दिल्ली का जीबी रोड: नहीं आ रहे जिस्म के खरीदार

दिल्ली के अजमेरी गेट से ले कर लाहौरी गेट तक लगभग 1 किलोमीटर दूर तक फैले जीबी रोड यानी गास्ट्रिन बैस्टियन रोड की गिनती भारत के बड़े रैडलाइट एरिया में होती है. कभी मुगलों के समय यहां 5 रैडलाइट एरिया हुआ करता था लेकिन अंगरेजों ने अपने शासनकाल में इन सभी को मिला दिया और तभी से यह जीबी रोड के नाम से जाना जाने लगा. हालांकि 1965 में इस मार्ग का नाम बदल कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग जरूर कर दिया गया मगर आज भी यह जीबी रोड के नाम से ही मशहूर है.

मुजरों से गुलजार रातें

मुगलकाल में यहां रातें रंगीन हुआ करती थीं और नृत्य के बहाने मुजरा देखने और शारीरिक भूख शांत करने यहां सेठसाहुकार बङी संख्या में आते थे. घुंघरू की झनकार और तबले की थापों के बीच मदिरा यानी शराब का दौर भी चलता था. यहां आमतौर पर रईस लोग आते थे जिन्हें भोगविलास और नारी देह में डूबे रहना बेहद पसंद था. समय बदला तो इस बदलाव का असर यहां भी हुआ. अब यहां जिस्मानी सुख की तलाश में लोग आने लगे, फिर चाहे दिन हो या रात. अलबत्ता मुजरे का दौर आज भी यहां बदस्तूर जरूर चलता है पर 1-2 जगहों पर ही, लेकिन ज्यादातर वही ग्राहक आते हैं जिन्हें मुजरे से अधिक दिलचस्पी शारीरिक सुख लेना होता है.

लेकिन दिनरात चलने वाले इस धंधे में आजकल सन्नाटा पसरा है. विश्वव्यापी कोरोना वायरस महामारी के बाद देश में लागू लौकडाउन से यह पूरा इलाका आजकल वीरान है. जहां पहले यहां 3 हजार से अधिक सैक्स वर्कर थीं, वहीं फिलहाल 1 डेढ़ हजार ही बची हुई हैं.

ये भी पढ़ें- पटरियों पर बलात्कर

कोरोना ने थाम दी है जिस्म की खरीदारी

मार्च का महीना शुरू होते ही देश में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ना शुरू हुआ तो यहां के कोठों में आने वाले ग्राहकों की संख्या नहीं के बराबर हो गई. 23 मार्च से जनता कर्फ्यू और इस के बाद समाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश आए तो जिस्म के खरीदारों ने यहां आना पूरी तरह बंद कर दिया.

जीबी रोड स्थित एक कोठे में काम करने वाले एक दलाल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,”यहां आमतौर पर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड, असम और नेपाल आदि जगहों की सैक्स वर्कर हैं जिन के सामने इस समय भुखमरी की समस्या आ खङी हुई है.”

यहां कोठों के नीचे दुकानें भी हैं जो फिलहाल बंद हैं. कोठों की पहली और दूसरी मंजिल पर वेश्यालय चलते हैं. यही हाल अन्य कोठों की भी है.

बिस्कुट तक खरीदने को पैसे नहीं

यहां 32 साल की एक सैक्स वर्कर रीना (बदला नाम) ने बताया,”हमारे पास बिस्कुट तक खरीदने के पैसे नहीं हैं. बस जिंदा हैं तो कुछ एनजीओ और सरकारी राशन की वजह से. ये हमें कुछ न कुछ जरूरत की चीजें देते रहते हैं.”

उस दलाल ने बताया,”लौकडाउन से ज्यादा अब लोगों को कोरोना वायरस का डर है और फिलहाल तो कई महीनों तक यहां ग्राहक आने से रहे.”

ये भी पढ़ें- विदेशी शोलों में झुलसते भारतीय : भाग 1

आखिर क्या है मजबूरी

स्पीड यानी सोसाइटी फौर पार्टीसिपैट्री इंटीग्रैटेड डेवलपमैंट की वाइस प्रेसिडैंट, ललिता यहां की महिलाओं और बच्चों की उत्थान के लिए पिछले 30 सालों से काम कर रही हैं. संस्था का काम यहां रह रहीं सैक्स वर्करों और उन के बच्चों को संरक्षण देने का है.

ललिता कहती हैं,”इन सैक्स वर्करों की जिंदगी शुरू से ही खराब रही है. समाज द्वारा सताई गईं, प्रेम अथवा अवैध संबंधों में धोखा खाईं, जबरन अपहरण की गईं ही अधिकतर महिलाओं को यहां लाया जाता है तो वे फिर चाह कर भी यहां से निकल नहीं पातीं क्योंकि उन्हें पता है कि न तो परिवार और न ही समाज उन्हें फिर से स्वीकारेगा. मजबूरन वे इस दलदल में फंसती हैं तो फंसती चली जाती हैं.

“हम न सिर्फ यहां की सैक्स वर्करों, बल्कि उन के बच्चों को शिक्षा आदि के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि वे अपने पैरों पर खङे हो सकें.” ललिता बताती हैं,”सैक्स वर्करों को इस धंधे में धकेलने के लिए नशे की आदत भी डलवाई जाती है ताकि वे इस बुरी लत की इस कदर शिकार हो जाएं कि जहर बांटने वाले की बात मानना मजबूरी बन जाए.”

पूरा इलाका अब बंद

दिल्ली की कुलीन कौलगर्ल्स में से ज्यादातर जहां समाजिक दूरी जैसी परिस्थितियों में निजी औडियो या वीडियो चैट लाइनों के जरीए फोन सेवाओं पर उपलब्ध रह सकती हैं, वहीं जीबी रोड की सैक्स वर्कर आमतौर पर मानव तस्करी का शिकार होती हैं और दूरदराज के इलाकों से लाई जाती हैं. पहले कम उम्र की लङकियां भी मानव तस्करी द्वारा लाई जाती थीं पर कानून की सख्ती से अब यहां एडल्ट यानी बालिग सैक्स वर्कर ही रह रही हैं. अब भी इन्हें ग्राहकों की खोज रहती है पर लौकडाउन की वजह से पूरा इलाका ही बंद है.

दुखदायी है जीवन

स्पीड के ही एक पदाधिकारी अवधेश यादव बताते हैं,”कोरोना महामारी के बाद से इन का जीवन और भी दुखदायी हो गया है. इस का असर इन के बच्चों पर भी पङा है और इस समय जबकि सारे स्कूल बंद हैं इन्हें पास के अजमेरी गेट और लाहौरी गेट स्थित सरकारी स्कूलों में रखा गया है और वहीं भोजनपानी के साथ इन की पढ़ाई की भी व्यवस्था की गई है.”

यह पूछने पर कि इन के बच्चों को स्कूलों में दाखिला कैसे मिलती है? ललिता ने बताया,”लोकतंत्र में सब को समान अवसर मिलता है. शिक्षा मौलिक अधिकार है और किसी भी स्कूल में दाखिले के लिए जरूरी नहीं कि पिता का नाम बताया जाए. ये बच्चे अपनी माता के नाम से ही दाखिला लेते हैं और पढ़ाई करते हैं. शिक्षा इन के लिए इसलिए भी जरूरी है ताकि ये पढ़लिख कर अपने पैरों पर खङे हो सकें और फिर अपनी माता को इस दलदल से निकाल सकें. कई बच्चों ने ऐसा किया भी है.”

