सपनों की राख तले : भाग 3

उन्हीं कुछ दिनों में निवेदिता ने अपने शरीर में कुछ आकस्मिक परिवर्तन महसूस किए थे. तबीयत गिरीगिरी सी रहती, जी मिचलाता रहता तो वह खुद ही चली गई थी डा. डिसूजा के क्लिनिक पर. शुरुआती जांच के बाद डा. डिसूजा ने गर्भवती होने का शक जाहिर किया था, ‘तुम्हें कुछ टैस्ट करवाने पड़ेंगे.’

एक घंटा भी नहीं बीता था कि तेज घर लौट आए थे. शायद डा. डिसूजा से उन की बात हो चुकी थी. बच्चों की तरह पत्नी को अंक में भर कर रोने लगे.

‘इतनी खुशी की बात तुम ने मुझ से क्यों छिपाई? अकेली क्यों गई? मैं ले चलता तुम्हें.’

आंख की कोर से टपटप आंसू टपक पड़े. खुद पर ग्लानि होने लगी थी. कितना छोटा मन है उन का…ऐसी छोटीछोटी बातें भी चुभ जाती हैं.

अगले दिन तेज ने डा. कुलकर्णी से समय लिया और लंच में आने का वादा कर के चले गए. 10 सालों तक हास्टल में रहने वाली निवेदिता जैसी लड़की के लिए अकेले डा. कुलकर्णी के क्लिनिक तक जाना मुश्किल काम नहीं था. डा. डिसूजा के क्लिनिक पर भी वह अकेली ही तो गई थी. पर कभीकभी अपना वजूद मिटा कर पुरुष की मजबूत बांहों के घेरे में सिमटना, हर औरत को बेहद अच्छा लगता है. इसीलिए बेसब्री से वह तेज का इंतजार करने लगी थी.

दोपहर के 1 बजे जूते की नोक से द्वार के पट खुले तो वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई थी. तेज बुरी तरह बौखलाए हुए थे. शायद थके होंगे यह सोच कर निवेदिता दौड़ कर चाय बना लाई थी.

‘पूरा दिन गंवारों की तरह चाय ही पीता रहूं?’ तेज ने आंखें तरेरीं तो साड़ी बदल कर, वह गाउन में आ गई और घबरा कर पूछ लिया, ‘आजकल काम ज्यादा है क्या?’

‘मैं आलसी नहीं, जो हमेशा पलंग पर पड़ा रहूं. काम करना और पैसे कमाना मुझे अच्छा लगता है.’

अपरोक्ष रूप से उस पर ही वार किया जा रहा है. यह वह समझ गई थी. सारा आक्रोश, सारी झल्लाहट लिए निवेदिता अंदर ही अंदर घुटती रही थी. उस ने कई किताबों में पढ़ा था कि गर्भवती महिला को हमेशा खुश रहना चाहिए. इसीलिए पति के स्वर में छिपे व्यंग्य को सुन कर भी मूड खराब करने के बजाय चेहरे पर मुसकान फैला कर बोली, ‘एक बार ब्लड प्रैशर चेक क्यों नहीं करवा लेते? बेवजह ही चिड़चिड़ाते रहते हो.’

 

इतना सुनते ही तेजेश्वर ने घर के हर साजोसामान के साथ कई जरूरत के कागज भी यत्रतत्रसर्वत्र फैला दिए थे. निवेदिता आज तक इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाई कि क्या पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास पर नहीं टिका होना चाहिए. वह जहां जाती तेजेश्वर के साथ जाती, वह जैसा चाहते वैसा ही पहनती, ओढ़ती, पकाती, खाती. जहां कहते वहीं घूमने जाती. फिर भी वर्जनाओं की तलवार हमेशा क्यों उस के सिर पर लटकती रहती थी?

अंकुश के कड़े चाबुक से हर समय पत्नी को साध कर रखते समय तेजेश्वर के मन में यह विचार क्यों नहीं आया कि जो पति अपनी पत्नी को हेय दृष्टि से देखता है उस औरत के प्रति बेचारगी का भाव जतला कर कई पुरुष गिद्धों की तरह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगते हैं. इस में दोष औरत का नहीं, पुरुष का ही होता है.

यही तो हुआ था उस दिन भी. श्वेता के जन्मदिन की पार्टी पर वह अपने कालिज की सहपाठी दिव्या और उस के पति मधुकर के साथ चुटकुलों का आनंद ले रही थी. मां और पापा भी वहीं बैठे थे. पार्टी का समापन होते ही तेज अपने असली रूप में आ गए थे. घबराहट से उन का पूरा शरीर पसीनेपसीने हो गया. लोग उन के गुस्से को शांत करने का भरसक प्रयास कर रहे थे पर तेजेश्वर अपना आपा ही खो चुके थे. एक बरस की नन्ही श्वेता को जमीन पर पटकने ही वाले थे कि पापा ने श्वेता को तेज के चंगुल से छुड़ा कर अपनी गोद में ले लिया था.

‘मुझे तो लगता है कि तेज मानसिक रोगी है,’ पापा ने मां की ओर देख कर कहा था.

‘यह क्या कह रहे हैं आप?’ अनुभवी मां ने बात को संभालने का प्रयास किया था.

‘यदि यह मानसिक रोगी नहीं तो फिर कोई नशा करता है क्योंकि कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा अभद्र व्यवहार कभी नहीं कर सकता.’

उस दिन सब के सामने खुद को तेजेश्वर ने बेहद बौना महसूस किया था. घुटन और अवहेलना के दौर से बारबार गुजरने के बाद भी तेज के व्यवहार की चर्चा निवेदिता ने कभी किसी से नहीं की थी. कैसे कहती? रस्मोरिवाज के सारे बंधन तोड़ कर उस ने खुद ही तो तेजेश्वर के साथ प्रेमविवाह किया था पर उस दिन तो मम्मी और पापा दोनों ने स्वयं अपनी आंखों से देखा, कानों से सुना था.

पापा ने साथ चलने के लिए कहा तो वह चुपचाप उन के साथ चली गई थी. सोचती थी, अकेलापन महसूस होगा तो खुद ही तेज आ कर लिवा ले जाएंगे पर ऐसा मौका कहां आया था. उस के कान पैरों की पदचाप और दरवाजे की खटखट सुनने को तरसते ही रह गए थे.

श्वेता, पा…पा…कहना सीख गई थी. हुलस कर निवेदिता ने बेटी को अपने आंचल में छिपा लिया था. दुलारते- पुचकारते समय खुशी का आवेग उस की नसों में बहने लगा और अजीब तरह का उत्साह मन में हिलोरें भरने लगा.

‘कब तक यों हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहेगी? अभी तो श्वेता छोटी है. उसे किसी भी बात की समझ नहीं है लेकिन धीरेधीरे जब बड़ी होगी तो हो सकता है कि मुझ से कई प्रकार के प्रश्न पूछे. कुछ ऐसे प्रश्न जिन का उत्तर देने में भी मुझे लज्जित होना पड़े.’

घर में बिना किसी से कुछ कहे वह तेज की मां के चौक वाले घर में पहुंच गई थी. पूरे सम्मान के साथ तेजेश्वर की मां ने निवेदिता को गले लगाया था बल्कि अपने घर आ कर रहने के लिए भी कहा था. लेकिन बातों ही बातों में इतना भी बता दिया था कि तेज कनाडा चला गया है और जाते समय यह कह गया है कि वह निवेदिता के साथ भविष्य में कोई संबंध नहीं रखना चाहता है.

निवेदिता ने संयत स्वर में इतना ही पूछा था, ‘मांजी, यह सब इतनी जल्दी हुआ कैसे?’

‘तेज के दफ्तर की एक सहकर्मी सूजी है. उसी ने स्पांसर किया है. हमेशा कहता था, मन उचट गया है. दूर जाना है…कहीं दूर.’

सारी भावनाएं, सारी संवेदनाएं ठूंठ बन कर रह गईं. औरत सिर्फ शारीरिक जरूरत नहीं है. उस के प्रेम में पड़ना, अभिशाप भी नहीं है, क्योंकि वह एक आत्मीय उपस्थिति है. एक ऐसी जरूरत है जिस से व्यक्ति को संबल मिलता है. हवा में खुशबू, स्पर्श में सनसनी, हंसी में खिलखिलाहट, बातों में गीतों सी सरगम, यह सबकुछ औरत के संपर्क में ही व्यक्ति को अनुभव होता है.

समय की झील पर जिंदगी की किश्ती प्यार की पाल के सहारे इतनी आसानी से गुजरती है कि गुजरने का एहसास ही नहीं होता. कितनी अजीब सी बात है कि तेज इस सच को ही नहीं पहचान पाए. शुरू से वह महत्त्वाकांक्षी थे पर उन की महत्त्वाकांक्षा उन्हें परिवार तक छोड़ने पर मजबूर कर देगी, ऐसा निवेदिता ने कभी सोचा भी नहीं था. कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची और पत्नी से दूर भागने के लिए उन्होंने महत्त्वाकांक्षा के मोहरे का इस्तेमाल किया था?

इनसान क्यों अपने परिवार को माला में पिरोता है? इसीलिए न कि व्यक्ति को सीधीसादी, सरल सी जिंदगी हासिल हो. निवेदिता ने विवेचन सा किया. लेकिन जब वक्त और रिश्तों के खिंचाव से अपनों को ही खुदगर्जी का लकवा मार जाए तो पूरी तरह प्रतिक्रियाविहीन हो कर ठंडे, जड़ संबंधों को कोई कब तक ढो सकता है?

