लेखक- डा. सुभाष चंद्र गर्ग

यहां तक कि गणित का जो सवाल पूरी कक्षा से हल न होता उसे राहुल जरूर हल कर देता था. तभी तो मदर प्रिंसिपल गर्व से कहती थीं कि राहुल की प्रतिभा का कोई सानी नहीं है. और राहुल ने भी कभी उन को निराश नहीं किया. अंतरविद्यालयीन मुकाबलों में जीते पुरस्कार उस की प्रतिभा के प्रत्यक्ष प्रमाण थे. इतना मेधावी राहुल फिर आज बेचैन क्यों था? क्यों आज वह मानवीय आचरण की गुत्थी में उलझ कर रह गया था? क्यों वह नहीं समझ पा रहा था कि इनसान इतना संवेदनहीन भी हो सकता है? हुआ यह कि कल गणित का पेपर था और आज राहुल के पड़ोस में जागरण हो रहा था. कोई और दिन होता तो राहुल बढ़चढ़ कर जागरण मंडली के साथ मां की भेंटें गा रहा होता और ढोलमजीरे की लय पर आंखें बंद किए पुजारी को गरदन घुमाते हुए वह श्रद्धाभाव से देख रहा होता लेकिन आज बात कुछ और थी. उसे परीक्षा की तैयारी करनी थी. उसे पास होने की नहीं बल्कि प्रदेश में प्रथम स्थान पाने की चिंता थी. उसे अपने अध्यापकों, सहपाठियों तथा मातापिता, सब की आकांक्षाओं पर खरा उतरना था. यही कारण था कि मंदिर से लाउडस्पीकर की आ रही ध्वनि उसे बारबार परेशान कर रही थी.

भक्तजनों ने ‘जयजगदंबे’, ‘जय महाकाली’ के जयकारे लगाए तो लगा, उस के दिमाग पर वे लोग हथौड़ों की तरह वार कर रहे हैं. मृदंग और ढोलक की आवाज से राहुल का सिर फटा जा रहा था. जब उस की सहनशक्ति जवाब देने लगी तो वह उठा और पुजारीजी के पास जा कर हाथ जोड़ विनम्र शब्दों में प्रार्थना की, ‘पुजारीजी, कल मेरी 10वीं की वार्षिक परीक्षा है. कृपया लाउड- स्पीकर की आवाज थोड़ी हलकी करवा दें या उस का मुंह मेरे घर से दूसरी तरफ करवा दें तो आप की बड़ी कृपा होगी क्योंकि शोर के कारण मुझ से पढ़ा नहीं जा रहा है.’

पता नहीं पुजारी ने सुना नहीं या सुन कर भी अनसुना कर दिया. वह अपने चेले से बोले, ‘भई, जरा कलश तो पकड़ाना, पूजा में उस की जरूरत पड़ने वाली है.’

राहुल उन के और समीप पहुंचा और तनिक जोर से अपनी प्रार्थना फिर दोहराई. पर पुजारीजी के पास शायद राहुल की कोई बात सुनने का समय ही न था. 2 बार अपनी उपेक्षा देख कर वह तीसरी बार थोड़ा और साहस जुटा कर पुजारी के सामने जा कर खड़ा हो गया और फिर से नम्र निवेदन किया.

‘अरे, लड़के. क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़ा है?’ पुजारीजी ने आव देखा न ताव, कड़क कर बोले, ‘दिखाई नहीं देता कि पूजा में देर हो रही है. क्या कहा तू ने? जागरण से तेरी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा है? अरे, कौन सी बी.ए. की परीक्षा देनी है, और फिर पढ़लिख कर  करेगा भी क्या? काम तो तुझे कपड़े की दुकान पर ही करना है. चल, छोड़ पढ़ाईलिखाई और महामाई का गुणगान करने को आजा, वही तेरी नैया पार लगाएंगी.’

पुजारी की बात राहुल को गाली से भी बुरी लगी. वह क्या करना चाहता है, क्या बनना चाहता है, यह तो वही जानता था. कपड़े की दुकान पर काम वाली बात राहुल कड़वे घूंट की तरह पी गया और मौके की नजाकत को देखते हुए पुजारी के सामने गिड़गिड़ा कर बोला, ‘पुजारीजी, परीक्षा छोटी हो या बड़ी, परीक्षा परीक्षा ही होती है. मैं आप से यह तो नहीं कहता कि जागरण बंद कर दें या लाउडस्पीकर बंद कर दें. हां, कुछ ऐसा कीजिए कि जागरण भी चलता रहे और मुझे पढ़ने में असुविधा भी न हो.’

