Sidharth Shukla के जाने से दुखी हुए भोजपुरी एक्टर रवि किशन, कहा ‘बहुत शॉकिंग है’

बिग बॉस 13 के विनर और फेमस टीवी सिद्धार्थ शुक्ला की मौत हार्ट अटैक की वजह से हो गई. एक्टर की मौत से एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में शोक की लहर छाई है. ऐसे में भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार रवि किशन ने भी दुख व्यक्त किया है. उन्होंने सिद्धार्थ शुक्ला की मौत को लेकर एक पोस्ट किया है.

रवि किशन ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर करते हुए कहा है कि सिद्धार्थ का इतनी छोटी उम्र में चले जाना बेहद दुखद है.

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रवि किशन  वीडियो में यह कहते हुए नजर आ रह हैं कि यह बहुत ही दुखद खबर है. सिद्धार्थ शुक्ला ने इतनी कम उम्र में सक्सेस की दहलीज पर अपना कदम रख दिया था. बिग बॉस के घर से उन्हें बहुत प्यार मिला था. उनका ऐसे चले जाना बहुत शॉकिंग है.

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आप इस वीडियो में ये भी दख सकते हैं कि रवि किशन सिद्धार्थ शुक्ला की तारीफ करते हुए कह रह हैं कि वे तुम हमेशा महिलाओं के लिए और ह्यूमन राइट्स के लिए लड़ते थे. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आगे क्या कहूं.

 

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हाल ही में बिग बॉस ओटीटी में  सिद्धार्थ शुक्ला और  शहनाज गिल गेस्ट के रूप में दिखाई दिए थे. उन दोनों को देख बिग बॉस ओटीटी के सभी कंटेस्टेंट के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी. वूट सिलेक्ट ने अपने ऑफिशल इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया. जिसमें दोनों  ‘तुहाडा कुत्ता टॉमी’ सॉन्ग पर धमाकेदार डांस कर रहे थे.

इसके बाद सिद्धार्थ शुक्ला डांस रियलिटी शो डांस दीवाने 3 में भी दिखाई दिए. जहां उन्होंने  फिल्म दिल तो पागल है के फेमस डायलॉग को फिर से रीक्रिएट किया. कलर्स टीवी ने अपने सोशल मीडिया पर प्रोमो शेयर करते हुए लिखा, जब सिद्धार्थ शुक्ला बने राहुल और माधुरी दीक्षित एक बार फिर बनी पूजा. हमारा दिल तो पागल होना ही था.

कल्याण सिंह हालात के हिसाब से बदलते रहें!

राजनीति‘मेरा उद्देश्य अब पिछड़ों को उन का हक दिलाना है. राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी इस काम को पूरा करेगी…’ साल 2002 में अपनी अलग पार्टी का गठन करते समय कल्याण सिंह ने ऐसा कहा था.

‘भाजपा में वापस जाना मेरी भूल थी. राम मंदिर पर अपनी भूमिका को ले कर भी मुझे खेद है. इस बार मैं ने हमेशाहमेशा के लिए भाजपा से संबंध खत्म कर लिए हैं,’ 21 जनवरी, 2009 को कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होने के बाद कहा था.

कल्याण सिंह अपनी बात पर कायम होने वाले नेता नहीं बन सके. वे जबजब भाजपा से अलग हुए, तबतब पार्टी को बुरी तरह से कोसा. इस के बाद वापस भाजपा में गए.

वैसे तो कल्याण सिंह साल 1967 में पहली बार विधायक चुने गए थे, लेकिन भाजपा में उन का उपयोग उस समय किया गया, जब तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ी जातियों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को पूरे देश में लागू किया था.

हर दल में पिछड़ी जाति के नेताओं को अहमियत दी जाने लगी थी और उस दौर में भाजपा ने भी कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे पिछड़े तबके के नेताओं को आगे कर के सत्ता हासिल की थी.

जनता पार्टी में जनसंघ का विलय होने के बाद जब जनता पार्टी टूटी, तब जनसंघ से आए नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी नाम से नया दल बनाया था. इस के पीछे संघ का पूरा हाथ था.

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भाजपा के संस्थापकों में अगड़ी जातियों के नेता प्रमुख थे. इन में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी व विजयाराजे सिधिंया जैसे नेता प्रमुख थे.

भाजपा के बनने के बाद संघ ने तय किया कि राम मंदिर आंदोलन को तेज किया जाएगा. इसी दौर में मंडल कमीशन को ले कर पिछड़ों की राजनीति भी शुरू हो रही थी.

भाजपा को उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के किसी ऐसे नेता की तलाश थी, जो मुलायम सिंह यादव का मुकाबला कर सके, वह जमीन से जुड़ा हो और उस में हिंदुत्व की भी धार हो.

कल्याण सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उसी बैल्ट से आते थे, जिस से मुलायम सिंह यादव आते थे. अलीगढ़ के रहने वाले कल्याण सिंह साल 1967 में पहली बार विधायक बने थे. इसी साल मुलायम सिंह यादव भी चुनाव जीते थे.

मुलायम सिंह यादव भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इटावा से आते थे. वे साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे. ऐसे में भाजपा ने कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपने का फैसला लिया.

कल्याण सिंह की खूबी थी कि वे पिछड़ी लोधी जाति से आते थे. वे हिंदुत्व की राजनीति कर सकते थे. वे अक्खड़ और रूखे स्वभाव के नेता थे. उन की छवि साफ थी. साल 1984 में कल्याण सिंह को भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष बना कर उन का इस्तेमाल शुरू किया था.

आमनेसामने 2 ओबीसी नेता

साल 1986 में राम मंदिर आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया गया, तो कल्याण सिंह सब से उपयोगी नेता साबित हुए. भाजपा ने कल्याण सिंह के कंधे पर बंदूक रख कर चलाना शुरू किया. उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के लोग एकजुट न रह सके, जिस से मंडल कमीशन का फायदा पिछड़ी जातियों को मिल सके.

इस राजनीति ने कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव को आमनेसामने खड़ा कर दिया. मुलायम सिंह यादव संघ की हिंदुत्व वाली राजनीति के खिलाफ थे. कल्याण सिंह ने राम मंदिर आंदोलन की कमान खुद संभाल रखी थी. उन दोनों के बीच राजनीतिक मुठभेड़ शुरू  हो गई.

