Social Problem: शादी को तरसे लड़के

Social Problem, लेखक – शकील प्रेम

भारतीय समाज में बेटा पैदा होना हमेशा से मूंछ की बात रही है. किसी के घर बेटा हुआ तो इसे त्योहार की तरह मनाया जाता है. पकवान बनते हैं और रिश्तेदारों में मिठाई बांटी जाती है. वजह, घर का नया वारिस पैदा हो गया है, जो वंश को आगे बढ़ाएगा.

इस के उलट बेटी पैदा होने पर बहुत से घरों में मातम का माहौल होता है. ज्यादा बेटी पैदा करने वाली औरत की भारतीय समाज में कोई इज्जत नहीं है. पहले ऐसी औरत का मर्द बेटे की चाह में दूसरी औरत ब्याह लाता था. नतीजतन, ऐसी औरतें बेटा पाने के चक्कर में बाबाओं का शिकार होती थीं.

बेटा और बेटी के इसी फर्क के चलते भारत के कई इलाकों में बेटियों को अफीम चटा कर मार देने का घिनौना रिवाज कायम था. यही वजह है कि कई राज्यों में लड़का और लड़की के लिंगानुपात में भारी गड़बड़ी पैदा हो गई. हरियाणा इस बात का बड़ा उदाहरण है.

हरियाणा में विकराल होती समस्या

हरियाणा में लिंगानुपात लंबे समय तक गड़बड़ रहा है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, हरियाणा में प्रति 1000 पुरुषों पर 879 महिलाएं थीं, जो राष्ट्रीय औसत (943) से कम है. कन्या भ्रूण हत्या के चलते लड़कियों की तादाद कम होती गई, जिस से पूरा सामाजिक सिस्टम गड़बड़ा गया.

लड़कियां कम हुईं, तो इस का खमियाजा लड़कों को भुगतना पड़ रहा है. हरियाणा में यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है. वहां के तकरीबन हर गांव में ऐसे ढेरों नौजवान कुंआरे बैठे हैं, जिन की उम्र 40 पार कर चुकी है. इस के पीछे वजह यह है कि लड़कियों की तादाद कम है. वैसे भी अब लड़कियों के परिवार वाले अपनी बेटियों की शादी गांव में नहीं करना चाहते हैं.

हरियाणा में शादी के लिए लड़के के पास अच्छी जमीन, मोटा बिजनैस या सरकारी नौकरी होना जरूरी है. जिन लड़कों के पास इन में से कोई एक है, वे गांव से निकल कर शहरों में बस जाते हैं और जिन लड़कों के पास अच्छी जमीन, मोटा बिजनैस या सरकारी नौकरी में से कुछ भी नहीं है, उन के लिए रिश्ते ढूंढ़ना मुश्किल हो जाता है.

हरियाणा के हिसार जिले में ही 40 साल से ज्यादा उम्र के तकरीबन 7 लाख कुंआरे हैं. इन में भी ज्यादातर जाट समुदाय से हैं.

हरियाणा के कुछ गांवों में तो खराब सड़कों, सीवेज सिस्टम की कमी और तंग गलियों के चलते भी रिश्ते नहीं हो पाते हैं या टूट जाते हैं.

लड़कों के कुंआरे रहने में खाप पंचायतें भी खास रोल निभाती हैं, जो इंटरकास्ट शादी की खिलाफत करती हैं, जिस से प्रेम विवाह करना मुश्किल हो जाता है. इस से भी शादी के मौके और कम हो जाते हैं.

पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान हरियाणा के कई इलाकों में कुंआरे लड़कों ने विधायक उम्मीदवारों के सामने शादी न होने को इलाके की बड़ी समस्यायों में से एक बताया था.

हरियाणा के कई लड़के तो बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड जैसे राज्यों से दुलहन लाने को मजबूर हैं. यही वजह है कि हरियाणा में इन राज्यों से लड़कियों की तस्करी के मामले उजागर हुए हैं.

उत्तराखंड में लड़कों की शादी में अड़चन

साल 2020-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक, उत्तराखंड में प्रति 1000 पुरुषों पर 984 महिलाएं हैं. लिंगानुपात के मामले में यह राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर है, फिर भी इस राज्य में हरियाणा जैसे हालात क्यों पैदा हो गए हैं?

हरियाणा की तरह उत्तराखंड में भी अब लड़कों के लिए शादी की समस्या बड़े पैमाने पर नजर आने लगी है. उत्तराखंड पहाड़ों से घिरा हुआ प्रदेश है. वहां के कई पहाड़ी गांवों में सड़क, बिजली, पानी और सेहत से जुड़ी सेवाओं जैसी बुनियादी सहूलियतों की कमी है. कोई भी परिवार अपनी लड़कियों की शादी ऐसे गांव में नहीं करना चाहता, जहां पहुंचना मुश्किल हो.

उत्तराखंड में नैनीताल जिले के गैरीखेत जैसे अनेक गांव ऐसे हैं, जहां सड़क की कमी के चलते बरात नहीं पहुंच पाती, जिस से बनेबनाए रिश्ते टूट जाते हैं.

इस के अलावा उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में लड़कों की शादी में बेरोजगारी भी एक बड़ी अड़चन है. रोजगार के मौके बड़े कम हैं. कई नौजवान नौकरी की तलाश में शहरों की ओर भाग जाते हैं, लेकिन जो नौजवान गांव से बाहर नहीं निकल पाते, उन की माली हालत कमजोर रहती है. ऐसे लड़कों से कोई परिवार अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता.

कई लड़के अपनी मनपसंद लड़की से प्रेम विवाह करना चाहते हैं, लेकिन गांवों में जातिवाद आज भी इतना मजबूत है कि जाति से बाहर शादी करने की हिम्मत करने वाले लड़कों को गांव तक छोड़ना पड़ता है.

राजस्थान में ऐसे हालात

हरियाणा और उत्तराखंड की तरह राजस्थान में भी लड़कों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही हैं. शादी हो भी जाए तो ज्यादातर लड़कों की पत्नियां उन्हें छोड़ कर चली जाती हैं.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक राजस्थान का लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 928 महिलाएं था. इस मामले में तो राजस्थान अपने पड़ोसी राज्य हरियाणा से बेहतर है, लेकिन लड़कों के लिए लड़की न मिलने की जो समस्या हरियाणा और उत्तराखंड में है, वही राजस्थान में भी है.

राजस्थान के गांवदेहात के इलाकों में रोजगार के कम मौके हैं. कई नौजवान पढ़ाईलिखाई पूरी करने के बाद भी बेरोजगार हैं. छोटामोटा रोजगार करने का कोई स्किल नहीं है. जिस के पास कोई स्किल है भी उस की माली हालत ऐसी नहीं है कि वह कोई रोजगार कर सके.

राजस्थान में जनसंख्या घनत्व कम है, जिस से यहां प्राइवेट कंपनियां उतनी तादाद में नहीं हैं कि पढ़ेलिखे नौजवानों की बेरोजगारी कम हो सके. वहां के बड़े शहर गांवों से काफी दूर हैं, जिस से नौजवानों के लिए छोटीमोटी नौकरी मिलना भी मुश्किल होता है.

राजस्थान के कई इलाकों में दहेज प्रथा अभी भी चलन में है. लड़के के परिवार द्वारा मांगे जाने वाले दहेज की रकम कई बार लड़की के परिवार की माली हालत से मेल नहीं खाती, जिस के चलते शादी होने में अड़चन आती है.

गांवदेहात में ज्योतिष और कुंडली मिलान जैसे अंधविश्वास गहराई तक बैठे हुए हैं, जिस से कई बार लड़कों की शादी होतेहोते रह जाती है.

मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वासों में भी नौजवानों को बेवकूफ बनाया जाता है. मांगलिक लड़के की शादी केवल मांगलिक लड़की से होनी चाहिए, इस पाखंड के चलते जोड़ी ढूंढ़ना मुश्किल हो जाता है.

राजस्थान के गांवदेहात के इलाकों में आज भी ‘नाता प्रथा’ कायम है, जिस में एक विधवा या तलाकशुदा औरत अपने पति की मौत होने या तलाक लेने के बाद उस के परिवार के किसी दूसरे मर्द जैसे देवर, भाई या कोई और करीबी रिश्तेदार के साथ शादी या सैक्स करती है.

इस प्रथा के चक्कर में कई बार औरतों की रजामंदी के बिना ही उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया जाता है. सामाजिक दबाव के चलते वे इस प्रथा की खिलाफत नहीं कर पाती हैं.

हालांकि, अब यह प्रथा पहले जितनी बड़े पैमाने पर नहीं रह गई है, लेकिन इस प्रथा के चलते भी आज की लड़कियां गांवदेहात में शादी करना नहीं चाहती हैं.

राजस्थान के कुछ गांवों में सड़क, परिवहन और दूसरी बुनियादी सहूलियतों की कमी के चलते बरात का आनाजाना मुश्किल होता है, जिस से बहुत से लड़के कुंआरे रह जाते हैं.

राजस्थान के दूरदराज के इलाकों में भी लड़कियां अब पढ़लिख रही हैं. लड़कियों को पढ़ाने को ले कर लोग भी पहले से ज्यादा जागरूक हो रहे हैं.

ऐसे में लड़कियां अब अपना भलाबुरा समझने लगी हैं, जिस के चलते कम पढ़ेलिखे या नकारा लड़कों को रिश्ते मिलने में मुश्किल होने लगी है.

शादी न होने की यह समस्या हरियाणा, उत्तराखंड और राजस्थान के लड़कों तक ही नहीं सिमटी है, बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र के लड़कों के साथ भी तकरीबन ऐसे ही हालात पैदा हो रहे हैं, जो चिंता की बात है. Social Problem

Crime Story: जुआ, जिस्म और कत्ल

Crime Story, लेखक – महेश कांत शिवा

उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के कांधला कसबे के रहने वाले 26 साला असलम, पिता का नाम आबिद, की बहन की शादी बागपत जनपद के गांव फतेहपुर कुट्ठी धनौरा में हुई थी.

बहन की शादी के बाद असलम का वहां आनाजाना हुआ तो उस की मुलाकात वहीं की ही रहने वाली 24 साल की आसमीन से हो गई. आसमीन असलम की बहन के पास आतीजाती रहती थी. इसी से असलम और आसमीन के बीच इश्क की आंखमिचौली शुरू हो गई.

9 साल पहले दोनों में दोस्ती हुई और कुछ ही समय में यह दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों परिवार वालों से छिपछिपा कर मिलने भी लगे.

एक दिन आसमीन ने असलम से कह ही दिया, ‘‘मैं तुम्हारे बिना अब एकपल भी जिंदा नहीं रह सकती. न जाने तुम ने मुझ पर क्या जादू कर दिया है, हरपल तुम ही तुम नजर आते हो.’’

‘‘ऐसा ही कुछ हाल मेरा भी है जानू. मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. मैं अपने घर वालों को मना लूंगा, तुम भी अपने घर वालों से बात कर के देखो,’’ असलम ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है, मैं आज अम्मी से बात कर के देखती हूं. उम्मीद है कि वे मान जाएंगी,’’ आसमीन ने कहा.

उसी दिन आसमीन ने अपने दिल की बात अपनी अम्मी से कह दी, लेकिन उस की अम्मी ने उस के अब्बू से बात करने की बात की.

आसमीन के अब्बू जब काम से वापस लौटे तो अम्मी ने आसमीन और असलम के बीच चल रहे संबंधों की जानकारी दी.

‘‘नहीं, यह हरगिज नहीं हो सकता. अगर ऐसा हुआ तो मैं असलम को मार दूंगा,’’ अचानक से वहां पहुंचे आसमीन के भाई हारून ने भड़कते हुए कहा.

इस के बाद अपने परिवार की नाराजगी की सारी बात आसमीन ने असलम को बता दी.

‘‘अब तो एक ही रास्ता निकलता है कि हम दोनों घर से भाग कर निकाह कर लें. तुम्हारी क्या राय है?’’ असलम ने आसमीन से पूछा.

‘‘जो भी करना है, जल्दी करो. हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है. मेरा निकाह कहीं और कर दिया जाएगा. तुम बस देखते रह जाओगे,’’ आसमीन ने गुस्सा जाहिर करते हुए कहा.

साल 2016 में एक दिन असलम और आसमीन अपनाअपना घर छोड़ कर भाग गए. दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली और कांधला कसबे से बाहर किराए का कमरा ले कर रहने लगे.

दोनों के बीच प्यारभरे संबंध बने तो आसमीन ने असलम की गोद में एक नन्हा सा बच्चा डाल दिया. दोनों हंसीखुशी से रहने लगे.

असलम को जो भी काम मिल जाता, वह उसे कर लेता था. रात को जब असलम काम से वापस लौटता तो अपने बच्चे और आसमीन को देख कर उस की दिनभर की सारी थकान दूर हो जाती थी.

दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी कि 5 साल पहले उन की जिंदगी में एक मोड़ आया. असलम और आसमीन कांधला लौट आए.

कांधला लौटने पर असलम ने अपने घर से दूर महल्ला रायजादगान में एक मकान किराए पर लिया और वहां पर रहने लगा. वहां पर रहतेरहते आसमीन 3 बच्चों की मां बनी. अब वह कुल 4 बच्चों की मां थी, जिन में 2 बेटे और 2 बेटियां थीं.

असलम ने कांधला में ही एक होटल पर नौकरी करना शुरू कर दी. जैसेजैसे परिवार बढ़ा और बच्चे बड़े होने लगे, तो असलम की जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं. घर और बच्चों के स्कूल की फीस का खर्च भी बढ़ रहा था.

होटल से असलम को थोड़ीबहुत ही तनख्वाह मिलती थी, जिस से गुजारा होना मुश्किल हो रहा था. घरखर्च चलाने के लिए उस ने जुआ खेलना शुरू कर दिया. जुए में पैसा हारने की वजह से वह लोगों का कर्जदार भी होता चला गया.

एक फाइनैंसर से असलम ने 20-30 हजार रुपए का कर्ज लिया, लेकिन समय से कर्ज की किस्तें अदा नहीं कर पा रहा था, जिस के चलते फाइनैंसर और उस के आदमी घर आ कर रुपयों का तकादा करने लगे.

रोजाना फाइनैंसर के घर आने से आसमीन भी परेशान हो गई.

असलम के पड़ोस में इंतजार नामक आटोरिकशा ड्राइवर भी रहता था. इंतजार की पत्नी की डेढ़ साल पहले मौत हो चुकी थी. तकरीबन 6 महीने पहले इंतजार और आसमीन के बीच मुलाकात हुई और प्यार हो गया. इंतजार ने असलम के घर में आनाजाना शुरू कर दिया.

उन दोनों के बीच मोबाइल पर दिनरात घंटों प्यारभरी बातें होने लगीं. ह्वाट्सएप पर भी वे दोनों खूब चैटिंग करने लगे.

असलम के होटल पर जाने के बाद इंतजार अकसर उस के घर पहुंच जाता था. आसमीन और इंतजार में संबंध भी बन गए थे.

इस बात का जब असलम को पता चला तो उस ने एतराज जताया, लेकिन आसमीन नहीं मानी और उस ने इंतजार से बने रिश्ते को जारी रखा.

‘‘आसमीन, जो तुम कर रही हो, वह ठीक नहीं है. मैं ने इंतजार को भी समझाया है, पर वह नहीं मान रहा. कम से कम तुम तो मान जाओ. रोजाना उस का हमारे घर आना, तुम्हारे साथ बैठ कर खाना खाना… क्या कहेंगे महल्ले वाले…’’

आसमीन कुछ नहीं बोली, बस चुपचाप असलम की बातें सुनती रही. वह अब इंतजार के साथ एक नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहती थी, लेकिन असलम इस राह में रोड़ा बन रहा था.

आसमीन के दिमाग में आया कि असलम को बीच रास्ते से हटाना होगा, तभी जा कर वह इंतजार के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर सकती है.

आसमीन ने इंतजार से मिलना जारी रखा. एक दिन उस ने अपने भाई हारून को अपने और इंतजार के रिश्ते के बारे में सारी बात बता दी. यह जानकारी पा कर हारून भी उस के घर पहुंच गया. इंतजार को भी बुला लिया गया.

आसमीन ने अपने भाई से सारे हालात की जानकारी दी, ‘‘असलम जुआ खेलता है. उस ने लोगों का कर्जा सिर पर चढ़ा रखा है. घर के बाहर कोई न कोई अपने पैसे मांगने वाला खड़ा ही रहता है. मैं तो तंग आ गई हूं. वह जो कमाता है, उसे जुए में उड़ा देता है. इस से अच्छा है कि उसे मार ही दो.’’

‘‘असलम तुम्हें ले कर घर से भागा था, जिस से रिश्तेदारों और बिरादरी में हमारी नाक कट गई,’’ हारून ने अपनी बहन से नाराजगी भरे लहजे में कहा.

‘‘मेरी भूल थी भाई. मुझे क्या पता था कि निकाह के बाद वह नकारा हो जाएगा, जुआ खेलने लगेगा,’’ आसमीन ने मायूसी भरे लहजे में कहा.

‘‘ठीक है, कुछ करते हैं,’’ हारून ने आसमीन को दिलासा देते हुए कहा.

9 अगस्त, 2025. शनिवार की शाम को हारून ने असलम को फोन कर के कहा, ‘‘चलो, आज घूमने कैराना चलते हैं, आसमीन भी साथ रहेगी.’’

असलम को शक नहीं हुआ. बीवी साथ थी तो सब सामान्य लगा. वे तीनों कांधला से कैराना की तरफ निकल पड़े. शराब के ठेके से शराब की बोतल ली. रास्ते में एक जगह पर बैठ कर उन दोनों ने शराब पी.

हारून ने कम शराब पी, जबकि असलम को ज्यादा शराब पिला दी, जिस से उसे कुछ होश न रहा.

थोड़ी देर के बाद असलम पूरी तरह से बेहोश हो चुका था. इस के बाद इंतजार अपना आटोरिकशा ले कर वहां पहुंच गया. उन तीनों ने मिल कर असलम को आटोरिकशा में डाला और एक सुनसान जगह ले जा कर मीट काटने वाले चाकू से असलम का गला रेत कर हत्या कर दी.

इस के बाद उन तीनों ने असलम की लाश को कैराना में कांधला रोड पर हाशिम के आम के बाग में फेंक दिया और फरार हो गए.

10 अगस्त, 2025, रविवार की सुबह तकरीबन सवा 9 बजे कैराना कोतवाली पुलिस को आम के बाग में एक लाश पड़ी होने की सूचना मिली. फोरैंसिक टीम को मौके पर बुला कर सुबूत जुटाए गए.

असलम की जेब से मिले आधारकार्ड से उस की पहचान हुई तो पुलिस ने असलम के पिता को भी मौके पर बुला लिया.

एसपी शामली रामसेवक गौतम ने हत्या के खुलासे के लिए एक टीम बनाई और कांधला से ले कर कैराना तक के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. सीसीटीवी में एक हरे रंग के आटोरिकशा में आसमीन, हारून और इंतजार असलम को ले जाते हुए नजर आए.

कैराना कोतवाली पुलिस ने बिना देरी किए आटोरिकशा ड्राइवर इंतजार को हिरासत में ले लिया. उस के और आसमीन के फोन की काल डिटेल खंगाली गई. मोबाइल में दोनों की ह्वाट्सएप चैटिंग भी मिली.

इस पर पुलिस का शक गहरा गया. वह अब पूरी तरह से यह मान चुकी थी कि असलम की पत्नी ने ही नाजायज संबंधों के चलते उस की हत्या कराई है.

पुलिस ने आसमीन और उस के भाई हारून को भी गिरफ्तार कर लिया. आसमीन ने पुलिस को बताया कि वह इंतजार से दूसरा निकाह करना चाहती थी, लेकिन असलम राह का रोड़ा बन रहा था.

बाद में आसमीन ने अपना बयान बदलते हुए पुलिस का बताया कि उस ने ऐसे ही कहा दिया था कि असलम को मार डालो, लेकिन इन दोनों (हारून और इंतजार) ने तो सच में ही उस के शौहर को मार डाला.

पुलिस ने 12 घंटे के भीतर वारदात का खुलासा किया और आसमीन, हारून और इंतजार को गिरफ्तार कर लिया. तीनों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. Crime Story

Story In Hindi: अनोखा बदला – निर्मला ने कैसे लिया बहन और प्रेमी से बदला

Story In Hindi: निर्मला से सट कर बैठा संतोष अपनी उंगली से उस की नंगी बांह पर रेखाएं खींचने लगा, तो वह कसमसा उठी. जिंदगी में पहली बार उस ने किसी मर्द की इतनी प्यार भरी छुअन महसूस की थी.

निर्मला की इच्छा हुई कि संतोष उसे अपनी बांहों में भर कर इतनी जोर से भींचे कि…

निर्मला के मन की बात समझ कर संतोष की आंखों में चमक आ गई. उस के हाथ निर्मला की नंगी बांहों पर फिसलते हुए गले तक पहुंच गए, फिर ब्लाउज से झांकती गोलाइयों तक.

तभी बाहर से आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘दीदी, चाय बन गई है…’’

संतोष हड़बड़ा कर निर्मला से अलग हो गया, जिस का चेहरा एकदम तमतमा उठा था, लेकिन मजबूरी में वह होंठ काट कर रह गई.

नीचे वाले कमरे में छोटी बहन उषा ने नाश्ता लगा रखा था. चायनाश्ता करने के बाद संतोष ने उठते हुए कहा, ‘‘अब चलूं… इजाजत है? कल आऊंगा, तब खाना खाऊंगा… कोई बढि़या सी चीज बनाना. आज बहुत जरूरी काम है, इसलिए जाना पड़ेगा…’’

‘‘अच्छा, 5 मिनट तो रुको…’’ उषा ने बरतन समेटते हुए कहा, ‘‘मुझे अपनी एक सहेली से नोट्स लेने हैं. रास्ते में छोड़ देना. मैं बस 5 मिनट में तैयार हो कर आती हूं.’’

उषा थोड़ी देर में कपड़े बदल कर आ गई. संतोष उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर चला गया.

उधर निर्मला कमरे में बिस्तर पर गिर पड़ी और प्यास अधूरी रह जाने से तड़पने लगी.

निर्मला की आंखों के आगे एक बार फिर संतोष का चेहरा तैर उठा. उस ने झपट कर दरवाजा बंद कर दिया और बिस्तर पर गिर कर मछली की तरह छटपटाने लगी.

निर्मला को पहली बार अपनी बहन उषा और मां पर गुस्सा आया. मां चायनाश्ता बनाने में थोड़ी देर और लगा देतीं, तो उन का क्या बिगड़ जाता. उषा कुछ देर उसे और न बुलाती, तो निर्मला को वह सबकुछ जरूर मिल जाता, जिस के लिए वह कब से तरस रही थी.

जब पिता की मौत हुई थी, तब निर्मला 22 साल की थी. उस से बड़ी कोई और औलाद न होने के चलते बीमार मां और छोटी बहन उषा को पालने की जिम्मेदारी बिना कहे ही उस के कंधे पर आ पड़ी थी.

निर्मला को एक प्राइवेट फर्म में अच्छी सी नौकरी भी मिल गई थी. उस समय उषा 10वीं जमात के इम्तिहान दे चुकी थी, लेकिन उस ने धीरेधीरे आगे पढ़ कर बीए में दाखिला लेते समय निर्मला से कहा था, ‘‘दीदी, मां की दवा में बड़ा पैसा खर्च हो रहा है. तुम अकेले कितना बोझ उठाओगी…

‘‘मैं सोच रही हूं कि 2-4 ट्यूशन कर लूं, तो 2-3 हजार रुपए बड़े आराम से निकल जाएंगे, जिस से मेरी पढ़ाई के खर्च में मदद हो जाएगी.’’

‘‘तुझे पढ़ाई के खर्च की चिंता क्यों हो रही है? मैं कमा रही हूं न… बस, तू पढ़ती जा,’’ निर्मला बोली थी.

अब निर्मला 30 साल की होने वाली है. 1-2 साल में उषा भी पढ़लिख कर ससुराल चली जाएगी, तो अकेलापन पहाड़ बन जाएगा.

लेकिन एक दिन अचानक मौका हाथ आ लगा था, तो निर्मला की सोई इच्छाएं अंगड़ाई ले कर जाग उठी थीं.

उस दिन दफ्तर में काम निबटाने के बाद सब चले गए थे. निर्मला देर तक बैठी कागजों को चैक करती रही थी. संतोष उस की मदद कर रहा था. आखिरकार रात के 10 बजे फाइल समेट कर वह उठी, तो संतोष ने हंस कर कहा था, ‘‘इस समय तो आटोरिकशा या टैक्सी भी नहीं मिलेगी, इसलिए मैं आप को मोटरसाइकिल से घर तक छोड़ देता हूं.’’

निर्मला ने कहा था, ‘‘ओह… एडवांस में शुक्रिया?’’

निर्मला को उस के घर के सामने उतार कर संतोष फिर मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगा, तो उस ने हाथ बढ़ा कर हैंडल थाम लिया और कहने लगी, ‘‘ऐसे कैसे जाएंगे… घर तक आए हैं, तो कम से कम एक कप चाय…’’

‘‘हां, चाय चलेगी, वरना घर जा कर भूखे पेट ही सोना पड़ेगा. रात भी काफी हो गई है. मैं जिस होटल में खाना खाता हूं, अब तो वह भी बंद हो चुका होगा.’’

‘‘आप होटल में खाते हैं?’’

‘‘और कहां खाऊंगा?’’

‘‘क्यों? आप के घर वाले?’’

‘‘मेरा कोई नहीं है. मैं मांबाप की एकलौती औलाद था. वे दोनों भी बहुत कम उम्र में ही मेरा साथ छोड़ गए, तब से मैं अकेला जिंदगी काट रहा हूं.’’

संतोष ने बहुत मना किया, लेकिन निर्मला नहीं मानी थी. उस ने जबरदस्ती संतोष को घर पर ही खाना खिलाया था.

अगले दिन शाम के 5 बजे निर्मला को देख कर मोटरसाइकिल का इंजन स्टार्ट करते हुए संतोष ने कहा था, ‘‘आइए… बैठिए.’’

निर्मला ने बिना कुछ बोले ही पीछे की सीट पर बैठ कर उस के कंधे पर हाथ रख दिया था. घर पहुंच कर उस ने फिर चाय पीने की गुजारिश की, तो संतोष ने 1-2 बार मना किया, लेकिन निर्मला उसे घर के अंदर खींच कर ले गई थी.

इस के बाद रोज का यही सिलसिला हो गया. संतोष को निर्मला के घर आने या रुकने के लिए कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी, खासतौर से छुट्टी वाले दिन तो वह निर्मला के घर पड़ा रहता था. सब ने उसे भी जैसे परिवार का एक सदस्य मान लिया था.

एक दिन अचानक निर्मला का सपना टूट गया. उस दिन उषा अपनी सहेली के यहां गई थी. दूसरे दिन उस का इम्तिहान था, इसलिए वह घर पर बोल गई थी कि रातभर सहेली के साथ ही पढ़ेगी, फिर सवेरे उधर से ही इम्तिहान देने यूनिवर्सिटी चली जाएगी.

उस दिन भी संतोष निर्मला के साथ ही उस के घर आया था और खाना खा कर रात के तकरीबन 10 बजे वापस चला गया था.

उस के जाने के बाद निर्मला बाहर वाला दरवाजा बंद कर के अपने कमरे में लौट रही थी, तभी मां ने टोक दिया, ‘‘बेटी, तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

निर्मला का मन धड़क उठा. मां के पास बैठ कर आंखें चुराते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है मां?’’

‘‘बेटी, संतोष कैसा लड़का है. वह तेरे ही दफ्तर में काम करता है… तू तो उसे अच्छी तरह जानती होगी.’’

निर्मला एकाएक कोई जवाब नहीं दे सकी.

मां ने कांपते हाथों से निर्मला का सिर सहलाते हुए कहा, ‘‘मैं तेरे मन का दुख समझती हूं बेटी, लेकिन इज्जत से बढ़ कर कुछ नहीं होता, अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है, इसलिए…’’

निर्मला एकदम तिलमिला उठी. वह घबरा कर बोली, ‘‘ऐसा क्यों कहती हो मां? क्या तुम ने कभी कुछ देखा है?’’

‘‘हां बेटी, देखा है, तभी तो कह रही हूं. कल जब तू बाजार गई थी, तब दो घड़ी के लिए संतोष आया था. वह उषा के साथ कमरे में था.

‘‘मैं भी उन के साथ बातचीत करने के लिए वहां पहुंची, लेकिन दरवाजे पर पहुंचते ही मैं ने उन दोनों को जिस हालत में देखा…’’

निर्मला चिल्ला पड़ी, ‘‘मां…’’ और वह उठ कर अपने कमरे की ओर भाग गई.

निर्मला के कानों में मां की बातें गूंज रही थीं. उसे विश्वास नहीं हुआ. मां को जरूर धोखा हो गया है. ऐसा कभी नहीं हो सकता. लेकिन यही हो रहा था.

अगले दिन निर्मला दफ्तर गई जरूर, लेकिन उस का किसी काम में मन नहीं लगा. थोड़ी देर बाद ही वह सीट से उठी. उसे जाते देख संतोष ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

निर्मला ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मेरी एक खास सहेली बीमार है. मैं उसे ही देखने जा रही हूं.’’

‘‘कितनी देर में लौटोगी?’’

‘‘मैं उधर से ही घर चली जाऊंगी.’’

बहाना बना कर निर्मला जल्दी से बाहर निकल आई. आटोरिकशा कर के वह सीधे घर पहुंची. मां दवा खा कर सो रही थीं. उषा शायद अपने कमरे में पढ़ाई कर रही थी. बाहर का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. इस लापरवाही पर उसे गुस्सा तो आया, लेकिन बिना कुछ बोले चुपचाप दरवाजा बंद कर के वह ऊपर अपने कमरे में चली गई.

इस के आधे घंटे बाद ही बाहर मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज सुनाई पड़ी. निर्मला को समझते देर नहीं लगी कि जरूर संतोष आया होगा.

निर्मला कब तक अपने को रोकती. आखिर नहीं रहा गया, तो वह दबे पैर सीढि़यां उतर कर नीचे पहुंची. मां सो रही थीं.

वह बिना आहट किए उषा के कमरे के सामने जा कर खड़ी हो गई और दरवाजे की एक दरार से आंख सटा कर झांकने लगी. भीतर संतोष और उषा दोनों एकदूसरे में डूबे हुए थे.

उषा ने इठलाते हुए कहा, ‘‘छोड़ो मुझे… कभी तो इतना प्यार दिखाते हो और कभी ऐसे बन जाते हो, जैसे मुझे पहचानते नहीं.’’

संतोष ने उषा को प्यार जताते हुए कहा, ‘‘वह तो तुम्हारी दीदी के सामने मुझे दिखावा करना पड़ता है.’’

उषा ने हंस कर कहा, ‘‘बेचारी दीदी, कितनी सीधी हैं… सोचती होंगी कि तुम उन के पीछे दीवाने हो.’’

संतोष उषा को प्यार करता हुआ बोला, ‘‘दीवाना तो हूं, लेकिन उन का नहीं तुम्हारा…’’

कुछ पल के बाद वे दोनों वासना के सागर में डूबनेउतराने लगे. निर्मला होंठों पर दांत गड़ाए अंदर का नजारा देखती रही… फिर एकाएक उस की आंखों में बदले की भावना कौंध उठी. उस ने दरवाजा थपथपाते हुए पूछा, ‘‘संतोष आए हैं क्या? चाय बनाने जा रही हूं…’’

संतोष उठने को हुआ, तो उषा ने उसे भींच लिया, ‘‘रुको संतोष… तुम्हें मेरी कसम…’’

‘‘पागल हो गई हो. दरवाजे पर तुम्हारी दीदी खड़ी हैं…’’ और संतोष जबरदस्ती उठ कर कपड़े पहनने लगा.

उस समय उषा की आंखों में प्यार का एहसास देख कर एक पल के लिए निर्मला को अपना सारा दुख याद आया.

मां के कमरे के सामने नींद की गोलियां रखी थीं. उन्हें समेट कर निर्मला रसोईघर में चली गई. चाय छानने के बाद वह एक कप में ढेर सारी नींद की गोलियां डाल कर चम्मच से हिलाती रही, फिर ट्रे में उठाए हुए बाहर निकल आई.

संतोष ने चाय पी कर उठते हुए आंखें चुरा कर कहा, ‘‘मुझे बहुत तेज नींद आ रही है. अब चलता हूं, फिर मुलाकात होगी.’’

इतना कह कर संतोष बाहर निकला और मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के घर के लिए चला गया.

दूसरे दिन अखबारों में एक खबर छपी थी, ‘कल मोटरसाइकिल पेड़ से टकरा जाने से एक नौजवान की दर्दनाक मौत हो गई. उस की जेब में मिले पहचानपत्रों से पता चला कि संतोष नाम का वह नौजवान एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था’. Story In Hindi

Hindi Family Story: अपराजिता – क्या पप्पी बचा पायगी अपनी जान?

Hindi Family Story: मेरे जागीरदार नानाजी की कोठी हमेशा मेरे जीवन के तीखेमीठे अनुभवों से जुड़ी रही है. मुझे वे सब बातें आज भी याद हैं.

कोठी क्या थी, छोटामोटा महल ही था. ईरानी कालीनों, नक्काशीदार भारी फर्नीचर व झाड़फानूसों से सजे लंबेचौड़े कमरों में हर वक्त गहमागहमी रहती थी. गलियारों में शेर, चीतों, भालुओं की खालें व बंदूकें जहांतहां टंगी रहती थीं. नगेंद्र मामा के विवाह की तसवीरें, जिन में वह रूपा मामी, तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों व उच्च अधिकारियों के साथ खडे़ थे, जहांतहां लगी हुई थीं.

रूपा मामी दिल्ली के प्रभावशाली परिवार की थीं. सब मौसियां भी ठसके वाली थीं. तकरीबन सभी एकाध बार विदेश घूम कर आ चुकी थीं. नगेंद्र मामा तो विदेश में नौकरी करते ही थे.

देशी घी में भुनते खोए से सारा घर महक रहा था. लंबेचौड़े दीवानखाने में तमाम लोग मामा व मौसाजी के साथ जमे हुए थे. कहीं राजनीतिक चर्चा गरम थी तो कहीं रमी का जोर था. नरेन मामा, जिन की शादी थी, बारबार डबल पपलू निकाल रहे थे. सभी उन की खिंचाई कर रहे थे, ‘भई, तुम्हारे तो पौबारह हैं.’

नगेंद्र मामा अपने विभिन्न विदेश प्रवासों के संस्मरण सुना रहे थे. साथ ही श्रोताओं के मुख पर श्रद्धामिश्रित ईर्ष्या के भाव पढ़ कर संतुष्ट हो चुरुट का कश खींचने लगते थे. उन का रोबीला स्वर बाहर तक गूंज रहा था. लोग तो शुरू से ही कोठी के पोर्टिको में खड़ी कार से उन के ऊंचे रुतबे का लोहा माने हुए थे. अब हजारों रुपए फूंक भारत आ कर रहने की उदारता के कारण नम्रता से धरती में ही धंसे जा रहे थे.

यही नगेंद्र मामा व रूपा मामी जब एक बार 1-2 दिन के लिए हमारे घर रुके थे तो कितनी असुविधा हुई थी उन्हें भी, हमें भी. 2 कमरों का छोटा सा घर  चमड़े के विदेशी सूटकेसों से कैसा निरीह सा हो उठा था. पिताजी बरसते पानी में भीगते डबलरोटी, मक्खन, अंडे खरीदने गए थे. घर में टोस्टर न होने के कारण मां ने स्टोव जला कर तवे पर ही टोस्ट सेंक दिए थे, पर मामी ने उन्हें छुआ तक नहीं था.

आमलेट भी उन के स्तर का नहीं था. रूपा मामी चाय पीतेपीते मां को बता रही थीं कि अगर अंडे की जरदी व सफेदी अलगअलग फेंटी जाए तो आमलेट खूब स्वादिष्ठ और अच्छा बनता है.

यही मामी कैसे भूल गई थीं कि नाना के घर मां ही सवेरे तड़के उठ रसोई में जुट जाती थीं. लंबेचौडे़ परिवार के सदस्यों की विभिन्न फरमाइशें पूरी करती कभी थकती नहीं थीं. बीच में जाने कब अंडे वाला तवा मांज कर पिताजी के लिए अजवायन, नमक का परांठा भी सेंक देती थीं. नौकर का काम तो केवल तश्तरियां रखने भर तक था.

दिन भर जाने क्या बातें होती रहीं. मैं तो स्कूल रही. रात को सोते समय मैं अधजागी सी मां और पिताजी के बीच में सोई थी. मां पिताजी के रूखे, भूरे बालों में उंगलियां फिरा रही थीं. बिना इस के उन्हें नींद ही नहीं आती थी. मुझे भी कभी कहते. मैं तो अपने नन्हे हाथ उन के बालों में दिए उन्हीं के कंधे पर नींद के झोंके में लुढ़क पड़ती थी.

मां कह रही थीं, ‘पिताजी को बिना बताए ही ये लोग आपस में सलाह कर के यहां आए हैं. उन से कह कर देखूं क्या?’

‘छोड़ो भी, रत्ना, क्यों लालच में पड़ रही हो? आज नहीं तो कुछ वर्ष बाद जब वह नहीं रहेंगे, तब भी यही करना पडे़गा. अभी क्यों न इस इल्लत से छुटकारा पा लें. हमें कौन सी खेतीबाड़ी करनी है?’ कह कर पिताजी करवट बदल कर लेट गए.

‘खेतीबाड़ी नहीं करनी तो क्या? लाखों की जमीन है. सुनते हैं, उस पर रेलवे लाइन बनने वाली है. शायद उसे सरकार द्वारा खरीद लिया जाएगा. भैया क्या विलायत बैठे वहां खेती करेंगे.’

मां को इस तरह मीठी छुरी तले कट कर अपना अधिकार छोड़ देना गले नहीं उतर रहा था. उत्तर भारत में सैकड़ों एकड़ जमीन पर उन की मिल्कियत की मुहर लगी हुई थी.

भूमि की सीमाबंदी के कारण जमीनें सब बच्चों के नाम अलगअलग लिखा दी गई थीं. बंजर पड़ी कुछ जमीनें ‘भूदान यज्ञ’ में दे कर नाम कमाया था. मां के नाम की जमीनें ही अब नगेंद्र मामा बडे़ होने के अधिकार से अपने नाम करवाने आए थे. वैसे क्या गरीब बहन के घर उन की नफासतपसंद पत्नी आ सकती थी?

स्वाभिमानी पिताजी को मिट्टी- पत्थरों से कुछ मोह नहीं था. जिस मायके से मेरे लिए एक रिबन तक लेना वर्जित था वहां से वह मां को जमीनें कैसे लेने देते? उन्होंने मां की एक न चलने दी.

दूसरे दिन बड़ेबडे़ कागजों पर मामा ने मां से हस्ताक्षर करवाए. मामी अपनी खुशी छिपा नहीं पा रही थीं.

शाम को वे लोग वापस चले गए थे.

अपने इस अस्पष्ट से अनुभव के कारण मुझे नगेंद्र मामा की बातें झूठी सी लगती थीं. उन की विदेशों की बड़बोली चर्चा से मुझ पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ा. पिताजी शायद अपने कुछ साहित्यकार मित्रों के यहां गए हुए थे. लिखने का शौक उन्हें कोठी के अफसरी माहौल से कुछ अलग सा कर देता था.

मुझे यह देख कर बड़ा गुस्सा आता था कि पिताजी का नाम अखबारों, पत्रिकाओं में छपा देख कर भी कोई इतना उत्साहित नहीं होता जितना मेरे हिसाब से होना चाहिए. अध्यापक थे तो क्या, लेखक भी तो थे. पर जाने क्यों हर कोई उन्हें ‘मास्टरजी’ कह कर पुकारता था.

सब मामामौसा शायद अपनी अफसरी के रोब में अकड़े रहते थे. कभी कोई एक शेर भी सुना कर दिखाए तो. मोटे, बेढंगे सभी कुरतापजामा, बास्कट पहने मेरे छरहरे, खूबसूरत पिताजी के पैर की धूल के बराबर भी नहीं थे. उन की हलकी भूरी आंखें कैसे हर समय हंसती सी मालूम होती थीं.

अनजाने में कई बार मैं अपने घर व परिस्थितियों की रिश्तेदारों से तुलना करती तो इतने बडे़ अंतर का कारण नहीं समझ पाई थी कि ऊंचे, धनी खानदान की बेटी, मां ने मास्टर (पिताजी) में जाने क्या देखा कि सब सुख, ऐश्वर्य, आराम छोड़ कर 2 कमरों के साधारण से घर में रहने चली आईं.

नानानानी ने क्रोध में आ कर फिर उन का मुंह न देखने की कसम खाई. जानपहचान वालों ने लड़कियों को पढ़ाने की उदारता पर ही सारा दोष मढ़ा. परंतु नानी की अकस्मात मृत्यु ने नाना को मानसिक रूप से पंगु सा कर दिया था.

मां भी अपना अभिमान भूल कर रसोई का काम और भाईबहनों को संभालने लगीं. नौकरों की रेलपेल तो खाने, उड़ाने भर को थी.

नानाजी ने कई बार कोठी में ही आ कर रहने का आग्रह किया था, परंतु स्वाभिमानी पिताजी इस बात को कहां गवारा कर सकते थे? बहुत जिद कर के  नानाजी ने करीब की कोठी कम किराए पर लेने की पेशकश की, परंतु मां पति के विरुद्ध कैसे जातीं?

फिर पिताजी की बदली दूसरे शहर में हो गई, पर घर में शादी, मुंडन, नामकरण या अन्य कोई भी समारोह होने पर नानाजी मां को महीना भर पहले बुलावा भेजते, ‘तुम्हारे बिना कौन सब संभालेगा?’

यह सच भी था. उन का तर्क सुन कर मां को जाना ही पड़ता था.

असुविधाओं के बावजूद मां अपना पुराना सा सूटकेस बांध कर, मुझे ले कर बस में बैठ जातीं. बस चलने पर पिताजी से कहती जातीं, ‘अपना ध्यान रखना.’

कभीकभी उन की गीली आंखें देख कर मैं हैरान हो जाती थी, क्या बडे़ लोग भी रोते हैं? मुझे तो रोते देख कर मां कितना नाराज होती हैं, ‘छि:छि:, बुरी बात है, आंखें दुखेंगी,’ अब मैं मां से क्या कहूं?

सोचतेसोचते मैं मां की गोद में आंचल से मुंह ढक कर सो जाती थी. आंख खुलती सीधी दहीभल्ले वाले की आवाज सुन कर. एक दोना वहीं खाती और एक दोना कुरकुरे भल्लों के ऊपर इमली की चटनी डलवा रास्ते में खाने के लिए रख लेती. गला खराब होगा, इस की किसे चिंता थी.

कोठी में आ कर नानाजी हमें हाथोंहाथ लेते. मां को तो फिर दम मारने की भी फुरसत नहीं रहती थी. बाजार का, घर का सारा काम वही देखतीं. हम सब बच्चे, ममेरे, मौसेरे बहनभाई वानर सेना की तरह कोठी के आसपास फैले लंबेचौड़े बाग में ऊधम मचाते रहते थे.

आज भी मैं, रिंपी, डिंकी, पप्पी और अन्य कई लड़कियां उस शामियाने की ओर चल दीं जहां परंपरागत गीत गाने के लिए आई महिलाएं बैठी थीं. बीच में ढोलकी कसीकसाई पड़ी थी पर बजाने की किसे पड़ी थी. पेशेवर गानेवालियां गा कर थक कर चाय की प्रतीक्षा कर रही थीं.

सभी महिलाएं अपनी चकमक करती कीमती साडि़यां संभाले गपशप में लगी थीं. हम सब बच्चे दरी पर बैठ कर ठुकठुक कर के ढोलकी बजाने का शौक पूरा करने लगे. मैं ने बजाने के लिए चम्मच हाथ में ले लिया. ठकठक की तीखी आवाज गूंजने लगी. नगेंद्र मामा की डिंकी व रिंपी के विदेशी फीते वाले झालरदार नायलोनी फ्राक गुब्बारे की तरह फूल कर फैले हुए थे.

पप्पी व पिंकी के साटन के गरारे खेलकूद में हमेशा बाधा डालते थे, सो अब उन्हें समेट कर घुटनों से ऊपर उठा कर बैठी हुई थीं. गोटे की किनारी वाले दुपट्टे गले में गड़ते थे, इसलिए कमर पर उन की गांठ लगा कर बांध रखे थे.

इन सब बनीठनी परियों सी मौसेरी, ममेरी बहनों में मेरा साधारण छपाई का सूती फ्राक अजीब सा लग रहा था. पर मुझे इस का कहां ज्ञान था. बाल मन अभी आभिजात्य की नापजोख का सिद्धांत नहीं जान पाया था. जहां प्रेम के रिश्ते हीरेमोती की मालाओं में बंधे विदेशी कपड़ों में लिपटे रहते हों वहां खून का रंग भी शायद फीका पड़ जाता है.

रूपा मामी चम्मच के ढोलकी पर बजने की ठकठक से तंग आ गई थीं. मुझे याद है, सब औरतें मग्न भाव से उन के लंदन प्रवास के संस्मरण सुन रही थीं. अपने शब्द प्रवाह में बाधा पड़ती देख वह मुझ से बोलीं, ‘अप्पू, जा न, मां से कह कर कपडे़ बदल कर आ.’

हतप्रभ सी हो कर मैं ने अपनी फ्राक की ओर देखा. ठीक तो है, साफसुथरा, इस्तिरी किया हुआ, सफेद, लाल, नीले फूलों वाला मेरा फ्राक.

किसी अन्य महिला ने पूछा, ‘यह रत्ना की बेटी है क्या?’

‘हां,’ मामी का स्वर तिरस्कारयुक्त था.

‘तभी…’ एक गहनों से लदी जरी की साड़ी पहने औरत इठलाई.

इस ‘तभी’ ने मुझे अपमान के गहरे सागर में कितनी बार गले तक डुबोया था, पर मैं क्या समझ पाती कि रत्ना की बेटी होना ही सब प्रकार के व्यंग्य का निशाना क्यों बनता है?

समझी तो वर्षों बाद थी, उस समय तो केवल सफेद चमकती टाइलों वाली रसोई में जा कर खट्टे चनों पर मसाला बुरकती मां का आंचल पकड़ कर कह पाई थी, ‘मां, रूपा मामी कह रही हैं, कपड़े बदल कर आ.’

मां ने विवश आंखों में छिपी नमी किस चतुराई से पलकें झपका कर रोक ली थी. कमरे में आ कर मुझे नया फ्राक पहना दिया, जो शायद अपनी पुरानी टिशू की साड़ी फाड़ कर दावत के दिन पहनने के लिए बनाया था.

‘दावत वाले दिन क्या पहनूंगी?’ इस चिंता से मुक्त मैं ठुमकतीकिलकती फिर ढोलक पर आ बैठी. रूपा मामी की त्योरी चढ़ गईं, साथ ही साथ होंठों पर व्यंग्य की रेखा भी खिंच गई.

‘मां ने अपनी साड़ी से बना दिया है क्या?’ नाश्ते की प्लेट चाटते मामी बोलीं. वही नाश्ता जो दोपहर भर रसोई में फुंक कर मां ने बनाया था. मैं शामियाने से उठ कर बाहर आ गई.

सेहराबंदी, घुड़चढ़ी, सब रस्में मैं ने अपने छींट के फ्राक में ही निभा दीं. फिर मेहमानों में अधिक गई ही नहीं. दावत वाले दिन घर में बहुत भीड़भाड़ थी. करीबकरीब सारे शहर को ही न्योता था. हम सब बच्चे पहले तो बैंड वाले का गानाबजाना सुनते रहे, फिर कोठी के पिछवाड़े बगीचे में देर तक खेलते रहे.

फिर बाग पार कर दूर बने धोबियों के घरों की ओर निकल आए. पुश्तों से ये लोग यहीं रहते आए थे. अब शहर वालों के कपड़े भी धोने ले आते थे. बदलते समय व महंगाई ने पुराने सामंती रिवाज बदल डाले थे. यहीं एक बड़ा सा पक्का हौज बना हुआ था, जिस में पानी भरा रहता था.

यहां सन्नाटा छाया हुआ था. धोबियों के परिवार विवाह की रौनक देखने गए हुए थे. हम सब यहां देर तक खेलते रहे, फिर हौज के किनारे बनी सीढि़यां चढ़ कर मुंडेर पर आ खडे़ हुए. आज इस में पानी लबालब भरा था. रिंपी और पप्पी रोब झाड़ रही थीं कि लंदन में उन्होंने तरणताल में तैरना सीखा है. बाकी हम में से किसी को भी तैरना नहीं आता था.

डिंकी ने चुनौती दी थी, ‘अच्छा, जरा तैर कर दिखाओ तो.’

‘अभी कैसे तैरूं? तैरने का सूट भी तो नहीं है,’ पप्पी बोली थी.

‘खाली बहाना है, तैरनावैरना खाक आता है,’ रीना ने मुंह चिढ़ाया.

तभी शायद रिंपी का धक्का लगा और पप्पी पानी में जा गिरी.

हम सब आश्वस्त थे कि उसे तैरना आता है, अभी किनारे आ लगेगी, पर पप्पी केवल हाथपैर फटकार कर पानी में घुसती जा रही थी. सभी डर कर भाग खड़े हुए. फिर मुझे ध्यान आया कि जब तक कोठी पर खबर पहुंचेगी, पप्पी शायद डूब ही जाए.

मैं ने चिल्ला कर सब से रुकने को कहा, पर सब के पीछे जैसे भूत लगा था. मैं हौज के पास आई. पप्पी सचमुच डूबने को हो रही थी. क्षणभर को लगा, ‘अच्छा ही है, बेटी डूब जाए तो रूपा मामी को पता लगेगा. हमारा कितना मजाक उड़ाती रहती हैं. मेरा कितना अपमान किया था.’

तभी पप्पी मुझे देख कर ‘अप्पू…अप्पू…’ कह कर एकदो बार चिल्लाई. मैं ने इधरउधर देखा. एक कटे पेड़ की डालियां बिखरी पड़ी थीं. एक हलकी पत्तों से भरी टहनी ले कर मैं ने हौज में डाल दी और हिलाहिला कर उसे पप्पी तक पहुंचाने का प्रयत्न करने लगी. पत्तों के फैलाव के कारण पप्पी ने उसे पकड़ लिया. मैं उसे बाहर खींचने लगी. घबराहट के कारण पप्पी डाल से चिपकी जा रही थी. अचानक एक जोर का झटका लगा और मैं पानी में जा गिरी. पर तब तक पप्पी के हाथ में मुंडेर आ गई थी. मैं पानी में गोते खाती रही और फिर लगा कि इस 9-10 फुट गहरे हौज में ही प्राण निकल जाएंगे.

होश आया तो देखा शाम झुक आई थी. रूपा मामी वहीं घास पर मुझे बांहों में भरे बैठी थीं. उन की बनारसी साड़ी का पानी से सत्यानास हो चुका था. डाक्टर अपना बक्सा खोले कुछ ढूंढ़ रहा था. मां और पिताजी रोने को हो रहे थे.

‘बस, अब कोई डर की बात नहीं है,’ डाक्टर ने कहा तो मां ने चैन की सांस ली.

‘आज हमारी बहादुर अप्पू न होती तो जाने क्या हो जाता. पप्पी के लिए इस ने अपनी जान की भी परवा नहीं की,’ नगेंद्र मामा की आंखों में कृतज्ञता का भाव था.

मैं ने मां की ओर यों देखा जैसे कह रही हों, ‘तुम्हारा दिया अपराजिता नाम मैं ने सार्थक कर दिया, मां. आज मैं ने प्रतिशोध की भावना पर विजय पा ली.’

शायद मैं ने साथ ही साथ रूपा मामी के आभिजात्य के अहंकार को भी पराजित कर दिया था. Hindi Family Story

Hindi Family Story: बंद गले का कोट

Hindi Family Story: मास्को में गरमी का मौसम था. इस का मतलब यह नहीं कि वहां सूरज अंगारे उगलने लगा था, बल्कि यह कहें कि सूरज अब उगने लगा था, वरना सर्दी में तो वह भी रजाई में दुबका बैठा रहता था. सूरज की गरमी से अब 6 महीने से जमी हुई बर्फ पिघलने लगी थी. कहींकहीं बर्फ के अवशेष अंतिम सांसें गिनते दिखाई देते थे. पेड़ भी अब हरेभरे हो कर झूमने लगे थे, वरना सर्दी में तो वे भी ज्यादातर बर्फ में डूबे रहते थे. कुल मिला कर एक भारतीय की नजर से मौसम सुहावना हो गया था. यानी ओवरकोट, मफलर, टोपी, दस्ताने वगैरा त्याग कर अब सर्दी के सामान्य कपड़ों में घूमाफिरा जा सकता था. रूसी लोग जरूर गरमी के कारण हायहाय करते नजर आते थे. उन के लिए तो 24 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पारा हुआ नहीं कि उन की हालत खराब होने लगती थी और वे पंखे के नीचे जगह ढूंढ़ने लगते थे. बड़े शोरूमों में एयर कंडीशनर भी चलने लगे थे.

सुनील दूतावास में तृतीय सचिव के पद पर आया था. तृतीय सचिव का अर्थ था कि चयन और प्रशिक्षण के बाद यह उस की पहली पोस्टिंग थी, जिस में उसे साल भर देश की भाषा और संस्कृति का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करना था और साथ ही दूतावास के कामकाज से भी परिचित होना था. वह आतेजाते मुझे मिल जाता और कहता, ‘‘कहिए, प्रोफेसर साहब, क्या चल रहा है?’’

‘‘सब ठीक है, आप सुनाइए, राजदूत महोदय,’’ मैं जवाब देता.

हम दोनों मुसकानों का आदानप्रदान करते और अपनीअपनी राह लेते. रूस में रहते हुए अपनी भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेमप्रदर्शन के लिए और भारतीयों की अलग पहचान दिखाने के लिए मैं बंद गले का सूट पहनता था. रूसी लोग मेरी पोशाक से बहुत आकर्षित होते थे. वे मुझे देख कर कुछ इशारे वगैरा करने लगते. कुछ लोग मुसकराते और ‘इंदीइंदी’ (भारतीयभारतीय) कहते. कुछ मुझे रोक कर मुझ से हाथ मिलाते. कुछ मेरे साथ खडे़ हो कर फोटो खिंचवाते. कुछ ‘हिंदीरूसी भाईभाई’ गाने लगते. सुनील को भी मेरा सूट पसंद था और वह अकसर उस की तारीफ करता था.

यों पोशाक के मामले में सुनील खुद स्वच्छंद किस्म का जीव था. वह अकसर जींस, स्वेटर वगैरा पहन कर चला आता था. कदकाठी भी उस की छोटी और इकहरी थी. बस, उस के व्यवहार में भारतीय विदेश सेवा का कर्मचारी होने का थोड़ा सा गरूर था.

मैं ने कभी उस की पोशाक वगैरा पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एक दिन अचानक वह मुझे बंद गले का सूट पहने नजर आया. मुझे लगा कि मेरी पोशाक से प्रभावित हो कर उस ने भी सूट बनवाया है. मुझे खुशी हुई कि मैं ने उसे पोशाक के मामले में प्रेरित किया.

‘‘अरे, आज तो आप पूरे राजदूत नजर आ रहे हैं,’’ मैं ने कहा, ‘‘सूट आप पर बहुत फब रहा है.’’

उस ने पहले तो मुझे संदेह की नजरों से देखा, फिर हलके से ‘धन्यवाद’ कहा और ‘फिर मिलते हैं’ का जुमला हवा में उछाल कर चला गया. मुझे उस का यह व्यवहार बहुत अटपटा लगा. मैं सोचने लगा कि मैं ने ऐसा क्या कह दिया कि वह उखड़ गया. मुझे कुछ समझ नहीं आया. इस पर ज्यादा सोचविचार करना मैं ने व्यर्थ समझा और यह सोच कर संतोष कर लिया कि उसे कोई काम वगैरा होगा, इसलिए जल्दी चला गया.

तभी सामने से हीरा आता दिखाई दिया. वह कौंसुलेट में निजी सहायक के पद पर था.

‘‘क्या बात हो रही थी सुनील से?’’ उस ने शरारतपूर्ण ढंग से पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ मैं ने बताया, ‘‘पहली बार सूट में दिखा, तो मैं ने तारीफ कर दी और वह मुझे देखता चला गया, मानो मैं ने गाली दे दी हो.’’

‘‘तुम्हें पता नहीं?’’ हीरा ने शंकापूर्वक कहा.

‘‘क्या?’’ मुझे जिज्ञासा होना स्वाभाविक था.

‘‘इस सूट का राज?’’ उस ने कहा.

‘‘सूट का राज? सूट का क्या राज, भई?’’ मैं ने भंवें सिकोड़ते हुए पूछा.

‘‘असल में इसे पिछले हफ्ते मिलित्सिया वाले (पुलिस वाले) ने पकड़ लिया था,’’ उस ने बताया, ‘‘वह बैंक गया था पैसा निकलवाने. बैंक जा रहा था तो उस के 2 साथियों ने भी उसे अपने चेक दे दिए. वह बैंक से निकला तो उस की जेब में 3 हजार डालर थे.

‘‘वह बाहर आ कर टैक्सी पकड़ने ही वाला था कि मिलित्सिया का सिपाही आया और इसे सलाम कर के कहा कि ‘दाक्यूमेत पजालस्ता (कृपया दस्तावेज दिखाइए).’ इस ने फट से अपना राजनयिक पहचानपत्र निकाल कर उसे दिखा दिया. वह बड़ी देर तक पहचानपत्र की जांच करता रहा फिर फोटो से उस का चेहरा मिलाता रहा. इस के बाद इस की जींस और स्वेटर पर गौर करता रहा, और अंत में उस ने अपना निष्कर्ष उसे बताया कि यह पहचानपत्र नकली है.’’

‘‘सुनील को जितनी भी रूसी आती थी, उस का प्रयोग कर के उस ने सिपाही को समझाने की कोशिश की कि पहचानपत्र असली है और वह सचमुच भारतीय दूतावास में तृतीय सचिव है. लेकिन सिपाही मानने के लिए तैयार नहीं था. फिर उस ने कहा कि ‘दिखाओ, जेब में क्या है?’ और जेबें खाली करवा कर 3 हजार डालर अपने कब्जे में ले लिए. अब सुनील घबराया, क्योंकि उसे मालूम था कि मिलित्सिया वाले इस तरह से एशियाई लोगों को लूट कर चल देते हैं और फिर उस की कोई सुनवाई नहीं होती. अगर कोई काररवाई होती भी है तो वह न के बराबर होती है. मिलित्सिया वाले तो 100-50 रूबल तक के लिए यह काम करते हैं, जबकि यहां तो मसला 3 हजार डालर यानी 75 हजार रूबल का था.’’

‘‘उस ने फिर से रूसी में कुछ कहने की कोशिश की लेकिन मिलित्सिया वाला भला अब क्यों सुनता. वह तो इस फिराक में था कि पैसा और पहचानपत्र दोनों ले कर चंपत हो जाए, लेकिन सुनील के भाग्य से तभी वहां मिलित्सिया की गाड़ी आ गई. उस में से 4 सिपाही निकले, जिन में से 2 के हाथों में स्वचालित गन थीं. उन्हें देख कर सुनील को लगा कि शायद अब वह और उस के पैसे बच जाएं.

‘‘वे सिपाही वरिष्ठ थे, इसलिए पहले सिपाही ने उन्हें सैल्यूट कर के उन्हें सारा माजरा बताया और फिर मन मार कर पहचानपत्र और राशि उन के हवाले कर दी और कहा कि उसे शक है कि यह कोई चोरउचक्का है. उन सिपाहियों ने सुनील को ऊपर से नीचे तक 2 बार देखा. मौका देख कर सुनील ने फिर से अपने रूसी ज्ञान का प्रयोग करना चाहा, लेकिन उन्होंने कुछ सुनने में रुचि नहीं ली और आपस में कुछ जोड़तोड़ जैसा करने लगे. इस पर सुनील की अक्ल ने काम किया और उस ने उन्हें अंगरेजी में जोरों से डांटा और कहा कि वह विदेश मंत्रालय में इस बात की सख्त शिकायत करेगा.

‘‘उन्हें अंगरेजी कितनी समझ में आई, यह तो पता नहीं, लेकिन वे कुछ प्रभावित से हुए और उन्होंने सुनील को कार में धकेला और कार चला दी. पहला सिपाही हाथ मलता और वरिष्ठों को गालियां देता वहीं रह गया. अब तो सुनील और भी घबरा गया, क्योंकि अब तक तो सिर्फ पैसा लुटने का डर था, लेकिन अब तो ये सिपाही न जाने कहां ले जाएं और गोली मार कर मास्कवा नदी में फेंक दें. उस का मुंह रोने जैसा हो गया और उस ने कहा कि वह दूतावास में फोन करना चाहता है. इस पर एक सिपाही ने उसे डांट दिया कि चुप बैठे रहो.

‘‘सिपाही उसे ले कर पुलिस स्टेशन आ गए और वहां उन्होंने थाना प्रभारी से कुछ बात की. उस ने भी सुनील का मुआयना किया और शंका से पूछा, ‘आप राजनयिक हैं?’

‘‘सुनील ने अपना परिचय दिया और यह भी बताया कि कैसे उसे परेशान किया गया है, उस के पैसे छीने गए हैं. बेमतलब उसे यहां लाया गया है और वह दूतावास में फोन करना चाहता है.

‘‘प्रभारी ने सामने पड़े फोन की ओर इशारा किया. सुनील ने झट से कौंसुलर को फोन मिलाया. कौंसुलर ने मुझे बुलाया और फिर मैं और कौंसुलर दोनों कार ले कर थाने पहुंचे. हमें देख कर सुनील लगभग रो ही दिया. कौंसुलर ने सिपाहियों को डांटा और कहा कि एक राजनयिक के साथ इस तरह का व्यवहार आप लोगों को शोभा नहीं देता.’’

‘‘इस पर वह अधिकारी काफी देर तक रूसी में बोलता रहा, जिस का मतलब यह था कि अगर यह राजनयिक है तो इसे राजनयिक के ढंग से रहना भी चाहिए और यह कि इस बार तो संयोग से हमारी पैट्रोल वहां पहुंच गई, लेकिन आगे से हम इस तरह के मामले में कोई जिम्मेदारी नहीं ले सकते?

‘‘अब कौंसुलर की नजर सुनील की पोशाक पर गई. उस ने वहीं सब के सामने उसे लताड़ लगाई कि खबरदार जो आगे से जींस में दिखाई दिए. क्या अब मेरे पास यही काम रह गया है कि थाने में आ कर इन लोगों की उलटीसीधी बातें सुनूं और तुम्हें छुड़वाऊं.’’

‘‘हम लोग सुनील को ले कर आ गए. अगले 2 दिन सुनील ने छुट्टी ली और बंद गले का सूट सिलवाया और उसे पहन कर ही दूतावास में आया. मैं ने तो खैर उस का स्टेटमेंट टाइप किया था, इसलिए इतने विस्तार से सब पता है, लेकिन यह बात तो दूतावास के सब लोग जानते हैं,’’ हीरा ने अपनी बात खत्म की.

‘‘तभी…’’ मेरे मुंह से निकला, ‘‘उसे लगा होगा कि मैं भी यह किस्सा जानता हूं और उस का मजाक उड़ा रहा हूं.’’

‘‘अब तो जान गए न,’’ हीरा हंसा और अपने विभाग की ओर बढ़ गया.

मुझे अफसोस हुआ कि सुनील को सूट सिलवाने की प्रेरणा मैं ने नहीं, बल्कि पुलिस वालों ने दी थी. Hindi Family Story

Marriage Problem: मैं अपनी पत्नी को छोड़ किसी और के साथ नई जिंदगी शुरू करना चाहता हूं

Marriage Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं बिहार का रहने वाला हूं और मेरी उम्र 28 साल है. मैं 19 साल की उम्र में एक लड़की से प्यार कर बैठा था और मेरे कहने पर मेरे घर वालों ने मेरी उस से शादी भी करा दी थी. शुरुआत में तो सब अच्छा लग रहा था, लेकिन धीरेधीरे मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं ने बहुत ही कम उम्र में शादी कर ली है. ऐसा लगने लगा कि मैं ने अपनी जवानी बिना जिए ही बरबाद कर दी. मेरा लगाव अपनी पत्नी में बिलकुल नहीं रहा. आज हमारी शादी को 9 साल हो चुके हैं, लेकिन हमारी लाइफ बिलकुल बोरिंग बन चुकी है. न ही सैक्स लाइफ में मजा है और न ही शादीशुदा जिंदगी ही अच्छी है. मैं चाहता हूं कि मुझे किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी शुरू करनी चाहिए, लेकिन मैं अपनी पत्नी से क्या कहूं समझ नहीं आता. हमारा एक बेटा भी है जिस के बारे में सोच कर ही मैं कोई फैसला नहीं ले पाता हूं. आप ही बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

मैं आप की परेशानी अच्छे से समझ सकता हूं. आप ने शादी करने का फैसला बहुत ही छोटी उम्र में ले लिया, जिस से अब आप को जिम्मेदारी निभाते हुए इतना समय हो गया है कि आप अपनी जिंदगी से थक चुके हैं और कुछ बदलाव चाहते हैं.

पर आप की यह सोच बिलकुल गलत है कि आप अपनी पत्नी को छोड़ कर किसी और के साथ नई जिंदगी शुरू करें, यह जानते हुए भी कि आप का एक बेटा भी है. पतिपत्नी के अलग होने के बाद औलाद की क्या हालत होती है, यह आप नहीं जानते शायद. अगर आप को अपनी जिंदगी बोरिंग लगने लगी है और कुछ नयापन लाना चाहते हैं, तो ऐसे बहुत से तरीके हैं जिन से आप अपनी बोरिंग लाइफ को बेहतर बना सकते हैं.

आप कुछ दिन की छुट्टी ले कर अपनी पत्नी और बेटे के साथ किसी अच्छी जगह घूमने निकल जाएं, जहां आप और आप की पत्नी एक बार फिर एकदूसरे के करीब आ सकें. सैक्स लाइफ अच्छी करने के लिए जरूरी है माहौल का चेंज होना, तो आप किसी रोमांटिक जगह जाएं और अपनी जिंदगी में एक बार फिर रोमांस जगाएं. आप की उम्र सिर्फ 28 साल है और अगर अभी से आप अपनी सैक्स लाइफ बोरिंग कर लेंगे, तो आगे की जिंदगी कैसे बिताएंगे.

आप को जो चेंज लाना है वह खुद में और अपनी पत्नी में लाएं. उसे सजनेसंवरने के लिए बोलें, पत्नी के साथ रोमांटिंक बातें करें, डिनर डेट्स पर जाएं जिस से आप दोनों को एकदूसरे का साथ फिर से अच्छा लगने लगेगा.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Marriage Problem

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें