तो विचारों के क्रम में बारबार बूढे़ की आकृति सामने आती रही, फिर नींद लगी तो देर से सो कर उठा. सामान्य कार्यों के बाद कुछ भोजन कर कपड़े बदले और पार्क जा पहुंचा.

देखा तो बूढ़ा उसी बैंच पर मुंह नीचे किए बैठा हुआ था. इस बार कतराने के बजाय मैं ने उस से कहा, ‘हैलो, जेंटिलमैन.’

बूढ़े ने मुंह ऊपर उठाया. उस की नजरें कुछ क्षणों के लिए मेरे चेहरे पर अटक गईं. फिर एकदम से उस की आंखों में चमक सी आ गई. वह बड़े उल्लास- पूर्वक बोला, ‘हैलो, सर. आप मेरे पास बैठेंगे क्या?’

मैं उसी बैंच पर उस के पास बैठ गया. बूढ़े ने मुझ से हाथ मिलाया, जैसे कई वर्षों के बाद कोई अपना मिला हो. मैं ने पूछा, ‘आप कैसे हैं?’

जब भी 2 व्यक्ति मिलते हैं तो यह एक ऐसा वाक्य है जो स्वत: ही मुख से निकल जाता है. कुछ देर मौन ने हम को अलग रखा था पर मैं ने ही फिर पूछा, ‘आसपास में ही रहते हैं?’

मेरे इस सवाल पर ही उस ने बिना झिझक के कहना शुरू कर दिया, ‘मेरा नाम जेम्स वारन है. 30 डार्बी एवेन्यू, फिंचले में अकेला ही रहता हूं.’

मैं ने कहा, ‘मिस्टर वारन…नहीं, नहीं…जेम्स.’

‘आप मुझे जेम्स कह कर ही पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा,’ जेम्स ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही कह दिया.

मैं जानता था कि जेम्स वारन के पास कहने को बहुत कुछ है, जिसे उस ने अपने अंदर दबा कर रखा है क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है. उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतना पर आने के लिए जाने कब से संघर्ष कर रही होंगी किंतु किस के पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिए समय है?

जेम्स ने एक आह सी भरी और कहना शुरू किया.

‘मैं अकेला हूं और 4 बेडरूम के मकान की भांयभांय करती दीवारों से पागलों की तरह बातें करता रहता हूं.’

इतना कह कर जेम्स ने चश्मे को उतारा और उसे साफ कर के दोबारा बोलना शुरू किया.

‘ऐथल, यानी मेरी पत्नी, केवल सुंदर ही नहीं, स्वभाव से भी बहुत अच्छी थी. हम दोनों एकदूसरे की सुनते थे. उस के साथ दुख का आभास ही नहीं होता था तो दुख की पहचान कैसे होती?

‘एक दिन पत्नी ने मुझे जो बताया उसे सुन कर मैं फूला न समाया. पिता बनने की खबर ने मुझे ऐसे हवाई सिंहासन पर बैठा दिया जैसे एक बड़ा साम्राज्य मेरे अधीन हो. मेरी मां ने दादी बनने की खुशी में घर पर परिचितों को बुला कर पार्टी दे डाली. इसी तरह 8 महीने आनंद से बीत गए. ऐथल ने अपने आफिस से अवकाश ले लिया था. मैं सारे दिन बच्चे और ऐथल के बारे में सोचता रहता.

‘एक रात मूसलाधार वर्षा हो रही थी. ऐथल को ऐसा तेज दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था. मैं ने एंबुलेंस मंगाई और ऐथल की कराहटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुंच गया.

‘नर्सों ने एंबुलेंस से ऐथल को उतारा और तेजी से आई.सी.यू. में ले गईं. डाक्टर ने ऐथल की हालत जांच कर कहा कि शीघ्र ही आपरेशन करना पड़ेगा. अंदर डाक्टर और नर्सें ऐथल और बच्चे के जीवन और मौत के बीच अपने औजारों से लड़ते रहे, बाहर मैं अपने से लड़ता रहा. काफी देर बाद एक नर्स ने आ कर बताया कि तुम एक लड़के के पिता बन गए हो. खुशी में एक उन्माद सा छा गया. नर्स को पकड़ कर मैं नाचने लगा था. नर्स ने मुझे जोर से झंझोड़ सा दिया पर मेरा हाथ जोर से दबाए रही. कहने लगी कि मिस्टर वारन, मुझे बहुत ही दुख से कहना पड़ रहा है कि डाक्टरों की हर कोशिश के बाद भी आप की पत्नी नहीं बच सकी.

जेम्स ने आंखों से चश्मा उतार कर फिर साफ किया. उस की आंखें आंसुओं के भार को संभाल नहीं पाईं.  उस ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपनी इस वेदना भरी कहानी को जारी करते हुए बोला, ‘मां पोते की खुशी और ऐथल की मृत्यु की पीड़ा में समझौता कर जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश करने लगीं. मेरी मां बड़ी साहसी थीं. उन्होंने बच्चे का नाम विलियम वारन रखा क्योंकि विलियम ब्लेक, ऐथल का मनपसंद लेखक था.’

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‘इसी तरह 8 साल बीत गए. मां बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं. एक दिन वह भी विलियम को मुझे सौंप कर इस संसार से विदा ले कर चली गईं. उस दिन से विलियम के लिए मैं ही मां, दादी और पिता के कर्तव्यों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता. उसे सुबह नाश्ता दे कर स्कूल छोड़ कर अपने दफ्तर जाता. वहां से भी दिन के समय स्कूल में फोन पर उस की टीचर से उस का हाल पूछता रहता. विलियम की उंगली में यदि जरा सी भी चोट लग जाती तो मुझे ऐसा लगता जैसे मेरे सारे शरीर में दर्द फैल गया हो.

‘इतने लाड़प्यार में पलते हुए वह 18 वर्ष का हो गया. ए लेवल की परीक्षा में ए ग्रेड में पास होने की खबर सुन कर मैं बेहद खुश हुआ था. जब उस ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से आनर्स की डिगरी पास की तो मेरे आनंद का पारावार न था.

‘विलियम की गर्लफ्रेंड जैनी जब भी उस के साथ घर आती तो मैं खुशी से नाच पड़ता. जैनी और विलियम का विवाह उसी चर्च में संपन्न हुआ जहां मेरा और ऐथल का विवाह हुआ था. एक साल के बाद ही विलियम और जैनी ने मुझे दादा बना दिया. उस दिन मुझे मां और ऐथल की बड़ी याद आई. मेरी आंखें भर आईं. पोते का नाम जार्ज वारन रखा.

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‘हंसतेखेलते एक साल बीत गया. इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था.

‘डैडी, जैनी और मुझे, कंपनी एक बहुत बड़ा पद दे कर आस्टे्रलिया भेज रही है. वेतन भी बहुत बढ़ा दिया है. मकान, गाड़ी, हवाई जहाज की यात्रा के साथसाथ कंपनी जार्ज के स्कूल का प्रबंध आदि की सुविधाएं भी दे रही है, विलियम ने बताया तो मेरी आंखें खुली की खुली ही रह गईं.

बिहार : सरकारी नौकरियों की चाहत ने बढ़ाई बेरोजगारी

धीरज कुमार

प्रदेश की राजधानी पटना में तकरीबन सभी जिलों के लड़केलड़कियां अलगअलग शहर के कोचिंग सैंटरों में अपना भविष्य बेहतर करने की उम्मीद में भागदौड़ करते देखे जा सकते हैं. उन की एक ही ख्वाहिश होती है कि किसी तरह से प्रतियोगिता परीक्षा में पास कर सरकारी नौकरी हासिल करना.

बहुत से लड़केलड़कियां अपना भविष्य बनाने की चाह में पटना जैसे शहरों में कई सालों से टिके होते हैं, फिर भले ही उन के मातापिता किसान हैं, रेहड़ी चलाने वाले हैं, छोटेमोटे धंधा करने वाले हैं. उन की थोड़ी आमदनी भी होगी, लेकिन वे अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए पैसा खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, चाहे इस के लिए खेत बेच कर, कर्ज ले कर, गहने गिरवी रख कर कोचिंग सैंटरों में लाखों रुपए क्यों न बरबाद करना पड़े.

कोचिंग सैंटर वाले भी इस का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. ज्यादातर कोचिंग सैंटर सौ फीसदी कामयाबी का दावा कर लाखों का कारोबार करते हैं, भले ही उन की कामयाबी की फीसदी जीरो के बराबर हो.

