Crime Story: औनलाइन गेम्स- खिलाड़ी बन रहे हैं अपराधी

सौजन्य- सत्यकथा

इन दिनों टैलीविजन से ले कर अखबार, सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर गेम से पैसे जीतने वाले इश्तिहारों की भरमार सी आ गई है. गेम खेल कर करोड़पति बनने के सपने दिखाने वाले इन इश्तिहारों में फिल्म, टैलीविजन व खेल जगत के कई बड़े चेहरे प्रमोशन करते नजर आ जाते हैं. इस का नतीजा यह है कि बहुत से लोग अब शौर्टकट तरीके से गेम खेल कर करोड़पति बनने का सपना पाले औनलाइन गेम में उल झे हुए देखे जा सकते हैं. लौकडाउन के बाद भारत में इस तरह के गेम खेलने वालों की तादाद में काफी उछाल देखा गया है. इन में तमाम लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने जो पहले तो अपने फोन में गेम को सिर्फ मनोरंजन के लिए ही इंस्टौल किया था, लेकिन बाद में यही गेम गैंबलिंग यानी जुए में बदल गया और पैसे कमाने के लालच में आ कर कई लोगों ने अपने मेहनत की कमाई गंवा दी.

औनलाइन गेमिंग की यह लत सोशल मीडिया की लत से ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है, क्योंकि सोशल मीडिया की लत के शिकार लोग अपना समय बरबाद करते हैं और तमाम तरह की दिमागी बीमारियों के शिकार होते हैं. औनलाइन गेमिंग न केवल जुआ खेलने की सोच को बढ़ावा दे रही है, बल्कि यह नएनए तरह के अपराध को भी बढ़ा रही है.

औनलाइन गेम के चक्कर में पैसे गंवाने और अपराध का रास्ता अपनाने का एक ताजा मामला उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर में सामने आया.

हुआ यह कि संतकबीर नगर जिले के खलीलाबाद कोतवाली इलाके में सरौली के रहने वाले अपर कृषि अधिकारी के पद पर काम कर रहे हरिश्चंद्र त्रिपाठी ने थाना कोतवाली खलीलाबाद में सूचना दी कि उन का बेटा आशुतोष त्रिपाठी उर्फ लकी, जो ग्वालियर में बीएससी नर्सिंग के तीसरे साल का छात्र है, का किसी ने अपहरण कर लिया है.

हरिश्चंद्र त्रिपाठी ने पुलिस को सूचना दी कि उन का बेटा लौकडाउन के चलते ग्वालियर से घर पर आया हुआ था और जरूरी सामान लेने के लिए जिला मुख्यालय के खलीलाबाद बाजार गया हुआ था कि तभी उन की पत्नी के मोबाइल फोन पर उन्हीं के लड़के के मोबाइल नंबर से मैसेज आया कि तुम्हारे लड़के का अपहरण कर लिया गया है. यह भी लिखा था कि तत्काल उस के खाते में 2 लाख रुपए ट्रांसफर कर दो, नहीं तो तुम्हारे बेटे की हत्या कर दी जाएगी.

हरिश्चंद्र त्रिपाठी की सूचना पर थाना कोतवाली खलीलाबाद की पुलिस हरकत में आ गई. तुरंत ही मुकदमा संख्या 430/2020 धारा 364 ए में मामला दर्ज कर लिया. जिले के पुलिस अधीक्षक ब्रजेश सिंह की अगुआई में अपर पुलिस अधीक्षक संजय कुमार की निगरानी में सर्विलांस सैल के प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार पंत व प्रभारी निरीक्षक कोतवाली खलीलाबाद की संयुक्त टीम का गठन कर दिया गया.

गठित पुलिस टीम ने आशुतोष त्रिपाठी उर्फ लकी के अपहरण करने वालों तक पहुंचने के लिए जाल बिछाया, तो उसे बस्ती जिले के हर्रैया कसबे से सहीसलामत बरामद कर लिया गया.

जब पुलिस ने खुलासा किया, तो पता चला कि आशुतोष का किसी ने अपहरण नहीं किया था, बल्कि उस ने खुद ही अपने अपहरण का जाल बुना था.

आशुतोष त्रिपाठी ने पूछताछ में बताया कि वह वर्तमान में मध्य प्रदेश में ग्वालियर के जय इस्टीट्यूट औफ नर्सिंग में बीएससी नर्सिंग का छात्र है.

3 जुलाई, 2020 को उस के मोबाइल नंबर के ह्वाट्सएप पर औनलाइन जून क्लब मनी मेकिंग गेम का एक लिंक आया था, जिस के जरीए पैसा कमाने की बात लिखी गई थी.

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आशुतोष त्रिपाठी ने पैसा कमाने की नीयत से गेम खेलना शुरू कर दिया, जिस से वह महज 2 दिनों में ही तकरीबन एक लाख, 60 हजार रुपए हार गया. उस ने इन पैसों को अपने कई दोस्तों से औनलाइन तरीकों से उधार लिया था, जिस के ट्रांजैक्शन का सुबूत भी उस के मोबाइल फोन से बरामद कर लिया गया.

आशुतोष त्रिपाठी ने पुलिस को बताया कि इतने सारे पैसे गेम में हार जाने के बाद उधारी चुकता करने के लिए उस ने 5 जुलाई को अपने अपहरण की योजना बना ली. इस के तहत फिरौती के तौर पर अपने ही मांबाप से 2 लाख रुपए मांगे जाने की योजना बनाई थी. उन में से उधारी के एक लाख, 60 हजार रुपए चुकता करने के बाद बाकी बचे 40,000 रुपए से फिर से औनलाइन गेम खेलने का प्लान बनाया था.

आशुतोष त्रिपाठी अपनी ही किडनैपिंग की योजना को अंजाम देने के लिए 6 जुलाई की शाम तकरीबन 4 बजे दवा व घर का सामान लेने के लिए निकला था. वहां से उस ने 1,500 रुपए एटीएम से निकाले और जनपद बस्ती के हर्रैया कसबे में पहुंच गया, जहां से साढ़े 7 बजे उस ने अपने घर पर परिजनों के मोबाइल नंबर पर मैसेज कर अपने अपहरण की सूचना दी और बताया कि अपहरण करने वाले इस के लिए 2 लाख रुपए की मांग कर रहे हैं.

लेकिन पुलिस की तत्परता से महज 24 घंटे के भीतर आशुतोष त्रिपाठी द्वारा किए गए खुद के अपरहण की साजिश को बेनकाब कर दिया गया.

आशुतोष त्रिपाठी औनलाइन गेम  से पैसे तो नहीं कमा पाया, लेकिन सलाखों के पीछे जरूर पहुंच गया.

ऐसे दिया जाता है लालच

वैसे तो औनलाइन गेम में दांव लगाए जाने की शुरुआत वर्चुअल मनी यानी आभासी मुद्रा से की जाती है, लेकिन हार और जीत होने के बाद इसे रियल मनी में बदलना पड़ता है. जो लोग इस तरह का गेमिंग जुआ खेलना शुरू करते हैं, वे पहले ऐसे गेम के एप को डाउनलोड करते हैं, जिस के बाद एन गेमिंग एप द्वारा यूजर को कुछ पौइंट्स व 10 रुपए से ले कर 100 रुपए दिए जाते हैं, जो यूजर को अपने वालैट या पेटीएम अकाउंट में एड करने होते हैं.

इस के अलावा गेम के जरीए जुआ खेलने वाले को रुपए से पौइंट खरीदने होते हैं, जो उन के मोबाइल एप में रहते हैं. लत लगने के चलते पौइंट हारने पर खिलाड़ी फिर रुपए खर्च कर पौइंट खरीदने पर मजबूर हो जाता है.

यह भी हो सकता है, गेम की शुरुआत करते हैं तो जीत के साथ शुरुआत हो जाए. लेकिन बाद में जब यूजर अपने रुपए हारने लगता है, तो वह इस आस में अपने बैंक अकाउंट से अपने वालेट में रुपए ट्रांसफर करता जाता है कि हो सकता है, वह हारे हुए रुपए जीत जाए. इस चक्कर में पड़ कर जब यूजर भारीभरकम रकम गंवा बैठता है, तो उसे यह बात सम झ आती है कि वह औनलाइन गेमिंग के चक्कर में ठगी का शिकार हो चुका है.

पत्रकार भावना ने बताया कि ड्रीम 11 या फैब 11 सब एकजैसी ही होती हैं. इन सभी एप में पहले आप को पैसे लगाने होते हैं, जिस में हजारों रुपए तक आप लगा सकते है. इस में जीतने के चांस बिलकुल भी नहीं होते हैं, क्योंकि मान लीजिए, दिल्ली और बैंगलुरू का गेम होने वाला है, फिर इसे कंप्यूटराइज्ड सिस्टम से गेम खेलने वाले को हरा दिया जाता है.

गेम खेलने वाले एवी शुक्ल ने बताया कि ड्रीम 11 जैसे गेम में 10 से ले कर 2,000 के आसपास तक रुपए लगाए जाते हैं. इस में जीतने के चांस बहुत कम होते हैं. तकरीबन 95 फीसदी लोग इसे हार जाते हैं. गेम कंपनियां अपने करोड़ों यूजर के जरीए हर दिन अरबों रुपयों का कारोबार करती हैं.

कुछ इसी तरह का अनुभव सुलभ श्रीवास्तव और सौरभ शुक्ल का भी है, जिन्होंने गेम से सिर्फ पैसे गंवाए हैं.

ऐसे होता है जुए का कारोबार

औनलाइन गेम के जरीए जुए की लत लगाने वाले एप और वैबसाइट बड़ी ही चालाकी से लोगों को अपने जाल में फंसाती हैं. सब से पहले ऐसे गेम को औनलाइन अपने लैपटौप या स्मार्टफोन में डाउनलोड करना पड़ता है. ऐसे एप को पूरी तरह से डाउनलोड करने के लिए मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी भेजा जाता है. इस के बाद जब मोबाइल नंबर वैरीफाई हो जाता है, तो खेलने वाले को खेलने से पहले पेटीएम अकाउंट बना कर कुछ रुपयों का भुगतान करना पड़ता है.

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यह भुगतान कभीकभी औनलाइन बैंकिंग या डैबिट कार्ड के जरीए लिया जाता है. ऐसे में गेम इंस्टौल करने वाले से जुड़ा बैंक और मोबाइल से सारा डाटा गेमिंग कंपनी के पास चला जाता है.

इसी तरह औनलाइन कैसीनो गेम भी खेला जाता है, जिस में एक से 36 तक अंक होते हैं. इस में दांव लगाने से गेंद अंक पर रुक जाए, तो एक रुपए के

36 रुपए मिलते हैं. इसी तरह हारजीत होती है. यह खेल टच स्क्रीन मोबाइल या कंप्यूटर से खेला जा सकता है.

इसी तरह के एक गेम का संचालन मुंबई से किया जाता था, जिस में खेलने के लिए आईडी दी जाती थी. उस का एक पासवर्ड होता है. वहां रतन नाम के एक आदमी ने गेम खेलने से पैसे जीतने के चक्कर 2 साल में डेढ़ लाख रुपए गंवा दिए. इस के बाद उन्होंने पुलिस  को शिकायत की, तो पुलिस ने  अचल चौरसिया नाम के आदमी को गिरफ्तार किया.

कभीकभी औनलाइन गेम खेलते समय वर्चुअल गेम पार्टनर द्वारा गेम के अगले पार्ट में जाने के लिए लिंक लौगइन कोड के साथ ओटीपी शेयर किया जाता है, जिस के जरीए पौइंट जीतने की बात की जाती है और इसी पौइंट को रुपयों में बदलने का लालच दिया जाता है.

जब खिलाड़ी दूसरी तरफ से भेजे गए ओटीपी को शेयर करता है या लिंक को खोलता है तो उस के पेटीएम या बैंक से रुपए कट जाते हैं और खेलने वाले को लगता है कि वह रुपए गेम में हार गया है.

इसी तरह का एक मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से सामने आया था, जिस में बिलरियागंज थाना क्षेत्र के हेगईपुर गांव के रहने वाले पेशे से शिक्षक हरिवंश के जमात 6 में पढ़ने वाले  12 साल के बेटे कपिल ने औनलाइन गेम में 8 लाख रुपए गंवा दिए.

इस मामले में हुआ यह कि कपिल ने एडवांस औनलाइन गेम खरीदने के चक्कर में पिता के डैबिड कार्ड की डिटेल्स हासिल कर ली और पहले पेटीएम के जरीए गेम संचालक को रुपए ट्रांसफर करना शुरू कर दिया, बाद में कपिल जब गेम से रुपए हारने लगा, तो उस ने बाद में यूपीआई आईडी बना कर धीरेधीरे कर अकाउंट से 8 लाख रुपए उड़ा दिए.

इस ठगी की जानकारी कपिल के पिता को तब हुई, जब वे बैंक पहुंचे और कुछ रुपए निकालने के लिए बैंक में अपना खाता चैक किया. उस के बाद उन्हें उन का बैंक अकाउंट खाली मिला.

इस बात की जानकारी उन्होंने पुलिस वालों को दी, तब जा कर पता चला कि पैसे तो उन के बेटे ने औनलाइन गेम गंवा दिए हैं.

देशीविदेशी कंपनियां शामिल

औनलाइन गेमिंग से जुए के कारोबार में देशी से ले कर विदेशी गेमिंग कंपनियां शामिल हैं, जो बड़े शातिराना अंदाज में लोगों की जेब में चूना लगाती हैं. इसी तरह भारतीय गेम ड्रीम 11 है, जिसे हर्ष जैन और भावित सेठ नाम के लोगों ने साल 2008 में शुरू किया था.

यह दुनियाभर की टौप इनोवेटिव कंपनी में गिनी जाती है, जिस के जरीए क्रिकेट, फुटबाल, कबड्डी जैसे गेम औनलाइन खेल सकते हैं. इस में ढेरों कैश प्राइज जीतने के लिए टीम बना कर खेलना पड़ता है. इस में पैसे जीतने के लिए क्रेडिट दिया जाता है, जिसे बाद में पैसे में कंवर्ट करना होता है.

ऐसी नामीगिरामी गेमिंग कंपनियों में भी लोग सेंध लगा कर लोगों को ठग लेते हैं. इसी तरह बिंगो कैसे खेलें, ब्रेनबाजी, पोलबाजी जैसे तमाम औनलाइन गेम लोगों में जुए की लत बढ़ा रहे हैं.

हर किसी के लिए हैं ऐसे गेम

औनलाइन गेमिंग के जरीए जुए का जाल फैलाने वाले एप और सौफ्टवेयर हर उम्र के लिहाज से चल रहे हैं, जिस से इन के चंगुल में बच्चों व किशोरों के साथसाथ नौजवानों और बड़ेबूढ़ों को भी फंसा देखा जा सकता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि आगे चल कर वे अपना वक्त व पैसा दोनों बरबाद करने वाले हैं.

इसी तरह का एक मामला सामने आया, जिस में लखनऊ की न्यू हैदराबाद कालोनी के एक बाशिंदे के 10 साला बेटे ने फ्री फायर गेम खेलने के चक्कर में पिता के अकाउंट को चपत लगा दी. यह बच्चा जमात 4 में पढ़ता था, जो अकसर औनलाइन गेम में उल झा रहता था. गेम खेलने के लिए पैसों का औनलाइन भुगतान करना पड़ता है.

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यह भुगतान करने के लिए बच्चे ने अपने पिता के मोबाइल से चुपचाप पेटीएम अकाउंट खोल लिया और 35,000 रुपए गेम कंपनी को ट्रांसफर कर दिए.

छात्र हो रहे ज्यादा शिकार

जमशेदपुर कोऔपरेटिव कालेज में पढ़ने वाले अंशुमन ने औनलाइन गेम के चक्कर में पड़ कर हजारों रुपए गंवा दिए.

सत्यनारायण भुइयां नाम के एक शख्स ने शौर्टकट तरीके से कमाई करने के चक्कर में आ कर औनलाइन तीन पत्ती गेम शुरू किया और जब तक उसे कुछ सम झ आया, तब तक वह 25,000 रुपए गंवा चुका था.

पुलिस भी लाचार

औनलाइन गेम के जरीए जुआ खेलने वालों पर पुलिस नकेल कसने में लाचार नजर आती है, क्योंकि ताश के पत्तों से खेले जाने वाले जुए में तो छापा मार कर जुआरियों को पकड़ा जा सकता है, लेकिन वर्चुअल जुआ इस से अलग होता है. इस में न तो पुलिस का छापा पड़ने का डर है, न ही जेल जाने का जोखिम.

औनलाइन गेम में अब ताश के पत्तों के बजाय मोबाइल फोन और लैपटौप पर दांव लगाया जाता है, जो पूरी तरह से उस औनलाइन गेम के प्लेटफार्म के संचालक के हाथ में होता है. इस में आप उस के इशारे पर ही गेम हारते और जीतते हैं, जबकि इस तरह के प्लेटफार्म द्वारा पहले खेलने की लत लगाने के लिए गेम में पैसे जिताए जाते हैं और बाद में जब आप को खेलने का चसका लग जाता है, तो आप भारीभरकम रकम गंवा देते हैं.

इस तरह के गेम को कहीं भी खेला जा सकता है, चाहे आप औफिस में बैठे हों, चाहे गाड़ी ड्राइव कर रहे हों या घर में हों. आजकल तीन पत्ती, रम्मी जैसे तमाम गेम हैं जो पैसे कमाने का लालच देते हैं. यह है तो पूरी तरह से जुआ ही, लेकिन इस गैरकानूनी काम को बड़ी ईमानदारी से संचालित किया जा रहा है.

बढ़ी है खेलने वालों की तादाद

जैसेजैसे देश में स्मार्टफोन यूजर्स की तादाद में इजाफा हो रहा है, वैसेवैसे औनलाइन गेम वाले एप की तादाद में भी इजाफा होता जा रहा है. भारत में पैसे जिताने का दावा करने वाले गेमिंग एप ड्रीम 11 या फैब 11, बिग टाइम, एमपीएल यानी मोबाइल प्रीमियर लीग, विंजो गोल्ड, हगो एप, गमेजोप, औन एप, कुएरका, लोको, अड्डा 52 डौट कौम, बिंगो रेसिंग वाले गेम्स, शूटिंग से ले कर निशानेबाजी और युद्ध वाले गेम्स हजारों गेम शामिल हैं, जिन के जरीए दांव लगाए जा रहे हैं. गूगल प्ले स्टोर पर कई ऐसे एप मुहैया हैं, जिन्हें जुआ खेलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

साइबर ऐक्सपर्ट आनंद कुमार ने बताया कि एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में लाखों मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी इस तरह के औनलाइन गेम्स से लगातार घंटों कनैक्ट रहते हैं.

भारत में सब से ज्यादा खेले जाने लूडो किंग के 10 करोड़ से भी ज्यादा यूजर हैं, जिस के रोजाना 60 लाख ऐक्टिव यूजर होते हैं. वहीं तीन पत्ती गेमिंग एप के 5 करोड़ यूजर हैं.

लग सकता है चूना

साइबर ऐक्सपर्ट आनंद कुमार के मुताबिक, औनलाइन गेम खेलने वालों को अपनी प्रोफाइल बनानी होती है, जिस में यूजर का पूरा नाम, उम्र, ईमेल, पता, क्रेडिट व डैबिट कार्ड डिटेल्स वगैरह शामिल हो सकते हैं. यह कई बार आप के बैंक खातों से जुड़े डाटा की चोरी की वजह बन जाता है.

डाक्टर की भी सुनें

मनोचिकित्सक डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन के मुताबिक, औनलाइन गेमिंग में फंस कर पैसे खोने का ही डर नहीं होता है, बल्कि ज्यादा देर तक मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखने के चलते आंखों की रोशनी पर भी फर्क पड़ सकता है. इस के अलावा नींद न आने की समस्या हो सकती है.

औनलाइन गेम के चलते बच्चे मोटापे और डायबिटीज के शिकार हो सकते हैं और सोशल लाइफ से दूर हो जाते हैं. इस तरह की सोच के चलते कई बार लोग हिंसक बरताव भी करने लगते हैं.

प्रचार करते बड़े चेहरे

औनलाइन गेम के जरीए जुए की लत बढ़ाने वाले ऐसे गेम को प्रमोट करने के लिए फिल्म और ग्लैमर इंडस्ट्री के साथ ही खेल जगत के तमाम बड़े चेहरे जुड़े हुए हैं. उन के इश्तिहार को देख कर लोग पैसे कमाने वाले ऐसे गेमिंग एप को अपने मोबाइल फोन में डाउनलोड कर खेलना शुरू कर देते हैं.

ऐसे कुछ गेम को प्रमोट करते हुए फिल्म स्टार प्रकाश राज, सौरभ शुक्ला, राजपाल यादव दिख जाएंगे. इस के अलावा महेंद्र सिंह धोनी भी ऐसे गेम्स को टीवी इश्तिहार में खूब प्रमोट करते रहे हैं.

बीते दिनों ऐसे गेम्स को बढ़ावा देने के आरोप में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और फिल्म हीरोइन तमन्ना भाटिया के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई. केस दायर करने वाले वकील ने कहा कि नौजवानों को इस की आदत हो रही है और औनलाइन जुआ कंपनियां विराट और तमन्ना जैसे सितारों का इस्तेमाल नौजवानों का ब्रेनवाश करने के लिए कर रही हैं.

उस याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से औनलाइन जुआ को बैन करने के लिए निर्देश देने की मांग की है. उन्होंने एक लड़के के मामले का भी जिक्र किया, जिस ने हाल में खुदकुशी कर ली थी, क्योंकि वह औनलाइन जुए के लिए उधार लिए पैसे वापस नहीं कर पाया था.

ऐसे बनाएं दूरी

अगर आप या आप के परिवार का कोई सदस्य ऐसे वर्चुअल गेम के चंगुल से बाहर नहीं निकल पा रहा है, तो सब से पहले कोशिश करें कि अपने फोन से ऐसे एप को तत्काल ही रिमूव कर दें और खुद को बिजी रखने के लिए पत्रपत्रिकाओं का सहारा लें. साथ ही, परिवार के साथ बैठ कर खेले जाने वाले गेम खेलें. इन में कैरम, सांपसीढ़ी, लूडो जैसे गेम भी शामिल किए जा सकते हैं.

जिन परिवारों में पढ़ने वाले बच्चे हैं, उन परिवारों को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर निगरानी रखें कि कहीं उन का बच्चा जरूरत से ज्यादा मोबाइल और कंप्यूटर तो नहीं चला रहा है, क्योंकि ऐसे गेम के एप्लीकेशन से जुड़ाव मानसिक तौर पर जुए की लत डाल देता है, इसलिए बच्चों में आउटडोर और इनडोर गेम्स को बढ़ावा दें.

फिलहाल तो अगर कोरोना के चलते आउटडोर गेम्स के लिए नहीं भेज सकते, तो घर में ही फिजिकल गेम्स में हिस्सा लेने के लिए बढ़ावा दें.

अब यह कहा जा सकता है कि केवल मनोरंजन के लिए खेला जाने वाला एप आधारित औनलाइन गेम अब खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी तरह जुआ और सट्टा कारोबार के रूप में अपने पैर पसार चुका है.

लोग शौर्टकट तरीके से पैसे कमाने के चक्कर में अपनी गाढ़ी कमाई से पलक  झपकते ही हाथ धो बैठते हैं, इसलिए अगर आप भी औनलाइन गेम खेलने का मन बना रहे हैं, तो आज ही तोबा कर लीजिए. कहीं ऐसा न हो कि आप इस तरह के गेम में अपनी व अपने मांबाप की कमाई से हाथ धो बैठें और साथ ही, जुर्म का रास्ता अख्तियार कर जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाएं.

Serial Story: सोच- पार्ट 2

कुछ देर तक गपशप का सिलसिला चलता रहा फिर मैं ने उन से विदा ली और घर लौट आई.

लगभग एक हफ्ते बाद फोन की घंटी बजी. श्रीमती सान्याल थीं दूसरी तरफ. हैरानपरेशान सी वह बोलीं, ‘मानसी का उलटियां कर के बुरा हाल हो रहा है. समझ में नहीं आता क्या करूं?’

‘क्या फूड पायजनिंग हो गई है?’

‘अरे नहीं, खुशखबरी है. मैं दादी बनने वाली हूं. मैं ने तो यह पूछने के लिए तुम्हें फोन किया था कि तुम ने ऐसे समय में अपनी बहू की देखभाल कैसे की थी, वह सब बता और जो भूल गई हो उसे याद करने की कोशिश कर. तब तक मैं अपनी कुछ और सहेलियों को फोन कर लेती हूं.’

अति उत्साहित, अति उत्तेजित श्रीमती सान्याल की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गई. ब्याह के एक बरस बाद राधिका गर्भवती हुई थी. शुरू के 2-3 महीने उस की तबीयत काफी खराब रही थी. उलटियां, चक्कर फिर वजन भी घटने लगा था. लेडी डाक्टर ने उसे पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी.

राधिका और राहुल मुझे बारबार बुलाते रहे. एक दिन तो राहुल दरवाजे पर ही आ कर खड़ा हो गया और अपनी कार में मेरा बैग भी ले जा कर रख लिया. अविनाश की भी इच्छा थी कि मैं राहुल के साथ चली जाऊं. पर मेरी इच्छा वहां जाने की नहीं थी. उन्होंने मुझे समझाते हुए यह भी कहा कि अगर तुम राहुल के घर नहीं जाना चाहती हो तो उन्हें यहीं बुला लो.

सभी ने इतना जोर दिया तो मैं ने भी मन बना लिया था. सोचा, कुछ दिन तो रह कर देखें. शायद अच्छा लगे.

अगली सुबह अखबार में एक खबर पढ़ी, ‘कृष्णा नगर में एक बहू ने आत्म- हत्या कर ली. बहू को प्रताडि़त करने के अपराध में सास गिरफ्तार.’

‘तौबातौबा’ मैं ने अपने दोनों कानों को हाथ लगाया. मुंह से स्वत: ही निकल गया कि आज के जमाने में जितना हो सके बहूबेटे से दूरी बना कर रखनी चाहिए.

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मां के प्राण, बेटे में अटकते जरूर हैं, मोह- ममता में मन फंसता भी है. आखिर हमारे ही रक्तमांस का तो अंश होता है हमारा बेटा. लेकिन वह भी तो बहू के आंचल से बंधा होता है. मां और पत्नी के बीच बेचारा घुन की तरह पिसता चला जाता है. मां तो अपनी ममता की छांव तले बहूबेटे के गुणदोष ढक भी लेगी लेकिन बहू तो सरेआम परिवार की इज्जत नीलाम करने में देर नहीं करती. किसी ने सही कहा है, ‘मां से बड़ा रक्षक नहीं, पत्नी से बड़ा तक्षक नहीं.’

मैं गर्वोन्नत हो अपनी समझदारी पर इतरा उठी. यही सही है, न हम बच्चों की जिंदगी में हस्तक्षेप करें न वह हमारी जिंदगी में दखल दें. राधिका बेड रेस्ट पर थी. उस ने अपनी मां को बुला लिया तो मैं ने चैन की सांस ली थी. ऐसा लगा, जैसे मैं कटघरे में जाने से बच गई हूं.

प्रसव के समय भी मजबूरन जाना पड़ा था, क्योंकि राधिका के पीहर में कोई महिला नहीं थी, सिर्फ मां थी, उन्हें भी अपनी बहू की डिलीवरी पर अमेरिका जाना पड़ रहा था.

3 माह का समय मैं ने कैसे काटा, यह मैं ही जानती हूं. नवजात शिशु और घर के छोटेबड़े दायित्व निभातेनिभाते मेरे पसीने छूटने लगे. इतने काम की आदत भी तो नहीं थी. राधिका की आया से जैसा बन पड़ता सब को पका कर खिला देती. रात में भी शुभम रोता तो आया ही चुप कराती थी.

3 माह का प्रसूति अवकाश समाप्त हुआ. राधिका को काम पर जाना था. बेटेबहू दोनों ने हमारे साथ रहने की इच्छा जाहिर की थी.

अविनाश भी 3 माह के शिशु को आया की निगरानी में छोड़ कर जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मेरी नकारात्मक सोच फिर से आड़े आ गई. मन अडि़यल घोड़े की तरह एक बार फिर पिछले पैरों पर खड़ा हो गया था. मन को यही लगता था कि बहू के आते ही इस घर की कमान मेरे हाथ से सरक कर उस के हाथ में चली जाएगी.

राधिका ने शुभम को अपने ही दफ्तर में स्थित क्रेच में छोड़ कर अपना कार्यभार संभाल लिया. लंच में या बीचबीच में जब भी उसे समय मिलता वह क्रेच में जा कर शुभम की देखभाल कर आती थी. शाम को दोनों पतिपत्नी उसे साथ ले कर ही वापस लौटते थे. दुख, तकलीफ या बीमारी की अवस्था में राधिका और राहुल बारीबारी से अवकाश ले लिया करते थे. मुश्किलें काफी थीं लेकिन विदेशों में भी तो बच्चे ऐसे ही पलते हैं, यही सोच कर मैं मस्त हो जाती थी.

मिसेज सान्याल अकसर मुझे अपने घर बुला लेती थीं. मैं जब भी उन के घर जाती, कभी वह मशीन पर सिलाई कर रही होतीं या फिर सोंठहरीरे का सामान तैयार कर रही होतीं. मानसी का चेहरा खुशी से भरा होता था.

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एक दिन उन्होंने, कई छोटेछोटे रंगबिरंगे फ्राक दिखाए और बोलीं, ‘बेटी होगी तो यह रंग फबेगा उस पर, बेटा होगा तो यह रंग अच्छा लगेगा.’

मैं उन के चेहरे पर उभरते भावों को पढ़ने का प्रयास करती. न कोई डर, न भय, न ही दुश्ंिचता, न बेचैनी. उम्मीद की डोर से बंधी मिसेज सान्याल के मन में कुछ करने की तमन्ना थी, प्रतिपल.

एक दिन सुबह ही मिस्टर सान्याल का फोन आया. बोले, ‘‘मानसी को लेबर पेन शुरू हो गया है और उसे अस्पताल ले कर जा रहे हैं. मिसेज सान्याल थोड़ा अकेलापन महसूस कर रही हैं, अगर आप अस्पताल चल सकें तो…’’

केवल मुठ्ठी भर लोगों को मौका दे रहा हुनर हाट

लेखक- शाहनवाज

लौकडाउन और कोविड-19 के कारण, एक लम्बे समय के बाद दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में जहां एक तरफ बड़ी बड़ी इमारतें और दूसरी तरफ दूरदर्शन की बड़ी सी गगनचुम्बी रेडियो और टीवी टावर के बीच मौजूद दिल्ली हाट में भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा हुनर हाट का आयोजन कर ही लिया गया. वैसे दिल्ली में यह हुनर हाट साल की शुरुआत (फरवरी)  में और अक्सर या तो इंडिया गेट के राजपथ पर लगा करता था या फिर प्रगति मैदान में.

हुनर हाट भारत के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा आयोजित मास्टर शिल्पकारों के पारंपरिक और उत्तम कौशल को प्रदर्शित करने और बढ़ावा देने के लिए एक प्रभावी मिशन बताया जाता है. हुनर हाट का लक्ष्य कारीगरों, शिल्पकारों और पारंपरिक खान-पान विशेषज्ञों को बाजार में निवेश और रोजगार के अवसर प्रदान करना है.

hunar-hat

लेकिन क्या सच में भारतीय शिल्पकारों और हस्तशिल्पियों के लिए देश भर के विभिन्न शहरों में लगने वाला हुनर हाट इन के लिए फायदे का सौदा होता है? क्या देश के दूर दराज़ वाले ग्रामीण इलाकों के शिल्पकारों और हस्तशिल्पियों को हुनर हाट मौका देता है? जो कलाकार अपने बनाए हुए सामान के साथ दिल्ली, मुंबई, इंदौर जैसे अन्य बड़े शहरों में आते हैं क्या उन के छोटे छोटे सपने इन बड़े बड़े शहरों में आ कर सच होते हैं?

इन्ही जैसे और भी महत्वपूर्ण सवालों का पता लगाने के लिए हमारी टीम ने पीतमपुरा दिल्ली हाट में लगे हुनर हाट में जा कर लोगों से बात की. हुनर हाट का आंखों देखी ब्यौरा और ग्राउंड रिपोर्ट कुछ इस प्रकार है.

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हुनर हाट: एक आदर्शवादी कल्पना

भारत सरकार की उस्ताद योजना (अपग्रेडिंग द स्किल्स एंड ट्रेनिंग इन ट्रेडिशनल आर्ट्स/क्राफ्ट्स फॉर डेवलपमेंट) के तहत हुनर हाट को स्थापित किया गया है. ये योजना राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार के साथ पारंपरिक कला/शिल्प के संबंधों को स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है. आसान शब्दों में कहें तो सरकार ने भारत के अल्पसंख्यक समुदाय के हस्तशिल्पियों और पारंपरिक दस्तकारों के हितों की रक्षा के लिए उस्ताद योजना शुरू की है. हुनर हाट इसी योजना के तहत एक अन्य प्रयास है जहां पर हस्तशिल्पी और पारंपरिक दस्तकार अपने द्वारा बनाए हुए उत्पादों को आम लोगों के सामने प्रदर्शनी के तौर पर लगाते हैं और उन्हें बेच कर वें आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहे हैं.

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सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में पारंपरिक कला और समुदाय से संबंधित हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए कौशल विकास तथा प्रशिक्षण योजना उस्ताद योजना शुरू की है. इन कलाकारों की कुशलता को सही लोगों तक पहुंचाने के लिए और इन की द्वारा बनाए गए उत्पादों का उचित मूल्य उपलब्ध कराने के लिए उस्ताद योजना को देश के कुछ बड़े संस्थानों के साथ जोड़ा गया है, जिन में राष्‍ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्‍थान (एन.आई.एफ.टी.), राष्‍ट्रीय डिजाइन संस्‍थान (एन.आई.डी.) और भारतीय पैकेजिंग संस्‍थान (आई.आई.पी.) की सहायता ली जा रही है.

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यह सब सुन ने में कितना अच्छा लगता है लेकिन इस की हकीकत ग्राउंड लेवेल पर कुछ और ही है. इस बार हुनर हाट में स्टाल लगाने वाले शिल्पकारों से बातचीत, योजना की कुछ और ही तस्वीर बयान करती है.

हुनर हाट: क्या है हकीक़त?

भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे उस्ताद योजना के तहत हुनर हाट को हर साल देश के बड़े शहरों में आयोजित किया जाता है. वहां जा कर, पूरा दिल्ली हाट घूम कर हम ने देखा की वहां शिल्पकारों और दस्तकारों के करीब 100 या 120 के आस पास ही स्टाल्स लगे हुए हैं. यह देख कर सब से पहला सवाल तो यही उठता है की देश भर में क्या सिर्फ 120 ही दस्तकार हैं?

हर बार की तरह इस बार भी हुनर हाट में देश के बहुसंख्यक राज्यों से शिल्पकार और दस्तकार मौजूद थे. दिल्ली, राजस्थान, जम्मू और कश्मीर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, नागालैंड, मणिपुर, झारखण्ड, और भी अन्य राज्य. हां लेकिन इस बार दक्षिण भारत के राज्यों के स्टाल नहीं लगे थे, जो की हर बार लगा करते थे. केरल, तमिलनाडु और कर्णाटक जैसे राज्यों के स्टाल्स इस बार हुनर हाट में नहीं दिखाई दिए.

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इस से पहले हुनर हाट में स्टाल्स की संख्या काफी बड़ी होती थी, लेकिन इस बार बहुत ही कम स्टाल्स देखने को मिले. शायद यही वजह है की अक्सर इंडिया गेट के राजपथ और कई बार प्रगति मैदान में लगने वाला हुनर हाट इस बार पीतमपुरा के छोटे से दिल्ली हाट में लगा. लेकिन इस की वजह कोविड के कारण लगाया जाने वाला लौकडाउन था जिस की वजह से जीवन भर अपनी कला को बेच कर अपना गुजारा करने वाले दूर दराज के शिल्पकारों को अपना परम्परागत काम छोड़ अन्य काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

बातचीत के दौरान हमारी बात मोनिका देवी जी से हुई. मोनिका झारखण्ड से हैं और कपड़ों के सुन्दर फूल बनाती हैं. इस के साथ साथ बैम्बू (बांस) पर भी वो कलाकारी करती हैं. केन एंड बैम्बू प्रोडक्ट्स के नाम से उन की स्टाल है. इस स्टाल का कोई भी शुल्क नहीं भरना होता. यह सरकार की तरफ से निःशुल्क है. उन्होंने बताया की उन के साथ  इस काम के लिए करीब 10 और परिवार जुड़े हुए हैं. परन्तु उन सब की तरफ से मोनिका जी यहां अकेले अपने छोटे बच्चे के संग आईं हैं. वे यहां पर सिर्फ अपना सामान बेचने आईं हैं. लेकिन खाली पड़े हुनर हाट में उन की यह उम्मीद अधूरी ही है.

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उन्होंने बात ही बात में बताया कि इस बार का हुनर हाट उन के जीवन का पहला हाट है, इस के बाद वें कभी इस तरह के आयोजन का हिस्सा नहीं बनेंगी. मोनिका जी ने बताया की एक तो पहले से ही उन की और उन के साथ काम करने वाले परिवारों की हालत बेहद खस्ता है, और लॉकडाउन के बाद गांव में सभी के आर्थिक हालात बहुत ही दयनीय हो चुकी है.

उन्होंने बताया कि दिल्ली में इस हाट में आने के लिए उन के पास किसी बड़े बाबू का कॉल आया था, और उन्हें यह भी बोला था कि दिल्ली में जाने के बाद जितना भी खर्चा होगा, वहां से वापिस आने पर वो सब वापिस मिल जाएगा. लेकिन सवाल तो यह था की दिल्ली जाने के लिए शुरूआती खर्चा तो खुद की जेब से ही देना था. आखिर वो कहां से आता. तो मोनिका जी ने अपने साथ काम करने वाले 10 परिवारों से पैसे उधार लिए, ताकि वो यहां आ कर अपना क्राफ्ट बेच सकें.

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इस हाट की शुरुआत से मोनिका जी ने सिर्फ 1500-2000 रूपए की कमाई की है. आलतू फालतू के खर्चे से बचने के लिए मोनिका जी रात 10 बजे (हाट के बंद होने का समय) के बाद अपने छोटे बच्चे के संग अपने स्टाल में ही रात गुजारती है. खाना खाने के लिए दिल्ली हाट के बाहर रस्ते के कोने की तरफ एक कुलचे वाला रेडी लगाता है, वो अपने बच्चे के संग वही जाती है. क्योंकि हुनर हाट के अन्दर मिलने वाला खाना बेहद महंगा है जो शायद मोनिका जी अफोर्ड नहीं कर सकती हैं. बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजर कर मोनिका जी बस किसी तरह से आखरी के कुछ दिन और काट लेना चाहती है.

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ये तो थी मोनिका जी की कहानी. लेकिन हुनर हाट में सब की हालत मोनिका जी जैसी नहीं हैं. हाट में अन्य शिल्पकारों से जब हम ने बात कि तो हम ने पाया की मामला कुछ और ही है. हम ने बात की उत्तर प्रदेश, मोरादाबाद से आने वाले रहमत अली से. ब्रास पेंटिंग एंड वाल हैंगिंग के नाम से इन की स्टाल है. रहमत पीतल पर काम करने वाले शिल्पकार हैं और जब से हुनर हाट की शुरुआत हुई है तब से ही वें अपना स्टाल हर साल और हर बड़े शहर में लगाते हैं.

बातचीत के दौरान रहमत ने बताया की उन की इस शिल्पकारी के पीछे कुल 25-30 परिवार जुड़े हुए है, जो की उन के लिए काम करते हैं. उन्होंने बताया की उन के पिता पहले के जमाने में खुद ही इस शिल्पकारी का काम किया करते थे लेकिन समय के साथ साथ रहमत ने अपने पिता जी का काम खुद संभाल लिया और अपने नीचे बाकि लोगों को जोड़ कर उन से काम करवाने लगे. रहमत ने बताया की उन्हें इस काम से और हुनर हाट के ऐसे आयोजनों से अच्छा ख़ासा मुनाफा हो जाता है. उन्होंने बताया की पिछले साल इंडिया गेट पर लगने वाले हुनर हाट में उन्होंने इतना पैसा कमा लिया था कि लॉकडाउन के इतने कठिन दिनों में उन्हें किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.

मुजीबुर रहमान, 22 साल के युवा हैं. मणिपुर के इम्फाल में रहते हैं. मणिपुर ट्रेडिशनल ड्रेसेस के नाम से उन की स्टाल है. उन का परिवार कपड़े पर पुरानी ट्रेडिशनल मशीनों के द्वारा मणिपुरी प्रिंट में छपाई करता है. मुजीबुर कई साल पहले ही दिल्ली में पढ़ाई के उद्देश्य से आ चुके थे. अभी वो दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज में पढाई करते हैं और इस के कभी फुल टाइम तो कभी पार्ट टाइम काम कर गुजारा करते हैं.

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उन्होंने बताया की कपड़े पर मणिपुरी प्रिंट करने का ये काम सिर्फ अकेला उन का परिवार ही करता है. वक्त के साथ साथ इस काम से अब उन के परिवार का भरोसा खत्म होता जा रहा है. क्योंकि उन के उत्पादों की मेकिंग कौस्ट ही इतनी जा जाती है की पूरी तरह से बन कर तैयार होने के बाद उस की कीमत थोड़ी और बढ़ जाती है. उन के स्टाल पर सब से कम कीमत की चीज फदी (गमछा) है जिस की कीमत सिर्फ 150 से शुरू है. और सब से ज्यादा कीमत फने (मणिपुर में त्यौहार में पहने जाने वाला वस्त्र) का है जिस की कीमत 4000 रूपए तक है.

हुनर हाट में ज्यादातर स्टाल लगाने वाले लोग मालिक ही है. बेशक से वो अपने आप को शिल्पकार कहते हो, कारीगर कहते हो, लेकिन सच्चाई तो यही है की उन्होंने अपने नीचे कई लोगों को काम पर रखा है. वो असली कारीगर और शिल्पकार इन के लिए काम करते हैं और कलाकार का दर्जा इन लोगों को मिल जाता है जो सिर्फ मालिक है. असली शिल्पकार न तो हमारे सामने आ पाते हैं और न ही उन की मेहनत का सही दाम उन्हें मिल पाता है.

वहां मौजूद कुछ स्टाल्स तो हम ने ऐसे भी देखें जिस में जिस के नाम से स्टाल आल्लोट किया गया है वह वहां मौजूद ही नही है, बल्कि स्टाल पर खड़े हो कर सामान बेचने के लिए 2 मजदूरों को और रखा हुआ है.

शिल्पकारों और दस्तकारो की स्थिति बेहद ख़राब

यदि हम भारत में सब से ज्यादा परेशान हालत में रहने वाले लोगों के बारे में विचार करेंगे तो शिल्पकारों और दस्तकारों का नाम उन में हमेशा से शामिल रहेगा. यह साफ़ कर देना जरुरी है की यहां पर किसी क्राफ्ट कंपनी की बात नहीं हो रही है बल्कि असली शिल्पकारो की हो बात हो रही है, जो खुद अपने हाथों से उत्पादों का निर्माण करता है. अगर आप किसी कंपनी की बात करेंगे तो जरुर आप को उन का मुनाफा होता हुआ नजर आ जाएगा, लेकिन जब व्यक्तिगत शिल्पकारों की बात होगी तो उन की हालत हमेशा से ही ख़राब ही रही है.

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2017 में वस्त्र राज्य मंत्री अजय टम्टा ने एसोचैम के एक इवेंट में कहा कि ‘भारतीय कपड़ा और हस्तशिल्प उद्योग कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार जनरेटर है’. इस से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पुरे भारत में 7 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं, जिस में बड़ी संख्या में महिलाएं और समाज के कमजोर वर्ग के लोग शामिल हैं. ये उद्योग सामान्य रूप से ग्रामीण समुदायों और विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत हैं.

बेशक से सरकार ने शिल्पकारों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए हुनर हाट जैसी व्यवस्था का आयोजन करवा दिया है, लेकिन क्या सच में हुनरमंद लोग इस व्यवस्था का फायदा वें उठा पा रहे हैं? हुनर हाट में मौजूद कुछ लोगों को यदि छोड़ दिया जाए (मोनिका जी और मुजीबुर रहमान जी) तो बहुसंख्यक लोगों को देख कर ये कही से नहीं लगता है की वें देश की महिला शिल्पकारों तक और कमजोर वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों. वहां मौजूद ज्यादातर स्टाल वाले मालिक हैं जिन्होंने सिर्फ पैसा लगाने का काम किया है और मालिक तो कोई भी हो सकता है, चाहे किसी को शिल्पकारी आती हो चाहे न आती हो.

सिर्फ यही नहीं हुनर हाट इन्ही कुछ कारणों की वजह से भारत के शहरी इलाकों में रहने वाले मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग का अड्डा बन कर रह गया है. अब जाहिर सी बात है हुनर हाट में मिलने वाले सामान, जिन की कीमत उत्पाद की तुलना में ज्यादा ही होती है, ऐसे में वो सब कौन खरीद ही पाएगा. आम लोग जो की मजदुर वर्ग या फिर निम्न मध्यम वर्ग का होगा वो तो सिर्फ घुमने के उद्देश्य से ही वहां जा पाएगा. न की कोई सामान खरीदने के उद्देश्य से.

ठीक ऐसा ही हाल हमें खान पान की जगह पर भी देखने को मिली. अगर पूरी जगह में सब से सस्ता कुछ खाने के लिए था तो वो बस एक समोसा. जो की सिर्फ एक स्टाल पर मिल रहा था और उस की कीमत भी 30 रूपए थी. कुल्हड़ वाली स्पेशल चाय 60 रूपए की. और नार्मल वाली चाय 50 की. अब भला कोई नार्मल सी चाय के लिए 50 रूपए क्यों देना चाहेगा. और कही पर भी कोई भी ट्रेडिशनल खान पान, या फिर विभिन्न राज्यों के प्रसिद्ध खान पान दिखाई नहीं दिए. सिर्फ बिरयानी, कोरमा, पनीर, नान, चाय, चाऊमीन, स्प्रिंग रोल इत्यादि जो आम जगहों पर भी मिल ही जाया करती है वही सब ही यहां भी मिल रहा था. जिन की कीमत ऐसी की जिन्हें कुछ लोग ही अफ्फोर्ड कर पाए.

इन शोर्ट अगर हुनर हाट की अब बात की जाए तो कही से भी हुनर हाट हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. न तो सरकार के इस आयोजन से समाज के बहुसंख्यक हिस्से को कोई लाभ मिल रहा है और न ही ये समाज में आम लोगों के दिमाग में शिल्पकार की कला को बसा पा रहा है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले वें लोग जो खुद का और अपने परिवार का पेट भरने के लिए एक तरफ तो खेती करते हैं और दूसरी तरफ कुछ पैसे हाथ में आ सके इसीलिए अपनी कला को लोगों के बीच बेचते हैं, वें अपनी चीजो का दाम कभी भी इतना नहीं रखेंगे की कोई उन्हें खरीद ही न सके. अगर ऐसे लोगों को हुनर हाट अपने पास जगह देता तो शायद समाज के बहुसंख्यक हिस्से को न सिर्फ अपना सामान बेच पाते बल्कि कीमत कम होने पर बहुसंख्यक लोग उन के द्वारा बनाया हुआ सामान खरीद भी पाते.

Serial Story: सोच- पार्ट 3

मैं तुरंत तैयार हो कर उन के साथ चल दी. मानसी दर्द से छटपटा रही थी और मिसेज सान्याल उसे धीरज बंधाती जा रही थीं. कभी उस की टांगें दबातीं तो कभी माथे पर छलक आए पसीने को पोंछतीं, उस का हौसला बढ़ातीं.

कुछ ही देर में मानसी को लेबररूम में भेज दिया गया तो मिसेज सान्याल की निगाहें दरवाजे पर ही अटकी थीं. वह लेबररूम में आनेजाने वाले हर डाक्टर, हर नर्स से मानसी के बारे में पूछतीं. मिसेज सान्याल मुझे बेहद असहाय दिख रही थीं.

मानसी ने बेटी को जन्म दिया. सब कुछ ठीकठाक रहा तो मैं घर चली आई पर पहली बार कुछ चुभन सी महसूस हुई. खालीपन का अहसास हुआ था. अविनाश दफ्तर चले गए थे. रिटायरमेंट के बाद उन्हें दोबारा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी. मेरा मन कहीं भी नहीं लगता था. घर बैठती तो कमरे के भीतर भांयभांय करती दीवारें, बाहर का पसरा हुआ सन्नाटा चैन कहां लेने देता था. तबीयत गिरीगिरी सी रहने लगी. स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया. मन में हूक सी उठती कि मिसेज सान्याल की तरह मुझे भी तो यही सुख मिला था. संस्कारी बेटा, आज्ञाकारी बहू. मैं ने ही अपने हाथों से सबकुछ गंवा दिया.

डाक्टर ने मुझे पूरी तरह आराम की सलाह दी थी. राहुल और राधिका मुझे कई डाक्टरों के पास ले गए. कई तरह के टेस्ट हुए पर जब तक रोग का पता नहीं चलता तो इलाज कैसे संभव होता? बच्चों के घर आ जाने से अविनाश भी निश्ंिचत हो गए थे.

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राधिका ने दफ्तर से छुट्टी ले ली थी. चौके की पूरी बागडोर अब बहू के हाथ में थी. सप्ताह भर का मेन्यू उस ने तैयार कर लिया था. केवल अपनी स्वीकृति की मुहर मुझे लगानी पड़ती थी. मैं यह देख कर हैरान थी कि शादी के बाद राधिका कभी भी मेरे साथ नहीं रही फिर भी उसे इस घर के हर सदस्य की पसंद, नापसंद का ध्यान रहता था.

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राहुल दफ्तर जाता जरूर था लेकिन जल्दी ही वापस लौट आता था.

शुभम अपनी तोतली आवाज से मेरा मन लगाए रखता था. घर में हर तरफ रौनक थी. रस्सियों पर छोटेछोटे, रंगबिरंगे कपड़े सूखते थे. रसोई से मसाले की सुगंध आती थी. अविनाश और मैं उन पकवानों का स्वाद चखते थे जिन्हें बरसों पहले मैं खाना तो क्या पकाना तक भूल चुकी थी.

कुछ समय बाद मैं पूरी तरह से स्वस्थ हो गई. मिसेज सान्याल हर शाम मुझ से मिलने आती थीं. कई बार तो बहू के साथ ही आ जाती थीं. अब उन पर, नन्ही लक्ष्मी को भी पालने का अतिरिक्त कार्यभार आ गया था. वह पहले से काफी दुबली हो गई थीं, लेकिन शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ दिखती थीं.

एक शाम श्रीमती सान्याल अकेली ही आईं तो मैं ने कुरेदा, ‘अब तक घर- गृहस्थी संभालती थीं, अब बच्ची की परवरिश भी करोगी?’

‘संबंधों का माधुर्य दैनिक दिनचर्या की बातों में ही निहित होता है. घरपरिवार को सुचारु रूप से चलाने में ही तो एक औरत के जीवन की सार्थकता है,’ उन्होंने स्वाभाविक सरलता से कहा फिर शुभम के साथ खेलने लगीं.

राधिका पलंगों की चादरें बदल रही थी. सुबह बाई की मदद से उस ने पालक, मेथी काट कर, मटर छील कर, छोटेछोटे पौली बैग में भर दिए थे. प्याज, टमाटर का मसाला भून कर फ्रिज में रख दिया था. अगली सुबह वे दोनों वापस अपने घर लौट रहे थे.

इस एक माह के अंदर मैं ने खुद में आश्चर्यजनक बदलाव महसूस किया था. अपनेआप में एक प्रकार की अतिरिक्त ऊर्जा महसूस होती थी. तनावमुक्ति, संतोष, विश्राम और घरपरिवार के प्रति निष्ठावान बहू की सेवा ने मेरे अंदर क्रांतिकारी बदलाव ला दिया था.

‘मिसेज सान्याल मुझे समझा रही थीं, ‘देखो, हर तरफ शोर, उल्लास, नोकझोंक, गिलेशिकवे, प्यारसम्मान से दिनरात की अवधि छोटी हो जाती है. 4 बरतन जहां होते हैं, खटकते ही हैं पर इन सब से रौनक भी तो रहती है. अवसाद पास नहीं फटकता, मन रमा रहता है.’

पहली बार मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरी सोच बदल गई है और अब श्रीमती सान्याल की सोच से मिल रही है. सच तो यह था कि मुझे अपने बच्चों से न कोई गिला था न शिकवा, न बैर न दुराव. बस, एक दूरी थी जिसे मैं ने खुद स्थापित किया था.

आज बहू के प्रति मेरे चेहरे पर कृतज्ञता और आदर के भाव उभर आए हैं. हम दोनों के बीच स्थित दूरी कहीं एक खाई का रूप न ले ले. इस विचार से मैं अतीत के उभर आए विचारों को झटक उठ कर खड़ी हो गई. कुछ पाने के लिए अहम का त्याग करना पड़ता है. अधिकार और जिम्मेदारियां एक साथ ही चलती हैं, यह पहली बार जान पाई थी मैं.

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राहुल और राधिका कार में सामान रख रहे थे. शुभम का स्वर, अनुगूंज, अंतस में और शोर मचाने लगा. राहुल, पत्नी के साथ मुझ से विदा लेने आया तो मेरा स्वर भीग गया. कदम लड़खड़ाने लगे. राधिका ने पकड़ कर मुझे सहारा दिया और पलंग पर लिटा दिया फिर मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘क्या हुआ मां?’’

‘‘मैं तुम लोगों को कहीं जाने नहीं दूंगी,’’ और बेटे का हाथ पकड़ कर मैं रो पड़ी.

‘‘पर मां…’’

‘‘कुछ कहने की जरूरत नहीं है. हम सब अब साथ ही रहेंगे.’’

मेरे बेटे और बहू को जैसे जीवन की अमूल्य निधि मिल गई और अविनाश को जीवन का सब से बड़ा सुख. मैं ने अपने हृदय के इर्दगिर्द उगे खरपतवार को समूल उखाड़ कर फेंक दिया था. शक, भय आशंका के बादल छंट चुके थे. बच्चों को अपने प्रति मेरे मनोभाव का पता चल गया था. सच, कुछ स्थानों पर जब अंतर्मन के भावों का मूक संप्रेषण मुखर हो उठता है तो शब्द मूल्यहीन हो जाते हैं.

‘मैडम चीफ मिनिस्टर” का ट्रेलर रिलीज होते ही यूजर्स ने किया Richa Chadda को ट्रोल

रिचा चड्ढा हवा में है.अभी दो दिन पहले ही उनकी 22 जनवरी को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ का पोस्टर वायरल हुआ था, जिसके वायरल होते ही सोशल मीडिया पर रिचा छा गई थी. जब खुद ऋचा चड्ढा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फिल्म ‘ मैडम चीफ मिनिस्टर ‘ का पोस्टर साझा किया, तो लोगों ने जमकर उनकी आलोचना की.  कुछ लोगों ने दिल्ली प्रेस की अंग्रेजी भाषा की पत्रिका ‘ कारवां’  के उस अंक के मुख्य पृष्ठ को भी साझा किया, जिसमें उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर कवर स्टोरी छपी थी. वास्तव में इस पोस्टर में रिचा चड्डा हाथ में झाड़ू लेकर खड़ी नजर आती है और उस पर लिखा हुआ था “अछूत”.

सोशल मीडिया में इसी बात की जमकर आलोचना हुई. लोगों किराए में यह एक महिला और एक महान नेता का अपमान है .तभी लोगों ने सोशल मीडिया पर कारवां पत्रिका का मुख्य पृष्ठ साझा करते हुए लिखा कि मायावती को सही अर्थों में “कारवां”पत्रिका में जगह दी गई थी.

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सुभाष कपूर लिखित और निर्देशित राजनीतिक फिल्म ‘ मैडम चीफ मिनिस्टर’ में मुख्यमंत्री की भूमिका में ऋचा चड्ढा है. इसके अलावा सौरभ शुक्ला ,मानव कौल , अक्षय ओबेरौय और शुभ्राज्योति जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के अहम किरदार हैं. इसमें रिचा चड्ढा एक अति शक्तिशाली और प्रतिष्ठित नारी के रूप में तथा राजनेता के रूप में नजर आने वाली हैं. चर्चाएं गर्म है कि यह फिल्म  उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर आधारित है. यूं तो निर्माताओं और निर्देशक ने इसे एक काल्पनिक कथानक बताया है. पर यह फिल्म उत्तर प्रदेश की ही राजनीतिक पृष्ठभूमि पर उत्तर प्रदेश में ही फिल्माई गई हैं. यह फिल्म राजनीति के क्षेत्र में एक युवा महिला की अति संघर्षपूर्ण यात्रा, विकास की यात्रा की ऐसी कहानी है, जो अब तक सिनेमा के पर्दे पर नहीं आई है. अब इसका ट्रेलर भी वायरल हो चुका है.

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ट्रेलर यहां देखिए:

फिल्म के ट्रेलर में रिचा चड्ढा के दो लुक सामने आते हैं. एक लुक में वह लंबे बाल व साड़ी पहने तो दूसरे लुक में बाल कटे हुए यानी कि बाब कट में नजर आती है. ट्रेलर देखकर जो कहानी समझ में आती है वह पूरी तरह से यह है कि एक लड़की अपने घर से भाग कर आई थी और उन्हें मास्टर जी ने शरण दी थी. मास्टर जी की ही शिक्षा और सलाह के आधार पर आगे बढ़ती हैं और एक दिन मुख्यमंत्री बनती हैं.

ट्रेलर  में एक संवाद है – जब मैडम अपने गुरु से  यानी कि मास्टर जी (सौरभ शुक्ला) से कहती हैं -“अछूत को  मंदिर में प्रवेश कराना गलत है ?लड़कियों को साइकिल पर बताना गलत है?… मगर मेरे इस काम से पार्टी मजबूत हो रही है. “ट्रेलर का समापन रिचा चड्ढा के इस संवाद से होती है-” मगर मैं बचपन से  जिद्दी हूं. बचपन से अक्खड़  हूं .कोई कितने भी सितम कर ले. मुझे कितने ही बलिदान देने पड़े.तुम्हारी आवाज उठाने से ,तुम्हारी सेवा करने से ,दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती…” यह संवाद अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है.

फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ राजनीति, विश्वास, धोखा, प्रतिशोध, लायल्टी, सत्ता की ताकत, सत्ता की भूख, सत्ता को हथियाने की साजिशों से परिपूर्ण है.

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फिल्म डायरेक्टर अली अब्बास जफर ने बेगम अलीसिया जफर संग शेयर की रोमांटिक फोटो      

बौलीवुड के मशहूर डायरेक्टर अली अब्बास जफर (Ali Abbas Zafar)  ने 4 जनवरी यानि सोमवार को अलीसिया जफर (Alicia Zafar)  के साथ निकाह कर लिया है. ये कपल इन दिनों सुर्खियों में छाये हुए हैं.

आखिर कौन हैं अलीसिया जफर, जिससे अली अब्बास जफर ने किया निकाह

अलीसिया जफर फ्रांस की रहने वाली हैं. अली ने सोशल मीडिया पर दो फोटो शेयर की. एक फोटो में वह अपनी बेगम का हाथ थामे हुए हैं. और दूसरे फोटो में उन्होंने साथ में रोमांटिक पोज दिया है,जिसके बाद उनके शादी की खबरे आने लगी.

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अली ने बताया कि जैसी ही उनकी पत्नी अलीसिया का वीजा अप्रूव हुआ, वैसे ही वह देहरादून पहुंचे और उन्होंने शादी की. उन्होंने अपने काम को लेकर बताया कि आने वाले साल में फिल्म निर्देशक अली काफी व्यस्त रहने वाले हैं. तो ऐसे में बिना देरी किए उन्होंने निकाह किया.

 

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आपको बता दें कि हाल ही में अली अब्बास जफर ने अलीसिया संग रिलेशनशिप पर खुलकर बात की. वर्कफ्रंट की बात करे तो अली अब्बास जल्द ही कैटरीना कैफ के साथ सुपरहीरो ड्रामा फिल्म का निर्देशन करने जा रहे हैं. इसके अलावा वह सलमान खान और कैटरीना कैफ स्टारिंग फिल्म ‘टाइगर 3’ का भी निर्देशन करेंगे.

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मुरादनगर श्मशान घाट हादसा: भ्रष्टाचार पर जीरो टौलरैंस की अंत्येष्टि

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ईटैंडरिंग योजना पर अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि ठेके देने की पारदर्शी व्यवस्था बन सकेगी, जिससे भ्रष्टाचार खत्म होगा, पर सरकार के दूसरे तमाम दावों की तरह यह दावा भी खोखला निकला. मुरादनगर हादसा ‘श्मशान में दलाली’ का सबसे बड़ा सुबूत है. यह योगी सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टौलरैंस नीति के सच को भी सब के सामने ला रहा है. भ्रष्टाचार करने वालों ने श्मशान की दीवारों पर तमाम ‘सूक्ति वाक्य’ लिखवाए जरूर थे, पर उन पर खुद अमल नहीं किया.

साल 2017 में जब उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उन की सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टौलरैंस की नीति पर काम करेगी. पर भ्रष्टाचार कहीं भी कम नहीं हुआ, उलटे जब लोगों ने भ्रष्टाचार की शिकायत की तो उनकी बात सुनी नहीं गई. जिसने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की उसके ही खिलाफ सरकार ने मुकदमे तक कायम करा दिए. सरकारी स्कूल में मिड डे मील घोटाले और लापरवाही की शिकायत करने पर मिर्जापुर जिले में पत्रकार के खिलाफ मुकदमा कायम कर के जेल भेज दिया गया.

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नगरनिगम में आयुक्त और मेयर के बीच का विवाद भी भ्रष्टाचार के ही चलते था. मेयर की शिकायत के बाद आयुक्त का तबादला किया गया था. सरकार इन मामलों को गंभीरता से नहीं ले रही थी.

गाजियाबाद के मुरादनगर में श्मशान घाट के 70 फुट लंबे गलियारे की एक महीने पहले बनी छत (लिंटर) पहली ही बारिश में गिरी तो उस के नीचे 25 आदमी दब कर मर गए और 15 घायल हुए.

एक कहावत है कि ‘गंदगी को कितना भी दबाने की कोशिश कीजिए वह बाहर आ ही जाती है’. मुरादनगर श्मशान घाट हादसे में भी यही हुआ. इस हादसे ने योगी सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टौलरैंस नीति का खुलासा कर दिया. सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि सरकार बनने के 3 साल बाद भी भ्रष्टाचार खत्म क्यों नहीं हुआ? सरकार अब मरने वालों को 10 लाख रुपए का नकद मुआवजा और रहने के लिए घर देने का दिखावा कर के अपने अपराध को कम करने की कोशिश कर रही है. सरकार के पास अब यह कहने का मौका नहीं है कि उत्तर प्रदेश भ्रष्टाचार मुक्त राज्य है.

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ऐसे मिलता है ठेका

मुरादनगर नगरपालिका के चेयरमैन विकास तेवतिया हैं. मुरादनगर के उखलारसी अंत्येष्टि स्थल के निर्माण का ठेका ठेकेदार अजय त्यागी को दिया गया था. अजय त्यागी को चेयरमैन विकास तेवतिया का करीबी माना जाता है. अजय त्यागी ने जिले के दूसरे अफसरों से भी अच्छे संबंध बनाए हैं. इस के दम पर ही उसे मुरादनगर उखलारसी अंत्येष्टि स्थल के निर्माण ठेके के साथसाथ शहर में दूसरी जगह काम करने का ठेका भी मिला हुआ है.

एक साल पहले उखलारसी अंत्येष्टि स्थल के निर्माण का ठेका 55 लाख रुपए में दिया गया था. इस के निर्माण में 60 लाख रुपए की लागत आई थी. अक्तूबर महीने में अंत्येष्टि स्थल पर बने भवन और गलियारे पर छत (लिंटर) डाली गई थी. दिसंबर महीने में निर्माण का काम पूरा हो गया था. निर्माण के बाद जांच अधिकारी ने भवन की जांच कर के क्वालिटी रिपोर्ट में सभी मानको को दुरुस्त बताया था. क्वालिटी रिपोर्ट सही पाए जाने के बाद भवन को खोल दिया गया था. अभी इस का लोकार्पण नहीं किया गया है.

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3 जनवरी, 2021 को अंत्येष्टि स्थल ढह गया. 60 लाख रुपए का निर्माण जनता के लिए खोले जाने के बाद 15 दिन में ही ढह गया. मंडलायुक्त अनीता मेश्राम के निर्देश पर मुरादनगर नगरपालिका की अधिशासी अधिकारी निहारिका चौहान, ठेकेदार अजय त्यागी, जेई सीपी सिंह, सुपरवाइजर आशीष के खिलाफ गैरइरादतन हत्या, भ्रष्टाचार और लापरवाही का मुकदमा आईपीसी 1860 की धारा 304, 337, 338, 427 और 409 के तहत अपराध संख्या 0006 में कायम किया गया.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका के तहत मुकदमा कायम करने का आदेश दिया गया है. सरकार ने लिखापढ़ी में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमा कायम कराया, पर जिन लोगों के इशारे पर ठेके दिए जाते हैं, उन के खिलाफ कुछ भी नहीं किया गया.

शोकसभा में हुआ हादसा

मुरादनगर के बंबारोड संगम विहार के बाशिंदे 70 साल के जयराम की मौत रविवार, 3 जनवरी, 2021 को हो गई थी. जयराम के बेटे दीपक ने गाजियाबाद के मुरादनगर थाने मे दी गई अपनी तहरीर में बताया कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार करने उखलारसी अंत्येष्टि स्थल आया था. साथ में गांवमहल्ले के कुछ लोग और रिश्तेदार भी थे. इन में से कुछ लोग बरसात से बचने के लिए श्मशान घाट में नए बने भवन के नीचे खड़े थे. वहीं पर शोक सभा होने लगी थी.

दोपहर के तकरीबन 12 बजे थे. इसी बीच बरसात के चलते वहां बना लिंटर भरभरा कर गिर गया, जिस में कई लोगों की मौत हो गई और बहुत से लोग घायल हो गए. कई वाहन भी इस मलबे में दब गए. दीपक ने पुलिस से जांच करने और इंसाफ दिलाने की मांग की.

घटिया निर्माण पहले भी होता रहा है, पर यह पहली बार हुआ है जब नई बनी इमारत एक महीने में ही ढह गई और उस के नीचे आ कर 25 लोगों की मौत हो गई. मुरादनगर श्मशान घाट पर जब यह निर्माण हो रहा था, उसी समय घटिया निर्माण की शिकायत की गई थी. पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष रेखा अरोड़ा के पति समाजसेवी राधे अरोड़ा और सभासद दिनेश कुमार शर्मा ने नगरपालिका के अधिकारियों को निर्माण कार्य में घटिया सामान इस्तेमाल किए जाने की शिकायत की थी.

ठेकेदार अजय त्यागी को राजनीतिक सिफारिश के बाद ठेका मिला था. इस वजह से नगरपालिका के अफसर घटिया निर्माण की शिकायत के बाद भी खामोश रहे.

दलाली की जांच

मुरादनगर श्मशान घाट हादसे में घटिया निर्माण की जांच का काम भी वहीं के अफसरों को दिया गया है, जिससे साफ है कि मामले में कोई फंसेगा नहीं. कुछ दिन बाद मामला निपटा दिया जाएगा. सरकार ने अपना दामन बचाने के लिए कड़े कदम उठाने का दावा करते हुए इस घटना के जिम्मेदार छोटे कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा कायम करने, रासुका लगाने और सरकारी पैसे को उन से वसूलने का बड़ा वादा किया है, पर इस के बाद भी भ्रष्टाचार खत्म होगा, यह नहीं कहा जा सकता. जब तक ठेकों में राजनीतिक दखलअंदाजी नहीं बंद होगी, तब तक यह सब चलता रहेगा. सरकारी कर्मचारियों को मोहरा बना कर नेता मोटी कमाई करते रहेंगे.

श्मशान घाट हादसे में घटिया निर्माण की जांच के लिए जिले के डीएम अजय शकर पांडेय ने जीडीए और पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर की अध्यक्षता में जांच कमेटी का गठन किया है. जांच के 2 बिंदु हैं कि क्या निर्माण के सामान की क्वालिटी घटिया थी और जब इस बात की शिकायत मिली थी, तब उस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया.

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वैसे, सरकार की तरफ से अब बड़ेबड़े दावे किए जा रहे हैं कि कोई भी जिम्मेदार बचने नहीं पाएगा. सांसद और केंद्रीय मंत्री रिटायर्ड जनरल वीके सिंह ने कहा कि जांच में किसी को बचाया नहीं जा सकेगा. कमिश्नर और एडीजी स्तर के अधिकारी जांच कर रहे हैं.

आम आदमी पार्टी के सांसद और उत्तर प्रदेश के प्रभारी संजय सिंह कहते हैं, ‘भाजपा श्मशान में दलाली वाले काम कर रही है. मुरादनगर की घटना ने यह बात साफतौर पर साबित कर दी है. अभी तक भाजपा इस बात को नहीं मान रही थी. वह उत्तर प्रदेश की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों को मानने के लिए तैयार नहीं थी. मुरादनगर की घटना ने सुबूत दे दिया है. केवल कर्मचारियों की नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए.’

Bigg Boss 14- क्या शो में शादी करेंगे जैस्मिन भसीन और अली गोनी?

बिग बौस 14 (Bigg Boss14) विकेंड का वार में इस हफ्ते 4 स्ट्रौग कंटेस्टेंट में कौन घर से बेघर होता है. ये देखना काफी दिलचस्प होने वाला है. जी हां, इस हफ्ते घर से बाहर होने के लिए लिए रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik), जैस्मिन भसीन (Jasmin Bhasin), अली गोनी (Aly Goni)  और अभिनव शुक्ला (Abhinav Shukla) नामिनेट हो चुके हैं.

फैंस को इस विकेंड वार का बेसब्री से इंतजार है. अब तो शो के विकेंड वार में ही पता चलेगा कि कौन घर से बेघर होता है. तो इसी बीच शो में ये दिखाया गया कि रुबीना दिलाइक ने अली और जैस्मिन की जमकर खींचाई की है.

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बता दें कि हाल ही में रुबीना दिलाइक ने यह कहा कि अली और जैस्मिन भसीन, दोनों शादी के लिए हां कर देंगे तो वो शो में लम्बा जाएंगे.

 

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दरअसल जैस्मिन भसीन ने घर के सदस्यों से अपने मन की बात कही थी. जैस्मिन भसीन ने कहा था कि मुझे कुछ कुछ होता है, जब वो कुछ कहता है या उसकी आंखों को देखकर… जैस्मिन की इसी बात को सुनकर रुबीना ने कहा, ‘आज सुबह बोल रही थी, अब तो 6 महीने भी एक्सटेंड हो जाए तो चलेगा. मैंने कहा क्यों भाई, घर बसाना है.

अभी इसका शादी करने का प्लान है, पहले इसने अपने प्यार का इजहार कर दिया कि मैं प्यार करती हूं और अभी 2-3 दिन से बेबी बेबी बोल रही है… तेरा अली बाबा का अली बेबी कर दिया है इसने.

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रुबीना दिलाइक ने ये भी कहा कि और कुछ हो ना हो…तुम लोगों को जरूर एक्टेंशन करने वाले है. जब तक तुम लोग शादी के लिए हां ना करो. इस शो की टीआरपी के लिए क्या मेकर्स ये फैसला ले सकते हैं. अब तो ये शो के अपकमिंग एपिसोड में ही पता चलेगा कि रुबीना दिलाइक की बातें सही साबित होती है या नहीं.

Serial Story: चिंता- पार्ट 2

‘छि:, बहुत हो गया. यह घर रोजरोज नरक बनता जा रहा है. न सुख है और न शांति.’ चिढ़ता हुआ संपत बाहर चला गया. पद्मजा रोतीबिलखती बिस्तर पर लेट गई.

पद्मजा रोज की तरह उस दिन भी  बाजार गई और वह सब्जी खरीद रही थी कि सामने एक ऐसा नजारा दिखाई पड़ा कि वह फौरन पीछे मुड़ी और बिना कुछ खरीदे ही घर लौट आई.

संपत स्कूटर पर कहीं जा रहा था और पीछे कोई खूबसूरत लड़की बैठी थी. दोनों अपनी दुनिया में मस्त थे. आपस में बातें करते हुए, हंसते हुए लोटपोट हो रहे थे. बस, इसी दृश्य ने पद्मजा को उत्तेजित, पागल और बेचैन कर दिया.

आते ही पद्मजा ने प्लास्टिक की थैली एक कोने में फेंक दी और सीधा रसोईघर में घुस गई. अलमारी से किरोसिन का डब्बा उठा कर उस ने अपने शरीर पर सारा तेल उड़ेल दिया. बस, अब तीली जला कर आत्महत्या करने ही वाली थी कि बाहर स्कूटर की आवाज सुनाई पड़ी.

पद्मजा का क्रोध मानो सातवें आसमान पर चढ़ गया. उस के मन में ईर्ष्या ने ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया.

‘अब मुझे मर ही जाना चाहिए. जीवन भर उसे 8-8 आंसू बहाते, तड़पतड़प कर रहना चाहिए,’ पद्मजा का दिमाग ऐसे विचारों से भर गया.

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संपत को घर में कदम रखते ही मिट्टी के तेल जैसी किसी चीज के जलने की गंध लग गई. रसोई में झांक कर देखा तो ज्वालाओं से घिरी पद्मजा दिखाई पड़ी. संपत हक्काबक्का रह गया. वह जोश में आ कर रसोई का दरवाजा पीटने लगा और पद्मजा को बारबार पुकार रहा था. अंत में दरवाजा टूट गया. 40 प्रतिशत जली पद्मजा अस्पताल में भरती कराई गई. फिर बड़ी मुश्किल से वह बच पाई. पद्मजा को जब यह पता चला कि उस दिन संपत के स्कूटर के पीछे बैठी नजर आई लड़की कोई और नहीं वह तो संपत के ताऊ की बेटी थी, बस, पद्मजा का मन पश्चात्ताप से भर गया. उसे अपनी गलती महसूस हुई.

पद्मजा में अपने प्रति ग्लानि तब और बढ़ गई जब पति ने इलाज के दौरान जीतोड़ कर सेवा की. उसे बड़ी शरम महसूस हुई और अपनी जल्दबाजी, मूर्खता पर स्वयं को कोसने लगी.

दौड़ती कार के अचानक रुकते ही पद्मजा वर्तमान में आ गई. अतीत के सारे चलचित्र ओझल हो गए.

‘‘गाड़ी क्यों रोकी?’’ उस ने ड्राइवर से पूछा.

‘‘मांजी, यहां एक छोटा होटल है. सोचा, आप थक गई होंगी. प्यास भी लग गई होगी. क्या मैं आप के लिए थोड़ा ठंडा पानी ले आऊं?’’

‘‘नहीं, इस समय मुझे कुछ भी नहीं चाहिए. मुझे फौरन वहां पहुंचना है वरना…’’ इतना कहतेकहते ही पद्मजा का गला भर गया. उस समय केवल समीरा ही उन के दिलोदिमाग पर छाई हुई थी.

पद्मजा पीछे सीट की तरफ झुक गई. खिड़की के शीशे नीचे कर देने से ठंडी हवा के झोंके भीतर आ कर मानो उस की थकावट दूर करते हुए सांत्वना भी दे रहे थे. बस, उस ने अपनी आंखें मूंद लीं.

गाड़ी अचानक ब्रेक के कारण एक झटके के साथ रुकी तो पद्मजा एकदम सामने वाली सीट पर जा गिरी. तभी उस की आंख खुल गई. वह एकदम उछल पड़ी. चारों ओर नजर दौड़ाई. स्थिति सामान्य देख कर वह बोल पड़ी, ‘‘सत्यम, अचानक गाड़ी क्यों रोक दी तूने?’’ पद्मजा ने पूछा.

‘‘आप नींद में चीख उठीं, तो मैं डर गया कि आप के साथ कोई अनहोनी हुई होगी,’’ उस ने अपनी सफाई दी.

कार शहर में पहुंच गई थी और रामनगर महल्ले की तरफ जाने लगी. पद्मजा मन ही मन सोचने लगी कि उस की बिटिया सहीसलामत रहे.

लेकिन, जैसा उस के मन में डर था. पद्मजा ने वहां ऐसा कुछ भी नहीं पाया था. वातावरण एकदम शांत था. गाड़ी के रुकते ही वह दरवाजा खोल कर झट से कूदी और भीतर की तरफ दौड़ पड़ी.

घर के भीतर खामोशी फैली हुई थी. सहमी हुई पद्मजा ने भीतर कदम रखा कि उसे ये बातें सुनाई पड़ीं.

समीरा बोल रही थी. बेटी की आवाज सुन कर पद्मजा के सूखे दिल में मानो शीतल वर्षा हुई.

‘‘आप ने क्यों बचा लिया मुझे? एक पल और बीतता तो मैं फांसी के फंदे में झूल जाती और इस माहौल से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता.’’

‘‘समीरा…’’ यह आवाज पद्मजा के दामाद की थी.

‘‘मैं ने यह बिलकुल नहीं सोचा कि तुम इतनी ‘सेंसिटिव’ हो. अरे, पतिपत्नी के बीच झड़प हो जाती है, झगड़े भी हो जाते हैं. क्या इतनी छोटी सी बात के लिए मर जाएंगे? समीरा, मैं तुम को दिल से चाहता हूं. क्या तुम यह नहीं जानतीं कि मैं बगैर तुम्हारे एक पल भी नहीं रह सकता?’’

‘‘आप जानते हैं कि मुझे शराबियों से सख्त नफरत है. फिर भी आप…’’

‘‘समीरा, मैं शराबी थोड़े ही हूं. तुम्हारा यह सोचना गलत है कि मैं हमेशा पीता रहता हूं लेकिन कभीकभी पार्टियों में दोस्तों का मन रखने के लिए थोड़ा पीता हूं. यह तो सच है कि परसों रात मैं ने थोड़ी सी शराब पी थी लेकिन तुम ने जोश में आ कर भलाबुरा कहा, मेरा मजाक उड़ाया और बेइज्जती की और मैं इसे बरदाश्त नहीं कर सका.

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Serial Story: चिंता- पार्ट 3

‘‘तुम पर अनजाने में हाथ उठाया उस के लिए तुम जो भी सजा दोगी, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं. लेकिन ऐसी सजा तो मत दो, समीरा. इस दुनिया में तुम से बढ़ कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हारी खातिर मैं शराब छोड़ दूंगा. प्रामिस, तुम्हारी कसम, लेकिन बगैर तुम्हारे यह जिंदगी कोई जिंदगी थोड़े ही है.’’

दामाद के स्वर में अपनी बेटी के प्रति जो प्रेम, जो अपनापन था, उसे सुन कर पद्मजा मानो पिघल गईं. उन की आंखें भी भर आईं. वह अपने आप को संभाल ही नहीं सकीं. और तुरंत दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘कौन है?’’ समीरा और शेखर एकसाथ ही बेडरूम से बाहर आ गए.

मां को देखते ही भावुक हो समीरा दूर से ही ‘मां’ कहते हुए दौड़ आई और उन से लिपट गई.

‘‘यह क्या किया बेटी तूने? तेरी चिट्ठी देखते ही मेरी छाती फट गई. मेरी कोख में आग लगाने का खयाल तुझे क्यों आया? यह तूने सोचा कैसे कि बगैर तेरे हम जिएंगे?’’

‘‘माफ करो मम्मी, मैं ने जोश में आ कर वह चिट्ठी लिख दी थी. यह नहीं सोचा कि वह तुम्हें इतना सदमा पहुंचाएगी.’’

शेखर एकदम शर्मिंदा हो गया. उसे अब तक यह नहीं पता था कि समीरा ने अपनी मां को चिट्ठी लिखी है. उस की नजरें अपराधबोध से झुक गईं.

समीरा मां का चेहरा देख कर भांप गई कि उस ने चिट्ठी पढ़ने से ले कर यहां पहुंचने तक कुछ भी नहीं खाया है.

समीरा ने पंखा चलाया फिर मां और ड्राइवर को ठंडा पानी पिलाया. थोड़ी देर बाद वह गरमागरम काफी बना कर ले आई. उसे पीने के बाद मानो पद्मजा की जान में जान आ गई.

वहां से जाने से पहले पद्मजा बेटी को समझातेबुझाते दामाद के बारे में पूछ बैठीं, ‘‘समीरा, शेखर घर पर नहीं है क्या?’’

‘‘हां हैं,’’ समीरा ने जवाब दिया.

पद्मजा ने भांप लिया कि समीरा इस बात के लिए पछता रही है कि उस के कारण शेखर की नाक कट गई और अपनी मां के सामने वह शरम महसूस कर रही है.

‘‘जा, उसे मेरे जाने की बात बता दे,’’ पद्मजा ने बड़े संक्षेप में कहा.

समीरा के भीतर जा कर बताते ही शेखर बाहर आया. भले ही वह पद्मजा की तरफ मुंह कर के खड़ा था, नजरें जमीन में गड़ी हुई थीं.

‘‘शेखर, समीरा की तरफ से मैं माफी मांगती हूं. उसे माफ कर दो.’’ शेखर विस्मित रह गया.

पद्मजा अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोलीं, ‘‘वह शुरू से ऐसी ही है, एकदम मेरे जैसी. वह बहुत भोली है, बिलकुल बच्चों जैसी. उसे यह भी नहीं पता कि जोश में आ कर जो भी फैसला वह करेगी, उस से सिर्फ उस को ही नहीं बल्कि दूसरों को भी दुख होता है.’’

समीरा और शेखर दोनों पद्मजा की बातें सुन कर चौंक पड़े.

‘‘बेटी, तू पूछती थी न, मेरे शरीर पर ये धब्बे क्या हैं? ये घाव के निशान हैं जो जल जाने के कारण हुए. मैं ने तुझे यह कभी नहीं बताया था, ये हुए कैसे? मैं सोचती थी, अगर बता दूं तो मेरे व्यक्तित्व पर कलंक लग जाएगा और मैं तेरी नजर से गिर भी सकती हूं. इसलिए मैं तुझ से झूठ बोलती आई.

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‘‘बेटी, अब मैं पछता रही हूं कि मैं ने यह पहले ही तुझ से क्यों नहीं कहा? लेकिन मुझे यह देर से पता चला कि बड़ों के अनुभव छोटों को पाठ पढ़ाते हैं. शुरू में मेरे भीतर भी आत्महत्या की भावना रहती थी. हर छोटीबड़ी बात के लिए मैं आत्महत्या कर लेने का निर्णय लेती थी. ऐसा सोचने के पीछे मुझे वेदना या विपत्तियों से मुक्ति पा लेने के विचार की तुलना में किसी से बदला लेने या किसी को दुख पहुंचाने की बात ही ज्यादा रहती थी. कालक्रम में मेरा यह भ्रम दूर होता गया और यह पता चला कि जिंदगी कितनी अनमोल है.

शेखर, जो पहली बार अपनी सासूमां की जीवन संबंधी नई बात सुन रहा था विस्मित हो गया. समीरा की भी लगभग यही हालत थी.

पद्मजा आगे बताने लगी.

‘‘दरअसल, मौत किसी भी समस्या का समाधान नहीं. मौत से मतलब, जिंदगी से डर कर भाग जाना, समस्याओं और चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना है. यह तो कायरों के लक्षण हैं. कमजोर दिल वाले ही खुदकुशी की बात सोचते हैं. बेटी, बहादुर लोग जीवन में एक ही बार मरते हैं लेकिन बुजदिल आदमी हर दिन, हर पल मरता रहता है. जिंदगी जीने के लिए है, बेटी, मरने के लिए नहीं. सुखदुख दोनों जीवन के अनिवार्य अंश हैं. जो दोनों को समान मानेगा वही जीवन का आनंद लूट सकेगा. समीरा, यह सब मैं तुझे इसलिए बता रही हूं कि अपनी समस्याओं का समाधान मर कर नहीं जीवित रह कर ढूंढ़ो. जीवन में समस्याओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक है. दोनों ठंडे दिमाग से सोच कर समस्या का समाधान ढूंढ़ो.

‘‘मैं भी जोश में आ कर आत्महत्या कर लेने का प्रयास कई बार कर चुकी हूं. उन में से अगर एक भी प्रयत्न सफल हो जाता तो आज न मुझे इतनी अच्छी जिंदगी मिलती, न इतना योग्य पति मिलता, न हीरेमोती जैसी संतानें मिलतीं. और न इतना अच्छा घर. अपने अनुभव के बल पर कहती हूं बेटी, मेरी बातें समझने की कोशिश करो. मुश्किलें कितनी ही कठिन हों, चुनौतियां कितनी ही गंभीर हों, आप अपने सुनहरे भविष्य को मत भूलें. आश्चर्य की बात यह है कि कभी जो उस समय कष्ट पहुंचाते हैं, वे ही भविष्य में हमारे लिए फायदेमंद होते हैं.’’

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‘‘चलिए, अगर मैं ऐसा ही बोलती रहूंगी तो इस का कोई अंत नहीं होगा. जिंदगी, जिंदगी ही होती है,’’ बेटीदामाद से अलविदा कह कर वह जाने को तैयार हो गई.

पद्मजा के ओझल हो जाने तक वे दोनों उन्हें वहीं खड़ेखडे़ देखते रहे. उन के चले जाने के बाद जिंदगी के बारे में उन्होंने जो कहा, उस का सार उन दोनों के दिलोदिमाग में भर गया.

जैसे हर यात्रा की एक मंजिल होती है उसी तरह हर जिंदगी का भी एक मकसद होता है, एक लक्ष्य रहता है. यात्रा में थोड़ी सी थकावट महसूस होने पर जहां चाहे वहां नहीं उतर जाना चाहिए. मंजिल को पाने  तक हमारी जिंदगी का सफर चलता रहता है.

इस प्रकार समीरा के विचार नया मोड़ लेने लगे. अब तक की मां की वेदना उस की समझ में आ गई जिस ने चारों ओर नया आलोक फैला दिया. अब वह पहले वाली समीरा नहीं. इस समीरा को तो जीवन के मूल्यों का पता चल गया.

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