कभी भी मां बनना नहीं चाहती ये टेलीविजन अभिनेत्री

ये हम आपको रील नहीं, किसी की रियल लाइफ की बातें ही बता रहे हैं. टेलीविजन पर मशहूर, अभिनेत्री नारायणी शास्त्री को अपने जीवन में बच्चे पैदा करने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है.

नारायणी शास्त्री चैनल लाइफ ओके के एक शो में ‘भंवरी देवी’ का किरदार निभा चुकी हैं. नारायणी ने कई शो में एक मां का भी किरदार निभाया है, लेकिन रियल लाइफ में व ऐसा कुछ नहीं चाहती हैं. जी हां, खुद नारायणी ने यह बात स्वीकारती हैं कि उन्हें बच्चे पैदा करने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

वे कहती हैं कि वे और उनके पति इस बात को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट हैं कि हमें बच्चे नहीं चाहिए. हालांकि उन्हें तो शादी भी नहीं करनी थी. उन्हें लगता था कि शादी करने के बाद उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था, जो उनके काम और जीवन में कभी भी दखल न दे. कोई पाबंदी न लगाये.

ऐसे में शायद उन्हें, उनके पति के अलावा ऐसा कोई और व्यक्ति मिल ही नहीं रहा था. बता दें शादी को लेकर उनके पति टोनी की भी वही सोच थी, जो नारायणी की.

एक बार मीडिया से बात करते हुए अपने पति टोनी के बारे में नारायणी बताती हैं कि वे एक पेंटर हैं और काफी खुश होकर अपनी जिंदगी जी रहे हैं. टोनी के बारे में वे कहती हैं कि वे कभी झूठ नहीं बोलते हैं और उनका बहुत ख्याल रखते हैं.

नारायणी स्टार प्लस के नए शो चक्रव्यूह में नजर आएंगी और वे इस शो में नेगेटिव किरदार में हैं. वे कहती हैं कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें उनकी उम्र से बड़े किरदार निभाने को कहा जा रहा है. उनका मानना है कि वे हर तरह के किरदार निभाने के लिए तैयार हैं और चाहती हैं कि उन्हें हर तरह के और ज्यादा चैलेंजिंग रोल मिलते रहें.

नारायणी आगे ये भी कहने से नहीं चूकी कि वे अब अच्छे किरदार निभा कर थक चुकी हैं और अब वे ज्यादा से ज्यादा नेगेटिव किरदार निभाना चाहती हैं.

समाज को आईना दिखाती हैं इन फिल्मों की कहानियां

बौलीवुड फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि कई बार इनकी कहानियां समाज को आईना दिखाने का काम भी करती हैं. उनमें से ही एक है कुछ ही दिनों बाद रिलीज होने वाली फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’.

अलग-अलग दौर में ऐसी कहानियां और मुद्दे पर्दे पर आते रहे हैं, जिनको लेकर समाज में एक नकारात्मक सोच या पूर्वाग्रह रहता है. बहुत सी फिल्मों के जरिए ऐसी सोच पर प्रहार किया जाता है.

शुभ मंगल सावधान

आरएस प्रसन्ना निर्देशित फ़िल्म शुभ मंगल सावधान मेल फर्टिलिटी यानि पुरुषों में नपुंकसता के विषय पर आधारित है. यह फिल्म सितंबर 2017 में रिलीज की जानी है.

मेल इंफर्टिलिटी को समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता और बीमारी से ज्यादा इसे कमजोरी के तौर पर देखा और समझा जाता है. इसी मुद्दे पर यह फिल्म शुभ मंगल सावधान बात करेगी. इस फिल्म में आयुष्मान खुराना और भूमि पेडनेकर मुख्य भूमिकाओं में हैं.

पोस्टर बौयज

अभिनेता श्रेयस तलपड़े फिल्म ‘पोस्टर बौयज’ से अपना निर्देशन करियर शुरू कर रहे हैं. इस फिल्म में सनी देओल और बौबी देओल मुख्य भूमिका में नज़र आएंगे. इस फिल्म की कहानी नसबंदी को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों पर आधारित है.

निल बटे सन्नाटा

निर्देशन क्षेत्र में अश्विनी अय्यर तिवारी की डेब्यू फिल्म निल बटे सन्नाटा ने प्रौढ़ शिक्षा के मुद्दे को उजागर किया था. फिल्म में स्वरा भास्कर ने हाउस मेड का रोल निभाया था, जो एक बच्चे की मां होती है और इसकी एजुकेशन के लिए वो खुद भी स्कूल में दाखिला लेती है.

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का उम्रदराज महिलाओं की सेक्सुअल लाइफ को लेकर समाज में फैले पूर्वाग्रहों को दर्शाती है. फ़िल्म में रत्ना पाठक के किरदार के जरिए इस इश्यू को हाइलाइट किया गया.

इंग्लिश विंग्लिश

गौरी शिंदे की फ़िल्म इंग्लिश विंग्लिश में गृहिणियों को रसोई घर तक सीमित कर देने वाली पुरुषवादी सोच पर कमेंट किया गया था. श्रीदेवी ने इस फिल्म में लीड रोल निभाया.

क्वीन

अभिनेत्री कंगना रनौत की बेहतरीन अदाकारी वाली फिल्म ‘क्वीन’ कियी लड़की की शादी टूटने के सामाजिक कलंक को सामने लाने का काम करती है. विकास बहल की इस फिल्म में कंगना के किरदार के जरिए समझाने की कोशिश की गयी थी कि शादी टूटना लड़की के लिए कोई कलंक नहीं है.

विक्की डोनर

शूजित सरकार द्वारा निर्देशित फिल्म विक्की डोनर में स्पर्म डोनर जैसे अहम इशु के बारे में बात की गयी, जिसकी चर्चा करना आम जिंदगी में लगभग वर्जित समझा जाता है.

हिंदी सिनेमा में इस विषय को इससे पहले कभी नहीं उठाया गया. आयुष्मान खुराना और यामी गौतम ने फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं.

प्रेम रोग

ऋषि कपूर के करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक ‘प्रेम रोग’ में विधवाओं को लेकर एक समाज और उसमें परिवार के पूर्वाग्रहों को दिखाया गया था. इस फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. इस फिल्म का डायरेक्शन राज कपूर ने किया था.

क्या खास है कैटरीना के इन पुशअप्स में?

आज भी अगर किसी को बौलीवुड की किलर बौडी वाली अभिनेत्री को चुनने के लिए कहा जाये तो उसमें निश्चित ही कैटरीना कैफ का नाम भी आएगा. ‘चिकनी चमेली’ से लेकर के ‘काला चश्मा’ जैसे हिट गाने तक उनके हर गाने ने सबका दिल जीता है.

बातें कितनी भी कर ली जाएं फिर भी, सेक्सी एब्स बनाना कोई मजाक तो नहीं हैं और ये एक दिन में नहीं बनाए जा सकते हैं, इसलिए हर कोई जानता है कि छरछरी काया वाली कैट कितनी मेहनती करती हैं चाहे वे सैट पर हों, जिम में हो या फिर सामान्य जीवन में.

हाल ही में कैटरीना ने अपनी फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ की शूटिंग पूरी की है. इस फिल्म के सिलसिले में वे काफी समय से मोरक्को में रहीं. खबरों की मानें तो वे वहां अपने व्यस्त शेड्यूल के बावजूद एक्सरसाइज करना नहीं भूलती थीं. उनके इस वर्कआउट करते हुये विडियो को देखकर लगता है कि हमारे लिए ऐसी बॉडी पाना बहुत मुश्किल है.

उन्होने इंस्टाग्राम पर एक विडियो पोस्ट किया है, जिसमें वे कुछ अविश्वसनीय पुश-अप्स करते नजर आ रहीं हैं. आप कहेंगे कि इन पुशअप्स में खास क्या है? तो हम आपको बता देना चाहते हैं कि वे बिना हाथों को जमीन पर रखे ये पुश-अप्स कर रही हैं. विडियो देखें.

किसी ने अगर थोड़ा देर से दिमाग लगाया है तो हम बताते हैं कि इसमें हुआ क्या है. दरहशल कैटरीना ने हम सबके साथ मज़ाक किया है. इस दौरान वे एक तख्त पर हैं और किसी ने उन्हें पीछे से उठाया हुआ है. ये वाकई में एक शानदार मजाक है और हमें तारीफ करनी होगी कि किस तरह सफाई से उन्होने सबको बेवकूफ बनाया है.

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50 की उम्र में 20 साल का लगता है ये मौडल

हर डेसिंग लड़का एक आई केंडी की तरह होता है, जो अपने हौट और टफ लुक से किसी भी महिला को आसानी से अपना दीवाना बना सकता है.

वैसे तो दुनियाभर में कई ऐसे लोग हैं जो उनकी उम्र से बहुत ही कम उम्र के नजर आते हैं, पर आज हम एक ऐसे व्यक्ति की बात करने जा रहें हैं जिसे देखकर तो लगता है कि इसकी उम्र ही थाम गई हो मानो. ये हैं सिंगापुर के एक होनहार फोटोग्राफर चुआंडो तान जो 50 वर्ष की उम्र में भी किसी 20-22 साल के लड़के से कम नहीं लगते हैं.

बढ़ती उम्र मानों थम सी गई है

आपको बता दें की इनकी उम्र 50 साल हैं लेकिन इस बात पर कोई यकीन नहीं करता. जी क्योंकि दिखने में ये केवल 20 या 22 साल के लगते है. चुआंडो तान ने अपने आप को पूरी तरह फिट रखा है. वो अपने खान पान का काफी ध्‍यान रखते है.

ये है चुआंडो के फिटनेस का सीक्रेट

चुआंडो की इस फ़िटनेस का राज है कि सुबह जल्दी और रात में देर से नहाना अवॉईड करते हैं. वो रोजाना चिकन खाते हैं. चुआंडो हर हफ़्ते के कई घंटे जिम में ही बिताते हैं. चुआंडो की एक खास बात और है कि सामने वाला शख्स उनसे कितना ही अच्छा क्यों न हो, वो कभी किसी से ईर्ष्या नहीं करते.

अस्सी और नब्बे दशक के पॉपलुर मॉडल

चुआंडो के दोस्त इन्हें सीडी (CD) कह के पुकारते हैं. एक चाइनिज़ वेबसाइट पर इनकी तस्वीरे आने से अचानक सीडी चर्चा में आ गए हैं. ये 80 और 90 के दशक में सिंगापुर के खासे चर्चित मौडल हुआ करते थे. कुछ दिनों तक गायकी में भी अपना हाथ आजमाया था. अभी पेशेवर फोटोग्राफर हैं.

इंस्टाग्राम पर हैं 300 हजार से ज्यादा फौलोअर्स

चुआंडो को देखकर आप उनकी असली उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते. चुआंडो की असली उम्र 50 साल हैं, लेकिन वो देखने में बिल्कुल 20 साल के लड़के की तरह दिखते हैं. 50 साल के इस शख्स को देखकर कोई भी लड़की अपना दिल दे बैठेगी.

इंदू सरकार : आपातकाल पर सतही फिल्म

बौलीवुड में एक गंभीर राजनीतिक फिल्म की कल्पना करना बेवकूफी ही है. ऐसे में 1975 से 1977 के बीच के 21 माह के आपाकाल के दिनों में घटे घटनाक्रमों पर बनी मधुर भंडारकर की फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’से बहुत ज्यादा उम्मीदें करना निरर्थक ही है. क्योंकि हमारे देश का राजनीतिक माहौल ही कुछ इस तरह का है. यदि फिल्मकार अपनी फिल्म को सत्यपरक बनाने के लिए फिल्म में किसी नेता का नाम ले ले, तो राजनेता उसकी चमड़ी ही नहीं मांस तक उधेड़ने में कसर बाकी नहीं रखेंगे. यही समस्या फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’ के साथ भी है. वैसे मधुर भंडारकर उस वक्त इस फिल्म को बना पाए हैं, जब ‘कांग्रेस’ विरोधी सरकार है. फिर भी इस फिल्म को कांग्रेस का कोपभाजन बनना पड़ा.

फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’ की कहानी इंदू नामक महिला के नजरिए से चलती है. इंदू (कीर्ति कुल्हारी) एक अनाथ लड़की है. वह कवितांए लिखती है, मगर हकलाती भी है. उसकी जिंदगी में एक पुरुष नवीन सरकार (तांता राय चौधरी) आता है, जिसकी महत्वाकांक्षा एक बहुत बड़ा ब्यूरोक्रेट्स बनना है. वह एक चाटुकार है. नवीन सरकार के साथ शादी कर वह इंदू सरकार बन जाती है. 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लग जाता है. फिर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, तुर्कमानगेट कांड, नसबंदी जैसे कई घटनाक्रम घटित होते हैं. नवीन सरकार नेताओं की हां में हां मिलाना शुरू करते हैं. मगर इंदू सरकार नैतिकता व एक स्वस्थ विचारधारा के साथ अपनी अलग राह चुनती है. परिणामतः उसकी खूबसूरत जिंदगी बदल जाती है. वह भी नानाजी (अनुपम खेर) के साथ अंडरग्राउंड होकर आपातकाल के खिलाफ जंग का हिस्सा बनती है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः 21 माह बाद आपातकाल खत्म होता है.

यूं तो आपातकाल के 21 माह के दौरान घटित घटनाक्रमों पर कई किताबें उपलब्ध हैं, फिर भी वर्तमान पीढ़ी के लिए आपातकाल की भयावहता को समझने मे यह फिल्म अच्छा साधन बन सकती है. क्योंकिमधुर भंडारकर ने तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर आपातकाल थोपे जाने के बाद जिस तरह से आम लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया, से लेकर इंदिरा गांधी की उनके बेटे संजयगांधी रूपी कमजोरी व संजय गांधी के दुःखद व गलत निर्णयों, जबरन नसबंदी, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, पूरे देश में आतंक का माहौल जैसे घटनाक्रमों व भयावहता का अपनी फिल्म में बेहतरीन चित्रण किया है.

मधुर भंडारकर ने बड़ी चालाकी से कहानी का केंद्र इंदू सरकार (कीर्ति कुलहारी) नामक एक अनाथ व साधारण मगर बहुत ही ज्यादा साहसी व दिलेर महिला के इर्द गिर्द बुना है. हम जानते हैं कि इंदिरा गांधी को एक खास इंसान ‘इंदू’ नाम से बुलाता था. इसी तरह फिल्म में संजय गांधी का किरदार तो रखा है, मगर उसे ‘चीफ’ (नील नितिन मुकेश) नाम दिया है. इसी तरह से दूसरे वास्तविक किरदारों के नाम बदले गए हैं. यदि मधुर भंडारकर ने इन नामों को फिल्म में रखा होता और इंदू सरकार के इर्द गिर्द के किरदारों को सही रूपों में अहमियत के साथ पेश किया होता, तो आपातकाल की पृष्ठभूमि पर ‘इंदू सरकार’ ज्यादा बेहतर फिल्म हो सकती थी. कुल मिलाकर मधुर भंडारकर ‘फैशन’ या ‘पेज थ्री’ जैसा जादू रचने में असफल रहे हैं.‘इंदू सरकार’ बहुत ज्यादा गहरा प्रभाव छोड़ने मे असफल रहती है.

फिल्म की कहानी व पटकथा कुछ कमजोरियों के बावजूद  बेहतर है. इंटरवल के बाद फिल्म निर्देशक के हाथ से फिसलती हुई नजर आती है. लगता है कि इस कमी को पूरा करने के लिए जबरन कव्वाली ठूंसी गयी है. फिल्म कई जगह इतनी तेज भागती है कि कुछ संवाद उसमें खो जाते हैं. आपातकाल के समय छोटेशहरों व गांवों में घटित घटनाक्रम ज्यादा भयावह थे, जिनकी उपेक्षा की गयी है. फिल्मकार मधुर भंडारकर जिस तरह के कथा कथन के लिए जाने जाते हैं, उसका अभाव फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’ में नजर आता है.

फिल्म के एडीटर की अपनी कमियों के चलते भी फिल्म कमजोर हुई है. फिल्म के कैमरामैन कीयको नकहरा बधाई के पात्र हैं. फिल्म का गीत संगीत उत्तम है. इंदू सरकार के चुनौतीपूर्ण किरदार में कीर्ति कुल्हारी ने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. अपनी भावनाओं, जिंदगी की दुविधाओं के बीच के संघर्ष के दृश्यों में उनकी अभिनय क्षमता इस तरह से निखर कर आयी है कि यदि उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाए, तो गलत नहीं होगा. तांता राय चौधरी ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है.

दो घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘इंदू सरकार’’ का निर्माण भरत शाह और भंडारकर इंटरटेनमेंट द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है. फिल्म के निर्देशक मधुर भंडारकर, लेखक मधुर भंडारकर, पटकथा लेखक अनिल पांडेय व मधुर भंडाकर, संवाद संजय छैल, संगीतकार अनु मलिक, कैमरामैन कीयको नकहरा तथा कलाकार हैं-कीर्ति कुल्हारी, नील नितिन मुकेश, सुप्रिया विनोद, तांता राय चौधरी, अनुपम खेर आदि.

चेहरे पर मुसकान बिखेर देगी ‘मुबारकां’

सिनेमा का मकसद दर्शक के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना और उसे मनोरंजन प्रदान करना होता है. इस मकसद को पूरी करने में फिल्म ‘‘मुबारकां’’ सक्षम है, जो कि फिल्मकार अनीस बजमी की अपनी खास शैली की पारिवारिक फिल्म है.

पारिवारिक रोमांटिक कामेडी फिल्म ‘‘मुबारकां’’ की कहानी करण व चरण के इर्द गिर्द घूमती है. जुड़वा भाई करण व चरण के माता पिता की बचपन में ही लंदन में ही एक कार दुर्घटना में मौत हो गयी थी. तब लंदन में ही रह रहे इनके चाचा करतार सिंह (अनिल कपूर) ने करण को लंदन में रह रही अपनी बहन (रत्ना पाठक) को तथा चरण को पंजाब में रह रहे अपने भाई बलदेव सिंह (पवन मल्होत्रा) को दे दिया था. जिसके चलते जुड़वा भाई होते हुए भी करण व चरण ममेरे व फुफुरे भाई बन गए तथा करतार सिंह करण के मामा और चरण के चाचा बन गए.

लंदन में पले बढ़े करण (अर्जुन कपूर) को स्वीटी (ईलियाना डिक्रूजा) से प्यार है. दोनों की मुलाकातें लंदन में ही हुई थी. पढ़ाई पूरी कर स्वीटी वापस पंजाब भारत लौट आती है, तो उसके पीछे पीछे करण भी अपने मामा बलदेव व भाई चरण के साथ रहने चंडीगढ़, पंजाब आ जाता है. एक दिन करण की मां का संदेष आता है कि उन्होंने करण की शादी लंदन में ही सिंधू की बेटी बिंकल (आथिया शेट्टी) से करने का फैसला किया है. इसलिए करण बिंकल को देखने के लिए आ जाए. मगर करण अभी शादी करने से मना कर देता है और चरण को चरण के पिता के साथ लंदन भेज देता है.

इधर चरण को चंडीगढ़ में ही वकालत कर रही एक मुस्लिम लड़की नफीसा कुरेशी (नेहा शर्मा) से प्यार है. वह लंदन पहुंचकर अपने करतार चाचा से सच बयां कर मदद मांगता है. करतार कहता है कि वह सिंधू के सामने उसे ड्रग्स लेने वाला साबित कर देंगे, तो सिंधू खुद ही अपनी बेटी बिंकल की शादी उससे नही करेंगे. मगर बिंकल से मिलते ही चरण पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठता है. जब तक चरण यह बात अपने चचा करतार को बताता तब तक तो करतार की वजह से सिंधू का बेटा परमीत उसे ड्रग्स लेने वाला मान लेता है. उसके बाद सिंधू, बलदेव को अपशब्द कहता है. बलदेव, सिंधू को अपशब्द कहता है और फिर भाई बहन के बीच भी झगड़े हो जाते हैं.

बलदेव कसम खाता है कि वह एक माह के अंदर पच्चीस तारीख तक अपने बेटे चरण की शादी बिंकल से भी अच्छी लड़की से करके दिखा देंगे और चंडीगढ़ वापस लौट आते हैं. एक दिन गुरुद्वारे में बलदेव की मुलाकात स्वीटी व उसके पिता से होती है. दोनों के बीच बातचीत होती है. दूसरे दिन बलदेव, चरण व करण के साथ स्वीटी के घर पहुंच जाता है. स्वीटी को लगता है कि करण के मामा करण का रिश्ता लेकर आए हैं. इसलिए वह वह तुरंत हां कर देती है. अब बलदेव उसी वक्त चरण व स्वीटी की शादी की तारीख 25 को तय कर देते हैं. इससे स्वीटी व करण दोनों परेशान होते हैं.

जब चरण को पता चलता है कि स्वीटी से करण प्यार करता है, तो वह भी परेशान हो जाता है. उधर करण की मम्मी, सिंधू को खुश करने के लिए बिंकल की शादी करण से 25 को ही करने का निर्णय ले लेती है. अब करण व चरण दोनों करतार सिंह से मदद मांगते हैं. तब करतार सिंह सबसे पहले बलदेव को डेस्टीनेशन वेडिंग के लिए तैयार कर चरण की लंदन में शादी करने के लिए राजी करता है. अब सब लंदन पहुंच जाते हैं. फिर शुरू होता है हास्य घटनाक्रमों का सिलसिला. अंततः बलदेव व उनकी बहन के बीच पुनः रिश्ता जुड़ता है और करण की स्वीटी से, चरण की बिंकल से तथा नफीसा की परमीत से शादी होती है.

‘‘प्यार तो होना ही था’’, ‘‘नो एंट्री’’, ‘‘वेलकम’’, ‘‘सिंह इज किंग’’ जैसी फिल्मों के निर्देशक अनीस बजमी ने एक बार फिर फिल्म ‘‘मुबारकां’’ में अपने बेहतरीन निर्देशकीय कौशल का परिचय दिया है. फिल्म में पारिवारिक रिश्तों की अहमियत व रिश्तों को जोड़े रखने की बात बड़ी खूबसूरती से कही गयी है. इतना ही नहीं वर्तमान पीढ़ी जिस तरह से प्रेमी या प्रेमिका को कपड़ों की तरह बदलती रहती है, उस पर भी निर्देशक व लेखक ने कटाक्ष करते हुए सही सलाह भी दी है. मगर फिल्म कहीं भी बोर नहीं करती. फिल्म के संवाद काफी आकर्षक हैं. फिल्म की कहानी व पटकथा को बड़ी खूबसूरती से बुना गया है, मगर इंटरवल के बाद फिल्म कुछ ज्यादा ही लंबी हो गयी है. इंटरवल के बाद के हिस्से को एडीटिंग टेबल पर कसा जाना चाहिए था. फिल्म का क्लायमेक्स और बेहतर हो सकता था.

अनीस बजमी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने एक साफ सुथरी ऐसी पारिवारिक फिल्म बनायी है, जिसे पूरा परिवार निःसंकोच एक साथ बैठकर देख सकता है. अन्यथा अमूमन फिल्मकार अपनी हास्य फिल्म में द्विअर्थी संवाद भरकर दर्शक को हंसाने का असफल प्रयास करते हैं.

फिल्म के कैमरामैन हिमान धमीजा भी बधाई के पात्र हैं. लोकेशन बहुत बेहतरीन चुनी गयी हैं. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षक है. मगर फिल्म में जरुरत से ज्यादा गाने रखे गए हैं. गानों की वजह से कई जगह फिल्म कमजोर भी होती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो पवन मल्होत्रा और अनिल कपूर ने बेहतरीन परफार्मेस दी है. कई दृश्यों में पवन मल्होत्रा ने तो अनिल कपूर व दूसरे कलाकारों को भी मात दिया है. दोहरी भूमिका निभाते हुए अर्जुन कपूर ने साबित कर दिया कि एक अच्छी पटकथा, दमदार किरदार और अच्छा निर्देशक हो तो, वह अपने अभिनय का मुरीद हर किसी को बना सकते हैं. दोहरी भूमिका में दोनों किरदारों के बीच दूरी बनाए रखना कलाकार के लिए मुश्किल होता है. मगर एक ही चेहरा होने के बावजूद करण व चरण दोनों काफी अलग उभरकर आते हैं. इसे अर्जुन कपूर के अभिनय की खूबी ही कही जाएगी. कई दृश्यों में वह स्वाभाविक लगे हैं.

ईलियाना डिक्रूजा ने साबित किया कि उनके अंदर काफी काफी संभावनाएं हैं. अपनी पहली फिल्म ‘हीरो’ के मुकाबले इस फिल्म में आथिया शेट्टी ने अच्छा अभिनय किया है. यह एक अलग बात है कि उनका किरदार लंबा नहीं है. मगर इस फिल्म से आथिया शेट्टी ने यह दिखाया कि यदि निर्देशक चाहे तो उनसे बेहतरीन अभिनय करवा सकता है. रत्ना पाठक शाह, नेहा शर्मा, राहुल देव, करण कुंद्रा आदि ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है.

दो घंटे 36 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मुबारकां’’ का निर्माण   अश्विन वर्दे, मुराद खेतानी, सुविदेश शिंगड़े, निर्देशक अनीस बजमी, लेखक राजेश चावला, कहानीकार बलविंदर सिंह जंजुआ व रूपिंदर चहल, पटकथा लेखक बलविंदर सिंह जंजुआ व गुरमीत सिंह, संगीतकार रिषी रिच, अमाल मलिक व गौरव रोशिन, कैमरामैन हिमान धमीजा तथा कलाकार हैं-अनिल कपूर, अर्जुन कपूर, ईलियाना डिक्रूजा, आथिया शेट्टी, राहुल देव, पवन मल्होत्रा, रत्ना पाठक व नेहा शर्मा.

तांत्रिक को न्योते का खतरनाक नतीजा

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के नौशाद नामक शख्स के गेहूं के खेत में 11 अप्रैल, 2016 की सुबह लोगों ने एक नौजवान की लाश देख कर पुलिस को सूचना दी. तकरीबन 30 साला नौजवान खून से लथपथ था. उस की हत्या किसी धारदार हथियार से गरदन काट कर की गई थी. उस की पैंट भी नदारद थी. पुलिस नौजवान की शिनाख्त कराने में नाकाम रही. मामला दर्ज कर के पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी. कई दिनों तक कोई नतीजा नहीं निकला.

इधर 16 अप्रैल, 2016 को दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके के कुछ लोग थाना कोतवाली पहुंचे. उन लोगों के मुताबिक, उन के परिवार का एक नौजवान ब्रजेश यादव लापता था. उन्हें पता चला कि उन के यहां कोई लाश मिली है.

पुलिस ने फोटो और बरामद सामान दिखाया, तो मृतक की पहचान ब्रजेश के रूप में हो गई.

पुलिस को ताज्जुब यह था कि वे लोग दिल्ली से बागपत किस सूचना पर पहुंचे थे. ब्रजेश के परिवार वालों ने अपने साथ आए नौजवान की ओर इशारा कर के बताया कि वह तांत्रिक है और उस के सिर पर आए जिन्न ने ही बताया था कि लापता ब्रजेश बागपत में यमुना किनारे मरा मिला है.

पुलिस को उस तथाकथित तांत्रिक की हरकतें कुछ ठीक नहीं लगीं, तो उसे हिरासत में ले लिया गया. उस तांत्रिक से सख्ती से पूछताछ हुई, तो मामला खुला.

यों उलझे जाल में

दरअसल, गिरफ्तार तांत्रिक इलियास बागपत इलाके का ही रहने वाला था. आवारागर्दी और ठगबाज लोगों की संगत ने उसे पाखंडी बना दिया. उस ने दाढ़ी बढ़ाई और सफेद कपड़े पहन कर तंत्रमंत्र के ढोंग कर लोगों को ठगना शुरू कर दिया. उस ने अपने कई आवारा दोस्त भी अपने साथ मिला लिए, जो उस के चमत्कार के किस्से लोगों को मिर्चमसाला लगा कर सुनाते थे.

समाज में पाखंडियों पर भरोसा करने वाले लोगों की कमी नहीं होती. आज भी लोग तांत्रिकों की तमाम बुरी करतूतों के बाद अपनी तकलीफों का इलाज झाड़फूंक, तंत्रमंत्र में खोजते हैं. ऐसे ही लोगों के पैसे पर वह भी मौज करने लगा.

जहांगीरपुरी के रहने वाले राजू यादव की पत्नी लीला देवी की तबीयत खराब रहती थी. पहले उस का डाक्टर से इलाज कराया. जब उसे कोई फायदा नहीं हुआ, तो उन्होंने मुल्लामौलवियों में झाड़फूक के सहारे इलाज की खोज शुरू कीं. वे इलियास से मिले, तो उस ने खुद को पहुंचा हुआ तांत्रिक बताया और तंत्र विद्या के बल पर इलाज करने को तैयार हो गया.

यादव परिवार उसे आसान शिकार लगा. अपने सिर पर वह जिन्न आने की बात करता और इलाज करने का ढोंग करता. चमत्कार की आस में पूरा परिवार उस के झांसे में आ गया.

इलियास अकसर उस के घर पहुंच जाता. इस दौरान उस की खूब इज्जत होती और मुंहमांगी रकम भी मिलती. जिन्न को खुश करने के नाम पर वह शराब और कबाब की दावत भी उड़ाता.

यादव परिवार उसे न्योता दे कर सोच रहा था कि वह उन्हें सारे दुखों से नजात दिला देगा. पाखंड के दम पर तांत्रिक मौज करता रहा. महीनों इलाज का फायदा नहीं दिखा, तो उस ने बहका दिया कि बुरी आत्माओं का साया पूरे परिवार पर है. उन्होंने लीला देवी को जकड़ लिया है. वे आत्माएं धीरेधीरे ही उस की तंत्र क्रियाओं से जाएंगी.

एक दिन लीला देवी का बेटा ब्रजेश अचानक गायब हुआ, तो परिवार के लोगों ने उस की खोजबीन शुरू की. दिल्ली में कई जगह वह उसे ढूंढ़ते रहे. कोई समझ नहीं पा रहा था कि वह कहां चला गया था.

इस खोजबीन में इलियास भी उन के साथ रहता. जब सभी थक गए, तो इलियास ने तंत्र विद्या के बल पर ब्रजेश का पता लगाने की बात की और तंत्र क्रिया के नाम पर रुपए ऐंठ लिए. इस के बाद उस ने बताया कि उस के सिर पर आए जिन्न ने बताया है कि बागपत में यमुना किनारे ब्रजेश को मार दिया गया है.

सब लोगों के साथ वह भी थाने पहुंचा, तो उस की बात एकदम सच निकली, लेकिन वह पुलिस के जाल में खुद ही उलझ गया.

इसलिए की हत्या

दरअसल, यादव परिवार तांत्रिक  इलियास का पूरी तरह मुरीद हो गया था. उन के पैसे पर वह मौज कर रहा था. तंत्र क्रियाओं के नाम पर शराब के साथ दावतें लेता था. परिवार की एक लड़की को भी उस ने अपने प्रेमजाल में फांस लिया और डोरे डालने शुरू कर दिए. ब्रजेश को उस की हरकतें पसंद नहीं आईं. उसे यह भी लगने लगा कि तंत्र क्रिया की आड़ में इलियास उन लोगों को लूट रहा है.

इलियास को यह बात अखर गई. यादव परिवार उस के लिए सोने के अंडे देने वाली मुरगी बन गया था. उन की जायदाद पर उस की नजर थी. सभी का विश्वास उस ने अपने पाखंड से जीत लिया था. अपने पाखंड के पैर जमाए रखने के लिए उस ने ब्रजेश को ही रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

एक दिन उस ने ब्रजेश को बताया कि उसे अपनी तंत्र क्रियाओं से पता चला है कि बागपत में गंगा किनारे खजाना दबा हुआ है, लेकिन उसे वह खुद नहीं निकाल सकता. उस ने ब्रजेश को समझाया कि उसे वह निकाल ले, बाद में दोनों आधाआधा बांट लेंगे. ऐसे में उस से जिन्न भी नाराज नहीं होंगे.

ब्रजेश को उस ने यह भी समझाया कि वह यह बात किसी को न बताए, वरना खजाना गायब हो जाएगा और उस के हाथ कुछ भी नहीं आएगा. ब्रजेश उस के झांसे में आ गया.

10 अप्रैल की शाम को वह इलियास के साथ बागपत पहुंच गया. अंधेरा होने पर इलियास उसे खेत में ले गया. ब्रजेश को जान का खतरा महसूस हुआ, तो वहां दोनों के बीच लड़ाई हो गई, लेकिन इलियास ने गंड़ासे से उस की गरदन काट कर हत्या कर दी.

ब्रजेश की पहचान जल्द न हो, इसलिए उस ने उस की पैंट उतार कर छिपा दी. इस दौरान इलियास के माथे पर भी चोट आई. बाद में वह ब्रजेश के परिवार में पहुंचा. वह भी ब्रजेश की खोजबीन कराता रहा. उस पर शक न

हो, इसलिए उस ने जिन्न वाली मनगढ़ंत कहानी बताई.

पाखंडी की पोल खुलने से यादव परिवार के पास पछताने के सिवा कुछ नहीं बचा था. तांत्रिक को न्योता दे कर उस ने धनदौलत और बेटा गंवा दिया था. पाखंडी तांत्रिक अब सलाखों के पीछे है, लेकिन अपनी करतूत का उसे कोई अफसोस नहीं है.

तांत्रिक के कहने पर बनाया चोर

एक नौजवान को तांत्रिक के कहने पर पूरे गांव ने चोर मान लिया. मामला बदायूं के लभारी गांव में सामने आया. दरअसल, हरीकश्यप नामक शख्स के घर से 15 अप्रैल, 2016 को कुछ गहने चोरी हो गए थे. हरी अपने एक तांत्रिक गुरु की शरण में पहुंच गया.

तांत्रिक ने पहले पूरी बात सुनी और उस का शक जान कर एक परची पर ‘द’ शब्द से शुरू होने वाला नाम लिख कर उसे थमा दिया. हरी का शक एक झोंपड़ी में रहने वाले दिनेश पर चला गया. अगले दिन गांव में तांत्रिक की मौजूदगी में पंचायत हो गई.

तांत्रिक का कहा लोगों के लिए पत्थर की लकीर हो गया. तांत्रिक ने उस पर जुर्माना थोपने के साथ ही अपनी 5 हजार फीस और आनेजाने का खर्चा भी मांग लिया. दिनेश ने जुर्माना भरने से मना किया, तो उसे गांव से निकल जाने का फरमान सुनाया गया. दिनेश पुलिस की शरण में पहुंच गया.

मौडल की तरह हौट और खूबसूरत है सेना की ये जवान

इन दिनों सोशल मीडिया पर सेना की एक महिला जवान की तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं. इजरायली आर्मी की इस लेडी सोल्जर की हॉट और बोल्ड तस्वीरों को लोग खूब पसंद कर रहे हैं. किम मेलीबोक्सी नाम की इस सोल्जर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं. अपनी खूबसूरती और बोल्ड अंदाज की वजह से ये इंटरनेट पर छा गई है.

बेहद हॉट हैं ये इजरायली सोल्जर

इजरायल की यह सोल्जर बेहद बोल्ड है. उन्होंने बिकिनी में अपनी हॉट तस्वीरों को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट किया है, जिसे देखकर लोग उनकी सुंदरता और बोल्डनेस की तारीफ कर रहे हैं. किम मेलीबोक्सी ने सेना के यूनिफॉर्म में भी अपनी तस्वीरें पोस्ट की हैं.

 

बोल्ड तस्वीरों ने लोगों को बनाया दीवाना

किम मेलीबोक्सी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर ऐसी-ऐसी तस्वीरें अपलोड की लोग उनके दीवाने हो गए. इंस्टाग्राम पर उनके 20000 फोलोअर्स थे, जिसके बाद हर दिन उनके फॉलोअर्स की तादात बढ़ती जा रही है. लोग उनकी तस्वीरों को खूब कमेंट करते हैं.

आर्मी ज्वाइन करना अनिवार्य

इजरायली कानून के मुताबिक 18 से 26 साल की लड़कियों को दो से तीन साल तक, अनिवार्य रूप से आर्मी ज्वाइन करनी ही होती है. किम ने भी इसी कानून के तहत 18 साल की उम्र में सेना ज्वाइन कर ली थी. हलांकि उन्हें हमेशा से मॉडलिंग से बेहद प्यार है.

सेना में अपनी सेवाएं देना चाहता है लगभग हर इजरायली

इजरायल के नागरिक सेना में शामिल होना चाहते हैं. यहां कि ज्यादातर युवा लड़कियां भी सेना में शामिल होकर खुद को खुशनसीब समझती हैं. इजरायली सेना में पुरुष सैनिक 18 साल के होने के बाद 2 साल 8 महीने काम कर सकते हैं. वहीं सेना में यहां की महिलाओं को 2 साल ही काम करना होता है.

पुरुषों के बराबर महिला सैनिक

अगर खबरों पर विश्वास किया जाए तो इजरायल की सेना में सैनिकों की संख्या 31 लाख के करीब है, जिसमें पुरुषों की संख्या लगभग 1,554,186, जबकि महिला सैनिकों की संख्या 1,514,063 है. इजरायल एकमात्र ऐसा देश है, जहां सेना में पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर है.

राग देश : दर्शकों को बांधने में नाकामयाब

इतिहास के किसी भी पन्ने को सेल्यूलाइड के परदे पर जीवंत करना एक फिल्मकार के लिए सबसे बड़ी चुनाती होती है. पर फिल्म ‘‘राग देश’’ के लेखक व निर्देशक तिग्मांशु धुलिया यहां पर बुरी तरह से असफल रहे हैं. ‘‘राग देश’’ देखने के बाद इस बात का एहसास ही नहीं होता कि यह फिल्मकार ‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्म बना चुका है.

यह एक काल खंड की फिल्म है, जिसकी कहानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेना ‘‘इंडियन  नेशनल आर्मी’’ के तीन जवानों के इर्द गिर्द घूमती है. इन्हें ब्रिटिश सरकार ने 1945 में लाल किले में मुकदमा चलाकर हत्या का अपराधी घोषित किया था. इन सैनिकों ने बर्मा की सीमा पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध लड़ा था.

मेजर जनरल शाह नवाज खान (कुणाल कपूर), लेफ्टीनेंट कर्नल गुरबख्श ढिल्लों (अमित साध) और कर्नल प्रेम सहगल (मोहित मारवाह) 1942 में सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ यानी कि नेशनल इंडियन आर्मी की अगुवाई कर रहे थें. इनका मकसद ब्रिटिश सेना से लड़कर हिंदुस्तान को आजाद कराना था. दुर्भाग्यवश एक प्लेन दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस का निधन हो गया. तब इन तीन जवानों ने दूसरे सैनिकों से अपना साथ देने के लिए कहा. कुछ विरोध करने लगे, तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया. ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने इन्हें बंधक बनाकर इन पर मुकदमा चलाया. मशहूर जज भूलाभाई देसाई (केनी देसाई) ने इनका मुकदमा लड़ा. पर यह अपराधी माने गएं. लेकिन हिंसात्मक दंगे न बढ़े, इसलिए इन्हें छोड़ दिया गया.

तिग्मांशु धुलिया निर्देशित इतिहास के खास काल खंड पर बनी यह फिल्म रोमांचित नहीं करती है. यह फिल्म दर्शकों को बांधकर नहीं रख पाती है. इंटरवल तक तो दर्शक किसी तरह सब्र रख पाता है, मगर इंटरवल के बाद दर्शक सोचने लगता है कि यह फिल्म कब खत्म होगी. यहां तक की इंटरवल के बाद का कोर्ट रूम ड्रामा भी बहुत सतही स्तर का है. फिल्म का कथा कथन बहुत कमजोर है और यह फिल्म फीचर फिल्म की बनिस्पत एक डॉक्यूमेंटरी मात्र बनकर रह गयी है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर भी यह फिल्म ठीक से बात नहीं करती है. एक ऐतिहासिक घटनाक्रम का घटिया प्रस्तुतिकरण है. पटकथा में कसाव के अलावा काफी मेहनत की जरुरत नजर आती है.

फिल्म का गीत संगीत काफी कमजोर है. फिल्म के तीनों मुख्य कलाकारों कुणाल कपूर, अमित साध व मोहित मारवाह ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है. मगर इस फिल्म में कुणाल कपूर की परफार्मेंस बहुत ही साधरण रही. फिल्म के लिए शोध कार्य करने वाली टीम ने फिल्म के कास्ट्यूम वगैरह पर अच्छा काम किया है. फिल्म के एडीटर ने भी फिल्म को बिगाड़ने में अपनी भूमिका निभायी है.

लाल किले का सेट बहुत ही ज्यादा बनावटी नजर आता है. दो घंटे सत्रह मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘राग देश’’ का निर्माण गुरदीप सिंह सपल द्वारा किया गया है. ‘राग देश’ के निर्देशक व पटकथा लेखक तिग्मांशु धुलिया, कैमरामैन रिषि पंजाबी, संगीतकार राणा मजुमदार, सिद्धार्थ पंडित, रेवंट, धर्मा विश हैं तथा कलाकार हैं कुणाल कपूर, अमित साध, मोहित मारवाह, केनी देसाई, केनी बासुमतारी, कंवलजीत सिंह, मृदुला मुराली, जाकिर हुसैन, राजेश खेरा, अली शाह व अन्य.

आरक्षण : जाति की खाई बहुत गहरी है

है क्या वजह कि जीओ और जीने दो

का उसूल हमें आज भी नहीं भाता,

यह खोट है नजर का कि दूसरों का सुखचैन हम से देखा नहीं जाता.

इनसानी कमजोरी पर ये लाइनें बड़ी मौजूं लगती हैं. जाति के आधार पर इनसान का इनसान में फर्क करना, बेवजह की दूरी और ऊंचनीच के फासले बनाना एक सामाजिक बुराई है. तालीम व तरक्की बढ़ने के बावजूद पल रही ऐसी बुराइयों की वजह जातिवाद, पिछड़ी सोच व धार्मिक कट्टरता है. बगलाभगत सब से एकजैसा सा बरताव करने, दीनदुखियों की मदद करने व उन्हें गले लगाने की महज बातें करते हैं. उन की कथनी और करनी एक नहीं होती है. हालांकि भेदभाव की बुनियाद पर टिकी इमारतें बेहद पुरानी व खंडहर हो चुकी हैं, लेकिन उन का वजूद बरकरार है, जो आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. यही वजह है कि आरक्षण से पिछड़ों, दलितों को सरकारी दफ्तरों में नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन असलियत में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता. अकसर उन्हें ताने सुनने को मिलते हैं. उन का मजाक उड़ाया जाता है.

बड़ों की सोच छोटी

एक सरकारी महकमे से रिटायर हुई सुधा रानी की जिंदगी जद्दोजेहद भरी रही. तकरीबन 40 साल पहले बमुश्किल पढ़लिख कर उन्हें स्टैनो की नौकरी मिली, लेकिन पूरे सेवाकाल में उन्हें एक टीस बराबर बनी रही.

सुधा रानी ने बताया, ‘‘ऊंची जाति के सहकर्मी लंच के वक्त या किसी की फेयरवैल पार्टी वगैरह में घुमाफिरा कर अकसर यह एहसास कराते थे कि मैं उन से अलग हूं, नीची जाति की हूं, इसलिए उन की बराबरी न करूं.’’

एक दलित अफसर का कहना है, ‘‘जैसे हाथी के दांत खाने के और व दिखाने के और होते हैं, वैसे ही सरकारी दफ्तरों में भी बहुत से अगड़े अफसर व मुलाजिम आज भी बेहद पिछड़ी सोच के शिकार हैं. उन्होंने अपने अलग गुट बना रखे हैं. हमारे साथ बैठने व खाने तक से परहेज करते हैं. वे बातबात पर नाकभौं सिकोड़ते हैं.

‘‘ऊंची जाति वाले अकसर अपनी जाति वालों की तरफदारी करते हैं.

हमें गैर समझते हैं, इसलिए अपनों की पैरोकारी में तबादले व तैनाती के फरमान जारी होते हैं. इस भेदभाव के चलते हमें बहुत सी चीजों से अलग रखा जाता है.’’

मुट्ठी से फिसलती रेत

यह बात सच है कि ऊंची जाति में पैदा होने, ज्यादा पैसा या पावर पा लेने या फिर उम्र में बड़ा हो जाने से ही कोई इनसान बड़ा नहीं हो जाता. उस के काम, उस की मेहनत व सूझबूझ से हासिल मुकाम ही उस को बड़ा बनाते हैं. समझदार लोग इसे मानते भी हैं, लेकिन इस के बावजूद हमारे समाज का एक कड़वा सच इस के बिलकुल उलट है.

संतमहंत उपदेशों व कथाप्रवचनों में भी दूसरों को बराबरी की सीख देते हैं, लेकिन बात ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली तर्ज पर आ कर ठहर जाती है. इसलिए जब उस पर अमल होने की बारी आती है, तो अगड़े खुद को ऊंचा और दूसरों को नीचा साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते. इस गरज से वे कमजोरों की टांगखिंचाई करने से भी बाज नहीं आते.

सदियों से हमारे समाज में धनदौलत, ओहदा, रुतबा वगैरह पर कब्जा अगड़ी जातियों का ही रहा है. यह सिलसिला आज भी बरकरार है, इसलिए महज मुट्ठीभर लोग ही सारी आन, बान और शान को अपनी जागीर समझते हैं. जायजनाजायज हुक्म दे कर दूसरों से काम कराने को वे अपना हक मानते हैं.

सब जानते हैं कि भारतीय संविधान में देश के हर नागरिक को बराबरी का हक है. इस के बावजूद सरकारी दफ्तरों में आरक्षण की वजह से नौकरी व तरक्की पाने वाले लोग भी अगड़ों की आंखों में किरकिरी बने रहते हैं.

यह कितने अफसोस की बात है कि अच्छेखासे खातेपीते व अमीर जाति वाले लोग भी अब अपने लिए आरक्षण की मांग करने लगे हैं.

कड़वा तजरबा

देखा गया है कि सरकारी नौकरी में दलितों और पिछड़ों को आरक्षण की सहूलियत मिलने की बात ज्यादातर अगड़ों के गले आसानी से नहीं उतरती. दरअसल, जब उन्हें अपने आसपास दूसरी छोटी जाति वाले बढ़ते दिखते

हैं, तो वे बेवजह ही उन की बातों पर लालपीले होने लगते हैं. कभी क्रीमीलेयर का मुद्दा उठाते हैं, तो कभी प्रमोशन में आरक्षण को गलत बताते हैं. इतना ही नहीं, मौका पाते ही वे अपने मातहतों को डरानेधमकाने व सताने से भी बाज नहीं आते.

फर्क इतना है कि पहले बाहुबल से डराधमका कर बंधुआ बना लिया जाता था, मारपीट कर सताया व बेइज्जत किया जाता था, जबरन जमीनें व बहूबेटियां छीन ली जाती थीं, लेकिन अब पढ़ेलिखे अगड़े नए तरीके से दिमागी तौर पर सताने लगे हैं. उन के बरताव में कदमकदम पर बेजा गुस्सा, घमंड व रोब टपकता है.

यह बात अलग है कि सरकारी नियमकानून के डर से अगड़े आरक्षण का फायदा लेने वालों को सीधे व खुल कर विरोध नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी दिमागी तौर पर सताने के लिए कोशिशें जरूर की जाती हैं.

मसलन बेबुनियाद आरोप लगाने, जांच में फंसाने व कार्यवाही करने में अगड़े अकसर गुस्सा निकालते हैं, झूठी शिकायतें कर के उन्हें बेवजह परेशान करते हैं.

मेरठ, उत्तर प्रदेश के गन्ना महकमे में मंडलीय लैवल के एक दलित अफसर को उन के नाम के हिज्जे बिगाड़ कर उन के संगीसाथी पहले तो खूब मजाक बनाते थे, फिर जब उन का चयन आईएएस में हो गया, तो रोड़ा अटकाने के लिए उन की झूठी शिकायत कर दी कि उन्होंने लखनऊ मीटिंग विभागीय सफर में सैकंड क्लास का टिकट ले कर फर्स्ट क्लास का टीए लिया था.

इस की जांच हुई व दलित अफसर बेगुनाह पाए गए. वे तो अपनी काबिलीयत से डीएम व कमिश्नर बन गए और उन से जलने वाले सारे अगड़े वहीं कदमताल करते रह गए, लेकिन ऐसी खुराफातों से अलगाव, टकराव व तनाव बढ़ता है.

ऐसे बदलाव होगा ही नहीं

यह सच है कि सरकारी महकमों, सार्वजनिक निगमों व सहकारी संगठनों में तयशुदा आरक्षण मिलता?है, लेकिन आरक्षण पाने वालों की गिनती कम ही रहती है.

आमतौर पर अगड़ों को ही अव्वल समझा जाता है. यह बात गलत है. सिर्फ इम्तिहान में हासिल नंबरों को सुबूत मान कर कामयाबी की दलीलें दी जाती हैं. बिना परखे ही अगड़ों के हुनर का गुणगान किया जाता है.

आरक्षण के चलते नौकरी पाने वालों को कमतर आंका जाता है. इतना ही नहीं, उन्हें नकारा समझा जाता है. साथ ही, मौका लगते ही उन्हें खूब खरीखोटी सुनाई जाती है.

कहींकहीं तो आज भी शादीब्याह में, कुओं पर, मंदिरों में उन के साथ खराब बरताव किया जाता है. सोशल मीडिया पर भी कई तरह की बेसिरपैर की भड़ास देखीपढ़ी जा सकती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में भी गैरबराबरी का चलन

होना बहुत बुरा है. इस माहौल के जल्द सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि  हर जाति में जातिवाद गहरे तक समाया हुआ है.

पुरानी है बीमारी

गैरबराबरी से जुड़े इस मसले के कई पहलू हैं. दरअसल, गरीबगुरबे, दलित, पिछड़े सदियों से अगड़ों की जबरदस्ती की मार के शिकार रहे हैं. ताकत, जागरूकता, तालीम की कमी, गरीबी व जातिवाद, छुआछूत और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं.

गंवई इलाकों में रहने वाले ही नहीं, बल्कि शहरी भी भेदभाव करने के हिमायती हैं, इसलिए तरक्की के बावजूद हमारे समाज में पसरी सामंती सोच की वजह से दफ्तरों में आज भी कमजोरों के साथ भेदभाव होता है.

बहुमत में मौजूद सरकारों ने पिछड़ों व निचलों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ों को आरक्षण की सहूलियत दी, इस से डूबते को तिनके का सहारा मिला, लेकिन अगड़ोंदबंगों, निठल्लों व कब्जेदारों को यह रास नहीं आता, क्योंकि जरूरतमंदों को आरक्षण मिल जाने से उन्हें अपने हाथों से कठपुतलियां फिसलती नजर आती हैं.

कपड़ों के नीचे छिपे इस कोढ़ को हमेशा के लिए दूर किया जाए, समाज में ऐसा नया माहौल बनाया जाए, जिस में सभी अगड़े दलितों व पिछड़ों से चिढ़ना छोड़ें, उन्हें सिर्फ अपना खिदमतगार न समझें.

ऐसा करना कोई मुश्किल काम नहीं है. बस, जरूरत है नए दौर के पंडेपुजारियों के उन झूठे किस्सेकहानियों की पोल खोलने की, जिन की घुट्टी बचपन से पिलाई गई है.

दरअसल, ऐसी बातें सिर्फ हम सब को अलगथलग कर के खुद अपना घर भरने की गरज से की जाती हैं. अगड़े, नेता, पंडेपुजारी, कट्टरपंथी, धर्म और समाज के ठेकेदार अपने फायदे के लिए भेदभाव के बीज बो कर लोगों को भरमाते, भटकाते व भड़काते हैं.

अमीर मुल्क बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और हम सदियों पुराने पचड़ों में पड़े हैं. साथ ही, आरक्षण से नौकरी की सहूलियत पाने वालों को भी कोशिश करनी चाहिए कि वे नौकरी को अपनी मंजिल नहीं, सफर समझें. काम का तजरबा व हुनर सीख कर खुद अपना रोजगार करें, ताकि नौकरी करने के बजाय अपने यहां दूसरों को काम पर रखने वाले बन सकें. मेहनत, कोशिश व सूझबूझ से आगे बढ़ें और ऐसा करना मुश्किल नहीं है.

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