मैं अपनी पत्नी को किसी चीज की कमी नहीं होने देता, फिर भी वह मेरे पास नहीं रहना चाहती मैं क्या करूं ?

सवाल
2 बच्चे होने के बावजूद मेरी पत्नी मेरे पास नहीं रहना चाहती. मैं उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देता, फिर भी वह नहीं मानती. क्या करूं?

जवाब
आप की पत्नी ने आप के साथ रह कर 2 बच्चे पैदा किए, फिर अब क्यों आप के साथ नहीं रहना चाहती? आप को इस बात की वजह जान कर उसे दूर करना होगा. आप बहुत ही प्यार से उस से वजह का पता लगाएं और उसे जड़ से मिटा दें. सिर्फ कमी न होने देना ही काफी नहीं है. आप उस का पूरापूरा खयाल रखें और अकसर घुमाने के लिए शहर से बाहर ले जाएं. भरपूर प्यार से वह आप की कायल हो जाएगी.

युवक भी वर्जिन होते हैं

कालेज और क्लास में अकसर स्टूडैंट्स के बीच आम बहस का टौपिक होता है कि उन की गर्लफ्रैंड या क्लासमेट ने अपनी वर्जिनिटी कब खोई थी. बड़े दिलचस्प अंदाज में युवक अंदाजा लगाते हैं कि फलां युवती वर्जिन है या नहीं. अपनी गर्लफ्रैंड बनाने की पहली प्राथमिकता भी वह एक वर्जिन युवती को ही देते हैं, लेकिन वे खुद के गिरेबान में कभी झांक कर नहीं देखते कि वे वर्जिन कहां हैं?

अमिताभ बच्चन इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहते हैं कि अगर युवतियों से उन की वर्जिनिटी, कौमार्य या कुंआरेपन को ले कर सवाल पूछे जाते हैं तो युवकों से भी ये सवाल पूछे जाने चाहिए. इस में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. वे आगे कहते हैं कि अगर किसी युवती से कुछ पूछा जाता है तो उस पर सवालिया निशान लगता है जैसे उस ने कोई गलत काम कर दिया है, लेकिन जब युवकों का मामला हो तो सवाल विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ आता है जैसे उन्होंने कोई महान काम कर दिया हो.

ये भी पढ़ें- मेरी पत्नी मुझे ही अपना भाई जैसा समझने लगी है. मैं क्या करूं ?

ये भी पढ़ें-

वर्जिनिटी टैस्ट में फेल तो…

आएदिन अखबारों में इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, जहां वर्जिनिटी टैस्ट करने के नाम पर युवती की शादी टूट जाती है या फिर उसे प्रताडि़त किया जाता है. गर्लफ्रैंड और बौयफ्रैंड के रिश्ते भी इसी बात के आधार पर टूट जाते हैं. पिछले दिनों यह खबर आई थी कि महाराष्ट्र के नासिक में एक पति ने शादी के 2 दिन बाद ही अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वह वर्जिनिटी टैस्ट में फेल हो गई.

ये भी पढ़ें- एक फ्रैंडशिप क्लब में मेरे पैसे फंसे हुए हैं. मैं क्या करूं?

इतना ही नहीं युवती वर्जिन है या नहीं इस का फैसला करने के लिए पंचायत के सदस्यों द्वारा शादीशुदा जोड़े को बिस्तर पर सफेद चादर बिछा कर सेक्स करने के लिए कहा जाता है. सेक्स के बाद अगर चादर पर खून के धब्बे नहीं मिलते, तो युवती को वर्जिन नहीं माना जाता. इस मामले में युवक ने अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टैस्ट का प्रमाण पंचायत को सौंपा. युवक ने सुबूत के तौर पर वह चादर पंचायत के सामने पेश की. इस चादर पर खून के धब्बे न होने पर पंचायत के सदस्यों ने पति को शादी खत्म करने की अनुमति दे दी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Short Story : हथेली पर आत्मसम्मान

‘‘सो म, तुम्हारी यह मित्र इतना मीठा क्यों बोलती है?’’

श्याम के प्रश्न पर मेरे हाथ गाड़ी के स्टीयरिंग पर तनिक सख्त से हो गए. श्याम बहुत कम बात करता है लेकिन जब भी बात करता है उस का भाव और उस का अर्थ इतना गहरा होता है कि मैं नकार नहीं पाता और कभी नकारना चाहूं भी तो जानता हूं कि देरसवेर श्याम के शब्दों का गहरा अर्थ मेरी समझ में आ ही जाएगा.

‘‘जरूरत से ज्यादा मीठा बोलने वाला इनसान मुझे मीठी छुरी जैसा लगता है, जो अंदर से हमारी जड़ें काटता है और सामने चाशनी बरसाता है,’’ श्याम ने अपनी बात पूरी की.

‘‘ऐसा क्यों लगा तुम्हें? मीठा बोलना अच्छी आदत है. बचपन से हमें सिखाया जाता है सदा मीठा बोलो.’’

‘‘मीठा बोलना सिखाया जाता है न, झूठ बोलना तो नहीं सिखाया जाता. यह लड़की तो मुझे सिर से ले कर पैर तक झूठ बोलती लगी. हर भाव को प्रदर्शन करने में मनुष्य एक सीमा रेखा खींचता है. जरूरत जितनी मिठास ही मीठी लगती है. जरूरत से ज्यादा मीठा किस लिए? तुम से कोई मतलब नहीं है क्या उसे? कुछ न कुछ स्वार्थ जरूर होगा वरना आज के जमाने में कोई इतना मीठा बोलता ही नहीं. किसी के पास किसी के बारे में सोचने तक का समय नहीं और वह तुम्हें अपने घर बुला कर खाना खिलाना चाहती है. कौनकौन हैं उस के घर में?’’

‘‘उस के मांबाप हैं, 1 छोटी बहन है, बस. पिता रिटायर हो चुके हैं. पिछले साल ही कोलकाता से तबादला हुआ है. साथसाथ काम करते हैं हम. अच्छी लड़की है शोभना. मीठा बोलना उस का ऐब कैसे हो गया, श्याम?’’

श्याम ने ‘छोड़ो भी’ कुछ इस तरह कहा जिस के बाद मैं कुछ कहूं भी तो उस का कोई अर्थ ही नहीं रहा. घर पहुंच कर भी वह अनमना सा चिढ़ा सा रहा, मानो कहीं का गुस्सा कहीं निकाल रहा हो.

ये भी पढ़ें- Short Story : अंतिम निर्णय

‘‘लगता है, कहीं का गुस्सा तुम कहीं निकाल रहे हो? क्या हो गया है तुम्हें? इतनी जल्दी किसी के बारे में राय बना लेना क्या इतना जरूरी है…थोड़ा तो समय दो उसे.’’

‘‘वह क्या लगती है मेरी जो मैं उसे समय दूं और फिर मैं होता कौन हूं उस के बारे में राय बनाने वाला. अरे, भाई, कोई जो चाहे सो करे…तुम्हारी मित्र है इसलिए समझा दिया. जरा आंख और कान खोल कर रखना. कहीं बेवकूफ मत बनते रहना मेरी तरह. आजकल दोस्ती और किसी की निष्ठा को डिस्पोजेबल सामान की तरह इस्तेमाल कर के डस्टबिन में फेंक देने वालों का जमाना है.’’

‘‘सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं, श्याम.’’

‘‘तुम से ज्यादा तजरबा है मुझे दुनिया का. 10 साल हो गए हैं मुझे धक्के खाते हुए. तुम तो अभीअभी घर छोड़ कर आए हो न इसलिए नहीं जानते, घर की छत्रछाया सिर्फ घर %A

किसान आन्दोलन : कैसे कट रही दिन और रातें?

लेखक–  रोहित और शाहनवाज

देश की राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से चल रहे किसान आन्दोलन ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खिंचा है. अपनी जायज मांगों को लेकर किसान दिल्ली की तरफ कुच करने पर मजबूर है. वैसे तो हर समय ही आन्दोलन चल रहा है लेकिन इन किसानों ने जब दिल्ली की सड़कों पर अपना घर बना ही लिया है तो वे किस प्रकार से पूरा दिन आन्दोलन कर रहे हैं? आखिर कैसे कट रही है इन किसानों की दिन और राते?

केंद्र सरकार के द्वारा कृषि कानूनों में बदलाव के कारण देश भर के किसानों में आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है. आन्दोलन की मौजूदा स्थिति यह है कि पंजाब और हरियाणा के किसान दिल्ली और हरियाणा के सिंघु बार्डर और टिकरी बार्डर पर संगठित हैं, वहीं उत्तर प्रदेश से आए किसान गाजीपुर बार्डर पर संगठित है.

यह आन्दोलन ऐसा नहीं है कि सुबह सुबह अपने घर से निकले, प्रोटेस्ट साईट पर पहुंचे, तख्तियां और बैनर लेकर दो चार नारे लगाए, पुलिस वालों के साथ धक्का मुक्की की और शाम ढली तो अपने घर को रवाना हो लिए. बल्कि आन्दोलन के लिए इतने दूर-दूर से आए इन किसानों के लिए दिल्ली की यही सड़कें अब उनका घर बन चुकी हैं.

दिल्ली-हरियाणा सिंघु बार्डर पर पंजाब और हरियाणा के किसान अपने जिन ट्रक और ट्रैक्टर से सफर कर वे दिल्ली आए थे, अब वहीं वाहन इन किसानों का घर बन चुके हैं. पुलिस वालों के द्वारा इन किसानों को रोकने के लिए जिन सीमेंट के भारी भरकम बैरीकेड का इस्तेमाल किया गया, वह अब इन किसानों के लिए अपना खाना बनाने के लिए चूल्हा बन चूका है.

ये भी पढ़ें- बढ़ती महंगाई, बिचौलियों की कमाई

ऐसे में किसानों के इस आन्दोलन में लोग चौबीसों घंटे तैनात हैं. यह किसान हर समय तो नारे तो नहीं लगा रहे या फिर पुलिस के साथ मुठभेड़ नहीं हो रही, बल्कि समय के साथ वें अपने प्रोटेस्ट को विराम और अपने शरीर के आराम का भी पूर्णतः ख्याल रख रहे हैं. हमने अलग अलग प्रदर्शन स्थालों पर विजिट कर यह जानने की कोशिश की, कि आन्दोलन के लिए आए ये किसान आखिर किस प्रकार अपने दिन और रातें काट रहे हैं.

हाल ही में बस में सफर करते समय मुझसे आगे बैठे 2 शख्स आपस में दिल्ली में चल रहे किसान आन्दोलन की बात कर रहे थे. एक कहता  कि, “आखिर कोई कैसे इतनी बड़ी संख्या में सड़क पर दिन और रात गुजार सकता है?” दूसरा वाला भी सहमती देते हुए कहता है कि “हां यार जिगरा चाहिए हर समय नारे लगाने का.”

वहीं पहला शख्स दूसरे से कहता कि, “अभी वे किसान अपने घर पर होते तो शायद अपने दिनचर्या वाले कामों में व्यस्त होते. अपने दोस्तों से मिलते, नहाते धोते, समय से खाते पीते, अपने बच्चों के साथ खेलते, खेती में व्यस्त हो जाते. सब कुछ नार्मल चलता लेकिन इस प्रोटेस्ट में आने के बाद वें किस तरह से हर चीज का ध्यान रख पा रहे होंगे ? हर समय आन्दोलन को देना कितना मुश्किल होता होगा. नहीं?”

बस में इन दो शख्सों की बातचीत सुन मेरे दिमाग में भी यह ख्याल आया कि जिन लोगों ने अपने जीवन में कभी किसी आन्दोलन का हिस्सा नहीं बने, जिन्होंने कभी कोई प्रोटेस्ट नहीं किया, जिनकी संख्या संभवतः ज्यादा ही होगी, वैसे लोग किसानों के लगातार आन्दोलन को इन्ही नजरों से देखते होंगे जिस प्रकार ये बात और आपस में सवाल जवाब कर रहे थे.

ये भी पढ़ें- सियासत : कांग्रेस में रार, होनी चाहिए आर या पार

प्रोटेस्ट करने आए ये किसान हर समय नारे लगाना या फिर हर समय पुलिस के साथ धक्का मुक्की के मोड पर नहीं रहते. ये बात सही है की इस प्रोटेस्ट में किसानों ने एक मंच ऐसा भी बनाया है जहां पर दिन भर कुछ न कुछ चलता ही रहता है. नारे लगाना, भाषण देना, गीत गाना इत्यादि ज्यादातर समय यह होता ही रहता है. लेकिन क्योंकि प्रोटेस्ट करने आए किसानों की संख्या हजारों में हैं इसीलिए हर समय उस मंच पर लोग बदलते रहते हैं.

और ऐसा नजारा जिन सभी बार्डर पर प्रोटेस्ट हो रहा है, उन सभी में देखा जा सकता है. मंच पर मौजूद होने पर किसान नारे भी लगाते हैं, गाने भी गाते हैं, मीडिया वालों से बातचीत भी करते हैं और भी बहुत कुछ चलता ही रहता है. लेकिन जब वें मंच के आसपास नहीं होते और अपने टेंट में होते हैं तो वें अपने लिए खाना भी बनाते हैं, आराम भी करते हैं, फ़ोन पर अपने परिवार वालों के साथ बातचीत भी करते हैं.

प्रदर्शन के लिए आए किसान पुरे जोर-शोर से अपने साथ 6 महीने तक का राशन बांध कर आए हैं. लेकिन ऐसा नहीं है की हर एक चीज का प्रबंध ये किसान खुद से कर रहे हो. बेशक केंद्र सरकार के द्वारा काले कृषि कानून के लागु होने के बाद किसान सड़कों पर उतरे हो, लेकिन दिल्ली से भी लोग प्रोटेस्ट साईट पर पहुंच कर किसानों की मांगों के समर्थन में उतरे हैं.

गाजीपुर बार्डर हो या फिर टिकरी बार्डर या सिंघु बार्डर हर जगह पर दिल्ली की सिख गुरुद्वारा कमिटी द्वारा लंगर का प्रबंध किया गया है और प्रदर्शनकारियों को कम से खाने पीने की किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है. इसके अलावा किसानों को रात में सोते वक्त ठण्ड न लगे इसके लिए भी आम लोगों और गुरुद्वारा कमिटी के द्वारा किसानों के लिए कम्बल और चादरों का इंतजाम किया गया है.

ये भी पढ़ें- किसान आत्महत्या कर रहे, मुख्यमंत्री मौन हैं!

कैसे कर रहे हैं किसान अपना टाइम पास?

वैसे तो 24 घंटे काम कोई मशीन या कोई रोबोट भी नहीं कर सकता. कुछ इसी तरह से हर समय किसान भी प्रदर्शन में लीन नहीं हो सकते हैं. गाजीपुर बॉर्डर पर जिस फ्लाईओवर के नीचे किसानों ने प्रोटेस्ट के लिए जगह हासिल की हैं वहां पर हमें किसान कई तरह से आन्दोलन में अपना समय निकालते हुए दिखाई दिए.

हम ने देखा की पुरे प्रदर्शन स्थल पर करीब 7-8 हुक्के दिखाई दिए, और हर हुक्के पर 10-12 लोगों का झुंड बारी बारी से हुक्का खीचने का इंतज़ार कर रहा था. उसी तरह से कुछ लोग जलते कोयले के पास हाथ सकते हुए नजर आए. कुछ अपने हुक्के में जलता हुआ कोयला भरते हुए नजर आए तो कुछ बेफिक्र हो कर यहां वहां घूमते नजर आए.

कुछ लोगों का झुंड हमें ताश खेलता हुआ भी नजर आया तो कुछ ठंड की दोपहर की धूप में सोते हुए नजर आए. कुछ आपस में बात करते हुए दिखाई दिए तो कुछ फोन पर अपने घर परिवार वालों से बात करते दिखाई दिए.

लेकिन ऐसा नहीं है कि उस समय प्रोटेस्ट नहीं हो रहा था. फ्लाईओवर के ऊपर बड़ी संख्या में लोग बैठ कर लोगों का भाषण सुन रहे थे. प्रोटेस्ट में गीत भी गाये जा रहे थे. बड़ी संख्या में उपस्थित पुलिस, फ्लाईओवर के ऊपर तैनात थी. उत्तर प्रदेश की तरफ से दिल्ली आने के लिए आम लोगों की गाड़ियां भी पुल पर खड़ी थी.

कुछ ऐसा ही नजारा टिकरी बार्डर पर भी हमें देखने को मिला. टिकरी बार्डर पर भारी तादाद में जमा थे. 58 साल के गुरविंदर सिंह जी ने वहां पर उपस्थित लोगों के बारे में थोड़ी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि, “इस बार्डर पर करीब 30-35 किलोमीटर आगे तक किसानों का हुजूम मौजूद है. और जैसे जैसे समय बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे लोगों की संख्या में और अधिक इजाफा बढ़ता ही रहा है.”

टिकरी बार्डर पर इतनी बड़ी संख्या में किसान प्रदर्शन के लिए मौजूद है कि वहां का नजारा देखने को ही बनता है. सड़के किसानों के ट्रैक्टर और ट्रक से भरी हैं. हर कुछ मीटर की दूरी पर किसान कुछ न कुछ बांटते हुए दिख ही जाएंगे. ऐसे में वहां पर लोग अपना ज्यादातर समय हमें या तो घूमते हुए नजर आए या फिर लंगर के लिए काम करते नजर आए.

लोग ज्यादातर समय खाने के लिए तैयारियां करते दिखाई दिए. कोई सब्जियां को छिलते हुए  दिखाई दिए, तो कोई उन छिली हुई सब्जियों को काटते हुए. कुछ लोगों का झुंड मिल कर चाय बनाता हुआ दिखाई दिया तो कोई चाय बांटता हुआ.

सिंघु बार्डर पर भी नजारा कुछ अलग नहीं था. कुछ नारे लगाते हुए दिखे तो कुछ घूमते हुए भी दिखे. रात को ढंग से नींद न पूरी होने के कारण लोग अपने ट्रक में और अपने ट्रैक्टर के पीछे सोते हुए दिखे. लोग सड़कों पर ही चटाई बिछा कर सोते हुए भी दिखे.

कुछ कमियों का सामना करने को मजबूर है किसान

इन तीनों बार्डर पर ही किसान किसी न किसी तरह से खुद को व्यस्त रखे हुए है. लेकिन कुछ चीजो की कमी हमें इन तीनों ही जगह पर दिखाई दी. जैसे शौच की व्यवस्था. टिकरी बार्डर और सिंघु बार्डर पर यह समस्या बहुत ज्यादा है. प्रशासन की ओर से प्रदर्शनकारियों के लिए शौच की व्यवस्था एकदम न के बराबर है.

टिकरी बार्डर पर मौजूद गुरविंदर सिंह जी ने हमें बताया की वें पहले दिन से इस प्रदर्शन का हिस्सा बने हुए हैं, लेकिन शौच की कोई किसी तरह की व्यवस्था नहीं हैं. टिकरी बार्डर पर 5 किलोमीटर आगे तक जाने के बाद हमने पाया कि उस 5 किलोमीटर के दायरे में केवल 3 गाड़ी वाले शौचालय हैं. एक गाड़ी में कुल मिला कर 8 शौचालय की व्यवस्था है. यानि की कुल मिला कर 24 शौचालय ही.

इतने हजार लोगों के लिए केवल 24 शौचालय. प्रशासन का बड़ा ही अमानवीय व्यवहार देखने को मिला. इस के साथ ही यदि प्रदर्शनस्थल पर कोई बीमार हो जाए तो उस के एम्बुलेंस की कोई भी व्यवस्था देखने को हमें नहीं मिली.

अभी प्रदर्शन की हालिया स्थिति यह है की सरकार और किसानों की 3 दिसम्बर के दिन बातचीत हुई जिस का कोई परिणाम निकल कर नहीं आया. और सरकार का रवैय्या देख किसानों ने 8 दिसम्बर के दिन भारत बंद का ऐलान किया है, जिस में प्रशासन को उन की मांगों की अनदेखी करने पर दिल्ली के सभी रास्ते बंद करने का भी ऐलान किया है. अब देखना यह है की यह आन्दोलन आने वाले समय में किस तरह से आगे बढ़ता है. अभी तक किसानों के इस रवैय्ये को देख हर किसी को यह समझ लेने की जरुरत है की किसान अपना प्रदर्शन जारी रखेंगे और अपनी मांगों को मनवाए बगैर एक इंच भी अपने कदम खीचने को तैयार नहीं होंगे.

खेसारी लाल यादव ने भोजपुरी अंदाज में कंगना रनौत को मारा ताना,  कहा- ‘ई कंगना के कुछ न बुझाई…’

बौलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut) अपने विवादित बयानों की वजह से हमेशा सुर्खियों में बनी रहती हैं. हाल ही में उन्होंने किसान आंदोलन में पहुंची एक बुजुर्ग महिला को लेकर ट्वीट किया था.

दरअसल किसानों के इस प्रोटेस्ट को लेकर कंगना रनौत ने एक बुजुर्ग महिला की तस्वीर ट्विट कर  शाहीन बाग वाली दादी बिलकिस बानो बता दिया. एक्ट्रेस ने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि किसानों के नाम पर हर कोई अपनी रोटियां सेक रहा है.

ये भी पढ़ें- स्लिम फिट रहने के लिए करती हूं मेहनत : रूपा सिंह

कंगना रनौत का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ. यूजर्स कंगना रनौत के विरोध में उतर आए हैं. तो वहीं आम जनता के साथ कई बौलीवुड सितारें भी कंगना को ट्रोल करने लगे. इस ट्वीट को देखकर पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh) ने सोशल मीडिया पर कंगना रनौत की जमकर लताड़ लगाई थी. और सितारों भी एक्ट्रेस की इस ट्विट पर नाराजगी जाहिर की थी.

तो इसी बीच भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव ने भी कंगना रनौत पर तंज कसा है. उन्होंने भोजपुरी स्टाइल में कंगना रनौत को लेकर सोशल मीडिया पर ट्विट किया. खेसारी लाल यादव ने लिखा, ‘ए भाई, ई कंगना के कुछ न बुझाई। ना समझ आवे आम, न बुझाये मूली… अ खाली हर बात पे जुबान खूली… किसान लोगिन के आज सबके साथ के जरुरत बा, सब गोटा मिल के बोलीं: जय जवान-जय किसान! बाकी सब के खेसारी के प्रणाम बा.’

ये भी पढ़ें- ‘रानी चटर्जी’ ने कहा ‘मैं जैसी हूं वैसी रहूंगी’, देखें ये वीडियो

फिर उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा, ‘इस समय किसानों को हमारे साथ की जरुरत है, हम सब उनके साथ खड़े हैं. किसानों की मांगें बिल्कुल सही हैं। किसानों के विरोध का तरीका जायज है. मुझे उम्मीद है जल्द ही केंद्र सरकार इनकी मांगें मान लेगी.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की एक्ट्रेस दिव्या भटनागर ने दुनिया को कहा अलविदा

छोटे पर्दे की फेमस एक्ट्रेस दिव्या भटनागर ( Divya Bhatnagar) का आज सुबह यानि सोमवार को निधन हो गया है. खबर ये आ रही है कि दिव्या को पिछले कुछ दिन से वेंटिलेटर पर रखा गया था. जिसके बाद आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली.

बताया जा रहा है कि दिव्या कोरोना वायरस का शिकार हो गई थी. जिसके बाद उन्हें गोरेगांव के एसआरवी अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. दिव्या कई बड़े शोज का हिस्सा रह चुकी हैं.  ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Yeh Rishta kya kehlata hai) और‘गुलाबो’ (Gulabo) जैसे शोज में दिव्या महत्वपूर्ण किरदार में नजर आई हैं.

ये भी पढ़ें- Bigg Boss 14: अभिनव शुक्ला संग फ्लर्ट करेंगी अर्शी खान, क्या होगा रुबीना दिलाइक का रिएक्शन

divya

खबरों के अनुसार दिव्या को निमोनिया हुआ था. और इलाज के दौरान उनकी हालत और भी गंभीर होती गई. उनका आक्सीजन लेवल  कम हो रहा था, इसी वजह से उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया. वह वेंटिलेटर पर कई दिन से जिंदगी की जंग लड़ रही थी. और अब वह हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से जा चुकी हैं.

ये भी पढ़ें- हिना खान ने बिकनी में दिखाया अपना ग्लैमरस अंदाज, देखें फोटोज

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार दिव्या भटनागर के दोस्त युवराज रघुवंशी ने एक्ट्रेस के निधन की खबर को कन्फर्म किया है. उन्होंने बताया कि ‘दिव्या का निधन सोमवार को सुबह 3 बजे हुआ. दिव्या को 7 हिल्स हास्पिटल में शिफ्ट कर दिया गया था. अचानक रात 2 बजे उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी थी.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Devoleena Bhattacharjee (@devoleena)

 

तो वहीं दिव्या की दोस्त और मशहूर एक्ट्रेस देवोलीना भट्टाचार्जी (Devoleena Bhattacharjee) ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दुख जाहिर किया है. उन्होंने लिखा, जब कोई किसी के साथ नहीं होता था तो बस तू होती थी. दिवु तू ही तो मेरी अपनी थी जिसे मैं डांट सकती थी, रूठ सकती थी, दिल की बात कह सकती थी. मुझे पता है कि जिंदगी ने तुझ पर बहुत सितम किये हैं. तू बेंइतेहां दर्द में थी. लेकिन अब मुझे पता है कि तू बेहतर जगह पर है, जहां दुख, दर्द, चीटिंग, झूठ जैसा कुछ नहीं है.

ये भी पढ़ें- रणदीप हुड्डा पहली बार इस वेब सीरीज में डिजिटल

Serial Story : अजनबी मुहाफिज

बढ़ती महंगाई, बिचौलियों की कमाई

जनता अब ‘महंगाई डायन खाए जात है’ जैसे गाने भले ही न गा रही हो, पर बढ़ती महंगाई उसे परेशान जरूर कर रही है. महंगाई में खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों का बहुत ज्यादा असर पड़ता है. बढ़ती महंगाई से उपभोक्ता परेशान हैं और किसान बेहाल हैं.

उपभोक्ताओं द्वारा ज्यादा कीमत देने के बाद भी किसानों को फसल की लागत भी ढंग से नहीं मिल रही है. केंद्र की मोदी सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने के अपने वादे को भूल गई है. सरकार कितने भी कृषि कानून बना ले, पर जब तक वह किसानों को उन की उपज के न्यूनतम मूल्य की गारंटी नहीं देगी, तब तक उन की हालत खराब रहेगी.

किसानों की मेहनत का फायदा उन्हें नहीं, बल्कि बिचौलियों को ही होगा. मंडी में निजी खरीदारों के टाई लगा लेने से किसानों की हालत में सुधार नहीं आएगा, न ही महंगाई घटेगी.

किसान फसल बो कर खेत तैयार करते हैं, बीज की बोआई के साथसाथ खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं. अच्छी पैदावार के लिए तमाम तरह के उपाय करते हैं. छुट्टा जानवरों  से खेत की दिनरात देखभाल करते हैं.

ये भी पढ़ें- रार, होनी चाहिए आर या पार

खेत से कटाई के बाद जब तक फसल महफूज जगह नहीं पहुंच जाती है, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता है. जब यह फसल तैयार हो कर मंडी पहुंचती है, तो मंडी में बैठे खरीदार उस की कम से कम कीमत लगाने की कोशिश करते हैं.

कोरोना के चक्कर में देशभर में हुई तालाबंदी के बाद फैस्टिवल सीजन में आलू की कीमत 60 रुपए से 80 रुपए प्रति किलोग्राम तक बाजार में थी. यह आलू किसान से सीजन के समय मुश्किल से  10 रुपए प्रति किलोग्राम खरीदा गया था. आलू की महंगाई पर सरकार बिचौलियों पर कड़ी कार्यवाही करने की जगह इस बात का इंतजार कर रही है कि दिसंबर महीने तक जब किसानों का नया आलू बाजार में आएगा, तब आलू की कीमत कम हो जाएगी.

सरकार को बिचौलियों से पूछना चाहिए कि 10 रुपए प्रति किलोग्राम का आलू उपभोक्ता को 60 रुपए से 80 रुपए प्रति किलोग्राम में क्यों बिक रहा है? ट्रैजिडी यह देखिए कि जिस आलू की बोआई में किसानों ने अपनी पूरी मेहनत, समय और लागत लगाई, उस को इस  के हिसाब से कुछ नहीं मिला. जिस बिचौलिए ने केवल भंडारण किया, वह कई गुना कमाई करने में कामयाब रहा.

ये भी पढ़ें- किसान आत्महत्या कर रहे, मुख्यमंत्री मौन हैं!

आलू की कहानी हर साल

यह बात केवल आलू की ही नहीं है, बल्कि किसान के खेतों में तैयार हर फसल का यही हाल है. जैसे ही किसान के खेत में फसल तैयार होती है, वैसे ही बाजार में उस के दाम कम हो जाते हैं. यही वह ट्रैजिडी है, जो किसान को मुनाफा नहीं कमाने देती.

नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते से उत्तर प्रदेश की मंडियों में यहां के किसानों के खेतों से तैयार आलू पहुंचने लगे हैं. 20 नवंबर तक तकरीबन 2,500 क्विंटल नया आलू बाजार में आ चुका है, जिस से फुटकर बाजार में आलू की कीमत गिरने लगी है.

उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के उद्यान निदेशक एसबी शर्मा कहते हैं, ‘प्रदेश का उत्पादित नया आलू अच्छी मात्रा में दिसंबर महीने तक बाजार में आ जाएगा. अभी ज्यादातर आलू पंजाब, हरियाणा और गुजरात से आ रहा है. जैसेजैसे किसान अपना नया आलू बाजार में लाएंगे, वैसेवैसे आलू की कीमत घट जाएगी.’

उत्तर प्रदेश में आलू की खुदाई नवंबर महीने के दूसरे हफ्ते से शुरू हो जाती है. कानपुर, फर्रुखाबाद, आगरा, कन्नौज, हाथरस और फिरोजाबाद की मंडियों में 20 नवंबर से 25 नवंबर तक नया आलू मंडियों तक पहुंच जाता है.

किसान अच्छी कीमत पाने के चक्कर में आलू की खुदाई कुछ समय पहले ही कर देते हैं, जिस की वजह से आलू में पानी की मात्रा ज्यादा होती है और यह खाने में पसंद नहीं किया जाता है. इस के मुकाबले पुराना आलू ज्यादा बिकता है.

किसानों का यही आलू सस्ते में खरीद कर बिचौलिए भंडारण कर लेते हैं. बाद में जब किसानों का आलू बिक जाता है, तो बिचौलिए अपने आलू की कीमत बढ़ा देते हैं. आलू की इस कहानी से किसान और बिचौलिए के फायदेनुकसान और लागत की बात साफ दिख रही है.

कमोबेश यही हालत दूसरी फसलों की भी होती है. बात केवल उत्तर प्रदेश की ही नहीं है, बल्कि हर प्रदेश में ऐसे ही हालात हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर इटौंजा में किसान रामफल सब्जी की खेती करते हैं. वे बताते हैं, ‘हमारे यहां से बैगन 5 रुपए से 7 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिका और दुबग्गा की सब्जी मंडी में वही बैगन 25 रुपए से 30 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा था. इस में न तो बिचौलिया किसी भी तरह का भंडारण का बोझ ढो रहा है और न ही कोई लागत लगा रहा है, इस के बाद भी वह  5 गुना तक का मुनाफा कमा रहा है.

ये भी पढ़ें- बिहार में का बा : लाचारी, बीमारी, बेरोजगारी बा

‘यही हाल मटर, धनिया, टमाटर और भिंडी का होता है. बिचौलिए के मुनाफे से आम आदमी और किसान दोनों ठगे जा रहे हैं. मोटा अंदाजा यह है कि बिचौलिए 8 से 10 गुना ज्यादा कीमत पर हरी सब्जियां बेच रहे हैं.

‘केरल में इस तरह की समस्या के समाधान के लिए वहां की सरकार ने सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर रखा है, जिस से कम पर किसी भी तरह के किसान से कोई सब्जी नहीं खरीद सकता है. ऐसी व्यवस्था पूरे देश में हो, तो किसान और उपभोक्ता दोनों को राहत मिलेगी.’

कैसे होता है मुनाफे का खेल

लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके में रहने वाले शुभम सिंह खेतीकिसानी करने के साथसाथ किसानों की राजनीति और अपना कारोबार भी करते हैं. वे बताते हैं, ‘हम एक बार अपने खेत की भिंडी ले कर लखनऊ की दुबग्गा सब्जी मंडी गए. वहां बिचौलिए ने 8 रुपए प्रति किलोग्राम में भिंडी की कीमत तय की. कैसरबाग की फुटकर सब्जी मंडी में यही भिंडी  50 रुपए से 60 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई और घरघर तक पहुंचने की कीमत 80 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई.

‘किसान से उपभोक्ता तक सब्जी पहुंचने में  3 तरह के बिचौलिए जैसे थोक मंडी, फुटकर मंडी और दुकानदार शामिल होते हैं. 10 गुना फायदे में इन की हिस्सेदारी होती है. किसान महीनों मेहनत कर के जिस भिंडी से केवल  8 रुपए प्रति किलोग्राम पाते हैं, जबकि इस में उन की लागत और समय दोनों  ही लगा होता है, पर 3 बिचौलिए केवल उपभोक्ता तक सामान पहुंचाने के नाम पर सारा मुनाफा एक ही दिन में कमा लेते हैं. ये लोग पहले से ऐसी कीमत लगाते हैं, जिस में खराब होने वाली या न बिकने वाली सब्जी की कीमत भी जुड़ी होती है.’

शुभम सिंह आगे बताते हैं कि मंडी में किसान की फसल की कीमत कुछ बिचौलिए बोली लगा कर तय करते हैं. इसी कीमत पर किसान को अपनी फसल बेचनी होती है. मनमुताबिक कीमत न मिलने के बाद भी किसान पैदावार बेचने को मजबूर होते हैं. मंडी के बिचौलिए, आढ़ती और दलाल किसानों से किसी भी तरह की हमदर्दी नहीं रखते हैं. किसान को तो 2 फीसदी मंडी शुल्क भी अदा करना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश सरकार मंडी शुल्क में कटौती कर के किसानों को राहत देने का दावा कर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार की मंडियों में किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए उन से 2 फीसदी मंडी शुल्क लिया जाता है. इस शुल्क से बचने के लिए किसान बिचौलियों  को मंडी के बाहर ही अपनी फसल बेच देते हैं.

सरकार ने मंडियों में किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बढ़ावा देने के लिए मंडी शुल्क घटा कर आधा कर दिया है. अब किसानों को केवल एक फीसदी मंडी शुल्क देना होगा. किसान और उस से जुडे संगठन काफी दिनों से यह मांग कर रहे थे. इस से किसानों को कितना फायदा होगा, यह देखने वाली बात है.

नए कृषि कानून में किसानों की उपज को खरीदने का काम निजी कारोबारियों और मंडियों को भी दिया गया है. ऐसे में यह जरूरी है कि फसल का न्यूनतम मूल्य जरूर तय किया जाए.

किसानों का शोषण

मंडियों में किस तरह से किसानों को मजबूर किया जाता है, इस को बताते हुए नवनीत सिंह कहते हैं, ‘जब किसान कोई जल्दी खराब होने वाली अपनी उपज ले कर मंडी जाता है, तो वहां बिचौलिए उस की बोली लगाने से ही इनकार कर देते हैं. किसानों को लगता है कि कम से कम आनेजाने और कुछ सामान खरीदने भर का ही पैसा मिल जाए. उन की मजबूरी को समझने के बाद भी बिचौलिए उपज की बोली नहीं लगाते हैं. ये लोग इतने संगठित होते हैं कि अगर एक ने मना कर दिया, तो दूसरा भी खरीदता नहीं है.

‘एक बार हम अपने खेत से उगाई गई हरी प्याज बेचने मंडी गए. हरी प्याज के जल्दी खराब होने और सड़ने का खतरा रहता है. कई बार तो यह रातभर भी नहीं रुक पाती है. मंडी में इस को खरीदने से इनकार कर दिया गया. बहुत कहा तो एक आढ़ती ने कहा कि चबूतरे पर रख जाओ, सड़ीगली निकाल कर. अगर कुछ बिक गई तो पैसा दे देंगे.

‘एक तरह से कूड़े की तरह हम अपनी हरी प्याज के 10 गट्ठर फेंक कर चले आए. बदले में आढ़ती ने केवल 1,000 रुपए दिए.’

जिस प्याज को वह आढ़ती सड़ीगली, कूड़ा कह रहा था, उसे उस ने खोल कर छोटेछोटे गट्ठर बना लिए और 10 रुपए प्रति गट्ठर फुटकर मंडी के किसान को बेच दिया. वैसे, कई बार किसान परेशान हो कर ऐसी उपज को फेंक देते हैं या पशुओं को खिला देते हैं.

मंडियों में भी आपस में किसानों की खरीद को ले कर एक समझौता होता है. कोई किसान चाह कर भी अपनी उपज फुटकर मंडी या दुकानदार को नहीं बेच सकता. इसी तरह कोई उपभोक्ता अगर चाहे कि वह फुटकर मंडी या थोक मंडी से अपने रोज की जरूरत के लिए कुछ खरीद ले, तो नहीं खरीद सकता है. शहरों में रेहड़ी लगाने के लिए भी किसान को इजाजत नहीं होती. इस के अलावा वह सस्ती कीमत पर भी उपभोक्ता को सीधे उपज नहीं बेच सकता है.

मोहनलालगंज, लखनऊ की ब्लौक प्रमुख विजय लक्ष्मी कहती हैं, ‘किसानों को उपज का दाम लागत से भी कम मिल रहा है. केंद्र सरकार को नया कृषि कानून बनाने से पहले यह तय करना चाहिए था कि किसानों को उपज की सही कीमत मिले. किसानों के हितों की हिफाजत करने के लिए सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए.’

ये भी पढ़ें- बीजेपी की ओर से जारी विज्ञापन से नीतीश की फोटो

महंगाई पर पड़ता असर

सब्जियों और दूसरे खाद्यान्नों की महंगाई का असर आम जीवन पर भी पड़ता है. तालाबंदी के दौर में भी रसोई की जरूरतों को नजरअंदाज करना मुश्किल काम नहीं था. भंडारण कर के रखी जाने वाली चीजों की ज्यादा खरीदारी की गई, जिस में आटा, चावल, आलू, प्याज, दालें और तेलमसाले  प्रमुख थे.

मुनाफाखोरों ने इन के दामों में न केवल बढ़ोतरी कर दी, बल्कि घटिया माल की सप्लाई भी की. तालाबंदी के समय में फैक्टरियों में माल तैयार नहीं हो रहा था. बाजार में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तमाम लोकल ब्रांड भी माल बना कर बेचने लगे, जो उतना अच्छा भले ही नहीं होता था, पर कीमत में बहुत अंतर नहीं था.

लखनऊ के सप्रू मार्ग पर शर्मा चाट का एक ठेला लगता है. तालाबंदी के पहले वह 30 रुपए प्लेट की दर से आलू की टिक्की बेचता था. तालाबंदी के बाद जब सरकार ने सड़कों पर दुकानें खोलने की इजाजत दे दी, तो उस ने चाट की कीमत में बढ़ोतरी कर दी.

इसे चलाने वाले प्रकाश शर्मा का कहना है कि 50 रुपए प्रति प्लेट टिक्की इसलिए करनी पड़ी, क्योंकि हर चीज के दाम बढ़ गए हैं खासकर आलू के दाम बहुत बढ़े हुए हैं. इस के अलावा हम ने  3 साल के बाद दाम बढ़ाए हैं और करीबकरीब हर जगह इसी कीमत पर चाट बिक रही है. दुकानों में तो 80 रुपए प्रति प्लेट टिक्की बिक रही है.

उपभोक्ता मामलों के जानकार पत्रकार रजनीश राज कहते हैं, ‘तालाबंदी  के बाद घाटे को पूरा करने के लिए कुछ कारोबारियों ने कीमतों में बढ़ोतरी कर दी. इस का असर यह हुआ कि खानेपीने की हर चीज 15 फीसदी से ले कर 30 फीसदी तक महंगी हो गई.

‘दुकानदार महंगाई का बहाना बना कर दाम बढ़ा देते हैं, लेकिन दाम घटने पर कोई माल सस्ता नहीं बिकता है. आलू के महंगे होने से टिक्की के दाम बढ़ गए, पर आलू के सस्ते होने पर टिक्की के दाम घटेंगे नहीं. खानेपीने की चीजों में इस तेजी की वजह लेबर की कमी और फैक्टरियों में कम उत्पादन होना भी है.’

Serial Story : अजनबी मुहाफिज – भाग 3

लेखक: शकीला एस हुसैन

स्टेशन मास्टर का शुक्रिया अदा कर के मैं बाहर आ गया. जिन दिनों की यह बात है उन दिनों स्टेशन के बाहर मुश्किल से 2-3 तांगे खड़े रहते थे. मैं एक तांगे की तरफ बढ़ा. कोचवान बूढ़ा आदमी था. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा, यह फोटो देख कर बताओ. मुझे इन दोनों की तलाश है. ये दोनों औरतें 3-4 दिन पहले स्टेशन से निकल कर तांगें में बैठ कर कहीं गई थीं. क्या तुम बता सकते हो वे किस के तांगे में गई थीं?’’

चाचा ने जवाब दिया, ‘‘14 तारीख को ये दोनों औरतें गुलाम अब्बास के तांगे में बैठ कर छछेरीवाल गई थीं, क्योंकि गुलाम अब्बास का रूट स्टेशन से छछेरीवाल तक ही जाता है क्योंकि वह खुद वहीं रहता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘चाचा, हमें छछेरीवाल ही जाना है और गुलाम अब्बास से मिलना है.’’

मैं अपने 2 सिपाहियों के साथ छछेरीवाल रवाना हो गया. वह हमें सीधे गुलाम अब्बास के घर ले गया. मैं पुलिस की वरदी में था. पहले तो वह घबरा गया. मैंने दोनों फोटो दिखा कर उन औरतों के बारे में पूछा तो वह फौरन ही बोला, ‘‘जी सरकार, इन दोनों औरतों को 14 दिसंबर की दोपहर रेलवे स्टेशन से छछेरीवाल लाया था. इस में से मोटी औरत को मैं जानता हूं. इस का नाम गुलशन है. सब इसे गुलशन आंटी कहते हैं पर वह गोरी खूबसूरत लड़की मेरे लिए नई थी.’’

ये भी पढ़ें- विदाई

उस ने हमें गुलशन के घर का पता बता दिया. हम वहां पहुंचे. घर के बाहर एक गंजा बूढ़ा आदमी फल और सब्जी का ठेला लगाए बैठा था. उस ने जल्दी से हमें सलाम किया. मैं ने उस से गुलशन आंटी के बारे में पूछा. वह बोला, ‘‘गुलशन मेरी बीवी है.’’

मैं उस के साथ घर के अंदर गया. धीरे से उस ने पूछा, ‘‘हुजूर, कुछ गलती हो गई है क्या?’’

‘‘हां, एक केस में उस से पूछताछ करनी है.’’ वह बड़बड़ाया, ‘‘वह जरूर फिर कोई कमीनी हरकत कर के आई होगी.’’

‘‘क्या तुम्हारी बीवी हमेशा कोई लफड़े करती रहती है?’’

‘‘बस सरकार, वह ऐसी ही है मेरी कहां सुनती है.’’

उसी वक्त अंदर के कमरे से एक तेज आवाज आई, ‘‘तुम्हारा दिल दुकान पर नहीं लगता. घर में क्यों चले आते हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘इसे बाहर बुलाओ.’’

उस ने उसे आवाज दी, ‘‘गुलशन बाहर आओ. तुम से मिलने कोई आया है.’’

घर का दरवाजा एक झटके से खोल कर जो औरत बाहर आई, वह गोलमटोल, 45 साल की औरत थी. उस के चेहरे पर चालाकी और कमीनापन झलक रहा था. हमें देखते ही उस ने दरवाजा बंद करना चाहा. मैं ने पांव अड़ा दिया और तेज लहजे में कहा, ‘‘गुलशन, सीधेसीधे हमारे सवालों के जवाब दो. नहीं तो मैं हथकड़ी डाल कर ले जाऊंगा.’’

मेरी धमकी का असर हुआ. वह हमें अंदर ले गई जहां 2 पलंग बिछे थे. हम उन पर बैठ गए.

‘‘गुलशन, 24 दिसंबर को जो लड़की तुम्हारे साथ तुम्हारे घर आई थी, वह कहां है?’’

‘‘कौन सी लड़की सरकार?’’

सिपाही ने फौरन ही फोटो निकाल कर उस के सामने रख दिया.

‘‘अच्छा! आप इस की बात कर रहे हैं. यह तो फरजाना है. मेरी रिश्ते की भांजी.’’ वह मजबूत लहजे में बोली, ‘‘वे लोग लालामूसा में रहते हैं. फरजाना मुझ से मिलने आई थी. मैं उसे लेने रेलवे स्टेशन गई थी.’’

ये भी पढ़ें- कल तुम बिजी आज हम बिजी

मैं समझ गया, वह सरासर झूठ बोल रही है. मैं ने उस के आदमी से पूछा, ‘‘तुम कभी फरजाना से मिलने लालामूसा गए हो?’’

वह हड़बड़ा गया, ‘‘नहीं…हां…जी…नहीं…’’

अब मैं गुलशन की तरफ बढ़ा और डांट कर कहा, ‘‘देखो गुलशन, तुम सच बोल दो उसी में भलाई है. वरना मैं तुम से बहुत बुरी तरह पेश आऊंगा. जिस लड़की को तुम अपनी भांजी बता रही हो, उस से तुम स्टेशन पर पहली बार मिली थी. उस से तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है. अगर होता तो तुम हरगिज उसे कादिर के हवाले नहीं करती. तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि फरीदपुर में कैसी कयामत बरपी है. तुम जिस लड़की को बहलाफुसला कर अपने साथ लाई थीं, 2 रोज बाद उसे तुम ने कादिर के हवाले कर दिया.’’

‘‘मैं किसी कादिर को नहीं जानती.’’

‘‘बकवास बंद करो. तुम बहुत ढीठ और बेशर्म औरत हो. थाने जा कर तुम्हारी जुबान खुलेगी.’’

उसे भी तांगे में बैठा कर हम थाने आ गए. मैं ने एक हवलदार को बुला कर गुलशन को उस के हवाले करते हुए कहा, ‘‘यह आंटी गुलशन हैं. इन्होंने एक लड़की चौधरी रुस्तम के डेरे पर भिजवाई थी, पर अब गूंगी हो गई हैं. तुम्हें रात भर में इसे अच्छा करना है. तुम्हारे पास जुबान खुलवाने के जितने मंत्र हैं, सब आजमा लो.’’

वह गुलशन आंटी को ले कर चला गया. उसी वक्त सादिक पहलवान मुझ से मिलने पहुंचा. ऊंचा पूरा मजबूत काठी का आदमी था. चेहरे से ही शराफत टपकती थी. मैं ने उस से काफी पूछताछ की.

सब से बड़ी बात यह थी कि वारदात के एक दिन पहले ही वह कुश्ती के मैच में शामिल होने दूसरे शहर चला गया था, जिस के कई गवाह थे. चौधरी सिकंदर के मुताबिक वह सच्चा और खरा आदमी था और फरीदपुर की शान था. वह 3 मैच जीत कर आया था. मैं ने उसे जाने दिया. शाम हो चुकी थी. मैं भी अपने क्वार्टर पर चला गया.

अगली सुबह तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा. हवलदार ने खुशखबरी सुनाई कि आंटी गुलशन बोलने लगी है. मैं ने हवलदार से पूछा, ‘‘तुम ने मारपीट तो नहीं की न?’’

‘‘नहीं साहब, सिर्फ पेशाब लाने वाली दवा पिला दी थी और उसे बाथरूम नहीं जाने दिया. मजबूर हो कर उस ने जुबान खोल दी.’’

आंटी गुलशन ने बताया कि वह शहरशहर घूमने वाली औरत है. जब कोई मजबूर, बेबस लावारिस लड़की नजर आती, उस से हमदर्दी जता कर उसे अपने साथ छछेरीवाल ले आती. कुछ दिन खिलापिला कर उसे फरेब में रखती, फिर किसी ग्राहक को बेच देती और अपने पैसे खड़े कर लेती.

ये भी पढ़ें- Short Story : बहू बेटी

कादिर जैसे कई लोगों से उस की जानपहचान थी, जिन्हें वह लड़कियां सप्लाई करती थी. यह लड़की, जिस का नाम जबीन था, उस ने कादिर के हवाले की थी. कादिर पहले भी रुस्तम के लिए गुलशन से कई लड़कियां ले चुका था. जबीन गुलशन को गुजरांवाला रेलवे स्टेशन पर मिली थी. वह पहली नजर में ही पहचान गई कि वह उस का शिकार है.

वह उस के करीब जा कर बैठ गई. 10 मिनट में ही प्यार जता कर उस की असल कहानी मालूम कर ली. जबीन का ताल्लुक वजीराबाद से था. उस का बाप मर चुका था. उस की मां ने दूसरी शादी कर ली थी. सौतेला बाप उस पर बुरी नजर रखता था. कई बार उसे परेशान भी करता था.

Serial Story : अजनबी मुहाफिज – भाग 4

लेखक: शकीला एस हुसैन

जब उस ने मां से शिकायत की तो मां ने उलटा उसे ही मुजरिम ठहराया. तंग आ कर जबीन घर से भाग निकली. जब वह ट्रेन से इस तरफ आ रही थी तो उसे महसूस हुआ कि एक आदमी उस का पीछा कर रहा है. घबरा कर वह अंजान स्टेशन पर उतर गई. वहीं उस की मुलाकात गुलशन से हुई.

गुलशन उसे अपनी मीठी बातों के जाल में फंसा कर अपने घर ले आई. 2 दिन उस की खूब खातिर की और फिर नौकरी दिलाने के बहाने कादिर के पास बेच कर आ गई. उस मासूम को इस छलकपट की खबर ही नहीं लगी.

मैंने गुस्से से कहा, ‘‘तुम दुनिया की सब से कमीनी औरत हो. जिस इज्जत की हिफाजत के लिए जबीन ने अपना घर छोड़ा था, तुम ने झूठी मोहब्बत का फरेब दे कर उस की इज्जत को नीलाम कर दिया. मैं तुम्हें कठोर सजा दिलवाऊंगा.’’

वो मगरमच्छ के आंसू बहाने लगी, जिस का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ.

‘‘तुम ने क्या कह कर उसे कादिर के हाथ बेचा था?’’

‘‘मैं ने कहा था यह मेरा भाई है. इस के 3-4 बच्चे हैं. इसे बच्चे संभालने के लिए एक औरत चाहिए. यह कह कर मैं ने उसे कादिर के हवाले कर दिया था. वह खुशीखुशी उस के साथ चली गई थी.’’

‘‘अब तुम्हारे पास बचाव का कोई रास्ता नहीं है. मैं तुम्हें मासूम लड़कियों की जिंदगी बरबाद करने के जुर्म में लंबे अरसे के लिए अंदर कर दूंगा.’’

दूसरे दिन मैं वजीराबाद रवाना हो गया. वहां मैं ने जबीन के सौतेले बाप और मां से मुलाकात की. उन लोगों को जबीन के बारे में कुछ पता नहीं था, न ही उन्हें उस की कोई फिक्र थी. उन लोगों ने उसे ढूंढने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. पूछताछ कर के मैं वापस गुजरांवाला आ गया.

यहां भी मैं ने जबीन की काफी तलाश करवाई लेकिन कुछ पता नहीं चला. बाद में किसी ने मुझे बताया कि जिस दिन गुलशन ने जबीन को कादिर के हवाले किया था, उसी दिन से छछेरीवाल से जावेद नाम का एक नौजवान गायब है. वह कबड्डी का बहुत अच्छा खिलाड़ी था.

ये भी पढ़ें- Short Story – खरीदारी : अपमान का कड़वा घूंट

यह सुन कर मेरे दिमाग में बिजली सी चमकी. मेरी आंखों के सामने कादिर की गरदन टूटी लाश घूम गई. कादिर की गरदन का मनका जिस माहिर अंदाज में तोड़ा गया था, वह किसी पहलवान या कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी का ही काम हो सकता था.

मैं ने छछेरीवाल में जावेद के जानने वाले लोगों से मिल कर अपने आर्टिस्ट से उस का स्केच बनवाया. उस के सहारे मैं ने जावेद की तलाश शुरू कर दी. 3 महीने गुजर गए.

मामला भी ठंडा पड़ गया. एक दिन अचानक मैं जावेद को ढूंढने में कामयाब हो गया. दरअसल, जावेद और जबीन ने शादी कर ली थी. एक दूरदराज इलाके में दोनों पुरसुकून जिंदगी गुजार रहे थे. जावेद का ताल्लुक छछेरीवाल से था. वह गुलशन के धंधे से अच्छी तरह से वाकिफ था. जब उस की नजर गुलशन के साथ आई जबीन पर पड़ी तो वह दिल हार बैठा. उस ने फैसला कर लिया कि वह इस मासूम लड़की की जिंदगी जरूर बचाएगा.

वह गुलशन की निगरानी करने लगा. जब गुलशन फरीदपुर से जबीन को कादिर के पास ले कर आई, जावेद उस का पीछा कर रहा था. पीछा करतेकरते ही वह रुस्तम के अड्डे पर पहुंच गया. वहीं छिप कर वह रुस्तम वाले बैडरूम में घुस गया और सही मौके का इंतजार करने लगा. रुस्तम को वहां किसी के होने का गुमान भी नहीं था. वह नशे में धुत था.

जब वह जबीन से जबरदस्ती करने लगा तो जावेद ने उसे सोचनेसमझने का मौका दिए बिना उस के सिर के पिछले हिस्से पर वजनी रेंच पाने से करारा वार किया, जिस से उस की मौत हो गई.

यह मंजर देख कर जबीन ने दरवाजे के बाहर दौड़ लगा दी. मारे डर के उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था.

बाहर कादिर मौजूद था. उस ने भी जबीन के पीछे दौड़ लगा दी. जावेद ने भी देर नहीं की. वह उन दोनों के पीछे दौड़ा. रेंच पाना वह रुस्तम के कमरे में पलंग के नीचे फेंक आया था. वे तीनों आगेपीछे दौड़ते हुए नजर के अंदर उतर गए.

जावेद जल्दी ही कादिर तक पहुंच गया और पलक झपकते ही एक झटके से उस ने कादिर की गरदन का मनका तोड़ डाला. पहले तो जबीन यह समझी कि यह वही आदमी है जो ट्रेन में उस का पीछा कर रहा था. पर जावेद ने उसे बताया कि उस ने उसे छछेरीवाल में देखा था और उस पर आशिक हो गया था.

ये भी पढ़ें- Short Story- ईर्ष्या : क्या था उस लिफाफे में

यह सुन कर जबीन की जान में जान आई. जावेद के हाथों 2 कत्ल हो चुके थे. छछेरीवाल जाने का सवाल ही नहीं उठता था. उन दोनों ने मिल कर फैसला किया कि दोनों किसी दूरदराज इलाके में जा कर शादी कर के रहेंगे.

इन तमाम हालात में जबीन का कोई कुसूर नहीं था. वह तो खुद हालात और गमों की मारी हुई थी. गिरफ्तारी के वक्त वह उम्मीद से थी.

जावेद ने जो भी किया, जबीन की इज्जत बचाने के लिए किया था. उस ने 2 शैतानों का सफाया कर दिया था, जो इंसान के रूप में भेडि़ए थे. एक हिसाब से उन दोनों का मर जाना अच्छा था.

मेरी नजर में जावेद का कातिल होना हालात का तकाजा था. मैं ने जावेद के लिए क्या सजा चुनी, यह मैं आप को नहीं बताऊंगा. यह आप की जहानत के लिए एक चैलेंज है, खुद सोचें और फैसला करें.

Serial Story : अजनबी मुहाफिज- भाग 1

लेखक: शकीला एस हुसैन

उन दिनों मैं जिला गुजरांवाला के थाना सदर में तैनात था. मेरा थाना जीटी रोड के मोड़ पर था. सर्दी का मौसम था. जब मैं थाने पहुंचा तो 2 लोग मेरे इंतजार में बैठे मिले. उन्होंने खबर दी कि नहर के किनारे एक लाश बरामद हुई है.

जिन दिनों अपर चिनाब नहर अपने किनारों तक भर कर बह रही होती है, उस वक्त उस की गहराई करीब 20 फीट होती है. मैं फौरन एएसआई नबी बख्श और एक हवलदार को ले कर मौकाएवारदात पर पहुंच गया. मेरी तजुर्बेकार निगाहों ने लाश को देखने के बाद अंदाजा लगा लिया कि मृतक को एक झटके में मौत के घाट उतारा गया है.

कातिल जो भी था, पहलवान या कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, क्योंकि मकतूल को गरदन का मनका तोड़ कर मौत के घाट उतारा गया था. यह टैक्निक किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है. मकतूल की उम्र 30 के आसपास थी. वह मजबूत जिस्म का स्मार्ट आदमी था, शानदार मूंछों वाला. उस के बदन पर गरम लिबास था, स्वेटर भी पहन रखा था.

पूरी तरह से तलाशी लेने के बाद मृतक के कपड़ों में ऐसी कोई चीज नहीं मिल सकी जो काम की होती. उस के जिस्म पर कोई जख्म भी नहीं था. अब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे. मैं ने सभी से लाश के बारे में पूछा, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. एक बूढ़े आदमी ने गौर से देखने के बाद कहा, ‘‘सरकार, मैं इसे पहचनता हूं. मैं ने इसे देखा है. यह फरीदपुर के चौधरी सिकंदर अली के यहां काम करता था.’’

मैं चौधरी सिकंदर को जानता था. उस से 2-3 मुलाकातें हो चुकी थीं. अच्छा आदमी था. कुछ अरसे पहले उसे फालिज का अटैक हुआ था. तब से वह बिस्तर का हो कर रह गया था. मैं ने हवलदार को लाश के पास छोड़ा और खुद घोड़े पर सवार हो कर एएसआई के साथ फरीदपुर रवाना हो गया. मैं ने हवलदार को कह दिया था कि लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेजने का बंदोबस्त कर ले.

फरीदपुर वहां से करीब 8 मील दूर था. हम घोड़ों पर सवार थे. अभी हम ने कुछ ही रास्ता तय किया था कि सामने से 2-3 घुड़सवार आते दिखाई दिए. हम उन्हें देख कर रुक गए. मैं ने उन से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम लोग कहां जा रहे हो?’’

ये भी पढ़ें- Short Story: मन का बोझ

‘‘हम लोग आप के पास ही आ रहे थे. आप को हमारे साथ चलना पड़ेगा. बड़ा हादसा हो गया है.’’ एक नौजवान ने कहा.

‘‘कहां चलना पड़ेगा और क्यों?’’

‘‘फरीदपुर, सरकार. वहां के चौधरी का किसी ने कत्ल कर दिया है. हम यही खबर ले कर आए थे.’’

‘‘तुम चौधरी सिकंदर की बात कर रहे हो?’’

‘‘नहीं जनाब, उन्हें कौन कत्ल करेगा. हम उन के बेटे चौधरी रुस्तम की बात कर रहे हैं.’’ उसी नौजवान ने जिस का नाम राशिद था, जवाब दिया.

‘‘किस ने कत्ल किया है और कब?’’

‘‘कातिल के बारे में तो कुछ पता नहीं सरकार. घटना पिछली रात की है. छोटे चौधरी साहब की लाश उधर डेरे पर पड़ी हुई है.’’

फरीदपुर छोटा सा गांव था. 60-70 घरों की आबादी वाला. मैं ने राशिद से पूछा, ‘‘इस हादसे के बाद से फरीदपुर से कोई गायब है क्या?’’

‘‘हां सरकार. आप को कैसे पता लगा? कल रात से कादिर गायब है. उस की ड्यूटी डेरे पर छोटे चौधरी के साथ होती थी, पर रात को वह ड्यूटी पर पहुंचा ही नहीं.’’

‘‘अब वह पहुंचेगा भी नहीं. वह मारा जा चुका है. तुम लोग मेरे साथ नहर पर चलो और लाश पहचान कर तसदीक कर दो.’’

वे लोग मेरे साथ घटनास्थल पर आए. उन्होंने तसदीक कर दी कि लाश कादिर की थी जोकि छोटे चौधरी का खास आदमी था. मैं ने उन्हें बताया, ‘‘लाश नहर में बहती हुई आई है. किसी ने गरदन का मनका तोड़ कर उसे कत्ल किया है.’’

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर मैं उन लोगों के साथ फरीदपुर रवाना हो गया. चौधरी सिकंदर तो फालिज की वजह से बिस्तर पर पड़े थे. उन का एकलौता बेटा रुस्तम ही कामकाज देखता था. पहले हम डेरे पर पहुंचे. वे तीनों आदमी मेरे साथ  थे.

ये भी पढ़ें- Short Story : सौतन बनी सहेली

डेरा नहर के किनारे खेत के बीचोबीच बना था. इस में फलों के कुछ पेड़ भी लगे थे. यहां नीची छत वाले 3 कमरे थे. सामने बड़ा बरामदा था. डेरे के आसपास भी कुछ लोग खड़े हुए थे. डेरे के एक तरफ कुछ मवेशी बंधे थे.

राशिद मुझे उस कमरे में ले गया, जिस कमरे में लाश थी. यह देख कर मुझे हैरत हुई कि कमरा आलीशान बैडरूम का मंजर पेश कर रहा था. दीवार की एक साइड में बड़ा पलंग बिछा था और उस पर चौधरी की लाश पड़ी थी. मैं ने रुस्तम की लाश की बारीकी से जांच की.

चौधरी की खोपड़ी पर पीछे से किसी भारी चीज से वार किया गया था, जिस से सिर बुरी तरह जख्मी हो गया था. बिस्तर और कपड़े खून में भीगे हुए थे. वार इतना करारा था कि पड़ते ही चौधरी मर गया. उस के बाद मैं ने कमरे का जायजा लिया. मेज पर कच्ची शराब की बोतल और शराब से भरा एक गिलास रखा था. बोतल भी खुली हुई थी. इस का मतलब मकतूल मरने से पहले शराब पी रहा था. यह कमरा शायद अय्याशी के लिए ही बनाया गया था.

ये भी पढ़ें- ट्रस्ट एक प्रयास

पलंग के नजदीक फर्श पर मुझे लाल हरी चूडि़यों के टुकड़े दिखाई दिए. मैं ने ऐहतियात से टुकड़े जमा कर लिए. इस का मतलब था चौधरी के साथ कोई औरत मौजूद थी. चूडि़यों के टुकड़े इस बात की गवाही दे रहे थे कि औरत अपनी मरजी से नहीं आई थी. उसे जबरदस्ती चौधरी की अय्याशी के लिए लाया गया था.

मेरे जहन में एक खयाल आया कि कहीं उस औरत ने ही तो चौधरी को मौत के घाट नहीं उतारा. यह मुमकिन भी था. मैं ने राशिद और ममदू से पूछा, ‘‘रात को चौधरी रुस्तम के साथ डेरे पर कौन था?’’

‘‘हुजूर, यहां तो सिर्फ कादिर ही होता है. पिछली रात भी वहीं था.’’

मैं ने टूटी हुई चूडि़यों की तरफ इशारा करते हुए पूछा, ‘‘यह औरत कौन थी, जिस की जबरदस्ती में चूडि़यां टूटी हैं?’’

‘‘जनाब हमारी बात का यकीन करें. हमें इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम. कादिर जानता है. पर अब तो वह मर चुका है.’’

उन की बात में सच्चाई थी. रुस्तम एक अय्याश आदमी था. वह शराब के नशे में था और किसी औरत के साथ उस ने जबरदस्ती की थी. राशिद ने बताया, ‘‘चौधरी रुस्तम अकसर डेरे पर ही रातें गुजारता था. सुबहसवेरे वह हवेली पहुंच जाता था. पर आज जब वह हवेली नहीं पहुंचा तो चौधरी सिकंदर ने हमें यहां भेजा. यहां चौधरी रुस्तम की लाश मिली. हम ने फौरन आप को खबर की.’’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें