छुटकी नहीं…बड़की: भाग -3

उस समय तो हिना ने खामोश रहना ही सही समझा, पर उस के मन में अब छुटकी के लिए वह प्यार नहीं रहा था. कहते हैं कि अच्छा समय बीतते ज्यादा वक्त नहीं लगता. ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ. हिना और फजल के दोनों बच्चे जुनैद और छुटकी साथसाथ बड़े होने लगे और 10 साल कब चले गए, पता ही नहीं चला.

बच्चे तो बच्चे होते हैं, पर इनसान अपना जहर उगलने से कभी बाज नहीं आता. ऐसा ही जहर उगला था हिना की भाभियों, निकहत और रजिया ने. दोनों ने जुनैद को बताया कि छुटकी उस की सगी बहन नहीं है, बल्कि उसे तो सज्जाद मुंशी से गोद लिया गया था.

ऐसा कर के जुनैद के मन में लोगों ने छुटकी के प्रति नफरत और अलगाव डालने की कोशिश की, पर जुनैद के मन में तो अपनी बहन छुटकी के लिए बेशुमार प्यार था और छुटकी भी उस पर जान न्योछावर करती थी.

‘‘अरे, मैं तो तुझे इसलिए पैसे देती हूं कि तू बाहर जा कर अपनी पसंद का जूस पी लिया कर. और तू है कि छुटकी के लिए उन पैसों को बचाबचा कर मिठाई ले आता है? ,’’ हिना ने जुनैद को डांटते हुए कहा.

‘‘पर अम्मी… दोनों साथ मिल कर खाते हैं, तो मजा दोगुना हो जाता है… है न?’’ कह कर हिना के गालों को चूम लिया था जुनैद ने.

जुनैद का छुटकी की तरफ झुकाव हिना को फूटी आंख न सुहाता था. उस का बस चलता तो छुटकी को अब यहां न रहने देती, पर फजल और जुनैद के आगे वह कुछ कह नहीं पाती थी, बस मन मसोस कर रह जाती. शहर में अचानक पीलिया फैल गया था. न जाने कहां से हिना को भी इस बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था. वह कमजोर होने लगी थी. डाक्टर को दिखाया गया, तो उन्होंने दवा के साथसाथ पूरी तरह से उसे आराम करने की हिदायत दी.

हिना को ऐसे समय पर सब से ज्यादा खानेपीने में एहतियात की जरूरत थी, पर निकहत और रजिया ने ऐसे मुश्किल समय में अपने हाथ खींच लिए और अपने बच्चों को भी हिना के कमरे में जाने से रोक दिया, क्योंकि उन का मानना था कि पीलिया छूत की बीमारी है और उन्हें और उन के बच्चों में भी फैल सकती है?

हिना अकेली पड़ गई थी, पर छुटकी अपनी अम्मी की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखती. डाक्टर की दी हुई कौन सी दवा कब देनी है, यह जिम्मा छुटकी ने अपने हाथों में ले रखा था. यहां तक कि अम्मी को उठानेबिठाने का काम भी छुटकी ने बखूबी किया, साथ ही फजल और जुनैद को भी खानेपीने और किसी भी तरह की कोई तकलीफ न होने दी.

दवा के असर से और छुटकी की देखरेख में हिना जल्दी ही ठीक होने लगी. हिना की शरीर की बीमारी के साथसाथ उस के मन की बीमारी भी जाने लगी. हिना के मन में छुटकी के लिए प्यार उमड़ आया और मन ही मन उसे पछतावा हो रहा था.

मैं कितनी खुदगर्ज हो गई थी और छुटकी को पराई लड़की समझ कर पिंड छुड़ा रही थी, पर छुटकी ने अपनी सेवा और प्यार से मेरा मन ही नहीं जीता, बल्कि मुझे एक नई सीख भी दी है, हिना ने सोचा और बोली, ‘‘अरे सुन… अब तू छुटकी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी हो गई है… बड़की है… तू बड़की,’’ हिना ने प्यार से छुटकी को गले लगा लिया था.

जुनैद भी दौड़ कर हिना और छुटकी से लिपट गया. पास में ही फजल खड़ा हुआ मुसकरा रहा था.      

मुहरे- भाग 2: विपिन के लिए रश्मि ने कैसा पैंतरा अपनाया

बटनों से छेड़छाड़ करने पर लिफ्ट 7वीं मंजिल पर बढ़ गई. हमारी लिफ्ट दरवाजों वाली नहीं है, चैनल वाली है, खुली है तो मुझे जरा ठीक लगता है. मैं ने अब उस लड़के पर नजर डाली. 26-27 साल का होगा. वह 7वीं मंजिल पर लिफ्ट से बाहर निकल कर मुसकराया तो आदतन मैं भी मुसकरा दी. मैं ने फिर 3 वाला बटन दबाया और अपने फ्लोर पर पहुंच मुसकराती हुई घर में घुसी. तीनों मेरा ही वेट कर रहे थे.

शाश्वत बोला, ‘‘अरे वाह, पनीर मिल गया?’’ मैं ने हंसते हुए ‘हां’ कहा तो विपिन ने कहा, ‘‘कितनी अच्छी लग रही हो हंसते हुए.’’

मैं मुसकराते हुए ही लिफ्ट में हुई गड़बड़ बताने लगी तो विपिन कुछ गंभीर हो गए. मैं मन ही मन हंसी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा लड़का था.’’

‘‘इतनी जल्दी पता चल गया तुम्हें कि अच्छा लड़का था?’’ विपिन बोले. ‘‘हां, मुझे जल्दी पता चल जाता है,’’ कहते हुए मुझे मजा आया.

वे बोले, ‘‘ध्यान रखा करो, यार… कहां था तुम्हारा ध्यान?’’ मैं मुसकराती रही. 3-4 दिन बाद मैं शाम की सैर से लौट रही थी. वही लड़का फिर मुझे मिल गया. हमारी हायहैलो हुई, बस. 2 दिन बाद मैं फिर सब्जी ले कर लौट रही थी तो वह लिफ्ट में साथ हो गया. उस ने मेरे कुछ कहे बिना लिफ्ट तीसरी मंजिल पर रोक दी. मैं थैंक्स कह बाहर आ गई.

मैं ने उस रात डिनर करते हुए सब को बताया, ‘‘अरे, आज वह लिफ्ट वाला लड़का भी मेरे साथ ही आया तो उस ने खुद ही तीसरी मंजिल पर लिफ्ट रोक दी.’’

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विपिन के चेहरे पर जो भाव आए, उन्हें देख कर मुझे मन ही मन शरारत सूझ गई. मैं ने कई बातें एकसाथ सोच लीं. फिर भोलेपन से पूछा, ‘‘क्या हुआ विपिन? क्या सोचने लगे?’’

वान्या और शाश्वत आराम से खाना खाते हुए हमारी बातें सुन रहे थे. विपिन ने कहा, ‘‘यह फिर कहां से लिफ्ट में मिल गया?’’

‘‘तो क्या हुआ, वह तो मुझे अकसर कहीं न कहीं टकरा ही जाता है… जब एक बिल्डिंग में रहते हैं तो सामना तो होगा ही न.’’ विपिन और मैं डिनर के बाद घूमने जाते हैं. उस दिन भी गए तो वह लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था.. मैं ने उसे देख कर जानबूझ कर हाथ हिला दिया. उस ने भी जवाब दिया.

विपिन ने कहा, ‘‘यह कौन है?’’ ‘‘वही लिफ्ट वाला.’’

बेचारे हायहैलो पर क्या बोलते, उस समय तो चुप ही रहे. घर आ कर जानबूझ कर बच्चों के सामने बोले, ‘‘आज तुम्हारी मम्मी का लिफ्ट वाला दोस्त देखा मैं ने.’’ बच्चे हंसे तो मैं भी मुसकरा दी, ‘‘अरे छोड़ो, कहां से दोस्त होगा वह मेरा, बच्चा है, मेरी उम्र देखो… इस उम्र में उस की उम्र का मेरा क्या दोस्त बनेगा?’’

उन के मुंह से निकल ही गया, ‘‘इतनी उम्र कहां हो गई तुम्हारी?’’ मैं ने चौंकने का अभिनय किया, ‘‘अच्छा? उम्र नहीं हो गई मेरी?’’

विपिन को कुछ न सूझा तो मुझे बहुत मजा आया. उस रात सोने लेटी तो विपिन के आज के चेहरे के भाव पर हंसी आ रही थी. आजकल उम्र की छेड़छाड़ से मुझे कितना परेशान कर रखा है. मुझे तो अब शरारत सूझ ही चुकी थी. जानती हूं मेरी इस शरारत के आगे विपिन टिक नहीं पाएंगे. पर अब सोच रही हूं कि मैं उन के इस मजाक पर इतना चिढ़ती क्यों हूं… स्त्री हूं न… उम्र की बात पर दिल जरा कमजोर पड़ ही जाता है. कौन स्त्री नहीं चाहती हमेशा यंग बने रहना, पर जब मैं मन से स्वयं को यंग और ऐनर्जेटिक महसूस करती हूं तो मैं हर समय यह नहीं सुनना चाहती कि मेरी उम्र हो रही है.

कभी कहीं दर्द हो गया तो उम्र का मजाक, कभी कुछ भूल गई तो उम्र… नहीं सुनना होता मुझे ये सब. अरे, मजाक कुछ और भी तो हो सकते हैं न. उम्र के मजाक और वह भी एक स्त्री से… घोर अपराध. अगले 10-15 दिन मैं ने नोट किया कि अकसर मेरे सैर से लौटने के समय वह लिफ्ट वाला लड़का मुझे नीचे मिलता और मेरे साथ ही लिफ्ट में प्रवेश कर जाता. मेरे दिल ने कहा, यह संयोग नहीं हो सकता. वह जानबूझ कर ऐसा करने लगा है. कभी कोई अन्य व्यक्ति लिफ्ट में होता तो बस मुसकरा देता वरना थोड़ीबहुत बात करता.

मुझे 2-3 बार उस ने यह भी कहा कि मैम, यू आर लुकिंग नाइस. एक दिन उस ने लिफ्ट में मुझ से कहा, ‘‘मैम, मैं प्रशांत, बहुत दिनों से आप का नाम भी जानना चाह रहा था, प्लीज बताएं’’ इतने में तीसरी मंजिल आ गई थी लिफ्ट से निकलते हुए मैं ने कहा, ‘‘रश्मि.’’

उस ने ऊपर जाते हुए ‘‘बाय, मैम’’ कहा. मैं जब अपना नाम बता रही थी वान्या अपने घर का दरवाजा खोल कर बाहर आ रही थी, उस ने मेरा अपना नाम बताना सुन लिया था.’’ पूछा, ‘‘मम्मी, किसे अपना नाम बता रही थीं?’’

‘‘लिफ्ट वाले लड़के को.’’ वान्या ने जिस तरह मुझे देखा उस पर मैं खुल कर हंसी.

‘‘पता नहीं किसकिस से बातें करती रहती हैं आप… अच्छा, मैं नोटबुक लेने जा रही हूं. अभी आई.’’ डिनर के समय वान्या ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं आप को बताना भूल गई. मेरी शर्ट के बटन लगा देंगी अभी?’’

‘‘हां, पर सूई में धागा डाल दो प्लीज. चश्मा लगा कर भी मुझ से धागा नहीं लगाया जाता है.’’

विपिन को एक और मौका मिल गया. बोले, ‘‘हां अब धीरेधीरे चश्मे का नंबर बढ़ेगा ही.’’ ‘‘क्यों पापा, नंबर क्यों बढ़ेगा?’’ वान्या ने पूछा.

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‘‘अरे भई, उम्र के साथ नजर भी कमजोर होती है न.’’ ‘‘पापा अभी इतनी उम्र भी नहीं हुई है मम्मी की… आप ने अभी मम्मी के जलवे नहीं देखे… पड़ोस के लड़के नाम पूछते घूमते हैं.’’

वान्या के कहने के ढंग पर मैं खुल कर हंसी. हम चारों में बेहद शानदार दोस्ती है. हमारे युवा बच्चे हमारे दोस्त हैं, हम एकदूसरे के साथ हंसीमजाक, छेड़छाड़ करते हैं. बस मैं उम्र के मजाक पर गंभीर हो जाती हूं.

विपिन ने पूछा, ‘‘कौन भई?’’ ‘‘लिफ्ट वाला लड़का आज मम्मी से इन का नाम पूछ रहा था.’’

‘‘क्यों? उसे क्या करना है इन के नाम का?’’ मैं ने बहुत ही भोलेपन से कहा, ‘‘जाने दो, बच्चा है… उम्र देखो मेरी.’’

‘‘इतनी भी उम्र नहीं हो रही तुम्हारी.’’ मैं ने फिर हैरानी से आंखें फाड़ी, ‘‘अच्छा?’’ विपिन झेंप गए तो मुझे बड़ी खुशी हुई.

हमारी सोसायटी में स्वीपर सुबह 8 बजे कूड़ा लेने आ जाते हैं. जब वान्या

बौयफ्रैंड पर भरोसा क्राइम नहीं

बौयफ्रैंड को ले कर समाज में एक गलत धारणा बन गई है कि बौयफ्रैंड लड़की के लिए अच्छा नहीं होता है. बौयफ्रैंड रखने वाली लड़कियों को गलत नजर से देखा जाता है. ऐसे में जिन लड़कियों के बौयफ्रैंड होते हैं वे अपराधबोध की भावना में रहती हैं, अपने बौयफ्रैंड को समाज के सामने लाने से कतराती हैं. इस की वजह यह होती है कि घरपरिवार और समाज को लगता है कि बौयफ्रैंड का मतलब यह होता है कि लड़की उस के साथ सैक्स संबंध बना सकती है.

समाज में शादी के पहले सैक्स की आजादी नहीं है. जरूरत इस बात की है कि सैक्स संबंध को बौयफ्रैंड से जोड़ कर न देखा जाए. बौयफ्रैंड को भी उसी नजर से देखा जाए जैसे 2 लड़कियों या 2 लड़कों की दोस्ती को देखा जाता है. बौयफ्रैंड का मतलब यह नहीं होता कि लड़कालड़की सैक्स संबंध बनाने को आजाद हो गए हैं.

समाज जब बौयफ्रैंड को सैक्स संबंधों के साथ जोड़ कर देखने लगता है तो लड़की के बारे में गलत धारणा बन जाती है. इसलिए लड़की में अपराधबोध हो जाता है और वह अपने बौयफ्रैंड को छिपाने लगती है. लड़की जब अपने बौयफ्रैंड को छिपाने लगती है तो कई तरह के अपराध हो जाते हैं. कुछ लड़कियों ने इस संबंध में अपने साथ हुई घटनाओं को बताया है, जिन के जरिए इस परेशानी को आसानी से सम  झा जा सकता है.

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दीपा आज बैंक में जौब करती है. वह बताती है, ‘‘मैं पहले गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी. मैं जब स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर के कालेज में पढ़ने के लिए गई तो पहली बार लड़कों को अपने क्लास में पढ़ते देखा. वहीं मेरी दोस्ती प्रताप के साथ हुई, जिसे आप मेरा बौयफ्रैंड कह सकते हैं. मेरी दोस्ती कई लड़कों से थी पर प्रताप कुछ खास था जिस से मैं निजी बातें शेयर करती थी.

‘‘एक दिन हम लोग होटल में खाना खाने गए. वहीं हमारे एक रिश्तेदार ने हमें देख लिया. मेरे घर तक यह बात पहुंच गई कि मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ होटल गई थी. हम शहर के रहने वाले थे. इस के बाद भी मु  झे घर में पहुंच कर तमाम तरह की बातें सुननी पड़ीं. जैसे, मेरा पढ़ने में मन नहीं लग रहा, अब मेरी शादी हो जानी चाहिए, मैं अपना कैरियर खराब कर रही हूं वगैरहवगैरह. ऐसी न जाने कितनी बातें सुननी पड़ीं.

‘‘मैं दोतीन दिन कालेज नहीं गई. इस के बाद यह बात मैं ने अपनी टीचर को बताई. वे हम लोगों को मनोविज्ञान पढ़ाती थीं. उन्होंने मेरी बात को सम  झा, प्रताप से बात की. इस के बाद मेरे और प्रताप के पेरैंट्स को बुला कर बात की. सब को सम  झाया कि जैसा आप लोग सम  झ रहे हो, वैसा नहीं है. दोनों अच्छे दोस्त हैं.

‘‘मेरे और प्रताप के परिवार वालों ने बात को सम  झा. घर वालों का समर्थन मिला. तब हमारा भी हौसला बढ़ा. हम अपराधबोध की भावना से बाहर निकल आए. इस के बाद हम ने आगे की पढ़ाई पूरी की. प्रताप का मेरे घर आनाजाना हो गया. मैं उस के घर आनेजाने लगी. हमारे घर वालों को यह लगा कि शायद हम आपस में शादी भी कर सकते थे. लेकिन हम ने खुद कभी इस बारे में नहीं सोचा था.

‘‘हमारे बीच ऐसा कोई संबंध नहीं था. हम ने बैंक में नौकरी की और प्रताप सांइटिस्ट बन गया. हम ने अलगअलग शादी की. आज भी हम आपस में बहुत अच्छे दोस्त हैं. एकदूसरे से मिलते हैं. मैं सोचती हूं कि अगर हमारी मनोविज्ञान वाली टीचर ने सही तरह से रास्ता नहीं दिखाया होता तो शायद बौयफ्रैंड को ले कर अपराधबोध में फंस जाती और प्रताप जैसे अच्छे दोस्त को खो देती.’’

हर बौयफ्रैंड धोखा नहीं देता

यह बात सही है कि अधिकतर युवा इस उम्र में सैक्स के आकर्षण में एकदूसरे के करीब आते हैं. ऐसे में पेरैंट्स और टीचर की जिम्मेदारी यह होती है कि वे इस बारे में लड़कियों को सजग रखें. बौयफ्रैंड बनाने में दिक्कत नहीं है. दिक्कत तब होती है जब आपस में सैक्स संबंध बन जाते हैं और गलती से बिना शादी के गर्भ ठहर जाता है.

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लड़के और लड़कियों दोनों को ऐसे हालात से बचना चाहिए. अगर वे इस के प्रति सजग रहते हुए दोस्ती करते हैं तो बौयफ्रैंड रखने में कोई बुराई नहीं है. इस को ले कर लड़कियां अपराधबोध में न पड़ें. हर बौयफ्रैंड धोखा नहीं देता. जरूरत सजग रहने की होती है. कई बार लोग दोस्ती, रिश्तेदारी में धोखा खा जाते हैं. इस का मतलब यह नहीं होता कि वे दोस्ती, रिश्तेदारी करना छोड़ दें.

हमारे समाज में सैक्स शिक्षा का अभाव है. इस वजह से लड़कियां यह नहीं सम  झ पातीं कि उन को किस लैवल तक छूट देनी चाहिए. कई बार लड़कियां गलत संगत में पड़ जाती हैं, अपना बुराभला नहीं सम  झ पातीं. इस कारण वे गलती कर बैठती हैं. इस तरह की घटनाएं ज्यादातर नशे की हालत में होती हैं.

इस के अलावा जब बौयफ्रैंड का चुनाव करने में गलती हो जाए तो भी दिक्कत होती है. वैसे लड़कियों में एक ‘सिक्स्थ सैंस’ होती है, जो उन्हें गलत कदम उठाने से रोकती है. कई बार नशे या धोखे में लड़कियां इस सिक्स्थ सैंस के अलार्म को सम  झ नहीं पातीं या इस की जानबू  झ कर अनदेखी कर देती हैं. यहीं से दिक्कत शुरू होती है. दिक्कत बौयफ्रैंड रखने में नहीं होती, गलती उस के साथ सैक्स संबंध बनाने के कारण होती है. ऐसे में शादी से पहले इस से बचें.

जरूरत बनते जा रहे बौयफ्रैंड

आज के समय में लड़कियां अपना कैरियर बनाने के लिए गांव, घर और अपने शहर से दूर पढ़ने जाती हैं. कई बार कालेज दूर होता है. अकेले आनाजाना पड़ता है. अकेली लड़की के लिए दिक्कतें होती हैं. रात में भी गली, सड़क और महल्ले में अंधेरे में खतरे हो सकते हैं.

ऐसे में अगर किसी कोचिंग से पढ़ कर वापस लौट रही लड़की के साथ कोई लड़का होता है तो उसे डर नहीं लगता. उस का हौसला बढ़ा रहता है. कोई अपराधी उस के साथ अपराध करने की हिम्मत नहीं कर पाता. यह जरूरी नहीं कि लड़का ‘हीमैंन’ या ‘हीरो’ जैसा ही हो. साधारण लड़के के भी साथ रहने से हौसला रहता है. सुरक्षा का जो काम कई बार भाई नहीं कर पाता, वह बौयफ्रैंड कर देता है. ऐसे में बौयफ्रैंड से खतरा नहीं, बल्कि सुरक्षा ही होती है.

अब समाज में ऐसे कानून बने हैं जिन के तहत लड़की की शिकायत करना लड़के पर भारी पड़ जाता है. ऐसे में बौयफ्रैंड आमतौर पर गलत हरकत करने की हिम्मत नहीं करता है. अपराध करने वाले लोग अनजान ही होते हैं. लड़कियों को अनजान लोगों के साथ संबंध नहीं रखने चाहिए. उन के साथ सुनसान जगह नहीं जाना चाहिए और कभी भी नशे वाली पार्टी में नहीं जाना चाहिए. आजकल नशे के ऐसे सामान मिलने लगे हैं जिन का सेवन करने से इंसान के सोचनेसम  झने व विरोध करने की क्षमता खत्म हो जाती है. इस तरह के हालात से लड़कियों को बचना चाहिए. बौयफ्रैंड रखने में कोई बुराई नहीं है, जरूरत इस बात की है कि बौयफ्रैंड के साथ संबंधों की सीमाओं को सम  झें. सीमाओं से बाहर जाना मुश्किल खड़ी कर देता है. बौयफ्रैंड इस से अलग नहीं होता है.

मनोविज्ञानी सुप्रीति बाली कहती हैं, ‘‘बौयफ्रैंड को ले कर कभी अपराधबोध न पालें. ऐसे रिश्तों के बारे में अपने घरपरिवार को बता कर रखें. ऐसे में उन का किसी बाहर वाले से जब इस का पता चलेगा तो उन को बुरा नहीं लगेगा. वे बात को सही तरह से सम  झ सकेंगे तो अगर समाज कुछ बुराभला भी कहेगा तब भी वे आप के साथ खड़े होंगे. समाज भी फिर उंगली नहीं उठा सकेगा.

‘‘बौयफ्रैंड को ले कर लड़की को तब अपराधबोध होता है जब घरपरिवार को जानकारी नहीं होती. वहीं से दिक्कतें शुरू होती हैं. अगर बौयफ्रैंड के साथ अपने रिश्तों को छिपाए नहीं तो परेशानी नहीं खड़ी होगी. बौयफ्रैंड को जब यह पता होता है कि उस के बारे में सब को पता है तो उस की भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है.’’

सत्य असत्य- भाग 1: क्या था कर्ण का असत्य

कर्ण के एक असत्य ने सब के लिए परेशानी खड़ी कर दी. जहां इसी की वजह से हुई निशा के पिता की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया, वहीं खुद कर्ण पछतावे की आग में सुलगता रहा. पर निशा से क्या उसे कभी माफी मिल सकी?

घर की तामीर चाहे जैसी हो, इस में रोने की कुछ जगह रखना.’ कागज पर लिखी चंद पंक्तियां निशा के हाथ में देख मैं हंस पड़ी, ‘‘घर में रोने की जगह क्यों चाहिए?’’

‘‘तो क्या रोने के लिए घर से बाहर जाना चाहिए?’’ निशा ने हंस कर कहा.

‘‘अरे भई, क्या बिना रोए जीवन नहीं काटा जा सकता?’’

‘‘रोना भी तो जीवन का एक अनिवार्य अंग है. गीता, अगर हंसना चाहती हो तो रोने का अर्थ भी समझो. अगर मीठा पसंद है तो कड़वाहट को भी सदा याद रखो. जीत की खुशी से मन भरा पड़ा है तो यह मत भूलो, हारने वाला भी कम महत्त्व नहीं रखता. वह अगर हारता नहीं तो दूसरा जीतता कैसे?’’

निशा के सांवले चेहरे पर बड़ीबड़ी आंखें मुझे सदा ही भाती रही हैं, और उस से भी ज्यादा प्यारी लगती रही हैं मुझे उस की बातें. हलके रंग के कपड़े उस पर बहुत सजते हैं.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘ये मशहूर शायर निदा फाजली के विचार हैं और मैं इन से पूरी तरह सहमत हूं. गीता, यह सच है, घर में एक ऐसा कोना जरूर होना चाहिए जहां इंसान जी भर कर रो सके.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है, जैसे घर में रसोईघर, सोने का कमरा, अतिथि कक्ष, क्या वैसा ही? मगर इतनी महंगाई में कैसे होगा यह सब? सुना है, राजामहाराजा रानियों के लिए कोपभवन बनवाते थे. क्या तुम भी वैसा ही कोई कक्ष चाहती हो?’’

शायद मेरी बात में छिपा व्यंग्य उसे चुभ गया. उस ने किताबें संभालीं और उठ कर चल दी.

मैं ने उसे रोकना चाहा, मगर वह रुकी नहीं. पलभर को मुझे बुरा लगा, लेकिन जल्द ही नौर्मल हो गई.

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मैं एमए के बाद बीएड कर रही थी. इसी सिलसिले में निशा से मुलाकात हो गई थी. पहली ही बार जब वह मिली, तभी इतनी अच्छी लगी थी कि कहीं गहरे मन में समा सी गई थी. पिता के सिवा उस का और कोईर् न था. पिता ही उस के सब थे. मैं उन से मिली नहीं थी, परंतु उन के बारे मैं इतना कुछ जान लिया था, मानो बहुतकुछ देखापरखा हो.

निशा के पिता विज्ञान के प्राध्यापक थे. लगभग 6 माह पहले ही उन का दिल्ली स्थानांतरण हुआ था.

‘‘आप इस से पहले कहां थीं?’’ एक दिन मैं ने पूछा तो वह बोली, ‘‘जम्मू.’’

‘‘बड़ी सुंदर जगह है न जम्मू. कश्मीर भी तो एक सुंदर जगह है. वहां तो तुम लोग जाती ही रहती होगी?’’

‘‘हां, बहुत सुंदर. कश्मीर तो अकसर जाते रहते हैं.’’

‘‘मगर तुम तो कश्मीरी नहीं लगतीं?’’

‘‘जानती हूं, दक्षिण भारतीय लगती हूं न, सभी हंसते हैं, पता नहीं क्यों. शायद मेरी मां सांवली होंगी. मगर मेरे पिता तो बहुत सुंदर हैं, कश्मीरी हैं न.’’

‘‘तुम्हारे भाईबहन?’’

‘‘कोई नहीं है. मैं और मेरे पिता, बस.’’

मां की कमी उसे खलती हो, ऐसा मुझे कभी नहीं लगा. वह मस्तभाव से हर बात करती थी.

एक दिन मेरे बड़े भैया ने मुझ से कहा, ‘‘कभी उसे घर लाना न, निशा कैसी है, जरा हम भी तो देखें.’’

‘‘अच्छा, लाऊंगी, मगर तुम इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हो?’’ भाई को तनिक छेड़ा तो पिताजी ने कहा, ‘‘अरे भई, दिलचस्पी लेने की यही तो उम्र है.’’

कहकहों के बीच एक भीनी सी इच्छा ने भी जन्म ले लिया था कि क्यों न मैं उसे अपनी भाभी ही बना लूं. वैसे है तो सांवली, लेकिन हो सकता है, भैया को पसंद आ जाए. हां, मां का पता नहीं, उन का गोरीचिट्टी बहू का सपना है, क्या पता वे इस लोभ से ऊपर न उठ पाएं.

उसी दिन से मैं उसे दूसरी ही नजर से देखने लगी थी. कल्पना में ही उसे भैया की बगल में बिठा कर दोनों की जोड़ी कैसी लगेगी. गुलाबी जोड़े में कैसी सजेगी निशा, कैसी प्यारी लगेगी.

‘गीता, क्या देखती रहती हो?’ अकसर निशा के टोकने पर ही मेरी तंद्रा भंग होती थी.

‘कुछ भी तो नहीं,’ मैं हौले से कह उठती.

एक दिन मैं ने उस से कहा, ‘‘हमारे घर चलोगी? तुम्हें सब से मिलाना चाहती हूं. चलो, मेरे साथ.’’

‘‘नहीं गीता, पिताजी को अच्छा नहीं लगता. फिर इस शहर में हम नए हैं न, किसी से इतनी जानपहचान कहां है, जो…’’

‘‘क्या मेरे साथ भी जानपहचान नहीं है?’’

‘‘कभी पिताजी के साथ ही आऊंगी, उन के बिना मैं कहीं नहीं जाती.’’

एक दिन मैं उस के साथ उस के घर चली गई. वे विश्वविद्यालय की ओर से मिले आवास में रहते थे.

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उन लोगों के पास 2 चाबियां थीं. घर पहुंचने पर द्वार उसे खुद ही खोलना पड़ा, क्योंकि उस के पिता अभी नहीं आए थे. पर सुंदर, व्यवस्थित घर में मैं ने उन का चित्र जरूर देख लिया. सचमुच वे बहुत सुंदर थे. किसी भी कोने से वे मुझे उस के पिता नहीं लगे, मगर बालों की सफेदी के कारण विश्वास करना ही पड़ा.

उस ने कहा, ‘‘पिताजी को फोन कर के बुला लूं. आज तुम पहली बार आई हो?’’

‘‘नहीं निशा, क्या यह अच्छा लगेगा कि मेरी वजह से वे काम छोड़ कर चले आएं? मैं फिर कभी अपने पिताजी के साथ आ जाऊंगी. दोनों में दोस्ती हो गई तो तुम्हें हमारे घर आने से नहीं रोकेंगे न.’’

‘घर में रोने को एक कोना उसे क्यों चाहिए? क्या उस के पिता ने किसी वजह से डांट दिया?’ घर आ कर भी मैं देर तक यह सोचती रही.

एक शाम भैया को

घर में प्रवेश करते

देखा तो कह दिया, ‘‘मेरे साथ निशा के घर चलो भैया, आज वह बहुत उदास थी. पता नहीं उसे क्या हो गया है.’’

‘‘तुम गौर से सुन लो, आइंदा उस से कभी मत मिलना. वह अच्छे चरित्र की लड़की नहीं है.’’

‘‘भैया,’’ मैं चीख उठी.

‘‘तुम उस के बहुत गुणगान करती थीं. अपने बाप के बिना वह कहीं जाती नहीं. अरे, दस बार तो मैं उसे एक लड़के के साथ देख चुका हूं.’’

‘‘लेकिन,’’ मैं भाई के कथन पर अवाक रह गई. फिर सोचते हुए पूछा, ‘‘आप ने निशा को कब देखा? जानते भी हो उसे?’’

‘‘जब से घर में उस के गुण गा रही हो, तभी से उसे देख रहा हूं.’’

‘‘कहां?’’

‘‘वहीं कालेज के बाहर. जब वह अपने घर जाती है, तब.’’

‘‘क्यों देखते रहे उसे?’’

‘‘झक मारता रहा, बस. और क्या कहूं,’’ भैया पैर पटक कर भीतर चले गए.

घर में मां और पिताजी नहीं थे, इसीलिए तमतमाई सी पीछे जा पहुंची, ‘‘आप सड़कछाप लड़कों की तरह उस का पीछा करते रहे? क्या आप अच्छे चरित्र के मालिक हैं? वाह भैया, वाह.’’

‘‘तुम ने ही कहा था न कि वह जहां जाती है, अपने पिता के साथ जाती है. यहां तक कि यहां तुम्हारे साथ भी नहीं आई.’’

‘‘हां, मैं ने कहा था, लेकिन यह तो नहीं कहा था कि…लेकिन आप इतने गंभीर क्यों हो रहे हैं? क्या वह किसी के साथ आजा नहीं सकती. भैया, आखिर उसे चरित्रहीन कहने का आप को क्या हक है?’’

‘‘हक क्यों नहीं है. मैं…मैं उसे पसंद करने लगा था. वह मुझे भी उतनी ही अच्छी लगती रही है, जितनी कि तुम्हें. पिछले कई हफ्तों से मैं उस पर नजर रख रहा हूं. वह लड़का उस के घर उस से मिलने भी जाता है. मैं ने कई जगह दोनों को देखा है.’’

पहली बार लगा, मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई. अगर उस का किसी के साथ प्रेम है भी, तो मुझे बताया क्यों नहीं.

मैं ने तनिक गुस्से में कहा, ‘‘भैया, अपने शब्द वापस लो. प्रेम करने और चरित्रहीन होने में जमीनआसमान का अंतर है. वह चरित्रहीन नहीं है.’’

‘‘कैसे नहीं है? तुम ने कहा था न.’’

‘‘मेरी बात छोड़ो. मैं तो यह भी कह रही हूं कि वह अच्छी लड़की है. मात्र मेरी बातों का सहारा मत लो. अपनी जलन को कीचड़ बना कर उस के चरित्र पर मत उछालो.’’

इतना सुनते ही भैया खामोश हो गए.

मैं निशा को ले कर बराबर विचलित रही. 2-3 दिन बीत गए, पर वह कालेज नहीं आई. मैं ने बहुत चाहा कि उस के घर जा कर उस युवक के विषय में पूछूं, पर हिम्मत ही न हुई.

?एक रात फोन की घंटी घनघना उठी.

?फोन निशा का था और वह

अस्पताल से बोल रही थी. उस के पिता को दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा था. भैया मेरे साथ उसी समय अस्पताल गए.

निशा के पिता आपातकक्ष में थे. हम उन्हें देखने भीतर नहीं जा सकते थे. मुझे देखते ही वह जोरजोर से रोने लगी. उन के पड़ोसी प्रोफैसर सुदीप चुपचाप पास खड़े थे.

दूसरे दिन सुबह भैया ने कहा था कि मैं निशा को अपने साथ घर ले जाऊं. पर वह हड़बड़ा गई, ‘‘नहीं गीता, मैं पिताजी को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

निशा के मना करने पर भैया ऊंची आवाज में बोले, ‘‘यहां बैठ कर रोनेधोने से क्या वे जल्दी अच्छे हो जाएंगे? जाओ, घर जा कर कुछ खापी लो. मैं यहीं हूं. पिताजी से कह देना, आज छुट्टी ले लें. जाओ, तुम दोनों घर चली जाओ.’’

वह मेरे साथ घर आईर् तो पिताजी ने कहा, ‘‘घबराना नहीं बेटी, यह मत सोचना कि तुम इस शहर में अकेली हो. हम हैं न तुम्हारे…’’

मेरे मन में बारबार प्रश्न उठता रहा कि आखिर इस संकट की घड़ी में निशा का वह मित्र कहां गायब हो गया? क्या वह मात्र सुख का साथी था?

निशा ने नहा कर मेरी गुलाबी साड़ी पहन ली. मेरा मन भर आया कि काश, निशा मेरी भाभी बन पाती.

मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं? मुझे भैया की आंखों में बसी पीड़ा याद आने लगी.

बरामदे से मां का बिस्तर साफ दिख रहा था. सर्दी में निशा सिकुड़ी सी सोई थी. भीतर जा कर मैं ने उस के ऊपर लिहाफ ओढ़ा दिया.

नहा कर और नाश्ता कर के मैं भी अपने कमरे में जा लेटी. भैया अभी तक घर नहीं लौटे थे. थोड़ी देर बार मेरी पलकें मुंदने लगीं. परंतु शीघ्र ही ऐसा लगा, जैसे कोई मुझे पुकार रहा है, ‘गीता…गीता…उठो न.’’

सहसा मेरी नींद खुल गई. लेकिन मेरी हड़बड़ाहट की सीमा न रही. वास्तव में जो सामने था, वह अविश्वसनीय था. सामने द्वार पर भैया पगलाए से खड़े थे और मेरी पीठ के पीछे निशा छिपने का प्रयास कर रही थी. फिर किसी तरह बोली, ‘‘मेरे पैर पकड़ रहे हैं तुम्हारे भैया. कहते हैं, वे मेरे दोषी हैं. पर मैं ने तो इन्हें पहले कभी नहीं देखा.’’

‘‘गीता, मुझ से घोर ‘पाप’ हो गया. मुझे माफ कर दो, गीता,’’ भैया ने डबडबाई आंखों से मेरी ओर देखा.

सहमी सी निशा कभी मुझे और कभी उन्हें देख रही थी. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘आप ने मेरा क्या बिगाड़ा है जो इस तरह क्षमायाचना…मेरे पिताजी को कुछ हो तो नहीं गया?’’

भैया गरदन नहीं उठा पाए. निशा के पिता का निधन हो चुका था. कैसे कहूं, क्याक्या बीत गया उन 3 दिनों में. मेरे पिता और भाई शव के साथ जम्मू चले गए. वहीं उन के नातेरिश्तेदार थे. पत्थर सी निशा भी साथ गई. एक अध्याय जैसे समाप्त हो गया.

कई दिनों तक घर का माहौल बोझल बना रहा. फिर धीरेधीरे सब सामान्य हो गया. परंतु भैया सामान्य नहीं हो पाए. कई बार मैं सोचती, उन से पूछूं कि उन्होंने खुद को निशा का दोषी क्यों कहा था?

लगभग 15-20 दिन बीत गए थे. एक शाम आंगन में भैया का बदलाबदला स्वर सुनाई दिया, ‘‘अरे निशा, आओ…आओ…’’

हाथ में अटैची पकड़े सामने निशा ही तो खड़ी थी. मां और पिताजी ने प्रश्नसूचक भाव से पहले मेरा मुंह देखा और फिर एकदूसरे का. मैं बढ़ कर उस का स्वागत करती, इस से पहले ही भैया ने उस के हाथ से अटैची ले ली.

‘‘आओ निशा, कैसी हो?’’ मैं ने पूछा तो वह मेरे गले से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी.

मां और पिताजी ने उसे बड़े स्नेह से दुलारा.

थोड़ी देर बाद निशा आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘गीता, मेरे पिताजी को किसी ने मुझ से अलग कर दिया. पता नहीं कौन उन्हें फोन कर के यह कहता रहा कि मैं उन से छिप कर किसी से मिलती हूं. भला किसी को मुझ से क्या दुश्मनी होगी? मैं ने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा. मुझे किस अपराध की सजा मिली?’’

रोतेरोते उस की हिचकी बंध गई. सहसा मेरे मन में एक सवाल उठा कि कौन था वह जिस के साथ भैया ने उसे देखा था? किसी तरह मां ने उसे शांत किया. मैं चाय, नाश्ता ले आई. भैया गुमसुम से सामने बैठ रहे.

निशा को बीएड की परीक्षाएं तो देनी ही थीं, उसी संदर्भ में उस ने पूछा, ‘‘क्या मैं कुछ दिन पेइंगगैस्ट के रूप में आप के पास रह सकती हूं? बीएड के बाद नौकरी कर लूंगी, फिर अपने घर चली जाऊंगी.’’

‘‘अरे, यह क्या कह रही हो बेटी, यह भी तुम्हारा ही घर है. पेइंगगैस्ट नहीं, मालकिन बन कर रहो,’’ पिताजी ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

निशा के रहने की व्यवस्था मेरे कमरे में हो गई. हमारा दिनरात का साथ हो गया. वह गृहकार्य में भी दक्ष थी, सो, मां का हाथ भी बंटाती. उस का सांवला रूप मुझे लुभालुभा जाता. परंतु एक जरा सा सत्य मुझे, बस, पीड़ा पर पीड़ा देता रहता.

अपने भाई के लिए भी मैं परेशान रहती. जब से निशा आईर् थी, वे अपने कमरे में ही कैद हो गए थे. चाय, नाश्ता सब खुद ही आ कर भीतर ले जाते. हमारे बीच बैठ कर बातचीत किए जैसे उन्हें सदियां बीत गई थीं. निशा उन की तरफ से तटस्थ थी.

मैं हैरान थी, 4-5 महीने बीतने पर भी निशा ने अपने मित्र का उल्लेख एक बार भी नहीं किया था. मैं सोचती, वह भला कब और किस वक्त उस से मिलती होगी, क्योंकि हमारा तो हर पल का साथ था. कभीकभी भैया एकटक निशा को ही निहारते रहते.

बीएड की परीक्षा हो गईर् और परीक्षाफल आतेआते एक विचित्र घटना घटी. भैया अपने एक परम मित्र से निशा की शादी करवाना चाहते थे. वे बोले, ‘‘निशा, वह कल आएगा, तुम उसे देख लेना. बहुत अच्छा इंसान है. मेरे साथ ही है, बैंक में काम करता है.’’

‘‘लेकिन कर्ण भैया,’’ पहली बार निशा ने मेरे भाई को पुकारा था.

‘‘तुम्हारे पिता के अंतिम शब्द यही थे कि वे तुम्हारी सुखी गृहस्थी नहीं देख पाए. तब यह जिम्मेदारी मैं ने अपने सिर पर ली थी. विजय मेरे साथ कालेज के दिनों से है. वह उतना ही अच्छा है, जितनी अच्छी तुम हो,’’ भैया ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘जी,’’ अवरुद्ध कंठ से वह इतना ही कह पाई.

‘‘तुम अगर उसे पसंद कर…’’ भैया ने आगे कहना चाहा, मगर वह बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘उस की जरूरत नहीं है. आप सब पिताजी जैसे ही माननीय हैं. आप जो करेंगे, अच्छा ही करेंगे.’’

‘‘लेकिन भैया,’’ मैं ने हौले से कहा, ‘‘निशा की भी अपनी कुछ पसंद होगी. हो सकता है उसे कोई और पसंद हो. आप अपना फैसला इस तरह इस पर क्यों थोप रहे हैं?’’

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‘‘हांहां, बेटे, इस की पसंद भी तो पूछो. शादीब्याह जबरदस्ती का नहीं, प्यार का नाता होता है,’’ मेरे पिताजी बोले.

सहसा निशा रो पड़ी. फिर कुछ क्षणों के बाद बोली, ‘‘मेरी कोई पसंद नहीं है.’’

तभी मेरे मन में विचार आया कि हो सकता है, निशा ने उस पुरुषमित्र को छोड़ दिया हो. सच ही तो है, जो कभी उस का सुखदुख पूछने भी नहीं आया, वह भला कैसा प्रेमी? तब इस अवस्था में वह मेरी भाभी क्यों नहीं बन सकती.

उस रात बड़ी देर तक मुझे नींद नहीं आई. मैं ने निशा की तरफ करवट बदली, तो देखा, वह तकिए में मुंह छिपाए सुबकसुबक कर रो रही थी. पास जा कर उसे हिलाया, उस के हाथपैर काफी ठंडे थे. मैं ने घबरा कर भाई को बुलाया. हम दोनों कितनी देर तक उस के हाथपैर रगड़ते रहे. भैया ने लिहाफ ओढ़ा कर उसे बिठाया तो वह उन की छाती में मुंह छिपा कर बेतहाशा रोने लगी, ‘‘मैं ने अपने पिताजी से कभी कुछ नहीं छिपाया था. मुझे कभी कहीं भी अकेले नहीं जाने देते थे. फिर मुझे अकेली क्यों छोड़ गए? मैं सच कह रही हूं, मैं ने उन से कभी…’’

‘‘मैं जानता हूं निशा, मैं सब जानता हूं,’’ भैया ने अपने कुरते की बांह से उस की आंखें पोंछीं.

थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘तुम निर्दोष हो निशा, तुम्हारे पिता तुम से नाराज नहीं थे. वह तो बस, यही कहते रहे कि जहां निशा चाहे, वहीं उसे…’’

‘‘मगर मैं ने चाहा ही क्या था? कुछ भी तो नहीं चाहा था…’’

रातभर भैया हमारे ही कमरे में रहे. मैं हैरान थी कि जिस निशा को वे चरित्रहीन घोषित कर चुके थे, उस पर इतना स्नेह लुटाने का क्या मतलब?

‘‘भैया, निशा के उस मित्र का पता क्यों नहीं करते?’’ मौका पाते ही मैं ने कह दिया.

भैया ने एक  बार मेरी ओर देखा अवश्य, पर बोले कुछ नहीं.,

‘‘जिस इंसान के लिए उस ने अपने पिता को खो दिया, कम से कम उसे निशा से मिलने तो आना चाहिए था न?’’

Manohar Kahaniya: प्यार के जाल में फंसा बिजनेसमैन- भाग 1

भाजपा नेता और प्रतिष्ठित मानसी की अदाओं और खूबसूरती का दीवाना बन चुके कारोबारी संजीव जैन ने उसे फोन किया, ‘‘यार मानसी, तुम कहां हो? मिलना है…’’

‘‘… लेकिन मैं तो आज ही मेरठ आई हूं.’’ मानसी की आवाज आई.

‘‘मेरठ कब? क्यों गई हो मेरठ? कोई खास बात है क्या?’’ संजीव लगातार बोलता चला गया.

‘‘इतने सवाल एक साथ मत करो. मेरी ससुराल है मेरठ में. मेरी भी तो कुछ पर्सनल है. मैं अपने चाचा के यहां भाई की शादी में आई हूं. कल शाम ही रायपुर से आई थी… कुछ जरूरी बात है तो बताओ, अभी के अभी आती हूं…’’ मानसी मिठास भरी शब्दों में बोली.

‘‘अरे यार, तुम्हारी बहुत याद आ रही है. मैं आज रायपुर पहुंच रहा हूं. सोचा था तुम से भी मिलता चलूं.’’ संजीव जैन ने मानसी के प्रति प्यार दर्शाते हुए धीरे से कहा.

‘‘अच्छा तो ये बात है,’’ मानसी बोली, ‘‘कोई बात नहीं, एक दिन वहां रुक सकते हो तो होटल में ठहरो.’’

‘‘तुम ने न जाने कैसा जादू कर दिया है मुझ पर, जब तक तुम से बात न कर लूं, मिल न लूं, मन नहीं लगता… और तुम से मिले हुए भी तो कई दिन हो गए हैं,’’ संजीव ने कहा.

संजीव की इस बात पर मानसी हंसती हुई बोली, ‘‘मैं भी तो तुम्हें हमेशा याद करती हूं. तुम्हारे इंतजार में कई बार घंटों बैठी रही हूं. और वैसे भी जब तुम ने फोन कर ही दिया है तो मेरी एक छोटी सी प्राब्लम दूर कर दो न प्लीज!’’

‘‘बताओ न प्राब्लम. मेरी तो जान हाजिर है तुम्हारे लिए,’’ संजीव चहकते हुए बोला.

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‘‘अरे, नहींनहीं, मैं भला तुम्हारी जान क्यों मांगने लगी… मेरा एक छोटा सा काम कर दो. मैं जानती हूं तुम वहीं से बैठेबैठे कर दोगे.’’ मानसी बोली.

‘‘काम बोलो तो सही.’’ संजीव बोला.

‘‘अरे! यहां शादी में आई हूं लेनदेन के खर्च में पैसे कम पड़ रहे हैं…’’ मानसी अपनी बात पूरी करने वाली ही थी कि संजीव ने कहा, ‘‘बस, इतनी सी बात… मैं हूं न. अभी ट्रांसफर करता हूं. और हां, 2 दिन तुम्हारे लिए रायपुर में ठहरूंगा.’’ कह कर संजीव ने फोन कट कर दिया और उस के अकाउंट में 20 हजार रुपए ट्रांसफर करने के लिए गूगलपे ऐप खोल लिया.

‘‘चैक कर लो,’’ 2 मिनट बाद संजीव ने दोबारा मानसी को काल किया.

‘‘अरे, चैक क्या करना, मुझे जितना तुम पर भरोसा है, उतना पति पर भी नहीं. रायपुर में मेरा इंतजार करना. कल शाम को मिलती हूं. आज ही ललित 3 दिनों के लिए बाहर जाने के लिए निकला है.’’ मानसी की इस जानकारी से संजीव जैन और भी खुश हो गया. उस ने मानसी के लिए एक गिफ्ट खरीदने के लिए कैब बुक कर ली.

छत्तीसगढ़ के जिला राजनंदगांव शहर की पहचान उस की सांस्कृतिक धरोहरों और साहित्यिक विरासत को ले कर है. यहां मुख्य रूप से कारोबार का काम जैनबंधु संभाले हुए हैं. भारत में उन की गिनती भले ही अल्पसंख्यकों में होती हो, किंतु राजनंदगांव में उन की संख्या बहुतायत में है.

उन का प्रमुख कारोबार राइस, पोहा और दाल मिल का है, उस के लिए उन्होंने बड़ेबड़े कारखाने लगा रखे हैं. वे एक विकसित उद्योग धंधे बने हुए हैं.

इसी शहर के हीरामोती लाइन इलाके में 75 वर्षीय सुरेशचंद्र जैन अपने भरेपूरे परिवार के साथ निवास करते हैं. उन के बड़े बेटे संजीव जैन, जिन की उम्र 56 वर्ष की थी, कुछ माह पहले तक अपने पुश्तैनी व्यवसाय को संभाले हुए थे. साथ ही वह न केवल भारतीय जनता पार्टी से जुड़ कर राजनीति में सक्रिय थे, बल्कि 2 साल पहले नगर पालिका में पार्षद का चुनाव भी जीत चुके थे.

अपने मृदुल व्यवहार और राजनीतिक रसूख के कारण संजीव जैन का शहर में अपना एक विशेष स्थान था. अपने व्यवसाय से समय निकाल कर वह सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाया करते थे. इस वजह से ही उन की गिनती शहर में एक जानीमानी शख्सियत के रूप में होती थी. संयोग से वह अब इस दुनिया में नहीं हैं.

उन के साथ क्या हुआ? वह कैसे इंसान थे? कितने हमदर्द, हर दिल अजीज और प्रिय थे? लोकप्रियता की पहचान और रसूख के पहनावे में वे भीतर से कितने खोखले और खलबली से भरे थे, इस का थोड़ा अंदाजा मानसी के साथ उन की हुई बातचीत से लग ही चुका होगा. आगे क्या हुआ और मानसी से वे कैसे जुडे, इत्यादि के बारे में जानने के लिए संजीव और मानसी के संबंध की तह में जाना होगा, जो इस प्रकार है—

एक दिन संजीव जैन ने कारोबार के सिलसिले में मोबाइल पर उत्तम जैन काल किया. दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज सुनाई दी, ‘‘हैलोहैलो! मेरी किस से बात हो रही है? आप कौन?’’

संजीव जैन ने अपने मित्र उत्तम जैन को काल लगाया था, वह सोच में पड़ गया कि उत्तम की जगह मोबाइल पर कालसेंटर वाली सधी हुई मधुर आवाज कैसे आने लगी, कहीं उस ने इस तरह का इंतजाम तो नहीं कर लिया है?’’

‘‘मैं संजीव जैन बोल रहा हूं, मगर आप कौन? मैं ने तो उत्तम भाई को फोन लगाया है.’’ संजीव बोले.

दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘मैं मानसी, मानसी यादव. यह तो मेरा नंबर है. आप ने कैसे लगाया? नंबर कहां से मिला?’’

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परवान चढ़ने लगी दोस्ती

संजीव समझ गए कि उन से कोई गलत नंबर लग गया है. फिर भी झल्लाने की बजाय उन्होंने फोन पर बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘… मगर यह तो मेरे दोस्त का नंबर है. आप कहां से बीच में आ गईं? लगता है रौंग नंबर लग गया है.’’

‘‘कोई बात नहीं, इसी बहाने एक नई जानपहचान तो हो गई, वरना इस भीड़भाड़ वाली दुनिया में कौन किसी को याद करता है?’’ मानसी का यह अंदाज संजीव को और भी लुभावना लगा.

‘‘रौंग नंबर ही सही, आप से बातें करते हुए अच्छा लग रहा है. लगता है मैडम, आप बहुत ही मिलनसार किस्म की हैं,’’ संजीव तारीफ करते हुए बोले.

‘‘अरेअरे ये क्या कह दिया आप ने मैडम. मैं तो अभी मिस हूं. मिस मानसी यादव.’’ रस घोलती मानसी की इस आवाज ने मानो संजीव पर जादू कर दिया हो. उसे मानसी से बात कर के मजा आने लगा था.

‘‘वैसे आप कौन हैं? मेरा मतलब आप के नाम और काम से है. रहते कहां हैं?’’ मानसी बोली.

मौका नहीं चूकते हुए संजीव ने हंसते हुए कहा, ‘‘ मैं…मैं… संजीव जैन हूं. राजनंदगांव से बोल रहा हूं. मैं एक बिजनैसमैन हूं. भाजपा का सक्रिय कार्यकर्ता भी हूं.’’

इतना सुन कर मानसी तपाक से बोल पड़ी, ‘‘अरे वाह! तब तो आप बड़ी पहुंच वाले हैं, आप से दोस्ती करनी ही चाहिए. आप की बातें सुन कर मुझे पता नहीं क्यों लग रहा है आप एक सज्जन व्यक्ति हैं.’’

उस के बाद संजीव ने उत्तम का वेटिंग काल आने की आवाज सुन कर मानसी को सौरी बोल कर उस का काल कट कर दिया. तब तक उत्तम का काल बंद हो चुका था.

उसे दोबारा काल मिलाते हुए संजीव काफी अच्छा महसूस करने लगा था …चलो, नई जानपहचान के बहाने उन का एक और समर्थक मिल गया. अनजान ही सही, कभी न कभी तो वह उस के कोई काम आएगी ही. उसे भी सामाजिक काम में शामिल किया जा सकता है.

उधर मानसी के मन में भी कुछ ऐसी मेलजोल बढ़ाने की भावनाएं अंकुरित होने लगी थीं. अनजाने में ही सही, लेकिन आज उस की बात धनवान व्यक्ति से हुई थी, जो भाजपा का एक नेता भी है, तो उस की बड़े लोगों से जानपहचान जरूर होगी. फिर उस ने संजीव का नंबर शौर्ट में ‘बीएमएन’ यानी बिजनेसमैन नेता के नाम से सेव कर लिया. यह वाकया साल 2013 का है.

संजीव और मानसी की फोन पर हुई पहली बातचीत कब दोनों के लिए अनंत काल का सिलसिला बन गई, उन्हें पता ही नहीं चला. उन की आपस में अकसर बातें होने लगीं.

मैसेजिंग का दौर भी चलने लगा. एक दिन संजीव को अचानक रायपुर जाना हुआ. उन्होंने तुरंत फोन कर मानसी को मैग्नेटो माल के निकट आने को कहा.

तब तक मानसी भी संजीव जैन से फोन पर बातें करतेकरते काफी खुल चुकी थी. दोनों ‘आप’ से ‘तुम’ पर आ चुके थे. यह कहना गलत नहीं होगा कि वह भी उस की तरफ आकर्षित हो चुकी थी. संजीव के बुलावे पर मैग्नेटो माल के पास पहुंचने में जरा भी देरी नहीं की.

यह दोनों की पहली मुलाकात थी. अभी तक वे एकदूसरे की सिर्फ तस्वीरों से ही पहचानते थे. संजीव अपनी कार में था. उस ने मानसी को अपनी साथ वाली सीट पर बैठा लिया.

पहली डेटिंग रही यादगार

मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली मानसी के लिए गाड़ी में बैठने का एक सुखद अनुभव था. वह खुश थी. संजीव की पर्सनैलिटी को ले कर जैसी उस ने कल्पना की थी, वह उस से कहीं अधिक बेहतर लग रहा था.

मानसी और संजीव के दिलों में एकदूसरे के लिए कितनी जगह बन चुकी थी, इस से दोनों अनजान थे, लेकिन उन के बीच मधुरता के बीज अवश्य अंकुरित हो चुके थे.

संजीव कार को धीरेधीरे बढ़ाते हुए उस की मुसकराहट की तारीफ कर बैठा, ‘‘आप बहुत खुश दिख रही हैं, सुंदर चेहरे पर मुसकान अच्छी लग रही है… आप ऐसे ही हमेशा रहती हैं?’’

इस के जवाब में मानसी की मुसकान और फैल गई. संजीव दोबारा बोला, ‘‘सच कहूं तो मैं ने नहीं सोचा था कि आप इतनी खूबसूरत और अच्छी दिखती होंगी.’’

अगले भाग में पढ़ेंकिसी न किसी बहाने से ऐंठती रही रुपए

एक डाक्टर और एक सीबीआई अफसर के अनुशासन में काफी अंतर है: डॉ. आशिष गोखले

कोरोना महामारी ने हर इंसान को बहुत कुछ सिखाया. इस महामारी के दौरान बहुतो ने अपने प्रियजन खोए. जबकि कोविड 19 के दौरान तमाम डाक्टर मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए दिन रात काम करते रहे. ऐसे ही डाक्टरो में से एक डॉ. आशिष गोखले भी ‘कोविड 19’’ के दौरान मुंबई के एक निजी अस्पताल में आईसीयू और आई सीसीयू में चैबिसों घंटे कार्यरत रहकर लोगों की जिंदगी बचाने के साथ ही लॉक डाउन के चलते परेशान 250 डेली वेजेस वर्करों को स्वयं हर दिन मुफ्त में खाना भी खिलाते रहे.

‘कोविड 19’ के दौरान डाॅ. आषिष गोखले को कोरोना पीड़ितों का इलाज करते हुए देखकर काफी लोग आशचर्य चकित भी हो रहे थे. क्योंकि डॉ. आशिष गोखले डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस करने के साथ साथ पिछले छह सात वर्षों से अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं. लोग उन्हे हिंदी सीरियल ‘कुमकुम भाग्य’’ व मराठी सीरियल ‘‘ मोगरा फुलेला’ सहित कई सीरियलों व फिल्मों में बतौर अभिनेता देख चुके है. पर अब डॉ. आशिष गोखले एक बार फिर अभिनय के क्षेत्र में काफी सक्रिय हो गए हैं. फिलहाल वह 17 दिसंबर से ‘जी 5’ पर स्ट्रीम होने वाली फिल्म ‘‘ 420 आई पी सी ’’को लेकर सूर्खियों में हैं, जिसमें उन्होने मुख्य सीबीआई अफसर का किरदार निभाया है.

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प्रस्तुत है डा. आशिष गोखले से हुई

एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश…

आप तो डाक्टरी पेशे से जुड़े हुए हैं,फिर यह अभिनय का चस्का कब लग गया?

-डाक्टरी पेशा तो मेरी रगों में बसा हुआ है.मैं महाराष्ट् के कोंकण इलाके के वेलनेष्वर, रत्नागिरी का रहने वाला हॅूं.मेरे परिवार में सभी डाक्टर हैं.मेरे पिता डा. ध्रुव गोखले, मां उषा गोखले व छोटी बहन भी डाक्टर है.मेरे माता पिता का वेलनेष्वर में ही ‘आषिष अस्पताल’ नामक अस्पताल है.मैंने पुणे से डाक्टरी की पढ़ाई पूरी की.फिर मैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई आ गया और मुंबई के मल्टीपल स्पेसियालिटी अस्पताल में आईसीयू और्र आइसीसीयू में इमर्जेंसी फिजीशियन डाक्टर के रूप में कार्यरत हॅूं.मगर मुझे बचपन से ही अभिनय का षौक रहा है. मैंने स्कूल के दिनों से ही थिएटर करना शुरू कर दिया था.

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जब बचपन से अभिनय का शौक था, तो फिर डाक्टरी की पढ़ाई??

-जैसा कि मैने पहले ही बताया कि मेरे माता पिता डाक्टर हैं और उनका अपना अस्पताल भी है.इसलिए उनका दबाव रहा.माता पिता ने मुझे एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा.मैने पुणे के मेडीकल कालेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की.डाक्टी की डाॅक्टरी की पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने डाॅक्टर के रूप में प्रैक्टिस करना षुरू किया था.लेकिन अभिनय का कीड़ा अंदर से हिलोरे मार रहा था.इसलिए मैने अपने पिता से मंुबई जाने की इजाजत मांगी.इस पर मेरे पिता कुछ नाराज हुए.बाद में कहा कि ‘यदि मंुबई जाओगे,तो आर्थिक मदद की उम्मीद मत करना.मैं तुझे एक फूटी कौड़ी नही दॅूंगा.तुझे अपने बलबूते पर संघर्ष करना पड़ेगा.’उस वक्त मैं डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करके प्रैक्टिस शुरू ही की थी.इसलिए मेरे पास आर्थिक बचत नही थी.पर मैं अपने सपने को पूरा करने के लिए मंुबई आ गया.मैं मंुबई के जुहू स्थित एक निजी अस्पताल में रात में बतौर डाक्टर काम करने लगा.तथा दिन में अभिनय के लिए संघर्ष करना षुरू किया.मेरी मेहनत रंग लायी.2015 -2016 में मुझे ‘प्यार को हो जाने दो’ तथा ‘कुमकुम भाग्य’ सीरियलों में अभिनय करने का अवसर मिला. ‘कुमकुम भाग्य’ में कैमियो किया था.2016 में फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ में छोटा सा किरदार निभाया.इस फिल्म के सेट पर कई लोगों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी.मुझे फिल्मी दुनिया की कार्यषैली, आॅडीषन देने के बारे में विस्तृत जानकारी मिली.2017 में फिल्म ‘लव यू फैमिली’की, जिसमें मैने मनोज जोषी के बेटे का किरदार निभाया था.इसके बाद मंैने भारत का पहले ड्ामा रियालिटी षो ‘तारा फ्र्राम सितारा’ किया.इसमें मेरा वरुण माने का किरदार काफी लोकप्रिय हुआ.इसके अलावा ‘भौकाल’ व ‘साइड हीरो’ जैसी वेब सीरीज की.‘मोगरा फुलेला’, ‘कंडीषंस अप्लाय’,‘रेडी मिक्स’,बाला’ सहित कुछ मराठी फिल्में की.अब मैने वेब फिल्म ‘‘ 420 आईपीसी’’की है.

थिएटर पर क्या क्या किया?

-थिएटर काफी किया है.मैने मराठी, हिंदी व उर्दू भाषा के नाटकों में अभिनय किया है.मैने बीस वर्ष कह उम्र में‘स्वामी विवेकानंद’ नामक नाटक में स्वामी विवेकानंद का यंग उम्र के स्वामी विवेकानंद का किरदार निभाया.मैने इसमें उनके संन्यासी बनने से पहले का किरदार निभाया.इसके कन्या कुमारी,कानपुर, दिल्ली, अहमदाबाद सहित कई शहरों में इसके षो किए.उस वक्त मैं इस नाटक के षो करते हुए डाक्टरी की पढ़ाई भी कर रहा था. उन दिनों मैं फैशन शो में माॅडलिंग करता था. कई प्रोडक्ट के लिए रैंपवाॅक भी किया.इसके चलते कालेज दिनों में मैं पुणे में काफी मषहूर था.

दो हिंदी,तीन मराठी और एक उर्दू नाटक में अभिनय किया.हर नाटक के काफी षो हुए.मैंने ख्ुाद भी एक नाटक का लेखन व निर्देशन व उसमें अभिनय किया.मैने कुछ एक पात्रीय नाटक भी किए.मराठी नाटक ‘‘नाते जुड़ा दे मणाषी मणाषी’ काफी लोकप्रिय रहा.एक पात्रीय नाटक ‘बैक टू स्कूल’ भी लोकप्रिय हुआ.यह सारे नाटक 2007 से 2011 के बीच ज्यादा किए.

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आपकी मातृभाषा तो मराठी है?

-जी हाॅ!लेकिन मैने पंजाबी,हिंदी व उर्दू भाषाएं लिखना व पढ़ना सीखा. मैने पुणे के कैंट इलाके के गुरूद्वारा में जाकर सरदार जी से पंजाबी भाषा सीखी.इसलिए मेरी हिंदी में आपको मराठी एसेंट नही मिलेगा.मैं षुद्ध हिंदी व

उर्दू में बात कर सकता हॅूं. फिल्म ‘‘ 420 आई पी सी ’’ से जुड़ना कैसे हुआ?

-एक अभिनेता के तौर पर संघर्ष करते हुए मैने कई प्रोडकशन हाउस में अपनी तस्वीरें भेज रखी हैं. फिल्म ‘‘420 आई पी सी’’ के प्रोडकशन हाउस में भी तस्वीरें भेज रखा था.कोविड के वक्त मैं बहुत व्यस्त था.दिन में पांच सौ फोन आते थे.मैने कई मरीजों का मुफ्त में इलाज किया. खैर,सितंबर 2020 में प्रोडक्षन हाउस से मेरे पास आॅडीषन करके वीडियो भेजने का फोन आया.उस वक्त मैं अस्पताल में था.तो मंैने कह दिया कि मैं रात में भेज पाउंगा.देर रात मैने आॅडीषन भेजा और मेरा चयन हो गया.

फिल्म ‘‘ 420 आई पी सी ’’ में आपका किरदार क्या है?

-मैने इसमें मुख्य सीबीआई आफिसर मिस्टर अचलेकर का किरदार निभाया है.जो कि एक बहुत बड़े घोटाले में षामिल मिस्टर केसवानी को गिरफ्तार करता है. केसवानी को सजा देने के बाद रिहा किया जाता हे.उसके बाद कोर्ट केस चलता है. सीबीआई अफसर का किरदार निभाने के लिए किस तरह की तैयारी की?

-निर्देषक मनीष गुप्ता ने मुझसे कहा कि मुझे सीबीआई आफिसर के लिए अपनी बाॅडी लैंगवेज को बदलना पड़ेगा.मुझे उनका उठना, बैठना,चलना फिरना वगैरह सब कुछ सीखना पड़ेगा.अब यह मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी.क्योकि सीबीआई आफिसर आसानी से मिलते नही है.यह लोग तो बताते भी नही है कि वह सीबीआई आफिसर हैं.पुलिस अफसर तो हमारे आसपास नजर आते हैं.इसलिए हम इनके बारे में सब कुछ आसानी से जान सकते हैं.सीबीआई आफिसर मीडिया में भी नही आते.तो यह जानना बहुत मुष्किल था कि उनकी बाॅडी लैंगवेज कैसी होती है?वह किसी भी परिस्थिति में किस तरह से रिएक्ट करते हैं.इस वेब सीरीज के सीबीआई आफिसर के किरदार में एक्षन व रिएक्षन काफी है.कोविड का वक्त था,इसलिए किसी सीबीआई आफिसर से मिलने भी नही जा पाया.मगर मैं कुछ पुलिस अफसरों को जानता हॅू,तो उनकी मदद से एक दो सीबीआई आफिसर का फोन नंबर लेकर उनसे फोन पर बात कर सारी चीजें समझी.बाॅडी लैंगवेज बदलने के लिए मुझे काफी मषक्कत करनी पड़ी.मैं अस्पताल में भी उसी तरह से रहने का प्रयास करता.तो मेरे सहकर्मी डाक्टरांे ने सवाल भी किया कि डाॅ.अषीष आपके अंदर कुछ बदलाव आ गया है.मेरे चलने का ढंग बदल चुका था.अब मैं गंभीर रहने लगा था.पहले मैं बहुत हंस हंस कर बात करता था,पर अब चुप रहने लगा था.वास्तव में मैं हमेशा चाहता हॅंू कि मैं जिस किरदार को निभाउं,उसमें पूरी तरह घुसकर उसे न्यायसंगत तरीके से परदे पर साकार करुं.इसलिए मैं अपने हर निर्देशक से किरदार के संबंध में कई सवाल करता हॅूं.मैं हमेषा हर किरदार को कैमरे के सामने पूरी षिद्दत के साथ जीता हॅूं. डाक्टर भी अनुषासित होते हैं.

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सीबीआई आफिसर भी अनुषासित होते हैं.इस बात ने आपको सीबीआई आफिर का किरदार निभाने में कितनी मदद की?

-देखिए,दोनो अनुषासन के साथ अपने काम को अंजाम देते हैं.मगर दोनो मंे सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक सीबीआई आफिसर अपराधी के आत्म विष्वास को डिगाकर उससे सच उगलवाता है.जबकि एक डाक्टर अपने मरीज के आत्मविष्वास को बढ़ाने के लिए आवष्यक बातें करता है.जब मरीज का आत्मविष्वास बढ़ता है,तभी वह जल्दी ठीक होता है.सीबीआई आफिसर की तरह डाक्टर गंभीर नही रहता.वह मरीज की बीमारी की रिपोर्ट देखकर भी चेहरे पर भाव नहीं आने देता.बल्कि यही कहता है कि कोई गंभीर बात नही है.डाक्टर अपने मरीज को हंसाता है.उसका आत्मविष्वास बढ़ाता है.बीमारी की गंभीरता को अहसास करते हुए डाक्टर इस बात को अपने चेहरे के हाव भाव से जाहिर नहीं होने देता.

इसके अलावा कुछ नया कर रहे हैं?

-जी हाॅ! दो तीन प्रोजेक्ट है.अभी एक फिल्म की षूटिंग हैदराबाद में कर रहा हॅूं.जबकि अमेजाॅन के लिए वेब सीरीज की है.पर इनके संबंध में अभी ज्यादा नहीं बता सकता.

शौक क्या है?

-संगीत सुनना,लिखना.कविताएं,चुटकुले व कहानियंा लिखता हॅूं.सामज सेवा के कार्य करता हॅूं.

सोशल वर्क?

-पहले लाॅक डाउन के वक्त मैं हर दिन 250 लोगों को मुफ्त में भोजनकराता था.कई मरीजों का मुफ्त में इलाज किया.उन दिनों मैने सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर लोगों को हर डेलीवेजेस की मदद करने के लिए प्रेरित करने का काम किया.होम क्वारंटाइन करने का काम किया.

भोजपुरी सिंगर Pramod Premi Yadav ने इस एक्ट्रेस संग सड़क पर किया रोमांस, देखें Video

भोजपुरी इंडस्ट्री के मशहूर सिंगर प्रमोद प्रेमी यादव (Pramod Premi Yadav) का एक नया गाना सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस गाने में वह भोजपुरी एक्ट्रेस प्रियंका राय संग सड़क पर रोमांस करते हुए नजर आ रहे हैं.

हाल ही में उनका नया गाना का ‘करे आरा जालु’ (Ka Kare Aara Jalu) रिलीज हुआ है. वीडियो में आप देख सकते हैं कि प्रेमी टशन झाड़ते हुए अपनी प्रेमिका से मिलने आते हैं. भोजपुरी एक्ट्रेस अपनी कमर को खूब लचकाती दिख रही हैं, पहले वे लहंगे में थिरकती हैं और बाद में क्रॉप टॉप में नजर आती हैं.

इस गाने को फैंस खूब पसंद रहे हैं. प्रेमी ही इस गाने को सिंगर और एक्टर दोनों हैं. जो प्रियंका संग सड़क पर रोमांस करते नजर आ रहे हैं.

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इस गाने को कृष्णा बेदर्दी ने लिखा हैं और कोरियोग्राफी राहुल यादव ने की है जबकि इसके डायरेक्टर आर्या शर्मा हैं. गाने को काफी पसंद किया जा रहा है. गाने पर दर्शकों का शानदार रिस्पौंस आ रहा है और स्टार के देसी अंदाज को पसंद किया जा रहा है.

 

प्रेमी टशन का एक और नया गाना ‘गोभी लेलअ हो’ रीलीज किया गया था. इसके लिरिक्स बोस रामपुरी ने लिखे हैं और श्याम सुंदर इसे म्यूजिक दिया है. प्रमोद प्रेमी का ये गाना अभिनेत्री अनीषा पांडे  पर फिल्माया गया है जिसमें वे अपने सजे धजे देसी महिला के रूप में नजर आती हैं.

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अनुपमा-अनुज के रिश्ते में पड़ेगी दरार? 10 साल पुराने रिलेशनशिप को लेकर होगा खुलासा

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) की कहानी में दिलचस्प मोड़ आ चुका है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुपमा ने भी अनुज की तरफ बढ़ने का मन बना लिया है. अब वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहती है. वह अनुज के साथ एक नई शुरूआत करने के लिए तैयार है. लेकिन अनुज का अतीत सामने आने वाला है जिससे शो में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिलेगा. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के नए एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा अपनी बेटी पाखी का मन टटोलेगी कि उसे अपनी मां और अनुज की दोस्ती से कोई फर्क तो नहीं पड़ेगा, पाखी कहेगी कि उसके भी बेस्ट फ्रेंड है और अनुज भी अनुपमा का बेस्ट फ्रेंड है.

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तो दूसरी तरफ बापूजी अनुपमा से कहेंगे कि वो अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले. बापूजी कहेंगे कि अनुज को उसकी जरूरत है. अनुपमा खुद से कहेगी कि उसने अपने और अनुज के रिश्ते के लिए खुद को इजाजत दे दी है.

 

जैसे ही अनुपमा अनुज के घर में कदम रखेगी और तभी उसे एक एक तस्वीर मिलेगी, जिसमें अनुज के साथ एक लड़की खड़ी होगी लेकिन उसका आधा हिस्सा फटा रहेगा. तो दूसरी तरफ अनुज जल्दी-जल्दी में सारी तस्वीरें उठाएगा. अनुज को इस तरह देख अनुपमा उसे खूब डांटेगी.

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शो में आप ये भी देखेंगे कि अनुपमा अपने प्यार का इजहार करने जाएगी. तभी वो अनुज को किसी से बात करते हुए सुनेगी. फोन पर अनुज किसी से कहेगा कि वह उससे बहुत प्यार करता है. यह सुनकर अनुपमा शॉक्ड हो जाएगी.

शो में दिखाया जाएगा कि अनुज, मालविका का 10 साल पहले रिलेशनशिप में थे. मालविका को अनुपमा के बारे में पता है लेकिन अनुपमा को नहीं. जब अनुपमा को इस बात का पता चलेगा तो वो अनुज को खोने से डरने लगेगी. शो में अब ये देखना होगा कि मालविका के आने अनुज-अनुपमा के रिश्ते बदल जाएंगे?

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