त्रिकोण प्रेम: दीपिका का खूनी खेल- भाग 3

बल्ली शुक्ला के पड़ोस में अवनीश शर्मा रहता था. उस का आनाजाना बल्ली शुक्ला के घर था. घर आतेजाते अवनीश शर्मा ने दीपिका को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया. वर्ष 2016 में अवनीश की दीवानी दीपिका 2 बेटियों को छोड़ कर अवनीश के साथ भाग गई.

अवनीश कल्याणपुर में रहता था और नकली शराब बनाता व बेचता था. दीपिका भी अवनीश के साथ नकली शराब बनाने व बेचने का काम करने लगी. उस ने अनेक शराब तस्करों से अपने संबंध मजबूत कर लिए और उन के मार्फत शिवली, सचेंडी, घाटमपुर तथा कानपुर में नकली शराब बेचने लगी थी.

सन 2017 में नकली व जहरीली शराब पीने से घाटमपुर व सचेंडी में 17 लोगों की मौत हो गई थी. इस मामले में वह अवनीश के साथ पहली बार जेल गई. उस के बाद सन 2019 में कोहना तथा शिवली थाने से भी नकली शराब बनाने व बेचने के जुर्म में जेल गई. कोहना थाने से उसे गैंगस्टर ऐक्ट में जेल भेजा गया था. इस मामले में उसे जून 2020 में जमानत मिली और वह बाहर आ गई.

आशू यादव जब जेल से बाहर आया तो उस ने दीपिका से मुलाकात की. मुलाकातें प्यार में बदलीं, फिर दोनों के बीच नाजायज रिश्ता बन गया. दीपिका उस की कार में बैठ कर घूमने लगी तथा उस के घर भी जाने लगी. आशू उस की आर्थिक मदद भी करने लगा.

इधर आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अमित गुप्ता को सितंबर 2020 में पैरोल मिल गई. अमित पैरोल पर बाहर आ रहा था, तो अवनीश ने उस से कहा कि वह उस की पत्नी दीपिका का खयाल रखे तथा उसे भी जेल से बाहर निकलवाने की कोशिश करे.

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कपड़ों की तरह बदलती रही प्रेमी

अमित ने जेल से बाहर आ कर दीपिका से संपर्क किया. कुछ दिनों में ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. वह दीपिका को ले कर अपने घर मोतीमोहाल पहुंचा. अमित के घरवालों ने दीपिका को घर में रखने की इजाजत नहीं दी. इस पर वह दीपिका को ले कर मसवानपुर में अनिल शुक्ला के मकान में किराए पर रहने लगा. दिखावे के लिए उस ने बाजार में कपड़े की दुकान खोल ली.

दीपिका के साथ रहते अमित को पता चला कि दीपिका के उस के दोस्त आशू यादव से पहले से ही नाजायज संबंध हैं. यह बात अमित को नागवार लगी और उस ने आशू को मिटाने की ठान ली. उस ने दीपिका से साथ देने को कहा तो वह आनाकानी करने लगी. इस पर अमित ने दीपिका को धमकी दी कि वह साथ नहीं देगी तो वह आशू और उस के नाजायज रिश्तों की बात उस के पति अवनीश को बता देगा.

इस धमकी से दीपिका डर गई और वह अमित का साथ देने को राजी हो गई. इस के बाद अमित ने दीपिका के साथ मिल कर आशू के कत्ल की योजना बनाई और अपनी योजना में दोस्त किशन वर्मा व सचिन वर्मा को भी पैसों का लालच दे कर शामिल कर लिया.

योेजना के तहत 31 दिसंबर की रात डेढ़ बजे दीपिका ने आशू के मोबाइल फोन पर काल की और जन्मदिन की बधाई दी फिर घर आने तथा मौजमस्ती करने का आमंत्रण दिया. उस के बाद आशू सजसंवर कर अपनी कार से दीपिका के घर मसवानपुर पहुंच गया. जन्मदिन की खुशी में दीपिका ने उसे खूब शराब पिलाई.

आशू जब नशे में धुत हो गया तभी अमित अपने साथियों किशन व सचिन के साथ घर आ गया. दोनों ने आशू को दबोच लिया और खूब पिटाई की. फिर अमित व दीपिका ने मिल कर आशू का रस्सी से गला घोंट दिया.

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इस बीच दीपिका ने आशू के 3 मोबाइल फोन कब्जे में ले कर स्विच्ड औफ कर दिए तथा आशू के गले से सोने की चेन तथा दोनों हाथों से सोने की 6 अंगूठियां उतार लीं. इस के बाद सब ने मिल कर आशू के शव को उस की कार में रखा और कार बर्रा थाना क्षेत्र के धर्मेंद्र नगर कच्ची बस्ती ला कर नहर पटरी पर खड़ी कर दी. उस के बाद वे सब फरार हो गए.

थाना रेलबाजार पुलिस ने अभियुक्त किशन वर्मा व सचिन वर्मा से पूछताछ के बाद उन्हें 4 जनवरी, 2021 को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मुख्य आरोपी अमित गुप्ता तथा दीपिका शुक्ला फरार थीं. पुलिस सरगरमी से उन की तलाश में जुटी थी. द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Valentine’s Special- कोई अपना: शालिनी के जीवन में बहार आने को थी

Valentine’s Special- कोई अपना: भाग 3

उन के जाने के बाद मेरा क्रोध पति पर उतरा, ‘‘आप ही बांध लेना इसे, मुझे नहीं पहनना इसे.’’ ‘‘अरे बाबा, 2-3 सौ रुपए की साड़ी होगी, किसी बहाने कीमत चुका देंगे. तुम तो बिना वजह अड़ ही जाती हो. इतने प्यार से कोई कुछ दे तो दिल नहीं तोड़ना चाहिए.’’

‘‘यह प्यारव्यार सब दिखावा है. आप से कर्ज लिया है न उन्होंने, उसी का बदला उतार रहे होंगे.’’ ‘‘50 हजार रुपए में न बिकने वाला क्या 2-3 सौ रुपए की साड़ी में बिक जाएगा? पगली, मैं ने दुनिया देखी है, प्यार की खुशबू की मुझे पहचान है.’’

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मैं निरुत्तर हो गई. परंतु मन में दबा अविश्वास मुझे इस भाव में उबार नहीं पाया कि वास्तव में कोई बिना मतलब भी हम से मिल सकता है. वह साड़ी अटैची में कहीं नीचे रख दी, ताकि न वह मुझे दिखाई दे और न ही मेरा जी जले. समय बीतता रहा और इसी बीच ढेर सारे कड़वे सत्य मेरे स्वभाव पर हावी होते रहे. बेरुखी और सभी को अविश्वास से देखना कभी मेरी प्रकृति में शामिल नहीं था. मगर मेरे आसपास जो घट रहा था, उस से एक तल्खी सी हर समय मेरी जबान पर रहने लगी. मेरे भीतर और बाहर शीतयुद्ध सा चलता रहता. भीतर का संवेदनशील मन बाहर के संवेदनहीन थपेड़ों से सदा ही हार जाता. धीरेधीरे मैं बीमार सी भी रहने लगी, वैसे कोई रोग नहीं था, मगर कुछ तो था, जो दीमक की तरह चेतना को कचोट और चाट रहा था.

एक सुबह जब मेरी आंख अस्पताल में खुली तो हैरान रह गई. घबराए से पति पास बैठे थे. मैं हड़बड़ा कर उठने लगी, मगर शरीर ने साथ ही नहीं दिया.

‘‘शालिनी,’’ पति ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया, ‘‘अब कैसी हो?’’ मुझे ग्लूकोज चढ़ाया जा रहा था. पति की बढ़ी दाढ़ी बता रही थी कि उन्होंने 2-3 दिनों से हजामत नहीं बनाई.

‘‘शालिनी, तुम्हें क्या हो गया था?’’ पति ने हौले से पूछा. मैं खुद हैरान थी कि मुझे क्या हो गया है? बाद में पता चला कि 2 दिन पहले सुबह उठी थी, लेकिन उष्ण रक्तचाप से चकरा कर गिर पड़ी थी.

‘‘बच्चों को तो नहीं बुला लिया?’’ मैं ने पति से पूछा. ‘‘नहीं, उन के इम्तिहान हैं न.’’

‘‘अच्छा किया.’’ ‘‘सुनीलजी, अब आप घर जा कर नहाधो लीजिए, हम भाभीजी के पास बैठेंगे. आप चिंता मत कीजिए, अब खतरे की कोई बात…’’ किसी का स्वर कानों में पड़ा तो मेरी आंखें खुलीं.

‘‘अरे, भाभीजी को होश आ गया,’’ स्वर में एक उल्लास भर आया था, ‘‘भाईसाहब, मैं अभी उर्मि को फोन कर के आता हूं.’’ वह युवक बाहर निकल गया, पर मैं उसे पहचान न सकी.

‘‘तुम ने तो मुझे डरा ही दिया था. ऐसा लग रहा था, इतने बड़े संसार में अकेला हो गया हूं. बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं, उन्हें बुला नहीं सकता था और इस अजनबी शहर में ऐसा कौन था जिस पर भरोसा करता,’’ पति ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा. मेरी आंखों के कोर भीग गए थे. ऐसा लगा मेरा अहं किसी कोने से जरा सा संतुष्ट हो गया है. सोचती थी, पति की जिंदगी में मेरी जरूरत ही नहीं रही. जब उन्हें रोते देखा तो लगा, मेरा अस्तित्व इतना भी महत्त्वहीन नहीं है.

मैं 2 दिन और अस्पताल में रही. इस बीच वह युवक लगातार मेरे पति की सहायता को आता रहा.

जब अस्पताल से लौटी तो कल्पना के विपरीत मेरा घर साफसुथरा था. शरीर में कमजोरी थी, मगर मन स्वस्थ था, जिस का सहारा ले कर मैं ने पति से ठिठोली की, ‘‘मुझे नहीं पता था, तुम घर की देखभाल भी कर सकते हो.’’ ‘‘यह सब उर्मि ने किया है. सचमुच अगर वे लोग सहारा न देते तो पता नहीं क्या होता.’’

‘‘उर्मि कौन?’’ ‘‘वही पतिपत्नी जो तुम्हें एक बार साड़ी उपहार में दे गए थे…’’

‘‘क्या?’’ मैं अवाक रह गई. ‘‘पता नहीं, किस ने उन्हें बताया कि तुम अस्पताल में हो. दोनों सीधे वहीं पहुंच गए. तुम्हें खून चढ़ाने की नौबत आ गई थी, उर्मि ने ही अपना खून दिया. मैं उस का ऋण जीवन में कभी नहीं चुका सकता.

‘‘वही हमारे घर को भी संभाले रही. आज सुबह ही अपने घर वापस गई है. शायद, दोपहर को फिर आएगी.’’ ‘‘और उस का बुटीक?’’

‘‘वह तो कब का बंद हो चुका है. उस के ससुर उन दोनों को अपने घर ले गए हैं. बैंक का कर्ज तो उन्होंने कब का वापस दे दिया. वे तो बस प्यार के मारे हमारा हालचाल पूछने आए थे. और हमें हमेशा के लिए अपना ऋणी बना गए.’’ अनायास मैं रो पड़ी और सोचने लगी कि मेरे पति ठीक ही कहते थे कि हमें तो बस अपना काम ईमानदारी से करना है. अच्छे लोग मिलें या बुरे, ईमानदार हों या बेईमान, बस, उन का हमारे चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. कुछ लोग हमें खरीदना चाहते हैं तो कुछ आदर दे कर मांबाप का दरजा भी तो देते हैं. इस संसार में हर तरह के लोग हैं, फिर हम उन की वजह से अपना स्वभाव क्यों बिगाड़ें, क्यों अपना मन भारी करें?

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‘‘तुम्हारे कपड़े निकाल देता हूं, नहाओगी न?’’ पति के प्रश्न ने चौंका दिया. मैं वास्तव में नहाधो कर तरोताजा होना चाहती थी. मैं ने अटैची से वही गुलाबी साड़ी निकाली, जिसे पहले खोल कर भी नहीं देखा था.

दोपहर को उर्मि हमारा दोपहर का भोजन ले कर आई. मैं समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उस का स्वागत करूं. ‘‘अरे, आप कितनी सुंदर लग रही हैं,’’ उस ने समीप आ कर कहा. फिर थोड़ा रुक गई, संभवतया मेरा रूखा व्यवहार उसे याद आ गया होगा.

मैं समझ नहीं पाई कि क्यों रो पड़ी. उस प्यारी सी युवती को मैं ने बांह से पकड़ कर पास खींचा और गले से लगा लिया.

‘‘आप को दीदी कह सकती हूं न?’’ उस ने हौले से पूछा. ‘‘अवश्य, अब तो खून का रिश्ता भी है न,’’ मेरे मन से एक भारी बोझ उतर गया था. ऐसा लगा, वास्तव में कोई अपना मिल गया है. सस्नेह मैं ने उस का माथा चूम लिया.

फिर उस ने मुझे और मेरे पति को खाना परोसा. ‘‘तुम्हारी ससुराल वाले कैसे हैं?’’ मैं ने धीरे से पूछा तो वह उदास सी हो गई.

‘‘संसार में सब को सबकुछ तो नहीं मिल जाता न, दीदी. सासससुर तो बहुत अच्छे हैं, परंतु मेरे मांबाप आज तक नाराज हैं. मैं तरस जाती हूं किसी ऐसे घर के लिए जिसे अपना मायका कह सकूं.’’ ‘‘मैं…मैं हूं न, इसी घर को अपना मायका मान लो, मुझे बहुत प्रसन्नता होगी.’’

सहसा उर्मि मेरी गोद में सिर रख कर रो पड़ी. मेरे पति पास खड़े मुसकरा रहे थे. उस के बाद उर्मि हमारी अपनी हो गई. उस घटना को 8 साल बीत गए हैं. हमारा स्थानांतरण 2 जगह और हुआ. फिर से अच्छेबुरे लोगों से पाला पड़ा, परंतु मेरा मन किसी से बंधा नहीं. उर्मि आज भी मेरी है, मेरी अपनी है. मैं अकसर यह सोच कर स्नेह और प्रसन्नता से सराबोर हो जाती हूं कि निकट संबंधियों के अलावा इस संसार में मेरा कोई अपना भी है.

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Valentine’s Special- कोई अपना सा: भाग 2

इसी कारण मैं ने उस युवती को टाल दिया. फिर शीतल पेय उन के सामने रख, पंखा तेज कर दिया क्योंकि गरमी बहुत ज्यादा थी. वे दोनों बारबार पसीना पोंछ रहे थे.

चंद क्षणों के बाद उस युवक ने पूछा, ‘‘सुनीलजी कितने बजे तक आ जाते हैं?’’ ‘‘कोई निश्चित समय नहीं है. वैसे अच्छा होगा, आप उन से कार्यालय में ही मिलें. ऐसा है कि वे घर पर किसी से मिलना पसंद नहीं करते.’’

‘‘जी, औफिस में उन के पास समय ही कहां होता है.’’ ‘‘इस विषय में मैं आप की कोई भी मदद नहीं कर सकती. बेहतर होगा, आप उन से वहीं मिलें,’’ ढकेछिपे शब्दों में ही सही, मैं ने उन्हें फिर वह कहानी दोहराने से रोक दिया जिस की टीस अकसर मेरे मन में उठती रहती थी.

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वे दोनों अपना सा मुंह ले कर चले गए. उन के इस तरह उदास हो कर जाने पर मुझे दुख हुआ, परंतु क्या करती? शाम को पति को सब सुनाया तो वे हंस पड़े, ‘‘ऐसा कहने की क्या जरूरत थी, उन की नईनई शादी हुई है. प्रेमविवाह किया है. दोनों के घर वालों ने कुछ नहीं दिया. सो, कर्ज ले कर कोई काम शुरू करना चाहता है. घर चला आया तो हमारा क्या ले गया. तुम प्यार से बात कर लेतीं, तो कौन सा नुकसान हो जाता?’’

‘‘लेकिन काम हो जाने के बाद तो ये मजे से अपना पल्ला झटक लेंगे.’’ ‘‘झटक लें, हमारा क्या ले जाएंगे. देखो शालिनी, हम समाज से कट कर तो नहीं रह सकते. मैं बैंक अधिकारी हूं, मुझ से तो वही लोग मिलेंगे, जिन्हें मुझ से काम होगा. अब क्या हम किसी के साथ हंसेंबोलें भी नहीं? कोई आता है या बुलाता है तो इस में कोई खराबी नहीं है. बस, एक सीमारेखा खींचनी चाहिए कि इस के पार नहीं जाना. भावनात्मक नाता बनाने की कोई जरूरत नहीं है. यों मिलो, जैसे हजारों जानने वाले मिलते हैं. इतनी मीठी भी न बनो कि कोई चट कर जाए और इतनी कड़वी भी नहीं कि कोई थूक दे.’’

मेरे पति ने व्यावहारिकता का पाठ पढ़ा दिया, जो मेरी समझ में तो आ गया, मगर भावुकता से भरा मन उसे सहज स्वीकार कर पाया अथवा नहीं, समझ नहीं पाई.

एक शाम एक दंपती हमारे यहां आए. बातचीत के दौरान पत्नी ने कहा, ‘‘अब आप कार क्यों नहीं ले लेते.’’ ‘‘कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई. जब लगेगा कार होनी चाहिए तब ले लेंगे,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘फिर भी भाभीजी, भाईसाहब बैंक में उच्चाधिकारी हैं, स्कूटर पर आनाजाना अच्छा नहीं लगता.’’ ‘‘क्यों, हमें तो बुरा नहीं लगता. कृपया आप विषय बदल लीजिए. हमारी जिंदगी में दखल न ही दें तो अच्छा है.’’

बच्चे बाहर पढ़ रहे थे, जिस वजह से कमरतोड़ खर्चा बड़ी मुश्किल से हम सह रहे थे. ईमानदार इंसान इन सारे खर्चों के बीच भला कहां कार और अन्य सुविधाओं के विषय में सोच सकता है. उस पर तुर्रा यह कि कोई आ कर यह जता जाए कि अब हमें स्कूटर शोभा नहीं देता, तो भला कैसे सुहा सकता है. एक बार तो कमाल ही हो गया. हमें किसी के जन्मदिन की पार्टी में जाना पड़ा. मेजबान ने मुझे घर की मालकिन से मिलाया, ‘‘आप सुनीलजी की पत्नी हैं और ये हैं मेरी पत्नी सुलेखा.’’ कीमती जेवरों से लदी आधुनिका मुझे देख ज्यादा प्रसन्न नहीं हुईं. फीकी सी मुसकान से मेरा स्वागत कर अन्य मेहमानों में व्यस्त हो गईं. पति को तो 2-3 लोगों ने बैंक की बातों में उलझा लिया, लेकिन मैं अकेली रह गई. चुपचाप एक तरफ बैठी रही. अचानक हाथ में गिलास थामे एक आदमी ने कहा, ‘‘आप सुनीलजी की पत्नी हैं?’’

‘‘जी हां,’’ मैं ने उत्तर दिया. ‘‘भाभीजी, आप से एक बात करनी थी…जरा सुनीलजी को समझाइए न, पूरे 50 हजार रुपए देने को तैयार हूं. आप कहिए न, मेरा काम हो जाएगा. अरे, ईमानदारी से रोटी ही चलती है, बस? आखिर वे कितना कमा लेते होंगे, यही 14-15 हजार…कितनी बार कहा है, हम से हाथ मिला लें…’’

मैं उस धूर्त व्यापारी को जवाब दिए बगैर ही वहां से उठ खड़ी हुई थी. मेरे पति पूरी बात सुन कर हैरान रह गए. मैं ने तनिक गुस्से से कहा, ‘‘आज के बाद ऐसी पार्टियों में मत ले जाना. मेरा वहां दम घुटता है.’’ ‘‘कोई बात नहीं, शालिनी, तुम एक कान से सुनो, दूसरे से निकाल दो. आजकल हर तीसरा इंसान बिकाऊ है. शायद वह सोचता होगा, तुम से बात कर के उस का काम आसान हो जाएगा.’’

मैं रो पड़ी थी. फिर कितने दिन सामान्य नहीं हो पाई थी. इसी बीच फिर खाने का दावतनामा मिला तो मैं ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘उन लोगों ने हम दोनों को खासतौर पर बुलाया है. छोटा सा काम शुरू किया है, उसी खुशी में.’’ ‘‘मुझे किसी के काम से क्या लेनादेना है, आप ही चले जाइए.’’

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‘‘ऐसा नहीं सोचते, शालिनी, वे हमारा इतना मान करते हैं, सभी एकजैसे नहीं होते.’’

पति ने बहुत जिद की थी, मगर मैं टस से मस न हुई. वे अकेले ही चले गए. जब पति 2 घंटे बाद लौटे तो कोई साथ था.

‘‘नमस्ते, भाभीजी,’’ एक नारी स्वर कानों में पड़ा, सामने एक युवा जोड़ा खड़ा था. ऐसा लगा, इस से पहले कहीं इन से मिल चुकी हूं. ‘‘आप हमारे घर नहीं आईं, इसलिए सोचा, हम ही आप से मिल आएं,’’ महिला ने कहा.

‘‘बैठिए,’’ मैं ने सोफे की तरफ इशारा किया. उस के हाथ में रंगदार कागज में कुछ लिपटा था, जिसे बढ़ कर मेरे हाथ में देने लगी. मुझे लगा, बिच्छू है उस में, जो मुझे डस ही जाएगा. मैं ने जरा तीखी आवाज में कहा, ‘‘नहींनहीं, यह सब हमारे यहां…’’

‘‘यह मेरे बुटीक की पहली पोशाक है. हमारे मांबाप ने तो हमें दुत्कार ही दिया था. लेकिन सुनील भाईसाहब की कृपा से हमें कर्ज मिला और छोटा सा काम खोला. हमें आप लोगों का बहुत सहारा है, आप ही अब हमारे मांबाप हैं. कृपया मेरी यह भेंट स्वीकार करें,’’ कहतेकहते वह रो पड़ी. मैं भौचक्की सी रह गई कि पत्थरों के इस शहर में कोई रो भी रहा है. वह कड़वाहट जिसे मैं पिछले कई सालों से ढो रही थी, क्षणभर में ही न जाने कहां लुप्त हो गई.

‘‘भाभीजी, आप इसे स्वीकार कर लें, वरना इस का दिल टूट जाएगा,’’ इस बार उस के पति ने बात संभाली. मैं ने उस के हाथ से पैकेट ले कर खोला, उस में गुलाबी रंग की कढ़ाई की हुई सफेद साड़ी थी.

‘‘आप घर नहीं आईं, इसलिए हम स्वयं ही देने चले आए. आप इसे पहनेंगी न?’’ ‘‘हांहां, जरूर पहनूंगी, मगर इस की कीमत कितनी है?’’

‘‘वह तो हम ने लगाई ही नहीं, आप पहन लेंगी तो कीमत अपनेआप मिल जाएगी.’’ ‘‘नहींनहीं, भला ऐसा कैसे होगा,’’ फिर मेरा स्वर कड़वा होने लगा था. मैं कुछ और भी कहती, इस से पहले मेरे पति ने ही वह साड़ी ले कर मेज पर रख दी, ‘‘हमें यह साड़ी पसंद है, शालिनी इसे अवश्य पहनेगी. और गुलाबी रंग तो इसे बहुत प्रिय है.’’

Valentine’s Special- कोई अपना: भाग 1

स्थानांतरण के बाद जब हम नई जगह आए तो पिछली भूलीभटकी कई बातें अकसर याद आतीं. कुछ दिन तो नए घर में व्यवस्थित होने में ही लग गए और कुछ दिन पड़ोसियों से जान-पहचान करने में. धीरेधीरे कई नए चेहरे सामने चले आए, जिन से हमें एक नया संबंध स्थापित करना था. मेरे पति बैंक में प्रबंधक हैं, जिस वजह से उन का पाला अधिकतर व्यापारियों से ही पड़ता. अभी महीना भर ही हुआ था कि एक शाम हमारे घर में एक युवा दंपती आए और इतने स्नेह से मिले, मानो बहुत पुरानी जानपहचान हो. ‘‘नई जगह पर दिल लग गया न, भाभीजी? हम ने तो कई बार सुनीलजी से कहा कि आप को ले कर हमारे घर आएं. आप आइए न कभी, हमारे साथ भी थोड़ा सा समय गुजारिए.’’ युवती की आवाज में बेहद मिठास थी, जो कि मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही थी. इतने प्यार से ‘भाभीभाभी’ की रट तो कभी मेरे देवर ने भी नहीं लगाई थी.

मेरे पति अभी बैंक से आए नहीं थे, सो मुझे ही औपचारिकता निभानी पड़ रही थी. नई जगह थी, सो, सतर्कता भी आवश्यक थी. शायद? उन्होंने मेरे चेहरे की असमंजसता पढ़ ली थी. युवक बोला, ‘‘मुझे सुनीलजी से कुछ विचारविमर्श करना था. बैंक में तो समय नहीं होता न उन के पास, इसलिए सोचा, घर पर ही क्यों न मिल लें. इसी बहाने आप के दर्शन भी हो जाएंगे.’’

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‘‘ओह,’’ उन का आशय समझते ही मेरे चेहरे पर अनायास ही एक बनावटी मुसकान चली आई. शीतल पेय लेने जब मैं भीतर जाने लगी तो वह युवती भी साथ ही चली आई, ‘‘मैं आप की मदद करूं?’’

मेरे चेहरे पर खीझ उभर आई कि अपना काम हो तो लोग किस सीमा तक झुक जाते हैं.

लगभग 4 साल पहले जब नएनए लुधियाना गए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था. मधु कैसे घुसी चली आई थी हमारी जिंदगी में. दोनों पतिपत्नी कितने प्यार से मिले थे. मधु के पति केशव ने कहा था, ‘भाभीजी, आप आइए न हमारे घर. मधु आप से मिल कर बहुत खुश होगी.’ ‘जी, जरूर आएंगे,’ मैं कितनी खुश हुई थी, कोई अपना सा लगने वाला जो मिला था. परिवार सहित पहले वे लोग हमारे घर आए और उस के बाद हम उन के घर गए. मधु मुझ से जल्दी ही घुलमिल गई थी जैसे पुरानी दोस्ती हो.

‘ये साहब आप को कैसे जानते हैं?’ मैं ने पति से पूछा. ‘हमारे बैंक की ही एक पार्टी है. अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए बेचारा दौड़धूप कर रहा है. बड़ी फैक्टरी खोलने का विचार है,’ पति ने लापरवाही से टाल दिया था, मानो उन्हें मेरा प्रश्न बेतुका सा लगा हो.

एक दिन मधु ऊन लाई और जिद करने लगी कि मैं उस के बेटे का स्वेटर बुन दूं. काफी मेहनत के बाद मैं ने रंगबिरंगा स्वेटर बुना था. उसे देख कर मधु बहुत खुश हुई थी, ‘भाभी, बहुत सफाई है आप के हाथ में. अब एक स्वेटर अपने देवर का भी बुन देना. ये कह रहे थे, इतना अच्छा स्वेटर तो उन्होंने आज तक नहीं देखा.’

‘मुझे समय नहीं मिलेगा,’ मैं ने टालना चाहा तो वह झट बोल पड़ी, ‘अपना भाई कहेगा तो क्या उसे भी इसी तरह इनकार कर देंगी?’ मधु के स्वर का अपनापन मुझे भीतर तक पुलकित कर गया था.

वह आगे बोली, ‘माना कि हम में खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी आप को अपनों से कम तो नहीं जाना. मुझे ऊन से एलर्जी है, तभी तो आप से कह रही हूं.’ आखिर मुझे उस की बात माननी पड़ी. लेकिन मेरे पति ने मुझे डांट दिया था, ‘यह क्या समाजसेवा का काम शुरू कर दिया है? उसे ऊन से एलर्जी है तो पैसे दे कर कहीं से भी बनवा लें. तुम अपनी जान क्यों जला रही हो?’

‘वे लोग हम से कितना प्यार करते हैं, और कुछ बना दिया तो क्या हुआ.’ मेरे पति खीझ कर चुप रह गए थे.

हमारा आनाजाना लगा रहता और हर बार वे लोग ढेर सारा प्यार जताते. धीरेधीरे उन का आना कम होने लगा. 2 महीनों की छुट्टियों में हम अपने घर गए थे. जब वापस आए, तब भी वे हम से मिलने नहीं आए.

एक दिन मैं ने पति से कहा, ‘मधु नहीं आई हम से मिलने, वे लोग कहीं बाहर गए हुए हैं?’ ‘पता नहीं,’ पति ने लापरवाही से उत्तर दिया.

‘क्या, केशव भाईसाहब आप से नहीं मिले?’ ‘कल उस का भाई बैंक में आया था.’

‘तो आप ने उन का हालचाल नहीं पूछा क्या?’ ‘नहीं. इतना समय नहीं होता, जो हर आनेजाने वाले के परिवार का हालचाल पूछता रहूं.’

‘कैसी रूखी बातें कर रहे हैं.’ किसी तरह पति मुझे टाल कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए और मैं यही सोचने लगी कि आखिर मधु आई क्यों नहीं?

15-20 दिनों बाद बच्चों के स्कूल में ‘पेरैंट्स मीटिंग’ थी. मधु का घर रास्ते में ही पड़ता था. अत: सो, वापसी पर मैं उस के घर चली गई. ‘ओह, आप,’ मधु का स्वर ठंडा सा था, मानो उसे मुझ से मिलना अच्छा न लगा हो. जब भीतर आई तो उस की सखियों से मुलाकात हुई. उस ने उन से मेरा परिचय कराया, ‘इन से मिलो, ये हैं मेरी रेखा और निशी भाभी, और आप हैं शालिनी भाभी.’

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थोड़ी देर बाद 15-20 वर्ष का लड़का मेरे सामने शीतल पेय रख गया. सोफे पर 4-5 सूट बिछाए, वह अपनी सखियों में ही व्यस्त रही. वे तीनों महंगे सूटों और गहनों के बारे में ही बातचीत करती रहीं. मैं एक तरफ अवांछित सी बैठी, चुपचाप अपनी अवहेलना और उन की गपशप सुनती व महसूस करती रही. शीतल पेय के घूंट गले में अटक रहे थे. कितने स्नेह से मैं उस से मिलने गई थी बेगाना सा व्यवहार, आखिर क्यों?

‘अच्छा, मैं चलूं,’ मैं उठ खड़ी हुई तो वहीं बैठेबैठे उस ने हाथ हिला दिया, ‘माफ करना शालिनी भाभी, मैं नीचे तक नहीं आ पाऊंगी.’ ‘कोई बात नहीं,’ कहती हुई मैं चली आई थी.

मैं मधु के व्यवहार पर हैरान रह गई थी कि कहां इतना अपनापन और कहां इतनी दूरी.

दिनभर बेहद उदास रही. रात को पति से बात की तो उन्होंने बताया, ‘उन्हें बैंक से 2 करोड़ रुपए का कर्ज मिल गया है. नई फैक्टरी का काम जोरों से चल रहा है. भई, मैं तो पहले ही जानता था, उन्हें अपना काम कराना था, इसलिए चापलूसी करते आगेपीछे घूम रहे थे. लेकिन तुम तो उन से भावनात्मक रिश्ता बांध बैठीं.’ ‘लेकिन,’ अनायास मैं रो पड़ी, क्योंकि छली जो गई थी, किसी ने मेरे स्नेह को छला था.

‘कई लोग अधिकारी के घर तक में घुस जाते हैं, जबकि काम तो अपनी गति से अपने समय पर ही होता है. कुछ लोग सोचते हैं, अधिकारी से अच्छे संबंध हों तो काम जल्दी होता है और केशव उन्हीं लोगों में से एक है,’ पति ने निष्कर्ष निकाला था. उस के बाद वे लोग हम से कभी नहीं मिले. मधु का वह दोगला व्यवहार मन में कांटे की तरह चुभता है. कोई ज्यादा झुक कर ‘भाभीजी, भाभीजी’ कहता है तो स्वार्थ की बू आने लगती है.

आजाद भारत के इतिहास में पहली बार होगी किसी महिला को फांसी

जी हां हमारे भारत देश को जब से आजादी मिली तब से पहली बार ऐसा होगा कि किसी महिला को फांसी होगी और क्यों होगी ये सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे जब आपको उस महिला की करतूतों का पता चलेगा. प्यार अंधा होता है ये तो सुना था लेकिन किस कदर अंधा होता है इसकी हद इस महिला ने दिखाई और हद भी ऐसी कि आपकी रूह कांप जाएगी.

दरअसल शबनम नाम की इस औरत ने अप्रैल 2008 में अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने सात परिजनों की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी थी और इतनी बेरहमी से हत्या करने के बाद भी इस महिला को कोई शर्म या कोई अफसोस नहीं हुआ.अमरोहा की इस बेरहम शबनम के परिवार में पिता शौकत अली पेशे से शिक्षक थें, मां का नाम हाशमी, भाई का नाम अनीस, राशिद, भाभी अंजुम और दस महीने का भतीजा अर्श था.

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शबनम और उसके गांव के ही एक युवक सलीम के बीच प्रेम संबंध था जो उसके पिता को पसंद नहीं था. दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन शबनम सैफी और सलीम पठान बिरादरी से था. दूसरी बिरादरी से होने के कारण शबनम के परिवार ने शादी से साफ इनकार कर दिया था लेकिन ये इनकार शबनम और उसके परिवार को इस कदर खला कि बिना कुछ सोचे-समझे इन दोनों ने मिलकर अपने ही परिवार की हत्या कर दी. दोनों ने एक ऐसा फैसला लिया जो दिल दहलाने वाला था.

14 अप्रैल 2008 की रात को शबनम ने अपने प्रेमी सलीम को घर बुलाया और पूरे परिवार को नींद की गोलियां खिलाकर सुला दिया. रात में शबनम और सलीम ने मिलकर नशे की हालत में सो रहे अपने परिवार की कुल्हाड़ी से गला रेत कर एक-एक को मौत के घाट उतार दिया. यहां तक कि अपने 10 के माह के भतीजे पर भी तरस नहीं खाई. एक ऐसा जुर्म जो शायद ही कोई करने का सोचे. अपने परिवार को मौत के घाट उतारना भला किस कदर शबनम ने ये सब किया ये कोई सोच भी नहीं सकता.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी अब अपनी मोहर लगा दी है यहां तक की राष्ट्रपति ने भी उसकी दया याचिका खारिज कर दी है और आखिर ऐसा हो भी क्यों न इस महिला ने गुनाह ही ऐसा किया है. जेल में भले ही महिला अपने दिन काट रही थी लेकिन देखा जाए तो सही मायने में अब जाकर उसको सजा मिलेगी.

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भारत के इतिहास में आजादी के बाद शबनम पहली महिला कैदी है जिसे फांसी पर लटकाया जाएगा और अब ये भी एक इतिहास ही बनेगा ताकि आगे से कोई भी औरत ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे. उत्तर प्रदेश के इकलौते महिला फांसीघर में मथुरा के अमरोहा की शबनम को फांसी पर लटकाया जाएगा. कुछ खबरों के मुताबिक मेरठ के पवन जल्लाद दो बार फांसीघर का दौरा कर चुके हैं और इस फांसी को अंजाम देंगे.

मथुरा के जेल में 150 साल पहले महिला फांसीघर बनाया गया था. लेकिन आजादी के बाद से अब तक किसी भी महिला को फांसी की सजा दी ही नहीं गई इसलिए ये फांसी आजाद भारत की पहली फांसी होगी. खबरों के मुताबिक वरिष्ठ जेल अधीक्षक शैलेंद्र कुमार मैत्रेय ने बताया कि अभी फांसी की तारीख तय नहीं है, लेकिन हमने तैयारी शुरू कर दी है. डेथ वारंट जारी होते ही शबनम को फांसी दे दी जाएगी.
और इस तरह यूपी के अमरोहा की रहने वाली शबनम आजादी के बाद देश की पहली महिला अपराधी होगी जिसे फांसी होने वाली है.

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शबनम और उसका प्रेमी सलीम एक साथ फांसी पर लटकाए जाएंगे. इसके लिए मथुरा की जेल में तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. सर्वोच्च न्यायालय से पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अब हत्या के आरोप में बंद शबनम की फांसी की सजा को राष्ट्रपति ने भी बरकरार रखा है. तो फांसी तो तय है.

क्या काजल राघवानी को बदनाम कर रहे हैं खेसारी लाल यादव, जानें क्या है पूरा ममला

बौलीवुड की ही तरह भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में भी कलाकारों की ऑन स्क्रीन जोड़ियों का काफी चलन है. भोजपुरी के दर्शक भी अपने पसंदीदा जोड़ियों को एक साथ देखने के लिए लालायित रहते हैं. ऐसी ही एक जोड़ी है सुपर स्टार खेसारीलाल यादव और काजल राघवानी की, जो दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय है. इनके फैंस दोनों को साथ देखना खूब पसंद करते हैं. मगर अब चर्चाएं गर्म है कि काजल राघवानी और खेसारी यादव के बीच कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है.

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इस चर्चा में घी डालने का काम काजल राघवानी का अपना एक बयान है, जिसमें उन्होंने साफ साफ कह दिया कि, ‘उनके स्टारडम में खेसारीलाल यादव का नहीं, बल्कि पवन सिंह का योगदान ज्यादा है.’ काजल के इस बयान के भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में चर्चे गर्म हो गए है कि 9 अप्रैल को प्रदर्तशित होने वाली भोजपुरी फिल्म ‘लिट्टी चोखा’ इन दोनों की जोड़ी वाली आखरी फिल्म साबित होने वाली है.

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काजल राघवानी ने कहा है, आज मैं जिस मुकाम पर हूं, उसे मैंने कड़ी मेहनत से हासिल किया है. मुझे खेसारीलाल यादव या किसी अन्य कलाकार के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन खेसारीलाल यादव हर जगह मुझे बदनाम कर रहे हैं कि मैंने उन्हें (खेसारीलाल यादव) धोखा दिया है. जबकि, ऐसा कुछ नहीं है. मुझे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. मैं गुजराती हूं, शायद इसी वजह से मुझे निशाना बनाया जा रहा है.’’

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इन दिनों काजल राघवानी की गिनती भोजपुरी की सर्वाधिक सफल अभिनेत्रियों में होती है. इस पर वह कहती हैं- ‘‘मेरे स्टारडम में खेसारीलाल यादव का कोई भी योगदान नहीं है. मेरे करियर में पवन सिंह का योगदान काफी ज्यादा है. गाना ‘छलकत हमरो जवनिया’ में मेरे और पवन सिंह के रोमांस को लोगों ने काफी पसंद किया था. आज भी यह गाना भोजपुरी में सबसे सुना जाने वाला गाना है. ऐसा नहीं है कि मैं खेसारी और पवन सिंह के बीच किसी एक को चुन रही हूं. मगर जो सच है, वह सच है.

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सोशल मीडिया पर मिल रही भद्दी गालियां काजल को दुःखी करती हैं. वह कहती हैं, ‘‘मैंने अपने अब तक के करियर में कभी भी किसी के खिलाफ कोई बात नहीं की. मैंने खेसारीलाल पर भी किसी भी तरह के आरोप नहीं लगाए. मैंने तो आज तक नहीं कहा कि उन्होंने मुझे धोखा दिया. फिर भी खेसारी लाल मेरे बारे में जो कुछ कह रहे हैं, वह पूर्णतया गलत है. मुझे चैनलों पर रोने की आदत भी नहीं है. मेरे लिए संस्कार और काम सबसे ज्यादा इंपोर्टेंट है. मैं सुलझी हूं और समझदार हूं. हमें भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को आगे ले जाने के लिए काम करना और सोचना है.’’

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काजल ने खेसारीलाल के साथ विवादों के बीच अपनी आने वाली फिल्म ‘लिट्टी चोखा’ को लेकर कहा कि,‘‘मैं काम के लिए समर्पित हूं. मैं खेसारी लाल को दुश्मन नहीं मानती हूं. मैं कलाकार हूं और मुझे काम करने में मजा आता है.’’

Naagin 5 एक्ट्रेस सुरभि चंदना के इस अवतार पर फैंस ने दिया ये रिएक्शन, देखें Photos

‘नागिन 5’  फेम एक्ट्रेस सुरभि चंदना की हॉट फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. जिसे फैंस खूब पसंद कर रहे हैं.

बता दें कि हाल ही में हुए आईटीए अवॉर्ड्स में सुरभि चंदना ने बेस्ट ऐक्ट्रेस का खिताब जीता है. और इसके साथ ही एक्ट्रेस ने अपनी स्टाइलिश अपीयरेंस से फैंस का दिल भी जीत लिया है.

 

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उन्होंने इस अवॉर्ड्स सेरिमनी के लिए एक फोटोशूट करवाया था, जिसमें वह ब्लैक गाउन में नजर आईं. इस फोटोशूट में उनका ग्लैमरस अंदाज फैन्स को खूब पसंद आ रहा है.

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एक यूजर ने सुरभि के फोटोज पर कमेंट किया, सीधा मार ही डालेंगी. तो वहीं एक यूजर ने कॉमेंट करके सुरभि चंदना की खूबसूरती का राज पूछ लिया. एक्ट्रेस की परफेक्ट फिगर की जमकर तारिफ कर रहे हैं.

 

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बता दें कि सुरभि चंदना ने काफी वजन घटा लिया है. ‘नागिन 5’ के लिए सुरभि ने वजन कम किया. एक्ट्रेस को डांस का बहुत शौक है. उन्होंने डांस के जरिए अपनी फिटनेस को मेनटेन किया है.

वर्कफ्रंट की बात करे तो ही वह ‘नागिन 5’ में नजर आईं. इसमें सुरभी और शरद मल्होत्रा के साथ उनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने काफी पसंद किया. इस शो के लिए सुरभि चंदना को आईटीए में बेस्ट ऐक्ट्रेस का खिताब भी मिला है.

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Bigg Boss 14: Rubina Dilaik ने बेबी प्लानिंग को लेकर कही ये बात

बिग बॉस 14 (Bigg Boss 14) दो दिनों में खत्म होने वाला है. अब शो में  केवल 5 कंटेस्टेंट्स ही बचे हैं. ऐसे में कंटेस्टेंट एक- दूसरे के सामने अपने प्रसनल लाइफ के बारे में बात करते नजर आ रहे हैं.

कंटेस्टेंट की कई ऐसी बातें होती हैं जो फैंस को एक्साइट कर देती हैं. शो के लेटेस्ट एपिसोड में सबसे स्ट्रांग कंटेस्टेंट रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik) ने अपनी फैमिली प्लानिंग के बारे में बात की है. जी हां, रुबीना ने अली गोनी को बताया कि वे बेबी प्लानिंग के बारे में क्या सोचती हैं. तो आइए जानते हैं, रुबीना दिलाइक बेबी प्लानिंग को लेकर क्या सोचती हैं.

दरअसल शो के लेटेस्ट एपिसोड में रुबीना दिलाइक और अली गोनी (Aly Goni) खाना खा रहे होते हैं. और खाने के दौरान अली गोनी रुबीना से पूछते हैं, मैडम कब करोगे प्लान? इस पर रुबीना हाथ के इशारे से बताती हैं कि 5 साल बाद.

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रुबीना के इस बात पर अली चौंक जाते हैं और कहते हैं कि 5 साल क्यों? इसके जवाब में रुबीना कहती हैं कि वे पूरी दुनिया घूमना चाहती हैं. इस बात पर अली कहते हैं कि आपके वर्ल्ड घूमने के चक्कर में बच्चों की वर्ल्ड में एंट्री ही लेट हो रही है. इस पर रुबीना कहती हैं कि मेरा एक ही सपना है कि मुझे दुनिया घूमनी है.

 

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फिर अली ये कहते हुए नजर आते हैं कि वो तो आप बच्चों के साथ भी घूम सकती हैं. इस पर रुबीना कहती हैं कि नहीं, बच्चे होने के बाद कई सारी दिक्कतें होती हैं.

बता दें कि घर में रुबीना दिलाइक, राखी सावंत, निक्की तंबोली, अली गोनी और राहुल वैद्य बचे हैं. जल्द ही घर से एक और सदस्य को बाहर किया जाएगा.

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प्यार में मिला धोखा: भाग 1

सौजन्य-  मनोहर कहानियां

सेजल मिश्रा और हिमांशु एकदूसरे को इतना चाहते थे कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. इसी दौरान सेजल की मां प्रतिभा उपाध्याय ने सेजल के ऐसे कान भरे कि वह प्रेमी की जान लेने को आमादा हो गई. इस के बाद जो हुआ…

21वर्षीय हिमांशु सिंह सुलतानपुर पीडब्लूडी कालोनी में अपनी मां प्रतिमा सिंह और बड़े भाई शिवेंद्र के साथ रहता था. 3 दिसंबर, 2020 की शाम साढ़े 6 बजे किसी का फोन आया तो वह घर से निकल गया. देर रात तक जब वह नहीं लौटा तो शिवेंद्र ने उस का फोन लगाया, लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ मिला. हर बार फोन बंद ही मिला तो वह परेशान हो गया. मां प्रतिमा सिंह भी चिंतित हो गईं कि पता नहीं वह कहां है जो उस का फोन भी नहीं लग रहा.

अगले दिन भी हिमांशु की तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता न चला. मोबाइल भी लगातार बंद आ रहा था. जब कुछ पता न चला तो 5 दिसंबर को शिवेंद्र अपने मामा विवेक सिंह के साथ शहर कोतवाली पहुंचा.

कोतवाली में मौजूद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को उन्होंने हिमांशु के लापता होने की बात बताई. पूरी  बात जानने के बाद इंसपेक्टर सिंह ने हिमांशु की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से हिमांशु को खोजने लगी. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह को जानकारी मिली कि बाराबंकी के लोनी कटरा थाना पुलिस ने 4 दिसंबर को अखैयापुर गांव के पास नाले से एक युवक की नग्न लाश बरामद की थी. जिस की शिनाख्त नहीं हो पाई थी.

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इंसपेक्टर सिंह ने कटरा थाने से लाश के फोटो मंगवा कर हिमांशु के भाई व मामा को दिखाए तो उन्होंने लाश की शिनाख्त हिमांशु के रूप में कर दी.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने हिमांशु के भाई शिवेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि हिमांशु की किसी से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन उस के प्रेम संबंध 18 वर्षीय सेजल मिश्रा नाम की युवती से थे.

वह डा. प्रदीप मिश्रा और प्रतिभा उपाध्याय की बेटी है और शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती है. प्रतिभा का तलाक हो चुका है. इसलिए वह पति से अलग रह रही है.

इस से हिमांशु की हत्या का शक सेजल के परिजनों पर गया. लिहाजा पुलिस ने प्रतिभा के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस से पता चला कि डा. प्रदीप घटना के दिन शाम 6 बजे से ले कर रात साढे़ 8 बजे तक प्रतिभा के घर पर थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उसी समय के बीच हत्या किए जाने की पुष्टि हुई थी. हिमांशु के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन की जांच की गई तो शक और पुख्ता हो गया. हिमांशु की आखिरी लोकेशन प्रतिभा के घर की थी. असरोगा टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में घटना की रात 12:05 बजे महाराष्ट्र नंबर की एक स्कोडा कार जाते हुए दिखी.

पुलिस ने हिमांशु के दोस्तों से पूछताछ की तो पता चला कि हिमांशु अपने एक दोस्त के साथ घटना की शाम प्रतिभा के घर गया था. हिमांशु दोस्त को बाहर छोड़ कर अंदर चला गया था. हिमांशु काफी समय तक वापस नहीं लौटा तो दोस्त उस के मोबाइल पर मैसेज भेज कर वापस आ गया. हिमांशु 6:40 बजे प्रतिभा के घर में घुसा था. 8:22 बजे वह प्रतिभा के घर से निकलते देखा गया.

हिमांशु के परिजनों ने भी उस के हिमांशु के आने की पुष्टि कर दी. अब यह बात समझ नहीं आ रही थी कि जब हिमांशु प्रतिभा के घर से निकल आया तो गया कहां. लेकिन शक की गुंजाइश अभी थी कि फोटो में निकलते समय हिमांशु का चेहरा नहीं दिख रहा था. हिमांशु के साथ  गए दोस्त और अन्य दोस्तों को युवक का फोटो दिखाया गया तो उन्होंने फोटो में दिख रहे युवक की पहचान हिमांशु के रूप में नहीं की.

वह युवक कपड़े जरूर हिमांशु के पहने था, लेकिन चालढाल उस की अलग थी. इस का मतलब यह था कि किसी और को हिमांशु के कपड़े पहना कर गुमराह करने के लिए घर से निकाला गया था. तमाम सुबूत प्रदीप मिश्रा और उन की तलाकशुदा पत्नी प्रतिभा की ओर इशारा कर रहे थे.

इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने 14 दिसंबर को डा. प्रदीप मिश्रा को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती में ही वह टूट गए और उन्होंने घटना के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी.

हिमांशु की हत्या करने में प्रदीप के अलावा प्रतिभा, उस की बेटी सेजल और उन का नौकर सद्दाम शामिल थे. हत्या के लिए बाकायदा एक प्रौपर्टी डीलर गुफरान अख्तर के जरिए 50 हजार रुपए की सुपारी दी गई थी. गुफरान ने अपने हिस्ट्रीशीटर दोस्त वाहिद खान को हत्या के लिए तैयार किया था. वाहिद ने सब के सामने घटना को अंजाम दिया था.

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पूछताछ के बाद इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह ने शिवेंद्र सिंह की तरफ से प्रदीप मिश्रा, प्रतिभा उपाध्याय, सेजल मिश्रा, गुफरान अख्तर, वाहिद खान और सद्दाम के खिलाफ भादंवि की धारा 364/302/201/34/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

आरोपियों से पूछताछ के बाद हिमांशु की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर की शहर कोतवाली के शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहती थी प्रतिभा उपाध्याय. प्रतिभा का विवाह 19 साल पहले बडि़यावीर में रहने वाले प्रदीप मिश्रा से हुआ था. प्रदीप मिश्रा होम्योपैथी के डाक्टर थे. विवाह के साल भर बाद ही प्रतिभा ने एक खूबसूरत बेटी सेजल को जन्म दिया.

समय अपनी गति से आगे बढ़ता गया. सन 2007 में प्रतिभा ने प्रदीप से किसी बात से खफा हो कर तलाक ले लिया और बेटी सेजल के साथ शास्त्रीनगर मोहल्ले में रहने लगी. प्रतिभा ब्याज पर पैसे देने का काम करती थी. इस पर उसे अच्छी कमाई होती थी.

अगले भाग में पढ़ें- हिमांशु से मुलाकात के बाद सेजल खोईखोई सी रहने लगी थी

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