Best Hindi Kahani: मुझे बेबस न समझो – वजूद तलाशती नेहा

Best Hindi Kahani: नेहा शूटिंग के उस सीन को याद कर सिहर उठती थी. वह ओलिशा की बौडी डबल थी, सो सारे रेप सीन या उघड़े बदन वाले सीन उस पर ही फिल्माए जाते थे. वैसे तो अब उसे इन सब की आदत पड़ चुकी थी पर आज रेप सीन को विभिन्न कोणों से फिल्माने के चक्कर में वह काफी टूटी व थकी महसूस कर रही थी.

फिर देर रात तक नींद उस से कोसों दूर रही. अपनी ही चीखें, चाहे डायलौग ही थे, उस के कानों में गूंज कर उस के अपने ही अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे थे जिस के कारण उसे शारीरिक थकावट से ज्यादा दिमागी थकावट महसूस हो रही थी.

कब तक वह ऐसे दृश्यों पर अभिनय करती रहेगी, यह सवाल उस के सिर पर हथौड़े की तरह वार कर रहा था. विचारों के भंवर से बाहर निकलने के लिए वह कौफी का मग हाथ में पकड़ खिड़की के पास आ खड़ी हुई. बाहर आसपास की दुनिया देख उसे कुछ सुकून मिला ही था कि उसे देख 1-2 लोगों ने हाथ हिलाया और फिर आपस में कोई भद्दा मजाक कर खीखी कर हंसने लगे.

सब को पता है कि वह छोटीमोटी फिल्मी कलाकार है. पर शुक्र है यह नहीं पता कि वह किसी का बौडी डबल करती है. नहीं तो उसे वेश्या ही समझ लेते. खैर, दिमाग से यह कीड़ा बाहर फेंक वह कालेज जाने की तैयारी करने लगी. बस पकड़ने के लिए स्टौप पर खड़ी थी तो देखा कि 2-4 आवारा कुत्ते एक कुतिया के पीछे लार टपकाते उसे झपटने जा रहे थे. वह कुतिया जान बचा उस के पैरों के आसपास चक्कर लगाने लगी. तभी, एक पत्थर उठा उस ने कुत्तों को भगाया. कुतिया भाग कर एक नाले में छिप गई.

बाहर आवारा कुत्ते उस कुतिया के आने का इंतजार करने लगे. किसी ने भी कुत्तों को वहां से नहीं भगाया. शायद मन ही मन इस कुतिया का तमाशा देखने की चाह रही होगी भीड़ की. तभी उस की बस आ गई और वह अपना बसपास दिखा सीट खाली होने का इंतजार करने लगी.

सीट का इंतजार करतेकरते आत्ममंथन भी करने लगी. शूटिंग के समय तो वह भी इस निरीह कुतिया की तरह लार टपकाते साथी सदस्यों से इसी तरह बचती फिरती रहती है क्योंकि उन की निगाह में ऐसे सीन देने वाली युवती का अपना कोई चरित्र नहीं होता. तभी तो सीन फिल्माते समय जानबूझ कर एक ही सीन को बीसियों बार रीटेक करवाया जाता है.

कभी ऐंगल की बात तो कभी कपड़े ज्यादा नहीं उघड़े, क्याक्या बहाने नहीं बनाए जाते उस की बेचारगी का फायदा उठाने के लिए. इसी कारण वह भी हर सीन के बाद चुपचाप एक कोने में बैठ जाती है. एक बार उस ने छूट दे दी तो गरीब की जोरु बन रह जाएगी.

उस की अपनी बेबसी, शूटिंग पर उपस्थित लोगों की कुटिल मुसकान भेदती निगाहें व अश्लील इशारे उस के अंतर्मन को क्षतविक्षत कर देते हैं पर वह भी क्या करे. बड़ेबड़े सपने ले कर वह चंडीगढ़ आई थी. उच्च शिक्षा के साथसाथ मौडलिंग व फिल्मों में काम करने के लिए. सब कहते थे कि वह फिल्मी सितारा लगती है, एकदम परफैक्ट फिगर है, कोई भी डायरैक्टर उसे देखते ही फिल्मों में हीरोईन साइन कर लेगा.

उच्च शिक्षा का सपना ले कर चंडीगढ़ आई नेहा की मुंबई तो अकेले जाने की व रहने की हिम्मत न पड़ी. पर यहां पढ़ाई के दौरान ही चंडीगढ़ में थोड़ी जानपहचान के बलबूते पर उसे मौडलिंग के काम मिलने लगे थे. मांबाप के मना करने के बावजूद वह इस आग के दरिया में कूद पड़ी. मौडलिंग से संपर्क बने तो इक्कादुक्का टीवी सीरियल में काम भी मिल गया.

उसे इतनी जल्दी मिलती शोहरत कुछ नामीगिरामी कलाकारों को रास नहीं आई. पालीवुड में उन को नेहा का आना खतरे की घंटी लगने लगा. उन्होंने उस की छोटीछोटी कमियों को बढ़ाचढ़ा कर दिखा उस के यहां पैर ही न टिकने दिए. मांबाप ने भी सहारा देने की जगह खरीखोटी सुना दी. वह तो भला हो उस के पत्रकार मित्र साहिल का जिस ने उसे फिल्मों में ओलिशा का बौडी डबल बनने की सलाह दी और फिल्मों में काम दिलवा उसे आर्थिक व मानसिक संकट से उबार लिया. अब तो यही काम उस की रोजीरोटी है.

आज कोई रिश्तेदार उस का अपना नहीं, सभी ने उस से मुंह मोड़ लिया है. इसी वजह से पढ़ाई दोबारा शुरू कर वह कुछ बनना चाहती है ताकि इस से छुटकारा पा सके. पर क्या करे, कहां जाए, मांबाप तो स्वीकारने से रहे. ‘नहीं, नहीं, ऐसे बेचारगी वाले नैगेटिव विचारों को वह फन नहीं उठाने देगी. यही कमजोरी औरों को फायदा उठाने का मौका देगी और वह उस बसस्टौप वाली निरीह कुतिया की तरह किसी के पैरों पर गिड़गिड़ाएगी नहीं.’ इस सोच ने उसे संबल प्रदान किया.

वर्तमान से रूबरू होते ही वह समझ गई कि आज भीड़ से भरी बस में उसे सीट मिलने से तो रही, इसलिए यूनिवर्सिटी तक खड़े हो कर ही जाना पड़ेगा. चलो, केवल 20 मिनट का ही सफर रह गया है, वह भी बस आराम से कट जाए. वैसे भी गली के आवारा कुत्तों से ज्यादा अश्लील व खूंखार तो कई बार सहयात्री होते हैं. सीट मिली तो विचारों की तंद्रा भी टूटी और नेहा को चैन भी आया क्योंकि आज नकारात्मक विचारों की कड़ी टूट ही नहीं रही थी.

बगल की सीट खाली हुई तो लाठी पकड़े बूढ़े ने जानबूझ कर उस पर अपना भार डाल दिया. वह किनारे खिसकी तो वृद्ध व्यक्ति ने हद ही कर दी. बैठतेबैठते उस के हिप्स पर च्यूंटी काट दी. उस ने घूर कर देखा तो खींसे निपोर सौरीसौरी बोलने लगा कि गलती से हाथ लग गया था.

जैसे ही बस रुकी, सीट बदल ली. पर यह तो दिन की शुरुआत थी. तभी अचानक बस रुकी और पीछे खड़ा व्यक्ति उस पर झूल पड़ा. वह झटके से उस वृद्ध के ऊपर लुढ़क गई. उस ने खड़े हो कर बाकी सफर करना तय करना ही सही समझा. और अपनी सीट से खड़ी हो आगे दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी. अभी वह खड़ी ही हुई थी कि तभी उसे पीछे कुछ गड़ता सा महसूस हुआ.

पीछे खड़ा 17-18 साल का भारी सा लड़का उस के साथ सट कर गंदी हरकत करने लगा. उस ने उसे धकियाते हुए लताड़ा तो खींसें निपोरते उस ने नेहा पर कटाक्ष किया, ‘‘इतनी ही नाजुक है तो अपनी सवारी पर आया कर.’’

वह मुंह फेर खड़ी हो गई. कौन इन कुत्तों के मुंह लगे. इन कुत्तों का शिकार नहीं बनना उसे. उस के जवाब न देने के कारण उस लड़के की हिम्मत बढ़ गई. वह कभी पीठ पर हाथ फेरता तो कभी उस के हिप्स पर. उस की घुटन देख एक बुजुर्ग सरदारजी ने उसे अपनी सीट सौंप दी. वैसे तो उस का स्टौप आने ही वाला था फिर भी उस ने बैठने में ही भलाई समझी और सिमट कर अपनी सीट पर बैठ गई.

पता नहीं, उस की इस बात को उस लड़के ने कैसे लिया क्योंकि स्टौप आने पर जैसे ही वह उठी तो उस लड़के ने उस के रास्ते में पैर अड़ा दिया. वह गिरतेगिरते बची. इस हरकत से जब उस बुजुर्ग सरदारजी ने उस लड़के को टोका तो उस ने भरी बस में उन्हें 2 मुक्के मार, पीछे सीट पर धकेल दिया. उन्हें बचाने के लिए कोई न उठा. ड्राइवर, कंडक्टर व सारी सवारियां मूकदर्शक बन तमाशा देखती रहीं जिस से उस लड़के की हिम्मत और बढ़ गई.

इस सब तमाशे की वजह से नेहा अपने स्टौप पर उतर ही नहीं पाई. लगा कौरवों की सभा में फंस कर रह गई है. तभी लालबत्ती पर बस रुकी. नेहा ने वहीं उतरने में भलाई समझी. पर यहां भी मुसीबत ही हाथ लगी. सोचने और कूदने में समय लग गया और उस के कूदतेकूदते ही बस चल पड़ी और वह सीधा सड़क पर गिरी. ज्यादा चोट नहीं लगी. हां, कुछ गाड़ी वालों ने गालियां जरूर सुना दीं.

तभी, जैसे ही वह खड़ी हुई तो 2 मजबूत हाथों ने उसे घुमा कर अपनी तरफ कर लिया और फुटपाथ की तरफ खींच कर ले आए.

जैसे ही उस अनाम व्यक्ति को धन्यवाद करने के लिए उस ने उस की तरफ देखा तो उस की चीख गले में ही घुट कर रह गई. यह तो वही दुष्ट था और भरी सड़क से किनारे ला उस की इज्जत पर हमला करना चाहता था. चलतीदौड़ती सड़क को देख नेहा ने हिम्मत जुटाई और 2 करारे थप्पड़ उस दुष्ट के मुंह पर जड़ दिए.

नेहा ने कड़क लहजे में पूछा, ‘‘क्या बदतमीजी है, तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’

‘‘ओ मेरी रानी, तुम्हें तो पा कर ही रहूंगा. पहले मेरे इन गालों पर चुंबन दे, इन्हें सहलाओ, तभी तुम्हें जाने दूंगा. कब तक तड़पाओगी, मेरी जान.’’ वह वहशी ठहाका मार कर हंसा और उसे अपनी तरफ खींचने लगा. नेहा समझ गई कि कोई बड़ी मुसीबत आन पड़ी है,

अपनी रक्षा स्वयं ही करनी होगी. सो, उस ने कस कर पकड़े अपने बैग में से अपने सुरक्षा कवच लालमिर्च पाउडर और मोबाइल को निकालने के लिए जद्दोजेहद शुरू की. आज तक कभी जरूरत नहीं पड़ी थी मिर्चपाउडर की.

इस मुसीबत में हड़बड़ाहट में न तो उसे मिर्चपाउडर मिल रहा था और न ही मोबाइल. बेबस हो उस ने बढ़ती भीड़ की तरफ झांका. कई लोग उस की सहायता करने के बजाय अपनेअपने मोबाइल से इस सारे कांड का वीडियो बना रहे थे.

उस ने सहायता के लिए गुहार लगाई. इक्कादुक्का लोग उस की सहायता को आगे बढ़े भी तो भीड़ ने उन के कदम थाम लिए, यह कह कर कि ‘देखते नहीं, शूटिंग चल रही है. कल भी यहीं एक शूटिंग चल रही थी, किसी ने ऐसे ही हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो बाउंसरों ने उस की खासी पिटाई कर दी थी.’

सारी भीड़ शूटिंग का मजा लेने के लिए घेरा बना खड़ी हो गई. यह सब सुनदेख नेहा का दिमाग पलभर के लिए सुन्न हो गया. क्या करे? वहां कोई भी मौके की नजाकत नहीं समझ रहा था. लगता था सभी बहती गंगा में हाथ धोना चाहते थे.

वैसे भी आजकल तो सजा बलात्कारी नहीं, बलात्कार होने वाली नारी को भुगतनी पड़ती है. लोगबाग तो बलात्कारी, आतंकवादी और हत्यारों के साथ सैल्फी ले हर्षित महसूस करते हैं. नहीं, वह दूसरी ‘निर्भया’ नहीं बनेगी. निर्बल नहीं, निर्भय होना है उसे, इस सोच के साथ जैसे ही वह अपने बैग में हाथ डाल अपने ‘हथियार’ निकालने लगी तो उस शख्स ने मौका पाते ही उसे जमीन पर गिरा दिया. स्वयं नेहा की छाती पर बैठ गया और बोला, ‘‘करती है, किस या नहीं. मैं चंडीगढ़ का किसर बौय हूं. देखता हूं तुम मुझे कैसे इनकार करती हो.’’

उस की इस हरकत पर भीड़ ने तालियां बजानी शुरू कर दीं. एक ने फिकरा कसा, ‘‘क्या बढि़या डायलौग है. पिक्चर सुपरहिट है, मेरे भाई. जारी रखो. बिलकुल असली सा मजा आ रहा है.’’

एक के बाद दूसरी आवाजें आ रही थीं. तब तक वह लड़का अपने होंठों को उस के होंठों तक ले आया. नेहा ने हिम्मत जुटा उसे परे धकेला. जैसे ही वह पीछे हटा तो दूर गिरा नेहा का बैग उस लड़के के पैरों से लग कर नेहा के हाथों पर आ गिरा. आननफानन नेहा ने लालमिर्च का पैकेट ढूंढ़ने की कोशिश की. उस के हाथ में पैकेट आता, उस से पहले ही वह लड़का अपनी जींस की जिप खोल उस की तरफ बढ़ा और…

भीड़ इस सब का पूरा लुत्फ उठा रही थी. लोगों के हाथ मोबाइल पर और आंखें उन दोनों पर टिकी थीं ताकि कोई भी पल ‘मिस’ न हो जाए.

भीड़ में से कोई चिल्लाया, ‘अजी, वाह, यह तो ब्लू फिल्म की शूटिंग चल रही है.’ नेहा समझ गई वासना से लिप्त भीड़ उस की कोई सहायता नहीं करेगी. क्या पता 1-2 लोग और इस मौके का फायदा उठाने को आ जाएं. उसे अपनी रक्षा खुद करनी होगी. हिम्मत जुटा उस ने हाथ में आए मिर्च के पैकेट को बाहर निकाला और उस दुष्ट की आंखों में झोंक दिया.

जब तक वह आंखें मलता तब तक नेहा ने अपने मिर्च वाले हाथों से उस का ‘वही’ अंग जिप में से निकाल कर दांतों में भींच लिया. खून का फौआरा फूट पड़ा. लड़का दर्द से बिलबिला, सड़क पर लोटने लगा.

सारी भीड़ हक्कीबक्की रह गई. वीरांगना के समान नेहा उठ खड़ी हुई. कपड़े झाड़ उस ने मिर्च का पैकेट हाथ में ले नपुंसक भीड़ पर छिड़क दिया, ‘‘लो, अब खींचों फोटो अपना व अपने इस साथी दरिंदे का.’’ और पिच्च से भीड़ पर थूक दिया. वह आगे बढ़ गई. भीड़ ने उस के लिए खुद ही रास्ता बना दिया. Best Hindi Kahani

Bihar Elections 2025 में बौलीवुड एक्ट्रेस की एंट्री, सामने आई सच्चाई

Bihar Elections 2025: जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राज्य का सियासी माहौल भी लगातार गरमाता जा रहा है. इस चुनावी माहौल के बीच भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े कई नाम चर्चा में बने हुए हैं. खासकर भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह और उनकी पत्नी ज्योति सिंह के बीच चल रहे विवाद ने सोशल मीडिया पर खूब हलचल मचा रखी है. दोनों के सपोर्टर्स एक-दूसरे के पक्ष में खुलकर पोस्ट कर रहे हैं, जिससे यह मामला और ज्यादा सुर्खियों में आ गया है. इसी बीच, इस मुद्दे पर भोजपुरी सुपरस्टार खेसारीलाल यादव का भी बयान सामने आया था जिसमें उन्होनें पवन सिंह को गलत ठहराया था.

इसी बीच सोशल मीडिया पर एक तस्वीर ने सबका ध्यान खींच लिया है, जिसमें बौलिवुड एक्ट्रेस रवीना टंडन और राजद नेता तेजस्वी यादव एक साथ नजर आ रहे हैं. इस तस्वीर के वायरल होते ही अफवाहें उड़ने लगीं कि रवीना टंडन अब राजनीति में कदम रख रही हैं और राजद के लिए प्रचार करने वाली हैं. हालांकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है.

जांच में पता चला कि यह पोस्ट नया नहीं बल्कि 16 नवंबर 2024 का है, जिसे तेजस्वी यादव ने अपने फेसबुक अकाउंट से शेयर किया था. उस समय उन्होंने कैप्शन में लिखा था – “सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रवीना टंडन जी से आज एयरपोर्ट पर मुलाकात हुई.”

आपको बता दें, हाल ही में एक्ट्रेस अक्षरा सिंह की एक फोटो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती दिखी. इस फोटो में वे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के साथ नजर आ रही हैं. अक्षरा ने फोटो शेयर करते हुए लिखा था, “आज बिहार के केंद्रीय मंत्री माननीय गिरिराज सिंह जी से शिष्टाचार और आशीर्वाद प्राप्त किया.” अक्षरा की इस पोस्ट के सामने आते ही फैंस और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है कि क्या अब वे भी राजनीति में कदम रखने की तैयारी कर रही हैं. Bihar Elections 2025

Hindi Kahani: पाखंड का अंत – बिंदु ने खोली ढोंगी बाबा की पोल

Hindi Kahani: बिंदु के मातापिता बचपन में ही गुजर गए थे, पर मरने से पहले वे बिंदु का रिश्ता भमुआपुर के चौधरी हरिहर के बेटे बिरजू से कर गए थे.

उस समय बिंदु 2 साल की थी और बिरजू 5 साल का. बिंदु के मातापिता के मरने के बाद उसे उस के चाचा ने पालापोसा था.

बिंदु के चाचा बहुत ही नेकदिल इनसान थे. उन्होंने बिंदु को शहर में रख कर पढ़ायालिखाया था. यही वजह थी कि 17वें साल में कदम रख चुकी बिंदु 12वीं पास कर चुकी थी.

बिरजू के घर से गौने के लिए कई प्रस्ताव आए, लेकिन बिंदु के चाचा ने उन्हें साफ मना कर दिया था कि वे गौना उस के बालिग होने के बाद ही करेंगे.

उधर बिरजू भी जवान हो गया था. उस का गठीला बदन देख कर गांव की कई लड़कियां ठंडी आहें भरती थीं. पर  बिरजू उन्हें घास तक नहीं डालता था.

‘‘अरे, हम पर भले ही नजर न डाल, पर शहर जा कर अपनी जोरू को तो ले आ,’’ एक दिन चमेली ने बिरजू का रास्ता रोकते हुए कहा.

‘‘ले आऊंगा. तुझे क्या? चल, हट मेरे रास्ते से.’’

‘‘क्या तेरी औरत के संग रहने की इच्छा नहीं होती? कहीं वो तो नहीं है तू…?’’ चमेली ने एक आंख दबा कर कहा, तो उस की हमउम्र सहेलियां खिलखिला कर हंस पड़ीं.

‘‘चमेली, ज्यादा मत बन. मैं ने कह तो दिया, मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं हैं,’’ कहते हुए बिरजू ने आंखें तरेरीं, तो वे सब भाग गईं.

उधर बिंदु की गदराई जवानी व अदाएं देख कर स्कूल के लड़के उस के आसपास मंडराते रहते थे.

गोरा बदन, आंखें बड़ीबड़ी, उभरी हुई छाती… जब बिंदु अपने बालों को झटकती, तो कई मजनू आहें भरने लगते.

बिंदु को भी सजनासंवरना भाने लगा था. जब कोई लड़का उसे प्यासी नजरों से देखता, तो वह भी तिरछी नजरों से उसे निहार लेती.

बिंदु के रंगढंग और बिरजू के घर वालों के बढ़ते दबाव के चलते उस के चाचा ने गौने की तारीख तय कर दी और उसी दिन बिरजू आ कर अपनी दुलहन को ले गया.

शहर में पलबढ़ी बिंदु को गांव में आ कर थोड़ा अजीब तो लगा, पर बिरजू को पा कर वह सबकुछ भूल गई.

बिंदु को बहुत चाहने वाला पति मिला था. दिनभर खेत में जीतोड़ मेहनत कर के जब शाम को बिरजू घर आता, तो बिंदु उस का इंतजार करती मिलती.

रात होते ही मौका पाकर बिरजू बिंदु को अपनी मजबूत बांहों में कस कर अपने तपते होंठ उस के नरम गुलाबी होंठों पर रख देता था.

कब 2 साल बीत गए, पता ही नहीं चला. बिंदु और बिरजू अपनी हसीन दुनिया में खोए हुए थे कि एक दिन बिंदु की सास अपने पति से पोते की चाहत जताते हुए बोलीं, ‘‘बहू के पैर अभी तक भारी क्यों नहीं हुए?’’

सचाई तो यह थी कि यह बात घर में सभी को चुभ रही थी.

‘‘सुनो,’’ एक दिन बिरजू ने बिंदु के लंबे बालों को सहलाते हुए पूछा, ‘‘हमारा बच्चा कब आएगा?’’

‘‘मुझे क्या मालूम… यह तो तुम जानो,’’ कहते हुए बिंदु शरमा गई.

‘‘मां को पोते का मुंह देखने की बड़ी तमन्ना है.’’

‘‘और तुम्हारी?’’

‘‘वह तो है ही, मेरी जान,’’ बिरजू ने बिंदु को खुद से सटाते हुए कहा और बत्ती बुझा दी.

‘‘मुझे लगता है, बहू में कोई कमी है. 3 साल हो गए ब्याह हुए और अभी तक गोद सूनी है. जबकि अपने बिरजू के साथ ही गोपाल का गौना हुआ था, वह तो 2 बच्चों का बाप भी बन गया है,’’ एक दिन पड़ोस की काकी घर आईं और बोलीं.

बिंदु के कानों तक जब ऐसी बातें पहुंचतीं, तो वह दुखी हो जाती. वह भी यह सोचने पर मजबूर हो जाती कि आखिर हम पतिपत्नी तो कोई ‘बचाव’ भी नहीं करते, फिर क्या वजह है कि

3 साल होने पर भी मैं मां नहीं बन पाई?

इस बार जब वह अपने मायके गई, तो उस ने लेडी डाक्टर से अपनी जांच कराई. पता चला कि उस की बच्चेदानी की दोनों नलियां बंद हैं. इस वजह से बच्चा ठहर नहीं रहा है.

यह जान कर बिंदु घबरा गई.

‘‘क्या अब मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?’’ डाक्टर से पूछने पर बिंदु का गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया.

‘‘ऐसी बात नहीं है. आजकल विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है. तुम जैसी औरतें भी मां बन सकती हैं,’’ डाक्टर ने कहा, तो बिंदु को चेहरा खिल उठा.

गांव आ कर उस ने बिरजू को सारी बात बताई और कहा, ‘‘तुम्हें मेरे साथ कुछ दिनों के लिए शहर चलना होगा.’’

‘‘शहर तो हम लोग बाद में जाएंगे, पहले तुम आज शाम को बंगाली बाबा के आश्रम में जा कर चमत्कारी भभूत का प्रसाद ले आना. सुना है कि उस के प्रसाद से कई बांझ औरतों के बच्चे हो गए हैं,’’ बिरजू बोला.

‘‘यह तुम कैसी अनपढ़ों वाली बातें कर रहे हो? तुम्हें ऐसा करने को किस

ने कहा?’’

‘‘मां ने.’’

बिंदु ने कहा, ‘‘देखिए, मांजी तो पुराने जमाने की हैं, इसलिए वे इन बातों पर भरोसा कर सकती हैं, पर हम तो जानते हैं कि ये बाबा वगैरह एक नंबर के बदमाश होते हैं. भोलीभाली औरतों को चमत्कार के जाल में फंसा कर…

‘‘नहीं, मैं तो नहीं जाऊंगी किसी के पास,’’ बिंदु ने बहुत आनाकानी की, पर उस की एक न सुनी गई.

बिंदु समझ गई कि अगर उस ने सूझबूझ से काम नहीं लिया, तो उस का घरसंसार उजड़ जाएगा. उस ने मजबूती से हालात का सामना करने की ठान ली.

बाबा के आश्रम में पहुंच कर बिंदु ने 2-3 औरतों से बात की, तो उस का शक सचाई में बदल गया.

उन औरतों में से एक ने उसे बताया, ‘‘बाबा मुझे अपने आश्रम के अंदरूनी हिस्से में ले गया, जहां घना अंधेरा था.’’

‘‘फिर क्या हुआ तुम्हारे साथ?’’

‘‘पहले तो बाबा ने मुझे शरबत जैसा कुछ पीने को दिया. शरबत पी कर मैं बेहोश हो गई और जब मैं होश में आई, तो ऐसा लगा जैसे मैं ने बहुत मेहनत का काम किया हो.’’

‘‘और भभूत?’’

‘‘वह पुडि़या यह रही,’’ कहते हुए महिला ने हाथ आगे बढ़ा कर भभूत की पुडि़या दिखाई, तो बिंदु पहचान गई कि वह केवल राख ही है.

अगले दिन बिंदु फिर आश्रम में गई, तभी एक सास अपनी जवान बहू को ले कर वहां आई. उसे भी बच्चा नहीं ठहर रहा था.

बाबा ने उसे अंदर आने को कहा. उस के बाद बिंदु की बारी थी, पर जैसे ही वह औरत बाबा के साथ अंदर गई, बिंदु भी नजर बचा कर अंदर घुस गई.

बाबा ने उस औरत को कुछ पीने को दिया. जब वह बेहोश हो गई, तो बाबा ने उस के कपड़े हटा कर…

बिंदु यह सब देख कर हैरान रह गई. उस ने इरादे के मुताबिक अपने कपड़ों में छिपाया हुआ कैमरा निकाला और कई फोटो खींच लिए.

वह औरत तो बेहोश थी और बाबा वासना के खेल में मदहोश था. भला कैमरे की फ्लैश पर किस का ध्यान जाता.

कुछ दिनों बाद बिंदु ने भरी पंचायत में थानेदार के सामने वे फोटो दिखाए. इस से पंचायत में खलबली मच गई.

बाबा को उस के चेलों समेत हवालात में बंद कर दिया गया, पर तब तक अपने झूठे चमत्कार के बहाने वह न जाने कितनी ही औरतों की इज्जत लूट चुका था. खुद संरपच की बेटी विमला भी

उस पाखंडी के हाथों अपनी इज्जत लुटा चुकी थी.

पूरे गांव में बिंदु के हौसले और उस की सूझबूझ की चर्चा हो रही थी. जिस ने न केवल अपनी इज्जत बचा ली थी, बल्कि गांव की बाकी मासूम युवतियों की जिंदगी बरबाद होने से बचा ली थी.

शहर जा कर बिंदु ने डाक्टर से अपना इलाज कराया और महीनेभर बाद गांव लौटी.

तीसरे महीने जब वह उलटी करने के लिए गुसलखाने की तरफ दौड़ी, तो बिरजू की मां व पूरे घर वालों का चेहरा खुशी से खिल उठा. Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: बंद किताब – रत्ना के लिए क्या करना चाहता था अभिषेक

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‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

‘‘10 साल पहले किन हालात में तुम्हारी शादी हुई थी, वह भी मैं जानता हूं. उस समय तुम 20 साल की थीं और प्रोफैसर साहब 50 के थे. शादी से ले कर आज तक मैं ने तुम्हारी आंखों में खुशी नहीं देखी है. तुम्हारी हर मुसकराहट में मजबूरी होती है.’’

‘‘वह तो अपनाअपना नसीब है.’’

‘‘देखो, नसीब, किस्मत, भाग्य का कोई मतलब नहीं होता. 2 विश्व युद्ध हुए, जिन में करोड़ों आदमी मार दिए गए. इस देश ने 4 युद्ध झेले हैं. उन में भी लाखों लोग मारे गए. बंगलादेश की आजादी की लड़ाई में 20 लाख बेगुनाह लोगों की हत्याएं हुईं. क्या यह मान लिया जाए कि सब की किस्मत

खराब थी?

‘‘उन में से हजारों तो भगवान पर भरोसा करने वाले भी होंगे, लेकिन कोई भगवान या खुदा उन्हें बचाने नहीं आया. इसलिए इन बातों को भूल जाओ. ये बातें सिर्फ कहने और सुनने में अच्छी लगती हैं. मैं सिर्फ 25 हजार रुपए लूंगा और बड़ी सफाई से तुम्हारे बूढ़े पति को रास्ते से हटा दूंगा.’’

अभिषेक की बातें सुन कर रत्ना चीख पड़ी, ‘‘चले जाओ यहां से. दोबारा अपना मुंह मत दिखाना. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं इतनी नीचता पर उतर आऊंगी?’’

‘‘अभी जाता हूं, लेकिन 2 दिन के बाद फिर आऊंगा. शायद तब तक मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाए,’’ इतना कह कर अभिषेक लौट गया.

रत्ना अपने बैडरूम में जा कर फफकफफक कर रोने लगी. अभिषेक ने जोकुछ कहा था, वह बिलकुल सही था.

रत्ना को ताज्जुब हो रहा था कि वह उस के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानता था. हो सकता है कि उस का कोई दोस्त रत्ना के कालेज में पढ़ता रहा हो, क्योंकि वह तो रत्ना के साथ कालेज में था नहीं. वह उस की कालोनी में भी नहीं रहता था.

रत्ना के पति बीमारी के पहले रोज सुबह टहलने जाया करते थे. हो सकता है कि अभिषेक भी उन के साथ टहलने जाता रहा हो. वहीं उस का उस के पति से परिचय हुआ हो और उन्होंने ही ये सारी बातें उसे बता दी हों. उस के लिए अभिषेक इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाना चाहता है. आखिर यह तो एक तरह की हत्या ही हुई. बात खुल भी सकती है. कहीं अभिषेक का यह पेशा तो नहीं है? बेमेल शादी केवल उसी की तो नहीं हुई है. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं. अभिषेक के चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता कि वह अपराधी किस्म का आदमी है. कहीं उस के दिल में उस के लिए प्यार तो नहीं पैदा हो गया है.

रत्ना को किसी भी तरह के सुख की कमी नहीं थी. प्रोफैसर साहब अच्छीखासी तनख्वाह पाते थे. उस के लिए काफीकुछ कर रखा था. 5 कमरों का मकान, 3 लाख के जेवर, 5 लाख बैंक बैलेंस, सबकुछ उस के हाथ में था. 50 हजार रुपए सालाना तो प्रोफैसर साहब की किताबों की रौयल्टी आती थी. इन सब बातों के बावजूद रत्ना को जिस्मानी सुख कभी नहीं मिल सका. प्रोफैसर साहब की पहली बीवी बिना किसी बालबच्चे के मरी थी. रत्ना को भी कोई बच्चा नहीं था. कसबाई माहौल में पलीबढ़ी रत्ना पति को मारने का कलंक अपने सिर लेने की हिम्मत नहीं कर सकती थी.

रत्ना ने अभिषेक से चले जाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन बाद में उसे लगने लगा था कि उस की बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था. रत्ना अपनेआप को तोलने लगी थी कि 2 दिन के बाद अभिषेक आएगा, तो वह उस को क्या जवाब देगी. इस योजना में शामिल होने की उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

अभिषेक अपने वादे के मुताबिक 2 दिन बाद आया. इस बार रत्ना उसे चले जाने को नहीं कह सकी. उस की आवाज में पहले वाली कठोरता भी नहीं थी. रत्ना को देखते ही अभिषेक मुसकराया, ‘‘हां बताओ, तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘कहीं बात खुल गई तो…’’

‘‘वह सब मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं सारी बातें इतनी खूबसूरती के साथ करूंगा कि किसी को भी पता नहीं चलेगा. हां, इस काम के लिए 10 हजार रुपए बतौर पेशगी देनी होगी. यह मत समझो कि यह मेरा पेशा है. मैं यह सब तुम्हारे लिए करूंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों?’’

‘‘सही बात यह है कि मैं तुम्हें  पिछले 15 साल से जानता हूं. तुम्हारे पिता ने मुझे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. मैं जानता हूं कि किन मजबूरियों में गुरुजी ने तुम्हारी शादी इस बूढ़े प्रोफैसर से की थी.’’

‘‘मेरी इज्जत तो इन्हीं की वजह से है. इन के न रहने पर तो मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम अकेली हो गई रत्ना, और आज तक अकेली हो.’’

‘‘मुझे भीतर से बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अगर भेद खुल भी जाता है, तो मैं सबकुछ अपने ऊपर ले लूंगा, तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आने पाएगा. मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूं रत्ना. मेरा और कोई दूसरा मकसद नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, तुम्हें पेशगी के रुपए मिल जाएंगे,’’ कह कर रत्ना भीतर गई और 10 हजार रुपए की एक गड्डी ला कर अभिषेक के हाथों पर रख दी. रुपए ले कर अभिषेक वापस लौट गया.

तय समय पर रत्ना के पति को नर्सिंग होम में भरती करवा दिया गया. सभी तरह की जांच होने के बाद प्रोफैसर साहब का आपरेशन किया गया, जो पूरी तरह से कामयाब रहा. बाद में उन्हें खून चढ़ाया जाना था. अभिषेक सर्जन राजेश की पूरी मदद करता रहा. डाक्टर साहब आपरेशन के बाद अपने बंगले पर चले गए थे. खून चढ़ाने वगैरह की सारी जिम्मेदारी अभिषेक पर थी. सारा इंतजाम कर के अभिषेक अपनी जगह पर आ कर बैठ गया था. रत्ना भी पास ही कुरसी पर बैठी हुई थी. अभिषेक ने उसे आराम करने को कह दिया था.

रत्ना ने आंखें मूंद ली थीं, पर उस के भीतर उथलपुथल मची हुई थी. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था. दिमाग में अनेकअनेक तरह के विचार पैदा हो रहे थे. अभिषेक ड्रिप में बूंदबूंद गिर कर प्रोफैसर के शरीर में जाते हुए खून को देख रहा था. अचानक वह उठा. अब तक रात काफी गहरी हो गई थी. वह मरीज के पास आया और ड्रिप से शरीर में जाते हुए खून को तेज करना चाहा, ताकि प्रोफैसर का कमजोर दिल उसे बरदाश्त न कर सके. तभी अचानक रत्ना झटके से अपनी सीट से उठी और उस ने अभिषेक को वैसा करने से रोक दिया.

वह उसे ले कर एकांत में गई और फुसफुसा कर कहा, ‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, रुपए भले ही अपने पास रख लो. मैं अपने पति को मौत के पहले मरते नहीं देख सकती. जैसे इतने साल उन के साथ गुजारे हैं, बाकी समय भी गुजर जाएगा.’’ अभिषेक ने उस की आंखों में झांका. थोड़ी देर तक वह चुप रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बड़ी कमजोर हो रत्ना. तुम जैसी औरतों की यही कमजोरी है. जिंदगीभर घुटघुट कर मरती रहेंगी, पर उस से उबरने का कोई उपाय नहीं करेंगी. खैर, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ इतना कह कर अभिषेक ने पेशगी के रुपए उसे वापस कर दिए. इस के बाद वह आगे कहने लगा, ‘‘जिस बात को मैं ने इतने सालों से छिपा रखा था, आज उसे साफसाफ कहना पड़ रहा है.

‘‘रत्ना, जिस दिन मैं ने तुम्हें देखा था, उसी दिन से तुम्हें ले कर मेरे दिल में प्यार फूट पड़ा था, जो आज बढ़तेबढ़ते यहां तक पहुंच गया है. ‘‘इस बात को मैं कभी तुम से कह नहीं पाया. प्यार शादी में ही बदल जाए, ऐसा मैं ने कभी नहीं माना.

‘‘मैं उम्मीद में था कि तुम अपनी बेमेल शादी के खिलाफ एक न एक दिन बगावत करोगी. मेरी भावनाओं को खुदबखुद समझ जाओगी या मैं ही हिम्मत कर के तुम से अपनी बात कह दूंगा.

‘‘इसी जद्दोजेहद में मैं ने 15 साल गुजार दिए. आज तक मैं तुम्हारा ही इंतजार करता रहा. जब बरदाश्त की हद हो गई, तब मौका पा कर तुम्हारे पति को खत्म करने की योजना बना डाली. रुपए की बात मैं ने बीच में इसलिए रखी थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझ न सको.

‘‘तुम ने इस घिनौने काम में मेरी मदद न कर मुझे एक अपराध से बचा लिया. वैसे, मैं तुम्हारे लिए जेल भी जाने को तैयार था, फांसी का फंदा भी चूमने को तैयार था.

‘‘मैं तुम्हें तिलतिल मरते हुए नहीं देख सकता था रत्ना, इसलिए मैं ने इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया था.’’

अपनी बात कह कर अभिषेक ने चुप्पी साध ली. रत्ना उसे एकटक देखती रह गई. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: मजदूर की सच्ची मुहब्बत – डिग्गी का दर्द

Story In Hindi: सोन नदी पर पुल बन रहा था. सैकड़ों मजदूर और कई इंजीनियर लगे हुए थे. मजदूरों में मर्दऔरत दोनों थे. वे सब दूरदराज से आए थे, इसीलिए ठेकेदार ने उन के रहने के लिए साइट पर ही कच्चे मकान बनवा दिए थे.

मजदूरों में एक रोहित नाम का लड़का ठेकेदार का बहुत चहेता था. 6 फुट लंबा कद, गोराचिट्टा रंग, चौड़ा सीना, लंबे बालों वाले रोहित की पर्सनैलिटी गजब की थी. उस में कमी थी तो सिर्फ यही कि वह किसी की झूठी तारीफ नहीं कर पाता था, इसीलिए 25 साल की उम्र होने के बावजूद वह अकेला था.

एक दिन रोहित की नजर डिग्गी नाम की एक मजदूर लड़की पर पड़ी. डिग्गी का असली नाम क्या था, किसी को नहीं मालूम था, पर वहां ठेकेदार से ले कर इंजीनियर और मजदूर सभी उसे डिग्गी कह कर ही बुलाते थे.

20 साल की डिग्गी बहुत ही मेहनती लड़की थी. वह देखने में बहुत ही खूबसूरत थी, पर हालात की मारी वह बचपन में ही अनाथ हो गई थी और मजदूरी कर के अपना गुजारा करती थी.

डिग्गी चरित्र की बिलकुल साफ थी. बहुत से इंजीनियर और मजदूर उस की भरीपूरी देह देख कर उस पर फिदा हो गए थे. कुछ लोग तो पैसे का भी लालच देते थे, पर वह जिस्म का सौदा करने के बजाय मजदूरी करना ठीक समझी थी. उसे मालूम था कि जिस्म का सौदा कर के वह जवानी में तो ऐशोआराम की जिंदगी जी सकती है, पर उस सुख का अंत बहुत कष्टकारी होता है.

रोहित ने डिग्गी के बारे में सबकुछ पता लगा लिया था और उसे अच्छे से मालूम था कि डिग्गी को सिर्फ प्यार की ताकत से ही अपनाया जा सकता है.

रोहित ने अपने दिल की बात ठेकेदार को बता दी, जिस से ठेकेदार उसे उसी जगह रहने को बोलता जहां डिग्गी काम कर रही होती थी, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा समय उस के साथ बिता सके और एक दिन उस के दिल में अपनी जगह बना ले.

डिग्गी का शरीर बहुत आकर्षक और कामवासना से भरपूर था, पर दिनभर मेहनत करने के बाद वह रात को गहरी नींद में सो जाती थी. अकेले रहते हुए भी तनहाई उस से कोसों दूर थी.

इधर रोहित के सिर पर प्यार का भूत सवार था, इसलिए वह दिनभर काम करता, शरीर उस का भी थका रहता था, पर रात की तनहाई उसे काट खाने को दौड़ती थी, क्योंकि उस ने अपनी आंखों में डिग्गी को पाने का ख्वाब जो सजा रखा था.

एक दिन रोहित ने डिग्गी की तरफ देखा, पर जब डिग्गी उस की ओर देखने लगी तो उस ने नजरें घुमा लीं. पर धीरेधीरे डिग्गी समझ गई कि रोहित उस से प्यार करता है, क्योंकि यह लड़कियों का स्वभाव होता है कि वे मर्द की पहली नजर देख कर ही भांप लेती हैं कि सामने वाला उस से क्या चाहता है.

रोहित का जमीर इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि वह सामने से अपने दिल की बात डिग्गी से कह दे, पर एक शाम को ठेकेदार ने डिग्गी से बोल दिया, ‘‘डिग्गी, रोहित तुझे बहुत पसंद करता है, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता है. तुम दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी जमेगी. क्या खयाल है तुम्हारा रोहित के बारे में?’’

इतना सुन कर डिग्गी शरमाते हुए वहां से चली गई. ठेकेदार समझ गया कि डिग्गी के दिल में भी रोहित के प्रति प्रेम है, नहीं तो वह उस की बातों का बुरा मान गई होती.

अब डिग्गी रोहित के चालचलन पर ध्यान देने लगी. सीधासादा लड़का किसी और मजदूर औरत से किसी तरह का लगाव नहीं रखता था, इसलिए डिग्गी मन ही मन उस से प्यार करने लगी. वह रोजाना सुबह उठ कर नहा लेती और साफसुथरे कपड़े पहनती. जिस दिन रोहित को नहीं देखती तो बेचैन हो जाती.

रोहित को भी एहसास हो चुका था कि डिग्गी के दिल में उस की ऐंट्री हो चुकी है. अब रोहित हर उस इनसान से झगड़ जाता था, जो डिग्गी के बारे में गलत बोलता था.

जाति से रोहित दलित था. वह ठेकेदार का चहेता और विश्वासपात्र मजदूर था. ठेकेदार ने उस के नाम से भी ठेकेदारी का लाइसैंस बनवा दिया था, ताकि जो टैंडर अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व्ड होता था, वह उस के हाथ से न जाने पाए.

ठेकेदार उस टैंडर को रोहित के नाम से ले लेता था. रोहित के खाते में पैसा आता और वह ईमानदारी से ठेकेदार को दे देता था. काम ठेकेदार अपने हिसाब से करवाता था, इसीलिए इंजीनियर और बाकी के मजदूर रोहित का कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे.

एक दिन रोहित फावड़े से मिट्टी खोद रहा था कि अचानक फावड़ा उस के पैर में लग गया. चोट लगने से खून निकलने लगा. वहीं पर डिग्गी काम कर रही थी. वह तुरंत कपड़े से घाव को बांधने लगी और रोने लगी, ‘‘ध्यान कहां रहता है तुम्हारा, कितना खून निकल रहा है.’’

यह सुन कर बाकी मजदूर हैरान रह गए कि रोहित को चोट लगी है तो डिग्गी इतना परेशान क्यों हो गई? रोहित की आंखें भर आई थीं. वे दोनों सब के सामने एकदूसरे के गले लग गए.

रोहित से लिपट कर डिग्गी रोरो कर सुनाने लगी, ‘‘बरसों पहले मैं ने अपने मातापिता को खो दिया था, अब तुम मेरी जिंदगी में आए हो. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो फिर मेरा जीने का कोई मकसद ही नहीं रहेगा.’’

ठेकेदार ने उस शाम दोनों को अपने केबिन में बुलाया और बोला, ‘‘तुम दोनों की शादी मैं करा दूंगा, फिलहाल एकसाथ रहो.’’

डिग्गी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस रात रोहित हिम्मत कर के डिग्गी के कमरे पर गया. डिग्गी से जितना हो पाया था, वह उतना सजसंवर कर बैठी थी.

रोहित को अपने कमरे पर देख कर डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘रोटीसब्जी बनाई है, खा लो.’’

रोहित बोला, ‘‘मुझे तुम्हारे प्यार की भूख है. मैं तुम से प्यार करने आया हूं.’’

डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को अपना सबकुछ मानती हूं. मेरे जिस्म के एकएक हिस्से पर सिर्फ तुम्हारा ही हक है. आप मुझे कभी छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मै एक पल भी जिंदा नहीं रह पाऊंगी.’’

रोहित बोला, ‘‘हम दोनों को अब सिर्फ मौत ही जुदा कर सकती है.’’

इतना सुन कर डिग्गी रोहित से लिपट गई. दोनों ने एकदूसरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. नदी के किनारे बने उस छोटे से कमरे में डिग्गी की सिसकारियों के साथ दोनों की कामवासना शांत हो गई.

उस दिन से डिग्गी रोहित का भी खाना बनाती थी. काम खत्म होने के बाद रोहित मार्केट से सब्जीराशन जैसा घर का सामान खरीद लाता था.

धीरेधीरे समय बीतता गया. 8वीं तक पढ़ा रोहित ठेकेदारी के सारे दांवपेंच

जान चुका था. अब डिग्गी मजदूरी नहीं करती थी. वह रोहित के साथ साइट पर रहती और औरत मजदूरों की देखरेख करती थी.

एक बार सड़क पुल का टैंडर रोहित के नाम से लिया गया. काम शुरू हो गया था कि अचानक उस के मालिक की सड़क हादसे में मौत हो गई. रोहित को बहुत दुख हुआ. उस के ऊपर पुल बनवाने की सारी जिम्मेदारी आ गई.

इस के पहले भी कई टैंडर रोहित के नाम से कंप्लीट हो चुके थे, जिस से सारे अफसर और इंजीनियर रोहित को ही जानते थे. उस ने भी अपनी सूझबूझ का परिचय दिया और उस पुल को अपने हिसाब से कंप्लीट करवाया, जिस में बहुत सारा पैसा बचा लिया. इस के बाद उस ने अपने लिए एक फ्लैट खरीदा

और डिग्गी को साइट पर ले जाना बंद कर दिया.

रोहित दूसरे ठेकेदारों की तुलना में ज्यादा कमीशन देता था. सारे नेताओं और अफसरों से उस की पहचान हो चुकी थी, इसलिए उसे टैंडर मिलते गए और वह एक कुशल ठेकेदार बन गया. इधर डिग्गी भी अपने रोहित की तरक्की देख कर बहुत खुश थी.

एक बार साइट पर रोहित की मुलाकात नीलू नाम की एक इंजीनियर से हुई. नीलू रोहित की पर्सनैलिटी और पैसा देख कर आकर्षित हो गई और 8वीं जमात तक पढ़ा रोहित नीलू की खूबसूरती और इंगलिश बोलने की कला देख कर उस पर फिदा हो गया.

रोहित टैंडर की दुनिया में राज करना चाहता था, इसलिए सोचा कि अगर नीलू जैसी पढ़ीलिखी लड़की उस के साथ रहेगी तो उस का सपना पूरा हो जाएगा.

रोहित डिग्गी को भूल कर नीलू के प्रेमजाल में फंस गया. दोनों एकदूसरे को डेट करने लगे. 2-2 दिन तक रोहित घर नहीं जाता था. डिग्गी के फोन करने पर साइट पर होने का बहाना बनाता, लेकिन हकीकत में वह नीलू के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा होता था.

एक रात जब रोहित घर नहीं आया तो डिग्गी साइट पर गई. वहां मजदूरों से पता चला कि ठेकेदार साहब तो नीलू मैडम के साथ गाड़ी में बैठ कर शाम को ही चले गए थे.

डिग्गी को बहुत दुख हुआ. उस रात उसे नींद नहीं आई. सुबह होते ही वह साइट पर आई और रोहित से लिपट कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘रोहित, मेरे साथ ऐसा मत करो. तुम्हारे अलावा इस दुनिया में कोई नहीं है मेरा.’’

इस बात पर रोहित ने उसे कुछ पैसे दे कर बोला, ‘‘घर जाओ, आज शाम को आऊंगा. नीलू को ले कर ज्यादा चिंता मत करना. उस के आने से मुझे फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं.’’

डिग्गी बोली, ‘‘अगर आज शाम को नहीं आओगे, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, सोच लेना.’’

इधर नीलू को जब पता चला कि साइट पर डिग्गी आई थी, तो वह रोहित से नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘‘उसे इतना सिर पर मत चढ़ाओ और आज शाम को घर जाने के लिए क्यों बोले हो? आज शाम हम ने फिल्म देखने का प्लान बनाया है न…’’

रोहित नीलू को खोना नहीं चाहता था, इसलिए वह रात को घर नहीं गया और नीलू के साथ फिल्म देखने चला गया. इस बात को डिग्गी ने दिल पर ले लिया. अब वह समझ गई थी कि रोहित उस की जिंदगी में कभी वापस नहीं आएगा, इसलिए जिद में आ कर उस ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली.

सुबह रोहित जब घर गया, तो डिग्गी को पंखे से लटकता देख कर उस का सिर चकरा गया. वह तुरंत जमीन पर गिर गया और चिल्लाचिल्ला कर रोने लगा.

डिग्गी इतना बड़ा कदम उठा लेगी, रोहित ने शायद सपने में भी नहीं सोचा था. डिग्गी सही बोलती थी कि उस के बिना उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. सब से बड़ा दुख रोहित को तब हुआ, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह पता चला कि डिग्गी 3 महीने के पेट से थी.

डिग्गी और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत का जिम्मेदार रोहित था. झूठे प्यार के चक्कर में एक मजदूर से ठेकेदार बना रोहित अपना सच्चा प्यार और बसाबसाया घरपरिवार खो बैठा. Story In Hindi

Hindi Family Story: पाबंदी – एक जवान विधवा का दर्द

Hindi Family Story: मेरा नाम आरती है. मेरे औफिस में केशवजी की फेयरवैल पार्टी थी. सुबहसुबह ही सरलाजी का फोन आया था, जो मेरे औफिस में ही सीनियर स्टाफ थीं. वे कह रही थीं, ‘‘आज केशवजी की फेयरवैल पार्टी है, अच्छे से तैयार हो कर आना.’’

मैं इस बात के लिए मना कर रही थी, लेकिन सरलाजी की बात को टाल भी नहीं सकती थी, क्योंकि वे मु?ो अपनी बेटी की तरह प्यार देती थीं और मैं भी उन्हें मां जैसी इज्जत देती थी. एक वे ही थीं, जिन से मैं अपना हर सुखदुख साझ करती थी.

जब मैं पार्टी में पहुंची और अपनी नजर दौड़ा कर देखा, तो लगा कि शायद सरलाजी अभी तक आई नहीं थीं.

मैं एक तरफ सोफे पर जा कर बैठ गई, पर मुझे बड़ा अजीब लग रहा था कि पार्टी में आए कुछ लोगों की नजरें सिर्फ मुझे ही घूर रही थीं.

मैं अपनेआप को असहज महसूस कर रही थी और सोच रही थी कि इतनी जल्दी यहां नहीं आना चाहिए था.

तभी मेरे करीब विनोद आ कर बैठ गया, जो मेरा ही कलीग था. वह कहने लगा, ‘‘अरे वाह, आज तो आप गजब ढा रही हैं इस नीले रंग की साड़ी में. ऊपर से ये बिंदी, चूड़ी… पहना कीजिए, अच्छी लग रही हैं… अब यह सब कौन मानता है.’’

तभी उधर से माधवजी कहने लगे, जो औफिस के ही सीनियर स्टाफ थे, ‘‘सच में आप को देख कर कोई नहीं कह सकता कि अभी 2 साल पहले ही आप के पति का देहांत हो चुका है.’’

जब मैं ने अपनी कड़ी नजर उन पर डाली, तो वे हकलाते हुए कहने लगे, ‘‘म… मेरा मतलब है कि आप अच्छी लग रही हैं.’’

पार्टी में आए सब लोग मुझे ऐसे देखने लगे, जैसे मैं ने कितना बड़ा अपराध कर डाला हो. सब की खा जाने वाली नजरों और बातों को झेलना अब मेरे नए नामुमकिन हो गया था. फफक कर मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. मुझे लगा कि अब यहां रुकना सही नहीं है.

मैं पलट कर जाने लगी कि तभी पीछे से सरलाजी के स्पर्श ने मुझे चौंका दिया. शायद वे सब सुन चकी थीं.

‘‘अरे आंटी, आप आ गईं,’’ मुझे जैसे बल मिल गया.

सरलाजी बोलीं, ‘‘हां, मैं जाम में फंस गई थी. पर तुम कहां जा रही हो… घर?’’

मैं बोली, ‘‘जी आंटी, वे बच्चे घर पर अकेले हैं, तो…’’

‘‘पर बेटा, पार्टी तो अभी शुरू ही हुई है. एंजौय करो न, घर ही तो जाना है. कहीं तुम इन सब की बातों से डर कर तो घर नहीं जा रही हो? अगर ऐसी बात है तो जाओ, लेकिन एक बात सुनती जाओ. ऐसे टुच्चे और बेशर्म लोग तो तुम्हें हर जगह मिल जाएंगे, फिर कहांकहां और किसकिस से भागती फिरोगी. अरे, भागना तो इन्हें चाहिए यहां से, क्योंकि ये सब दिल और दिमाग दोनों से बीमार हैं…

‘‘शर्म नहीं आती आप लोगों को ऐसी बातें करते हुए. और विनोद आप, क्या मुझे पता नहीं कि आप की नजर कितनी गंदी है इस को ले कर. घर में बीवी होते हुए भी बाहर की औरतों को कैसी गंदी नजरों से देखते हैं आप, क्या यह मुझे बताना पड़ेगा.

‘‘और माधवजी आप, कम से कम अपनी उम्र का तो लिहाज कर लिया होता. अरे, यह तो आप की बेटी जैसी है. बड़े समाज के ठेकेदार बनते फिरते हैं आप, तो फिर वह औरत कौन है, जिसे को आप ने अपने घर में रखा हुआ है, क्योंकि जहां तक मुझे पता है, आप की पत्नी को तो मरे हुए सालों हो चुके हैं.

‘‘क्यों, मैं सच बोल रही हूं न? बोलती बंद हो गई आप की…. घटिया इनसान, खुद में हजारों छेद हैं और ?झांक रहे हैं दूसरे की जिंदगी में…’’

सरलाजी आगे कहने लगीं, ‘‘ऐसा क्या गुनाह कर दिया इस ने, जो सब मिल कर इस की खिल्ली उड़ा रहे हैं. कल तक तो आप सब को कोई एतराज नहीं था इस के पहननेओढ़ने से, तो फिर आज क्या हो गया? क्योंकि अब इस का पति नहीं रहा इसलिए? इसलिए अब यह अपने मन का पहनओढ़ नहीं सकती? हंसबोल नहीं सकती? अपनी पसंद का खा नहीं सकती?

‘‘क्या इस के पति के साथ इस के अरमान भी मर गए? और अब इसे वही सबकुछ करना चाहिए, जो आप सब को ठीक लगे?

‘‘कहने को तो यह हमारी दुनिया, हमारा समाज, हमारा परिवार है, पर जब एक पति न हो तो यही दुनिया, समाज और परिवार एक अकेली औरत के लिए पराया हो जाता है.

‘‘कल तक जो औरत अपने मनमुताबिक जीती रही, आज उसी औरत की खुशियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं, क्योंकि अब उस का पति नहीं रहा इसलिए. तो क्या इस की सजा उन मातापिता, भाईबहन और रिश्तेदारों को नहीं देनी चाहिए, जो उस के पति के रिश्ते में हैं? पत्नी को ही इस की सजा क्यों दी जाती है?’’यह सुन कर सभी लोगों के सिर शर्म से झक गए. Hindi Family Story

Hindi Family Story: मुझे यकीन है – शौहर को तरसती गुलशन

Hindi Family Story: पढ़ीलिखी गुलशन की शादी मसजिद के मुअज्जिन हबीब अली के बेटे परवेज अली से धूमधाम से हुई. लड़का कपड़े का कारोबार करता था. घर में जमीनजायदाद सबकुछ था.

गुलशन ब्याह कर आई तो पहली रात ही उसे अपने मर्द की असलियत का पता चल गया. बादल गरजे जरूर, पर ठीक से बरस नहीं पाए और जमीन पानी की बूंदों के लिए तरसती रह गई. वलीमा के बाद गुलशन ससुराल दिल में मायूसी का दर्द ले कर लौटी.

खानदानी घर की पढ़ीलिखी लड़की होने के बावजूद सीधीसादी गुलशन को एक ऐसे आदमी को सौंप दिया गया, जो सिर्फ चारापानी का इंतजाम तो करता, पर उस का इस्तेमाल नहीं कर पाता था.

गुलशन को एक हफ्ते बाद हबीब अली ससुराल ले कर आए. उस ने सोचा कि अब शायद जिंदगी में बहार आए, पर उस के अरमान अब भी अधूरे ही रहे.

मौका पा कर एक रात को गुलशन ने अपने शौहर परवेज को छेड़ा, ‘‘आप अपना इलाज किसी अच्छे डाक्टर से क्यों नहीं कराते?’’

‘‘तुम चुपचाप सो जाओ. बहस न करो. समझी?’’ परवेज ने कहा.

गुलशन चुपचाप दूसरी तरफ मुंह कर के अपने अरमानों को दबा कर सो गई. समय बीतता गया. ससुराल से मायके आनेजाने का काम चलता रहा. इस बात को दोनों समझ रहे थे, पर कहते किसी से कुछ नहीं थे. दोनों परिवार उन्हें देखदेख कर खुश होते कि उन के बीच आज तक तूतूमैंमैं नहीं हुई है.

इसी बीच एक ऐसी घटना घटी, जिस ने गुलशन की जिंदगी बदल दी. मसजिद में एक मौलाना आ कर रुके. उन की बातचीत से मुअज्जिन हबीब अली को ऐसा नशा छाया कि वे उन के मुरीद हो गए. झाड़फूंक व गंडेतावीज दे कर मौलाना ने तमाम लोगों का मन जीत लिया था. वे हबीब अली के घर के एक कमरे में रहने लगे.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी के  2 साल हो गए, पर मुझे दादा बनने का सुख नहीं मिला. कहो तो मौलाना से तावीज डलवा दूं, ताकि इस घर को एक औलाद मिल जाए?’’ हबीब अली ने अपनी बहू गुलशन से कहा.

गुलशन समझदार थी. वह ससुर से उन के बेटे की कमी बताने में हिचक रही थी. चूंकि घर में ससुर, बेटे, बहू के सिवा कोई नहीं रहता था, इसलिए वह बोली, ‘‘बाद में देखेंगे अब्बूजी, अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

हबीब अली ने कुछ नहीं कहा.

मुअज्जिन हबीब अली के घर में रहते मौलाना को 2 महीने बीत गए, पर उन्होंने गुलशन को देखा तक नहीं था. उन के लिए सुबहशाम का खाना खुद हबीब अली लाते थे.

दिनभर मौलाना मसजिद में इबादत करते. झाड़फूंक के लिए आने वालों को ले कर वे घर आते, जो मसजिद के करीब था. हबीब अली अपने बेटे परवेज के साथ दुकान में रहते थे. वे सिर्फ नमाज के वक्त घर या मसजिद आते थे.

मौलाना की कमाई खूब हो रही थी. इसी बहाने हबीब अली के कपड़ों की बिक्री भी बढ़ गई थी. वे जीजान से मौलाना को चाहते थे और उन की बात नहीं टालते थे.

एक दिन दोपहर के वक्त मौलाना घर आए और दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘जी, कौन है?’’ गुलशन ने अंदर से ही पूछा.

‘‘मैं मौलाना… पानी चाहिए.’’

‘‘जी, अभी लाई.’’

गुलशन पानी ले कर जैसे ही दरवाजा खोल कर बाहर निकली, गुलशन के जवां हुस्न को देख कर मौलाना के होश उड़ गए. लाजवाब हुस्न, हिरनी सी आंखें, सफेद संगमरमर सा जिस्म…

मौलाना गुलशन को एकटक देखते रहे. वे पानी लेना भूल गए.

‘‘जी पानी,’’ गुलशन ने कहा.

‘‘लाइए,’’ मौलाना ने मुसकराते हुए कहा.

पानी ले कर मौलाना अपने कमरे में लौट आए, पर दिल गुलशन के कदमों में दे कर. इधर गुलशन के दिल में पहली बार किसी पराए मर्द ने दस्तक दी थी. मौलाना अब कोई न कोई बहाना बना कर गुलशन को आवाज दे कर बुलाने लगे. इधर गुलशन भी राह ताकती कि कब मौलाना उसे आवाज दें.

एक दिन पानी देने के बहाने गुलशन का हाथ मौलाना के हाथ से टकरा गया, उस के बाद जिस्म में सनसनी सी फैल गई. मुहब्बत ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था.

ऊपरी मन से मौलाना ने कहा, ‘‘सुनो मियां हबीब, मैं कब तक तुम्हारा खाना मुफ्त में खाऊंगा. कल से मेरी जिम्मेदारी सब्जी लाने की. आखिर जैसा वह तुम्हारा बेटा, वैसा मेरा भी बेटा हुआ. उस की बहू मेरी बहू हुई. सोच कर कल तक बताओ, नहीं तो मैं दूसरी जगह जा कर रहूंगा.’’

मुअज्जिन हबीब अली ने सोचा कि अगर मौलाना चले गए, तो इस का असर उन की कमाई पर होगा. जो ग्राहक दुकान पर आ रहे हैं, वे नहीं आएंगे. उन को जो इज्जत मौलाना की वजह से मिल रही है, वह नहीं मिलेगी.

इस समय पूरा गांव मौलाना के अंधविश्वास की गिरफ्त में था और वे जबरदस्ती तावीज, गंडे, अंगरेजी दवाओं को पीस कर उस में राख मिला कर इलाज कर रहे थे. हड्डियों को चुपचाप हाथों में रख कर भूतप्रेत निकालने का काम कर रहे थे.

बापबेटे दोनों ने मौलाना से घर छोड़ कर न जाने की गुजारिश की. अब मौलाना दिखाऊ ‘बेटाबेटी’ कह कर मुअज्जिन हबीब अली का दिल जीतने की कोशिश करने लगे.

नमाज के बाद घर लौटते हुए हबीब अली ने मौलाना से कहा, ‘‘जनाब, आप इसे अपना ही घर समझिए. आप की जैसी मरजी हो वैसे रहें. आज से आप घर पर ही खाना खाएंगे, मुझे गैर न समझें.’’

मौलाना के दिल की मुराद पूरी हो गई. अब वे ज्यादा वक्त घर पर गुजारने लगे. बाहर के मरीजों को जल्दी से तावीज दे कर भेज देते. इस काम में अब गुलशन भी चुपकेचुपके हाथ बंटाने लगी थी. तकरीबन 6 महीने का समय बीत चुका था. गुलशन और मौलाना के बीच मुहब्बत ने जड़ें जमा ली थीं.

एक दिन मौलाना ने सोचा कि आज अच्छा मौका है, गुलशन की चाहत का इम्तिहान ले लिया जाए और वे बिस्तर पर पेट दर्द का बहाना बना कर लेट गए.

‘‘मेरा आज पेट दर्द कर रहा है. बहुत तकलीफ हो रही है. तुम जरा सा गरम पानी से सेंक दो,’’ गुलशन के सामने कराहते हुए मौलाना ने कहा.

‘‘जी,’’ कह कर वह पानी गरम करने चली गई. थोड़ी देर बाद वह नजदीक बैठ कर मौलाना का पेट सेंकने लगी. मौलाना कभीकभी उस का हाथ पकड़ कर अपने पेट पर घुमाने लगे.

थोड़ा सा झिझक कर गुलशन मौलाना के पेट पर हाथ फिराने लगी. तभी मौलाना ने जोश में गुलशन का चुंबन ले कर अपने पास लिटा लिया. मौलाना के हाथ अब उस के नाजुक जिस्म के उस हिस्से को सहला रहे थे, जहां पर इनसान अपना सबकुछ भूल जाता है.

आज बरसों बाद गुलशन को जवानी का वह मजा मिल रहा था, जिस के सपने उस ने संजो रखे थे. सांसों के तूफान से 2 जिस्म भड़की आग को शांत करने में लगे थे. जब तूफान शांत हुआ, तो गुलशन उठ कर अपने कमरे में पहुंच गई.

‘‘अब्बू, मुझे यकीन है कि मौलाना के तावीज से जरूर कामयाबी मिलेगी,’’ गुलशन ने अपने ससुर हबीब अली से कहा.

‘‘हां बेटी, मुझे भी यकीन है.’’

अब हबीब अली काफी मालदार हो गए थे. दिन काफी हंसीखुशी से गुजर रहे थे. तभी वक्त ने ऐसी करवट बदली कि मुअज्जिन हबीब अली की जिंदगी में अंधेरा छा गया.

एक दिन हबीब अली अचानक किसी जरूरी काम से घर आए. दरवाजे पर दस्तक देने के काफी देर बाद गुलशन ने आ कर दरवाजा खोला और पीछे हट गई. उस का चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. बदन में कंपकंपी आ गई थी.

हबीब अली ने अंदर जा कर देखा, तो गुलशन के बिस्तर पर मौलाना सोने का बहाना बना कर चुपचाप मुंह ढक कर लेटे थे.

यह देख कर हबीब अली के हाथपैर फूल गए, पर वे चुपचाप दुकान लौट आए.

‘‘अब क्या होगा? मुझे डर लग रहा है,’’ कहते हुए गुलशन मौलाना के सीने से लिपट गई.

‘‘कुछ नहीं होगा. हम आज ही रात में घर छोड़ कर नई दुनिया बसाने निकल जाएंगे. मैं शहर से गाड़ी का इंतजाम कर के आता हूं. तुम तैयार हो न?’’

‘‘मैं तैयार हूं. जैसा आप मुनासिब समझें.’’

मौलाना चुपचाप शहर चले गए. मौलाना को न पा कर हबीब अली ने समझा कि उन के डर की वजह से वह भाग गया है.

सुबह हबीब अली के बेटे परवेज ने बताया, ‘‘अब्बू, गुलशन भी घर पर नहीं है. मैं ने तमाम जगह खोज लिया, पर कहीं उस का पता नहीं है. वह बक्सा भी नहीं है, जिस में गहने रखे हैं.’’

हबीब अली घबरा कर अपनी जिंदगी की कमाई और बहू गुलशन को खोजने में लग गए. पर गुलशन उन की पहुंच से काफी दूर जा चुकी थी, मौलाना के साथ अपना नया घर बसाने. Hindi Family Story

Social Story In Hindi: काशी वाले पंडाजी – अंधविश्वास का कुचक्र

Social Story In Hindi: रबी की फसल तैयार होने के बाद काशी वाले पंडाजी का इलाके में आना हुआ. लेकिन इस बार पंडाजी के साथ एक पहलवान चेला भी था, जिस की उम्र तकरीबन 35 साल के आसपास थी. पर देखने में वह 21-22 साल का ही लगता था.

हाथ में कई अंगूठियां, छोटेछोटे काले बाल, प्रैस

की हुई खादी की धोती और पैर में कोल्हापुरी चप्पल उस पर खूब फबती थी.

पंडाजी बांस की बनी एक छोटी डोलची ले कर चलते थे. डोलची के हैंडिल के सहारे 2 छोटीछोटी गोल रंगीन शीशियां बंधी रहती थीं.

पंडाजी बड़ी सावधानी से शीशी खोलते और बहुत ही थोड़ा जल निकाल कर यजमान के बरतन में डालते. इस के बाद पहलवान चेला शुरू हो जाता, ‘‘यह प्रयाग का गंगाजल है. पंडाजी ने नवरात्र के समय मंदिर में इसे कठिन साधना के साथ मंत्रों से पढ़ा है.

‘‘इस गंगाजल में शुद्ध जल मिला कर घर के चारों तरफ छिड़क दें. इस के बाद सारा उपद्रव शांत हो जाएगा. बालबच्चे खुश रहेंगे और यजमान का कल्याण होगा.’’

उस पहलवान चेले की बात खत्म होते ही लाल और पीले धागे वाले

2 तावीज वह पंडाजी की ओर बढ़ा देता और कुछ क्षण बाद तावीजों को ले कर यजमान के हाथों में रखते हुए कहता, ‘‘पंडाजी बता रहे हैं कि लाल धागे वाला तावीज यजमान बाएं हाथ में मंगलवार को पहनें और पीले धागे वाला तावीज बुधवार को यजमान दाहिने हाथ में पहनें. इस के बाद सब तरह की बाधा दूर हो जाएगी और हर काम में तरक्की होगी.’’

यजमान दोनों हथेलियों पर 2 रंगों वाले तावीजों को इस तरह देखने लगता, मानो वह तावीज नहीं, कुबेर के खजाने की कुंजी और दवा हो.

चेला दक्षिणा उठा कर गिनता. अगर वह 51 रुपए होती, तो चुपचाप पंडाजी की दाहिनी जेब से पर्स निकाल कर उस में रख देता और अगर पैसा इस से कम होता, तो कहता, ‘‘यह तो नवरात्र का खर्च भी नहीं है. लौट कर भी तो अनुष्ठान करना होगा.’’

तब यजमान कुछ रुपए निकाल कर चेले को बढ़ा देता. चेला नोटों की गिनती किए बिना पर्स के हवाले कर देता.

पंडाजी यजमानों द्वारा दी गई दक्षिणा के हिसाब से ही अपना कीमती समय देते थे. पर वे माई के घर पर घंटों आसन जमाते. माई बहुत दिनों तक परदेश में रही थीं और उन की तीनों कुंआरी बेटियां भी देखने में खूबसूरत थीं.

पंडाजी के गांव में पधारते ही माई के दरवाजे पर उन के आसन का इंतजाम हो गया था. तीनों बेटियां भी अच्छी तरह सजसंवर कर तैयार हो चुकी थीं.

पंडाजी के पहुंचते ही माई ने उन की आवभगत की. पंडाजी आसन पर बैठने ही वाले थे कि एक लड़की ने आ कर उन के पैर छुए. उन्होंने पूछा, ‘‘हां, क्या नाम है?’’

‘‘जी… संजू.’’

‘‘कुंभ राशि. कन्या के लक्षण तो अति विलक्षण हैं. यह तो पिछले जन्म में राजकन्या थी. कुछ चूक हो जाने के चलते इसे इस कुल में आना पड़ा, तभी तो यह इतनी सुंदर और चंचला है.’’

सुंदर और चंचला शब्द सुनते ही संजू के गाल और भी लाल हो उठे और वह रोमांचित हो कर पंडाजी के और करीब होने लगी.

तभी दूसरी लड़की रंजू ने कहा, ‘‘पंडाजी, इस को घरवर कैसा मिलेगा? इस की शादी कब तक होगी? हम तो इसी चिंता में परेशान रहते हैं. इस साल ही इस के हाथ पीले होने का कोई जतन बताइए न.’’

रंजू की बातें सुन कर पंडाजी चेले की ओर देखने लगे. संजू के यौवन में भटकता चेला अचकचा कर पंडाजी की ओर देखता हुआ कुछ पल चुप रहने के बाद बोला, ‘‘बीते सावन में इस के हाथ से जो सांप मर गया, वह कुलदेवता था. कुलदेवता इस पर बहुत गुस्सा हैं. इस के लिए मंत्र और तंत्र दोनों की साधनाएं करनी होंगी.

‘‘अच्छा है कि आज मंगलवार है. आज रात यह अनुष्ठान हो जाए, तो सब बिगड़ा काम बन सकता है.’’

चेले का यह सु?ाव माई को डूबते को तिनके का सहारा जैसा लगा.

सभी समस्याओं का समाधान निकल आने से माई की जान में जान आई. ठीक 5 बजे अनुष्ठान शुरू करने की बात कह कर पंडाजी चेले के साथ कैथीटोला गांव की ओर चल पड़े.

रात 9 बजे से माई के आंगन में अनुष्ठान का काम पंडाजी और चेले ने शुरू किया. हर तरह से सजीसंवरी तीनों बहनें भी आ कर लाइन से बैठ गईं.

कुछ देर तक मंत्र पढ़ने के बाद आग जला कर उन्होंने माई के साथसाथ संजू, रंजू और मंजू को भभूत मिला प्रसाद खाने को दिया. इस के बाद चेले ने वहां मौजूद पासपड़ोस के लोगों को बाहर जाने का इशारा किया.

इशारा पाते ही सभी वहां से चले गए. फिर उस के बाद रात में क्या हुआ, गांव वालों को इस का क्या पता…

अगली सुबह माई के घर में हाहाकार मचा हुआ था. माई और उस की छोटी बेटी मंजू छाती पीटपीट कर चिल्ला रही थीं, ‘‘कोई हमारी संजू… रंजू को वापस ला दो. वह पंडा पुरोहित नहीं, ठग था.

‘‘हम दोनों को बेहोश कर के पंडा और चेला मेरी दोनों बेटियों को उठा

कर कहां ले गए… कुछ मालूम नहीं. हमारी बेटियों को वापस ला दो. उन्हें बचा लो.’’

गांव वालों को माजरा समझते देर नहीं लगी.

राजमणि काका ने तुरंत रेलवे स्टेशन और बसस्टैंड के लिए कुछ लोगों को भेजा, लेकिन वे सभी खाली हाथ निराश लौट आए. तब पुलिस में मामले को ले जाया गया. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

माई के पास कलेजे पर पत्थर रख कर संजू और रंजू को भूलने के अलावा कोई चारा नहीं था.

इधर उन दोनों बहनों ने समझदारी से काम लिया. पंडा और चेले की गलत मंसा भांपते हुए चालाकी से संजू ने पंडाजी से और रंजू ने चेले से ब्याह कर मौजमस्ती से जिंदगी बिताने का प्रस्ताव रखा.

पंडा और चेला इस प्रस्ताव को सुन कर बहुत खुश हुए. रंजू ने कहा, ‘‘लेकिन, इस के लिए जरूरी है कि हमारे घरपरिवार, गांव के लोग आगे आएं. कोई कानूनी दांवपेंच नहीं लगाएं और हमें पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना पड़े, सो हम लोग बिना समय गंवाए कोर्ट मैरिज कर लें.’’

संजू और रंजू के रूपजाल में फंसे पंडा और चेला कोर्ट मैरिज के कागजात के साथ अदालत में जज के सामने हाजिर हुए.

जब जज ने संजू और रंजू से उन की रजामंदी के बारे में पूछा, तो संजू कहने लगी, ‘‘जज साहब, ये दोनों हमारे गांव में पंडापुजारी बन कर आए थे. भोलेभाले गांव वालों के सामने तंत्रमंत्र का मायाजाल फैला कर इन ढोंगियों ने उन्हें खूब लूटा.

‘‘हम तीनों बहनों पर तो ये लट्टू बने थे. माई को घरपरिवार पर देवी का प्रकोप बता कर तांत्रिक अनुष्ठान कराने के लिए इन दोनों ने इसलिए मजबूर किया, ताकि उस की आड़ में हमें भोग सकें.

‘‘इन की खराब नीयत को भांप कर हम दोनों बहनों ने आपस में विचार किया और इन दोनों को कानून के हवाले करने के लिए यह नाटक खेला है, ताकि कानून इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे, ताकि फिर कभी इस तरह की घटना न होने पाए.’’

संजू और रंजू के बयान को दर्ज करते हुए अदालत ने पंडा और चेले को जेल भेजने का आदेश दिया.

संजू और रंजू ने जब गांव वालों को यह दास्तान सुनाई, तो सभी कहने लगे, ‘सचमुच, तुम्हारी दोनों बेटियां बड़ी बहादुर हैं माई. इन दोनों ने वह कर दिखाया है, जो बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. पूरे गांव को इन पर नाज है.’

माई की आंखों में भी खुशी और संतोष के आंसू छलछला रहे थे. Social Story In Hindi

Tanya Mittal पर लगे गंभीर आरोप, इस शख्स ने की एफआईआर की मांग

‘बिग बौस 19’ की कंटेस्टेंट Tanya Mittal इन दिनों फिर से चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल या शोहरत नहीं, बल्कि उनके खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप हैं. Tanya Mittal अक्सर अपनी रौयल जिंदगी और सफलता के किस्सों को लेकर चर्चा में रहती हैं, लेकिन अब वही बातें उनके लिए परेशानी का सबब बनती दिख रही हैं.

कभी शो में कोई स्टैंड-अप कौमेडियन उन्हें रोस्ट करता है, तो कभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर उनकी असलियत उजागर करने का दावा करते नजर आते हैं. हाल ही में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर फैजान अंसारी ने Tanya Mittal के खिलाफ ग्वालियर के एसएसपी औफिस में शिकायत दर्ज कराई है.

फैजान का आरोप है कि Tanya Mittal ने कई लोगों से पैसों की ठगी की है और यहां तक कि अपने ही बौयफ्रेंड को जेल भिजवाने की साजिश रची. उन्होंने कहा कि ‘बिग बौस 19’ में Tanya Mittal ने अपनी पर्सनल लाइफ और परिवार को लेकर कई झूठ बोले थे. फैजान ने Tanya Mittal के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की मांग भी की है.

फैजान के मुताबिक, बलराज सिंह नाम का एक व्यक्ति जिसे तान्या का बौयफ्रेंड बताया जा रहा है ने ही सबसे पहले सोशल मीडिया पर तान्या की पोल खोली थी. हालांकि, इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह फिलहाल कहना मुश्किल है, लेकिन इतना जरूर है कि तान्या इन दिनों एक बड़ी मुश्किल में घिरती नजर आ रही हैं.

Indian Constitution: सनातन के लिए संविधान पर चलाया जूता

Indian Constitution: भारत का सुप्रीम कोर्ट वह जगह है, जहां संविधान की आत्मा बसती है. जहां शब्द नहीं, व्यवस्था बोलती है. जहां न्याय की मर्यादा सब से ऊपर मानी जाती है. वहीं ऐसा सीन सामने आया, जिस ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया.

सुनवाई के दौरान, 71 साल के एक वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. यह न केवल एक अदालत की इज्जत को भंग करना था, बल्कि यह घोर पौराणिक और सनातन सोच का प्रदर्शन था, जो आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की कुरसी पर एक एससी बैठा है और दूसरे एससीएसटी, पढ़ेलिखे लोगों की तरह पुराणवादियों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं है.

चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस घटना को शांत भाव से लिया. उन्होंने कहा, ‘इस से मैं विचलित नहीं हुआ, कृपया कार्यवाही जारी रखिए.’

सामाजिक सोच

सवाल सीधा है कि अगर वही जूता किसी एससीएसटी ने ऊंची जाति के चीफ जस्टिस की ओर फेंका होता, तो क्या वही सहिष्णुता दिखाई जाती? क्या तब यह मामला भी माफ कर देने जितना हलका होता? वह वकील है, 71 साल का है और यह किसी किशोर का गुस्सा नहीं था. उस की हरकत में अनुभव, शिक्षा और विचार का मिश्रण था और यही उसे भयावह बनाता है.

किसी एससी चीफ जस्टिस पर इस तरह का हमला यह दिखाता है कि भारतीय समाज का एक हिस्सा अब भी उस ‘मनुस्मृति’ को भीतर दबाए बैठा है, जो कहती है कि शूद्र ज्ञान या न्याय पाने का अधिकारी नहीं है और उस से भी नीचे का अछूत एससी तो कतई नहीं, चाहे संविधान कुछ भी कहता रहे.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना उस व्यवस्था पर चोट है, जिस ने हमेशा सत्ता और न्याय को ऊंची जातियों के दायरे में सीमित रखा. एक एससीएसटी का सर्वोच्च न्यायासन पर बैठना उस सोच के लिए असहनीय है, जो अपने वर्चस्व को ईश्वरीय व्यवस्था मानती है. हां, ऐसा जना चुपचाप अगर ऊंची जातियों को माईबाप मानता रहे, तो ठीक है.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टें आईं. किसी ने लिखा, ‘गवई तो बैचलर हैं, मास्टर नहीं’. यह तंज नहीं, जातिगत ईष्या का प्रदर्शन था. असलियत यह है कि चीफ जस्टिस बीआर गवई मास्टर इन ला में गोल्ड मैडलिस्ट हैं. लेकिन फिर भी सवाल उठे. ‘वह कैसे मुख्य न्यायाधीश बन गया और वह सनातनी वकील वकील ही क्यों रह गया?’

यह सवाल पढ़ाईलिखाई या काबिलीयत का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच का है, जो यह नहीं स्वीकार कर पाती कि कभी ‘अछूत’ कहे जाने वाले लोग अब न्याय और सत्ता के केंद्र में पहुंच चुके हैं.

संविधान बनाम ‘मनुस्मृति’

भारत का संविधान कहता है कि सभी नागरिक समान हैं. किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, जबकि ‘मनुस्मृति’ का मानना है कि ब्राह्मण ही ईश्वर का मुख है, शूद्र उस के पैर हैं. ‘मनुस्मृति’ अछूतों की बात ही नहीं करती जो शूद्रों से भी नीचे हैं और जिन को कंट्रोल करने के लिए शूद्रों को डंडाभाला दिया गया है.

इन दोनों विचारों के बीच टकराव सिर्फ इतिहास का नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारत का सच है. चीफ जस्टिस बीआर गवई का वजूद ही इस टकराव की याद दिलाता है. वे संविधान के उस वादे के प्रतीक हैं, जिस में हर भारतीय को समान अवसर का अधिकार दिया गया है, पर यह समानता सिर्फ कागज पर नहीं टिक सकती, अगर समाज की मानसिकता बदलने को तैयार न हो.

जूता फेंकने वाला वकील संविधान से नहीं, उस के समानता के सिद्धांत से चिढ़ा हुआ था. वह यह नहीं सह सकता था कि एक दलित किसी ऊंची जाति की याचिका को नामंजूर कर दे. उस की मूर्ति को दोबारा स्थापित करने की मांग खारिज हुई, तो वह धर्म के नाम पर संविधान पर चोट करने निकल पड़ा.

कोर्ट में धर्म की दखलअंदाजी

यह पूरा मामला खजुराहो मंदिर परिसर से जुड़ा था. वकील ने एक याचिका दायर की थी कि वहां भगवान विष्णु की 7 फुट ऊंची मूर्ति को दोबारा स्थापित करने का आदेश दिया जाए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी पीठ से यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह धार्मिक मामला है, इसे अदालत नहीं, बल्कि भगवान पर छोड़ दीजिए.

यह संविधानिक नजरिए से सही टिप्पणी थी, क्योंकि कोर्ट धर्म का निर्णायक नहीं है. वह कानून का व्याख्याता है, लेकिन मनुवादियों के लिए यह बेइज्जती बन गया, क्योंकि उन का लक्ष्य भगवान नहीं, बल्कि अपने धार्मिक वर्चस्व का प्रदर्शन था. और इस बात को मनुवादी मानने के लिए तैयार नही थे. इसी का नतीजा यह हुआ कि जूता फेंकने की कोशिश की गई. यह जूता धर्म के नाम पर संविधान के चेहरे पर मारा गया.

भाजपा सरकार की चुप्पी

इस घटना के बाद जो सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही, वह थी भाजपा सरकार की चुप्पी. न प्रधानमंत्री ने प्रतिक्रिया दी, न गृह मंत्री ने और न ही कानून मंत्री ने.

सवाल यह है कि क्या यह चुप्पी सहमति की भाषा थी? जब किसी मंदिर पर पत्थर फेंका जाता है, तो पूरा राष्ट्रवादी तंत्र जाग उठता है. फिर जब न्याय के मंदिर पर हमला हुआ, तो वही लोग खामोश क्यों रहे?

सुप्रीम कोर्ट अकसर छोटीछोटी बातों पर खुद से संज्ञान लेता है, तो फिर संविधान के सम्मान पर हुए इस हमले पर चुप क्यों रहा? क्या यह इसलिए कि हमला करने वाला ‘हमारा’ था या इसलिए कि जिस पर हमला हुआ, वह ‘दलित’ था?

न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व की असमानता

भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकट नया नहीं है. देश की बड़ी अदालतों में बहाल जजों में 80 फीसदी से ज्यादा सवर्ण बैकग्राउंड के होते हैं. सुप्रीम कोर्ट में दलित, पिछड़े या आदिवासी वर्गों से आने वाले जजों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना इसलिए ऐतिहासिक था. वे यह प्रमाण हैं कि संविधान ने कम से कम एक शख्स को वह अवसर दिया जो ‘मनुस्मृति’ ने कभी नहीं दिया था. लेकिन इसी वजह से उन की उपस्थिति कई लोगों के लिए चुनौती बन गई, क्योंकि बीआर गवई का नाम यह साबित करता है कि भारत में न्याय केवल ब्राह्मण नहीं कर सकता, दलित भी कर सकता है.

सनातनी सोच की जड़ें बहुत गहरी

ब्राह्मणवाद कोई धर्म नहीं, एक विचार प्रणाली है जो श्रेष्ठता के भरम पर टिकी है. यह उस समय की देन है, जब समाज को जातियों में बांट कर सत्ता और ज्ञान कुछ हाथों में कैद कर दिया गया था. आज वही सोच नए रूपों में फिर से उभर रही है. कभी यह काबिलीयत के नाम पर कभी मैरिट के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर समानता का विरोध करती है. जूता फेंकने वाला शख्स उसी सोच का प्रतिनिधि था, जो यह मानती है कि दलितों को सम्मान देना सामाजिक व्यवस्था का अपमान है.

मीडिया की भूमिका और चुप्पी

सब से गलत पहलू यह रहा कि मुख्यधारा मीडिया ने इस घटना को ‘बड़ी खबर’ की तरह नहीं उठाया, जहां मनोरंजन की छोटी घटनाएं घंटों तक चलती हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट की इस शर्मनाक घटना पर कुछ सैकंड की खबर, कुछ कौलम की रिपोर्ट बस इतना ही.

मीडिया की यह चुप्पी सिर्फ पत्रकारिता की नाकामी नहीं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कमजोरी भी है, क्योंकि यह घटना केवल जूता फेंकने की नहीं थी, बल्कि यह संविधान की आत्मा पर पुराणवाद द्वारा किया गया प्रतीकात्मक प्रहार था.

संविधान की ताकत

जस्टिस बीआर गवई ने जो किया, वह न्याय का नहीं, संस्कार का उदाहरण था. उन्होंने कहा कि ‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता’. यह वाक्य साधारण नहीं है. यह उस शख्स का कहना है, जिस ने जाति के कांटों के बीच चल कर न्याय के मंदिर तक पहुंचने का सफर तय किया.

उन्होंने उसे माफ किया, लेकिन यह माफी उन की नहीं, संविधान की गरिमा की थी. वे जानते थे कि अगर वे प्रतिशोध लेंगे, तो लोग कहेंगे कि देखो, दलित जज भावनात्मक है, इसलिए उन्होंने माफी को हथियार बनाया.

पर इस माफी को समाज बुजदिली न सम झे, चेतावनी सम झे. यह पक्का है कि अगर उलटा होता तो जूता फेंकने वाले का पूरा परिवार और उस के दोस्त थानों में बैठे बयान दर्ज करा रहे होते.

आत्ममंथन की जरूरत

यह घटना न्यायपालिका के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है. क्या हमारी अदालतें वास्तव में हर नागरिक के लिए समान हैं? क्या न्याय की कुरसी पर बैठने वालों का चयन सिर्फ काबिलीयत से होता है या उस में सामाजिक ढांचे की झलक भी है?

समानता का मतलब केवल अवसर देना नहीं, सम्मान की रक्षा करना भी है. जब किसी चीफ जस्टिस पर इस तरह हमला होता है, तो यह केवल उस शख्स का नहीं, पूरे संस्थान का अपमान है.

सामाजिक न्याय का अधूरा सपना

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता बेकार है, अगर सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है. आज वही बात सही साबित होती है. हम ने संविधान बना लिया, आरक्षण दे दिया, कानून बना दिए लेकिन समाज का सोचने का ढंग अभी भी वही है. दलितों को न्याय, पिछड़ों को समान अवसर और स्त्रियों को सम्मान ये सब आज भी सिद्धांत हैं, असलियत नहीं.

ब्राह्मणवाद चाहे जितना भी सिर उठाए, संविधान का उजाला उस की छाया को मिटाने के लिए काफी है. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने माफ कर दिया, पर भारत को यह भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह माफी नहीं, एक संदेश है कि समानता की राह अभी लंबी है, पर जब तक संविधान है, आशा भी है. Indian Constitution

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