मन में विचार कौंधा कि अब यह घर उसे छोड़ देना चाहिए. आखिर मांबाप पर कब तक आश्रित रहेगी. और अब तो भाई का भी विवाह होने वाला था. उस की और श्वेता की उपस्थिति ने भाई के सुखद संसार में ग्रहण लगा दिया तो? उसे क्या हक है किसी की खुशियां छीनने का?

अगले दिन निवेदिता देहरादून में थी. सोचा कि इस शहर में अकेली कैसे रह सकेगी? लेकिन फौरन ही मन ने निश्चय किया कि उसे अपनी बिटिया के लिए जीना होगा. तेज तो अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर विदेश जा बसे पर वह अपने दायित्वों से कैसे मुंह मोड़ सकती है?

श्वेता को सुरक्षित भविष्य प्रदान करने का दायित्व निवेदिता ने अपने कंधों पर ले तो लिया था पर वह कर क्या सकती थी? डिगरियां और सर्टि- फिकेट तो कब के तेज के क्रोध की आग पर होम हो चुके थे.

नौकरी ढूंढ़ने निकली तो एक ‘प्ले स्कूल’ में नौकरी मिल गई, साथ ही स्कूल की प्राध्यापिका ने रहने के लिए 2 कमरे का मकान दे कर उस की आवास की समस्या को भी सुलझा दिया, पर वेतन इतना था कि उस में घर का खर्चा चलाना ही मुश्किल था. श्वेता के सुखद भविष्य को बनाने का सपना वह कैसे संजोती?

मन ऊहापोह में उलझा रहता. क्या करे, कैसे करे? विवाह से पहले कुछ पत्रिकाओं में उस के लेख छपे थे. आज फिर से कागजकलम ले कर कुछ लिखने बैठी तो लिखती ही चली गई.

कुछ पत्रिकाओं में रचनाएं भेजीं तो स्वीकृत हो गईं. पारिश्रमिक मिला, शोहरत मिली, नाम मिला. लोग प्रशंसात्मक नजरों से उसे देखते. बधाई संदेश भेजते, तो अच्छा लगता था, फिर भी भीतर ही भीतर कितना कुछ दरकता, सिकुड़ता रहता. काश, तेज ने भी कभी उस के किसी प्रयास को सराहा होता.

निवेदिता की कई कहानियों पर फिल्में बनीं. घर शोहरत और पैसे से भर गया. श्वेता डाक्टर बन गई. सोचती, यदि तेज ने ऐसा अमानवीय व्यवहार न किया होता तो उस की प्रतिभा का ‘मैं’ तो बुझ ही गया होता. कदमकदम पर पत्नी की प्रतिभा को अपने अहं की कैंची से कतरने वाले तेजेश्वर यदि आज उसे इस मुकाम पर पहुंचा हुआ देखते तो शायद स्वयं को उपेक्षित और अपमानित महसूस करते. यह तो श्वेता का संबल और सहयोग उन्हें हमेशा मिलता रहा वरना इतना सरल भी तो नहीं था इस शिखर तक पहुंचना.

दरवाजे पर दस्तक हुई, ‘‘निवेदिता,’’ किसी ने अपनेपन से पुकारा तो अतीत की यादों से निकल कर निवेदिता बाहर आई और 22 बरस बाद भी तेजेश्वर का चेहरा पहचानने में जरा भी नहीं चूकी. तेज ने कुरसी खिसका कर उस की हथेली को छुआ तो वह शांत बिस्तर पर लेटी रही. तेज की हथेली का दबाव निवेदिता की थकान और शिथिलता को दूर कर रहा था. सम्मोहन डाल रहा था और वह पूरी तरह भारमुक्त हो कर सोना चाह रही थी.

‘‘बेटी के ब्याह पर पिता की मौजूदगी जरूरी होती है. श्वेता के विवाह की बात सुन कर इतनी दूर से चला आया हूं, निवि.’’

यह सुन कर मोम की तरह पिघल उठा था निवेदिता का तनमन. इसे औरत की कमजोरी कहें या मोहजाल में फंसने की आदत, बरसों तक पीड़ा और अवहेलना के लंबे दौर से गुजरने के बाद भी जब वह चिरपरिचित चेहरा आंखों के सामने आता है तो अपने पुराने पिंजरे में लौट जाने की इच्छा प्रबल हो उठती है. निवेदिता ने अपने से ही प्रश्न किया, ‘कल श्वेता ससुराल चली जाएगी तो इतने बड़े घर में वह अकेली कैसे रहेगी?’

‘‘सूजी निहायत ही गिरी हुई चरित्रहीन औरत निकली. वह न अच्छी पत्नी साबित हुई न अच्छी मां. उसे मुझ से ज्यादा दूसरे पुरुषों का संसर्ग पसंद था. मैं ने तलाक ले लिया है उस से. मेरा एक बेटा भी है, डेविड. अब हम सब साथ रहेंगे. तुम सुन रही हो न, निवि? तुम्हें मंजूर होगा न?’’

बंद आंखों में निवेदिता तेज की भावभंगिमा का अर्थ समझ रही थी.

बरसों पुराना वही समर्थन, लेकिन स्वार्थ की महक से सराबोर. निवेदिता की धारणा में अतीत के प्रेम की प्रासंगिकता आज तक थी, लेकिन तेज के व्यवहार ने तो पुराने संबंधों की जिल्द को ही चिंदीचिंदी कर दिया. वह तो समझ रही थी कि तेज अपनी गलती की आग में जल रहे होंगे. अपनी करनी पर दुखी होंगे. शायद पूछेंगे कि इतने बरस उन की गैरमौजूदगी में तुम ने कैसे काटे. कहांकहां भटकीं, किनकिन चौखटों की धूल चाटी. लेकिन इन बातों का महत्त्व तेजेश्वर क्या जानें? परिवार जब संकट के दौर से गुजर रहा हो, गृहकलह की आग में झुलस रहा हो, उस समय पति का नैतिक दायित्व दूना हो जाता है. लेकिन तेज ने ऐसे समय में अपने विवेक का संतुलन ही खो दिया था. अब भी उन का यह स्पर्श उसे सहेजने के लिए नहीं, बल्कि मांग और पूर्ति के लिए किया गया है.

पसीने से भीगी निवेदिता की हथेली धीरेधीरे तेज की मजबूत हथेली के शिकंजे से पीछे खिसकने लगी, निवेदिता के अंदर से यह आवाज उठी, ‘अगर सूजी अच्छी पत्नी और मां साबित न हो सकी तो तुम भी तो अच्छे पिता और पति न बन सके.  जो व्यक्ति किसी नारी की रक्षा में स्वयं की बलि न दे सके वह व्यक्ति पूज्य कहां और कैसे हो सकता है? 22 बरस की अवधि में पनपे अपरिचय और दूरियों ने तेज की सोच को क्या इतना संकुचित कर दिया है?’

जेहन में चुभता हुआ सोच का टुकड़ा अंतर्मन के सागर में फेंक कर निवेदिता निष्प्रयत्न उठ कर बैठ गई और बोली, ‘‘तेज, दूरियां कुछ और नहीं बल्कि भ्रामक स्थिति होती हैं. जब दूरियां जन्म लेती हैं तो इनसान कुछ बरसों तक इसी उम्मीद में जीता है कि शायद इन दूरियों में सिकुड़न पैदा हो और सबकुछ पहले जैसा हो जाए, पर जब ऐसा नहीं होता तो समझौता करने की आदत सी पड़ जाती है. ऐसा ही हुआ है मेरे साथ भी. घुटनों चलने से ले कर श्वेता को डाक्टर बनाने में मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ी. रुकावटें आईं पर हम दोनों मांबेटी एकदूसरे का संबल बने रहे. आज श्वेता के विवाह का अनुष्ठान भी अकेले ही संपूर्ण हो जाएगा.’’

 

एक बार निवेदिता की पलकें नम जरूर हुईं पर उन आंसुओं में एक तरह की मिठास थी. आंसुओं के परदे से झांक कर उन्होंने अपनी ओर बढ़ती श्वेता और होने वाले दामाद को भरपूर निगाहों से देखा. श्वेता मां के कानों के पास अपने होंठ ला कर बुदबुदाई, ‘जीवन के मार्ग इतने कृपण नहीं जो कोई राह ही न सुझा सकें. मां, जिस धरती पर तुम खड़ी हो वह अब भी स्थिर है.’

ऐक्ट्रैस का हौट लुक होना जरूरी है- भोजपुरी एक्ट्रेस सोना पांडेय

सुना है कि आप ने वीडियो अलबम के जरीए फिल्मों में भी ऐंट्री कर ली है?

जी, आप ने बिलकुल सही सुना है कि मैं ने भोजपुरी वीडियो अलबम में बुलंदियों को चूमने के बाद भोजपुरी फिल्मों में भी ऐंट्री मार ली है और कई नामचीन चेहरों के साथ काम करती हुई नजर आने वाली हूं, जिन में पवन सिंह और रवि किशन के साथ ‘मेरा भारत महान’, ‘तेरे इश्क में मरजावां’ और प्रमोद प्रेमी यादव के साथ ‘बंधन टूटे न’ प्रमुख फिल्में हैं.

क्या भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में आने के लिए आप को परेशानियों का सामना करना पड़ा?

मेरा शुरुआती कैरियर भी परेशानियों से भरा रहा. मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से हूं, जहां की लड़कियों को भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कैरियर बनाने के लिए ताने सुनने पड़ते हैं.

मुझे इस राह में कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लोग भी मिले, जिन से खुद को बचाते हुए मैं ने मेहनत कर के अपना मुकाम हासिल करने का फैसला किया.

आप भोजपुरी वीडियो अलबम में हौट, स्टाइलिस्ट और ग्लैमरस लुक में नजर आती रही हैं. क्या आप के परिवार वालों को हौट और बोल्ड लुक में देख कर बुरा नहीं लगता है?

ज्यादातर भोजपुरी गानों और फिल्मों में ऐक्ट्रैस का लुक हौट होना जरूरी होता है. ऐसे में एक आर्टिस्ट के तौर पर मेरे रोल को ले कर मम्मीपापा ने कभी भी एतराज नहीं किया. उस की महज यही वजह है कि मैं एक कलाकार के तौर पर यह सब करती हूं.

क्या आप यह मानती हैं कि लोकप्रियता का लाभ अकसर कैरियर को आगे बढ़ाने में कारगर रहता है?

जी बिलकुल. हर लोकप्रिय इनसान को उस की लोकप्रियता आगे बढ़ाने में मददगार साबित हुई है. ऐसा मेरे साथ भी हुआ है. मेरी लोकप्रियता का ही कमाल है कि मुझे लगातार बड़े ऐक्टरों के साथ वीडियो अलबम औफर होते रहे हैं, साथ ही मैं ने पहली फिल्म भी बड़े ऐक्टर और बड़े बजट के साथ की.

आप सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वाले लोगों को किस रूप में देखती हैं?

मेरा मानना है कि ट्रोलिंग का शिकार इनसान केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं होता है, बल्कि जिंदगी में कामयाबी की राह पर चलने वाले हर किसी को ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है.

मैं ट्रोलिंग को हर समय पौजिटिव रूप में देखती हूं. मैं अपने ट्रोलर्स से अपनी कमियां पूछना चाहती हूं कि उन्हें मेरा काम क्यों पसंद नहीं आया? मुझ में क्या कमियां हैं, जिन्हें सुधारने की जरूरत है. अगर सचमुच मुझे लगता है कि मुझ में सुधार की जरूरत है तो मैं उसे बेहतर करने की कोशिश करती हूं.

धोखाधड़ी: बिना डिगरी वाला हरियाणा का फर्जी आईजी विनय अग्रवाल 

लालच का भूत जब किसी आदमी पर सवार हो आता है, तो वह रातोंरात अमीर बनने का सपना पूरा करने के लिए बिना नतीजे की चिंता किए किसी भी हद तक चला जाता है, लेकिन कानून के शिकंजे में जब वह फंसता है, तो उस की सारी चालाकी धरी की धरी रह जाती है व उस के काले कारनामे सामने आ जाते हैं.

विनय अग्रवाल फर्जी आईजी बन गया, लेकिन उस के साथ जो 2 पुलिस वाले रहते थे, वे फर्जी नहीं थे. लालच का भूत उन पर भी सवार था. वे दोनों ही विनय अग्रवाल की पहचान आईजी के रूप में सभी से कराते थे व हरियाणा में पकड़े जाने का डर था, इसीलिए इन्होंने हिमाचल प्रदेश के जिला सोलन के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी को इस काम के लिए चुना और उद्योग से जुड़े लोगों को डराधमका कर मोटी रकम वसूलना शुरू कर दिया.

ये 2 पुलिस वाले रविंद्र (सोनीपत) व जसवीर (जगाधरी) यमुनानगर में तैनात हैं. ये दोनों ही वरदी में इस नकली आईजी के साथ रहते थे, ताकि किसी को भी फर्जी आईजी पर शक न हो व इस इरादे में वे कामयाब भी रहे. उन्होंने डराधमका कर के लोगों से करोड़ों रुपए की उगाही कर ली.

सोनीपत के बाशिंदे विनय अग्रवाल का सालाना टर्नओवर करोड़ों में है. इस ने तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए की गैरकानूनी वसूली यहां से की है. उत्तराखंड (हरिद्वार) में आरोपी की फार्मा यूनिट?है. विनय अग्रवाल व शिकायत करने वाले में कारोबार की डील होती थी. शिकायत करने वाला वहां कई उत्पाद बनाता था. जब उन दोनों में खटपट हुई, तो नौबत शिकायत की आ गई.पुलिस ने एसआईटी का गठन किया व कई बातों से परदा उठाया.

विनय के साथी सेठी को भी फिर हिरासत में ले कर लंबी पूछताछ हुई. सेठी ने ही विनय को कालाअंब (नाहन) में उद्योगपति (जगवीर) से मिलवाया था. जगवीर की कालाअंब में कई फार्मा यूनिट हैं.

सीआईडी ने पंचकूला, हरियाणा बद्दी व कालाअंब में भी दबिश दी है. एसआईटी ने आरोपी की जायदाद कहांकहां व कितनी है, तथ्यों को जुटा लिया है. फोन नंबर व काल डिटेल की भी पूरी जांच कर ली है.

यह धंधा कब से चल रहा था, इस में मुख्य सरगना कौन हैं, इस पर छानबीन चल रही है व हरियाणा के कुछ बड़े अफसर भी शक के दायरे में हैं कि हरियाणा पुलिस के  2 वरदीधारी आखिर किस के इशारों पर चल रहे थे.

पूरे तथ्य जुटा कर व लंबी जांच के बाद चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, वहां अभी जमानत नहीं मिली है. हिमाचल हाईकोर्ट से जमानत मिलने तक आरोपी पुलिस हिरासत में ही रहेंगे. दोनों पुलिस वालों को भी शिमला में पूछताछ के लिए बुलाया गया.

कितना ताज्जुब होता?है कि जब ऐसे लोग किसी लालच व दबाव में अनैतिक काम कर अपराध की दलदल में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें कानून की जरा भी फिक्र नहीं होती कि आखिर सच सामने आने पर उन का क्या हश्र होगा.

अगर हर इनसान पहले ही भयानक नतीजों व कठोर सजा पर गौर कर ले, तो शायद वह इस दलदल में उतरे ही न.

मुकेश विग

जीवनज्योति: क्या हुआ था ज्योति के साथ

story in hindi

सत्यकथा: तहसीलदार का खूनी इश्क

रुचि सिंह चौहान उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही थी. उस का हाल ही में बाराबंकी से लखनऊ तबादला हुआ था. 13 फरवरी, 2022 को उस की ड्यूटी थी, लेकिन वह अपने औफिस ड्यूटी पर नहीं पहुंची. इस के बाद उस की तलाश की गई, उस का कोई पता नहीं चला. उस का मोबाइल भी बंद आ रहा था. रुचि के साथ काम करने वाली उस की सहेली ने सोशल मीडिया पर फोटो सहित उस के लापता होने की पोस्ट डाली तो पूरे विभाग में हड़कंप मच गया.

जब किसी तरह से रुचि का पता नहीं लगा तो विभाग के अनुभाग अधिकारी एम.पी. सिंह ने सुशांत गोल्फ सिटी थाने में रुचि की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. पुलिस ने 3-4 दिनों तक उसे अपने स्तर से ढूंढा, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

उसी दौरान 17 फरवरी को पीजीआई थाना क्षेत्र के कल्ली माती स्थित नाले में एक युवती की लाश मिली है. पीजीआई थाने के प्रभारी धर्मपाल सिंह सूचना पर पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश को नाले से निकलवा कर निरीक्षण किया गया.

मृतका का चेहरा काफी बिगड़ गया था. कपड़ों से ही उस की पहचान हो सकती थी. परंतु जब मौके पर उस की शिनाख्त न हो सकी तो इंसपेक्टर सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

इसी बीच थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह सुशांत को गोल्फ सिटी में सिपाही रुचि सिंह की गुमशुदगी दर्ज होने की जानकारी मिली तो उन्होंने नाले से युवती की लाश बरामद करने की सूचना थाना गोल्फ सिटी को दे दी.

सूचना पा कर 19 फरवरी को रुचि के साथ काम करने वाली उस की सहेली थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह के साथ मोर्चरी चली गई. उस ने कपड़ों के आधार पर ही लाश की पहचान रुचि के रूप में कर ली. जिस के बाद रुचि सिंह के घर घटना की सूचना दे दी गई. रुचि मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद थाने के महावतपुर बिलौच की रहने वाली थी. रुचि के घर वालों द्वारा भी लाश की पहचान कर ली गई.

इस के बाद पुलिस ने पीजीआई थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर केस की जांच शुरू कर दी. रुचि का मोबाइल नंबर भी सर्विलांस पर लगा दिया गया.

काल डिटेल्स में 12 फरवरी को उस के फोन की आखिरी लोकेशन पीजीआई, लखनऊ के पास मिली. उसी दिन उस की जिस नंबर से अंतिम बार बात हुई थी, वह नंबर पता किया गया. वह नंबर पद्मेश श्रीवास्तव के नाम पर था, जोकि प्रतापगढ़ के रानीगंज में नायब तहसीलदार के पद पर तैनात था.

20 फरवरी की सुबह साढे़ 5 बजे लखनऊ पुलिस प्रतापगढ़ पहुंच गई. स्थानीय पुलिस को साथ ले कर लखनऊ पुलिस रानीगंज में कंपनी बाग के पास स्थित ट्रांजिट हौस्टल पहुंची. इसी हौस्टल में पद्मेश रहता था.

पुलिस ने दरवाजा खटखटाया तो कुछ पलों में ही पद्मेश ने दरवाजा खोल दिया. पुलिस ने पद्मेश को हिरासत में लेने के बाद पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. पूछताछ में रुचि की हत्या में 2 और नाम सामने आए. एक नाम पद्मेश की पत्नी प्रगति श्रीवास्तव और दूसरा उन दोनों के परिचित नामवर सिंह का था.

पद्मेश की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने नामवर सिंह को रानीगंज से और पद्मेश की पत्नी प्रगति को प्रयागराज स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया. तीनों को ले कर लखनऊ पुलिस वापस आ गई. यहां आ कर जब उन सभी से गहनता से पूछताछ की गई तो हत्या की पूरी वजह खुल कर सामने आ गई.

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद थाने के महावतपुर बिलौच में रहती थी 25 वर्षीय रुचि सिंह चौहान. उस के पिता का नाम योगेंद्र सिंह चौहान और माता का नाम रानी देवी था. पिता पेशे से किसान थे. रुचि का एक भाई था शुभम. वह अभी पढ़ रहा था.

रुचि शुरू से पढ़ाई में काफी तेज थी. उस ने नजीबाबाद के ही एक कालेज से इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की थी. उस के बाद उस ने पुलिस की भरती के लिए तैयारियां करनी शुरू कर दीं.

उस का सेलेक्शन भी हो गया. पुलिस ट्रेनिंग के दौरान उस की मुलाकात नीरज सिंह से हुई. वह भी कांस्टेबल की ट्रेनिंग कर रहा था.

नीरज सिंह बरेली जिले का रहने वाला था. रुचि बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस के तीखे नैननक्श उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे. जो उसे देखता, देखता ही रह जाता. नीरज भी उसे देख कर अपना दिल हार बैठा. उस की नजर ही रुचि पर से नहीं हटती थी.

नीरज ने उस की तरफ कदम बढ़ाए तो रुचि को भी इस का एहसास हो गया कि नीरज उसे चाहता है. नीरज भी गबरू जवान था. रुचि भी उस में रुचि लेने लगी. पहले दोनों में दोस्ती हुई, जब दोनों एकदूसरे को अच्छे से जानने लगे, चाहत की आग बढ़ी तो दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार कर बैठे.

जून, 2019 में रुचि ने नीरज से विवाह कर लिया. रुचि के घरवाले इस विवाह के सख्त खिलाफ थे, लेकिन रुचि नहीं मानी. इस पर रुचि के घरवालों ने उस से ज्यादा मतलब रखना बंद कर दिया.

विवाह के बाद जैसेजैसे समय आगे बढ़ता गया, दोनों के बीच और नजदीकियां आने के बजाय दूरियां आने लगीं. उन के बीच का प्यार कम होता गया. रोजरोज झगड़े होने लगे.

रुचि ने फेसबुक पर अपना एकाउंट बना रखा था. उस के जरिए वह परिचितों से तो जुड़ी ही थी, साथ ही साथ नए अंजान लोगों के संपर्क में भी आ गई थी. उन में से ही एक था पद्मेश श्रीवास्तव.

पद्मेश स्मार्ट तो था ही, उस की सब से बड़ी खूबी यह थी कि वह सरकारी नौकरी करता था. वह उस समय नायब तहसीलदार के पद पर कौशांबी में तैनात था. उस की पहली पोस्टिंग प्रतापगढ़ के कुंडा में थी. वह प्रयागराज का रहने वाला था. पद्मेश शादीशुदा था और उस की पत्नी प्रगति प्रयागराज में जौब करती थी. उन के 2 बच्चे थे.

फेसबुक के जरिए रुचि की मुलाकात पद्मेश से हुई. दोनों ने एकदूसरे को अपने बारे में बताया. उन के बीच हर रोज बातचीत होने लगी. मैसेंजर पर चैटिंग होने लगी. जिस की वजह से उन में गहरी दोस्ती हो गई. पद्मेश ने उसे यह नहीं बताया था कि वह विवाहित है.

रुचि तो उसे अविवाहित समझ कर उस के साथ जुड़ी थी. वह नीरज के बाद पद्मेश के साथ जिंदगी गुजारने के सपने देखने लगी थी.

वह समझती थी कि पद्मेश से अच्छा दूसरा उसे कोई जीवनसाथी नहीं मिलेगा. इसलिए उस ने नीरज से तलाक लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी. नीरज इस समय कौशांबी में जीआरपी में तैनात था.

समय के साथ दोनों ने अपने प्रेम का इजहार भी कर दिया. दोनों की मोबाइल पर बातें शुरू हो गईं. पहली मुलाकात दोनों की एक जमीन के मामले में हुई. उस के बाद उन के बीच मुलाकातों का सिलसिला चल निकला.

पद्मेश लखनऊ आता तो रुचि के साथ ही उस के किराए के मकान पर रुकता था. वह अकेली ही वहां रहती थी. रुचि भी रानीगंज जाती और पद्मेश के साथ उस के हौस्टल के कमरे में ही रुकती थी. सब अच्छा चलता देख कर रुचि पद्मेश पर जल्दी शादी कर लेने की बात करने लगी.

पद्मेश तो सिर्फ उस से संबंध बनाए रखना चाहता था. इसलिए उसे शादी करने का झूठा दिलासा देता रहता था. वह उस से कहता कि जल्द ही वह उस से शादी कर लेगा और लखनऊ में ही मकान बनवा कर उस के साथ रहेगा. यह सुन कर रुचि खुश हो जाती थी.

28 अगस्त, 2021 को रुचि का भाई शुभम उत्तर प्रदेश पुलिस में एसआई की परीक्षा देने लखनऊ आया तो वह अपनी बहन रुचि के मकान पर ही रुका. रुचि ने उसे भी बताया कि वह नीरज से तलाक ले रही है और तहसीलदार पद्मेश से शादी करने वाली है.

फोन पर शुभम की पत्नी शालिनी यानी अपनी भाभी को भी रुचि ने पद्मेश से शादी करने की बात बताई. वह शादी को ले कर बहुत खुश थी.

समय निकलता जा रहा था, लेकिन पद्मेश शादी की बात कहता जरूर था लेकिन करता कुछ नहीं था. इस पर रुचि पद्मेश पर जल्दी शादी करने का दबाव बनाने लगी.

उस के बारबार दबाव डालने से पद्मेश को एहसास हो गया कि रुचि अब ऐसे नहीं मानने वाली. अब वह उसे किसी तरह समझा कर बहलाफुसला नहीं सकता तो उस ने रुचि से अपने शादीशुदा होने की बात बता दी.

यह सुन कर रुचि हैरत में पड़ गई. इतना बड़ा झूठ पद्मेश ने उस से बोला, वह उसे ही सच मानती रही. उस झूठ को सच मान कर अपना तनमन उस पर लुटाती रही. लेकिन रुचि अब इतना आगे बढ़ चुकी थी कि वह वहां से पीछे नहीं लौट सकती थी. इसलिए वह पद्मेश के शादीशुदा होने के बाद भी उस से शादी करने को तैयार हो गई.

दूसरी ओर पद्मेश को उम्मीद थी कि उस के शादीशुदा होने की बात जान कर रुचि उस से शादी करने का इरादा छोड़ देगी, जिद नहीं करेगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

पद्मेश के लिए अब रुचि गले में फंसी हड्डी बन गई थी, न निगलते बन रहा था, न उगलते. वह उस से दूरी बनाने लगा. उस की काल आती तो वह उठाता नहीं था. अगर उठाता तो व्यस्त होने का बहाना बना कर काल काट देता.

एक दिन जब रुचि ने पद्मेश को फोन किया तो वह प्रयागराज में अपने घर पर था. मोबाइल की घंटी बजते देख कर पद्मेश की पत्नी ने काल रिसीव कर ली. इस के बाद दोनों में काफी नोकझोंक हुई.

प्रगति ने रुचि को हिदायत दी कि वह दोबारा काल न करे. अपने पति पद्मेश को भी रुचि से दूर रहने की हिदायत दी. बात न मानने पर देख लेने की धमकी दी. लेकिन रुचि कहां मानने वाली थी. वह पद्मेश से हर हाल में शादी करना चाहती थी.

रुचि की जिद से पद्मेश तो परेशान था ही, उस की पत्नी प्रगति को भी डर था कि कहीं रुचि अपने इरादों में न सफल हो जाए और उस की सौतन बन जाए. इसलिए रुचि को ठिकाने लगाने का फैसला उस ने पद्मेश के साथ बात कर के कर लिया.

नामवर सिंह लखनऊ के पीजीआई थाना क्षेत्र के कल्ली में रहता था. रानीगंज में उस की जमीन का कुछ मामला था. उसी संबंध में वह नायब तहसीलदार पद्मेश से मिलता रहता था. कई बार मुलाकात में एकदूसरे को जान गए थे.

प्रगति की तबियत कुछ ठीक नहीं रहती थी. पीजीआई में उसे दिखाने के लिए पद्मेश प्रगति को कार से ड्राइवर के साथ भेज देता था. वहां पीजीआई के पास रहने के कारण नामवर सिंह वहीं मिल जाता और प्रगति को आराम से डाक्टर को दिखवा देता था.

बारबार डाक्टर को दिखाने आने से प्रगति और नामवर सिंह की कई मुलाकातें हुईं तो उन मुलाकातों में दोनों एकदूसरे के करीब आ गए.

दूसरी ओर पद्मेश ने नामवर सिंह से कहा कि वह रुचि की हत्या करने में उस का साथ देगा तो वह उस की जमीन का दाखिल खारिज कर देगा. एक तो यह लालच और दूसरा प्रगति के कहने पर वह पद्मेश का साथ देने को तैयार हो गया.

12 फरवरी, 2022 को पद्मेश कार से पीजीआई के पास पहुंचा. नामवर सिंह उस के पास पहुंच गया. फिर योजनानुसार पद्मेश ने रुचि को फोन कर के पीजीआई आने को कहा.

रुचि कैब कर के अर्जुनगंज से पीजीआई के लिए निकल गई. वहां पहुंचने पर वह पद्मेश से मिलने के लिए उस की कार में बैठ गई. पहले तो पद्मेश और नामवर का इरादा रुचि का इलाज कराने के बहाने उसे जहरीला इंजेक्शन दे कर मार देने का था. हालांकि यह योजना सफल नहीं हुई.

फिर नींद की 10 गोलियां अनार के जूस मे मिला दीं. वह जूस रुचि को पीने को दे दिया. वह जूस पी कर रुचि को नींद आने लगी. इस के बाद पद्मेश और नामवर ने उस का पहले गला दबाया, फिर सिर पर प्रहार कर के उस की हत्या कर दी.

फिर नामवर ने रुचि की लाश को अपनी गाड़ी में शिफ्ट किया और कल्ली स्थित 5 फीट गहरे नाले में फेंक आया. इस के बाद प्रगति को रुचि की हत्या कर देने की बात बता दी. इस के बाद पद्मेश वापस लौट गया.

लेकिन उन के गुनाह की इबारत पुलिस से छिपी न रह सकी और तीनों पकड़े गए. कागजी खानापूर्ति करने के बाद पुलिस ने तीनों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित

6 मई को रिलीज होगी 3 अलग-अलग और जज्बाती कहानियों से सजी ‘क्लोजर’

डिज़्नी+हॉटस्टार पर जल्द ही तीन अलग-अलग और अनूठी कहानियों की डोर में बंधी एक लघु एंथोलॉजी को रिलीज़ की जाएगी. तीन मौलिक कहानियों से सजी इस फ़िल्म का नाम ‘क्लोज़र’ है.

इंसानी जज़्बातों और आपसी रिश्तों को गहराई से दर्शाती इस फ़िल्म में अभिषेक बैनर्जी, दितिप्रिया रॉय, नमित दास, भूपेंद्र जाडावत, विभा आनंद, रेणुका शहाणे, राजेश्वरी सचदेव और सैयद रज़ा जैसे मंजे हुए कलाकार अपने अभिनय का जलवा दिखाएंगे. इस फ़िल्म का निर्देशन ब्रिंदा मित्रा ने निर्देशित किया है, जबकि प्रमोद फ़िल्म्स के प्रतीक चक्रवर्ती और दीप फ़िल्म्स के मायनेक सेन ने साझा तौर पर इसका निर्माण किया है.

फ़िल्म की अलग-अलग कहानियों में आपसी रिश्तों के ताने-बाने को एक अलग अंदाज़ में पेश करने‌ की कोशिश की गई है. उल्लेखनीय है कि सभी कहानियों की थीम एक ही है – क्लोज़र जिसका हिंदी में अर्थ समापन या समाप्ति होता है. इन सभी कहानियों में ज़िंदगी के एक अध्याय को ख़त्म कर ज़िंदगी की नई शुरुआत करने की जद्दोजहद को प्रमुखता से दर्शाया गया है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Renuka Shahane (@renukash710)

*बल्लू ऐंड मोगली:*

इसमें बल्लू (अभिषेक बैनर्जी) और मोगली (दितिप्रीया रॉय) नामक भाई-बहन की कहानी को दर्शाया गया है. दोनों अपने जीवन में घटित हुए एक दुखद घटना से जूझने के अलावा ज़िंदगी से जुड़ी एक सच्चाई के उजागर होने से परेशान हो जाते हैं और दोनों को अपनी निजी ज़िंदगी की इन घटनाओं से मुक़ाबला करने की कोशिशों के दौरान कई तरह की मुश्क़िलों का सामना करना पड़ता है. जैसे-जैसे दोनों सच्चाई जानने के करीब पहुंचते हैं, दोनों को इस बात का एहसास होता है कि दोनों मिलकर ही इसका समाधान पा सकते है और आगे की ज़िंदगी सुकून के साथ जी सकते हैं.

*रीयूनियन* –

सालों पहले कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने के बाद एक दिन अभिनव श्रीवास्तव (भूपेंद्र जाडावत) उसी कॉलेज में पुरानों छात्रों से जुड़े एक ख़ास आयोजन में पहुंच जाते हैं. यहां उनकी मुलाक़ात अंगद सिंह (नमित दास) नामक शख़्स से हो जाती है. नमित की पहचान अब एक बड़े और बेस्ट सेलिंग लेखक के तौर पर होती है. पहली नज़र में दोनों की यह मुलाक़ात अचानक हुई मुलाक़ात सी महसूस होती है, मगर फिर जल्द ही दोनों के बीच कुछ पुरानी और अनकही बातों का सच सामने आने लगता है जो दोनों को हैरान कर देता है. अभिनव और अंगद की यह मुलाक़ात दोनों को एक अनपेक्षित राह पर ले जाती है.

*सनशावर* –

ईरा अय्यर (रेणुका शहाणे) अपने बेटे नील (सैयद रज़ा) के साथ रहती हैं. एक दिन ईरा अपनी ज़िंदगी से जुड़े एक राज़ को उजागर करने का फ़ैसला करती हैं. एक ऐसा राज़ जिसे उन्होंने सालों पहले दफ़्न कर दिया था. इस सिलसिले में वह जल्द ही निख़त (राजेश्वरी सचदेव) से मिलने का फ़ैसला करती है ताकि सालों पहले उनके साथ हुई घटना का उसे समापन प्राप्त हो सके और वह अपनी ज़िंदगी को एक नये सिरे से शुरु कर सकें..

यह लघु एंथोलॉजी डिज़्नी+हॉटस्टार पर 6 म‌ई, 2022 को रिलीज़ की जाएगी.

सरस सलिल भोजपुरी अवॉर्ड 2022: सोशल मीडिया पर जम कर मिली तारीफ

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में हुए तीसरे ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ की कामयाबी ने सब का दिल जीत लिया. हर तरफ इस अवार्ड शो के ही चर्चे रहे. क्या आम और क्या खास, सभी ने पारदर्शी तरीके से हुए इस अवार्ड शो की जम कर तारीफ की.

इस अवार्ड शो में जिन फिल्मों, टैक्निशियनों और ऐक्टरों को बैस्ट कैटेगरी के लिए चुना गया था, उन के नामों की घोषणा जब अवार्ड के स्टेज से की गई तो तालियों की गड़गड़ाहट यह बता रही थी कि जिन नामों का चयन इस बार जूरी द्वारा किया गया है, वे इस अवार्ड के लिए कितने हकदार थे.

हर तरफ अवार्ड की चर्चा

तीसरे ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में बैस्ट कैटेगरी से नवाजे गए लोगों को मिल रही बधाइयां इस बात की गवाह रही हैं कि यह अवार्ड लोगों का यकीन जीतने में कामयाब रहा.

भोजपुरी बैल्ट के लोगों को अपनी ऐक्टिंग का कायल बना चुके भोजपुरी सुपरस्टार अरविंद अकेला ‘कल्लू’ ने अपने फेसबुक पर लिखा, ‘कहा जाता है कि सब्र का फल मीठा होता है और पुरस्कार हमेशा कलाकार का मनोबल बढ़ाता है. अपने अभिनय जीवन के 11 साल गुजारने के बाद मुझे कल रात फिल्म ‘प्यार तो होना ही था’ के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ नायक 2021’ का अवार्ड मिला.

‘यह अवार्ड मैं अपने पिता के उस संघर्ष को समर्पित करता हूं, जिस के कारण आज मैं हूं. मेरे साथ मेरी फिल्म को 12 अवार्ड मिलने पर मेरी खुशी दोगुनी हो गई है. पूरी टीम को बधाई. हमारी मेहनत रंग लाई.

‘मैं उन तमाम निर्माताओं और निर्देशकों का आभारी हूं, जिन के कारण मेरी अभिनय यात्रा सतत चलती रही और आगे भी उन का प्यार और आशीर्वाद इसी तरह बना रहे.’

अरविंद अकेला ‘कल्लू’ के इस पोस्ट को फेसबुक पर तकरीबन 60,000 लोगों के ‘लाइक’ मिले, वहीं इंस्टाग्राम पर तकरीबन 16,000 ‘लाइक’ मिले.

‘बताशा चाचा’ के नाम से मशहूर ऐक्टर और कौमेडियन मनोज सिंह ‘टाइगर’ ने बाकायदा एक वीडियो जारी कर के कहा कि इस वीडियो को बनाने के पीछे का एक खास मकसद है. कुछ ऐक्सप्रैशंस देखे, कुछ वीडियो देखे. विनोद मिश्राजी का, ‘कल्लू’ का, सुनील मांझी और तमाम सारे कलाकारों को स्टेज पर बोलते हुए देखा.

‘सरस सलिल’ का जो अवार्ड फंक्शन, जो बस्ती में हुआ, बड़ी खुशी हुई कि यार, ये भी टैलेंटेड हैं. ‘कल्लू’ 11 साल से सिनेमा कर रहा है और यह बात मेरे दिमाग में ही नहीं आई कि

11 साल से उस बच्चे को अवार्ड ही नहीं दिया गया. एक ऐक्टर के तौर पर क्या उस ने कोई काम ही नहीं किया था कि उसे पुरस्कार मिले.

विनोद मिश्रा इतने उच्च कोटि के कलाकार हैं… इतने सालों में उन्हें कभी मंच पर बुलाया ही नहीं गया था अवार्ड के लिए. यह सोचने वाली बात है. ‘सरस सलिल’ ने ऐसे कलाकारों को बुला कर अवार्ड दिए इस से मुझे दिल से खुशी मिली है.

मनोज सिंह ‘टाइगर’ के इस वीडियो को फेसबुक पर तकरीबन 45,000 लोगों ने देखा और सराहा.

भोजपुरी फिल्म निर्माता, लाइन प्रोड्यूसर व ऐक्टर जनार्दन पांडेय उर्फ ‘बबलू पंडित’ ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि ‘सरस सलिल’ के मंच पर  ‘बैस्ट लाइन प्रोड्यूसर’ का अवार्ड मिलना 8 सालों की मेहनत का फल है. धन्यवाद देना है दिल्ली प्रैस परिवार व ‘सरस सलिल’ पत्रिका को, जिन्होंने मुझे इस लायक समझा.

एक फेमस फिल्म पत्रकार ने ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा कि मैं आमतौर पर किसी भी अवार्ड शो की आलोचना या जबरदस्ती की तारीफ नहीं करता, लेकिन सोशल मीडिया पर हर अवार्ड के बाद अवार्ड समीक्षकों की बाढ़ आ जाती है. हर अवार्ड विशेषज्ञ अपनेअपने ढंग से उसे विश्लेषित करता है.

खैर, यह उन की सोच है और सब की अपनीअपनी सोच होती है, मुझे उस से कोई आपत्ति नहीं. चाहे विनोद गुप्ताजी का अवार्ड हो, कुलदीप श्रीवास्तवजी का सबरंग हो, अभय सिन्हाजी का अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड हो, सरस सलिल अवार्ड हो, ग्रीन सिनेमा अवार्ड हो, पिछले साल से लखनऊ में हमारे पत्रकार बिरादरी के दुबेजी का अवार्ड हो या कोई और हो, इन सब में जो अच्छी बात मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छी लगती है वह है अवार्ड के बहाने भोजपुरी की चर्चा.

भोजपुरी फिल्म जगत की बात आते ही इन से जुड़े लोग (बाहरी नहीं) ऐसे मुंहनाक सिकोड़ देते हैं, जैसे कड़वी दवा खा ली हो. अश्लीलता, अश्लीलता और अश्लीलता… बस यही रचाबसा है उन के जेहन में.

खैर, अब सैंसर बोर्ड की रिपोर्ट देखें, तो साल 2021 में सब से कम ‘ए’ सर्टिफिकेट वाली फिल्में भोजपुरी की ही रही हैं. हमारा मुद्दा यहां अश्लीलता नहीं अवार्ड है. जब से अवार्ड की शुरुआत हुई है और आज तक जितने भी अवार्ड हुए हैं, उन में मात्र 6 स्टार्स की फिल्मों को ही सर्वाधिक अवार्ड मिले हैं और इन्हीं

6 को बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड मिला है. मतलब, तीसरे दौर की शुरुआत (2003) से ले कर अभी तक यानी 2022 तक मात्र 6 स्टार ही हुए हैं भोजपुरी में?

बस्ती में ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में अरविंद अकेला ‘कल्लू’ को बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड मिला यानी वे 7वें ऐसे ऐक्टर बन गए, जिन्हें इस अवार्ड से नवाजा गया है. 14 साल के अभिनय कैरियर, जिन में 11 साल से बतौर हीरो वे अभिनय कर रहे हैं, पहली बार उन को कोई अवार्ड मिला है यानी 14 साल तक वे आयोजकों की नजर में किसी अवार्ड के हकदार नहीं थे?

विनोद मिश्राजी कमाल के अभिनेता हैं, पर पहली बार उन्हें अवार्ड का हकदार समझा गया. सुशील सिंह के अभिनय की तारीफ हर कोई करता है, पर उन को अभी तक कितनी बार अवार्ड मिला है?

हर अवार्ड के आयोजन में लाखों खर्च होते हैं और टीवी चैनल के अलावा उन्हें मिलता क्या है? प्रायोजकों के नाम पर बहुत बड़ी राशि तो मिलती है नहीं, ऐसे में आयोजकों के फिल्मी मित्र की मदद अगर मिलती है तो बुराई क्या है? अगर खुद के खर्च पर आप लोगो को सम्मान दें तो भी आलोचना होगी ही, क्योंकि आज तक कोई ऐसा अवार्ड शो नहीं हुआ किसी भी फिल्म जगत में, जिस में सब संतुष्ट हुए हैं. जिन्हें मिलेगा उन के और उन के समर्थकों के लिए अच्छा और जिन्हें नहीं मिला उन के और उन के समर्थकों के लिए बुरा. एक वर्ग ऐसा भी है, जिन की नजरें सिर्फ कमियां देखती हैं.

खैर, हर अवार्ड के बाद 2-3 दिनों तक सोशल मीडिया पर भड़ास कार्यक्रम जारी रहता है. ‘सरस सलिल’ को ले कर भी ऐसा कलपरसों तक होगा. पर, मैं सराहना करूंगा ‘सरस सलिल’ टीम से जुड़े लोगों की, जिन्होंने एक अच्छा आयोजन किया. बोलने वालों का मुंह बंद करने और सोशल मीडिया पर अपनी ऊर्जा बरबाद करने से अच्छा है कि आयोजक अपने काम पर ही फोकस करें.

जानेमाने ऐक्टर संजय पांडेय ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि ‘सरस सलिल’ के अवार्ड शो में था कल, अच्छा लगा, बहुत कमियां भी थीं, बहुत खूबियां भी थीं. आसान होता है किसी व्यक्ति विशेष या आयोजन पर टिप्पणी करना, सिर्फ शब्द ही फेंकने हैं और एक लंबी बहस शुरू हो जाती है, उस में पैसा नहीं लगता, पर फिर भी अगर हम उन कमियों की ओर इशारा न करें तो बढ़ेंगी.

इस बात की तारीफ करूंगा कि ‘सरस सलिल’ में इस बार कुछ अवार्ड ऐसे थे, जो काबिलेतारीफ थे, जैसे इतनी फिल्में करने के बाद ‘कल्लूजी’ को अवार्ड देना. जो खुशी उन के चेहरे पर दिख रही थी, वह अद्भुत थी और वे हकदार थे…

और एक कलाकार, जिन का मैं बहुत बड़ा फैन हूं, वे हैं विनोद मिश्राजी. और विनोदजी ने जो मंच पर कहा, वह लाइन तो कमाल थी, हिल गया मैं सुन कर. आप से साझा कर रहा हूं… हमार श्रीमतीजी हम से हमेशा कहत रही कि एजी सब के अवार्ड मिलेला, आप के काहे नईखे मिलत… राउर कौनो जुगाड़ नईखे का ओईजा. ता देख ला हो आज हमरो जुगाड़ लाग गईल, ता ला हे वंदना मिश्रा तोरे पगला के भी आज अवार्ड मिल गईल. अरे सुन रही हो आज मुझे भी अवार्ड मिल गया.

आंखें भर आईं उन की ये बातें मंच पर सुन कर. आईना दिखा दिया उन्होंने. फिर भी अगर बात समझ में न आए तो अफसोस.

संजय पांडेय ने अंत में लिखा कि पोस्ट को विवादास्पद न बनाएं, दिल की बात कही है. आप का सहमत होना आवश्यक नहीं है.

उन्होंने अपने इस पोस्ट के साथ अवार्ड लेते हुए का कुछ सैकंड का एक वीडियो भी पोस्ट किया था जिसे फेसबुक पर तकरीबन 61,000 लोगों ने देखा.

अपराध: पंजाब में की हत्या, लाशें फेंकी सोलन में

कालका से शिमला की ओर कोही रेलवे सुरंग के पास चादर में लिपटी 2 लाशें पड़ी देख कर लोग इकट्ठा हुए, तो पता चला कि दोनों ही लाशें औरतों की थीं. फरवरी के पहले हफ्ते में हुए इस हत्याकांड ने सभी को चौंका दिया.

आसपास के इलाके के लोगों से पूछताछ हुई, तो सभी ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. मुंहनाक बंद कर उन की हत्या की गई?थी. लैब से जांच के बाद विशेष जांच टीम ने सीसीटीवी कैमरों को खंगालना शुरू किया व इन औरतों की पहचान के लिए सभी जगह फोटो भेज कर जांच को आगे बढ़ाया, तो मालूम हुआ कि ये लाशें ऊना व पंजाब के बठिंडा की औरतों की थीं. वे दोनों ही औरतें ब्यूटीपार्लर में काम करती थीं और साथ में ही रहती थीं.

पंचकूला व चंडीगढ़ के ब्यूटीपार्लर में गहन पूछताछ की गई. दूसरे राज्यों के सीसीटीवी कैमरों पर भी नजर रखी गई. वे दोनों औरतें पति से अलग रहती थीं. गीता, 31 साल, पत्नी जसवाल, बठिंडा (पंजाब) व निशा, 27 साल, पत्नी सनी, अंबऊना की रहने वाली थी. उन दोनों की काल डिटेल को भी चैक किया गया. परिजनों से पूछताछ पर पता चला कि वे दोनों पंचकूला व चंडीगढ़ के ब्यूटीपार्लर में काम करती थीं. उन की जानपहचान पंचकूला में हुई जो दोस्ती में बदल गई, तो दोनों ने जीरकपुर में कमरा लिया व वहीं रहने लगीं.

पुलिस ने भी हत्यारों को पकड़ने के लिए पूरा जोर लगा रखा था, ताकि इस शांत राज्य में अपराध की बुनियाद डालने व लोगों को डराने वालों को बेनकाब कर सजा दी जा सके.

शातिर मजे से घूम रहे थे, लेकिन पुलिस उन्हें ढूंढ़ रही थी. बारबार सीसीटीवी कैमरों पर गौर किया गया तो एक बाहरी नंबर प्लेट वाली कार हत्याकांड वाले दिन कालका की तरफ से हिमाचल प्रदेश में दाखिल हुई, तो कुछ समय बाद ही वापस लौट गई. इसी नंबर की जांच कर पूछताछ व सख्ती की गई. यहां आने की ठोस वजह न बता पाने पर उन्हें हिरासत में ले लिया गया तो काफी बड़ी कामयाबी हाथ लगी. आरोपियों को जुर्म कबूलने के सिवा कोई चारा न दिखा तो इस दोहरे हत्याकांड से भी पुलिस ने परदा उठा दिया.

जितेंद्र, 43 साल, खरड़ (मोहाली) व दिनेश, 32 साल, रोपड़ को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किए जाने पर कोर्ट ने उन्हें रिमांड पर भेजा. दोनों आरोपी पेशे से ड्राइवर हैं. कसौली कोर्ट से उन्हें रिमांड मिली है, क्योंकि जहां लाशें फेंकी गई थीं, वह इलाका कसौली के तहत ही आता है.

अभी तक हत्यारों ने ज्यादा नहीं बताया है, लेकिन दोनों ही औरतों गीता व निशा की हत्या को इन्होंने खरड़ के ही एक निजी फ्लैट में अंजाम दिया है, जहां दोनों हत्यारे जितेंद्र व दिनेश पेशे से चालक हैं. इन्हीं कडि़यों को जोड़ कर आगे की तफतीश जारी है.

कसौली मशहूर पर्यटक स्थल है व हिमाचल प्रदेश शांत राज्य है, लेकिन यहां ऐसे अपराधों का लगातार बढ़ते जाना गहरी चिंता की बात है. हत्यारों का इतनी दूर से यहां आ कर लाशों को फेंकना बड़ी साजिश का ही हिस्सा है, लेकिन उन की योजना फेल हो गई और वे आज पुलिस हिरासत में हैं.

सच व अपराध महक की तरह हैं. इन्हें लंबे समय तक झूठ व चालाकी के दम पर छिपाया या दबाया नहीं जा सकता. कानून में देर तो है, लेकिन अंधेर नहीं.

मुकेश विग      

आंगन का बिरवा- भाग 1: मीरा ने नेहा को क्या दी सलाह

पलकें मूंदे मैं आराम की मुद्रा में लेटी थी तभी सौम्या की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘मां, शलभजी आए हैं.’’

उस का यह शलभजी संबोधन मुझे चौंका गया. मैं भीतर तक हिल गई परंतु मैं ने अपने हृदय के भावों को चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया, सहज भाव से सौम्या की तरफ देख कर कहा, ‘‘ड्राइंगरूम में बिठाओ. अभी आ रही हूं.’’

उस के जाने के बाद मैं गहरी चिंता में डूब गई कि कहां चूक हुई मुझ से? यह ‘शलभ अंकल’ से शलभजी के बीच का अंतराल अपने भीतर कितना कुछ रहस्य समेटे हुए है. व्यग्र हो उठी मैं. सच में युवा बेटी की मां होना भी कितना बड़ा उत्तरदायित्व है. जरा सा ध्यान न दीजिए तो बीच चौराहे पर इज्जत नीलाम होते देर नहीं लगती. मुझे धैर्य से काम लेना होगा, शीघ्रता अच्छी नहीं.

प्रारंभ से ही मैं यह समझती आई हूं कि बच्चे अपनी मां की सुघड़ता और फूहड़ता का जीताजागता प्रमाण होते हैं. फिर मैं तो शुरू से ही इस विषय में बहुत सजग, सतर्क रही हूं. मैं ने संदीप और सौम्या के व्यक्तित्व की कमी को दूर कर बड़े सलीके से संवारा है, तभी तो सभी मुक्त कंठ से मेरे बच्चों को सराहते हैं, साथ में मुझे भी, परंतु फिर यह सौम्या…नहीं, इस में सौम्या का भी कोई दोष नहीं. उम्र ही ऐसी है उस की. नहीं, मैं अपने आंगन की सुंदर, सुकोमल बेल को एक बूढ़े, जर्जर, जीर्णशीर्ण दरख्त का सहारा ले, असमय मुरझाने नहीं दूंगी.

अब तक मैं अपने बच्चों के लिए जो करती आई हूं वह तो लगभग अपनी क्षमता और लगन के अनुसार सभी मांएं करती हैं. मेरी परख तो तब होगी जब मैं इस अग्निपरीक्षा में खरी उतरूंगी. मुझे इस कार्य में किसी का सहारा नहीं लेना है, न मायके का और न ससुराल का. मुंह से निकली बात पराई होते देर ही कितनी लगती है. हवा में उड़ती हैं ऐसी बातें. नहीं, किसी पर भरोसा नहीं करना है मुझे,  सिर्फ अपने स्तर पर लड़नी है यह लड़ाई.

बाहर के कमरे से सौम्या और शलभ की सम्मिलित हंसी की गूंज मुझे चौंका गई. मैं धीमे से उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ी.

‘‘नमस्ते, भाभीजी,’’ शलभ मुसकराए.

‘‘नमस्ते, नमस्ते,’’ मेरे चेहरे पर सहज मीठी मुसकान थी परंतु अंतर में ज्वालामुखी धधक रहा था.

‘‘कैसी तबीयत है आप की,’’ उन्होंने कहा.

‘‘अब ठीक हूं भाईसाहब. बस, आप लोगों की मेहरबानी से उठ खड़ी हुई हूं,’’ कह कर मैं ने सौम्या को कौफी बना लाने के लिए कहा.

‘‘मेहरबानी कैसी भाभीजी. आप जल्दी ठीक न होतीं तो अपने दोस्त को क्या मुंह दिखाता मैं?’’

मुझे वितृष्णा हो रही थी इस दोमुंहे सांप से. थोड़ी देर बाद मैं ने उन्हें विदा किया. मन की उदासी जब वातावरण को बोझिल बनाने लगी तब मैं उठ कर धीमे कदमों से बाहर बरामदे में आ बैठी. कुछ खराब स्वास्थ्य और कुछ इन का दूर होना मुझे बेचैन कर जाता था, विशेषकर शाम के समय. ऊपर  से इस नई चिंता ने तो मुझे जीतेजी अधमरा कर दिया था. मैं ने नहीं सोचा था कि इन के जाने के बाद मैं कई तरह की परेशानियों से घिर जाऊंगी.

उस समय तो सबकुछ सुचारु रूप से चल रहा था, जब इन के लिए अमेरिका के एक विश्वविद्यालय ने उन की कृषि से संबंधित विशेष शोध और विशेष योग्यताओं को देखते हुए, अपने यहां के छात्रों को लाभान्वित करने के लिए 1 साल हेतु आमंत्रित किया था. ये जाने के विषय में तत्काल निर्णय नहीं ले पाए थे. 1 साल का समय कुछ कम नहीं होता. फिर मैं और सौम्या  यहां अकेली पड़ जाएंगी, इस की चिंता भी इन्हें थी.

संदीप का अभियांत्रिकी में चौथा साल था. वह होस्टल में था. ससुराल और पीहर दोनों इतनी दूर थे कि हमेशा किसी की देखरेख संभव नहीं थी. तब मैं ने ही इन्हें पूरी तरह आश्वस्त कर जाने को प्रेरित किया था. ये चिंतित थे, ‘कैसे संभाल पाओगी तुम यह सब अकेले, इतने दिन?’

‘आप को मेरे ऊपर विश्वास नहीं है क्या?’ मैं बोली थी.

‘विश्वास तो पूरा है नेहा. मैं जानता हूं कि तुम घर के लिए पूरी तरह समर्पित पत्नी, मां और सफल शिक्षिका हो. कर्मठ हो, बुद्धिमान हो लेकिन फिर भी…’

‘सब हो जाएगा, इतना अच्छा अवसर आप हाथ से मत जाने दीजिए, बड़ी मुश्किल से मिलता है ऐसा स्वर्णिम अवसर. आप तो ऐसे डर रहे हैं जैसे मैं गांव से पहली बार शहर आई हूं,’ मैं ने हंसते हुए कहा था.

‘तुम जानती हो नेहा, तुम व बच्चे मेरी कमजोरी हो,’ ये भावुक हो उठे थे, ‘मेरे लिए 1 साल तुम सब के बिना काटना किसी सजा जैसा ही होगा.’

फिर इन्होंने मुझे अपने से चिपका लिया था. इन के सीने से लगी मैं भी 1 साल की दूरी की कल्पना से थोड़ी देर के लिए विचलित हो उठी थी, परंतु फिर बरबस अपने ऊपर काबू पा लिया था कि यदि मैं ही कमजोर पड़ गई तो ये जाने से साफ इनकार कर देंगे.

‘नहीं, नहीं, पति के उज्ज्वल भविष्य व नाम के लिए मुझे स्वयं को दृढ़ करना होगा,’ यह सोच मैं ने भर आई आंखों के आंसुओं को भीतर ही सोख लिया और मुसकराते हुए इन की तरफ देख कर कहा, ‘1 साल होता ही कितना है? चुटकियों में बीत जाएगा. फिर यह भी तो सोचिए कि यह 1 साल आप के भविष्य को एक नया आयाम देगा और फिर, कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है न?’

‘पर यह कीमत कुछ ज्यादा नहीं है?’ इन्होंने सीधे मेरी आंखों में झांकते हुए कहा था.

वैसे इन का विचलित होना स्वाभाविक ही था. जहां इन के मित्रगण विश्वविद्यालय के बाद का समय राजनीति और बैठकबाजी में बिताते थे, वहीं ये काम के बाद का अधिकांश समय घर में परिवार के साथ बिताते थे. जहां भी जाना होता, हम दोनों साथ ही जाते थे. आखिरकार सोचसमझ कर ये जाने की तैयारी में लग गए थे. सभी मित्रोंपरिचितों ने भी इन्हें आश्वस्त कर जाने को प्रेरित किया था.

इन के जाने के बाद मैं और सौम्या अकेली रह गई थीं. इन के जाने से घर में अजीब सा सूनापन घिर आया था. मैं अपने विद्यालय चली जाती और सौम्या अपने कालेज. सौम्या का इस साल बीए अंतिम वर्ष था. जब कभी उस की सहेलियां आतीं तो घर की उदासी उन की खिलखिलाहटों से कुछ देर को दूर हो जाती थी.

आगे पढ़ें- मेरी सहयोगी शिक्षिकाएं भी बहुधा…

लेखक- शशि श्रीवास्तव

अमिताभ बच्चन ने इस TV एक्ट्रेस के लिए भेजी बग्घी, जानें क्यों

बौलीवुड में अमिताभ बच्चन की गिनती महज एक महान अभिनेता के ही रूप में ही नहीं होती है, बल्कि वह दूसरे कलाकारों की प्रतिभा को पहचान कर उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करते रहते हैं. ऐसे ही महान अभिनेता अमिताभ बच्चन के कसीदें अभिनेत्री आकांक्षा सिंह पढ़ते नजर आ रही हैं, जिन्हें 29 अप्रैल को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘रनवे 34 में अमिताभ बच्चन के साथ अभिनय करने का अवसर मिला है.

अमिताभ बच्चन से मिलना एक इमोशनल पल

इस फिल्म में आकांक्षा सिंह की जोड़ी तो अजय देवगन के साथ है, मगर एक सीन में वह अमिताभ बच्चन के साथ भी खड़ी नजर आने वाली हैं. पर आकांक्षा सिंह, अमिताभ बच्चन की जो प्रशंसा कर रही हैं, उसकी वजह यह है कि अमिताभ बच्चन ने उनका पैर फ्रैक्चर होने पर उन्हे घर से लेेने लिए बग्घी भेजी थी. जब इस मसले पर हमने आकांक्षा सिंह से बात की,तो आकांक्षा ेसिंह ने पूरा वाक्या विस्तार से बताते हुए कहा-

‘‘जी हाॅ! मैं यह पूरा मसला बताना चाहूंगी.में फिल्म ‘‘रनवे 34’’ के लिए अमिताभ बच्चन सर के साथ शूटिंग कर रही थी.और मेरा पैर फैक्चर हो चुका था. पहले दिन जब मैं उनसे मिली,उस वक्त वह मुझसे काफी दूरी पर थे. मैने सहायक निर्देशक से कहा कि मुझे बच्चन सर से मिलना है, तो उनसे मिलवा लाओ. उसने कहा कि मैम, आप अभी यहां बैठ जाइए.आपका यह शाट हो जाएगा, उसके बाद मैं आपको बच्चन सर के पास मिलवाने ले जाउंगा. मेरे सीन का फिल्मांकन पूरा हुआ, तो मैं उस सहायक निर्देशक की तलाश करने लगी कि वह कहां है, मुझे तो बच्चन सर से मिलने जाना है. वह दिखायी नही दिया, तो मैने अपना वाॅकर लिया और वाॅकर के सहारे बच्चन सर से मिलने गयी.

amitabh-akansha-1

मैने बच्चन सर से कहा कि ,‘सर, मेरी हमेषा से दिली इच्छा थी कि आपके साथ मुझे काम करने का अवसर मिले, तो अब यह थोड़ा सा पूरा हुआ है. मैं इस फिल्म में अभिनय कर रही हॅूं, जिसमें आप हैं, मगर इस फिल्म में आपके साथ मेरा एक भी दृष्य नही है. मुझे आपके साथ एक पूरी फिल्म करनी है.’ तो वह हंसे और फिर उनकी निगाह मेरे पैर की तरफ गयी. तो उन्होने पूछा कि पैर में क्या हुआ? मैने बताया कि फिल्म की षूटिंग खत्म होने के बाद मैं घर जाने के लिए अपनी कार में बैठ रही थी, तभी पैर मुड़ गया और पैर फै्रक्चर हो गया.’

तीन सीट वाला स्कूटर लेकर आए अमिताभ

तब उन्होने मुझसे पूछा कि तब तो चलने में काफी तकलीफ होती होगी? कैसे चलती है? इस पर मैने कहा कि सर वाॅकर लेकर चलती हॅंू. तब बच्चन सर ने मुझसे कहा- ‘कल मैं आपके लिए बग्घी लेकर आउंगा.’ मुझे लगा कि वह मजाक कर रहे हैं. ंबच्चन सर, बग्घी लेकर आएंगे, यह बात मेरी समझ से परे थी.

दूसरे दिन वह सेट पर अपने तीन सीट वाले स्कूटर पर चलकर आए. उन्होने मुझसे मेरे घर का पता मांगा और वास्तव में दूसरे दिन बच्चन सर ने मेरे घर पर बग्घी भेजी. यह मेेरे लिए बहुत ही अद्भुत अनुभव था.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Aakanksha Singh (@aakankshasingh30)

अमिताभ के लिए लिखी कविता

पहली बार मैं उनके साथ किसी फिल्म का हिस्सा थी. दूसरी बात निजी स्तर मैं उन्हे इस तरह जान पा रही थी. मैं इसके लिए उनका धन्यवाद अदा करना चाहती थी. षूटिंग के आखिरी दिन मैने अपने हाथ से एक कविता लिखी और उनकी वैनिटी वैन में गयी. मैने उनसे कहा- ‘सर मुझे नही पता कि मैं आपका धन्यवाद किस तरह से अदा करुं. इसलिए मैने यह एक कविता आपके लिए लिखी है, इसे आप स्वीकार करें.’

उन्होंने मेरी कविता स्वीकार की और तभी उन्हे षाॅट देने के लिए बुला लिया गया. सेट पर जब मैं पहुॅची, तब तक वह मेरी कविता पढ़ चुके थे. उन्होने मुूझसे पूछा कि मैं कब से कविता लिख रही हॅूं. मैने उन्हे बताया कि सर, यह तो मेरा बचपन से षौक है. बच्चन सर ने कहा- ‘‘आप बहुत अच्छा लिख लेती हैं.’’ यह तो मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि और बड़ी बात थी.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Aakanksha Singh (@aakankshasingh30)

बच्चन सर ने भेजा लेटर…

बच्चन सर द्वारा मेरी तारीफ करना उपलब्धि ही है. उनके पिता श्री हरिवंष राय बच्चन जी बहुत बड़े व महान कवि थे. उनके बारे में जो कहा जाए, वह कम है.बच्चन सर भी ख्ुाद बहुत अच्छा लिखते रहते हैं. मैने उनकी लिखी हुई कई चीजें सोषल मीडिया पर पढ़ी हुई हैं.’ उस वक्त मैने बच्चन सर को धन्यवाद कह दिया. दूसरे दिन सुबह सुबह मेरे घर पर कूरियर पहुॅचा. यह बच्चन सर ने भेजा था. मन मंे सवाल उठा कि अब उन्होने क्या भेज दिया? मैने कूरियर से आया हुआ, वह लिफाफा खोला, तो उसमें बच्चन सर के हाथों से लिखा हुआ पत्र था.

उसमें लिखा हुआ था- ‘‘प्रषंसा के पत्र आते रहेंगे,पहले यह स्नेह भरा पत्र कीजिए स्वीकार.’’ यह उनके पत्र की आखिरी दो पंक्तियंा थी. तब मुझे याद आया कि मैने जो कविता लिखकर उन्हें दी थी, उसमें मैने अपनी इच्छा जाहिर की थी कि मैं कुछ ऐसा अभिनय करुं, कि आपके हाथ से लिखा हुआ प्रष्ंासा पत्र मुझे मिले. मेरी उन पंक्तियंांे को पढ़कर ही बच्चन सर ने मुझे यह पत्र भेजा था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें