Serial Story: जीवनधारा भाग 1

लेखिका- मनीषा शर्मा

एक सुबह पापा अच्छेखासे आफिस गए और फिर उन का मृत शरीर ही वापस लौटा. सिर्फ 47 साल की उम्र में दिल के दौरे से हुई उन की असामयिक मौत ने हम सब को बुरी तरह से हिला दिया.

‘‘मेरी घरगृहस्थी की नाव अब कैसे पार लगेगी?’’ इस सवाल से उपजी चिंता और डर के प्रभाव में मां दिनरात आंसू बहातीं.

‘‘मैं हूं ना, मां,’’ उन के आंसू पोंछ कर मैं बारबार उन का हौसला बढ़ाती, ‘‘पापा की सारी जिम्मेदारी मैं संभालूंगी. देखना, सब ठीक हो जाएगा.’’

मुकेश मामाजी ने हमें आश्वासन दिया, ‘‘मेरे होते हुए तुम लोगों को भविष्य की ज्यादा चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. संगीता ने बी.काम. कर लिया है. उस की नौकरी लगवाने की जिम्मेदारी मेरी है.’’

मुझ से 2 साल छोटे मेरे भाई राजीव ने मेरा हाथ पकड़ कर वादा किया, ‘‘दीदी, आप खुद को कभी अकेली मत समझना. अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करते ही मैं आप का सब से मजबूत सहारा बन जाऊंगा.’’

राजीव से 3 साल छोटी शिखा के आंखों से आंसू तो ज्यादा नहीं बहे पर वह सब से ज्यादा उदास, भयभीत और असुरक्षित नजर आ रही थी.

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मोहित मेरा सहपाठी था. उस के साथ सारी जिंदगी गुजारने के सपने मैं पिछले 3 सालों से देख रही थी. इस कठिन समय में उस ने मेरा बहुत साथ दिया.

‘‘संगीता, तुम सब को ‘बेटा’ बन कर दिखा दो. हम दोनों मिल कर तुम्हारी जिम्मेदारियों का बोझ उठाएंगे. हमारा प्रेम तुम्हारी शक्ति बनेगा,’’ मोहित के ऐसे शब्दों ने इस कठिन समय का सामना करने की ताकत मेरे अंगअंग में भर दी थी.

परिवर्तन जिंदगी का नियम है और समय किसी के लिए नहीं रुकता. जिंदगी की चुनौतियों ने पापा की असामयिक मौत के सदमे से उबरने के लिए हम सभी को मजबूर कर दिया.

मामाजी ने भागदौड़ कर के मेरी नौकरी लगवा दी. मैं ने काम पर जाना शुरू कर दिया तो सब रिश्तेदारों व परिचितों ने बड़ी राहत की सांस ली. क्योंकि हमारी बिगड़ी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने वाला यह सब से महत्त्वपूर्ण कदम था.

‘‘मेरी गुडि़या का एम.बी.ए. करने का सपना अधूरा रह गया. तेरे पापा तुझे कितनी ऊंचाइयों पर देखना चाहते थे और आज इतनी छोटी सी नौकरी करने जा रही है मेरी बेटी,’’ पहले दिन मुझे घर से विदा करते हुए मां अचानक फूटफूट कर रो पड़ी थीं.

‘‘मां, एम.बी.ए. मैं बाद में भी कर सकती हूं. अभी मुझे राजीव और शिखा के भविष्य को संभालना है. तुम यों रोरो कर मेरा मनोबल कम न करो, प्लीज,’’ उन का माथा चूम कर मैं घर से बाहर आ गई, नहीं तो वह मेरे आंसुओं को देख कर और ज्यादा परेशान होतीं.

मोहित और मैं ने साथसाथ ग्रेजुएशन किया था. उस ने एम.बी.ए. में प्रवेश लिया तो मैं बहुत खुश हुई. अपने प्रेमी की सफलता में मैं अपनी सफलता देख रही थी. मन के किसी कोने में उठी टीस को मैं ने उदास सी मुसकान होंठों पर ला कर बहुत गहरा दफन कर दिया था.

पापा के समय 20 हजार रुपए हर महीने घर में आते थे. मेरी कमाई के 8 हजार में घर खर्च पूरा पड़ ही नहीं सकता था. फ्लैट की किस्त, राजीव व शिखा की फीस, मां की हमेशा बनी रहने वाली खांसी के इलाज का खर्च आर्थिक तंगी को और ज्यादा बढ़ाता.

‘‘अगर बैंक से यों ही हर महीने पैसे निकलते रहे तो कैसे कर पाऊंगी मैं दोनों बेटियों की इज्जत से शादियां? हमें अपने खर्चों में कटौती करनी ही पडे़गी,’’ मां का रातदिन का ऐसा रोना अच्छा तो नहीं लगता पर उन की बात ठीक ही थी.

फल, दूध, कपडे़, सब से पहले खरीदने कम किए गए. मौजमस्ती के नाम पर कोई खर्चा नहीं होता. मां ने काम वाली को हटा दिया. होस्टल में रह रहे राजीव का जेबखर्च कम हो गया.

इन कटौतियों का एक असर यह हुआ कि घर का हर सदस्य अजीब से तनाव का शिकार बना रहने लगा. आपस में कड़वा, तीखा बोलने की घटनाएं बढ़ गईं. कोई बदली परिस्थितियों के खिलाफ शिकायत करता, तो मां घंटों रोतीं. मेरा मन कभीकभी बेहद उदास हो कर निराशा का शिकार बन जाता.

‘‘हिम्मत मत छोड़ो, संगीता. वक्त जरूर बदलेगा और मैं तुम्हारे पास न भी रहूं, पर साथ तो हूं ना. तुम बेकार की टेंशन लेना छोड़ दो,’’ मोहित का यों समझाना कम से कम अस्थायी तौर पर तो मेरे अंदर जीने का नया जोश जरूर भर जाता.

अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में मैं जीजान से जुटी रही और परिवर्तन का नियम एकएक कर मेरी आशाओं को चकनाचूर करता चला गया.

बी.टेक. की डिगरी पाने के बाद राजीव को स्कालरशिप मिली और वह एम.टेक. करने के लिए विदेश चला गया.

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‘‘संगीता दीदी, थोड़ा सा इंतजार और कर लो, बस. फिर धनदौलत की कमी नहीं रहेगी और मैं आप की सब जिम्मेदारियां, अपने कंधों पर ले लूंगा. अपना कैरियर बेहतर बनाने का यह मौका मैं चूकना नहीं चाहता हूं.’’

राजीव की खुशी में खुश होते हुए मैं ने उसे अमेरिका जाने की इजाजत दे दी थी.

राजीव के इस फैसले से मां की आंखों में चिंता के भाव और ज्यादा गहरे हो उठे. वह मेरी शादी फौरन करने की इच्छुक थीं. उम्र के 25 साल पूरे कर चुकी बेटी को वह ससुराल भेजना चाहती थीं.

मोहित ने राजीव को पीठपीछे काफी भलाबुरा कहा था, ‘‘उसे यहां अच्छी नौकरी मिल रही थी. वह लगन और मेहनत से काम करता, तो आजकल अच्छी कंपनी ही उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायता करती हैं. मुझे उस का स्वार्थीपन फूटी आंख नहीं भाया है.’’

मोहित के तेज गुस्से को शांत करने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी थी.

मां कभीकभी कहतीं कि मैं शादी कर लूं, पर यह मुझे स्वीकार नहीं था.

‘‘मां, तुम बीमार रहती हो. शिखा की कालिज की पढ़ाई अभी अधूरी है. यह सबकुछ भाग्य के भरोसे छोड़ कर मैं कैसे शादी कर सकती हूं?’’

मेरी इस दलील ने मां के मुंह पर तो ताला लगाया, पर उन की आंखों से बहने वाले आंसुओं को नहीं रोक पाई.

एम.बी.ए. करने के बाद मोहित को जल्दी ही नौकरी मिल गई थी. उस ने पहली नौकरी से 2 साल का अनुभव प्राप्त किया और इस अनुभव के बल पर उसे दूसरी नौकरी मुंबई में मिली.

अपने मातापिता का वह इकलौता बेटा था. उन्हें मैं पसंद थी, पर वह उस की शादी अब फौरन करने के इच्छुक थे.

‘‘मैं कैसे अभी शादी कर सकती हूं? अभी मेरी जिम्मेदारियां पूरी नहीं हुई हैं, मोहित. मेरे ससुराल जाने पर अकेली मां घर को संभाल नहीं पाएंगी,’’ बडे़  दुखी मन से मैं ने शादी करने से इनकार कर दिया था.

‘‘संगीता, कब होंगी तुम्हारी जिम्मेदारियां पूरी? कब कहोगी तुम शादी के लिए ‘हां’?’’ मेरा फैसला सुन कर मोहित नाराज हो उठा था.

‘‘राजीव के वापस लौटने के बाद हम….’’

‘‘वह वापस नहीं लौटेगा…कोई भी इंजीनियर नहीं लौटता,’’ मोहित ने मेरी बात को काट दिया, ‘‘तुम्हारी मां विदेश में जा कर बसने को तैयार होंगी नहीं. देखो, हम शादी कर लेते हैं. राजीव पर निर्भर रह कर तुम समझदारी नहीं दिखा रही हो. हम मिल कर तुम्हारी मां व छोटी बहन की जिम्मेदारी उठा लेंगे.’’

‘‘शादी के बाद मुझे मां और छोटी बहन को छोड़ कर तुम्हारे साथ मुंबई जाना पड़ेगा और यह कदम मैं फिलहाल नहीं उठा सकती हूं. मेरा भाई मुझे धोखा नहीं देगा. मोहित, तुम थोड़ा सा इंतजार और कर लो, प्लीज.’’

मोहित ने मुझे बहुत समझाया पर मैं ने अपना फैसला नहीं बदला. मां भी उस की तरफ से बोलीं, पर मैं शादी करने को तैयार नहीं हुई.

मोहित अकेला मुंबई गया. मुझे उस वक्त एहसास नहीं हुआ पर इस कदम के साथ ही हमारे प्रेम संबंध के टूटने का बीज पड़ गया था.

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वक्त ने यह भी साबित कर दिया कि राजीव के बारे में मोहित की राय सही थी.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने वहीं नौकरी कर ली. वह हम से मिलने भी आया, एक बड़ी रकम भी मां को दे कर गया, पर मेरी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर लेने को वह तैयार नहीं हुआ.

परिस्थितियों ने मुझे कठोर बना दिया था. मेरे आंसू न मोहित ने देखे न राजीव ने. इन का सहारा छिन जाने से मैं खुद को कितनी अकेली और टूटा हुआ महसूस कर रही थी, इस का एहसास मैं ने इन दोनों को जरा भी नहीं होने दिया था.

मां रातदिन शादी के लिए शोर मचातीं, पर मेरे अंदर शादी करने का सारा उत्साह मर गया था. कभी कोई रिश्ता मेरे लिए आ जाता तो मां का शोर मचाना मेरे लिए सिरदर्द बन जाता. फिर रिश्ते आने बंद हो गए और हम मांबेटी एकदूसरे से खिंचीखिंची सी खामोश रह साथसाथ समय गुजारतीं.

जीवनधारा: हादसे जिंदगी के ढांचे को बदल देते हैं!

Serial Story: जीवनधारा भाग 3

मैं ने शोर मचाने की धमकी दी, तो वह गुस्से से बिफर कर गुर्राए, ‘‘इतने दिनोें से मेरे पैसों पर ऐश कर रही हो, तो अब सतीसावित्री बनने का नाटक क्यों करती हो? कोई मैं पागल बेवकूफ हूं जो तुम पर यों ही खर्चा कर रहा था.’’

उन से निबटना मेरे लिए कठिन नहीं था, पर अकेली घर पहुंचने तक मैं आटोरिकशा में लगातार आंसू बहाती रही.

घर पहुंच कर भी मेरा आंसू बहाना जारी रहा. मां ने बारबार मुझ से रोने का कारण पूछा, पर मैं उन्हें क्या बताती.

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रात को मुझे नींद नहीं आई. रहरह कर कपूर साहब का डायलाग कानों में गूंजता, ‘…अब सतीसावित्री बनने का नाटक क्यों करती हो? कोई मैं पागल, बेवकूफ हूं जो तुम पर यों ही खर्चा कर रहा था.’

यह सच है कि उन के साथ मेरा वक्त बड़ा अच्छा गुजरा था. अपनी जिंदगी में आए इस बदलाव से मैं बहुत खुश थी, पर अब अजीब सी शर्मिंदगी व अपमान के भाव ने मन में पैदा हो कर सारा स्वाद किरकिरा कर दिया था.

रात भर मैं तकिया अपने आंसुओं से भिगोती रही. अगले दिन रविवार होने के कारण मैं देर तक सोई.

जब आंखें खुलीं तो उम्मीद के खिलाफ मैं ने खुद को सहज व हलका पाया. मन ने इस स्थिति का विश्लेषण किया तो जल्दी ही कारण भी समझ में आ गया.

नींद आने से पहले मेरे मन ने निर्णय लिया था, ‘मैं अब खुश रह कर जीना चाहती हूं और जिऊंगी भी. यह नेक काम मैं अब अपने बलबूते पर करूंगी. किसी कपूर साहब, राजीव या मोहित पर निर्भर नहीं रहना है मुझे.’

‘परिस्थितियों के आगे घुटने टेक कर…अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दब कर मेरी जीवनधारा अवरुद्ध हो गई थी, पर अब ऐसी स्थिति फिर नहीं बनेगी.’

‘मेरी जिंदगी मुझे जीने के लिए मिली है. दूसरों की जिंदगी सजानेसंवारने के चक्कर में अपनी जिंदगी को जीना भूल  जाना मेरी भूल थी. कपूर साहब मेरी जिस नासमझी के कारण गलतफहमी का शिकार हुए हैं, उसे मैं कभी नहीं दोहराऊंगी. जिंदगी का गहराई से आनंद लेने से मुझे अब न अतीत की यादें रोक पाएंगी, न भविष्य की चिंताएं.’

अपने अंतर्मन में इन्हीं विचारों को गहराई से प्रवेश दिला कर मैं नींद के आगोश में पहुंची थी.

अपनी भावदशा में आए सुखद बदलाव का कारण मैं इन्हीं सकारात्मक विचारों को मान रही थी.

कुछ दिन बाद मेरे एक दूसरे सहयोगी नीरज ने मुझ से किसी बात पर शर्त लगाने की कोशिश की. मैं जानबूझ कर वह शर्त हारी और उसे बढि़या होटल में डिनर करवाया.

इस के 2 दिन बाद मैं चोपड़ा और उस की पत्नी के साथ फिल्म देखने गई. अपने इन दोनों सहयोगियों के टिकट मैं ने ही खरीदे थे.

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पड़ोस में रहने वाले माथुर साहब मुझे मार्किट में अचानक मिले, तो उन्हें साथसाथ कुल्फी खाने की दावत मैं ने ही दी और जिद कर के पैसे भी मैं ने ही दिए.

मैं ने अपनी रुकी हुई जीवनधारा को फिर से गतिमान करने के लिए जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए थे.

कपूर साहब की तरह मैं किसी दूसरे पुरुष को गलतफहमी का शिकार नहीं बनने देना चाहती थी.

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इस में कोई शक नहीं कि मेरी जिंदगी में हंसीखुशी की बहार लौट आई थी. अपनों से मिले जख्मों को मैं ने भुला दिया था. उदासी और निराशा का कवच टूट चुका था.

हंसतेमुसकराते और यात्रा का आनंद लेते हुए मैं जिंदगी की राह पर आगे बढ़ चली थी. मेरा जिंदगी भर साथ निभाने को कभी कोई हमराही मिल गया, तो ठीक, नहीं तो उस के इंतजार में रुक कर अपने अंदर शिकायत या कड़वाहट पैदा करने की फुर्सत मुझे बिलकुल नहीं थी.

Crime: नाबालिग के हाथ, खून के रंग

कभी-कभी छोटी सी बात हत्या का कारण बन जाती है. कभी-कभी नाबालिग हत्यारे बन जाते हैं. छोटे-छोटे हाथ कैसे किसी अपने ही दोस्त की गर्दन पर पहुंच जाते हैं, यह आज के सोशल मीडिया और अपराधिक होते माहौल का ही परिणाम है.आइए ! आज आपको ले चलते हैं छत्तीसगढ़ के जिला दुर्ग के ऐसे हत्याकांड की पृष्ठभूमि की ओर जहां छोटी सी बात पर नाबालिगों के हाथ खून से रंग गये.

दरअसल, इस हत्याकांड के पीछे सिर्फ चिढाना और मृतक का अपने सहपाठी दोस्तों को गालियां देना था . दुर्ग जिले के पुलगांव थाना के अंतर्गत आने वाले पुलगांव बस्ती से थाने में सूचना प्राप्त हुई कि, वहां शासकीय प्राथमिक शाला पुलगांव के तीसरी मंजिल में एक नाबालिग लड़के की लाश पड़ी हुई है. सूचना प्राप्त होने पर दुर्ग पुलिस अधीक्षक ,नगर पुलिस अधीक्षक विवेक शुक्ला एवं पुलगांव थाना प्रभारी उत्तर वर्मा घटनास्थल पर पहुंचे. घटनास्थल पर पहुंच मुआयना किया.

उक्त मुआयना के दौरान यह बात प्रकाश में आई कि 13 वर्षीय वर्षीय किशोर दानेश्वर साहू उर्फ पप्पू का शव प्राथमिक शाला पुलगांव के तीसरे मंजिल पर पड़ा हुआ है. आश्चर्य की बात यह थी कि तीसरी मंजिल पर जाने के लिए कोई भी सीढ़ी वहां पर नहीं है! इससे यह बात स्पष्ट हुई कि, तीसरी मंजिल चढ़ने वाले ऐसे युवकों की खोज की जाए जो वहां अक्सर जाया करते हैं.टीम द्वारा अपनी विवेचना का एवं पूछताछ का केंद्र बिंदु यह बात रखते हुए सभी से पूछताछ की जाने लगी.साथ ही मृतक के सभी दोस्तों से बारी-बारी से पूछताछ किया जाना शुरू किया गया.

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इस बीच मौके पर एफएसएल की टीम एवं डॉग स्क्वाड भी पहुंचा एफएसएल टीम के प्रभारी डॉ मनोज पटेल द्वारा बताया गया कि उपरोक्त हत्या गले में किसी चीज को बांधकर की गई है और इस हत्या में संभवत 2 से 3 लोग शामिल होने का अनुमान लगाया और पूछताछ शुरू हो गई.

चिढ़ाना और गालियां देना

युवक जो उस स्कूल की छत पर अक्सर चढ़ा करते थे, उनसे लगातार पूछताछ की गई. इसी बीच एक अन्य सूचना मुखबिर के द्वारा प्राप्त हुई की मृतक आख़िरी समय में अपने कुछ दोस्तों के साथ देखा गया था अतः. उनसे बुलाकर पूछताछ की गई जिसमें उक्त किशोरों ने जो कि नाबालिक थे, ने पुलिस के समक्ष रोते हुए अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों ही अपचारी बालक जिनकी उम्र क्रमशः 17 वर्ष एवं 15 वर्ष है. दोनों ने अपने इकबालिया बयान में बताया कि दानेश्वर साहू उर्फ पप्पू को हम अक्सर चिढ़ाया करते थे, और घटना दिवस को भी उसे चिढ़ा रहे थे जिससे वह आवेश में आकर आरोपी को मां बहन की गाली देने लगा .

जिससे हम लोगों को गुस्सा आ गया. और उन्होंने प्लान किया कि इसे स्कूल की छत पर ले जाते हैं, ऐसा सोचकर उन्होंने उसे स्कूल की छत चलने के लिए तैयार किया. और वहां ले जाने के बाद उससे बहस हुई बहस के दौरान पुनः मृतक ने उन्हें गाली दी.जिससे उनके द्वारा मृतक के गले को हुड वाले जैकेट जिसमें लेस लगा होता है. उसके लेस को निकालकर एक अपचारी बालक द्वारा गले मे कसकर बांध कर खींचा दिया गया. तथा दूसरे अपचारी बालक द्वारा उसके पैर को पकड़ कर रखा गया.

दोनों अपचारी बालक द्वारा अपना जुर्म स्वीकार कर लिया गया है. हत्या में प्रयुक्त लेस को भी आरोपी के शिनाख्त पर घटनास्थल से बरामद कर लिया गया . कुल मिलाकर हत्या का कारण होश संभालते किशोर बालकों का आपसी वाद विवाद सामने आ गया जो यह बताता है कि कभी-कभी छोटी सी बात कैसे गंभीर मसला बन जाती है.

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दानेश्वर सुबह अखबार बांटा करता. वह अपने परिवार में इकलौता पुत्र था. पिता मजदूरी करते हैं. दानेश्वर उसी स्कूल का 10 वीं कक्षा का छात्र था जिस छत पर उसकी हत्या की गई. कोरोना काल में छुट्टी की वजह से अपने पिता की साइकिल पर अखबार वितरण का काम करने लगा था. कोरोना काल में स्कूल की छुट्टियां है. इस कारण स्कूल नशेडिय़ों का अड्डा बन चुका था. नशेड़ी जंगला और छज्जा पकड़कर दूसरे माले पर चढ़ जाते. ऊपर ही नशा, जुआ, शराबखोरी करते हैं. लोगों ने पुलगांव थाने में कई बार शिकायत भी की थी.

पुलिस को उसके साथियों पर शक शुरू से ही था. पुलिस यह कयास लगा रही है कि दानेश्वर भी छत पर चढ़ जाता होगा. साथियों के साथ छत पर गया होगा. जहां उनके बीच किसी बात को लेकर विवाद हुआ. रस्सीनुमा किसी चीज से उसका गला घोंटा गया है. पुलिस ने जब दानेश्वर और उसकी बहन के दोस्तों से पूछताछ की तो अंततः हत्या का खुलासा हो गया.

Serial Story: जीवनधारा भाग 2

लेखिका- मनीषा शर्मा

राजीव ने उस की शादी का सारा खर्च उठाया. वह खुद भी शामिल हुआ. मां ने शिखा को विदा कर के बड़ी राहत महसूस की.

राजीव ने जाने से पहले मुझे बता दिया कि वह अपनी एक सहयोगी लड़की से विवाह करना चाहता है. शादी की तारीख 2 महीने बाद की थी.

उस ने हम दोनों की टिकटें बुक करवा दीं. पर मैं उस की शादी में शामिल होने अमेरिका नहीं गई.

मां अकेली अमेरिका गईं और कुछ सप्ताह बिता कर वापस लौटीं. वह ज्यादा खुश नहीं थीं क्योंकि बहू का व्यवहार उन के प्रति अच्छा नहीं रहा था.

‘‘मां, तुम और मैं एकदूसरे का ध्यान रख कर मजे से जिंदगी गुजारेंगे. तुम बेटे की खुदगर्जी की रातदिन चर्चा कर के अपना और मेरा दिमाग खराब करना बंद कर दो अब,’’  मेरे समझाने पर एक रात मां  मुझ से लिपट कर खूब रोईं पर कमाल की बात यह है कि मेरी आंखों से एक बूंद आंसू नहीं टपका.

अब रुपएपैसे की मेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं रही थी. मैं ने मां व अपनी सुविधा के लिए किस्तों पर कार भी  ले ली. हम दोनों अच्छा खातेपहनते. मेरी शादी न होने के कारण मां अपना दुखदर्द लोगों को यदाकदा अब भी सुना देतीं. मैं सब  को हंसतीमुसकराती नजर आती, पर सिर्फ मैं ही जानती थी कि मेरी जिंदगी कितनी नीरस और उबाऊ हो कर मशीनी अंदाज में आगे खिसक रही थी.

‘संगीता, तू किसी विधुर से…किसी तलाकशुदा आदमी से ही शादी कर ले न. मैं नहीं रहूंगी, तब तेरी जिंदगी अकेले कैसे कटेगी?’ मां ने एक रात आंखों में आंसू भर कर मुझ से पुराना सवाल फिर पूछा था.