अब सवाल यह कि किसी सरकार के पास इतने इंतजाम हैं, जो सभी नौजवानों को नौकरी मुहैया करा देगी? इस सवाल के जवाब के लिए पिछले तकरीबन 10 सालों की  प्रमुख रिक्तियों और बहालियों का विश्लेषण किया गया. राज्य सरकार ने साल 2010 में बिहार में पहली बार शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) का आयोजन किया था. इस परीक्षा में 26.79 लाख लोगों ने आवेदन किया था, जिन में से मात्र 1.47 लाख अभ्यर्थियों को पास किया गया. इस में कामयाबी का फीसदी मात्र साढ़े 5 फीसदी था. राज्य सरकार ने उन सफल अभ्यर्थियों में से तकरीबन एक से सवा लाख लोगों को नियोजन किया.

उस समय शिक्षकों को सरकार ने  जो बहाली की, उन्हें नियोजन यानी आउटसोर्सिंग पर रखा गया, जिन को सरकार नियत वेतन देती है. नियमित शिक्षकों की तरह वेतन व अन्य सुविधाएं नहीं देती है. हां, चुनाव के समय कुछ पैसे बढ़ा कर वोट बैंक के लिए खुश करने की कोशिश की जाती है.

आज उन्हीं शिक्षकों ने कानून का दरवाजा खटखटा कर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ी, ताकि उन्हें पुराने शिक्षकों की तरह दूसरी सुविधाएं मिलें. लेकिन वे सरकार और अदालत के चक्रव्यूह में फंस कर हार गए.

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी दलील पेश की है कि स्थायी बहाली नहीं होंगी. पहले की हुई स्थायी बहाली को वर्तमान सरकार डाइंग कैडर यानी मृतप्राय मान चुकी है.

इस का मतलब यह है कि अब जो भी बहाली होगी, वह सिर्फ नियत वेतन पर रखा जाएगा. अब पुरानी बहाली की तरह ईपीएफ, बीमा, पैंशन, ग्रेच्युटी, स्थानांतरण, अनुकंपा पर नौकरी देने का प्रावधान आदि की सुविधाएं खत्म कर दी गई हैं.

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जबकि गैरसरकारी संस्थाओं में आज भी ऐसी सुविधाओं में से कुछ ही दी जाती हैं. यही वजह है कि मेहनत करने वाले लोग प्राइवेट संस्थाओं को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, लेकिन इस के बावजूद भी कुछ  लोग अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागना फायदेमंद है या नुकसानदायक.

बिहार सरकार स्टाफ सिलैक्शन कमीशन (एलडीसी) 2014 में  तकरीबन 13,000 पदों की बहाली के लिए परीक्षा का आयोजन किया गया. इन पदों पर बहाली के लिए तकरीबन  13 लाख  अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था. कई बार यह परीक्षा रद्द की गई. इस परीक्षा को टालते हुए लगभग  5-6 साल बीत जाने के बाद भी अभी उस की बहाली पूरी नहीं की गई है. अगर रिक्तियों के अनुपात में बहाली की संख्या को देखा जाए तो इस परीक्षा में महज  1 फीसदी अभ्यर्थियों का चयन किया जाना है.

बिहार सरकार जानबूझ कर कोई भी बहाली को कम समय में पूरा नहीं करती है, बल्कि उसी बहाली को कई सालों में चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की कोशिश करती है, ताकि समय लंबा खिंचे. इस से अभ्यर्थी धीरेधीरे कम होंगे और सरकार के एजेंडे का प्रचारप्रसार ज्यादा होगा. इस तरह सरकार को ज्यादा फायदा मिलेगा. ऐसी प्रक्रिया में कुछ अभ्यर्थियों की तो उम्र भी निकल जाती है, जिस के कारण वे बहाली से पहले ही छंट जाते हैं.

साल 2019 में बिहार पुलिस में कांस्टेबल के 11,880 पदों पर बहाली होनी थी, जिस में तकरीबन 13 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन दिए थे. अभ्यर्थियों के अनुपात में यह महज एक फीसदी से भी कम बहाली की गई. इस के साथ ही कई अन्य छोटीमोटी बहालियां हुईं जैसे दारोगा की बहाली, नर्स की बहाली, पशुपालन विभाग में बहाली वगैरह. इन सभी पदों की बहाली में सीटें कम थीं. इन 10 सालों की बहाली में तकरीबन छोटीबड़ी सभी बहालियां मिला कर तकरीबन डेढ़ से 2 लाख अभ्यर्थियों की बहाली हुई होगी.

ऊपर मोटेतौर पर 2-3 परीक्षाओं का जिक्र किया गया. गौर करने की बात  यह है कि तीनों परीक्षाओं  में तकरीबन 50 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया, जिन में से तकरीबन 2 लाख लोगों को नौकरी मिल गई.