भाजपा में ऊंची जातियों के नेता दूर से इस लड़ाई को देख रहे थे. साल 1989 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब कल्याण सिंह भाजपा विधानमंडल दल के नेता थे.  इस दौरान राम मंदिर आंदोलन शिखर पर था.

साल 1990 में राम मंदिर बनाने के लिए कारसेवा की घोषणा हुई. उस समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उन्होंने कहा था कि अयोध्या में कोई भी कारसेवक घुसने नहीं पाएगा. वहां परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा. दूसरी तरफ कल्याण सिंह इस बात पर अडिग थे कि कारसेवक अयोध्या पहुंचेंगे. 30 अक्तूबर और 6 नवंबर को हिंसक झड़पें हुईं.

कारसेवकों को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव को गोलियां चलवानी पड़ीं. इस के बाद उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की लहर उठी. कल्याण सिंह इस के प्रतीक बने. मंडल कमीशन और पिछड़ों की राजनीति का नुकसान हुआ. मुलायम सिंह की सरकार गिर गई.

साल 1991 में उत्तर प्रदेश में दोबारा चुनाव हुए और तब पहली बार कल्याण सिंह की अगुआई में भाजपा की सरकार बनी. 221 सीटों वाली भाजपा ने कल्याण सिंह को अपना मुख्यमंत्री बनाया. कल्याण सिंह ने अपनी सरकार का कामकाज रामलला के दर्शन करने के बाद शुरू किया.

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हिंदुत्व की लहर पर सवार कल्याण सिंह भले ही मुख्यमंत्री बने पर पिछड़ी जातियों के सामाजिक न्याय के साथ धोखा हो गया. कल्याण सिंह केवल पिछड़ी जातियों के न्याय और मंडल कमीशन लागू होने की राह में रोड़ा ही नहीं बने, बल्कि मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ कर कानून और व्यवस्था के प्रति न्याय नहीं कर सके. अदालत में शपथपत्र देने के बाद भी वे अयोध्या के विवादित ढांचे की हिफाजत नहीं कर सके.

जब गिर गया विवादित ढांचा

कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद राम मंदिर की राजनीति करने वाली विश्व हिंदू परिषद ने दबाव बनाना शुरू किया कि राम मंदिर मसला जल्दी हल किया जाए.

कल्याण सिंह राम मंदिर बनाने का रास्ता मजबूत करना चाहते थे, पर उन के पास कोई हल नहीं था. मसला कोर्ट में था. बिना कोर्ट के फैसले के कुछ हो नहीं सकता था. वे इस मामले में थोड़ा वक्त चाहते थे.

राम मंदिर आंदोलन से जुड़े ऊंची जातियों के नेता इस के लिए वक्त देने को तैयार नहीं थे. ऐसे में 6 दिसंबर, 1992 को कारसेवा की घोषणा कर दी गई. कल्याण सिंह ने केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों को वचन दिया कि कारसेवा के दौरान अयोध्या में कोई गड़बड़ नहीं होने  दी जाएगी.

6 दिसंबर के पहले से ही देशभर में माहौल गरम था. कारसेवा करने वालों के हौसले बुलंद थे, क्योंकि इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे, जो रामभक्त थे. उन से यह उम्मीद नहीं की जा रही थी कि वे कारसेवकों पर गोली चलवाएंगे. कारसेवक, जो काम साल 1990 में नहीं कर पाए थे, वह 2 साल बाद साल 1992 में करना चाहते थे.  कल्याण सिंह ने अयोध्या की सुरक्षा के ऐसे इंतजाम किए थे, जिस में केंद्र सरकार की फोर्स पीछे थी. उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों में अयोध्या की मुख्य कमान थी. घटना के दिन उत्तर प्रदेश पुलिस पीछे हट चुकी थी. उसे यह आदेश थे कि किसी भी कीमत पर कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई जाएगी.

कारसेवक गुंबदों पर चढ़ कर उन्हें तोड़ने लगे. इस बात की जानकारी देश के तब के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को मिली. वे मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से फोन पर संपर्क करने की कोशिश करने लगे.

कल्याण सिंह अपने सरकारी आवास में थे. इस के बाद भी फोन पर बात नहीं की. वे भाजपा के नेताओं के संपर्क में थे. जैसा निर्देश मिल रहा था, वैसा काम कर रहे थे. पुलिस ने गोली नहीं चलाई और अयोध्या में कारसेवकों का  कब्जा हो गया. 1-1 कर के तीनों गुंबद गिरते गए.

केंद्र सरकार ने कैबिनेट मीटिंग शुरू की. उस में यह फैसला लिया जाना था कि उत्तर प्रदेश की कल्याण सरकार को बरखास्त कर दिया जाए.

यह सूचना मिलते ही जैसे ही साढ़े 5 बजे तीनों गुंबद गिर गए, कल्याण सिंह 30 मिनट बाद राजभवन गए और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

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जब तक गुंबद पूरी तरह से गिर नहीं गए और वहां पर अस्थायी राम मंदिर नहीं बन गया, कल्याण सिंह ने कुरसी नहीं छोड़ी.

कल्याण सिंह ने इस के बाद पूरे देश में ‘जनादेश यात्रा’ निकाली. उन को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और ‘अयोध्या का नायक’ कहा गया.

‘चरित्र हनन’ की राजनीति

साल 1997 में बहुजन समाज पार्टी और भाजपा के बीच 6-6 महीने की सरकार चलाने का समझौता हुआ. कल्याण सिंह 21 अक्तूबर को मुख्यमंत्री बने. कल्याण सिंह को यह लगा कि वे अब भाजपा के बड़े नेता हो चुके हैं. इस सोच के बाद ही उन का टकराव उस समय के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से हो गया.

अगड़ी जाति के नेताओं को यह लग चुका था कि कल्याण सिंह को अब जमीन पर लाना है. इस के बाद कल्याण सिंह के साथ राजाजीपुरम क्षेत्र की सभासद कुसुम राय के संबंधों को ले कर ‘चरित्र हनन’ की राजनीति शुरू हुई. ऊंची जातियों के समर्थक मीडिया में रोज नई खबरें गढ़ी जाने लगीं. लोग राजाजीपुरम के नाम को मजाक में ‘रानीजीपुरम’ कहने लगे.

अहम की इस लड़ाई में अयोध्या के नायक कल्याण सिंह की हार हुई. उन को भाजपा से बाहर कर दिया गया.

साल 2002 में कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी का गठन किया, पर इस में वे कामयाब नहीं हुए. साल 2004 में वे वापस भाजपा में आए. 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान कल्याण भाजपा से बाहर हो गए.  उस समय उन्होंने कहा कि अब वे वापस भाजपा में नहीं जाएंगे. यह दौर वह था, जब भाजपा में पिछड़ी  जातियों की जगह अगड़ी जातियों का कब्जा था.

साल 2013 में जब भाजपा में पिछड़ी जातियों को अहमियत दी जाने लगी, तो कल्याण सिंह को वापस भाजपा में लाया गया. साल 2014 में राजस्थान और साल 2015 में हिमाचल प्रदेश के प्रभारी राज्यपाल बने.

साल 2017 में कल्याण सिंह के पोते संदीप को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री बनाया गया. साल 2019 में कल्याण सिंह वापस भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे.

साल 2021 के अगस्त महीने में कल्याण  सिंह की मौत हो गई, जिस के बाद भाजपा ने पूरे सम्मान के साथ उन का अंतिम संस्कार किया.

Photo Credit- Social Media

Film Review- हेलमेटः कमजोर लेखन व निर्देशन

रेटिंगः एक स्टार

निर्माताःसोनी पिक्चर्स और डीनो मोरिया

निर्देशकः सतराम रमानी

कलाकार: अपारशक्ति खुराना, प्रनूतन बहल, अभिषेक बनर्जी, आशीष विद्यार्थी, शारिब हाशमी, रोहित तिवारी, सानंद वर्मा, हिमांशु कोहली, दीपक वर्मा,जयशंकर त्रिपाठी,अनुरीता झा, श्रीकांत वर्मा और अन्य.

अवधिः एक घंटा 44 मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5

भारत में बहुत से विषयों पर बात करने से लोग हिचकते हैं. कुछ चीजों पर बात करना ‘टैबू’बना हुआ है. उन्हीं में से जनसंख्या नियंत्रण के उपाय के तौर पर कंडोम का उपयोग करना भी षामिल है. हमारे देश में कंडोम खरीदते हुए लोग झिझकते हैं.कंडोम के बारें में बात करना भी गंवारा नही है.इसी मुद्दे पर फिल्मकार सतराम रमानी फिल्म ‘‘हेलमेट’’ लेकर आए हैं,जो कि तीन सितंबर से ‘जी 5’’पर स्टीम हो रही है.

कहानीः

जोगी(अशीष विद्यार्थी) के साले गुप्ता(श्रीकांत वर्मा ) की शादी व्याह में बैंड बाजा बजाने वाली बैंड कंपनी है, जिसमें गीत गाने वाले अनाथ युवक लक्की(अपारषक्ति खुराना ) संग जोगी की बेटी रूपाली(प्रनूतन बहल) को प्यार है. लक्की और रूपाली के बीच प्यार की खिचड़ी पकते हुए चार वर्ष हो गए हैं. एक शादी के मौके पर जहां फूलों से सजावत करने का काम रूपाली करते हैं.वहीं रूपाली व लक्की को एक कमरे में एकांत मिलता है,पर हमबिस्तर होने केे लिए रूपाली,लक्की से कंडोम लेकर आने के लिए कहती है.

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लक्की, शंभू मेडिकल स्टोर पर जाने के बावजूद कंडोम नहीं खरीद पाता. रूपाली कहती है कि लक्की उसके पिता जोगी से उसका हाथ मांगकर शादी कर ले. लक्की जोगी के पास जाता है, मगर रूपाली के सामने ही जोगी,लक्की से कहते हैं कि वह रूपाली की शादी अमरीका में रह रहे विक्रम से करेंगे,जिसकी कमायी तीन लाख है. इतना ही नहीं गुप्ता जी लक्की को अपने बैंड से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं.अब लक्की के पास नौकरी नही है.अपना खुद का बैंड शुरू करने के लिए पैसे नही है.

उसका दोस्त माइनस(अषीष वर्मा ) भी बेरोजगार है.माइनस के दोस्त सुल्तान(अभिषेक बनर्जी ) को बंटी (शारिब हाशमी) का कर्ज चुकाना है. अब लक्की,माइनस व सुल्तान तीनों योजना बनाकर एक ट्क से मोबाइल से भरे डिब्बे समझ कर चुुराते हैं.पर उन डिब्बों में मोबाइल की बजाय कंडोम के छोटे छोटे डिब्बे निकलते हैं.अब क्या करेे?तब तीनो हेलमेट पहनकर अपनी शक्ल व पहचान छिपाकर कंडोम के छेटे डिब्बे बेचना शुरू करते हैं. रूपाली भी उनका साथ देती है.पैसे आते ही लक्की अपना ‘‘लक्की ब्रास बैंड’’ शुरू करता है. पर जोगी, गुप्ता से कहते हैं कि लक्की का बैंड शुरू न होने पाए.उसके बाद कई घटनाकम्र तेजी से बदलते हैं.

लेखन व निर्देशन:

आयुष्मान खुराना जिस तरह की फिल्में करते हैं,उसी तरह की फिल्म सतराम रमानी ‘हेलमेट’लेकर आए हैं,मगर पटकथा बहुत कमजोर हैं. कहानी में नयापनद नही है.इस तरह की प्रेम कहानी साठ व सत्तर के दशक में काफी नजर आती थीं.इतना ही नही फिल्म में लक्की व रूपाली के रोमांस को भी ठीक से चित्रित नहीं किया जा सका.सब कुछ एकदम मोनोटोनस है. फिल्म में ह्यूमर का घोर अभाव है. जबकि इस तरह के विषय वाली फिल्म में ह्यूमर तो अनिवार्य रूप से होना चाहिए.कुछ दृश्य बड़े अजीबोगरीब हैं.दो दशक पूर्व एड्स की बीमारी का हौव्वा पैदा हुआ था.

उस वक्त एड्स जागरूकता मिशन के तहत कई एनजीओ कार्यरत हुए थे, उसी की पृष्ठभूमि में 2021 में लोगों को जन्म नियंत्रण के बारे में शिक्षित करने के साथ-साथ ‘कंडोम’खरीदने की शर्म और शर्मिंदगी को पेश करने का यह असफल प्रयास है. इस तरह के विषयों में ह्यूमर व व्यंग्य अनिवार्य होता है.पर सतराम रामनी बुरी तरह से मात खा गए.हास्य के दृश्य मेलोडमौटिक हो गए हैं. हकीकत में लेखन व निर्देशन इस कदर कमजोर है कि एक बेहतरीन विषय का सट्टानाश हो गया है.

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अभिनय:

अफसोस अपारशक्ति अपने अभिनय को निखार नही सके.लक्की के किरदार में अपारशक्ति खुराना को देखकर इस बात का अहसास हुआ कि उनके अंदर की अभिनय क्षमता को निकालने का काम अच्छा निर्देषक ही कर सकता है.क्योकि पिछली फिल्मों में अपारशक्ति बेहतरीन अभिनय कर चुके हैं. अपारशक्ति खुराना और आशीष वर्मा के पास तो स्वाभावकि मजाकिया गुण है,मगर वह भी इस फिल्म में नजर नहीं आया.अभिषेक बनर्जी का काम अच्छा है.आशीष वर्मा भी जमे नही. प्रनूतन बहल खूबसूरत लगने के अलावा कुछ नही कर पायी.उन्हे अपनी अभिनय प्रतिभा को निखारने के लिए काफी मेहनत करने की जरुरत है.अशीष विद्यार्थी की प्रतिभा को जाया किया गया है.षारिब हाषमी ने फिल्म क्यों की,यह समझ से पर है.

अनुज कपाड़िया संग बढ़ेंगी अनुपमा की नजदीकियां, आएगा ये बड़ा ट्विस्ट

सुधांशु पांडे और रूपाली गांगुली स्टारर सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) टीआरपी लिस्ट में लगातार टॉप में जगह बनाई हुई है. शो में अब तक आपने देखा कि नया किरदार अनुज कपाड़िया की एंट्री हो चुकी है. जिससे कहानी में कई दिलचस्प मोड़ आने वाला है. शो के अपकमिंग एपिसोड में महाट्विस्ट होने वाला है. आइए बताते हैं शो के ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि रियूनियन पार्टी में अनुपमा-अनुज कपाड़िया मिलते हैं. अनुपमा को वहां पता चलता है कि बिजनेसमैन अनुज कपाड़िया उसका क्लासमेट है. अनुज अनुपमा स शायराना अंदाज में अपने दिल का हाल बयां करता है लेकिन अनुपमा नहीं समझ पाती है.

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तो वहीं देविका अनुपमा को स्टेज के करीब ले जाती है और अनुज अपने कॉलेज के दिनों को याद करता है. देविका अनुज से कहती है कि यह मौका अपने हाथ से मत जाने दो, अनुपमा के साथ तुम डांस कर सकते हो. अनुज- अनुपमा स्टेज पर धमाकेदार डास करते हैं.

 

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तो दूसरी तरफ समर और नंदिनी के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. नंदिनी का एक्स बॉयफ्रेंड आ चुका है. वह नंदिनी को फोर्स कर रहा है कि वो दोनों फिर से पैचअप कर ले लेकिन नंदिनी कहती है कि अब वह सिर्फ समर से प्यार करती है.

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अनुपमा- अनुज का डांस दखकर वनराज की गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है. तो वहीं काव्या हैरान हो जाती है कि अनुज- अनुपमा क्लासमेट है. हालांकि वनराज अनुज कपाड़िया के साथ अपनी डील को लेकर परेशान दिखाई पड़ता है. तो वहीं काव्या अनुपमा- अनुज की दोस्ती का फायदा उठाना चाहती है.

 

मैं एक्टर बनना चाहता हूं, इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल

मैं 18 साल का एक गरीब घर का लड़का हूं. मैं बीए पास हूं और देखने में हैंडसम भी हूं. मैं फिल्मों में जाना चाहता हूं, पर मुझे ऐक्टिंग का कोई अनुभव नहीं है. क्या मेरा यह सपना पूरा हो सकता है? इस सिलसिले में मुझे सही राह दिखाएं?

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जवाब

न तो ऐक्टिंग ही आसान काम है और न ही फिल्म इंडस्ट्री में मुकाम हासिल कर पाना हंसीखेल है. अगर आप खूबसूरती के दम पर फिल्मों का सपना देख रहे हैं तो वक्त रहते जाग जाएं, नहीं तो इन सपनों में आप का बहुत वक्त बरबाद हो जाएगा.

अगर आप वाकई संजीदा हैं, तो ऐक्टिंग का कोई कोर्स करें. इस के लिए अपने शहर के किसी ऐक्टिंग स्कूल या नाटक मंडली में दाखिला लें और फिर देखें कि ऐक्टिंग आप के बस की बात है या नहीं. लगन और मेहनत से कोई भी सपना पूरा हो जाता है, लेकिन ऐक्टिंग का होगा, इस की कोई गारंटी नहीं है.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कहीं किसी रोज- भाग 1: आखिर जोया से विमल क्या छिपा रहा था?

स्विमिंग पूल के किनारे एक तरफ जा कर विमल ने हाथ में लिए होटल के गिलास से ही सूर्य को जल चढ़ाया, सुबह की हलकीहलकी खुशनुमा सी ताजगी हर तरफ फैली थी, जल चढ़ाते हुए उस ने कितने ही शब्द होठों में बुदबुदाते हुए कनखियों से पूल के किनारे चेयर पर बैठी महिला को देखा, आज फिर वह अपनी बुक में खोई थी.

कुछ पल वहीं खड़े हो कर वह उसे फिर ध्यान से देखने लगा, सुंदर, बहुत स्मार्ट, टीशर्ट, ट्रैक पैंट में, शोल्डर कट बाल, बहुत आकर्षक, सुगठित देहयष्टि.

विमल को लगा कि वह उस से उम्र में कुछ बड़ी ही होगी, करीब चालीस की तो होगी ही, वह उसे निहार ही रहा था कि उस स्त्री ने उस की तरफ देख कर कहा, ‘‘इतनी दूर से कब तक देखते रहेंगे, आप की पूजाअर्चना हो गई हो और अगर आप चाहें तो यहां आ कर बैठ सकते हैं.‘‘

विमल बहुत बुरी तरह झेंप गया. उसे कुछ सूझा ही नहीं कि चोरी पकडे जाने पर अब क्या कहे, चुपचाप चलता हुआ उस स्त्री से कुछ दूर रखी चेयर पर जा कर बैठ गया.

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स्त्री ने ही बात शुरू की, ‘‘आप भी मेरी तरह लौकडाउन में इस होटल में फंस गए हैं न? आप को रोज देख रही हूं पूजापाठ करते. और आप भी मुझे देख ही रहे हैं, यह भी जानती हूं.‘‘

विमल झेंप रहा था, बोला, ‘‘हां, यहां देहरादून में औफिस के टूर पर आया था, अचानक लौकडाउन में फंस गया, मैं लखनऊ में रहता हूं और आप…?‘‘

‘‘मैं देहरादून घूमने आई थी. मैं बैंगलोर में रहती हूं, वहीं जौब भी करती हूं.‘‘

‘‘अकेले आई थीं घूमने?‘‘ विमल हैरान हुआ.

‘‘जी, मगर आप इतने हैरान क्यों हुए?‘‘

विमल चुप रहा, महिला उठ खड़ी हुई, ‘‘चलती हूं, मेरा एक्सरसाइज का टाइम हो गया. थोड़ी रीडिंग के बाद ही मेरा दिन शुरू होता है.‘‘

विमल ने झिझकते हुए पूछा, ‘‘आप का शुभ नाम?‘‘

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‘‘जोया.‘‘

‘‘आगे?‘‘

‘‘आगे क्या?‘‘

‘‘मतलब, सरनेम?‘‘

‘‘मुझे बस अपना नाम अच्छा लगता है, मैं सरनेम लगा कर किसी धर्म के बंधन में नहीं बंधना चाहती, सरनेम के बिना भी मेरा एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो सकता है. आप भी मुझे अपना नाम ही बताइए, मुझे किसी के सरनेम में कभी कोई दिलचस्पी नहीं होती.‘‘

विमल का मुंह खुला का खुला रह गया, ‘‘यह औरत है, क्या है,’’ धीरे से बोला विमल.

‘‘ओके, बाय,‘‘ कह कर जोया चली गई. विमल जैसे एक जादू के असर में बैठा रह गया.

लौकडाउन के शुरू होने पर रूड़की के इस होटल में 8-10 लोग फंस गए थे, कुछ यंग जोड़े थे जो कभीकभी दिख जाते थे, कुछ ऐसे ही टूर पर आए लोग थे, दिनभर तो विमल लैपटौप पर औफिस के काम में बिजी रहता. वह बहुत ही धर्मभीरु, दब्बू किस्म का इनसान था, उस की पत्नी और दो बच्चे लखनऊ में रहते थे, जिन से वह लगातार टच में था, जोया को वह अकसर ऐसे ही स्विमिंग पूल के आसपास खूब देखता. अकसर वह इसी तरह बुक में ही खोई रहती.

जोया एक बिंदास, नास्तिक महिला थी, बैंगलोर में अकेली रहती थी, एक कालेज में फाइन आर्ट्स की प्रोफेसर थी, विवाह किया नहीं था. पेरेंट्स भाई के पास दिल्ली रहते थे, घूमनेफिरने का शौक था, खूब सोलो ट्रैवेलिंग करती, खूब पढ़ती, हमेशा बुक्स साथ रखती, अब लौकडाउन में फंसी  थी तो बुक्स पढ़ने के शौक में समय बीत रहा था. वह बहुत इंटेलीजेंट थी, कई फिलोसोफर्स को पढ़ चुकी थी, कई दिन से देख रही थी कि विमल उसे चोरीचोरी खूब देखता है, उसे मन ही मन हंसी भी आती, विमल देखने में स्मार्ट था, पर उसे एक नजर देखने से ही जोया को अंदाजा हो गया था कि वह धर्म में पोरपोर डूबा इनसान है.

होटल में स्टाफ अब बहुत कम  था, खानेपीने की चीजें सीमित थीं, पर काम चल रहा था. विमल का आज काम में दिल नहीं लगा, आंखों के आगे जोया का जैसे एक साया सा लहराता रह गया.

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शाम होते ही लैपटौप बंद कर स्विमिंग पूल की तरफ भागा, जोया अपनी बुक में डूबी थी. विमल उस के पास जा कर खड़ा हो गया, ‘‘गुड ईवनिंग, जोयाजी.”

बुक बंद कर जोया मुसकराई, ‘‘गुड ईवनिंग, आइए, फ्री हैं तो बैठिए.”

विमल तो उस के पास बैठने के लिए ही बेचैन था, जोया बहुत प्यारी लग रही थी, नेवई ब्लू, टीशर्ट में उस का गोरा सुनस
सुंदर चेहरा खिलाखिला लग रहा था. जोया ने छेड़ा, ‘‘देख लिया हो तो कोई बात करें.”

हंस पड़ा विमल, ‘‘आप बहुत स्मार्ट हैं, नजरों को खूब पढ़ती हैं.”

‘‘हां जी, यह तो सच है,” जोया ने दोस्ताना ढंग से कहा, तो दोनों में कुछ बढ़ा, जोया ने कहा, ‘‘आजकल तो यहां जितनी भी सुविधाएं मिल रही हैं, बहुत हैं, मेरी सुबहशाम तो स्विमिंग पूल पर कट रही है और दिन होटल के कमरे में. आप क्या करते रहते हैं?”

Crime Story: शादी के बीच पहुंची दूल्हे की प्रेमिका तो लौटानी पड़ी बरात

एक लड़की, जिसकी शादी हो रही हो, हाथों में मेहंदी लगी हो, फेरे चल रहे हों, उस वक्त होने वाले पति की प्रेमिका आ जाए, तो उसका क्या हाल होगा, कहना सहज ही समझा जा सकता है. अगर किसी शादी के खूबसूरत माहौल में ऐसा मोड़ आता है तो लड़की व उस के परिवार की खुशियों पर ग्रहण लग जाता है.

भले ही लड़की के परिवार वालों ने पुलिसिया कार्यवाही से मना कर दिया हो, पर उस घर में मातम पसरा रहता है. प्रेमिका को धोखा देकर शादी करना कितना भारी पड़ सकता है, यह इस वाकए से उजागर होता है.

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घटना 7 जुलाई की है. जालंधर जिले के गोराया में उस दिन शादी समारोह चल रहा था. माहौल खुशियों से भरा था. दूल्हा-दुलहन फेरे ले रहे थे. इसी बीच एक लड़की वहां पहुंचीं और जोर-जोर से अपनी बात कहनी शुरू कर दी. वह लड़की दूल्हे की बचकाना हरकत को ऐसे बखान कर रही थी जैसे उस ने शादी कर के आफत मोल ले ली हो. हालात ऐसे हो गए कि दूल्हे को भीगी बिल्ली बन वहां से रफूचक्कर हो जाना पड़ा.

दरअसल, वह लड़की दूल्हे की प्रेमिका थी. दूल्हा उसे धोखा दे कर शादी कर रहा था, वह भी चोरीछिपे. ऐसा कैसे हो सकता था. प्रेमिका की पैनी नजर से वह बच न सका. तभी तो ऐसे हालात हो गए कि दूल्हे को बरात के संग बिना शादी किए लौट जाना पड़ा.

शेरपुर गांव के जसकरन कुमार उर्फ जस्सी बरात ले कर गोराया गांव में एक लड़की से शादी करने पहुंचा था. गुरुद्वारा साहिब में फेरों की रस्म चल रही थी. तभी वहां एक लड़की अचानक ही पहुंच गई. उस लड़की ने ऐसा हंगामा खड़ा किया कि लोगों की नजरें उधर ही घूम गईं. उस लड़की ने खुद को जसकरन उर्फ जस्सी की प्रेमिका बताया. उस के ऐसा कहने पर समारोह में हड़कंप मच गया.

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इस सब के बीच लड़की ने दुल्हन के परिवार को दूल्हे जसकरन से अपने प्रेम संबंध की जानकारी दी. साथ ही, जसकरन के साथ की कुछ तस्वीरें दिखाईं. तस्वीरों की सचाई की बाबत जब पूछा गया तो जसकरन ने हामी भर दी. फिर क्या था, घड़ा तो फूटना ही था. गनीमत यह थी कि कोई अप्रिय घटना नहीं हुई.

उस लड़की ने यह भी बताया कि उस का जसकरन कुमार उर्फ जस्सी के साथ तकरीबन डेढ़ साल से प्रेम प्रसंग चल रहा है. वह उस के साथ रहती थी और घूमने के लिए वे दोनों दुबई भी गए थे. वह लड़की गांव में उस के परिवार के साथ भी रह चुकी है.

जस्सी ने उसे गुमराह किया था कि उस के बड़े भाई की शादी है. उसे बीती रात ही यह पता चला कि शादी जसकरन की हो रही है. तुरंत ही वह उस के गांव शेरपुर पहुंची तो सारा मामला साफ हो गया.

दुल्हन के घर वालों ने दूल्हा जसकरन से पूछा तो उस ने बताया कि उसे दुबई से लौटे 8 महीने हुए हैं. 4 महीने पहले ही उस की दोस्ती इस लड़की से हुई थी. जब उस से लड़की द्वारा दिखाई गई तस्वीरों के बारे में पूछा गया, तो उस ने प्रेम प्रसंग को स्वीकारा. इस के बाद दुल्हन के परिवार ने शादी से मना कर दिया.

थाना गोराया के प्रभारी ने इस संबंध में कहा कि जस्सी के परिवार वाले लड़की के परिवार (जिस से शादी हो रही थी) से राजीनामा कर बारात वापस ले गए. दुल्हन के परिवार ने भी मामले में किसी तरह की पुलिसिया कार्यवाही से मना कर दिया.

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शादी से बैरंग लौटना भले ही दूल्हे जस्सी के लिए इज्जत का सवाल हो गया, पर दुल्हन के परिवार वालों पर क्या बीती होगी. शादी में खर्च तो हुआ ही साथ ही सामाजिक अपमान भी झेलना पड़ा होगा. ऐसी शादियां कितने दिन तक टिक पातीं, यह तो पता नहीं, पर ऐसी शादियां न हों, तो ही बेहतर है. इसीलिए तो कहा जाता है कि शादी भले ही देर मेंं हो, पर तहकीकात बहुत जरूरी है.

Satyakatha- सोनू पंजाबन: गोरी चमड़ी के धंधे की बड़ी खिलाड़ी- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- सुनील वर्मा  सोनू

कुछ समय बाद गीता ने निक्कू से कुछ पैसा ले कर गीता कालोनी में ही अपना खुद का ब्यूटीपार्लर खोल लिया और इस की आड़ में खुद तो जिस्मफरोशी का धंधा करती ही थी, साथ में उस ने नौकरी दे कर कुछ लड़कियों को भी पार्लर में जोड़ लिया.

सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन एक बार फिर उस की खुशियों को ग्रहण लग गया. साल 2000 में एक दिन ऐसा आया जब यूपी पुलिस ने निक्कू त्यागी को हापुड़ के पास मुठभेड़ में मार गिराया.

एक बार फिर गीता के सिर से उस के सरपरस्त का साया उठ गया और वह उदास हो गई. लेकिन तब तक वह जिस्मफरोशी की दुनिया के जिस धंधे में वह उतर चुकी थी, उस ने गम की परछाई को ज्यादा दिन गीता के ऊपर रहने नहीं दिया.

गीता धीरेधीरे यमुनापार के गरीब परिवार की खूबसूरत लड़कियों को अपने साथ जोड़ कर उन से धंधा कराने लगी.

एक दिन गीता की मुलाकात दीपक जाट से हुई. दीपक उस के पास आया तो था अपने जिस्म की प्यास बुझाने के लिए, लेकिन वह गीता की अदाओं और हुस्न के जाल में इस तरह उलझा कि तन ही नहीं, मन से भी उस से प्यार करने लगा. इस के बाद तो दीपक अकसर गीता से मिलनेजुलने लगा.

ऐसा लगता था कि तकदीर ने गीता की जिंदगी में आने वाले हर मर्द के हाथों में अपराध की लकीरें बना कर भेजी थीं. नजफगढ़ इलाके का रहने वाला दीपक भी विजय और निक्कू की तरह अपराधी ही था. उस की गिनती दिल्ली के नामी वाहन चोरों में होती थी.

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दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में दीपक और उस के छोटे भाई हेमंत उर्फ सोनू का जबरदस्त खौफ था. गीता जीवन में आई तो दीपक को लगने लगा कि जैसे भटकती जिंदगी को किनारा मिल गया हो. कुछ समय बाद दीपक ने बिना सात फेरे लिए ही गीता के साथ पतिपत्नी की तरह रहना शुरू कर दिया.

लेकिन 2003 में असम पुलिस ने दीपक को स्कौर्पियो कार चुराने के आरोप में मुठभेड़ में मार गिराया. गीता फिर तन्हा हो गई. लेकिन इस बार उस का ये तन्हापन ज्यादा दिन नहीं रहा क्योंकि इस बार उसे सहारा देने वाला कोई और नहीं वरन दीपक का छोटा भाई हेमंत उर्फ सोनू था.

दीपक के भाई हेमंत उर्फ सोनू ने भाई की मौत के बाद गीता से अपनी इकरारे मोहब्बत बयान कर उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया.

सोनू भी दिल्ली से ले कर हरियाणा और यूपी के कई गैंगस्टरों के साथ मिल कर लूट, डकैती, अपहरण, जबरन वसूली और ठेके पर हत्या करने की वारदातों को अंजाम देता था.

लेकिन 6 मार्च, 2006 को स्पैशल सेल के एसीपी संजीव यादव की टीम ने गुड़गांव के सागर अपार्टमेंट में हेमंत को उस के 2 साथियों जसवंत और जयप्रकाश के साथ मुठभेड़ में मार गिराया.

हेमंत की मौत के बाद गीता एक बार फिर अकेली हो गई. लेकिन अब तक गीता का नाम बदल चुका था. सोनू की पत्नी होने के कारण लोग उसे गीता की जगह सोनू और जाति से पंजाबी होने के कारण पंजाबन ज्यादा कहने लगे थे.

एक बार सोनू नाम क्या पड़ा कि जल्द ही गीता अरोड़़ा सोनू पंजाबन के नए नाम से विख्यात हो गई. अपने अतीत की वजह से सोनू पंजाबन का अपराध से करीब का रिश्ता बन चुका था.

सोनू पंजाबन हेमंत के एक दोस्त गैंगस्टर अशोक बंटी से पहले से परिचित थी. इस के बाद उस ने बुलंदशहर के अशोक उर्फ बंटी के साथ दिलशाद गार्डन में रखैल की तरह रहना शुरू कर दिया. लेकिन सोनू को शायद पता नहीं था कि अपराध से उस ने जो नाता जोड़ा है, उस से अभी उस का पीछा छूटा नहीं है.

उसे शायद ये भी नहीं पता था कि उस की किस्मत में स्थायी रूप से किसी मर्द का साथ लिखा ही नहीं था.

बंटी को अप्रैल 2006 में एक दिन दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल ने मुठभेड़ में मारा गिराया.

सोनू के जीवन में जो भी मर्द आया वह पुलिस के हाथों मारा गया. इसलिए अब उस ने किसी का आसरा लेने की जगह जिस्मफरोशी के अपने धंधे को ही चमकाने और बढ़ाने का काम शुरू किया. वह अपने धंधे को संगठित रूप से बढ़ाने व चलाने लगी.

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सोनू गीता कालोनी इलाके में बदनामी के कारण अपने बेटे को अपनी मां और भाइयों के पास छोड़ कर साकेत के पर्यावरण कौंप्लैक्स में रहने चली गई और वहीं से धंधा औपरेट करने लगी.

सोनू पंजाबन को जिस्मफरोशी के आरोप में पहली बार 31 अगस्त, 2007 को प्रीत विहार पुलिस ने 7 लड़कियों के साथ गिरफ्तार किया था. इस के बाद सोनू पूरी तरह एक कालगर्ल सरगना के रूप में बदनाम हो गई.

उस ने प्रीत विहार छोड़ कर साकेत में नया ठिकाना बना लिया. लेकिन वहां भी 21 नवंबर, 2008 को साकेत पुलिस ने सोनू को सैक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

सोनू ने फिर ठिकाना बदला और प्रीत विहार में एक दूसरा बंगला किराए पर ले लिया. लेकिन 22 नवंबर, 2009 को वहां भी प्रीत विहार पुलिस ने छापा मार दिया. सोनू को फिर से 4 लड़कियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद तो सोनू के दिमाग से पुलिस का खौफ पूरी तरह निकल गया. अब वह खुल कर बड़े पैमाने पर धंधा करने लगी.

उस ने अपराध की दुनिया से जुड़े प्रेमियों और जिस्मफरोशी के कारोबार से जुटाई गई दौलत से दिल्ली के महरौली इलाके के सैदुल्लाजाब के अनुपम एनक्लेव में एक आलीशान फ्लैट खरीद लिया और वहीं से अंडरग्राउंड रह कर धंधे का संचालन करने लगी.

सोनू अब लड़कियों को खुद ले कर नहीं जाती थी उस ने एजेंट रख लिए. सोनू ने अपने सभी फोन नंबर भी बदल लिए थे. वह आमतौर पर अंजान लोगों से फोन पर बात नहीं करती बल्कि किसी पुराने ग्राहकों का रैफरेंस देने पर ही नए ग्राहकों को लड़की उपलब्ध कराती थी.

5 अप्रैल, 2011 को सोनू को महरौली पुलिस ने 5 लड़कियों और साथ धर दबोचा. इस बार पुलिस ने उस के ऊपर मकोका कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया.

इस बार उस के साथ पकड़ी गई लडकियों में ज्यादातर लड़कियां मौडल या टेलीविजन कार्यक्रमों में काम करने वाली अभिनेत्रियां थीं.

इस बार यह खुलासा हुआ कि सोनू का धंधा कई राज्यों तक फैल चुका था. उस का पूरा कारोबार संगठित तरीके से चलता था.

हालांकि पुलिस सोनू पंजाबन पर मकोका कानून के आरोप सिद्ध नहीं कर सकी, इसीलिए 2013 में वह मकोका के आरोप से बरी हो कर जेल से रिहा हो गई.

3 साल जेल में रहने के बाद सोनू पंजाबन अदालत से बरी हुई तो उस ने बेहद सावधानी से अपने धंधे को आगे बढ़ाना शुरू किया. अब वह खुद सामने नहीं आती थी बल्कि अपने लोगों को सामने रख कर इस काम को करती थी.

सोनू पंजाबन ने अब लड़कियों को अपने यहां काम पर रख लिया है. इन लड़कियों को वह ग्राहक के पैसों में हिस्सा नहीं देती थी, बल्कि उन्हें एकमुश्त सैलरी देती थी.

यूं कहें तो गलत न होगा कि उस ने अपने काम करने के तरीके को एकदम कारपोरेट शैली में बदल दिया था.

उस के सिंडीकेट से जुड़े हर शख्स का काम बंटा हुआ था. कोई लड़कियों को एस्कार्ट करता था तो कोई उन का ड्राइवर बन कर उन्हें बड़ेबड़े ग्राहकों के पास छोड़ कर आता था.

सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 2011 में प्रीति नाम की एक लड़की को खरीदने के आरोप में उसे 24 साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहने की सजा मिलेगी, यह उस ने कभी नहीं सोचा था.

दरअसल, उन दिनों प्रीति 13 साल की थी. जब वह कोंडली में स्थित दिल्ली सरकार के स्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ती थी. गरीब परिवार में जन्मी प्रीति के पिता एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे.

अभावों में पलीबढ़ी लेकिन सूरत व शरीर से बेहद खूबसूरत प्रीति की दोस्ती स्कूल आतेजाते संदीप बेलवाल से हो गई, जो उस से 4-5 साल बड़ा था.

संदीप कभी उसे कार तो कभी मोटरसाइकिल से घुमाने लगा. संदीप से प्रभावित होने के बाद प्रीति उस के प्यार में कुछ ऐसी दीवानी हो गई कि वह उस पर आंख बंद कर के भरोसा करने लगी.

एक दिन इसी विश्वास में प्रीति संदीप के साथ उस के जन्मदिन की पार्टी मनाने नजफगढ़ में उस की किसी सीमा आंटी के पास चली गई. बस यही उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी.

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संदीप ने उस दिन कोल्डड्रिंक में उसे कोई मदहोश करने वाली दवा पिला कर उस की इज्जत को तारतार कर दिया. इतना ही नहीं वह उसे सीमा आंटी के पास एक लाख रुपए में बेच कर चला गया. बाद में उसे पता चला कि सीमा आंटी देहव्यापार करने वाली औरत थी और संदीप उस के साथ जुड़ा था.

इस के बाद शुरू हुआ प्रीति की जिंदगी में हर रोज होने वाले यौनशोषण का ऐसा सिलसिला जो कई साल तक चला.

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आखिर क्यों लड़कियों को ही माना जाता हैं रेप के लिए दोषी?

गरीब कमजोर लड़कियों को, खासतौर पर अगर वे निचले वर्गों से आती हों तो, रेप करने का हक हर ऊंची जाति का मर्द पैदायशी और धर्म की मोहर वाला मानता है. निचले लोग तो होते ही सेवा के लिए हैं और भोग की चीज बनाने में कोई हर्ज नहीं है, यह सोच देश के गांवगांव में भरी है. 2014 में बरेली के पास के एक गांव में दोपहर में 3 मर्दों ने तमंचे के बल पर एक शादीशुदा लड़की का रेप किया. उस की हिम्मत थी कि उस ने पुलिस, मजिस्टे्रट और डाक्टर को पूरी बात बताई और फास्टटै्रक अदालत में मामला गया.

चूंकि फास्टटै्रक कोर्ट भी ऐसे मामले को हलके में ही लेती है, गवाही तक काफी समय बीत गया और जब लड़की से अदालत ने बयान लिया तो वह मुकर गई. जाहिर है इतने दिन काफी थे एक गरीब लड़की के घर वालों को धमकाने में. ये गरीब लड़कियां न सिर्फ कमजोर हैं, उन के घर वालों ने दिमाग में भरा है कि इस तरह के जुल्म सहना तो उन के भाग में लिखा है जो पिछले जन्मों के कर्मों का फल है.

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ऐसा बहुत मामलों में होता है. मुंबई में 2015 में एक साढ़े 3 साल की बच्ची को रेप करने के मामले में एक लड़के को  6 साल जेल में तो रखा गया पर जब गवाही का समय आया तो मातापिता खिलाफ बोलने से मुकर गए. लड़की से पूछताछ वे कराना नहीं चाहते थे क्योंकि वह हादसा भूल सी चुकी थी.

भुवनेश्वर में 2003 में एससीएसटी जाति की एक मजदूरनी को रेप करने के आरोप में एक शख्स पकड़ा गया पर वह 2004 में जमानत पा गया. ट्रायल कोर्ट ने 2012 में उसे अपराधी माना पर गवाही में औरत ने कहा था कि उसे याद नहीं कि इन में से कौन लोग थे जो रात को इस अनाथ लड़की के घर में घुसे थे. उड़ीसा हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.

18 साल की एक लड़की ने अपने ममेरे भाई के खिलाफ नोएडा में शिकायत दर्ज कराई थी कि उस का कई बार बलात्कार किया गया और धमकी दी गई कि किसी को बताए न. जब उस ने शिकायत की तो उस लड़के को पकड़ा गया और कुछ महीनों में उसे जमानत मिल गई. गवाही में लड़की अपनी शिकायत से मुकर गई और एक गवाह जो उस का दादा ही था, वह भी मुकर गया और अपराधी बच निकला.

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रेप के मामले होते ही इसलिए हैं कि लड़कियों के मन में कूटकूट कर भर दिया गया है कि रेप की दोषी वे खुद हैं और गांवों, कसबों से ले कर शहरों तक यह खेल चलता है. हर लड़की को समझा दिया जाता है कि अगर जेल हो भी गई तो लड़की को तो गंदा मान लिया ही जाएगा, इसलिए पहले शिकायत करने के बाद भी लड़कियों को कहा जाता है कि वे मुकर जाएं कि उन के साथ रेप किया गया था ताकि इज्जत बची रहे.

औरतों और खासतौर पर गरीब और निचली, पिछड़ी जातियों का रेप करना आसान रहता है क्योंकि उन को समझा दिया जाता है कि ऊंचे लोगों को तो खुश करना ही उन का काम है. हमारे देश के चकले और देहव्यापार के केंद्र इन्हीं लड़कियों से भरे हैं. रेप हमेशा होते रहे हैं और होते रहेंगे पर चोरीडकैती भी हमेशा होती रही है और होती रहेगी. पर चोर और डाकू का शिकार अपने को अपराधी नहीं मानता जबकि लड़की रेप के बाद खुद को ही गलत मानती है और यही बड़ी वजह है कि धड़ल्ले से रेप होते हैं. जब तक रेप के आरोपी छूटते रहेंगे तब तक हिम्मत बनी रहेगी, यह पक्का है और अगर शिकार के मुकरने से छूट जाओ तो समझो गंगा नहा कर पाप धो आए. पाप करो, फिर गंगा नहाओ बस.

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