“अनु आज कुछ हल्का ही बनाना शाम को बॉस की बेटी की शादी में जाना है ।”
“फिर तो ये ग्रेंड शादी होगी।”
“हाँ,इतने आइटम होंगे कि चखना भी मुश्किल।”
तभी फोन की घंटी बजती है।
“हैलो, खुश रहो,
अरे आप बुलाए और हम न आये, हाँ भाई दीदी भी साथ आएगीं।”
“किसका फोन था ? ”
“तुम्हारे मौसेरे भाई प्रदीप का।”
“क्या कह रहा था ? ”
“आज उसका बेटा एक साल का हो गया तो जन्मदिन की पार्टी में बुलाया है।”
“एक दिन में दो-दो पार्टियां। कहाँ रखी है पार्टी?”
“होटल ब्लू हेवन।”
“और बॉस की।”
“गोविन्द उद्यान।”
“दोनों एक दूसरे के विपरीत एक शहर के इस छोर ,दूसरी दूसरे छोर कैसे जाएगें दोनों जगह ।”
“मैनें प्रदीप को बता दिया है। बॉस के यहाँ शादी में जाना है। देर हो जाएगी तो केक देर से काटना।”
“मुझे तो मुश्किल लग रहा है दोनों जगह जाना।”
“कोई मुश्किल नहीं,पहले हम शादी में जरा जल्दी पहुँचेंगे।खाना खाकर गिफ्ट देकर आठ बजे तक निकलकर नौ बजे तक प्रदीप के यहाँ पहुंच जाएगे।”
“ठीक है।”
“अब तुम खिचड़ी ही बना लो शाम को तो वैसे भी भारी खाना ही खाना है। फिर जल्दी तैयार हो जाओ।”
शादी में जब ये गेट के अंदर जाने लगे तो..
“अरे शर्मा जी अंदर कहाँ जा रहे हो,हम लड़की वाले हैं। बारात का स्वागत नहीं करोगे ? ”
मजबूरन दोनों को गेट पर ही रूकना पड़ा। बारात साढ़े नौ बजे लग पायी।
“खाने में बहुत भीड़ है, यदि खाना खाने रूके तो एक घंटा लग जाएगा।”
“क्यों न हम आइसक्रीम खाकर निकल ले, खाना प्रदीप के यहाँ खा लेगें।”
रास्ते में ट्रेफिक की वजह से पहुँचते- पहुँचते ग्यारह बज गये।
“क्या जीजाजी, बहुत लेट हो गये खाना भी बंद हो गया।खैर, आप तो शादी की पार्टी में खाकर ही आयें होंगे।”
“हाँ “धीमे स्वर में
“अरे भाई, कोई दीदी, जीजाजी को केक तो खिलाओ।”
एक- एक केक का पीस खाकर घर पहुँचते ही सोफे पर निढ़ाल हो गये।
“अनु पेट में तो चूहें कूद रहें हैं।”
“एक काम करों थोड़ी सी खिचड़ी ही बना लो।”

मौलिक
मधु जैन जबलपुर

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