योगी सरकार को मंजूर नहीं ‘गुजरात का साबुन’

जो भाजपा सत्ता के बाहर रहते हुये विरोधी दलों के नेताओं को चूडियां और साडी भेंट कर अपना विरोध प्रदर्शन करती थी उसे आज दलित संगठनों के अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के लिये गुजरात से आया साबुन भेंट करना पंसद नहीं है. इन लोगों को उत्तर प्रदेश में प्रवेश से पहले झांसी से ही वापस भेज दिया गया और राजधानी लखनऊ में होने वाली विचार गोष्ठी को कैसिंल करा कर आयोजको गिरफ्तार कर लिया. अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देने वाली भाजपा अब खुद इसकी राह का रोडा बन गई है.

संवैधानिक तरह से विरोध करना लोकतंत्र का मूलभूत अधिकार होता है. सत्ता पक्ष हमेशा इसका अधिकार विरोध करने वालों को देता है. इसका सम्मान करता है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अपनी आलोचना को सहन करने की हालत में नहीं है. दलित मुद्दों को लेकर लखनऊ के प्रेस क्लब में ‘दलित अत्याचार और निदान’ विषय पर परिचर्चा होनी थी. इसके लिये आयोजक आशीष ने बुकिंग के लिये पैसा भी जमा करा दिया था. अचानक उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के सचिव जेपी तिवारी ने बुकिंग कैंसिल कर दी. बताया जाता है कि सरकार को यह पता चल चुका था कि परिचर्चा के बाद गुजरात से आने वाले दलित संगठन उत्तर प्रदेश के दलित संगठनों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को साबुन से बनी गौतम बुद्व की 125 किलो की साबुन की प्रतिमा भेंट करना चाहते थे. उत्तर प्रदेश की सरकार ने गुजरात से आने वालों को झांसी में रोक लिया और उनको वापस गुजरात भेज दिया.

25 कार्यकर्ता लखनऊ के नेहरू युवा केन्द्र में रूके थे. उनको वहां पर नजरबंद कर लिया गया. बाकी कार्यकर्ताओं को अलग अलग शहरों में रोक लिया गया. लखनऊ प्रेस क्लब में दलित चिंतक रिटायर आईपीएस एसआर दारापुरी, नेता रमेश दीक्षित सहित कई लोग विचार गोष्ठी में शामिल होने के लिये समय पर प्रेस क्लब पहुंच गये तो वहां पर उनको बताया गया कि विचार गोष्ठी के लिये बुकिग कैंसिल कर दी गई है. इसकी जानकारी इन लोगों को प्रेस क्लब की ओर से पहले नहीं दी गई. ऐसे में जब यह लोग आगे क्या किया जाय इस बात की चर्चा कर रहे थे उनको पुलिस ने धारा 144 के उल्लधंन के आरोप में पकड़ लिया. वहां से उनको शाम के 5 बजे तक लखनऊ पुलिस लाइन में रखा गया. बाद में 20-20 हजार के निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ रिहा किया गया कि वह शांतिभंग करने का कोई काम नहीं करेंगे.

एसआर दारापुरी ने बताया कि दलितों की समस्या पर होने वाली विचार गोष्ठी में गुजरात से कुछ दलित संगठन के लोग यहां आने वाले थे. उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के पहले जिस तरह से दलितों को नहाने के लिये साबुन दिया गया उससे गुजरात के दलित संगठन आहत थे. उनका सोचना था कि सरकार दलितों को गंदा मानती है. इसलिये उनको नहाने के लिये साबुन दिया. यह एक तरह से पूरी बिरादरी का अपमान था. बाबा भीमराव अंबेडकर की 125 जंयती चल रही है इसलिये 125 किलो साबुन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को देना तय हुआ. बौद्ध धर्म के कारण साबुन का मूर्ति का आकार दिया गया था. दलित संगठन के लोग चाहते थे कि योगी आदित्यनाथ इस साबुन से नहा कर अपना तन और मन साफ कर सके.

दारापुरी कहते हैं ‘सरकार ने जब गुजरात के लोगों को झांसी में रोक कर उनको जबरन वापस भेज दिया तब साबुन देने वाली बात को खत्म हो गई थी. उसके बाद भी विचार गोष्ठी का आयोजन क्यों नहीं करने दिया गया? ऐसे साफ पता चलता है कि सरकार सबको सबक सिखाने के लिये तैयार है. ऐसे में लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी प्रभावित होती है.

सारे कपड़े उतारकर खड़ी रही ये लड़की और लोगों को दी अपने साथ कुछ भी करने की छूट

मरीना अब्रामोविक एक परफॉरमेंस आर्टिस्ट हैं. ये यूगोस्लाविया से हैं. क्या आप जानते हैं कि, क्यों मरीना को दुनिया भर में जाना जाता है. इसके पीछे कारण है इनका अनोखा काम. इनकी परफॉरमेंस में ऐसा नहीं होता कि ये किसी स्टेज पर हों, और बाकी लोग केवल इन्हें देख या सुन रहे हों. इनकी परफॉरमेंस ये ध्यान में रखते हुए की जातीं हैं कि वहां मौजूद सभी लोग इसका हिस्सा बन सकीं.

मरीना को परफॉर्म करते हुए 30 सालों से ज्यादा हो गए हैं. परफॉरमेंस आर्ट की दुनिया में इन्हें ‘बड़ी मां’ कहा जाता है. क्योंकि इनकी परफॉरमेंस लोगों को खुद से ही परिचित करवाती है.

मरीना ने फाइन आर्ट्स की ट्रेनिंग ली है और इसके बाद वे परफॉरमेंस करने लगीं. मूक, चेहरे पर दृढ़ता, आंखों में कठोरता मिश्रित दर्द. शायद से बात तो आप सभी जानते होंगे कि मरीना ने रिदम नाम से कई परफॉरमेंस दीं. इसमें से इनकी कुछ परफॉरमेंस हमेशा याद रखी गईं. ऐसी ही एक परफॉरमेंस थी रिदम जीरो.

इटली के नेपल्स शहर में हुई इस परफॉरमेंस को लोग आज भी याद रखते हैं. परफॉरमेंस साल 1974 में हुई थी. मरीना इसके बारे में आज भी बात करती हुई देखी जाती हैं. 6 घंटे चली इस परफॉरमेंस में मरीना ने कुछ भी नहीं किया था. वो सारे कपड़े उतारकर बस खड़ी रहीं. पास में एक टेबल था. टेबल पर 72 चीजें रखी हुई थीं. वहां आए लोगों को उन 72 चीजों में अपनी पसंद की चीज से मरीना के साथ कुछ भी करना था. मरीना ने लिखा था कि उनके साथ जो भी कुछ होता है, उसकी जिम्मेदारी वो खुद लेंगी.

इस परफॉरमेंस में कोई स्टेज नहीं था. उनका लक्ष्य बस इतना था कि वे देखना चाहती थीं कि ऐसी स्थिति में पब्लिक किस हद तक जा सकती है.

तो उसके निर्देश कुछ ऐसे ऐसे थे :

टेबल पर 72 चीजें हैं. लोग इनमें से कितनी भी चीजें मेरे ऊपर इस्तेमाल कर सकते हैं.

मैं इस परफॉरमेंस की वस्तु हूं.

इस दौरान जो भी होगा उसकी जिम्मेदारी मेरी होगी.

समय: 6 घंटे (शाम 8 से रात 2 बजे तक)

यहां हम आपको बता देना चाहते हैं कि पहले तो उनके करीब केवल फोटोग्राफर आए. फिर लोग आने शुरू हो गए. पहले तो केवल उन्हें देखते रहे. कुछ ने उन्हें हिलाया-डुलाया. हाथ-पांव हिलाए. उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर खड़ा कर दिया. फिर लोग टेबल की ओर बढे.

टेबल पर सुंदर वस्तुओं से लेकर खतरनाक वस्तुएं थीं. पंख और फूल थे. ब्लेड, चाकू और बंदूक भी थे. लोगों ने मरीना के ऊपर चीजें टांग दीं. रस्सी से बांधा. एक व्यक्ति ने उन्हें ब्लेड से काट दिया. एक और व्यक्ति ने उन्हें लोडेड बंदूक खुद पर तानने के लिए कहा.

एक व्यक्ति ने तो उन्हें नग्न कर उनका शरीर जहां-तहां छुआ. लोगों को इसपर भी सुकून नहीं पड़ा. उन्होंने मरीना के शरीर में कांटे भोंक दिए.

इसके बाद जब परफॉरमेंस खत्म हुई, यानि कि 6 घंटे के बाद, मरीना ने कमरे में चलना शुरू किया. हर एक व्यक्ति के पास गईं. आंखों में आंखें डालकर खड़ी हो गईं. वे लोग जो उनको कुछ देर पहले हैरेस कर रहे थे, अब उनकी आंखों में भी नहीं देख पा रहे थे. मरीना ने उन्हें उनके अंदर का राक्षस दिखा दिया था.

मरीना ने बाद में कहा कि ‘इस परफॉरमेंस ने ये बताया कि इंसानियत की सबसे बुरी चीज क्या है. लोग आपको असहाय पाकर आपको पीड़ा देने का एक भी मौका नहीं गंवाते. ये बताता है कि कितना आसान है किसी इंसान को वस्तु बनाकर उसके साथ बुरा बर्ताव करना.

वीडियो में देखें क्या कहती हैं मरीना…

आप भी जान लीजिए लड़कियां कमतर नहीं

देश में फिल्म ‘दंगल’ को लड़कियों को चूल्हेचौके से निकाल कर अपने बल पर एक संकीर्ण समाज से निकालने का संदेश देती फिल्म माना गया है पर जब इसे चीन में रिलीज किया गया तो वहां वैसे तो यह फिल्म चली पर दर्शकों में बहुतों ने पिता के रोल में आमिर खान को अपनी इच्छा बच्चों पर थोपते माना है. उन के अनुसार फिल्म पितृसत्तात्मक संदेश देती है जिस में लड़कियों की नहीं, पिता की मरजी और उस का अनुशासन हावी है.

अगर यह राय कुछ हद तक ठीक है तो भी हरियाणा जैसे राज्य में लड़कियों को इतनी आजादी नहीं  है कि वे खुली कुश्ती जैसे खेलों में भाग ले सकें. फिल्म की जो शुरुआत लड़कीलड़के के बीच कुश्ती से हुई है, वह फिल्म का मुख्य संदेश है. महिला कुश्ती में विजय नहीं.

चीनी समाज भी आज भारतीय समाज की तरह ही है हालांकि वह तेजी से बंदिशों से निकला है. माओ त्से तुंग ने कल्चरल रैवोल्यूशन के समय चीन के पूरे समाज को हिला दिया था पर फिर भी सदियों की परतें अभी भी टूटी नहीं हैं.

‘दंगल’ की खूबी यह थी कि बेटियों को प्रोत्साहन देने वाला पिता है. आमतौर पर इस तरह की खिलाड़ी अपनेआप जिद कर के सामाजिक बंधनों को तोड़ती हैं. पिता नई सोच के आड़े आता है. यहां उलटा है, लड़कियां पारंपरिक तरीके से जीना चाहती हैं और पिता अपने सपनों को नहीं, लड़कियों को कमतर न आंकने की जिद पर उन्हें सोच के काले कमरे से जरूर निकालता है.

‘दंगल’ का हीरो पितृसत्तात्मक नहीं, सुधारक है जो पानी के बहाव में बहने वाले तिनकों को अपनी राह चुनने की प्रेरणा ही नहीं देता, उन का मार्गदर्शन भी करता है. आज ऐसे पिता की जरूरत है जो आम लड़कियों से अलग जीने की प्रेरणा लड़कियों को दे सकें और साबित कर सकें कि सही अवसर मिलने पर लड़कियां खुद सही फैसले कर खुद ही अपनी राह चुन सकती हैं.

‘दंगल’ में अंत में मुकाबला लड़कियों और लड़कों के बीच नहीं है पर संदेश है कि यदि लड़कियों को कमतर न आंका जाए तो वे बहुत कुछ कर सकती हैं. उन्हें मां या पिता का सहारा जरूर चाहिए पर एक हद तक. चीन में अगर फिल्म को अच्छे दर्शक मिले हैं तो इसीलिए कि वहां भी लड़कियां अपनी सत्ता खोज रही हैं.

अपने ही दोस्त को धोखा देकर किसने की थी उसकी प्रेग्नेंट बीवी से शादी

कुछ दिनों पहले ही भारतीय क्रिकेटर दिनेश कार्तिक की पत्नी दीपिका पल्लीकल, सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर करने के बाद अचानक चर्चा में आईं थीं.

क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे क्या वजह थी. हमारे साथ जानिए जानें क्या थी इसकी वजह.

दरअसल दीपिका ने जो तस्वीर शेयर की थी उसमें वो एक पूल में नजर आ रही हैं. इस तस्वीर के साथ उन्होंने केप्शन लिखा था कि, अपने पति के साथ घूमना मुश्किल काम हो सकता है.

दीपिका पल्लीकल की इस तस्वीर पर हार्दिक पांड्या ने कमेंट कर इस स्वीमिंग पूल के बारे में पूछा कि, यह पूल कहां पर है. आपको बता दें कि साल 2015 में दिनेश कार्तिक और दीपिका पल्लीकल ने शादी की है.

हम आपको एक बता देना चाहते हैं कि दिनेश की जिंदगी बिल्कुल आसान नहीं रही. उन्हें उन्हीं के एक दोस्त ने धोखा दिया था.

तो कहानी कुछ ऐसो शुरु हुई कि, साल 2007 में कार्तिक ने अपनी बचपन की दोस्त निकिता से शादी की थी, लेकिन साल 2012 में दिनेश कार्तिक की पत्नी की मुलाकात उनके साथी मित्र क्रिकेटर मुरली विजय से हुई.

इसके बाद मुरली विजय और कार्तिक की पत्नी निकिता एक दूसरे को पसंद करने लगे और उनका अफेयर शुरू हो गया. दोनों एक दूसरे से मिलने और साथ में समय बिताने लगे.

जब दिनेश कार्तिक को इस बात का पता चला तो उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया. हैरानी की बात ये रहै कि जब दिनेश ने निकिता को तलाक दिया था, उस समय वे प्रेग्नेंट थीं.

आगे आपको जानकर और हैरानी होगी कि तलाक होते ही निकिता ने मुरली विजय से शादी कर ली थी. खबरों की माने तो कार्तिक ने कभी बेटे पर अपना हक जताने की कोशिश नहीं की.

निकिता से तलाक के बाद दिनेश की जिंदगी आसान नहीं रही. उनके जाने के कुछ समय बाद, साल 2013 में उनकी मुलाकात इंटरनेश्नल स्क्वैश प्लेयर दीपिका पल्लीकल से हुई.

दिनेश कार्तिक के इस बुरे दौर में दीपिका ने उन्हें काफी सपोर्ट किया. इसके बाद दोनों ने बहुत ही जल्दी सगाई भी कर ली, लेकिन इसका खुलासा कियी के सामने नहीं किया. साल 2014, अक्टूबर में एक इवेंट के दौरान दोनों ने ये कहा था कि वे अगले साल यानि कि 2015 में शादी कर सकते हैं, और ऐसा हुआ भी दोनों ने साल 2015 में शादी कर ली.

दिनेश कार्तिक हिंदू हैं और दीपिका क्रिश्चियन इसलिए दोनों ने दोनों रीति रिवाजों से शादी की थी.

किस अदाकारा ने किया था ऐश्वर्या राय को रिप्लेस

फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों से अपना सिनेमाई करियर शुरू करने वाली अभिनेत्री अमीषा पटेल अब कहीं खो सी गई हैं. अमीषा शायद पहली ही ऐसी एक्ट्रेस हैं जिनको अपनी पहली दो फिल्मों से वो स्टारडम मिला जो कई अभिनेत्रियों को अपने पूरे करियर में नसीब नहीं हो पाता है. हालांकि उनकी कुछ फिल्में अभी भी अधर में हैं, लेकिन उससे हमें क्या अमीषा को खुद भी कोई उम्मीद नहीं होगी.

वहीं दूसरी ओर कंट्रोवर्सी के दौर भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहे. कभी उनके अपने पर्सनल रिलेशनशिप्स, तो कभी उनके अपने पापा से झगड़े अखबारों की सुर्खियां बनते रहे हैं. हालांकि कुछ चीजें ऐसी भी हैं जो इन्हें बॉलीवुड की बाकी एक्ट्रेसेज से अलग करती हैं और वो है उनकी अकेडमिक क्वालिफिकेशन.

अमीषा बॉलीवुड की सबसे ज्यादा पढ़ीं-लिखी अभिनेत्रीयों में से एक हैं, ऐसा कहना गलत नहीं होगा. आइये जानते हैं उनकी पढाई, पर्सनल लाइफ और सिनेमा से जुड़े कुछ खास किस्से :

पटेल का नाम उनके माता-पिता के नामों को मिला के बना है. उनके पापा का नाम अमित और मां का नाम आशा पटेल है.

अमीषा पटेल ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मुंबई से करने के बाद यूएस से 2 साल बायो-जेनेटिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. पर इसे बीच में ही छोड़कर बाद में उन्होंने ‘टफ्ट यूनिवर्सिटी मासुचुसेट्स’ से इकोनॉमिक्स में गोल्ड मैडल के साथ ग्रेजुएशन पूरी की.

राकेश रोशन ने उनको अपनी फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ का ऑफर उनके हाई स्कूल पास करने के तुरंत बाद दे दिया था, लेकिन उस वक्त अमीषा ने उन्हें ये कहकर मना कर दिया कि वे आगे की पढाई के लिए यूएस जाना चाहती हैं. उसके बाद इस फिल्म के लिए करीना कपूर को फाइनल कर दिया गया. पर अमीषा के पिता और राकेश रोशन के घरेलू संबंध होने के कारण ये रोल आखिरकार अमीषा को ही मिला.

हालांकि दूसरी फिल्म के लिए अमीषा को खासी मेहनत करनी पड़ी. फिल्म गदर के लिए 500 लड़कियों का ऑडिशन लिया गया, जिसमें से 22 को स्क्रीन टेस्ट के लिए चुना गया. अमीषा भी इस 22 में थी. 12 घंटे ऑडिशन लेने के बाद अमीषा को ‘गदर- एक प्रेम कथा’ की मुख्य अभिनेत्री के तौर पर फाइनल किया गया.

इस फिल्म के लिए अमीषा को ‘फिल्मफेयर स्पेशल परफॉरमेंस अवार्ड’ मिला. शायद आप ये बात भी नहीं जानते होंगे कि रिलीज के बाद ‘गदर’ 21वीं सदी की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बनी.

केतन मेहता की फिल्म ‘मंगल पाण्डे – द राइजिंग’ में अमीषा की कास्टिंग प्रोसेस बड़ी दिलचस्प रही थी. इस फिल्म में उन्हें आमिर खान की सलाह पर ऐश्वर्या राय के रिप्लेसमेंट के रूप में चुना गया था, क्योंकि आमिर ने उन्हें बीबीसी के एक शो में देखा था. यहीं आमिर को उनका आई क्यू लेवल भा गया और उन्हें इस फिल्म में बंगाली महिला के किरदार के लिए साइन कर लिया गया.

अमीषा पटेल अपनी निजी जिन्दगी को लेकर भी खासी चर्चा में रहती हैं. पहले विक्रम भट्ट के साथ अपने संबंधों को लेकर और उसके बाद अपने पारिवारिक झमेलों को लेकर. खबरों की मानें तो उनके भाई अश्मित पटेल के साथ भी उनके रिश्ते काफी कड़वे हैं. अपने पापा के खिलाफ तो वो कोर्ट केस भी कर चुकीं हैं. उन्होंने अपने पिता पर आरोप लगाया है की उन्होंने मेरे कमाए हुए पैसों का इस्तेमाल फैमिली बिजनेस को पटरी पर लाने में किया. उन्होंने अपने पिता पर 12 करोड़ रूपये के हेरफेर का आरोप लगाया और साथ ही पैसे वापसी की मांग भी की थी.

लालू यादव ढूंढ़ रहे हैं ‘सूटेबल बहू’

राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उन की बीवी राबड़ी देवी को ‘सूटेबल बहू’ की तलाश है. उन्हें ऐसी बहू चाहिए, जो उन का और उन के घरपरिवार का खयाल रखे. नौकरी करने वाली या राजनीति करने वाली बहू उन्हें कतई नहीं चाहिए. उन्हें सीधीसादी घरेलू लड़की ही चाहिए.

लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि लड़की के लिए कोई खास क्राइटेरिया नहीं है. वे राबड़ी देवी जैसी सोच वाली सीधीसादी लड़की खोज रहे हैं, जो हर हाल में साथ निभाए और परिवार का खयाल रखे.

लालूराबड़ी के बेटे तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव बिहार के ‘मोस्ट ऐलिजिबल’ बैचलर हैं. उन के बड़े बेटे तेजप्रताप बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं और छोटे बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री हैं. दोनों के लिए जोरशोर से लड़की देखने और चुनने की कवायद शुरू कर दी गई है.

लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटे साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर विधानसभा पहुंचे थे और उस के बाद नीतीश सरकार में मंत्री बनाए गए थे. तेजप्रताप यादव ने महुआ विधानसभा सीट से चुनाव जीता था और तेजस्वी यादव ने राघोपुर सीट से.

लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी दावा करते हैं कि वे अपने दोनों बेटों की शादी में दहेज नहीं लेंगे. राबड़ी देवी इस में एक बात और जोड़ती हैं कि दहेज तो नहीं लेंगे, लेकिन कोई गाय देना चाहेगा, तो जरूर ले लेंगे.

साथ ही, वे यह भी कहती हैं कि उन्हें गुणवान और सुंदर बहू चाहिए. तेजप्रताप यादव भी शादी को ले कर पूछे गए सवालों के जवाब में कहते हैं कि वे अपने मातापिता की पसंद की लड़की से ही शादी करेंगे. लालूराबड़ी के 2 बेटे और 7 बेटियां हैं. सातों बेटियों की शादी हो चुकी है. मीसा भारती, रागिनी, राजलक्ष्मी, हेमा, रोहिणी, चंदा और धन्नु लालू की बेटियां हैं. सभी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां संभाल रही हैं.

बड़ी बेटी मीसा भारती को पिछले साल राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था. उन के पति शैलेश कुमार इंजीनियर हैं और उन के 2 बच्चे हैं. पिछले साल यह हवा जोरों से चली थी कि बाबा रामदेव के किसी रिश्तेदार की बेटी से तेजप्रताप यादव की शादी तय हो चुकी है और उस के बदले बिहार के हाजीपुर में बाबा रामदेव को डेरी फार्म खोलने के लिए जमीन मुहैया की जाएगी. यह बात बाद में अफवाह साबित हो कर रह गई.

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटों को राजनीति में सैटल कर दिया है और अब उन्हें उन की शादी कर देनी चाहिए.

उन के इस मजाक पर तेजप्रताप यादव तैश में आ गए और कह डाला कि मोदी अपने बेटे की शादी क्यों नहीं करते हैं? क्या वह नपुंसक है? उन की इस बात पर बिहार की सियासत गरमा गई, तो लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को उस पर पानी डालने के लिए आगे आना पड़ा.

गोद लिए बच्चों का दर्द भी समझिए

गोद लेना अच्छी बात है, पर अकसर देखा गया है कि जहां लड़कियों को गोद लिया जाता है, वहां पुरुष अभिभावक उन लड़कियों से बदतमीजी भी कर डालते हैं. अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश का एक मामला आया, जिस में एक पतिपत्नी ने 7 साल की बच्ची को रिश्तेदार से गोद लिया, पर कुछ ही दिन में पड़ोसियों को लगने लगा कि लड़की के साथ कुछ गलत हो रहा है, क्योंकि वह रोती थी तो पड़ोसियों को आवाजें आ जाती थीं.

पड़ोसियों ने पूछताछ भी की, पर उन्हें टाल दिया गया. पर एक दिन जब गोद लेने वाला उस की लाश ले जाता दिखा, तो पुलिस में शिकायत की गई. पोस्टमार्टम में छोटी लड़की पर कई घाव दिखे और पता चला कि गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस पर जलने के निशान भी थे. उस लड़की के साथ गुदा मैथुन भी होता था.

गोद लेने वाले को मौत की सजा तो नहीं मिली, पर 7 साल की मिली और यह पक्का हो गया कि जब तक वह बाहर आएगा तब तक न उस की बीवी बचेगी, न घर. अफसोस इस बात का है कि जिन लोगों को छोटे बच्चे अपनी छाया समझते हैं, वे ही उन के साथ गलत काम करते हैं और यह सारे देश में गरीबोंअमीरों सब जगह बुरी तरह हो रहा है. आमतौर पर डर के मारे छोटी बच्चियां चुप रह जाती हैं, क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं होता है कि उन के साथ जो किया जा रहा है, वह कितना गलत है.

इस वहशीपन को रोकने के लिए अकसर सख्त कानूनों की मांग की जाती है, पर यह न भूला जाए कि 7-8 साल की बच्ची कानून की पनाह में नहीं जा सकती. जरूरत तो इस बात की है कि सैक्स के भूखों को समझाया जाए, पर दुनिया में ऐसा कोई सबक नहीं लिखा गया है, जो हर लड़केआदमी को पढ़ाया जा सके.

बच्चों को प्यार और दुलार चाहिए और उस के बहाने उन से गलत काम के खिलाफ मुहिम चलनी चाहिए, जो लगातार लोगों को समझाए कि जैसे लोग आमतौर पर दूसरे की जेब पर डाका नहीं डालते, वैसे ही किसी लड़की, छोटी या बड़ी के साथ मनमानी नहीं की जा सकती. यह समझा जाता है कि इस का पाठ तो लोग खुदबखुद समझ लेंगे, जबकि ऐसा नहीं है.

देशभक्ति, राष्ट्रगान के समय खड़े होना, जय भारत बोलना वगैरह के नारे लगाने की जगह बच्चियों और औरतों को बचाएंगे, उन की इज्जत रखेंगे, उन्हें छेड़ेंगे नहीं के नारे लगने चाहिए. घरघर में यह पाठ पढ़ाना चाहिए, क्योंकि ये गुनाहगार घर के अंदर ज्यादा हैं, बाहर कम. गुनाह के बाद सख्त सजा देना उपाय नहीं है, गुनाह रोकना उपाय है.

शर्मनाक : क्या तारा को मिलेगा इंसाफ?

तकरीबन 3 साल तक चली लंबी जांचपड़ताल के बाद झारखंड की गोल्डन गर्ल और नैशनल लैवल की निशानेबाज तारा शाहदेव को इंसाफ मिलने की उम्मीदें जगी हैं. 23 मई, 2017 को सीबीआई के स्पैशल जज फहीम किरमानी की अदालत में सीबीआई ने झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद, तारा के पति रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन और उस की मां कौशल्या देवी के खिलाफ कांड संख्या-9/2015 की जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की. पिछले 3 सालों से दिमागी, जिस्मानी और माली परेशानी झेल रही तारा शाहदेव कहती हैं कि उन्हें इंसाफ जरूर मिलेगा. रंजीत ने अपना धर्म छिपा कर धोखे से उन से शादी की थी.

7 जुलाई, 2014 को तारा और रंजीत की शादी हुई थी. शादी करने के लिए रकीबुल उर्फ रंजीत ने अपना धर्म छिपाया था. शादी के दूसरे दिन जब तारा शाहदेव को पता चला कि रंजीत असल में रकीबुल हसन है, तो उन के ऊपर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. वह उन पर धर्म बदलने का दबाव बनाने लगा.

रकीबुल ने 25 मौलवियों को अपने घर बुलाया और तारा को धर्म बदलने पर जोर देने लगा. तारा ने रोतेबिलखते धर्म बदलने से मना किया, तो उन्हें कुत्तों से कटवाया गया. रांची के हिंदपीढ़ी पुलिस थाने में दर्ज अपनी रिपोर्ट में तारा शाहदेव ने कहा है कि उन की 40 दिनों की शादीशुदा जिंदगी किसी खौफनाक सपने की तरह रही.

तारा की आंखों में आज भी खौफ साफ नजर आता है. रीढ़ की हड्डियों में तेज दर्द की वजह से वे ठीक ढंग से खड़ी नहीं हो पाती हैं, लेकिन उन के इरादे बुलंद हैं और वे फिर से निशानेबाजी में वापसी कर रकीबुल को सजा देना चाहती हैं.

तारा शाहदेव कहती हैं, ‘‘मुझे फिर से नैशनल और इंटरनैशनल लैवल की शूटिंग प्रतियोगिताओं में मैडल जीतते देख रकीबुल को भयंकर चोट पहुंचेगी.’’

तारा शाहदेव मामले के आरोपी रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान और उस की मां कौशल्या देवी उर्फ कौसर परवीन को रांची पुलिस की स्पैशल टीम ने 27 अगस्त को दिल्ली में दबोच लिया था.

तारा शाहदेव झारखंड के गुमला जिले के पालकोट इलाके के नागवंशी राजपरिवार से ताल्लुक रखती हैं. तारा के पिता लाल अंबिका नाथ शाहदेव और उन के छोटे भाई लाल देविका नाथ शाहदेव को जमींदारी के तौर पर सिसई के बिरकेरा गांव के आसपास का इलाका मिला हुआ है.

तारा के अलावा रंजीत की नौकरानी हरिमति ने भी पुलिस को बताया है कि रंजीत और उस की मां तारा की पिटाई किया करते थे.

उधर पुलिस भी रंजीत के 3 धर्मों की कहानी में उलझ कर रह गई. रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान ने पुलिस को बताया था कि वह पहले सिख था और साल 2007 में तांत्रिक आरिफ से पहचान होने के बाद वह धर्म बदल कर मुसलिम हो गया और अपना नाम रकीबुल हसन रख लिया. रंजीत

की मां कौशल्या देवी पहले मुसलिम थी और उस का नाम कौसर परवीन था. वह रंजीत के पंजाबी पिता सरदार हरमन सिंह के यहां बरतन धोने का काम करती थी और उन्हीं से शादी कर ली थी.

कौशल्या देवी ने हिंदू बन कर हरमन से शादी तो की, पर इसलाम धर्म नहीं छोड़ा था.

रंजीत के बैंक अकाउंट में रोहित नाम के आदमी के अकाउंट से लाखों रुपए ट्रांसफर होने का भी खुलासा हो चुका है. रांची के अरगोड़ा चौक और हजारीबाग में रोहित कंप्यूटर का कारोबार करता है. पुलिस यह पता कर रही है कि रोहित किस काम के एवज में रंजीत के अकाउंट में पैसा डालता था.

तारा शाहदेव कहती हैं कि रंजीत सरकार में पैठ बना कर अपने काले और गैरकानूनी धंधों को बेरोकटोक चलाना चाहता था. इतना ही नहीं, कौशल बायोटैक प्राइवेट लिमिटेड नाम के एनजीओ की आड़ में वह हवाला का काम भी करता था. एनजीओ के जरीए वह पेड़पौधे लगाने का काम करना दिखाता था.

रंजीत के घर आने के बाद मांबेटा डेढ़ 2 घंटे तक बातचीत करते थे. इस दौरान तारा को सोने नहीं दिया जाता था.

पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि रंजीत ने लड़कियों को फंसा कर उन्हें देह धंधे में धकेल कर काफी दौलत बना ली थी. वह अफसरों, मंत्रियों और रसूखदार लोगों को लड़की सप्लाई कर उन से अच्छा रिश्ता और ढेरों रुपए भी बना लेता था. उस के अशोक विहार के मकान नंबर एफ-95 के आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि उस के मकान में अकसर लड़कियां आतीजाती रहती थीं. उस के यहां रात में बड़ीबड़ी गाडि़यों से भी लोग आते थे.

तारा का मामला सामने आने के बाद ही रंजीत के करीबी झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार, विजीलैंस मुश्ताक अहमद को सस्पैंड कर दिया गया था. मुश्ताक ने ही तारा को रंजीत से शादी करने की सलाह दी थी. तारा ने मुश्ताक पर शादी करने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया है.

तारा का आरोप है कि वे ईद के मौके पर मुश्ताक के घर गई थीं. उन्होंने वहां देखा कि कुछ औरतों पर इसलाम धर्म कबूल करने का दबाव बनाया जा रहा था. मुश्ताक जामताड़ा और सिमड़ेगा में जिला और सैशन जज रह चुका है.

रंजीत पुलिस को बता चुका है कि उस का रिश्ता बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कई जजों से है, जिन से मिल कर वह जमानत दिलवाने का धंधा करता था.

झारखंड पुलिस ने जब रंजीत को गिरफ्तार किया था, तो उस के पास से 6 सिम कार्ड बरामद हुए थे, जिस में से 2 न्यायिक अफसरों के नाम से थे.

रंजीत सिंह कोहली के पासपोर्ट की सिफारिश रिटायर्ड जज आईडी मिश्रा ने की थी. पासपोर्ट का नंबर के-138875 है. पासपोर्ट रंजीत सिंह कोहली के नाम से है और पिता का नाम हरमन सिंह कोहली लिखा हुआ है. साल 2012 में तत्काल कोटे से यह पासपोर्ट 24 घंटे में बन गया था.

रंजीत के रांची के 3 मकानों की तलाशी ली गई, तो वहां से 2 राइफल, 3 कंप्यूटर सीपीयू, एक प्रिंटर, 36 सिम कार्ड, 15 मोबाइल फोन और 30 फाइलें मिली थीं. रंजीत के ब्लेयर अपार्टमैंट्स के फ्लैट, अशोक नगर के रोड नंबर-6 के मकान और अशोक विहार के किराए के मकान की छानबीन की गई थी.

झारखंड पुलिस के सूत्रों की मानें, तो रंजीत ने पुलिस को दिए बयान में 45 आला अफसरों और जजों के नाम लिए हैं. झारखंड के मंत्री सुरेश पासवान और हाजी हुसैन, झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके इंदरसिंह नामधारी, देवघर के जिला जज पंकज श्रीवास्तव, चतरा के जिला जज रहे आईडी मिश्रा, डीएसपी सुरजीत कुमार और अमिष नेथानी, वन विभाग के अफसर पारितोष उपाध्याय समेत एक महिला जज का भी नाम लिया है.

इस मामले की जांच का काम सीबीआई को सौंपा गया था और समूची जांच रिपोर्ट आने के बाद कई और चेहरों से नकाब हटने की उम्मीद बढ़ गई है.

मैं हार मानने वाली नहीं – तारा शाहदेव

पिछले 3 सालों से तारा शाहदेव जिस्मानी और दिमागी तौर पर काफी दर्द झेल रही हैं. उन का निशानेबाजी का कैरियर भी चौपट हो गया है. जिस के साथ शादी रचा कर उन्होंने खुशहाल जिंदगी का सपना देखा था, उसी ने उन की जिंदगी को तबाह कर डाला.

तारा कहती हैं, ‘‘में एक स्पोर्ट्स वूमन हूं और जीतने का हौसला और जुनून मेरे अंदर है. मैं फिर से अपनी खेल की दुनिया में वापसी करूंगी. सरकार, कानून और समाज से बस इतना ही चाहती हूं कि वह कुछ ऐसा करे, जिस से फिर किसी तारा के साथ ऐसा हादसा न हो. मुझे जितने मैडल मिलेंगे, रकीबुल के गाल पर उतने ही थप्पड़ पड़ेंगे.’’

मैं कौमेडी करना चाहती हूं : नीलू वाघेला

राजस्थानी फिल्मों से टैलीविजन के धारावाहिक ‘दीया और बाती हम’ में भाबो का किरदार निभा कर नाम कमा चुकी नीलू वाघेला राजस्थान की हैं. बचपन से ही ऐक्टिंग का शौक रखने वाली नीलू वाघेला एक थिएटर आर्टिस्ट हैं. उन्होंने 11 साल की उम्र से अदाकारी के क्षेत्र में कदम रखा. उन की राजस्थानी फिल्म ‘बाई चाली सासरिय’ काफी कामयाब रही, जिस पर हिंदी की फिल्म ‘साजन का घर’ बनी थी. उन्होंने तकरीबन 50 राजस्थानी फिल्में और 5 गुजराती फिल्में की हैं.

नीलू वाघेला अपनी कामयाबी का श्रेय अपने मातापिता और पति अरविंद कुमार को देती हैं. उन के 2 बच्चे हैं, बेटा कैजर और बेटी वंशिका.

धारावाहिक ‘दीया और बाती हम’ की कामयाबी को देखते हुए इस के सीक्वल के तौर पर ‘तू सूरज मैं सांझ पियाजी’ एक बार फिर से ‘स्टार प्लस’ चैनल पर आया है. इस में नीलू वाघेला भाबो के ही किरदार में दूसरी पीढ़ी का स्वागत करती हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

धारावाहिक ‘दीया और बाती हम’ के सीक्वल ‘तू सूरज मैं सांझ पियाजी’ में क्या खास है?

इस सीरियल में मैं अपने आने वाले राठी परिवार का स्वागत करती हूं. 20 साल आगे बढ़ चुकी इस कहानी में मैं भी ओल्ड हो चुकी हूं, लेकिन मेरा स्वभाव पहले जैसा ही है. हम ने केरल में शूटिंग की है.

भाबो के किरदार को निभाने के बाद आप अपनेआप में क्या बदलाव महसूस करती हैं?

 मेरी सोच काफी बदल चुकी है. आज मैं देखती हूं कि लोग बहुत बिजी रहने के बावजूद परिवार वालों के साथ मिलने की कोशिश करते हैं. वे उन्हें याद करते हैं.

मैं अपने इस किरदार को घर पर भी ले जा चुकी हूं. इस के अलावा मैं ने यह भी सीखा है कि अपनी कोई भी समस्या को आप खुद ही सुधार सकते हैं, इस की जिम्मेदारी किसी पर थोपना ठीक नहीं. इनसान को हमेशा सच की लड़ाई लड़नी चाहिए.

बीच में ऐसा कहा गया था कि आप यह शो छोड़ने वाली हैं. इस की वजह क्या थी?

 उन दिनों मेरी तबीयत काफी खराब रहती थी. रोज 12 से 14 घंटे काम करना पड़ रहा था. ऐसे में मुझे आराम नहीं मिल पा रहा था, इसलिए मैं ने सोचा कि मैं थोड़ा रैस्ट कर लूं.

क्या कभी ऐसा लगा कि आप भाबो के किरदार से कुछ और अच्छा काम कर सकती थीं?

 मेरा यह पहला टैलीविजन शो था. मैं ने इस किरदार को सही माने में जीया है. यह मेरे दिल के बहुत करीब है. इसे करते हुए मुझे बहुत सुकून मिला और ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं कुछ और अच्छा कर सकती थी.

आप थिएटर आर्टिस्ट भी हैं. उसे कितना मिस करती हैं?

 मैं आज भी थिएटर करती हूं. मुझे गर्व होता है कि मैं आज भी अपने दर्शकों के बीच में जाती हूं. मैं ने किसी को छोड़ा नहीं है.

दरअसल, थिएटर करने के बाद आप नैचुरल बन जाते हैं. पहले लोग थिएटर को असल नहीं, बल्कि बनावटी ऐक्टिंग करने की जगह बताते थे, लेकिन आजकल ऐसा नहीं है. इस से आप का आत्मविश्वास बढ़ता है और कैमरे का डर खत्म हो जाता है.

क्या जिंदगी में कुछ मलाल रह गया है?

 मैं कौमेडी करना चाहती हूं, क्योंकि लोगों को हंसाना भी एक कला है.

क्या औरतों को प्रेरित करने वाले इस तरह के धारावाहिकों का औरतों पर कुछ असर पड़ता है?

 मुझे याद आता है कि राजस्थान में एक महिला पुलिस अफसर ने मुझे पास बुला कर धन्यवाद दिया था. उन का कहना था कि वे जब आईपीएस बनना चाहती थीं, तो उन्हें बहुत सारी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं.

क्या टैलीविजन इंडस्ट्री में काबिलीयत के मुताबिक पैसे नहीं मिलते हैं? क्या इस वजह से कई कलाकार टैलीविजन इंडस्ट्री छोड़ जाते हैं?

 ऐसा मेरे साथ नहीं हुआ. ये सभी बातें आप के स्वभाव और तरीके पर निर्भर करती हैं. लेकिन अगर वाकई कोई समस्या आ जाती है, तो उसे मिलबैठ कर सुलझाया जा सकता है.

इतना सबकुछ दिखाए जाने के बाद भी आज औरतें सताई जाती हैं. आप किसे जिम्मेदार मानती हैं?

इस के लिए हमें अपनी लड़कियों को इतना मजबूत बनाना होगा कि वे किसी भी मुसीबत का डट कर मुकाबला कर सकें. उन्हें पहनावे से ले कर तालीम हासिल करने तक की पूरी आजादी मिलनी चाहिए, जिस से उन्हें हिम्मत मिले.

मैं अपनी 10 साल की बेटी को आज  के तौरतरीके सिखाती हूं और समझाती भी हूं कि कोई अगर गलत तरीके से छुए, तो तुम जोर से चीखोगी या भागोगी. बच्चों को मजबूत बनाने के साथसाथ उन की सोच को भी नया बनाना पड़ेगा.

परीक्षाओं का मखौल तो न उड़ाएं

बिहार के वैशाली जिले के विशुन रौय इंटर कालेज की रूबी राय के पिछले वर्ष 89 परसैंट नंबर लाने पर जो भंडाफोड़ हुआ था, उस का नतीजा है कि इस साल बिहार बोर्ड ने सही कदम सख्ती से उठाए और पास होने वाले 12.40 लाख में से सिर्फ 5 लाख रह गए. अब बिहार में परीक्षाएं मखौल बन गई हैं. वहां नकल, पेपर लीक होना, आंसर शीटों को बदलना और आखिरी सूची में नंबर बढ़वाना लाखों रुपयों में नहीं, बल्कि सैकड़ों में ही हो जाता है, क्योंकि नंबर बढ़वाने में इतने ज्यादा लोग लगे रहते हैं कि थोड़ेथोड़े भी दें, तो बहुत जमा हो जाते हैं.

आमतौर पर इस के लिए दोष छात्रों पर मढ़ा जाता है कि वे नकल करते हैं. असल में गुनाहगार वे पढ़ाने वाले हैं जो सरकार से वेतन पूरा लेते हैं, पर पढ़ाने के नाम पर जीरो हैं. माना कि बिहार के गांवकसबों में पढ़ने की इच्छा कम है, पर वह कम इसलिए है कि जाति की ऊंचनीच, गुंडागर्दी, बेईमानी, पाखंड, निकम्मापन, निठल्लापन बिहार की रगरग में भरा है. वही बिहारी जो बाहर जा कर हजारों कमाता है, बिहार के घुटन से भरे भ्रष्ट माहौल में न काम करना चाहता है, न पढ़नालिखना.

बिहार बोर्ड ने सख्ती कर के अच्छा किया है, पर यह सख्ती केवल छात्र ही क्यों सहें? हर फेल छात्र पर उस के मास्टरों पर 5 सौ रुपए से एक हजार रुपए का फाइन लगना चाहिए. वे मजे में पूरा वेतन लेते रहें और 12वीं की सीधीसादी पढ़ाई भी न करा सकें, तो उन का क्या फायदा?

बिहार में पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि हाथ के काम पर भी जोर देना जरूरी है. वहां की पढ़ाई फिलहाल केवल अधकचरे पंडे तैयार कर रही है, जो रट्टा मार कर कुछ नंबर ऐसे पाते हैं, जैसे मंत्र रट लिए हों.

छात्रों को पढ़ाई के साथसाथ हुनरमंद भी बनाना जरूरी है, ताकि 12वीं के बाद अगर वे चाहें तो कोई कामधंधा कर सकें. और स्कूलों में लगे अरबों रुपयों का क्या फायदा, अगर वे इतना सा भी न सिखा सकें. स्कूलों में ‘जय माता’ की जगह ‘जय टै्रक्टर देवा’ सिखाया जाए, तो 12वीं की पढ़ाई ज्यादा कारगर होगी.

शासन को इस बुरे नतीजे के लिए फाइन भी करना चाहिए और जहांजहां 10-15 प्रतिशत बच्चे पास हुए हैं, वहांवहां सारे मास्टरों को नौकरी से 3 साल की छुट्टी बिना वेतन की देनी चाहिए.

छात्र को ही नहीं, बल्कि मंत्री से ले कर स्कूल चपरासी तक को इस बुरे नतीजे का फल भुगतना चाहिए.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें