Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 3

एक तरफ बेटी का प्यार. वहीं दूसरी तरफ उन का स्वयं का दिया पठान को वचन. वह रात भर सोच कर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके.

सुबह उन्होंने अपनी बेगम और बेटी रेशमा को एकांत कक्ष में बुला कर बात की. महबूब खान ने रेशमा से कहा, ‘‘बेटी, मेरे कई बार प्राण जातेजाते बचे थे. जानती हो, प्राण मेरे अंगरक्षक सैनिक पठान ने अपनी जान पर खेल कर बचाए.

‘‘मैं ने उस के इन वीरता भरे कदमों से खुश हो कर उसे वचन दिया है कि रेशमा से उस का विवाह करूंगा. अब मेरी इज्जत तुम्हारे हाथ में है. तुम चाहो तो मेरा वचन कायम रह सकता है. अगर मैं वचन नहीं निभा सका तो मैं प्राण दे दूंगा?’’ कहतेकहते महबूब खान की आंखें भर आईं.

रेशमा कहे भी तो क्या. वह तो मन से विजय सिंह को अपना सर्वस्व मान चुकी थी. ऐसे में वह अपने पिता के वचन का मान कैसे रखती. अगर पिता के वचन का मान रखती तो उस का प्यार विजय सिंह उसे धोखेबाज ही कहता. रेशमा ने विजय सिंह के सामने उन की प्रशंसा सुन कर प्रेम प्रस्ताव रखा था. उस के प्रेम प्रस्ताव को विजय सिंह ने स्वीकार भी कर लिया था और उस से शादी का वादा किया था.

अब यदि वह पिता के वचन को निभाते हुए पठान से ब्याह करती है तो विजय सिंह के दिल पर क्या गुजरेगी. वह गुमसुम बैठी सोचती रही. वह कुछ नहीं बोली. तब महबूब खान ने कहा, ‘‘कुछ तो बोल बेटी. इस धर्मसंकट से निकलना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं विजय सिंह को अपने मन से पति मान चुकी हूं. वह भी मुझ से प्रेम करते हैं और मुझ से विवाह करना चाहते हैं. विजय सिंह के अलावा इस धरती पर जितने मनुष्य हैं वह सब मेरे भाईबंधु हैं. अब आप ही फैसला करें कि बेटी की विजय से शादी करेंगे या उस का मरा मुंह देखेंगे?’’ रोते हुए रेशमा एक ही सांस में कह गई.

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महबूब खान अपनी पुत्री रेशमा की जिद से भलीभांति वाकिफ थे. वह समझ गए कि रेशमा ने जो मन में ठान लिया, वही करेगी. वह किसी की नहीं सुनेगी. ऐसे में महबूब खान ने बेटी से कहा, ‘‘बेटी, विजय सिंह और पठान में मल्लयुद्ध और अस्त्रशस्त्र से लड़ाई होगी. इस में जो जीतेगा उस से तुझे विवाह करना पड़ेगा.’’

‘‘अब्बू, मैं आप से कह चुकी हूं कि मैं ने अपना प्रियतम चुन लिया है. ऐसे में अब आप क्यों शर्त रख रहे हैं कि मल्लयुद्ध और तलवार से लड़ाई में जो जीतेगा उस से विवाह करना होगा. मैं मन से ठाकुर सा को पति मान चुकी हूं. इस जन्म में तो वहीं मेरे पति होंगे.’’

बेटी की बात सुन कर महबूब खान के तनबदन में आग लग गई. वह गुस्से से आंखें निकालते हुए बोले, ‘‘तेरी बकवास बहुत सुन चुका. तू जानती नहीं कि तू एक खान की बेटी है और अपने इसलाम धर्म में ही शादी कर सकती है. मेरे लाड़प्यार ने तुझे बिगाड़ दिया है. इसलिए तू एक राजपूत से शादी करने पर अड़ी है. अगर तेरा प्रियतम ठाकुर मेरे सैनिक पठान से जीतेगा तभी उस से शादी करूंगा. वरना कभी नहीं…समझी.’’

रेशमा ने अपने अब्बा का गुस्सा आज पहली बार देखा था. वह समझ गई कि अब तो अपनी सच्ची चाहत के बूते ही वह अपने प्रियतम को पा सकती है.

महबूब खान ने ऊंट सवार हमीरगढ़ भेज कर ठाकुर विजय सिंह को समाचार भिजवाया कि अगर रेशमा को चाहते हो और शादी करनी है तो अस्त्रशस्त्र ले कर कजली तीज के रोज शाहगढ़ पहुंच जाना. खुले मैदान में पठान खान से मल्लयुद्ध व तलवारबाजी का युद्ध करना होगा.

इस युद्ध में अगर तुम जीते तो रेशमा तुम्हारी और अगर पठान जीता तो रेशमा उस की होगी. समय पर शाहगढ़ पहुंच जाना. अगर नहीं आए तो रेशमा का पठान से विवाह कर दिया जाएगा.

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विजय सिंह समाचार मिलते ही अस्त्रशस्त्र से लैस हो कर अपने 2 राजपूत साथियों के साथ शाहगढ़ के लिए रवाना हो गए. कजली तीज में 4 दिन का समय बाकी था. ठाकुर सा घोड़े पर सवार हो कर अपने साथियों के साथ शाहगढ़ की राह चल पड़े. कजली तीज से एक रोज पहले ही वह शाहगढ़ पहुंच गए.

महबूब खान ने उन्हें एक तंबू में रोका. पठान भी शाहगढ़ आ गया था. महबूब खान ने विजय सिंह और पठान को मिलाया. दोनों एकदूसरे से इक्कीस थे. रेशमा को जैसे ही पता चला कि ठाकुर सा विजय सिंह आ गए हैं, तो उस ने अम्मी से कहा कि वह एक बार ठाकुर सा से मिलना चाहती है.

रेशमा को उस की अम्मी ने ठाकुरसा से एकांत में मिलवाया. विजय सिंह को देखते ही रेशमा उन के सीने से जा लिपटी और कस कर बांहों में भर कर सुबकते हुए बोली, ‘‘अब्बा हमारे प्यार की यह कैसी परीक्षा ले रहे हैं. अब क्या होगा?’’

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‘‘तुम चिंता मत करो रेशमा. अगर हमारा प्यार सच्चा है तो जीत हमारी ही होगी. प्रेमियों को हमेशा से ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ा है?’’ विजय सिंह ने रेशमा को दिलासा दी.

रेशमा बोली, ‘‘आप नहीं मिले तो मैं मर जाऊंगी?’’

‘‘रेशमा, ऐसा न कहो. सब ठीक होगा. मुझ पर विश्वास रखो.’’ ठाकुरसा ने कहा. इस के बाद थोड़ी देर तक दोनों प्रेमालाप करते रहे, फिर अलग हो गए.

Serial Story: प्यार में दी खुद की कुरबानी- भाग 4

रेशमा की आंखें आंसुओं से तर थीं. उस की हिचकियां बंधी थीं. अम्मी ने उसे संभाला और कक्ष में ले गईं. विजय सिंह को पता चल गया था कि पठान ने महबूब खान की कई बार जान बचाई थी. इस कारण उन्होंने पठान को बचन दिया था कि वे उस से अपनी बेटी रेशमा का विवाह कर के एहसानों का बदला चुकाएंगे.

रात में जब रेशमा और विजय सिंह के बीच बातें हो रही थी, तब पास के तंबू में सो रहे पठान ने सारी बातें सुन ली थीं. पठान को नींद नहीं आई. खड़का होने पर पठान ने देखा कि रेशमा अपनी अम्मा के साथ विजय सिंह से मिलने आई और उन के बीच का वार्तालाप भी सुन लिया था.

पठान की सब समझ में आ गया. वह जान गया कि रेशमा उस से नहीं ठाकुर सा विजय सिंह से प्रेम करती है. बस, पठान ने मन ही मन एक निर्णय कर लिया कि उसे रेशमा का दिल जीतने के लिए क्या करना है.

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अगले दिन कजली तीज का त्यौहार था. गांव की सुहागिनें एवं युवतियां सोलह शृंगार कर के झूले पर जाने से पहले उस मैदान में पहुंच गईं. जहां रेशमा को पाने के लिए 2 वीरों के बीच युद्ध होना था. तय समय पर शाहगढ़ के तमाम नरनारी उस मैदान में आ जमे थे. विजय सिंह ने केसरिया वस्त्र धारण किए और कुलदेवी को प्रणाम करने के बाद युद्ध मैदान में कूद गए.

पठान खान भी मैदान में आ गए. नगाड़े पर डंका बजते ही दोनों योद्धा आपस में भिड़ गए. मल्ल युद्ध में दोनों एकदूजे को परास्त करने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाने लगे. मगर ताकत में दोनों बराबर थे. तय समय तक दोनों बराबरी पर छूटे.

तब महबूब खान ने कहा कि अब फैसला तलवार करेगी कि कौन रेशमा के लायक है, दोनों ने तलवारें और ढाल उठा लीं. रेशमा दिल थाम कर देख रही थी. तलवारबाजी शुरू होने से पहले दोनों वीरों ने रेशमा की तरफ देखा. रेशमा एकटक ठाकुरसा की तरफ ही देख रही थी. यह पठान से छिप न सका.

तलवारबाजी शुरू हुए थोड़ा समय ही गुजरा था कि पठान पस्त होने लगा. महबूब खान की समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है. तभी ठाकुर विजय सिंह की तलवार ने पठान का सीना चीर दिया. पठान गिर पड़ा.

महबूब खान के आदेश पर युद्ध रोक दिया गया. महबूब खान भाग कर रेशमा वगैरह के साथ युद्धस्थल पर रक्त रंजित पड़े पठान खान के पास पहुंचे. पठान ने कहा कि रेशमा के लायक विजय सिंह है.

महबूब खान ने पूछा, ‘‘ऐसा तुम क्यों कह रहे हो?’’

तब खून से लथपथ पड़े पठान ने कहा, ‘‘रेशमा और विजय सिंह एकदूसरे से प्रेम करते हैं. यह मैं ने कल रात में जाना. जब यह दोनों थोड़ी देर के लिए मिले. मैं ने इन की बातें सुनीं तो मुझे अहसास हुआ कि रेशमा मेरे साथ कभी खुश नहीं रह सकेगी. क्योंकि वह तो सिर्फ विजय सिंह से प्यार करती है.

अगर इस युद्ध में विजय सिंह की हार होती तो रेशमा जी नहीं पाती. मैं ने कल रात इन की बातें सुनने के बाद प्रण कर लिया था कि मुझे युद्ध में क्या करना है. मल्लयुद्ध में आप ने देखा कि हम दोनों ताकत में बराबर हैं, तो तलवारबाजी में भी हम बराबर ही रहते. मगर मुझे रेशमा की खुशी के लिए ठाकुरसा से यह युद्ध हारना जरूरी लगा.

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इसीलिए मैं ने ठाकुर सा पर प्राणघातक वार नहीं किया और उन्होंने मुझे कमजोर मान कर तलवार का वार सीने पर कर के मुझे घायल कर दिया. मुझे खुशी है कि ठाकुरसा को रेशमा जैसी प्यार करने वाली जीवनसाथी मिलेगी, जो मेरे नसीब में नहीं है. यदि मैं युद्ध में जीत भी जाता तो रेशमा का दिल कभी नहीं जीत पाता. इसलिए मैं युद्ध में हार गया.’’

इतना सुन कर ठाकुर विजय सिंह, रेशमा और महबूब खान व अन्य लोग एकदूसरे की तरफ देखते रह गए.

महबूब खान ने वैद्य को बुला कर पठान का ईलाज करने को कहा. वैद्य ने ईलाज शुरू किया, मगर तलवार ने सीने पर गहरा जख्म किया था. पठान ने मरतेमरते रेशमा के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘तुम मेरी बहन हो. इस भाई को भी इतना प्यार करना जितना विजय सिंह से करती हो. मेरा मरना सार्थक हो जाएगा?’’

कह कर पठान ने जोर की हिचकी ली और प्राण त्याग दिए. रेशमा ही नहीं विजय सिंह और वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं. रेशमा के प्यार के लिए पठान ने कुरबानी दे कर साबित कर दिया कि वह ठाकुर सा विजय सिंह से किसी भी तरह कम नहीं थे.

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पठान खान को वहीं पर कब्र बना कर दफना दिया गया. बाद में दोनों पठान की कब्र पर गए और फूल चढ़ा कर नवजीवन के लिए हमीरगढ़ प्रस्थान कर गए. रेशमा जब भी शाहगढ़ आती थी, पठान की कब्र पर जरूर जाती थी. फिर एक वक्त वह भी आया

जब रेशमा और ठाकुर सा भी अनंत सफर पर चले गए.

उसका गणित: कैसा था लक्ष्मी का गणित

मनोज हर दिन जिस मिनी बस में बैठता था, उसी जगह से लक्ष्मी भी बस में बैठती थी. आमतौर पर वे एक ही बस में बैठा करते थे, मगर कभीकभार दूसरी में भी बैठ जाते थे. उन दिनों उन के बस स्टौप से सिविल लाइंस तक का किराया 4 रुपए लगता था, मगर लक्ष्मी कंडक्टर को 3 रुपए ही थमाती थी. इस बात को ले कर उस की रोज कंडक्टर से बहस होती थी, मगर उस ने एक रुपया कम देने का जैसे नियम बना ही लिया था.

कभीकभार कोई बदतमीज कंडक्टर मिलता, तो लक्ष्मी को बस से उतार देता था. वह पैदल आ जाती थी, पर एक रुपया नहीं देती थी. लक्ष्मी मनोज के ही महकमे के किसी दूसरे सैक्शन में चपरासी थी. एक साल पहले ही अपने पति की जगह पर उस की नौकरी लगी थी.

लक्ष्मी का पति शंकर मनोज के महकमे में ड्राइवर था. सालभर पहले वह एक हादसे में गुजर गया था. लक्ष्मी की उम्र महज 25 साल थी, मगर उस के 3 बच्चे थे. 2 लड़के और एक लड़की.

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एक दिन मनोज पूछ ही बैठा, ‘‘लक्ष्मी, तुम रोज एक रुपए के लिए कंडक्टर से झगड़ती हो. क्या करोगी इस तरह एकएक रुपया बचा कर?’’ ‘‘अपनी बेटी की शादी करूंगी.’’

‘‘एक रुपए में शादी करोगी?’’ मनोज हैरान था. ‘‘बाबूजी, यों देखने में यह एक रुपया लगता है, मगर रोजाना आनेजाने के बचते हैं 2 रुपए. महीने के हुए

60 रुपए और सालभर के 730 रुपए. 10 साल के 7 हजार, 3 सौ. 20 साल के 14 हजार, 6 सौ.

‘‘5 सौ रुपए इकट्ठे होते ही मैं किसान विकास पत्र खरीद लेती हूं. साढ़े 8 साल बाद उस के दोगुने पैसे हो जाते हैं. 20 साल बाद शादी करूंगी, तब तक 40-50 हजार रुपए तो हो ही जाएंगे.’’ मनोज उस का गणित जान कर हैरान था. उस ने तो इस तरह कभी सोचा ही नहीं था. भले ही गलत तरीके से सही, मगर पैसा तो बच ही रहा था.

लक्ष्मी को खूबसूरत कहा जा सकता था. कई मनचले बाबू और चपरासी उसे पाने को तैयार रहते, मगर वह किसी को भाव नहीं देती थी. लक्ष्मी का पति शराब पीने का आदी था. दिनभर नशे में रहता था. यही शराब उसे ले डूबी थी. जब वह मरा, तो घर में गरीबी का आलम था और कर्ज देने वालों की लाइन.

अगर लक्ष्मी को नौकरी नहीं मिलती, तो उस के मासूम बच्चों का भूखा मर जाना तय था. पैसे की तंगी और जिंदगी की जद्दोजेहद ने लक्ष्मी को इतनी सी उम्र में ही कम खर्चीली और समझदार बना दिया था.

एक दिन लक्ष्मी ने न जाने कहां से सुन लिया कि 10वीं जमात पास करने के बाद वह क्लर्क बन सकती है. बस, वह पड़ गई मनोज के पीछे, ‘‘बाबूजी, मुझे कैसे भी कर के 10वीं पास करनी है. आप मुझे पढ़ालिखा कर 10वीं पास करा दो.’’ वह हर रोज शाम या सुबह होते ही मनोज के घर आ जाती और उस की पत्नी या बेटाबेटी में से जो भी मिलता, उसी से पढ़ने लग जाती. कभीकभार मनोज को भी उसे झेलना पड़ता था.

मनोज के बेटाबेटी लक्ष्मी को देखते ही इधरउधर छिप जाते, मगर वह उन्हें ढूंढ़ निकालती थी. वह 8वीं जमात तक तो पहले ही पढ़ी हुई थी, पढ़नेलिखने में भी ठीकठाक थी. लिहाजा, उस ने गिरतेपड़ते 2-3 सालों में 10वीं पास कर ही ली. कुछ साल बाद मनोज रिटायर हो गया. तब

तक लक्ष्मी को लोवर डिविजनल क्लर्क के रूप में नौकरी मिल गई थी. उस ने किसी कालोनी में खुद का मकान ले लिया था. धीरेधीरे पूरे 20 साल गुजर गए. एक दिन लक्ष्मी अचानक मनोज के घर आ धमकी. उस ने मनोज और उस की पत्नी के पैर छुए. वह उसे पहचान ही नहीं पाया था. वह पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. उस का शरीर भी भराभरा सा लगने लगा था.

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लक्ष्मी ने चहकते हुए बताया, ‘‘बाबूजी, मैं ने अपनी बेटी की शादी कर दी है. दामादजी बैंक में बाबू हैं. बेटी बहुत खुश है. ‘‘मेरे बड़े बेटे राजू को सरकारी नौकरी मिल गई है. छोटा बेटा महेश अभी पढ़ रहा है. वह पढ़ने में बहुत तेज है. देरसवेर उसे भी नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अब भी कंडक्टर को एक रुपया कम देती हो लक्ष्मी?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘नहीं बाबूजी, अब पूरे पैसे देती हूं…’’ लक्ष्मी ने हंसते हुए बताया, ‘‘अब तो कंडक्टर भी बस से नहीं उतारता, बल्कि मैडम कह कर बुलाता है.’’ थोड़ी देर के बाद लक्ष्मी चली गई, मगर मनोज का मन बहुत देर तक इस हिम्मती औरत को शाबाशी देने का होता रहा.

हैप्पी बर्थडे: कैसे मनाया गया जन्मदिन

आज भोर में दादीमां की नींद खुल गई थी. पास ही दादाजी गहरी नींद में सो रहे थे. कुछ दिन पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. अब ठीक थे, लेकिन कभीकभी सोते समय नींद की गोली खानी पड़ती थी. दादाजी को सोता देख दादीमां के होंठों पर मुसकान दौड़ गई. आश्वस्त हो कर फिर से आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर में उन्हें फिर से झपकी आगई.

अचानक गाल पर गीलेपन का एहसास हुआ. आंख खोल कर देखा तो श्वेता पास खड़ी थी.

गाल पर चुंबन जड़ते हुए श्वेता ने कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दादीमां.’’

‘‘मेरी प्यारी बच्ची,’’ दादीमां का स्वर गीला हो गया, ‘‘तू कितनी अच्छी है.’’

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‘‘मैं जाऊं, दादीमां? स्कूल की बस आने वाली है.’’

श्वेता ने दादाजी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कैसे सो रहे हैं.’’

दादीमां को लगा कि सच में दादाजी बरसों से जाग रहे थे. अब कहीं सोने को मिला था.

सचिन ने प्रवेश किया. हाथ में 5 गुलाबों का गुच्छा था. दादीमां को गुलाब के फूलों से विशेष प्यार था. देखते ही उन की आंखों में चमक आ जाती थी.

चुंबन जड़ते हुए सचिन ने फूलों को दादीमां के हाथ में दिया और कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’

‘हाय, तू मेरा सब से अच्छा पोता है,’’ दादीमां ने खुश हो कर कहा, ‘‘मेरी पसंद का कितना खयाल रखता है.’’

सचिन ने शरारत से पूछा, ‘‘दादीमां, अब आप की कितनी उम्र हो गई?’’

‘‘चल हट, बदमाश कहीं का. औरतों से कभी उन की आयु नहीं पूछनी चाहिए,’’ दादीमां ने हंस कर कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं, दादीमां,’’ सचिन बोला, ‘‘बाहर लड़के कालिज जाने के लिए इंतजार कर रहे हैं.’’

दादीमां आहिस्ता से उठीं, खटपट से कहीं दादाजी जाग न जाएं. वह बाथरूम गईं और आधे घंटे बाद नहा कर बाहर आ गईं और कपड़े बदलने लगीं.

बेटे तरुण ने नई साड़ी ला कर दी थी. दादीमां वही साड़ी पहन रही थीं.

‘हाय मां,’’ तरुण ने अंदर आते हुए कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे. आज आप कितनी सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘चल हट, तेरी बीवी से सुंदर थोड़ी हूं,’’ दादीमां बहू के ऊपर तीर छोड़ना कभी नहीं भूलती थीं.

‘‘किस ने कहा ऐसा,’’ तरुण ने मां को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मेरी मां से सुंदर तो तुम्हारी मां भी नहीं थीं. तुम्हारी मां ही क्यों, मां की मां की मां में भी कोई तुम्हारे जैसी सुंदर नहीं थीं.’’

‘‘चापलूस कहीं का,’’ दादीमां ने प्यार से चपत लगाते हुए कहा, ‘‘इतना बड़ा हो गया पर बात वही बच्चों जैसी करता है.’’

‘‘अब तुम्हारा तो बच्चा ही हूं न,’’ तरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा हूं. पापाजी को क्या हो गया? अभी तक सो रहे हैं.’’

‘‘सो कहां रहा हूं,’’ दादाजी ने आंखें खोलीं और उठते हुए कहा, ‘‘इतना शोर मचा रहे हो, कोई सो सकता है भला.’’

‘‘पापाजी, आप बहुत खराब हैं,’’ तरुण ने शिकायती अंदाज में कहा, ‘‘आप चुपकेचुपके मांबेटे की खुफिया बातें सुन रहे थे.’’

‘‘खुफिया बातें कान में फुसफुसा कर कही जाती हैं. इस तरह आसमान सिर पर उठा कर नहीं,’’ दादाजी ने चुटकी ली.

‘‘क्या करूं, पापाजी, सब लोग कहते हैं कि मैं आप पर गया हूं,’’ तरुण ने दादाजी को सहारा देते हुए कहा, ‘‘अब आप तैयार हो जाइए. वसुधा आप लोगों के लिए कोई विशेष व्यंजन बना रही है.’’

‘‘क्यों, कोई खास बात है क्या?’’ दादाजी ने प्रश्न किया.

‘‘पापाजी, कोई खास बात नहीं, कहते हैं न कि सब दिन होत न एक समान. इसलिए सब के जीवन में एक न एक दिन तो खासमखास होता ही है,’’ तरुण ने रहस्यमयी मुसकान से कहा.

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‘‘तू दर्शनशास्त्र कब से पढ़ने लगा,’’ दादाजी ने कहा.

‘‘चलता हूं, पापाजी,’’ तरुण की आंखें मां की आंखों से टकराईं.

क्या सच ही इन को याद नहीं कि आज इन की पत्नी का जन्मदिन था जिस ने 55 साल पहले इन के जीवन में प्रवेश किया था? अब बुढ़ापा न जाने क्या खेल खिलाता है.

डगमगाते कदमों से दादाजी ने बाथरूम की तरफ रुख किया. दादीमां ने सहारा देने का असफल प्रयत्न किया.

दादाजी ने झिड़क कर कहा, ‘‘तुम अपने को संभालो. देखो, मैं अभी भी अभिनेता दिलीप कुमार की तरह स्मार्ट हूं. अपना काम खुद करता हूं. काश, तुम मेरी सायरा बानो होतीं.’’

दादाजी ने बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. अंदर से गाने की आवाज आ रही थी, ‘अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं.’

दादीमां मुसकराईं. बिलकुल सठिया गए हैं.

बहू वसुधा ने कमरे में आते ही कहा, ‘‘हाय मां, हैप्पी बर्थडे,’’ फिर उस की नजर साड़ी पर गई तो बोली, ‘‘तरुण सच ही कह रहे थे. इस साड़ी में आप खिल गई हैं. बहुत सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘तू भी कम नहीं है, बहू,’’ यह कहते समय दादीमां के गालों पर लाली आ गई.

जातेजाते वसुधा बोली, ‘‘मां, मैं खाना लगा रही हूं. आप दोनों जल्दी से आ जाइए. गरमागरम कचौरी बना रही हूं.’’

दादीमां का बचपन सीताराम बाजार में कूचा पातीराम में बीता था. अकसर वहां की पूरी, हलवा, कचौरी और जलेबी का जिक्र करती थीं. जिस तरह दादीमां बखान करती थीं उसे सुन कर सुनने वालों के मुंह में पानी आ जाता था.

वसुधा मेरठ की थी और उसे ये सारे व्यंजन बनाने आते थे. दादीमां को अच्छे तो लगते थे लेकिन उस की प्रशंसा करने में हर सास की तरह वह भी कंजूसी कर जाती थीं. शुरूमें तो वसुधा को बुरा लगता था. लेकिन अब सास को अच्छी तरह पहचान लिया था.

थोड़ी देर बाद दादाजी और दादीमां बाहर आ कर कुरसी पर बैठ गए. उन के आने की आवाज सुन कर वसुधा ने कड़ाही चूल्हे पर रख दी.

सूजी का मुलायम खुशबूदार हलवा पहले दादीजी ने खाना शुरू किया. कचौरी के साथ वसुधा ने दहीजीरे के आलू बनाए थे.

दादाजी 2 कचौरियां खा चुके थे. दादीमां ने दादाजी से हलवे की तारीफ में कहा, ‘‘शुद्ध घी में बनाया है न… बना तो अच्छा है लेकिन हजम भी तो होना चाहिए.’’

‘‘अरे वाह, तुम ने तो और ले लिया,’’ दादाजी ने निराश स्वर में कहा.

उन दोनों की बातें सुन कर वसुधा हंस पड़ी, ‘‘पापा, मैं फिर बना दूंगी.’’

दिल का दौरा पड़ जाने से दादाजी को काफी परहेज करना व करवाना पड़ता था. दिन में दादीमां की दोनों बहनों व उन के परिवार के लोग फोन पर जन्मदिन की बधाई दे रहे थे. उन के भाईभाभी का कनाडा से फोन आया. बहुत अच्छा लगा दादीमां को. वह बहुत खुश थीं और दादाजी मुसकरा रहे थे.

रात को तो पूरा परिवार जमा था. बेटी और दामाद भी उपहार ले कर आ गए थे. खूब हल्लागुल्ला हुआ. लड़के-लड़कियां फिल्मी धुनों पर नाच रहे थे. तरुण अपने बहनोई से हंसीमजाक कर रहा था तो वसुधा अपनी ननद के साथ अच्छेअच्छे स्नैक्सबना कर किचन से भेज रही थी. बस, मजा आ गया.

‘‘दादीमां, आप का बर्थडे सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य आना चाहिए,’’ सचिन ने दादीमां से कहा, ‘‘काश, मेरा बर्थडे भी इसी तरह मनाया जाता.’’

दादीमां ने अचानक कहा, ‘‘आज मुझे सब लोगों ने बधाई दी. बस, एक को छोड़ कर.’’

‘‘कौन, मां?’’ तरुण ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यह गुस्ताखी किस ने की?’’ सचिन ने कहा.

‘‘इन्होंने,’’ दादीमां ने पति की ओर देख कर कहा.

दादाजी एकदम गंभीर हो गए. ‘‘क्या कहा? मैं ने बधाई नहीं दी?’’

दादाजी अभी तक गुदगुदे दीवान पर सहारा ले कर बैठे थे कि अचानक पीछे लुढ़क गए. शायद धक्का सा लगा. ऐसे कैसे भूल गए. सब का दिल दहल गया.

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‘‘हाय राम,’’ दादीमां झपट कर दादाजी के पास गईं. लगभग रोते हुए बोलीं, ‘‘आंखें खोलो. मैं ने ऐसा क्या कह दिया?’’

दादाजी को शायद फिर से दिल का दौरा पड़ गया, ऐसा सब को लगा. दादीमां की आंखें नम हो गईं. उन्होंने कान छाती पर लगा कर दिल की धड़कन सुनने की कोशिश की. एक कान से सुनाई नहीं दिया तो दूसरा कान छाती पर लगाया.

‘‘हैप्पी बर्थडे,’’ दादाजी ने आंखें खोल कर मुसकरा कर कहा, ‘‘अब तो कह दिया न.’’

‘‘यह भी कोई तरीका है,’’ दादीमां ने आंसू पोंछते हुए कहा. अब उन के होंठों पर हंसी लौट आई थी.

सब हंस रहे थे. ‘‘तरीका तो नहीं है,’’ दादाजी ने उठते हुए कहा, ‘‘लेकिन याद तो रहेगा न.’’

‘‘छोड़ो भी,’’ दादीमां ने शरमा कर कहा.

‘‘वाह, इसे कहते हैं 18वीं सदी का रोमांस,’’ सचिन ने ताली बजाते हुए कहा.

फिर तो सारा घर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

खेसारी लाल यादव और कनिष्का नेगी का नया गाना ‘कोलगेट’ हुआ वायरल, देखें Video

भोजपुरी इंडस्ट्री के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव अपनी एक्टिंग और गानों की वजह से दर्शकों के बीच छाये रहते हैं. तभी तो खेसारी लाल यादव का गाना आते ही सोशल मीडिया पर काफी कम टाइम में वायरल हो जाता है.

हाल ही में खेसारी लाल यादव ने अपना नया गाना ‘कोलगेट’ (Colgate Full Song) यूट्यूब पर रिलीज किया है. इस गाने में एक्टर के साथ भोजपुरी क्विन कनिष्का नेगी नजर आ रही हैं.

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दरअसल खेसारी लाल यादव इस गाने में कनिष्का नेगी से चुम्मा मांगते हुए नजर आ रहे हैं. तो एक्ट्रेस इस गाने के जवाब में कहती हैं कि पहले कोलगेट कर लो.

आपको बता दें कि इसी थीम को लेकर गाने का नाम कोलगेट रखा गया. इस गाने की आवाज खेसारी लाल यादव और कनिष्का ने दिया है. इस गाने को जाहिद अख्तर ने लिखा हैं.

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खेसारी लाल यादव की फिल्म ‘लिट्टी चोखा’ का ट्रेलर हाल ही में रिलिज किया गया है. इस फिल्म का निर्देशन प्रदीप शर्मा कर रहे हैं. बता दें कि खेसारी लाल यादव इस फिल्म से पहले प्रदीप के साथ ‘लिट्टी चोखा’ में भी दिखाई देंगे. फैंस भी आम्रपाली दुबे और खेसारी लाल यादव का ऑनस्क्रीन रोमांस देखने के लिए लिए बेताब हैं.

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Imlie और आदित्य आएंगे एक-दूसरे के करीब, तो क्या करेगी मालिनी

स्टार प्लस का सीरियल इमली में अब तक आपने देखा कि कि मालिनी आदित्य के बदले मिजाज से काफी दुखी है और वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि आदित्य उसके साथ ऐसा बिहेव क्यों कर रहा है तो उधर अनु की मां को शक है कि इमली की वजह से ही आदित्य मालिनी से दूर हो रहा है. तो आइए बताते हैं सीरियल के नए अपडेट्स के बारे में.

सीरियल के अपकमिंग एपिसोड में आपको बेहद ही रोमांटिक सीन देखने को मिलने वाला है. जी हां, इमली और आदित्य एक-दूसरे के करीब आएंगे. आदित्य बार-बार इमली को यकीन दिलाता  है कि वह सिर्फ और सिर्फ इमली से प्यार करता है. अब उसका दिल इमली के लिए ही धड़कता है.

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वो दोनों घर के एक कोने में छिपकर मिलते है और ऐसे में आदित्य इमली की मांग में सिंदूर भरता है  तो मालिनी को इमली की मांग में भरा सिंदूर देखकर चौंक जाती है और उससे कई सवाल पूछती है.

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तभी उसे अपनी दादी की कही हुई बात याद आती है कि वो अपने बच्चे को इस दुनिया में लाने के बारे में सोचे क्योंकि इसी से ही वो अपने रिश्ते को बचा पाएगी.

इस सीरियल के अपकमिंग एपिसोड में ऐसे ही कई ट्विस्ट आने वाला है. जिससे दर्शको को एटरटेनमेंट का डबल डोज मिलेगा.

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स्टार प्लस का सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ काफी कम दिनों में दर्शकों के दिल में जगह बना ली है. इस शो में नए-नए ट्विस्ट देखने को मिल रहा जिससे दर्शकों का भरपूर एंटरटेनमेंट हो रहा है. सीरियल के बिते एपिसोड में आपने देखा कि सई पुलकित और देवयानी की शादी कराने के लिए प्लान बनाती और वह इस शादी को करवाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है. अब आपको बताते हैं इसके आगे सीरियल में क्य होने वाला है.

सीरियल के लेटेस्ट ट्रैक में ये दिखाया जा रहा है कि सई ने अपनी जिद पर आकर पुलकित और देवयानी की शादी करवा रही है तो दूसरी तरफ विराट चाहता है कि पुलकित और देवयानी की शादी टूट जाए. क्योंकि विराट को भवानी की चाल के बारे में पता नहीं है.

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विराट को ये भी नहीं पता है कि भवानी ने गुंडों के साथ मिलकर पुलकित के लिए साजिश रची थी. आज भी विराट को लगता है कि पुलकित गलत इंसान है. तो वहीं सई विराट से ये कहेगी कि देवयानी की ताई की खुशी इसी में है कि वो और पुलकित एक हो जाए.

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सई की इस बात को सुनकर विराट का  गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचेगा. इस बात को लेकर उन दोनों के बीच काफी बहस होगी. दोनों के बीच खूब कहासुनी होगी.

तो उधर भवानी ये नजारा देखकर काफी खुश होगी क्योंकि वो भी चाहती है कि देवयानी और पुलकित की शादी कभी ना हो.

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Serial Story- और तो सब ठीकठाक है: भाग 3

‘‘हाउसिंग बोर्ड का मकान कर्ज पर लिया है. राजवैद्य चक्रपाणिजी के आयुर्वेदिक उपचार से मुझे स्वास्थ्य लाभ हुआ है. चुनाव में भी लोगों को मेरे चरित्र पर विश्वास था. मैं समझता हूं कि इस चुनाव में किसी का कुछ खर्च नहीं हुआ. क्या प्रमाण है आप के पास? क्या खर्च किया है आप ने?’’

‘‘छि:छि:, उग्र होने से स्वास्थ्य बिगड़ता है, मेरे भाई. सुनो, जिन लोगों को चुनाव से पहले वारुणी की बोतलें वितरित कीं, उन की रसीदें चाहिए क्या? 3 महल्लों में हैंडपंप लगवाए हैं, उन की रसीद चाहिए क्या? 3 हजार कंबल खरीद कर बांटे गए, उन की रसीद चाहिए क्या? कैसी बच्चों जैसी बातें करते हो? बिना खर्चपानी के कोई चुनाव नहीं जीतता. एक प्राइमरी स्कूल के मास्टर की इतनी हस्ती नहीं होती कि वह विधान सभा का चुनाव जीत ले. क्या तुम्हारी सात पुश्तों में भी किसी ने ऐसा सम्मान प्राप्त किया था?

‘‘भाई मेरे, अब तुम सरकार हो, कानून हो, शहर के मालिक हो. तुम किसी को भी जेल में बंद करा सकते हो. किसी को भी जेल से छुड़वा सकते हो. शहर के जुए के अड्डे, रंडियों के कोठे, शराब की भट्ठियां सब तुम्हारी मरजी से चलती हैं.

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‘‘मुगल शासनकाल में बादशाह विभिन्न प्रांतों के लिए अलगअलग सूबेदार नियुक्त करता था. वह सूबेदार अपने इलाके का राजा होता था. तुम भी अपने इलाके के राजा हो. किसी का भी तबादला करा सकते हो, नियुक्ति करा सकते हो, निलंबित करा सकते हो. तुम्हारे एक इशारे पर कोई भी पिट सकता है, हवालात में बंद हो सकता है या भगाया जा सकता है. क्या मदरसे की मास्टरी में तुम्हारा यही रोब था?’’

‘‘लेकिन चौधरी साहब, पेट बड़ा हो जाने से खुराक भी ज्यादा हो जाती है. आप ने हमारा पेट बड़ा किया है तो हमें खुराक भी बड़ी चाहिए.’’

‘‘पुलिस विभाग आप के लिए छोड़ दिया है. खाओ और खाने दो. शहर के गुंडेबदमाशों का दोहन करो, लाटरी, जुआ, शराब, चिट आदि की सदाबहार खेती को संभालो.’’

‘‘फिर भी आप को हम सब का हिस्सा तो देना ही होगा. आप जबरदस्ती हमारा हिस्सा हजम नहीं कर सकते.’’

‘‘फिर ठीक है, समझ लो, मैं ने सब कुछ हजम कर लिया. अब आप को जो करना है कर लेना.’’

‘‘समझ लीजिए, चौधरी साहब. आप को यह सौदा महंगा पड़ेगा.’’

‘‘जाओ, मास्टर. राजनीति में ऐसी धमकियां तो हमारा नाश्तापानी हैं. हां, लेकिन हाथपैर संभाल कर वार करना.’’

सभी लोग उत्तेजित से निकल गए. नेताजी ने चपरासी से कहा, ‘‘अंदर कोई नहीं आए. जरा रामदुलारी को भेज देना. कंठ बड़ा चटक रहा है.’’

दूसरे दिन तहसील में होहल्ला मचा हुआ था. वकील सुरेंद्रनाथ, नेता ज्वालाप्रसाद और नरेंद्र का कत्ल हो गया था. रात में 8-10 डाकू आए थे गांव में.

सब से पहले गल्ला फकीर मरा. वह पागल था. पुराने कुएं की जगत पर सोया था. होहल्ला सुन कर डाकुओं के सामने सीना तान कर खड़ा हो गया. एक घोड़े की लगाम भी पकड़ ली. तभी आग के एक शोले ने उसे जमीन पर लिटा दिया. एक ही चीख में ठंडा हो गया वह पागल. उस की कहीं चर्चा भी नहीं हुई.

फिर डाकुओं ने ढूंढ़ढूंढ़ कर तीनों व्यक्तियों को मारा. संयोगवश मास्टर ज्ञानेंद्र किसी काम से शहर गए थे. सरपंच होतीलाल को पेचिश लग गई थी. वह सरकारी अस्पताल का लाल पानी पीने के लिए गांव से बाहर ही थे. शायद इसीलिए शहीद होतेहोते बच गए.

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सरकारी टेलीफोन की घंटियां घनघना उठीं. नेता, अभिनेता, पत्रकार, फोटोग्राफर आदि की लाइनें लगने लगीं. पुलिस हरकत में आ गई.

दूरदूर तक डाकुओं का पीछा किया गया. उन की धूल भी हाथ न लगी, लेकिन पुलिस को तो कुछ न कुछ करना ही था. 30 आदमियों को गिरफ्तार किया गया. गांवतहसील में कुछ नारेबाजियां हुईं. फिर सबकुछ शांत हो गया.

दूसरे दिन शाम को मास्टर ज्ञानेंद्र चुपचाप आए डरेसहमे से. चौधरी साहब ने उन का स्वागत किया. अंदर के निजी कक्ष में कुछ भेद की बातें हुईं. कुछ देर बाद मास्टर ज्ञानेंद्र कुछ संतुष्ट से, कुछ खुश से बाहर निकले.

ज्ञानेंद्र ने गांव संभाल लिया था. अब उन के मकान की दूसरी मंजिल का काम संगमरमर से हो रहा था. कुछ नई शक्लसूरतें गांव में दिखाई दे रही थीं.

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फिर एक दिन चौधरी साहब गांव में आए. सब को आश्वस्त किया. लोग उन से सहमे हुए थे, डरे हुए थे. और तो सब ठीकठाक था. सब जगह शांति थी. लोग अपनेअपने कामों में लग गए थे.

Crime- दिल्ली: छोटी गलती बड़ी वारदात

अभी खबर आई थी कि दिल्ली दुनिया की सब से ज्यादा प्रदूषित राजधानी है. मतलब वहां की आबोहवा खराब है. पर वहां की एक और बात चिंता बढ़ाने वाली है, जो अपराध से जुड़ी है. अपराध भी ऐसे जो टाले जा सकते थे, लेकिन लोगों की नासम?ा ने उन ?ागड़ों को इतना बड़ा बना दिया कि बात खूनखराबे तक जा पहुंची.

पहले 2 हालिया घटनाओं पर नजर डालते हैं. दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में सोमवार, 15 मार्च, 2021 की आधी रात को रोडरेज में 2 नौजवानों की चाकू से गोद कर हत्या कर दी गई.

‘गोदना’ शब्द पर ध्यान दीजिएगा. चाकू से एक के बाद एक वार करना. इस मामले में एक स्कूटी और मोटरसाइकिल की हलकी सी टक्कर हो गई थी. इस के बाद स्कूटी पर सवार 2 लोगों द्वारा मोटरसाइकिल पर सवार 2 नौजवानों को तब तक चाकू से गोदा गया, जब तक उन्होंने प्राण नहीं छोड़ दिए. उन दोनों पर चाकू के 50-50 से ज्यादा वार किए गए थे.

यह वारदात उद्योग नगर मैट्रो स्टेशन के पास एक गली के नुक्कड़ पर हुई थी. नांगलोई के रहने वाले 23 साल के रोहित अग्रवाल और नरेला के रहने वाले 20 साल के घनश्याम (मूल रूप से बिहार का रहने वाला) तब ज्वालापुरी में हुए एक शादी समारोह से लौट रहे थे.

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वे दोनों मोटरसाइकिल से जैसे ही उस गली के नुक्कड़ पर पहुंचे, तो आरोपियों की स्कूटी और उन की मोटरसाइकिल की हलकी सी टक्कर हो गई. इसी से गुस्साए स्कूटी सवारों ने उन दोनों की जान ले ली.

यह पूरी वारदात एक सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जिसे अगले दिन सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया. इस के बाद पुलिस ने उन दोनों आरोपियों को पकड़ लिया, जिन में से एक नाबालिग था. इस वारदात में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया गया.

अब दूसरी वारदात पर नजर डालते हैं. यह एक परिवार का आपसी मामला था और बात भी बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी. दिल्ली के बिंदापुर इलाके का एक वीडियो वायरल न हुआ होता तो शायद यह मामला सामने आ ही नहीं पाता. पुलिस ने उस वीडियो को कब्जे में ले कर छानबीन की.

मामला कुछ यों है कि बिंदापुर इलाके में रणबीर सिंह का एक मकान है. उस ने मकान का एक हिस्सा किराए पर दे रखा है. सोमवार, 15 मार्च, 2021 की दोपहर को रणबीर सिंह का अपने किराएदार से गाड़ी पार्क करने को ले कर ?ागड़ा हो गया था. परिवार के बीचबचाव के बाद मामला तब शांत हो गया था.

इस के बाद रणबीर सिंह अपनी मां और पत्नी के साथ मकान के मेन गेट पर आ गया, लेकिन दरवाजा खुलने से पहले रणबीर सिंह अपनी 76 साल की मां अवतार कौर के साथ बहस करने लगा. वीडियो में दिखा कि उस की पत्नी मांबेटे को शांत करने की कोशिश कर रही थी, पर इसी बीच रणबीर सिंह ने अपनी मां को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

बूढ़ी मां अचानक हुए इस हमले में संभल नहीं सकीं और सड़क पर धड़ाम से गिर गईं. उन्हें बेहोशी की हालत में पास के अस्पताल में भरती कराया गया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मरा हुआ बता दिया.

इस के बाद आरोपी ने आननफानन में अपनी मां का अंतिम संस्कार कर दिया. पर बाद में मंगलवार, 16 मार्च, 2021 को वीडियो के सामने आने पर इस मामले का खुलासा हुआ.

दिल्ली में ऐसी वारदात होना नई बात नहीं है. कभी नेब सराय थाना इलाके में 2,700 रुपए को ले कर 2 पक्षों के ?ागड़े में बीचबचाव करने वाले नौजवान को चाकू मार दिया जाता है, तो कभी आदर्श नगर इलाके में किसी चार्टर्ड अकाउंटैंट को अपने ही घर की कंस्ट्रक्शन साइट पर गोली मार दी जाती है.

इन सभी वारदात में सिर्फ नेब सराय वाले मामले में चाकू के वार से घायल हुआ 20 साल का सौरभ बच पाया, वरना बाकी में सब अपनी जान से हाथ धो बैठे. बुजुर्ग औरत अवतार कौर की उम्र 75 पार थीं, पर बाकी 3 लोग तो कम उम्र के ही थे. रोहित अग्रवाल 23 साल का था, तो घनश्याम महज  20 साल का. उन दोनों की जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी. चार्टर्ड अकाउंटैंट अनिल अग्रवाल 45 साल के थे.

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इन मौतों से पीडि़त परिवार वालों पर जो आफत आई है, उसे बयां करना मुश्किल है. रोहित अग्रवाल और घनश्याम के परिवार वालों पर तो कहर टूटा ही है, पर जिन लड़कों ने उन्हें चाकू से गोदा था, उन की जिंदगी भी नरक हो जाएगी. उन के परिवार वाले भुगतेंगे सो अलग.

अपनी बुजुर्ग मां की थप्पड़ से जान लेने वाले रणबीर सिंह को यह गुस्सा करना बड़ा भारी पड़ेगा. उसे कोर्टकचहरी में जूते रगड़ने पड़ेंगे और समाज में इज्जत भी गंवा दी.

अनिल अग्रवाल का परिवार तो सदमे से उबरा ही नहीं है. उन की पत्नी, बेटे और बेटी पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.

इस तरह की वारदातें क्यों होती हैं? इस सवाल का सीधा सा जवाब है कि अब लोगों में सब्र न के बराबर रह गया है. तूतूमैंमैं कब इज्जत का सवाल बन जाएगी, कह नहीं सकते.

अनिल अग्रवाल के केस में पुलिस पहले की कोई रंजिश बता रही है, पर बाकी मामलों में ऐसा कुछ नहीं था. बेटे ने मां को तैश में ऐसा थप्पड़ रसीद किया कि वह दुनिया से ही उठ गई. बाकी मामलों में आरोपी शायद एकदूसरे को पहले से जानते भी नहीं थे, पर जरा सी कहासुनी चाकू मारने की नौबत तक पहुंच गई.

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अगर जरा से ठंडेपन से काम लिया जाए, तो इन वारदात को रोका जा सकता है. अगर एक को गुस्सा आ गया है, तो दूसरे को समझदारी दिखाते हुए मामले को तूल नहीं देना चाहिए, वरना दिल्ली की आबोहवा के साथसाथ जो यह हमारी इनसानियत प्रदूषित हो रही है, वह हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत को कहीं का नहीं छोड़ेगी.

और तो सब ठीकठाक है : कैसे थे चौधरी जगत नारायण

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