ये भी पढ़ें- मर्डर मिस्ट्री

पढ़ना चाहती हैं यहां की बेटियां

यहां सैक्स वर्करों की कुछ बेटियां भी उन के साथ रहती हैं, जो पढ़ना चाहती हैं, आगे बढ़ना चाहती हैं. वे चाहती हैं कि आम बच्चों की तरह वे भी आगे चल कर नौकरियां करें, डाक्टर, इंजीनियर बनें. इन की मांएं नहीं चाहतीं कि जिन अंधेरी गलियों में रह कर उन्होंने कष्ट झेले हैं, शरीर को पुरूष राक्षसों से नोचवाया है, अरमानों और सपनों को कुचलवाया है, उन की बेटियां इस दलदल में पङें. इसलिए बङी संख्या में सैक्स वर्करों की बेटियां अब स्कूल जाती हैं, पढ़ती हैं. मगर लौकडाउन के बाद स्कूल जब बंद हो गए तो कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं ने इन के रहने और पढ़ाने का जिम्मा उठाया है.

ललिता बताती हैं कि संस्थाओं से ले कर दिल्ली पुलिस भी इन की मदद करती है और जरूरी राशन का इंतजाम भी कर रही है.

ये भी हमारी तरह ही इंसान हैं

दिल्ली महिला आयोग की सदस्य प्रोमिला गुप्ता कहती हैं,”हमारी तरह इन को भी अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक है. इन को भी यह मौलिक अधिकार है कि इन के बच्चे समाज की मुख्यधारा में शामिल हों, शिक्षा और तमाम जरूरी चीजें इन्हें मिलें.

दिल्ली महिला आयोग ने समयसमय पर इन सैक्स वर्करों की पुनर्वास की भी पहल की है. जबरन धंधे में धकेली गईं महिलाओं को इस दलदल से निकाला भी गया है. आयोग ने समयसमय पर दिल्ली पुलिस के साथ मिल कर अभियान भी चलाया है ताकि इस नारकीय जिंदगी से मुक्त हो कर ये बेहतर जिंदगी जी सकें.”

मगर फिलहाल तो अभी लौकडाउन है और ऐसा लगता भी नहीं कि यहां रहने वाली सैक्स वर्करों की जिंदगी पटरी पर आए.

प्रोमिला गुप्ता कहती हैं कि सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयासों से आम जनता की तरह इन का भी ध्यान रखा जा रहा है. जरूरी चीजें व राशन पहुंचाए जा रहे हैं. हां, सैक्स वर्करों को इस गंद से निकालने की जिम्मेदारी एक चुनौती जरूर है.”

पर यह बीङा उठाए कौन? एक नारी को अपने देह पर पूरा अधिकार है. मगर कानून इस की इजाजत नहीं देता कि वह शरीर को व्यवसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करे.

एडवोकेट बसंत सिंह कहते हैं,”भारतीय दंडविधान 1860 से वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक 1956 तक सभी कानून वेश्यालयों को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं. इस कानून के अनुसार सैक्स वर्कर्स कानूनी तौर पर जनता में ग्राहकों की मांग नहीं कर सकती हैं.

“आईटीपीए 1986 वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए बनाया गया है.”
मगर यह विडंबना ही है कि सरकार इसे रोकने के लिए कानून का हवाला देती है पर देश में सैक्स वर्करों की बेहतर जिंदगी के लिए ठोस उपाय ढूंढ़ने में विफल रही है.

अब देशभर की सैक्स वर्कर्स की स्थिति नाजुक दौर में है तिस पर कोरोना वायरस की मार और फिर लौकडाउन. आम नागरिक की तरह लोकतंत्र में इन को मौलिक अधिकार मिले हैं पर उस पुरूषवादी समाज का क्या जो नारी देह को सिर्फ भोगना जानता है, नीच और तुच्छ समझता है, धर्म का भय दिखाता है? ऐसे में इन की दशा सुधरेगी इस में संदेह ही है.

ये भी पढ़ें- खाने को कुछ नहीं था तो कोबरा सांप को मार कर ही

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 : आप का दम बाकी बेदम

सियासत में जो सत्ता पर काबिज होता है, वही सिकंदर कहलाता है. इन चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इसे दोबारा सच साबित कर दिया. उन्हें दिल्ली की जनता ने अपना दिल ही नहीं दिया, बल्कि ‘झाड़ू’ को वोट भी भरभर कर दिए, 70 में से 62 सीटें.

किसी सत्तारूढ़ दल के लिए इस तरह से अपना तख्त बचाए रख पाना ढोलनगाड़े बजाने की इजाजत तो देता ही है, वह भी तब जब दिल्ली को किसी भी तरीके से जीतने के ख्वाब देखने वाली भारतीय जनता पार्टी के तमाम दिग्गज नेता यह साबित में करने लगे थे कि यह चुनाव राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोही सोच के बीच जंग है, यह चुनाव भारत और पाकिस्तान के हमदर्दों के बीच पहचान करने की लड़ाई है, यह चुनाव टुकड़ेटुकड़े गैंग को नेस्तनाबूद करने की आखिरी यलगार है.

ये भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ मे छापे: भूपेश की चाह और राह!

पर, दिल्ली की जनता ने पाकिस्तान की सरहदों को वहीं तक समेटे रखने में ही अपनी भलाई समझी और बिजली, पानी, सेहत और पढ़ाईलिखाई को तरजीह देते हुए 8 फरवरी, 2020 को आम आदमी पार्टी के चुनावी निशान ‘झाड़ू’ पर इतना प्यार लुटाया कि 11 फरवरी, 2020 को जब नतीजे आए, तो भाजपाई ‘कमल’ 8 पंखुडि़यों में सिमट कर मुरझा सा गया. कांग्रेस के ‘हाथ’ पर तो जो 0 पिछली बार चस्पां हुआ था, उस का रंग और भी गहरा हो गया.

केजरीवाल के माने

साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से तकरीबन 2 साल पहले जब देश की राजधानी के जंतरमंतर पर एक बूढ़े, लेकिन हिम्मती समाजसेवी अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल, 2011 को देश की तमाम सरकारों को भ्रष्टाचार के मुद्दे और लोकपाल की नियुक्ति पर घेरा था, तब अरविंद केजरीवाल और उन के कुछ जुझारू दोस्तों ने दिल्ली की तब की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार को पानी पीपी कर कोसा था और दिल्ली की जनता को सपना दिखाया था कि अगर उसी के बीच से कोई ईमानदार आम आदमी सत्ता पर अपनी पकड़ बनाता है तो यकीनन वह उन को बेहतर सरकार दे सकता है. तब दिल्ली के तकरीबन हर बाशिंदे को ‘मैं आम आदमी’ कहने में गर्व महसूस हुआ था.

अरविंद केजरीवाल का तीर निशाने पर लगा था. साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में उन की पार्टी को उम्मीद से बढ़ कर 28 सीटें मिली थीं. भाजपा 32 सीटें जीत कर सब से बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि कांग्रेस महज 7 सीटों पर सिमट कर रह गई थी.

इस के बाद अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के समर्थन से 28 दिसंबर, 2013 से 14 फरवरी, 2014 तक 49 दिनों के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, पर विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के लोकपाल बिल के विरोध में एक हो जाने पर और भ्रष्ट नेताओं पर लगाम कसने वाले इस लोकपाल बिल के गिर जाने के बाद उन्होंने नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

ये भी पढ़ें- पौलिटिकल राउंडअप : विधानपरिषद को खत्म किया

इस के बाद साल 2014 में देश में लोकसभा चुनाव हुए और भाजपा की अगुआई वाली सरकार देश में बनी. दिल्ली की सातों सीटें भाजपा को मिलीं. इसे नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत माना गया और तब दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनाव को ले कर भाजपाई आश्वस्त थे कि अब तो दिल्ली भी उन की हुई, पर अरविंद केजरीवाल की अगुआई में फरवरी, 2015 के चुनावों में उन की आम आदमी पार्टी ने 70 में से रिकौर्ड 67 सीटें जीत कर भारी बहुमत हासिल किया और 14 फरवरी, 2015 को वे दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर काबिज हुए.

आप के पिछले 5 साल

अरविंद केजरीवाल ने पिछले 5 सालों में अपने किए गए कामों पर इस बार के चुनाव में जनता से वोट मांगे. उन्होंने तो इतना तक कह दिया था कि अगर उन्होंने काम नहीं कराया है, तो जनता उन्हें वोट न दे.

अरविंद केजरीवाल की यह साफगोई और ईमानदार छवि उन के द्वारा दिल्ली को मुफ्त में बिजली, पानी, मोहल्ला क्लिनिक, साफसुथरे सरकारी स्कूल और चिकित्सा सुविधाओं को जनता तक पहुंचाने के दम पर बनी थी. उन्होंने हर मौके पर दिल्ली पुलिस को आड़े हाथ लिया था और खुद को जनता का कवच बना दिया था.

मुफ्त बिजलीपानी का फार्मूला जनता को बहुत रास आया. 200 यूनिट बिजली मुफ्त मिलना जनता को यह बात सिखा गया कि अगर वह चौकस रहे तो तय कोटे में अपना काम भी चला सकती है और बिजली बचाने में अपना योगदान भी दे सकती है. अब उसे सरकारी खंभे में कांटा लगाने की जरूरत नहीं थी. मुफ्त पानी ने तो सोने पर सुहागे जैसा काम किया. बहुत से लोग टैंकर माफिया के चंगुल से निकल गए.

अरविंद केजरीवाल के दूसरे वजीर मनीष सिसोदिया ने एक कदम आगे बढ़ कर सरकारी स्कूलों के साथसाथ सरकारी अस्पतालों में कई ऐसे सुधार किए कि दिल्ली की जनता के जेहन में यह बात बैठ गई कि सरकार का मन हो तो वह अपनी अवाम का खयाल रख सकती है. इस के साथ ही आम आदमी पार्टी ने कच्ची कालोनियों को पक्का करने की अपनी मुहिम भी चलाए रखी.

चुनाव से ठीक पहले दिल्ली की सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त में सफर करने का जो तोहफा इस सरकार ने दिया, वह गरीब जनता की जेब पर सीधा असर डाल गया. निचले तबके की औरतों और लड़कियों को इस से बहुत फायदा मिला.

भाजपा के दांव पड़े उलटे

एक के बाद एक कई राज्यों में अपनी सरकार गंवाने वाली और दिल्ली में मजबूत चेहरे और आपसी तालमेल से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी के पास अरविंद केजरीवाल को घेरने के लिए कोई खास मुद्दे थे ही नहीं.

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी अपनी ‘रिंकिया के पापा’ वाली इमेज से बाहर निकल ही नहीं पा रहे थे. दूसरे बड़े नेता भी अपने कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए हुए थे.

ये भी पढ़ें- पोस्टर वार के साथ चुनावी सरगर्मी

शायद सभी इस बात की राह देख रहे थे कि कब नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी जादुई छड़ी घुमाएंगे और दिल्ली में बिना कोई मेहनत किए सत्ता उन की झोली में आ गिरेगी.

लेकिन जब आलाकमान को ऐसा होता नहीं दिखा तो उस ने अपना वही पुराना हिंदूमुसलिम कार्ड खेला और सीएए के लागू होने पर भारत के मुसलिम समाज में छटपटाहट हुई, तो दिल्ली में धरने पर बैठे शाहीन बाग के लोगों को टुकड़ेटुकड़े गैंग से जोड़ने की तिकड़म भिड़ाई गई.

गृह मंत्री अमित शाह अपने रंग में दिखाई दिए और उन्होंने अरविंद केजरीवाल को शाहीन बाग का अगुआ बताते हुए आतंकवादी तक कह दिया, तो उन का एजेंडा सामने आ गया कि वे दिल्ली में वोटों का ध्रुवीकरण कर के सारे हिंदू वोट अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं.

इस के अलावा भाजपा के पास कोई भी ऐसा चेहरा नहीं था, जो मुख्यमंत्री पद का इतना तगड़ा दावेदार हो जो अरविंद केजरीवाल को टक्कर दे सके. यहां भी नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखा कर राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से वोट बटोरने की सोची गई थी जिसे जनता ने नकार दिया.

भाजपा ने उस समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी, जब उस ने जनता को अरविंद केजरीवाल की खामियां तो खूब गिनाईं, पर यह नहीं बताया कि अगर वह सत्ता में आई तो दिल्ली वालों की भलाई के क्याक्या काम करेगी. उस के लोकल नेता भी जनता के सामने नरेंद्र मोदी की ही बातें करते दिखे. कश्मीर, गाय, राम मंदिर, अर्बन नक्सली की हवाहवाई चिंघाड़ लगाते रहे.

सब से बड़ी बात तो यह कि भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल को घेरने में पूरी तरह नाकाम रही. उस के पास आम आदमी पार्टी द्वारा जनता को दी गई सुविधाओं का कोई जवाब नहीं था. न ही कोई ऐसा रोडमैप था, जो सत्ता में आने के लिए उस की राह बनता. यही वजह थी कि भाजपा के इतने तामझाम के बाद भी दिल्ली की जनता ने अपना विश्वास आम आदमी पार्टी में दिखाया और पूरे देश के लिए एक रोल मौडल पेश किया कि केंद्र सरकार की नाराजगी और सीमित सरकारी खजाने के बावजूद अगर कोई मुख्यमंत्री चाहे तो वह अपने राज्य के लोगों की भलाई के काम कर सकता है.

कांग्रेस गई गड्ढे में

लगता है, कांग्रेस यह मान कर चल रही है कि अब वह वहीं लड़ेगी जहां कम से कम नंबर 2 पर तो आ ही जाए. दिल्ली के इन चुनाव ने तो यही साबित किया है. साल 2015 के बाद अब साल 2020 में भी नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा. कभी दिल्ली और देश में अपनी धाक जमाने वाली इस पार्टी की जीरो इस बार भी नहीं टूटी, तो सवाल उठता है कि दिल्ली की जनता ने उसे पूरी तरह क्यों नकार दिया? वह क्यों एक नालायक छात्र की तरह पूरे चुनाव में इम्तिहान देने से बचती रही? क्यों नाम के लिए हिस्सा लिया और अपनी मिट्टी पलीद करा ली?

लगता है, कांग्रेस ने अपनी कमियों पर आंखें मूंदे रहने का मन बना लिया है. उस के पास कीमती 5 साल थे, जिन में वह जनता से जुड़ कर अपनी सियासी जमीन को दोबारा बंजर से उपजाऊ बना सकती थी.

याद रहे कि आम आदमी का आज का वोटर कल का कांग्रेसी प्रेमी था. ऐसे में सुभाष चोपड़ा को आगे कर देना कांग्रेस के लिए खुदकुशी कर देने जैसा था.

ये भी पढ़ें- नागौर में बर्बरता की हद पार: पेट्रोल से गीले कपड़े को प्राइवेट पार्ट में डाला

इस पर कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का यह कहना कि सब को मालूम था कि आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता में आएगी, पार्टी के गिर चुके कंधों की तरफ इशारा करता है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी हार से ज्यादा इस बात पर खुश दिखे कि बड़ेबड़े दावे करने वाली भाजपा का ऐसा हश्र हुआ?

हो सकता है कि कांग्रेस चाहती हो कि किसी भी तरह भाजपा को दिल्ली की सत्ता से दूर रखा जाए. अगर वह चुनाव में दम दिखाती तो आम आदमी पार्टी के वोट बैंक में ही सेंध लगाती. इस से भाजपा ही मजबूत होती तो उस ने पहले से ही सोचीसमझी चाल के तहत दिल्ली की गद्दी अरविंद केजरीवाल को सौंप दी.

पर अगर ऐसा है, तो यह राहुल गांधी के सियासी सफर को और ज्यादा मुश्किल बना देगा, क्योंकि राजनीति में कब, कौन पलटी मार दे, कह नहीं सकते.

केजरीवाल की चुनौतियां

अगले 5 साल फिर केजरीवाल. इस जीत से आम आदमी पार्टी की कामयाबी का ग्राफ बहुत ज्यादा बढ़ा है, तो चुनौतियां भी कम नहीं हैं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से जो 10 वादे किए हैं, उन्हें उन पर खरा उतरना होगा. मुफ्त की सुविधाओं और सरकारी खजाने के बीच भी तालमेल बनाना होगा. सब से बड़ी समस्या तो दिल्ली के सामने गंदगी की है.

आज जहां देखो, कचरा ही कचरा दिखाई देता है और अरविंद केजरीवाल दिल्ली को लंदन बनाने के ख्वाब देख रहे हैं. दिल्ली की कच्ची बस्तियों के हाल तो और भी बुरे हैं. नाले पर बस्ती है या बस्ती में से नाला है, इस का पता ही नहीं चलता है. बहुत से मोहल्ला क्लिनिक तक गंदगी का दूसरा नाम बन गए हैं.

आप वाले कह सकते हैं कि नगरनिगम पर भाजपा का कब्जा है, तो वह कैसे साफसफाई की मुहिम चलाए? लेकिन जनता तो आप पर ही विश्वास करती है न? सफाई मुहिम को जनता की मुहिम बना कर भी इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है और जब नगरनिगम के चुनाव हों, तो उन पर भी कब्जा जमाया जा सकता है.

इस के अलावा बेरोजगारी, माली मंदी और बढ़ती आबादी दिल्ली को बैकफुट पर ला रही है. अरविंद केजरीवाल ने जीतने के बाद दिल्ली को ‘आई लव यू’ कहा है, तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि जिस से प्यार करते हैं, उस का हर तरह से खयाल भी रखा जाता है. लिहाजा, वे दिल्ली में ही जमे रहें और पिछली बार की तरह अभी से देश की सियासत पर कब्जा जमाने के सपने न देखें, क्योंकि अभी इस लिहाज से आप के लिए भी दिल्ली दूर है.

आप की महिला उम्मीदवार भी कम नहीं

चुनाव से ऐन पहले दिल्ली की महिलाओं को डीटीसी बस में मुफ्त सफर कराने के ऐलान ने आम आदमी पार्टी को बहुत फायदा पहुंचाया. उसे दिल्ली की गद्दी पर तीसरी बार पहुंचाने में महिला वोटरों ने खूब योगदान दिया.

वैसे, इस बार के विधानसभा चुनाव में कुल 79 महिलाएं बतौर उम्मीदवार मैदान में थीं, लेकिन जलवा रहा आम आदमी पार्टी की 8 महिलाओं का. अरविंद केजरीवाल ने 9 महिला उम्मीदवारों को टिकट दी थी, जिन में से 8 ने जीत हासिल की.

कांग्रेस ने 10 महिला उम्मीदवारों पर दांव लगाया था, पर एक भी सीट नहीं हासिल हो पाई. ऐसा ही कुछकुछ भाजपा का भी हाल रहा. उस ने सब से कम 5 महिला उम्मीदवारों को टिकट दी थी, पर उन में से एक भी नहीं जीत पाई.

ये भी पढ़ें- भूपेश बघेल की अमेरिका यात्रा के कुछ यक्ष-प्रश्न

सफाई वाले का बेटा भी विधायक बना इस चुनाव में 18 ऐसे चेहरे हैं, जो पहली बार विधानसभा में पहुंचे हैं. इन में से 16 विधायक तो आम आदमी पार्टी के ही हैं और 2 विधायक भाजपा के हैं. लेकिन सब से ज्यादा सुर्खियां बटोरीं आम आदमी पार्टी के कोंडली सीट से चुन कर आए कुलदीप कुमार ने. वे एक सामान्य परिवार से आते हैं. उन के पिता नगरनिगम में सफाईकर्मी हैं. वैसे, कुलदीप कुमार साल 2007 में पार्षद भी बने थे. वे 30 साल के हैं और इस बार सब से कम उम्र के विधायक बने हैं.

संभल कर खाओ ओ दिल्ली वालो

बचपन में जब कभी मैं अपने गांव जाता था तो वहां के मेरे दोस्त मुझे अकसर ही छेड़ते रहते थे कि ‘दिल्ली के दलाली, मुंह चिकना पेट खाली’. तब मुझे बड़ी चिढ़ मचती थी कि मैं इन से बेहतर जिंदगी जीता हूं, फिर भी ये ऐसा क्यों कहते हैं?

यह बात याद आने के पीछे आज की एक बड़ी वजह है और वह यह कि दिल्ली और केंद्र सरकार में दिल्ली की कच्ची कालोनियों को पक्का करने की होड़ सी मची है. वे उन लोगों को सब्जबाग दिखा रहे हैं, जो देश की ज्यादातर उस पिछड़ी आबादी की नुमाइंदगी करते हैं जो यहां अपनी गरीबी से जू झ रहे हैं, क्योंकि उन के गांव में तो रोटी मिले न मिले, अगड़ों की लात जरूर मिलती है.

पर, अब तो दिल्ली शहर भी सब से छल करने लगा है. यहां के लोगों को रोजीरोटी तो मिल रही है पर जानलेवा, फिर चाहे वे पैसे वाले हों या फटेहाल. बाजार में खाने का घटिया सामान बिक रहा है.

दिल्ली के खाद्य संरक्षा विभाग ने इस मिलावट के बारे में बताते हुए कहा कि साल 2019 की 15 नवंबर की तारीख तक 1,303 नमूने लिए गए थे. उन में से 8.8 फीसदी नमूने मिस ब्रांड, 5.4 फीसदी नमूने घटिया और 5.4 फीसदी ही नमूने असुरक्षित पाए गए. ये नमूने साल 2013 से अभी तक सब से ज्यादा हैं.

ये भी पढ़ें- बढ़ते धार्मिक स्थल कितने जरूरी?

यहां एक बात और गौर करने वाली है कि जिन व्यापारियों के खाद्य सामान के नमूने फेल हुए हैं, उन के खिलाफ अलगअलग अदालतों में मुकदमे दर्ज मिले हैं. पर यह तो वह लिस्ट है, जहां के नमूने लिए गए, लेकिन दिल्ली की ज्यादातर आबादी ऐसी कच्ची कालोनियों में रहती है, जहां ऐसे मानकों के बारे में कभी सोचा भी नहीं जाता होगा.

साफ पानी के हालात तो और भी बुरे हैं. साफ पानी की लाइन में सीवर के गंदे पानी की लाइन मिलने की खबरें आती रहती हैं.

ऐसी बस्तियों में ब्रांड नाम की कोई चीज नहीं होती है. हां, किसी बड़े ब्रांड के नकली नाम से बने सामान यहां धड़ल्ले से बिकते हैं. पंसारी की खुली बोरियों में क्याक्या भरा है, किसे पता?

पिछले साल के आखिर में दिल्ली की बवाना पुलिस ने जीरा बनाने की एक ऐसी फैक्टरी पकड़ी थी, जहां फूल  झाड़ू बनाने वाली जंगली घास, गुड़ का शीरा और स्टोन पाउडर से जीरा बनाया जा रहा था. इस जीरे को दिल्ली के अलावा गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व दूसरी कई जगह बड़ी मात्रा में सप्लाई किया जाता था. इस नकली जीरे को असली जीरे में 80:20 के अनुपात में मिला कर लाखों रुपए में बेच दिया जाता था.

यह तो वह मिलावट है जो पकड़ी गई है, बाकी का तो कोई हिसाबकिताब ही नहीं है. दिल्ली के असली दलाल तो ये मिलावटखोर हैं, जो एक बड़ी आबादी को शरीर और मन से इस कदर बीमार कर रहे हैं कि उस का मुंह भी चिकना नहीं रहा है. कच्ची कालोनियों को पक्का करने से पहले ऐसे मिलावटखोरों का पक्का इंतजाम करना जरूरी है.

ये भी पढ़ें- अमीर परिवारों की बहूबेटियों को सौगात

दिल्ली-लखनऊ में हिंसा आर या पार, नागरिकता बिल पर बवाल

19 दिसंबर की दिल्ली की ये हिंसा इस कदर हावी हो गई की लोगों के मन में डर बैठ गया है. लोग सहम रहे हैं. इस हिंसा को देख तो यही लगता है कि अब तो दिल्ली की ये हिंसा आर या पार. इस बढ़ती हिंसा के चलते राजधानी दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया, जिसमें भगवान दास, राजीव चौक, जनपथ, वसंत विहार, कल्याण मार्ग, मंडी हाउस, खान मार्केट, जामा मस्जिद, लालकिला, जामिया विश्वनिद्याल, मुनेरका, केंदीय सचिवालय, चांदनी चौक, शाहीन बाग ये सभी मेट्रो स्टेशन शामिल हैं.

लालकिला, मंडीहाउस समेत कई ऐसे क्षेत्र हैं दिल्ली के जहां पर गुरुवार को उग्र प्रदर्शनकारियों ने जमकर प्रदर्शन किया और जगह-जगह पर आगजनी, तोड़-फोड़, पथराव किया. पुलिस को लाठीचार्ज करनी पड़ी, आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. ऐसा नहीं है कि इस प्रदर्शन में केवल विद्यार्थी ही शामिल हैं बल्कि इस प्रदर्शन में कुछ नेता भी शामिल हैं. एक खबर के मुताबिक इतिहासकार रामचंद्र गुहा और बेंगलुरु में लेखक को तो हिरासत में लिया गया साथ ही योगेंद्र यादब, उमर खालिद, संदीप दीक्षित, प्रशांत भूषण जैसे नेताओं को भी हिरासत में लिया गया है.

ये भी पढ़ें- खजाने के चक्कर में खोदे जा रहे किले

ये सभी नेता नागरिकता बिल को लेकर प्रदर्शन में शामिल है. मेंट्रो के बंद हो जाने के कारण आम जनता को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि लोगों को आवाजाही में दिक्कत हो रही है. तो वहीं राजधानी दिल्ली में कई इलाकों में इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया गया है. कालिंग सुविधा बंद कर दी गई है. एसएमएस तक पर रोक लगा दी गई है. ताकि हिंसा को बढ़ावा देने वाले कुछ अवांछनीय तत्व जो अफवाह फैला रहे हैं वो ना कर पाए. लेकिन ऐसे में उन क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिक परेशानी उठा रहे हैं.

इधर जामिया हिंसा को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए कहा कि इस पर सुनवाई अब चार फरवरी को होगी. एक तरफ दिल्ली में हिंसा उग्र होती जा रही है तो वहीं गुरुवार को लखनऊ में भी हिंसा अपने चरम पर पहुंचता हुआ नजर आया. वहां पर प्रदर्शनकारी उग्र हो उठे. कई जगहों पर आगजनी, तोड़फोड़ की और इतना ही नहीं बल्कि एक ओबी वैन को भी आग के हवाले कर दिया. कई गाड़ियां धू-धू कर जल रहीं थीं. रोडवेज बसों को भी आग के हवाले कर दिया.

हालांकि जहां पर भी सार्वजनिक संपत्ति को प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया है वहां पर सरकार कड़ा रुख अपनाते हुए सख्त कार्रवाई करेगी. लखनऊ के डालीगंज इलाके में हिंसा इतनी तेज हो गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़ें. लखनऊ के इस बढ़ती हिंसा में दो पुलिस बूथ भी बुरी तरह से स्वाहा हो गए. वहां पर इस हिंसा को देखते हुए इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है. हिंसा का ये रूप देखकर कोई भी सहम जाए. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच में झड़प हो रही है. प्रदर्शनकारी पुलिस पर उल्टा पथराव करने पर उतारू हैं.

ये भी पढ़ें- अंधविश्वास: भक्ति या हुड़दंग

खबरों के मुताबिक सीएम योगी इन सब को देख कर काफी नाराज हैं और उन्होंने कहा है कि जो भी उपद्रवी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं उन सबको भरपाई करनी पड़ेगी. उन पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने इस इस पर चर्चा के लिए बैठक भी बुलाई है. शायद ये कड़ा रुख अपनाना जरूरी भी था. उपद्रवीयों ने लखनऊ में 20 बाइक, 10 कार व 3 बसों को जला डाला. इतना ही नहीं कवर करने के लिए गई चार मीडियो ओबी वैन को भी आग के हवाले कर दिया. ना जाने ये प्रदर्शन कब तक चलेगा और देश को कब तक इसमें जलना पड़ेगा, क्योंकि ये हिंसा बहुत ही खतरनाक रूप लेती जा रही है और सरकार को जल्द ही इस पर कोई कड़ा रूख अपनाना होगा.

दिल्ली की आग से देश की आंखें नम, पढ़िए आग की नौ बड़ी घटनाएं

नई दिल्ली: लुटियंस दिल्ली के लोग इस काली सुबह को कभी भूल नहीं पाएंगे. सर्दी के मौसम में सुबह पांच बजे लोग आराम से सो रहे होते हैं. लेकिन उनको क्या पता था कि जब उनकी आंखे खुलेगी तो सामने आग की लपटों पर लिपटे जिस्म की चीखें सुनाई देंगी. कुछ ऐसा ही हुआ. दिल्ली में अनधिकृत बैग मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरी में रविवार को लगी आग में 43 लोगों की मौत हो गई और बहुत से दूसरे लोग अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यह घटना बीते 25 सालों में देश में हुई आग दुर्घटनाओं में सबसे गंभीर है.

देश में आग की नौ बड़ी घटनाएं

8 दिसंबर, 2019

लुटियंस दिल्ली में अनधिकृत बैग मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरी में रविवार को लगी आग में 43 लोगों की मौत हो गई और बहुत से दूसरे लोग अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जिनके साथ ये हादसा हुआ अगर उनकी जुबानी सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. यह घटना बीते 25 सालों में देश में हुई आग दुर्घटनाओं में सबसे गंभीर है.

ये भी पढ़ें- डेटिंग ऐप्स में सेक्स तलाशते युवा

23 दिसंबर, 1995-डबवाली-हरियाणा

स्कूल के वार्षिक दिवस समारोह के बाद आग व भगदड़ मचने से 442 लोगों की मौत हो गई, जिसमें 225 स्कूली बच्चे थे. हॉल परिसर में 1500 लोग एक शामियाने में जमा थे, जिसके गेट बंद थे.

23 फरवरी 1997-बारिपदा-ओडिशा

यह आग एक संप्रदाय के धार्मिक कार्यक्रम के दौरान लगी और भगदड़ के बाद बारिपदा में 23 फरवरी 1997 को 206 लोगों की मौत हो गई. यह आग हताहतों की संख्या के मामले में दूसरी सबसे बड़ी आग त्रासदी थी. इसके अतिरिक्त भगदड़ में 200 लोगों को चोटें आई, जब भक्त आग से बचने की कोशिश कर रहे थे.

10 अप्रैल 2006-मेरठ-उत्तर प्रदेश

यहां एक उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स मेले के दौरान लगी भीषण आग से 100 लोगों की मौत हो गई. आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट था.

ये भी पढ़ें- हैदराबाद में चार आरोपियों के साथ कानून का भी हुआ एनकाउंटर

16 जुलाई, 2004-कुंभकोणम-तमिलनाडु

एक अस्थायी मिडडे मील रसोई घर में लगी आग से 94 स्कूली बच्चों की मौत हो गई. रसोई घर की आग की लपटें पहली मंजिल की कक्षाओं तक पहुंच गई जहां 200 छात्र मौजूद थे.

9 दिसंबर, 2011-कोलकाता-पश्चिम बंगाल

इमारत के बेसमेंट में इलेक्ट्रिक शॉर्ट सर्किस से आग लग गई और इससे आग व धुआं एएमआरआई अस्पताल तक पहुंच गई और 89 लोगों की मौत हो गई.

13 जून, 1997-उपहार सिनेमा

आग की यह भयावह घटना बॉलीवुड फिल्म ‘बॉर्डर’ की स्क्रिनिंग के दौरान हुई, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए.

5 सितंबर 2012-शिवकाशी-तमिलनाडु

यह हादसा शिवकाशी में पटाखा मैन्युफैक्चरिंग के दौरान मजदूरों के रासायनों के मिलाने की वजह से विस्फोट से हुआ और आग लग गई, जिसमें 54 लोग मारे गए और 78 लोग घायल हो गए.

ये भी पढ़ें- पहली बार पुरूष वनडे क्रिकेट में जीएस लक्ष्मी बनेंगी अंपायर, शारजाह का मैदान बनेगा गवाह

23 जनवरी, 2004-श्रीरंगम-तमिलनाडु

शादी के समारोह के दौरान आग लगने से 50 लोगों की मौत हो गई और 40 लोग घायल हो गए.

15 सितंबर, 2005-खुसरोपुर-बिहार

तीन अनधिकृत पटाखा मैन्युफैक्चरिंग ईकाई में विस्फोट से आग लगने से 35 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज्यादा लोग घायल हुए.

दिल्ली में बारिश के बाद इनकी कमाई बढ जाती है…

राजधानी दिल्ली में 1-2 दिन की बारिश के बाद एक फोटो खूब वायरल किया जा रहा. फोटो में एक ट्रैक्टर पर 2-3 बाइक ले जाते लोग हैं. नीचे कमर तक पानी है. दरअसल, यह तस्वीर दिल्ली के तुगलकाबाद स्थित प्रह्लादपुर अंडरपास की है जो थोङी देर की बारिश में ही आधा डूब गया. ऐसे में जिन्हें जरूरी काम के लिए इस हो कर गुजरना था उन के लिए समस्या हो गई. अब या तो जमा पानी के अंदर घुस कर जाओ या फिर तैर कर. बाइक वालों के लिए तो यह बङी मुसीबत थी. पानी के अंदर गए तो समझो बाइक में खराबी तय है. पब्लिक को इस समस्या में देख कर  ट्रैक्टर मालिकों के चेहरे खिल उठे. उन्होंने न सिर्फ सवारी बल्कि बाइक को पार कराने के लिए 10 रूपए प्रति व्यक्ति तय कर दी. यानी खुद जाओ या बाइक भेजो 10 रूपए देने ही पङेंगे.

डूब जाती है दिल्ली

यों दिल्ली में हलकी बारिश और वाटर लौगिंग होना आम है. यह अलग बात है कि बारिश से पहले दिल्ली सरकार और एमसीडी बङेबङे वादे तो करती है पर एक ही बारिश के बाद इन की पोलपट्टी खुल जाती है. अभी पिछले साल दिल्ली के मिंटो रोड अंडरपास पर एक बस पूरी तरह डूब गई थी. यह तस्वीर तब देशदुनिया की मीडिया में सुर्खियां बनी थी. एक अखबार ने शीर्षक प्रकाशित कर तंज कसा था,”दिल्ली वाकई पेरिस बन गई.”

ये भी पढ़ें- बाढ़ में डूबे बिहार से आई रौंगटे खड़े करने वाली तस्वीर, पढ़ें पूरी खबर

केजरीवाल पर तंज

वैसे दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने से पहले केजरीवाल ने मीडिया से बातचीत में बताया था कि पिछली सरकारें दिल्ली को लूटती रही हैं पर किया कुछ नहीं. अगर उन की सरकार बनी तो दिल्ली को विदेश जैसा बना देंगे. अब दिल्ली में जगहजगह वाटर लौगिंग पर विपक्ष के नेता फोटो के नीचे कैप्शन लगाते हुए तंज करते हैं,”लो जी केजरीवाल ने दिल्ली को वाकई पेरिस बना दिया.” पिछले साल की बारिश में दिल्ली में भयंकर जलजमाव हो गया था. दिल्ली के कई इलाकों में सड़कों पर पानी जमा हो गया था. पंजाबी बाग से ले कर रिंग रोड तक सङकें पानी में डूब गई थीं. जाम इतना लंबा था कि लोगों को अपने गंतव्य तक जाने में घंटों लगे थे.

कोर्ट की सख्ती

इस को देखते हुए तब दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रूप अपनाया था. कोर्ट ने जल बोर्ड से ले कर शहरी विकास मंत्रालय तक को नोटिस भेज कर जवाब मांगा था. मगर दूसरी ओर दिल्ली में बढती आबादी, कूङेकचरे का सही निस्तारण न होने और सरकारी उदासीनता बङी वजहे हैं. कोर्ट से ले कर तमाम संगठन इस पर चिंता जाहिर कर चुके हैं और संभावना जता चुके हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई उपाय नहीं किए तो दिल्ली में भीषण महामारी फैल सकता है.

ये भी पढ़ें- राजपूतों का सपा से मोहभंग

यूपी ही तय करेगा दिल्ली का सरताज

लोकसभा चुनाव के पांचवे चरण में पहुंचते-पहुंचते यह साफ है कि चुनावी लड़ाई बेहद कठिन है. अपने नेताओं को दरकिनार करने के बाद फिल्म, टीवी और खेल के मैदान से नामचीन चेहरे लाने के बाद भी भाजपा 75 प्लस सीटे लाने की हालत में नहीं दिख रही है. उत्तर प्रदेश से भाजपा को जो चुनौती मिल रही है उस कमी को पूरा करने वाला देश का कोई दूसरा प्रदेश नहीं है. पहले उम्मीद की जा रही थी भाजपा कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी को चुनाव जीतने नहीं देगी.

अमेठी और रायबरेली दोनो संसदीय सीट पर भाजपा के प्रत्याशी किसी तरह की बड़ी चुनौती नहीं खड़ी कर पा रहे है. रायबरेली के लालगंज के पास सरेनी कस्बे में बातचीत में वहां के रहने वालों ने कहा कि सोनिया गांधी जिस तरह की राजनीति करती हैं और जितनी सहनशील हैं वो आज के नेताओं की बस की बात नहीं है.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

सवर्ण जातियों के प्रभाव वाला यह क्षेत्र विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ था. पर लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस के साथ खड़ा है. यहां राष्ट्रवाद कोई मुददा नहीं है. सवर्ण जातियां ठाकुर और ब्राह्मण की आपसी गुटबाजी से दूर केवल कांग्रेस को वोट देने जा रही है. किसी के मन में इस बात का भी कोई मलाल नहीं है कि सोनिया और प्रियंका यहां वोट मांगने क्यो नहीं आ रहीं? कमोवेश यहीं हालत अमेठी लोकसभा सीट की है. राहुल गांधी और स्मृति ईरानी के बीच केवल

वोट के अंतर को देखना भर रह गया है. 2014 में मोदी के मैजिक के समय भाजपा यहां 2 सीटें जीत नहीं पाई थी. 2014 के मुकाबले भाजपा 2019 की राह कठिन है. भाजपा को लग रहा था कि त्रिकोणीय लड़ाई होने का लाभ पार्टी को मिलेगा. पर यह लाभ होता नहीं दिख रहा है.

मीडियाकर्मियों का दिल जीत लिया राहुल ने

80 सीटों वाले इस प्रदेश में भाजपा के मुकाबले गैर भाजपा की सीटें अधिक होगी. जिससे भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने की राह कठिन हो जायेगी. विपक्ष इस बार उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करके सरकार बनाने लायक सीटों को लाने के प्रयास में लगा है. अगर उत्तर प्रदेश में विपक्ष का प्रदर्शन अचछा रहा, तभी वह केन्द्र की चाबी तैयार कर सकेगा. भाजपा में

उत्तर प्रदेश से प्रभाव कम होने से बहुमत की सरकार से वह दूर रह जायेगी. ऐसे में ‘शाह-मोदी’ का विरोध, विरोधी दल ही नहीं बल्कि इनके अपने लोग ही करने लगेगें.

ऐसे में यह साफ है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर ही जायेगा. भाजपा ने सभी जातियों के हिन्दू धुव्रीकरण का प्रयास किया है वह पूरी तरह से सफल नहीं है. प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या और अकबरपुर में अपनी चुनावी सभा की पर अयोध्या राम मंदिर का दर्शन करने अपने 5 साल के अपने पूरे कार्यकाल में नहीं गये.

बड़े सितारों पर भारी पड़ रहे क्षेत्रीय कलाकार

बाराबंकी जिले के पफतेहपुर के रहने वाले सामान्य वर्ग के सुरेश शर्मा कहते है ‘भाजपा ने राम मंदिर बनाने की बात की थी. ना तो राम मंदिर बना ना ही आयोध्या का विकास हुआ. ऐसे में अब लोग भाजपा को क्यो वोट दे?’

उत्तर प्रदेश में कमल को खिलने से रोकने के लिये हाथी और साइकिल के साथ पंजा भी मिल गया है. यह मिलकर भाजपा का दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता रोकने को सफल हो रहे है. अपने चुनावी प्रबंधन से भाजपा अपने चुनावी नुकसान को कम कर सकती है यह नुकसान बिलकुल नहीं होगा यह भाजपा को भी लग रहा है. यही वजह है कि भाजपा ने अपने उबाऊ और बासी दिखने वाले नेताओं की जगह पर फिल्म और खेल के मैदान के लोगों को उतारा है.

भाजपा के लिए चुनौती हैं प्रियंका

लोगों को नहीं भाई आर्यन-सारा की बाइक राइड, कर दिया ट्रोल

सारा अली खान और कार्तिक आर्यन इस समय इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल-2 की शूटिंग में व्यस्त है. इन दिनों दिल्ली में इस फिल्म की शूटिंग जोरो-शोरों से चल रही है और आए दिन सेट से इनकी कोई ना कोई तस्वीर और वीडियो सामने आ ही जाते है.

दिल्ली में यूं घूम रहे हैं दोनों…

कुछ घंटे पहले ही सारा और कार्तिक का एक नया वीडियो सामने आया है जो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया. इस वीडियो में सारा कार्तिक के साथ बाइक पर बैठी हुई नजर आ रही है.

लव आज कल-2 की शूटिंग का वीडियो…

अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये वीडियो फिल्म ‘लव आजकल 2’ का ही एक सीक्वेंस होगा. जहां इस जोड़ी के लिए ये वीडियो किसी तोहफे से कम नहीं वहीं कई ऐसे लोग भी है जो इस वीडियो की वजह से सारा को जमकर ट्रोल करने में लगे हुए. दरअसल सारा बाइक पर बिना हेलमेट ही बैठी हुई है, ऐसे में कई फैंस सारा को हिदायत देने में लगे है कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.

पौपुलर हुई दोनों की जोड़ी…

सारा और कार्तिक को तो फैंस ‘सार्तिक’ नाम दे चुके है. हाल ही में सारा ने करण जौहर के शो में आकर ये इच्छा जताई थी कि वह कार्तिक को डेट करना चाहती है. बस इसी के बाद से इनके चाहने वालों ने तो सोशल मीडिया पर इनके नाम के कई फैन क्लब भी बना दिया.

लव आजकल-2 में नजर आएंगे सैफ…

इम्तियाज की फिल्म ‘लव आजकल’ में सैफ अली खान लीड रोल में नजर आए थे. इस फिल्म में सैफ के अपोजिट दीपिका पादुकोण नजर आई थीं.

डाक्टर ने 3 महिलाओं को कुचला, रुका और भाग गया

दिल्ली के करोल बाग इलाके में हिट एंड रन का मामला सामने आया है. मंगलवार रात रोड क्रॉस कर रहीं तीन महिलाओं को एक तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी, जिसमें एक की मौत हो गई, जबकि दो जख्मी हैं. मृतका की पहचान 60 वर्षीय सन्नो के रूप में हुई है. हादसा इतना जबर्दस्त था कि एक महिला हवा में करीब 10 फुट उछलकर दूसरी ओर जा गिरीं.

दर्दनाक हादसे में महिला खून से लथपथ हालत में तड़पती रहीं. जबकि दो अन्य महिलाएं भी कार की चपेट में आ गई. हादसे के बाद कार चला रहा शख्स एक पल के लिए रुका फिर स्पीड बढ़ाकर वहां से भाग गया.

इस बीच पब्लिक इकट्ठा हो गई. हादसे की सूचना पर पीसीआर ने तीनों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया. जहां पुलिस ने मृत घोषित कर दिया. हादसे के चश्मदीदों और घटनास्थल से छानबीन के बाद पुलिस ने आरोपी कार सवार का पता लगाया. बुधवार सुबह उसे गिरफ्तार किया. जिसे थाने से ही बेल मिल गई. पुलिस ने महिला का शव परिजनों को सौंपकर जांच कर रही है.

पुलिस के मुताबिक, हिट एंड रन के इस मामले में कार सवार आरोपी एक डॉक्टर है. पूछताछ में उसकी पहचान अम्बुज गर्ग के तौर पर हुई है.

मेडिकल जांच से पता लगाया जा रहा है कि आरोपी डॉक्टर हादसे के वक्त नशे में तो नहीं था. चश्मदीद किशनगंज निवासी गीता देवी हैं. उनके बयान पर केस दर्ज किया है. गीता देवी, किरपाली देवी और सन्नो कुम्हार वाली गली सदर में एक कारखाने में काम करती थीं.

टाइम से पहुंचतीं तो बच सकती थी जान

हिट एंड रन के आरोपी डॉक्टर अंबुज गर्ग ने घटनास्थल पर ही अगर अपनी कार रोककर उस महिला को तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया होता तो शायद वो जिंदा होतीं. यह कहना है हादसे के चश्मदीदों का. टक्कर लगने के बाद सन्नो तड़पती रहीं. तमाशबीन लोग भी मोबाइल से विडियो बनाते रहे. चश्मदीदों ने बताया है डॉक्टर अपनी कार में तेज रफ्तार से था.

सन्नो अपना काम खत्म कर घर जाने के लिए निकलीं. इस बीच रास्ते में पड़ोस में रहने वाली गीता और कृपाली देवी मिली. तीनों एक साथ घर जाने लगे. फिल्मिस्तान सिनेमा के पास तीनों रानी झांसी रोड पर सड़क पार करने लगीं. इसी दौरान ईदगाह की ओर से आए कार सवार डॉक्टर अंबुज गर्ग ने तीनों को टक्कर मार दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया. सन्नो को डॉक्टरों ने मृत बताया. गीता व कृपाली का इलाज जारी है.

पुलिस ने कार के नंबर के आधार पर देर रात को ही आरोपी डॉक्टर को उसके घर से दबोचकर कार बरामद कर ली और अरेस्ट किया. पुलिस मामले की छानबीन कर रही है.

एटीएम के की-पैड के नीचे माचिस की तीली डालकर महिला से फ्रौड

एटीएम के की-पैड के नीचे माचिस की तीली या पिन डालकर फ्रौड कर 10 हजार रुपये निकालने वाले व्यक्ति को पकड़ लिया गया. दिल्ली के राजौरी गार्डन थाना एरिया में महिला से ठगी की गई. आरोपी ने कहा कि यह कला उसने अपने जीजा से सीखी थी.

डीसीपी मोनिका भारद्वाज ने बताया कि गिरफ्तार किए गए आरोपी का नाम हेमाराम (35) है. उसे राजौरी गार्डन थाने के एसएचओ सुनील शर्मा की टीम ने पकड़ा. पुलिस का कहना है कि पश्चिम विहार का रहने वाला हेमाराम ने पूछताछ में बताया है कि उसे यह कला उसके जीजा ने सिखाई है.

पुलिस उसके जीजा की भी तलाश में है. हेमाराम से पूछताछ करके पता लगाया जा रहा है कि अभी तक इस तरह से उसने कितने लोगों के अकाउंट से पैसे निकाले हैं.

सोमवार शाम करीब 7:15 बजे एक महिला ने एक बैंक के एटीएम से 10 हजार रुपये निकालने की कोशिश की थी. उन्होंने कार्ड को स्वाइप करके अपना पासवर्ड डाला. मगर, रुपये नहीं निकले. महिला के पीछे यह हेमाराम खड़ा था. उसने महिला से कहा कि लगता है एटीएम खराब है. महिला एटीएम में दी गई अपनी कमांड को कैंसल करके नहीं गईं. उनके जाते ही हेमाराम ने पासवर्ड डालकर एटीएम से 10 हजार रुपये निकाल लिए.

महिला एटीएम से निकलकर कुछ दूर गई थीं कि उनके मोबाइल फोन पर 10 हजार रुपये निकलने का मेसेज आया. वह वापस दौड़कर एटीएम पहुंचीं तो देखा कि आरोपी वहां से भाग रहा था. उन्होंने पुलिस कॉल कर दी. वहीं से एक हवलदार और एक सिपाही गुजर रहे थे. उन्हें देखकर आारोपी ने 10 हजार रुपये रोड पर फेंक दिए. दोनों पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ लिया. महिला ने उसकी पहचान कर ली. आरोपी से और पूछताछ की जा रही है.

आरोपी ने पुलिस को बताया कि वह एटीएम का की-पैड थोड़ा उठा देता था. अगर कोई रुपये निकालने के लिए पासवर्ड डालता तो पैसे नहीं निकलते. पीछे खड़ा होकर पासवर्ड देख लेता था. जैसे ही पैसे निकालने वाला बाहर जाता था वह पासवर्ड डालकर रुपये निकाल लेता था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें