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पश्चिम बंगाल में चलेगा ममता बनर्जी का जादू ?

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को जीतने में कुछ ज्यादा बेचैन ही नजर आ रही है और इसलिए उस के पिछलग्गू इस बात पर तो खुश होंगे कि उन की राह में रोड़ा बनी ममता बनर्जी की टांग एक भीड़ के कुचले जाने की वजह से क्रैक कर गई और बाकी चुनाव में उन्हें ह्वीलचेयर पर बैठ कर बोलना और जगहजगह जाना पड़ेगा.

यह घटना हुई इसलिए कि ममता बनर्जी अपने और अपने वोटरों के बीच फासला नहीं रखतीं. इस देश में वैसे तो छूतअछूत का दौर आज भी चलता है और जब तक दूसरे की जाति पता नहीं हुई उसे छूने का परहेज ही किया जाता है. जो जितना बड़ा हिंदू कट्टरपंथी होगा वह उतना ज्यादा छुआछात बरतेगा और कहीं गंदा न हो जाए वह भीड़ में ही नहीं जाएगा. जो मंत्री है उसे तो भरपूर सरकारी बंदोबस्त मिलता है और प्रधानमंत्री के आसपास तो सिर्फ कैमरे वाले ही फटक सकते हैं. गनीमत है कि ममता बनर्जी ऐसी नहीं हैं.

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चुनावों में इस तरह पैर टूटने से काफी नुकसान हो सकता है क्योंकि ममता बनर्जी अब उतनी जगह नहीं जा पाएंगी जितनी वे चाहती थीं. भाजपा की हो सकती है इस वजह से लौटरी भी खुल जाए. दूसरी तरह यह भी हो सकता है कि पश्चिम बंगाल की जनता कहे, अरे यह नेता तो अपनी है, अपनों के साथ घुलतीमिलती है, सेहत तक का खयाल नहीं रखती. ऐसा हुआ तो फायदा हो भी सकता है.

वैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी हारें या न हारें यह पक्का दिख रहा है कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का सफाया होगा ही. वे मुंह दिखाने लायक सीटें भी नहीं जीतेंगे. वैसे भी वे नहीं चाहते कि जो भाजपा को पसंद नहीं करते उन की वोटें कटें. वे चाहते हैं कि चाहे वे हार जाएं पर भाजपा सरकार न बना पाए.

ऐसा लग नहीं रहा कि भाजपा को बड़ी जीत मिलने वाली है क्योंकि अभी भी ममता बनर्जी का जादू चालू है. पिछले सभी चुनावों में जहां भी कद्दावर विपक्ष का नेता है, भारतीय जनता पार्टी जीत नहीं पाई. पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र इस बात का सुबूत हैं कि अब तक भाजपा कहीं भी कद्दावर नेता को हरा नहीं पाई है. दिल्ली के राज सिंहासन पर भी वह जीत इसीलिए रही है क्योंकि देश की जनता ढुलमुल नेताओं के साथ खुश नहीं है और नरेंद्र मोदीकी टक्कर का नेता कोई कहीं नहीं है. इस के बावजूद बहुत से राज्यों में लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को न के बराबर की जीत मिली है.

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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने क्या किया क्या नहीं यह अब सवाल ही नहीं रह गया है. ममता बनर्जी तो तब अच्छा रिपोर्टकार्ड दिखाएं जब सामने वाले के पास नारों, वादों के अलावा कोई रिपोर्टकार्ड हो. सामने वाले तो न अपनी डिगरी दिखाते हैं, न कोविड में जमा किए अरबों का हिसाब देने को तैयार हैं और न ही कोई उन से राम मंदिर के बनाने के लिए चंदों की लिस्ट मांगेगा. वे तो वैसे ही बातों के धनी हैं पर जनता समझती नहीं ऐसा भी नहीं. जहां चेहरा अच्छा होता है वहां पंजाब और दिल्ली के नगरनिकायों जैसे नतीजे आते हैं जहां भाजपा दूरदूर तक नजर नहीं आई थी.

क्या ‘जय श्रीराम’ के नारे से जनता की समस्याओं का हल किया जा सकता है ?

जब देश में महंगाई की डायन का साया चारों तरफ फैल रहा हो, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही हो, कानूनों की मनमानी के खिलाफ देश के कितने हिस्सों में जनता उबाल पर हो, राजपाट करने वाले या तो प्रवचन करने में लगे हैं या धर्म का डंका बजा कर राज्य सरकारों को गिराने में लगे हैं.

पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जय श्रीराम का नारा लगा रखा है और खरीदफरोख्त कर के अब पुडुचेरी की कांग्रेस सरकार गिरा दी. राज करने वालों को या तो पौराणिक धर्म को बचाने की चिंता है या फिर उस के सहारे अपनी गलतियों को छिपाने की.

देश की जनता की मूल परेशानियों के बारे में भाजपा की सोच गायब सी हो गई है. जितने मंत्री हैं, सांसद हैं, राज्य सरकारों के मुख्यमंत्री हैं अगर भारतीय जनता पार्टी के हैं तो राम मंदिर के लिए चंदा जुटाने में लगे हैं या जनता को बहकाने में कि इसी से उन का कल्याण होगा, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में पक्का. जो दूसरे दलों की सरकारें हैं वे सम झ नहीं पा रहीं कि वे जनता के हितों में काम करें या अपनी धोती में भाजपा की लगाई गई आग को बुझाने में.

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नुकसान जनता का है. जनता को जो मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा. हां 1940-45 की तरह बंगाल में आए अकाल की तरह देश की सड़कों पर भूखों की कतारें नहीं लग रहीं और गरीब और किसान भी जो कैमरों की लपेटों में आ रहे हैं, खातेपीते दिख रहे हैं, पर यह कमाल इस सरकार का नहीं, यह बिजली, पानी, कपड़ा, मकान की नई तकनीकों का है.

जो पैसा गांवों में दिख रहा है और शहरों की गरीब बस्तियों में दिख रहा है उस का बड़ा हिस्सा उन मजदूरों का है जो विदेशों में काम कर रहे हैं. 90 लाख तो खाड़ी के देशों में ही हैं. 80 लाख दूसरे देशों में हैं. लगभग सवा करोड़ भारतीय मजदूर 80,00,00,00,000 डौलर तो बैंकों के जरीए भारत में भेजते हैं. विदेशों में वे कोई ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने नहीं गए हैं. जो 90 लाख खाड़ी के देशों में हैं वे तो मुसलिम मालिकों के पास काम कर रहे हैं.

हमारे नेता इन मुसलिम मालिकों के यहां लगभग गुलामी कर के भेजे पैसे पर देश में 8,000-8,000 करोड़ के हवाईजहाज खरीदते हैं ताकि वे एक जगह से दूसरी जगह आराम से जा सकें. इस पैसे के बल पर राम मंदिर बन रहा है. इन मुसलिम मालिकों के बल पर कमाए पैसे से चारधाम की सड़कें बन रही हैं.

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देश में हिंदूमुसलिम कर रहे नेता आम जनता को भड़का और बहका रहे हैं कि धर्म की रक्षा ही सब से बड़ा काम है. ये वे ही लोग है जिन्हें सिखों में खालिस्तानी ही नजर आते हैं. ये नेता वे हैं जो विदेशी संबंधों के नाम पर किसी को भी जेल में ठूंस देते हैं. पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी हो या मध्य प्रदेश अगर भाजपा सरकारों को गिराने में लगी है न कि विदेशों से आए मजदूरों के पैसे का सही इस्तेमाल करने में तो यह जमींदारी से भी बदतर काम होगा. रातदिन खट कर हमारे मजदूर देश में भी और विदेश में भी जो कमाते हैं वह उन के सुखों के लिए है, भगवानों की मूर्तियों के लिए नहीं.

यह ठीक है कि धर्म के दुकानदारों के जबरदस्त प्रचार की वजह से हर देशवासी आज धर्म को काम से ज्यादा इंर्पोटैंस देने लगा है पर यह अपने लिए खुद गड्ढा खोदना है. किसी न किसी दिन चारों ओर फेंकी गई मिट्टी ढहेगी ही और खोदने वाले दबे पाए जाएंगे.

क्या जाति के आधार पर सेलेक्शन करते हैं शिक्षा संस्थान?

सरकार हर तरह के हथकंडे अपना रही है कि जन्म से पैदा हुए नीच दलित शैड्यूल कास्टों और शैड्यूल ट्राइबों को न पढ़ने को मिले, न नौकरियां मिलें और न उन की जिंदगी सुधरे. उन्हें पढ़ने को स्कूल न मिलें इसलिए हर राज्य ही नहीं, जिले के भी शिक्षा अधिकारी ज्यादातर सरकारी स्कूलों को उन इलाकों में खोलते हैं जहां उन से ऊंची जाति शूद्र जिन्हें हम पिछड़े या ओबीसी कहते हैं, ज्यादा गिनती में हों. दिल्ली की इंडियन इंस्टीट्यूट टैक्नोलौजी की एक रिसर्च टीम ने यह पाया है.

वैसे तो पिछले 6 सालों से ये बातें ही बंद हो गई हैं और आईआईटी हो या शिक्षा मंत्रालय, वहां बैठे लोग, जो ऊंची जातियों के ही हैं, किसी तरह के तथ्य ही नहीं जमा करने देते. पढ़ाई के बारे में तो वे बहुत ही सतर्क हैं क्योंकि जानते हैं कि अगर शूद्र और दलित जान गए कि उन को लगातार मूर्ख बनाया जा रहा है तो शायद विद्रोह कर जाएं.

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पढ़ाई का मौका न देना दलितों को पुश्तैनी कामों में धकेलने का सब से आसान तरीका है जहां कम पैसे में मेहनत का काम लिया जा सकता है. लड़कों से खेतोंकारखानों में काम कराया जाता है और लड़कियों को या तो बच्चे पैदा करने की मशीन बना लिया  जाता है या फिर दूसरों के घरों में काम के लिए भेज दिया जाता है. यहां वेतन सुविधाएं भी कम मिलती हैं और किसी तरह ऊंची जगह पहुंचने के मौके भी कम. ऊंची जातियां इसीलिए स्कूलों की जगह मंदिर बनवाने पर जोर देती हैं ताकि ऊंचे लोगों को मिलबैठ कर साजिश करने की तो जगह मिल जाए पर झोंपडि़यों में रहने वाले अपने खाने के इंतजाम में लगे रहें.

जो सरकारी स्कूल दलितों के इलाकों में खुल भी जाते हैं उन का हाल बुरा रहता है. वहां ऊंची जाति के मास्टर पढ़ाते नहीं सेवा कराते हैं. अच्छे बच्चों को जलील करते हैं. ड्रौप आउट यानी स्कूल छोड़ने वाले इन्हीं स्कूलों में ज्यादा होते हैं. अगला खाना कैसे पकेगा, इस के लिए मांबाप भी बच्चों को स्कूल भेजने की जगह कागजपत्थर, लकडि़यां बटोरने के लिए भेज देते हैं. लड़कियां अमूमन दबंगों की चपेट में आ जाती हैं और जल्दी ही छोटे सुखों के लिए स्कूल की पढ़ाई की जगह बिस्तर की पढ़ाई सीख लेती हैं.

आईआईटी ने पाया है कि बिहार के 777 शैड्यूल ट्राइब बहुल इलाकों में केवल 11 स्कूल हैं. उत्तर प्रदेश का भी यही हाल है. मध्य प्रदेश में केवल 6 फीसदी सैकेंडरी स्कूल दलित इलाकों में हैं. मध्य प्रदेश में भी 15,843 गांव ज्यादा दलित हैं केवल 965 सैकेंडरी स्कूल हैं. देश के शासकों के राज्य गुजरात में 54 दलित बहुल गांवों में सिर्फ 2 सैकेंडरी स्कूल हैं. जब दलित बच्चों को 10-20 मील दूर सैकेंडरी स्कूल में जाना होता है, वह भी पैदल क्योंकि वे बस का पैसा नहीं खर्च कर सकते, उन का पढ़ाई में क्या मन लगेगा.

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यह सब साजिश के तौर पर हो रहा है और दलितों और गरीब पिछड़े सोच रहे हैं कि गांव में किसी ऐरेगैरे देवता का मंदिर बना कर उन्होंने अपना अगला जन्म सुधार लिया. लानत है इन के नेताओं पर, इन के चौधरियों पर और इन बिरादरियों के सरकारी मुलाजिमों पर.

क्या राममंदिर के लिए पैसा जमा करना जरूरी है?

गांवगांव, शहरशहर में कहा जाता है कि मंदिर जाओ, कीर्तन करो, पाठ पढ़ो, दान दो, यज्ञहवन कराओ, पैसा बरसेगा. आम भारतीय इस भुलावे में रह कर घर पर रह कर, गांवशहर के मंदिर में जा कर, कभीकभार दूर तीर्थस्थल तक जा कर, मन्नतें मान कर, दूधनारियल चढ़ा कर पैसा पाने के लिए कोशिश करता ही रहता है. जो करता है उसे धर्म के दुकानदार शरीफ बता देते हैं. जो नहीं करता उस का हुक्कापानी बंद करवाने की कोशिश करते हैं.

गरीब भी अपनी थोड़ी सी कमाई का एक बड़ा हिस्सा पूजापाठ पर खर्च कर डालता है कि इस से और मिलेगा, अपनेआप मिलेगा, छप्पर फाड़ कर मिलेगा. भई अगर ऐसा है तो राम मंदिर को अयोध्या में पैसा जमा करने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए. पर हो उलटा रहा है. लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने हुक्म जारी किया?है कि उस के सांसद गलीगलीकूचेकूचे जा कर राम मंदिर के लिए अगले 1-2 महीनों में पैसा जमा करें. दिल्ली में राम मंदिर के लिए मनोज तिवारी फरवरी भर यही काम करेंगे.

उन्होंने कहा है कि वे घरघर, दुकानदुकान जाएंगे. अब अकेले तो जाएंगे नहीं. 10-20 भगवा दुपट्टे लपेटे तोंद वाले वर्कर भी साथ होंगे. खातेपीते दबंग घरों के लोग जिस घर में जाएंगे वहां से खाली हाथ लौटने का सवाल ही नहीं. सांसद दरवाजे तक आए और 10-20 हजार लिए बिना चला जाए, कैसे हो सकता है. मुसलमानों के घरों में भी जाएंगे और जो मांगेंगे मिलेगा वरना मालूम है न कि कपिल मिश्रा ने पुलिस की निगरानी में क्या कहा था और उत्तरपूर्व दिल्ली में क्या किया था फरवरी 2020 में.

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यह सारे देश में दोहराया जाएगा. जहां भाजपा सरकारें हैं वहां भी, जहां नहीं हैं, वहां भी. दलितों से भी वसूला जाएगा, पिछड़ों से भी. कहने को राम मंदिर सब के लिए खुला होगा पर असल में इस में ऊंची जातियों वाले ही जा पाएंगे. वैसे भी हमारे देश में आम वैश्यों के लिए शिव, वर्किंग लोगों के लिए हनुमान, और छोटी जातियों के लिए लोकल देवीदेवता रिजर्व हैं. लोग अपनेअपने देवीदेवता की पूजा करते हैं, क्योंकि उन का अक्लमंद पंडितपुजारी उन्हें जाति के हिसाब से खास मंदिर में जाने पर ही पैसा पाने की दिलासा देता है.

राम मंदिर को ग्रंथों के हिसाब से अपनेआप पैसा मिलना चाहिए. भगवान जब खुश होते हैं तो हीरेजवाहरातों के ढेर प्रकट हो जाते हैं. सुख टपक पड़ता है, धन की कमी रहती ही नहीं. मनोज तिवारी जैसे सांसद फिर तो पक्की बात है कि राम मंदिर के बहाने कुछ और वसूली करने जा रहे हैं. यह पैसा भी हो सकता है, काम करने की इजाजत देने की कीमत भी, और अगले चुनाव के लिए वोट भी.

अब भला कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस के पास ऐसी जादू की छड़ी कहां है? राम मंदिर ही नहीं लगभग सभी मंदिरों पर कब्जा तो एक ही का है. जिस के पास वसूली का हक और तरीका है वही वोट मंदिर से वरदान पाएगा.

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आखिर पढ़ाई की संस्थाओं में अड़चनें क्यों आ रही है?

मोदी सरकार ने भीमराव अंबेडकर के आरक्षण का असर कम करने के लिए पढ़ाई की संस्थाओं में जो इकोनौमिकली वीकर सैक्शनों के लिए आरक्षण घोषित किया था, उस में भी अड़चनें आ रही हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों में बहुत सी सीटें खाली रह गई हैं क्योंकि चाहने वालों को सर्टिफिकेट नहीं मिले थे.

शायद बात दूसरी है. रिजर्वेशन के खिलाफ हल्ला इसलिए नहीं है कि ऊंची जातियों के लोगों को शिक्षा संस्थानों या नौकरियों में जगह नहीं मिल पा रही है और उन की जगह पिछड़े और दलित आ रहे हैं. यह हल्ला तो इसलिए मच रहा है कि आखिर पिछड़े और दलित पढ़ें ही क्यों और सरकारी नौकरी में बाबू अफसर क्यों बनें?

ऊंची जाति वालों को रोज पुराण पढ़ कर आज भी सुनाए जा रहे हैं कि साफ लिखा है कि पिछड़ी और निचली जाति के लोगों का काम न राज करना है, न ज्ञान पाना और देना है, न व्यापार करना है. ऊंची जातियों के लोगों ने पिछले 200 सालों में बड़ी मेहनत से पुराणों की महानता का बखान करकर के लोगों के दिमाग में बैठाया है कि जो भी इन में लिखा है वही पहला और आखिरी सच है और इन में अगर लिखा है कि शूद्र (सभी पिछड़े ओबीसी) व जाति बाहर (सभी तरह के दलित) न पैसे के हकदार हैं, न राज के, न पढ़ाई और ज्ञान के तो सही लिखा है. यह इन के पिछले जन्मों के पापों का फल है और इन्हें भुगता जाना चाहिए चाहे कोई भी कीमत हो. इन्हें न भोगना भगवान के आदेश के खिलाफ जाना है. अगर नासमझ पिछड़े व दलित इस ईश्वरवाणी को नहीं समझ रहे तो ज्ञानी स्वामियों का फर्ज व अधिकार है कि वे समझाएं चाहे बोल कर या डंडा मार कर या फिर जेल में बंद कर के.

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अगर कालेजों में इकोनौमिकली वीकर सैक्शन की सीटें नहीं भर रहीं तो इसलिए कि इन जातियों में गरीब हैं ही न के बराबर और जो हैं वे इतने निकम्मे हैं जो घटी कटऔफ में भी दाखिला नहीं ले पाते.

जो पिछड़े और दलित अच्छे नंबर पा कर ज्ञान और सत्ता पा रहे हैं उन से निबटना हमारे महाज्ञानी अच्छी तरह जानते हैं और तभी वे सत्ता में बैठ गए हैं जबकि उन की गिनती मुट्ठीभर है. पिछड़े और दलित किसानों की सरकारों को कहीं चिंता है क्या, जो वे दिल्ली की सरहदों पर धरना दिए बैठे हैं. अगर धर्म का काम, जैसे कांवड़ यात्रा, हो रहा होता तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह खुद चल कर सिर नवाने जाते.

विश्वविद्यालयों में ईडब्ल्यूएस कोटे में जो सीटें खाली हैं वे आरक्षण के खिलाफ हल्ले की पोल खोलती हैं.

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मोबाइल वीडियो एक मजबूत हथियार 

पुलिसके अत्याचारों के खिलाफ आम लोगों के हाथ में आज सब से बड़ा हथियार मोबाइल है. सैकड़ों वीडियो क्लिप्स आज सोशल मीडिया में घूम रही हैं जिन में पुलिस वालों को किसी को बेरहमी से पीटते, किसी से रिश्वत लेते, लोगों से जोरजबरदस्ती करते देखा जा रहा है. इस बीच, पुलिस वाले चौकन्ने हो गए हैं, वे ऐसे मोबाइलों को तोड़ने की कोशिश करने लगे हैं.

मोबाइलों से खींची या बनाई गईं वीडियो क्लिप्स कोई असर डालती हैं, इस बारे में कोई आंकड़ा तो जमा नहीं किया गया पर पुलिस वालों को इस से फर्क जरूर पड़ता है. कई बार जब ये क्लिप्स टीवी चैनलों में पहुंच जाती हैं और चैनल सरकारी भोपू न हों और चुप न रहने की हिम्मत रखते हों, तो पुलिस की आमजन के प्रति क्रूरता जगजाहिर हो जाती है.

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आज युवा ज्यादा उत्साह दिखाते हैं जो गलत बातों का विरोध करते हैं. उन के लिए पुलिस के डंडों से बचने का यह एक उपाय है. पर फ्रांस में एक कानून बनने वाला है जिस में इस तरह की वीडियो बनाना ही अपराध घोषित कर दिया जाएगा. ऐसी एक वीडियो क्लिप हमारे देश भारत में किसान आंदोलन के दौरान एक वृद्ध सिख पर पुलिस वाले का डंडा बरसाने की बनाई गई थी जिस पर राहुल गांधी की टिप्पणी पर भाजपा आईटी सैल ने ट्विटर पर एक अधूरा वीडियो डाला था. ट्विटर कंपनी ने भाजपा के अमित मालवीय के इस प्रतिउत्तर  वाले ट्वीट को गलत ठहराया है. फ्रांस तो उसे पकड़ लेगा जिस ने पुलिस वाले का वीडियो बनाया था. फ्रांस में बन रहे कानून के खिलाफ वहां देशभर में  1 दिसंबर से प्रदर्शन होने लगे हैं. लोग कहते हैं कि उन्हें पुलिस की ज्यादतियों का वीडियो लेने का मौलिक अधिकार है. पुलिस कानून को हाथ में नहीं ले सकती.

वह जबरन किसी को पीट नहीं सकती. नागरिकों के पास अकेला हथियार उस समय उस के साथी या आसपास के लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो ही हैं. पुलिस किस तरह हमारे देश भारत में थानों में अत्याचार करती है, यह जगजाहिर है. दिसंबर के पहले सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सारे थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं ताकि थानों के भीतर पुलिस के अत्याचार कम हो सकें.  ये सीसीटीवी कैमरे लग तो जाएंगे पर पहले ही दिन से खराब रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट हर थाने में थोड़े ही मौजूद रहेगा? वहां तो आरोपी के रिश्तेदार ही होंगे और यदि उन के पास पूछताछ के समय वीडियो बनाने का अधिकार हो तो पुलिस अपनी बर्बरता से उन्हें वीडियो बनाने से रोक सकती है. दुनिया के हर देश को पुलिस की जरूरत है पर हर देश में पुलिस अपनेआप में आपराधिक गिरोह बन जाती है. जो किसी वजह या बेवजह पकड़ा गया, वह पुलिस अत्याचारों का शिकार रहा था या नहीं, यह कभी पता नहीं चल सकता.  सरकारें पुलिस पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि सत्ता में बैठे नेता अपने विरोधियों को इसी पुलिस के सहारे कुचलते हैं.

वैसे, मार खाने वालों में ज्यादातर युवा ही होते हैं, वे चाहे राजनीतिकविरोधी हों या समाज के प्रति असल गुनाहगार. एमेजौन का वर्चस्व  दुनियाभर में नवंबर का आखिरी शुक्रवार औफर्स का मनभावन दिन होता है जब बड़े स्टोर अपना बचा माल बहुत सस्ते दामों पर बेचते हैं. इसे ‘ब्लैक फ्राइडे’ कहते हैं. अमेरिका से शुरू हुआ यह तमाशा अब दुनिया के सभी समृद्ध देशों के स्टोर मनाते हैं और औनलाइन स्टोरों, जैसे एमेजौन आदि ने भी ब्लैक फ्राइडे मनाना शुरू कर दिया है.  इस बार इसी दिन एमेजौन के खिलाफ एक आंदोलन शुरू हुआ है.

ऊपर से तो यही कहा जा रहा है कि एमेजौन अपने कर्मचारियों को पूरे पैसे नहीं देता और बहुत से देशों में टैक्स नहीं देता, पर असली वजह यह है कि लोग इस की बढ़ती मोनोपौली से घबरा रहे हैं. एमेजौन अब आप को अपनी मरजी का सामान बेचता है और जो जरूरत नहीं, वह भी मनमाने दामों में बेच डालता है.  मोबाइल या कंप्यूटर पर खरीदारी एक तरह से जुए की शक्ल लेने लगी है जिस में लोग फोटो या वीडियो देख कर सस्ती चीजों को खरीदते हैं और फिर इंतजार करते हैं कि पासा उन के पक्ष में पड़ा या नहीं. एमेजौन जुआघर बनने लगा है. इस में लोगों को घर बैठे सस्ते सामान का लालच दे कर जुआ खेलने की आदत डाली जा रही है. यह काम आप के घर के करीब की दुकानें नहीं कर सकतीं. एमेजौन छोटे बिजनैसों को हड़प रहा है और आज के या भविष्य के लाखों छोटे व्यापारी अब डिलीवरीमैन बने जा रहे हैं.

एमेजौन ने बुद्धिहीन डिलीवरीमैनों की आर्मी खड़ी कर ली जो एक भाषा, एक सा व्यवहार, एक सी पोशाक पहन रहे हैं. यही नहीं, वे जल्द से जल्द सामान पहुंचाने के लिए ट्रैफिक का वह जोखिम ले रहे हैं जो सीमा पर दुश्मन से लड़ने के लिए सैनिक लेते हैं. आम किसी कंपनी का घरेलू सामान आज बिक ही नहीं सकता अगर एमेजौन का वरदहस्त न हो.

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चीनी कंपनी अलीबाबा भी वैसी ही है, पर एमेजौन तो उस से 8-9 गुना बड़ी है. कोई बड़ी बात नहीं होगी जो कभी रहस्य खुले कि अमेरिकाचीन संबंध एमेजौन के कारण खराब हुए थे जो अलीबाबा को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती. यह संभव है कि आज एक कंपनी अमेरिका और चीन की सरकारों को प्रभावित कर ले.  बहरहाल, शिकार हर हालत में आज के युवा ही होंगे जो या तो फालतू सामान खरीदेंगे या फिर फालतू टिकटौक  पर नाचेंगे.

गहरी पैठ

हाथरस, बलरामपुर जैसे बीसियों मामलों में दलित लड़कियों के साथ जो भी हुआ वह शर्मनाक तो है ही दलितों की हताशा और उन के मन की कमजोरी दोनों को दिखाता है. 79 सांसदों और 549 विधायक जिस के दलित हों, वह भारतीय जनता पार्टी की इस बेरुखी से दलितों पर अत्याचार करते देख रही है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि दलित आवाज नहीं उठाएंगे.

पिछले 100 सालों में पहले कांग्रेसी नेताओं ने और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने जम कर पौराणिक व्यवस्था को गांवगांव में थोपा. रातदिन पुराणों, रामायण, महाभारत और लोककथाओं को प्रवचनों, कीर्तनों, यात्राओं, किताबों, पत्रिकाओं, फिल्मों व नाटकों से फैलाया गया कि जो व्यवस्था 2000 साल पहले थी वही अच्छी थी और तर्क, तथ्य पर टिकी बराबरी की बातें बेकार हैं.

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जिन लोगों ने पढ़ कर नई सोच अपनाई थी उन्हें भी इस में फायदा नजर आया चाहे वे ऊंची जातियों के पढ़े-लिखे सुधारक हों या दलितों के ही नेता. उन्हें दलितों में कम पैसे में काम करने वालों की एक पूरी बरात दिखी जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते थे.

यही नहीं, दलितों के बहाने ऊंची जातियों को अपनी औरतों को भी काबू में रखने का मौका मिल रहा था. जाति बड़ी, देश छोटा की बात को थोपते हुए ऊंची जातियों ने दहेज, कुंडली, कन्या भ्रूण हत्या जम कर अपनी औरतों पर लादी. औरत या लड़की चाहे ऊंची जाति की हो या नीची, मौजमस्ती के लिए है. इस सोच पर टिकी व्यवस्था में सरकार, नेताओं, व्यापारियों, अफसरों, पुलिस से ले कर स्कूलों, दफ्तरों में बेहद धांधली मचाई गई.

हाथरस में 19 साल की लड़की का रेप और उस से बुरी तरह मारपीट एक सबक सिखाना था. यह सबक ऊंची जातियां अपनी औरतों को भी सिखाती हैं, रातदिन. अपनी पढ़ीलिखी औरतों को रातदिन पूजापाठ में उलझाया गया. जो कमाऊ थीं उन का पैसा वैसे ही झटक लिया गया जैसा दलित आदमी औरतों का झटका जाता है. जिन आदमियों को छूना पाप होता है, उन की औरतों, बेटियों के गैंगरेप तक में पुण्य का काम होता है. यह पाठ रोज पढ़ाया जाता है और हाथरस में यही सबक न केवल ब्राह्मण, ठाकुर सिखा रहे हैं, पूरी पुलिस, पूरी सरकार, पूरी पार्टी सिखा रही है.

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दलितों के नेता चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि जिन का उद्धार नहीं हुआ उन्हें तो पाप का फल भोगना होगा. मायावती जैसे नेता तो पहले ही उन्हें छोड़ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी के 79 सांसद और 549 विधायक अपनी बिरादरी से ज्यादा खयाल धर्म की रक्षा के नाम पर पार्टी का कर रहे हैं. दलित लड़कियां तो दलितों के हाथों में भी सुरक्षित नहीं हैं. यह सोच कर इस तरह के बलात्कारों पर जो चुप्पी साध लेते हैं, वही इस आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं.

सरकार की हिम्मत इस तरह बढ़ गई है कि उस ने अपराधियों को बचाने के लिए पीडि़ता के घर वालों पर दबाव डाला और हाथरस के बुलगढ़ी गांव को पुलिस छावनी बना कर विपक्षी दलों और प्रैस व मीडिया को जाने तक नहीं दिया. वे जानते हैं कि जाति शाश्वत है. यह हल्ला 4 दिन में दब जाएगा.

बिहार चुनावों की गुत्थी समझ से परे हो गई है. भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार का साथ भी दे रही है और उसी के दुश्मन चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी से भी मिली हुई है. इस चक्कर में हाल शायद वही होगा जो रामायण और महाभारत के अंत में हुआ. रामायण में अंत में राम के पास न सीता थी, न बच्चे लवकुश, न लक्ष्मण, न भरत. महाभारत में पांडवों के चचेरे भाई मारे भी जा चुके थे और उन के अपने सारे बेटेपोते भी.

लगता है कि हिंदू पौराणिक कथाओं का असर इतना ज्यादा है कि बारबार यही बातें दोहराई जाती हैं और कुछ दिन फुलझड़ी की तरह हिंदू सम्राट का राज चमकता है, फिर धुआं देता बुझ जाता है. बिहार में संभव है, न नीतीश बचें, न चिराग पासवान.

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जो स्थिति अब दिख रही है उस के अनुसार चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार भाजपा की सहयोगी पार्टी सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ उम्मीदवार खड़ी करेगी. वे कितने वोट काटेंगे पता नहीं, पर चिराग पासवान के पास अगर अभी भी दलित व पासवान वोटरों का समर्थन है तो आश्चर्य की बात होगी, क्योंकि चिराग पासवान जाति के नाम पर वोट ले कर सत्ता में मौज उठाने के आदी हो चुके हैं. हो सकता है कि उन्हें एहसास हो गया हो कि नीतीश कुमार निकम्मेपन के कारण हारेंगे तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ गठबंधन करने में आसानी रहेगी और तब वे भाजपा को 2-4 बातों पर कोस कर अलग हो जाएंगे.

जो भी हो, यह दिख रहा है कि कम से कम नेताओं को तो बिहार की जनता की चिंता नहीं है. बिहार की जनता को अपनी चिंता है, इस के लक्षण दिख नहीं रहे, पर कई बार दबा हुआ गुस्सा वैसे ही निकल पड़ता है जैसे 24 मार्च को लाखों मजदूर दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु से पैदल ही बिहार की ओर निकले थे. वह हल्ला का परिणाम था, चुनावों में गुस्से का दर्शन हो सकता है.

बिहार के मुद्दे अभी तक चुनावी चर्चा में नहीं आए हैं. बिहार में बात तो जाति की ही हो रही है. बिहार की दुर्दशा के लिए यही जिम्मेदार है कि वहां की जनता बेहद उदासीन और भाग्यवादी है. उसे जो है, जैसा है मंजूर है, क्योंकि उसे पट्टी पढ़ा दी गई है कि सबकुछ पूजापाठी तय करते हैं, आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं है.

बिहार देश की एक बहुत बड़ी जरूरत है. वहां के मजदूरों ने ही नहीं, वहां के शिक्षितों और ऊंची जाति के नेताओं ने देशभर में अपना नाम कमाया है. बिहार के बिना देश अधूरा है पर बिहार में न गरीब की पूछ है, न पढ़ेलिखे शिक्षित की चाहे वह तिलकधारी हो या घोर नास्तिक व तार्किक. ऐसा राज्य अपने नेताओं के कारण मैलाकुचला पड़ा रहे, यह खेद की बात है और नीतीश कुमार जीतें या हारें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

गहरी पैठ

कोरोना को तमाशा मानने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कोविड 19 के शिकार हो गए और अक्तूबर में उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा, जब राष्ट्रपति पद का चुनाव महज 30 दिन दूर रह गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू से ही उसे साधारण फ्लू कहा और चाहा कि अमेरिका काम पर चले चाहे लोगों को बीमारी हो. उन्होंने तब भारत आने का न्योता लिया जब चीन का वुहान शहर बिलकुल बंद था और बाकी शहरों में लौकडाउन था. लाखों की भीड़ को देख कर ट्रंप खूब खुश हुए थे.

अमेरिका में चुनावों में ट्रंप वही कर रहे थे जो उन्होंने मार्च में गुजरात में किया था. हजारों के सामने बिना मास्क के भाषण देना, खुले में घूमना, कोरोना पर जीत की डींग मारना. शायद नरेंद्र मोदी ने उन से सीखा था, जब 24 मार्च को कहा था कि 21 दिनों में कोरोना की लड़ाई जीत ली जाएगी. आज अमेरिका में सब से ज्यादा बीमार हैं, सब से ज्यादा मौतें हुई?हैं और फिर भी भारत के महान नेताओं की तरह वे यही कहते थे कि इस फ्लू को तो किसी भी कीटनाशक दवा से मारा जा सकता है.

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गोरों की वोटों पर जीत कर आए ट्रंप असल में ठस दिमाग के कट्टर नेता हैं. अमेरिका में बसे ऊंची जातियों के भारतीय भी उन्हें और नरेंद्र मोदी को बराबर सा चाहते हैं. अमेरिका में दलितोंपिछड़ों की तरह कालों और लैटिनों से बुरी तरह व्यवहार किया जाता है. उन्हें जो थोड़ाबहुत मिल जाए वह भी गोरों को सहन नहीं होता. वहां तो गोरे 40-45 फीसदी हैं, पर वे जानते हैं कि भारत की तरह 10 फीसदी खास लोग चतुराई से राज कर सकते हैं. भला हो कोरोना का, जो न जाति देखता है, न धर्म, न रंग, न पैसा और पद. अमित शाह भी बीमार पड़े, दिल्ली के सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया भी और अब डोनाल्ड ट्रंप व उन की बीवी.

आम लोगों में यह बीमारी कितनी फैली है यह सिर्फ नंबरों से पता चलता है, पर यह पक्का है कि मेहनतकश इस बीमारी को आसानी से सह लेते हैं क्योंकि उन्हें पहले से तरहतरह के रोगों से लड़ने की आदत होती है. भारत और अमेरिका दोनों के समाजों में यह महामारी आग की तरह नहीं फैली जैसे पहले हैजा या प्लेग फैलता था. इस वायरस को तो असल में हवाईजहाजों में चलने की आदत है. चीन से यह इटली, ईरान, स्पेन, भारत, अमेरिका हवाईजहाजों से गया जब कोरोना बीमार इधर से उधर जा रहे थे.

डोनाल्ड ट्रंप को भी होप हिक्स से लगा जो उन के साथ हवाई यात्राओं में चुनावी सभाओं में जाने के लिए घूम रही थी. होप कहां से लाई पता नहीं. ट्रंप की पत्नी ने भारतीय नेताओं की तरह विदेशी नागरिकों को देश की मुसीबतों की जड़ बताया था. ट्रंप ने लाखों बच्चों को अपने मातापिता से अलग कर रखा है क्योंकि बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं और माईग्रैट यानी घुसपैठिए अवैध हैं. हमारे नेताओं ने तबलीगी जमात वालों को कोरोना का दोषी ठहराया था जबकि बाद में सारी अदालतों ने माना कि कोरोना फैलाने में उन का कोई खास योग नहीं है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और भाजपा एकजैसी नीतियों वाली हैं. देखें अब क्या कोरोना रिपब्लिकनों से सत्ता छीनता है. 10 नवंबर तक पता चल जाएगा.

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हाथरस में एक दलित लड़की का रेप और फिर बुरी तरह जख्मी कर मार देना दलितों को सबक सिखाने के लिए जरूरी है. उन की हिम्मत क्यों हुई कि वे ऊंची जाति वालों के खिलाफ मुकदमे करें, एससी ऐक्ट का इस्तेमाल करें. सदियों से सनातन धर्म कह रहा है कि दलित और औरतें, सवर्ण औरतें भी, पाप योनि की देन हैं और उन्हें सजा चाहे भगवान दें या भगवान के बैठाए दूत दें, एक ही बात है.

जिन लोगों ने दलित लड़की का रेप किया वे सामाजिक कानून लागू कर रहे थे. वे मोदी और योगी की तरह के कानून के रखवाले हैं. गलत कानून अगर संविधान ने दिए हैं तो उन्हें ठीक करना तो जरूरी है. यदि दिखावे के लिए कानून को सही नहीं किया जा सकता तो सही कानून के खुद भरती किए सिपाही इस काम को करेंगे.

देश के गांवगांव, गलीगली में यह बात रातदिन फैलाई जा रही है कि हर जने को अपनी ‘औकात’ में रहना चाहिए जो जन्म से तय है, संविधान कुछ भी कहता रहे. कुछ उदारवादी कहते हैं कि सब एक हैं, पर असल यही है कि हिंदू व्यवस्था साफ कहती है कि सब अलग हैं. पिछले जन्मों के कर्मों से बंधे हैं. जब तक पापों के भागियों को अपनी जगह पर नहीं रखा जाएगा देश चल नहीं सकता.

इस बात के हामी सिर्फ ऊंची जाति के लोग ही नहीं हैं. मायावती, उदित राज, रामदास अठावले जैसे सैकड़ों दलित नेता हैं जो पहले दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर उबलते थे पर अब उन्हें ज्ञान हो गया है कि दलित तो भगवान के बनाए हुए हैं और जिन थोड़े से दलितों ने अपने जपतप से भगवानों के दूतों को खुश कर दिया है, उन का काम है कि विभीषणी करते हुए अपने ही लोगों की मौत, रेप, पिटाई, बेगारी होते देखें और समाज के गुन गाएं. तभी तो योगी सरकार की पुलिस को यह बल मिला. 19 साल की लड़की की मौत को तमाशा बनने से रोकने के लिए आधी रात को उस का दाह संस्कार कर दिया गया. अब उस की राख के बदले कुछ रुपए उस के घर वालों के मुंह पर मारे जाएंगे और बात खत्म.

यह न समझें कि दलितों पर अत्याचार की छूट का असर नहीं पड़ता. देश की 2000 साल की गुलामी के पीछे यही भेदभाव है. करोड़ों लोग अगर मुसलमान बने तो इसलिए कि उन को हिंदू समाज में सांस लेना दूभर हो रहा था. आज दलितों को खरीदना आसान हो रहा है इसलिए उन की बोलती बंद है पर यह खरीदफरोख्त अब ऊंचों के साथ भी हो रही है. सारे देश में आपाधापी मची हुई है. नोटबंदी और जीएसटी उसी का एक रूप हैं. गिरती अर्थव्यवस्था इसी कानून के प्रति अविश्वास की निशानी है.

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अब गांवों, कसबों, शहरों में समाज और ज्यादा टुकड़ेटुकड़े होगा. हिंदूमुसलिम भेदभाव तो था ही, दलितठाकुर, ठाकुरजाट, जाटकुर्मी न जाने कितने टुकड़े एकदूसरे के खून के प्यासे बनते जाएंगे, कितनों के घरों में सामाजिक विवाद की सजा मासूम बेटियों को मिलेगी. हां, धर्म की जय होगी. मसजिद ढहाने पर भी जयजय. दलित हत्या पर भी जयजय.

गहरी पैठ

हमारे देश में फालतू बातों पर समय और दम बरबाद करने की पुरानी आदत है. यहां तो बेबात की, तो सिर भी फोड़ लेंगे पर काम की बात के लिए 4 जने जमा नहीं होंगे. बकबक करनी हो, होहल्ला मचाना हो, तो सैकड़ों की तमाशाई भीड़ जमा भी हो जाएगी और अपनाअपना गुट भी बना लेगी. जब देश के सामने चीन की आफत खड़ी है, जब बेकारी हर रोज बढ़ रही है, जब उद्योगधंधे बंद हो रहे हैं, जब कोरोना की बीमारी दुनियाभर के रिकौर्ड बना रही है, हम क्या बोल रहे हैं, सुन रहे हैं? रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह के किस्से, जिस में ऐक्टै्रस कंगना राणावत बेबात में कूद कर हीरोइन बन गई है.

यह आज की बात नहीं है. रामायण काल में राजा दशरथ को राज करने की जगह फालतू में शिकार पर जाने की लगी थी, जब उन्होंने एक अंधे मांबाप के बेटे को तीर से मार डाला. राजा का काम राज करने का था. उस के बाद जंगल में राम ने शूर्पणखा की नाक सिर्फ इसलिए काट ली कि वह प्यार करने का आग्रह बारबार कर रही थी. दोनों का नतीजा बुरा हुआ. श्रवण कुमार के मांबाप के श्राप की वजह से राम को वनवास लेना पड़ा और उस के गम में राजा दशरथ की मौत हो गई.

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महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी का दुर्योधन और उस के भाइयों को महल में अंधे के बेटे कहना इतना गंभीर बना कि महाभारत का युद्ध हो गया और कुरु वंश ही खत्म हो गया. गीता का उपदेश चाहे जैसा हो, उस में यह नहीं कहा गया कि फालतू की भीड़ और फालतू की बकबक से समाज और देश नहीं बनते.

आज चीन, कोरोना, उद्योगों, भूख, गरीबी से न लड़ कर हमारी चैनलों की भीड़ एकसुर में कंगना और रिया का अलाप कर रही है. ऐसा लगता है मानो रामायण और महाभारत के पात्र ये एंकर हर रोज सुबह पढ़ते हैं और दिनभर उसे ही दोहराते हैं.

हमारे यहां गांवों में ऐसा हर रोज होता है. हर रोज गांव में लड़ाईझगड़े इसी तरह छोटीछोटी बातों पर होते हैं. घरों में सासबहू और जेठानीदेवरानी से ले कर पड़ोसियों और जातियों के विवाद इसी तरह बेबात में तू ने यह क्यों कहा, वह क्यों कहा पर होते हैं. रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह जो भी कर रहे थे, उस का आम जनता से लेनादेना नहीं है पर चैनल ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें और यहां तक कि केंद्र सरकार भी इस छोटे से मामले में कूद पड़ी हैं, ताकि बड़े मामलों को भुलाया जा सके.

यहां तक कि बिहार में मुद्दा बनाया जा रहा है कि सुशांत सिंह की हत्या का मामला चुनावों में पहला होगा, राज्य में लूटपाट, गरीबी, बदहाली नहीं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अब बंगाली ब्राह्मण रिया चक्रवर्ती का मामला उठा रही हैं.

किसानों ने इन दिनों देशभर में बड़े आंदोलन किए पर चैनलों ने दिखाए ही नहीं. छात्रों ने बेकारी का मुद्दा उठाया और रात को मशाल जुलूस निकाले पर उन की बात करने की फुरसत नहीं रही. रामायण और महाभारत काल की तरह युद्ध राजाओं के आपसी मतलब के हुए और आम जनता बेकार में पिसी थी. दोनों ही लड़ाइयों के बाद आम जनता को कुछ नहीं मिला. राम को सीता मिली और युधिष्ठिर को राज, पर तब जब सब मर गए. क्या हम इसे दोहराने में लगे हुए हैं?

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अब देश को सीमाओं की चिंता ही नहीं है. देश की सरकार को अब देश में होने वाले भयंकर बड़े झगड़ों, खूनखराबों की फिक्र नहीं है. देश को चिंता है गाय की. गाय है तो जहां है, जान का क्या आतीजाती रहती है. गरीब, किसान, मजदूर, व्यापारी जिएंमरें कोई फर्क नहीं पड़ता, पर गौमाता नहीं मरनी चाहिए, खासतौर पर मुसलमान के हाथों. ब्राह्मण उसे भूखा रख कर मार दें तो कोई बात नहीं क्योंकि उन्हें तो कोई पाप लगता ही नहीं.

एक कानून है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून. इस में बिना जमानत, बिना दलील, बिना वकील किसी को भी महीनों तक जेल में रखा जा सकता है और हर चौकी का मुंशी इसे लागू कर सकता है. थोड़ी सी कागजी घोडि़यां बनानी होती हैं, वे पकड़ कर बंद करे जाने के बाद बनाई जाती रहती हैं.

उत्तर प्रदेश में अप्रैल, 20 से अगस्त, 20 तक 139 लोगों पर यह कानून लागू किया जिन में से 44 को गौहत्या के अपराध का नाम लगा कर पकड़ा गया था. मजे की बात है 4,000 तो गौहत्या कानून में वैसे ही बंद हैं. कुछ को गैंगस्टर ऐक्ट में बंद कर रखा है तो कुछ को गुंडा ऐक्ट में भी. ये सब बंद लोग धन्ना सेठ नहीं हैं. ये आम आदमी हैं. हो सकता है, ज्यादातर मुसलमान यह दलित हों पर गौमांस या दूसरा कोई और मांस खरीदनेबेचने वाले कहीं पकड़े नहीं जाते. अगर कभीकभार चंगुल में आ जाएं तो वे वकील कर के निकल जाते हैं. गरीब ही सड़ते रहते हैं.

यह न समझें कि इस पकड़धकड़ से गायों की मौतों को बंद कर दिया गया है. वे तो पहले की तरह ही मरेंगी. दान में ब्राह्मण तो केवल दूध देने वाली गाय लेगा. जब दूध देना बंद कर देगी तो पहले वही ही बेच देता था. अब खेतों में छोड़ देता है, जहां वे खड़ी फसलों को खाती रहती हैं. उत्तर प्रदेश की ही नहीं दिल्ली तक की सड़कों पर गायों को आराम से मरते देखा जा सकता है.

इस कानून का फायदा भगवा गैंग वाले जम कर उठा रहे हैं. वे किसी भी घर में गौमांस होने का आरोप लगा सकते हैं. पुलिस छापा मारती है, घर वालों को गिरफ्तार करती है और मांस को लैब में भेज देती है. आमतौर पर 3-4 महीने में रिपोर्ट आती है कि मांस तो भैंस का था पर तब तक पुलिस वाले और भगवा गैंग वाले कमाई कर चुके होते हैं.

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इस धांधली के खिलाफ कोई बोल भी नहीं रहा क्योंकि पार्टी सुनेगी नहीं, मीडिया बढ़ाचढ़ा कर दिखाता है और जज खुद तिलकधारी, जनेऊधारी हैं. वे क्यों पुण्य के काम में दखल दें, चाहे गलत क्यों न हो. गाय के नाम पर जो आपाधापी हो रही है वह बहुत कमाई कर रही है. यह मौका भी एक ही पार्टी के पास है जिसे अपने वर्करों को पैसे नहीं देने पड़ते क्योंकि वर्कर इस तरह हफ्तावसूली कर रहे हैं. गौपूजा का मतलब ही यही है कि गौपालकों की पूजा हो, गौ जिएमरे कौन चिंता करता है?

गहरी पैठ

दलितों के नेता होने का दावा करने वाले रामविलास पासवान वर्षों से उस पार्टी के साथ चिपके हैं जिस पर उन्होंने ही एक बार सदियों से हो रहे जुल्मों को सही और पिछले जन्मों का फल बताया था. सत्ता के मोह में रामविलास पासवान अपना पासा तो सही फेंकते रहे हैं और अपनी जगह बचाए रखते रहे हैं, पर वे इस चक्कर में दलितों के हितों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं.

उदित राज, रामविलास पासवान, मायावती जैसे बीसियों दलित नेता भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में हैं और इन दोनों पार्टियों में दलितों और उन के वोटों का इस्तेमाल करने वाले ऊंचे नेताओं की देश में कमी नहीं है और हर पार्टी में ये मौजूद हैं. इन की मौजूदगी का आम दलितों को कोई फायदा होता है, यह दिखता नहीं है. हाल में अपने गांवों तक बड़े शहरों से पैदल चल कर आने वाले मजदूरों में काफी बड़ी तादाद में दलित ही थे और इन के नेताओं के मंत्रिमंडल में होने के बावजूद न केंद्र सरकार ने और न राज्य सरकारों ने इन मजदूरों से हमदर्दी दिखाई.

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रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी अब बिहार के चुनावों से पहले पर फड़फड़ा रही है, पर यह साफ है कि वह नेताओं के हितों को ध्यान में रखेगी, वोटरों के नहीं. दलितों की मुश्किलें अपार हैं, पर चाहे उन की गिनती कुछ भी हो, उन के पास अपना दुख कहने का कोई रास्ता नहीं है.

रामविलास पासवान, प्रकाश अंबेडकर, मायावती जैसे दसियों नेता देशभर में हैं, पर उन्हें अपनी पड़ी रहती है. जो थोड़े उद्दंड होते हैं जैसे चंद्रशेखर उन्हें सरकार जल्दी ही जेल में पहुंचा देती है और ऊंची जातियों के जज उन्हें जमानत नहीं देते. उन के सत्ता में बैठे नेता चुप रहते हैं.

बिहार में चिराग पासवान जो भी जोड़तोड़ करेंगे वह सीटों के लिए होगी. नीतीश कुमार और भाजपा समझते हैं कि यदि उन्हें सीटें ज्यादा दी भी गईं तो फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हर जीतने वाले विधायक को आसानी से एक गाड़ी, एक मकान और थोड़ा सा पैसा दे कर खरीदा जा सकता है.

लोक जनशक्ति पार्टी ने धमकी दी है कि वह बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के खिलाफ 143 उम्मीदवार खड़े करेगी, पर सब जानते हैं कि अंत में वह 10-15 पर राजी हो जाएगी. रामविलास पासवान कभी लालू प्रसाद यादव के साथ काम कर चुके हैं, पर लालू यादव जैसे पिछड़े नेताओं को दलितों को मुंह पर खुश करने की कला नहीं आती जो भाषा पहले संस्कृत या अब अंगरेजी पढ़ेलिखे नेताओं को आती है जो कांग्रेस में हमेशा रहे और अब भाजपा में पहुंच गए हैं.

दलितों की बिहार में हालत बहुत बुरी है. सामान्य पढ़ाई करने के बावजूद उन में चेतना नहीं आई है. उन्हें पढ़ाने वाले भी दुत्कारते रहे हैं और उन से काम लेने वाले भी. उन्हें दलितों के लिए बने अलग मंदिरों में ठेल कर बराबरी का झूठा अहसास दिला दिया गया है, पर उन की हैसियत गुलामों और जानवरों सी ही है. अफसोस यही है कि अब जब 3 पीढि़यां पढ़ कर निकल चुकी हैं तब भी वे रास्ता दिखाने वालों की राह तकें, यह गलत है. इस का मतलब तो यही है कि उन्हें फिर एक चुनाव में उन्हें ही वोट देना पड़ेगा जो उन पर अत्याचार करते हैं.

पाकिस्तान का नाम लेले कर चुनाव जीतने वाली सरकार के लिए चीन गले की आफत बनता जा रहा है. लद्दाख से ले कर अरुणाचल तक चीन सीमा पर तनाव पैदा कर रहा है और भारत सरकार को जनता में अपने बचाव के लिए कोई मोहरा नहीं मिल रहा है. सरकार ने 200 से ज्यादा चीनी एप जरूर बैन कर दिए हैं, पर ये चीनी एप खिलंदड़ी के एप थे और इन को बंद करना देश की अपनी सेहत के लिए अच्छा है और चीन को इन से कोई फर्क नहीं पड़ता.

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पाकिस्तान के मामले में आसानी रहती है कि किसी भी दूसरे धर्म वाले को गुनाहगार मान कर गाली दे दो, पर चीनी तो देश में हैं ही नहीं. जिन उत्तरपूर्व के लोगों के राज्यों पर चीन अपना हक जमाने की कोशिश कर रहा है, वे पूरी तरह भारत के साथ हैं. वे कभी भी चीन की मुख्य भूमि के पास भी नहीं फटके थे. ज्यादा से ज्यादा उन का लेनदेन तिब्बत से होता था और तिब्बती खुद भारत के साथ हैं और एक तिब्बती मूल के सैनिक की चीनी मुठभेड़ में मौत इस बात की गवाह है.

सरकार द्वारा मुसीबत को मौके में बदलने में चीनी मामले में चाहे मुश्किल हो रही हो, भारत को यह फिक्र तो करनी ही होगी कि हमारी एक इंच भूमि भी कोई दुश्मन न ले जाए. यह तो हर नागरिक का फर्ज है कि वह जीजान से जमीन की रक्षा करे और इस में न धर्म बीच में आए, न जाति और न पार्टी के झंडे का रंग.
दिक्कत यह है कि देश आज कई मोरचों पर जूझ रहा है. हमारी हालत आज पतली है. नोटबंदी और जीएसटी के हवनों में हम ने अरबों टन घीलकड़ी जला डाला है कि इन हवनों के बाद सब ठीक हो जाएगा.

ठीक तो कुछ नहीं हुआ, सारे कारखाने, व्यापार, धंधे, नौकरियां भी खांस रहे हैं. राज्य सरकारों के खजाने बुरी तरह धुएं से हांफ रहे हैं. ऊपर से कोरोना की महामारी आ गई. हवन कुंड की आग को कोरोना की तेज हवाओं ने बुरी तरह चारों ओर फैला दिया है. चीन से ज्यादा चिंता आज हरेक को अपने अगले खाने के इंतजाम की हो गई है.

दुश्मन पर जीत के लिए देश का हौसला और भरोसा बहुत जरूरी है. यह अब देश से गायब हो गया है. कल क्या होगा यह आज किसी को नहीं मालूम. जब कोरोना के पैर बुरी तरह गलीगली में फैल रहे हों तो सीमा पर चीन की चिंता सेना पर छोड़नी पड़ रही है. जनता के पास इतनी हिम्मत नहीं बनती है कि वह दोनों मोरचों पर सोच सके. जनता ने तो चीन की सीमा का मामला सेना पर छोड़ दिया है. हमारी सरकार भी रस्मीतौर पर चीन के साथ भिड़ने की बात कर रही है, क्योंकि ज्यादातर नेता तो कोविड के डर से घरों में दुबके हैं. आमतौर पर ऐसे मौके पर सितारे, समाज सुधारक, हर पार्टी के नेता, हर जाति व राज्य के नेता सैनिकों की हिम्मत बढ़ाने के लिए फ्रंट पर जाते हैं, पर अब सब छिपे हुए हैं.

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यह सेना की हिम्मत है कि वह बहादुरी से चीन को जता रही है कि भारत को अब 1962 का भारत न समझे. बहुत बर्फ पिघल चुकी है इन 50-60 सालों में. भारत चाहे गरीब आज भी हो, पर अपनी जमीन को बचाना जानता है.

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