चिराग पासवान के साथ क्यों हुआ ऐसा

रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान को जिस बेइज्जती से दिल्ली के घर से निकाला गया है और उन के पिता की तसवीरों को बाहर गेट पर पटक दिया गया ताकि पूरी जनता टीवी कैमरों के माध्यमों से देख सके, दलितों को उन की सही औकात बताती है. अगर उत्तर प्रदेश में मायावती डरी रहती हैं और कितने ही दलित नेता सरकारी चरण चूमते नजर आते हैं तो इसलिए कि उन्हें अपनी औकात के बारे में पैदा होते ही बता दिया जाता है.

रामविलास पासवान ने कभी दलितों के लिए काम किया था, उन के हितों के लिए लड़े थे पर जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि इस कौम की जनता अपने हकों के लिए लड़ सकती ही नहीं है. वे भी उसी रास्ते पर चल दिए जिस पर मायावती चलीं और उदित राज चले.

चिराग पासवान ने भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल का भी साथ न देने का फैसला किया जो उन्हें उन के उन सलाहकारों की देन था जो कौम के बल पर कुछ छोटे लाभों के लालच में आ गए. रामविलास पासवान ने लगातार एक के बाद एक पार्टियां बदलीं और यह भरोसा ऊंची जातियों को दिला दिया कि दलितों के वोट पाने के लिए उन्हें बराबर के मौके, हक, स्थान आदि देने की जरूरत नहीं, कुछ टुकड़े फेंकने की जरूरत है, बाकी काम वे पाठ पढ़ाने वाले करते रहते हैं जो उन्हें कहते रहते हैं कि उन का जन्म इस कौम में हुआ तो इसलिए कि उन्होंने पिछले जन्मों में पाप किए थे.

रामविलास पासवान या चिराग पासवान या दूसरे सैकड़ों दलित नेता, अफसर, प्रोफैसर, चिंतक, लेखक इस गलतफहमी को दूर करने की जगह अपनी जनता को कुछ टुकड़े दिलाने में लगे रहते हैं. उसी चक्कर में उन्हें अपने लिए कुछ ज्यादा मिल जाता है जिस से वे खुश रहते हैं. रामविलास पासवान पिछली कई सरकारों में लगातार पार्टियां बदल कर मंत्री बने रहे और उन का दलितों के लिए काम कब का धुल गया और उस का खमियाजा उस बेइज्जती से हुआ जिस से उन के पुत्र चिराग पासवान को दिल्ली के सरकारी बंगले से निकालने पर हुआ.

वैसे चिराग पासवान को कब का यह बंगला छोड़ देना चाहिए था. उन्हें नेता बनना चाहिए था जो कुरबानी कर सके. सुख भोगने के लिए नहीं, एक सताई हुई कौम को आवाज देने और उस की खुशियों के लिए. लोक जनशक्ति पार्टी आज बिखर गई है. सभी नेता रामविलास पासवान की नकल कर के जहां शहद है वहां चले गए हैं. दलित वोटर साबित करते रहते हैं कि दो वक्त की रोटी और शराब की बोतल से उन के वोट वह खरीद सकता है जो बाद में उन पर डंडे बरसाए. उन को लगातार धर्मभीरु भी बनाया जा रहा है और रामविलास पासवान हों या उदित राज भक्तों का साथ दे कर साबित करते रहते हैं कि पूजापाठ से ही उन का कल सुधरेगा.

दिल्ली के जनपथ पर बना उन का सरकारी बंगला बड़ा था पर इतना बड़ा भी नहीं कि सरकार के लिए आफत होता पर खाली करा कर जता दिया गया है कि दलितों के नेता चिराग पासवान की औकात क्या है. हर दलित को हर रोज यह औकात किसी न किसी तरह जता दी जाती है.

मेरा फिगर देखा तो काम करने का औफर दे डाला- भोजपुरी एक्ट्रेस मधु सिंह राजपूत

मधु सिंह राजपूत का फिगर बौलीवुड की कई नामचीन हीरोइनों जैसा है. ऐसे में वे भोजपुरी फिल्मों की पसंद बनती जा रही हैं. उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले की रहने वाली मधु सिंह राजपूत इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रह रही हैं और वहीं से वे अलगअलग लोकेशनों पर जा कर अपनी फिल्मों की शूटिंग पूरी करती हैं.

हाल ही में बस्ती जिले में हुए ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में उन से लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप बहुत छोटे से शहर से ताल्लुक रखती हैं, जहां की लड़कियों का फिल्मों में काम करना बड़ा मुश्किल माना जाता है, फिर आप की भोजपुरी सिनेमा में ऐंट्री कैसे हुई?

मैं पहले भोजपुरी में जरा भी दिलचस्पी नहीं रखती थी, लेकिन एक बार यूट्यूब पर गाना सर्च करते हुए रितेश पांडेय का गाना ‘जा ए चंदा…’ सुना. उस के बाद तो मैं भोजपुरी और रितेश पांडेय की फैन हो गई. मेरी उन के साथ फोटो खिंचाने की बड़ी इच्छा थी. ऐसे में मैं उन से मिलने बनारस चली गई.

वहां मैं ने रितेश पांडेय के साथ फोटो खिंचाने की इच्छा जाहिर की. उस दौरान वे एक गाने के वीडियो शूट पर थे. उन्होंने जब मेरा फिगर देखा तो गाने में काम करने का औफर दे डाला, जिसे मैं मना नहीं कर पाई और मेरा पहला अलबम खूब हिट रहा.

इस के बाद मुझे उन्हीं के साथ पहली फिल्म ‘किस में कितना है दम’ में काम करने का मौका मिला, जिस में मेरे काम को खूब सराहा गया.

आप की कामयाब फिल्में कौन सी रही हैं?

मेरी कामयाब फिल्मों में ‘संगम रिश्तों का’, ‘निरहुआ बना बाजीगर’, ‘वांटेड’, ‘मजनुआ’, ‘शूद्र : द रक्षक’, ‘जंग’, ‘पिस्टल पांडेय’, ‘दूल्हा बिकता है’ जैसी दर्जनों फिल्में शामिल रही हैं.

आप की ऐक्टिंग नैचुरल है या कहीं से इसे सीखा है?

सब से पहले मैं अपने किरदार को खूब अच्छे से पढ़ती हूं,  जब उस किरदार को निभा रही होती हूं, तो किरदार में ढल जाने की कोशिश करती हूं. यह बिलकुल नैचुरल है. मैं ने कहीं से इस के लिए ट्रेनिंग नहीं ली है.

आप भोजपुरी में किस तरह की फिल्में करना चाहती हैं?

वैसे तो मैं हर तरह की फिल्में करना चाहती हूं, लेकिन मैं चाहती हूं कि जिस कहानी में प्यार हो, रोमांस हो, सस्पैंस और थ्रिल हो और महिला प्रधान फिल्में हों, तो उन्हें जरूर करना चाहूंगी.

आज के दौर में सैलेब्रिटी के तौर पर आप के लिए सोशल मीडिया कितना अहम है?

सोशल मीडिया का प्लेटफार्म काफी अहम है. इस पर आप के फौलोअर्स यह बताते हैं कि वे आप को कितना चाहते हैं.

हकीकत: फुटपाथ- बिखरते सपने, जलालत जिंदगी

पौलीथिनों को जोड़जोड़ कर बनाई गई ?ोंपडि़यों के पास पहुंचते ही नथुने में तेज बदबू का अहसास होता है. बगल में बह रही संकरी नाली में बजबजाती गंदगी. कचरा भरा होने की वजह से गंदा पानी गली की सतह पर आने को मचलता दिखता है.

तंग और सीलन भरी छोटीछोटी ?ोंपडि़यों से ?ांकते चीकट भरे चेहरे… खांसते और लड़खड़ाते जिंदगी से बेजार हो चुके बूढ़े, पास की सड़कों और गलियों में हुड़दंग मचाते मैलेकुचैले बच्चे…

यही है फुटपाथों की जिंदगी. सुबह होते ही शहर की चिल्लपौं… गाडि़यों की तेज आवाज और कानफोड़ू हौर्न से ले कर शाम ढलने के बाद के सन्नाटे को आसानी से ?ोलने की कूवत होती है फुटपाथ के बाशिंदों में.

ऐसा नहीं है कि फुटपाथों पर बनी ?ाग्गियों और बाजारों से प्रशासन अनजान होता है या गरीबों पर रहम खा कर उन्हें फुटपाथों पर कारोबार करने या बसने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस के पीछे हरे नोटों की चमक काम करती है.

एक पुलिस अफसर बताते हैं कि फुटपाथ पर रहने वालों या कोई धंधा करने वालों को उस के एवज में खासी रकम चुकानी पड़ती है. फुटपाथियों को पुलिस वाले और लोकल रंगदार दोनों की ही मुट्ठी गरम करनी पड़ती है.

सरकार फुटपाथ से कब्जे को हटा तो नहीं सकती, पर उसे वहां रहने वालों या कारोबार करने वालों को पट्टे पर दे दे, तो सरकार के खजाने में काफी पैसा आ सकता है.

पटना के ही ऐक्जीबिशन रोड पर बड़ा पाव और आमलेट का ठेला लगाने वाला एक दुकानदार नाम नहीं छापने की गारंटी देने के बाद कहता है कि वह दिनभर में 2,000 रुपए का धंधा कर लेता है.

रोज शाम होते ही पुलिस वाले और लोकल दादा टाइप लोग ‘टैक्स’ वसूलने के लिए पहुंच जाते हैं. 200 रुपए पुलिस वालों और 300 रुपए गुंडों को चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है. इस के बाद भी वे लोग बड़ा पाव और आमलेट मुफ्त में हजम करना नहीं भूलते हैं.

मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पटना से ले कर किसी भी बड़े या छोटे शहर के फुटपाथों की जिंदगी एकजैसी ही होती है. आजादी के 74 सालों में शहर का रंगरूप बदला. चमचमाती बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो गईं. कोलतार की जगह कंक्रीट की ठोस सड़कें बन गईं. फुटपाथों पर रंगबिरंगी टाइल्स लग गईं. कई सरकारें बदल गईं. तरक्की के हजारों दावे और वादे हुए, पर फुटपाथों पर रहने वालों का कुछ भी नहीं बदला.

शहर के लोग ही फुटपाथियों को मखमल में टाट का पैबंद की तरह मानते हैं और उन्हें हिकारत की नजर से देखा जाता है. सरकार उन्हें अपने वोट बैंक के तौर पर ही देखती है.

दरअसल, इन फुटपाथियों में ज्यादातर दुकानदार पिछड़ी और दलित जातियों के होते हैं, जिन से वसूली का हक तो पौराणिक है और कोई अफसर या नेता इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहता.

एक समाज विज्ञानी कहते हैं कि दलित या भूमिहीन गरीब लोग गांव छोड़ कर शहर इसलिए आते हैं कि उन्हें कोई बढि़या और पक्का काम मिलेगा, लेकिन ज्यादातर लोग मजदूर, रिकशा या ठेला गाड़ी चलाने वाले और भिखारी बन कर रह जाते हैं, शहरों में इधरउधर भटकते हुए फुटपाथों पर टिक जाते हैं.

फुटपाथ पर ही बसना और उजड़ना उन की नियति बन जाती है. कभीकभार जब लोकल पुलिस थानों पर ‘ऊपरी प्रैशर’ आता है, तो आननफानन में ही मुहिम शुरू कर फुटपाथ को साफ करा दिया जाता है और पुलिस की ‘हल्ला गाड़ी’ (बुलडोजर या जेसीबी) के वापस लौटते ही फुटपाथों पर फिर से कब्जा होने लगता है.

सड़कों के किनारे फुटपाथ बनाने का मकसद यही है कि पैदल चलने वाले लोगों को परेशानी न हो और सड़कों पर तेज चलती गाडि़यों से उन की हिफाजत की जा सके.

