भोजपुरी फिल्मों के बाद अब वेब सीरीज में तहलका मचाएंगी अक्षरा सिंह

हाल ही में बिहार के दरभंगा में अक्षरा सिंह के नृत्य का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. अक्षरा सिंह के नृत्य के हर स्टेप पर लोग न सिर्फ झूमते हुए दिखे बल्कि उन का दीदार करने के लिए बेताब नजर आए.

अक्षरा सिंह का मानना है कि भोजपुरी फिल्मों के अलावा उन्होंने भोजपुरी संगीत के जो अलबम किए हैं, उन के चलते भी अब उन के प्रशंसक पूरे देश में तेजी से बढ़े हैं. उन की सब से बड़ी खासियत यह है कि अब वे न सिर्फ फिल्मों में, बल्कि स्टेज कार्यक्रम के समय भी खुद गीत गाती हैं.

इन दिनों अक्षरा अपनी नई फिल्म को ले कर उत्साहित हैं जिस में उन के हीरो रितेश पांडे होंगे और फिल्म का निर्देशन मंजुल ठाकुर करेंगे.

बिहारी वैब सीरीज ‘लिट्टी वाला लव’

मनोरंजन की दुनिया में इन दिनों वैब सीरीज का चलन न सिर्फ तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रहा है. इसी क्रम में अब बिहार में रोमकौम जोनर की कहानी पर बनी पहली वैब सीरीज ‘लिट्टी वाला लव’ का जुलाई माह के पहले सप्ताह से यूट्यूब चैनल लहसुन फिल्म्स पर प्रसारण शुरू हुआ.

6 एपिसोड के इस वैब सीरीज के पहले एपिसोड ने ही लोगों को अपना दीवाना बना लिया है. इस के संवाद पटना स्टाइल में हैं. इस वैब सीरीज की सब से बड़ी खासियत यह है कि बिहारी स्टाइल में बनी यह सीरीज बिहारवासियों के प्रति देश में जो धारणा बनी है, उस पर कठोर कटाक्ष भी करती है.

इस के निर्माता अंकित भारद्वाज कहते हैं, ‘‘बिहारी प्रतिभाएं हर क्षेत्र में अव्वल हैं. तभी तो हम जब बिहार का पहला वैब सीरीज ‘लिट्टी वाला लव’ ले कर आए. तो लोगों का खूब प्यार मिलना शुरू हो गया. यह रोमांटिक कौमेडी है.’’

खेसारीलाल बने कुली नंबर वन

पिछले कुछ समय से भोजपुरी फिल्में बौक्सऔफिस पर कुछ खास कमाई नहीं कर पा रही हैं. मगर 2019 की पहली छमाही में अभिनेता खेसारीलाल यादव की फिल्म ‘कुली नंबर वन’ बौक्सऔफिस पर अच्छी कमाई कर इस साल की पहली छमाही की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म बन गई है.

सुरेंद्र प्रसाद निर्मित और लाल बाबू पंडित निर्देशित भोजपुरी फिल्म ‘कुली नंबर वन’ को जब ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ के साथ प्रदर्शित किया गया था तो कइयों ने कहा कि यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला कदम है. लेकिन अब सभी प्रशंसा करने में जुट गए हैं.

इस फिल्म को मिली सफलता के साथ ही अब अभिनेत्री काजल राघवानी का भी लाल बाबू पंडित के कैंप में प्रवेश हो गया है. ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘कुली नंबर वन’ में खेसारीलाल यादव के साथ काजल राघवानी की रोमांटिक जोड़ी है.

कैसी है सीमा

झाड़ूपोंछा तो महरी करने लगी पर भोजन बनाने का भार मौसी पर आ पड़ा. वह नाश्ता और खाना बनाने में परेशान हो जातीं. अब वह बिना मसाले की सादी सब्जी से काम चला लेतीं. कहतीं, ‘‘अब उम्र हो गई. काम करने की पहले जैसी ताकत थोड़े ही रह गई है.’’

सीमा का मन होता, पूछे, मौसी, सिर्फ खाना ही तो बनाना है. और खाना बनाना भी कोई काम है? तुम तो कहती थीं, दालचावल और सब्जीरोटी तो कैदियों का खाना है. तुम ऐसा खाना क्यों बना रही हो, मौसी?

किसी तरह सप्ताह बीता था कि मौसी का मन उखड़ने लगा. एक दिन प्रभात से बोलीं, ‘‘बेटा, तुम्हारे पास बहुत दिन रह ली. सुरेखा रोज सपने में दिखाई देती है. जाने क्या बात है. बहू जैसी ही उस की भी हालत है.’’

प्रभात सन्न रह गए, ‘‘मौसी, ऐसी कोई बात होती तो सुरेखा का पत्र जरूर आता. तुम चली जाओगी तो बड़ी मुसीबत होगी. अच्छा होता जो कुछ दिन और रुकजातीं.’’

पर मौसी नहीं मानीं. वह बेटी को याद कर के रोने लगीं. प्रभात निरुपाय हो गए. उन्होंने उसी दिन गांव पत्र लिखा.

सुशीला जीजी पिछले साल 2 माह रह कर गई थीं. उन्हें भी एक पत्र विस्तार से लिखा. कई दिनों बाद गांव से पत्र आया कि 15 दिनों बाद अम्मां स्वयं आएंगी. पर 15 दिनों के लिए दूसरी क्या व्यवस्था हो सकेगी?

ये भी पढ़ें- गृहस्थी की डोर

प्रभात को याद आया कि मंगला की बीमारी का समाचार मिलते ही गांव के लोग किस तरह हैदराबाद तक दौड़े चले जाते हैं. फिर सीमा के लिए ऐसा क्यों? शायद इस का कारण वह स्वयं ही है. जिस तरह सुनील ने अपने परिजनों के हृदय में मंगला के लिए स्नेह और सम्मान के बीज बोए थे, वैसा सीमा के लिए कभी किया था उस ने?

15 दिन बाद अम्मां गांव से आ गईं. उन के आते ही प्रभात निश्चिंत हो गए. उन्हें विश्वास था कि अम्मां अब सब संभाल लेंगी. मार्च का महीना?था. वह अपने दफ्तर के कार्यों में व्यस्त हो गए. सुबह घर से जल्द निकलते और रात को देर से घर लौटते.

पिछले वर्ष जब मंगला को आपरेशन से बच्चा हुआ था, उस समय अम्मां हैदराबाद में ही थीं. उन्होंने उस की खूब सेवा की थी. उस की सेवा का औचित्य उन की समझ में आता था, लेकिन सीमा को क्या हुआ, यह उन की समझ में ही न आता. वह दिनभर काम करें और बहू आराम करे, यह उन के लिए असहाय था.

प्रभात के सामने तो अम्मांजी चुपचाप काम किए जातीं, परंतु उन के जाते ही व्यंग्य बाण उन के तरकस में कसमसाने लगते. कभी वह इधरउधर निकल जातीं.

महल्ले की स्त्रियां मजा लेने के लिए उन्हें छेड़तीं, ‘‘अम्मां, हो गया काम?’’

‘‘हां भई, काम तो करना ही है. पुराने जमाने में बहुएं सास की सेवा करती थीं, आज के जमाने में सास को बहुओं की सेवा करनी पड़ती?है.’’

सीमा सुनती तो संकोच से गड़ जाती. किस मजबूरी में वह उन की सेवा ग्रहण कर रही थी, इसे तो वही जानती थी.

उसी समय प्रभात को दफ्तर के काम से सूरत जाना पड़ा. उन के जाने की बात सुन कर सीमा विकल हो उठी थी. जाने के 2 दिन पहले उस ने प्रभात से कहा भी, ‘‘अम्मां से कार्य करवाना मुझे अच्छा नहीं लगता. उन की यहां रहने की इच्छा भी नहीं है. उन्हें जाने दीजिए. यहां जैसा होगा, देखा जाएगा.’’

‘‘परिवार से संबंध बनाना तुम जानती ही नहीं हो,’’ प्रभात ने उपेक्षा से कहा था.

प्रभात के जाते ही अम्मां मुक्त हो गई थीं. वह कभी मंदिर निकल जातीं, कभी अड़ोसपड़ोस में जा बैठतीं. सीमा को यह सब अच्छा ही लगता. उन की उपस्थिति में जाने क्यों उस का दम घुटता था.

उस दिन अम्मां सामने के घर में बैठी बतिया रही थीं. सीमा ने टंकी में से आधी बालटी पानी निकाला और उठाने ही जा रही थी कि देखा, अम्मां सामने खड़ी हैं. उसे याद आया अम्मां पीछे वाली पड़ोसिन से कह रही थीं, ‘‘प्रभात पेट में था, तब छोटी ननद की शादी पड़ी. हमें बड़ेबड़े बरतन उठाने पड़े,  पर कहीं कुछ नहीं हुआ. हमारी बहू तो 2-2 लोटा पानी ले कर बालटी भरती है, तब नहाती?है.’’

सीमा ने झेंप कर बालटी भरी और उठा कर स्नानघर तक पहुंची ही थी कि दर्द के कारण बैठ जाना पड़ा. जिस का भय था, वही हो गया. डाक्टर निरुपाय थे. गर्भपात कराना जरूरी हो गया.

अम्मां रोरो कर सब से कह रही थीं, ‘‘हम इतना काम करते थे तो भला क्या इन्हें बालटी भर पानी नहीं दे सकते थे. हमारे रहने का क्या फायदा हुआ?’’

ये भी पढ़ें- साथ-साथ

उसी दिन शाम को प्रभात घर लौटे. अस्पताल पहुंचे तो डाक्टर गर्भपात कर के बाहर निकल रही थीं. उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘बच्चा निकालना जरूरी हो गया था. लड़का था.’’

प्रभात हतबुद्धि से डाक्टर को देखते रह गए. फिर अचकचा कर पूछा, ‘‘सीमा कैसी है?’’

कभी-कभी ऐसा भी…

शौपिंग कर के बाहर आई तो देखा मेरी गाड़ी गायब थी. मेरे तो होश ही उड़ गए कि यह क्या हो गया, गाड़ी कहां गई मेरी? अभी थोड़ी देर पहले यहीं तो पार्क कर के गई थी. आगेपीछे, इधरउधर बदहवास सी मैं ने सब जगह जा कर देखा कि शायद मैं ही जल्दी में सही जगह भूल गई हूं. मगर नहीं, मेरी गाड़ी का तो वहां नामोनिशान भी नहीं था. चूंकि वहां कई और गाडि़यां खड़ी थीं, इसलिए मैं ने भी वहीं एक जगह अपनी गाड़ी लगा दी थी और अंदर बाजार में चली गई थी. बेबसी में मेरी आंखों से आंसू निकल आए.

पिछले साल, जब से श्रेयस का ट्रांसफर गाजियाबाद से गोरखपुर हुआ है और मुझे बच्चों की पढ़ाई की वजह से यहां अकेले रहना पड़ रहा है, जिंदगी का जैसे रुख ही बदल गया है. जिंदगी बहुत बेरंग और मुश्किल लगने लगी है.

श्रेयस उत्तर प्रदेश सरकार की उच्च सरकारी सेवा में है, सो हमेशा नौकर- चाकर, गाड़ी सभी सुविधाएं मिलती रहीं. कभी कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी. बैठेबिठाए ही एक हुक्म के साथ सब काम हो जाता था. पिछले साल प्रमोशन के साथ जब उन का तबादला हुआ तो उस समय बड़ी बेटी 10वीं कक्षा में थी, सो मैं उस के साथ जा ही नहीं सकती थी और इस साल अब छोटी बेटी 10वीं कक्षा में है. सही माने में तो अब अकेले रहने पर मुझे आटेदाल का भाव पता चल रहा था.

सही में कितना मुश्किल है अकेले रहना, वह भी एक औरत के लिए. जिंदगी की कितनी ही सचाइयां इस 1 साल के दौरान आईना जैसे बन कर मेरे सामने आई थीं.

औरों की तो मुझे पता नहीं, लेकिन मेरे संग तो ऐसा ही था. शादी से पहले भी कभी कुछ नहीं सीख पाई क्योंकि पापा भी उच्च सरकारी नौकरी में थे, सो जहां जाते थे, बस हर दम गार्ड, अर्दली आदि संग ही रहते थे. शादी के बाद श्रेयस के संग भी सब मजे से चलता रहा. मुश्किलें तो अब आ रही हैं अकेले रह के.

मोबाइल फोन से अपनी परेशानी श्रेयस के साथ शेयर करनी चाही तो वह भी एक मीटिंग में थे, सो जल्दी से बोले, ‘‘परेशान मत हो पूरबी. हो सकता है कि नौनपार्किंग की वजह से पुलिस वाले गाड़ी थाने खींच ले गए हों. मिल जाएगी…’’

ये भी पढ़ें- Social Story In Hindi: सच्चाई सामने आती है पर देर से

उन से बात कर के थोड़ी हिम्मत तो खैर मिली ही मगर मेरी गाड़ी…मरती क्या न करती. पता कर के जैसेतैसे रिकशा से पास ही के थाने पहुंची. वहां दूर से ही अपनी गाड़ी खड़ी देख कर जान में जान आई.

श्रेयस ने अभी फोन पर समझाया था कि पुलिस वालों से ज्यादा कुछ नहीं बोलना. वे जो जुर्माना, चालान भरने को कहें, चुपचाप भर के अपनी गाड़ी ले आना. मुझे पता है कि अगर उन्होंने जरा भी ऐसावैसा तुम से कह दिया तो तुम्हें सहन नहीं होगा. अपनी इज्जत अपने ही हाथ में है, पूरबी.

दूर रह कर के भी श्रेयस इसी तरह मेरा मनोबल बनाए रखते थे और आज भी उन के शब्दों से मुझ में बहुत हिम्मत आ गई और मैं लपकते हुए अंदर पहुंची. जो थानेदार सा वहां बैठा था उस से बोली, ‘‘मेरी गाड़ी, जो आप यहां ले आए हैं, मैं वापस लेने आई हूं.’’

उस ने पहले मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा, फिर बहुत अजीब ढंग से बोला, ‘‘अच्छा तो वह ‘वेगनार’ आप की है. अरे, मैडमजी, क्यों इधरउधर गाड़ी खड़ी कर देती हैं आप और परेशानी हम लोगों को होती है.’’

मैं तो चुपचाप श्रेयस के कहे मुताबिक शांति से जुर्माना भर कर अपनी गाड़ी ले जाती लेकिन जिस बुरे ढंग से उस ने मुझ से कहा, वह भला मुझे कहां सहन होने वाला था. श्रेयस कितना सही समझते हैं मुझे, क्योंकि बचपन से अब तक मैं जिस माहौल में रही थी ऐसी किसी परिस्थिति से कभी सामना हुआ ही नहीं था. गुस्से से बोली, ‘‘देखा था मैं ने, वहां कोई ‘नो पार्किंग’ का बोर्ड नहीं था. और भी कई गाडि़यां वहां खड़ी थीं तो उन्हें क्यों नहीं खींच लाए आप लोग. मेरी ही गाड़ी से क्या दुश्मनी है भैया,’’ कहतेकहते अपने गुस्से पर थोड़ा सा नियंत्रण हो गया था मेरा.

इतने में अंदर से एक और पुलिस वाला भी वहां आ पहुंचा. मेरी बात उस ने सुन ली थी. आते ही गुस्से से बोला, ‘‘नो पार्किंग का बोर्ड तो कई बार लगा चुके हैं हम लोग पर आप जैसे लोग ही उसे हटा कर इधरउधर रख देते हैं और फिर आप से भला हमारी क्या दुश्मनी होगी. बस, पुलिस के हाथों जब जो आ जाए. हो सकता है और गाडि़यों में उस वक्त ड्राइवर बैठे हों. खैर, यह तो बताइए कि पेपर्स, लाइसेंस, आर.सी. आदि सब हैं न आप की गाड़ी में. नहीं तो और मुश्किल हो जाएगी. जुर्माना भी ज्यादा भरना पड़ेगा और काररवाई भी लंबी होगी.’’

उस के शब्दों से मैं फिर डर गई मगर ऊपर से बोल्ड हो कर बोली, ‘‘वह सब है. चाहें तो चेक कर लें और जुर्माना बताएं, कितना भरना है.’’

मेरे बोलने के अंदाज से शायद वे दोनों पुलिस वाले समझ गए कि मैं कोई ऊंची चीज हूं. पहले वाला बोला, ‘‘परेशान मत होइए मैडम, ऐसा है कि अगर आप परची कटवाएंगी तो 500 रुपए देने पड़ेंगे और नहीं तो 300 रुपए में ही काम चल जाएगा. आप भी क्या करोगी परची कटा कर. आप 300 रुपए हमें दे जाएं और अपनी गाड़ी ले जाएं.’’

उस की बात सुन कर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, मगर मैं अकेली कर भी क्या सकती थी. हर जगह हर कोने में यही सब चल रहा है एक भयंकर बीमारी के रूप में, जिस का कोई इलाज कम से कम अकेले मेरे पास तो नहीं है. 300 रुपए ले कर चालान की परची नहीं काटने वाले ये लोग रुपए अपनीअपनी जेब में ही रख लेंगे.

मुझ में ज्यादा समझ तो नहीं थी लेकिन यह जरूर पता था कि जिंदगी में शार्टकट कहीं नहीं मारने चाहिए. उन से पहुंच तो आप जरूर जल्दी जाएंगे लेकिन बाद में लगेगा कि जल्दबाजी में गलत ही आ गए. कई बार घर पर भी ए.सी., फ्रिज, वाशिंग मशीन या अन्य किसी सामान की सर्विसिंग के लिए मेकैनिक बुलाओ तो वे भी अब यही कहने लगे हैं कि मैडम, बिल अगर नहीं बनवाएंगी तो थोड़ा कम पड़ जाएगा. बाकी तो फिर कंपनी के जो रेट हैं, वही देने पड़ेंगे.

श्रेयस हमेशा यह रास्ता अपनाने को मना करते हैं. कहते हैं कि थोड़े लालच की वजह से यह शार्टकट ठीक नहीं. अरे, यथोचित ढंग से बिल बनवाओ ताकि कोई समस्या हो तो कंपनी वालों को हड़का तो सको. वह आदमी तो अपनी बात से मुकर भी सकता है, कंपनी छोड़ कर इधरउधर जा भी सकता है मगर कंपनी भाग कर कहां जाएगी. इतना सब सोच कर मैं ने कहा, ‘‘नहीं, आप चालान की रसीद काटिए. मैं पूरा जुर्माना भरूंगी.’’

मेरे इस निर्णय से उन दोनों के चेहरे लटक गए, उन की जेबें जो गरम होने से रह गई थीं. मुझे उन का मायूस चेहरा देख कर वाकई बहुत अच्छा लगा. तभी मन में आया कि इनसान चाहे तो कुछ भी कर सकता है, जरूरत है अपने पर विश्वास की और पहल करने की.

वैसे तो श्रेयस के साथ के कई अफसर यहां थे और पापा के समय के भी कई अंकल मेरे जानकार थे. चाहती तो किसी को भी फोन कर के हेल्प ले सकती थी लेकिन श्रेयस के पीछे पहली बार घर संभालना पड़ रहा था और अब तो नईनई चुनौतियों का सामना खुद करने में मजा आने लगा था. ये आएदिन की मुश्किलें, मुसीबतें, जब इन्हें खुद हल करती थी तो जो खुशी और संतुष्टि मिलती उस का स्वाद वाकई कुछ और ही होता था.

पूरा जुर्माना अदा कर के आत्म- विश्वास से भरी जब थाने से बाहर निकल रही थी तो देखा कि 2 पुलिस वाले बड़ी बेदर्दी से 2 लड़कों को घसीट कर ला रहे थे. उन में से एक पुलिस वाला चीखता जा रहा था, ‘‘झूठ बोलते हो कि उन मैडम का पर्स तुम ने नहीं झपटा है.’’

‘‘नाक में दम कर रखा है तुम बाइक वालों ने. कभी किसी औरत की चेन तो कभी पर्स. झपट कर बाइक पर भागते हो कि किसी की पकड़ में नहीं आते. आज आए हो जैसेतैसे पकड़ में. तुम बाइक वालों की वजह से पुलिस विभाग बदनाम हो गया है. तुम्हारी वजह से कहीं नारी शक्ति प्रदर्शन किए जा रहे हैं तो कहीं मंत्रीजी के शहर में शांति बनाए रखने के फोन पर फोन आते रहते हैं. बस, अब तुम पकड़ में आए हो, अब देखना कैसे तुम से तुम्हारे पूरे गैंग का भंडाफोड़ हम करते हैं.’’

एक पुलिस वाला बके जा रहा था तो दूसरा कालर से घसीटता हुआ उन्हें थाने के अंदर ले जा रहा था. ऐसा दृश्य मैं ने तो सिर्फ फिल्मों में ही देखा था. डर के मारे मेरी तो घिग्गी ही बंध गई. नजर बचा कर साइड से निकलना चाहती थी कि बड़ी तेजी से आवाज आई, ‘‘मैडम, मैडम, अरे…अरे यह तो वही मैडम हैं…’’

मैं चौंकी कि यहां मुझे जानने वाला कौन आ गया. पीछे मुड़ कर देखा. बड़ी मुश्किल से पुलिस की गिरफ्त से खुद को छुड़ाते हुए वे दोनों लड़के मेरी तरफ लपके. मैं डर कर पीछे हटने लगी. अब जाने यह किस नई मुसीबत में फंस गई.

‘‘मैडम, आप ने हमें पहचाना नहीं,’’ उन में से एक बोला. मुझे देख कर कुछ अजीब सी उम्मीद दिखी उस के चेहरे पर.

‘‘मैं ने…आप को…’’ मैं असमंजस में थी…लग तो रहा था कि जरूर इन दोनों को कहीं देखा है. मगर कहां?

‘‘मैडम, हम वही दोनों हैं जिन्होंने अभी कुछ दिनों पहले आप की गाड़ी की स्टेपनी बदली थी, उस दिन जब बीच रास्ते में…याद आया आप को,’’ अब दूसरे ने मुझे याद दिलाने की कोशिश की.

ये भी पढ़ें- Family Story In Hindi: उन्मुक्त- कैसा था प्रौफेसर सोहनलाल का बुढ़ापे का जीवन

उन के याद दिलाने पर सब याद आ गया. इस गाड़ी की वजह से मैं एक नहीं, कई बार मुश्किल में फंसी हूं. श्रेयस ने यहां से जाते वक्त कहा भी था, ‘एक ड्राइवर रख देता हूं, तुम्हें आसानी रहेगी. तुम अकेली कहांकहां आतीजाती रहोगी. बाहर के कामों व रास्तों की तुम्हें कुछ जानकारी भी नहीं है.’ मगर तब मैं ने ही यह कह कर मना कर दिया था कि अरे, मुझे ड्राइविंग आती तो है. फिर ड्राइवर की क्या जरूरत है. रोजरोज मुझे कहीं जाना नहीं होता है. कभीकभी की जरूरत के लिए खामखां ही किसी को सारे वक्त सिर पर बिठाए रखूं. लेकिन बाद में लगा कि सिर्फ गाड़ी चलाना आने से ही कुछ नहीं होता. घर से बाहर निकलने पर एक महिला के लिए कई और भी मुसीबतें सामने आती हैं, जैसे आज यह आई और आज से करीब 2 महीने पहले वह आई थी.

उस दिन मेरी गाड़ी का बीच रास्ते में चलतेचलते ही टायर पंक्चर हो गया था. गाड़ी को एक तरफ रोकने के अलावा और कोई चारा नहीं था. बड़ी बेटी को उस की कोचिंग क्लास से लेने जा रही थी कि यह घटना घट गई. उस के फोन पर फोन आ रहे थे और मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करूं. गाड़ी में दूसरी स्टेपनी रखी तो थी लेकिन उसे लगाने वाला कोई चाहिए था. आसपास न कोई मैकेनिक शौप थी और न कोई मददगार. कितनी ही गाडि़यां, टेंपो, आटोरिक्शा आए और देखते हुए चले गए. मुझ में डर, घबराहट और चिंता बढ़ती जा रही थी. उधर, बेटी भी कोचिंग क्लास से बाहर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी. श्रेयस को फोन मिलाया तो वह फिर कहीं व्यस्त थे, सो खीझ कर बोले, ‘अरे, पूरबी, इसीलिए तुम से बोला था कि ड्राइवर रख लेते हैं…अब मैं यहां इतनी दूर से क्या करूं?’ कह कर उन्होंने फोन रख दिया.

काफी समय यों ही खड़ेखड़े निकल गया. तभी 2 लड़के मसीहा बन कर प्रकट हो गए. उन में से एक बाइक से उतर कर बोला, ‘मे आई हेल्प यू, मैडम?’

समझ में ही नहीं आया कि एकाएक क्या जवाब दूं. बस, मुंह से स्वत: ही निकल गया, ‘यस…प्लीज.’ और फिर 10 मिनट में ही दोनों लड़कों ने मेरी समस्या हल कर मुझे इतने बड़े संकट से उबार लिया. मैं तो तब उन दोनों लड़कों की इतनी कृतज्ञ हो गई कि बस, थैंक्स…थैंक्स ही कहती रही. रुंधे गले से आभार व्यक्त करती हुई बोली थी, ‘‘तुम लोगों ने आज मेरी इतनी मदद की है कि लगता है कि इनसानियत और मानवता अभी इस दुनिया में हैं. इतनी देर से अकेली परेशान खड़ी थी मैं. कोई नहीं रुका मेरी मदद को.’’ थोड़ी देर बाद फिर श्रेयस का फोन आया तो उन्हें जब उन लड़कों के बारे में बताया तो वह भी बहुत आभारी हुए उन के. बोले, ‘जहां इस समाज में बुरे लोग हैं तो अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है.’

और आज मेरे वे 2 मसीहा, मेरे मददगार इस हालत में थे. पहचानते ही तुरंत उन के पास आ कर बोली, ‘‘अरे, यह सब क्या है? तुम लोग इस हालत में. इंस्पेक्टर साहब, इन्हें क्यों पकड़ रखा है? ये बहुत अच्छे लड़के हैं.’’

‘‘अरे, मैडम, आप को नहीं पता. ये वे बाइक सवार हैं जिन की शिकायतें लेले के आप लोग आएदिन पुलिस थाने आया करते हैं. बमुश्किल आज ये पकड़ में आए हैं. बस, अब इन के संगसंग इन के पूरे गिरोह को भी पकड़ लेंगे और आप लोगों की शिकायतें दूर कर देंगे.’’

इतना बोल कर वे दोनों पुलिस वाले उन्हें खींचते हुए अंदर ले गए. मैं भी उन के पीछेपीछे हो ली.

मुझे अपने साथ खड़ा देख कर वे दोनों मेरी तरफ बड़ी उम्मीद से देखने लगे. फिर बोले, ‘‘मैडम, यकीन कीजिए, हम ने कुछ नहीं किया है. आप को तो पता है कि हम कैसे हैं. उन मैडम का पर्स झपट कर हम से आगे बाइक सवार ले जा रहे थे और उन मैडम ने हमें पकड़वा दिया. हम सचमुच निर्दोष हैं. हमें बचा लीजिए, प्लीज…’’

एक लड़का तो बच्चों की तरह जोरजोर से रोने लगा था. दूसरा बोला, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हम तो वहां से गुजर रहे थे बस. आप ने हमें पकड़ लिया. वे चोर तो भाग निकले. हमें छोड़ दीजिए. हम अच्छे घर के लड़के हैं. हमारे मम्मीपापा को पता चलेगा तो उन पर तो आफत ही आ जाएगी.’’

ये भी पढ़ें- Social Story In Hindi: नींद- मनोज का रति से क्या था रिश्ता

हालांकि मैं उन्हें बिलकुल नहीं जानती थी. यहां तक कि उन का नामपता भी मुझे मालूम नहीं था लेकिन कोई भी अच्छाबुरा व्यक्ति अपने कर्मों से पहचाना जाता है. मेरी मदद कर के उन्होंने साबित कर दिया था कि वे अच्छे लड़के हैं और अब उन की मदद करने की मेरी बारी थी. ऐसे कैसे ये पुलिस वाले किसी को भी जबरदस्ती पकड़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे और गुनाहगार शहर में दंगा मचाने को आजाद घूमते रहेंगे.

मैं ने कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, मैं इन्हें जानती हूं. ये बड़े अच्छे लड़के हैं. मेरे भाई हैं. आप गलत लोगों को पकड़ लाए हैं. इन्हें छोड़ दीजिए.’’

‘‘अरे मैडम, इन के मासूम और भोले चेहरों पर मत जाइए. जब चोर पकड़ में आता है तो वह ऐसे ही भोला बनता है. बड़ी मुश्किल से तो ये दोनों पकड़ में आए हैं और आप कहती हैं कि इन्हें छोड़ दें… और फिर ये आप के भाई कैसे हुए? दोनों तो मुसलिम हैं और अभी आप ने चालान की रसीद पर पूरबी अग्रवाल के नाम से साइन किया है तो आप हिंदू हुईं न,’’ बीच में वह पुलिस वाला बोल पड़ा जिस से मैं ने अपनी गाड़ी छुड़वाई थी.

उस के बेढंगे बोलने के अंदाज पर मुझे बहुत ताव आया और बोली, ‘‘इंस्पेक्टर, कुछ इनसानियत के रिश्ते हर धर्म, हर जाति से बड़े होते हैं. वक्त पड़ने पर जो आप के काम आ जाए, आप का सहारा बन जाए, बस उस मानवतारूपी धर्म और जाति का ही रिश्ता सब से बड़ा होता है. कुछ दिन पहले मैं एक मुसीबत में फंस गई थी, उस समय मेरी मदद करने को तत्पर इन लड़कों ने मुझ से मेरी जाति और धर्म नहीं पूछा था. इन्होंने मुझ से तब यह नहीं कहा था कि अगर आप मुसलिम होंगी तभी हम आप की मदद करेंगे. इन्होंने महज इनसानियत का धर्म निभाया था और मुश्किल में फंसी मेरी मदद की थी.’’

‘‘इंस्पेक्टर साहब, शायद मेरी समझ से जो इस धर्म को अपना ले, वह इनसान सच्चा होता है, निर्दोष होता, बेगुनाह होता है, गुनहगार नहीं. उस वक्त अपनी खुशी से मैं ने इन्हें कुछ देना चाहा तो इन्होंने लिया नहीं और आप कह रहे हैं कि…’’

ये भी पढ़ें- Romantic Story In Hindi: सबसे हसीन वह

मेरी उन बातों का शायद उन पुलिस वालों पर कुछ असर पड़ा. लड़के भी मेरी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखने लगे थे. एक बोला, ‘‘मैडम, आप बचा लीजिए हमें. यह जबरदस्ती की पकड़ हमारी जिंदगी बरबाद कर देगी.’’

मैं ने भरोसा दिलाते हुए उन से कहा, ‘‘डोंट वरी, कुछ नहीं होगा तुम लोगों को. अगर उस दिन मैं ने तुम्हें न जाना होता और तुम ने मेरी मदद नहीं की होती तो शायद मैं भी कुछ नहीं कर पाती लेकिन किसी की निस्वार्थ भाव से की गई सेवा का फल तो मिलता ही है. इसीलिए कहते हैं न कि जिंदगी में कभीकभी मिलने वाले ऐसे मौकों को छोड़ना नहीं चाहिए. अपनी तरफ से पूरी कोशिश करनी चाहिए कि आप के हाथों किसी का भला हो जाए.’’

मेरी बातों के प्रभाव में आया एक पुलिस वाला नरम लहजे में बोला, ‘‘देखिए मैडम, इन लड़कों को उस पर्स वाली मैडम ने पकड़वाया है. अब अगर वह अपनी शिकायत वापस ले लें तो हम इन्हें छोड़ देंगे. नहीं तो इन्हें अंदर करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है.’’

‘‘तो वह मैडम कहां हैं? फिर उन से ही बात करते हैं,’’ मैं ने तेजी से कहा. ऐसा लग रहा था जैसे कि कुछ अच्छा करने के लिए ऊर्जा अंदर से ही मिल रही थी और रास्ता खुदबखुद बन रहा था.

‘‘वह तो इन लोगों को पकड़वा कर कहीं चली गई हैं. अपना फोन नंबर दे गई हैं, कह रही थीं कि जब ये उन के पर्स के बारे में बता दें तो आ जाएंगी.’’

‘‘अच्छा तो उन्हें फोन कर के यहां बुलाइए. देखते हैं कि वह क्या कहती हैं? उन से ही अनुरोध करेंगे कि वह अपनी शिकायत वापस ले लें.’’

पुलिस वाले अब कुछ मूड में दिख रहे थे. एक पुलिस वाले ने फोन नंबर डायल कर उन्हें थाने आने को कहा.

फोन पहुंचते ही वह मैडम आ गईं. उन्हें देखते ही मेरे मुंह से निकला, ‘‘अरे, मिसेज सान्याल…’’ वह हमारे आफिसर्स लेडीज क्लब की प्रेसीडेंट थीं और मैं सेके्रटरी. इसी चक्कर में हम लोग अकसर मिलते ही रहते थे. आज तो इत्तफाक पर इत्तफाक हो रहे थे.

मुझे थाने में देख कर वह भी चौंक गईं. बोलीं, ‘‘अरे पूरबी, तुम यहां कैसे?’’

‘‘मिसेज सान्याल, मेरी गाड़ी को पुलिस वाले बाजार से उठा कर थाने लाए थे, उसी चक्कर में मुझे यहां आना पड़ा. पर ये लड़के, जिन्हें आप ने पकड़वाया है, असली मुजरिम नहीं हैं. आप देखिए, क्या इन्होंने ही आप का पर्स झपटा था.’’

‘‘पूरबी, पर्स तो वे मेरा पीछे से मेरे कंधे पर से खींच कर तेजी से चले गए थे. एक बाइक चला रहा था और दूसरे ने चलतेचलते ही…’’ इत्तफाक से मेरे पीछे से एक पुलिस जीप आई, जिस में ये दोनों पुलिस वाले बैठे थे. मेरी चीख सुन के इन्होंने मुझे अपनी जीप में बिठा लिया. तेजी से पीछा करने पर बाइक पर सवार ये दोनों मिले और बस पुलिस वालों ने इन दोनों को पकड़ लिया. मुझे लगा भी कि ये दोनों वे नहीं हैं, क्योंकि इतनी तेजी में भी मैं ने यह देखा था कि पीछे बैठने वाले के, जिस ने मेरा पर्स झपटा था, घुंघराले बाल नहीं थे, जैसे कि इस लड़के के हैं. वह गंजा सा था और उस ने शाल लपेट रखी थी, जबकि ये लड़के तो जैकेट पहने हुए हैं.

‘‘इन पुलिस वाले भाईसाहब से मैं ने कहा भी कि ये लोग वे नहीं हैं मगर इन्होंने मेरी सुनी ही नहीं और कहा कि अरे, आप को ध्यान नहीं है, ये ही हैं. जब मारमार के इन से आप का कीमती पर्स निकलवा लेंगे न तब आप को यकीन आएगा कि पुलिस वालों की आंखें आम आदमी से कितनी तेज होती हैं.’’

फिर मिसेज सान्याल ने तेज स्वर में उन से कहा, ‘‘क्यों, कहा था कि नहीं?’’

पुलिस वालों से तो कुछ कहते नहीं बना, लेकिन बेचारे बेकसूर लड़के जरूर अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए बोले, ‘‘मैडम, अगर हम आप का पर्स छीन कर भागे होते तो क्या इतनी आसानी से पकड़ में आ जाते. अगर आप को जरा भी याद हो तो आप ने देखा होगा कि मैं बहुत धीरेधीरे बाइक चला रहा था क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे हाथ में फ्रैक्चर हो गया था. आप चाहें तो शहर के जानेमाने हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. संजीव लूथरा से पता कर सकते हैं, जिन्होंने मेरा इलाज किया था.

‘‘हम दोनों यहां के एक मैनेजमेंट कालिज से एम.बी.ए. कर रहे हैं. आप चाहें तो कालिज से हमारे बारे में सबकुछ पता कर सकती हैं. इंस्पेक्टर साहब, आप की जरा सी लापरवाही और गलतफहमी हमारा कैरियर चौपट कर देगी. देश का कानून और देश की पुलिस जनता की रक्षा के लिए है, उन्हें बरबाद करने के लिए नहीं. हमें छोड़ दीजिए, प्लीज.’’

ये भी पढ़ें- सक्सेसर: पति के जाने के बाद क्या हुआ निभा के साथ

अब बात बिलकुल साफ हो चुकी थी. पुलिस वालों की आंखों में भी अपनी गलती मानने की झलक दिखी. मिसेज सान्याल ने भी पुलिस से अपनी शिकायत वापस लेते हुए उन लोगों को छोड़ देने और असली मुजरिम को पकड़ने की प्रार्थना की. मुझे भी अपने दिल में कहीं बहुत अच्छा लग रहा था कि मैं ने किसी की मदद कर एक नेक काम किया है.

सचमुच, जिंदगी में कभीकभी ऐसे मोड़ भी आ जाते हैं जो आप के जीने की दिशा ही बदल दें. पुलिस के छोड़ देने पर वे दोनों लड़के वाकई मेरे भाई जैसे ही बन गए. बाहर निकलते ही बोले, ‘‘आप ने पुलिस से हमें बचाने के लिए अपना भाई कहा था न, आज से हम आप के बस भाई ही हैं. अब आप को हम मैडम नहीं ‘दीदी’ कहेंगे और हमारे अलगअलग धर्म कभी हमारे और आप के पाक रिश्ते में आड़े नहीं आएंगे. हमारा मोबाइल नंबर आप रख लीजिए, कभी भी, कहीं भी, किसी भी समय अच्छीबुरी कोई बात हो, अपने इन भाइयों को जरूर याद कर लेना दीदी, हम तुरंत आप की सेवा में हाजिर हो जाएंगे.’’

उन का मोबाइल नंबर अपने मोबाइल में फीड कर के मैं मुसकरा दी थी और अपनी पकड़ी गई गाड़ी को ले कर घर आ गई. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये सब हकीकत में मेरे साथ हुआ, लग रहा था कि जैसे किसी फिल्म की शूटिंग देख कर आ रही हूं. घर पहुंच कर, इत्मीनान से चाय के सिप लेती हुई श्रेयस को फोन किया और सब घटना उन्हें सुनाई तो खोएखोए से वह भी कह उठे, ‘‘पूरबी, होता है, कभीकभी ऐसा भी जिंदगी में…’’

खाओं नमक रोटी, करो योग पीटी

जिससे स्वस्थ्य रह सके. बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सतीष द्विवेदी ने कहा कि ‘सभी परीक्षक स्कूलों में प्रार्थना सभा के बाद 15 मिनट योग और छुट्टी के समय 15 मिनट पीटी कराने के लिये कहा गया है.’

सतीश द्विवेदी नये शिक्षा राज्यमंत्री बने है. ऐसे में वह अपनी सरकार के संस्कृतिक एजेंडों को लागू करके दिखावा कर रहे है. उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले खाने की हालत बेहद बुरी है. मिर्जापुर के प्राथमिक स्कूल में बच्चों को ‘मिड डे मील’ में रोटी नमक देने की घटना सामने आने के बाद अब जांच की बात चल रही है.देखा जाये तो पूरे प्रदेश के स्कूलों के ‘मिड डे मील‘ का बुरा हाल है.

ये भी पढ़ें- उन्नाव कांड: आखिरकार इलाज के लिए दिल्ली पहुंची 

अमरोहा में बीएसए ने कुछ स्कूलों का निरीक्षण किया तो ‘मिड डे मील’ में दाल में सिर्फ पानी मिला. कई स्कूलों में खुद बच्चे बरतन धोते मिले. षामली के स्कूलों में ‘मिड डे मील’ में बासी खाना परोसा गया. अधिकारियों ने मामले की जांच की और मामले को रफादफा कर किया. इस स्कूल में रोटी बासी दी गई. रोटी में साबूत गेंहू निकले. सब्जी में सोयाबीन कच्ची थी. खाने के लिये दिये गये केले सडे हुये थे. ऐसी शिकायतें बहुत सारे स्कूलों में होती है. ज्यादातर मामलों में अधिकारी ऐसे मामलों को दबा जाते है. बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री सतीश द्विवेदी को चाहिये कि वह पहले अपने स्कूलों में बच्चों को अच्छी तरह से ‘मिड डे मील’ की व्यवस्था कर ले.

ये भी पढ़ें- शौचालय में चढ़ा चूल्हा

इसके बाद ही योगा और पीटी कराये. उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत उपर से देखने में भले ही बदली दिख रही हो. जिसमें स्कूल रंगे पुते नजर आ रहे हो पर स्कूल में खाने की हालत और पढ़ाई की हालत बहुत अच्छी नहीं है. स्कूल में बच्चे को उपस्थित बहुत कम होती है. उनकी पढ़ाई का स्तर बहुत खराब है. ऐसे में सरकार को चाहिये कि वह पढ़ाई और खानपान के स्तर को सुधारे. इसके बाद योगा और पीटी जैसे शिगूफे छोडे. पीटी स्कूलों में पहले भी होती थी. सरकारी नीतियों की वजह से वह खराब हो गई. ऐसे में अब पढ़ाई के मुख्य मुददे से ध्यान खीचने के लिये पीटी और योगा का नाम ले रही है.

तो क्या इन वजहों से बंद हुई सलमान खान और आलिया भट्ट की ‘‘इंशा अल्लाह’’?

1999 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘हम दिल दे चुके सनम’’ में संजय लीला भंसाली के निर्देशन में सलमान खान ने अभिनय किया था और पर इस फिल्म के बाद ही इन दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गए थे. यह अलग बात है कि सलमान खान हमेशा कहते रहे कि, वह संजय लीला भंसाली के साथ कोई फिल्म नहीं कर रहे हैं. मगर उनकी दोस्ती बरकरार है. पूरे बीस साल बाद संजय लीला भंसाली के निर्देशन में सलमान खान फिल्म ‘‘इंशा अल्लाह’’ करने जा रहे थे, जिसकी शूटिंग बुधवार, 28 अगस्त से मुंबई में शुरू होनी थी. मगर रविवार 25 अगस्त की शाम सलमान खान ने अपने ट्वीटर हैंडल पर लिखा कि फिल्म इंशा अल्लाह स्थगित हो गयी है. अब यह फिल्म 2020 में ईद के मौके पर नहीं आएगी.

भंसाली प्रोडक्शन ने ट्वीट कियाः

सोमवार को पूरे दिन ‘‘इंशा अल्लाह’’ को लेकर कई तरह की चर्चा होती रही. अंतत शाम होते होते भंसाली प्रोडक्शन के औफिशियल ट्वीटर पर ऐलान कर दिया गया कि फिल्म ‘इंशा अल्लाह’ को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है. फिल्म ‘‘इंशा अल्लाह’’ को हमेशा के लिए बंद किए जाने की खबर से पूरा बौलीवुड सकते में है. जब फिल्म के स्थगित होने की बात समाने आयी थी, तब कहा जा रहा था कि फिल्म ‘मलाल’ की असफलता के चलते यह कदम उठाया गया है. मगर फिल्म को हमेशा के लिए बंद कर देना अच्छी खबर नहीं मानी जा सकती.

इसकी कई वजहें हैं…

‘‘इंशा अल्लाह’’ पर करोड़ों रूपए खर्च हो चुके हैंः

सूत्रों के अनुसार संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘‘इंशा अल्लाह’’ की शूटिंग के लिए मुंबई में बांदरा के महबूब स्टूडियो, गोरेगांव के फिल्मसिटी स्टूडियो के साथ साथ ‘यशराज’ स्टूडियो में अपनी इस फिल्म की शूटिंग के लिए भी करोड़ो की लागत के सेट बनवा रहे थे. बांदरा के महबूब स्टूडियो में तो इस फिल्म का भव्य सेट बनकर तैयार हो गया था. इसी सेट पर बुधवार से गाने के फिल्मांकन के साथ फिल्म की शूटिंग शुरू होनी थी. गाना आलिया भट्ट पर फिल्माना था,  इसलिए रविवार को आलिया भट्ट इस सेट पर अपने गाने की रिहर्सल भी कर रही थी. उनको फिल्म के बंद होने की खबर उसी वक्त मिली थी. सूत्रों का दावा है कि सोमवार की शाम को सेट को तोड़ने का भी आदेश दे दिया गया है.

इसके मायने यह हैं कि संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘‘इंशा अल्लाह’’के लिए काफी रकम खर्च करने के बावजूद इस फिल्म को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय लिया है. ऐसे में इसके पीछे की वजह सिर्फ ‘मलाल’ का असफल होना नही हो सकता है. इसी के चलते अब बौलीवुड में तमाम चर्चाएं गर्म हैं.

सलमान और संजय लीला भंसाली के बीच बढ़ते मतभेदः

सूत्रों का दावा है कि फिल्म ‘‘इंषा अल्लाह’’के बंद होने की मुख्य वजह सलमान खान और संजय लीला भंसाली के बीच बढ़ते रचनात्मक मतभेद हैं. चर्चाएं गर्म हैं कि संजय लीला भंसाली के साथ सलमान खान का पैसे को लेकर भी कुछ झगड़ा हुआ. मगर सलमान खान के नजदीकी सूत्रों का दावा है कि सलमान खान ने पटकथा में कभी भी कोई बदलाव करने की बात नही कही. इस फिल्म को बंद करने का निर्णय संजय लीला भंसाली और सलमान खान ने बंद कमरे में बैठकर लंबी बातचीत करने के बाद लिया है. इसलिए इसकी वजह सिर्फ संजय लीला भंसाली और सलमान खान ही जानते हैं.

सलमान के नए ट्वीट से लग रहे हैं कयासः

उधर सोमवार की शाम सलमान खान ने जो नया ट्वीट किया, उससे यह कयास लगने शुरू हो गए कि अब सलमान खान फिल्म ‘‘किक 2’’की शूटिंग शुरू करेंगे,जो कि साजिद नाडियाडवाला की 2014 में प्रदर्शित फिल् ‘‘किक’’ का सिक्वअल होगी. सलमान खान ने अपने ट्वीटर पर लिखा है- ‘‘इतना मत सोचना मेरे बारे में. दिल में आता हूं ….और ईद पर भी….’’जिसने फिल्म ‘किक’ देख रखी है, उन्हें याद होगा कि फिल्म ‘किक’की पंचलाइन है ‘‘मेरे बारे में इतना मत सोचना …मैं दिल में आता हूं…समझ में नहीं..’’ जब हमने इस ट्वीट को लेकर लोगों से चर्चा की, तो सूत्रों ने दावा किया कि यह एक मजाक वाला ट्वीट है. इसके कोई अर्थ नहीं निकाले जाने चाहिए.

अब सलमान खान कौन सी फिल्म करेंगें?

सूत्रों की माने तो सलमान खान ने दो फिल्मों की पटकथाएं चुनी हैं पर अब तक इनमें से किसी भी फिल्म को हरी झंडी नही दी थी पर अब वह जल्द इनमें से किसी भी एक फिल्म को हरी झंडी दे सकेंगे. बहरहाल,पूरे विवाद को लेकर सलमान और संजय लीला भंसाली ने अभी तक मीडिया से खुलकर कोई बात नही की है. लेकिन सूत्रों के अनुसार सलमान खान मानते हैं कि संजय लीला भंसाली अपनी फिल्म के साथ गद्दारी नही कर सकते और फिल्म इंशा अल्लाह बने या ना बने, पर इनकी दोस्ती में कोई अंतर नहीं आएगा. फिल्म‘‘इंशा अल्लाह’’में सलमान खान एक बिजनेसमैन और आलिया भट्ट वाराणसी की एक उभरती हुई हीरोइन के किरदार को निभाने वाली थी.

राजूराम को मिले जेर खाद से अच्छे नतीजे

लेखक-भानु प्रकाश राणा

इस के इस्तेमाल से खेत में अच्छी पैदावार मिलती है. लेकिन आज का किसान अब अधिक जागरूक हो गया है.

ऐसे ही एक जागरूक किसान हैं

राजूराम सीरवी राठौर, जो तहसील बिलाड़ा, जोधपुर (राजस्थान) में रहते हैं. इन्होंने गायभैंस के जेर से जैविक खाद तैयार की, जो अपनेआप में काफी उम्दा दर्जे की जैविक खाद है.

राजूराम का कहना है कि जब भी आप की गाय या भैंस बच्चा देने वाली हो तो उस समय खास निगरानी रखें. पशु ब्याने की शुरुआत में जब वाटर बैलून या जैव रस की थैली बाहर आने लगे तभी एक टोकरी राख छान कर तैयार रखें.

जैसे ही यह पानी की थैली जमीन पर गिरे, तुरंत टोकरी की राख इस पर डाल दें. इस से जानवर के शरीर से जो जैव रस का पानी वेस्ट न हो कर राख सोख ले. इस के बाद जब पशु बच्चा देने के बाद जेर डाले. इस जेर और जैव रस वाली राख को एक मिट्टी के घड़े में भर कर ढकते हुए यह घड़ा किसी छायादार पेड़ के नीचे 60-70 दिन के लिए दबा दें. 70 दिन बाद इसे निकालने पर इस में नम सीमेंट जैसा पाउडर मिलेगा. इस का एक चम्मच भर मात्र से 10 किलोग्राम बीज का उपचार कर सकते हैं.

ये भी पढ़ें- असम में मुसलमानों और दलितों के साथ भेदभाव की 

200 ग्राम पाउडर को 10 लिटर पानी में घोल कर छानने के बाद इस का फसल पर छिड़काव करें. इस से फसल की बढ़वार और उपज में चमत्कारिक फायदा मिलेगा. फलदार पेड़ों में 15-25 ग्राम मात्रा को 15 लिटर पानी में घोल कर या इसी मात्रा का पेड़ पर छिड़काव करने से इस के परिणाम आप की सोच से भी ज्यादा बढ़ कर होंगे. इस का इस्तेमाल गेहूं, सौंफ, धान, सरसों,?ज्वार और सब्जियों पर हम ने कर के देखा है. फलों में खजूर, अमरूद, जामुन, आम और चीकू पर भी हम ने कर के देखा है. इस का बहुत ही शानदार नतीजा देखने को मिला है.

इस जेर खाद को किसान मित्र बरसाती फसलों ज्वार, बाजरा, तिल, तिल्ली, ग्वार, मूंग, मोठ वगैरह में भी उपयोग ले सकते हैं.

यह खाद बहुत ही असरदार है. रिजके की फसल में पानी देते समय 2 किलोग्राम पाउडर को 10 किलोग्राम सूखी गोबर की खाद या 5 किलोग्राम राख में मिला कर प्रति बीघे के हिसाब से छिड़काव करें. इस के अच्छे नतीजे मिलेंगे.

ये भी पढ़ें- सोशल मीडिया का अंधेरा यानी अंधविश्वास

ज्यादा जानकारी के लिए आप राजूराम सीरवी राठौर के मोबाइल नंबर 09461691944 पर संपर्क कर सकते हैं.

लड़कों पर भी खूब जंचता है पीला रंग, यकीन न हो तो देखें ‘अलादीन’ के ये लुक्स

सिद्धार्थ निगम छोटे और बड़े पर्दे के उन एक्टर में शुमार है जो इंडस्ट्री में अपनी एक्टिंग, मार्शलआर्टस और डांस तीनों के लिए जाने जाते है. महज 18 साल की उम्र में सिद्धार्थ ने कई सारे सीरियल्स और रियालिटी शो में काम करके अपने टेलेंट से लोगों का दिल जीता. सिद्धार्थ ने अपने कैरियर की शुरुआत बौलीवुड की ब्लोक बस्टर फिल्मों में से एक साल 2013 में आई धूम 3 से की जिसमें उन्होंने छोटे साहिर और समर के डबल रोल किया था. जिसके बाद से वो सभी की नजरों में आ गई. इसके बाद वो ‘महाकुंभ’, ‘सम्राट अशोक’, ‘झलक दिखलाजा’, ‘पेशवा बाजीराव’, और ‘चंद्र नंदनी’, जैसे पौपुलर शो में नजर आए, फिलहाल सिद्धार्थ सब टीवी के शो अलादिन में अपनी एक्टिंग से सभी का दिल जीतने में लगे है. सिद्धार्थ अपने लुक्स के भी काफी पौपुलर है इसलिए आज हम लेकर आए है उनके कुछ खास लुक किसे आप ट्राय जरुर करें.

येलो जैकेट को करें फैसन में ट्राय

सिद्धार्थ के इस लुक की सबसे खास बात है इसको कलर कौम्बिनेशन, जो इस लुक को काफी रिच लुक दे रहा है. लाइट औरेंज कलर की टी-शर्ट के साथ येलो जैकेट इस इस लुक काफी वाइब्रेंट और क्लासी बना रही है. अगर आप कुछ कूल ट्राय करना चाहते है तो ये लुक आपके लिए परफैक्ट है.

ये भी पढ़ें- बौलीवुड हीरों से कम नहीं इस टीवी एक्टर के लुक, 

वाइट के साथ ट्राय करें चेक प्रिंट

वाइट एक ऐसा कलर है जिसके साथ कुछ भी ट्राय करों वो अच्छा ही लगता है लेकिन अगर आप इसके साथ चेक प्रिंट की औवर शर्ट ट्राय करते है को ये आपको एक डिफरेंट लुक को देगा ही साथ ही साथ ये आपको कंफर्ट भी पहुंचाएगा. लाइट कलर आपकी स्कीन के लिए काफी अच्छा होता है. इसमें कम गरमी लगती है.

ट्राय करें शोर्ट्स और शर्ट

अगर आप कोई वेकेशन का प्लान करे तो ट्राय करें की आप काफी रिलेक्स कपड़े पहने जिससे आपको कंफर्ट भी मिलेगा और आप फैशनेबल भी दिखेंगें. सिद्धार्थ के इस लुक को ट्राय कर सकते है.

 

View this post on Instagram

 

Which pose is better👻 ————— #siddharthnigam #thesiddharthnigam #travel #blessed #fanlove

A post shared by Siddharth Nigam (@thesiddharthnigam) on

ये भी पढ़ें-‘बहूबेगम’ के इस एक्टर के फैशन ने मचाया धमाल, देखें 

टाई नही अब बो का है जमाना

इस लुक में सिद्धार्थ ने जो मस्टर्ड कलर का कोट पहना है वो काफी अच्छा लुक दे रहा है पर  पूरा ध्यान उनकी बो टाई ने लिआ है. सन ग्लासेज वाली इस बो टाई में उनके लुक काफी अगल हो गया है. इस लुक को आप किसी पार्टी में जरुर ट्राय कर सकते हैं.

 

काश, मेरा भी बौस होता

आज फिर अनीता छुट्टी पर है. इस का अंदाज मैं ने इसी से लगा लिया कि वह अभी तक तैयार नहीं हुई. लगता है कल फिर वह बौस को अदा से देख कर मुसकराई होगी. तभी तो आज दिनभर उसे मुसकराते रहने के लिए छुट्टी मिल गई है.

मेरे दिल पर सांप लोटने लगा. काश, मेरा भी बौस होता…बौसी नहीं…तो मैं भी अपनी अदाओं के जलवे बिखेरती, मुसकराती, इठलाती हुई छुट्टी पर छुट्टी करती चली जाती और आफिस में बैठा मेरा बौस मेरी अटेंडेंस भरता होता…पर मैं क्या करूं, मेरा तो बौस नहीं बौसी है.

बौस शब्द कितना अच्छा लगता है. एक ऐसा पुरुष जो है तो बांस की तरह सीधा तना हुआ. हम से ऊंचा और अकड़ा हुआ भी पर जब उस में फूंक भरो तो… आहा हा हा. क्या मधुर तान निकलती है. वही बांस, बांसुरी बन जाता है.

‘‘सर, एक बात कहें, आप नाराज तो नहीं होंगे. आप को यह सूट बहुत ही सूट करता है, आप बड़े स्मार्ट लगते हैं,’’ मैं ऐसा कहती तो बौस के चेहरे पर 200 वाट की रोशनी फैल जाती है.

‘‘ही ही ही…थैंक्स. अच्छा, ‘थामसन एंड कंपनी’ के बिल चेक कर लिए हैं.’’

‘‘सर, आधे घंटे में ले कर आती हूं.’’

‘‘ओ के, जल्दी लाना,’’ और बौस मुसकराते हुए केबिन में चला जाता. वह यह कभी नहीं सोचता कि फाइल लाने में आधा घंटा क्यों लगेगा.

पर मेरी तो बौसी है जो आफिस में घुसते ही नाक ऊंची कर लेती है. धड़मधड़म कर के दरवाजा खोलेगी और घर्रर्रर्रर्र से घंटी बजा देगी, ‘‘पाल संस की फाइल लाना.’’

‘‘मेम, आज आप की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

ये भी पढ़ें- “दावत ए खिचड़ी”

वह एक नजर मेरी आंखों में ऐसे घूरती है जैसे मैं ने उस की साड़ी का रेट कम बता दिया हो.

‘‘काम पूरा नहीं किया क्या?’’ ठां… उस ने गरम गोला दाग दिया. थोड़ी सी हवा में ठंडक थी, वह भी गायब हो गई, ‘‘फाइल लाओ.’’

दिल करता है फाइल उस के सिर पर दे मारूं.

‘‘सर, आज मैं बहुत थक गई हूं, रात को मेहमान भी आए थे, काफी देर हो गई थी सोने में. मैं जल्दी चली जाऊं?’’ मैं अपनी आवाज में थकावट ला कर ऐसी मरी हुई आवाज में बोलती जैसी मरी हुई भैंस मिमियाती है तो बौस मुझे देखते ही तरस खा जाता.

‘‘हां हां, क्यों नहीं. पर कल समय से आने की कोशिश करना,’’ यह बौस का जवाब होता.

लेकिन मेरे मिमियाने पर बौसी का जवाब होता है, ‘‘तो…? तो क्या मैं तुम्हारे पांव दबाऊं? नखरे किसी और को दिखाना, आफिस टाइम पूरा कर के जाना.’’

मन करता है इस का टाइम जल्दी आ जाए तो मैं ही इस का गला दबा दूं.

‘‘सर, मेरे ससुराल वाले आ रहे हैं, मैं 2 घंटे के लिए बाहर चली जाऊं,’’ मैं आंखें घुमा कर कहती तो बौस भी घूम जाता, ‘‘अच्छा, क्या खरीदने जा रही हो?’’ बस, मिल जाती परमिशन. पर यह बौसी, ‘‘ससुराल वालों से कह दिया करो कि नौकरी करने देनी है कि नहीं,’’ ऐसा जवाब सुन कर मन से बददुआ निकलने लगती है. काश, तुम्हारी कुरसी मुझे मिल जाती तो…लो इसी बात में मेरी बौसी महारानी पानी भरती दिखाई देती.

उस दिन पति से लड़ाई हो गई तो रोतेरोते ही आफिस पहुंची थी. मेरे आंसू देखते ही बौसी बोली, ‘‘टसुए घर छोड़ कर आया करो.’’ लेकिन अगर मेरा बौस होता तो मेरे आंसू सीधे उस के (बौस के) दिल पर छनछन कर के गरम तवे पर ठंडी बूंदों की तरह गिरते और सूख जाते. वह मुझ से पूछता, ‘क्या हुआ है? किस से झगड़ा हुआ.’ तब मैं अपने पति को झगड़ालू और अकड़ू बता कर अपने बौस की तारीफ में पुल बांधती तो वह कितना खुश हो जाता और मेरी अगले दिन की एक और छुट्टी पक्की हो जाती.

कोई भी अच्छी ड्रेस पहनूं या मेकअप करूं तो डर लगने लगता है. बौसी कहने लगती है, ‘‘आफिस में सज कर किस को दिखाने आई हो?’’ अगर बौस होता तो ऐसे वाहियात सवाल थोड़े ही करता? वह तो समझदार है, उसे पता है कि मैं उस के दिल के कोमल तारों को छेड़ने और फुसलाने के लिए ही तो ऐसा कर रही हूं. वह यह सब जान कर भी फिसलता ही जाएगा. फिसलता ही जाएगा और उस की इसी फिसलन में उस की बंद आंखों में मैं अपने घर के हजारों काम निबटा देती.

पर मेरी किस्मत में बौस के बजाय बौसी है, बासी रोटी और बासी फूल सी मुरझाई हुई. उस के होेते हुए न तो मैं आफिस टाइम पर शौपिंग कर पाती हूं, न ही ससुराल वालों को अटेंड कर पाती हूं, न ही घर जा कर सो पाती हूं, न ही अपने पति की चुगली उस से कर के उसे खुश कर पाती हूं और न ही उस के रूप और कपड़ों की बेवजह तारीफ कर के, अपने न किए हुए कामों को अनदेखा करवा सकती हूं.

ये भी पढ़ें-साथ-साथ

अगर मेरा बौस होता तो मैं आफिस आती और आफिस आफिस खेलती, पर काम नहीं करती. पर क्या करूं मैं, मेरी तो बौसी है. इस के होने से मुझे अपनी सुंदरता पर भी शक होने लगा है. मेरा इठलाना, मेरा रोना, मेरा आंसू बहाना, मेरा सजना, मेरे जलवे, मेरे नखरे किसी काम के नहीं रहे.

इसीलिए मुझे कभीकभी अपने नारी होने पर भी संदेह होने लगा है. काश, कोई मेरी बौसी को हटा कर मुझे बौस दिला दे, ताकि मुझे मेरे होने का एहसास त

कैसी है सीमा

‘‘आज जरा चेक पर दस्तखत कर देना,’’ प्रभात ने शहद घुली आवाज में कहा.

सीमा ने रोटी बेलतेबेलते पलट कर देखा, चेक पर दस्तखत करवाते समय प्रभात कितने बदल जाते हैं, ‘‘आप की तनख्वाह खत्म हो गई?’’ वह बोली.

‘‘गांव से पिताजी का पत्र आया था. वहां 400 रुपए भेजने पड़े. फिर लीला मौसी भी आई हुई हैं. घर में मेहमान हों तो खर्च बढ़ेगा ही न?’’

सीमा चुप रह गई.

‘‘पैसा नहीं देना है तो मत दो. किसी से उधार ले कर काम चला लूंगा. जब भी पैसों की जरूरत होती है, तुम इसी तरह अकड़ दिखाती हो.’’

‘‘अकड़ दिखाने की बात नहीं है. प्रश्न यह है कि रुपया देने वाली की कुछ कद्र तो हो.’’

‘‘मैं बीवी का गुलाम बन कर नहीं रह सकता, समझीं.’’

बीवी के गुलाम होने वाली सदियों पुरानी उक्ति पुरुष को आज भी याद है. किंतु स्त्रीधन का उपयोग न करने की गौरवशाली परंपरा को वह कैसे भूल गया?

बहस और कटु हो जाए, इस के पहले ही सीमा ने चेक पर हस्ताक्षर कर दिए.

शाम को प्रभात दफ्तर से लौटे तो लीला मौसी को 100 का नोट दे कर बोले, ‘‘मौसी, तुम पड़ोस वाली चाची के साथ जा कर आंखों की जांच करवा आना.’’

‘‘अरे, रहने दे भैया, मैं तो यों ही कह रही थी. अभी ऐसी जल्दी नहीं है. रायपुर जा कर जांच करा लूंगी.’’

‘‘नहीं मौसी, आंखों की बात है. जल्दी दिखा देना ही ठीक है.’’

मौसी मन ही मन गद्गद हो गईं.

प्रभात मौसी का बहुत खयाल रखते हैं. मौसी का ही क्यों, रिश्ते की बहनों, बूआओं, चाचाताउओं सभी का. कोई रिश्तेदार आ जाए तो प्रभात एकदम प्रसन्न हो उठते हैं. उस समय वह इतने उदार हो जाते हैं कि खर्च करते समय आगापीछा नहीं सोचते. मेहमानों की तीमारदारी के लिए ऐसे आकुलव्याकुल हो उठते हैं कि उन के आदेशों की धमक से सीमा का सिर घूमने लगता है.

ये भी पढ़ें- “दावत ए खिचड़ी”

‘‘सीमा, आज क्या सब्जी बनी?है?’’ प्रभात पूछ रहे थे.

‘‘बैगन की.’’

‘‘बैगन की. मौसी की आंखों में तकलीफ है. बैगन की सब्जी खाने से तकलीफ बढ़ेगी नहीं? उन के लिए परवल की सब्जी बना लो.’’

‘‘नहीं. मैं बैगन की सब्जी खा लूंगी, बेटा. बहू को एक और सब्जी बनाने में कष्ट होगा. कालिज से थक कर आई है.’’

‘‘इस उम्र में थकना क्या है, मौसी? वह तो इन के घर वालों ने काम की आदत नहीं डाली, इसी से थक जाती हैं.’’

‘‘हां, बेटा. आजकल लड़कियों को घरगृहस्थी संभालने की आदत ही नहीं रहती. हम लोग घर के सब काम कर के 10 किलो चना दल कर फेंक देते थे,’’ मौसी बोलीं.

बस, इसी बात से सीमा चिढ़ जाती है. उस के मायके वालों ने काम की आदत नहीं डाली तो क्या प्रभात ने उस के लिए नौकरों की फौज खड़ी कर दी? एक बरतनकपड़े साफ करने वाली के अलावा दूसरा कोई नौकर तो देखा ही नहीं इस घर में.

और लीला मौसी के जमाने में घरगृहस्थी ही तो संभालती थीं लड़कियां. न पढ़ाईलिखाई में सिर खपाना था और न नौकरी के पीछे मारेमारे घूमना था.

सीमा सोचने लगी, ‘लीला मौसी तो खैर अशिक्षित महिला हैं, परंतु प्रभात की समझ में यह बात क्यों नहीं आती?’

अभी पिछले सप्ताह भी ऐसा ही हुआ था. सीमा ने करेले की सब्जी बनाई थी. प्रभात ने देखा तो बोले, ‘‘करेले बनाए हैं? क्या मौसी को दुबला करने का विचार है? उन के लिए कुछ और बना लो.’’

सीमा एकदम हतप्रभ रह गई. मौसी हंसीं, ‘‘नहीं… नहीं, कुछ मत बनाओ, बहू. बस, दाल को तड़का दे दो. तब तक मैं टमाटर की चटनी पीस लेती हूं.’’

‘‘मौसी, बहू के रहते तुम्हें काम करने की क्या जरूरत है? आओ, उस कमरे में बैठें,’’ प्रभात बोले.

सीमा अकेली रसोई में खटती रही. उधर साथ वाले कमरे में मौसी प्रभात को झूठेसच्चे किस्से बताती रहीं, ‘‘तुम्हारे बड़े नानाजी खेत में पहुंचे तो देखा, सामने गांव के धोबी का भूत खड़ा है…’’

मौसी खूब अंधविश्वासी हैं. मनगढ़ंत किस्से खूब बताती हैं. भूतप्रेतों के, प्रभात के बड़े नाना, मझले नाना और छोटे नाना के, दूध सी सफेद छोटी नानी के, प्रभात की ननिहाल के जमींदार महेंद्रप्रताप सिंह और रूपा डाकू के भी. इन किस्सों के साथसाथ मौसी लोगों की मेहमाननवाजी और बढि़या भोजन को भी खूब याद करतीं. उन की व्यंजन चर्चा सुन कर श्रोताओं के मुंह में भी पानी भर आता.

मौसी मूंग के लड्डू, खस्ता, कचौरी, मेवे की गुझिया और खोए की पूरियों को याद किया करतीं.

प्रभात उन की हर फरमाइश पूरी करवाते. सीमा को कालिज जाने तक रसोई में जुटे रहना पड़ता. थकान के कारण खाना भी न खाया जाता. उस दिन भी ऐसा ही हुआ था. कालिज से लौट कर वह कुछ खाना ही चाहती थी कि प्रभात के मित्र आ गए. उस ने किसी तरह उन्हें चायनाश्ता करवाया. दूध का बरतन उठा कर अलमारी में रखने लगी तो सहसा चक्कर खा कर गिर पड़ी. सारे कमरे में दूध ही दूध फैल गया.

मौसी और प्रभात दौड़े आए. अपने निष्प्राण से शरीर को किसी तरह खींचती हुई सीमा पलंग पर जा लेटी. आंखें बंद कर के वह न जाने कितनी देर तक लेटी रही.

अचानक प्रभात ने धीरे से उसे उठाते हुए कहा, ‘‘सुनो, अब उठ कर जरा रसोई में देख लो. तब से मौसी ही लगी हुई हैं.’’

शरीर में उठने की शक्ति ही नहीं थी. ‘हूं’ कह कर सीमा ने दूसरी ओर करवट ले ली.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, यह मैं मानता हूं परंतु अपने घर का काम कोई और करे यह तो शोभा नहीं देता,’’ प्रभात धीरे से बोले.

सीमा का मन हुआ चीख कर कह दे, ‘मौसी के घर में बहूबेटी बीमार होती हैं, तब क्या वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती हैं? एक समय भोजन बना भी लेंगी तो ऐसी क्या प्रलय हो जाएगी?’ लेकिन कहा कुछ नहीं. आवाज कहीं गले में ही फंस कर रह गई. आंखों से आंसू बह निकले. उठ कर बचा हुआ काम निबटाया.

मौसी प्रभात की प्रशंसा करते नहीं थकतीं. उस दिन किसी से कह रही थीं, ‘‘हमारे परिवार में प्रभात हीरा है. सब के सुखदुख में साथ देता है. रुपएपैसे की परवाह नहीं करता. ऐसा आदरसम्मान करता है कि पूछो मत. बहू बड़े घर की लड़की?है, पर प्रभात का ऐसा शासन?है कि मजाल है बहू जरा भी गड़बड़ कर जाए.’’

यह प्रशंसा वह पहली बार नहीं सुन रही थी. ऐसी प्रशंसा प्रभात के परिवार के हर छोटेबड़े के मुख पर रहती है. ससुराल वालों को इतना आतिथ्यसत्कार तथा सेवा करने और बैंक के चेक फाड़फाड़ कर देने के बाद भी वह प्रभात के इस सुयश की भागीदार नहीं बन सकी. या यों कहा जाए कि प्रभात ने इस में उसे भागीदार बनाया ही नहीं बल्कि अपने लोगों के सामने उसे बौना बनाने में ही वह गर्व महसूस करते रहे. उस  की कमियों और गलतियों को वह बढ़ाचढ़ा कर सुनाया करते और सारा परिवार रस ले ले कर सुना करता.

इस संबंध में सीमा को अपनी देवरानी मंगला से ईर्ष्या होती है. देवर सुनील उस के सम्मान को बढ़ाने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते. हैदराबाद से वह साल में एक बार घर आते हैं. छोटेबड़े सभी के लिए कुछ न कुछ लाने का उन का नियम है, लेकिन लेनदेन का दायित्व उन्होंने मंगला को ही सौंप रखा है.

जब सारा परिवार मिल कर बैठता?है तब सुनील पत्नी को गौरवान्वित करते हुए कहते हैं, ‘‘मंगला, निकालो भई, सब चीजें. दिखाओ सब को, क्याक्या लाई हो तुम उन के लिए,’’ सब की नजरें मंगला पर टिक जाती?हैं. वह कितनी ऊंची हो जाती है सब की दृष्टि में.

मंगला की अनुपस्थिति में जब परिवार के लोग मिल बैठते हैं तो उस के लाए उपहारों की चर्चा होती?है. उस की दरियादिली की प्रशंसा होती है. परंतु सीमा की मेहनत की कमाई से भेजे गए मनीआर्डरों का कभी जिक्र नहीं होता. उस का सारा श्रेय प्रभात को जाता है. कभी बात चलती?है तो अम्मां उसे सुना कर साफ कह देती हैं, ‘‘सीमा की कमाई से हमें क्या मतलब? प्रभात घर का बड़ा बेटा है, उस की कमाई पर तो हमारा पूरा हक है.’’

कभीकभी सीमा सोचती है, ‘नेकी करते हुए भी किसी के हिस्से में यश और किसी के हिस्से में अपयश क्यों आता है?’ वैसे इस विषय में ज्यादा सोच कर वह अपना मन खराब नहीं करती. फिर भी उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रह पाता. पिछले दिनों डाक्टर ने बताया था, ‘‘पैर भारी हैं. थोड़ा आराम करना चाहिए.’’

इधर मौसी कहती थीं, ‘‘एक रोटी बनाने का ही तो काम है घर में. न चक्की पीसनी है, न कुएं से पानी खींच कर लाना है. खूब मेहनत करो और डट कर खाओ. तभी तो सेहत बनेगी.’’

और एक दिन सेहत बनाने के चक्कर में लड्डू बांधतेबांधते कालिज जाने का समय हो गया था. सीमा जल्दीजल्दी सीढि़यां उतरने लगी तो अचानक पैर फिसल गया. 3-4 सीढि़यां लांघती हुई वह नीचे जा गिरी. चोट तो उसे विशेष नहीं आई, पर पेट में दर्द होने लगा था.

‘‘इन के लिए बिस्तर पर आराम करना बहुत जरूरी है,’’ डाक्टर ने प्रभात से कहा था.

प्रभात ने लापरवाही के लिए सीमा को जी भर कर कोसा, किंतु इस परिस्थिति में डाक्टर की सलाह मानना आवश्यक हो गया.

(कहानी के अगले भाग में पढ़िए – क्या सीमा अपनी अहमियत मौसी और प्रभात को समझा पाएगी…)

 

खूबियों से भरी शतावरी

लेखक- प्रदीप कुमार सैनी

इन मुलायम शाखाओं द्वारा सूप व सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. यहां तक कि इन शाखाओं को सब्जी उत्पादक ज्यादातर डब्बाबंदी के लिए इस्तेमाल में लाते हैं. इन मुलायम शाखाओं को 3-4 साल में पूरी तरह फसल के रूप में हासिल किया जाने लगता है. ये शाखाएं

एक तने का रूप लिए होती हैं. इन को उबाल कर भी खाने में इस्तेमाल किया जाता है. यह फसल 10-15 साल तक सही बनी रहती है. इस सब्जी को मैदानी व पहाड़ी इलाकों में उगाया जा सकता है.

यह फसल ज्यादा सर्दी या बर्फीला मौसम पसंद नहीं करती है?क्योंकि सर्दी में शाखाएं सूख जाती हैं. वसंत मौसम इस फसल के लिए ज्यादा मुफीद रहता?है और इसी मौसम में जमीन या मेंड़ों से नई शाखाएं निकल कर नए पौधे तैयार हो जाते हैं और मुलायम तने या शाखाएं निकल आती हैं. मौसम बदलाव के समय नईनई शाखाएं निकलती हैं. इन की सही बढ़ावार होने पर ही काटें, वरना कड़ी होने के बाद ये खाने लायक नहीं रहती हैं. इन्हीं शाखाओं पर पत्तियां निकलती हैं जो देखने में हरे रंग की होती?हैं. इस सब्जी की ज्यादातर मांग बड़े होटलों और बड़ेबड़े शहरों में मौडर्न सब्जी बाजार व सब्जी दुकानों में होती?है.

ये भी पढ़ें- गाजर की खेती में कृषि यंत्र

जमीन व जलवायु : सब से अच्छी जमीन दोमट या हलकी बलुई दोमट रहती है. लेकिन जमीन में उपजाऊपन होना जरूरी है. इस का पीएच मान 7.0-7.5 के आसपास हो. जलवायु वसंत ऋतु वाली, जिस में तापमान 30-35 डिगरी सैंटीग्रेड हो और हलकी नमी का होना भी जरूरी है क्योंकि इसी मौसम में तने या शाखाएं ज्यादा बनती हैं. बारिश का मौसम भी बढ़वार के लिए सही रहता है.

खेत की तैयारी : खेत की सब से पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए, जिस से घासफूस व दूसरी फसल के अवशेष मिट्टी में दब कर गलसड़ जाएं. इस तरह से 4-5 गहरी जुताइयों की जरूरत होती है. तैयार खेत की पहचान मिट्टी का भुरभुरा होना माना जाता है. खेत में सूखी घास वगैरह भी नहीं रहनी चाहिए.

उन्नत किस्में

एस्पेरेगस की किस्में स्थानीय रूप से जो भी मिले, उगाया जा सकता?है. एक उन्नत किस्म है परफैक्शन. इस किस्म में ज्यादा शाखाएं निकलती?हैं. किसान इस की लोकल किस्म भी उगा सकते हैं.

प्रवर्धन विधि : एस्पेरेगस का प्रवर्धन बीज वानस्पतिक विधि द्वारा किया जाता है. बीज परिपक्व शाखाओं से तैयार किया जाता है, जिन्हें अप्रैलमई माह में बो कर जूनजुलाई माह में क्यारियों में लगा दिया जाता?है.

वानस्पतिक विधि द्वारा बड़े व पुराने पौधों से फरवरीमार्च महीनों में जड़ विभाजित कर के नए पौधे तैयार किए जाते?हैं, जो आगे चल कर बढ़ोतरी करते हैं.

बीज की बोआई : बीज की बोआई आमतौर पर जूनजुलाई माह में करते हैं और खेत में इन्हें फरवरीमार्च माह में लगाते हैं. बीज 20-25 दिन के बाद ही उगते?हैं. पौधों को सालभर बाद ही लगाना चाहिए.

पौधे रोपने की दूरी : पौधों को रोपते समय पौधे से पौधे की दूरी 45 सैंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 120-150 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. पौधों को रोपने से पहले?क्यारियों में मोटी मेंड़ या नाली, जिन की गहराई 40 सैंटीमीटर और चौड़ाई 45 से 60 सैंटीमीटर रख कर मेंड़ के ऊपर पौधों की सही दूरी रखनी चाहिए और पानी नालियों में दें. इस के पौधे पेड़ों पर अधिक बढ़वार करते हैं. इन पेड़ों पर पौधों को 15 सैंटीमीटर गहरा दबाना चाहिए. पानी की सही मात्रा दें, जिस से पौधों को नमी पहुंचती रहे.

खाद और उर्वरक की मात्रा: गोबर की खाद 12-15 टन प्रति हेक्टेयर और नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा क्रमश: 80:60:50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दें. नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय या पौधे लगाने के 15 दिन पहले देनी चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को 2 बार में दें. पौधे रोपने से 20-25 दिन बाद और जनवरीफरवरी माह में खड़ी फसल में टौप ड्रेसिंग के दौरान देनी चाहिए.

ये भी पढ़ें- वैज्ञानिक तरीके से तैयार करें मिर्च की पौधशाला

सिंचाई का इंतजाम : पौधे रोपने के तुरंत बाद सिंचाई करें. लेकिन गरमियों में पानी की विशेष व्यवस्था रहे यानी प्रति हफ्ता सिंचाई करनी चाहिए. इस तरह से सर्दियों में 15-20 दिन के अंतराल पर, गरमियों में 8-10 दिन के अंतराल पर और बारिश में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

मिट्टी चढ़ाएं : यह एक बहुवर्षीय फसल है. साल में एक बार मिट्टी जरूर चढ़ानी चाहिए. वैसे, मिट्टी चढ़ाने का सही समय फरवरीमार्च माह का है, क्योंकि मार्च के बाद मौसम बदल जाता है और पौधे ज्यादा बढ़वार करते हैं. इस से तने या शाखाएं ज्यादा मात्रा में निकल सकें.

बीमारियां व कीट नियंत्रण : बीमारी लगने पर फफूंदीनाशक दवा का स्प्रे करें और कीट लगने पर रोगोर, इंडोसल्फान और मोनोक्रोटोफास वगैरह कीटनाशक का 1 फीसदी घोल का स्प्रे करें.

शाखाओं की कटाई: जब पौघों में से जमीन की सतह से नई कोमल शाखाएं निकलने लगें जिन का ऊपरी हिस्सा हरा और नीचे से सफेद होता?है. इन की लंबाई 20-30 सैंटीमीटर हो, तब ही जमीन की सतह से चाकू की मदद से काटें.

ध्यान रहे कि ये नई शाखाएं मुलायम ही काटी जाएं वरना कठोर होने पर स्वाद बदल जाता है और बाजार में इस की कीमत भी घट जाती है. कठोर व रेशे हो जाने पर स्वाद में बदलाव आ जाता है.

ये भी पढ़ें- जल्दी तैयार होती मूली की खेती

उपज : औसतन प्रति पौधा 15-20 शाखाएं हासिल होती हैं और प्रति हेक्टेयर 80-100 क्विंटल तक उपज मिल जाती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें