2 दिन तक कोई रिस्पौंस नहीं आया, मगर तीसरे दिन इनबौक्स में उस का मैसेज देखते ही मैं झूम उठी. उस ने अपना मोबाइल नंबर लिख कर रात 8 बजे से पहले बात करने को कहा था. लगभग 7 बजे मैं ने फोन किया. वह भी शायद मेरे ही फोन का इंतजार कर रही थी. फोन उठाते ही अपनी चिरपरिचित शैली में चहक कर बोली, ‘‘हाय फ्रैंडी, कैसी हो? आज अचानक मेरी याद कैसे आ गई? बच्चे और जीजाजी से फुरसत मिल गई क्या?’’
‘‘अरे बाप रे, एकसाथ इतने सवाल? जरा सांस तो ले ले,’’ मैं ने हंसते हुए कहा. फिर उसे उस गाने की याद दिलाई जिसे वह अकसर गुनगुनाया करती थी. सुन कर तनु जोर से खिलखिला उठी. कहने लगी, ‘‘क्या करूं यार, मैं शायद ऐसी ही हूं… बिना आशिकी के रह ही नहीं सकती.’’
‘‘क्या अब तक आशिक ही बदल रही है? तेरे मनमुताबिक कोई परमानैंट साथी नहीं मिला क्या?’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा. ‘‘अरे, तुझे बताया नहीं क्या कभी? मैं ने राजीव से शादी कर ली थी,’’ तनु ने नए राज का खुलासा किया.
‘‘हम मिले ही कब थे जो तुम मुझे बताती? पर मैं बहुत खुश हूं. आखिर मेरी मेनका को विश्वामित्र मिल ही गया,’’ मैं ने अपनी खुशी जाहिर की. ‘‘हां यार. 2 साल तक हम दोनों का रिश्ता रहा. मैं ने उसे अपनी कसौटी पर खूब परखा. इस के लिए मैं ने अपनी सीमाएं लांघ कर उसे फुसलाने की बहुत कोशिश की, मगर वह नहीं फिसला. एक बार तो मुझे शक भी हुआ था कि यह पुरुष है भी या नहीं. कोई लड़की इतनी लिफ्ट दे रही है और ये महाशय ब्रह्मचारी बने बैठे हैं.’’ तनु के शब्दों की गाड़ी चल पड़ी थी. मेरी भी दिलचस्पी अब उस की बातों में बढ़ने लगी थी.
‘‘अच्छा, फिर आगे क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा. ‘‘लगता है राजीव आ गया. बाकी बातें कल करेंगे,’’ कह कर तनु ने मुझ अचंभित छोड़ कर फोन काट दिया.
दूसरे दिन शाम 7 बजे तनु का फोन आया. उस ने कल के लिए सौरी बोला और कहा, ‘‘फोन काटने के लिए सौरी. मगर हम दोनों ने डिसाइड कर रखा है कि घर आने के बाद अपना सारा समय सिर्फ एकदूसरे को ही देंगे.’’ ‘‘यह तो बहुत प्यारी बौंडिंग है तुम दोनों के बीच. खैर सौरीवौरी छोड़, तू तो आगे की स्टोरी बता,’’ मैं ने उसे याद दिलाया.
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अपनी बात आगे बढ़ाते हुए तनु कहने लगी, ‘‘राजीव यों तो मुझ से बहुत प्यार जताता था, मगर जब भी मैं उसे लिफ्ट देती थी वह मुझ से कहता था कि दोस्ती तो ठीक है, मगर वह बिना शादी के जिस्मानी संबंध के पक्ष में नहीं है. वह ऐसे संबंध को अपनी होने वाली पत्नी के साथ विश्वासघात समझता है,’’ तनु ने कहा. ‘‘वैरी गुड. तुम्हें ऐसे ही साथी की तलाश थी,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.
‘‘हां, और फिर हम ने शादी कर ली.’’ ‘‘यानी हैप्पी ऐंडिंग,’’ मैं उस के लिए खुश हो गई.
‘‘नहीं, असली कहानी तो उस के बाद शुरू हुई,’’ तनु थोड़ी झिझकी. ‘‘अब क्या हुआ. क्या राजीव सचमुच पुरुष नहीं था?’’ मेरा मन घबरा उठा.
‘‘वह पक्का पुरुष ही था,’’ तनु ने कहा. ‘‘वह कैसे?’’ मैं ने आशंकित हो कर पूछा.
‘‘हुआ यों कि शादी के साल भर बाद ही मुझे बेचैनी होने लगी. आदतन मेरा मन किसी के प्यार के लिए तड़पने लगा. विवेक जो मेरे विभाग में नया आया था, मेरा मन उस की तरफ खिंचने लगा. उस का केयरिंग नेचर मुझे लुभाने लगा. यह बात भला एक पति और वह भी राजीव जैसे पुरुष को कैसे सहन हो सकती थी,’’ तनु बोली. ‘‘मगर क्यों? क्या राजीव के प्यार में कोई कमी थी?’’ मैं ने आशंकित हो कर पूछा.
‘‘अरे यार समझा कर, जब हम दोस्त को पति बना लेते हैं तो एक अच्छा दोस्त खो देते हैं. बहुत सी बातें ऐसी भी होती हैं जो हम पति से नहीं बल्कि एक दोस्त से ही कह सकते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ. पता नहीं ये लड़के लोग शादी करने के बाद इतने पजैसिव क्यों हो जाते हैं,’’ तनु धीरेधीरे खुल रही थी. ‘‘अच्छा, फिर क्या हुआ’’ मैं ने आदतन जिज्ञासा से पूछा.
‘‘होना क्या था, हमारे बीच दूरियां बढ़ने लगीं. विवेक का जिक्र आते ही जैसे राजीव के चेहरे की रौनक गायब हो जाती थी. उसे मेरा विवेक से मिलना, हंसना, बोलना जरा भी पसंद नहीं था. शादी के बाद गैरमर्द से दोस्ती रखना उस के हिसाब से चरित्रहीनता थी, मगर मैं भी अपने दिल के हाथों मजबूर थी. मैं बिना प्यार के रह ही नहीं सकती.’’ तनु ने कहा. ‘‘फिर?’’
‘‘फिर क्या? एक दिन मैं ने राजीव का हाथ अपने हाथ में ले कर उस से पूछा कि दिल पर हाथ रख कर बताओ कि जब हम दोस्त थे तब वह मेरे चरित्र के बारे में क्या सोचता था? उस ने कहा कि उस ने मुझ जैसे मजबूत इरादों वाली लड़की नहीं देखी और वह मेरी इसी खूबी पर मरमिटा था. बस फिर क्या था. मैं ने उसे समझाया कि शादी से पहले जब मैं इतने लड़कों के साथ दोस्ती कर के भी वर्जिन रही तो अब वह कैसे सोच सकता है कि मेरी दोस्ती में पवित्र भावना नहीं होगी.’’ ‘‘फिर क्या कहा राजीव ने?’’ मेरी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी.
‘‘मैं ने उसे यकीन दिलाया कि जिस वक्त मेरे किसी दोस्त का हाथ मेरे कंधे से नीचे सरकने लगेगा मैं उसी क्षण हाथ झटक दूंगी. मेरे तन और मन पर सिर्फ और सिर्फ उसी का हक है. बस मेरे खुश होने की शर्त शायद यही है कि एक जिगरी दोस्त मेरी जिंदगी में होना ही चाहिए,’’ तनु ने अपनी बात पूरी की. ‘‘फिर?’’
‘‘बस, बात राजीव की समझ में आ गई कि मैं दोस्त के बिना खुश नहीं रह सकती और अगर मैं खुश नहीं रहूंगी तो उसे खुश कैसे रखूंगी,’’ तनु आगे बोली. ‘‘अच्छा.’’ सुन कर मैं उछल पड़ी.
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‘‘इस के बाद उस ने मुझे विवेक से दोस्ती रखने से नहीं रोका और मैं ने भी उस से वादा किया कि जब वह मेरे साथ होगा तब मेरे वक्त पर सिर्फ उसी का अधिकार होगा,’’ तनु ने अपनी बात खत्म की. हम ने आगे भी टच में रहने का वादा करते हुए फोन पर विदा ली. तनु का फोन तो कट गया, मगर मैं अभी भी मोबाइल को कान पर लगाए सोच रही थी कि कितनी साहसी है तनु. सच ही तो कहती है कि कम से कम एक आशिक तो हमारी जिंदगी में ऐसा होना ही चाहिए जो हमें सिर्फ प्यार करे. हमारी हर बुराई के साथ हमें स्वीकार करे. जिस से हम अपनी सारी अच्छीबुरी बातें शेयर कर सकें. पति से
जुड़े राज भी. जिसे हम खुल कर अपनी कमियां बता सकें. हम औरतें जिंदगी भर अपने पति में एक दोस्त ढूंढ़ती रहती हैं, मगर पति पति ही रहता है. वह दोस्त नहीं बन सकता.’’



