अटूट प्यार- भाग 1: यामिनी से क्यों दूर हो गया था रोहित

‘कितने मस्ती भरे दिन थे वे…’ बीते दिनों को याद कर यामिनी की आंखें भर आईं.

कालेज में उस का पहला दिन था. कैमिस्ट्री की क्लास चल रही थी. प्रोफैसर साहब कुछ भी पूछते तो रोहित फटाफट जवाब दे देता. उस की हाजिरजवाबी और विषय की गहराई से समझ देख यामिनी के दिल में वह उतरता चला गया.

कालेज में दाखिले के बाद पहली बार क्लास शुरू हुई थी. इसीलिए सभी छात्रछात्राओं को एकदूसरे को जाननेसमझने में कुछ दिन लग गए. एक दिन यामिनी कालेज पहुंची तो रोहित कालेज के गेट पर ही मिल गया. उस ने मुसकरा कर हैलो कहा और अपना परिचय दिया. यामिनी तो उस पर पहले दिन से ही मोहित थी. उस का मिलनसार व्यवहार देख वह खुश हो गई.

‘‘और मैं यामिनी…’’ उस ने भी अपना परिचय दिया तो रोहत ने उसे कैंटीन में अपने साथ कौफी पीने का औफर कर दिया. वह मना नहीं कर सकी.

साथ कौफी पीते हुए रोहित टकटकी लगा कर यामिनी को देखने लगा. यामिनी उस की नजरों का सामना नहीं कर पा रही थी. लेकिन उस के दिल में खुशी का तूफान उमड़ रहा था. क्लास में भी दोनों साथ बैठे रहे.

शाम को घर लौटते समय रोहित ने यामिनी से अचानक प्यार का इजहार कर दिया. वह भौंचक्की रह गई. लेकिन अगले ही पल शर्म से लाल हो गई और भाग कर रिकशे पर बैठ गई. थोड़ी देर बाद यामिनी ने पीछे मुड़ कर देखा. रोहित अब तक अपनी जगह पर खड़ा उसे ही देख रहा था.

यामिनी के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं. खुशी से उस के होंठ लरज रहे थे. उस की आंखों में सिर्फ रोहित का मासूम चेहरा दिख रहा था. न जाने क्यों वह हर पल उसे करीब महसूस करने लगी.

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अगले दिन सुबह यामिनी की नींद खुली तो आदतन उस ने अपना मोबाइल चेक किया. रोहित ने मैसेज भेजा था, ‘सुप्रभात, आप का दिन मंगलमय हो.’

यामिनी देर  तक उस मैसेज को देखती रही और रोमांचित होती रही. वह भी उसे एक खूबसूरत सा जवाब देना चाहती थी. लेकिन क्या जवाब दे, सोचने लगी. मैसेज टाइप करने के लिए अनजाने में उस की उंगलियां आगे बढ़ीं. लेकिन वे कांपने लगीं.

यामिनी फिर रोहित के मैसेज को प्यार से देखने लगी और जवाब के लिए कोई अच्छा सा मैसेज सोचने लगी. लेकिन दिमाग जैसे जाम सा हो गया. अच्छा मैसेज सूझ ही नहीं रहा था. आखिरकार उस ने ‘आप को भी सुप्रभात’ टाइप कर मैसेज भेज दिया.

यामिनी की जिंदगी की एक नई शुरुआत हो चुकी थी. रोहित से मिलना, उसे देखना और प्यार भरी बातें करना यामिनी को अच्छा लगने लगा. एकदूसरे से मिले बिना उन्हें चैन नहीं आता. जिस दिन किसी प्रोफैसर के छुट्टी पर रहने के कारण क्लास नहीं रहती, उस दिन दोनों आसपास के किसी पार्क में चले जाते या बाजार घूमते. मस्तियों में उन के दिन गुजर रहे थे. हालांकि कालेज में दोनों को ले कर तरहतरह की बातें होने लगी थीं. लेकिन उन दोनों को कोई परवाह नहीं थी.

बातों ही बातों में यामिनी को मालूम हुआ कि रोहित के मातापिता इस दुनिया में नहीं हैं. एक ऐक्सीडैंट में उन की मौत हो गई थी. रोहित के चाचाचाची ही उस की देखभाल कर रहे थे. रोहित का घर शहर से दूर एक गांव में था. वह यहां किराए का कमरा ले कर कालेज की पढ़ाई कर रहा था. रोहित पढ़ाई में अच्छा था. इसीलिए यामिनी को उस से मदद मिल जाती थी पढ़ाई में.

एक दिन यामिनी कालेज गई तो पाया कि रोहित कालेज नहीं आया है. बहुत देर इंतजार करने के बाद यामिनी ने उसे फोन किया, लेकिन रोहित ने फोन नहीं उठाया. जब यामिनी ने कई बार फोन किया तब रोहित ने काल रिसीव किया और दबी आवाज में बोला, ‘‘यामिनी, मैं कालेज नहीं आ पाऊंगा. बुखार है मुझे. तुम परेशान नहीं होना. मैं ठीक होते ही आऊंगा.’’

दूसरे दिन भी रोहित कालेज नहीं आया. इसीलिए कालेज में यामिनी का मन नहीं लग रहा था. उसे रहरह कर रोहित का खयाल आता. उस ने सोचा, ‘कहीं रोहित की बीमारी बढ़ न जाए. उस से मिलने जाना चाहिए. पता नहीं अकेले किस हाल में है? दवा ले रहा है या नहीं. खाना कैसे खा रहा है.’

बहुत मुश्किल से ढूंढ़तेढूंढ़ते यामिनी रोहित के कमरे पर पहुंची. देर तक दस्तक देने के बाद रोहित ने दरवाजा खोला. उस का बदन तप रहा था. उस की हालत देख कर दया से ज्यादा गुस्सा आ गया यामिनी को. बोली, ‘‘इतनी तेज बुखार है और तुम ने बताया भी नहीं. दवा ली क्या? घर पर किसी को बताया?’’

रोहित अधखुली पलकों से यामिनी को देखते हुए शिथिल आवाज में बोला, ‘‘नहीं. चाचाचाची को कष्ट नहीं देना चाहता और डाक्टर के पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.’’

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2 दिनों में ही बहुत कमजोर पड़ गया था रोहित. आंखों के नीचे कालापन दिखने लगा था. यामिनी का मन रो पड़ा. रोहित ने शायद कुछ खाया भी नहीं था, क्योंकि खाना वह खुद बनाता था. होटल से लाया हुआ खाना एक स्टूल पर पड़ा था और सूख चुका था. एक शीशे के गिलास में थोड़ा सा पानी था. एक बिस्कुट का अधखुला पैकेट बगल में पड़ा था. कमरा भी अस्तव्यस्त था.

यह सब देख यामिनी से रहा नहीं गया. वह कमरा साफ करने लगी. रोहित हाथ के इशारे से मना करता रहा. पर यामिनी उसे आराम करने को कह कर सफाई में लगी रही. कमरे की सफाई करने के बाद वह पास की दुकान से ब्रैड और दूध ले आई और रोहित को खाने को दिया. रोहित एक ही ब्रैड खा पाया.

रोहित की हालत ठीक नहीं थी. वह अकेला था. यामिनी पास के एक डाक्टर से संपर्क कर दवा ले आई और रोहित को खिलाई. वह शाम तक उसी के पास बैठी रही. रोहित आंखों में आंसू लिए यामिनी को देखता रहा. यामिनी उसे बारबार समझाती, ‘‘मुझ से जितना होगा करूंगी. रोते क्यों हो?’’

‘‘तुम कितनी अच्छी हो यामिनी. बचपन से मैं प्यार को तरसा हूं. मम्मीपापा मुझे छोड़ कर चले गए. साथ में मेरी सारी खुशियां भी ले गए. चाचाचाची ने मुझे आश्रय जरूर दिया. लेकिन एक बोझ समझ कर. उन से प्यार कभी नहीं मिला. जब तुम मेरी जिंदगी में आई तो मैं ने जाना कि प्यार क्या होता है? तुम्हारा प्यार, तुम्हार सेवाभाव देख कर मुझे अपने मम्मीपापा की याद आ गई. इसीलिए मेरी आंखों में आंसू आ गए.

‘‘खैर मुझे अपने चाचाचाची से कोई शिकायत नहीं है. मैं उन की अपनी औलाद तो नहीं हूं. लेकिन बचपन से मुझे किसी का साया तो नसीब हुआ,’’ रोहित की आंखों से आंसू की धारा बह रही थी.

‘‘बस करो रोहित. अभी यह सब सोचने का वक्त नहीं. स्वास्थ्य पर ध्यान दो. खुद को अकेला नहीं समझो. मैं साथ देने से कभी पीछे नहीं हटूंगी,’’ कहते हुए यामिनी ने दुपट्टे से रोहित के आंसू पोंछ दिए.

वह करीब 2 घंटे तक रोहित के पास बैठी रही. शाम होने को आ गई थी. दवा के प्रभाव से रोहित को पसीना आ गया था. बुखार कम हुआ तो वह कुछ अच्छा महसूस करने लगा था. यामिनी ने कहा, ‘‘अब मैं चलूंगी. घर पर सब मेरा इंतजार कर रहे होंगे. तुम रात में दूध गरम कर ब्रैड के साथ ले लेना. दवा भी ले लेना. किसी तरह की परेशानी हो तो फोन जरूर करना. यह नहीं सोचना कि मैं क्या कर पाऊंगी? तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं.’’

रोहित को ढांढ़स बंधा कर यामिनी अपने घर आ गई. लेकिन उसे चिंता होती रही. रात में वह सब की नजर बचा कर घर की छत पर गई और फोन कर रोहित का हाल पूछा. रोहित ने कहा कि अभी वह ठीक महसूस कर रहा है. यह जान कर यामिनी को राहत महसूस हुई.

चौथे दिन रोहित ठीक हो गया. यामिनी पिछले 2 दिन उस के घर गई थी. सब से नजर बचा कर वह रोहित के लिए घर से खाना ले जाती थी और घंटों उस के पास बैठ कर बातें करती थी. 5वें दिन रोहित कालेज आया तो यामिनी बहुत खुश हुई. उस के ठीक होने की खुशी में वह उस के गले से लिपट गई. यामिनी अब रोहित के बहुत करीब आ चुकी थी.

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ऐसे ही 3 साल कब बीत गए उन्हें एहसास ही न हुआ. खुशियों के वे पल जैसे पंख लगा कर उड़ गए और उन के जुदाई के दिन आ गए. दरअसल, उन की कालेज की पढ़ाई पूरी हो गई थी. रोहित ने आगे की पढ़ाई के लिए कालेज में ही पुन: दाखिला ले लिया. वह प्रोफैसर बनना चाहता था. लेकिन यामिनी के आगे की पढ़ाई के लिए उस के पापा ने मना कर दिया. इसीलिए अब उस का रोहित से मिलनाजुलना बेहद मुश्किल हो गया. हर पल उसे रोहित की याद आती. रोहित से दूर रहने के कारण उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता.

यामिनी के मम्मीपापा अब उस की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. इसीलिए यामिनी के लिए लड़का ढूंढ़ा जाने लगा था. उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया गया था. रोहित से दिल की बात कहना भी कठिन हो गया उस के लिए. मोबाइल फोन का ही आसरा रह गया था. वह जब भी मौका पाती, रोहित को फोन कर देती और उसे कुछ करने के लिए कहती ताकि दोनों हमेशा के लिए एक हो जाएं. लेकिन रोहित को कोई उपाय नहीं दिखता.

जब घर में शादी की बात चलती तो यामिनी की हालत बुरी हो जाती. रोहित से दूर होने की बात सोच कर उस का मन अजीब हो जाता. अपने मम्मीपापा को रोहित के बारे में बताने की उस की हिम्मत नहीं होती थी. पापा पुलिस में थे. इसीलिए गरम मिजाज के थे. हालांकि शायद ही वह कभी गुस्सा हुए हों यामिनी पर. वह उन की इकलौती बेटी जो थी.

एक दिन यामिनी को उस की मां ने बताया कि उसे देखने कुछ मेहमान आएंगे. लड़का डाक्टर है. यह जान कर यामिनी की आंखों से आंसू निकल गए. वह किसी तरह सब से बच कर रोहित से मिलने गई. उस के गले से लिपट कर रो पड़ी. जब उस ने अपने लिए लड़का देखे जाने की बात बताई तो रोहित भी अपने आंसू नहीं रोक पाया.

तभी यामिनी बोली, ‘‘रोहित, तुम मुझे मेरे पापा से मांग लो. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊंगी.’’

उलझे रिश्ते- भाग 2: क्या प्रेमी से बिछड़कर खुश रह पाई रश्मि

Writer- Ravi

‘‘जानती हूं पर यह कौन सा तरीका है?’’ रश्मि ने प्यार से समझाने की कोशिश की,  ‘‘कुछ दिन इंतजार करो मिस्टर. रश्मि तुम्हारी है. एक दिन पूरी तरह तुम्हारी हो जाएगी.’’ परंतु सुधीर पर कोई असर नहीं हुआ. हद से आगे बढ़ता देख रश्मि ने सुधीर को धक्का दिया और हिरणी सी कुलांचे भरती हुई घर से बाहर निकल गई. उस रात रश्मि सो नहीं पाई. उसे सुधीर का यों बांहों में लेना अच्छा लगा. कुछ देर और रुक जाती तो…सोच कर सिहरन सी दौड़ गई. और एक दिन ऐसा आया जब पढ़ाई की आड़ में चल रहा प्यार का खेल पकड़ा गया. दोनों अब तक बी.कौम अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुके थे और एकदूजे में इस कदर खो चुके थे कि उन्हें आभास भी नहीं था कि इस रिश्ते को रश्मि के पिता और भाई कतई स्वीकार नहीं करेंगे. उस दिन रश्मि के घर कोई नहीं था. वह अकेली थी कि सुधीर पहुंच गया. उसे देख रश्मि की धड़कनें बढ़ गईं. वह बोली,  ‘‘सुधीर जाओ तुम, पापा आने वाले हैं.’’

‘‘तो क्या हो गया. दामाद अपने ससुराल ही तो आया है,’’ सुधीर ने मजाकिया लहजे में कहा.

‘‘नहीं, तुम जाओ प्लीज.’’

‘‘रुको डार्लिंग यों धक्के मार कर क्यों घर से निकाल रही हो?’’ कहते हुए सुधीर ने रश्मि को अपनी बांहों में भर लिया. तभी जो न होना चाहिए था वह हो गया. रश्मि के पापा ने अचानक घर में प्रवेश किया और दोनों को एकदूसरे की बांहों में समाया देख आगबबूला हो गए. फिर पता नहीं कितने लातघूंसे सुधीर को पड़े. सुधीर कुछ बोल नहीं पाया. बस पिटता रहा. जब होश आया तो अपने घर में लेटा हुआ था. सुधीर और रश्मि के परिवारजनों की बैठक हुई. सुधीर की मम्मी ने प्रस्ताव रखा कि वे रश्मि को बहू बनाने को तैयार हैं. फिर काफी सोचविचार हुआ. रश्मि के पापा ने कहा,  ‘‘बेटी को कुएं में धकेल दूंगा पर इस लड़के से शादी नहीं करूंगा. जब कोई काम नहीं करता तो क्या खाएगाखिलाएगा?’’ आखिर तय हुआ कि रश्मि की शादी जल्द से जल्द किसी अच्छे परिवार के लड़के से कर दी जाए. रश्मि और सुधीर के मिलने पर पाबंदी लग गई पर वे दोनों कहीं न कहीं मिलने का रास्ता निकाल ही लेते. और एक दिन रश्मि के पापा ने घर में बताया कि दिल्ली से लड़के वाले आ रहे हैं रश्मि को देखने. यह सुन कर रश्मि को अपने सपने टूटते नजर आए. उस ने कुछ नहीं खायापीया.

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भाभी ने समझाया, ‘‘यह बचपना छोड़ो रश्मि, हम इज्जतदार खानदानी परिवार से हैं. सब की इज्जत चली जाएगी.’’

‘‘तो मैं क्या करूं? इस घर में बच्चों की खुशी का खयाल नहीं रखा जाता. दोनों दीदी कौन सी सुखी हैं अपने पतियों के साथ.’’

‘‘तेरी बात ठीक है रश्मि, लेकिन समाज, परिवार में ये बातें माने नहीं रखतीं. तेरे गम में पापा को कुछ हो गया तो…उन्होंने कुछ कर लिया तो सब खत्म हो जाएगा न.’’

रश्मि कुछ नहीं बोल पाई. उसी दिन दिल्ली से लड़का संभव अपने छोटे भाई राजीव और एक रिश्तेदार के साथ रश्मि को देखने आया. रश्मि को देखते ही सब ने पसंद कर लिया. रिश्ता फाइनल हो गया. जब यह बात सुधीर को रश्मि की एक सहेली से पता चली तो उस ने पूरी गली में कुहराम मचा दिया,  ‘‘देखता हूं कैसे शादी करते हैं. रश्मि की शादी होगी तो सिर्फ मेरे साथ. रश्मि मेरी है.’’ पागल सा हो गया सुधीर. इधरउधर बेतहाशा दौड़ा गली में. पत्थर मारमार कर रश्मि के घर की खिड़कियों के शीशे तोड़ डाले. रश्मि के पिता के मन में डर बैठ गया कि कहीं ऐसा न हो कि लड़के वालों को इस बात का पता चल जाए. तब तो इज्जत चली जाएगी. सब हालात देख कर तय हुआ कि रश्मि की शादी किसी दूसरे शहर में जा कर करेंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी. अब एक तरफ प्यार, दूसरी तरफ मांबाप के प्रति जिम्मेदारी. बहुत तड़पी, बहुत रोई रश्मि और एक दिन उस ने अपनी भाभी से कहा, ‘‘मैं अपने प्यार का बलिदान देने को तैयार हूं. परंतु मेरी एक शर्त है. मुझे एक बार सुधीर से मिलने की इजाजत दी जाए. मैं उसे समझाऊंगी. मुझे पूरी उम्मीद है वह मान जाएगा.’’

भाभी ने घर वालों से छिपा कर रश्मि को सुधीर से आखिरी बार मिलने की इजाजत दे दी. रश्मि को अपने करीब पा कर फूटफूट कर रोया सुधीर. उस के पांवों में गिर पड़ा. लिपट गया किसी नादान छोटे बच्चे की तरह,  ‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ रश्मि. मैं नहीं जी  पाऊंगा, तुम्हारे बिना. मर जाऊंगा.’’ यंत्रवत खड़ी रह गई रश्मि. सुधीर की यह हालत देख कर वह खुद को नहीं रोक पाई. लिपट गई सुधीर से और फफक पड़ी, ‘‘नहीं सुधीर, तुम ऐसा मत कहो, तुम बच्चे नहीं हो,’’ रोतेरोते रश्मि ने कहा.

‘‘नहीं रश्मि मैं नहीं रह पाऊंगा, तुम बिन,’’ सुबकते हुए सुधीर ने कहा.

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‘‘अगर तुम ने मुझ से सच्चा प्यार किया है तो तुम्हें मुझ से दूर जाना होगा. मुझे भुलाना होगा,’’ यह सब कह कर काफी देर समझाती रही रश्मि और आखिर अपने दिल पर पत्थर रख कर सुधीर को समझाने में सफल रही. सुधीर ने उस से वादा किया कि वह कोई बखेड़ा नहीं करेगा. ‘‘जब भी मायके आऊंगी तुम से मिलूंगी जरूर, यह मेरा भी वादा है,’’ रश्मि यह वादा कर घर लौट आई. पापा किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे, इसलिए एक दिन रात को घर के सब लोग चले गए एक अनजान शहर में. रश्मि की शादी दिल्ली के एक जानेमाने खानदान में हो गई. ससुराल आ कर रश्मि को पता चला कि उस के पति संभव ने शादी तो उस से कर ली पर असली शादी तो उस ने अपने कारोबार से कर रखी है. देर रात तक कारोबार का काम निबटाना संभव की प्राथमिकता थी. रश्मि देर रात तक सीढि़यों में बैठ कर संभव का इंतजार करती. कभीकभी वहीं बैठेबैठे सो जाती. एक तरफ प्यार की टीस, दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से रश्मि टूट कर रह गई. ससुराल में पासपड़ोस की हमउम्र लड़कियां आतीं तो रश्मि से मजाक करतीं  ‘‘आज तो भाभी के गालों पर निशान पड़ गए. भइया ने लगता है सारी रात सोने नहीं दिया.’’ रश्मि मुसकरा कर रह जाती. करती भी क्या, अपना दर्द किस से बयां करती? पड़ोस में ही महेशजी का परिवार था. उन के एक कमरे की खिड़की रश्मि के कमरे की तरफ खुलती थी. यदाकदा रात को वह खिड़की खुली रहती तो महेशजी के नवविवाहित पुत्र की प्रणयलीला रश्मि को देखने को मिल जाती. तब सिसक कर रह जाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता था रश्मि के पास.

संभव जब कभी रात में अपने कामकाज से जल्दी फ्री हो जाता तो रश्मि के पास चला आता. लेकिन तब तक संभव इतना थक चुका होता कि बिस्तर पर आते ही खर्राटे भरने लगता. एक दिन संभव कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था और रश्मि तपती दोपहर में  फर्स्ट फ्लोर पर बने अपने कमरे में सो रही थी. अचानक उसे एहसास हुआ कोई उस के बगल में आ कर लेट गया है. रश्मि को अपनी पीठ पर किसी मर्दाना हाथ का स्पर्श महसूस हुआ. वह आंखें मूंदे पड़ी रही. वह स्पर्श उसे अच्छा लगा. उस की धड़कनें तेज हो गईं. सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं. उसे लगा शायद संभव है, लेकिन यह उस का देवर राजीव था. उसे कोई एतराज न करता देख राजीव का हौसला बढ़ गया तो रश्मि को कुछ अजीब लगा. उस ने पलट कर देखा तो एक झटके से बिस्तर पर उठ बैठी और कड़े स्वर में राजीव से कहा कि जाओ अपने रूम में, नहीं तो तुम्हारे भैया को सारी बात बता दूंगी, तो वह तुरंत उठा और चला गया. उधर सुधीर ने एक दिन कहीं से रश्मि की ससुराल का फोन नंबर ले कर रश्मि को फोन किया तो उस ने उस से कहा कि सुधीर, तुम्हें मैं ने मना किया था न कि अब कभी मुझ से संपर्क नहीं करना. मैं ने तुम से प्यार किया था. मैं उन यादों को खत्म नहीं करना चाहती. प्लीज, अब फिर कभी मुझ से संपर्क न करना. तब उम्मीद के विपरीत रश्मि के इस तरह के बरताव के बाद सुधीर ने फिर कभी रश्मि से संपर्क नहीं किया.

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Romantic Story in Hindi- रिश्तों की परख: भाग 3

लेखक- शैलेंद्र सिंह परिहार

हमेशा ठंडे दिमाग से काम लेने वाली मम्मी क्रोधित हो गई थीं, ‘नहीं करना किसी के फोनवोन का इंतजार, दूसरा लड़का देखना शुरू कर दीजिए.’

‘पागल न बनो,’ पापा ने समझाया था, ‘अपनी बेटी को यह सपना तुम ने ही दिखाया था, पल भर में उसे कैसे तोड़ दोगी? कभी सोचा है उस के दिल को कितनी ठेस लगेगी?’

एक दिन मां ने मुझ से कहा था, ‘बेटी, कमल शादी के लिए तैयार नहीं है. कहता है कि यदि उस की जबरन शादी की गई तो वह आत्महत्या कर लेगा, अब तू ही बता, हम लोग क्या करें?’

मैं इतना ही पूछ पाई थी, ‘वह इस समय कहां है?’

‘कहां होगा…वहीं…इलाहाबाद में मर रहा है,’ मम्मी ने गुस्से से कहा था.

‘मैं उस से एक बार मिलूंगी…एक बार मां…बस, एक बार,’ मैं ने रोते हुए कहा था.

पापा मुझे ले कर इलाहाबाद गए थे. वह अपने कमरे में ही मिला था. बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई, कपड़े अस्तव्यस्त, हालत पागलों की तरह लग रही थी. पापा मुझे छोड़ कर कमरे से बाहर चले गए. औपचारिक बातचीत होने के बाद वह मुझ से बोला था, ‘तुम लड़कियों को क्या चाहिए, बस, एक अच्छा सा पति, एक सुंदर सा घर, बालबच्चे और घरखर्च के लिए हर महीने कुछ पैसे. लेकिन मेरे सपने दूसरे हैं. अभी शादी के बारे में सोच भी नहीं सकता. तुम जहां मन करे शादी कर लो.’

कमल की बातें सुन कर मुझे भी क्रोध आ गया था, ‘तुम मुझे अपने पास न रखो, लेकिन शादी तो कर सकते हो, मेरे मांबाप भी चिंतामुक्त हों, कब तक वह लोग तुम्हारे आई.ए.एस. बन जाने का इंतजार करते रहेंगे?’

मेरी बात सुनते ही वह गुस्से से चीख पड़ा, ‘इंतजार नहीं कर सकती हो तो मर जाओ लेकिन मेरा पीछा छोड़ो…प्लीज…’

उस की बात सुन मैं सन्न रह गई थी. एक ही पल में 10 सालों से संजोया हुआ स्वप्न बिखर गया था. सोच रही थी, क्या यह वही कमल है? मन से निकली हूक तब शब्दों में इस तरह फूटी थी कि मरूंगी तो नहीं लेकिन एक बात कहती हूं, जब किसी बेबस की ‘आह’ लगती है तो मौत भी नसीब नहीं होती मिस्टर कमलकांत वर्मा, और इसे याद रखना.

घर आ कर मैं मम्मी से बोली थी, ‘आप लोग जहां भी मेरी शादी करना चाहें कर सकते हैं, लेकिन जिस से भी कीजिएगा उसे मेरी पिछली जिंदगी के बारे में पता होना चाहिए.’

1 वर्ष के अंदर ही मेरी शादी सुप्रीम कोर्ट के वकील गौरव के साथ हो गई. एक जमाने में उन के पापा वहीं के जानेमाने वकील थे. हम लोग दिल्ली में ही रहने लगे. गौरव जैसा चाहने वाला पति पा कर मैं कमल को भूल सी गई. साल भर में एक बार ही मायके जाना हो पाता था. इस बार तो अकेली ही जा रही थी. गौरव को कोर्ट का कुछ आवश्यक काम निकल आया था.

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मैं ने घड़ी की तरफ देखा, रात के 3 बज रहे थे. ट्रेन अपनी गति से चली जा रही थी कि अचानक कर्णभेदी धमाका हुआ और आंखों के सामने अंधेरा सा छाता चला गया. जब होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया. गौरव भी आ चुके थे. एक ही ट्रैक पर 2 ट्रेनें आ गई थीं. आमनेसामने की टक्कर थी. कई लोग मारे गए थे. सैकड़ों लोग घायल हुए थे. मैं जिस बोगी में थी वह पीछे थी इसलिए कोई खास क्षति नहीं हुई थी फिर भी बेटे की हालत गंभीर थी. उसे 5-6 घंटे बाद होश आया था. 2 दिन बाद जब मैं डिस्चार्ज हो कर जा रही थी तो नर्स ने मुझे एक खत ला कर यह कहते हुए दिया कि मैडम, यह आप के लिए है…देना भूल गई थी…माफ कीजिएगा.

मैं ने आश्चर्य से पूछा था, ‘‘किस ने दिया?’’

‘‘वही, जो आप लोगों को यहां तक ले कर आया था. क्या आप नहीं जानतीं?’’

‘‘नहीं?’’

‘‘कमाल है,’’ नर्स आश्चर्य से बोल रही थी, ‘‘उस ने आप की मदद की, आप के बेटे को अपना खून भी डोनेट किया और आप कहती हैं कि आप उस को नहीं जानतीं?’’

मैं आतुरता से खत को पढ़ने लगी :

‘स्नेह,

सोचा था कि अपने किए की माफी मांग लूंगा लेकिन मृत्यु के इस तांडव ने मौका ही नहीं दिया. रिजर्वेशन टिकट पर ही गौरव का मोबाइल नंबर था. उन्हें फोन कर दिया है. वह जब तक नहीं आते मैं यहां रहूंगा. हो सके तो मुझे माफ कर देना. तुम्हारा गुनाहगार कमल.’

पत्र को गौरव ने भी पढ़ा था. ‘‘अच्छा तो वह कमल था…’’

गौरव खोएखोए से बोले थे, ‘‘सचमुच उस ने बड़ी मदद की, हमारे बेटे को एक नया जीवन दिया है.’’

बात आईगई हो गई. पीछे गौरव को एक केस में काफी व्यस्त पाया था. पूछने पर बस यही कहते, ‘‘समझ लो स्नेह, एक महत्त्वपूर्ण केस है. यदि जीत गया तो बड़ा आत्मिक सुख मिलेगा.’’

1 वर्ष तक केस चलता रहा, फैसला हुआ, गौरव के पक्ष में ही. वह उस दिन खुशी से पागल हो रहे थे. शाम को आते ही बोले, ‘‘यार, जल्दी से अच्छी- अच्छी चीजें बना लो, मेरा एक दोस्त आ रहा है, आई.ए.एस. है.’’

‘‘कौन दोस्त?’’ मैं ने पूछा था.

‘‘जब आएगा तो खुद ही उसे देख लेना, मैं उसी को लेने जा रहा हूं.’’

कुछ देर बाद गौरव वापस आए थे और अपने साथ जिसे ले कर आए थे उसे देख कर मैं अवाक् रह गई. यह तो ‘कमल’ है लेकिन यह कैसे हो सकता है?

‘‘स्नेह,’’ गौरव ने प्यार से कहा था, ‘‘तुम्हें आहत कर के इस ने भी कोई सुख नहीं पाया है. हमारी शादी के 1 साल बाद इस का आई.ए.एस. में चयन हुआ था. लेकिन तब तक लगातार मिलती असफलताओं ने इसे विक्षिप्त कर दिया था. यह पागलों की तरह हरकतें करने लगा था. इस कारण आयोग ने इस की नियुक्ति को भी निरस्त कर दिया था.

‘‘3 साल तक मेंटल हास्पिटल में रहने के बाद जब यह ठीक हुआ तो सब से पहले तुम्हारे ही घर गया, तुम से माफी मांगने के लिए. लेकिन पापाजी ने इसे हमारा पता ही नहीं दिया था और फिर जीवन से निराश, जीवनयापन के लिए इस ने टी.सी. की नौकरी कर ली. आज मैं इसी का केस जीता हूं, अदालत ने इस की पुन: नियुक्ति का फैसला दिया है. आज यह फिर तुम से माफी मांगने ही आया है.’’

वर्षों बाद मुझे वही कमल दिखा था, जिस से मैं पहली बार मिली थी, शर्मीला और संकोची. उस ने अपने दोनों हाथ मेरे सामने जोड़ दिए थे. मुझ से नजर मिलाने का साहस नहीं कर पा रहा था. उस की आंखों से प्रायश्चित्त के आंसू बह निकले, ‘‘स्नेह, मैं तुम्हारा अपराधी हूं, एक लक्ष्य पाने के लिए जीवन के ही लक्ष्य को भूल गया था…आप के कहे शब्द…आज भी मेरे हृदय में कांटे की तरह चुभते हैं…लगता है आज भी एक आह मेरा पीछा कर रही है…हो सके तो मुझे माफ कर दो.’’

‘‘कमल,’’ मैं ने भरे गले से कहा, ‘‘मैं ने तो तुम्हें उसी दिन माफ कर दिया था जिस दिन तुम ने मेरी ममता की रक्षा की थी. अब तुम से कोई शिकायत नहीं…तुम जहां भी रहो खुश रहो, यह मेरे मन की आवाज है.’’

‘‘हां, कमल,’’ गौरव भी उसे समझाते हुए बोले थे, ‘‘कल तुम ने एक रिश्ते को परखने में भूल की थी, आज फिर से वही भूल मत करना, मातापिता को खुश रखना, अपना घरसंसार बसाना और अपनी शादी में हमें भी बुलाना…भूल तो न जाओगे?’’

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वह गौरव के गले लग रो पड़ा. निर्मल जल के उस शीतल प्रवाह ने हमारे हृदय के सारे मैल को एक ही पल में धो दिया.

‘‘7 वर्षों तक दिशाहीन और पागलों सा जीवन व्यतीत किया है मैं ने, मर ही चुका था, आप ने तो मुझे नया जीवन ही दिया…कैसे भूल जाऊंगा.’’

कमल के जाने के बाद मैं गौरव के सीने से लगते हुए बोली थी, ‘‘गौरव, सचमुच मुझे आप पर गर्व है…लेकिन यह क्या, आप की आंखों में भी आंसू.’’

‘‘हां…खुशी के हैं, जानती हो सच्चा प्रायश्चित्त वही होता है जब आंसू उस की आंखों से भी निकलें जिन के लिए प्रायश्चित्त किया गया हो, आज कमल का प्रायश्चित्त पूरा हुआ.’’

पति की बात सुन कर स्नेह भी अपनेआप को रोने से न रोक सकी.

Family Story in Hindi- खुशियों की दस्तक: भाग 2

‘‘मैं आप का दर्द समझता हूं. मैं भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहा हूं. कितनी खूबसूरत थी मेरी जिंदगी और आज क्या हो गई,’’ कौस्तुभ ने कहा. एकदूसरे का दर्द बांटतेबांटते कौस्तुभ और प्रिया ने एकदूसरे का नंबर भी शेयर कर लिया. फिर अकसर दोनों के बीच बातें होने लगीं. दोनों को एकदूसरे का साथ पसंद आने लगा. वैसे भी दोनों की जिंदगी एक सी ही थी. एक ही दर्द से गुजर रहे थे दोनों. एक दिन घर वालों के सुझाव पर दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. कोर्ट में सादे समारोह में उन की शादी हो गई.कौस्तुभ को एक नाइट कालेज में नौकरी मिल गई. साथ ही वह शिक्षा से जुड़ी किताबें भी लिखने लगा और अनुवाद का काम भी करने लगा. 2 साल के अंदर उन के घर एक चांद सा बेटा हुआ. बच्चा पूर्ण स्वस्थ था और चेहरा बेहद खूबसूरत. दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा. बेटे को अच्छी शिक्षा दिला कर ऊंचे पद पर पहुंचाना ही अब उन का लक्ष्य बन गया था. बच्चा पिता की तरह तेज दिमाग का और मां की तरह आकर्षक निकला. मगर थोड़ा सा बड़ा होते ही वह मांबाप से कटाकटा सा रहने लगा. वह अपना अधिकांश वक्त दादादादी या रामू काका के पास ही गुजारता, जिसे उस की देखभाल के लिए रखा गया था.

कौस्तुभ समझ रहा था कि वह बच्चा है, इसलिए उन के जले हुए चेहरों को देख कर डर जाता है. समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. लेकिन 8वीं कक्षा के फाइनल ऐग्जाम के बाद एक दिन उस ने अपने दादा से जिद की, ‘‘बाबा, मुझे होस्टल में रह कर पढ़ना है.’’

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‘‘पर ऐसा क्यों बेटे?’’ बाबा चौंक उठे थे.कौस्तुभ तो अपने बेटे को शहर के सब से अच्छे स्कूल में डालने वाला था. इस के लिए कितनी कठिनाई से दोनों ने पैसे इकट्ठा किए थे. मगर बच्चे की बात ने सभी को हैरत में डाल दिया. दादी ने लाड़ लड़ाते हुए पूछा था, ‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो बेटा, भला यहां क्या प्रौब्लम है तुम्हें? हम इतना प्यार करते हैं तुम से, होस्टल क्यों जाना चाहते हो?’’ मोहित ने साफ शब्दों में कहा था, ‘‘मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि तुम्हारे मांबाप कितने बदसूरत हैं. इसीलिए वे मेरे घर भी नहीं आते. मैं इन के साथ नहीं रहना चाहता.’’ मोहित की बात पर दादी एकदम से भड़क उठी थीं, ‘‘ये क्या कह रहे हो? तुम तो जानते हो कि मम्मीपापा कितनी मेहनत करते हैं तुम्हारे लिए, तभी तुम्हें नएनए कपड़े और किताबें ला कर देते हैं. और तुम्हें कितना प्यार करते हैं, यह भी जानते हो तुम. फिर भी ऐसी बातें कर रहे हो.’’ तभी कौस्तुभ ने मां का हाथ दबा कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया और दबे स्वर में बोला, ‘‘ये क्या कर रही हो मम्मी? बच्चा है, इस की गलती नहीं.’’

मगर कई दिनों तक मोहित इसी बात पर अड़ा रहा कि उसे होस्टल में रह कर पढ़ना है, यहां नहीं रहना. दादादादी इस के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. आखिर पूरे घर में चहलपहल उसी की वजह से तो रहती थी. तब एक दिन कौस्तुभ ने अपनी मां को समझाया, ‘‘मां, मैं चाहता हूं, हमारा बच्चा न सिर्फ शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहे और इस के लिए जरूरी है कि हम उसे अपने से दूर रखें. वह हमारे साथ रहेगा तो जाहिर है कभी भी खुश और मानसिक रूप से मजबूत नहीं बन सकेगा. मेरी गुजारिश है कि वह जो चाहता है, उसे वैसा ही करने दो. मैं कल ही देहरादून के एक अच्छे स्कूल में इस के दाखिले का प्रयास करता हूं. भले ही वहां फीस ज्यादा है पर हमारे बच्चे की जिंदगी संवर जाएगी. उसे वह मिल जाएगा, जिस का वह हकदार है और जो मुझे नहीं मिल सका.’’

2 सप्ताह के अंदर ही कौस्तुभ ने प्रयास कर के मोहित का ऐडमिशन देहरादून के एक अच्छे स्कूल में करा दिया, जहां उसे 70 हजार डोनेशन के देने पड़े. पर बच्चे की ख्वाहिश पूरी करने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था. मोहित को विदा करने के बाद प्रिया बहुत रोई थी. उसे लग रहा था जैसे मोहित हमेशा के लिए उस से बहुत दूर जा चुका है. और वास्तव में ऐसा ही हुआ. छुट्टियों में भी मोहित आता तो बहुत कम समय के लिए और उखड़ाउखड़ा सा ही रहता. उधर उस के पढ़ाई के खर्चे बढ़ते जा रहे थे जिन्हें पूरा करने के लिए कौस्तुभ और प्रिया को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही थी. समय बीतते देर नहीं लगती. मोहित अब बड़ा हो चुका था. उस ने बीए के बाद एम.बी.ए. करने की जिद की. अबतक कौस्तुभ के मांबाप दिवंगत हो चुके थे. कौस्तुभ और प्रिया स्वयं ही एकदूसरे की देखभाल करते थे. उन्होंने एक कामवाली रखी थी, जो घर के साथ बाहर के काम भी कर देती थी. इस से उन्हें थोड़ा आराम मिल जाता था. मगर जब मोहित ने एम.बी.ए. की जिद की तो कौस्तुभ के लिए पैसे जुटाना एक कठिन सवाल बन कर खड़ा हो गया. कम से कम 3-4 लाख रुपए तो लगने ही थे. इतने रुपयों का वह एकसाथ इंतजाम कैसे करता?

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तब प्रिया ने सुझाया, ‘‘क्यों न हम घर बेच दें? हमारा क्या है, एक छोटे से कमरे में भी गुजारा कर लेंगे. मगर जरूरी है कि मोहित ढंग से पढ़ाईलिखाई कर किसी मुकाम तक पहुंचे.’’ ‘‘शायद ठीक कह रही हो तुम. घर बेच देंगे तो काफी रकम मिल जाएगी,’’ कौस्तुभ ने कहा. अगले ही दिन से वह इस प्रयास में जुट गया. अंतत: घर बिक गया और उसे अच्छी रकम भी मिल गई. उन्होंने बेटे का ऐडमिशन करा दिया और स्वयं एक छोटा घर किराए पर ले लिया. बाकी बचे रुपए बैंक में जमा करा दिए ताकि उस के ब्याज से बुढ़ापा गुजर सके. 1 कमरे और किचन, बाथरूम के अलावा इस घर में एक छोटी सी बालकनी थी, जहां बैठ कर दोनों धूप सेंक सकते थे.

बेटे के ऐडमिशन के साथ खर्चे भी काफी बढ़ गए थे, अत: उन्होंने कामवाली भी हटा दी और दूसरे खर्चे भी कम कर दिए. अब उन्हें इंतजार था कि बेटे की पढ़ाई पूरी होते ही उस की अच्छी सी नौकरी लग जाए और वे उस के सपनों को पूरा होते अपनी आंखों से देखें. फिर एक खूबसूरत सी लड़की से उस की शादी करा दें और पोतेपोतियों को खिलाएं. मगर एक दिन मोहित के आए फोन ने उन के इस सपने पर भी पल में पानी फेर दिया, जब उस ने बताया कि पापा मुझे सिंगापुर में एक अच्छी जौब मिल गई है और अगले महीने ही मैं हमेशा के लिए सिंगापुर शिफ्ट हो जाऊंगा. ‘‘क्या? सिंगापुर जा रहा है? पर क्यों बेटे?’’ कौस्तुभ की जबान लड़खड़ा गई, ‘‘अपने देश में भी तो अच्छीअच्छी नौकरियां हैं, फिर तू बाहर क्यों जा रहा है?’’ लपक कर प्रिया ने फोन ले लिया था, ‘‘नहींनहीं बेटा, इतनी दूर मत जाना. तुझे देखने को आंखें तरस जाएंगी. बेटा, तू हमारे साथ नहीं रहना चाहता तो न सही पर कम से कम इसी शहर में तो रह. हम तेरे पास नहीं आएंगे, पर इतना सुकून तो रहेगा कि हमारा बेटा हमारे पास ही है. कभीकभी तो तेरी सूरत देखने को मिल जाएगी. पर सिंगापुर चला गया तो हम…’’ कहतेकहते प्रिया रोने लगी थी.

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‘‘ओह ममा कैसी बातें करती हो? भारत में कितनी गंदगी और भ्रष्टाचार है. मैं यहां नहीं रह सकता. विदेश से भी आनाजाना तो हो ही जाता है. कोशिश करूंगा कि साल दो साल में एक दफा आ जाऊं,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया था. प्रिया के आंसू आंखों में सिमट गए. उस ने रिसीवर रखा और बोली, ‘‘वह फैसला कर चुका है. वह हम से पूरी तरह आजादी चाहता है, इसलिए जाने दो उसे. हम सोच लेंगे हमारी कोई संतान हुई ही नहीं. हम दोनों ही एकदूसरे के दुखदर्द में काम आएंगे, सहारा बनेंगे. बस यह खुशी तो है न कि हमारी संतान जहां भी है, खुश है.’’ उस दिन के बाद कौस्तुभ और प्रिया ने बेटे के बारे में सोचना छोड़ दिया. 1 माह बाद मोहित आया और अपना सामान पैक कर हमेशा के लिए सिंगापुर चला गया. शुरुआत में 2-3 माह पर एकबार फोन कर लेता था, मगर धीरेधीरे उन के बीच एक स्याह खामोशी पसरती गई. प्रिया और कौस्तुभ ने दिल पत्थर की तरह कठोर कर लिया. खुद को और भी ज्यादा कमरे में समेट लिया. धीरेधीरे 7 साल गुजर गए. इन 7 सालों में सिर्फ 2 दफा मोहित का फोन आया. एक बार अपनी शादी की खबर सुनाने को और दूसरी दफा यह बताने के लिए कि उस का 1 बेटा हो गया है, जो बहुत प्यारा है.

Crime Story in Hindi: वह नीला परदा- भाग 6: आखिर ऐसा क्या देख लिया था जौन ने?

Writer- Kadambari Mehra

पूर्व कथा

एक रोज जौन सुबहसुबह अपने कुत्ते डोरा के साथ जंगल में सैर के लिए गया, तो वहां नीले परदे में लिपटी सड़ीगली लाश देख कर वह बुरी तरह घबरा गया. उस ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. बिना सिर और हाथ की लाश की पहचान करना पुलिस के लिए नामुमकिन हो रहा था. ऐसे में हत्यारे तक पहुंचने का जरिया सिर्फ वह नीला परदा था, जिस में उस लड़की की लाश थी. इंस्पैक्टर क्रिस्टी ने टीवी पर वह नीला परदा बारबार दिखाया, मगर कोई सुराग हाथ नहीं लगा. एक रोज क्रिस्टी के पास किसी जैनेट नाम की लड़की का फोन आया, जो पेशे से नर्स थी. वह क्रिस्टी से मिल कर नीले परदे के बारे में कुछ बताना चाहती थी.

जैनेट ने क्रिस्टी को जिस लड़की का फोटो दिखाया उस का नाम फैमी था. फोटो में वह अपने 3 साल के बेटे को गालों से सटाए बैठी थी. जैनेट ने बताया वह छुट्टियों में अपने वतन मोरक्को गई थी. क्रिस्टी ने मोरक्को से यहां आ कर बसी लड़कियों की खोजबीन शुरू की. आखिरकार क्रिस्टी को फहमीदा सादी नाम की एक महिला की जानकारी मिली. क्रिस्टी फहमीदा के परिवार से मिलने मोरक्को गया. वहां फहमीदा की मां ने लंदन में बसे अपने 2-3 जानकारों के पते दिए. क्रिस्टी को लारेन नाम की औरत ने बताया कि फहमीदा किसी मुहम्मद नाम के व्यक्ति से प्यार करती थी. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली थी. एक रोज लारेन ने क्रिस्टी को बताया कि उस ने मुहम्मद को देखा है. क्रिस्टी और लारेन जब उस जगह पहुंचे तो पता चला कि यह दुकान मुहम्मद की नहीं, बल्कि साफिया नासेर नाम की औरत की थी. जिस के दूसरे पति का नाम नासेर था. अब सवाल यह उठ रहा था, आखिर साफिया दुकान बेच कर कहां चली गई?

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अगले दिन मौयरा ने अपनी एक तुर्की सहेली को तैयार किया और वह साफिया के बारे में उस दुकान के पासपड़ोस में पूछताछ कर आई. किसी ने बताया कि उस ने दूर कहीं नया रेस्टोरेंट खोल लिया है.

क्रिस्टी पिछले 6 सालों में जितने नए रेस्टोरेंट खोले गए, सब का कच्चाचिट्ठा निकाला. लेकिन कहीं कोई मुहम्मद या साफिया नासेर नहीं मिली. वह फिर हताश हो गया. तभी उसे याद आया कि जौन को देखने जाना है.

शनिवार को सजधज कर क्रिस्टी ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘चलो, हम लोग जौन को देख आएं. पहले वोकिंग जाएंगे, वहां का बाजार अच्छा है. तुम चाहो तो किसी बुटीक में घूमती रहना. मैं जौन से मिल कर तुम से मिल लूंगा. फिर हम एस्कौट में रुक कर कुछ खापी लेंगे. अच्छी जगह है. थोड़ा ड्राइव पर जाने का मन कर रहा है.’’

क्रिस्टी की बीवी रोजी उस के साथ तैयार हो कर निकली. रोजी ने क्रिस्टी को जौन वाले अस्पताल के पोर्च में उतार दिया और खुद खरीदारी करने निकल गई. क्रिस्टी जौन से मिला तो वह बेहद खुश हुआ. उसे देखते ही वह बोला, ‘‘मुझे पता है कि तुम ने आधा रास्ता तय कर लिया है और जल्द ही कातिल तुम्हारे सामने होगा.’’

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क्रिस्टी किस मुंह से बताता कि सभी रास्ते बंद हो चुके हैं. उस ने प्रकट में जरा भी संशय नहीं दिखाया. यही बताया कि खोज चल रही है.

‘‘तुम क्यों इतना परेशान हो, जौन? लंदन में तो आए दिन कत्ल होते रहते हैं. पिछले 20 सालों में विभिन्न जगहों से आ कर यहां बसने वाले लोग अपनी विभीषकाएं संग लाए हैं. ग्रीक साइप्रस के लोगों से तंग है, इटैलियन स्पैनिश लोगों को पसंद नहीं करते, रूमानिया वाले क्रोएशिया से घृणा करते हैं, पोलिश जर्मन से, तो फ्रेंच अंगरेजों से. कहां तक गिनाएं. सब के आने से क्राइम रेट बढ़ गया है.

‘‘सरकारें उन के अपने देशों की बनतीगिरती हैं, धरने सब यहां देते हैं. जुलूस निकालते हैं, तोड़फोड़, आपसी लड़ाइयां, मर्डर… क्या नहीं करते? अपने घरों में बैठे थे तो किसी को जानते भी नहीं थे. यहां आ कर अनजानों से बेपनाह दुश्मनी सिर्फ पूर्वाग्रह के कारण… सरकार, पुलिस और हमारी न्याय व्यवस्था सब पर भार डालते हैं ये सिरफिरे.

‘‘हमारा इंगलैंड ऐसा तो नहीं था. जब मैं बच्चा था सब के दरवाजे खुले पड़े रहते थे गली में. हम सड़क पर फुटबाल खेलते थे, न ट्रैफिक था न कोई खतरा, न बच्चे गायब होते थे, न लड़कियां. अब तो जाने कितने खतरे पैदा हो गए हैं.’’

‘‘हां, पहले केवल किलों, रजवाड़ों में अंगरेजों के भूतप्रेत दिखने की अफवाहें उड़ाई जाती थी. कब्रिस्तान तो बेपनाह आवाजाही के छोटे रास्ते हुआ करते थे. हम कब्रिस्तान में निडर हो कर लुकाछिपी का खेल खेलते थे. यह सब सिफ एक अंधविश्वास ही थी,’’ जौन ने कहा.

‘‘तुम क्यों डरे?’’

‘‘उस औरत की वजह से.’’

‘‘कैसी थी दिखने में, क्या पहने थी?’’

‘‘कह नहीं सकता.’’

‘‘जौन, तुम अपनी इच्छाशक्ति को काबू में रखो. मर्द हो, अपनी बीवी का खयाल करो. जो कुछ तुम महसूस कर रहे हो वह सिर्फ तुम्हारा अपना डर है. तुम ने तो उसे देखा तक नहीं, सिर्फ कपड़ा छुआ, वह भी एक कोना, मुश्किल से 2 इंच का.’’

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‘‘डेविड, तुम ने देखा क्या?’’

‘‘जौन, अब मैं जाऊंगा. रोजी आती होगी. मैं आराम करना चाहता हूं. जरा तबीयत ताजा हो जाए तो ध्यान ज्यादा दे पाऊंगा. यह सब काम बेहद भारी पड़ता है दिलोदिमाग पर.’’

‘‘भई, मुझे माफ कर देना, तुम्हें बारबार मेरे पास आना पड़ता है. लेकिन चाहता यही हूं कि जल्दी कातिल पकड़ा जाए.’’

‘‘बायबाय…’’

‘‘बाय.’’

डेविड ने झूठ बोला कि उस ने लाश को नहीं देखा था. वह जौन को जरा भी उत्तेजित नहीं करना चाहता था. उत्तेजित होने के कारण ही वह सोचसोच कर और कल्पना कर के परेशान था.

‘‘क्या खाओगी रोजी?’’

‘‘कुछ भी जो बिना वक्त खराब किए खाया जा सके.’’

‘‘फिर तो हम रेस्टोरेंट में नहीं बैठ सकते.’’

‘‘चलो गरमगरम कुछ खाते हैं. रास्ते में कोई अच्छा टेक अवे दिखा तो वहीं रुकेंगे.’’

कुछ देर गाड़ी चलाने के बाद एक डोनर कबाब की दुकान दिखाई दी. नई व साफसुथरी दुकान थी. डेविड क्रिस्टी वहीं रुक गए.

दुकान का मालिक एक खुशमिजाज गोराचिट्टा आदमी था, जो खूब हंसहंस कर बातें बनाना जानता था. दुकान में 2-4 टेबल लगे थे. एक कसीनो मशीन भी थी. डेविड कबाब और सैंडविच बनाने का और्डर दे कर 10 मिनट तक इंतजार करता रहा. अचानक उस के दिमाग में लारेन का बताया हुलिया कुलबुलाया. इस दुकानदार के गालों पर पतली सी दाढ़ी की लकीरें कलमों से ठुड्डी पर जाती थीं. रंग गोरा, बदन मोटा.

‘‘बड़े जिंदादिल इंसान हो. क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘नासेर.’’

‘‘कहां से आए हो? तुम्हारी भाषा में विदेशीपन है.’’

‘‘टर्की का हूं, पढ़ने आया था मगर शादी कर के यहीं जम गया.’’

‘‘रहते भी इसी शहर में हो?’’

‘‘हांहां, और कहां जाना है. बिजनेस हो तो घर पास ही होना चाहिए. तुम कहां से आए हो? यहीं रहते हो क्या?’’

‘‘हांहां, बिलकुल पास में.’’

‘‘लो, तुम्हारा सामान तैयार है.’’

डेविड ने अपना कबाब लिया और नासेर से विदा ले कर वापस अपनी कार में आ बैठा. कबाब खाने का उस का सारा शौक जाता रहा. मन में जाने कैसी अजीब सी घृणा उतर आई. कैसे कीमे के थक्के को तेज लंबे चाकू से परतदरपरत काटकाट कर वह उतार रहा था. कितनी सफाई से स्लाइस निकाल कर ब्रैड में भरे उस ने. क्या इसी तेज चाकू से उस ने फहमीदा का कत्ल किया होगा?

‘‘कहां खो गए डेविड, खाओ न.’’

रोजी की आवाज सुन कर उस की तंद्रा भंग हुई. बोला, ‘‘तुम खाओ, रोजी. मुझे पेट में कुछ गड़बड़ लग रही है. कहीं सोडा वाटर पिअूंगा.’’

रोजी भुनभुना कर चुपचाप कबाब खाने लगी. डेविड के मन में एक खयाल आता एक जाता. क्या करना है उसे इस के बाद.

‘बेकार उलझता जा रहा हूं’ उस ने सोचा. ‘अभी भी क्या पता कि वह औरत फहमीदा ही थी? क्या पता नासेर बेकुसूर हो. सफिया उस की बीवी है क्या? यह तो 40-42 का नहीं लगता, मुश्किल से 30-32 बरस का लगता है. कुछ बात तो जरूर है तभी यह अचानक मुझे मिल गया.’

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डेविड ने समय नहीं गंवाया. मौयरा बड़ी घाघ औरत थी. डेविड ने उस को नासेर के राज जानने के लिए ठीक समझा. उस ने मौयरा से कहा, ‘‘मौयरा, तुम आजकल की छोकरियों वाले 2-4 कपड़े खरीद लो. तुम्हें किसी से इश्क लड़ाना है और उस की असलियत उगलवानी है. कर सकोगी?’’

मौयरा हंस पड़ी, ‘‘कर लूंगी, नौकरी और प्यार में सब जायज है. यह भी अच्छा है कि मैं कुंआरी हूं और मेरा बौयफ्रैंड एक पायलट है. कहीं वह घर बैठा आदर्श पति होता, तब तुम्हारे आधे से ज्यादा केस फाइलों में ही बंद रह जाते, कभी सुलझते नहीं.’’

‘‘चलचल, कौन सी दूध की धुली हो तुम. भूल गई जब टैक्स कमिश्नर को फांसा था?’’

‘‘बड़ा काइयां था वह, पर उस ने मुझे बहुत मजे कराए.’’

मिथुन चक्रवर्ती इस फिल्म में कर रहे हैं कैमियो का रोल प्ले

‘‘घायल’’,‘‘दामिनी’’,‘‘बरसात’’,‘‘चाइना गेट’’,‘‘खाकी’’, ‘‘हल्ला बोल’’सहित कई सफलतम फिल्मों के लेखक व निर्देशक राज कुमार संतोषी इन दिनों अपनी फिल्म ‘‘बैड ब्वाॅयज’’की शूटिंग में व्यस्त है. फिल्म‘बैंड ब्वायज’’की कहानी से प्रभावित होकर 360 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके तथा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती भी इस फिल्म में कैमियो कर रहे हैं.

राजकुमार संतोषी इन दिनों अपनी फिल्म‘‘बैड ब्वाॅय’’के लिए नमाशी चक्रवर्ती और अमरीन कुरैशी के साथ हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी स्टूडियो में एक खूबसूरत रोमांटिक गाना ‘‘जनाब-ए-अली‘‘ फिल्माने में व्यस्त हैं. जिसका नृत्य निर्देशन पियूष भगत और शाजिया सामजी कर रही हैं.इसी गाने में ओजी डिस्को किंग और ग्रैंड मास्टर मिथुन चक्रवर्ती ने मुख्य कलाकारों के साथ मिलकर एक छोटा सा कैमियो कर रहे हैं.मिथुन दा ऐस म्यूजिक कंपोजर हिमेश रेशमिया के म्यूजिक की धुन पर आएंगे नजर. निर्देशक राजकुमार संतोषी कहते है-

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‘‘कोविड ने रिलीज के शेड्यूल में गड़बड़ी की है, हालांकि हम जल्द से जल्द फिल्म को रिलीज करने की उम्मीद करते हैं.मिथुन दा एक लेजेंड हैं, गाने में मिथुन दा के होने से ना केवल अतिरिक्त तड़का आएगा बल्कि लोगों मैं फिल्म ‘बैड बॉय‘ को लेकर और भी जोश बढ़ जाएगा.’’ फिल्म के मुख्य अभिनेता नमाशी चक्रवर्ती कहते हैं, ‘‘आज मैंने अपने आदर्श के साथ न केवल ऑन-स्क्रीन, बल्कि ऑफ-स्क्रीन भी काम किया है. 360 फिल्मों और तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के अनुभव के साथ अब तक के सबसे महान अभिनेता ने मुझे और मेरी पहली फिल्म को आशीर्वाद दिया.उनके साथ एक ही फ्रेम में रहने के लिए, मैं बहुत ही ज्यादा आभारी हूँ.‘‘

फिल्म की मुख्य अदाकारा अमरीन कुरैशी ने कहा, ‘‘मैं दिग्गजों के साथ काम करके बहुत खुश हूं, मेरे डेब्यू प्रोजेक्ट में, मिथुन अंकल डांस के प्रतीक हैं और वह मेरे सबसे पसंदीदा रहे हैं. यह वास्तव में संजोने का एक क्षण है कि मेरी फिल्म में मुझे ऐसा करने का अवसर मिला है, जिसमे मुझे मिथुन सर के साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका मिल रहा है.”

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निर्माता साजिद कुरैशी कहते हैं, ‘‘हर दिन, हम फिल्म की रिलीज के करीब पहुंच रहे हैं.यह गाना हमारे लिए बहुत खास है.इस गाने मेंमिथुन दा का होना एक आदर्श है.यह आधुनिक और पुराने विश्व आकर्षण का एक आदर्श मिश्रण है.”

भोजपुरी फिल्मों में होगी Sapna Choudhary की धमाकेदार एंट्री, निरहुआ के साथ करेंगी रोमांस

मशहूर एक्ट्रेस सपना चौधरी(Sapna Choudhary)अपने डांसिग और सिंगिंग के बदौलत दर्शकों के दिल पर राज करती हैं. अब खबर यह आ रही है कि सिंगर सपना चौधरी (Sapna Choudhary) भोजपुरी इंडस्ट्री में कदम रखने जा रही हैं. जी हां सही सुना आपने. भोजपुरी दर्शकों के लिए यह बहुत बड़ी खुशखबरी है. सपना चौधरी जल्द ही भोजपुरी फिल्म में नजर आएंगी. एक्ट्रेस अपने एक्टिंग से दर्शकों का दिल चुराएंगी.

दरअसल सपना चौधरी इन दिनों ‘भाग’ वेब सीरीज की शूटिंग में बिजी हैं. इस सीरीज की शूटिंग खत्म करने के बाद वह अपकमिंग भोजपुरी फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाली हैं. इस फिल्म में भोजपुरी इंडस्ट्री के फेमस स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ सपना चौधरी के साथ दिखाई देंगे.

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एक इंटरव्यू के अनुसार सपना ने बताया कि उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में एंट्री इसलिए ली क्योंकि उनके फैंस चाहते थे. उन्होंने ये भी कहा कि मेरे फैंस काफी समय से बड़े पर्दे पर देखने के लिए इंतजार कर रहे थे.

एक्ट्रेस ने यह भी कहा कि वह जिस वेब सीरीज के लिए काम कर रही है, वह हिंदी में है. सपना ने आगे बताया कि इस सीरीज की रिलीज डेट को लेकर अभी कोई खुलासा नहीं किया गया है.

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भोजपुरी  फिल्म के बारे में बात करते हुए सपना चौधरी ने कहा कि वह जल्द ही दिनेश लाल यादव के साथ ऑनस्क्रीन नजर आएंगी. हालांकि एक्ट्रेस ने फिल्म का नाम नहीं बताया लेकिन फिल्म के मेकर्स जल्द ही अनाउंसमेंट करेंगे.

 

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जिगरी दोस्त Aly Goni ने दिया धोखा तो अपनी ही शादी में लुटे Rahul Vaidya, जूता चुराई में जेब हुई खाली

बिग बॉस 14 फेम राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) अपनी लेडीलव दिशा परमार के साथ शादी के बंधन में बंध चुके हैं. शादी की फोटोज और वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. फैंस को राहुल और दिशा की शादी का बेसब्री से इंतजार था. अब ये सात फेरे ले लिए हैं.

राहुल वैद्य की शादी में उनके दोस्त अली गोनी भी खूब हंगामा मचाते नजर आए. जी हां, अली ने अपने दोस्त राहुल की शादी में खूब मस्ती की. तो वहीं राहुल वैद्य ने अली गोनी को धोखेबाज बता दिया है. आइए बताते हैं, राहुल ने अपने ही दोस्त को क्यों धोखेबाज कहा.

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राहुल वैद्य ने आरोप लगाया कि अली गोनी की वजह से वह अपनी ही शादी में लुट गए. दरअसल अली की वजह से राहुल को काफी पैस खर्च करनी पड़ी .राहुल वैद्य अपनी जूता चुराई की रस्म को लेकर ये बात कही. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राहुल ने ने बताया कि किस तरह अली गोनी उनकी सालियों की बात में आ गए थे.

 

अली गोनी की वजह से राहुल वैद्य की जूतियां शादी के मंडप से गायब हो गई. राहुल वैद्य ने कहा कि अली गोनी ने मुझे धोखा दे दिया. अली गोनी ने मेरी जूतियां संभालकर रखी हुई थी. मुझे लगा, मेरी जूतियां सुरक्षित थी.  पर मेरे एक दोस्त ने अली गोनी से जूतियां ले ली और उसे मेरी सालियों को दे दी.

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राहुल वैद्य ने आगे बताया कि अली गोनी के जाते ही मेरी जूतियां गायब हो गई. उसके बाद मैंने अली गोनी को जमकर फटकार लगाई. मैंने अपनी जूतियां वापस पाने के लिए काफी मोटी रकम दी है. राहुल वैद्य का बयान आने के बाद फैंस खूब हंस रहे हैं. शादी की इस रस्म में राहुल वैद्य लुट गए.

क्या ‘नरेंद्र मोदी’ नाम का जहाज डूब रहा है!

कि भारत में भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र दामोदरदास मोदी की “सत्ता- सरकार” का जहाज जब डूबने डूबने को हो रहा था तो मोदी अपने सिद्धांतों और कही हुई बातों से मुकर गए और मोदी नाम का जहाज़ डूब गया.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने जब 2014 में देश के प्रधानमंत्री की शपथ ली थी तो उन्होंने अपने मुंह से और आचरण से जो जो बातें कहीं, क्या वह आपको याद है. हमारे देश की यही फितरत है- “आगे पाठ पीछे सपाट” यही कारण है कि मोदी ने जो जो आशा आकांक्षाएं देश की जन जन के बीच जागृत की थी और लोग उनके मुरीद होते चले गए थे. आज लगभग 7 साल बीत जाने के बाद मोदी को एहसास हो चला है कि उनका बनाया हुआ “मायाजाल” अब बिखर रहा है. देश की आवाम इस जादुई “भ्रम जाल” से बाहर निकल रहा हैं, ऐसे में मोदी के आचरण में वही घबराहट दिख रही है जो नाव या जहाज डूबने के समय नाविक और कैप्टन के चेहरे पर नजर आती है.

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नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह एहसास हो चला है कि आने वाले समय में लोकतंत्र की दुहाई देकर, देश प्रेम की अग्नि जलाकर, देश को विकास के एक नए मॉडल के सपने दिखाकर उन्होंने जो सत्ता हासिल की है वह अब उनकी हाथों से निकल रही है. यही कारण है कि उन्होंने बीते दिनों जो केंद्रीय मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया वह स्वयं उनके लिए आइना बन गया है, जो बता रहा है कि आपने जो जो कहा था, उससे आप मुकर गए हैं. सत्ता के लिए आप भी वही सब कुछ कर रहे हैं जो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया था.

मोदी के इस संपूर्ण व्यवहार और सिद्धांत पर आइए हम दृष्टिपात करते हैं.

दिग्गज मंत्रियों को हटाने का “लक्ष्य”!

लोगों के एक आदर्श बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की कथनी और करनी में अंतर साफ साफ दिखाई देता है. वो जो कहते हैं के पीछे का सच कुछ और होता है और जो कुछ नहीं कहते हैं उसके आगे का सच कुछ और होता है. बिलकुल वैसे ही जैसे तीतर के दो आगे तीतर तीतर के दो  पीछे तीतर बताओ कितने तीतर!

देशभर में नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल की चर्चा हो रही है कि किस तरह उन्होंने डॉ हर्षवर्धन, प्रकाश जावड़ेकर जैसे दिग्गज मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. और किस तरह महिलाओं को, पिछड़ों को और उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु को उन्होंने प्रतिनिधित्व दिया है. महिलाओं का कोटा बढ़ा दिया है ऐसी बातें पढ़ कर के और देख कर के हमें यह समझना होगा कि आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कि इसके पीछे रणनीति क्या है?

नरेंद्र मोदी के बारे में सारा देश और दुनिया जानती है कि वही प्रधानमंत्री हैं और वही कैबिनेट और राज्यमंत्री भी! उनकी बिना सहमति और निगाह के किसी मंत्री की कोई बखत नहीं है. देश को एकमात्र वही अपनी उंगलियों पर चला रहे हैं या कहें नचा रहे हैं ऐसे में इन बड़े-बड़े दिग्गज मंत्रियों को अचानक हटाने के पीछे की मंशा क्या है.

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दरअसल इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अपनी छवि को निखारना है. आप याद करिए जब  कोरोना कोविड-19 का देश में आगमन हुआ था तो किस तरह  “नमस्ते ट्रंप” का  आयोजन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुआ था. कोरोना जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ता गया, दीप जलाओ ताली बजाओ और लॉकडाउन का खेल चला और यह कहा गया कि अब कोरोनावायरस देश से खत्म हो जाएगा.मगर जब दांव उल्टा पड़ने लगा तो अपनी छवि बनाने के लिए नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने मंत्रिमंडल के दिग्गज मंत्रियों की छुट्टी करके यह संदेश देने का प्रयास किया है कि देखिए! किस तरह हम एक्शन लेते हैं.

यह भी सच है कि जिन जिन मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया है आने वाले समय में आप देखेंगे कि देश के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर यही लोग विराजमान दिखेंगे. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अभी लोगों को ध्यान बटाने के लिए यह एक सीधी सी ट्रिक चली गई है जो कामयाब होती भी दिख रही है. क्योंकि हमारे देश में लोगों के जल्द भूल जाने की फितरत है. उसी का लाभ हमारे नेताओं को गाहे-बगाहे मिल जाता है.

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Anupamaa: वनराज ने मारा होने वाली बहू नंदिनी को जोरदार थप्पड़, ‘पापा’ नहीं बोल पाने पर दी सजा

स्टार प्लस का पॉपुलर सीरियल ‘अनुपमा’ बहुत ही कम समय में फैंस के दिल में जगह बना ली है. इस शो के हर किरदार को फैंस काफी पसंद करते हैं. शो के हर एपिसोड में मेकर्स नए-नए ट्विस्ट लाते हैं, जिससे फैंस को एंटरटेनमेंट का डबल डो़ज मिलता है.

इस शो के एक्टर्स सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं. वह अक्सर फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करते रहते हैं. अब ‘अनुपमा’ फेम नंदिनी यानी अनघा भोसले ने होने वाले ऑनस्क्रीन ससुर वनराज यानी सुधांशु पांडे के साथ एक मजेदार वीडियो शेयर किया है.

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इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि सुधांशु, अनघा को थप्पड़ मारते हुए दिखाई दे रहे हैं. सीरियल ‘अनुपमा’ में नंदिनी वनराज शाह की बहू बनने वाली हैं.

दरअसल इस वीडियो में वनराज और नंदिनी ऑफ कैमरा मस्ती करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में वनराज, नंदिनी को पापा कहने का सही तरीका बता रहे हैं. नंदिनी से गलती हो जाने पर उन्हें वनराज से थप्पड़ पड़ती है.

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इस वीडियो को अनघा ने शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है कि मैंने और पापा ने एक और रील बनाया है. मेरे पापा जी. फैंस इस वीडियो को खूब पसंद कर रहे हैं.

 

इस वीडियो पर मदालसा शर्मा (काव्या) ने हार्ट और लाफिंग इमोजी कमेंट किया है तो वहीं शो में राखी दवे  (तस्नीम शेख) ने लिखा है, ‘अरे बेचारी.  सुधांशु पांडे ने भी इस पोस्ट पर हार्ट इमोजी कमेंट किया है. यूजर्स भी  इस वीडियो के लिए नाइस, क्यूट, फनी लिख रहे हैं.

सीरियल में इन दिनों दिखाया जा रहा है कि काव्या, पाखी-अनुपमा के बीच दरार डालने की कोशिश कर रही है तो उधर वनराज अपने कैफे के लिए खूब खुश नजर आ रहा है. शो के अपकमिंग एपिसोड में महाट्विस्ट आने वाला है, काव्या बा-बापूजी  और अनुपमा को आपस में भिड़वाने के लिए नया चाल चलने वाली है.

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