क्या ‘नरेंद्र मोदी’ नाम का जहाज डूब रहा है!

कि भारत में भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र दामोदरदास मोदी की “सत्ता- सरकार” का जहाज जब डूबने डूबने को हो रहा था तो मोदी अपने सिद्धांतों और कही हुई बातों से मुकर गए और मोदी नाम का जहाज़ डूब गया.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने जब 2014 में देश के प्रधानमंत्री की शपथ ली थी तो उन्होंने अपने मुंह से और आचरण से जो जो बातें कहीं, क्या वह आपको याद है. हमारे देश की यही फितरत है- “आगे पाठ पीछे सपाट” यही कारण है कि मोदी ने जो जो आशा आकांक्षाएं देश की जन जन के बीच जागृत की थी और लोग उनके मुरीद होते चले गए थे. आज लगभग 7 साल बीत जाने के बाद मोदी को एहसास हो चला है कि उनका बनाया हुआ “मायाजाल” अब बिखर रहा है. देश की आवाम इस जादुई “भ्रम जाल” से बाहर निकल रहा हैं, ऐसे में मोदी के आचरण में वही घबराहट दिख रही है जो नाव या जहाज डूबने के समय नाविक और कैप्टन के चेहरे पर नजर आती है.

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नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह एहसास हो चला है कि आने वाले समय में लोकतंत्र की दुहाई देकर, देश प्रेम की अग्नि जलाकर, देश को विकास के एक नए मॉडल के सपने दिखाकर उन्होंने जो सत्ता हासिल की है वह अब उनकी हाथों से निकल रही है. यही कारण है कि उन्होंने बीते दिनों जो केंद्रीय मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया वह स्वयं उनके लिए आइना बन गया है, जो बता रहा है कि आपने जो जो कहा था, उससे आप मुकर गए हैं. सत्ता के लिए आप भी वही सब कुछ कर रहे हैं जो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया था.

मोदी के इस संपूर्ण व्यवहार और सिद्धांत पर आइए हम दृष्टिपात करते हैं.

दिग्गज मंत्रियों को हटाने का “लक्ष्य”!

लोगों के एक आदर्श बन चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की कथनी और करनी में अंतर साफ साफ दिखाई देता है. वो जो कहते हैं के पीछे का सच कुछ और होता है और जो कुछ नहीं कहते हैं उसके आगे का सच कुछ और होता है. बिलकुल वैसे ही जैसे तीतर के दो आगे तीतर तीतर के दो  पीछे तीतर बताओ कितने तीतर!

देशभर में नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल की चर्चा हो रही है कि किस तरह उन्होंने डॉ हर्षवर्धन, प्रकाश जावड़ेकर जैसे दिग्गज मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. और किस तरह महिलाओं को, पिछड़ों को और उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु को उन्होंने प्रतिनिधित्व दिया है. महिलाओं का कोटा बढ़ा दिया है ऐसी बातें पढ़ कर के और देख कर के हमें यह समझना होगा कि आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कि इसके पीछे रणनीति क्या है?

नरेंद्र मोदी के बारे में सारा देश और दुनिया जानती है कि वही प्रधानमंत्री हैं और वही कैबिनेट और राज्यमंत्री भी! उनकी बिना सहमति और निगाह के किसी मंत्री की कोई बखत नहीं है. देश को एकमात्र वही अपनी उंगलियों पर चला रहे हैं या कहें नचा रहे हैं ऐसे में इन बड़े-बड़े दिग्गज मंत्रियों को अचानक हटाने के पीछे की मंशा क्या है.

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दरअसल इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ अपनी छवि को निखारना है. आप याद करिए जब  कोरोना कोविड-19 का देश में आगमन हुआ था तो किस तरह  “नमस्ते ट्रंप” का  आयोजन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुआ था. कोरोना जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ता गया, दीप जलाओ ताली बजाओ और लॉकडाउन का खेल चला और यह कहा गया कि अब कोरोनावायरस देश से खत्म हो जाएगा.मगर जब दांव उल्टा पड़ने लगा तो अपनी छवि बनाने के लिए नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने मंत्रिमंडल के दिग्गज मंत्रियों की छुट्टी करके यह संदेश देने का प्रयास किया है कि देखिए! किस तरह हम एक्शन लेते हैं.

यह भी सच है कि जिन जिन मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया है आने वाले समय में आप देखेंगे कि देश के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर यही लोग विराजमान दिखेंगे. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अभी लोगों को ध्यान बटाने के लिए यह एक सीधी सी ट्रिक चली गई है जो कामयाब होती भी दिख रही है. क्योंकि हमारे देश में लोगों के जल्द भूल जाने की फितरत है. उसी का लाभ हमारे नेताओं को गाहे-बगाहे मिल जाता है.

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Anupamaa: वनराज ने मारा होने वाली बहू नंदिनी को जोरदार थप्पड़, ‘पापा’ नहीं बोल पाने पर दी सजा

स्टार प्लस का पॉपुलर सीरियल ‘अनुपमा’ बहुत ही कम समय में फैंस के दिल में जगह बना ली है. इस शो के हर किरदार को फैंस काफी पसंद करते हैं. शो के हर एपिसोड में मेकर्स नए-नए ट्विस्ट लाते हैं, जिससे फैंस को एंटरटेनमेंट का डबल डो़ज मिलता है.

इस शो के एक्टर्स सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं. वह अक्सर फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करते रहते हैं. अब ‘अनुपमा’ फेम नंदिनी यानी अनघा भोसले ने होने वाले ऑनस्क्रीन ससुर वनराज यानी सुधांशु पांडे के साथ एक मजेदार वीडियो शेयर किया है.

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इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि सुधांशु, अनघा को थप्पड़ मारते हुए दिखाई दे रहे हैं. सीरियल ‘अनुपमा’ में नंदिनी वनराज शाह की बहू बनने वाली हैं.

दरअसल इस वीडियो में वनराज और नंदिनी ऑफ कैमरा मस्ती करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में वनराज, नंदिनी को पापा कहने का सही तरीका बता रहे हैं. नंदिनी से गलती हो जाने पर उन्हें वनराज से थप्पड़ पड़ती है.

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इस वीडियो को अनघा ने शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है कि मैंने और पापा ने एक और रील बनाया है. मेरे पापा जी. फैंस इस वीडियो को खूब पसंद कर रहे हैं.

 

इस वीडियो पर मदालसा शर्मा (काव्या) ने हार्ट और लाफिंग इमोजी कमेंट किया है तो वहीं शो में राखी दवे  (तस्नीम शेख) ने लिखा है, ‘अरे बेचारी.  सुधांशु पांडे ने भी इस पोस्ट पर हार्ट इमोजी कमेंट किया है. यूजर्स भी  इस वीडियो के लिए नाइस, क्यूट, फनी लिख रहे हैं.

सीरियल में इन दिनों दिखाया जा रहा है कि काव्या, पाखी-अनुपमा के बीच दरार डालने की कोशिश कर रही है तो उधर वनराज अपने कैफे के लिए खूब खुश नजर आ रहा है. शो के अपकमिंग एपिसोड में महाट्विस्ट आने वाला है, काव्या बा-बापूजी  और अनुपमा को आपस में भिड़वाने के लिए नया चाल चलने वाली है.

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Social Story in Hindi: डुप्लीकेट- भाग 3: आखिर क्यों दुखी था मनोहर

निशा के साथ मनोहर का मेलजोल बढ़ता रहा. वह भी फिल्म नगरी के इस अंधकार से ऊब चुकी थी. वह भी यहां से कहीं दूर जाना चाहती थी, पर अकेली कहां जाए? हर जगह इनसान के रूप में ऐसे भेडि़ए मौजूद हैं जो उस जैसी अकेली को नोचनोच कर खा जाना चाहते हैं.

मनोहर व निशा को एकदूसरे के सहारे की जरूरत थी. सो, उन्होंने शादी कर ली.

कुछ दिनों बाद वे दोनों मुंबई से हजारों किलोमीटर दूर इस शहर में आ गए थे.

यहां आ कर अपने पैर जमाने के लिए मनोहर को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी.

15 साल बीत गए. इस बीच निशा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसे मधुरिमा कहा जाने लगा. मधुरिमा अब 10वीं में और कमल बीए फाइनल में पढ़ रहा था.

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जनकपुरी में रिकशा रुका तो मनोहर यादों से बाहर निकला. रिकशे वाले को पैसे दे कर वह भारी मन से घर पहुंचा. एक कमरे में सोफे पर जा कर वह पसर गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. बारबार आंखों के सामने वही सीन आ रहा था, जब नीलू सीढि़यों से लुढ़क कर गिरती है.

मनोहर के पास आ कर निशा सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘देख आए वह सीन. सचमुच देखा नहीं जाता. बहुत दुख होता है. उस समय नीलू को कितना दर्द सहना पड़ा होगा.’’

मनोहर कुछ नहीं बोला.

‘‘मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर निशा रसोईघर की ओर चल दी.

मनोहर की नजर दीवार पर लगी नीलू की तसवीर पर चली गई. वह एकटक उस की ओर ही देखता रहा.

निशा ने चाय मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘चाय पी लीजिए. मन ज्यादा दुखी करने से कुछ नहीं होगा.’’

मनोहर ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘कमल अभी तक नहीं आया? कहां रह गया वह? उस का कोई फोन आया या नहीं?’’

‘‘हां, एक घंटा पहले आया था कि अभी पहुंच रहा हूं.’’

‘‘फिल्म की शूटिंग देखने वह लखनपुर गया है?’’

‘‘हां, मैं ने तो उसे बहुत मना किया था, पर वह माना नहीं, बच्चों की तरह जिद करने लगा. कह रहा था कि पहली बार फिल्म की शूटिंग देखने जा रहा हूं. बचपन में मुंबई में देखी होगी, वह तो अब याद नहीं. साथ में उस का दोस्त सूरज भी जा रहा है. बस शाम तक लौट आएंगे?’’

‘‘फिल्मी दुनिया की चमकदमक किसे अच्छी नहीं लगती,’’ मनोहर ने कह कर लंबी सांस छोड़ी.

मधुरिमा दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रही थी, तभी घर के बाहर मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज आई तो मनोहर समझ गया कि कमल आ गया है.

कमल कमरे में घुसा. उस के माथे पर पट्टी बंधी देख मनोहर व निशा बुरी तरह चौंक उठे.

‘‘यह क्या हुआ? कोई हादसा हो गया था क्या?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘नहीं पापा…’’

‘‘फिर यह चोट…? तू तो लखनपुर शूटिंग देखने गया था न? वहां किसी से झगड़ा तो नहीं हो गया?’’ निशा ने कमल की ओर देखते हुए पूछा.

तभी मधुरिमा भी कमरे से बाहर निकल आई. उस ने भी एकदम पूछा, ‘‘यह क्या हुआ भैया?’’

कमल ने कहा, ‘‘मैं शूटिंग देखने ही गया था. जैसे ही शूटिंग शुरू हुई तो हीरो के डुप्लीकेट के पेट में भयंकर दर्द हो गया. जब दवा से भी आराम नहीं हुआ तो उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में भेज दिया. प्रोड्यूसर माथा पकड़ कर बैठ गया, तभी डायरैक्टर की नजर मुझ पर पड़ी…’’

‘‘फिर…?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘डायरैक्टर ने मुझे अपने पास बुलाया. नीचे से ऊपर तक देखा और कहा कि एक छोटा सा काम करोगे. काम बहुत आसान है. हीरोइन नाराज हो कर जाती है. हीरो आवाज देता है, पर हीरोइन सुनती नहीं और चली जाती है. हीरो उस के पीछे दौड़ता है. पैर फिसलता है और छोटी सी पहाड़ी से लुढ़क कर नीचे गिरता है. बस यही काम था उस डुप्लीकेट का.

‘‘मैं मना नहीं कर सका. सीन ओके हो गया. तब डायरैक्टर ने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे 10,000 रुपए भी दिए थे. सिर में मामूली सी चोट लग गई है. 2-4 दिन में ठीक हो जाएगी,’’ कमल ने बताया.

यह सुन कर मनोहर ने एक जोरदार थप्पड़ कमल के मुंह पर मारा और चीखते हुए कहा, ‘‘तू भी बन गया डुप्लीकेट. दफा हो जा मेरी नजरों के सामने से. मैं तेरी सूरत भी नहीं देखना चाहता. जा, भाग जा… चला जा मुंबई. वहां जा कर देख कि किस तरह कीड़ेमकोड़े की जिंदगी जीते हैं ये डुप्लीकेट.

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‘‘मेरे साथ चल कर देख फिल्म ‘अपना कौन’ में तेरी मम्मी डुप्लीकेट का काम करतेकरते हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चली गई. मुझे इस काम से क्यों नफरत हो गई थी. मैं यह काम छोड़ कर क्यों मुंबई से यहां आ गया था? तुझे भी तो यह सब मालूम है, फिर तू ने क्यों जानबूझ कर अपने माथे पर डुप्लीकेट का लेबल लगा लिया?

‘‘अगर तुझे आज कुछ हो जाता तो हमारा क्या होता? यह सब नहीं सोचा होगा तू ने,’’ कहतेकहते मनोहर का गला भर्रा उठा.

कमल को अपनी भूल का अहसास हो रहा था. वह बोला, ‘‘माफ कर देना पापा, मुझे दुख है कि मैं ने आप का दिल दुखाया. यह मेरी पहली और आखिरी भूल है.’’

Crime Story in Hindi: सोने का घंटा- भाग 2: एक घंटे को लेकर हुए दो कत्ल

प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन

मैं ने उन दोनों को गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया और सख्ती भी की, पर दोनों रोते रहे, कसमें खाते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया है. मैं डीएसपी के हुक्म के आगे मजबूर था. डीएसपी के जाने के बाद मैं ने सुगरा को छोड़ दिया, क्योंकि उस की हालत बहुत बुरी थी. वह बच्चों के लिए तड़प रही थी.

मेरी हमदर्दी सुगरा के साथ थी. क्योंकि वह बेकसूर लग रही थी, पर नींद की गोलियां का मामला साफ होने के बाद ही यकीन से कुछ कहा जा सकता था. मुझे यह पता करना था कि गोलियां कहां से खरीदी गई थीं. कस्बे में एक ही बड़ी दुकान थी. उस के मालिक गनपत लाल को मैं जानता था.

उस ने पूछताछ के बाद बताया कि करीब एक महीने पहले रंजन सिंह उस की दुकान से कुछ दवाइयां ले कर गया था, जिस में नींद की गोलियां भी शामिल थीं.

यह एक पक्का सबूत था. मैं ने उस से बयान लिखवा कर साइन करवा लिया. मैं वापस थाने पहुंचा तो सुगरा नजीर से मिलने आई थी. वही बुरे हाल, फटे कपड़े, रोता बच्चा, अखबार में लिपटी 2 रोटियां और प्याज. उसे देख कर बड़ा तरस आया. काश, मैं उस के लिए कुछ कर सकता.

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दूसरे दिन गांव में एक झगड़ा हो गया. दोनों पार्टियां मेरे पास आ गईं. मैं उन दोनों की रिपोर्ट लिखवा रहा था. तभी मुझे खबर मिली कि ढाब का नंबरदार लहना सिंह मुझ से मिलने आया है. उस ने अंदर आ कर कहा, ‘‘नवाज साहब, मुझे आप से बहुत जरूरी बात करनी है. कुछ वक्त दे दें.’’

मुझे लगा कि वह इसी लड़ाई के बारे में कुछ कहना चाहता होगा. मैं ने उसे बाहर बैठ कर कुछ देर इंतजार करने को कहा. वह अनमना सा बाहर चला गया.

इस झगड़े में एक आदमी बहुत जख्मी हुआ था, जो अस्पताल में भरती था. काम निपटाते निपटाते 2 घंटे लग गए. फिर मैं ने लहना सिंह को बुलवाया तो पता चला वह चला गया है. मैं ने शाम को एक सिपाही को यह कह कर लहना सिंह के घर भेजा कि उसे बुला लाए.

पता चला कि वह अभी तक घर ही नहीं पहुंचा है. मुझे कुछ गड़बड़ नजर आ रही थी. 11 बजे के करीब लहना सिंह का छोटा भाई बलराज आया. कहने लगा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, लहना सिंह का कहीं पता नहीं चल रहा है. हम सब जगह देख चुके हैं.’’

मैं परेशान हो गया, क्योंकि लहना सिंह का इस तरह से गायब होना किसी हादसे की तरफ इशारा कर रहा था. मैं ने बलराज से पूछा, ‘‘लहना सिंह की किसी से लड़ाई तो नहीं थी?’’

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‘‘साहब, एक दो महीने पहले उन की चौधरी श्याम सिंह से जम कर लड़ाई हुई थी. दोनों एकदूसरे को मरने मारने पर उतारू थे. मेरा पूरा शक श्याम सिंह पर है.’’ मुझे मालूम था कि श्याम सिंह रसूखदार आदमी है.

उसी वक्त लहना सिंह का बेटा और एक दो लोग भागते हुए थाने आए और कहने लगे, ‘‘साहब, जल्दी चलिए. श्याम सिंह ने लहना सिंह को कत्ल कर दिया है या फिर जख्मी कर के अगवा कर लिया है. हवेली के पीछे मैदान में खून के धब्बे मिले हैं.’’

मैं फौरन मौका ए वारदात के लिए रवाना हो गया. उन दोनों की लड़ाई के बारे में मैं ने भी सुना था. श्याम सिंह शहर से एक तवायफ ले आया था, जिसे उस ने अपने डेरे पर रख रखा था. एक दिन मौका पा कर नशे में धुत लहना सिंह वहां पहुंच गया और उस ने दो साथियों के साथ उस तवायफ से ज्यादती कर डाली. इस बात को ले कर दोनों में बहुत झगड़ा हुआ था. यह बात गांव में सब को पता थी.

लहना सिंह की हवेली के पीछे एक सुनसान मैदान था. वहां शौर्टकट के लिए एक पगडंड़ी थी. वहीं पर कच्ची जमीन पर 3-4 जगह खून के धब्बे थे. वहीं पर लहना सिंह की एक जूती भी पड़ी थी. संघर्ष के भी निशान थे. कुछ दूर तक जख्मी को घसीट कर ले जाया गया था. उस के बाद उसे उठा कर ले गए थे. मैं ने मौके की जगह की अच्छी तरह जांच की. कुछ बयान लिए. लेकिन हादसे का चश्मदीद गवाह एक भी नहीं मिला.

मैं थाने पहुंचा तो देखा चौधरी श्याम सिंह शान से बैठा हुआ था. मैं ने उस से अकेले में बात करना बेहतर समझा. मैं ने कहा, ‘‘देखो चौधरी, लंबे चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है. अगर लहना सिंह तुम्हारे पास है तो उसे बरामद करा दो. मैं कोई केस नहीं बनाऊंगा.’’

वह मुस्कुरा कर बोला, ‘‘नवाज साहब, हम केस से या कोर्ट कचहरी से नहीं डरते, पर सच्ची बात यह है कि मैं ने एक हफ्ते से लहना सिंह को नहीं देखा. हमारी लड़ाई जरूर हुई थी पर मुझे उसे उठा कर छुपाने की क्या जरूरत है?’’

छुपाने की बात कहते हुए वह कुछ घबरा सा गया था, इसलिए बात बदलते हुए फिर बोला, ‘‘मुझे पता नहीं है जी उस ने आप के क्या कान भर दिए और वह चंदर तो…’’ फिर वह एकदम चुप हो गया. मैं ने पूछा, ‘‘चंदर कौन?’’

‘‘जी…जी… वह कोई नहीं आप चाहे तो मेरा पर्चा कटवा दें.’’

मैं समझ गया कि कोई राज की बात थी, जो उस ने भूल से कह दी और अब छुपा रहा है. मुझे यकीन हो गया कि लहना सिंह के अगवा करने में उसी का हाथ है. 2-4 सवाल कर के मैं ने उसे जाने दिया. फिर लहना सिंह के बेटों को बुला कर समझाया कि कोई लड़ाईझगड़ा ना करे, हम शांति से उसे बरामद करेंगे.

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मैं ने बिलाल शाह को भेजा कि मालूम करे कि चंदर किस का नाम है. दूसरे दिन बिलाल शाह खबर ले कर आया कि चंदर रंजन सिंह का ही दूसरा नाम है.

जवानी में वह पहलवानी करता था. लोग उसे चंदर कह कर पुकारते थे. मैं चौंका. इस का मतलब रंजन सिंह के कत्ल और लहना सिंह के गायब होने में कोई संबंध जरूर था. अब मुझे अफसोस हुआ कि काश मैं ने लहना सिंह की बात सुन ली होती.

मैं ने चौधरी श्याम सिंह की निगरानी शुरू करवा दी. इस काम के लिए मेरी नजर शांदा पर अटक गई. वह दाई थी. उस का चौधरियों के यहां खूब आनाजाना था. उन के घर के सभी बच्चे उसी के हाथों पैदा हुए थे. वह लालची या डरने वाली औरत नहीं थी. पर उस की एक कमजोरी मेरे हाथ आ गई थी. उसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए मैं ने उसे चौधरी  के खिलाफ मुखबिरी करने के लिए राजी कर लिया.

शांदा से खबर लाने का काम बिलाल शाह के जिम्मे था. तीसरे दिन बिलाल शाह ने आ कर बताया कि शांदा के मुताबिक हवेली का एक कारिंदा जोरा सिंह हवेली से बाहर हैं. पांचवे दिन एक खास खबर मिली कि नंबरदार लहना सिंह चौधरी श्याम सिंह के कारिंदे जोरा सिंह की कुएं वाली कोठरी में जख्मी हालत में बंद है.

पिछली रात जब जोरा सिंह चौधरी से मिलने आया था तो शांदा ने अपने बेटे को उस के पीछे लगा दिया था. उस ने देखा लहना सिंह कुएं के पास बने एक कमरे में बंद था. एक रायफल धारी उस का पहरा दे रहा था. शांदा के बेटे ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बहुत बड़ी जानकारी प्राप्त की थी. मैं फौरन मुहिम पर रवाना हो गया. मैं ने अपनी टीम के साथ जोरा सिंह की कोठरी पर धावा बोल दिया.

उस वक्त सुबह के 9 बजे थे. खेतखलिहान सुनसान थे. किस्मत से श्याम सिंह बाहर गया हुआ था. हमें देखते ही जोरा सिंह ने छलांग लगाई और खेतों की तरफ भागा. मेरे हाथ में भरा हुआ रिवाल्वर था. मैं चिल्लाया, ‘‘रुक जाओ, नहीं तो गोली चला दूंगा.’’ लेकिन जोरा सिंह नहीं रुका. मैं ने उस की पिंडली का निशाना ले कर गोली दाग दी. वह औंधे मुंह गिरा.

उसे काबू कर के और उस के 2 आदमियों के हाथ से बंदूक छीन कर हम कमरा खुलवा कर अंदर पहुंचे. लहना सिंह एक कोने में खाट पर सुकड़ासिमटा पड़ा था. वह मुश्किल से पहचाना जा रहा था. उस के कपड़ों पर खून के धब्बे थे.

सिर पर जख्म था. 2 दांत टूटे हुए थे. एक कलाई टूट कर लटकी हुई थी. जिस्म पर कुल्हाड़ी के कई जख्म थे. वह बेहोश पड़ा था. हम उसे संभाल कर बाहर ले कर आए.

फायरिंग की आवाज से लोग जमा हो गए थे. लहना सिंह को इतनी बुरी हालत में देख कर सब हैरान रह गए. उस की एक जूती भी कमरे से बरामद हुई. मैं ने फौरन गाड़ी का इंतजाम कर के उसे अमृतसर के अस्पताल रवाना किया. उस के जख्म बहुत खराब हो चुके थे. अस्पताल पहुंचने के पांचवे दिन उस की तबीयत जरा संभली और वह बयान देने के काबिल हुआ.

Romantic Story in Hindi- बात एक रात की: भाग 3

लेखक : श्री प्रकाश

तपन चित्रा को विदा करने स्टेशन गया. चलते समय चित्रा ने कहा, ‘‘आगे जब कोलकाता आएं तो मुझ से जरूर मिलना. फिलहाल मेरे साल्ट लेक फ्लैट में ही मेरी कंपनी है,’’ और फिर अपना कार्ड तपन को दे दिया.

‘‘श्योर,’’ कह तपन ने भी अपना कार्ड चित्रा को दे दिया.

चित्रा कोलकाता लौट गई. अब वे अकसर फोन पर बातें करते थे. तपन ज्यादातर चित्रा के काम और स्वास्थ्य के बारे में पूछता, तो चित्रा तपन और उस की मां के बारे में. कभी चित्रा मां से बात करती तो हर बार मां यही पूछतीं कि उस ने अपने भविष्य के बारे में क्या फैसला लिया है? चित्रा भी हर बार यही कहती कि अभी कोई फैसला नहीं लिया.

एक बार जब चित्रा का फोन आया तो मां ने उस से पूछा, ‘‘मेरा तपन तुम्हें कैसा लगता है?’’

चित्रा इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी, फिर भी उस ने कहा, ‘‘तपन तो बहुत ही अच्छे इनसान हैं.’’

‘‘वह हमेशा तुम्हारी तारीफ करता रहता है. कहता है कि बहुत मेहनती लड़की है. खूब तरक्की करेगी,’’ मां बोलीं.

‘‘यही तो उन का बड़प्पन है.’’

कुछ दिनों के बाद तपन को कोलकाता जाना पड़ा. वह चित्रा से मिला. चित्रा ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं, पर केवल काम से संबंधित. चलते समय चित्रा ने उसे फिर आने को कहा और हाथ मिला कर विदा किया. यह तपन और चित्रा का दूसरा दैहिक स्पर्श था. पहला स्पर्श रिकशे पर हुआ था. इधर चित्रा का प्रोजैक्ट पूरा होने जा रहा था. उस का टैस्ट चल रहा था, जिस के बाद प्रोजैक्ट को अमेरिकन कंपनी को बेचा जाना था. इधर तपन की मां की तबीयत काफी खराब थी. चित्रा भी सुन कर आई थी. बोकारो में बड़े अस्पताल नहीं थे, तो चित्रा ने तपन को उन्हें कोलकाता ले चलने को कहा. वह स्वयं टैक्सी बुक कर मां और तपन के साथ कोलकाता आई. मां को बड़े अस्पताल में भरती कराया गया. 2 हफ्ते में तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. इस बीच तपन चित्रा के फ्लैट में रहा. चित्रा और तपन अब थोड़ा करीब आ चुके थे. दोनों एकदूसरे को बेहतर समझ रहे थे.

तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिली तो चित्रा उन्हें भी अपने घर ले आई थी और कहा था कि यहां कुछ दिन आराम करने के बाद ही लौटना. 1 हफ्ते तक वे चित्रा के फ्लैट में ही रहे.

1 सप्ताह बाद तपन मां के साथ बोकारो लौट रहा था. पर चलते समय मां ने चित्रा से फिर कहा, ‘‘बेटी, तुम ने तो अपनी बेटी से भी बढ़ कर मेरा खयाल रखा है. कुदरत तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे… पर मेरी बात पर भी सोचना.’’

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‘‘कौन सी बात मां?’’ चित्रा ने पूछा.

‘‘अपने और तपन के बारे में.’’

आप के आशीर्वाद से मेरा प्रोजैक्ट पूरा हो गया है. 2 हफ्तों के अंदर ही इस के

अच्छे परिणाम मिलने की आशा है. फिर आप की बात भी मान लूंगी.

तपन और मां दोनों चित्रा की ओर देखने लगे. चित्रा की तरफ से पहला पौजिटिव संकेत मिला था.

इधर चित्रा के मातापिता भी उस के लिए चिंतित रहते थे. चित्रा ने तपन की चर्चा उन से कर रखी थी. उस ने कहा था कि बोकारो जाने वाली एक रात की बात ने चित्रा को काफी इंप्रैस किया है. इतना ही नहीं, चित्रा के पिता ने एक बार चुपके से बोकारो आ कर तपन के बारे में जानकारी भी ले ली थी. वे तपन से संतुष्ट थे. उन्होंने अपनी सहमति चित्रा को बता दी थी.

इस के 1 महीने के अंदर ही चित्रा ने तपन को फोन पर बताया कि उस का प्रोडक्ट अमेरिका की कंपनी ने अच्छी कीमत दे कर खरीद लिया है. उस की कंपनी के चारों पार्टनर्स को 5-5 करोड़ रुपए का फायदा हुआ है.

तपन की मां ने चित्रा से फोन पर कहा, ‘‘तुम्हारी सफलता पर बहुतबहुत बधाई. देखा तपन ने ठीक ही कहा था कि तुम बहुत मेहनती लड़की हो और जल्द ही तुम्हें तरक्की मिलेगी.’’

‘‘सब आप लोगों के आशीर्वाद से है.’’

‘‘अब तो तेरा प्रोजैक्ट भी पूरा हो गया तो बता तपन के बारे में क्या सोचा है?’’

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‘‘मैं ने कहा था न कि तपन बहुत अच्छे इनसान हैं. मुझे भी अच्छे लगते हैं. इस के आगे मैं क्या बोलूं? हां, एक और सरप्राइज है, मेरी कंपनी को अमेरिका से बहुत बड़ा और्डर मिला है.’’

मां ने जब यह बात तपन को बताई तो उस ने फोन मां के हाथ से ले कर चित्रा से कहा, ‘‘बहुतबहुत बधाई इस दूसरी कामयाबी पर और एक सरप्राइज मेरी ओर से भी है. मुझे प्रमोशन दे कर कंपनी ने कोलकाता औफिस में पोस्टिंग की है. 1 हफ्ते के अंदर जौइन करना होगा.’’

फिर मां ने चित्रा से कहा, ‘‘अब तो और इंतजार नहीं कराना है?’’

‘‘नो मोर इंतजार मांजी. अब आगे आप की मरजी का इंतजार है. आप जो कहेंगी वैसा ही करूंगी,’’ और हंसते हुए फोन काट दिया.

इधर मां की आंखों में भी खुशी के आंसू छलक आए थे.

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कायरता का प्रायश्चित्त: भाग 1

लेखक-  शुचिता श्रीवास्तव

डा. मिहिर ने जैसे ही अपने चेहरे के सामने से किताब हटाई और सामने बैठे मरीज की तरफ देखा तो वह चौंक गए.

चौंकी तो मिताली भी थी पर उस ने अपनेआप को संयत कर लिया था.

‘‘अरे मिहिर, आप?’’ मिताली बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि आप यहां हो सकते हैं.’’

‘‘कहो, मिताली, कैसी हो और क्या हुआ तुम्हें जो एक डाक्टर की जरूरत पड़ गई?’’ डा. मिहिर सामान्य स्वर में बोले.

‘‘मिहिर, मैं तो ठीक हूं पर यहां मैं अपने पति नवीन को दिखाने आई हूं,’’ मिताली बोली, ‘‘पिछले 3-4 माह से उन की तबीयत कुछकुछ खराब रहती थी पर इधर कुछ दिनों से काफी अधिक अस्वस्थ रहने लगे हैं,’’ कह कर मिताली ने

डा. मिहिर का परिचय नवीन से करवाया, ‘‘नवीन, डा. मिहिर का घर कानपुर में मेरी बूआ के घर के बगल में है. मेरे फूफाजी और मिहिर के डैडी बचपन के दोस्त हैं.’’

डा. मिहिर ने नवीन का चेकअप किया व कुछ टेस्ट करवाने का परामर्श दिया जिस की रिपोर्ट ले कर अगले दिन आने को कहा.

मिताली व नवीन चले गए पर

डा. मिहिर का मन उचट गया. एक बार उन के मन में आया कि वह घर लौट जाएं लेकिन जब अपने मरीजों का ध्यान आया जो कई दिन पहले नंबर लगवा चुके थे और काफी दूरदूर से आए थे तो उन्होंने अपनेआप को संभाल लिया और चपरासी से मरीजों को अंदर भेजने के लिए कह दिया.

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शाम के समय मिहिर को किसी दोस्त के घर पार्टी में जाना था पर वह वहां न जा कर सीधे घर आ कर चुपचाप बिस्तर पर लेट गए.

डा. मिहिर को बारबार एक ही बात चुभ रही थी कि जिस मिताली के कारण अपना घर, डैडी का अच्छाखासा नर्सिंग होम छोड़ कर उसे इस अनजान शहर में आ कर अपनी प्रैक्टिस जमानी पड़ी वही मिताली उन के शांत जीवन में कंकड़ फेंकने के लिए यहां भी आ गई.

‘‘साहब, चाय लेंगे या कौफी?’’ हरिया ने अंदर आ कर पूछा.

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं लूंगा,’’ मिहिर ने छोटा सा जवाब दिया तो वह चला गया.

उस के जाते ही मिहिर का मन अतीत के सागर में गोते लगाने लगा.

मिताली को पहली बार मिहिर ने रस्तोगी अंकल की बेटी रानी के जन्मदिन की पार्टी में देखा था. यों तो वह रानी के घर वालों के मुंह से मिताली की सुंदरता की चर्चा पहले भी सुन चुका था पर उस दिन जो देखा तो बस देखता ही रह गया था.

हालांकि मिहिर भी कम सुंदर न था. उस पर संपन्न परिवार का इकलौता लड़का, साथ में डाक्टरी की पढ़ाई. पार्टी में आई तमाम लड़कियों की नजरें उस पर टिकी थीं और वे उस से बातें करने को आतुर थीं. पर मिहिर जिस से बात करना चाहता था वह अपनी सहेलियों से बातें करने में व्यस्त थी.

काफी देर बाद मिहिर को मिताली से बात करने का मौका मिला.

‘आप का नाम मिताली है?’ बातचीत शुरू करने के उद्देश्य से मिहिर ने पूछा.

‘हां, पर आप को मेरा नाम कैसे पता चला?’ मिताली ने उसे आश्चर्य से देखते हुए प्रतिप्रश्न किया.

‘सिर्फ नाम ही नहीं, मैं तो आप के बारे में और भी बहुत कुछ जानता हूं,’ मिहिर ने कहा तो मिताली की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘अच्छा, और क्याक्या जानते हैं आप मेरे बारे में?’ उस ने पूछा.

‘यही कि आप रानी के मामा की बेटी हैं और एम.बी.ए. की छात्रा हैं. संगीत सुनना, बैडमिंटन खेलना, कविताएं लिखना आप की हौबी है,’ मिहिर बोला.

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‘हां, आप कह तो सच रहे हैं पर मेरे बारे में इतना सबकुछ आप कैसे जानते हैं? क्या मैं आप का परिचय जान सकती हूं?’ मिताली ने कहा.

‘मैं रानी का पड़ोसी हूं. मेरा नाम मिहिर है. मैं मेडिकल अंतिम वर्ष का छात्र हूं. आजकल छुट्टियों में घर आया हूं,’ मिहिर ने अपना परिचय दिया.

तभी मिताली को किसी ने पुकारा और वह वहां से चली गई. मिहिर भी घर लौट आया. उस की आंखों की नींद व मन का चैन उड़ चुका था. दिनरात, सोते- जागते, उठतेबैठते बस उसे मिताली ही नजर आती थी.

उस दिन मिहिर अपनी छोटी बहन रूपाली के साथ शापिंग करने गया था. रूपाली बुटीक में अपने लिए कपड़े पसंद कर रही थी. मिहिर बोर होने लगा तो वह बाहर आ गया. अचानक उस की नजर सामने की गिफ्ट शाप की तरफ गई तो वह चौंक पड़ा. वहां मिताली कुछ खरीद रही थी. मिहिर उस ओर बढ़ चला.

‘हाय, मिताली, कैसी हो और यहां कैसे?’ मिताली के करीब जा कर मिहिर ने पूछा.

‘अरे मिहिर, आप और यहां. दरअसल आज मेरी एक फैं्रड का जन्मदिन है. मैं उसी के लिए गिफ्ट खरीदने आई हूं, और आप?’ मिताली ने उस से कहा.

‘मैं अपनी बहन रूपाली के साथ आया हूं. वह सामने की दुकान से कपड़े खरीद रही है. बोर होने लगा तो अंदर से बाहर आ गया और तुम यहां दिख गईर्ं.’

मिताली ने एक टेबल लैंप पैक करवा लिया. वह पैसे देने के लिए मुड़ी तो मिहिर ने उसे फिर शो केसों की तरफ बुला लिया और एक सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘मिताली, देखो तो जरा यह कैसा लग रहा है?’

‘बहुत खूबसूरत है,’ मिताली बोली.

मिहिर ने सोचा, क्यों न वह अपने प्यार का इजहार मिताली को यह सुंदर उपहार दे कर करे? यह सोच कर उस ने वह ताजमहल और साथ में एक खूबसूरत पत्थर का बना कीमती ब्रेसलेट भी खरीद लिया.

तभी मिहिर को ढूंढ़ते हुए वहां रूपाली भी आ गई और मिताली को देख कर उस से बातें करने लगी.

मिहिर मन ही मन खुश हुआ कि चलो वह सफाई देने से बच गया वरना न जाने कितनी देर तक उस की छोटी बहन उस से सिर्फ इसलिए लड़ती कि वह उसे बिना बताए क्यों चला आया.

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‘अच्छा अब मैं चलती हूं,’ घड़ी की तरफ नजर डालते हुए मिताली बोली.

‘मिताली, हमारे साथ ही चलो न, मुझे मेरी दोस्त के घर छोड़ कर मिहिर भैया तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे.’

Satyakatha: मकान में दफन 3 लाशें- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

पवन ने 2018 में हरियाणा के शहर पानीपत की शिवनगर कालोनी में 5 लाख रुपए में एक मकान खरीदा था. इस से पहले वह अपने परिवार के साथ पानीपत की ही शुगर मिल कालोनी के क्वार्टर में किराए पर रहता था.

पवन ने यह मकान ढाई साल पहले खरीदा था, लेकिन उस में उस ने वहां कोई मरम्मत का काम नहीं करवाया था.

मकान के बाहरी हिस्से में स्थित दालान के एक कोने में छोटी लाल चींटियों ने फर्श में सुराख बना दिए थे. उन्हीं सुराखों के रास्ते बहुत दिनों से फर्श के भीतर बड़ी तादाद में चींटियों का आनाजाना लगा था. यह देख कर पवन और उस की पत्नी बबीता को कुछ अजीब सा लगता था, लेकिन दोनों उस पर ज्यादा माथापच्ची नहीं करते थे.

बात यहीं पर खत्म हो गई, ऐसा नहीं था. दालान वाले फर्श पर जब कभी भी कोई वजनदार चीज गिरती थी तो छन्न की आवाज होती थी. पता नहीं क्यों दोनों को ऐसा लगता था जैसे फर्श के नीचे खोखला हो. एक दिन बबीता पति से बोली, ‘‘देखो जी, चींटियों का सिलसिला तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. पता नहीं कहां से आती हैं और कहां जाती हैं.’’

‘‘कह तो तुम ठीक रही हो बबीता. मैं भी कई दिनों से चींटियों का नजारा देख रहा हूं. इन की लाइन टूटने का नाम ही नहीं ले रही है.’’ पवन ने कहा.

‘‘सच कह रहे हो आप. मैं तो कहती हूं कि किसी राजमिस्त्री को बुला कर फर्श दिखा देते हैं कि ऐसा क्यों होता है.’’ पत्नी ने सुझाव दिया.

‘‘तुम ठीक कहती हो, कल ही किसी राजमिस्त्री को बुला कर दिखाता हूं. पता तो चले कि ऐसा क्यों हो रहा है.’’ पवन ने सहमति जताई.

अगले दिन पवन एक राजमिस्त्री को बुला कर ले आया और फर्श दिखाया. हथौड़े से फर्श के ऊपर मिस्त्री ने चोट की तो सचमुच छन्न की आवाज आ रही थी. फिर उस ने कमरे के फर्श पर चोट की तो वहां ऐसी कोई आवाज नहीं हुई.

राजमिस्त्री को कुछ आशंका हुई. उस ने हथौड़े से फर्श पर छेनी से लगातार 3-4 चोट कीं. इतने से ही फर्श में गहरा छेद बन गया और उस के हाथ से छेनी छूट कर उस छेद में जा गिरी. यह देख कर राजमिस्त्री दंग रह गया था.

उत्सुकतावश मिस्त्री फर्श तोड़ता गया. तो फर्श के भीतर एक गहरा गड्ढा बना मिला, जिस के ऊपर सीमेंट की एक मोटी परत भर चढ़ाई गई थी. यह देख कर सभी दंग रह गए.

इस के बाद राजमिस्त्री ने हथौड़े से पूरे फर्श को तोड़ दिया. 4×6 लंबाई और चौड़ाई तथा 7 फीट गहरे फर्श के नीचे एक गड्ढा मिला. शक होने पर पवन ने गड्ढे से मिट्टी निकलवाई तो अंदर का दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर सभी के होश उड़ गए थे. गड्ढे के अंदर बड़ी मात्रा में कंकाल पड़े थे.

पवन को जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने पुलिस कंट्रोलरूम के 100 नंबर पर फोन कर के घटना की जानकारी दे दी. मामला वाकई चौंकाने वाला था.

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सूचना मिलते ही कंट्रोलरूम ने किला थाने के सीआईए-1 प्रभारी राजपाल अहलावत को घटना की जानकारी दी और उन्हें वहां पहुंचने के निर्देश दिए.

सूचना मिलते ही सीआईए-1 थाने के प्रभारी राजपाल अहलावत पुलिस टीम के साथ शिवनगर कालोनी पहुंच गए, जहां का यह मामला था. मौके पर पहुंच कर उन्होंने छानबीन शुरू कर दी.

बांस की सीढ़ी के सहारे उन्होंने कांस्टेबल लखन यादव को गड्ढे में उतारा. कांस्टेबल को वहां 3 मानव खोपडि़यां दिखीं. इस का मतलब साफ था कि गड्ढे में हत्या कर के 3 लाशें दफनाई गई थीं. इंसपेक्टर राजपाल ने मकान मालिक पवन से पूछा, ‘‘कब से रह रहे हो यहां?’’

‘‘करीब ढाई साल से.’’ पवन ने सपाट लहजे में जबाव दिया.

‘‘किस की लाशें हैं ये? तुम ने किस की हत्या की और उसे दफना दिया?’’ इंसपेक्टर राजपाल ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने किसी की हत्या नहीं की, सर. मैं कुछ नहीं जानता हूं.’’ पवन बोला.

‘‘तुम नहीं जानते तो और कौन जानता है?’’ इंसपेक्टर ने सवाल किया.

‘‘सर, ढाई साल पहले मैं ने इस मकान को अहसान सैफी से 5 लाख रुपए में खरीदा था.’’ पवन ने बताया.

‘‘अहसान सैफी इस समय कहां है? क्या मकान खरीदते समय इस की छानबीन की थी तुम ने?’’ इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया.

‘‘नहीं सर, नहीं की थी. मालिक वही था. चाहें तो आप पूछ सकते हैं. उस ने बताया था बीवी और बच्चों के साथ वह जगदीश नगर में किराए का कमरा ले कर रहता है. फिर जब से मैं ने मकान खरीदा है, तब से मैं ने यहां कोई नया काम नहीं कराया.’’

‘‘क्या…?’’ पवन की बात सुन कर राजपाल अहलावत ऐसे चौंके जैसे कोई अजूबा देख लिया हो, ‘‘तुम ने इतने दिनों में कोई काम नहीं कराया?’’

‘‘हां सर, मैं सच कहता हूं, मैं ने कोई काम नहीं कराया. चाहे तो आप पड़ोसियों से पूछ सकते हैं.’’ पवन ने सफाई दी.

‘‘वो तो मैं पूछ ही लूंगा, पहले तुम अहसान सैफी के घर ले चलो. बाकी तो मैं बाद में देखता हूं.’’

इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ने पूछताछ करते हुए ही घटना की जानकारी डीएसपी सतीश वत्स, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को दे दी थी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद जांच टीम मौके पर आ चुकी थीं. छानबीन के दौरान फोरैंसिक टीम ने मौके से जो 3 खोपडि़यां बरामद की थीं, उस में एक औरत और 2 बच्चों की थीं. हड्डियों के ढांचे के आधार पर एक बच्चे की उम्र करीब 10 साल और दूसरे की 14 साल के आसपास आंकी गई थी.

इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ने कंकालों को पोस्टमार्टम के लिए पीजीआई रोहतक भेजवा दिया और तीनों कंकालों से डीएनए टेस्ट के लिए सैंपल लिए और जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेजवा दिए.

यह सब करतेकरते दोपहर के 3 बज गए थे. कागजी काररवाई पूरी करने के बाद इंसपेक्टर अहलावत थाने वापस लौट आए और 2 कांस्टेबलों के साथ पवन को जगदीश नगर अहसान सैफी का पता लगाने के लिए भेज दिया. इधर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. यह बात मार्च, 2021 के पहले सप्ताह की है.

अहसान सैफी ने पवन को अपना जो पता बताया था, वहां पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि अहसान सैफी नाम का कोई आदमी अपने परिवार के साथ यहां कभी रहा ही नहीं. यह सुन कर सभी दंग रह गए. इस का मतलब साफ था कि अहसान सैफी ने पवन से झूठ बोला था.

दोनों कांस्टेबलों ने इंसपेक्टर राजपाल को फोन कर के पूरी बात बता दी. जिस बात की आशंका उन्हें पहले से थी, आखिरकार वही सच हुआ. इंसपेक्टर अहलावत की नजरों में अहसान सैफी संदिग्ध रूप से चढ़ गया था.

उन्हें शक था कि अहसान ने अपनी बीवी और दोनों बच्चों की हत्या कर के उसे जमींदोज कर के फरार हो गया होगा. तसवीर उस के पकड़े जाने पर साफ होगी, इसलिए पुलिस अहसान सैफी की तलाश में जुट गई.

अहसान सैफी तक पहुंचने के लिए पुलिस ने अपने मुखबिर तंत्र का जाल फैला दिया, जिस का परिणाम सुखद निकला. मुखबिर के जरिए पुलिस को पता चला कि मरने वालों में अहसान सैफी की दूसरी पत्नी नाजनीन और उस के बेटे सोहिल और साजिद थे.

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नाजनीन अमीर घराने के मुन्ना शेख की शादीशुदा बेटी थी. वह मुंबई की कल्याणी घाट की रहने वाली थी. मुखबिर के जरिए पुलिस को मुन्ना शेख का मोबाइल नंबर मिल गया. पुलिस ने फोन कर के उसे सारी बात बताई और पानीपत के किला थाना बुलवाया.

3 दिनों बाद मुन्ना शेख पानीपत के किला थाने पहुंचा और इंसपेक्टर राजपाल अहलावत से मिला. मामले को ले कर मुन्ना शेख से उन्होंंने विस्तार से पूछताछ की तो पता चला अहसान सैफी से उस की तलाकशुदा बेटी नाजनीन शेख की नजदीकियां शादी डौटकौम के जरिए बढ़ी थीं.

उस के बाद दोनों ने निकाह कर लिया. निकाह के बाद मुंबई से यहां (पानीपत) आ गई और दोनों साथ रहने लगे. बीचबीच में फोन के जरिए बातचीत हो जाया करती थी.

‘‘कब से आप दोनों की बातें नहीं हुईं?’’ राजपाल अहलावत ने पूछा.

‘‘सर, यही कोई 4 साल से.’’

‘‘4 साल से?’’ थानाप्रभारी बुरी तरह चौंके, ‘‘4 सालों से आप दोनों के बीच में बातचीत नहीं हुई तो क्या आप ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि बेटी और नाती कहां हैं, किस हाल में हैं?’’

‘‘की थी सर. बेटी और नातियों के बारे में पता लगाने की बहुत बार कोशिश की थी, लेकिन दामाद कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया करता था. तो मैं भी थकहार कर बैठ गया.’’ मुन्ना शेख ने बताया.

‘‘थाने में कोई सूचना नहीं दी थी?’’

‘‘नहीं सर.’’

‘‘ओह नो! कैसे बाप हो तुम. जिस की बेटी और 2-2 नाती गायब हों, वह शख्स भला हाथ पर हाथ धरे कैसे बैठा रह सकता है. हद कर दी तुम ने तो.’’ कुछ सोचते हुए उन्होंने आगे पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पास अहसान का कोई फोन नंबर है?’’

‘‘एक नंबर है साहब, जिस से अकसर बातें हुआ करती थीं कभी.’’ मुन्ना बोला.

उस के बाद मुन्ना शेख ने अहसान सैफी का मोबाइल नंबर उन्हें दे दिया और यह भी बता दिया था कि अहसान उत्तर प्रदेश के भदोही शहर में कहीं रह रहा है. इंसपेक्टर राजपाल ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया. उस नंबर की लोकेशन भदोही की ही आ रही थी. 24 मार्च, 2021 को एक पुलिस टीम तुरंत भदोही भेज दी.

इत्तफाक से अहसास भदोही में ही मिल गया, जहां वह अपनी तीसरी पत्नी के साथ मजे से रह रहा था.

अहसान सैफी को भदोही से गिरफ्तार कर इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ट्रांजिट रिमांड पर पानीपत ले आए और पूछताछ के लिए अदालत में पेश कर 10 दिनों की रिमांड पर उसे ले लिया.

पूछताछ में अहसान सैफी ने पुलिस के सामने कबूल कर लिया कि उसी ने अपनी दूसरी पत्नी नाजनीन और उस के दोनों बेटों सोहेल और साजिद को खाने में नींद की दवा खिला कर मौत के घाट उतार दिया था और राज छिपाने के लिए तीनों की लाशें दालान में गड्ढा खुदवा कर दफना दीं, ताकि किसी को कुछ पता न चले. उस के बाद उस ने पूरी कहानी से परदा उठा दिया.

पूछताछ में उस ने यह भी बताया कि उस की पहली पत्नी नूरजहां और बेटा शाकिर ने हत्या का राज छिपाने और मृतका के कीमती सामानों को रख लेने में उस की मदद की थी. इस आधार पर पुलिस ने मुजफ्फरनगर के जाग्गाहेड़ी से आरोपी अहसान सैफी की पहली पत्नी नूरजहां और बेटे शाकिर को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

सवा 4 साल से रहस्यमय ढंग से गायब नाजनीन और उस के बेटों सोहेल और साजिद की हत्या की दिल दहला देने वाली कहानी ऐसे सामने आई—

अहसान सैफी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के जाग्गाहेड़ी का रहने वाला था. मध्यमवर्गीय परिवार के अहसान सैफी के परिवार में पत्नी नूरजहां और 2 बेटे साहिल और शाकिर थे. पेशे से अहसान सैफी बढ़ई था.

बढ़ई के काम से इतनी कमाई नहीं होती थी कि घर खर्च के बाद भविष्य के लिए 2 पैसे बचा पाएं. जो भी वह कमाता था सारा पैसा परिवार के खर्च में निकल जाता था. यह देख कर अहसान हमेशा परेशान रहता था कि ऐसा क्या करे, जिस से गरीबी से छुटकारा भी मिल जाए और दौलतमंद भी हो जाए.

पत्नी से सलाहमशविरा कर के अहसान सैफी मुजफ्फरनगर से पानीपत किस्मत आजमाने चला आया था. किस्मत ने साथ दिया तो उस के दिन पलट गए. बढ़ई के काम से यहां उसे अच्छे पैसे मिलने लगे थे. परिवार के खर्च के लिए आधा पैसा भेज देता था और आधा अपने पास खर्चे के लिए रखता था.

अगले भाग में पढ़ें- पति की बेईमान शराफत पर नाजनीन ने आंख बंद कर कर लिया यकीन 

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दैनिक आहार में कुछ महत्त्वपूर्ण खाद्यपदार्थ शामिल कर आप अपने उन खास पलों के रोमांच को किस तरह बढ़ा सकते हैं, जरूर जानिए:

सामन:

सामन ओमेगा-3 फैटी ऐसिड डीएचए और ईपीए का एक ज्ञात प्राकृतिक स्रोत है. इस से मस्तिष्क में डोपामाइन स्तर बढ़ने में मदद मिलती है, जिस से उत्तेजना पैदा होती है. ओमेगा-3 डोपामाइन की उत्पादन क्षमता बढ़ाता है. यह मस्तिष्क के लिए एक महत्त्वपूर्ण रसायन है, जो व्यक्ति के चरमसुख की भावना को ट्रिगर करता है.

कद्दू के बीज:

कद्दू के बीज जस्ता (जिंक) का एक बड़ा स्रोत हैं, जो टेस्टोस्टेरौन को बढ़ा देते हैं. इन में आवश्यक मोनोअनसैचुरेटेड वसा भी होती है, जिस से शरीर में कोलैस्ट्रौल बनता है. यौन हारमोन को ठीक से काम करने के लिए कोलैस्ट्रौल की जरूरत पड़ती है.

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बैरीज:

स्ट्राबैरी, ब्लैकबैरी, नीले जामुन ये सभी प्राकृतिक मूड बूस्टर हैं. स्ट्राबैरी में पर्याप्त विटामिन सी और बी होता है. ब्लैकबैरी और नीले जामुन फाइटोकैमिकल युक्त होते हैं, जो व्यक्ति के मूड को रामांटिक बनाते हैं.

केला:

केला पोटैशियम का प्राकृतिक स्रोत है. पोटैशियम एक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व है, जो मांसपेशी संकुचन को बढ़ाता है और उन खास पलों में बहुत अहम होता है. साथ ही केला ब्रोमेलैन से समृद्ध होता है, जो टेस्टोस्टेरौन उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार होता है.

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तरबूज:

तरबूज में 92% पानी है, लेकिन बाकी 8% पोषक तत्त्वों से भरा होता है. तरबूज का शांत प्रभाव रक्तवाहिकाओं को शांत करता है. यह स्त्री और पुरुष दोनों के अंगों में रक्तप्रवाह सुधारता है.

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लहसुन:

रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाला खास आहार लहसुन ऐलिकिन समृद्ध होता है, जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के यौन अंगों में रक्तप्रवाह को बढ़ाता है. रात में शहद में भिगो कर रखा गया कच्चा लहसुन खाना लाभप्रद होता है.

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