‘जिंदगी हर हाल में कट ही जाती है, मां. मैं जब खुश और संतुष्ट हूं तो तुम क्यों मेरी चिंता कर के दुखी होती हो? अब स्वीकार कर लो कि तुम्हारी बड़ी बेटी कुंआरी ही मरेगी,’ मैं ने मुसकराते हुए उन का दुखदर्द हलका करना चाहा था.

‘तेरे पिता की असामयिक मौत ने मुझे विधवा बनाया और तुझे उन की जिम्मेदारी निभाने की यह सजा मिली कि तू बिना शादी किए ही विधवा सी जिंदगी जीने को मजबूर है,’ मां फिर खूब रोईं और मेरी आंखें उस रात भी सूनी रही थीं.

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अपने भाई, छोटी बहन व पुराने प्रेमी की जिंदगियों में क्या घट रहा है, यह सब जानने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. अतीत की बहुत कुछ गलीसड़ी यादें मेरे अंदर दबी जरूर पड़ी थीं, पर उन के कारण मैं कभी दुखी नहीं होती थी.

मेरी समस्या यह थी कि अपना वर्तमान नीरस व अर्थहीन लगता और भविष्य को ले कर मेरे मन में किसी तरह की आशा या उत्साह कतई नहीं बचा था. मैं सचमुच एक मशीन बन कर रह गई थी.

जिंदगी में समय के साथ बदलाव आना तो अनिवार्य ही है. मेरी जिंदगी की गुणवत्ता भी कपूर साहब के कारण बदली.

कपूर साहब आफिस में मेरे सीनियर थे. अपने काम में वह बेहद कुशल व स्वभाव के अच्छे थे. एक शाम बरसात के कारण मुझ से अपनी चार्टर्ड बस छूट गई तो उन्होंने अपनी कार से मुझे घर तक की ‘लिफ्ट’ दी थी.  वह चाय पीने के लिए मेरे आग्रह पर घर के अंदर भी आए. मां से उन्होंने ढेर सारी बातें कीं. हम मांबेटी दोनों के दिलों पर अच्छा प्रभाव छोड़ने के बाद ही उन्होंने उस शाम विदा ली थी.

अगले सप्ताह ऐसा इत्तफाक हुआ कि हम दोनों साथसाथ आफिस की इमारत से बाहर आए. जरा सी नानुकुर के बाद मैं उन के साथ कार में घर लौटने को राजी हो गई.

‘‘कौफी पी कर घर चलेंगे,’’ मुझ से पूछे बिना उन्होंने एक लोकप्रिय रेस्तरां के सामने कार रोक दी थी.

हम ने कौफी के साथसाथ खूब खायापिया भी. एक लंबे समय के बाद मैं खूब खुल कर हंसीबोली भी.

उस रात मैं इस एहसास के साथ सोई कि आज का दिन बहुत अच्छा बीता. मन बहुत खुश था और यह चाह बलवती  थी कि ऐसे अच्छे दिन मेरी जिंदगी में आते रहने चाहिए.

मेरी यह इच्छा पूरी भी हुई. कपूर साहब और मेरी उम्र में काफी अंतर था. इस के बावजूद मेरे लिए वह अच्छे साबित हो रहे थे. सप्ताह में 1-2 बार हम जरूर छोटीमोटी खरीदारी के लिए या खानेपीने को घूमने जाते. वह मेरे घर पर भी आ जाते. मां की उन से अच्छी पटती थी. मैं खुद को उन की कंपनी में काफी सुरक्षित व प्रसन्न पाती. मेरे भीतर जीने का उत्साह फिर पैदा करने में वह पूरी तरह से सफल रहे थे.

फिर एक शाम सबकुछ गड़बड़ हो गया. वह पहली बार मुझे अपने फ्लैट में उस शाम ले कर गए जब उन की पत्नी दोनों बच्चों समेत मायके गई हुई थीं.

उन्हें ताला खोलते देख मैं हैरान तो हुई थी, पर खतरे वाली कोई बात नहीं हुई. उन की नीयत खराब है, इस का एहसास मुझे कभी नहीं हुआ था.

फ्लैट के अंदर उन्होंने मेरे साथ अचानक जोरजबरदस्ती करनी शुरू की, तो मुझे जोर का सदमा लगा.

साथी जब नशे में धुत्त हो तो ड्राइव का जोखिम भूलकर भी ना ले

पिछले साल कोरोना महामारी के चक्कर में दुनिया दूसरे हादसों से इतनी कट गई थी कि सुर्खियों में आई बड़ीबड़ी और दिल दुखाने वाली खबरों को उस ने मानो नजरअंदाज कर दिया था.

नवंबर का महीना था. उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद में ईस्टर्न पैरिफेरल ऐक्सप्रैसवे पर एक रात बहुत बड़ा हादसा हुआ था. हिमाचल प्रदेश से उत्तर प्रदेश के बरेली जा रही तेज रफ्तार डबल डैकर बस कंट्रोल खो कर हाईवे पर पलट गई, जिस में सवार 28 मुसाफिर घायल हो गए.

उस बस में तकरीबन 200 सवारियां थीं और दीवाली पर घर जा रही थीं. बस तेज रफ्तार चल रही थी. मुसाफिरों ने कई बार ड्राइवर को धीरे चलाने के लिए कहा, लेकिन ड्राइवर शराब पी कर गाड़ी चला रहा था. इतने में बस रोड की साइड में टकरा कर पलट गई.

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एक और मामले पर नजर डालते हैं. नवंबर का ही महीना था और साल 2020. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के टाटीबंध चौक के करीब आधी रात को एक तेज रफ्तार कार कंट्रोल खो बैठी और सड़क किनारे लगी लोहे की एक सेफ्टी वाल से टकरा गई. इस हादसे में एक नौजवान की मौके पर मौत हो गई.

पुलिस के मुताबिक कार में बैठे तीनों नौजवानों शुभम पांडेय, वैभव तिवारी और नीतीश यादव ने शराब पी रखी थी. वे रायपुर से भिलाई लौट रहे थे. कार वैभव तिवारी चला रहा था.

टाटीबंध चौक के पास पीछे बैठे नीतीश यादव ने नशे के झोंके में कहा, ‘अब कार मैं चलाऊंगा…’ और यह कह कर वह चलती गाड़ी में ही पीछे की सीट से ड्राइविंग सीट की ओर आगे आने की कोशिश करने लगा. इस से कार बेकाबू हो गई. सेफ्टी वाल का एक टुकड़ा विंड स्क्रीन तोड़ता हुआ कार के अंदर आ गया. इस हादसे में नीतीश यादव की मौके पर ही मौत हो गई.

हमारे देश में शराब पी कर गाड़ी चलाने से होने वाले हादसों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है, इस के बावजूद लोग नहीं मानते हैं. इस तरह के हादसों के शिकार हर उम्र के लोग होते हैं, मतलब यह कि बालिग, पढ़ेलिखे और समझदार लोग भी शराब पी कर गाड़ी चलाते हैं और मौत के खतरनाक सफर पर निकल पड़ते हैं.

ऐसे ही आंकड़ों की बात करें तो पता चलता है कि हर साल 14,000 से ज्यादा सड़क हादसे केवल इसलिए हो जाते हैं कि गाड़ी चलाने वाले ने शराब पी रखी होती है. उत्तर प्रदेश में साल 2017 में 3336, साल 2018 में 3595 और साल 2019 में 4496 हादसे शराब पीने के चलते हुए थे. इसी तरह ओडिशा में साल 2017 में 1533, साल 2018 में 1220 और साल 2019 में 1068 हादसे दर्ज किए गए थे.

यह तो महज 2 राज्यों का ब्योरा है, जबकि देशभर के दूसरे राज्यों में भी शराब के नशे में की गई भिड़ंत खबरों की सुर्खियां बनती रहती हैं. पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी 90 फीसदी सड़क हादसे चालक के नशे में रहने की वजह से होते हैं. दुख और हैरत की बात है कि इन में मरने वाले ज्यादातर लोगों की उम्र 18 से 35 साल तक होती है.

यही वजह है कि ड्रंक एंड ड्राइव यानी शराब पी कर गाड़ी चलाने को ले कर साल 2017 में दिल्ली की जिला और सत्र अदालत के जज गिरीश कठपालिया ने तो अपने एक फैसले में यह तक कह दिया था कि शराब पी कर गाड़ी चलाना एक निर्धारित अपराध नहीं है, लेकिन एक गंभीर समाजिक खतरा है. शराब पी कर गाड़ी चलाने वाला इनसान न केवल अपनी जिंदगी को जोखिम में डालता है, बल्कि सड़क पर चलने वाले दूसरे की जिंदगी से भी खेलता है.

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जज ने आगे कहा कि ऐसे हादसों का शिकार सड़क का इस्तेमाल करने वाले लोग और साथ ही शराब पी कर गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर का परिवार बेकुसूर होता है. सड़कों पर चलने वाले ऐसे चालक किसी ‘आत्मघाती हमलावर’ से कम नहीं हैं.

ऐसी ही किसी अनहोनी को रोकने के मद्देनजर केंद्रीय सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जुलाई, 2019 में ‘मोटर व्हीकल(संशोधन) बिल, 2019’ को लोकसभा में पेश किया था. इस संशोधित मोटर ह्वीकल ऐक्ट में सड़क यातायात उल्लंघन को ले कर नियमों को कड़ा किया गया है. संशोधित बिल में यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि शराब पी कर गाड़ी चलाने पर 10,000 रुपए जुर्माना की सजा होगी.

लेकिन लोग कहां मानते हैं. सब से ज्यादा दिक्कत उन महिलाओं के साथ होती है, जिन के पति या पुरुष साथी अमूमन शराब पी कर गाड़ी चलाते हैं और बगल में बैठने से उन की जान भी सांसत में रहती है. कभीकभार उन्हें ऐसा करना रोमांचक लग सकता, पर उन्हें जज साहब की चेतावनी पर ध्यान देना चाहिए कि शराब पी कर गाड़ी चलाने वाले लोग ‘आत्मघाती हमलावर’ होते हैं.

क्या है इलाज?

यह समस्या उन महिलाओं के सामने ज्यादा पेश आती है, जो खुद ड्राइविंग नहीं जानती हैं और पुरुष साथी के नशे में होने के बावजूद वे उन के साथ बैठने के लिए मजबूर होती हैं. ऐसे हादसों में ड्राइवर की मौत होने या उसे गंभीर चोट आने का खतरा सब से ज्यादा होता है. चूंकि ज्यादातर मामलों में वह पुरुष उस महिला का पति होता है, लिहाजा हादसा होने के बाद सब से बड़ा घाटा महिला का ही होता है.

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अगर वह महिला गाड़ी चला सकती है तो ड्राइविंग कर के ऐसे हादसों को कम कर सकती हैं, पर अगर ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता है तो उसे अपने पुरुष साथी के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए और इन बातों पर अमल करना चाहिए :

  • हो सके तो पुरुष साथी को शराब पी कर गाड़ी चलाने से मना करें.
  • अगर ऐसा मुमकिन नहीं है तो अपनी गाड़ी को छोड़ कर किसी कैब या प्राइवेट टैक्सी से घर जाने में भलाई है.
  • पुरुष साथी को मजे के लिए शराब पीने के लिए बिलकुल न उकसाएं. यह अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा है.
  • अगर आप ने खुद शराब पी हुई है और पुरुष साथी भी नशे में है तो उसे तेज रफ्तार गाड़ी चलाने के लिए कतई न कहें.
  • यह बात याद रखें कि शराब पी कर गाड़ी चलाना खुद को खतरे में तो डालता ही है, सामने वाले की जान भी आफत में डाल देता है, इसलिए अपने पुरुष साथी को कंट्रोल में रखें, क्योंकि ऐसे हादसों में मरने वाले के परिवार वाले ज्यादा और उम्रभर तक भुगतते हैं.

‘हाउस आफ वैक्स’ के स्क्रीनराइटर के साथ Vikram Bhatt बनाएंगे हौरर फिल्म

मशहूर कवि व गीतकार रोजम ने विक्रम भट्ट की हारर और रोमांचक फिल्म ‘ द सेलो’ की कहानी और पटकथा लिखी है, जिसमें उन्हें हौलीवुड की चर्चित फिल्मों “हाउस आफ वैक्स”, ” द रिपिंग” और ” द कांन्ज्यूरिंग”  के पटकथा लेखकों करी हेस और चाड़ हेस का साथ मिला है. हौरर और रोमांचक फिल्म ” द हेलो”  की कहानी काफी अनोखी है.

सऊदी अरब के मशहूर कवि और गीतकार तुर्क अल शेख कि “पेननेम” है रोजम. वह भारतीय संगीत व फिल्मों के बहुत बड़े प्रशंसक हैं. हाल ही में एक पुरस्कार समारोह की उन्होंने मेजबानी की थी ,जिसमें शाहरुख खान को पुरस्कृत किया गया था . इसी समारोह के लिए रोजम ने संगीतकार ए आर रहमान के साथ ट्रैक बनाया था.

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फिल्म ” द सेलो” की चर्चा करते हुए फिल्म निर्देशक विक्रम भट्ट कहते हैं-” सऊदी अरब के मशहूर लेखक तुर्क अल शेख  और मैं इस हारर वह रोमांचक फिल्म की वजह से एकजुट हुए हैं. तुर्क अल शेख  लिखित इस कहानी और पटकथा में कैरी हेस और छाड़ हेस ने अपनी सलाह दी है .तुर्क अल शेख  इस फिल्म का निर्माण भी कर रहे हैं .मैं इसका निर्देशन कर रहा हूं. हम इस फिल्म का अधिकांश हिस्सा सऊदी अरब में फिल्माएंगे. मैं विशेष रूप से अल उला की खास लोकेशन पर जाने को लेकर उत्सुक हूं.”
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फिल्म के सलाहकार और पटकथा लेखक कैरी हेस और चार हेस ने कहा है- ” फिल्म ‘ द कांन्ज्यूरिंग’ की सफलता के बाद हमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्माताओं और रचनात्मक लोगों के साथ काम करने के कई अवसर मिले हैं. पर हम रोज, मैं और विक्रम भट्ट जैसे रचनात्मक और प्रतिभाशाली व्यक्तियों के साथ विश्व स्तर पर काम करने को लेकर उत्साहित हैं. विक्रम भट्ट आत्मा को लेकर बेहतरीन फिल्में बनाने में माहिर है . फिल्म का निर्माण एक सहयोगी प्रक्रिया है और सर्वश्रेष्ठ के साथ काम करना एक सम्मान है. हम फिल्म ‘ द सेलो’ को लेकर उत्साहित हैं.”

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Bigg Boss 14: एजाज खान के इविक्शन की खबर पर फैंस ने कहा, ‘ये सीजन बेहद ही घटिया है’

‘बिग बौस 14’ के मेकर्स इस शो को हिट बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं. शो में लगातार नए-नए ट्विस्ट देखने को मिल रहा है जिससे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा है. तो आइए जानते हैं, शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

बताया जा रहा है कि इस वीकेंड पर एजाज खान घर से बेघर होने वाले हैं. एजाज खान इस हफ्ते घर से बेघर होने के लिए नौमिनेटेड हैं.दरअसल एजाज खान का इविक्शन को वोट के आधार पर नहीं किया जाएगा.

बता दें कि इस शो में आने से पहले एजाज खान ने एक फिल्म के लिए कमिटमेंट किया था, जिसके लिए उन्हें शो को छोड़ना ही होगा.

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इस खबर ने एजाज खान के फैंस का दिल तोड़ दिया है. सोशल मीडिया पर फैंस ने अपना रिएक्शन दिया है, उन्होंने कहा है कि ‘बिग बौस 14’ का ये सीजन बेहद ही घटिया है.  तो वहीं कुछ यूजर्स ने कहा है कि मेकर्स ने पहले से तय कर लिया है कि शो की रुबीना दिलाइक को बनाया जाएगा.

शो के बीते एपिसोड में दिखाया गया कि रुबीना दिलाइक और एजाज खान के बीच जमकर लड़ाई हुई. लड़ाई के दौरान ही एजाज खान ने रुबीना दिलाइक को टच किया तो अभिनव शुक्ला ने खूब हंगामा किया.

शो के अपकमिंग एपिसोड में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस हफ्ते एजाज खान घर से बेघर होते हैं तो घर का माहौल में क्या बदलाव आएगा.

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सोनाली फोगाट ने बताया, स्वर्गीय पति चाहते थे ‘मैं Bigg Boss का हिस्सा बनूं’

‘बिग बौस 14’ की कंटेस्टेंट सोनाली फोगाट इन दिनों सुर्खियों में छायी हुई हैं. वह घर में लड़ाई-झगड़े के कारण काफी चर्चे में है. इस हफ्ते सोनाली फोगाट घर से बेघर होने के लिए नौमिनेट हुई हैं. और इसके लिए उन्होंने राखी सावंत को ‘एहसान फरामोश’ भी कह दिया था. तो घर में वो रुबीना, राहुल और निक्की से भी लड़ाई कर चुकी हैं.

इस शो का एक ‘अनसीन अनदेखा’ वीडियो सामने आया है. इस वीडियो में सोनाली फोगाट बता रही हैं कि उनके पति चाहते थे कि वह बिग बौस का हिस्सा बने.

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उन्होंने आगे बताया कि शुरुआत में उनके पति नहीं चाहते थे कि वह बिग बौस में जाएं या फिर एक्टिंग करें. लेकिन जब मेरे पति ने इस शो के कुछ एपिसोड लगातार देखे तो उन्हें शो अच्छा लगने लगा. तब उन्होंने सोनाली से कहा था कि उन्हें भी बिग बौस में जाना चाहिए.

 

शो के बीते एपिसोड में पति की मौत के बाद झेले गए ‘टार्चर’ को लेकर सोनाली फोगाट ने बात की थी और अब उन्होंने खुलासा किया है कि वह अपने स्वर्गीय पति की विश को पूरा करने के लिए वह इस शो में आई हैं.

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शो में यह भी दिखाया गया था कि पति को याद कर सोनाली भावुक हो गई थीं. सोनाली ने बताया था ‘चार साल पहले जब मेरे पति की मौत हुई तो मैं मुंबई में थी. मैं ऐक्‍ट‍िंग, पौलिटिक्‍स सबकुछ छोड़ना चाहती थी. लेकिन मेरी सासू मां ने मुझे रोका और इस तरह सबकुछ छोड़ने की बजाय, उन्होंने आगे बढ़ने का हिम्मत दिया.

बता दें कि हाल ही में लड़ाई के दौरान सोनाली ने रुबीना को गाली दे दी, जिसके कारण उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया.

Crime Story: प्यार के भंवर में भाग 1

सौजन्य: सत्यकथा

उत्तर प्रदेश के जिला बांदा का एक गांव है-बदौली. रसपाल इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी
चंद्रकली के अलावा एक बेटा भानुप्रताप तथा बेटी सुनीता थी. रसपाल खेतीकिसानी के साथसाथ ट्यूबवैल मरम्मत का काम करता था. इस से उसे अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी.

कुल मिला कर उस का परिवार खुशहाल था. रसपाल ने अपनी बेटी सुनीता का विवाह सन 2016 में हरिओम के साथ कर दिया था. हरिओम के पिता शिवबरन, फतेहपुर जिले के गांव लमेहटा के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी गेंदावती के अलावा 2 बेटे हरिओम व राममिलन थे. हरिओम जेसीबी चालक था, जबकि राममिलन पिता के कृषि कार्य में हाथ बंटाता था.

एक तरह से सुनीता और हरिओम की शादी बेमेल थी. हरिओम उम्र में तो बड़ा था, साथ ही वह सांवले रंग का भी था. जबकि सुनीता सुंदर थी और चंचल भी. इस के बावजूद उस के घरवालों ने हरिओम को पसंद कर लिया था. इस की वजह यह थी कि हरिओम जेसीबी चला कर अच्छा पैसा कमाता था.

हरिओम जहां सुनीता को पा कर खुश था, वहीं सुनीता उम्रदराज और सांवले रंग के पति को पा कर जरा भी खुश नहीं थी. शादी से पहले उस के मन में पति को ले कर जो सपने थे, वे चकनाचूर हो गए थे.
शादी के एक साल बाद सुनीता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम हर्ष रखा. इस के बाद एक बेटी का जन्म हुआ. 2 बच्चों की किलकारियों से सुनीता का घरआंगन गूंजने लगा.

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सुनीता की अपने देवर राममिलन से खूब पटती थी. इस की वजह यह थी कि एक तो वह हमउम्र था, दूसरे सुनीता, राममिलन के बात व्यववहार से काफी प्रभावित थी. वह अपने देवर का हर तरह से खयाल रखती थी.

इसी वजह से राममिलन सुनीता के आकर्षण में बंध कर उस के नजदीक आने की कोशिश करने लगा. यही नहीं, वह उस की खूब तारीफ करता और उसे प्रभावित करने के लिए कभीकभार वह उस के लिए कोई उपहार भी ले आता.

हरिओम ड्राइवर था, सो पक्का शराबी था. अकसर वह झूमता हुआ घर वापस आता. वह कभी थोड़ाबहुत खाना खा कर तो कभी बिना खाए ही सो जाता था. सुनीता 2 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन अभी उस में पति का साथ पाने की प्रबल इच्छा थी. लेकिन हरिओम तो बिस्तर पर लेटते ही खर्राटे भरने लगता था. तब सुनीता मन मसोस कर रह जाती थी.

आखिर पति से जब उसे शारीरिक सुख मिलना बंद हुआ तो उस ने विकल्प की खोज शुरू कर दी.
सुनीता स्वभाव से मिलनसार थी. राममिलन भाभी के प्रति सम्मोहित था. जब दोनों साथ चाय पीने बैठते, तब सुनीता उस से खुल कर हंसीमजाक करती. सुनीता का यह व्यवहार धीरेधीरे राममिलन को ऐसा बांधने लगा कि उस के मन में भाभी सुनीता का सौंदर्य रस पीने की कामना जागने लगी.

एक दिन राममिलन खाना खाने बैठा, तो सुनीता थाली ले कर आई और जानबूझ कर गिराए गए आंचल को ढंकते हुए बोली, ‘‘लो देवरजी, खाना खा लो, आज मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है.’’
राममिलन को भाभी की यह अदा बहुत अच्छी लगी. वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘भाभी, तुम भी अपनी थाली परोस लो, साथ खाने में मजा आएगा.’’

सुनीता अपने लिए भी खाना ले आई. खाना खाते समय दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो राममिलन बोला, ‘‘भाभी, तुम सुंदर व सरल स्वभाव की हो, लेकिन भैया ने तुम्हारी कद्र नहीं की. मुझे पता है, वह अपनी कमजोरी की खीझ तुम पर उतारते हैं. लेकिन मैं तुम्हें प्यार करता हूं.’’

यह कह कर राममिलन ने सुनीता की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सच में सुनीता पति से संतुष्ट नहीं थी. उसे न तो पति से प्यार मिल रहा था और न ही शारीरिक सुख, जिस से उस का मन विद्रोह कर उठा. उस का मन बेईमान हो चुका था. आखिर उस ने फैसला कर लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. चाहे इस के लिए उसे रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े.

औरत जब जानबूझ कर बरबादी की राह पर कदम रखती है, तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही सुनीता के साथ हुआ. सुनीता जवान भी थी और पति से असंतुष्ट भी, अत: उस ने देवर राममिलन के साथ नाजायज रिश्ता बनाने का निश्चय कर लिया.

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राममिलन वैसे भी सुनीता का दीवाना था. देवर राममिलन गबरू जवान था, दूसरे कुंवारा था. उस पर दिल आते ही सुनीता उसे अपने प्यार के भंवर में फंसाने की कोशिश करने लगी. भाभीदेवर के रिश्ते की आड़ में सुनीता राममिलन से ऐसेऐसे मजाक करने लगी कि राममिलन के शरीर में सिहरन सी होने लगी. जल्दी ही उस का मन स्त्री सुख के लिए बेचैन होने लगा.

अगले भाग में पढ़ें- सुनीता और राममिलन के नाजायज रिश्तों का क्या हुआ अंजाम

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