बिहार के नौजवानों की यह खासीयत है कि एकसाथ कई परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. अगर मान लिया जाए कि तीनों परीक्षा में कुछ लोग समान रूप से सम्मिलित हुए हों, तो तकरीबन 30 से 35 लाख नौजवान 10 सालों में बेरोजगार रह गए यानी उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल पाई.

राज्य और केंद्र सरकार द्वारा युवाओं में स्किल पैदा करने के लिए ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के तहत कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. लेकिन इन प्रशिक्षण केंद्रों पर प्लेसमैंट की योजना नहीं होने के चलते ये सभी कार्यक्रम कागजों पर ही रह गए हैं. इसी तरह नौकरी से वंचित लोगों की वजह से बेरोजगारों की तादाद काफी बड़ी हो जाती है. उन में से ज्यादातर लोग घर छोड़ कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं. स्किल की कमी में कम तनख्वाह पर बाहरी राज्यों में काम करना पड़ता हैं.

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नीतीश सरकार अपने शुरू के कार्यकाल में बेरोजगारी दूर करने और रोजगार बढ़ाने के लिए बाहरी राज्यों के गैरसरकारी संस्थाओं को बिहार में आमंत्रित कर नियोजन मेला का आयोजन करती थी, जिस का मीडिया में काफी प्रचारप्रसार भी किया जाता था. इस में दूसरे राज्यों के धागा मिल, कपड़ा मिल, बीमा कंपनियां, सिक्योरिटी कंपनी, साइकिल कंपनी, मोटर कंपनी वगैरह छोटीबड़ी तकरीबन 20-22 कंपनियां हर जिले में आ रही थीं. उस में 18 से 25 साल की उम्र के लड़के और लड़कियों को रोजगार देने का काम किया जाता था. लेकिन लोगों ने गैरसरकारी कंपनी होने के चलते रोजगार हासिल करने में जोश नहीं दिखाया, इसलिए सरकार को वह कार्यक्रम बंद करना पड़ा.

केंद्र सरकार की ओर से की जाने वाली बहाली जैसे रेलवे, बैंक वगैरह में कम कर दी गई हैं या तकरीबन रोक दी गई हैं. फिर भी बिहार के छोटेबड़े शहरों में तैयारी करने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है, बल्कि इजाफा ही हुआ है.

साल 2001 से साल 2005 के बीच बिहार सरकार ने 11 महीने के लिए राज्य में शिक्षामित्रों की बहाली की थी. यह बहाली मुखिया द्वारा की गई थी, जिन का मासिक वेतन मात्र 1,500 रुपए था. बाद में आई सरकार ने उन के मासिक वेतन में बढ़ोतरी 3,000 रुपए कर दी. साल 2015 में  वर्तमान सरकार शिक्षकों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए वेतनमान तो लागू कर दिया, पर आज भी पुराने शिक्षकों की तरह सुविधाओं से वंचित रखा गया है.

आज सरकार हजार डेढ़ हजार रुपए पर किसी भी तरह की बहाली निकालती है, तो लोगों की भीड़ लग जाती है. लोगों का मानना है कि पहले सरकारी दफ्तर में किसी तरह से घुस जाओ. आने वाले समय में सरकार अच्छस वेतन दे ही देगी. इसी का नतीजा है कि बिहार में तकरीबन ढाई लाख रसोइया विद्यालयों में इस उम्मीद में काम कर रही हैं कि आने वाले दिनों में सरकार अच्छा वेतन देगी.

सरकारी नौकरियों के पीछे भागने की खास वजह यह रही है कि इस में मेहनत कम करनी पड़ती है. इस के उलट गैरसरकारी दफ्तरों में काम ज्यादा करना पड़ता है.

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बिहार में खेती लायक जमीन होते हुए भी लोगों का खेतीबारी के प्रति मोहभंग होता जा रहा है. इस के पीछे बाढ़, सुखाड़ और नवीनतम कृषि उपकरणों की कमी होना भी है, जिस के कारण लोगों के पास एकमात्र विकल्प सरकारी तंत्र में नौकरियों की तलाश करना रह जाता है.

नौजवानों को चाहिए कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागने के बजाय वे अपने अंदर हुनर पैदा करें. इस पर अपने पौजिटिव नजरिए को विकसित करने की जरूरत है. कोई भी नया हुनर सीख कर अपने कामधंधे में लगा जा सकता है और अपने परिवार के लिए सहारा बना जा सकता है.

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