नई भर्तियों से मजबूत होगा स्वास्थ्य विभाग ढाँचा

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पिछले पौने पांच वर्षों में साढ़े चार लाख सरकारी नौकरियां देकर अपना संकल्प पूरा किया.  कोविड 19 महामारी के दौरान भी योगी का मिशन रोज़गार धीमा नहीं पड़ा. समय की ज़रुरत के अनुसार स्वास्थ्य  विभाग के खाली पद भर कर  स्वास्थ्य   इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत किया.

स्वास्थ्य क्षेत्र के ढांचे को  सुदृढ़ बनाने की दिशा में उ. प्र. लोक सेवा आयोग का बड़ा योगदान रहा जिसने अन्य विभागों के साथ साथ स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा में समयबद्ध , निष्पक्ष और त्वरित तरीके से भर्तियां करके नागरिकों को राहत दी.  सार्वजनिक हित को दृष्टिगत रखते हुए, उ.प्र. लोक सेवा आयोग ने स्वास्थ्य विभाग से सम्बन्धित पदों का चयन जल्द से जल्द वरीयता के आधार किया  जिससे चुने गए अभ्यर्थी शीघ्रातिशीघ्र अपने नियत पदों पर दायित्व संभाल सके. इस क्रम में चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता, शुचिता और पारदर्शिता को अक्षरशः सुनिश्चित करते हुए समयबद्ध कार्यवाही की गयी .

इस क्रम में एलोपैथिक चिकित्साधिकारी (श्रेणी-2) के 15 संवर्गों के 3620 पदों पर चयन सम्बन्धी कार्यवाही का विज्ञापन आयोग द्वारा 28.05.2021 को जारी किया गया जिसमें आवेदन प्राप्त करने की अंतिम तिथि 28 जून थी.  त्वरित कार्यवाही करते हुए आयोग ने अंतिम तिथि के एक महीने में अभ्यर्थियों का साक्षात्कार प्रारम्भ कर दिए. लगभग ढाई महीने मात्र में समस्त संवर्गों के लिए साक्षात्कार पूरे कर लिए गए.  साक्षात्कार समाप्त होने की तिथि 07.10.2021 थी लेकिन उससे पहले ही साक्षात्कार प्रारंभ होने के महीने भर से पहले ही प्रथम दो संवर्ग पीडियाट्रिक्स / एनेस्थेटिस्ट के परिणाम 18 अगस्त , 2021 को जारी कर दिए गए.  यही नहीं, समस्त संवर्गों का अंतिम परिणाम साक्षात्कार समाप्त होने के महीने भर के अंदर ही दिनांक 2.11. 2021 तक जारी कर दिया गया.

इस प्रकार युद्ध स्तर पर कार्य करते हुए प्राथमिकता के आधार पर एलोपैथिक चिकित्सा विशेषज्ञों के 15 संवर्गों यथा पीडियाट्रिशियन, एनेस्थेटिस्ट फिजिशियन, पैथालाजिस्ट इत्यादि के 3620 पदों पर चयन हेतु 4062 अभ्यर्थियों का साक्षात्कार सम्पन्न किया गया. लगभग चार माह में 1237 अभ्यर्थियों को चयन के लिए उपयुक्त पाया गया.

इसके अतिरिक्त चिकित्सा विभाग के अन्य संवर्गों यथा स्टेटीशियन कम प्रवक्ता, सहायक आचार्य पैथालाजी, कम्युनिटी मेडिसिन साइक्रियाटिक तथा एनेस्थीसिया के लगभग 82 पदों का परिणाम जारी किया गया तथा एम. ओ. एच. सह सहायक आचार्य के 05 तथा सहायक आचार्य, ब्लड बैंक के 15 पदों का भी साक्षात्कार सम्पन्न हो चुका है. उक्त पदों का परिणाम इसी सप्ताह जारी कर दिया जायेगा जबकि सहायक आचार्य के शेष पदों पर यथाशीघ्र साक्षात्कार कराने की कार्यवाही की जा रही है.

कोविड महामारी में स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आयोग ने पारदर्शिता, निष्पक्षता सुनिश्चित रखते हुए अपनी गतिशीलता को और आगे बढ़ाया है. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं उ.प्र. के अंतर्गत स्टाफ नर्स / सिस्टर (ग्रेड-2) (महिला एवं पुरुष) के 4743 पदों का विज्ञापन 16 जुलाई को जारी किया गया. आवेदन के लिए एक माह का समय दिया गया और मात्र डेढ़ मास में तीन अक्टूबर को लिखित परीक्षा आयोजित कर दी गई.उक्त पदों का निम्नवत् श्रेणियों में अंतिम चयन परिणाम औपबंधिक रूप से निम्नवत जारी कर दिया गया है

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के 2582 पदों ( 50 पुरुष एवं 2532 महिला) के सापेक्ष 50  पुरुष तथा 1627 महिला अभ्यर्थी चयनित चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण विभाग के 1235 पदों ( 90 पुरुष एवं 1145 महिला) के सापेक्ष 90 पुरुष तथा 623 महिला अभ्यर्थी चयनित के. जी. एम. यू. के 926 पदों ( 46 पुरुष एवं 880 महिला) के सापेक्ष 46 पुरुष तथा 578 महिला अभ्यर्थी चयनित

उपरोक्त तीनों श्रेणियों में कुल 3014 अभ्यर्थी चयनित हुए

आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम अर्हता अंक न पाने के कारण 1729 पद भर नहीं सके.आयोग के अध्यक्ष संजय श्रीनेत ने बताया कि विज्ञापन जारी होने के लगभग पांच  माह में ही स्टाफ नर्स के 4743 पदों पर चयन की प्रक्रिया पारदर्शी रूप से पूर्ण की गयी जो अपने आप में एक प्रेरणास्पद मानदण्ड है. उन्होंने इसके लिए आयोग कार्मिकों की प्रतिबद्धता और संकल्प और आयोग की कार्य संस्कृति को सराहा जिन्होंने कोविड 19 महामारी की अवधि में भी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृह बनाए रखने के लिए राष्ट्रहित में अपना योगदान किया. उन्होंने बताया कि स्टाफ नर्स (पुरुष) की शेष 448 रिक्तियों का विज्ञापन भी  इसी माह जारी कर दिया जायेगा .

Manohar Kahaniya: छिन गया मासूम का ‘आंचल’

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उद्योगपति पवन ग्रोवर ने अपनी बेटी आंचल की शादी बड़े कारोबारी सूर्यांश खरबंदा से की थी. शादी में उन्होंने करीब एक करोड़ रुपए खर्च किए थे. शादी के करीब ढाई साल बाद ऐसा क्या हुआ कि आंचल की लाश पंखे से झूलती हुई मिली?

19नवंबर, 2021 की देर रात करीब साढ़े 11 के आसपास कानपुर के अशोक नगर में मसाला कारोबारी

सूर्यांश खरबंदा के घर के बाहर होने वाले शोरशराबे ने सोसाइटी में रहने वाले अन्य लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा. सूर्यांश खरबंदा देशविदेश में विख्यात मसाला कंपनी एमडीएच के डिस्ट्रीब्यूटर हैं. उन के घर के बाहर उस रात इतना ज्यादा शोरशराबा हो रहा था कि सोसाइटी वालों ने अपने घर से बाहर निकल कर सूर्यांश के घर के बाहर जमावड़ा लगा दिया था.

‘‘गेट खोलो, हम आंचल के मायके के लोग हैं. जल्दी गेट खोलो, वरना पुलिस को बुलाएंगे. बाहर निकलो.’’ ऐसा शोर अशोक नगर की उस पौश सोसाइटी में शायद पहली बार मचा था.

आंचल खरबंदा सूर्यांश की पत्नी थी और उस के मातापिता और भाई मकान के बाहर से घर में घुसने के लिए चीखचीख कर गुहार लगा रहे थे.

एक तरफ आंचल के मायके वालों का मकान में जल्दी घुसने का शोर, दूसरी तरफ मकान के भीतर से कुत्तों के भौैंकने का शोर. इस शोर की वजह से कौन क्या कहना चाह रहा था, किसी को कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था.

कुछ देर के संघर्ष के बाद भी जब सूर्यांश के मकान का गेट नहीं खुला तो आंचल की मां रीना ने फोन कर पुलिस को इस बारे में सूचना दे दी.

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इलाके का थाना नजीराबाद अशोक नगर से मात्र 10 मिनट की ही दूरी पर था. जब तक पुलिस आती, तब तक आंचल के मायके वालों ने इंतजार किया, लेकिन घर के भीतर से कुत्तों के भौंकने का शोर लगातार जारी रहा.

इस बीच मोहल्ले में इकट्ठा बाकी लोगों की भीड़ ने आंचल के मायके वालों से मकान में घुसने की वजह पूछी. इस से पहले कि वह कुछ बताते, पुलिस की गाड़ी मोहल्ले में जमी भीड़ को हटाते और सायरन बजाते हुए मकान के सामने आ पहुंची.

पुलिस के गाड़ी से उतरते ही आंचल की मां और पिता दोनों दौड़ कर उन के पास मदद की गुहार लगाते हुए पहुंच गए. आंचल के पिता पवन ग्रोवर रोते हुए थानाप्रभारी से बोले, ‘‘साहब, जल्दी दरवाजा खुलवाइए, इन्होंने अब तक मेरी बेटी को जान से मार दिया होगा. तब से मेरी बेटी फोन नहीं उठा रही है. कुछ समझ नहीं आ रहा है. न तो कोई फोन उठा रहा है और न ही कोई मकान का दरवाजा खोलने को राजी है. ऊपर से कुत्ते खुले छोड़ दिए हैं ताकि हम अंदर न घुस सकें.’’

नजीराबाद थानाप्रभारी ने पिता पवन ग्रोवर की बात सुनी और अपनी टीम को गेट खुलवाने का इशारा किया. पुलिस को दरवाजा खटखटाते हुए देख मकान में उस समय मौजूद सिक्युरिटी गार्ड ने तुरंत दरवाजा खोल दिया.

घुसने नहीं दिया घर में मौजूद पिटबुल कुत्तों ने दरवाजा खुलते ही गेट पर 7 बड़ेबड़े पिटबुल नस्ल के कुत्ते, जोकि कुत्तों में सब से खूंखार नस्ल के होते हैं, भौंकने लगे. उन्हें भौंकता देख पुलिस ने सिक्युरिटी गार्ड को डपटते हुए उन्हें अंदर करने के लिए कहा.

कुत्तों की गरदन पर लगे पट्टे को पकड़ कर दोनों गार्डों ने एकएक कर के उन्हें काबू में किया और उन सभी को मकान के अंदर एक कमरे में ले जा कर बंद कर दिया.

कुत्तों को बंद करने के बाद पुलिस और आंचल के परिवार वाले देर न करते हुए मकान में चारों ओर फैल गए और आंचल को ढूंढने लगे. मकान में उस समय सूर्यांश के परिवार का कोई भी सदस्य मौजूद नहीं था.

पहली मंजिल पर डरीसहमी घर में काम करने वाली 2 नौकरानियां राधिका और किरन किचन में एक किनारे दुबके बैठी हुई थीं. राधिका की गोद में आंचल और सूर्यांश का 2 साल का बेटा अयांश भी था. इतने में आंचल की मां रीना किचन में आई और अयांश को राधिका की गोद से छीनते हुए अपने साथ मकान में दूसरे कमरों में आंचल को ढूंढने के लिए निकल गई.

पुलिस की पूछताछ में दोनों और डर गईं और उन्होंने पुलिस अधिकारियों को आंचल को आखिरी बार उस के कमरे में देखने की बात कही. पूरे मकान में ‘आंचल…आंचल’ का शोर गूंज रहा था.

आंचल के कमरे का गेट खुला था तो पुलिस टीम कमरे में घुस कर आंचल को ढूंढने लगी. लेकिन वह अपने कमरे में मौजूद नहीं थी. इतने में पुलिस की नजर कमरे में अटैच बाथरूम में गई, जिस का दरवाजा बंद था. यह बाथरूम दरअसल अंदर से बंद था. कई बार आवाज लगाने पर और दरवाजा खटखटाने पर जब कोई जवाब नहीं मिला तो बाथरूम से सटे काले रंग के कांच की खिड़की को तोड़ा गया.

कांच टूटते ही अंदर जो कुछ पुलिस और आंचल के घर वालों ने देखा, उसे देख सब के होश उड़ गए थे. बाथरूम में पंखे से चुन्नी के सहारे फांसी पर आंचल की लाश लटक रही थी.

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आंचल को लटकता देख मायके वाले जोरजोर से चीखनेचिल्लाने और रोने लगा, ‘‘मेरी बेटी को मार ही डाला इन्होंने. मेरी बेटी इतने समय से इन के जुल्म सह रही थी. इस की ससुराल वाले खूनी हैं. हम ने इन को दहेज में और पैसे नहीं दिए तो इन्होंने मेरी बेटी का मर्डर कर दिया.’’

थानाप्रभारी ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए मायके वालों को सांत्वना दी और अपनी टीम से आंचल की लाश को पंखे से उतारने, संबंधित अधिकारियों और संबंधित विभाग को सूचना देने का इशारा किया.

पलक झपकते ही यह खबर इलाके में आग की तरह फैल गई. सब यह जान कर हैरान थे कि जिस सूर्यांश का नाम पूरे इलाके में नामचीन था, जिन की संपत्ति में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, जो इलाके में सब से संपन्न परिवारों में से एक था, उन के घर की बहू (आंचल) को दहेज के लिए प्रताडि़त किया जा रहा था.

ससुराल वालों के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

पुलिस को पहली नजर में यह मामला आत्महत्या का लगा, लेकिन आंचल की लाश को पंखे से उतारने के बाद पिता पवन ने पुलिस को आंचल की आत्महत्या का नहीं, बल्कि उस के ससुरालवालों द्वारा उस की हत्या कर उस की लाश पंखे से लटकाने की बात कही.

पवन और रीना ने घटना को हत्या बता कर आंचल के परिवार वाले जिस में, पति सूर्यांश खरबंदा, सास निशा खरबंदा, फूफा भरत ग्रोवर, बुआ मीनाक्षी ग्रोवर और अनु खुल्लर, बहनोई पुनीत कोटवानी, ननद निकिता कोटवानी और तान्या ग्रोवर पर हत्या और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाया.

थानाप्रभारी ने भी यह महसूस किया कि इतनी बड़ी घटना हो गई लेकिन आंचल के पति और सास का कहीं कोई अतापता ही नहीं था. उन से संपर्क करने के लिए उन्हें फोन किया गया, लेकिन फोन कनेक्ट नहीं हो सका.

आंचल की मौत की खबर उस के मायके के अन्य लोगों व रिश्तेदारों को रातोंरात हो गई और वे लोग शोक व्यक्त करने और मुश्किल हालात में परिवार का सहारा बनने के लिए पहुंचने लगे.

रात बहुत ज्यादा हो गई थी तो पुलिस ने आंचल की डैडबौडी पास के अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. लेकिन पोस्टमार्टम अगले दिन 20 नवंबर को सुबह होना था, इसलिए परिवार के कुछ सदस्य सूर्यांश के घर मौजूद थे तो कुछ अस्पताल के बाहर.

अस्पताल के बाहर पुलिस की पूरी फौज ने अस्पताल को घेरा हुआ था. एडिशनल डीसीपी (क्राइम) मनीष चंद्र सोनकर, एसीपी (नागराबाद) संतोष कुमार सिंह, एसीपी (गोविंद नगर) विकास कुमार पांडेय, एसीपी (बाबरपुरवा) आलोक सिंह समेत पुलिस के कई उच्च अधिकारी भी शामिल थे.

20 नवंबर की दोपहर 2 बजे आंचल का पोस्टमार्टम हुआ तो पुलिस ने अस्पताल के बाहर खड़े आंचल के मायके वालों को शव सौंपना चाहा तो उन्होंने आंचल का शव स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया. घर वालों ने जल्द से जल्द आंचल की हत्या के आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की. घर वालों ने आंचल के शव के साथ ही सड़क जाम करते हुए आंचल को न्याय दिलाने की मांग करते हुए नारेबाजी की.

मायके वालों ने कर दी सड़क जाम

करीब 3 घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस अधिकारियों ने उन्हें समझाया और आरोपियों को जल्द पकड़ने और सजा दिलाने का आश्वासन दिया तो वह शांत हुए. फिर पुलिस ने उन्हें घर भेज दिया गया.

आंचल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस प्रशासन के हाथों में थी, जिस के अनुसार आंचल के शरीर पर किसी तरह के जख्म का निशान मौजूद नहीं था और मरने का कारण फांसी को ही बताया गया.

एक तरफ तो आंचल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मरने की वजह फांसी थी, लेकिन दूसरी ओर आंचल के पति और सास दोनों का नदारद होना पुलिस के दिमाग में घटना का कुछ और ही रूप बयान कर रहे थे.

पुलिस टीम ने वक्त बरबाद न करते हुए सब से पहले आंचल के पति सूर्यांश को तलाश करने की कोशिश की. लेकिन सूर्यांश का फोन बंद होने की वजह से उस का पता लगा पाना पुलिस के सामने एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रहा था.

सूर्यांश के फोन की लास्ट लोकेशन और उस से पहले की लोकेशन का जायजा लेने के बाद पुलिस की टीम ने पूरे प्रदेश में अपने मुखबिरों को सूर्यांश का पता लगाने को लगा दिया.

करीब 7 घंटों की लगातार मेहनत के बाद पुलिस टीम को बड़ी कामयाबी हाथ लगी. राजधानी लखनऊ से सूर्यांश और उस की मां निशा खरबंदा को उन के एक रिश्तेदार के घर से खोज निकाला और उन्हें गिरफ्तार कर आगे की काररवाई और पूछताछ के लिए उन्हें कानपुर नजीराबाद थाने लाया गया.

आंचल के पति सूर्यांश और सास निशा से शुरुआती पूछताछ के बाद मामला सुलझने के बजाए और उलझता चला गया. सूर्यांश और निशा ने उल्टा आंचल को ही दोषी करार करते हुए कहा कि आंचल ने ही उस के परिवार का जीना हराम कर रखा था.

सूर्यांश और निशा ने पुलिस के सामने ऐसे वीडियो दिखाए, जिस में आंचल अपने पति और सास को गालियां बकते हुए दिखाई दे रही थी.

वीडियो देख पुलिस के सामने सवाल और दुविधा दोनों ही उठ खड़े हुए थे. ऐसे में सवाल यह था कि आखिर आंचल के परिवार और सूर्यांश के बीच सच कौन बोल रहा था, ऐसे क्या कारण थे जिस की वजह से आंचल को आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ा.

आंचल सूर्यांश की शादी

कानपुर के रानीगंज, काकादेव में रहने वाले प्लास्टिक जेर्किन फैक्ट्री के मालिक पवन ग्रोवर की बेटी आंचल की अशोक नगर निवासी सूर्यांश खरबंदा, जोकि नामचीन मसाला कंपनी एमडीएच के डिस्ट्रीब्यूटर हैं, से फरवरी 2019 में शादी हुई. आंचल शादी से पहले एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया करती थी. पिता की लाडली बेटी और पूरे परिवार की आंख का तारा होने की वजह से आंचल और सूर्यांश की शादी में परिवार वालों ने किसी भी तरह की कोई कमी नहीं होने दी थी. उन्होंने आंचल की शादी में करीब एक करोड़ रुपए खर्च किए थे.

बेटी को सुखी वैवाहिक जीवन देने के लिए पिता ने पैसों की बिलकुल भी परवाह नहीं की थी. बेटी आंचल की शादी क्योंकि किसी आम लड़के के साथ नहीं, बल्कि नामचीन कारोबारी से हुई थी इसलिए पवन ने शादी के बाद अपनी बेटी की चिंता छोड़ ही दी थी.

उन्हें लगा कि उन की बेटी सुरक्षित और सुखी जीवन जी रही है, लेकिन इस की हकीकत तो शादी के एक साल होने के बाद आंचल को पता चली.

आंचल और सूर्यांश की शादी को करीब साल भर हो गया था. इस बीच उन के रिश्तों में कभी भी कोई वादविवाद या टकराव जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई थी. दोनों के बीच बेपनाह प्यार था और दोनों ही एकदूसरे को लगभग हर महीने महंगे गिफ्ट्स दिया करते थे.

लेकिन साल भर बाद जब आंचल ने सूर्यांश को अपने मां और उस के पिता होने की खुशखबरी सुनाई तो इस खबर से सूर्यांश खुश नहीं हुआ.

पिछले कुछ समय से सूर्यांश ने आंचल को कानपुर में ही एक ‘पब’ खोलने की बात कही थी. जिसे ले कर सूर्यांश काफी गंभीर था. उस ने आंचल के सामने यह भी कहा था कि उसे पब खोलने के लिए करीब 70 लाख रुपयों की जरूरत है, जोकि उस के पास नहीं है.

इस से पहले कि आंचल कुछ समझ पाती, सूर्यांश ने आंचल से 70 लाख रुपयों की मांग कर डाली. आंचल ने सूर्यांश को शुरुआती दिनों में समझाया कि उस के पिता के पास उसे देने के लिए अभी इस समय कुछ भी पैसे नहीं हैं. लेकिन समय बीतने के साथ सूर्यांश आंचल से पैसों को ले कर उस पर दबाव बनाने लगा.

दोनों के बीच पैसों की बात वादविवाद, फिर छोटेमोटे झगड़े, फिर हाथापाई वाले झगड़े और बड़े झगड़े होने लगे. यह बात अब परिवार में किसी से छिपी हुई नहीं थी. लेकिन आंचल ने यह बात अपने परिवार को तब तक नहीं बताई थी, जब तक उन के बीच कोई बड़ा विवाद या झगड़ा नहीं हो गया.

दरअसल, आंचल अपने पिता और परिवार के हालात जानती थी. वह जानती थी कि उस के पिता ने उस की शादी कितनी मुश्किल से उधार ले कर करवाई थी. वह उन तक सूर्यांश के साथ होने वाले झगड़े नहीं पहुंचने देना चाहती थी.

इसलिए आंचल हर तरीके से खुद सारे दुख झेलती, खुद पर होने वाली सारी प्रताड़नाएं झेलती लेकिन अपने परिवार को इन सभी बातों से अछूता रखा हुआ था.

पैसों को ले कर सूर्यांश के साथ होने वाले झगड़े में अब उस के ससुराल वाले भी शरीक होने लगे थे. आंचल की सास निशा भी पैसों को ले कर उसे ताना मारने लगी थी.

धीरेधीरे उस की ननद निकिता और तान्या भी उस के साथ झगड़ने लगे. यही नहीं, निकिता के पति पुनीत कोटवानी की आंचल पर शुरुआत से गंदी नजर थी.

आंचल की खूबसूरती को देख पुनीत कोटवानी खुद को रोक नहीं पाता था, इसलिए पैसों की बात सुन उस ने घर पर अन्य लोगों को भी आंचल के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया था.

इस पूरे घटनाक्रम में सूर्यांश की बुआ और फूफा भी पीछे नहीं थे. एक समय बाद सूर्यांश और उस के परिवार वालों ने आंचल को इतना ज्यादा परेशान करना शुरू कर दिया था कि हार मान कर आंचल को अपने मायके में अपनी मां और पिता को उस पर होने वाली प्रताड़नाओं के बारे में बताने को मजबूर होना पड़ा.

आत्महत्या के लिए उकसाता था सूर्यांश

पुलिस ने मृतका के मातापिता के बयान दर्ज किए. परिजनों ने स्पष्ट कहा कि ससुराल वालों ने आंचल को दहेज के लिए प्रताडि़त किया. आए दिन खुदकुशी करने के तरीके बता कर उस को उकसाया. आखिर में मार कर लटका दिया. बयानों के साथ मातापिता ने आंचल के मोबाइल समेत तमाम तथ्य भी पुलिस को उपलब्ध कराए.

आंचल की मां रीना ने बताया कि सूर्यांश और उस का परिवार आए दिन आंचल को प्रताडि़त करते थे. दहेज की मांग करते थे. विवाद हुआ तो समझौता कराया गया, जिस से बेटी का परिवार बिखरने से बचा रहे. मगर आरोपी नहीं माने. आखिर में मार ही डाला.

आंचल के पिता पवन और भाई अक्षय ने पुलिस को बताया कि कई बार सूर्यांश फ्लाईओवर पर गाड़ी रोक चुका था. इस दौरान वह आंचल से कहता था कि यहां से कूद जाओ. इसी तरह से घर पर वह पंखे से लटक कर खुदकुशी करने को कहता था. यह भी कहता था कि जब भी लटकना तो बाथरूम वाले पंखे से लटकना, क्योंकि वह सस्ता है.

खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए आरोपी पति सूर्यांश और सास निशा खरबंदा द्वारा मृतका आंचल से विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने पर आंचल के पिता पवन ग्रोवर ने सवाल उठाए. उन्होंने सवाल किया कि अगर आंचल के ससुराल वाले उस से प्रताडि़त थे तो उन की बेटी क्यों मरी?

इस संबंध में उन्होंने पुलिस कमिश्नर के सामने भी अपना पक्ष रखा. दरअसल, आरोपियों ने थाने में अपनी बेगुनाही के सबूत के रूप में एक वीडियो दिखाया था. इस वीडियो में आंचल अपने पति और सास के साथ अभद्रता करते दिख रही थी.

इस पर सवाल उठाते हुए आंचल के पिता पवन ग्रोवर ने बताया कि वीडियो में उन की बेटी बारबार बोल रही है कि और मार… और मार… इस से साफ है कि वीडियो बनाने से पहले उस के साथ जम कर मारपीट की गई थी.

वीडियो में आंचल अपनी सास के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी शख्स से उस के संबंध होने की भी बात कर रही थी. इस के बाद मां और बेटा एक शब्द नहीं बोल रहे.

उन्होंने कहा इस से साफ है कि जानबूझ कर ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं कि आंचल आक्रोशित हो और मांबेटे इस वीडियो का गलत तरीके से इस्तेमाल कर सकें. उन्होंने वीडियो बनाने के लिए उन की बेटी को उकसाने का आरोप लगाया.

‘‘आरोपी मांबेटा अगर बेटी से प्रताडि़त थे तो कभी थाने में शिकायत क्यों नहीं की? वीडियो में सच्चाई थी तो इस को बेटी के जीते जी कभी वायरल क्यों नहीं किया? अगर बेटी उन के साथ मारपीट और प्रताडि़त करती थी तो वो कैसे मरी? अगर बेटी 2 सालों से मांबेटे के साथ अभद्र व्यवहार

कर रही थी तो पुलिस कंट्रोल रूम पर कितनी बार मदद मांगी?’’ आंचल के पिता पवन ने पुलिस के सामने इसी तरह के सवाल उठाए.

आंचल की मौत को हत्या कहें, आत्महत्या कहें या फिर आत्महत्या के लिए उकसाना कहें, इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए पुलिस की टीम जांच में कथा संकलन तक जुटी हुई थी.

तुलसी गौड़ा: इनसाइक्लोपीडिया औफ फारेस्ट

किसी को भी सम्मान, ईनाम और अवार्ड मिलता है तो कुछ लोगों को यही लगता है कि गलत व्यक्ति को अवार्ड दिया गया है. खास कर जब सरकार की ओर से मान, सम्मान या अवार्ड दिया जाता है, तब हमेशा इस तरह की बातें होती हैं. देश में सर्वोच्च अवार्ड दिए जाने का इतिहास हमेशा विवादास्पद रहा है.

ऐसे में 9 नवंबर, 2021 को राष्ट्रपति के हाथों पद्म, पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण अवार्ड दिए गए. उन में से कुछ ऐसे व्यक्ति भी अवार्ड लेने वाले थे, जिन्हें देख कर चौंके बिना नहीं रहा गया.

9 नवंबर को राष्ट्रपति भवन में आयोजित अवार्ड वितरण समारोह में जब तुलसी गौड़ा का नाम अवार्ड लेने के लिए पुकारा गया तो जो महिला अवार्ड लेने के लिए आई, उसे देख कर सभी की नजरें उसी पर टिकी रह गईं. उन की सादगी ने सब का मन मोह लिया.

अवार्ड लेने आने वाली वृद्ध महिला नंगे पैर आई थीं. उन के शरीर पर मात्र एक धोती (साड़ी) जैसा कपड़ा लिपटा था. गले में आदिवासी जीवनशैली की कुछ मालाएं थीं. 72 साल से अधिक उम्र वाली उस महिला को जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देश के चौथे सब से बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री अवार्ड दे कर सम्मानित किया तो राष्ट्रपति भवन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

कर्नाटक के हलक्की जनजाति से आने वाली तुलसी गौड़ा ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा. क्योंकि वह बहुत ही गरीब परिवार में पैदा हुई थीं. फिर भी पर्यावरण में उन के योगदान और पेड़पौधों सहित जड़ीबूटियों की तमाम प्रजातियों के बारे में उन के अथाह ज्ञान के कारण आज उन की पहचान ‘इनसाइक्लोपीडिया औफ फारेस्ट’ के रूप में होती है.

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वह आज भी तमाम नर्सरियों की देखभाल करती हैं. इस से पहले भी उन्हें और कई अवार्डों से सम्मानित किया जा चुका है. इस से पहले उन्हें ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवार्ड’, ‘राज्योत्सव अवार्ड’, ‘कविता मेमोरियल’ जैसे अवार्ड मिल चुके हैं. तुलसी गौड़ा को पद्मश्री अवार्ड मिलने पर बहुत लोगों ने दिल खोल कर उन की प्रशंसा की है.

कर्नाटक के फारेस्ट डिपार्टमेंट में 10 साल की उम्र से ही मां के साथ जंगल में काम करने के लिए जाने वाली तुलसी ने अब तक जंगल में 30 हजार से भी अधिक पेड़ लगाए होंगे. वन विभाग में दैनिक मजदूरी पर काम शुरू करने वाली तुलसी को इसी विभाग में परमानेंट नौकरी मिल गई थी.

अपना फर्ज अदा करते हुए उन्होंने अपनी समझ से इतनी जानकारी प्राप्त कर ली है कि जंगल में उगने वाले लगभग 3 सौ पौधे इंसान के लिए दवा के काम आते हैं.

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देखा जाए तो वह 10 साल की उम्र से पर्यावरण संरक्षण का काम कर रही हैं. एक तरह से उन्होंने अपना पूरा जीवन ही प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है.

तुलसी जिस जनजाति से आती हैं, वह हलक्की जनजाति औषधीय वनस्पति के ज्ञान के लिए जानी जाती है. तुलसी ने जंगल में रह कर अपने इस परंपरागत ज्ञान को बढ़ा कर असंख्य लोगों की आदिव्याधि का वनस्पति के उपयोग से निवारण किया है.

कौन सा वृक्ष किस समय बीज देता है, उस बीज को कब (रोपा) बोया जाए तो वह उगेगा, इस बात की एकदम सही जानकारी तुलसी गौड़ा को है.

जंगल में मदर ट्री को खोजना बहुत ही मुश्किल काम है. क्योंकि इस मदर ट्री का बीज सब से ज्यादा असरदार होता है. तुलसी जंगल के लाखों वृक्षों में से मदर ट्री को खोज सकती हैं. उन की इस तरह की असंख्य जानकारियों की ही वजह से कर्नाटक के जंगल समृद्ध हुए हैं.

तुलसी के इन्हीं कामों की वजह से कर्नाटक राज्य सरकार ने भी उन्हें समयसमय पर सम्मानित किया है.

खूबसूरती की मल्लिका अनारा बेगम: एक हिंदू राजा ने मुस्लिम स्त्री से ऐसे निभाया प्यार

खूबसूरती की मल्लिका अनारा बेगम- भाग 1: एक हिंदू राजा ने मुस्लिम स्त्री से ऐसे निभाया प्यार

राजामहाराजे का एक दौर था, जब जोधपुर में जोधाणे की ख्यातिप्राप्त रियासत थी. वहां के महाराजा गजसिंह राठौड़ की आगरा, लखनऊ, और दिल्ली के नवाबों के बीच भी काफी चर्चा होती थी.

एक रोज वह आगरा के नवाब फजल के घर शयनकक्ष में मखमली बिस्तर पर नींद में थे. वह जहां सो रहे थे, वहीं समीप जल रहे एक दीपक की मद्धिम रोशनी में बिस्तर पर बिछी जरीदार गद्दे चमक रहे थे.

कल रात शराब ज्यादा पीने से महाराजा अलसाए हुए अनिद्रा में थे. चाह कर भी नहीं उठ पा रहे थे. जबकि सुबह होने वाली थी. नौकर कई बार आ कर देख चुका था. वह चिंता में था कि महाराजा साहब समय पर क्यों नहीं उठे हैं. मगर वह उन्हें जगाना नहीं चाहता था.

रात की खुमारी जैसे उन की आंखों की पलकों पर जमी बैठी थी. मानो वह पलकों की बोझिलता के साथ एक अनोखी दुनिया में होने जैसे सपनीली मादकता के एहसास में हों. रेशमी जरीदार कमरबंद, किनारी में झूलती हुई स्वर्णिम जरी, गले में चमकता अमूल्य हार, कानों में लौंग और हाथों में सोने के कड़े.

वह कल रात मुगल सम्राट शाहजहां के विशेष कृपापात्र नवाब फजल के घर आमंत्रित किए गए थे. नवाब फजल ने गजसिंह के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. जबरदस्त महफिल जमी थी. कुछ अन्य सरदार और रसूखदार वहां बैठे थे. सभी को उम्दा शराब परोसी गई थी. सुरा के साथ सुंदरी का भी इंतजाम किया गया था.

ईरानी हसीन नर्तकी ने हुस्न के जलवे बिखेरे थे. और फिर नृत्य, गायनवादन से शमा परवाने की रातें रंगीन होने लगी थीं. देर रात तक जश्न चला था. सुंदरी ने सभी अतिथियों को शराब के मनुहार से संतुष्ट किया था.

…और जब महफिल की शमा बुझी, तब तक अतिथिगण मदहोश हो चुके थे. अधिकतर तो अपनेअपने घर चले गए थे, लेकिन महाराजा गजसिंह को तनिक भी होश नहीं था. वह वहीं बैठ गए. नवाब फजल भी तकिए के सहारे वहीं लुढ़क गए.

गजसिंह के पास हाजरिए कृपाल सिंह ने उन्हें सतर्क करते हुए कहा, ‘‘महाराजा साहेब, होश में आइए, हमें अपने डेरे पर चलना है. उठिए महाराजा साहेब!’’

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‘‘नहींनहीं, हम डेरे पर नहीं चल सकते.’’ एक पल रुक कर उन्होंने हुक्म दिया, ‘‘बुलाओ हमारे लिए उस ईरानी नर्तकी को. हम उसे ईनाम देंगे.’’

‘‘वह तो चली गई. रात बहुत हो गई है. अब हम को भी चलना चाहिए, महाराजा साहेब.’’ कृपाल सिंह ने कहा.

गजसिंह उस के कहने पर चलने के लिए उठे. साथ चलने लगे, लेकिन 2-4 कदम चल कर ही अचानक रुक गए. फिर नशे में बुदबुदाने लगे, ‘‘जिस की नर्तकी चांद के समान रूपवती हो, उस नवाब की बीवी अनारा कितनी सुंदर होगी? मैं ने अनारा बेगम की बहुत चर्चा सुनी है. हमें कोई उस का दीदार करवा दे तो हम उस को मुहमांगा ईनाम दे सकते हैं.’’

यह बात उस जगह से कही गई थी, जहां से पास के झरोखे तक उन की आवाज बाहर जा सकती थी. वह ईरानी नर्तकी की मधुर यादों में खोए हुए थे. कहते हैं न कि नशा चीज ही ऐसी है, जो अच्छेअच्छों को बेसुध कर देती है. क्या शूरवीर और क्या अमीर क्या गरीब.

मंदिर से शंख और घंटेघडि़याल की आवाजें आते ही गजसिंह हड़बड़ा कर उठ बैठे और तेजी से चल दिए. आज वह दरबार में हाजिर नहीं हो पाएंगे. ऐसा उन्होंने आलीजहां को कहवा कर भेज दिया और अपने डेरे में ऊपरी मंजिल पर आ गए.

अब भी उन की आंखों में बीते रात की महफिल का सुरूर और ईरानी नर्तकी छाई हुई थी. उन का मन ईरानी नर्तकी को अपनी बाहों में कैद करने की भावना से बेचैन था. बिस्तर पर लेट चुके थे, नींद की आगोश में आने लगे थे, किंतु दिमाग में हलचल सी मची हुई थी. तभी एक सेवक ने आ कर कहा, ‘‘अन्नदाता, हुजूर नवाब साहब की दासी आप से मिलना चाहती है.’’

‘‘नवाब साहब की दासी? आने दो.’’

चंद मिनटों में ही एक 40 वर्षीया औरत महाराज गजसिंह के सामने पेश हो गई. उस का रंग गोरा था और मुंह में पान चबा रही थी.

‘‘नवाब साहब का कोई परवाना लाई हो?’’ महाराजा ने उस से पूछा.

‘‘गुस्ताखी माफ हो, मैं तनहाई में कुछ अर्ज करना चाहती हूं.’’

दासी के कहने पर वहां खड़ा अंगरक्षक सिर झुका कर चला गया. दासी ने अत्यंत ही कोमलता के साथ अदबी लहजे में कहा, ‘‘दासी को जरीन नाम से जानते हैं. मैं एक खास मकसद से पेश हुई हूं. मुआफी चाहूंगी.’’

‘‘कहो, क्या बात है? बेहिचक बताओ.’’ महाराजा गजसिंह बोले.

‘‘हुजूर, कल रात जब आप ने ईरानी नर्तकी रक्कासा की प्रशंसा करतेकरते अनारा बेगम का जिक्र किया था, तब मैं झरोखे पर खड़ी थी. आप को इस कदर हुस्न का आशिक मिजाज देख कर मेरा दिल पसीज गया और…’’

‘‘…और क्या?’’ महाराजा ने बेसब्री से पूछा.

‘‘बात यह है हुजूर कि हमारी सब से छोटी बेगम साहिबा के नाखून के बराबर भी नहीं है रक्कासा. आप चाहें तो…’’

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इतना सुनते ही विलासी महाराजा गजसिंह के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई, लेकिन उन्होंने तुरंत अपनी बेसब्री पर काबू किया. गंभीरता से बोले, ‘‘जरीन, यह मत भूलो कि तुम एक हिंदू राजा के सामने खड़ी हो, जो तुम्हें जिंदा जमीन में गड़वा सकता है. मुगलिया सल्तनत की नींव हिला सकता है. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यह सब कहने की? मुझ से किसी तरह का खेल खेलने की कोशिश मत करना. जानती हो, उस वक्त हम नशे में थे. शराब ने हम को होशोहवास में नहीं रहने दिया था. तुम मर्द की कमजोरी का नाजायज फायदा…’’

‘‘तौबा करती हूं, गरीब परवर! हम गुलाम हैं, आप हमें माफ कर दें.’’ दासी कांपती हुई हाथ जोड़ कर बोली.

भोजपुरी एक्ट्रेस Anjana Singh ने शेयर किया अपकमिंग फिल्म का पोस्टर, इस एक्टर संग आएंगी नजर

भोजपुरी एक्ट्रेस अंजना सिंह (Anjana Singh) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह फैंस के साथ फोटोज और वीडीयो शेयर करती रहती है. हाल ही में उन्होंने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘बिछिया’ (Bichiya) से सेट एक साथ कई फोटोज शेयर की थी.

एक्ट्रेस ने इस फिल्म का फर्स्ट लुक शेयर किया है. फैंस फिल्म के पोस्टर में एक्ट्रेस की लुक की जमकर तारीफ कर रहे हैं. पोस्टर में अंजना सिंह मांग में सिंदूर भरे और साड़ी में बेहद सिंपल लुक में नजर आ रही हैं.

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अंजना सिंह ने  फिल्म का पोस्टर शेयर करते हुए कैप्शन लिखा है कि  नए साल के अवसर पर हमारी आने वाली फिल्म ‘बिछिया का फर्स्ट लुक आप सभी के लिए… आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.

एक्ट्रेस के इस पोस्ट पर एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, ‘इतना भी क्यूट कोई दिखता है क्या भला’ तो वहीं दूसरे यूजर ने लिखा, ‘आपकी इस फिल्म को देखने के लिए और इंतजार नहीं कर सकता हूं.

 

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आपको बता दें कि इस फिल्म में अंजना सिंह के साथ लीड रोल में रवि किशन भी दिखाई देंगे. फैंस इस सुपरहिट जोड़ी को ऑनस्क्रीन देखने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. इस फिल्म को दीपक शाह प्रोड्यूस कर रहे हैं.

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वर्कफ्रंट की बात करें तो अंजना सिंह जल्द ही ‘स्वाभिमान’ और ‘कसम पैदा करने वाले की 2’ में यश कुमार और निधि झा के साथ लीड रोल में दिखाई देंगी.

Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin के विराट ने शादी के बाद पहली बार तोड़ी चुप्पी, कही ये बात

गुम है किसी के प्यार में  (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) फेम नील भट्ट् (विराट) और ऐश्वर्या शर्मा (पाखी) ने एक महीने पहले ही शादी के बंधन में बंधे. इनकी शादी में करीबी दोस्त और परिवार के लोग ही शामिल हुए थे. शादी के बाद पहली बार निल भट्ट ने अपनी सिंपल वेडिंग के बारे में खुलासा किया है. आइए बताते हैं क्या कहा है आपके फेवरेट स्टार ने.

एक इंटरव्यू के अनुसार, नील भट्ट (Neil Bhatt) ने अपनी शादी को लेकर खुलासा किया है. उन्होंने कहा है कि वह एक अभिनेता नील होने का बोझ अपने साथ नहीं ले सकते थे. उन्होंने ये भी ​​​​कहा कि उनकी शादी एक रोलर कोस्टर राइड थी क्योंकि ऐश्वर्या और नील दोनों उस दौरान काम में बिजी थे.

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एक्टर ने आगे ये भी कहा कि मैं चाहता था कि नील एक सिंपल लड़के की तरह शादी करे. इसलिए मैंने शादी के फंक्शन को में सिंपल रखा और मैंने हर चीज का भरपूर आनंद लिया. निल भट्ट ने ये भी बताया कि  मैंने अपनी शादी को सीक्रेट रखने के बारे में कभी नहीं सोचा था लेकिन ऐसा होने से पहले मैं इसके बारे में बात नहीं करना चाहता था.

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रिपोर्ट के अनुसार, विराट ने ये भी कहा कि मैं एक बहुत ही सिंपल लड़का हूं जो एक सिंपल फैमिली से ताल्लुक रखता है और एक नार्मल गुजराती लड़के की तरह ही मैं चीजों को अपने तक ही रखना पसंद करता हूं. मेरे लिए शादी बहुत पवित्र बंधन है.

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नील की शादी के फंक्शन में बॉलीवुड एक्ट्रेस रेखा भी आई थीं. एक्टर ने बताया कि रेखा जी को मैंने एक कॉल किया और बताया कि हम शादी कर रहे हैं. इसके बाद वो शादी में आने के लिए राजी हो गईं.

बिना कुछ कहे: स्नेहा ने पुनीत को कैसे सदमे से निकाला

पुनीत और आरती एकदूसरे के लिए बिलकुल परफैक्ट थे. अचानक आरती विहान को ले कर पुनीत से कटने लगी, जिस कारण पुनीत और आरती के रास्ते अलगअलग हो गए. फिर आखिर कैसे स्नेहा ने पुनीत को इस सदमे से बाहर निकाला?

सफलता के लिए तपना तो पड़ेगा

Writer- रोहित

कई लोग मेहनत और अनुशासन के पथ पर चलने को कष्टदायक सम झते हैं. वे इस से मुंह मोड़ लेते हैं. ऐसे में वे लोग कभी अपनी क्षमता का आकलन नहीं कर पाते और भविष्य में आने वाली छोटीमोटी मुसीबतों से ही जल्दी टूट जाते हैं.

कहते हैं आग में जल कर ही सोना कुंदन बनता है. यानी पहले खुद को तपाना पड़ता है, उस के बाद सफलता चूमने को मिलती है. लेकिन अजीब यह है कि इंसान अपनी सफलता व असफलता के पैमाने को अपने तथाकथित ‘भाग्य’ और ‘शौर्टकट’ से जोड़ कर देखने लगता है. वह मानने लगता है कि यदि ‘भाग्य’ में होगा तो ही कुछ मिलेगा, भाग्य प्रबल होगा तो घर बैठे ही मिल जाएगा या जीवन में कुछ तो जुगाड़ कर लिया जाएगा.

ऐसे में व्यक्ति मेहनत करने के लिए उतना नहीं सोचता जितना इन चीजों के प्रबल होने के बारे में सोचता है. थोड़ा सा कष्ट मिलते ही वह अपने पांव पीछे खींचने लगता है. वह संघर्ष के आगे खुद को असहाय महसूस करता है और हार मानने लगता है. ऐसे में वह खुद पर विश्वास करने की जगह दूसरों पर अधिक निर्भर होता जाता है. लेकिन जैसे ही यह निर्भरता टूटती है, उसे एहसास होता है. पर तब तक काफी देर हो चुकी होती है, उस के पास अपना सिर पीटने के अलावा रास्ता नहीं बचता. सच, सही समय पर कड़े परिश्रम का कोई सानी नहीं है.

इस का उदाहरण धावक हिमा दास से लिया जा सकता है, जिन्होंने सम झाया कि असल जीवन में भी सफलता के लिए लगातार दौड़ना ही पड़ता है. किसान परिवार में पैसों की अहमियत काफी होती है. किसान परिवार में जन्मी हिमा दास सम झौतों से रूबरू होती सफलता की आसमान छूती इमारत के शिखर पर चढ़ीं. किसान पिता ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से 1,200 रुपए के एडिडास कंपनी के जूते खरीदे, जिन्हें बड़े जतन से अपनी पुत्री हिमा दास को सौंपे, जैसे एक पिता अपने पुत्र को विरासत सौंपता है. अब उसी एडिडास कंपनी ने हिमा को चिट्ठी लिख अपना एंबैसडर बनाने का फैसला किया है.

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गरीब व कमजोर परिवार से आने वाली हिमा दास ने अपनी मेहनत पर भरोसा किया. कड़े अनुशासन और कठिन परिश्रम को जीवन जीने का ढंग बनाया. उस ने शौर्टकट को दलील नहीं बनाया, क्योंकि वह जानती थी कि रेस चाहे कोई भी हो, उस में शौर्टकट नहीं होता. जिस चीज को लोग अपना भाग्य सम झते हैं, उस ने रियलिस्टिक हो कर उसे अपना अवसर बताया. वह बहुत बार गिरी, थकी, बैठी लेकिन दौड़ना नहीं छोड़ा, फिर चाहे वह ट्रैक पर हो या अपने जीवन के संघर्ष में हो.

ऐसे ही दीपा करमाकर हैं, जिन के बारे में तो यहां तक कह दिया गया था कि जिमनास्टिक खेल के लिए उन के पैर अनुकूल नहीं हैं. यहां तो लोगों ने सीधा उन के हिस्से में लिखे कथित भाग्य को ही चुनौती दे दी. उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और अटूट अनुशासन से सफलता की इबारत लिख दी. वे न सिर्फ जिमनैस्टिक की खिलाड़ी बनीं बल्कि ओलिंपिक खेलों में पहली खिलाड़ी के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया. कारण सीधा है कि उन्होंने अपने भाग्य से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया. ऐसे और कई लोगों की फेहरिस्त है, फिर चाहे वे किसी भी पेशे से जुड़े व्यक्ति रहे हों, जिन्होंने ऐसे कारनामे किए हैं.

भाग्य पर भरोसा

आमतौर पर भाग्य को कोसना सब से आसान तरीका होता है. इस से व्यक्ति अपनी गलतियों पर आसानी से परदा डाल लेता है. इस का असर इतना ज्यादा होता है कि बहुत बार ऐसे व्यक्ति अपने ‘भाग्य की होनी’ पर इतना विश्वास करने लग जाते हैं कि कुछ करने की जहमत नहीं उठाते. उन का यही मानना रहता है कि जो होना होगा वह तो होगा ही. वहीं जब बिन किए कुछ होताजाता नहीं, तब फिर से वे अपनी असफलता के लिए अपने भाग्य को कोसने में जुट जाते हैं. वे इसे अपना बुरा समय बताते तो हैं, लेकिन इस बुरे समय को मेहनत और लगन से ठीक करने के बजाय राशिफल, जादूटोना, पूजापाठ, अंधविश्वास से सुल झाने की कोशिश करते हैं. अपनी इस सनक से वे न सिर्फ भ्रमजाल में फंसते हैं बल्कि ‘गरीबी में आटा गीला’ वाली कहावत की तर्ज पर पैसा भी खूब लुटा देते हैं.

भाग्य के भरोसे खुद को छोड़ने से वे आलस और नीरसता से भर जाते हैं. उन के हाथों में कलावे, गले में मालाएं, उंगलियों में अंगूठियां बढ़ने लगती हैं. ऐसे में किसी तरह की महत्वाकांक्षा उन में नहीं रहती. बिना महत्वाकांक्षा और तय गोल के वे अपने रास्ते में भटकते फिरते हैं, जिस कारण वे अपने जीवन में अनुशासन भी तय नहीं कर पाते.

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ऐसी ही फंतासी में जयपाल सिंह असवाल (59) का परिवार भी फंसा है. जयपाल सिंह दिल्ली के नेहरूनगर इलाके में रहते हैं. उन के 3 बेटे हैं जिन में से 2 बेटों आशीष और विकास की शादी हो चुकी है. 58 वर्ष की उम्र में निजी कंपनी से जयपाल रिटायर हो गए थे. उस दौरान उन के दोनों बेटे कार्यरत थे. आशीष सऊदी अरब में होटल मैनेजमैंट के काम में था, तो विकास रीड एंड टेलर कंपनी में सेल्समैन था.

3 साल पहले आशीष अपना कौट्रैक्ट खत्म कर सऊदी अरब से वापस दिल्ली आया. दिल्ली आने के बाद उस का कहीं काम करने का मन नहीं किया. उस के पास कुछ सेविंग्स थी तो वही खर्च करता रहा. वहीं विकास का भी यही हाल रहा. पहले उस की जौब कनाट प्लेस में लगी थी, लेकिन जैसे ही उसे कंपनी ने अपनी दूसरी ब्रांच नोएडा जाने को कहा तो उस ने दूर काम करने से मना कर दिया और कामधाम छोड़ कर घर पर बैठ गया. अब आलस का आलम यह है कि नजदीक उसे मनमुताबिक काम मिल नहीं रहा और दूर वह जाना नहीं चाहता. ऐसे में घर के जवान हट्टेकट्टे सदस्य पिछले 2-3 सालों से निठल्ले बैठे हैं. उन के घरखर्च का एकमात्र माध्यम फिलहाल किराएदार से मिलने वाला किराया है.

हालफिलहाल जयपाल सिंह से इस सिलसिले में बात हुई. जयपाल ने बताया कि उन के परिवार पर किसी का बुरा साया पड़ा है. उन के बेटों पर किसी ने जादूटोना किया हुआ है. इसी के चलते उन्होंने अपने गांव में इष्ट देवताओं को खुश करने के लिए बड़ी पूजा रखवाई है. अब जयपाल को कौन सम झाए कि समस्या ‘बुरे साए’ की नहीं, बल्कि बेटों के आलसपन की है. फिलहाल, जयपाल इस बात से चिंतित हैं कि पूजा में लगने वाले खर्च को वे कैसे पूरा करेंगे, क्योंकि पूजा में लगने वाला खर्च लेदे कर 50 से 60 हजार रुपए तक हो ही जाएगा.

शौर्टकट भ्रमभरा रास्ता

इंसान अपने जीवन में मेहनत से बचने के लिए न सिर्फ भाग्य पर निर्भर रहता है बल्कि वह सोचता है कि कोई ऐसा शौर्टकट हो जिस से कम समय में ज्यादा पैसे कमाए जा सकें. ऐसे व्यक्ति जितनी जल्दी उठते हैं उस से कई गुना रफ्तार से नीचे गिर पड़ते हैं. सफलता मेहनत से मिलती है, इस के लिए कोई शौर्टकट नहीं होता है. शौर्टकट के बल पर हासिल की गई सफलता कुछ समय के लिए ही टिकती है. सच यह है कि एक समय के बाद व्यक्ति को अर्श से फर्श तक आने में समय नहीं लगता.

ऐसे ही कई वाकए लौकडाउन के समय देखने को मिले, जहां पैसा कमाने के लिए आपदा को अवसर बनाने में लोगों ने कोई कमी नहीं छोड़ी. जिस दौरान पहला लौकडाउन लगा, लोगों में खूब भ्रम और डर फैल गया था. लोगों को गलत सूचना मिली कि फूड सप्लाई में भारी शौर्टेज होगी, जिस कारण शहरों में राशन की कमी होने लगेगी. यह भ्रम इलाकों के रिटेल विक्रेताओं और थोक व्यापारियों द्वारा फैलाया गया था. जनता के बीच खाद्य सामग्री स्टोर करने की होड़ सी मचने लग गई. किराए पर रहने वाले लोग इस अव्यवस्था को ले कर खासा सकते में रहे और उन में से कई इस कारण अपने राज्यों को पैदल ही लौट पड़े. लेकिन जो शहरी थे, वे डबल मार  झेलते रहे. दुकानदारों ने मौके का फायदा उठाते हुए राशनपानी के दाम बढ़ा दिए.

लेकिन कहते हैं न, शौर्टकट से कुछ पल के लिए खिलाड़ी बना जा सकता है, लेकिन अंत में मुंह की खानी ही पड़ती है. ऐसा ही एक उदाहरण बलजीत नगर के आनंद जनरल स्टोर के अभिषेक कुमार का है. अभिषेक के पिताजी (आनंद) ने 30 साल पहले परचून की दुकान इलाके में खोली थी, जो काफी चलती थी. पिताजी ने बड़ी ईमानदारी और मेहनत से इसे शुरू किया था. इलाके में दुकान का खासा नाम भी था. इलाके के लोग घर की जरूरतों की खरीदारी इसी दुकान से करते थे. यानी कुल मिला कर एक विश्वास आनंद ने ग्राहकों में कायम कर के रखा था.

लौकडाउन लगते ही इलाके में राशन की कमी का भ्रम फैला. अभिषेक ने मौका पाते ही सामान के भाव बढ़ाने शुरू कर दिए. जो सामान 5 रुपए का था उसे 10 में देना शुरू कर दिया. जो 100 का था उसे 150 में. लोग मजबूर थे, उन्हें अपनी जरूरत पूरी करने के लिए सामान लेना ही था. एक दिन टीवी पर सामान के ‘शौर्टेज वाले भ्रम’ की  झूठी खबरों को सरकार ने क्लीयर किया. लेकिन अभिषेक और आसपास की दुकान वाले फिर भी बढ़े दाम में सामान बेचते रहे. ऐसे में किसी सज्जन ने दुकान की कंप्लैंट कर दी. पुलिस ने यह बात पुख्ता की और अभिषेक की दुकान सील कर दी. थाने के चक्कर काटने तो पड़े ही, साथ ही भारी बदनामी भी  झेलनी पड़ी. लगभग 3-4 महीने तक उस की दुकान बंद रही. लेदे कर उस ने दुकान खुलवाने की आज्ञा प्राप्त की. लेकिन खुलने के बाद लोगों ने उस की दुकान का बायकाट कर दिया. अब उस दुकान पर कुछ ही ग्राहक जा कर सामान खरीदते हैं. पहले जैसी रौनक न रही.

जाहिर है मेहनत का रास्ता मुश्किलों भरा, लंबा और कुछ हद तक तनहा होता है. मगर सफलता का एहसास इस रास्ते की सारी तकलीफें भुलाने के लिए काफी होता है. अपनी मंजिल का रास्ता चुनते समय यह हमेशा याद रखना चाहिए कि मंजिल तक पहुंचने के लिए हम जिस शौर्टकट रास्ते का चुनाव कर रहे हैं, उस की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है.

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मेहनत के साथ अनुशासन ही सफलता देगा

अनुशासन शब्द 2 शब्दों के योग से बना है- अनु और शासन. अनु उपसर्ग है जिस का अर्थ है विशेष. इस प्रकार से अनुशासन का अर्थ हुआ- विशेष शासन. अनुशासन का शाब्दिक अर्थ है- आदेश का पालन या नियमसिद्धांत का पालन करना ही अनुशासन है. दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि नियमबद्ध जीवन व्यतीत करना अनुशासन कहलाता है.

भारत में आज के युवाओं में एक अजीब तरह की संस्कृति पनपती जा रही है. वे अनुशासन से खुद को बंधाबंधा सा महसूस करते हैं. वे इसे अपनी आजादी के बीच बाधा मानते हैं. उन का मानना रहता है कि वे अपने जीवन के खुद मालिक हैं, जिसे जैसे चाहे वे जिएं. ऐसे में कब उठना है, कब कौन सा काम करना है, किस काम को प्राथमिकता देनी है आदि सिर्फ मूड और इच्छा पर निर्भर करता है. यदि कोई दूसरा व्यक्ति खुद को अनुशासित करता दिखता है, खुद का टाइम मैनेजमैंट करता है, तो वे उसे बड़ी हैरानी और हिकारतभरी नजरों से देखते हैं, उस का सामूहिक उपहास उड़ाया जाता है.

अनुशासन का पालन करने का अर्थ यह नहीं है कि आप नियमों और तौरतरीकों के गुलाम हो गए और आप की आजादी छिन गई है. यह सोच गलत है. सोचिए, यदि ट्रेन को पटरी से उतार दें तो वह आजाद तो हो जाएगी लेकिन ऐसे में क्या वह चल पाएगी? इस का आराम से अनुमान लगाया जा सकता है. अनुशासन आजादी में खलल नहीं है, बल्कि नियमकानून के अनुसार किसी काम को करने की सीख है.

एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति कुछ पाने की ललक में खुद को पूरी तरह  झोंक देता है. उस का खुद को  झोंकना सिर्फ काफी नहीं. उस की सफलता के लिए खुद को व्यवस्थित करना बहुत जरूरी है और अनुशासन ही उस की रीढ़ है. सड़क हो या सदन, व्यवसाय हो या खेती, खेल का मैदान हो या युद्धभूमि, अनुशासन के बिना जीत संभव ही नहीं है.

जाहिर सी बात है, मेहनत के साथ अनुशासन या सू झबू झ का होना बहुत जरूरी है वरना पता चला कि चढ़ना था दिल्ली की ट्रेन में और बैठ गए कोलकाता की ट्रेन में. अनुशासन में रहने वाला व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएं अच्छे से सम झता है. वह यह भलीभांति जानता है कि अपने गोल तक पहुंचने के लिए उसे किस काम को वरीयता देनी है. वह अपनी दिनचर्या निर्धारित करता है. कामों का बंटवारा करता है. वरना बिना अनुशासन के वह कम जरूरी काम में ही फंस कर रह जाएगा और ऐसे में अपने दिनोंदिन खपा देगा. अनुशासनहीन व्यक्ति चाहे मेहनती ही क्यों न हो, वह अपने गोल से भटकता रहता है. वह अपनी एनर्जी को केंद्रित नहीं कर पाता. उस के पास योजना की कमी रहती है. अगर योजना नहीं, तो उस का विकासपथ विनाश को आमंत्रण भी दे सकता है.

खुद को तपाना तो पड़ेगा ही

आज तमाम सफल व्यक्तियों से उन की सफलता का राज पूछा जा सकता है, चाहे वे नौकरशाह, डाक्टर, वकील इत्यादि क्यों न हों. वे सभी एक बात पर सहमत होंगे कि मेहनत और अनुशासन के ही कारण वे इस मुकाम तक पहुंचे हैं. देश में इस का सब से बड़ा उदाहरण महात्मा गांधी को लिया जा सकता है. कहते हैं, वे अपने दोनों हाथों से लिखा करते थे. दायां हाथ थक जाए तो बाएं हाथ से लिखने लग जाते थे. किसी काम को अंत तक करने की ललक उन में खूब थी. उस पर वे पूरी शिद्दत से लग जाते थे. लेकिन उन की सफलता में सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि उन के अनुशासन की भी बड़ी भूमिका है. बड़ा नेता होने के बावजूद उन्होंने खुद के लिए अनुशासन सैट किए हुए थे. जो नियम कार्यकारिणी के लिए बने थे वे उन्हें खुद पर भी अप्लाई करते थे. इसी चक्कर में उन्हें एक रोज देरी के चलते खाना खाने की लाइन में लंबा इंतजार करना पड़ गया.

यह सच है कि कई लोग मेहनत और अनुशासन के पथ पर चलने को कष्टदायक सम झते हैं. वे अपना मुंह मोड़ लेते हैं. ऐसे में वे लोग कभी अपनी क्षमता का आकलन नहीं कर पाते. भविष्य में आने वाली छोटीमोटी मुसीबतों से वे जल्दी टूट जाते हैं. वे साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, जिस में उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा तो खोनी ही पड़ती है, साथ में अपने असफल जीवन से समयसमय पर आर्थिक चोट भी खानी पड़ती है.

लेकिन यह भलीभांति सम झने की जरूरत है कि जीवन कोई सौफ्टी नहीं, जिसे जीभ लगाया और चाट लिया. इस में कांटे भी समयसमय पर मिलते रहेंगे. जीवन संघर्षों से भरा हुआ है, इस में अंधेरापन भी आएगा ही. काले ब्लैकबोर्ड पर काली चौक मार कर अपनी बात लिखी तो जा सकती है, लेकिन पढ़ी नहीं जा सकती, इसलिए खुद में परिस्थिति के अनुसार कंट्रास पैदा कर सफेद चौक बनना ही पड़ता है. उसी प्रकार खुद को तपाने के लिए जीवन में कंट्रास से गुजरना ही पड़ेगा. जो जीवन के कंट्रास से मुंह मोड़ लेगा वह अपनी बात लिख तो रहा है लेकिन उसे कोई पढ़ नहीं सकता.

बिना कुछ कहे- भाग 1: स्नेहा ने पुनीत को कैसे सदमे से निकाला

Writer- शिवी गोस्वामी 

दिसंबर की वह शायद सब से सर्द रात थी, लेकिन कुछ था जो मुझे अंदर तक जला रहा था और उस तपस के आगे यह सर्द मौसम भी जीत नहीं पा रहा था.

मैं इतना गुस्सा आज से पहले स्नेहा पर कभी नहीं हुआ था, लेकिन उस के ये शब्द, ‘पुनीत, हमारे रास्ते अलगअलग हैं, जो कभी एक नहीं हो सकते,’ अभी भी मेरे कानों में गूंज रहे थे. इन शब्दों की ध्वनि अब भी मेरे कानों में बारबार गूंज रही थी, जो मुझे अंदर तक झिंझोड़ रही थी.

जो कुछ भी हुआ और जो कुछ हो रहा था, अगर इन सब में से मैं कुछ बदल सकता तो सब से पहले उस शाम को बदल देता, जिस शाम आरती का वह फोन आया था.

आरती मेरा पहला प्यार थी. मेरी कालेज लाइफ का प्यार. कोई अलग कहानी नहीं थी, मेरी और उस की. हम दोनों कालेज की फ्रैशर पार्टी में मिले और ऐसे मिले कि परफैक्ट कपल के रूप में कालेज में मशहूर हो गए.

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मैं आरती को बहुत प्यार करता था. हमारे प्यार को पूरे 5 साल हो चुके थे, लेकिन अब कुछ ऐसा था, जो मुझे आरती से दूर कर रहा था. मेरी और आरती की नौकरी लग चुकी थी, लेकिन अलगअलग जगह हम दोनों जल्दी ही शादी करने के लिए भी तैयार हो चुके थे. आरती के पापा के दोस्त का बेटा विहान भी आरती की कंपनी में ही काम करता था. वह हाल ही में कनाडा से यहां आया था. मैं उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था और उस की नजरें भी साफ बताती थीं कि कुछ ऐसी ही सोच उस की भी मेरे प्रति है.

‘‘देखो आरती, मुझे तुम्हारे पापा के दोस्त का बेटा विहान अच्छा नहीं लगता,‘‘ मैं ने एक दिन आरती को साफसाफ कह दिया.

‘‘तुम्हें वह पसंद क्यों नहीं है?‘‘ आरती ने मुझ से पूछा.

‘‘उस में पसंद करने लायक भी तो कुछ खास नहीं है आरती,‘‘ मैं ने सीधीसपाट बात कह दी.

‘‘तो तुम्हें उसे पसंद कर के क्या करना है,‘‘ यह कह कर आरती हंस दी.

मेरे मना करने का उस पर खास फर्क नहीं पड़ा, तभी तो एक दिन वह मुझे बिना बताए विहान के साथ फिल्म देखने चली गई और यह बात मुझे उस की बहन से पता चली.

मुझे छोटीछोटी बातों पर बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है, शायद इसीलिए उस ने यह बात मुझ से छिपाई. उस दिन मेरी और उस की बहुत लड़ाई हुई थी और मैं ने गुस्से में आ कर उस को साफसाफ कह दिया था कि तुम्हें मेरे और अपने उस दोस्त में से किसी एक को चुनना होगा.

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‘‘पुनीत, अभी तो हमारी शादी भी नहीं हुई है और तुम ने अभी से मुझ पर अपना हुक्म चलाना शुरू कर दिया है. मैं कोई पुराने जमाने की लड़की नहीं हूं, कि तुम कुछ भी कहोगे और मैं मान लूंगी. मेरी भी खुद की अपनी लाइफ है और खुद के अपने दोस्त, जिन्हें मैं तुम्हारी मरजी से नहीं बदलूंगी.‘‘

सीधे तौर पर न सही, लेकिन कहीं न कहीं उस ने मेरे और विहान में से विहान की तरफदारी कर मुझे एहसास करा दिया कि वह उस से अपनी दोस्ती बनाए रखेगी.

आरती और मैं हमउम्र थे. उस का और मेरा व्यवहार भी बिलकुल एकजैसा था. मुझे लगा कि अगले दिन आरती खुद फोन कर के माफी मांगेगी और जो हुआ उस को भूल जाने को कहेगी, लेकिन मैं गलत था, आरती की उस दिन के बाद से विहान से नजदीकियां और बढ़ गईं.

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मैं ने भी अपनी ईगो को आगे रखते हुए कभी उस से बात करने की कोशिश ही नहीं की और उस ने भी बिलकुल ऐसा ही किया. उस को लगता था कि मैं टिपिकल मर्दों की तरह उस पर अपना फैसला थोप रहा हूं, लेकिन मैं उस के लिए अच्छा सोचता था और मैं नहीं चाहता था कि जो लोग अच्छे नहीं हैं, वे उस के साथ रहें. एक दिन उस की सहेली ने बताया कि उस ने साफ कह दिया है कि जो इंसान उस को समझ नहीं सकता, उस की भावनाओं की कद्र नहीं कर सकता, वह उस के साथ अपना जीवन नहीं बिता सकती.

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