राहुल का इतना कहना था कि पुजारी गुस्से में लालपीले हो गए. एकदम भड़क उठे और बोले, ‘मां जगदंबा के जगराते में विघ्न डालता है? निकृष्ट बालक, मां की अनुकंपा के बिना तू अच्छे नंबरों से तो क्या पास भी नहीं हो सकता,’ क्रोध से तमतमाए पुजारी ने अपने चेलों को आदेश दे कर लाउडस्पीकर की आवाज और भी ऊंची करवा दी.

निराश राहुल को मदन ताऊजी की याद आई जो महल्ले में किसी की कैसी भी समस्या हो धैर्य से सुनते थे और प्राय: समस्या का उचित समाधान भी ढूंढ़ते थे. वह अपनी व्यथा ले कर ताऊजी के पास जा पहुंचा. ताऊजी ने उस की सारी बातें ध्यान से सुनीं. उन्हें राहुल की बातों में सचाई और तर्क दोनों की झलक दिखाई दी. वह राहुल को ढांढ़स बंधाते हुए बोले, ‘बेटा, मैं तुम्हारे साथ चलता हूं, मुझे भरोसा है कि पुजारीजी मेरी बात जरूर सुनेंगे. उन का मूड किसी वजह से खराब होगा अन्यथा तुम्हारी इतनी छोटी सी बात मानने में भला उन का क्या जाता है.’

जागरण के पंडाल में पहुंच कर मदन ताऊजी ने पुजारी को नमस्कार किया और विनम्रतापूर्वक बोले, ‘पुजारीजी, इस लड़के की कल परीक्षा है. यदि लाउडस्पीकर जरा धीमा कर दें तो…’ ताऊजी की बात बीच में काटते हुए पुजारीजी उसी गुस्से भरी मुद्रा में बोले, ‘पंडितजी, तो ले आया आप को भी अपने साथ यह लड़का और आप भी इस की बातों में आ गए. यह लड़का पढ़ने का नाटक करता है. कल सारा दिन तो मैं ने इसे महल्ले में घूमते देखा और अब ठीक जागरण के समय इसे पढ़ाई की सूझ रही है.’

पुजारी द्वारा मंदिर के अहाते में देवी मां के सामने बोले गए सफेद झूठ ने राहुल की आत्मा को झकझोर दिया. वह भौचक हो कर पुजारी और ताऊ की बातों को सुनता रहा. आखिर जब बात किसी तरह नहीं बनी तो ताऊजी ने भी पुजारी के हठी आचरण के सामने हथियार डाल दिए और मुड़ कर राहुल से बोले, ‘बेटा राहुल, लगता है पुजारीजी मानने वाले नहीं हैं, तुम ही कहीं और जा कर पढ़ लो.’

राहुल खिन्न हो गया. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह वापस घर आया तो चौखट पर खड़ी मां ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और पुचकारते हुए बोलीं, ‘बेटा, अगर पुजारीजी ने तुम्हारे ताऊजी की बात नहीं मानी तो अब किसी और की बात मानने की संभावना शून्य है. अच्छा है कि तुम अब सो जाओ, और सुबह जल्दी उठ जाना और तब पढ़ाई कर लेना.’

मां की बात मान राहुल सोने की कोशिश करने लगा लेकिन इतने शोर में नींद भी कहां आती? वह इसी उधेड़बुन में था कि कैसे इस विपदा से पार पाया जाए. तरहतरह के विचार उस के मन में आने लगे कि क्या करूं, कहां जाऊं? हताश मन में एक विचार आया कि स्कूल में जा कर पढ़ लेता हूं. तभी अंदर से उत्तर मिला, वहां तो सारे कमरे बंद होंगे और फिर इतनी रात में कमरा कौन खोलेगा. मदर प्रिंसिपल से टेलीफोन कर के पूछूं? पर कहीं मना कर दिया तो? लेकिन मन ने आवाज दी, नहीं…नहीं…मना नहीं करेंगी क्योंकि वह बहुत प्यार करती हैं मुझ से. शायद मां से भी ज्यादा. इतनी रात गए क्या कहूंगा उन्हें कि मदरजी, हमारे धर्म में गौड की प्रेयर धूमधड़ाके वाली, शोरगुल से भरपूर होती है. भांग पी कर नाचते पुजारी और जोरजोर से मृदंग और करताल पीटते उन के चेले गौड्स को मनाने के अनिवार्य अंग होते हैं.

राहुल ने हृदय में मची उथलपुथल को अपनी बाल बुद्धि से तर्क दे कर शांत करने का प्रयास किया. सोचा, नींद तो आ नहीं रही, इधरउधर मन भटकाने से अच्छा है कि यहीं पढ़ने की कोशिश की जाए. सवाल ही तो हल करने हैं. एक बार एकाग्रता बन गई तो शोर सुनाई देना स्वत: ही बंद हो जाएगा.

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बहुत चाहने के बावजूद भी राहुल की एकाग्रता बन नहीं पा रही थी. अनमना सा वह उठा और पड़ोस में जा कर स्कूल में टेलीफोन कर ही दिया.

‘गुड इवनिंग मदर, मैं राहुल बोल रहा हूं.’

‘वैल सन, कैसे याद किया? सब ठीक तो है न?’

‘मैम, मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं क्योंकि मेरे घर के पास लाउडस्पीकर का बहुत शोर हो रहा है.’

‘राहुल, तुम शोर करने वालों से प्रार्थना करो कि वे शोर न करें. उन को बताओ कि कल तुम्हारा मैथ का पेपर है. वे तुम्हारी बात जरूर मान लेंगे,’ मदर ने राहुल को समझाया.

‘मैम, सब तरीके अपनाने के बाद ही आप को इतनी रात में फोन किया है. आई एम सौरी, मैम.’

मदर प्रिंसिपल भांप गईं कि सचमुच राहुल के सामने भारी समस्या है वरना वह कभी फोन न करता. इसलिए जरूरी है कि इस समय उस की मदद की जाए.

‘सन, तुम होस्टल आ जाओ. यहां मैं तुम्हारी पढ़ाई का पूरा इंतजाम कर दूंगी,’ मदर प्रिंसिपल की आवाज में सहानुभूति और वात्सल्य का मेल था.

राहुल होस्टल पहुंच गया. मदर प्रिंसिपल ने उस का बेड डोरमेटरी में लगवा दिया था. पढ़ाई पूरी कर के वह सोने का प्रयत्न करने लगा.

बचपन से ले कर किशोर होने तक का सफर सिनेमा की तरह उस की आंखों के सामने घूम गया. राहुल के घर और मंदिर की दीवार साझी थी. जब से उस ने होश संभाला था, अपनेआप को मंदिर से किसी न किसी तरह जुड़ा पाया था. पूरे महल्ले के बच्चे खेलने के लिए मंदिर में जमा होते थे. वह भी वहीं खेलता था. सर्दियों में मंदिर के विशाल मैदान में खिली धूप का आनंद मिलता था तो गरमियों में नीम, पीपल तथा बरगद की ठंडी छांव सुख पहुंचाती थी.

मंदिर में कोई न कोई कथावार्ता हमेशा चलती रहती थी. संतमहात्मा आते रहते थे और अपने प्रवचनों से लोगों को ज्ञान प्रदान करते थे. ताऊजी भी अधिकांश समय मंदिर में बिताते थे. रोज सुबह खुद भी और बच्चों से भी हनुमान चालीसा का पाठ करवाते थे, जो उन्हें मुंहजबानी याद था. अनेक भक्तों की कहानियां ताऊजी को याद थीं. पुंडरीक, प्रह्लाद व ध्रुव आदि की कहानियां न जाने कितनी बार उन्होेंने राहुल को सुनाई थीं.

ताऊजी अपने ढंग से बच्चों को कहानियों के माध्यम से अनेक शिक्षाएं देते थे, ‘सदा सच बोलो’, ‘अन्याय मत करो’, ‘अन्याय मत सहो’, ‘अत्याचार मत करो’, ‘अत्याचारी से बड़ा पापी अत्याचार सहने वाला होता है’ आदि. बच्चों को भी उन की कहानियां सुनने में बड़ा आनंद आता था.

राहुल को वह दिन याद आया जिस दिन ताऊजी ने धन्ना जाट की कहानी उसे सुनाई थी. कहानी कुछ ऐसी थी कि राहुल के मन में कौतूहल जाग उठा. उस ने सोचा कि यदि धन्ना जाट अपने हठ से कृष्ण को पा सकता है तो वह क्यों नहीं? एक पत्थर उठाया और बैठ गया राहुल भी उस के सामने यह हठ कर के कि ‘तब तक न खाऊंगा, न पीऊंगा जब तक प्रभु दर्शन नहीं देते. ताऊजी की शैली में धन्ना जाट का डायलाग राहुल ने पत्थर के सामने दोहराया.

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3-4 घंटे बीत जाने पर मां ने राहुल को ढूंढ़ना शुरू किया और जब वह कमरे में गईं तो देखा, पत्थर के सामने दीपक और अगरबत्ती जला कर राहुल बैठा है. मां को जब सारी बात का पता चला तो उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. हंसी भी आई और दुलार भी आया बेटे के भोलेपन पर.

होस्टल के बिस्तर पर पड़े राहुल को अतीत की वह हर घटना याद आ रही थी जिस ने बालक राहुल को सनातन कर्मकांड का भक्त बना दिया था. प्राय: उस का दिन मंदिर में जा कर पूजा से शुरू होता था. परीक्षा देने जाते समय भगवान को टीका अवश्य लगाता था. पूजापाठ या मंदिर का कोई भी काम होता तो राहुल सब से आगे होता था. राहुल के विवेक पर आस्था का साम्राज्य हो गया था.

छठी कक्षा की वह घटना भी उसे याद आई जब सिस्टर फ्लोरेंस स्कूल में हनुमानजी के बारे में पढ़ा रही थीं, ‘हनुमान वाज ए मंकी’ (हनुमान एक बंदर था).

राहुल का दिमाग भन्ना गया. वह बिफर कर बोला, ‘सिस्टर, हनुमान वाज नाट ए मंकी. ही वाज ए सर्वेंट आफ गौड.’ (अर्थात हनुमान बंदर नहीं भगवान के सेवक थे)

‘परंतु था तो बंदर ही,’ सिस्टर ने तर्क दिया.

‘नहीं, यह मेरे आराध्य देव का अपमान है. वे केवल रामभक्त थे, यही उन का परिचय है,’ ताऊजी के दिए संस्कार राहुल के सिर चढ़ कर बोल रहे थे.

राहुल के साहस और उग्रता के सामने सिस्टर फ्लोरेंस धीमी पड़ गई. वह खुद कोई दंड न दे कर राहुल को मदर प्रिंसिपल के पास ले गईं.

मदर प्रिंसिपल ने गंभीरतापूर्वक कहा था, ‘फ्लौरेंस, अगर हनुमान को बंदर कहने से राहुल की भावनाओं को ठेस पहुंचती है तो जो वह कहना चाहता है उसे वही कहने दो. दूसरों की भावनाओं का आदर करना ही मानव जाति का सब से बड़ा धर्म है और उन्हें कुचलना सब से बड़ा अधर्म.’

गांठ की तरह बांध ली थी राहुल ने अपने पल्ले से प्रिंसिपल मैम की यह बात.

राहुल को पुजारी के व्यवहार ने तोड़ दिया था. उस का संवेदनशील मन, सच और सही रास्ते की तलाश में भटक रहा था. वह भगवान के अस्तित्व को खोज रहा था. उसे फैसला करना था कि भगवान है कहां? मन में या मंदिर में, मानवता की सेवा में या मृदंग की थाप में? किसी का दिल दुखाने में या किसी की सहायता करने में? राहुल के मन

में मंथन जारी था. पता नहीं कब मन

में यह कशमकश लिए राहुल को नींद आ गई.

इस घटना को 30 साल बीत चुके हैं. पुजारीजी अभी जिंदा हैं. उन को पक्षाघात हो गया है जिस के कारण उन्होंने खटिया पकड़ ली है. उन के चेलों में सब से उद्दंड चेला अब पुजारी बन चुका है. उस ने उन की खाट मंदिर से निकाल, पिछवाड़े में भैंसों के तबेले के साथ वाले कमरे में डाल दी है.

जब राहुल ताऊजी के संस्कार पर गया था तो वह पुजारीजी से भी मिल कर आया था.

राहुल ने अपने साथ चलने के लिए पुजारीजी से आग्रह किया था ताकि वह अपने हस्पताल में उन का इलाज करवा सके. लेकिन वह नहीं माने तो उन की खटिया वापस मंदिर के आंगन में डलवा दी थी और नए पुजारी से उन के इलाज के लिए हर माह कुछ रकम भेजने का वादा भी किया था.

मदर प्रिंसिपल से राहुल की मुलाकात लगभग 12 बरस पहले स्कूल के रजत जयंती समारोह में हुई थी. उन के सीने में दर्द रहने लगा था और उन्होंने अपनी बीमारी की फाइल राहुल को दिखाई थी. राहुल जब उन के लिए दवाइयां लिख रहा था तो उन की आंखों की चमक बता रही थी कि वह खुशी से अधिक गर्व महसूस कर रही हैं. उन का नन्हा राहुल उन की हर आकांक्षाओं पर खरा जो उतरा.

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राहुल की शादी हुए लगभग 10 साल हो चुके हैं. उस के 2 होनहार बच्चे हैं. राहुल कभी मंदिर नहीं जाता. पूरे परिवार को राहुल का यह व्यवहार बड़ा अटपटा लगता है. पत्नी कई बार सोचती है कि हर बात में बुद्धिसंगत व्यवहार करने वाले राहुल मंदिर का नाम आते ही इतना असंगत क्यों हो जाते हैं? ऐसी क्या गांठ राहुल के मन में है कि वह किसी भी तरह मंदिर जाने के लिए तैयार नहीं होते.

आज 30 साल बाद राहुल दक्षिण भारत के मदुरई नगर में स्थित मीनाक्षी मंदिर की दहलीज पर खड़ा है. राहुल ने अपना कदम आगे बढ़ाया और मंदिर की चौखट लांघी पर लांघने वाले कदम भगत राहुल के नहीं अपितु पर्यटक राहुल के थे.         द्य

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