ईशा की दिलकश अदाओं ने मचा दी इंटरनेट पर धूम, देखें तस्वीरें

सुपर हौट और सेक्सी अभिनेत्री ईशा गुप्ता की तस्वीरें और वीडियो ने इन दिनों धमाल मचाया हुआ है.

ईशा ने एक बार फिर बेहद हौट और बोल्ड तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. ईशा ने लिंगरी फोटोशूट कराया है. इन तस्वीरों में वे अपनी हौटनेस के पिछले सारे रिकौर्डस तोड़ रही हैं.

ईशा गुप्ता की ये दिलकश अदाएं किसी को भी अपना दीवाना बना सकती हैं. ईशा ने इंस्टाग्राम पर जो तस्वीरें शेयर की हैं, उसमें उन्होंने ब्लैक कलर की लिंगरी पहनी हुई है.

इससे पहले भी ईशा ने बोल्ड तस्वीरें शेयर की हैं और इसके बाद भी उन्होंने एक व्हाइट कलर की ड्रेस में बेहद खूबसूरत तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. हम आपको बता दें कि कुछ दिनों पहले ईशा ने एक वीडियो शेयर किया था. इस वीडियो में भी वह बिकिनी में नजर आ रही थीं.

ईशा के इंस्टाग्राम पर डेढ़ मिलियन यानि कि करोड़ो फौलोअर्स हैं. वे जल्द ही फिल्म बादशाहो में नजर आने वाली हैं, जो कि 1 सितम्बर 2017 को सिनेमा घरों में आने वाली है. इस फिल्म में अजय देवगन, इमरान हाशमी, इलियाना डिक्रूज के अलावा विद्युत जामवाल भी हैं.

इससे पहले ईशा ने कई फिल्मों में काम किया है. बीते दिनों वह अक्षय कुमार और इलियाना के साथ फिल्म रुस्तम में नजर आई थीं. इस फिल्म में ऑडियंस ने ईशा की एक्टिंग की तारीफ की थी.

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यहां देखें वीडियो…

 

Coming Soon.. film by @arjun.mark

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योगी के ‘किले’ में अमित शाह की ‘सेंधमारी’

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से सरकार के अपने किले को सुरक्षित किया था, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उसमें सेंधमारी कर संगठन को सरकार में दखल का अधिकार दे दिया है. शाह ने बता दिया कि सरकार में बैठे लोगों को संगठन को महत्व देना होगा. संगठन के सम्मान और साख के बहाने योगी के किले में सेंधमारी का काम किया गया है.

पहले से प्रभावी चल रहे प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल को अब मंत्रियों के साथ होने वाली बैठक में बुलाया जाने लग गया है. अब उनको सरकार के तंत्र में पहले से ज्यादा महत्व मिलने लगा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य के बीच आपसी संबंध सभी को पता थे. केशव मौर्य के आफिस को एनक्सी से विधानसभा ले जाने की घटना चर्चा में रही. अमित शाह ने केशव के महत्व को बढ़ाया और उनकी खुलकर तारीफ की. केशव मौर्य के साथ ही साथ दूसरे उप मुख्यमंत्री डाक्टर दिनेश शर्मा को भी महत्व दिया गया.

राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह साफ कर दिया कि दोनो उपमुख्यमंत्री भी सरकार में महत्वपूर्ण हैं. इसके साथ ही साथ सरकार भाजपा संगठन को महत्व और जानकारी देकर काम करे. सरकार के मंत्रियों को विधायकों की परेशानियों को सुनने के लिये भी कह दिया गया है. अमित शाह के इन फैसलों से साफ हो गया है कि अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सरकार में उप मुख्यमंत्रियों के साथ भाजपा संगठन मंत्री को पूरा महत्व देना होगा. असल में 4 माह की सरकार के कामकाज की समीक्षा में अमित शाह को यह पता चल गया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकारी अफसरों से सही तरह से काम नहीं ले पा रहे हैं. खासकर अपराध को लेकर जो आलोचना हो रही है उसका मुद्दा सबसे प्रमुख है.

भाजपा योगी को अपने हिदुत्व का चेहरा बना चुकी है. ऐसे में वह योगी को किनारे नहीं कर सकती. 2019 की सफलता से ही योगी की भूमिका तय होगी. योगी को सरकार के चेहरे के तौर पर प्रयोग किया जायेगा. सरकार को चलाने में जिस काबिलियत की जरूरत भाजपा महसूस कर रही है उसके लिये संगठन पर पकड़ रखने वालो की जरूरत है. ऐसे में सुनील बंसल और केशव मौर्य अमित शाह की पहली पंसद बनकर उभर रहे हैं. केशव मौर्य को विरोधी दलो में तोडफोड कर विपक्ष को खत्म करने का काम दिया गया है.

केन्द्र में भाजपा ओबीसी बिल को पास करवा कर पिछडों की राजनीति में अपनी दखल बढ़ा कर दलित जातियों को दरकिनार करने का काम करेगी. जिसके फलस्वरूप उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती की जातीय राजनीति को खत्म किया जा सके. पिछडों में जिस तरह तेजी से हिन्दुत्व की भावना बढ़ रही है उससे भाजपा काफी उत्साहित है. आने वाले समय में भाजपा जाति की राजनीति दरकिनार कर धर्म की राजनीति को प्रभावी हथियार की तरह प्रयोग करेगी.

तो फिल्मों के लिए नहीं मरती है ये टीवी कलाकार

कृतिका कामरा टेलीविजन की दुनिया की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में से एक हैं और अब उन्हें इस इंडस्ट्री का हिस्सा बने भी लंबा समय बीत चुका है. इन दिनों वे लाइफ ओके के शो ‘चंद्रकांता’ में काम कर रही हैं, लेकिन आपको उनके बारे में यह बात जान कर हैरानी होगी कि इतनी बेहतरीन एक्टिंग करने वाली कृतिका को कभी इस फील्ड में आना ही नहीं था.

मीडिया से एक बातचीत के दौरान कृतिका ने ये बात स्वीकारी है “मैं हमेशा से कला की तरफ अधिक रोमांचित थी. मेरे दिमाग में कभी भी एक्टिंग का ख्याल ही नहीं आया था. इसलिए मैं फैशन स्कूल में गयी. अगर वाकई मैं एक्टिंग नहीं कर रही होती तो मैं फैशन डिजाइनर ही बन गयी होती. लेकिन अब मैं खुश हूं कि मैं यहां आयी क्योंकि अब मुझे लगता है कि अगर एक्टिंग को नहीं चुना होता तो भी मुझे एक्टिंग की लत लग जाती और मैं तब छोटी- मोटी एक्टर बन कर रह जातीं.”

कृतिका ने सबको ये भी बताया है कि वे फिल्मों में जाना चाहती हैं, लेकिन इसके लिए वे मरी नहीं जा रही हैं. उन्होंने थियेटर में काम किया है इसलिए उन्हें लगता है कि वे अच्छे एक्सपेरिमेंट्स कर सकती हैं लेकिन ऐसे वक्त में भी वे नहीं चाहेंगी कि उनके नाम के आगे टीवी एक्टर का ठप्पा लगा हो. उन्होंने कहा कि वे तभी फिल्म करेंगी जब फिल्म की कहानी और किरदार में वाकई दम होगा.

कृतिका कहती हैं कि वे खुश हैं कि उनके करियर में सब कुछ काफी अच्छा रहा है और उन्हें अच्छे-अच्छे किरदार मिलते रहे हैं. खासतौर से वे इन दिनों अपनी शौर्ट फिल्मों वाला फेज भी काफी एंजौय कर रही हैं. अब तक उन्होंने बेस्ट गर्लफ्रेंड, व्हाइट शर्ट, फ्रेंड जोन सहित कई शॉर्ट फिल्मों में काम किया है. कृतिका कहती हैं कि उन्हें ऐसे प्लैटफॉर्म पर अच्छे किरदार निभाने का मौका मिल जाता है.

कृतिका यह बात स्वीकारती हैं कि ऐसे कई टेलीविजन एक्टर्स हैं, जिन्हें केवल ओवरएक्टिंग ही आती है और वे उस जौनर से बाहर ही नहीं आ पाते हैं. उनके पास सेंस औफ कंटेंट नहीं होता है. लेकिन मैं अलग हूं. कोशिश यही होती है कि मैं एक्सपेरिमेंट से बाहर निकल कर आऊं और नयी चीजें एक्सप्लोर कर सकूं.

कुछ तो कौमन है इन फिल्मों में, पर क्या?

सभी फिल्मों के टाइटल्स की भी अपनी एक कहानी होती है,. तो जानिए क्या कौमन है फिल्म ‘गुड़गांव’, ‘बॉम्बे वेलवेट’ और ‘दिल्ली 6’ जैसी फिल्मों में. अभी कुछ ही दिनों में रिलीज होने वाली फिल्म टाइटल की भी, अपने टाइटल को लेकर एक अलग ही कहानी है.

अगर आप अब तक अंदाजा नहीं लगा पाए हैं तो हम आपको बतातें हैं कि इन सभी फिल्मों के टाइटल्स की खूबसूरती के बारे में.

बौलीवुड फिल्मों की कहानी में तो एंटरटेनमेंट है ही लेकिन इन फिल्मों के टाइटल के पीछे भी एक इंट्रेस्टिंग फैक्ट है. ऐसी कई फिल्में हैं जिनके टाइटल में सिटी का नाम होता है, बस हम कभी नोट ही नहीं कर पाते. देखिये और कौन कौन सी फिल्मों के टाइटल में छुपे हैं शहरों के नाम…

गुड़गांव
पंकज त्रिपाठी, रागिनी खन्ना, अक्षय ओबेरॉय अभिनीत इस फिल्म का पोस्टर और टीजर हाल ही में रिलीज हुआ है और इसका टाइटल साफ जाहिर कर रहा है कि इसकी कहानी शहर गुड़गांव पर बेस्ड है.

बरेली की बर्फी
कृति सेनोन और आयुष्मान खुराना की आने वाली फिल्म ‘बरेली की बर्फी’ भी शहर बरेली की है जिसमें राजकुमार राव भी हैं.

दिल्ली 6
सोनम कपूर और अभिषेक बच्चन स्टारर ‘दिल्ली 6’ दिल्ली की सड़कों पर ही शूट हुई थी. साल 2009 की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई मगर, फिल्म के टाइटल ने दिल्ली वालों को तो अपनी और जरूर खींचा था.

गैंग्स औफ वासेपुर
मनोज बाजपेयी की ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ को क्रिटिक्स ने बहुत सराहा. और यह कहानी भी झारखंड के धनबाद नमक जगह में बसे छोटे से शहर वासेपुर की कहानी थी.

अलीगढ़
मनोज बज्पेयो और राजकुमार राव की ‘अलीगढ़’ को तो कई अवार्ड्स मिले और मनोज की एक्टिंग को भी खूब सराहा गया. यह फिल्म शहर अलीगढ़ के रामचंद्र सिरस नाम के एक इन्सान की कहानी थी जिसके किरदार को मनोज ने निभाया था.

गेस्ट इन लंदन
कार्तिक आर्यन और परेश रावल की हाल ही में रिलीज हुई ‘गेस्ट इन लंदन’ के टाइटल में भी ख़ूबसूरत लंदन का जिक्र है और यह कहानी भी लंदन शहर की ही है.

बौम्बे वेलवेट
रणबीर कपूर, करण जौहर, अनुष्का शर्मा स्टारर ‘बौम्बे वेलवेट’ एक पीरियड-क्राइम ड्रामा फिल्म थी. यह फिल्म 1960 के मुंबई शहर में बसे एक बौक्सर की कहानी है जिसे रणबीर कपूर ने निभाया था.

चेन्नई एक्सप्रेस
शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण की इस फिल्म को हम इस लिस्ट में शामिल करना कैसे भूल सकते हैं इस फिल्म के बहुत से हिस्से चेन्नई में ही शूट किये गए हैं.

गो गोवा गौन
बौलीवुड की पहली जोम्बी-कौमेडी फिल्म! गोवा की एक पार्टी में होती है इसकी कहानी शुरू और इस पार्टी में फंसते हैं. कुनाल खेमू, वीर दास, आनंद तिवारी और पूजा गुप्ता. इन सभी को बचाने के लिए इस फिल्म में सैफ अली खान भी थे जिनके किरदार को लोग अज भी बहुत पसंद करते हैं.

जिला गाजियाबाद
संजय दत्त, अरशद वारसी और विवेक ओबेरॉय स्टारर ‘जिला गाजियाबाद’ के टाइटल में भी आपकों भारत के शहर का नाम दिखेगा.

‘सुपर सीएम’ की तरह नजर आए अमित शाह

उत्तर प्रदेश में भले ही भाजपा के पास एक मुख्यमंत्री और दो उप मुख्यमंत्री हों, पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लखनऊ में ‘सुपर सीएम’ के अंदाज में नजर आये. संगठन से लेकर सरकार तक के लोग उनके आगे पीछे घूमते नजर आये. संगठन से अधिक प्रदेश के मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल के सहयोगी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के आगे पीछे घूमते नजर आये. भाजपा के प्रदेश कार्यालय में जब अमित शाह प्रदेश के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के साथ प्रेसवार्ता करते दिखे, तो प्रदेश से जुडे सारे सवालों पर अमित शाह ने खुद ही जवाब दिये. हालांकि प्रेसवार्ता में कोई ऐसा सवाल न पूछा जाये जो असहज कर जाये इसका ख्याल पहले से ही रखा गया था.

अमित शाह के स्वागत में राजधानी लखनऊ को बैनर पोस्टर से पाट दिया गया था. सबसे आश्चर्य वाली बात यह थी कि सड़क पर आदमकद कटआउट लगे थे, उनमे केवल दो लोगों को ही शामिल किया गया था. अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कटआउट ही लगा था. लखनऊ में राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेताओं को भी कोई महत्व नहीं दिया गया. उनकी फोटो दूसरे नेताओं के साथ फिलर की तरह ही लगी दिखी.

अमित शाह ने लखनऊ में समाजवादी पार्टी के 3 विधान परिषद सदस्यों को  भाजपा में शामिल किये जाने को हरी झंडी दिखाई. पहले इनको अमित शाह के सामने ही पार्टी में शामिल होना था. बाद में अमित शाह दिल्ली चले गये तो प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने इनको पार्टी में शामिल किया. भाजपा ने एक तरह से विरोधी दलों को तोडफोड की अपनी फिल्म का ‘ट्रेलर’ दिखाया. ऐसे में भाजपा के लोग यह कह रहे है कि विरोधी दलों के लोग भाजपा में शामिल हो रहे हैं. भाजपा इस बात का बार बार कह रही है कि आने वाले दिनों में केवल भाजपा ही रह जायेगी.

प्रदेश में भाजपा खुद को अखिलेश यादव और केन्द्र में इंदिरा गांधी से बेहतर है यह बात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कही. सरकार और संगठन दो अलग अलग होते हैं. मुख्यमंत्री और उसका पूरा मंत्रिमंडल जिस तरह से अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की आगवानी से लेकर दिशा निर्देश लेने में लगा रहा उससे साफ लग रहा था कि अमित शाह ‘सुपर सीएम’ हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के समय अमित शाह ने दलित कार्यकर्ता के घर खाना खाया था. इस बार उन्होंने पिछडे जाति के कार्यकर्ता के घर खाना खाया. भाजपा अब प्रदेश में अगडों की जगह पिछडों और दलितों को ज्यादा प्रभाव देती नजर आयेगी.

अमित शाह के आने से पहले प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य के दिल्ली जाने की अटकले लग रही थी. अमित शाह के लखनऊ दौरे के बाद केशव मौर्य काफी मजबूत हालत में पहुंच गये हैं. अमित शाह ने ज्यादातर समय केशव मौर्य के साथ बिताया और उनकी नाराजगी को खत्म कर दिया. उपमुख्यमंत्री बनने के बाद केशव मौर्य के अपने प्रभाव को लेकर असहज महसूस करने की खबरे आ रही थी. ऐसे में अमित शाह के आने से वह नई ऊर्जा का अनुभव कर रहे हैं.

सीबीआई के शिकंजे में लालू यादव का परिवार

लालू प्रसाद यादव के परिवार ने वर्षों पहले साल 2006 में हेराफेरी की थी या नहीं, या कैसे की थी, यह साबित होने में अभी वर्षों लगेंगे. लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाले के मामले 20 सालों से चल रहे हैं और कोई लंबा चौड़ा पैसा पकड़ा नहीं गया है. अदालतों में सरकारी सुबूतों पर कुछ सजाएं दी गई हैं, पर वे पूरा न्याय हैं, कहा नहीं जा सकता.

जिस देश के हमाम में सभी नंगे और काले हों वहां नेताओं को, खासतौर पर दूसरी पार्टी के नेताओं को जांच एजेंसियों के मारफत फंसा कर राजनीतिक उद्देश्य पूरा करने का काम पूरी दुनिया में होता है. रूस के लगभग तानाशाह व्लादिमीर पुतिन ने अपने विरोधियों के धंधे भी छीन लिए और उन्हें पकड़ कर बंद भी कर दिया, ताकि उन की सत्ता को कोई चैलेंज न कर सके.

इस में शक नहीं है कि नेता लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल भरपूर पैसा कमाने में लगाते हैं, पर जिस देश में मंदिरों, आश्रमों, मठों में अरबों रुपया टपकता हो, लोग कालीसफेद कमाई चढ़ाते रहते हों, इन को चलाने वाले एक कानी कौड़ी का हिसाब न देते हों, वहां नेताओं को ही बलि का बकरा क्यों बनाया जाए?

नेतागीरी शराफत से तो चल ही नहीं सकती. आज मुफ्त के कार्यकर्ता किसी को भी नहीं मिलते. भारतीय जनता पार्टी के बहुत से पैरोकार सीधे पार्टी से पैसा नहीं लेते, पर वे आश्रमों, जागरण पार्टियों, भजन मंडलियों, स्कूलों, कालेजों से जुड़े होते हैं, जहां बरसने वाला पैसा बेहद काला होता है, क्योंकि वह झूठे सपने दिखा कर वसूला जाता है. उन्हें फूलों की बारिश मिले और नेताओं को अदालतों की हाजिरियां, यह राजनीति में चलेगा, पर सही हो जरूरी नहीं.

लालू प्रसाद यादव के परिवार ने साल 2006 में जो बेईमानियां की हैं, उन्हें साबित तो होने दें. सिर्फ जांच शुरू करना या मुकदमा चलाना तो काफी नहीं है. पहले उमा भारती, लाल कृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी आदि को भी पद छोड़ने पड़े थे, जो गलत था, क्योंकि आखिर में सब बरी हो गए. क्या मालूम, लालू प्रसाद यादव का परिवार भी छूट निकले.

नालों पर बस्तियां : आखिर ये कैसी तरक्की है

उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ में हर शहर की तरह कई गंदे नाले हैं, जिन के किनारे पीढि़यों से लोग रह रहे हैं. हैदर कैनाल और कुकरैल नहर के किनारे रहने वालों को देखने से पता चलता है कि गंदे नालों के किनारे बने जिन मकानों को घर कहते हैं, वे केवल छत और दीवारों से घिरे होते हैं. बरसात का मौसम सब से खराब होता है. इन घरों में रहने वाले लोग अपनी जेब के हिसाब से घर को सजाते हैं. ज्यादातर लोग कपड़े के परदे डालते हैं. ऐसे नालों से कुछ सौ मीटर से भी कम की दूरी पर पौश बाजार और रिहायशी मकान होते हैं, जो पूरी तरह चमकदमक से भरपूर होते हैं.

हैदर कैनाल के किनारे से कुछ दूर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती का दफ्तर है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी दफ्तर है और राज्यपाल का राजभवन बना है. सत्ता के गलियारे से इतना करीब होने के बाद भी लोग नाले के किनारे रहने को मजबूर हैं. आम घरों के लोग जहां खड़ा होना भी पसंद नहीं करते हैं, वहां ये लोग पीढि़यां गुजार देते हैं.

किसी भी घर में प्लास्टर नहीं है. कई घरों में खिड़की के लिए जगह जरूर छोड़ी गई है, जिस से हवा और रोशनी आती रहे, पर उस में दरवाजे नहीं लगे हैं. मकान एकमंजिला और दोमंजिला  दोनों ही तरह के बने हैं.

ज्यादातर मकान नाले के किनारे सीमेंट के खंभे दे कर बनाए गए हैं. नीचे के मकानों में बदबूदार सीलन रहती है. शौचालय में भी घर की तरह केवल दीवार और छत ही होती है. कई घरों में शौचालय होता ही नहीं है. लोग नाले के किनारे ही शौच के लिए जाते हैं.

इन घरों की औरतें देर शाम या जल्दी सुबह लोगों के जागने से पहले ही शौच कर लेती हैं. जिन घरों में शौचालय बने भी हैं, उन में भी दरवाजा नहीं होता. टाट की पट्टी या फिर कपड़े का परदा डाल कर काम चलाया जाता है.

यहां रहने वाले ज्यादातर गरीब तबके के लोग होते हैं. इन में मुसलिम, हिंदू सभी धर्मों के लोग शामिल हैं. बहुत से घरों में बंगलादेशी और नेपाली मूल के लोग भी हैं.

कई परिवारों की तो दूसरी पीढ़ी यहां रह रही हैं. गंदे नाले पर बने इन्हींघर में इन के शादीब्याह समेत दूसरी तमाम रस्में पूरी होती हैं.

गरीबों का नरक

नालों के किनारे रहने वालों में ज्यादातर लोग शराब और दूसरे किस्म के नशे के शिकार होते हैं और जुआ खेल कर अपना समय बिताते हैं. कई घरों के बच्चे जब छोटे होते हैं, तो स्कूल में पढ़ने भी जाते हैं, पर कमाई करने लायक होते ही वे स्कूल छोड़ कर कामधंधे पर लग जाते हैं.

लड़के और लड़कियों दोनों की ही कम उम्र में शादी कर दी जाती है. कम उम्र में मां बनने से जच्चाबच्चा की जान जाने का खतरा बना रहता है. सब से ज्यादा बीमारियां गंदगी से होती हैं.

ऐसे घरों में रसोईघर के नाम पर प्लास्टिक और स्टील के डब्बों में भरा कुछ सामान, बरतन और गैस के चूल्हे होते हैं, जो 5 किलोग्राम वाली गैस से चलते हैं.

कम घरों में गैस का कनैक्शन है. यहां के घरों में पानी के कम, बल्कि बिजली के कनैक्शन ज्यादा होते हैं. ज्यादातर काम जुगाड़ से चलता है.

अब बहुत ही कम घरों में खाना बनाने के लिए लकड़ी के चूल्हे या मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव का इस्तेमाल होता है. जिन के घर ईंट के नहीं बने होते, वे लोग छप्पर पर प्लास्टिक की बड़ी शीट डाल कर अपने लिए छत बना लेते हैं.

मनोरंजन के लिए टैलीविजन और रेडियो सभी घरों में मिल जाता है. शुरुआत में लोग छप्पर डाल कर रहते हैं, बाद में धीरेधीरे पक्का मकान बनाने में लग जाते हैं.

पहले नाले के किनारे कहींकहीं लोग घर बना कर रहते थे, पर अब पूरे नाले के किनारे कम ही खाली जगह दिखती है, जहां रहने वाले न हों.

ज्यादातर लोगों के पास वोटर कार्ड हैं. वे वोट डालते हैं. अब वे यहां के स्थायी निवासी हो गए हैं. एकसाथ रहने के बाद भी इन में आपस में लड़ाईझगड़ा भी खूब होता है. इस की खास वजह एकदूसरे के साथ सैक्स संबंध होते हैं. सोने से ले कर नहाने तक के लिए लोगों के पास जगह की कमी होती है. ऐसे में बहुतकुछ परदे में नहीं रह पाता है.

सालों से एकसाथ रहने के बाद भी ये लोग अपनी बातें दूसरों को बताने में संकोच महसूस करते हैं. इन्हें डर होता है कि कहीं इन से रहने की यह जगह खाली न करा ली जाए.

ऐसे में ये लोग किसी न किसी लोकल नेता का हाथ पकड़ कर रखते हैं, जो इन की मदद करता है. नेता ही इन के वोटर कार्ड बनवा देते हैं, जिस के बाद ये यहां रहने के हकदार हो जाते हैं.

जब कभी कोई सरकार इन को नाले के किनारे से हटाने की बात करती है, तो लोकल नेता इस का विरोध करते हैं. गंदे पानी के नाले हर शहर में होते हैं. इन का काम बरसात के पानी को शहर से बाहर ले जाना होता है. इन को गंदा नाला इसलिए कहते हैं, क्योंकि ये शहर के सीवर के पानी को भी बाहर ले जाते हैं.

जब शहरों का बहुत विकास नहीं हुआ था, गरीबी का लैवल ज्यादा था, ऐसे नालों के किनारे बसने वालों की तादाद कम होती थी. जैसेजैसे शहरों का विकास हो रहा है, वैसेवैसे अमीरी का लैवल बढ़ रहा है. देश में सामाजिक तरक्की हो रही है. ऐसे गंदे नालों के किनारे रहने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है.

पहले जहां झोंपड़पट्टी होती थी, अब वहां पक्के मकान बन गए हैं. गंदे नाले पर कब्जा कर के बने ऐसे मकान दोहरी परेशानी झेलते हैं.

यहां बने मकानों के नीचे या आसपास बदबूदार पानी बहता रहता है, जिस में मक्खी, मच्छर और तमाम तरह के कीड़े रहते हैं, जो सेहत के लिए काफी खतरनाक होते हैं. गंदे नालों के किनारे मकान बनने से नाले में बरसात और सीवर का पानी बहने में परेशानी होती है, जिस से शहर के बाकी हिस्सों में पानी जमा होता है.

देश के तकरीबन हर बड़े शहर की यही कहानी है. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, मुंबई जैसे इलाकों में जहां आबादी का बोझ ज्यादा है, वहां यह परेशानी ज्यादा है.

गंदे नाले की कहानी को समझने के लिए लखनऊ की हैदर कैनाल को समझना जरूरी है.

लखनऊ के अलावा बाकी शहरों की कहानी भी बहुत मिलतीजुलती है. हैदर कैनाल राजाजीपुरम से चल कर कालीदास मार्ग से होते हुए गोमती नदी में मिलती है. यह तकरीबन 17 किलोमीटर लंबी है. इस की चौड़ाई 40 मीटर से 70 मीटर के बीच है.

पहले लखनऊ के बरसाती पानी और सीवर को इस के जरीए ही बाहर ले जाया जाता था. उस समय इस का नाम हैदर कैनाल था. इस में केवल बरसात का पानी बहता था. कुछ समय बाद इस में सीवर का गंदा पानी भी बहने लगा. तब से हैदर कैनाल की जगह यह ‘गंदा नाला’ के नाम से जाना जाने लगा.

गंदे पानी का नाला होने के बाद भी लोगों ने इस के किनारे बसना शुरू कर दिया. अब पूरे नाले के किनारे मकान, दुकान और गैराज वगैरह बन गए हैं.

बढ़ रही है आबादी

हैदर कैनाल पर किए गए कब्जे को हटाने के लिए साल 1998 में एक योजना तैयार की गई थी. कब्जा न हो, इस के लिए उस पर सड़क बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जिस से शहर का आवागमन आसान हो जाए और सड़क के नीचे पानी भी बहता रहे. चारबाग से कालीदास मार्ग तक तकरीबन 9 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के लिए मायावती सरकार ने 6 सौ करोड़ रुपए का भारीभरकम बजट तैयार किया था.

हैदर कैनाल के किनारे तकरीबन 3 लाख लोग बसे हैं. इन को हटाना किसी भी सरकार के लिए बहुत मुश्किल काम है. ऐसे में मायावती सरकार ने हैदर कैनाल पर सदर से लाल बहादुर शास्त्री मार्ग तक तकरीबन 8 सौ मीटर लंबे नाले पर ही सड़क बनाने का काम किया.

मायावती के लिए मजबूरी यह थी कि यहीं पास में उन की पार्टी का प्रदेश हैडक्वार्टर है. उस के आसपास राजभवन और मुख्यमंत्री सचिवालय भी है. हैदर कैनाल के बाकी हिस्से पर बसे लोगों को हटाने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं हुई. हाल ही में उत्तर प्रदेश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तो एक बार फिर से हैदर कैनाल के ऊपर से कब्जा हटाने की बात होने लगी है.

दरअसल, योगी आदित्यनाथ की सरकार में उपमुख्यमंत्री बने डाक्टर दिनेश शर्मा पहले लखनऊ के मेयर थे. वे लखनऊ की परेशानियों से रूबरू थे. ऐसे में वे हैदर कैनाल पर से गैरकानूनी कब्जा हटाने की मुहिम में शामिल हो गए.

डाक्टर दिनेश शर्मा ने कहा कि नालों के ऊपर बने मकानों को हटाया जाएगा.  लखनऊ में यह परेशानी केवल हैदर कैनाल के सामने ही नहीं है, बल्कि बहुत सारे दूसरे नालों के किनारे भी लोग बस गए हैं. इन की तादाद कम होने के बजाय बढ़ने लगी है.

मजबूरी है बसना

आज भी देश में ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है, जिन के पास रहने को घर नहीं हैं. ये लोग ऐसी गंदी जगहों पर ही रहने को मजबूर हैं. शहरों में कामधंधे और रोजगार के लिए आने वाले बहुत से लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता कि वे अच्छे मकान बना कर रह सकें.

शहरों में नंबर एक तो जमीन है ही नहीं. जहां है, वहां बहुत महंगी है. जिसे खरीद पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है.

शहर से दूर बसना ऐसे लोगों के लिए महंगा साबित होता है. ऐसे में ये लोग शहर के अंदर बहने वाले नालों के किनारे रहना शुरू कर देते हैं.

गंदे नाले के किनारे बसना बहुत ही मजबूरी का सौदा होता है. वहां रहने वाले लोगों की औसत उम्र साफ जगहों पर रहने वालों से कम होती है.

इतना ही नहीं, वे ज्यादा बीमार भी पड़ते हैं, क्योंकि साफसफाई नहीं होती. शरीर से भी कमजोर रहते हैं. यहां तक कि समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाते हैं.

नाकाम स्वच्छता मिशन

ऐसे लोगों के लिए साफसफाई से जुड़े मिशन बेकार की बातें होती हैं. नाले पर रहने वाले अपनी मरजी से वहां नहीं रहते, बल्कि यह उन की मजबूरी होती है. सरकारों को ये बातें समझ नहीं आतीं. हर सरकार यह बताती है कि उस ने इतने मकान बना दिए, पर किसी सरकार ने यह नहीं बताया कि उस के समय में गंदे नाले पर रहने वालों की तादाद कितनी ज्यादा हो गई.

किसी शहर की गरीबी और लाचारी को देखना है, तो उस शहर के गंदे नाले और उस के किनारे बसे लोगों और बस्तियों को देखना होगा. लेकिन दुख की बात यह है कि हर सरकार यह कहती है कि गंदे नाले पर बसे लोगों को वहां से हटा दिया जाएगा, लेकिन कोई भी सरकार यह नहीं कहती कि ऐसे लोगों के लिए कहां घर बनाए जाएंगे.

सरकार की आवास योजनाएं महंगी हैं और रिश्वतखोरी से भरी होती हैं. ऐसे में बहुत से ऐलान के बाद भी गरीबों को रहने के लिए मकान नहीं मिलते. सरकारी मकान लेने के लिए कम से कम 3 लाख से 8 लाख रुपए खर्च करने होते हैं. इस के बाद भी सरकार ऐसे मकान नहीं बना पाती, जिस से हर जरूरतमंद को घर मिल सके.

जब तक शहरों में रहने के लिए आवास नहीं मिलेंगे, तब तक सामाजिक तरक्की की बातें बेमानी हैं. गंदे नालों पर बसने वाला तबका सरकार के चमकते दावों की पोल खोलता है.

समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसी जगहों पर रह रहा है, जहां पर खड़े होना भी मुश्किल होता है. नेता और अफसर बिना नाक पर कपड़ा रखे वहां ज्यादा देर तक टिक नहीं सकते हैं.

आदिवासियों की बगावत के क्या हैं मायने

‘देश में आजादी के इतिहास की बात होती है, तो कुछ लोगों की चर्चा बहुत होती है. कुछ लोगों की आवश्यकता से अधिक होती है, लेकिन आजादी में जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासियों का योगदान अप्रतीक था. वे जंगलों में रहते थे. बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है, लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा, जहां 1857 से ले कर आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हो, बलिदान न दिया हो. आजादी क्या होती है, गुलामी के खिलाफ जंग क्या होती?है, उन्होंने अपने बलिदान से बता दिया था.’

– नरेंद्र मोदी, 15 अगस्त, 2016.

भारत के प्रधानमंत्री ने यह बात लाल किले की प्राचीर से कही और सही बात कही, लेकिन एक बात जो उन की जबान पर आई, पर उन्होंने उसे दबा दिया और आदिवासियों की लड़ाई को आजादी तक ही सीमित कर दिया, वह लड़ाई अब भी जारी है, जिस का वर्तमान रूप माओवाद के नाम से जाना जाता है.

दरअसल, आदिवासी जनता देशीविदेशी पूंजीपतियों के रहमोकरम पर जिंदा नहीं रहना चाहती है और इस के लिए वह हर रोज जद्दोजेहद कर रही है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में आदिवासी जनता के बलिदानों का जिक्र कर के अपनेआप को पहले की सरकारों से अलग दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन उन की सरकार का पूरा रवैया पहले की सरकारों जैसा ही है.

आर्थिक नीतियों को और तेज रफ्तार से लागू करने के नाम पर आदिवासियों के जीने के साधनों जल, जंगल और जमीन को छीना जा रहा है. इतना ही नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर खनिजों को खानों से खोद कर देशीविदेशी लुटेरों को लूटने के लिए खुली छूट दी जा रही है. जंगल से लूटे गए माल को शहरों और विदेशों तक

में पहुंचाने के लिए जंगली इलाकों में 6 लाइन की सड़कें बनवाई जा रही हैं, समुद्री तटों पर बंदरगाह बनवाए जा रहे हैं.

इस लूट के विरोध में आदिवासी खड़े हैं. कहीं माओवादी आंदोलन की अगुआई में वे हथियारबंद हैं, तो कहीं धरनाप्रदर्शन के द्वारा इस लूट को रोकना चाहते हैं. उन्हें कहींकहीं थोड़ीबहुत जीत भी मिल जाती है.

माओवादी इलाकों में सरकारों के कई साल पहले लिए गए फैसले लागू नहीं किए जा सके. जैसा कि बस्तर के लोहंडीगुडा में 2044 हैक्टेयर जमीन में बनने वाला टाटा का स्टील प्लांट 5 जून, 2005 से 4-5 नवीनीकरण के बावजूद 2016 में रद्द कर दिया गया. यही हाल दूसरे इकरारनामों का भी है.

सरकार आदिवासियों की जद्दोजेहद के चलते इन कंपनियों के लिए जमीन छीन नहीं पा रही है. आदिवासियों ने जिस तरह से अंगरेजों की गुलामी को नहीं स्वीकारा था, उसी तरह से वे देशीविदेशी पूंजीपतियों की गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. वे अपनी आजादी को बचाए रखने के लिए अपने जीने के साधन जल, जंगल और जमीन पर हक चाहते हैं.

आदिवासी खुले में जीना चाहते हैं. इसी जिंदगी में उन को आजादी मिलती है. उन की आजादी और जीविका के साधनों को छीनने के लिए सरकार ने अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को खुली छूट दे रखी है कि आदिवासियों की हत्याबलात्कार करो, उन के घरों को लूटो.

इस विरोध को दबाने के लिए अंगरेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के तहत साल 2004 में छत्तीसगढ़ में सलवाजुडूम चलाया गया, जिस में 650 गांव को जला दिया गया, औरतों से बलात्कार किए गए, सैकड़ों लोगों को मार दिया गया, लाखों लोग गांव छोड़ने पर मजबूर हुए, हजारों लोगों को उन के गांव से उठा कर कैंपों में रखा गया, जिस का खर्च टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों ने उठाया.

सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी का कहना है कि अमेरिका में कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सलवाजुडूम सब से बड़ी मुहिम थी. तब गृह मंत्री रह चुके पी. चिदंबरम ने आदिवासी इलाकों में माओवादियों के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट चलवाया था. तब आदिवासी इलाकों में एक जंग सी छिड़ गई थी.

अमीर की सेना द्वारा फर्जी मुठभेड़, गांवों में लूटपाट, बलात्कार बढ़ गए. मिशन 2016 के तहत बस्तर इलाके में 134 लोगों की हत्याएं की गईं. सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अफसर को साल 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाज दिया गया. इसी तरह एसएसपी रहते हुए एसआरपी कल्लुरी को भी वीरता पुरस्कार दिया गया. 30 अक्तूबर, 2015 को नैशनल लैवल की औरतों का एक दल जगदलपुर और बीजापुर गया था. इस दल ने रिपोर्ट दी कि 19-20 से 24 अक्तूबर, 2015 के बीच छत्तीसगढ़ के बासागुडा थाने के तहत चिन्न गेल्लूर, गुंडुम और बुड़गी चेरू गांवों में सुरक्षा बलों ने वहां की औरतों के साथ लैंगिक हिंसा और मारपीट की.

पेदा गेल्लूर और चिन्न गेल्लूर गांवों में ही कम से कम ऐसी 15 औरतें मिलीं, जिन के साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं. इन में से 4 औरतें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलक्टर, पुलिस कमिश्नर व ऐडिशनल पुलिस कमिश्नर के सामने अपने बयान दर्ज कराए.

इन औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. पेट से हुई एक औरत के साथ नदी में ले जा कर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया. औरतों की छातियों को निचोड़ा गया, उन के कपड़े फाड़ दिए गए. मारपीट, बलात्कार के अलावा उन के घरों से रुपयापैसा लूटा गया. उन के चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिया गया और जो बचा उसे साथ ले गए. घरों में तोड़फोड़ की गई और उन का सामान भी लूटा गया.

15 जनवरी, 2016 को मानवाधिकार संगठन के एक और समूह की टीम छत्तीसगढ़ गई थी. इस टीम का अनुभव भी अक्तूबर में गई टीम जैसा ही रहा था. इस तरह की खबरें बड़े अखबारों की बड़ी सुर्खियां नहीं बन पाती हैं. राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरें तब आती हैं, जब बीजापुर के सरकिनागुडा जैसी घटना होती है, जिस में 17 गांव वालों, जिन में 6 बच्चे भी शामिल थे, को मौत की नींद सुला दिया जाता है.

ऐसी खबरों पर रायपुर से ले कर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती हैं कि बहादुर जवानों को बड़ी कामयाबी मिली है. नक्सलियों को मांद में घुस कर मारा, माओवादियों को धूल चटाई वगैरह. झीरम घाटी या सुकमा जैसी बड़ी घटनाएं होती हैं, तो बड़े अखबारों में इन को कायराना हमला, माओवादियों की हताशा बताया जाता है, जबकि आदिवासी अपने वजूद को बचाने के लिए एकजुट हो कर लड़ रहे हैं, चाहे आप इन की जद्दोजेहद को जिस नाम से भी पुकारें.

शांति बहाली के लिए लोगों को उन का अधिकार देना पड़ेगा. राज व्यवस्था की जड़ में शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार है. माओवाद उन्मूलन के नाम पर भी व्यवस्था भ्रष्टाचार करती है. जवानों के हथियार खरीदने से ले कर उन के खाने के सामान तक में कमीशन लिया जाता है और उन को खराब क्वालिटी का खाना और साजोसामान दिया जाता है. फर्जी माओवादी को आत्मसमर्पण कराने के बाद पैसा डकार लिया जाता है.

सरकार भूल जाती है कि जनता टैक्स इसलिए देती है, ताकि वह लोगों को सिक्योरिटी दे और शांति बनाए रखे. कोई भी इनसानों के बहने वाले खून पर खुशी नहीं मना सकता. यहां तक कि माओवादी भी मानते हैं कि जवान उन के दुश्मन नहीं हैं. वे कहते हैं कि सैनिकों पर की गई कार्यवाही को जवाबी हमले के रूप में देखना चाहिए.

जो जवान मारे गए हैं, वे सड़क बनाने से जुड़ी सिक्योरिटी में लगे हुए थे. मारे गए जवानों को इस सड़क से कोई फायदा नहीं होने वाला था. ये जवान गरीब परिवारों से आते हैं और उन का परिवार जिस जगह पर रहता है, उन के यहां भी ऐसी सड़कें नहीं होंगी. उन के परिवारों को टूटेफूटे रास्तों से ही अस्पताल व स्कूलकालेज जाना पड़ता होगा. लेकिन छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों में भी अच्छी सड़कों को बनाया जा रहा है, ताकि पूंजीपतियों द्वारा वहां की प्राकृतिक संपदा को लूट कर ले जाया जा सके. इन्हीं लूटों में से कुछ हिस्सा पा कर शासक वर्ग उन की सिक्योरिटी करने के लिए इन जवानों को वहां भेजता है, जिस का विरोध वहां की जनता कर रही है.

माओवादियों का कहना है कि वे हिंसावादी नहीं हैं, लेकिन सामंती ताकतों, देशीविदेशी कारपोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाली सरकारों द्वारा हर पल की जा रही हिंसा के जवाब में वे भी हिंसा को अंजाम देने के लिए मजबूर हैं. रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है, ‘हम सभी को अपने गरीबान में झांकना चाहिए, सचाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी. इस घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी हैं, इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी इलाकों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार करना, आदिवासी औरतें नक्सली?हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन की छाती को निचोड़ कर देखा जाता है.

‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के चलते सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का. आखिर यह सबकुछ क्यों हो रहा है. सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिन्हें उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल, जंगल और जमीन खाली नहीं करेंगे, क्योंकि यह उन की मातृभूमि है.’

इस समस्या का समाधान सैनिक हल नहीं है. अभी तक की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि नक्सलवाद की वजह सामाजिक व आर्थिक समस्या है. मारे गए जवान सौरभ के पिता की बातों पर ध्यान देना होगा, जो सुझाव देते हैं कि सरकार ठंडे दिमाग से बातचीत के जरीए इस मसले का हल निकाले. नक्सलियों को मुख्यधारा में लाए, उन्हें काम दे, उन के बालबच्चों को पढ़ाए.

लोगों को काम मिलेगा, तो नक्सली नहीं पैदा होंगे. अगर शांति लानी है, तो इस समस्या का हल दमन से नहीं, राजनीतिक बातचीत से निकलेगा, नहीं तो धरती खून से लाल होती रहेगी, देशवासी मरते रहेंगे, जेलों में लोग सड़ते रहेंगे और लोग गुलाम सरीखी जिंदगी जीने को मजबूर रहेंगे और यह जंग यों ही चलती रहेगी.

इन अभिनेत्रियों ने उड़ा दिए थे निर्माताओं के होश

किसी फिल्म के लिए कहानी के बाद सबसे जरूरी बात होती है इसकी स्टार कास्ट. किरदार की जरूरत के हिसाब से फिल्मों में कलाकारों को कास्ट किया जाता है, मगर कई स्टार कास्ट में अचानक बदलाव करने पड़ते हैं.

चित्रांगदा सिंह

नवाजुउद्दीन सिद्दीकी अब ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ में मुख्य भूमिका में दिखने वाले हैं. इस फिल्म में वो गैंगस्टर के किरदार में हैं, मगर बंदूकबाजी के साथ नवाज की आशिक-मिजाजी भी फिल्म में देखने को मिलेगी.

फिल्म में नवाज के अपोजिट बिदिता बाग को कास्ट किया गया है. मगर, बिदिता पहली च्वाइस नहीं थीं.

बाबूमोशाय बंदूकबाज में नवाज के अपोजिट डस्की ब्यूटी चित्रांगदा सिंह को कास्ट किया गया था, मगर चित्रांगदा को नवाज के संग आशिकी नहीं जमी और उन्होंने ये फिल्म छोड़ दी.

रेखा

इसी साल रिलीज हुई फितूर में का केस तो काफ़ी दिलचस्प है. ये फिल्म रेखा, आदित्य रॉय कपूर और कटरीना कैफ के साथ शुरू की गयी थी, मगर शूटिंग पूरी होने के बाद रेखा को अपनी भूमिका नहीं जमा और उन्होंने मेकर्स से उनका पार्ट हटाने की रिक्वेस्ट की. बाद में रेखा की जगह तब्बू को लेकर फिल्म रीशूट की गयी.

ऐश्वर्या राय बच्चन

साल 2012 की मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ में ऐश्वर्या राय बच्चन मुख्य भूमिका में थीं, मगर प्रेग्नेंसी के चलते ऐश ने फिल्म बीच में छोड़ दी थी. बाद में मधुर ने करीना कपूर को हीरोइन बनाकर फ़िल्म पूरी की.

प्राची देसाई

प्राची देसाई ने अजहर के बाद शुभम सिन्हा की फिल्म पेनाल्टी की स्टार कास्ट को ज्वाइन किया, मगर एक दिन की शूटिंग के बाद फिल्म छोड़ दी.

आपको बता दें कि कुछ महीने पहले हेरा फेरी 3 का एलान किया गया, जिसमें अभिषेक बच्चन, जॉन अब्राहम, सुनील शेट्टी और परेश रावल मुख्य कास्ट में शामिल थे, मगर फिल्म शुरू होने से पहले ही जौन और अभिषेक ने फिल्म छोड़ दी और अक्षय कुमार की एंट्री हुई, जो इस फ्रेंचाइजी के पहले दोनों भागों की मुख्य कास्ट का हिस्सा थे.

सनी देओल नहीं जानते थे इस चर्चित शब्द का मतलब

फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ मराठी में बनी बिल्कुल इसी नाम की फिल्म पर आधारित है, जो कि 8 सितंबर को सिनेमा घरों में आने वाली है.

बौलीवुड के मशहूर अभिनेता सनी देओल से, जब मीडिया ने उनकी फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर ‘नेपोटिज्म’ यानि कि वंशवाद को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा उन्हें इस शब्द के बारे में ही, कुछ नहीं पता तो वे कोई टिप्पणी कैसे कर सकते हैं.

नेपोटिज्म जिसे सरल भषा में आप भाई-भतीजावाद भी कर सकते हैं, इन दिनों बौलीवुड में खूब छाया हुआ है. पहले करण और कंगना के बीच नेपोटिज्म को लेकर हुई बातचीत से बवाल मचा था और अभी कुछ दिन पहले आईफा 17 में करण जौहर, वरुण धवन और सैफ अली खान द्वारा परफॉर्म किए गए एक्ट में नेपोटिज्म को लेकर कंगना का मजाक उड़ाया गया था जिसके बाद यह मुद्दा फिर से उठा.

जब इस बार में सनी देओल से नेपोटिज्म पर राय मांगी गई तो उन्होंने तो शब्द का अर्थ नहीं मालूम होने की बात कही. सनी अपनी फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर मौजूद थे. सनी देओल कहते हैं, ‘यह कौन सा शब्द है’.

वहीं इस सवाल पर अभिनेता बौबी देओल ने कहा, ‘इसका मतलब क्या हुआ.’ गौरतलब है कि फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ नसबंदी के विषय पर आधारित है. फिल्म का निर्देशन फिल्म अभिनेता श्रेयस तलपडे ने किया है.

इस फिल्म में जहां बौबी देओल हिंदी के प्राध्यापक बने हैं और शुद्ध हिंदी में अपने डायलॉग बोलते हैं. वही सनी देओल के डायलौग में सीधे साधे व्यक्ति का अंदाज नजर आता है. फिल्म के ट्रेलर लौन्च के मौके पर मशहूर फिल्म अभिनेता और बौबी व सनी के पिता धर्मेन्द्र भी उपस्थित थे.

हालांकि वे फिल्म में नजर आएंगे. उन्होंने इस बात को लेकर खुशी जताई कि आज उनके दोनों बेटे फिल्म अभिनेता होने के साथ अच्छे व्यक्तित्व के धनी भी हैं. फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ मराठी में बनी इसी नाम की फिल्म पर आधारित है जो 8 सितंबर को रिलीज होने वाली है.

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