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शहर में अचानक दंगा भड़क जाने से सावित्री कर्फ्यू में फंस गईं. कोई भी घर जाने में उन की मदद नहीं कर रहा था कि तभी सावित्री के पुराने परिचित सूरज प्रकाश मिल गए और उन्हें अपने घर ले गए. सावित्री के बेटे राजन को यह बात पता चली तो उस ने राहत की सांस ली, पर उन्हें लेने नहीं गया.

त भी कमला बोल उठीं, ‘‘मैं ने तो ऐसा कोई जादू नहीं किया था आप पर. आप ने तो अपने मातापिता की भरपूर सेवा की है. यह बेटे के ऊपर भी निर्भर करता है कि वह उस जादू से कितना बदलता है.’’

सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘भाभीजी, ऐसा लगता है दुनिया में दुखी लोग ज्यादा हैं. देखो न हम इसलिए दुखी हैं कि हमारे कोई औलाद नहीं है. आप इसलिए दुखी हैं कि अपना बेटा भी अपना न रहा. वह आप की नहीं, बल्कि बहू की ही सुनता और मानता है.’’

‘‘हां, सोचती हूं कि इस से तो अच्छा था कि बेटा नहीं, बल्कि एक बेटी ही हो जाती, क्योंकि बेटी कभी अपने मांबाप को बोझ नहीं समझती.’’

‘‘इस दुनिया में सब के अपनेअपने दुख हैं,’’ कमला ने कहा.

5 दिन तक कर्फ्यू लगा रहा. इन 5 दिनों में राजन ने एक दिन भी फोन कर के सावित्री का हाल नहीं पूछा.

5 दिन बाद कर्फ्यू में 4 घंटे की ढील दी गई. सावित्री ने सूरज प्रकाश से कह कर राजन को फोन मिलवाया.

सूरज प्रकाश ने कहा, ‘‘कैसे हो राजन, सब ठीक तो है न?’’

‘हांहां अंकल, सब ठीक है. मम्मी कैसी हैं?’ उधर से राजन की आवाज सुनाई दी.

‘‘वे भी ठीक हैं बेटे. लो, अपनी मां से बात कर लो,’’ कहते हुए सूरज प्रकाश ने सावित्री को फोन दे दिया.

‘कैसी हो मम्मी?’

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं. भाई साहब के यहां कोई परेशानी हो सकती है क्या? इन दोनों ने तो मेरी भरपूर सेवा की है. तू ने 5 दिनों में एक दिन भी फोन कर के नहीं पूछा कि मम्मी कैसी हो?’’

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‘‘अंकल बहुत अच्छे इनसान हैं. उन की सभी तारीफ करते हैं. मैं जानता था कि अंकल के यहां आप सहीसलामत रहोगी.’’

‘‘कर्फ्यू में 4 घंटे की ढील है. तू यहां आ जा. मैं तेरे साथ घर आ जाऊंगी.’’

‘मम्मी, मैं तो बाजार जा रहा हूं कुछ जरूरी सामान खरीदना है. तुम ऐसा करो कि रिकशा या आटोरिकशा कर के घर आ जाना, क्योंकि मुझे बाजार में देर हो जाएगी.’

‘‘ऐसा ही करती हूं,’’ बुझे मन से सावित्री ने कहा और फोन काट दिया.

सूरज प्रकाश ने पूछा, ‘‘क्या कहा राजन ने?’’

‘‘कह रहा है कि कुछ जरूरी सामान खरीदने बाजार जा रहा हूं तुम रिकशा या आटोरिकशा कर के घर आ जाओ. भाई साहब, अभी 3 घंटे से भी ज्यादा का समय बाकी है. मैं बाहर से कोई रिकशा या आटोरिकशा पकड़ कर घर चली जाऊंगी,’’ सावित्री ने निराशा भरी आवाज में कहा.

‘‘भाभीजी, आप क्या बात कर रही हैं? आप अकेली जाएंगी? क्या हम से मन ऊब गया है जो इस तरह जाना चाहती हो?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी बात नहीं है. इन 5 दिनों में तो मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं बता नहीं सकती.’’

‘‘वैसे तो मैं भी आप को घर छोड़ कर आ सकता हूं, पर मैं नहीं जाऊंगा. जब कर्फ्यू पूरी तरह खुल जाएगा तब आप चली जाना. हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि राजन क्यों नहीं आया.’’

‘‘ठीक कहते हैं आप, लेकिन घर जाना भी तो जरूरी है.’’

‘‘मैं ने कब मना किया है. 3 दिन बाद कर्फ्यू खुल जाएगा, तब आप चली जाना,’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

3 दिनों के बाद जब पूरी तरह कर्फ्यू खुला तो सावित्री ने अकेले ही घर जाने के लिए कहा.

कमला ने टोक दिया, ‘‘नहीं दीदी, आप अकेली नहीं जाएंगी. ये आप को घर छोड़ आएंगे.’’

‘‘हां भाभीजी, आप के साथ चल रहा हूं.’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

स्कूटर सावित्री के मकान के सामने रुका. सावित्री ने कहा, ‘‘अंदर आइए.’’

‘‘मैं फिर कभी आऊंगा भाभीजी. आज तो बहुत काम करने हैं. समय नहीं मिल पाएगा.’’

सावित्री घर में घुसी.

‘‘तुम किस के साथ आई हो मम्मी?’’ राजन ने पूछा.

‘‘सूरज प्रकाश घर छोड़ कर गए हैं. मैं ने उन से बहुत कहा कि अकेली चली जाऊंगी, पर वे दोनों ही नहीं माने. कमला दीदी भी कहने लगीं कि अकेली नहीं जाने दूंगी.’’

भारती चुप रही. उसे सावित्री के आने की जरा भी खुशी नहीं हुई, पर पोता राजू बहुत खुश था.

राजन व भारती के बरताव में कोई फर्क नहीं पड़ा. सावित्री को लग रहा था कि उन्हें जानबूझ कर परेशान किया जा रहा है.

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रविवार का दिन था. सावित्री दोपहर का खाना खा रही थी, पर सब्जी में मिर्च बहुत ज्यादा थी. एक टुकड़ा खाना भी मुश्किल हो गया. उस ने चुपचाप 3-4 टुकड़े रोटी के खा लिए, पर मुंह में जैसे आग लग गई हो. पानी पी कर राजन को आवाज दी.

राजन ने पूछा, ‘‘क्या हुआ मम्मी?’’

‘‘सब्जी में मिर्च बहुत तेज है. मुझ से तो खाई नहीं जा रही है.’’

‘‘मम्मी, सब्जी तो एकजैसी बनती है. तुम्हारी अलग से नहीं बनती.’’

‘‘तू सब्जी चख कर तो देख.’’

‘‘तुम्हारे मुंह का जायका खराब हो गया है. कल तुम डाक्टर को दिखा कर आना.’’

तभी भारती रसोई से निकल कर आई और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी कह रही हैं कि सब्जी में मिर्च बहुत तेज है.’’

‘‘बनाबनाया खाना बैठेबिठाए मिल जाता है. खाना खराब है तो छोड़ क्यों नहीं देतीं. क्यों खा लेती हो दोनों टाइम?’’

‘‘छोड़ो भारती, तुम रसोई में जाओ. मम्मी तो सठियाती जा रही हैं.’’

सावित्री ने खाने की थाली एक तरफ सरकाते हुए कहा, ‘‘रहने दे राजन, मुझे नहीं खाना है. डाक्टर ने तेज मिर्च, नमक, मसाले व ज्यादा घीतेल खाने को मना कर रखा है. इस उम्र में बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. अभी तो मेरे हाथपैर चल रहे हैं. मैं अपना नाश्ता और खाना खुद बना लूंगी.’’

राजन चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया.

उस दिन के बाद सावित्री ने खुद ही अपना चायनाश्ता व खाना बनाना शुरू कर दिया.

एक रात सावित्री की सोते हुए आंख खुली. रात के 12 बज रहे थे. वे उठीं और आंगन के एक कोने में बने बाथरूम की ओर चल दीं. राजन के कमरे में बहुत कम आवाज में टैलीविजन चल रहा था. राजन और भारती की बातचीत सुन कर उन के कदम रुक गए.

‘‘तुम्हारी मम्मी से तो मैं बहुत ही परेशान हूं. तुम्हारे पापा तो चले गए और इस मुसीबत को मेरी छाती पर छोड़ गए. अगर दंगे में मारी जातीं तो हमेशा के लिए हमें भी चैन की सांस मिलती,’’ भारती बोल रही थी.

‘‘और सरकार से 5 लाख रुपए भी मिलते, जैसा कि अखबारों में छपा था कि दंगे में मरने वालों के परिवार को सरकार द्वारा 5 लाख रुपए की मदद की जाएगी,’’ राजन बोला.

यह सुन कर सावित्री सन्न रह गईं. वे थके कदमों से बाथरूम पहुंचीं और लौट कर अपने बिस्तर पर लेट गईं.

अगली सुबह सावित्री उठीं. नहाधो कर बिना नाश्ता किए सूरज प्रकाश के घर पहुंच गईं.

कमला ने चेहरे पर खुशी बिखेरते हुए पूछा, ‘‘दीदी, कैसी हैं आप?’’

‘‘हां, बस ठीक हूं,’’ सावित्री ने उदास लहजे में कहा.

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‘‘भाभीजी, पहले आप नाश्ता कर लीजिए,’’ सूरज प्रकाश ने कहा.

नाश्ता करने के बाद सावित्री ने सारी बातें बता दीं. रात की बात सुन कर तो उन दोनों को भी बहुत दुख हुआ.

सावित्री ने दुखी मन से कहा, ‘‘भाई साहब, समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? घरपरिवार होते हुए भी मैं बिलकुल अकेली सी हो गई हूं. अब तो वह घर मुझे जेल की कोठरी की तरह लगने लगा है. आप मुझे किसी वृद्धाश्रम का पता बता दीजिए. मैं अपनी जिंदगी के बाकी दिन वहां बिता लूंगी,’’ कहतेकहते सावित्री रोने लगीं.

‘‘भाभीजी, क्या बात कर रही हैं आप? आप वृद्धाश्रम में क्यों रहेंगी? आप अपने घर में न रहें, यह आप की इच्छा है, पर हमारी भी एक इच्छा है, अगर आप बुरा न मानो तो कह दूं?’’

‘‘हांहां, कहिए.’’

‘‘क्या यह नहीं हो सकता कि आप हम दोनों के साथ इसी घर में रहें. हम दोनों भी बूढ़े हैं और अकेले हैं. हम तीनों मिलजुल कर रहें, इस से हम तीनों का अकेलापन दूर हो जाएगा,’ सूरज प्रकाश ने कहा.

तभी कमला बोल उठीं, ‘‘दीदी, मना मत करना. मैं एक बात जानना चाहती हूं कि हमारी दलित जाति के चलते आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’

‘‘नहींनहीं, हम दोनों परिवारों के बीच यह जाति कहां से आ गई. आप के यहां इतने दिन रह कर तो मैं ने देख लिया है. आप जैसे परिवार का साथ पाने को भला कौन मना कर सकता है.’’

‘‘भाभी, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सभी शहरों में अकेलेपन की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए समान विचारों के 3-4 बूढ़े इकट्ठा रहने लगें?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं हो सकता ऐसा,’’ सावित्री ने कहा. उन्हें लग रहा था कि उन के दिल से भारी बोझ उतर रहा है.

शाम को जब सावित्री घर पहुंचीं तो राजन ने कहा, ‘‘आप कहां चली गई थीं? फोन भी यहीं छोड़ गई थीं. कहां रहीं सुबह से अब तक?’’

सावित्री ने अपने कमरे में कुरसी पर बैठते हुए कहा, ‘‘भारती को भी बुला ले. मुझे तुम दोनों से बात करनी है.’’

राजन ने भारती को आवाज दी. उसे लग रहा था कि मम्मी के दिल में कोई ज्वालामुखी धधक रहा है. भारती भी कमरे में आ गई.

सावित्री बोल उठीं, ‘‘मैं ने कल रात तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. मैं अपने ही घर में अपनी औलाद पर बोझ बन गई हूं. मैं इतनी बड़ी मुसीबत बन गई हूं कि तुम दोनों मुझ से छुटकारा चाहते हो. तुम चाहते थे कि मैं भी दंगे में मारी जाती और तुम्हें 5 लाख रुपए सरकार से मिल जाते.’’

राजन और भारती यह सुन कर सन्न रह गए.

‘‘बेटे, अब तक तो मैं तेरे और पोते के मोह के जाल में थी. अपने खून का मोह होता है, पर रात को जो मैं ने सुना उसे सुन कर सारा मोह खत्म हो गया है.’’

‘‘यह मकान, नकदी जोकुछ भी मेरे पास है, सब तुम्हारा ही तो था, पर तब जब मेरी सेवा करते. मेरे बुढ़ापे का सहारा बनते. अब तो मेरी इच्छा है कि मैं अपनी सारी जायदाद किसी ऐसे वृद्धाश्रम को दान कर दूं, जहां लोग अपनी नालायक औलाद से पीडि़त और दुखी हो कर पहुंचते हैं. अब मैं यहां नहीं रहूंगी. कल ही मैं यहां से चली जाऊंगी.’’

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‘‘कहां जाओगी?’’ राजन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.

‘‘मैं सूरज प्रकाश के घर जा रही हूं. हम तीनों मिल कर अपना बुढ़ापा आराम से काट लेंगे.’’

‘‘सूरज अंकल तो दलित हैं… क्या आप उन के घर में रहोगी?’’

‘‘मैं ने कर्फ्यू में वहां इतने दिन गुजारे तब तो तू ने कुछ नहीं कहा. अब मैं वहां हमेशा रहने की बात कर रही हूं तो तुझे उन की जाति दिखाई दे रही है,’’ सावित्री ने गुस्से भरे लहजे में कहा.

राजन और भारती उन से नजरें नहीं मिला पा रहे थे.

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