Politics : दलितों और मुसलिमों को नेताओं की जरूरत ही नहीं

Politics. डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे, लेकिन वे दलितों के हित के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. दलित समाज से जो भी हाल में नेता हुए, अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों की भलाई के नाम पर वोटों को बेचने का ही काम किया. यही हाल मुसलिमों का भी रहा.

मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे, लेकिन यह किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल ही बने रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के हित की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने गैरमुसलिमों की पार्टी का ही भला किया.

आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर आजाद रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है. मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर आजाद रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मांझी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.

बिना नायक की आबादी

भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी है यानी तकरीबन 11 करोड़ है. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है. दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज के हालात तकरीबन एकजैसे ही हैं.

अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को सच मानें तो ज्यादातर मुसलिमों के हालात दलितों से बदतर हैं. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की कुल आबादी को जोड़ दिया जाए तो देश की आबादी में इन तीनों समाजों का अनुपात तकरीबन 40 फीसदी हो जाता है. इस में ईसाई, सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समाजों को भी जोड़ लिया जाए तो यह फीसदी 50 के पार पहुंच जाएगा, लेकिन फिर भी मौजूदा राजनीतिक माहौल में देश की यह आधी आबादी पूरी तरह सत्ता से दूर नजर आती है.

40 फीसदी आबादी होने के बावजूद मुसलिम, दलित और आदिवासी पूरी तरह हाशिए पर हैं. नेता नहीं, मीडिया नहीं, उद्योगपति नहीं, लेखक नहीं और कोई नायक नहीं.

मुसलिम, दलित व आदिवासियों के जो नेता संसद और विधानसभाओं में हैं, वे अपनेअपने समाजों और उन की समस्याओं से इतने ऊपर उठ चुके हैं कि उन्हें समाज के भीतर की मुश्किलें नजर ही नहीं आती हैं.

दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की सब से बड़ी समस्या अशिक्षा है, लेकिन इसे दूर करने में इन समाजों के नेताओं की कोई दिलचस्पी नहीं है.

मेनस्ट्रीम मीडिया के बंद दरवाजे

मीडिया में नुमाइंदगी नहीं होने के चलते दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की असली समस्याएं कभी हाईलाइट ही नहीं हो पाती हैं. गरीबी, बेरोजगारी का दंश झेलते इन तीनों समाजों का जम कर शोषण होता है, अत्याचार होते हैं, लेकिन इन की ऐसी खबरें कभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया तक नहीं पहुंच पाती हैं.

मुख्यधारा की मीडिया में दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की भागीदारी बिलकुल न के बराबर है. ये तीनों वर्ग न्यूजरूम, कवरेज, एंकरिंग और नेतृत्व वाले पदों से कोसों दूर खड़े हैं.

औक्सफेम इंडिया और न्यूजलौन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया में केवल ऊंची जातियों का ऐसा दबदबा है कि यह तकरीबन 86-90 फीसदी पदों पर काबिज हैं. इन तीनों वर्गों की लेखन, रिपोर्टिंग, एंकरिंग में भागीदारी जीरो है. एक भी दलित, मुसलिम या आदिवासी मेन स्ट्रीम के किसी भी मीडिया ग्रुप का हैड नहीं है. यही वजह है कि इन तबकों से जुड़े मुद्दों को ले कर अंगरेजी अखबारों में 5 फीसदी से कम लेख छपते हैं तो हिंदी अखबारों में महज 10 फीसदी ही लेख छपते हैं.

मीडिया के 121 प्रमुख पदों में से 106 पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठे हैं. एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि में एससीएसटी एंकर एक भी नहीं है. 972 प्रमुख पत्रिकाओं की कवर स्टोरी में से केवल 10 दलित या आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित होती हैं.

दलित अत्याचार, आदिवासी विस्थापन या मुसलिम भेदभाव की खबरें मेनस्ट्रीम से गायब रहती हैं या इन्हें भाव ही नहीं दिया जाता. मुसलिम, दलित और आदिवासियों के मुद्दे अकसर ऊंची जाति के पत्रकारों द्वारा कवर किए जाते हैं, जिन में ज्यादातर पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं. दलित, मुसलिम और आदिवासी पत्रकारों को अंगरेजी या हिंदी मीडिया में प्रवेश मुश्किल से मिलता है.

उद्योगों से भी दूर

वंचित समाज रोजगार के नाम पर असंगठित क्षेत्र की नौकरी, मजदूरी और रेहड़ीपटरी के अलावा दलित, मुसलिम और आदिवासी समाजों के पास कोई औप्शन नहीं होता. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दलित, मुसलिम और आदिवासी कभी उद्योगों के मालिक नहीं बन पाते.

भारत के टौप 100 अमीर उद्योगपतियों में मुसलिम, दलित और आदिवासी की नुमाइंदगी जीरो है. साल 2025 की रिपोर्ट्स (फोर्ब्स और वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब) के मुताबिक टौप 100 उद्योगपतियों में तकरीबन 90 फीसदी ऊपरी जातियों से हैं.

वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब के मुताबिक, एसटी से कोई भी अरबपति नहीं है. कोई आदिवासी उद्योगपति या कोई बड़ा ट्राइबल बिजनैस ग्रुप टौप 100 में नहीं है.

हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025, वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब 2024-25, फोर्ब्स इंडिया रिच लिस्ट के मुताबिक, टौप 1,000 अमीर भारतीयों की सूची में जिन की नैटवर्थ 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हो इन में ऊं जातियों का दबदबा 88.4 फीसदी है. एसटी आबादी (8 फीसदी) के बावजूद कोई आदिवासी उद्योगपति टौप 1,000 में भी नहीं है.

यही हाल मुसलिमों का है. उन की कुल संपत्ति में हिस्सेदारी महज एक फीसदी है और कोई प्रमुख मुसलिम उद्योगपति टौप 1,000 में नहीं है. भारतीय राजनीति में मुसलिम नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में खास रोल अदा किया है. आजादी के बाद भी मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे मुसलिम नेता हुए जिन्होंने मुसलिम समाज की तरक्की पर जोर दिया, लेकिन आज के समय मुसलिम समाज में ऐसे नेता नहीं हैं, जो हाशिए पर खड़े मुसलिम समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में ईमानदारी से कदम बढ़ा सकें.

मौजूदा दौर में मुसलिम समाज के पास असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का जमावड़ा है. फारूक अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, बदरूद्दीन अजमल, अरिफ मोहम्मद खान, उमर फारूक, मौलाना अरशद मदनी जैसे तमाम मुसलिम नेताओं का मुसलिम समाज की तरक्की में कोई खास योगदान नहीं है. इन तमाम नेताओं ने मुसलिम समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और सिर्फ मुसलिमों के नाम पर राजनीति की है.

दलितों को राजनीति सिखाने वाले कांशीराम

कांशीराम भारतीय राजनीति में एक ऐसे दलित नेता थे जिन्होंने डाक्टर भीमराव अंबेडकर के विचारों को अपनाया और हाशिए पर पड़े दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत करने का सपना देखा.

कांशीराम ने ‘बहुजन’ की सोच को लोकप्रिय बनाया जिस में समाज के 85 फीसदी लोग दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, आदिवासी, अल्पसंख्यक शामिल थे. उन का नारा था ‘जाति तोड़ो, समाज जोड़ो’ और ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा’.

कांशीराम ने 1971 में आल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनौरिटी कम्युनिटीज एम्प्लौइज फैडरेशन को बनाया था, जो सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने और दलितपिछड़ा जागरूकता बढ़ाने का मंच था. बाद में 1981 में डीएस-4 दलित शोषित समाज संघर्ष समिति और 1984 में बहुजन समाज पार्टी को बनाया.

कांशीराम का मानना था कि वोट की ताकत से दलितपिछड़े समुदाय सत्ता हासिल कर सकते हैं. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनाया.

कांशीराम ने विभिन्न जातियों और समुदायों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई, जैसे ‘दलितमुसलिम या ‘दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग गठजोड़, ताकि राजनीति में बहुजन समाज की नुमाइंदगी मजबूत हो सके. कांशीराम ने अपने विजन को पूरा कर दिखाया और मायावती 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.

मायावती का राजनीतिक सफर

1977 में कांशीराम पहली बार मायावती के घर पहुंचे थे तब मायावती सिविल सेवा की तैयारी कर रही थीं. कांशीराम ने उन्हें सिविल सेवा छोड़ कर राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. कांशीराम ने तब मायावती से कहा था, ‘‘मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बना दूंगा कि आईएएस अधिकारी तुम्हारे आदेशों के पालन के लिए लाइन लगा देंगे.’’

मायावती ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी के बनने के समय से ही पार्टी में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. 1989 में पहली बार वे बिजनौर से लोकसभा सदस्य चुनी गईं. मायावती की यह जीत दलित राजनीति में एक मील का पत्थर साबित हुआ.

1998-2004 के बीच मायावती अकबरपुर से 3 बार लगातार लोकसभा सांसद रहीं. 15 दिसंबर, 2001 को कांशीराम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और 18 सितंबर, 2003 को मायावती बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं. 3 जून, 1995 को मायावती उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. 2012 तक वे 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं.

इस बीच विचारधारा बदल चुकी थी. विचारधारा के साथ नारा भी बदल गया. ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का नारा अब ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ हो चुका था. दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़ कर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का प्रयास बुरी तरह फ्लौप हो गया और इस के साथ ही कांशीराम की 40 साल की मेहनत भी धूल में मिल गई. तब से बहुजन समाज पार्टी का लगातार पतन ही हुआ.

साल 2004 बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा में 19 सीटें जीतीं थीं. 2014, 2019 और 2024 लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से कोई सीट नहीं मिली. साल 2017 और साल 2022 विधानसभा चुनावों में भी हार मिली. इस तरह एक सामाजिक क्रांति की असमय मौत हो गई.

क्या से क्या हो गए जीतनराम मांझी

जीतनराम मांझी इस समय भाजपा की गठबंधन सरकार में मंत्री हैं और आज भाजपा के हिंदुत्ववादी नैरेटिव का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. यही जीतनराम मांझी 2 साल पहले तक दलितों की आवाज बन कर उभरे थे.

जीतनराम मांझी का राजग में जुड़ने से पहले का इतिहास देखें तो उन्होंने कई बार हिंदू धर्म पर विवादास्पद बयान दिए हैं. उन्होंने 2023 में बक्सर के एक मंच से कहा था कि राम काल्पनिक पात्र हैं और वे उन्हें भगवान नहीं मानते. उन्होंने रामायण को बाल्मीकि और तुलसीदास द्वारा रचित कथा बताया था.

जीतनराम मांझी जोरशोर से यह बात कहते थे कि हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव को चुनौती देना जरूरी है. मांझी ने कहा कि ‘रावण का चरित्र श्रीराम से बड़ा और महान था’. उन्होंने रावण को विद्वान और शासक के रूप में सराहा, जबकि राम को पारंपरिक हिंदू आख्यान का हिस्सा बताया.

इ तना ही नहीं जीतनराम मांझी ने ब्राह्मण प्रधान हिंदू परंपराओं को दलितों के शोषण का माध्यम बताया था. जीतनराम मांझी के इन बयानों से भाजपा और हिंदू संगठन इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने जीतनराम मांझी को ‘धरती पर बोझ’ तक कहा और उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ करार दिया. उन के खिलाफ ब्राह्मणों ने विरोध मार्च निकाला, पुतला फूंका और उन के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ, लेकिन जीतनराम मांझी ने माफी नहीं मांगी और कहा कि वे अपनी बात पर कायम हैं.

इस मामले के बाद बिहार की राजनीति में जीतनराम मांझी शोषित समाज के लिए एक मजबूत आवाज बन कर उभरे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने मंत्री बनने के लालच में अपनी विचारधारा को तिलांजलि दे दी.

रामविलास पासवान मसीहा या अवसरवादी

बिहार में कभी दलितों के सब से बड़े नेता के रूप में रामविलास पासवान को गिना जाता था. रामविलास पासवान 80 और 90 के दशक में सामाजिक न्याय, दलित उत्थान और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले मजबूत नेता के रूप में उभरे थे. वे ‘जय भीम’ का उपयोग संसद और रैलियों में अकसर किया करते थे. यह नारा सामाजिक समानता, संविधान की रक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ उन के संघर्ष का हिस्सा था.

रामविलास पासवान ने 1989 से लोकसभा में ‘जय भीम’ का नारा बुलंद करना शुरू किया. वे संसद में अंबेडकर और बहुजन नेताओं के योगदान को रेखांकित करते हुए इस नारे का इस्तेमाल करते थे. 1991 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के खिलाफ बोलते हुए रामविलास पासवान ने संसद में ऐतिहासिक भाषण दिया था.

इस भाषण में उन्होंने ‘जय भीम’ के साथ सैकुलरिज्म और सोशल जस्टिस की बात की थी. वे बोधगया महाबोधि मंदिर को बौद्धों के नियंत्रण में देने के मुद्दे पर भी सदन में जोरदार भाषण देते हुए ‘जय भीम’ का उच्चारण करते हुए कहते थे, ‘‘मिल कर लड़ेंगे, जीतेंगे, इंकलाब जिंदाबाद, जय भीम.’’

यह नारा रामविलास पासवान के लिए दलितों और वंचितों के सशक्तिकरण की दिशा में उन की स्पष्ट विचारधारा का प्रतीक था. रामविलास पासवान ने मंडल कमीशन लागू कराने, आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट जैसे मुद्दों पर लड़ाई लड़ी. वे खुद को ‘दलितों का रक्षक’ कहते थे और उन का नारा ‘मैं उस घर में दीया जलाने चला हूं, जिस घर में सदियों से अंधेरा था’ दलित उत्थान का प्रतीक बन गया था.

लेकिन बाद के सालों में दलितों के इस मसीहा ने अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर अपनी विचारधारा को तिलांजलि दे दी. रामविलास पासवान लगातार 5 दशकों तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे और इस बीच 6 अलगअलग प्रधानमंत्रियों (चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा, आईके गुजराल और नरेंद्र मोदी) की सरकारों में केंद्रीय मंत्री बने रहे.

रामविलास पासवान ने 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बन कर राजनीति में प्रवेश किया था. 1977 में जनता पार्टी से जुड़ कर वे लोकसभा पहुंचे और 1980 में जनता पार्टी (सैकुलर) से फिर जीते लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे फिर से कांग्रेसी हो गए और कुछ सालों के बाद में वे जनता दल में शामिल हो गए.

रामविलास पासवान मई, 1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार के हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर चुनाव जीते. इस तरह वे छठी बार लोकसभा पहुंचे. जून, 1996 में एचडी देवेगौड़ा की संयुक्त मोरचा सरकार के बनने के बाद वे केंद्रीय रेल मंत्री बने. यह उन का पहला कार्यकाल था जब वे रेल मंत्रालय संभाल रहे थे.

इस दौरान चूंकि एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा सदस्य थे इसलिए लोकसभा में गठबंधन के प्रस्तावों का नेतृत्व रामविलास पासवान ने किया. वे लोकसभा में लीडर औफ हाउस (4 जून, 1996 से दिसंबर, 1997 तक) के रूप में सक्रिय रहे. 1997 में इंद्र कुमार गुजराल की संयुक्त मोरचा सरकार में भी रेल मंत्री बने रहे. इस दौरान रामविलास पासवान ने लालू प्रसाद यादव के साथ बिहार में गठबंधन बनाए रखा.

गुजराल सरकार 1998 की शुरुआत में विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के कारण गिर गई. फरवरीमार्च, 1998 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से हाजीपुर से जनता दल के टिकट  पर जीते. यह उन की 7वीं लोकसभा सदस्यता थी. हालांकि, चुनाव के बाद राजग सरकार बनी, लेकिन तब पासवान ने राजग का समर्थन नहीं किया. इस के बजाय वे विपक्ष में रहे लेकिन ज्ल्दी ही उन्होंने हवा के रुख को पहचान लिया और 1999 में राजग के साथ जुड़े गए.

साल 2000 में उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की और पार्टी के जरीए राजग को समर्थन जारी रखा. इस दौरान वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संचार मंत्री बने और बाद में कोयला और खान मंत्री का पदभार भी संभाला.

2002 के गुजरात दंगों के बाद पासवान ने भाजपा को ‘सांप्रदायिक’ बताते हुए राजग छोड़ दिया. 2004 में कांग्रेस गठबंधन (संप्रग-1) की सरकार बनी और रामविलास पासवान इस गठबंधन में शामिल हो गए. कांग्रेस सरकार में उन्होंने 23 मई, 2004 से 22 मई, 2009 तक रसायन एवं उर्वरक मंत्री तथा स्टील मंत्री के रूप में कार्य किया.

2009 में संप्रग-2 सरकार बनी लेकिन इस गठबंधन में रामविलास पासवान शामिल नहीं हो पाए क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनावों में उन की पार्टी लोजपा ने संप्रग से अलग हो कर चौथे मोरचे (राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी के साथ) के तहत चुनाव लड़ा था और पासवान खुद हाजीपुर से चुनाव हार गए थे.  2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा मजबूत हुई, तो वे फिर से राजग की गोद में जा बैठे.

6 दशकों की राजनीति में रामविलास पासवान ने हमेशा गठबंधन सरकारों में महत्वपूर्ण मंत्रालय हासिल किए. रामविलास पासवान की शुरुआती राजनीति पर गौर करें तो वे सामाजिक न्याय और जातिगत असमानता के लिए लड़ने वाले नेताओं में से एक नजर आते थे, लेकिन उन के पूरे राजनीतिक सफर को देखें तो वे एक घोर अवसरवादी नेता ही साबित होते दिखे.

यही कारण है कि रामविलास पासवान दलित नेता जरूर थे लेकिन दलितों के नेता कभी नहीं बन पाए. उन्होंने कभी बिहार में दलितों के लिए कोई मजबूत आधार नहीं बनाया.

पिता की अवसरवादी राजनीति को आगे बढ़ाते चिराग पासवान

साल 2020 में रामविलास पासवान के न रहने के बाद उन के बेटे चिराग पासवान ने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए अवसरवादी राजनीति का ही सहारा लिया. चिराग पासवान वर्तमान में लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री के रूप में केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.

रा जनीति में आने से पहले चिराग पासवान ने बौलीवुड में कैरियर बनाने की कोशिश की. साल 2011 में उन की पहली फिल्म ‘मिले न मिले हम’ आई लेकिन यह फिल्म बौक्स औफिस पर नाकाम रही. इस नाकामी के बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया.

2014 में चिराग पासवान ने अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और राष्ट्रीय जनता दल के सुधांशु शेखर भास्कर को 85,000 से अधिक वोटों से हराया. इस जीत ने उन्हें बिहार की राजनीति में स्थापित कर दिया.

पिता की तरह चिराग पासवन के पास भी कोई ठोस विचारधारा नहीं है. यही कारण है कि चिराग पासवान ने 2021 में अयोध्या के राम मंदिर निर्माण के लिए 1.11 लाख रुपए दान किए और भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो कर जून, 2024 में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री बन गए.

चिराग पासवान ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में जमुई सीट जीती. 2019 में उन्होंने 55.76 फीसदी वोट शेयर के साथ भुड़ेव चौधरी को हराया. 2020 में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान का निधन हो गया. चिराग ने पिता की राजनीतिक विरासत की कमान संभाली पार्टी और अपनी पार्टी को राजग के साथ मजबूत गठबंधन में बनाए रखा.

रामविलास पासवान की मृत्यु के तुरंत बाद उन की लोजपा के नेतृत्व को ले कर विवाद हुआ. रामविलास पासवान के बड़े भाई पशुपति कुमार पारस ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद हथिया लिया, जिस के बाद लोजपा 2 गुटों में बंट गई. एक चिराग पासवान के नेतृत्व में (लोजपा-रामविलास) और दूसरा पशुपति पारस के नेतृत्व में. इस राजनीतिक बंदरबांट में पार्टी के कई दिग्गज नेता इधरउधर हुए लेकिन इस से चिराग पासवान के राजनीतिक कैरियर पर ज्यादा असर नहीं पड़ा.

2024 के लोकसभा चुनाव में चिराग पासवान ने हाजीपुर (एससी) सीट से चुनाव लड़ा, जो उन के पिता का गढ़ था. इस चुनाव में उन्होंने 53.3 फीसदी वोट शेयर के साथ जीत हासिल की. जून, 2024 में उन्हें मोदी सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री बनाया गया. साल 2014 और साल 2019 में लोजपा ने राजग के साथ मिल कर बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया.

2020 बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चिराग ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जद (यू) के खिलाफ ‘बिहार फर्स्ट’ नीति अपनाई, जिस से लोजपा को नुकसान हुआ. 2024 लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी ने बिहार की 5 सीटें जीतीं जिस से लोजपा तो मजबूत हुई साथ ही राजग भी मजबूत हुआ.

कांग्रेस का दलित कार्ड

इस में कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अपनी शुरुआत से सवर्णों की पार्टी रही है. यही कारण है कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं ने कांग्रेस से दूरी बनाए रखी.

डाक्टर अंबेडकर शूद्रों और अछूतों को हिंदू धर्म से अलग मानते थे. उन का मानना था कि अछूतों को हिंदू धर्म से अलग किए बिना अछूतों की गुलामी दूर नहीं होगी, इसलिए वे लगातार हिंदू धर्म और इस की वर्णव्यवस्था की आलोचना करते थे.

डाक्टर अंबेडकर की यह बात कांग्रेसी नेताओं को हजम नहीं होती थी. अंबेडकर से सहमत न होने वाले कांग्रेस के बड़े नेताओं में मोहनदास करमचंद गांधी भी शामिल थे. डाक्टर अंबेडकर जहां दलितों को हिंदू धर्म से दूर करने की बात करते थे वहीं महात्मा गांधी ने 1930 के दशक में दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर के लोग) कहना शुरू किया. यह कांग्रेस की दलितों के उत्थान का अपना तरीका था.

म हात्मा गांधी चाहते थे अछूतों के लिए समाज में फैली नफरत तो खत्म हो लेकिन जाति व्यवस्था बनी रहे. वहीं डाक्टर अंबेडकर वर्णव्यवस्था को समाज के लिए घातक मानते थे. यही वजह है कांशीराम जैसे नेता कांग्रेस को दलितों का छिपा दुश्मन मानते थे. यह सच है कि कांग्रेस कभी भी दलितों की हमदर्द नहीं रही लेकिन संविधान निर्माण में कांग्रेस के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.

आजादी के बाद कांग्रेस ने डाक्टर अंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन किया. 1950 में लागू भारतीय संविधान ने अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, जिस में शिक्षा, नौकरियों और विधायिकाओं में कोटा तय किया गया. यह कांग्रेस की दलित उत्थान की प्रतिबद्धता का एक खास कदम था.

जवाहरलाल नेहरू ने सामाजिक समानता पर जोर दिया और दलितों को सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनाया जिस से दलितों के सामाजिक और आर्थिक स्तर में सुधार होना शुरू हुआ.

कांग्रेस ने ही 1955 में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम पास किया जिसे 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के रूप में और मजबूत किया गया.

इंदिरा गांधी ने 1970 के दशक में ‘गरीबी हटाओ’ नारे के तहत कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिन का लाभ दलित समुदायों को भी मिला. भूमि सुधार और ग्रामीण विकास जैसी क्रांतिकारी योजनाओं ने दलितों की आर्थिक को मजबूत करने में खास रोल निभाया. 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया. कांग्रेस ने भी इस का समर्थन किया. कांग्रेस की विभिन्न राज्य सरकारों ने दलितों के आरक्षण को और मजबूत किया.

यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कई योजनाएं, जैसे मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, और खाद्य सुरक्षा अधिनियम, लागू की गईं, जिन का लाभ दलित समुदायों को भी मिला.

दलितों के हितों के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस पर अकसर यह आरोप लगता रहा है कि उस ने दलितों के प्रति प्रेम को वोट बैंक की राजनीति के रूप में इस्तेमाल किया.

अंबेडकरवादी संगठनों और कुछ दलित नेताओं ने कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि उस ने दलितों की समस्याओं को पूरी तरह हल करने के बजाय सतही कदम उठाए.

इतिहास में कांग्रेस ने भले ही दलितों के हितों को महत्व न दिया हो लेकिन हाल के सालों में कांग्रेस ने दलितों के मुद्दों को जोरशोर से उठाया है, खासकर रोहित वेमुला आत्महत्या का मामला हो या दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की बात हो राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इन मुद्दों पर अपना विरोध ईमानदारी से दर्ज करवाया है.

यह सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को पूरी तरह रोकने में कांग्रेस की सरकारें पूरी तरह सफल नहीं रहीं लेकिन यह भी सच है की कांग्रेस के शासनकाल में ही दलित आंदोलनों

ने जोर पकड़ा और कांशीराम जैसे दलितों के बड़े नेताओं की राजनीति के लिए जमीन तैयार हुई.

दलितों के मसीहा बाबू जगजीवन राम

बाबू जगजीवन राम का सामाजिक न्याय की लड़ाई में खास योगदान रहा. वे भारत के प्रमुख दलित नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने सामाजिक समानता, दलित उत्थान और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के प्रयास किए.

जगजीवन राम ने दलितों और वंचित वर्गों की आवाज को राष्ट्रीय मंच पर उठाया. वे आजादी के समय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे और वे संविधान सभा के सदस्य भी थे इसलिए उन्होंने दलितों और अन्य वंचित समुदायों के लिए आरक्षण और समानता के प्रावधानों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यही कारण है कि बाबू जगजीवन राम को ‘दलितों के मसीहा’ के रूप में भी जाना जाता है.

अपने शुरुआती जीवन में, बिहार में और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान, उन्हें छुआछूत और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा. इस भेदभाव के विरोध में उन्होंने स्कूल में दलितों के लिए रखे गए अलग घड़े को तोड़ दिया था, जिस के बाद प्रधानाचार्य को उस व्यवस्था को खत्म करना पड़ा. छुआछूत के खिलाफ यह जगजीवन राम की पहली लड़ाई थी. यहीं से उन्हें समाज के एक विशेष वर्ग के खिलाफ अन्यायपूर्ण रवैए के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा मिली.

जगजीवन राम ने दलितों और शोषित वर्गों को संगठित करने के लिए 1934-35 में अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग की स्थापना की में अहम भूमिका निभाई. उन के इस संगठन का उद्देश्य अछूतों को समानता का अधिकार दिलाना था.

कांग्रेस से जुड़ कर जगजीवन राम ने दलितों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास शुरू किया. वे 1936 में बिहार विधानसभा परिषद के सदस्य नामित हुए और बाद में बिहार विधानसभा के लिए चुने गए.

स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कानून बनाए. सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 का निर्माण उन्हीं के प्रयासों का परिणाम माना जाता है, जिस का उद्देश्य छुआछूत को कानूनी रूप से दंडनीय बनाना था.

बाबू जगजीवन राम ने न केवल राजनीतिक और कानूनी स्तर पर, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी दलितों के उत्थान के लिए काम किया. महात्मा गांधी की प्रेरणा से जगजीवन राम ने दलितों के सामूहिक धर्म परिवर्तन को रोका और उन्हें भारतीय समाज की मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए प्रेरित किया.

बाबू जगजीवन राम का योगदान केवल बिहार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के लिए एक मजबूत आवाज बन कर उन के अधिकारों की लड़ाई लड़ी और उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने के लिए अथक प्रयास किए.

बाबू जगजीवन राम भारत के सब से लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे. वे लगातार 30 सालों तक अलग अलग मंत्रालयों में मंत्री रहे. जगजीवन राम ने छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और 1931 में वे कांग्रेस में शामिल हुए. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी से प्रेरित हो कर उन्होंने 10 दिसंबर, 1940 को गिरफ्तारी दी.

1946 से 1952 के बीच जगजीवन राम श्रम मंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने मजदूरों के अधिकारों के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए. 1952 से 1956 के दौरान वे संचार मंत्री रहे और उन्होंने डाक और संचार सेवाओं का विस्तार किया. 1956 से 1962 के दौरान उन्होंने रेल मंत्री के तौर पर रेलवे का आधुनिकीकरण किया. 1967 से 1969 के बीच वे खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे और इस दौरान उन्होंने हरित क्रांति की नींव रखी. 1977 से 1978 के बीच वे उपप्रधानमंत्री रहे.

जगजीवन राम दलितों और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए हमेशा संघर्षरत रहे. 1977 के चुनावों से पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर जनता पार्टी जौइन की, लेकिन बाद में वापस लौट आए. बाबू जगजीवन राम की मृत्यु 6 जुलाई, 1986 को नई दिल्ली में हुई. बाबू जगजीवन राम सामाजिक न्याय, शिक्षा और समानता के प्रतीक थे. उन की बेटी मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला स्पीकर बनीं.

बाबू जगजीवन राम बिहार से निकले हुए नेता थे जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के उसूलों के साथ जुड़े रहे इस बीच दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने ऐतिहासिक काम किए, लेकिन बिहार में जमीनी स्तर पर उन्होंने कोई सामाजिक आंदोलन खड़ा नहीं किया.

कांग्रेस की अलगअलग सरकारों में लगातार 30 सालों तक मंत्री बने रहने के बावजूद बिहार में दलित चेतना को जगाने में बाबू जगजीवन राम का कोई खास योगदान नहीं रहा. अगर बाबू जगजीवन राम जैसे नेता सत्ता सुख को चुनने के बजाय बिहार के जातिगत सामाजिक परिवेश को बदलने के लिए जमीन से जुड़ कर काम करते तो बिहार में बड़ी क्रांति की शुरुआत हो जाती. इस क्रांति से दलितों के अपने नेता निकल कर आते जिस से आज के बिहार में दलितों का भी राजनीतिक नेतृत्व संभव हो जाता.

नेता और मसीहा में फर्क होता है

डाक्टर अंबेडकर अपने समय के नेता ही थे लेकिन आज उन्हें दलितों, शोषितों और वंचित तबकों का मसीहा माना जाता है, क्योंकि उन्होंने सिर्फ राजनीति के लिए राजनीति नहीं की. सिर्फ नेता बनने के लिए चुनाव नहीं लड़ा. वे सिर्फ बंगलागाड़ी के लिए कांग्रेस के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अछूतों के मानसम्मान और अधिकारों के लिए सामाजिक और राजनीतिक लड़ाई लड़ी.

डाक्टर अंबेडकर का पूरा जीवन वंचित तबके को न्याय, समता और सम्मान दिलाने के संघर्ष का प्रतीक है. भारत में उन के बाद दलितों का कोई मसीहा पैदा नहीं हुआ.

यही कारण है की डाक्टर अंबेडकर व्यक्ति नहीं विचारधारा बन गए और इसी विचारधारा पर चल कर भारतीय राजनीति में कई दलित नेता पैदा हुए जिन में कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुए और महान भी बने लेकिन डाक्टर अंबेडकर की तरह मसीहा नहीं बन पाए.

डाक्टर अंबेडकर जैसा मसीहा मुसलिम समाज में कोई पैदा नहीं हुआ. उन्होंने खुल कर हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों की आलोचना की वर्णव्यस्था के खिलाफ आवाज उठाई. ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती दी और इस सोच को पोसने वाले ग्रंथों में आग लगाई. यह एक वैचारिक क्रांति की शुरुआत थी. ऐसी वैचारिक क्रांति करने वाला मसीहा मुसलिम समाज में कभी पैदा नहीं हुआ. राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठ कर मुसलिम समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए जमीनी संघर्ष करने वाले मुसलिम नेता भी कहीं नजर नहीं आते.

दलितों की राजनीति का अंत या शुरुआत

आज के समय मुसलिम, दलित और आदिवासी तबकों का कोई ऐसा नेता फिलहाल नहीं है जो दलितों के न्याय और अधिकारों के लिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके. चंद्रशेखर रावण जैसे दलित नेता भीड़ तो इकट्ठा कर लेते हैं, लेकिन भीड़ तो सिर्फ भीड़ होती है. भीड़ को ले कर कभी क्रांति नहीं हो सकती. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों के जमीन से जुड़े नेताओं के मामले में देश इतना बंजर हो चुका है की फिलहाल दूरदूर तक कोई नजर नहीं आता.

यह देश के 40  फीसदी शोषित, दलित वर्ग के लिए बेहद चिंताजनक हालात हैं. गुजरात के जिग्नेश मेवाणी हों या उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर रावण, ये दोनों नेता युवाओं में काफी लोकप्रिय युवा नेता जरूर हैं लेकिन यह दलितों के मसीहा नहीं बन सकते क्योंकि मसीहा जमीन से जुड़े लोग होते हैं जो कभी हवा में नहीं उड़ते.  Politics

क्या चिराग पासवान का राजनीतिक करियर समाप्त हो गया है?

महाभारत में क्या हुआ था. कौरवों और पांडवों को पहले आपस में लड़वा दिया और फिर सब को मरवा दिया, कुरु वंश को ही समाप्त करा दिया. यह बात दूसरी है कि आज जब तर्क और तथ्य सब को उपलब्ध हैं, अधिकतर हिंदू महाभारत को विशेष धर्मयुद्ध सम झते हैं जिस में कृष्ण ने हिचकिचाते अर्जुन को गीता का पाठ पढ़ा कर परस्पर विरोधी बातें कहते हुए उसे रणक्षेत्र में लड़ने को अंतत: राजी कर ही लिया.

2019 के संसदीय चुनावों में ऐसा सा महाभारत भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ही सहयोगी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के साथ रचा जब लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान को नीतीश कुमार के उम्मीदवारों के सामने खड़ा करवा कर नीतीश कुमार को कमजोर कर दिया और नीतीश कुमार अब भारतीय जनता पार्टी के मोहताज हैं.

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22 जून को चिराग पासवान ने यह माना कि 2019 में उन्होंने जो भी किया वह भाजपा की रजामंदी से किया था. चिराग पासवान को यह रहस्य खोलना पड़ा क्योंकि जैसे पांडवों को हिमालय पर जा कर आत्महत्या करनी पड़ी थी, वैसे ही चिराग पासवान को करनी पड़ रही है क्योंकि उन के सांसद और विधायक छोड़ कर जा रहे हैं पर विपक्ष में नहीं, भारतीय जनता पार्टी या जनता दल (यू) में. चिराग को अनाथ कर के बड़ी चालबाजी से भारतीय जनता पार्टी ने दलित आंदोलन को बिहार में भी कुचल दिया और काफी बड़ी संख्या में होते हुए, वंचित होते हुए भी दलितों को अब किसी ऊंची जाति की जीहुजूरी में फिर से लगना पड़ेगा.

बातें बनाने में तेज और लच्छेदार लुभावने वादों के बलबूतों पर भाजपाई जैसे लोग सदियों से इस देश में राज करते आए हैं. राजनीतिक शासन किसी के हाथ में हो सामाजिक शासन हमेशा इन्हीं के हाथों में रहा है और जन्म से ले कर मृत्यु तक दलितों की तो छोडि़ए, शूद्रों, वैश्यों और क्षत्रियों तक की लगाम इन्हीं लोगों के पास रही. आज थोड़ाबहुत पढ़लिख कर इन्हें गरूर होने लगा था कि हम भी कुछ हैं पर पहले रामविलास पासवान को दलबदलू नंबर एक बना डाला गया और अब उन के पुत्र चिराग पासवान को दलबदल की आग में स्वाहा कर दिया गया है.

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चिराग पासवान अब चाहे जो भी कहते रहें, उन का राजनीतिक कैरियर समाप्त ही है. कोई करिश्मा ही उन का उद्धार कर सकता है.

गहरी पैठ

हाथरस, बलरामपुर जैसे बीसियों मामलों में दलित लड़कियों के साथ जो भी हुआ वह शर्मनाक तो है ही दलितों की हताशा और उन के मन की कमजोरी दोनों को दिखाता है. 79 सांसदों और 549 विधायक जिस के दलित हों, वह भारतीय जनता पार्टी की इस बेरुखी से दलितों पर अत्याचार करते देख रही है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि दलित आवाज नहीं उठाएंगे.

पिछले 100 सालों में पहले कांग्रेसी नेताओं ने और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने जम कर पौराणिक व्यवस्था को गांवगांव में थोपा. रातदिन पुराणों, रामायण, महाभारत और लोककथाओं को प्रवचनों, कीर्तनों, यात्राओं, किताबों, पत्रिकाओं, फिल्मों व नाटकों से फैलाया गया कि जो व्यवस्था 2000 साल पहले थी वही अच्छी थी और तर्क, तथ्य पर टिकी बराबरी की बातें बेकार हैं.

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जिन लोगों ने पढ़ कर नई सोच अपनाई थी उन्हें भी इस में फायदा नजर आया चाहे वे ऊंची जातियों के पढ़े-लिखे सुधारक हों या दलितों के ही नेता. उन्हें दलितों में कम पैसे में काम करने वालों की एक पूरी बरात दिखी जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते थे.

यही नहीं, दलितों के बहाने ऊंची जातियों को अपनी औरतों को भी काबू में रखने का मौका मिल रहा था. जाति बड़ी, देश छोटा की बात को थोपते हुए ऊंची जातियों ने दहेज, कुंडली, कन्या भ्रूण हत्या जम कर अपनी औरतों पर लादी. औरत या लड़की चाहे ऊंची जाति की हो या नीची, मौजमस्ती के लिए है. इस सोच पर टिकी व्यवस्था में सरकार, नेताओं, व्यापारियों, अफसरों, पुलिस से ले कर स्कूलों, दफ्तरों में बेहद धांधली मचाई गई.

हाथरस में 19 साल की लड़की का रेप और उस से बुरी तरह मारपीट एक सबक सिखाना था. यह सबक ऊंची जातियां अपनी औरतों को भी सिखाती हैं, रातदिन. अपनी पढ़ीलिखी औरतों को रातदिन पूजापाठ में उलझाया गया. जो कमाऊ थीं उन का पैसा वैसे ही झटक लिया गया जैसा दलित आदमी औरतों का झटका जाता है. जिन आदमियों को छूना पाप होता है, उन की औरतों, बेटियों के गैंगरेप तक में पुण्य का काम होता है. यह पाठ रोज पढ़ाया जाता है और हाथरस में यही सबक न केवल ब्राह्मण, ठाकुर सिखा रहे हैं, पूरी पुलिस, पूरी सरकार, पूरी पार्टी सिखा रही है.

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दलितों के नेता चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि जिन का उद्धार नहीं हुआ उन्हें तो पाप का फल भोगना होगा. मायावती जैसे नेता तो पहले ही उन्हें छोड़ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी के 79 सांसद और 549 विधायक अपनी बिरादरी से ज्यादा खयाल धर्म की रक्षा के नाम पर पार्टी का कर रहे हैं. दलित लड़कियां तो दलितों के हाथों में भी सुरक्षित नहीं हैं. यह सोच कर इस तरह के बलात्कारों पर जो चुप्पी साध लेते हैं, वही इस आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं.

सरकार की हिम्मत इस तरह बढ़ गई है कि उस ने अपराधियों को बचाने के लिए पीडि़ता के घर वालों पर दबाव डाला और हाथरस के बुलगढ़ी गांव को पुलिस छावनी बना कर विपक्षी दलों और प्रैस व मीडिया को जाने तक नहीं दिया. वे जानते हैं कि जाति शाश्वत है. यह हल्ला 4 दिन में दब जाएगा.

बिहार चुनावों की गुत्थी समझ से परे हो गई है. भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार का साथ भी दे रही है और उसी के दुश्मन चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी से भी मिली हुई है. इस चक्कर में हाल शायद वही होगा जो रामायण और महाभारत के अंत में हुआ. रामायण में अंत में राम के पास न सीता थी, न बच्चे लवकुश, न लक्ष्मण, न भरत. महाभारत में पांडवों के चचेरे भाई मारे भी जा चुके थे और उन के अपने सारे बेटेपोते भी.

लगता है कि हिंदू पौराणिक कथाओं का असर इतना ज्यादा है कि बारबार यही बातें दोहराई जाती हैं और कुछ दिन फुलझड़ी की तरह हिंदू सम्राट का राज चमकता है, फिर धुआं देता बुझ जाता है. बिहार में संभव है, न नीतीश बचें, न चिराग पासवान.

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जो स्थिति अब दिख रही है उस के अनुसार चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार भाजपा की सहयोगी पार्टी सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ उम्मीदवार खड़ी करेगी. वे कितने वोट काटेंगे पता नहीं, पर चिराग पासवान के पास अगर अभी भी दलित व पासवान वोटरों का समर्थन है तो आश्चर्य की बात होगी, क्योंकि चिराग पासवान जाति के नाम पर वोट ले कर सत्ता में मौज उठाने के आदी हो चुके हैं. हो सकता है कि उन्हें एहसास हो गया हो कि नीतीश कुमार निकम्मेपन के कारण हारेंगे तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ गठबंधन करने में आसानी रहेगी और तब वे भाजपा को 2-4 बातों पर कोस कर अलग हो जाएंगे.

जो भी हो, यह दिख रहा है कि कम से कम नेताओं को तो बिहार की जनता की चिंता नहीं है. बिहार की जनता को अपनी चिंता है, इस के लक्षण दिख नहीं रहे, पर कई बार दबा हुआ गुस्सा वैसे ही निकल पड़ता है जैसे 24 मार्च को लाखों मजदूर दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु से पैदल ही बिहार की ओर निकले थे. वह हल्ला का परिणाम था, चुनावों में गुस्से का दर्शन हो सकता है.

बिहार के मुद्दे अभी तक चुनावी चर्चा में नहीं आए हैं. बिहार में बात तो जाति की ही हो रही है. बिहार की दुर्दशा के लिए यही जिम्मेदार है कि वहां की जनता बेहद उदासीन और भाग्यवादी है. उसे जो है, जैसा है मंजूर है, क्योंकि उसे पट्टी पढ़ा दी गई है कि सबकुछ पूजापाठी तय करते हैं, आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं है.

बिहार देश की एक बहुत बड़ी जरूरत है. वहां के मजदूरों ने ही नहीं, वहां के शिक्षितों और ऊंची जाति के नेताओं ने देशभर में अपना नाम कमाया है. बिहार के बिना देश अधूरा है पर बिहार में न गरीब की पूछ है, न पढ़ेलिखे शिक्षित की चाहे वह तिलकधारी हो या घोर नास्तिक व तार्किक. ऐसा राज्य अपने नेताओं के कारण मैलाकुचला पड़ा रहे, यह खेद की बात है और नीतीश कुमार जीतें या हारें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

बिहार में का बा : लाचारी, बीमारी, बेरोजगारी बा

जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के नाम अपने संदेश में लोगों को कोरोना से बचने के लिए आगाह कर रहे थे, उसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार विधानसभा चुनाव के सिलसिले में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उस भीड़ में न मास्क था और न ही आपस में 2 गज की दूरी. इसी साल के मार्च महीने में जब कोरोना की देश में आमद हो रही थी, तब 2,000 लोगों के जमातीय सम्मेलन को कोरोना के फैलने की वजह बता कर बदनाम किया गया था, पर अब बिहार चुनाव में लाखों की भीड़ से भी कोई गुरेज नहीं है.

बिहार चुनाव इस बार बहुत अलग है. नीतीश कुमार अपने 15 साल के सुशासन की जगह पर लालू प्रसाद यादव के 15 साल के कुशासन पर वोट मांग रहे हैं. इस के उलट बिहार के 2 युवा नेताओं चिराग पासवान और तेजस्वी यादव ने बड़ेबड़े दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं.

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बिहार चुनाव में युवाओं की भूमिका अहम है. बिहार में बेरोजगारी सब से बड़ा मुद्दा बन गई है. एक अनजान सी गायिका नेहा सिंह राठौर ने ‘बिहार में का बा’ की ऐसी धुन जगाई है कि भाजपा जैसे बड़े दल को बताना पड़ रहा है कि ‘बिहार में ई बा’ और नीतीश कुमार अपने काम की जगह लालू के राज के नाम पर वोट मांग रहे हैं.

बिहार की चुनावी लड़ाई अगड़ों की सत्ता को मजबूत करने के लिए है. एससी तबके की अगुआई करने वाली लोक जनशक्ति पार्टी को राजग से बाहर कर के सीधे मुकाबले को त्रिकोणात्मक किया गया है, जिस से सत्ता विरोधी मतों को राजदकांग्रेस गठबंधन में जाने से रोका जा सके.

जिस तरह से नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर के पिछड़ों की एकता को तोड़ा गया, अब चिराग पासवान को निशाने पर लिया गया है, जिस से कमजोर पड़े नीतीश कुमार और चिराग पासवान पर मनमाने फैसले थोपे जा सकें.

बिहार चुनाव में अगर भाजपा को पहले से ज्यादा समर्थन मिला, तो वह तालाबंदी जैसे फैसले को भी सही साबित करने की कोशिश करेगी. बिहार को हिंदुत्व का नया गढ़ बनाने का काम भी होगा.

बिहार के चुनाव में जातीय समीकरण सब से ज्यादा हावी होते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहले से ही यहां जातीयता और राजनीति में चोलीदामन का साथ रहा है. 90 के दशक से पहले यहां की राजनीति पर अगड़ों का कब्जा रहा है.

लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीति की दिशा को बदल दिया था. अगड़ी जातियों ने इस के खिलाफ साजिश कर के कानून व्यवस्था का मामला उठा कर लालू प्रसाद यादव के राज को ‘जंगलराज’ बताया था. उन के सामाजिक न्याय को दरकिनार किया गया था.

पिछड़ी जातियों में फूट डाल कर नीतीश कुमार को समाजवादी सोच से बाहर कर के अगड़ी जातियों के राज को स्थापित करने में इस्तेमाल किया गया था. बिहार की राजनीति के ‘हीरो’ लालू प्रसाद यादव को ‘विलेन’ बना कर पेश किया गया था.

भारतीय जनता पार्टी को लालू प्रसाद यादव से सब से बड़ी दुश्मनी इस वजह से भी है कि उन्होंने भाजपा के अयोध्या विजय को निकले रथ को रोकने का काम किया था. साल 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ ले कर भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी निकले, तो उन को बिहार में रोक लिया गया.

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भाजपा को लालू प्रसाद यादव का यह कदम अखर गया था. केंद्र में जब भाजपा की सरकार आई, तो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में उल झाया गया और इस के सहारे उन की राजनीति को खत्म करने का काम किया गया.

लालू प्रसाद यादव के बाद भी बिहार की हालत में कोई सुधार नहीं आया. बिहार में पिछले 15 साल से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस के बाद भी बिहार बेहाल है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव का ‘सामाजिक न्याय’ भी बड़ा मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, पर उन का मुद्दा चुनाव में मौजूद है.

नई पीढ़ी का दर्द

तालाबंदी के बाद मजदूरों का पलायन एक दुखभरी दास्तान है. नई पीढ़ी के लोगों को यह दर्द परेशान कर रहा है. नौजवान सवाल कर रहे हैं कि 15 साल तक एक ही नेता के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी बिहार की ऐसी हालत क्यों है? अब उसी नेता को दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए वोट क्यों दिया जाए?

मुंबई आ कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी रोजीरोटी के लिए तिलतिल मरते हैं. अगर उन के प्रदेशों में कामधंधा होता, रोजीरोटी का जुगाड़ होता, तो ये लोग अपने प्रदेश से पलायन क्यों करते?

फिल्म कलाकार मनोज बाजपेयी ने अपने रैप सांग ‘मुंबई में का बा…’ में मजदूरों की हालत को बयां किया है.  5 मिनट का यह गाना इतना मशहूर  हुआ कि अब बिहार चुनाव में वहां की जनता सरकार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’.

दरअसल, बिहार में साल 2005 से ले कर साल 2020 तक पूरे 15 साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे हैं. केवल एक साल के आसपास जीतनराम मां झी मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ पाए थे, वह भी नीतीश कुमार की इच्छा के मुताबिक.

किसी भी प्रदेश के विकास के लिए 15 साल का समय कम नहीं होता. इस के बाद भी बिहार की जनता नीतीश कुमार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’ यानी बिहार में क्या है?

तालाबंदी के दौरान सब से ज्यादा मजदूर मुंबई से पलायन कर के बिहार आए. 40 लाख मजदूर बिहार आए. इन में से सभी मुंबई से नहीं आए, बल्कि कुछ गुजरात, पंजाब और दिल्ली से भी आए.

ये मजदूर यह सोच कर बिहार वापस आए थे कि अब उन के प्रदेश में रोजगार और सम्मान दोनों मिलेंगे. यहां आ कर मजदूरों को लगा कि यहां की हालत खराब है. रोजगार के लिए वापस दूर प्रदेश ही जाना होगा. बिहार में न तो रोजगार की हालत सुधरी और न ही समाज में मजदूरों को मानसम्मान मिला.

बीते 15 सालों में बिहार की  12 करोड़, 40 लाख आबादी वाली जनता भले ही बदहाल हो, पर नेता अमीर होते गए हैं. बिहार में 40 सांसद और 243 विधायक हैं. इन की आमदनी बढ़ती रही है. पिछले 15 सालों में  85 सांसद करोड़पति हो गए और 468 विधायक करोड़पति हो गए.

मनरेगा के तहत बिहार में औसतन एक मजदूर को 35 दिन का काम मिलता है. अगर इस का औसत निकालें तो हर दिन की आमदनी 17 रुपए रोज की बनती है. राज्य में गरीब परिवारों की तादाद बढ़ती जा रही है.

गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों की तादाद तकरीबन 2 करोड़, 85 लाख है. नीतीश कुमार के 15 सालों में गरीबों की तादाद बढ़ी है और नेताओं की आमदनी बढ़ती जा रही है.

जंगलराज या सामाजिक न्याय

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीतिक और सामाजिक हालत में आमूलचूल बदलाव हुआ. लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा बन कर उभरे. उन के योगदान को दबाने का काम किया गया.

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साल 1990 से साल 2020 के  30 सालों में बिहार पर दलितपिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ राजनीति पर हावी रहा है. अगड़ी जातियों का मकसद है कि  30 सालों में जो उन की अनदेखी हुई, अब वे मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएं.

भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में अगड़ी जातियां काफीकुछ अपने मकसद में कामयाब भी हो गई हैं. बिहार में भाजपा का युवा शक्ति के 2 नेताओं तेजस्वी यादव और चिराग पासवान से सीधा मुकाबला है.

भाजपा के पास बिहार में कोई चेहरा नहीं है, जिस के बल पर वह सीधा चुनाव में जा सके. सुशील कुमार मोदी भाजपा का पुराना चेहरा हो चुके हैं.

विरोधी मानते हैं कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के समय जंगलराज था. जंगलराज का नाम ले कर लोगों को डराया जाता है कि लालू के आने से बिहार में जंगलराज की वापसी हो जाएगी.

राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव कहते हैं, ‘मंडल कमीशन के बाद वंचितों को न्याय और उन को बराबरी की जगह दे कर सामाजिक न्याय दिलाने का काम किया गया था. अब आर्थिक न्याय देने की बारी है.

‘जो लोग जंगलराज का नाम ले कर बिहार की छवि खराब कर रहे हैं, वे बिहार के दुश्मन हैं. इन के द्वारा बिहार की छवि खराब करने से यहां पर निवेश नहीं हो रहा. लोग डर रहे हैं. अब हम आर्थिक न्याय दे कर नए बिहार की स्थापना के लिए काम करेंगे.’

वंचितों के नेता

लालू प्रसाद यादव की राजनीति को हमेशा से जातिवादी और भेदभावपूर्ण बता कर खारिज करने की कोशिश की गई. लालू प्रसाद यादव अकेले नेता नहीं हैं, जिन को वंचितों के हक की आवाज उठाने पर सताया गया हो. नेल्सन मंडेला, भीमराव अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जैसे अनगिनत उदाहरण पूरी दुनिया में भरे पड़े हैं.

लालू प्रसाद यादव सामंतियों के दुष्चक्र के शिकार हुए, जिन की वजह से उन का राजनीतिक कैरियर खत्म करने की कोशिश की गई. इस के बाद भी लालू प्रसाद यादव के योगदान से कोई इनकार नहीं किया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव साल 1990 से साल 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. साल 2004 से साल 2009 तक उन्होंने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यानी संप्रग सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम किया.

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो अदालत ने 5 साल के कारावास की सजा सुनाई. चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें लोकसभा से अयोग्य ठहराया गया.

लालू प्रसाद यादव मंडल विरोधियों के निशाने पर थे. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव ने राम रथ यात्रा के दौरान समस्तीपुर में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया.

मंडल विरोधी भले ही लालू प्रसाद यादव के राज को जंगलराज बताते थे, पर सामाजिक मुद्दे के साथसाथ आर्थिक मोरचे पर भी लालू सरकार की तारीफ होती रही है.

90 के दशक में आर्थिक मोरचे पर विश्व बैंक ने लालू प्रसाद यादव के काम की सराहना की. लालू ने शिक्षा नीति में सुधार के लिए साल 1993 में अंगरेजी भाषा की नीति अपनाई और स्कूल के पाठ्यक्रम में एक भाषा के रूप में अंगरेजी को बढ़ावा दिया.

राजनीतिक रूप से लालू प्रसाद यादव के जनाधार में एमवाई यानी मुसलिम और यादव फैक्टर का बड़ा योगदान है. लालू ने इस से कभी इनकार भी नहीं किया है.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने. उन के कार्यकाल में ही दशकों से घाटे में चल रही रेल सेवा फिर से फायदे में आई.

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भारत के सभी प्रमुख प्रबंधन संस्थानों के साथसाथ दुनियाभर के बिजनैस स्कूलों में लालू प्रसाद यादव के कुशल प्रबंधन से हुआ भारतीय रेलवे का कायाकल्प एक शोध का विषय बन गया.

अगड़ी जातियों की वापसी

राजनीतिक समीक्षक अरविंद जयतिलक कहते हैं, ‘जनता यह मानती है कि राज्य की कानून व्यवस्था अच्छी रहे. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के विरोधियों ने उन की पहचान को जंगलराज से जोड़ कर प्रचारित किया. उन के प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार के राज को सुशासन कहा गया.

‘इसी मुद्दे पर ही नीतीश कुमार हर बार चुनाव जीतते रहे और 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे. लालू प्रसाद यादव ने जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी और जो आर्थिक सुधारों के लिए काम किया, उस की चर्चा कम हुई.

‘लालू प्रसाद यादव की आलोचना में विरोधी कामयाब रहे. बहुत सारे काम करने के बाद भी लालू यादव को जो स्थान मिलना चाहिए था, नहीं मिला.’

बिहार में तकरीबन 20 फीसदी अगड़ी जातियां हैं. पिछड़ी जातियों में 200 के ऊपर अलगअलग बिरादरी हैं. इन में से बहुत कोशिशों के बाद कुछ जातियां ही मुख्यधारा में शामिल हो पाई हैं. बाकी की हालत जस की तस है. इन में से 10 से 15 फीसदी जातियों को ही राजनीतिक हिस्सेदारी मिली है.

1990 के पहले बिहार की राजनीति में कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार प्रभावी रहे हैं. दलितों की हालत भी बुरी है. बिहार की आबादी का 16 फीसदी दलित हैं. अगड़ी जातियों ने दलितों में खेमेबंदी को बढ़ावा देने का काम किया है.

साल 2005 में भाजपा और जद (यू) ने अगड़ी जातियों को सत्ता में वापस लाने का काम किया. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अब नीतीश कुमार को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रही है.

बिहार चुनाव में नौजवान चेहरों ने संभाली कमान

बिहार चुनाव में इस बार नौजवान चेहरों ने धूम मचा रखी है. राजद के तेजस्वी यादव और लोजपा के चिराग पासवान ने तो वर्तमान सत्ता पक्ष की नींद हराम कर दी है. सोशल मीडिया पर नौजवान तबका इस बार के चुनाव में बहुत ज्यादा जोश में है. उम्मीदवारों के साथ नौजवान कार्यकर्ता ज्यादा दिखाई पड़ रहे हैं.

प्लूरल्स पार्टी से इस बार पुष्पम प्रिया चौधरी नौजवान उम्मीदवार हैं. अखबारों में पहले पेज पर इश्तिहार दे कर वे खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी हैं. दिग्गज नेता अपना भविष्य अपने बच्चों में देखने लगे हैं. अपनी राजनीतिक विरासत अपने बच्चों को सौंपने लगे हैं. अपने बच्चों के मोहपाश में फंसे नेता अपने विचार और धारा दोनों भूल कर अपने बच्चों को सियासी गलियारे में उतार चुके हैं.

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पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव की पूरी राजनीति कांग्रेस के खिलाफ रही. वे समाजवादी नेता के रूप में पूरे देश में चर्चित रहे. वे लोकदल, जनता दल से ले कर जद (यू) तक में रहे और कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करते रहे. लेकिन इस बार उन की बेटी सुभाषिनी कांग्रेस का दामन थाम कर बिहारीगंज से चुनाव मैदान में उतर चुकी हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान  का राजनीति में प्रवेश राजग के रास्ते हुआ. राजग के जरीए लोजपा से 2014 और 2019 में चिराग पासवान जमुई से सांसद बने. इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने उसी राजग के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है. जिस विधानसभा क्षेत्र से जद (यू) के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं, चिराग पासवान वहां से लोजपा के उम्मीदवार खड़े कर चुके हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और फिल्म स्टार शत्रुध्न सिन्हा की राजनीति की शुरुआत भाजपा से हुई थी. वे भाजपा के स्टार प्रचारक रहे थे, लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा. उन की पत्नी पूनम सिन्हा 2019 का लोकसभा चुनाव लखनऊ से समाजवादी पार्टी से लड़ी थीं. इस बार उन के बेटे लव सिन्हा बांकीपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

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प्लूरल्स पार्टी की प्रमुख पुष्पम प्रिया चौधरी ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. अपनी पार्टी की वे मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं. उन्होंने साफ कहा है कि चुनाव के बाद उन का किसी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगा. उन के पिता विनोद कुमार चौधरी जद (यू) के पूर्व विधानपार्षद रहे हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी 2015 में राजग के साथ रहे. उस के बाद वे महागठबंधन में चले गए. उन के बेटे संतोष कुमार सुमन को राजद ने विधानपार्षद बनाया. इस के बाद वे फिर राजग में शामिल हो गए. इस बार जीतन राम मांझी इमामगंज और उन के दामाद देवेंद्र मांझी मखदूमपुर से चुनाव लड़ रहे हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह पूरी उम्र राजद में रहे. वे राजद का प्रमुख चेहरा थे. अब उन के बेटे सत्यप्रकाश सिंह ने जद (यू) का दामन थाम लिया है. पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह हमेशा जद (यू) में रहे. उन के बड़े बेटे इस बार रालोसपा के टिकट पर जमुई से चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि छोटे बेटे सुमित सिंह चकाई से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतर रहे हैं.

राजनीति की मलाई का स्वाद चख चुके नेता और उन के बच्चे इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि राजनीति से अच्छा किसी भी क्षेत्र में स्कोप नहीं है, इसलिए तो नेता अपने बेटाबेटी को जिस भी दल से जैसे भी टिकट मिले, दिला देते हैं और जैसे भी हो चुनाव जिता कर सत्ता सुख का फायदा जिंदगीभर उठाते हैं.

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यही वजह है कि सिद्धांत और अपनी विचारधारा पर अडिग रहने वाले लोग राजनीति की मुख्यधारा से किनारे होते जा रहे हैं.

कोरोना का कहर और बिहार में चुनाव

ज्यों ज्यों कोरोना का कहर बिहार में बढ़ते जा रहा है उसी रफ्तार से चुनावी सरगर्मी भी बढ़ रही है. सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एन डी ए और महागठबंधन दोनों में आपसी खींचतान शुरू है. अधिक से अधिक सीट लेने के लिए दोनों गठबंधन में सुप्रीमो पर दबाव बनाना जारी है.

एन डी ए में जद यू ,भाजपा और लोजपा के बीच गठबंधन है. वहीं  महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और वी आई पी के बीच गठबंधन है. दोनों गठबंधन में सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है.

एन डी ए गठबंधन में लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान लगातार नीतीश कुमार पर आरोप लगा रहे हैं.अपने दल के कार्यकर्ताओं से सभी सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयारी करने की बात भी बोल रहे हैं.

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गठबंधन में कई पार्टी भले ही एक दूसरे से टैग हैं. मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भाजपा के सुशील कुमार मोदी, रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा,राजद के तेजस्वी यादव,रालोसपा के चिराग पासवान,हम के जीतन राम माँझी के अंदर भी हिलोरें मार रही हैं.

हम पार्टी के संस्थापक जीतन राम माँझी जो यू पी ए गठबंधन में है. वे इस समय नीतीश कुमार की तारीफ करने लगे हैं. इससे इनके ऊपर भी ऊँगली उठने लगी है. ये किसके तरफ कब हो जायेंगे. कहना मुश्किल है.

महागठबंधन में मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव के पूर्व घोषणा का मामला भी आपस में विवाद का कारण बना हुआ है. सभी दल वाले अधिक से अधिक सीट लेने के लिए दबाव बनाने में लगे हुवे हैं.

गरीबो दलितों और प्रबुद्ध वर्ग के लोग जिस वामपंथी दलों से जुड़े हुवे हैं. जैसे कम्युनिस्ट पार्टी,मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भाकपा माले ये दल भी एन डी ए गठबंधन को हर हाल में हराने के लिए  महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन इनलोगों को महागठबंधन में उतना तवज्जो नहीं दिया जाता.अगर वामपंथी दल आपस में गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ते हैं तो उससे  महागठबंधन को ही घाटा होगा क्योंकि इनका जनाधार महागठबंधन के जो वोटर हैं.उन्हीं के बीच में है.पप्पू यादव का जाप पार्टी भी चुनाव मैदान में आने के लिए कमर कसकर तैयार है.जनता की हर तरह की समस्याओं के निदान के लिए जाप पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव के साथ उनके कार्यकर्ता सक्रिय दिख रहे हैं. महागठबंधन के साथ ये चुनाव लड़ेंगे या अलग अभी तक मामला स्पष्ट नहीं हो सका है. महागठबंधन के वोटर के बीच वोटों का आपस में बिखराव की संभावना अधिक दिख रही है. अगर एन डी ए गठबंधन से अलग सारे दल आपसी ताल मेल से चुनाव लड़ते हैं. तभी वर्तमान सरकार को चुनौती मिल सकती है.

एन डी ए गठबंधन में भाजपा भले ही जद यू के नीतीश कुमार के साथ है. लेकिन भाजपा के समर्थक की हार्दिक इक्षा यही होती है कि मुख्यमंत्री मेरा अपना हो.

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इस चुनाव को लेकर सभी दल डिजीटल माध्यम से प्रचार प्रसार में लगे हुवे हैं. इस खेल में एन डी ए गठबंधन माहिर है.इनके पास संसाधन भी अधिक उपलब्ध है. राज्य चुनाव आयोग से संकेत मिलते ही बिहार की सभी पार्टियाँ चुनाव को लेकर सक्रिय होने लगी है.कोरोना की वजह से राजनीतिक गतिविधि पर रोक है. इस परिस्थिति में सभी दल डिजिटल प्रचार की तैयारी में जुट गए है. बिहार के सभी राजनीतिक दल के लिए चुनौती सिर्फ एक ही है भारतीय जनता पार्टी .सभी दलों को पता है कि डिजिटल प्रचार के मामले में भाजपा को महारत हासिल है. सभी दल वाले इसका काट ढूंढने में लगे हैं.

यह तो स्पष्ट हो गया है कि अगर समय पर चुनाव हुआ तो कोरोना के साये में ही होगा.महामारी के बीच सभी पार्टियाँ डिजिटल माध्यम से प्रचार करने के लिए कमर कसने लगा है. भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता और गृह मंत्री से इस डिजिटल प्रचार का आगाज वर्चुअल रैली के माध्यम से कर चुके हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कार्यकर्ताओं से डिजिटल माध्यम से  संवाद कर चुके हैं. जद यू के महासचिव एवं राज्य सभा सांसद आर सी पी सिंह लगातार सभी संघटनों के साथ फेसबुक लाइव और जूम ऐप के माध्यम से सम्पर्क बनाये हुवे है. जद यू ने अपने तीन मंत्री अशोक चौधरी ,संजय झा और नीरज कुमार को डिजटली मजबूत करने की जिम्मेवारी सौंपी है. इन तीन मंत्रियों को प्रमंडल स्तर की जिम्मेदारी दी गयी है.

सत्तापक्ष के साथ साथ विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. इनकी टीम भी लगी हुवी है. अपने विधयकों को डिजीटल माध्यम से सक्रिय करने का कार्य तेज गति से चल रहा है. कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल और प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा भी कई बार वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अपने कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग कर चुके हैं.

बी जे पी कोरोना संकट के बीच पी एम के आर्थिक पैकेज की घोषणा को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. इसके लिए पार्टी ने पाँच सदस्यीय टीम की घोषणा कर दी है. इसमें उपाध्यक्ष राजेश वर्मा,राजेन्द्र गुप्ता,महामंत्री देवेश कुमार ,मंत्री अमृता भूषण और राकेश सिंह शामिल हैं. ये सभी प्रधानमंत्री के विशेष पैकेज का प्रचार प्रसार हाईटेक तरीके से करेंगे.

प्रवासी मजदूरों के साथ किये गए पुलिसिया जुल्म अत्याचार और अन्याय के खिलाफ विरोधी दल भी आवाज उठायेंगे.

बिहार सरकार द्वारा प्रवासी मजदूरों के साथ की गयी उपेक्षा को नीतीश कुमार किसी रूप से उसपर मरहम लगाना चाहते हैं. जिसका लाभ चुनाव में वोट के रूप में भंजा सकें.देश भर में जब लॉकडाउन की वजह से मजदूर महानगरों में फँस गए तो मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर इंकार कर दिया कि मजदूरों को बाहर से नहीं लाया जाएगा.निराश उदास और मजबूर होकर महानगरों से अपने गाँव के लिए ये मजदूर पैदल सायकिल और ट्रकों में जानवर की तरह अपने गांव लौटे.

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इन मजदूरों के साथ हर जगह पर पुलिस,पदाधिकारी और आमजनों ने भी इनके साथ अमानवीय ब्यवहार किया.यहाँ तक कि इन मजदूरों को एक ब्यक्ति के रूप में नहीं देखकर इन्हें हर जगह कोरोना वायरस के रूप में देखा गया.लोग अपने दरवाजे पर बैठने और चापाकल तक का पानी तक नहीं पीने दिया.नीतीश कुमार अखबारों और टी वी पर ब्यान देते रहे.सभी मजदूरों को रोजगार दिया जाएगा.लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यहाँ पर रोजगार के कोई अवसर और विकल्प नहीं दिख रहा है.

कोरोना काल मे चुनाव नहीं कराने के लिए विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव और लोजपा के युवा नेता चिराग पासवान ने आवाज उठाया है.पक्ष विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप जारी है.अपने अपने दल के नेता टिकट लेने के लिए जुगत भिड़ाने में जोर शोर से जुट गए हैं.

कोरोना के साथ साथ चुनाव की चर्चा पटना से लेकर चौक चौराहों और गांव की गलियों में होने लगा है.

पौलिटिकल राउंडअप : चिराग पासवान का ऐलान

पटना. लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने 3 मार्च को कहा था कि उन की पार्टी किसानों के मुद्दे पर बिहार विधानसभा चुनाव में उतरेगी.

याद रहे कि बिहार में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने वाले?हैं. इसी को ध्यान में रख कर 14 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में होने वाली रैली में लोक जनशक्ति पार्टी का चुनाव घोषणापत्र ‘विजन डौक्यूमैंट 2020’ जारी किया जाएगा. इस में जातपांत मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश का विकास मुख्य मुद्दा होगा.

रजनीकांत का खुलासा

चेन्नई. फिल्म सुपरस्टार रजनीकांत ने 12 मार्च को साफ किया कि तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनने की उन की ख्वाहिश कभी नहीं थी और राजनीति की उन की योजना में भावी पार्टी और उस की अगुआई वाली संभावित सरकार के अलगअलग प्रमुख होंगे.

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याद रहे कि रजनीकांत ने 31 दिसंबर, 2017 को राजनीति में आने का ऐलान किया था और अपनी पहली आधिकारिक प्रैस कौंफ्रैंस में यह भी कहा कि उन की योजना है कि मुख्यमंत्री के तौर पर किसी पढ़ेलिखे नौजवान को आगे किया जाए.

केजरीवाल ने नकारा एनआरसी

नई दिल्ली. केंद्र सरकार के ‘कागज दिखाओ मिशन’ को नकारते हुए दिल्ली विधानसभा में 13 मार्च को एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिया गया.

इस प्रस्ताव पर हुई चर्चा में हिस्सा लेते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार से पूछा कि कोरोना से देश में चिंता बढ़ी है और अर्थव्यवस्था का बुरा हाल हो चुका है. इन समस्याओं से किनारा कर सीएए, एनपीआर, एनआरसी पर जोर क्यों दिया जा रहा है?

उन्होंने केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि अगर सरकार हम से दस्तावेज मांगे तो दिल्ली विधानसभा के 70 में से 61 विधायकों के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है, तो क्या उन्हें डिटैंशन सैंटर में रखा जाएगा?

जिन्हें लग रहा था कि केजरीवाल सरकार के प्रति मुलायम हो गए हैं, उन्हें थोड़ा संतोष हुआ होगा कि वे फिलहाल तो सिर्फ मुठभेड़ी माहौल से बच रहे हैं.

योगी के तीखे तेवर

लखनऊ. नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ किए गए प्रदर्शनों में हुई हिंसा में सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान की भरपाई के लिए आरोपियों की तसवीर वाली

होर्डिंग्स प्रदेश सरकार द्वारा लखनऊ में अलगअलग चौराहों पर लगाई गईं. इस पर नाराज होते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन होर्डिंग्स को हटवाने का आदेश दिया. इस के बाद योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, पर सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछा था कि किस कानून के तहत यह कार्यवाही की गई?

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इस के जवाब में योगी सरकार 13 मार्च को उत्तर प्रदेश रिकवरी औफ डैमेज टू पब्लिक ऐंड प्राइवेट प्रोपर्टी अध्यादेश 2020 ले कर आई, जिसे कैबिनेट से मंजूरी भी मिल गई. इस के तहत आंदोलनोंप्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर कुसूरवारों से वसूली भी होगी और उन के पोस्टर भी लगाए जाएंगे.

यह कानून नितांत लोकतंत्र विरोधी है. भाजपा को पुराणों से मतलब है, संविधान से नहीं. जहां राजा राम शंबूक का गला मरजी के अनुसार काट सकते हैं.

कांग्रेस है डूबता जहाज

रांची. भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और कभी केंद्रीय मंत्री रहे शाहनवाज हुसैन ने 14 मार्च को कहा कि कांग्रेस की बदहाली के लिए खुद कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार है और आज इस की दशा डूबते हुए उस जहाज की तरह हो गई है, जिस पर सवार लोग अपनी जान बचाने के लिए उस में से कूद कर भाग रहे हैं.

शाहनवाज हुसैन ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि कांग्रेस के नौजवानों को यह समझ में आ गया है कि पार्टी नेता राहुल गांधी की अगुआई में न तो उन का भला होने वाला है और न ही देश का भला होने वाला है. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की घर वापसी हुई है. दूसरे प्रदेशों में भी कांग्रेस में भगदड़ मची है.

कांग्रेस में ऊंची जाति वालों या अंधभक्तों की कमी नहीं जो भाजपा के वर्णव्यवस्था वाले फार्मूले में पूरा भरोसा रखते हैं. ये विभीषण हैं.

गहलोत ने केंद्र को कोसा

जयपुर. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 14 मार्च को राजसमंद जिले में आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की गलत नीतियों के चलते देश में अभी मंदी का दौर है. भारत सरकार की गलत नीतियों की वजह से नौकरियां लग नहीं रही हैं… नौकरियां जा रही हैं. ऐसे माहौल में अगर हम लोग ऐसे फैसले करेंगे, जिन का फायदा सब को मिले तो मैं समझता हूं कि आने वाले वक्त में हम लोग स्वावलंबन की तरफ बढ़ सकेंगे.

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अपनी सरकार की तारीफ करते हुए अशोक गहलोत ने कहा कि सरकार राज्य में ढांचागत विकास के साथसाथ पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सड़कों, ऊंची पढ़ाईलिखाई पर खास ध्यान दे रही है.

यूट्यूब चैनल और साजिश

चंडीगढ़. कांग्रेस विधायक नवजोत सिंह सिद्धू ने 14 मार्च को अपना यूट्यूब चैनल ‘जीतेगा पंजाब’ शुरू किया था, पर इस के 2 दिन बाद ही 16 मार्च को चैनल के चीफ एडमिन स्मित सिंह ने दावा किया कि कुछ ‘पंजाब विरोधी ताकतें’ इसी नाम की फर्जी आईडी बना कर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं. ‘जीतेगा पंजाब’ की लौंच के कुछ ही मिनटों के भीतर इसी नाम की सैकड़ों फर्जी यूट्यूब आईडी बन गईं. कुछ पेशेवर लोग जनता के साथ नवजोत सिंह सिद्धू के सीधे जुड़ाव को कम करने में लगे हैं.

इसी गरमागरमी में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने 16 मार्च को ही एक बयान दिया कि उन का अमृतसर के विधायक (नवजोत सिंह सिद्धू) के साथ कोई मसला नहीं है और वे पार्टी में किसी के साथ भी किसी भी मामले पर चर्चा कर सकते हैं.

कांग्रेस हुई कड़ी

अहमदाबाद. राज्यसभा चुनाव से पहले गुजरात कांग्रेस ने 16 मार्च को अपने उन 5 विधायकों को पार्टी से सस्पैंड कर दिया, जिन्होंने हाल ही में विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था. कांग्रेस ने जहां इसे भाजपा की साजिश बताया, वहीं भाजपा ने इन इस्तीफों के पीछे कांग्रेस के कलह को जिम्मेदार बताया. सस्पैंड होने वाले विधायकों में मंगल गावित समेत 4 दूसरे विधायक शामिल थे.

गुजरात की 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास 103 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस के पास 73 विधायक हैं. भारतीय जनता पार्टी अब देशभर में दूसरे दलों के विधायकों को खरीदने में लग गई है.

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