टीवी इंडस्ट्री की मशहूर एक्ट्रेस लता सभरवाल (Lataa Saberwal) ने कुछ दिन पहले ही एक बड़ा ऐलान कर के अपने फैंस को बड़ा झटका दिया था.
दरअसल एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर फैंस के साथ ये शेयर की थी कि वो टीवी सीरियल्स की दुनिया को अलविदा कह रही हैं. और इसके बाद हर कोई ये जानना चाहता था कि आखिर लता सभरवाल टीवी इंडस्ट्री को क्यों छोड़ रही हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने इस फैसले की सही वजह बताई है. खबरों की मानें तो एक्ट्रेस ने इसकी वजह टीवी सीरियल्स से बोरियत होने को कहा है. लता सभरवाल ने कहा, लॉकडाउन ने हम सभी को एक अलग नजरिया दिया. उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि मेरी प्राथमिकता मेरा 7 वर्षीय बेटा है, और मैं कुछ समाज के लिए भी करना चाहती थी.
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खबरों के अनुसार लता सभरवाल ने कहा, मैं 20 साल की उम्र से ही एक्टर बनना चाहती थी लेकिन मेरा लक्ष्य बदल गया. मैं अपने बेटे को उसकी पढ़ाई में मदद करना चाहती हूं. मैं उन लोगों के लिए वीडियोज बनाना चाहती हूं जो शारीरिक और मानसिक रुप से समर्थ नहीं हैं.
एक्ट्रेस ने कहा कि वह टीवी सीरियल्स से तंग आ चुकी थी. उन्होंने कहा, मैं टीवी शोज से ऊब चुकी थी. जहां हम रोज जाते हैं और कंटेंट बनाते हैं. लेकिन अब अगर ऐसा 5-6 दिनों का कंटेंट है तो ठीक है, नहीं तो मैं बॉलीवुड में काम करना चाहती हूं.
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उन्होंने आगे बताया कि मैं लोगों को अपनी कहानी बताना चाहती हूं. कैसे लखनऊ के एक मीडिल क्लास फैमिली की लड़की जिसका पूरा परिवार पढ़ाई के क्षेत्र में हैं और प्रोफेशनल है, मगर वो एक्ट्रेस बनी. अब मैं कुछ ऐसा करना चाहती हूं जिससे लोगों की जिंदगी पर असर पड़े. उन्होंने अपने पति के बारे में भी बताया कि संजीव मुझे काफी सपोर्ट करते हैं.
टीवी का सबसे विवादित शो ‘बिग बॉस 14’ (Bigg Boss 14) का जल्द ही ग्रैंड फिनाले होने वाला है. तो ऐसे में घर में मौजूद कंटेस्टेंट बिग बॉस 14 की ट्राफी जीतने के लिए पूरी लगन से गेम खेल रहे हैं.
हाल ही में अर्शी खान और बीती रात अभिनव शुक्ला घर से बेघर हो गए. अब घर में रुबीना दिलाइक, अली गोनी, राखी सावंत, राहुल वैद्य, देवोलीना भट्टाचार्जी, निक्की तम्बोली बचे हुए हैं.
फिलहाल शो में रुबीना दिलाइक को सबसे स्ट्रांग कंटेस्टेंट माना जा रहा है. घर में रुबीना और अली के बीच टफ कम्पटीशन चल रहा है.
शो में अली गोनी ने कहा है कि वह रुबीना को अपनी बहन मानते है. बीते एपिसोड में दिखाया गया कि रुबीना और जैस्मिन भसीन के बीच जमकर लड़ाई हुई थी. लेकिन इससे रुबीना और अली को कोई फर्क नहीं पड़ा. और ऐसे में अली ने रूबीना को लेकर एक बड़ी बात कही है.
अली ने कहा है कि रुबीना लाइफ टाइम के लिए उनकी बहन है. क्योंकि जैस्मीन के बेघर होने के रुबीना के अलावा किसी ने भी घर में उसकी देखभाल नहीं की थी.
उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने मेरे लिए घर में खाना बनाया है. अली ने कहा ये भी बताया कि जब मैं बीमार हो गया था तब रुबीना ने मेरा ख्याल रखा और मुझे बेहतर महसूस कराया. उसने भी बिना किसी को जाने मुझे कॉफी पिलाई. उसने मुझे मेरी बहन की तरह ही सब कुछ किया.
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अली के इस बात जैस्मिन भसीन गुस्सा होती नजर आ रही हैं. जी हां, जैस्मिन को गुस्से में देखने के बाद यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि जैस्मिन गुस्से में आकर अली से ब्रेकअप तो नहीं कर लेंगी.
शो के लेटेस्ट प्रोमो में जैस्मिन अली से कहती हैं कि ये ट्राफी भी रुबीना को दे देना. अब शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि जैस्मिन, अली और रुबिना के रिश्ते से कितना इफेक्ट होती है और ऐसे में अली के साथ वह कैसा बर्ताव करती हैं.
अधिकांश लोग औरत को अकसर कमजोर समझते हैं, लेकिन उन्हें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि औरत कमजोर नहीं होती. वह अगर किसी काम को करने की ठान ले तो उस के लिए कुछ भी असंभव या मुश्किल नहीं होता. बल्कि वह उस काम को भी कर सकती है जिस पर पुरुष समाज अपना वर्चस्व समझता है.
जबलपुर के एक छोटे से गांव कुंडम की रहने वाली कल्याणी संध्या मरावी इस का जीताजागता उदाहरण है. वह कटनी रेलवे स्टेशन पर ऐसा काम करती हैं, जिसे देख कर लोग भी हैरान रह जाते हैं. 30 साल की संध्या वहां पर कुली के रूप में काम करती हैं.
संध्या ने यह काम खुशी से नहीं किया बल्कि उन के घर के ऐसे हालात हो गए जिस की वजह से उसे यह करने के लिए मजबूर होना पड़ा. दरअसल 22 अक्तूबर, 2016 को संध्या के पति भोलाराम मरावी की मृत्यु हो गई. वह लंबे समय से बीमार थे. पति की मौत के बाद संध्या पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. घर में पति के अलावा कोई भी कमाने वाला नहीं था.
पति जबलपुर के ही कटनी रेलवे स्टेशन पर कुली थे. उन की कमाई से मां, पत्नी और 3 बच्चों का पेट भरता था. पति की मौत के बाद संध्या की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब परिवार का खर्च कैसे चलेगा. अपनी बूढ़ी सास के अलावा तीनों बच्चों को कैसे पालेगी. यही सोचसोच कर वह परेशान हो रही थीं.
उन्होंने यह तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह परिवार को भूखों नहीं मरने देगी. काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने तय कर लिया वह पति के काम को ही शुरू करेगी. वह कटनी रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर के पास पहुंची और उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया.
स्टेशन मास्टर ने संध्या से यही कहा कि वह उस की इतनी मदद कर सकते हैं कि उस के पति का कुली का लाइसैंस उस के नाम ट्रांसफर करा देंगे. तो क्या वह कुली के रूप में यहां काम कर सकती है? संध्या तो पहले ही इस के लिए मन बना कर आई थीं, इसलिए तुरंत हां कर दी और दूसरी बात यह थी कि इस काम को करने के अलावा उन के सामने कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था.
संध्या ने अपने परिवार का बोझ कम करने के लिए यात्रियों का लगेज उठाना शुरू किया तो उस के सामने कई तरह की परेशानियां आईं. उन्हें कुली के काम करने का कोई अनुभव नहीं था फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. स्टेशन पर 45 पुरुष कुलियों के बीच वह अकेली महिला कुली थीं.
शुरुआत में यात्री भी उसे अपना लगेज देने में झिझकते थे. उन्हें इस बात का डर रहता था कि कहीं यह महिला उस का लगेज गिरा कर कोई बड़ा नुकसान न कर दे. क्योंकि अधिकांश पुरुष महिला को असहाय और कमजोर ही समझते हैं. लेकिन संध्या ने जिम्मेदारी के साथ अपने काम को अंजाम देना शुरू किया.
वह यात्रियों के लगेज को सिर और कंधे पर रख कर जब चलती थीं तो तमाम लोग उसे आश्चर्य से देखते. संध्या ने किसी की भी कोई परवाह नहीं की क्योंकि अपने परिवार के बोझ के आगे उन्हें यात्रियों का वह बोझ हल्का लगता था.
संध्या कुंडम गांव में रहती हैं. वह वहां से 45 किलोमीटर का सफर तय कर के पहले जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुंचती हैं और इस के बाद 90 किलोमीटर दूर कटनी पहुंचती हैं. इस तरह रोजाना 270 किलोमीटर का सफर तय करके वह अपने परिवार के लिए रोजीरोटी मुहैया करा रही हैं. वर्ष 2017 से कुली का काम कर रही संध्या का सपना है कि वह अपने तीनों बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर कामयाब इंसान बनाए.
रोजाना 270 किलोमीटर का सफर तय करने की वजह से उन का काफी समय बर्वाद हो जाता है, जिस से वह अपने बच्चों को समय नहीं दे पाती हैं. संध्या चाहती हैं कि उन का तबादला उन के घर के समीप यानी जबलपुर कर दिया जाए तो उन की परेशानी कुछ कम हो सकती है.
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के एक कारोबारी परिवार का ही किस्सा लेते हैं. 17 जनवरी, 2021 को वहां के शास्त्रीनगर इलाके के रहने वाले बौबी जैन, जिन का कानपुर में लोहे का कारोबार है, अपने परिवार के साथ आगरा गए थे, लेकिन जब वापस लौटे तो घर में बड़ी चोरी हो चुकी थी.
बौबी जैन के घर का मेन ऐंट्री वाला गेट टूटा हुआ था. घर के अंदर सामान फैला हुआ था. सवा लाख रुपए की नकदी के अलावा पत्नी के हीरे और सोने के जेवर भी गायब थे. उन जेवरों की कीमत तकरीबन 14 लाख रुपए थी.
पुलिस तहकीकात में पता चला कि चोरों को इस बात की खबर थी कि बौबी जैन का परिवार घर पर नहीं है. तभी यह कांड कर दिया गया.
बिहार के बांका जिले में साल 2020 के नवंबर महीने में शिव विहार (थाना कालोनी) में चोरों ने देर रात पूर्व जिला पार्षद कंचन साह का घर सूना पा कर ताला तोड़ कर नकदी समेत तकरीबन 3 लाख रुपए की कीमत के जेवर की चोरी कर ली.
इस बाबत कंचन साह के पति दिलीप कुमार साह ने पुलिस को बताया कि छठ पर्व के मौके पर वे अपने पुश्तैनी घर रजौन में थे. इसी दौरान रात को चोरों ने ताला तोड़ कर घर में रखे नकद 30,000 रुपए समेत सोने और चांदी के जेवरों की चोरी कर ली.
सितंबर, 2020 में मध्य प्रदेश के इंदौर के बाणगंगा थाना इलाके में चोरों ने एक निजी गैस कंपनी के ठेकेदार के सूने घर में धावा बोल कर लाखों रुपए का सोना लूट लिया. चोरी की पृरी घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. घर के मालिक के मुताबिक चोर तकरीबन 22 तोला सोना ले गए, जिस की कीमत 30 लाख रुपए के आसपास आंकी गई.
देशभर में चोरी के ऐसे न जाने कितने ही मामले रोज सामने आते रहते हैं. दिल्ली भी इस से अछूती नहीं है. साल 2018 में आईपीसी के तहत दर्ज अपराध के कुल 2,36,476 मामलों में से 75 फीसदी मामले चोरी के थे. हद तो यह रही थी कि चोरी के इन मामलों में से 86 फीसदी मामलों में पुलिस चोरों का पता ही नहीं लगा पाई थी.
कहने का मतलब है कि चोरी होना तो जैसे अब अपराध ही नहीं रह गया है. इस से चोरों के हौसले इतने ज्यादा बुलंद हो चुके हैं कि अगर उन्हें पता चल जाए कि फलां घर में कोई नहीं है, तो वे दिनदहाड़े वहां कांड कर देते हैं. रात हो तो कहने ही क्या.
नवंबर, 2020 का एक मामला देखें. चोरों ने एक रात उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद इलाके के कौशांबी थाना क्षेत्र के वैशाली सैक्टर 3 में कारोबारी पीयूष कुमार के बंद घर में पहले दारू पार्टी की उस के बाद लाखों के माल पर हाथ साफ कर दिया.
कुछ चोर तो इतने शातिर होते हैं कि अपनी काली करतूतों से मीडिया और फिल्मी दुनिया तक में छा जाते हैं. ‘बंटी चोर’ याद है? उस का असली नाम देविंदर सिंह है और अपनी चालाकी भरी चोरियों के चलते वह ‘सुपर चोर’ का खिताब पा चुका है. एक समय तो वह इतना ज्यादा चर्चा में था कि उस पर साल 2008 में फिल्म ‘ओए लकी लकी ओए’ बना दी गई थी. वह साल 2010 में टैलीविजन के रिएलिटी शो ‘बिग बौस’ में भी दिखाई दिया था.
ऐसा ही एक चोर कालिया नाम का है, जो राजस्थान के बाड़मेर इलाके का रहने वाला है. कालिया चोरी की 100 से ज्यादा वारदातों को अंजाम दे चुका है और उस पर 45 मुकदमे दर्ज हैं. उस ने बाड़मेर पुलिस की नाक में दम कर रखा है.
बताया जाता है कि कालिया चोर को धंधे वालियों और नशे की बुरी लत है. इन दोनों के लिए वह
कितनी बार चोरी कर चुका है, खुद उसे भी नहीं पता. फिलहाल वह पुलिस की गिरफ्त में है.
देश में न जाने कितने ही बंटी और कालिया जैसे चोर भरे पड़े हैं जो खाली घरों की रेकी कर के वहां चोरी की वारदात को अंजाम देते हैं. बहुत से शहरी इलाकों में घर में काम करने वाली नौकरानी, ड्राइवर या चौकीदार ही इन को अपने साहब के आशियाने का भेद दे देते हैं, जिस से इन का काम और भी आसान हो जाता है.
लिहाजा, ऐसे लोगों से भी सावधान रहना चाहिए. दिलोदिमाग से यह बात निकाल देनी चाहिए कि हमारे साथ ऐसा नहीं होगा. कहते हैं कि ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’, पर साथ ही यह भी सच है कि ‘जब जागो तभी सवेरा’. खुद के घर में कोई ऐसा हादसा हो, इस से पहले अगर कुछ कदम उठा लिए जाएं तो चोरों को अपनी हाथ की सफाई दिखाने का मौका ही हाथ नहीं लगेगा. जब भी परिवार समेत घर से बाहर जाएं, तो इन बातों पर अमल जरूर करें :
-घर के किसी कमरे की लाइट जला कर जाएं. इस से घर रात को एकदम सूना नहीं लगेगा.
-घर की कीमती चीजों की नुमाइश न करें. अगर कामवाली या कोई दूसरा नौकर घर पर आता है, तो आंख मूंद कर उस पर यकीन न करें. जेवर और नकदी को अलमारी में ही लौकर रखें.
-अपने घर की दूसरी जोड़ी चाबी को भरोसेमंद पड़ोसी के पास रख सकते हैं. अगर किसी पर यकीन नहीं है, तो उन्हें एकदम सेफ जगह पर रखें.
-गैरजरूरी कीमती सामान को बैंक के लौकर में रखें.
-परिवार समेत घर से बाहर जाने पर घर के हर खिड़कीदरवाजे को अच्छी तरह बंद करें और जहां जरूरी हो ताला लगाएं.
-किसी भी सेल्समैन, सब्जी वाले या किसी अनजान से अपने या अपने घर के बारे में ज्यादा बात न करें.
-अगर सीसीटीवी कैमरा लगवा सकते हैं, तो जरूर लगवाएं.
‘‘हम दोनों ने सोचा है कि तुम्हें ‘वृद्ध आश्रम’ में भेज दें. वहां तुम्हारी देखभाल भी हो जाएगी और मन भी लग जाएगा. तुम्हारी सुखसुविधा का सभी प्रबंध हम कर देंगे. पैसे की कोई चिंता नहीं है. वैसे सबकुछ तुम्हारा ही है,’’ फिर खिसियानी हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘हम दोनों तो देखरेख के लिए तुम्हारे मैनेजर हैं.’’
वे अवाक पागलों के समान बेटे का मुंह ताकती रहीं. थोड़ी देर के लिए उन्हें लगा कि शरीर का खून किसी ने खींच लिया है, पर जल्द ही उन का स्वाभिमान जाग उठा. उन्होंने गरदन उठा कर कहा, ‘‘ठीक है बेटा, तुम दोनों ने ठीक ही सोचा होगा. वैसे भी इस घर को मेरी कोई आवश्यकता नहीं रह गई है.’’ अपमान से दुखी पलकों के ऊपर विवशता के जल की बूंदें टपक पड़ीं.
थोड़ी देर बाद ब्रजेश बोला, ‘‘इसी शहर में यह आश्रम खुला है. यहां सुखसुविधा का सब इंतजाम है. बड़ेबड़े लोग इसे मन लगाने का स्थान समझ कर रह रहे हैं. वैसे भी, जब तुम्हारा मन न लगे तो घर तो है ही, वापस चली आना.’’
पोते के चलते समय के शब्द उन्हें याद आने लगे. उस ने कैसे विश्वास से कहा था, ‘दादी, आज मातापिता मुझे घर से निकाल कर होस्टल भेज रहे हैं, किसी दिन ये तुम्हें भी घर से निकाल देंगे.’ पोते की भविष्यवाणी सचमुच सत्य साबित हो गई थी. उन्होंने अभिमान से गरदन उठा कर कहा, ‘‘मैं तैयार हूं. तुम ने सभी इंतजाम पहले से कर लिया होगा. वैसे भी, यहां रुकने की तुक नहीं है. मैं भी चाहती हूं कि अपनी जिम्मेदारी से तुम दोनों को मुक्त कर दूं.’’
ब्रजेश मां से आंखें न मिला सका. चलतेचलते बोला, ‘‘इतनी जल्दी भी क्या है. 2-4 दिनों बाद चली जाना.’’
कमला ने कहा, ‘‘मैं 2 घंटे बाद चली जाऊंगी, ड्राइवर को स्थान बता देना.’’
लगभग 60 सालों तक सुख की शय्या पर सोई उन की काया ने कांटों की चुभन का अनुभव नहीं किया था. जीवन के 2 पहलू भी होते हैं, यह अब उन्होंने जाना. अपने खून से सींची औलाद भी पराई हो सकती है, यह भी आज ही उन्हें पता चला. उन के अंतर्मन से आवाज आई, ‘मैं तो तन से स्वस्थ तथा धन से परिपूर्ण होते हुए भी इतनी सी चोट से घबरा उठी हूं, पर उन वृद्धों की मनोस्थिति क्या होती होगी, जो तन, मन तथा धन तीनों से वंचित हैं.’ अब उन्हें अपना दुख नगण्य लगा. एक अदम्य उत्साह तथा विश्वास से उन्होंने अपना पथ चुन लिया था. चैकबुक और अपना जरूरी सामान उन्होंने सूटकेस में रख लिया और बिना बेटाबहू की तरफ देखे गाड़ी में बैठ गईं.
वृद्धाश्रम शहर से दूर एकांत स्थान पर था. चारों तरफ हरियाली से घिरा वह भवन मन को शांति देने वाला था. अंदर जा कर उन्होंने देखा कि जीवन की सभी आवश्यकताओं का सामान वहां उपलब्ध है. जिस ने भी उसे बनवाया था, बहुत सोचविचार कर ही बनवाया था. चूंकि अभी वह नया ही बना था, इसी कारण 10-12 ही स्त्रीपुरुष वहां थे. सभी वृद्धों के चेहरों पर अपने अतीत की छाया मंडरा रही थी.
कमला ने मुसकराते हुए सब से अभिवादन किया. उन्हें प्रफुल्लित तथा मुसकराते देख सभी चकित रह गए. सभी वृद्ध समृद्ध परिवारों के सदस्य थे. पैसे की उन के पास कमी न थी, पर अपमान की वेदना सहतेसहते वे टूट चुके थे.
कमला उन के पास बैठ कर बोलीं, ‘‘देखिए, अगर मैं कुछ कहूं और उस से आप को पीड़ा पहुंचे तो इस के लिए मैं क्षमा चाहती हूं. मैं इसी शहर के सफल व्यवसायी प्रताप सिंह की पत्नी कमला हूं. 8 साल पहले मेरे पति की मृत्यु हो चुकी है. मैं अपने बेटे ब्रजेश के साथ रहती हूं. आप सब के समान मुझे भी घर का फालतू प्राणी समझ कर यहां भेज दिया गया है.
‘‘थोड़ी देर के लिए मैं भी बहुत मायूस हो गई थी पर जब मैं ने सोचा कि मेरे पास तो धन और स्वास्थ्य दोनों ही हैं, पर उन वृद्धों की मनोस्थिति क्या होती होगी जो तन, मन तथा धन तीनों से वंचित होंगे, तो यह महसूस करते ही मुझ में एक अदम्य उत्साह जागृत हो गया. फिर मुझे यह अपमान, अपमान न लग कर वरदान लगा. हम सब को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए कि कुछ तो हमारे पास है, जिस का उपयोग हम कर सकते हैं.
‘‘हमें यह नहीं दिखना है कि हम टूट चुके हैं. जीवन में यही समय है जब हम खाली हैं और कुछ सत्कार्य करने में सक्षम हैं. आप सब के पास दौलत की कमी नहीं है. यह सभी दौलत आप ने अपने पुरुषार्थ से संचित की है. इसे उपयोग में लाने का आप को पूरा हक है. अपने बच्चों के लिए तो सभी करते हैं पर किसी ने जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े उन वृद्धों के बारे में सोचा है, जो तिलतिल कर मर रहे हैं? चूंकि उन के पास पैसा नहीं है, इस कारण उन की जिंदगी कुत्तों से बदतर हो गई है. अपना ही खून सफेद हो गया है. क्या हम उन के लिए कुछ नहीं कर सकते?
‘‘अगर हम ने एक दुखी को अंत समय शांति तथा सुख दिया तो इस से बड़ा नेक कार्य और क्या हो सकता है. देने से बढ़ कर और कोई सुख नहीं है. मैं ने अपने बेटे को इस योग्य बना दिया है कि वह स्वयं कमा सकता है. मैं अपनी समस्त संपत्ति उन वृद्धों पर खर्च करूंगी जो इस वृद्ध आश्रम में पैसे के कारण नहीं आ सकते. हम उन से वही कार्य करवाएंगे, जिन में उन की रुचि होगी, ताकि वे अपने को दूसरों पर आश्रित समझ कर हीनभावना से ग्रसित न होने पाएं. हम अपने पैसे से दुत्कारे हुए वृद्धों को नवजीवन दे सकें तो इस से क्या सब को संतोष तथा प्रसन्नता नहीं होगी?’’
उन वृद्धों के पोपले मुखों पर संतुष्टि की एक स्मित रेखा सी खिंच गई. पूरा हौल तालियों से गूंज उठा. अब तक खाली बैठेबैठे उन की आंखों के आगे अतीत चलचित्र की भांति कौंध जाता था जब उन्हें पालतू प्राणी समझ कर उन की उपेक्षा की जाती थी. पर अब उन्हें अपने अस्तित्व की शक्ति का भान हुआ था. सभी बारीबारी से बोल उठे कि हमारी बड़ीबड़ी कोठियां हैं, उन्हें हम वृद्धों का निवासस्थान बना देंगे. वहां ऊंचनीच व जातपांत का भेदभाव नहीं रहेगा.
कमला की आंखें नम हो गईं. उन्हें लगा, ‘जो हमसफर इतने पास आ जाते हैं, उन्हें फिर एकदूसरे को अपनी बात समझानी नहीं पड़ती. उन की आंतरिक अनुभूतियां ही वाणी समान मुखर हो उठती हैं.’ सभी वृद्धों की आंखें विजयीगर्व से चमक रही थीं.
दूसरे दिन कमला ने सभी वृद्धों से अपने पोते की भविष्यवाणी के बारे में बताया और यह भी कहा कि वे उस की पसंद की चीजें ले कर अकसर उस से मिलने जाया करेंगी.
इतवार के दिन उन्होंने राजू की पसंद की ढेर सारी चीजें खरीदीं, ताकि वह अपने दोस्तों को भी दे सके. होस्टल पहुंचते ही राजू उन से लिपट कर बोला, ‘‘दादी, मैं जानता था कि तुम जरूर मुझ से मिलने आओगी,’’ उस ने अपने दोस्तों से कहा कि यही मेरी प्यारी दादी हैं. कमला ने सभी सामान बच्चों में बांटा और कई घंटे उन के साथ व्यतीत करने के बाद यह कह कर लौट पड़ीं कि वे यहां आती रहेंगी.
राजू ने पूछा, ‘‘घर पर सब ठीक है न?’’
उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ मैं घर में नहीं रहती. एक वृद्ध आश्रम है, वहीं पर रहती हूं.’’
राजू चीख कर बोला, ‘‘मैं समझ गया हूं, उन्होंने आप को भी घर से निकाल दिया है.’’
हंसते हुए उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘राजू, वहां तेरे बिना मेरा मन भी तो नहीं लगता था. इस कारण भी तेरे मातापिता ने मुझे आश्रम भेज दिया.’’
‘‘मैं सब समझता हूं. वे हम दोनों को प्यार नहीं करते, इसी कारण घर से निकाल दिया है.’’
उन्होंने प्यार से राजू के माथे को चूमते हुए कहा, ‘‘बेटे, मातापिता के लिए ऐसी बातें नहीं सोचनी चाहिए. वे जो कुछ भी कर रहे हैं, तुम्हारे भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए ही कर रहे हैं. होस्टल में बच्चों के संग तुम्हारा मन लग जाएगा, इसलिए तुम्हें यहां भेजा है.’’
राजू ने अविश्वास से दादी की तरफ देख कर कहा, ‘‘आप कहती हो तो मान लेता हूं,’’ फिर मासूमियत से बोला, ‘‘दादी, अपने घर में कब ले चलोगी?’’
कमला की आंखों में आंसू तैर आए, जिन्हें उन्होंने बड़े कौशल से पी कर कहा, ‘‘बेटे, हमारे घर में सभी वृद्ध लोग हैं. वहां तुम्हारा मन नहीं लगेगा. हम हीतुम्हारे पास आते रहेंगे.’’
वृद्धाश्रम लौटने पर काफी देर उन का मन उदास रहा. फिर उन के भीतर से आवाज आई, ‘तुझे भावुकता में बह कर अपने ध्येय को नहीं भूलना. तेरा लक्ष्य तेरे सामने है. इस समय बीस हाथ तेरी सहायता के लिए तैयार हैं. ये हाथ दिनोंदिन बढ़ते ही जाएंगे. सफलता तुझे पुकारपुकार कर कह रही है, आगे बढ़ती जा, ‘यह सोचते ही अदम्य उत्साह से वे उठ खड़ी हुईं.
दूसरे दिन कमला ने आश्रम के वृद्धों से कहा, ‘‘आप लोगों के पास जो भी कोठियां हैं, अगर आप खुशीखुशी उन्हें वृद्धाश्रम बनाने के लिए दे सकें, तो जो व्यय हम इस वृद्धाश्रम पर कर रहे हैं, वही हम अपने आश्रम पर खर्च करेंगे. हम सभी मिल कर उन्हें आवश्यक सामान से सुसज्जित कर कई वृद्ध आश्रम बना सकते हैं. मेरे पास जितनी संपत्ति है, उसे मैं वृद्धाश्रमों को दे रही हूं. यह सही है कि इस उम्र में हम थक सकते हैं पर जिस उत्साह से हम कार्य करेंगे, उस से शायद किसी को भी थकावट महसूस नहीं होगी.’’
हर वृद्ध, जिस के पास पैसा था, ने वह दिया और जिस के पास कोठी भी थी, उस ने सहर्ष कोठी तथा पैसा दोनों ही दिए. जब वृद्धों ने अपनीअपनी कोठियां खाली करवानी शुरू कीं तो रिश्तेदारों के होश उड़ गए. इस प्रकार कई कोठियां खाली हो गईं. अब उन वृद्धों ने बड़े उत्साह से उन में आवश्यक सामान तथा नौकरों का बंदोबस्त करना शुरू कर दिया.
समाचारपत्रों में इन वृद्ध आश्रमों की प्रशंसा में कौलम भर गए. मध्यवर्गीय परिवार के वृद्धों को प्राथमिकता मिली. हर वृद्धाश्रम का ट्रस्ट बना दिया गया, ताकि जिन्होंने पैसा दिया है, उन की मृत्यु के बाद भी वे सुचारु रूप से चलते रहें.
वृद्धों के निराश चेहरों पर रौनक आने लगी. समाज के जो संभ्रांत परिवार थे, उन के यहां एक अनोखा परिवर्तन आया. परिवार की युवा पीढ़ी जहां सतर्क हुई, वहीं वृद्धों के प्रति उन के व्यवहार में भी परिवर्तन आया और उन की पूरी देखभाल होने लगी.
कमला तथा अन्य वृद्धों, जिन्होंने इन आश्रमों को बनवाने में अपना पूरा सहयोग दिया था, की देखादेखी बहुत से रईसों ने अपना पैसा तथा सहयोग देना शुरू
कर दिया क्योंकि वे स्वजनों के व्यवहारपरिवर्तन के इस छलावे को समझ चुके थे और किसी न किसी रूप में इन वृद्धाश्रमों से संपर्क बनाने की चेष्टा में लग गए थे. एक तरफ वाहवाही की चाह थी, तो दूसरी ओर परोपकार की भावना जोर मार रही थी. हृदय के किसी कोने में प्रतिकार भी था.
कमला वृद्धाश्रम के एक कक्ष में बैठी विचारों में मगन थीं. उन के चहेरे पर वेदना और शांति के भावों का अनोखा मिश्रण झलक रहा था. अब उन्होंने जाना कि कांटों की शय्या पर सोया प्राणी ही कुछ करने की क्षमता रखता है. जिस सत्कार्य को करने का उन्होंने बीड़ा उठाया था, उस को प्रेरणा देने वाला उन के बेटेबहू का व्यवहार ही तो था. कमला ने महसूस किया कि देने से बड़ा सुख और कोई नहीं है. दूसरों को सहायता तथा सुख पहुंचा कर अपने हृदय को कितनी शांति और सुकून मिलता है. उन्होंने जीवन का सब से बड़ा सुख पा लिया था.
अपनी आलीशान कोठी में ऊपर की मंजिल की खिड़की के पास खड़ी कमला की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे. वे अपने अश्रुपूरित नेत्रों से बारबार फाटक को निहार रही थीं, जहां से उन का पोता राजू रोताबिलखता होस्टल भेजा गया था.
नन्हे पोते की चीखें अभी तक उन के कानों में गूंज रही थीं. मां की रोबीली फटकार तथा पिता का निर्विकार चेहरा देख वह चीख कर बोला था, ‘अब मैं कभी आप के पास नहीं आऊंगा. बस, होस्टल ही मेरा घर होगा.’ फिर दादी का आंचल पकड़ कर उन से लिपट कर बोला, ‘दादी, मैं आप को बहुत प्यार करता हूं. आप जरूर मेरे पास आओगी, यह मैं जानता हूं क्योंकि इस घर में एक आप ही तो हो जो मुझे प्यार करती हो. मैं यह भी जानता हूं कि आप की भी इस घर में कोईर् सुनता नहीं है. आप को भी किसी दिन ये लोग घर से निकाल देंगे.’
8 वर्षीय पोते की बातें उन के अंतर्मन को उद्वेलित कर रही थीं.
कमला के पति सफल व्यवसायी थे. उन्होंने अपनी मेहनत तथा लगन से अपार संपत्ति उपार्जित की थी. उन के केवल एक पुत्र था, ब्रजेश, जिस के लालनपालन में उन्होंने कोई कमी नही की थी. मां की ममता तथा पिता के प्यारभरे संरक्षण ने ब्रजेश को भी एक सफल व्यवसायी बना दिया था. उस की पत्नी एक कर्नल की बेटी थी, जिस की रगरग में पिता का दबंग स्वभाव तथा अनुशासन समाया हुआ था. अनुशासन ने उस के ममत्व को भी धराशायी कर दिया था.
पति के न रहने पर कमला ने अपने पोते राजू पर अपना समस्त प्यार उड़ेल दिया था. अब उसी को अपने से अलग करवाते देख उन का मन चीत्कार कर उठा था. बहू के वे शब्द, जो उस ने ब्रजेश तथा नौकरों के सामने कहे थे, कांटे के समान उन्हें चुभ रहे थे. जिस पोते के प्यार में डूब कर वे पति का गम भी भूल गई थीं, उसी के प्रति ये शब्द सुनने पड़े, ‘यहां आप के लाड़प्यार ने इसे बिगाड़ दिया है. इस के चरित्र निर्माण के लिए होस्टल ही उचित स्थान है, यहां रह कर यह कुछ नहीं बन पाएगा.’
उन का मन तो हुआ कि कह दें, इतना बड़ा व्यवसाय मेरे बेटे ने संभाला हुआ है, वह सबकुछ इसी घर की चारदीवारी में रह कर ही सीखा है, पर वे जानती थीं कि तब बहू नौकरों के सामने उन्हें जलील करने में देर नहीं करेगी और उन का बेटा मूकदर्शक ही बना रहेगा.
राजू के कुछ खिलौने तथा कपड़े छूट गए थे, उन को उन्होंने रोते हुए अपनी कीमती चीजों के संग रख दिया. सोचा, अब तो राजू की इन्हीं चीजों को देखदेख कर वे अतीत के उन आनंददायक क्षणों में पहुंच जाएंगी, जब राजू उन से लिपट कर अपनी नन्हीं बांहें उन के गले में डाल कर कहता था, ‘दादी, परी वाली कहानी सुनाओ न.’
राजू को गए 4 दिन बीत गए थे. उन्होंने खाने के कमरे में पैर नहीं रखा था. वहां पहुंच कर राजू की खाली कुरसी देख क्या वे अपनी रुलाई पर काबू पा सकेंगी? दोनों समय खाना कमरे में ही मंगवा लेती थीं. एक प्रकार से उन्होंने खुद को कमरे में कैद कर लिया था. जिस घर में राजू की खिलखिलाहट सुनाई पड़ती थी, वहां अब वीरानी सी फैली थी. बेटाबहू दोनों ही औफिस चले जाते थे. अब तो घर की दीवारें ही उन के संगीसाथी रह गए थे.
इधर, राजू के जाने के बाद से घर में चुप्पी छाई थी. ऐसा लगता था, इस शांति के बाद कुछ अनहोनी होने वाली है.
एक दिन वे बाहर निकलीं. उन की आंखें फाटक पर अटक गईं. अभी वे अपने को संतुलित करने की कोशिश कर ही रही थीं कि बहू की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘न भई, मैं उन से यह कहने नहीं जाऊंगी. वैसे भी मेरी कोई बात उन्हें अच्छी नहीं लगती. तुम्हीं चहेते हो. हम ने जो तय किया है, कह दो. मैं तो उन की नजरों में विष की डली हूं.’’
वे समझ न सकीं कि बेटाबहू किस विषय पर वार्त्तालाप कर रहे हैं. पर सोचा, 1-2 दिन में तो पता चल ही जाएगा.
दूसरे दिन बेटा उन के कमरे में आया. उन्हें लगा कि उन्हें दुखी देख शायद वह राजू को लेने जा रहा है और यही खुशखबरी सुनाने आया है.
ब्रजेश ने उन से आंखे चुराते हुए कहा, ‘‘मां, मैं देख रहा हूं कि राजू के जाने के बाद से तुम बहुत अकेलापन महसूस कर रही हो. तुम्हारी बहू और मैं औफिस चले जाते हैं. इधर मेरा बाहर जाने का कार्यक्रम बहुत बढ़ गया है. तुम्हारी बहू भी व्यवसाय में मेरी बहुत सहायता करती है. कभीकभी तो हम दोनों को ही बाहर जाना पड़ सकता है, ऐसे में तुम्हारी देखभाल करने वाला कोईर् नहीं रहेगा.
यह तो होना ही था. साल 2013 में केदारनाथ में बादल फटने के बाद मचे हाहाकार और जानमाल के नुकसान से भी सरकारें नहीं जागी हैं. आज भी पहाड़ों पर ऐसी विवादित परियोजनाएं चल रही हैं, जो कुदरत को मानो उकसा रही हैं अपना गुस्सा दिखाने के लिए.
उत्तराखंड के चमोली जिले में हिम ग्लेशियर टूटने से जिस ऋषिगंगा पावर प्रोजैक्ट की तबाही का रोना रोया जा रहा है, वह शुरू से ही विवादों में रहा है. इस प्रोजैक्ट पर 10 साल से ज्यादा समय से काम जारी था. पर याद रहे कि यह कोई सरकारी नहीं, बल्कि प्राइवेट सैक्टर का प्रोजैक्ट था, जिसे ले कर जम कर विरोध हुआ था.
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस प्रोजैक्ट को बंद कराने के लिए अदालत का दरवाजा तक खटखटाया था, लेकिन वे नाकाम रहे थे. उन का मानना था कि इस तरह के प्रोजैक्ट हिमालय को नुकसान पहुंचा सकते हैं और उन का डर आज सच साबित हो गया.
उधर तमाम विवादों के बावजूद ऋषिगंगा पावर प्रोजैक्ट पर बिजली का उत्पादन शुरू हो गया था और वहां 63,520 एमडब्ल्यूएच बिजली बनाने का टारगेट रखा गया था. हालांकि अभी कितना उत्पादन हो रहा था, इस की कोई आधिकारिक जानकारी मौजूद नहीं है. शुरुआती दावों की बात करें तो यह कहा गया था कि जब यह प्रोजैक्ट अपनी पूरी क्षमता पर काम करेगा, तब यहां से बनने वाली बिजली दिल्ली, हरियाणा समेत कुछ दूसरे राज्यों में सप्लाई की जाएगी.
वैसे, ऋषिगंगा नदी पर उत्तराखंड जल विद्युत निगम के साथ प्राइवेट कंपनी के भी कई पावर प्रोजैक्ट बन रहे हैं.
इस सिलसिले में भारतीय जनता पार्टी की नेता उमा भारती ने कहा कि ग्लेशियर टूटने के चलते हुई त्रासदी चिंता की बात होने के साथसाथ चेतावनी भी है. साथ ही उन्होंने कहा कि मंत्री रहते हुए वे गंगा और उस की मुख्य सहायक नदियों पर बांध बना कर पनबिजली परियोजनाएं लगाने के खिलाफ थीं.
नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली पहली राजग सरकार में उमा भारती जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री थीं. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘इस सिलसिले में मैं ने अपने मंत्रालय की तरफ से हिमालय उत्तराखंड के बांधों के बारे में जो हलफनामा दिया था, उस में यही आग्रह किया था कि हिमालय एक बहुत संवेदनशील स्थान है, इसलिए गंगा और उस की मुख्य सहायक नदियों पर पनबिजली परियोजना नहीं बननी चाहिए.’
उमा भारती की चेतावनी 7 फरवरी, 2021 की सुबह तब सच साबित हो गई, जब नंदादेवी ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने से अलकनंदा की सहायक नदियों ऋषिगंगा और धौलीगंगा में विकराल बाढ़ आ गई.
अचानक उफनाई नदियों का बहाव देखते ही देखते इतना प्रचंड हो गया था कि जोशीमठ इलाके में ऋषिगंगा पावर प्रोजैक्ट और धौलीगंगा किनारे एनटीपीसी का प्रोजैक्ट पूरी तरह बरबाद हो गए. भारतचीन की सरहद पर आईटीबीपी की पोस्ट जोड़ने वाला पुल भी बह गया. साथ ही, तकरीबन डेढ़ सौ लोगों के लापता होने की खबरें भी आईं.
जब यह कुदरती आपदा आई उस से पहले इस इलाके के आसपास बसे गांवों में रोजाना की तरह शांति थी. रैणी गांव के लोगों ने बताया कि सुबह साढ़े 9 बजे के आसपास हिमालय के ऊपरी इलाकों से सफेद धुएं के साथ ऋषिगंगा नदी मलबे के साथ बहती दिखी. इस तेज बहाव को नदी का भयंकर शोर और भी डरावना बना रहा था.
उसी समय धौलीगंगा पर बन रहे तपोवनविष्णुगाड़ पनबिजली प्रोजैक्ट से जुड़े मजदूर काम कर रहे थे. सुबह 10 के बाद जैसे ही धौली गांव के आसपास नदी का जल स्तर बढ़ने लगा, वैसे ही गांव वालों की बैचेनी भी बढ़ने लगी.
गांव के लोगों ने प्रोजैक्ट पर काम कर रहे लोगों को आवाज दे कर और सीटियां बजा कर खतरे से आगाह भी किया, पर नदी की तेज आवाज में गांव वालों की आवाज दब कर रह गई. नतीजतन, प्रोजैक्ट का बैराज और सुरंग मलबे में दफन हो गए.
इस पानी की तबाही देखते ही देखते जंगल में लगी आग की तरह हर जगह फैल गई. इस से स्थानीय प्रशासन के बाद उत्तराखंड सरकार और बाद में केंद्र सरकार भी हरकत में आ गई. इस आपदा से ज्यादा तबाही न मचे और बाढ़ के डर को देखते हुए प्रशासन ने नीचे ऋषिकेश और हरिद्वार तक अलर्ट कर दिया. लोगों को गंगा से दूर रहने की चेतावनी दी गई. राफ्टिंग और नदी किनारे कैंपिंग पर भी रोक लगा दी गई.
इस आपदा में राहत की बात यह रही कि उस समय पहाड़ों पर बारिश नहीं हो रही थी और आगे में मौसम साफ रहने की उम्मीद थी. पर तबाही तो मची थी, लिहाजा, एनडीआरएफ और दूसरे संस्थानों के जवानों ने मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने का बीड़ा उठा लिया. आईटीबीपी के जवानों ने एनटीपीसी के बन रहे तपोवनविष्णुगाड़ पनबिजली प्रोजैक्ट की एक सुरंग में फंसे सभी 12 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया. राहत के दूसरे काम भी जारी थे.
हताहत होने वाले ज्यादातर मजदूर और दूसरे मुलाजिम तेलुगुभाषी बताए गए हैं, जो आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के एक इंजीनियर संजीवा रेड्डी के तहत प्रोजैक्ट पर काम कर रहे थे.
पर सवाल उठता है कि इस तरह की आपदाएं क्यों जन्म लेती हैं? अगर आबोहवा से जुड़े माहिर लोगों की मानें तो क्लाइमेट में हो रहे बदलाव और बढ़ती गरमी के चलते ग्लेशियर टूट रहे हैं. अगर इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो साल 2050 तक हालात और भी बदतर हो जाएंगे. जिस तरह से तरक्की के नाम में पहाड़ काटे जा रहे हैं, उस से ग्लेशियर भी सिकुड़ रहे हैं और वे अपना रास्ता भी बदलने लगे हैं.
इस के अलावा पहाड़ों पर घने और ऊंचे पेड़ देख कर मन में यह सवाल भी आता है कि जब वहां जंगलों की भरमार है, तो फिर ‘चिपको आंदोलन’ के अगुआ सुंदरलाल बहुगुणा और उन के ‘वन सैनानियों’ को कुछ पेड़ कट जाने का ऐसा क्या दर्द था, जो उन्होंने पेड़ों से चिपकचिपक कर उन्हें बचाया था? आज जब ग्लेशियर टूट रहे हैं और उस से पहाड़ों पर नदियों का कहर बरप रहा है, तो पता चलता है कि सुंदरलाल बहुगुणा जैसे लोग कुदरत को ले कर कितना आगे की सोच रहे थे.
ऐसी ही सोच को आगे बढ़ा रहे हैं नैनीताल के ओखलकांडा ब्लौक के नाई गांव के रहने वाले पर्यावरण प्रेमी चंदन सिंह नयाल जो अब तक 40,000 पौधे लगा कर अपना ही एक जंगल बना चुके हैं, जबकि अभी उन की उम्र महज 26 साल है.
चंदन नयाल
चंदन सिंह नयाल कहते हैं कि उन के इलाके में चीड़ और बुरांश के जंगलों में आग लग रही थी. जमीन सूख रही थी. तब उन्होंने क्षेत्र में बांज के पौधे लगाने शुरू किए, क्योंकि ऐसा करना भूस्खलन रोकने में मदद करता है, साथ ही जल संरक्षण में भी अहम रोल निभाता है.
चंदन सिंह नयाल पर्यावरण को ले कर इतने सजग हैं कि उन्होंने हल्द्वानी मैडिकल कालेज को अपनी देह दान कर दी है, ताकि उन की मौत के बाद किसी पेड़ को न काटना पड़े.
चमोली जिले में हिम ग्लेशियर के टूटने पर चंदन सिंह नयाल ने दुखी मन से बताया, “इस तरह जाड़ों के समय ग्लेशियर का टूटना बहुत ही चिंता की बात है, क्योंकि ज्यादातर ग्लेशियर बरसात या गरमियों में ही टूटते हैं. इस साल हिमपात भी बहुत कम हुआ है, जिस वजह से ग्लेशियरों का आकार काफी कम हुआ है. यह भी इस ग्लेशियर के टूटने की एक खास वजह हो सकता है. साथ ही, इस साल मध्य हिमालय और उच्च हिमालयी इलाको में पिछले कई महीने से भीषण आग लगी हुई थी. यह गरमी भी ग्लेशियर टूटने की एक वजह हो सकती है.
“तेजी से चलता विकास का काम, लगातार कठोर चट्टानों पर ब्लास्टिंग कर के सड़क बनाना, ऊंचे पहाड़ों पर लगातार तोड़फोड़ की जा रही है, जिस से हिमालय को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. जिस इलाके में यह आपदा आई है, मैं वहां का दौरा कर चुका हूं. यह जोन काफी सेंसिटिव है. यह नहीं कहा जा सकता कि आफत टल गई, बल्कि आगे भी कई ग्लेशियरों के टूटने का खतरा बना हुआ है.
“ग्लेशियरों में जो दरारें होती हैं, वे बर्फबारी होने पर भर जाती हैं जिस के चलते ग्लेशियर टूटने का खतरा नहीं होता. मैं यही कहूंगा कि सतर्कता बनी रहे. सरकार को इस पर गहराई से सोचने की जरूरत है और उसे आगे भी लगातार ग्लेशियरों पर नजर बनाए रखना होगा.”
हीरा सिंह बिष्ट
जिला चमोली के गांव वाण के रहने वाले समाजसेवी हीरा सिंह बिष्ट गढ़वाली ने भी इस कुदरती कहर पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने बताया, “कई बार बहुत ज्यादा बर्फबारी से पहाड़ी नदियां या झीलें जम जाती हैं और ग्लेशियर नदी का बहाव रोक देती है. इस वजह से भी झील बड़ा ग्लेशियर बन जाती है, जिस के टूटने या फटने का डर बना रहता है.
“मैं आप को एक जानकारी और दे दूं कि चमोली जिले का रैणी गांव जो जोशीमठ के तपोवन से आगे है और जहां यह हादसा हुआ है, वह ‘चिपको आंदोलन’ से जुड़ी गौरा देवी का ससुराल है. उन का जन्म साल 1925 में चमोली जिले के लाता नामक गांव में हुआ था. उन्होंने 5वीं जमात तक पढ़ाई की थी. सिर्फ 11-12 साल की उम्र में उन की शादी रैणी गांव के मेहरबान सिंह नाम के आदमी से हुई थी. गौरा देवी ने अपने इलाके के पेड़ों को कटने से बचाने के बहुत बड़ी मुहिम चलाई थी.
“साल 1986 में गौरा देवी को तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पहला ‘वृक्षमित्र पुरस्कार’ दिया था. वे ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत करने वाली महिलाओं में सब से आगे मानी जाती थीं.”
रतन सिंह असवाल
‘पलायन : एक चिंतन’ समूह के रतन सिंह असवाल ने बताया, “हम कुदरती आपदा को रोक तो नहीं सकते पर उस से होने वाले जान और माल के नुकसान को कम जरूर कर सकते हैं. उत्तराखंड कुदरती आपदाओं से घिरा एक पर्वतीय राज्य है, लिहाजा वहां डौप्लर (वैदर राडार) सिस्टम की बेहद जरूरत है जो भूकंप आना, बादल फटना, ग्लेशियर का टूटना जैसी चेतावनियां समय रहते दे दे, जिस से नुकसान को कम से कम किया जा सके.
“हमारे यहां बड़ेबूढ़ों की कहावत है कि बांसुरी की धुन से नहीं पर इनसानी आवाज के शोर से पहाड़ों पर बर्फ दरक जाती है. पहाड़ों पर जो यह मशीनी शोर बढ़ा है, वह भी इस तरह की आपदाओं को न्योता देता है. केदारनाथ त्रासदी के बाद राज्य में डौप्लर (वैदर राडार) सिस्टम की सख्त जरूरत बताई गई थी, पर अभी भी इस सिस्टम पर ज्यादा काम नहीं हो पाया है, जो चिंता की बात है.”
बहरहाल, ग्लेशियर टूटने की यह घटना हम सब के लिए सबक है कि तरक्की के नाम पर मची इस आपाधापी में हम कुदरत को उतना ही छेड़े जिस से वह दर्द के मारे बिलबिलाए नहीं. भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में कुदरत अपना गुस्सा जाहिर करती रहती है. अभी तो वह छोटे स्तर पर चेतावनी दे रही है, पर अगर कहीं यह बड़े स्तर पर होने लगेगा तो इस धरती पर इनसान और दूसरे तमाम जीवों की हस्ती मिटते देर नहीं लगेगी.
मशहूर रोमांटिक गीतकार व शायर फैज अनवर ला रहे हैं रोमांटिक सिंगल ‘‘मुस्कुराना तेरा’’ ‘दिल है कि मानता नहीं’,‘साजन’,‘नम’‘इम्तिहान’, ‘तेरे मस्त मस्त दो नयन’, ‘आओगे जब तुम साजना’, ‘कोई फरियाद तेरे दिल में’, ‘चिकनी कमर’, ‘जिंदगी तेरे नाम’, ‘ये जो मोहब्बत है’, वीरे दी वेडिंग’ सहित सैकड़ों फिल्मों में रोमांटिक गीत लिख चुके सुप्रसिद्ध शायर व गीतकार फैज अनवर अब वैलेंटाइन डे के खास मौके के लिए अपनी खुद की संगीत कंपनी ‘‘फेम म्यूजिक’’के तहत एक रोमांटिक गीत ‘‘मुस्कुराना तेरा’’ लेकर आ रहे हैं.
इस अलबम को वह अपने नए डिजिटल म्यूजिक चैनल ‘फेम स्टूडियो‘ के जरिए लोगों तक पहुंचाने वाले हैं.इसके गीतकार खुद फाएज अनवर व संगीतकार फरजान फैज हैं. इस रोमांटिक गीत रेहान खान व तनु श्रीवास्तव ने अपनी आवाज स्वरबद्ध किया है.जबकि इसके वीडियो में रोजल खान और रवि भाटिया रोमांटिक अंदाज में नजर आएंगे शायर व गीतकार फाएज अनवर म्यूजिक अलबम ‘मुस्कुराना तेरा‘ की चर्चा चलने पर कहते है,‘ फेम स्टूडियो यह एक नई पहल है.
वैलेंटाइन डे के अवसर को देखते हुए युवा पीढ़ी के लिए युवा प्रतिभाओं द्वारा एक रोमांटिक अलबम है,जिसे सभी वर्ग के लोग पसंद करेंगे. फैज अनवर आगे कहते हैं, अब वक्त बदल चुका है. एक वक्त वह था, जब सात व आठ गानों का पूरा अलबम आता था. तब एक गायक एक ही अलबम में अलग अलग अंदाज के गीत गाते हुए अपनी आवाज का जादू श्रोताओं तक पहुंचाता था और उस वक्त हर गायक की अपनी एक बड़ी पहचान हुआ करती थी.
बतौर गीतकार व शायर हमें भी एक ही अलबम में अलग अलग भावनाओं को व्यक्त करने वाले गीत लिखने में बड़ा आनंद आता था.एक ही अलबम के लिए हम खुशी, गम, दर्द भरे नगमें, उदासी, पछतावा, रोमांस आदि भावनाओं को उकेरने वाले गीत व शायरी लिखकर सकून पाते थे.उन दिनों फिल्म के अंदर समाहित गीतों की सफलता से ही फिल्म की सफलता सुनिश्चित मानी जाती थी. इसलिए गीतकार, गायक व संगीतकर सभी हर गाने पर काफी मेहनत करते थे.
उस वक्त तो गायक को रियाज करना पड़ता था. हर गाना लाइव रिकार्ड हुआ करता था.पर अब तो सब कुछ ‘की बोर्ड’ पर निर्भर हो गया है. इस नकलीपन के ही कारण गीत व संगीत का वह जादू भी गायब सा हो गया है.
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मगर मैं आज भी अपनी लय में ही काम करना पसंद करता हूं. जिस फिल्म की कहानी व पटकथा पसंद नहीं आती है, उसके लिए गीत लिखने से मना कर देता हूं.’