संविधान के अनुच्छेद 20 के पैरा 2 और 3 में सड़कों पर पैदल चलने वालों को सुरक्षा का अधिकार दिया गया है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि शहरों में 28 फीसदी आबादी ऐसी है, जो पैदल चलती है. इस के बाद भी सरकारें पैदल चलने वालोंकी हिफाजत के लिए गंभीर नहीं रही हैं.

शहरों में कुल सड़कों की लंबाई का 30 फीसदी ही फुटपाथ है और उस के बाद करेले पर नीम वाली हालत यह है कि फुटपाथों पर गैरकानूनी कब्जा है.

पटना शहर का मुख्य और पुराना इलाका है अशोक राजपथ. इसी सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर भिखारियों की झोंपडि़यां बसी हुई हैं. अपने गुजर चुके परिवार वालों की आत्मा को शांति पहुंचाने के टोटके के नाम पर लोग यहां के लोगों के बीच पूरी, सब्जी और मिठाई का पैकेट बांटते रहते हैं.

समाज में फैले अंधविश्वास ने भी फुटपाथों को जिंदा रखने में अहम रोल अदाकिया है. शहर में रोज कोई न कोई मरता ही है और उन के परिवार वाले फुटपाथ पर रहने वाले गरीबों के बीच खाने का पैकेट बांटने की रस्म निभा कर सम?ाते हैं कि मरे हुए परिवार वालों की आत्मा को शांति मिलेगी.

इसी दकियानूसी सोच की वजह से शहरी फुटपाथों के बाशिंदों को कभी पकवानों की कमी नहीं होती है. फुटपाथ पर पिछले 26 सालों से रह रहा जीतन बताता है कि महीने में 15-17 दिन पूरी, सब्जी और मिठाई खाने का मजा मिलता है. वह अपने 3 बच्चों और बीवी के साथ छोटी सी झोंपड़ी में रह रहा है.

कोविड 19 के दिनों में लोगों ने इन लोगों को भरपेट खाना खिला कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी कम निभाई, पुण्य ही ज्यादा कमाया. उन्हें गरीब रखने से ही तो पुण्य मिलेगा और वैसे भी ये गरीब फटेहाल पिछले जन्मों के पापों के फल भोग रहे हैं.

जब मुफ्त में बैठेठाले खाने को तर माल मिल रहा हो और हराम का खाना खाने की आदत पड़ गई हो, तो कोई काम करने के लिए हाथपैर क्यों चलाए? भिखारियों की इस गली के बसने, पनपने और बढ़ने के पीछे पोंगापंथ का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है.

जब एक बच्चे से पूछा गया कि उसे लोग बढि़याबढि़या खाना खाने के लिए क्यों दे जाते हैं, तो वह छूटते ही कहता है, ‘‘जब तक लोग हम कंगालों को खाना नहीं खिलाएंगे, तब तक मरने वाले की आत्मा भटकती रहेगी. दूसरा जीवन पाने के लिए उसे कोई शरीर ही नहीं मिलेगा.’’

उस बच्चे की बातों को सुन कर यही लगता है कि उस के मांबाप ने भी उसे यह बात घुट्टी में पिला दी है कि लोग उसे खाना खिला कर या दान दे कर कोई अहसान नहीं करते हैं. यह सब काम लोग अपना मतलब साधने के लिए ही करते हैं.

?ारखंड की राजधानी रांची के मेन रोड इलाके में फुटपाथ पर रहने वाले ज्यादातर लोग किसी भी सूरत से अपंग और लाचार नहीं हैं. इस के बाद भी वे कोई काम नहीं करना चाहते हैं. उन्हें कोई काम नहीं देना चाहता है. मेहनतमजदूरी का पैसा कमाने और पेट पालने के बारे में वे लोग सोचते ही नहीं हैं.

अपने 4 बच्चों के साथ रहने वाले डोमन दास से जब पूछा गया कि वह कोई कामधंधा क्यों नहीं करता है? अपंग नहीं होने के बाद भी भीख और दान के भरोसे क्यों रहता है? इन सब सवालों के जवाब में वह उलटा सवाल करता है, ‘‘अगर हम लोग दूसरा कामधंधा करने लगेंगे, तो पैसे वालों के दानपुण्य का काम कैसे चलेगा? गरीबों को दान दे कर ही तो रईस लोग पुण्य बटोरते हैं.’’

हर सरकार और प्रशासन फुटपाथ और ?ाग्गियों में बसे लोगों को हटाने या दूसरी जगह बसाने के बजाय उन्हें बनाए रखने में दिलचस्पी रखते हैं. कभीकभार आम जनता की आंखों में धूल ?ोंकने के लिए प्रशासन पर सनक सवार होती है, तो फुटपाथ पर से कब्जा हटा दिया जाता है और उस के बाद दोबारा कान में तेल डाल कर सो जाता है.

झुग्गियां उखाड़ने के चंद घंट बाद ही फिर से तिनकातिनका जोड़ कर लोग फुटपाथों पर झोंपडि़यां बना लेते हैं. प्रशासन के इसी रवैए की वजह से फुटपाथ पर रहने वालों को पुलिस के डंडों और बुलडोजरों से अब डर नहीं लगता है.

हालांकि वे सम?ा चुके हैं कि साल 2 साल में उन्हें फिर से उजाड़ा जाएगा और वे फिर उसी जगह बस जाएंगे. उस के बाद कुछ सालों तक उन्हें कुछ नहीं होने वाला है.

दरअसल, उजड़ना और बसना ही फुटपाथियों की जिंदगी रही है. पटना के पीरमुहानी महल्ले में फुटपाथ पर बसे कल्लू गोप कहता है कि वह पिछले 8 सालों से उस जगह पर रह रहा है, लेकिन रोजाना ही उस के सिर पर उजड़ने की तलवार लटकी रहती है.

पास ही में खड़ा उस का 12 साल का बेटा बड़ी ही मासूमियत से कहता है कि उस के साथ कई बच्चों ने मिल कर मुख्यमंत्री अंकल और डीएम अंकल से कहा था कि उन्हें रहने के लिए छोटा सा घर दिया जाए, जिस से झोंपड़ी के बच्चे मन लगा कर पढ़ सकें और बड़ा आदमी बन सकें, पर कोई सुनता ही नहीं है.

इलाके के लोग सर्किल अफसर से ले कर गवर्नर तक गुहार लगा चुके हैं, इस के बाद भी गरीबों को उन के हाल पर छोड़ दिया गया है. बेलगाम पुलिस ने गंगा बिंद के 3 साल के मासूम बच्चे को भी लाठी से पीट डाला.

अपनी झोंपड़ी के सामने खड़ी तकरीबन 70 साल की बीना देवी पर भी पुलिस ने रहम नहीं दिखाया और उस के पेट में लाठी मार दी. वह तड़प कर जमीन पर गिर पड़ी. उस के इलाज पर 2,000 रुपए खर्च हो गए.

फुटपाथ पर रहने वालों की जिंदगी को देख कर यही महसूस होता है कि गांवघर को छोड़ कर बेहतर जिंदगी का सपना देखने वालों के लिए शहर का फुटपाथ ही बिछौना और घर है. 6-7 फुट के झोंपड़े में न जाने कितनी जिंदगियां खाक हो गईं और न जाने कितने खाक होने के इंतजार में तिलतिल कर रोज ही मर रहे हैं.

गांवों में तो उन का और भी बुरा हाल है, क्योंकि वहां तो उन के ?ोंपड़ों में आग भी लगा दी जाती है और औरतों को उठा कर ले जाया जाता है.

तलाश: ज्योतिषी ने कैसे किया अंकित को अनु से दूर?

romantic story in hindi

प्रेमी ने लगाया शक का चश्मा: भाग 3

‘‘हां, गीता और मम्मी बाजार गई हैं, थोड़ी देर में लौट आएंगी.’’ सविता ने सुंदर के सवालों का सपाट जवाब दिया.

फिर पलभर के लिए दोनों के बीच खामोशी छाई रही. उसे सुंदर ने ही तोड़ा, ‘‘सविता, आजकल मैं देख रहा हूं कि तुम मुझ से कटीकटी सी रहती हो और दूसरों पर मेहरबान.’’

‘‘क्या कहा?’’ सविता अचकचा उठी, ‘‘मैं तुम से कटीकटी सी रहती हूं और दूसरों पर मेहरबान? तुम्हारे कहने का मतलब क्या है सुंदर?’’ सविता सुंदर पर भड़क उठी.

‘‘यही कि मैं कई दिनों से देख रहा हूं कि तुम अपना ट्रैक चेंज कर किसी और की बांहों में झूल रही हो.’’

‘‘खबरदार सुंदर! आज तो तुम ने मेरे दामन पर कीचड़ उछाल दी, फिर दोबारा मुझ से ऐसी बातें मत करना वरना मैं यह भूल जाऊंगी कि मैं ने कभी तुम्हें प्यार किया था. इस से पहले कि मेरा गुस्सा मेरे सिर चढ़ कर बोले, तुम यहां से अभी चलते बनो और फिर दोबारा अपनी शक्ल मुझे मत दिखाना.’’ सविता गुस्से से पागल हो गई थी. उस की आंखें एकदम सुर्ख हो गई थीं.

सविता का यह रौद्र रूप देख कर सुंदर डर गया और बिना कुछ बोले उठा और वहां से अपने घर चला गया.

अपमान के अग्निकुंड में जलने लगा सुंदर

प्रेमिका के अपमान के अग्निकुंड में जलते सुंदर ने एक बड़ा और खतरनाक फैसला ले लिया था. उस ने उसी समय तय कर लिया कि सविता को मौत के घाट उतार कर वह अपने अपमान का बदला लेना.

इस के लिए सुंदर ने एक चाल चली. उस ने योजना के अनुसार, अपने किए के लिए उस से माफी मांग ली थी ताकि उस की सविता के घर में घुसपैठ बनी रहे. कोमल हृदय वाली सविता ने उसे माफ कर दिया और फिर से उस का पहले जैसा आनाजाना शुरू  हो गया. लेकिन सविता के दिल में गांठ बन गई थी.

सविता यह भुला नहीं पा रही थी कि सुंदर ने कैसे उस के प्यार पर शक किया था कि उस का और मर्दों से भी चक्कर चल रहा है. इसी बात से दोनों के बीच में दूरियां बढ़ती चली गईं.

सविता अपने प्रेमी सुंदर से जितनी दूर होती जा रही थी, सुंदर के तनबदन में ईर्ष्या की आग धधकती जा रही थी. प्रेमिका की जुदाई सुंदर और बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. वह इस किस्से को जल्द से जल्द समाप्त कर देना चाहता था.

योजना के मुताबिक, 19 जुलाई, 2022 की रात साढ़े 10 बजे सुंदर सविता के घर पहुंचा. उस समय सविता, उस की मां लखिमा और बेटी गीता खाना खा कर सोने की तैयारी कर रहे थे.

सुंदर को इतनी रात गए देख कर सविता मन ही मन बुदबुदाई और उसे घर के अंदर बुला लिया. उस ने इतनी रात गए आने की वजह पूछी तो सुंदर अपना आपा खो बैठा. अपने साथ लाए लोहे के रोड से उस के सिर पर जोरदार वार किया कि वह चीखती हुई चौकी पर जा गिरी.

मां की चीख सुन कर गीता उस की तरफ बढ़ी तो उसे देख कर सुंदर डर गया कि वह पुलिस को इस बाबत बता सकती है.

फिर क्या था? सुंदर ने गीता के सिर पर उसी रौड से एक जोरदार प्रहार किया कि वह भी एक ही वार में ढेर हो कर नीचे फर्श पर जा गिरी थी.

उस की दर्दनाक चीख सुन कर सो रही लखिमा मुर्मू की नींद टूट गई. यह देख कर एक बार फिर सुंदर डर गया. 2-2 कत्ल का राज छिपाने के लिए सुंदर ने उसे भी मौत के घाट उतार दिया.

तीनों की हत्या करने के बाद इत्मीनान से उस ने वाशरूम में जा कर खून सनी रौड और अपने हाथपैर धोए. ये सब करतेधरते रात के एक बज गए थे. उस के बाद उस ने कमरे पर बाहर से ताला बंद कर वह फरार हो गया.

हत्यारा लाख चालाक क्यों न हो, कानून की नजर से कभी बच नहीं सकता. आखिरकार, सुंदर का भी वही हुआ, जो हर मुलजिम के साथ होता है.

कथा लिखे जाने तक आरोपी सुंदर जेल में बंद था और हत्या में प्रयुक्त रौड पुलिस ने बरामद कर ली थी. मृतकों की गला रेत कर हत्या करने वाली बात से पुलिस ने इंकार किया था. उस ने भी सिर में गहरी चोट लगने से मौत होना बताया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

महापुरुष- भाग 2: कौनसा था एहसान

प्रोफेसर ने रेफ्रिजरेटर से संतरे के रस से भरी एक बोतल और एक बीयर की बोतल निकाली. जूस गिलास में भर कर रवि को दे दिया और बीयर खुद पीने लगे. कुछ देर बाद चावल तैयार हो गए. उन्होंने खाना खाया. कौफी बना कर वे बैठक में आ गए. अब काम करने का समय था.

रवि अपना बैग उठा लाया. उस ने 89 पृष्ठों की रिपोर्ट लिखी थी. प्रोफेसर गौतम रिपोर्ट का कुछ भाग तो पहले ही देख चुके थे, उस में रवि ने जो संशोधन किए थे, वे देखे. रवि उन से अनेक प्रश्न करता जा रहा था. प्रोफेसर जो भी उत्तर दे रहे थे, रवि उन को लिखता जा रहा था.

रवि की रिपोर्ट का जब आखिरी पृष्ठ आ पहुंचा तो उस समय शाम के 5 बज चुके थे. आखिरी पृष्ठ पर रवि ने अपनी रिपोर्ट में प्रयोग में लाए संदर्भ लिख रखे थे. प्रोफेसर को लगा कि रवि ने कुछ संदर्भ छोड़ रखे हैं. वे अपने अध्ययनकक्ष में उन संदर्भों को अपनी किताबों में ढूंढ़ने के लिए गए.

प्रोफेसर को गए हुए 15 मिनट से भी अधिक समय हो गया था. रवि ने सोचा शायद वे भूल गए हैं कि रवि घर में आया हुआ है. वह अध्ययनकक्ष में आ गया. वहां किताबें ही किताबें थीं. एक कंप्यूटर भी रखा था. अध्ययनकक्ष की तुलना में प्रोफेसर के विभाग का दफ्तर कहीं छोटा पड़ता था.

प्रोफेसर ने एक निगाह से रवि को देखा, फिर अपनी खोज में लग गए. दीवार पर प्रोफेसर की डिगरियों के प्रमाणपत्र फ्रेम में लगे थे. प्रोफेसर गौतम ने न्यूयार्क से पीएच.डी. की थी. भारत से उन्होंने एम.एससी. (कानपुर से) की थी.

‘‘साहब, आप ने एम.एससी. कानपुर से की थी? मेरे नानाजी वहीं पर विभागाध्यक्ष थे,’’ रवि ने पूछा.

प्रोफेसर 3-4 किताबें ले कर बैठक में आ गए.

‘‘क्या नाम था तुम्हारे नानाजी का?’’

‘‘रामकुमार,’’ रवि ने कहा.

‘‘उन को तो मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं. 1 साल मैं ने वहां पढ़ाया भी था.’’

‘‘तब तो शायद आप ने मेरी माताजी को भी देखा होगा,’’ रवि ने पूछा.

‘‘शायद देखा होगा एकाध बार,’’ प्रोफेसर ने बात पलटते हुए कहा, ‘‘देखो, तुम ये पुस्तकें ले जाओ और देखो कि इन में तुम्हारे मतलब का कुछ है कि नहीं.’’

रवि कुछ मिनट और बैठा रहा. 6 बजने को आ रहे थे. लगभग 6 घंटे से वह प्रोफेसर के फ्लैट में बैठा था. पर इस दौरान उस ने लगभग 1 महीने का काम निबटा लिया था. प्रोफेसर का दिल से धन्यवाद कर उस ने विदा ली.

रवि के जाने के बाद प्रोफेसर को बरसों पुरानी भूलीबिसरी बातें याद आने लगीं. वे रवि के नाना को अच्छी तरह जानते थे. उन्हीं के विभाग में एम.एससी. के पश्चात वे व्याख्याता के पद पर काम करने लगे थे. उन्हें दिल्ली में द्वितीय श्रेणी में प्रवेश नहीं मिल पाया था. इसलिए वे कानपुर पढ़ने आ गए थे. उस समय कानपुर में ही उन के चाचाजी रह रहे थे. 1 साल बाद चाचाजी भी कानपुर छोड़ कर चले गए पर उन्हें कानपुर इतना भा गया कि एम.एससी. भी वहीं से कर ली. उन की इच्छा थी कि किसी भी तरह से विदेश उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाएं. एम.एससी. में भी उन का परीक्षा परिणाम बहुत अच्छा नहीं था, जिस के बूते पर उन को आर्थिक सहायता मिल पाती. फिर सोचा, एकदो साल तक भारत में अगर पढ़ाने का अनुभव प्राप्त कर लें तो शायद विदेश में आर्थिक सहायता मिल सकेगी.

उन्हीं दिनों कालेज के एक व्याख्याता को विदेश में पढ़ने के लिए मौका मिला था, जिस के कारण गौतम को अस्थायी रूप से कालेज में ही नौकरी मिल गई. वे पैसे जोड़ने की भी कोशिश कर रहे थे. विदेश जाने के लिए मातापिता की तरफ से कम से कम पैसा मांगने का उन का ध्येय था. विभागाध्यक्ष रामकुमार भी उन से काफी प्रसन्न थे. वे उन के भविष्य को संवारने की पूरी कोशिश कर रहे थे.

एक दिन रामकुमार ने गौतम को अपने घर शाम की चाय पर बुलाया.

रवि की मां उमा से गौतम की मुलाकात उसी दिन शाम को हुई थी. उमा उन दिनों बी.ए. कर रही थी. देखने में बहुत ही साधारण थी. रामकुमार उमा की शादी की चिंता में थे. उमा विभागाध्यक्ष की बेटी थी, इसलिए गौतम अपनी ओर से उस में पूरी दिलचस्पी ले रहा था. वह बेचारी तो चुप थी, पर अपनी ओर से ही गौतम प्रश्न किए जा रहा था.

कुछ समय पश्चात उमा और उस की मां उठ कर चली गईं. रामकुमार ने तब गौतम से अपने मन की इच्छा जाहिर की. वे उमा का हाथ गौतम के हाथ में थमाने की सोच रहे थे. उन्होंने कहा था कि अगर गौतम चाहे तो वे उस के मातापिता से बात करने के लिए दिल्ली जाने को तैयार थे.

सुन कर गौतम ने बस यही कहा, ‘आप के घर नाता जोड़ कर मैं अपने जीवन को धन्य समझूंगा. पिताजी और माताजी की यही जिद है कि जब तक मेरी छोटी बहन के हाथ पीले नहीं कर देंगे, तब तक मेरी शादी की सोचेंगे भी नहीं,’ उस ने बात को टालने के लिए कहा, ‘वैसे मेरी हार्दिक इच्छा है कि विदेश जा कर ऊंची शिक्षा प्राप्त करूं, पर आप तो जानते ही हैं कि मेरे एम.एससी. में इतने अच्छे अंक तो आए नहीं कि आर्थिक सहायता मिल जाए.’

‘तुम ने कहा क्यों नहीं. मेरा एक जिगरी दोस्त न्यूयार्क में प्रोफेसर है. अगर मैं उस को लिख दूं तो वह मेरी बात टालेगा नहीं,’ रामकुमार ने कहा.

‘आप मुझे उमाजी का फोटो दे दीजिए, मातापिता को भेज दूंगा. उन से मुझे अनुमति तो लेनी ही होगी. पर वे कभी भी न नहीं करेंगे,’ गौतम ने कहा.

आगे पढ़ें- अपने कमरे में पहुंचते ही गौतम ने…

महापुरुष- भाग 1: कौनसा था एहसान

रवि प्रोफेसर गौतम के साथ व्यवसाय प्रबंधन कोर्स का शोधपत्र लिख रहा था. उस का पीएच.डी. करने का विचार था. भारत से 15 महीने पहले उच्च शिक्षा के लिए वह मांट्रियल आया था. उस ने मांट्रियल में मेहनत तो बहुत की थी, परंतु परीक्षाओं में अधिक सफलता नहीं मिली.

मांट्रियल की भीषण सर्दी, भिन्न संस्कृति और रहनसहन का ढंग, मातापिता पर अत्यधिक आर्थिक दबाव का एहसास, इन सब कारणों से रवि यहां अधिक जम नहीं पाया था. वैसे उसे असफल भी नहीं कहा जा सकता, परंतु पीएच.डी. में आर्थिक सहायता के साथ प्रवेश पाने के लिए उस के व्यवसाय प्रबंधन की परीक्षा के परिणाम कुछ कम उतरते थे.

रवि ने प्रोफेसर गौतम से पीएच.डी. के लिए प्रवेश पाने और आर्थिक मदद के लिए जब कहा तो उन्होंने उसे कुछ आशा नहीं बंधाई. वे अपने विश्वविद्यालय और बाकी विश्वविद्यालयों के बारे में काफी जानकारी रखते थे. रवि के पास व्यवसाय प्रबंधन कोर्स समाप्त कर के भारत लौटने के सिवा और कोई चारा भी नहीं था.

रवि प्रोफेसर गौतम से जब भी उन के विभाग में मिलता, वे उस को मुश्किल से आधे घंटे का समय ही दे पाते थे, क्योंकि वे काफी व्यस्त रहते थे. रवि को उन को बारबार परेशान करना अच्छा भी नहीं लगता था. कभीकभी सोचता कि कहीं प्रोफेसर यह न सोच लें कि वह उन के भारतीय होने का अनुचित फायदा उठा रहा है.

एक बार रवि ने हिम्मत कर के उन से कह ही दिया, ‘‘साहब, मुझे किसी भी दिन 2 घंटे का समय दे दीजिए. फिर उस के बाद मैं आप को परेशान नहीं करूंगा.’’

‘‘तुम मुझे परेशान थोड़े ही करते हो. यहां तो विभाग में 2 घंटे का एक बार में समय निकालना कठिन है,’’ उन्होंने अपनी डायरी देख कर कहा, ‘‘परंतु ऐसा करो, इस इतवार को दोपहर खाने के समय मेरे घर आ जाओ. फिर जितना समय चाहो, मैं तुम्हें दे पाऊंगा.’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था. आप क्यों परेशान होते हैं,’’ रवि को प्रोफेसर गौतम से यह आशा नहीं थी कि वे उसे अपने निवास स्थान पर आने के लिए कहेंगे. अगले इतवार को 12 बजे पहुंचने के लिए प्रोफेसर गौतम ने उस से कह दिया था.

प्रोफेसर गौतम का फ्लैट विश्व- विद्यालय के उन के विभाग से मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर ही था. उन्होंने पिछले साल ही उसे खरीदा था. पिछले 22 सालों में उन के देखतेदेखते मांट्रियल शहर कितना बदल गया था, विभाग में व्याख्याता के रूप में आए थे और अब कई वर्षों से प्राध्यापक हो गए थे. उन के विभाग में उन की बहुत साख थी.

सबकुछ बदल गया था, पर प्रोफेसर गौतम की जिंदगी वैसी की वैसी ही स्थिर थी. अकेले आए थे शहर में और 3 साल पहले उन की पत्नी उन्हें अकेला छोड़ गई थी. वह कैंसर की चपेट में आ गई थी. पत्नी की मृत्यु के पश्चात अकेले बड़े घर में रहना उन्हें बहुत खलता था. घर की मालकिन ही जब चली गई, तब क्या करते उस घर को रख कर.

18 साल से ऊपर बिताए थे उन्होंने उस घर में अपनी पत्नी के साथ.

सुखदुख के क्षण अकसर याद आते थे उन को. घर में किसी चीज की कभी कोई कमी नहीं रही, पर उस घर ने कभी किसी बच्चे की किलकारी नहीं सुनी. इस का पतिपत्नी को काफी दुख रहा. अपनी संतान को सीने से लगाने में जो आनंद आता है, उस आनंद से सदा ही दोनों वंचित रहे.

पत्नी के देहांत के बाद 1 साल तक तो प्रोफेसर गौतम उस घर में ही रहे. पर उस के बाद उन्होंने घर बेच दिया और साथ में ही कुछ गैरजरूरी सामान भी. आनेजाने की सुविधा का खयाल कर उन्होंने अपना फ्लैट विभाग के पास ही खरीद लिया. अब तो उन के जीवन में विभाग का काम और शोध ही रह गया था. भारत में भाईबहन थे, पर वे अपनी समस्याओं में ही इतने उलझे हुए थे कि उन के बारे में सोचने की किस को फुरसत थी. हां, बहनें रक्षाबंधन और भैयादूज का टीका जब भेजती थीं तो एक पृष्ठ का पत्र लिख देती थीं.

प्रोफेसर गौतम ने रवि के आने के उपलक्ष्य में सोचा कि उसे भारतीय खाना बना कर खिलाया जाए. वे खुद तो दोपहर और शाम का खाना विश्वविद्यालय की कैंटीन में ही खा लेते थे.

शनिवार को प्रोफेसर भारतीय गल्ले की दुकान से कुछ मसाले और सब्जियां ले कर आए. पत्नी की बीमारी के समय तो वे अकसर खाना बनाया करते थे, पर अब उन का मन ही नहीं करता था अपने लिए कुछ भी झंझट करने को. बस, जिए जा रहे थे, केवल इसलिए कि जीवनज्योति अभी बुझी नहीं थी. उन्होंने एक तरकारी और दाल बनाई थी. कुलचे भी खरीदे थे. उन्हें तो बस, गरम ही करना था. चावल तो सोचा कि रवि के आने पर ही बनाएंगे.

रवि ने जब उन के फ्लैट की घंटी बजाई तो 12 बज कर कुछ सेकंड ही हुए थे. प्रोफेसर गौतम को बड़ा अच्छा लगा, यह सोच कर कि रवि समय का कितना पाबंद है. रवि थोड़ा हिचकिचा रहा था.

प्रोफेसर गौतम ने कहा, ‘‘यह विभाग का मेरा दफ्तर नहीं, घर है. यहां तुम मेरे मेहमान हो, विद्यार्थी नहीं. इस को अपना ही घर समझो.’’

रवि अपनी तरफ से कितनी भी कोशिश करता, पर गुरु और शिष्य का रिश्ता कैसे बदल सकता था. वह प्रोफेसर के साथ रसोई में आ गया. प्रोफेसर ने चावल बनने के लिए रख दिए.

‘‘आप इस फ्लैट में अकेले रहते हैं?’’ रवि ने पूछा.

‘‘हां, मेरी पत्नी का कुछ वर्ष पहले देहांत हो गया,’’ उन्होंने धीमे से कहा.

रवि रसोई में खाने की मेज के साथ रखी कुरसी पर बैठ गया. दोनों ही चुप थे. प्रोफेसर गौतम ने पूछा, ‘‘जब तक चावल तैयार होंगे, तब तक कुछ पिओगे? क्या लोगे?’’

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं लूंगा. हां, अगर हो तो कोई जूस दे दीजिएगा.’’

आगे पढ़ें- रवि अपना बैग उठा लाया. उस ने…

तलाश- भाग 1 : ज्योतिषी ने कैसे किया अंकित को अनु से दूर?

पहली नजर में वह मुझे कोई खास आकर्षक नहीं लगी थी. एक तरह से इतने दिनों का इंतजार खत्म हुआ था.

2 महीने से हमारे ऊपर वाला फ्लैट खाली पड़ा था. उस में किराए पर रहने के लिए नया परिवार आ रहा है, इस की खबर हमें काफी पहले मिल चुकी थी. उस परिवार में एक लड़की भी है, यह जान कर मुझे बड़ी खुशी हुई थी, पर जब देखा तो उस में कोई विशेष रुचि नहीं जागी थी मेरी.

उन्हें रहते हुए 1 महीना हो गया था, पर मेरी उस से कभी कोई बात नहीं हुई थी, न ही मैं ने कभी ऐसी कोशिश की थी.

एक दिन अप्रत्याशित रूप से उस से बातचीत करने का मौका मिला था. मेरे एक दोस्त की शादी में वे लोग भी आमंत्रित थे. उस ने गुलाबी रंग का सलवारकुरता पहन रखा था. माथे पर साधारण सी बिंदी थी और बाल कंधों पर झूल रहे थे. चेहरे पर कोई खास मेकअप नहीं था. न जाने क्यों उस का नाम जानने की इच्छा हुई तो मैं ने पूछा, ‘‘मैं आप के नीचे वाले फ्लैट में रहता हूं. क्या आप का नाम जान सकता हूं?’’

‘‘अनु. और आप का?’’ उस ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘अंकित,’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘अंकित? मेरे चाचा के लड़के का भी यही नाम है, मुझे बहुत पसंद है यह नाम,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

उस के खुले व्यवहार को देख कर उस से बातें करने की इच्छा हुई, पर तभी उस की सहेलियों का बुलावा आ गया और वह दूसरी ओर चली गई.

पहली मुलाकात के बाद ऐसा नहीं लगा कि मैं उसे पसंद कर सकता हूं.

दूसरे दिन जब मैं दफ्तर जाने के लिए घर से बाहर आया तो देखा कि वह सीढि़यां उतर रही है. वह मुसकराई, ‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो,’’ मैं ने भी उस के अभिवादन का संक्षिप्त सा उत्तर दिया. बस, इस से अधिक कोई बात नहीं हुई थी.

इस के बाद बहुत दिनों तक हमारा आमनासामना ही नहीं हुआ. इस बीच मैं ने उस के बारे में सोचा भी नहीं. मैं सुबह 9 बजे ही दफ्तर चला जाता और शाम को 7 बजे तक घर आता था.

एक ही इमारत में रहने के कारण धीरेधीरे मेरे और उस के परिवार वालों का एकदूसरे के यहां आनाजाना शुरू हो गया. खानेपीने की चीजों का आदानप्रदान भी होने लगा, पर मैं ने किसी बहाने से कभी भी उस के घर जाने की कोशिश नहीं की थी.

एक दिन मां को तेज बुखार था. पिताजी दौरे पर गए हुए थे. मेरे दफ्तर में एक जरूरी मीटिंग थी इसलिए छुट्टी लेना असंभव था. मैं परेशान हो गया कि क्या करूं, मां को किस के हवाले छोड़ कर जाऊं? तभी मुझे अनु की मां का ध्यान आया. शायद वे मेरी कुछ मदद कर सकें. यह सोच कर मैं उन के घर पहुंचा.

दरवाजा अनु ने ही खोला. वह शायद कालेज के लिए निकलने ही वाली थी. उस के चेहरे पर खुशी व आश्चर्य के भाव दिखाई दिए, ‘‘आप, आइएआइए. आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया है? बैठिए न.’’

‘‘नहीं, अभी बैठूंगा नहीं, जल्दी में हूं, चाचीजी कहां हैं?’’

‘‘मां? वे तो दफ्तर चली गईं.’’

‘‘ओह, तो वे नौकरी करती हैं?’’

‘‘हां, आप को कुछ काम था?’’

‘‘असल में मां को तेज बुखार है और मैं छुट्टी ले नहीं सकता क्योंकि आज मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है. मैं सोच रहा था कि अगर चाचीजी होतीं तो मैं उन से थोड़ी देर मां के पास बैठने के लिए निवेदन करता, फिर मैं दफ्तर से जल्दी आता. खैर, मैं चलता हूं.’’

अनु कुछ सोच कर बोली, ‘‘ऐसा है तो मैं बैठती हूं चाचीजी के पास, आप दफ्तर चले जाइए.’’

‘‘पर, आप को तो कालेज जाना होगा?’’

‘‘कोई बात नहीं, एक दिन नहीं जाऊंगी तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘आप निश्चिंत हो कर जाइए. मैं 2 मिनट में ताला लगा कर आती हूं.’’

मैं आश्वस्त हो कर दफ्तर चला गया. 3 बजे मैं घर आ गया. अनु मां के पास बैठी एक पत्रिका में डूबी हुई थी. मां उस समय सो रही थीं.

‘‘मां कैसी हैं अब?’’ मैं ने धीरे से पूछा.

‘‘ठीक हैं, बुखार नहीं है, उन से पूछ कर मैं ने दवा दे दी थी.’’

‘‘मैं आप का शुक्रिया किन शब्दों में अदा करूं,’’ मैं ने औपचारिकता निभाते हुए कहा.

‘‘अब वे शब्द भी मैं ही आप को बताऊं?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘देखिए, मुझे कोई फिल्मी संवाद सुनाने की जरूरत नहीं है. कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया है मैं ने,’’ कह कर वह खड़ी हो गई.

लेकिन मैं ने उसे जबरदस्ती बैठा दिया, ‘‘नहीं, ऐसे नहीं, चाय पी कर जाइएगा.’’

मैं चाय बनाने रसोई में चला गया. तब तक मां भी जाग गई थीं. हम तीनों ने एकसाथ चाय पी.

उस दिन अनु मुझे बहुत अच्छी लगी थी. अनु के जाने के बाद मैं देर तक उसी के बारे में सोचता रहा.

हमारा आनाजाना अब बढ़ गया था. वह भी कभीकभी आती. मैं भी उस के घर जाने लगा था.

फिर यह कभीकभी का आनाजाना रोज में तबदील होने लगा. जिस दिन वह नहीं मिलती थी, कुछ अधूरा सा लगता था.

धीरेधीरे मेरे मन में अनु के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था. क्या मैं वास्तव में उसे चाहने लगा था? इस का निश्चय मैं स्वयं नहीं कर पा रहा था. उस का आना, उसे देखना, उस से बातें करना आदि अच्छा लगता था. पर एक बात जो मेरे मन में शुरू से ही बैठ गई थी कि वह बहुत सुंदर नहीं है, हमेशा मेरा निश्चय डगमगा देती.

अपनी कल्पना में शादी के लिए जैसी लड़की मैं ने सोच रखी थी, वह बहुत ही सुंदर होनी चाहिए थी. लंबा कद, दुबलीपतली, गोरी, तीखे नैननक्श. मेरे खींचे गए काल्पनिक खाके में अनु फिट नहीं बैठती थी. केवल यही बात उस से मुझे कुछ भी कहने से रोक लेती थी.

अनु ने भी कभी कुछ नहीं कहा मुझ से पर उसे भी मेरी मौजूदगी पसंद थी, इस का एहसास मुझे कभीकभी होता था. पर मैं ने कभी आजमाना नहीं चाहा. मैं स्वयं ही इस संबंध में कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था और न ही मैं कुछ कह पाया था.

एक दिन अनु पिकनिक से लौट कर मुझे वहां के किस्से सुनाने लगी. बातों ही बातों में उस ने बताया, ‘‘आज हम लोग पिकनिक पर गए थे. वहां एक ज्योतिषी बाबा थे. सब लड़कियां उन्हें हाथ दिखा रही थीं. मैं ने भी अपना हाथ दिखा दिया. वैसे मुझे इन बातों पर कोई विश्वास नहीं है, फिर भी न जाने क्यों दिखा ही दिया. जानते हैं उस ने क्या कहा?’’

‘‘क्या?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

आगे पढ़ें- बचपन से ही दादादादी, मां और…

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें