Bigg Boss 14 : राखी सावंत ने कहा, मैं चीख चीख कर कह रही हूं मेरी शादी हो गई है!

बिग बौस 14 (Bigg Boss 14) में एक्स कंटेस्टेंट की एंट्री से शो काफी ज्यादा इंटरेस्टिंग होता जा रहा है. शो का लेटेस्ट एपिसोड काफी धमाकेदार रहा. ड्रामा क्वीन राखी सावंत शो में धमाका करती नजर आ रही है. तो आइए जानते हैं, शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

दरअसल शो में दिखाया गया कि राखी, राहुल महाजन और अभिनव शुक्ला के साथ बात कर रही थी. इसी बातचीत के दौरान उम्होंने अपने पति के बारे में खुलासा किया. शो में राखी यह कहते हुए नजर आई कि उनकी शादी हो चुकी है और उनके पति का कहना है कि जब बच्चे हो जाएंगे, तो वह खुद लोगों के सामने आएंगे.

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बातचीत के दौरान ही राखी सावंत ने आगे कहा कि उन्होंने अपने पति से खुद को दुनिया के सामने आने के लिए रिक्वेस्ट की, क्योंकि कोई भी उनकी शादी के बारे में विश्वास नहीं करता है.

राखी सावंत ने ये भी कहा कि मैं चीख चीख कर कह रही हूं, मेरी शादी हो गई है. अरे नहीं कर रही है पब्लिसिटी के लिए. राखी ने आगे कहा कि उनके पति का कहना है कि सबके सामने शादी के बारे में कहना आसान नहीं है.

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उन्होंने आगे कहा कि जब बच्चे होंगे तो वह खुद आगे आकर इसका खुलासा करेंगे. राखी ने बताया कि उनके पति ने कहा, “यह मेरे लिए आसान नहीं है. मुझे थोड़ा वक्त दो. मैं सबके सामने आऊंगा.”

राखी ने शो में अपने पति के लिए ये कहते हुए दिखाई दी कि वे उनके शब्दों का वैल्यू और सम्मान रखें क्योंकि लोगों को अभी भी लगता है कि उन्होंने पब्लिसिटी हासिल करने के लिए अपनी शादी के बारे में बात की है और यह सब फर्जी है.

क्या बैंक जनता का पैसा लूटती है ?

भारतीय रिजर्व बैंक की इजाजत और उस के कंट्रोल में चलने वाले एक और बैंक ने दरवाजे बंद कर दिए हैं. आईएल एंड एफएस, महाराष्ट्र कोऔपरेटिव बैंक, डीएचएफएल, यैस बैंक के बाद यह लक्ष्मी विलास बैंक एक बड़ा बैंक है जिस का दीवाला पिट गया. चेन्नई के इस बैंक की 563 ब्रांचें हैं और आम लोगों के 20,000 करोड़ रुपए जमा हैं. अब लोग केवल एक बार 25,000 रुपए अपने खातों या डिपौजिट से निकाल सकते हैं.

बैंक कई सालों से नुकसान में चल रहा था क्योंकि बैंक ऐसे कर्ज दे रहा था जिसे लेने वाले चुका नहीं रहे थे. बैंक खातों में तो ऐसे दिए कर्ज के पैसे को अपनी मिलकीयत समझता था और उन पर ब्याज को आमदनी मानता था पर असल में सब जीरो था.

बैंकों का फेल हो जाना कोई नई बात नहीं है और दुनियाभर में ऐसा होता है पर आम आदमी जिस ने इन बैंकों में पैसा जमा कर रखा होता है बुरी तरह मार खाता है. पहले तो उसे लगता है कि उस का पैसा इन बैंकों में सेफ है और इसीलिए कम ब्याज में भी जमा करा देता है.

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जहां ये सरकारी लगने वाले बैंक सिर्फ 7-8 फीसदी से ज्यादा ब्याज नहीं देते थे, निजी साहूकार कर्ज लेने जाओ  तो 30-40 फीसदी तक का ब्याज झटक लेते थे. सारे देश में चिटफंड कंपनियों का जालजंजाल इसीलिए फैला कि लोगों को भरोसा हो गया था कि सरकारी लगने वाले लक्ष्मी विलास बैंक जैसे बैंक लूटते हैं. चिटफंड कंपनियां 20 से  30 फीसदी तक के मुनाफे का वादा करती थीं और शुरू के 1,000-2,000 हजार जमाकर्ताओं को इतना पैसा मिल भी जाता था.

चिटफंड कंपनियों के एजेंट घरघर जाते हैं जबकि बैंक में लाइन में लग कर पैसा जमा कराना पड़ता है और मिन्नत कर के फिक्स्ड डिपौजिट रसीद मिलती है. बैंक केवाईसी का बहाना बना कर लोेगों का पैसा भी दाब लेते हैं. सरकारी कंट्रोल वाले बैंकों में कौन सी आपाधापी नहीं होती, फिर भी सरकार इन में मंदिर की तरह पूजा करवाती रहती है.

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लोगों को आजकल जबरन अपने हाथ में नकदी न रखने का हुक्म दिया जा रहा है. सरकार को आम लोगों के पैसे की फिक्र नहीं है, वह तो चाहती है कि गरीबों का थोड़ाथोड़ा पैसा भी बड़ेबड़े बैंकों में आ कर भारतीय रिजर्व बैंक में आ जाए जहां से सरकार जब चाहे निकाल सके. जो बैंक फेल हो रहे हैं उन में कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें कम ब्याज पर भारतीय रिजर्व बैंक को पैसा जमा कराना पड़ा, जो केंद्र की मोदी सरकार हड़प गई. इन्हीं से भी बैंकों को नुकसान हुआ.

मोटी बात यह है कि हमारे देश में भी बैंक जनता की सेवा के लिए नहीं, जनता का पैसा लूटने के लिए रास्ता बन गए हैं. सरकार का वरदहस्त है इसलिए लोगों को इन के पास जाना ही पड़ता है. लक्ष्मी विलास बैंक तो लक्ष्मी लूट बैंक बन गया. अब पूजा करने का क्या फायदा.

स्टेशन की वह रात : भाग 2

शायद 12-15 दिन हो गए हैं. पहली ट्रेन छोड़ने के बाद मैं भटकती रही और फिर देर शाम सड़क से गुजरते ट्रक वालों ने मुझे आगे छोड़ने की पेशकश की. ‘‘कोई रास्ता न देख वह ट्रक में चढ़ गई. फिर चलते ट्रक में मेरे साथ वह सब हुआ, बारबार हुआ, जिस का टीवी न्यूज वाले ढिंढोरा पीटते रहते हैं. जब एक बार ट्रक वालों का मन भर जाता तो मुझे सड़क किनारे फेंक देते. कुछ देर बाद दूसरे उठा लेते. ‘‘मुझे खुद भी याद नहीं कि अब तक कितनों ने मेरे साथ हैवानियत की है. अब मुझे सड़क से डर लगता है. रेलवे स्टेशन पर भीड़ रहती है, कोई मुझे उठा कर नहीं ले जा सकता है, इसलिए अब मैं स्टेशन पर हूं. ‘‘रास्ते में किसी औरत ने बताया था कि मैं कुरुक्षेत्र जाऊं, वहां धार्मिक मेले में बड़े दानी लोग आए हुए हैं. मेरा भला होगा. किसी से पूछ कर बिना टिकट मैं कुरुक्षेत्र से गुजरने वाली ट्रेन में चढ़ गई, स्टेशन चूक गया सो कुरुक्षेत्र के बजाय अंबाला पहुंच गई.

हालत खराब होने की वजह से तब से मैं इसी बड़े स्टेशन पर पड़ी हूं.’’ रश्मि के चुप होने पर हैरानी से सबकुछ सुन रहे तेजा ने दिमाग को झकझोरा. सख्त दिखने वाले तेजा ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पटना जाने वाली ट्रेन का टिकट खरीद कर दूंगा, साथ में खाना खाने लायक पैसे भी दूंगा. तुम अपने घर लौट जाओ.’’ लेकिन रश्मि तैयार नहीं हुई. उस ने कहा, ‘‘अब घर और समाज में कोई मुझे नहीं अपनाएगा.’’ तेजा अब रश्मि पर हक से बोलने लगा, ‘‘बेशक, लोग तुम पर ताने मारें, पर तुम अपने बच्चों के लिए घर लौट जाओ. उन मासूमों का इस दुनिया में कोई पराया ध्यान नहीं रखेगा और तुम्हारा पति तो पहले ही नशेड़ी है.’’ रश्मि ने कहा, ‘‘मैं ऐसी गलती कर चुकी हूं, जहां से कभी वापसी नहीं हो सकती है.’’ तेजा ने रश्मि से कहा, ‘‘तुम पहले कुछ खा लो, फिर डाक्टर से दवा ले लो, ताकि तुम्हारे शरीर में कुछ जान आ सके.’’ तेजा की बात सुन कर अब तक मन की बात बताने वाली रश्मि का चेहरा और अंदाज बदल गया. उस ने धीमी आवाज में अपना फैसला साफ कर देने वाली बात कही,

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‘‘मैं रेलवे स्टेशन के बाहर नहीं जाऊंगी, चाहे तुम पैसे दो या मत दो.’’ यह बात कहने का अंदाज देख कर तेजा समझ गया कि इस औरत का भरोसा सब से उठ चुका है, जो दरिंदगी इस के साथ की गई है, उस ने दिल में डर बैठा दिया है, इसलिए वह अब उस पर भी भरोसा नहीं करेगी. तेजा ने कहा, ‘‘अगर तुम कुछ दिन और स्टेशन पर पड़ी रही तो शायद मर जाओगी.’’ लेकिन रश्मि पर इस का भी खास असर नहीं हुआ. उस ने मुरदा से हो चुके चेहरे को और ढीला छोड़ते हुए कहा, ‘‘मैं बेशक मर जाऊं, लेकिन स्टेशन से बाहर नहीं जाऊंगी. न ही वापस अपने घर जाऊंगी.’’ तेजा ने मन में सोचा कि वह बुरी तरह फंस गया है, इस हालत में इसे छोड़ कर गया तो यह फिर गलत लोगों के हाथ पड़ जाएगी या फिर कुछ दिनों बाद मरने की हालत में पहुंच जाएगी. लेकिन साथ ही उसे यह एहसास भी हुआ कि वह खुद कौन सा चीफ मिनिस्टर है, जो अचानक से इस औरत की जिंदगी को वाकई जिंदा कर देगा? अंदर एक कोने में यह डर भी था कि कहीं उसे आधी रात को बेवकूफ तो नहीं बनाया जा रहा है? बैठेबैठे एक दौर बीत चुका था. तेजा की ट्रेन का वक्त नजदीक आ रहा था. खड़ूस तेजा का दिमाग कन्फ्यूज हो कर तेजी से घूम रहा था. मन में यह भी आ रहा था कि अगर औरत सच बोल रही है तो बरबादी की जिम्मेदार वह खुद ही है. इस तरह घर छोड़ कर भागेगी तो ऐसा ही अंजाम होगा. लेकिन उसे वह वक्त भी याद आया जब झगड़ कर तेजा खुद घर छोड़ कर दिल्ली के एक आश्रम में चला गया था. घर से संन्यासी बनने की ठान कर निकला था, लेकिन 4-5 दिन बाद सुबह 3 बजे चुपचाप आश्रम छोड़ कर वापस घर का रास्ता पकड़ लिया. घर लौटने पर मातापिता और पड़ोसियों ने उस की गरदन नहीं पकड़ी, बल्कि राहत की सांस ली थी. तेजा के मन में आया कि क्या दुनिया है कि घर से भागा एक लड़का वापस आ जाए तो सब को चैन, लेकिन एक औरत के लिए वही सब करना पाप… तेजा की नजर बारबार घड़ी पर जा रही थी.

लग रहा था, वक्त ने रफ्तार बढ़ा ली है. उस की टे्रन के आने की घोषणा हो चुकी थी. लेकिन रश्मि का सच और उस की जिद जान कर तेजा उस के लिए कुछ भी कर पाने की हालत में नहीं था. बिना सोचे तेजा के मुंह से अचानक शब्द निकले, ‘‘मुझे अब जाना होगा रश्मि. ट्रेन आ रही है.’’ तेजा ने जेब से पर्स निकाला. उसे ध्यान नहीं कितने नोट निकले, लेकिन रश्मि को थमा दिए और बैंच से खड़ा हो गया. ‘‘अपना ध्यान रखना,’’ बोल कर तेजा आगे बढ़ने लगा. तेजा को जाते देख रश्मि के चेहरे पर फिर से कुछ बड़ा खो देने के भाव थे. कई दिन से पत्थर बनी उस की आंखें नम हो गईं. पुल पर पलट कर तेजा ने अंधेरे कोने में नजरें दौड़ाईं. ऐसा लग रहा था मानो बैंच के साथ रश्मि की मूर्ति हमेशा से वहीं चिपकी हुई है. तेजा के पैर आगे बढ़ते जा रहे थे. रेलवे स्टेशन की तमाम चिल्लपौं से दूर उस का दिमाग खोया हुआ था, उसे भी नहीं मालूम कहां. एक सन्नाटा पसरा हुआ था. पीछे से धक्का मारते हुए एक आदमी ने कहा, ‘‘नहीं चढ़ना है तो रास्ते से हट जाओ.’’ तेजा जागा और देखा कि उस की ट्रेन सामने है, वह अनजाने में चलते हुए ठीक अपनी बोगी के सामने पहुंच गया है, लेकिन ऊपर चढ़ने के बजाय गेट के बाहर पैर जम गए हैं, इसलिए पीछे से बाकी मुसाफिर उस पर गुस्से में चिल्ला रहे हैं. तेजा हड़बड़ाहट में तेजी से अंदर चढ़ गया. चंद पलों में सीटी बजी और बिजली से चलने वाली ट्रेन के पहियों ने फर्राटा भर दिया. इस से पहले कि ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ पाती, तेजा ने बैग के साथ गेट से छलांग लगा दी. कालेज जाते वक्त रोजाना सरकारी बस के सफर का तजरबा था, इसलिए इंजन की दिशा में दौड़ता रहा वरना स्टेशन पर खड़े लोग तेजा के गिरने के डर में आंखें तकरीबन बंद कर चुके थे.

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स्टेशन की वह रात : भाग 3

कम से कम 30-40 मीटर दौड़ते रहने पर तेजा के लड़खड़ाते पैर संतुलन में आ पाए. तेज सांसें छोड़ता हुआ तेजा रुका और चमकती आंखों के साथ वापस मुड़ा. तेजा को अंदाजा था कि पठानकोट में जाट रैजीमैंट के कैंप पहुंच कर मामा से मदद मिलने की गुंजाइश कम है. मामी और उन के घर वालों का असर फौजी मामा को लाचार बना चुका था, इसलिए वहां जाने में वक्त बरबाद कर नाउम्मीद होने से बेहतर है कि रश्मि और उस के बच्चों को मिलाया जाए. मांबच्चों का मिलन हो जाएगा तो बाकी सब भाड़ में जाएं. तेजा ने फोन निकाल कर दिल्ली के न्यूज चैनल में काम करने वाले दोस्त गौरव को मिला दिया. मालूम था, रात के 2 बजे हैं, गौरव के फोन रिसीव करने के चांस कम हैं, लेकिन फोन को स्पीकर पर लगा कर वह टिकट काउंटर की तरफ बढ़ चला. कोई जवाब नहीं मिला, लेकिन तेजा को कोई परवाह नहीं. रीडायल बटन दबा दिया. घंटी बज रही थी. देर रात होने की वजह से काउंटर खाली था. अंदर टिकट बाबू और एक मैडमजी बातों में मस्त थे. तेजा ने कहा, ‘‘पटना के लिए टे्रन कब मिलेगी?’’ बातचीत के मधुर सफर में खोए टिकट बाबू को यह सवाल घोर बेइज्जती लगा. पहले नजरों से नफरत के बाण चलाए, फिर जबान खोली, ‘‘एक घंटे बाद सुपरफास्ट ट्रेन है. जम्मू से आ रही है, सीधी हावड़ा जाएगी. बीच में दिल्लीपटना जैसे बड़े स्टेशनों पर रुकती है. सीट भी दिलवा दूंगा. अंदर मस्तमस्त बिस्तर मिलेगा, साथ में गरमागरम खाना. लेकिन टिकट खरीदने के लिए औकात चाहिए, अब बोल खरीदेगा टिकट?

‘‘वैसे, सुबह 8 बजे दिल्ली तक पैसेंजर ट्रेन है. वहां से पटना के लिए मिल जाएगी, चल भाग अभी. ये बिहार वाले शांति से चार बात भी नहीं करने देते हैं. हां, तो सपना… मैं क्या कह रहा था?’’ ‘अरे भैया, रात को 2 बजे भी सोने नहीं देते हो, 5-7 दिन की छुट्टी मिलती हैं. समझा करो यार,’ नींद में ऊंघ रहे गौरव ने फोन पर जवाब दिया. ‘‘गौरव, तुम फोन पर बने रहो,’’ तेजा ने स्पीकर बंद कर मुसकराते हुए टिकट बाबू से कहा, ‘‘2 टिकट दे दीजिए,’’ और उस ने डैबिट कार्ड आगे बढ़ा दिया. टिकट बाबू ने तेजा की सूरत को घूरते हुए कार्ड ले लिया. बुनियादी जानकारी पूछी और बटन दबा दिया. 2 टिकट निकाल कर तेजा को थमा दी. टिकट और डैबिट कार्ड ले कर तेजा तेज कदमों से रश्मि की तरफ चल पड़ा. तेजा ने चलते हुए एक सांस में रश्मि की पूरी कहानी फोन पर गौरव को बता दी. गौरव पटना का ही रहने वाला था. दोनों जोधपुर के मिलिटरी स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे, क्योंकि दोनों के पिता फौज में वहीं तैनात थे. हालांकि गौरव तेजा से कई क्लास सीनियर था, लेकिन दोनों की खूब जमती थी.

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फोन पर गौरव ने कहा, ‘तेजा इतने दिनों बाद फोन किया वह भी रात के 2 बजे. और यह किस के लिए पागल हुआ जा रहा है. अरे भाई, ऐसे कितने ही लोग रोज बरबाद होते हैं. कितनों को घर पहुंचाएगा तू.’ तेजा ने मजबूत आवाज में कहा, ‘‘गौरव भाई, मैं उसे ले कर पटना आ रहा हूं. समझो, अब मसला पर्सनल है. कुछ देर में तुम्हें उस के घर का अतापता सब मैसेज कर रहा हूं. मुझे इस औरत को उस के बच्चों से मिलाना है. इतना ही नहीं, उस का घर भी बसना चाहिए. तुम अपने विधायक भाई को बोलो या थानेदार को. बस, यह होना चाहिए.’’ गौरव समझ गया कि तेजा के दिमाग में धुन चढ़ गई है. अब यह कुछ नहीं मानेगा या समझेगा. उस ने तेजा को कहा, ‘मैं कल ही दिल्ली से छुट्टी ले कर पटना आया था. तू मुझे उस औरत की जानकारी मैसेज कर. मैं लल्लन भैया से बात करता हूं. अब तू ने कहा है तो निबटाते हैं मसला यार.’ लल्लन भैया 2 दफा विधायक रह चुके थे. गौरव उन की रिश्तेदारी में था. रश्मि अंधेरे की तरफ मुंह किए उसी बैंच पर पत्थर बनी बैठी थी. तेजा ने पहुंच कर कहा, ‘‘तुम्हें स्टेशन से बाहर नहीं जाना है. ट्रेन में मेरे साथ सफर करना है. मैं तुम्हें ले कर पटना जाऊंगा. अगर तुम्हारे बच्चों से मिला कर तुम्हारा संसार नहीं बसा सका, तो जो तुम्हें करना है उस के बाद भी कर सकती हो. चलो उठो, प्लेटफार्म बदलना है.’’ तेजा की इस अंदाज में वापसी देख कर रश्मि सकपका गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है. तेजा की बातें सुन कर वह कल्पना करने की कोशिश कर रही थी कि क्या उस की जिंदगी फिर से खिल सकती है? ‘‘मेरा पति और लोग मुझे जीने नहीं देंगे बाबू,’’ रश्मि ने तेजा से कहा. ‘‘वह सब मुझ पर छोड़ दो,’’ तेजा ने जवाब दिया. जब ट्रेन आई और दोनों उस में चढ़े तो अजीब नजारा था. अंदर के मुसाफिर रश्मि को घूर कर देख रहे थे और रश्मि आलीशान ट्रेन के अंदर हर चीज को घूर रही थी. तेजा उस का हाथ पकड़ कर सीट तक ले गया. प्लेटफार्म पर खरीदा गया खानेपीने का सामान उसे थमा दिया और कहा, ‘‘अब कुछ खा लो.’’ थोड़ी देर में ट्रेन ने सीटी बजा दी और दौड़ चली. पूरे सफर में तेजा और गौरव की फोन पर बातचीत चलती रही. रश्मि इस दौरान लेटेलेटे कभी अचेत सी हो कर सो जाती, तो कभी शीशे की खिड़की के पार नजरें गड़ाए देखती रहती. पटना स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो रश्मि का भाई, मां उस के 2 छोटेछोटे बच्चों के साथ खड़े थे.

उन के साथ गौरव और लल्लन भैया के 2 आदमी भी थे. ट्रेन से उतर कर रश्मि को समझ नहीं आ रहा था, वह बच्ची बन कर अपनी मां से लिपट कर रोए या रोते हुए ‘मम्मीमम्मी’ बोल कर उस की तरफ आ रहे बच्चों को छाती से चिपका ले. तेजा के सामने वक्त ठहर गया था. उस के मन में सुकून और प्यार की बयार बह रही थी. गौरव तेजा को देखे जा रहा था. लल्लन भैया के दोनों लोग पूरे नजारे पर नजरें गड़ाए हुए थे. बूढ़ी मां, रश्मि, दोनों बच्चे एकदूसरे में खो गए. दूर देहात से आए रश्मि के बड़े भाई को भी खुद पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. जब रश्मि ने पति के बरताव और घर के हालात के बारे में भाई को बताया था तब उस ने जरूरी कदम नहीं उठाया. उसी का नतीजा छोटी बहन और 2 छोटेछोटे मासूम बच्चों को भुगतना पड़ा. लेकिन अब बड़े भाई ने मन मजबूत कर लिया था. गौरव ने तेजा को बताया कि लल्लन भैया ने रश्मि के आदमी को उठवा लिया है. अब वह नशा मुक्ति केंद्र में बंद है. नशे की हालत में उस का बरताव देख लल्लन भैया भी गरम हो गए थे. 2 थप्पड़ जड़ दिए उसे और बोले कि ऐसे आदमी के पास कोई कैसे रह सकता है? लल्लन भैया ने अपने चमचों से कह दिया था कि रश्मि के ससुराल और मायके वालों से पूरा सच पता करें. सच यही निकला कि रश्मि गलत औरत नहीं थी, लेकिन पति बिगड़ैल निकला. कामचोर, नशेड़ी और दूसरों की सीख मानने वाला. उस हालत में रश्मि को 2 ही रास्ते सूझे, एक तो गले में फंदा लगा ले या फिर घर से भाग जाए.

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लेकिन अब बच्चों के चेहरे देख कर उस के अंदर की ताकत जाग गई थी. उस ने मन ही मन फैसला किया, अब बच्चों के लिए जिएगी. आदमी सही रास्ते पर आया तो ठीक है, वरना बच्चों को खुद पालेगी. बड़े भैया ने बीच में आ कर रश्मि से कहा कि फिलहाल वह मायके में चले. वह और मां उन का ध्यान रखेंगे. गौरव ने कहा, ‘‘रश्मि की सेहत ठीक होने पर उसे लल्लन भैया के दोस्त के स्कूल में नौकरी लगवा देंगे. वह वहां अपने बच्चों को भी पढ़ा सकती है. उस के बिगड़ैल पति को सुधारने की जिम्मेदारी अब लल्लन भैया ने ले ली है. जब वह इनसान बन जाएगा, तब उसे सब बता दिया जाएगा.’’ स्टेशन के बाहर रश्मि का सामान एक जीप में लदा था. यह जीप लल्लन भैया की थी. रश्मि के भाई ने हाथ जोड़ कर तेजा को शुक्रिया कहा. बच्चों के साथ रश्मि और उस के भाई और मां जीप में बैठ गए. दोनों लोग भी गाड़ी में लद लिए. चमचों को और्डर था कि रश्मि को उस के गांव तक सहीसलामत छोड़ कर आएं. जीप तेज धुआं छोड़ते हुए आगे बढ़ चली. गौरव ने तेजा को झकझोरते हुए कहा, ‘‘चलो भैया, अब तो हम मिल कर पटना दर्शन करते हैं.’’

पति बना हैवान

बलात्कारी वर्दी का “दंश”

हमारे आसपास समाज में ऐसी अनेक घटनाएं घटित होते जाती है. दरअसल, यह कुछ ऐसा ही है जैसे बाड़ ही खेत को खा जाए. आज हम इस रिपोर्ट में इन्हीं तथ्यों पर विचार करते हुए आपको बताएंगे की किस तरह वर्दी,पावर, अपने पद के गुमान में आम लोगों और विशेषकर अबला कही जाने वाली नारी पर अपने अत्याचार के रंग दिखाती है.

प्रथम घटना-

न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर के एक पुलिस महा निरीक्षक जैसे बड़े पद पर बैठे शख्स पर एक महिला ने यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए. मामला सुर्खियों में रहा आज भी महिला आयोग में मामला लंबित है.

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दूसरी घटना-

एक पुलिस अधीक्षक आईपीएस ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कुछ युवतियों से संबंध बना लिए. मामला जब धर्मपत्नी तक पहुंचा तो उसने जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के बस्तर के कांकेर में एक पुलिस अधिकारी ने एक आदिवासी युवती को बहला-फुसलाकर शादी करूंगा कह अपने जाल में फंसाया. युवती के माता-पिता ने उच्च अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाई. अंततः पुलिस अधिकारी हुआ निलंबित.

यह कुछ घटनाएं सिर्फ बानगी मात्र है, जो बताती है कि किस तरह “खाकी वर्दी” पहन कर कुछ लोग पद का दुरुपयोग कर रहे है. और जब बात बढ़ती है तो खाकी वर्दी पर भी गाज गिर पड़ती है. और आगे चलकर यह लोग मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहते वहीं पद और प्रतिष्ठा भी खो देते हैं.

आरक्षकों का कारनामा

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दो पुलिसकर्मियों ने नाबालिग एक किशोरी से डरा धमका कर दुष्कर्म किया . दोनों पुलिसकर्मी डायल 112 में कांस्टेबल हैं. अपने पद का दुरुपयोग करते हुए किशोरी को दोनों आरोपी डरा धमकाकर बुलाते और बलात्कार करते रहे. किशोरी ने अंततः परिजनों को बताया और परिजनों के संरक्षण में मामला पुलिस के उच्च अधिकारियों तक पहुंचा. शिकायत के बाद मामला जांच में सही पाया गया इसके पश्चात बिलासपुर के सरकंडा थाना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो माह के लंबे समय के बाद दोनों कांस्टेबल को गिरफ्तार कर कार्रवाई की. पुलिस के उच्च अधिकारी बताते हैं कि जिले के
सीपत क्षेत्र निवासी 14 साल की किशोरी को कुछ माह पहले डायल 112 में तैनात कांस्टेबल देवानंद केंवट और वीरेंद्र राजपूत ने एक संदिग्ध युवक के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा था.

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इस पर दोनों पुलिसकर्मियों ने किशोरी का मोबाइल नंबर लिया और अपराधिक मंशा से छोड़ दिया . आरोप है कि इसके बाद ही किशोरी को दोनों सिपाही कौल करने लगे. वह डरा धमकाकर उसे बुलाते और दुष्कर्म करते रहे.परेशान होकर किशोरी ने अक्टूबर 2020 में सरकंडा थाने में रपट दर्ज करा दी. आरोपी कांस्टेबल इसी थाने के पदस्थ बताए जा रहे थे इस मामले की जांच में पुलिस को लंबा समय लग गया. जांच सही मिलने पर दिसंबर माह में पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. यहां यह भी कड़वा सच है कि पुलिस दोनों कांस्टेबल को बचाने के प्रयास में जुटी रही. इसके लिए समझौते का भी दबाव बनाया गया. मगर जब मामला नहीं बना तो पुलिस ने औपचारिकता पूरी की.

इस मामले में यह तथ्य भी सामने आया है कि एक आटो चालक मध्यस्थ था और मौका मिलते ही उसने भी किशोरी के साथ बलात्कार किया था और पकड़ा गया था. बहतराई निवासी पंचराम साहू उर्फ सोनू किशोरी को अपनी ऑटो में पुलिसकर्मियों के पास छोड़ने जाता और लाता था. इस दौरान उसने भी मौका पाकर किशोरी से दुष्कर्म किया था.

मेरी कालेज टीचर मुझे देख कर मुस्कुराती है और खाली समय में साथ चाय पीने की बात कहती है, मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं एक गरीब घर का होनहार लड़का हूं और फिलहाल बीए फाइनल के इम्तिहान की तैयारी कर रहा हूं. अभी हाल ही में मेरा ध्यान अपनी एक कालेज टीचर को देख कर भटकने लगा है. वह भी मुझे देख कर मुस्कुराती है और खाली समय में साथ चाय पीने की बात कहती है.

कालेज के दूसरे साथी मुझे उस से दूर रहने की सलाह देते हैं कि वह औरत किरदार की अच्छी नहीं है. लेकिन मैं अपना ध्यान उस से हटा नहीं पा रहा हूं. वैसे, अपनी टीचर के साथ चाय पीने में बुराई ही क्या है? सलाह दें.

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जवाब-

टीचर के साथ चाय पीने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन इस के बाद जो होने के ख्वाब आप देख रहे हैं, वे यही हैं कि फिर वह अकेले में आप को घर बुलाएगी, अपनी सेक्सी अदाओं से आप को लुभाएगी, फिर आप उसे अपनी बांहों में समेट लेंगे, उस के बाद गरमागरम सांसों का एक तूफान आएगा और फिर…

कई बार एक अच्छे जने का साथ जिंदगी सुधार देता है. अगर आप को लगे कि आप खिलौना नहीं बनेंगे, तो थोड़ा जोखिम लेने में हर्ज नहीं.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

स्टेशन की वह रात

पति बना हैवान – भाग 3

सौजन्य-मनोहर कहानियां

शुभम को शिवांगी का यह रवैया पसंद नहीं आया. जून 2019 में शशांक और शुभम ने फैसला किया कि शिवांगी की हत्या कर दी जाए. लेकिन हत्या घर में करने से घर वालों पर हत्या का शक आएगा. इसलिए हत्या ऐसे की जाए कि हत्या न लग कर हादसा लगे. कई बार प्रयास किए लेकिन रास्ता नहीं बना.

इसी बीच शुभम शिवांगी और बेटे युवराज को ले कर नैनीताल के थाना भवाली अंतर्गत गांव नगारी में अपने पिता के मकान में जा कर रहने लगा. वहां वह एक होटल लीज पर ले कर चलाना चाहता था. होटल को लीज पर लेने को ले कर बात चल रही थी कि लौकडाउन लग गया. इस वजह से उसे वापस अपने घर लौटना पड़ा.

शिवांगी की हत्या की बनी योजना

लौकडाउन के दौरान शशांक और शुभम ने आराम से शिवांगी की हत्या को हादसा कैसे बनाना है, इस पर पूरी योजना बनाई. उन की इस योजना में शुभम का जिगरी दोस्त प्रशांत राजपूत भी शामिल था.

प्रशांत गाजियाबाद के साहिबाबाद थाना क्षेत्र के पसौड़ा का रहने वाला था. शुभम और प्रशांत रोज बैठ कर साथ शराब पीते थे. पीने के बाद लांग ड्राइव पर जाते थे. वे दोस्ती में एकदूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे.

योजनानुसार शुभम ने शिवांगी से कहा कि वह कुछ दिन अपने मातापिता से मिल आए. उस का तो मन हो ही रहा होगा, उस के मातापिता को भी उसे देखने का मन होगा. शिवांगी खुश हो गई. वैसे भी वह एक बार फिर से गर्भवती हो गई थी.

लौकडाउन खुल चुका था. लौकडाउन की सारी बंदिशें हटीं तो शुभम उसे कार में बैठा कर मायके जा कर छोड़ने को तैयार हो गया. शिवांगी से उस ने पूरी ज्वैलरी पहनने को कहा कि घर जा रही हो तो घर के आसपास के लोग देखेंगे तो बिना ज्वैलरी के अच्छा नहीं लगेगा. शिवांगी ने पूरी ज्वैलरी पहन ली.

शुभम उसे ले कर बदायूं स्थित शिवांगी के घर पहुंच गया. वहां उस ने शिवांगी के घर वालों से काफी घुलमिल कर बातें की. उसे वहां छोड़ कर शुभम वापस लौट आया. वापस आ कर उस ने फिर से पूरी योजना को सही से अंजाम देने के लिए शशांक और प्रशांत से बात की.

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16 अक्तूबर, 2020 को कार से शुभम शिवांगी और बेटे युवराज को लेने बदायूं पहुंच गया. वापस लाते समय भी शुभम ने शिवांगी पर पूरी ज्वैलरी पहनने का दबाव डाला. शिवांगी ने पूरी ज्वैलरी पहन ली. शिवांगी को बिलकुल भी आभास नहीं था कि जिस से उस ने प्यार किया और शादी की. इतना विश्वास किया, वह उस की जान लेने तक को तैयार हो जाएगा.

शाम 6 बजे कार से शुभम पत्नीबेटे को ले कर निकला. बरेली के बहेड़ी कस्बे में पहुंच कर उस ने कार रोकी. वहां एक दुकान से उस ने जूस खरीदा और उस में चालाकी से नशीली गोलियां मिला दीं. वह जूस उस ने शिवांगी को दिया तो उस ने पी लिया.

गोलियों का असर धीरेधीरे शिवांगी पर होने लगा. बहेड़ी कस्बे से निकल कर कुछ दूर नैनीताल रोड पर एक ढाबे के पास उस ने कार रोकी. उस ने युवराज को गोद में लिया और शिवांगी से उसे चौकलेट दिलाने की बात कह कर चल दिया. कार उस ने स्टार्ट छोड़ दी थी. उस समय तक काफी अंधेरा हो गया था.

अगले ही पल शशांक प्रशांत के साथ बाइक से वहां पहुंचा. शशांक कार की ड्राइविंग सीट पर जा कर बैठ गया और कार को गति दे दी. प्रशांत बाइक से उस के पीछे चलने लगा.

गांव आमडंडा के पास सुनसान सड़क पर शशांक ने कार रोकी. प्रशांत भी वहां पहुंच गया. दोनों शिवांगी के शरीर से ज्वैलरी उतारने लगे. साथ ही साथ वे शिवांगी के साथ मारपीट भी करने लगे. शिवांगी उस समय होश में आ गई थी. वह अपने जेठ शशांक से कहने लगी, ‘‘आप को जो लेना है ले लो, लेकिन मुझे मारो मत.’’

योजना को दिया अंजाम

ज्वैलरी उतारने के बाद उन्होंने कार को लौक कर दिया. इस के बाद प्रशांत बाइक की डिक्की में रखी पैट्रोल से भरी केन निकाल लाया और कार के ऊपर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. कार धूधू कर जलने लगी. शिवांगी कार के अंदर बंद फड़फड़ा कर चिल्लाने लगी लेकिन कार लौक होने से उस की आवाज बाहर नहीं आ रही थी. शिवांगी ने कार से निकलने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुई.

कुछ गांव वालों ने दूर से कार को जलते देखा तो उस ओर दौड़ पड़े. गांव वालों को आता देख कर शशांक और प्रशांत बाइक पर बैठ कर वहां से भाग गए.

गांव वालों ने किसी तरह से शिवांगी को कार से निकाल कर बचाया. कार बाहर से जल रही थी, लेकिन आग अंदर तक नहीं पहुंची थी इसलिए शिवांगी जली नहीं थी, बस झुलस गई थी. गले पर कुछ निशान बन गए थे. बदहवास हालत में वह कार से थोड़ी दूर सड़क पर बैठ गई.

दूसरी ओर योजनानुसार कार जाने के कुछ समय बाद शुभम चिल्लाने लगा. चिल्ला कर वह अपनी पत्नी के अपहरण की बात लोगों से कहने लगा. शुभम ने 112 नंबर पर पुलिस को पत्नी के अपहरण की सूचना भी दे दी.

वायरलैस पर प्रसारित संदेश से बहेड़ी थाना पुलिस को घटना की सूचना मिली. सूचना पा कर बहेड़ी थाने के इंसपेक्टर पंकज पंत पुलिस टीम के साथ तुरंत ढाबे पर पहुंचे. वहां खड़े शुभम लोहित ने उन्हें पत्नी शिवांगी को अपहर्त्ताओं द्वारा कार से नैनीताल रोड पर ले जाने की बात बताई.

इंसपेक्टर पंत अपनी टीम के साथ नैनीताल रोड पर गए तो आमडंडा के पास उन को एक कार जलते हुए मिली. वहां गांव के काफी लोग मौजूद थे. पुलिस को देख कर गांव के लोगों ने पूरी बात बताई और शिवांगी से मिलवाया. शिवांगी ने जब घटना बताई तो अपनों द्वारा रची गई साजिश का खुलासा हुआ.

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इस के बाद शिवांगी को इंसपेक्टर पंत ने उपचार हेतु भेजा. फिर शुभम को हिरासत में ले कर थाने आ गए. कुछ सख्ती करने पर शुभम ने पूरी घटना बयान कर दी. जिस के बाद इंसपेक्टर पंकज पंत ने शुभम लोहित, शशांक लोहित और प्रशांत राजपूत के खिलाफ भादंवि की धारा 364/328/307/120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. बेटे युवराज को भी शुभम से ले कर शिवांगी को सौंप दिया गया.

कागजी खानापूर्ति पूरी करने के बाद शुभम को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

शुभम ने सोचा था कि इस तरह शिवांगी को मारने से उस पर या उस के घरवालों पर आरोप नहीं लगेगा. ज्वैलरी भी उस के पास आ जाएगी और कार के इंश्योरेंस की रकम भी उसे मिल जाएगी. शिवांगी से भी उसे हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा. लेकिन बुरा करने वालों का किस्मत कभी साथ नहीं देती. शुभम के साथ भी ऐसा ही हुआ.

कथा लिखे जाने तक शशांक और प्रशांत फरार थे. पुलिस उन की सरगर्मी से तलाश कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों और शिवांगी से पूछताछ पर आधारित

स्टेशन की वह रात : भाग 1

इसलिए उस ने पुल से चलते हुए आखिरी प्लेटफार्म की तरफ कदम बढ़ाए. सीढि़यों से उतर कर आखिरी प्लेटफार्म की भी वह बैंच पकड़ी, जिस के बाद नशेडि़यों, चोरउच्चकों का इलाका शुरू हो रहा था. थोड़ाबहुत जोखिम लेना तेजा के लिए आम बात थी. कुछ दूरी पर ही मैलीकुचैली चादरों में भिखारी सो रहे थे.

चाय की दुकान पर एकाध खरीदार पहुंच रहे थे. रेलवे जंक्शन के कोने में मौजूद दुकान पर चाय खरीद रहे लोगों की हालत भी टी स्टौल की तरह उजड़ी हुई थी. तेजा जिस मंजिल के लिए निकला था, उसे पाना नामुमकिन था, लेकिन सपनों का पीछा करना उस की लत बन चुकी थी. इस वजह से दिमाग में कभी चैन नहीं रहा था. अचानक ही पीछे से आई हलकी आवाज ने तेजा को चौंका दिया, ‘‘भैयाजी, 2 दिन से कुछ खाया नहीं है.’’ कहने को तो तेजा तेज आवाज से भी डरने वालों में से नहीं था, लेकिन इतनी रात में आखिरी प्लेटफार्म का कोना पकड़ते वक्त उसे नशेडि़यों की नौटंकी का अंदाजा था. सो, अचानक पीछे से आ कर बैंच पर बैठ जाने वाली 30-35 साल की एक औरत की धीमी आवाज ने भी उसे सकते में डाल दिया था. पहनी हुई साड़ी और शक्लसूरत से वह औरत कहीं से भी रईस नहीं लग रही थी, लेकिन भिखारी भी दिखाई नहीं देती थी. हालांकि यह जरूर लगता था कि वह घर से निकल कर सीधी यहां नहीं आई है. उस का कई दिन भटकने जैसा हुलिया बना हुआ था. हालात भांप कर तेजा ने चौकस आवाज में कहा कि वह पैसे नहीं देगा. हां, अपने पैसे से दुकान वाले को बोल कर चायबिसकुट जरूर दिला सकता है. लेकिन औरत का अंदाज चायबिसकुट पाने तक सिमट जाने वाला नहीं था.

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औरत ने दुखियारी बन कर कहा, ‘‘मैं बहुत ही मुश्किल में हूं, कुछ पैसे दे दो.’’ तेजा का दिमाग चकरा गया, क्योंकि यह औरत उस टाइप की भी नहीं लग रही थी, जो अंधेरी रातों में नौजवानों को इशारे कर बुलाती हैं. न ही कपड़े और सूरत उस के भिखारी होने पर मोहर लगा रहे थे. तेजा ने चेहरा थोड़ा नरम करने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘यहां स्टेशन के अंधेरे कोने में क्या कर रही हो?’’ उस औरत ने धीमी आवाज में और दर्द लाते हुए कहा, ‘‘बस, थोड़े पैसे दे दीजिए.’’ तेजा ने नजरें घुमा कर चारों तरफ देखा. उस की नजरें यह तसल्ली कर लेना चाहती थीं कि कम रोशनी वाले स्टेशन के कोने में एक औरत के साथ बैठने पर दूसरों की नजरें उसे किसी अलग नजरिए से तो नहीं देख रही हैं? लेकिन तेजा को यह जान कर तसल्ली हुई कि स्टेशन जैसे कुछ देर पहले था, ठीक अब भी वैसा ही है. नए हालात देख कर कालेज के फाइनल ईयर का स्टूडैंट तेजा रोमांच से भर उठा. यह रोमांच इस उम्र के लड़कों में खास हालात बनने पर खुद ही पैदा हो जाता है. तेजा भी दूसरे ग्रह का प्राणी नहीं था. सो, उसे भी यह एहसास हुआ. अब जब आसपास के हालात बैंच के माहौल में खलल डालने वाले नहीं थे, तो तेजा का खोजी दिमाग सवाल उछालने लगा. उस ने कहा, ‘‘मैं पैसे तो दे दूंगा, लेकिन पहले यह बताओ कि तुम इस हालत में यहां क्या कर रही हो?’’ पैसे मिलने की बात सुन कर उस औरत ने बताया कि वह बिहार के पटना की रहने वाली है.

मेरा मर्द बहुत बुरा आदमी था. घर खर्च के लिए वह पैसे नहीं देता था. वह दारू पीता था. बच्चे खानेखिलौनों के लिए हमेशा मां को ही कहते थे, लेकिन पति के गलत बरताव और नशेड़ी होने की वजह से वह घुट रही थी. एक दिन जेठानी से उस का झगड़ा हो गया. जब पति घर आया तो उस ने बाल धोने के लिए शैंपू खरीदने के पैसे मांग लिए. पहले से ही जेठानी के सिखाए नशेड़ी पति ने उस की बेरहमी से पिटाई कर दी. यह पिटाई नई नहीं थी, लेकिन लंबे अरसे से उस के मन में जो बगावती ज्वालामुखी दबा बैठा था, उस रात फट पड़ा. पति को जवाब देना तो उस के बूते से बाहर था, लेकिन घर में सबकुछ छोड़ फिल्मी हीरोइन की तरह सीधे स्टेशन पहुंच गई. आंसू पोंछने का दौर चलने के बाद दिल को पत्थर बना लिया और आखिर में अनजान ट्रेन में कदम रख ही दिया और आज यहां है. मच्छरों का काटना, मुसाफिरों की शक्की नजर का डर, सबकुछ तेजा के दिमाग से भाग चुका था और उस औरत की बातें सुन कर उस का घनचक्कर दिमाग और ज्यादा घूम गया.

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तेजा ने पूछा, ‘‘शैंपू की खातिर पति ने पीट क्या दिया, तुम अपने छोटेछोटे बच्चोें को छोड़ कर घर से भाग आई? कितने दिन पहले घर छोड़ा था? क्या तुम ट्रेन से सीधे अंबाला स्टेशन पर उतरी हो? तुम्हारा नाम क्या है?’’ तेजा के 4 सवालों की बौछार का सामना करने के बाद अपने लंबे बालों को हलके से खुजलाते हुए उस औरत ने खुद का नाम रश्मि बता कर कहा, ‘‘सही से याद नहीं.

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