Hindi News Story: उपराष्ट्रपति के बहाने तीर तानों के चलाने

Hindi News Story: ‘‘यार, बहुत दिनों से मैं अपने पुराने दोस्तों से नहीं मिली हूं. सोच रही हूं कि कल उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना लूं,’’ अनामिका ने विजय से कहा.

‘‘बना लो, पर मैं नहीं चल पाऊंगा,’’ विजय बोला.

‘‘क्यों? तुम कहीं जा रहे हो क्या?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘नहीं, पर उन लोगों के साथ मैं बोरियत महसूस करता हूं. वे हर बात में राजनीति घुसेड़ देते हैं. कभी भी अपनी बातें नहीं करते हैं. और वह जो तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड है न जितेश, वह तो मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता है,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मेरे दोस्तों का नाम सुन कर इतना बिदक क्यों जाते हो? मैं इतने दिनों के बाद उन के साथ लंच का प्रोग्राम बना रही हूं और तुम मेरा मूड खराब कर रहे हो,’’ अनामिका थोड़ा नाराज हो कर बोली.

‘‘मैं कब मना कर रहा हूं. तुम जाओ अपने दोस्तों के पास और मजे करो,’’ विजय ने माहौल को थोड़ा हलका बनाते हुए कहा.

‘‘मैं तो जाऊंगी ही. जितेश से मेरी बात हुई थी. वह आज कन्फर्म कर देगा. फिर मैं, जितेश, राहुल, सुरजीत और सोनिया सब कल लंच पर मिलेंगे,’’ अनामिका ने अपना प्लान बता दिया.

इतने में जितेश का फोन आ गया, ‘‘हां जितेश, बोलो… कल हम सब मिल रहे हैं न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘हां, हम सब ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट पर मिलेंगे. तुम देर मत करना. कल बड़ा मजा आएगा,’ उधर से जितेश की आवाज आई.

‘‘ठीक है. मैं टाइम से पहुंच जाऊंगी,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

अगले दिन अनामिका ने अपना पसंदीदा सूटसलवार पहना और ठीक दोपहर 1 बजे अनुपम रैस्टोरैंट जा पहुंची. उस के सारे दोस्त पहले ही वहां आ गए थे.

‘‘विजय ने परमिशन दे दी यहां आने की?’’ जितेश ने चुटकी ली.

‘‘क्या मतलब?’’ अनामिका ने आंखें तरेरते हुए पूछा.

‘‘पहले अपनी रिजर्व्ड सीट पर बैठते हैं, लंच का और्डर करते हैं, फिर कुछ टांग खिंचाई करेंगे. क्यों, सही कहा न जितेश?’’ सोनिया ने एक आंख दबाते हुए कहा.

‘‘एकदम सही पकड़े हैं आप. आज हमारा टारगेट ही यह सूटसलवार वाली दबंग लड़की है, जो विजय के प्यार में ऐसी बावली हो गई है कि अपने दोस्तों को भी भूल गई है,’’ राहुल बोला.

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उसे भूख लगी थी. वह बोली, ‘‘विजय पुराण बाद में बांच लेना, पहले कुछ पेट पूजा कर लेते हैं.’’

‘‘जो हुक्म हमारी राजदुलारी,’’ जितेश ने रैस्टोरैंट का मेन दरवाजा खोलते हुए कहा.

दरअसल, जब से अनामिका की विजय से गहरी दोस्ती हुई थी, तब से वह अपने पुराने दोस्तों से बिलकुल कट गई थी. जब भी वे अनामिका को मिलने के लिए कहते, तब अनामिका विजय के साथ होने की मजबूरी जाहिर करती. फोन पर अपने दोस्तों को सिर्फ विजय की अच्छाइयां ही बताती थी. इस बात से अनामिका के सारे दोस्त उकता गए थे.

आज जब अनामिका लंच पर आई तो सब को मौका मिल गया उस की खिंचाई करने का. सब से पहले सुरजीत ने ताना कसा, ‘‘वैसे आज सूरज जरूर पश्चिम से निकला होगा, तभी तो अनामिका आज बिना विजय के हमारे साथ यहां बैठी है.’’

‘‘अबे यार, क्यों इसे तंग कर रहा है. अगर विजय को पता चल गया तो इसे अभी यहां से ले जाएगा,’’ सोनिया बोली.

‘‘मेरा विजय है ही ऐसा. मेरी एक आवाज पर कुछ भी कर सकता है. दुनिया में वही मेरी सब से ज्यादा केयर करता है,’’ अनामिका राहुल की प्लेट में मंचूरियन राइस सर्व करते हुए बोली.

‘‘हां, मैं ने भी देखा है विजय को अच्छी तरह, मेरे 1,000 रुपए तो आज तक वापस नहीं किए… पर तेरे लिए वह दुनिया हिला सकता है,’’ जितेश ने कहा.

‘‘यह ज्यादा हो रहा है. अगर विजय ने तुम्हारे 1,000 वापस नहीं किए, तो मैं कर देती हूं, पर उस पर इतना बड़ा इलजाम तो मत लगा,’’ अनामिका झल्ला कर बोली.

‘‘तू इलजाम की बात करती है. विजय की पैरवी करने में तू उपराष्ट्रपति रह चुके जगदीप धनखड़ से भी आगे निकल चुकी है, जिन्हें हाल ही में अपनी सेहत का हवाला दे कर पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

‘‘कभी राजग सरकार के चहेते उपराष्ट्रपति रहे जगदीप घनखड़ पर अचानक ऐसी कौन सी गाज गिरी कि वे एकदम से एकांतवास में चले गए?’’ जितेश ने कहा.

‘‘तुम्हारा मतलब क्या है? मेरे और विजय के रिश्ते के बीच ये जगदीप धनखड़ अचानक कहां से आ गए? उन का हम सब से क्या लेनादेना?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारा रवैया हमें जगदीप धनखड़ की याद दिलाता है, जिन्होंने हमेशा राजग की हां में हां मिलाई. तुम भी विजय के मामले में ऐसा ही बरताव करती हो. पर जो हाल अब जगदीप धनखड़ का हुआ है, वह किसी से छिपा नहीं है,’’ सोनिया बोली.

‘‘ऐसा क्या हुआ है जगदीप धनखड़ के साथ?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘जगदीप धनखड़ ने सत्ता पक्ष राजग का हमेशा साथ दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में ‘सैक्यूलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जैसे शब्दों को जोड़े जाने को ‘नासूर’ करार दिया था.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान साफ कहा था कि ‘संसद सब से ऊपर है’ और संविधान के मुताबिक कोई भी संस्था इस से ऊपर नहीं हो सकती है.

‘‘उन्होंने कहा था कि सब से ऊपर तो संसद ही है, उस से ऊपर कोई अथौरिटी नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि संसद में जो सांसद चुन कर आते हैं, वे आम जनता की नुमाइंदगी करते हैं. संसद ही सबकुछ होती है, इस से ऊपर कोई नहीं होता है.’’

‘‘तुम अनुच्छेद 142 वाली बात भी तो बताओ. चलो, रहने दो. मैं ही सुनाती हूं…’’ सोनिया ने कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि हम ऐसे हालात नहीं बना सकते, जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और वह भी किस आधार पर?

‘‘संविधान के तहत आप के पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है. इस के लिए 5 या उस से ज्यादा जस्टिसों की जरूरत होती है.

‘‘हाल ही में जजों ने उपराष्ट्रपति को तकरीबन आदेश दे दिया और उसे कानून की तरह माना गया, जबकि वे संविधान की ताकत को भूल गए. अनुच्छेद 142 अब लोकतांत्रिक ताकत के खिलाफ एक ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है, जो चौबीसों घंटे न्यायपालिका के पास उपलब्ध है.’’

‘‘जगदीप धनखड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान सुनियोजित धर्मांतरण का आरोप लगाया और कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. उन्होंने कहा कि सनातन कभी विष नहीं फैलाता, सनातन स्वशक्तियों का संचार करता है. एक और संकेत दिया गया है जो बहुत खतरनाक है और देश की राजनीति को भी बदलने वाला है. यह नीतिगत तरीके से हो रहा है, संस्थागत तरीके से हो रहा है, सुनियोजित साजिश के तरीके से हो रहा है और वह है धर्म परिवर्तन.

‘‘उन्होंने आगे कहा कि शुगर कोटेड फिलौसफी बेची जा रही है. वे समाज के कमजोर वर्गों को निशाना बनाते हैं. वे हमारे आदिवासी लोगों में ज्यादा घुसपैठ करते हैं. लालच देते हैं. हम एक नीति के रूप में संरचित तरीके से बहुत दर्दनाक धार्मिक रूपांतरण देख रहे हैं और यह हमारे मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है,’’ सुरजीत ने बताया.

अनामिका उन सब की बातें बड़ी ध्यान से सुन रही थी.

राहुल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जगदीप धनखड़ ने मार्च, 2023 में शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि कुछ यूनिवर्सिटी देश विरोधी विचारधारा का अड्डा बन चुकी हैं. उन के इस बयान को जेएनयू और कुछ दूसरी केंद्रीय यूनिवर्सिटियों की ओर इशारा समझ गया था.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में रुकावट से ले कर बिना चर्चा के विधेयक पास होने के आरोपों तक, कई मुद्दों पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया था. उन्होंने खासतौर पर उन बड़े वकीलों पर निशाना साधा था, जो विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस की नुमाइंदगी करने वाले राज्यसभा सदस्य भी हैं.

‘‘जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की थी, जिस में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की कौलेजियम सिस्टम को पलटने की कोशिश की गई थी.

‘‘इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की हाजिरी में दोनों सदनों द्वारा तकरीबन सर्वसम्मति से पास कानून को रद्द करने के लिए बड़ी अदालत पर सवाल उठाया था.

उन्होंने सांसदों की भी आलोचना करते हुए कहा था कि जब कानून को रद्द किया गया, तो सांसदों की तरफ से विरोध का एक स्वर तक नहीं उभरा,’’ सुरजीत ने जैसे जगदीप धनखड़ की एकतरफा राय की बखिया उधेड़ दी.

अनामिका थोड़ी देर तक चुप रही, फिर वह बोली, ‘‘ठीक है कि किसी उपराष्ट्रपति को अपने पद की गरिमा बना कर रखनी चाहिए. उन्हें सत्ता पक्ष का राग नहीं अलापना चाहिए. उन्हें विपक्ष की बातों का भी मान रखना चाहिए.

‘‘पर अब तो देश को नया उपराष्ट्रपति भी मिल गया है. राजग के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन देश के अगले उपराष्ट्रपति चुने गए हैं. मंगलवार, 9 सितंबर, 2025 को उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में उन के हक में कुल 452 वोट पड़े. कुल 767 सांसदों ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट दिया. इन में से 752 वैलिड थे और बाकी 15 अमान्य करार दिए गए.

‘‘सीपी राधाकृष्णन के सामने विपक्षी पार्टियों के साझा उम्मीदवार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रह चुके बी. सुदर्शन रेड्डी चुनौती पेश कर रहे थे. बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 फर्स्ट प्रैफरैंस वोट मिले और सीपी राधाकृष्णन को 452 वोट,’’ बताते हुए अनामिका ने अपना ज्ञान बघारा.

‘‘इस से ज्यादा बदलाव नहीं आएगा. ये भी जगदीप धनखड़ जैसे ही साबित होंगे. जब तक सरकार की राजी में राजी रखेंगे, तब तक इन्हें अच्छा ट्रीटमैंट मिलेगा, जब बागी सुर अपनाएंगे तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दिए जाएंगे,’’ जितेश बोला.

‘‘तुम भी विजय का ऐसे ही राग अलापती हो. किसी दिन उस की खामियों पर अपनी राय देना, तब सारी असलियत सामने आ जाएगी,’’ सोनिया बोली.

‘‘यार, इतना भी शर्मिंदा मत करो. ठीक है, विजय मेरी जिंदगी में बहुत खास है, पर मैं उस की अंधी पैरवी नहीं करती. लेकिन अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो आज के बाद मैं ध्यान रखूंगी और सही को सही और गलत को गलत कहूंगी, चाहे मेरी और विजय की अनबन ही क्यों न हो जाए,’’ अनामिका बोली.

‘‘यह हुई न बात. अब आई अनामिका अपने पुराने रंग में. इसी बात पर आज के लंच का बिल अनामिका देगी,’’ राहुल बोला.

यह सुनते ही सब ने ठहाका लगा दिया. अनामिका सब को टेढ़ी निगाहों से देख रही है. उस ने अपनी हंसी रोक रखी थी. Hindi News Story

Hindi Family Story: रंग लौट आए

Hindi Family Story: इस समय गोवा के खुशनुमा मौसम को चार चांद लग रहे थे. हवाओं में खूबसूरत नमी सिमट रही थी. मानसून की पहली बारिश ने कितनी ही मटमैली हो गई चीजों से कैसीकैसी धूल की परतें मिटा कर उन की चमक वापस लौटा दी थी.

मिसाल के तौर पर गुलमोहर का दरख्त कितना चटख हरा लगने लगा था. इतना ही नहीं, रिमझिम के मधुर संगीत के साथ धरती अपनी प्यास पूरी तरह बुझा लेने को उतावली थी, मगर अभी बस रिमझिम ही चल रही थी. तेज बौछारों का आना तो अभी बाकी था.

इस रिमझिम के सुर में डूबे हुए नारियल के पेड़ तो जैसे इतराए जा रहे थे. उन के पास बशर्ते मीठा जल था, लेकिन बादलों का यह उपहार उन को दीवाना कर देता था.

नारियल के पेड़ सड़क के किनारे इतने अनुशासित खड़े थे, जैसे किसी प्राइमरी पाठशाला की सभा में सीधे खड़े विद्यार्थी. हवा और रिमझिम की संगत में नारियल के पेड़ दीवाने बन कर संगीत के दीवानों की तरह झूम रहे थे.

गोवा की राजधानी पणजी से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर कैंडोलिम बीच पर एक नौजवान इस रिम?िम में सराबोर हो कर लहरों का आनाजाना देख रहा था.

इस नौजवान का नाम रोशन है. वह साफसाफ महसूस कर रहा है कि गोवा राज्य के उत्तरी भाग में बने इस छोटे से शहर कैंडोलिम में इस बार गिनेचुने सैलानी ही आए हैं, जबकि यह गोवा के सब से लंबे समुद्री बीच में से एक है.

रोशन को इस बार यहां लगातार हो रही बरसात की वजह से कम सैलानी होने का कोई दुख नहीं हो रहा था. इस की वजह यह थी कि उस की कुछ महीने की पक्की कमाई कुछ दिन पहले ही हो गई थी. अब वह एकदम निश्चिंत था.

अब वे जमाने गए कि जब रोशन घबराया सा रहता था. रोज रात को एक रजिस्टर में अपनी कमाई का हिसाबकिताब लिखा करता था. डरता रहता था कि कल को क्या होगा. अब उसे कोई फिक्र नहीं.

मीठी रिमझिम की तो लगातार झड़ी लगी हुई थी. इस समय सुबह के 10 बजे थे और रोशन का मन सूरज की तरह खिलाखिला था. इस तरह खिले रहने की आदत बनाने में उस की पुरानी प्रेमिका झलक का बड़ा ही योगदान रहा था. वह हमेशा खुश ही रहती थी.

रिमझिम की हर रिमझिम में कमाल और धमाल था. चाहे माहवारी की वजह से पूरे बदन में भयंकर दर्द हो रहा हो, पेट और कमर पर बल पड़े हों, मगर रिमझिम भी न जाने कौन सी मिट्टी की बनी थी कि वह अपनी एक सांस से दर्द को खींच लेती, फिर दूसरी सांस से मुसकराना, खिलखिलाना शुरू कर देती.

रोशन ने ‘आल इज वैल’ का यह सूत्र झलक से ही पाया था. वह उस शाम को आज तक न भूला है. हंस कर कैसे बोली थी झलक, ‘‘ऐ रोशन, इधर देख तो. नजर मिला न. कैसी उदासी और कैसा सुबकना?

‘‘देखो, कुछ भी हो, मगर तुम मुझे भूलना मत. बस इसी तरह हमारा प्यार अमर रहेगा. शादी की दावत खा कर जाना. भूलना मत,’’ ऐसी सीख दे गई वह. उस भावुक दिन, जब अपनी शादी का कार्ड देने बुलाया था.

इसी तरह की बातें हुआ करती थीं झलक की. वह तो अपनेआप में अनोखी थी. शादी के एक महीने बाद जब मायके आई तो वह सीधा रोशन को मिलने आ गई. घबराए से रोशन की सम?ा में नहीं आ रहा था कि झलक इतनी बेखौफ हो भी कैसे सकती है.

‘‘ओहो, इस में खौफ की कौन सी बात है रोशन?’’ रोशन के दिल की बात पढ़ कर बोली थी झलक, ‘‘सुन अब, गौर से सुन, तुझे एक बढि़या सलाह देने आई हूं,’’ वह किलक कर बोली थी.

‘‘झलक, तू मुझ को सलाह देगी… ठीक है, पर शादी करने की सलाह तो बिलकुल मत ही देना मुझे,’’ रोशन ने बिदक कर कह दिया था.

‘‘अरे पगले, कभी नहीं. शादी तो बरबादी है रे. अगर मेरे बाप पर इतना कर्ज न होता तो मै भी कौन सा शादी कर के ससुराल जाने वाली थी. कतई नहीं. बिलकुल नहीं,’’ झलक की यह सच्ची और खरी सी यह बात सुन कर रोशन ने भी बस गरदन हिला दी थी. इस सच से तो वह एकदम वाकिफ था, इसीलिए तो झलक से आज भी खफा न था. उस से नफरत नहीं करता था.

रोशन को सब मालूम था कि सट्टे और जुए का शौकीन झलक का बाप कितना गलीज है. झलक का बाप इतना गिरा हुआ था कि तब भी झलक ने अपनी सोच मैली न होने दी. ऐसे बाप की इतनी समझदार औलाद थी झलक. इतना नीच और नशेड़ी कि हर किसी से रुपए उधार मांगता फिरता था. शरमलाज तो जैसे सब बेच कर खाई थी उस जानवर ने. कितनी जगह से कर्ज ले रखा था. सब से ज्यादा तो लिया था उस डोलम होटल वाले से.

डोलम होटल वाले का एक भाई था. उस ने झलक से शादी की जिद कर ली थी. डोलम होटल वाला तो ?ालक को जैसे कोई चीज समझ कर डील कर रहा था.

गरीब की बेटी सारे गांव की दिलरुबा झलक ने यह कड़वी हकीकत बहुत पहले ही निगल कर पचा ली थी, इसलिए उस को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता था. उस ने वैसे भी अपनी मनमरजी की छोटी सी जिंदगी 14 साल की उम्र से 19 साल की उम्र तक तबीयत से जी ली थी. अब 20 की उम्र में बाप के कर्ज के बदले बेटी बलिदान कर दी गई थी.

डोलम होटल वाले को लगता था कि मासूम और कोमल झलक उस के भाई की पत्नी बनने जा रही है, पर यह उस की नादानी ही थी.

दरअसल, रोशन और झलक पिछले कई महीने से एकदूजे के हो गए थे. एकदूसरे की बांहों में दोनों को सांस आती और फिर हर तरह के प्यार की प्यासी झलक तो रोशन को ही अपना सबकुछ मानती थी.

रोशन ही तो उस का मातापिता, सगा, बंधु, परिचित, रिश्तेदार था. पिछले साढ़े 5 साल से हर साल उस के साथ शादी की सालगिरह मनाती थी.

वे दोनों दुनिया के लिए भले ही कुंआरे थे, मगर उन दोनों को ही पता था कि वे एकदूजे के लिए पतिपत्नी थे. दोनों देर तक गोमती पुल के नीचे एक कोने में समोसा और जलेबी खाते हुए अपने होने वाले बेटाबेटी के नाम तय करते थे. नाटकनाटक में झगड़ा भी किया करते थे, ताकि पतिपत्नी जैसा अहसास कर सकें.

और आज वही झलक गोवा में किसी और के संग हनीमून मना कर मायके लौटी थी.

यह झलक भी गजब थी कि ‘रोशनरोशन’ करती हुई सीधा उसी से मिलने आ गई थी.

‘‘गोवा में तेरा यह सब सामान खूब बिकेगा. मैं ने देखा है वहां मछलीचावल खाते हुए. एक से बढ़ कर एक चीनी मिट्टी की प्लेट. तू तो लखनऊ से मुंबई जा और वहां से बस का किराया 520 रुपए. सीधा पणजी चला जा,’’ यही राय देने आई थी झलक.

रोशन का घर लखनऊ में था. उस के पिता चीनी मिट्टी के बरतन बनाते और बेचा करते थे. रोशन को भी इस काम में बहुत ही चाव था. वह महज 9 बरस की कच्ची उम्र में सब सीख गया था. चिकनी मिट्टी को गीला कर के कितना सुखाना है, उसे आकार देते समय कितना धीरज रखना है, कैसे पकाना है वगैरहवगैरह.

रोशन ने आगे पढ़ाई भी नहीं की. किसी तरह 10वीं कर पाया था. सबक याद ही नहीं होता था उस को.
‘‘जितनी देर में यह सबक याद होता है उतनी देर में तो मैं कितने बरतन बना लेता,’’ एक दिन रोशन ने अपने लंगोटिया यार पामू से कहा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कभी भी जल्दी नहीं. इस मिट्टी में कोई राज होता है. इसे हौलेहौले सामने आने दिया करो,’’ पामू उसे प्यार से समझाया करता.

पामू का परिवार भी चीनी मिट्टी के बरतन बनाया करता था. पामू भी तो इस काम को कुछ अलग ही ढंग से सीखने की कोशिश करता था, मगर कभी कुछ का कुछ बना देता, फिर कहता कि यह कलाकृति है. इस के पीछे एक सोच है.

मगर पामू के मातापिता को वह कलाकृति किधर से भी समझ नहीं आती थी. उसे वह एक तरफ रख कर अपने और्डर को पूरा करने लगते. उन को कप और प्लेट के बहुतायत में और्डर मिला करते थे.

पामू को कप और प्लेट के सिवा सबकुछ बनाने का मन करता. कभी मीनार, कभी टोपी, कभी गुटका तो कभी मुड़ा हुआ सांप. उस का दिमाग कुछ और ही किया करता था. खैर, वे तो पुराने दिन हो गए थे.

अब झलक की उस हौसलाअफजाई के बाद रोशन की आज की तसवीर एकदम अलहदा है.

28 साल के रोशन को अब इस जगह का सबकुछ मालूम था. वह सब जानतासमझता था. जिस गैस्ट हाउस में वह रहता था, उधर भी सब से जानपहचान हो गई थी.

गैस्ट हाउस में उस को ‘रोशन दादा’ कहने वाले कितने ही नौजवान थे. ज्यादातर तो हिमाचल प्रदेश के थे. सीधेसरल पहाड़ी नौजवान. मेहनती और सच्चे. इन के भरोसे ही यहां के ज्यादातर होटल चल पा रहे थे.

अब रोशन एक अलग ही उमंग में भरा हुआ है. वह 2 दिन बाद कार्निवाल के लिए जाने वाला है. कार्निवाल
की तैयारी का आलम इधर गजब ही रहता है. कितने तरह के तो बैंड आते हैं. देशीविदेशी पर्यटक बैंड की धुन पर खूब झूमते और नाचते हैं.

रोशन को तो कितनी बार यह भी लगता है कि कार्निवाल के चलते ही यहां की रंगत है. मगर फिर कितनी बार उस को लगता है कि इस के इतने सारे रंगबिंरगे तट हैं. इस वजह से गोवा एकदम खास है और अलग है.

रोशन के सोचने या न सोचने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था, मगर कैंडोलिम बीच पर कार्निवाल की धूम ने कुछेक सैलानियों को मस्ती के सागर में तैरा दिया था.

‘अरे… अरे…’ खुशी के मारे एकाएक रोशन की आंखें चौड़ी हो गईं. कार्निवाल में रोशन ने अचानक ही पामू को देखा.

‘‘पामू… पामू… ओ पामू… पहचाना?’’ रोशन चीख कर बोला.

‘‘ओह रोशन, मैं ने एक ही बार में पहचान लिया,’’ कह कर पामू बच्चों के जैसे खिलखिला उठा.

पामू इधर कुछ नया करने का सोच कर आया था, पर इतना भी नया कर न सका. रोशन जानता था कि उस का लंगोटिया यार पामू एक सच्चा कलाकार है. उस की मदद करनी चाहिए.

रोशन ने एक उपाय सोचा. उस की जेब में 10,000 रुपए थे. इस समय उसे बारबार झलक याद आ रही थी.

‘‘पामू, इस बार इधर कम सैलानी हैं. लेकिन फिक्र मत कर, तेरी कलाकृतियां यहां बिक जाएंगी. दिखाना तो कैसा सामान लाया है?’’ रोशन उत्सुक हो कर पूछने लगा.

पामू ने अपना बक्सा खोल कर दिखाया. रोशन ने गौर से देखा. कुछ काम तो कमाल का कर रखा था पामू ने. उस ने छोटेछोटे प्रतीक बना रखे थे.

‘‘ये किस सांचे में ढाल कर बनाए?’’ रोशन कुछ पेपरवेट देखने लगा.

‘‘नहींनहीं रोशन, कोई भी सांचा नहीं है. अपनी कल्पना से ढाला है इन को. मगर यह तो सब को समझ नहीं आता है न,’’ कह कर पामू किसी गहरी सोच में डूब गया था.

‘‘पामू, तू इतने दिन इधर कैसे रहा? जब कमाई नहीं तो फिर रोटीपानी कैसे किया सब?’’

‘‘वह सब हो गया था.’’

‘‘कैसे मगर?’’ रोशन ने पूछा.

‘‘वह बस्तरिया बाजार है न, उधर गिटार बजाते हैं लड़के. उन के लिए नाचता था मैं, तो रोज का 200 रुपए हो जाता था. खाना वे ही देते थे, बस सोने का किसी न किसी जगह इंतजाम हो जाता था,’’ पामू ने हंस कर कहा.

वह आगे बोला, ‘‘2 दिन पहले ही इधर आया हूं. इधर होटल में किराया कम है न,’’ मगर ऐसा उस ने अपनी मजबूरी और परेशानी छिपाने के लिए कहा था. उस का यह अंदाज पुराना था और यह तो रोशन ने खूब भांप ही लिया था.

‘‘पामू, अभी तो शुरुआत है. मगर यहां कभीकभार ऐसे टूरिस्ट मिल जाते हैं, जो कलाकार को मुंहमांगी रकम देते हैं,’’ रोशन बोला.

‘‘हांहां, ऐसा हुआ है न मेरे साथ. 2 बार हुआ है. मुझे रुपया भी दिया और सैंडविच भी खिलाया, इसलिए तो मुझे भरोसा है,’’ पामू अब भी उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं चाहता था.

‘‘कल मिलते हैं,’’ कह कर रोशन ने पामू से विदा ली.

रोशन झलक से फोन पर बात करता हुआ चला जा रहा था. ?ालक के ब्याह को अब 4 साल से भी ऊपर हो चले थे, इसलिए झलक अब एकदम बिंदास रहती थी. बच्चे उस ने पैदा किए नहीं. अपने तरीके से दिल से जिंदगी जीने लगी थी झलक.

रोशन ने बातों ही बातों में झलक को पामू की दशा का भी सच्चा हाल बयान कर दिया था. झलक ने इस बात को काफी गंभीरता से सुना.

झलक के साथ एक कमाल की बात हो गई थी. वह अब अपनी जिंदगी को खेल सम?ाने लगी थी. इसी खेलखेल में एक दिन झलक लौटरी के 50 टिकट खरीद कर ले आई. हर टिकट 500 रुपए का था. मगर कमाल की बात यह हुई कि 5 लाख का नकद इनाम झलक के नाम खुल गया. झलक की महिमा ही बढ़ गई.

मगर झलक भी ऐसी मजेदार कि उस ने एक रुपया तक न रखा. तथाकथित पति को ही सारे नोट थमा दिए. बस, उस घटना के बाद तो जैसे जादू ही हो गया था. अब ससुराल में झलक को कोई न रोकता था, न टोकता था.

झलक भी कोई बावली न थी कि पागलपंथी ही करने लगे. आचरण तो उस का संतुलित ही था, मगर अब वह अपने तरीके से बड़े फैसले लेने लग गई थी.

मिसाल के तौर पर झलक का देवर अपनी गर्लफ्रैंड को काठमांडू घुमाने ले जाना चाहता था. झलक ने उस की इस इच्छा का मान रखा. उस के पास पूरे 20 रुपए न थे, तो झलक ने उसे 20,000 रुपए दिए.

देवर झलक का मुरीद बन गया था. बात बाद में खुल गई थी. सारे परिवार को भी पता चल गया, मगर झलक पर किसी ने उंगली तक न उठाई. उस की पहली वजह यह कि झलक ने जो किया अपने परिवार के लिए किया. दूसरी और जोरदार वजह यह कि उसी गर्लफ्रैंड से देवर की सगाई और शादी भी हो गई थी.

अब देवरदेवरानी झलक की मुट्ठी में बंद थे, मगर झलक ने अपनी मुट्ठी कभी कस कर रखी ही नहीं.

इस बार रोशन की बात का मतलब महसूस कर झलक ने अपने तेज और बल का इस्तेमाल कर लिया. एक ही घंटे की चर्चा में देवरदेवरानी ने हां भर दी. गोवा जा कर और वहां का मुआयना कर के एक छोटा होटल खोलने की इच्छा बन गई उन की.

उसी रात को तीनों रवाना हो गए. झलक और देवरानी पीछे बैठे. आगे की सीट पर कार ड्राइवर और देवर. कार ड्राइवर भी इतना होशियार था कि उस ने तय समय से 4 घंटे पहले गोवा पहुंचा दिया.

कार्निवाल की धूम से सारा गोवा जवांजवां था. झलक अपने हनीमून के बाद अब आई थी, मगर कैंडोलिम
तो उस ने आज ही देखा था. रोशन से मुलाकात हो गई. खूब गपशप हुई.

इस दफा रोशन को यह वाली झलक कुछ अलगअलग सी लगी. मगर रोशन कुछ ही देर में सामान्य भी हो गया था, क्योंकि अब वह खुद भी पहले वाला रोशन तो था नहीं.

24 घंटे बाद देवरदेवरानी ने रोशन की मदद से कुछेक जगह बातचीत कर ली थी. एक बनाबनाया होटल मिल रहा था. थोड़ी मरम्मत की दर कार थी. उस की जिम्मेदारी रोशन ने उठा ली थी.

धीरेधीरे होटल की सजावट के लिए पामू को और्डर मिल गया था. पामू को तो जैसे मनचाही मुराद मिली, बिन मांगे मोती मिले.

रोशन ने पामू को ठीक से समझा दिया था. उस के लिए रहने और खाने का मुफ्त इंतजाम हो गया था. इस के अलावा टीम लगा कर कलाकृति बनाने का अलग से एडवांस मिल रहा था. इस तरह अब एक साल तक पामू को इधर ही काम करना था.

झलक ने पामू की जीवन नैया भी डगमग होने से बचा ली थी. इस डील को पक्का कर के यह तीनों अब लौट रहे थे. रोशन ने हाथ हिला कर वापस जाती झलक के चेहरे को गौर से देखा था.

रोशन को लगा जैसे उस की जन्मजन्मांतर की पत्नी झलक उस से कह रही है, ‘रोशन, तुम मुझे भी लौटा कर ले चलो. चलो, हम गोमती के पुल के नीचे बैठ कर समोसाजलेबी खाएं. अपनी वहीं बातें करें.’

रोशन का हिलता हुआ हाथ एकाएक रुक गया. उस के कान में झनझनाहट सी हुई. लगा, जैसे उस से कोई फुसफुसा कर कह रहा था. इस झलक ने रोशन की जिंदगी संवारने और अपनी बरबाद करने के लिए यह जन्म लिया है. Hindi Family Story

Hindi Funny Story: हनीमून की सनक

Hindi Funny Story: पिछले हफ्ते सब से छोटे बेटे की शादी ईएमआई पर निबटाते ही इधर मेरे मन में गंगा स्नान की भावना कुलांचें मारने लगी, तो उधर मेरी बीवी के मन में हनीमून पर जाने की.

सब से छोटे बेटे की शादी कर के लगा ज्यों गंगू तेली ने गृहस्थी का रण नहीं, बल्कि महारण जीत लिया हो. मैं अपने को सिकंदर से महान फील कर रहा था. हर शादीशुदा अपने घर में बच्चा पैदा होने पर उतना खुश नहीं होता जितना खुश वह उस का ब्याह हो जाने पर होता है.

बच्चों की शादियों से निबटीं तो एक दोपहर अचानक बीवी ने मेरे दिमाग पर भिनभिनाते हुए कहा, ‘‘सुनो जी…’’

‘‘अब क्या है?’’ मैं ने मिमियाते हुए पूछा तो वे बोलीं, ‘‘हे पतित देव, इस गृहस्थी में कदमकदम पर हम जहन्नुम तक गए, पर आज तक हनीमून पर नहीं गए. हनीमून में हुए बलिदानी कहते हैं कि शादी के बाद हनीमून पर गए बिना स्वर्ग नहीं जाया जाता.

‘‘बीतिकाल के कवि बीमारी लाल भी कह गए हैं कि हनीमून स्वर्ग का मारग है, जहां सयानप चालाकी सब सही. तहां झूठे चलै संग एक्स फ्रैंड के, जग जो कहै अब सो कही.’’

‘‘मतलब?’’ मैं दोबारा मिमियाया.

‘‘मतलब यह कि स्वर्ग का रास्ता हनीमून से हो कर जाता है. गृहस्थी में रहते बहुत नरक भोग लिया, अब…’’

अपनी पीठ पर पत्नी का सिर ढोते उस के मुख से ज्यों ही जहर से भी जहर वचन सुने तो मैं तो मैं, मेरी रूह तक कांप उठी. लगा, ज्यों उस में उस समय सोनम की आत्मा प्रवेश कर गई हो.

पर मैं राजा नहीं हूं भाई साहब… माना, मैं ने कदमकदम पर उस की हर इच्छा का खून किया है, ऐसे में अब कहीं इस ने किसी को मेरे नाम की सुपारी दे कर मेरा फाइनल खून कराने की तो नहीं सोची होगी? पर फिर सोचा कि अपनी मैरिज लव मैरिज तो है नहीं.

वैसे अंदर की बात कहूं सज्जनो, आजकल भाई लोगों से उतना डर नहीं लगता जितना डर नएनए तो छोडि़ए, 50 साल पुराने मुझ जैसे पतिपत्नियों को भी एकदूसरे से लग रहा है.

आह, क्या हनीमून जमाना आ गया भाई साहब. नहीं कहीं हनी, न कहीं मून. बस जिधर देखो, उधर खून ही खून.

मतलब, मेरा इधर का काम खत्म तो अब उधर का काम भी खत्म? आह रे गृहस्थी, तेरी यही कहानी. जिम्मेदारियां खत्म तो आत्मा हनीमूनयानी. लगता है, गृहस्थी की चक्की में पिसते मर्द की जरूरत परिवार को तभी तक रहती है जब तक उस के कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है. जैसे ही जिम्मेदारियां खत्म, वह काम का न काज का दुश्मन अनाज का.

आखिर मैं ने अपने को गुप्त हौसला देते हुए उसे समझा कर कहा, ‘‘देखो बेगम, जो अरेंज्ड मैरिज करते हैं, वे हनीमून पर नहीं जाया करते. वे हर शाम अपने से भी अपना मुंह छिपाते गलीसड़ी सब्जियां लाने सब्जी मंडी जाया करते हैं.

‘‘हनीमून जाने की तो छोड़ो, हम तो अब श्मशान घाट जाने लायक भी नहीं. अरेंज्ड मैरिज वालों के लिए हनीमून पर जाना पाप नहीं, महापाप होता है.

‘‘अरेंज्ड मैरिज वाले जो हनीमून पर जाते हैं तो वे मरने से पहले ही नरक को जाते हैं. हनीमून पर लव मैरिज करने वाले जाया करते हैं.

‘‘हनीमून पर जाना लव मैरिज वालों को ही शोभा देता है. हनीमून पर लव मैरिज करने वालों का ही एकाधिकार है. अरेंज्ड मैरिज करने वालों को ऐसी छिछोरी हरकत शोभा नहीं देती है.’’

हे मेरे समय के घोड़ी की लात खाने वाले अरेंज्ड विवाहितो, पता नहीं मैं कितना उन दिनों का बचाखुचा अरेंज्ड मैरिड खुशनसीब हूं जिन दिनों की शादियों में न फोटोग्राफर कदमकदम पर वरवधू को फेरे लगाने से रोका करता था और न ही शादी के तुरंत बाद हनीमून पर जाने के बाद मरवाए जाने की परंपरा थी.

उन दिनों शादी के तुरंत बाद हर शादीशुदा अपनी बीवी को दिल में लिए चार पैसे कमाने चुपचाप शहर चला जाया करता था और बीवी घर में बारहमासे गा कर पति की कमी को पूरा किया करती थी.

वैसे अब काबिलेगौर है यह कि मेरी जायज हरकत पर हरपल सोशल मीडिया के टच में रहने वाली मेरी परमादणीय बीवी अब मुझे हनीमून पर जाने के लिए उकसाने हेतु अगला क्या तीर चलाती है?

वैसे किसी भी वर्ग के परिवार की जिम्मेदारियां दुनियाभर के झूठ बोल, इधरउधर ठगी करने के बाद शायद ही कोई बाप होगा, जो स्वर्ग जाना नहीं चाहता होगा. Hindi Funny Story

Hindi Story: दूसरा मौका

Hindi Story: सदैव की प्रेमिका शीरी उस से उम्र में बड़ी थी और निचली जाति की भी. बड़ी मुश्किलों से उन की शादी हुई, पर ससुराल में शीरी को ज्यादा इज्जत नहीं मिली. बाद में वह औफिस में भी तरक्की करती गई, तो सदैव को यह बाद खटकने लगी. उस ने एक प्लान के तहत शीरी से शादी की थी. क्या था वह प्लान?

लखनऊ शहर के बाहरी छोर पर बना हुआ यह एक ओपन एयर रैस्टोरैंट था. ओपन एयर यानी सबकुछ खुला हुआ, यहां तक कि किचन में बनने वाली डिश को भी ग्राहक अपनी आंखों के सामने देख सकता था.

रैस्टोरैंट के बीच में अमलतास का एक पेड़ था, जिस के पीले रंग के फूल अपनी छठा बिखेर रहे थे. इस पेड़ के चारों तरफ कुरसियों और टेबलों को सजाया गया था और किनारे की क्यारियों में देशीविदेशी फूल लगे हुए थे.

एक किनारे पर आर्टिफिशियल झरना बना हुआ था, जिस से गिरता हुआ पानी आंखों को सुकून देता था. कभीकभी जब हवा का झौंका आता तो मिलेजुले फूलों की खुशबू फैल जाती. तब यहां बैठे प्रेमी जोड़ों का मन और भी रूमानी हो उठता था.

सदैव और शीरी ने किनारे वाली टेबल चुनी थी और दोनों अपने लिए मनपसंद चीजों का और्डर भी दे चुके थे. उन के यहां आने का मकसद सिर्फ टेस्टी खाना ही नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के बारे में संजीदा बातें भी करना था.

सदैव और शीरी दोनों एक ही न्यूज चैनल ‘खबर तक’ में काम करते थे. सदैव एसोसिएट प्रोड्यूसर था, जबकि शीरी न्यूज रिपोर्टर थी.

साथ काम करतेकरते कब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया पता ही नहीं चला और दोनों एकदूसरे के प्यार को 4 साल तक ईमानदारी की कसौटी पर जांचतेपरखते रहे और फिर जब दोनों ने समझ लिया कि उन के प्यार का रंग पक्का है, जिस पर पानी की कोई बौछार कोई असर नहीं डालेगी, तब उन दोनों ने शादी के बंधन में बंध जाने का फैसला कर लिया.

पर सदैव और शीरी के लिए शादी की राह इतनी आसान नहीं हो जाने वाली थी. सदैव अभी 25 साल का था और शीरी 27 साल की. उन दोनों का अलगअलग जाति से होना भी समस्या था, क्योंकि सदैव ब्राह्मण कुल से था, जबकि शीरी लोहार जाति की थी.

सदैव साधारण मिडिल क्लास परिवार का था. उस के परिवार वालों ने सदैव को पढ़ाने के लिए बैंक से
लोन लिया था, जिसे वे कई सालों तक चुकाते रहे थे, दूसरी तरफ शीरी मिर्जापुर के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थी.

शीरी के पापा एक मेकैनिकल वर्कशौप चलाते थे और तकरीबन 15 लोगों का स्टाफ था उन की वर्कशौप पर और इसी के सामने उन का आलीशान मकान बना हुआ था.

सदैव और शीरी दोनों जानते थे कि दूसरी जाति में शादी करना अब भी उतना आसान नहीं है, पर शीरी बहुत आशावादी लड़की थी. उस का मानना था कि अच्छा सोचने से अच्छा होता है, जबकि सदैव पर नैगेटिव सोच हावी रहती थी, क्योंकि जिस परिवार से वह ताल्लुक रखता था, वह परिवार भी छोटी सोच से अभी तक ऊपर नहीं उठ पाया था.

हालांकि, शीरी और सदैव ने जब शादी करने का फैसला किया था उस के बाद से शीरी अकसर ही सदैव की मां से, सदैव के दोस्त की हैसियत से फोन पर बात किया करती और उन का हालचाल लिया करती थी.

सदैव की मां भी बड़े प्यार से शीरी से बातें करती थीं, पर तब तक ही जब तक उन्हें यह नहीं पता चला कि उन का बेटा शीरी से शादी करना चाहता है.

‘‘क्या, अब उस लोहारिन से शादी करेगा तू, हमारा धर्म नष्ट कराएगा तू… नीच जाति की लड़की को घर लाएगा,’’ बम फूट गया था जैसे सदैव के घर में और कई बार बेटे और मातापिता में शादी को ले कर तीखी बहस भी हुई.

मिर्जापुर में जब शीरी ने फोन पर अपने मांबाप को उस की उम्र से छोटे और एक ब्राह्मण लड़के से शादी करने की बात बताई थी, तो उसे भी नाराजगी और गुस्सा ही झेलना पड़ा था.

शीरी के मांबाप ने खूब खरीखोटी सुनाई. उन्हें लोहार जाति का होने पर कोई अफसोस नहीं था और इसीलिए वे लोग चाहते थे कि शीरी अपनी जाति वाले किसी लड़के से ही शादी करे, ब्राह्मण जाति का लड़का उन्हें बिलकुल लुभा नहीं रहा था.

पर शीरी अपने मन और सदैव के प्यार के आगे मजबूर थी, सो उस ने अपने घर में साफ कर दिया था कि सदैव के अलावा वह किसी और से शादी नहीं करेगी.

‘‘तो क्या तुम अपनी ब्राह्मण सास से अपने लिए ‘लोहारिन’ और ‘छोटी जाति’ जैसे शब्द सुन पाओगी?’’

शीरी की मां ने कहा तो शीरी ने बदले जमाने और नई सोच का हवाला देते हुए कहा, ‘‘आप लोग अपने मन से कहानियां मत बनाओ. जहां तक सदैव के घर वालों की बात है तो सदैव उन्हें मना लेगा, पर पहले आप लोग तो मान जाओ.’’

सदैव ने भी अपने घर में अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर उस की शादी शीरी से नहीं होगी तो वह खुदकुशी कर लेगा. उस की बात सुन कर मांबाप दोनों सन्न रह गए थे और बेटे की इस बात ने उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था.

दोनों परिवार आपस में मिले. उन लोगों की मुलाकात के समय काफी तनाव का माहौल था, पर दोनों परिवार ही अपने बच्चों की जिद के आगे मजबूर थे, इसलिए तमाम जद्दोजेहद और उठापटक के बाद बड़े बेमन से दोनों तरफ से शादी के लिए हां तो कर दी गई.

लेकिन सदैव के मांबाप चाहते थे कि शादी के कार्ड पर लड़की के नाम के आगे ‘विश्वकर्मा’ की जगह ‘शर्मा’ लिखवा दिया जाता तो ठीक रहता, क्योंकि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में एक ब्राह्मण वर्ग शर्मा नामक सरनेम का इस्तेमाल करता है, जिस से ब्राह्मण परिवार की साख बनी रहती और रिश्तेदारी में लड़की के लोहार होने की बात दब जाती.

पर अपना सरनेम बदला जाना शीरी के मांबाप को कतई मंजूर नहीं हुआ और उन्होंने इस बात से साफ इनकार कर दिया.

इस बात पर सदैव ने भी नाराजगी जताई तो सदैव की शादीशुदा बहन रोमी ने बीच का रास्ता बताया कि वे लोग 2 तरह के कार्ड छपवाएं. एक पर ‘विश्वकर्मा’ सरनेम हो जो लड़की वालों का रियल सरनेम है, इसलिए वे कार्ड उन्हें दिखा दिए जाएं, जबकि जो कार्ड उन्हें अपनी रिश्तेदारी में बांटने हैं उस पर वे लोग ‘शर्मा’ सरनेम डलवा दें और इस कार्ड की भनक लड़की वालों को न दी जाए.

बहन की इस सलाह पर ही अमल किया गया और इसे बड़ी चालाकी से अंजाम दिया गया.

शादी के कर्मकांड में भी कई रुकावटें आईं, पर सदैव के पापा सब बातों को सुलझे दिमाग से संभालते गए और शीरी और सदैव की शादी हो गई.

सदैव और शीरी को शादी के बाद सदैव के पुश्तैनी घर यानी मनमीत नगर जाना था जो नोएडा से तकरीबन 550 किलोमीटर की दूरी पर तराई इलाके में बसा हुआ था.

शीरी ने कार में बैठेबैठे ही सदैव के मकान पर नजर डाली जो एक छोटा सा साधारण मकान था. अंदर जा कर देखने पर भी घर और घर के लोग सामान्य से ही लगे, पर इस से शीरी को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उसे तो कुछ दिन यहां रुकने के बाद वापस नोएडा अपने 3 बीएचके के फ्लैट में ही जाना था, जिसे सदैव ने किराए पर ले रखा है.

पहलेपहल ही शीरी का स्वागत अच्छा नहीं हुआ. उस को लंबा घूंघट न करने के लिए डांट पड़ी और किचन में घुसने को मना कर दिया गया, जबकि शीरी पहले से ही इन सब बातों के लिए तैयार थी.

शीरी किसी आदर्श बहू की तरह रोज सुबह 5 बजे जाग जाती और घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद नहाती, फिर नाश्ते की तैयारी करने लगती, जबकि घर के सभी लोग तब तक सोते ही रहते. सास के जागने के बाद वह उन्हें रात की भीगी हुई मेथी का पानी देती और ससुर को अंकुरित स्प्राउट, जबकि देवर का नाश्ता रोज बदल कर देने का फरमान था सास का, सो देवर के लिए रोज इंटरनैट से देख कर नया नाश्ता बना देती.

‘‘ये चावल किस ने पकाए हैं? जरूर शीरी भाभी ने पकाए होंगे,’’ किचन में ननद की आवाज गूंज रही थी.
पर शीरी ने बिना सब्र खोए कहा, ‘‘दीदी, अगर आप को दूसरे चावल खाने हैं, तो मैं दोबारा पका देती हूं.’’

इस बात के बदले में ननद से कुछ न बोला गया. वह किचन से बाहर पैर पटकती चली गई.

जब तक शीरी अपनी ससुराल में रही, तब तक कोई ऐसा दिन नहीं गया होगा कि उस के काम में कोई कमी नहीं निकाली गई हो.

पर फिर भी शीरी अपनी जबान को दांतों तले दबाए रही और किसी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा.

आज शीरी और सदैव को नोएडा अपने काम पर लौटना था, इसलिए शीरी किसी विजेता की तरह नोएडा वापस आ रही थी. दोनों ने वापस आ कर औफिस जौइन कर लिया था.

अपनी शादी से पहले शीरी ने कश्मीर में हुए एक आतंकी हमले के दौरान तमाम खतरों के बीच जा कर बहुत शानदार रिपोर्टिंग की थी. आज काम पर लौटते ही उस के क्रिएटिव हैड ने अपने केबिन में बुला कर उसे शादी की बधाई देने के बाद शाबाशी दी और साथ ही उस की बेहतर और बेबाक रिपोर्टिंग के लिए उसे ‘न्यूज स्टार’ नामक अवार्ड मिलने की बधाई भी दी.

शीरी ने तुरंत ही यह बात बताने के लिए सदैव को फोन लगाया तो उस ने फोन काट दिया. उस की किसी गलती पर बौस ने उसे डांटा था. शाम को भी वह अनमना सा था.

‘‘यह सब होता रहता है,’’ शीरी ने कहा तो सदैव को बुरा लग गया.

‘‘तुम्हें तो अवार्ड दिया जा रहा है, इसलिए तुम खुश हो,’’ सदैव ने झंझलाते हुए कहा.

सदैव का यह रूप देख कर शीरी ने शांत हो जाना ही ठीक समझा. अगले 2-3 दिन तक घर का माहौल काफी बोझिल सा रहा.

अगले दिन सदैव ने शीरी से अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उन के फ्लैट का किराया बहुत ज्यादा जाता है, तो क्यों न वे कोई फ्लैट खरीद लें. शीरी को इस में कोई बुराई नहीं नजर आई.

सदैव और शीरी ने अपने अपार्टमैंट्स से कुछ दूरी पर बने ‘शालीमार अपार्टमैंट्स’ में एक फ्लैट बुक कर दिया और 50 फीसदी रकम का भुगतान कर के बाकी पैसों की मासिक किस्त बनवा ली. शीरी ने अपनी सैलेरी से ईएमआई का पेमेंट करना स्वीकार कर लिया था.

कुछ दिनों के बाद ही शीरी ने अंबेडकरनगर में जा कर गरीब बच्चों के दुखदर्द को सामने लाने के लिए रिपोर्टिंग की, जिस की खूब तारीफ हुई और अब स्टाफ के लोगों को लगने लगा था कि हो न हो बहुत जल्दी ही शीरी को उस के लगातार अच्छे काम के लिए प्रमोशन दिया जाएगा.

और हुआ भी वही, शीरी को प्रमोट कर दिया गया, जबकि सदैव का साधारण सा इन्क्रीमेंट ही किया गया.
शाम को जब सदैव घर आया तो चाय पीते समय काफी गुस्से में लग रहा था और बौस और मैनेजमैंट के भेदभाव वाले रवैए के बारे में अनापशनाप बोल रहा था.

कहीं न कहीं सदैव के मुंह से यह बात भी निकल गई कि शीरी का अवार्ड और प्रमोशन उस के लड़की होने के चलते है, क्योंकि लड़कियों के लिए बहुत सारी चीजें पाना आसान हो जाता है. बौस लोग लड़कियों को पसंद करते हैं और उन्हें आगे बढ़ाने से उन का भी उल्लू सीधा होता है.

‘‘उल्लू सीधा होने से क्या मतलब है सदैव? तुम भी मेहनत करो तो तुम भी आगे बढ़ सकोगे,’’ शीरी का सब्र जवाब दे रहा था, इसलिए उस ने सवाल किया.

‘‘अरे, यह बात तुम अच्छी तरह समझती हो. अब भला उस अंबेडकरनगर वाली रिपोर्टिंग में तो ऐसी कोई खास बात नहीं थी, जिस के लिए वाहवाही की जाए.

‘‘पर आजकल तो दलित जाति के लिए दो हमदर्दी भरे शब्द बोल कर कोई भी लाइमलाइट में आ सकता है,’’ सदैव गुस्से में बक रहा था.

कितना जहर भरा था सदैव के मन और उस की बातों में, यह शीरी को अब धीरेधीरे पता चल रहा था, पर उस के पास सदैव के इस बरताव पर सिर्फ अवाक और दुखी होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

4 महीने बीत चुके थे और इन्हीं खट्टीमीठी बातों के बीच शीरी को पता चला कि वह पेट से है. तुरंत ही उस ने यह खबर सदैव को सुनाई.

बाप बनने की खबर सुन कर सदैव भी खुशी से फूला नहीं समाया और शीरी ने जल्द ही अपनी मां को फोन लगा कर यह खुशखबरी सुना दी.

मां ने ढेर सारी सावधानियां रखने की ताकीद करनी शुरू कर दी, जबकि अभी तो शीरी का पेट से होना शुरुआती दौर में था.

7 महीने हो गए और अब शीरी को औफिस से मैटरनिटी लीव ले कर घर पर ही रहना था.

एक दिन शीरी ने कहा, ‘‘सासू मां यहां आ जातीं, तो ठीक रहता.’’

इस बात पर सदैव ने भी रजामंदी जताई और अपनी मां को नोएडा आ कर रहने को कहा, पर उसे अपनी मां की तरफ से कड़वे शब्द ही सुनने को मिले, ‘‘तो तू क्या चाहता है कि अब मैं आ कर तेरी बीवी की सेवा करूं और जब उस का बच्चा हो तो नौकरानी की तरह काम करूं?’’

सदैव समझ गया था कि उस की मां नोएडा नहीं आएंगी, इसलिए उस ने शीरी से मिर्जापुर से अपनी मां को ही बुला लेने को कहा.

शीरी ने अपनी मां को बुला लिया और उस की मां ने आते ही किचन और शीरी की देखभाल का जिम्मा संभाल लिया.

समय आने पर शीरी ने एक खूबसूरत सी बेटी को जन्म दिया. सदैव बहुत खुश हुआ, पर उस की मां और पापा की तरफ से कड़वे शब्द ही आए कि ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. ऊंचे कुल की लड़की से शादी करता तो लड़का पैदा होता. इस ने तो लड़की पैदा कर के रख दी है. और करो नीची जाति की लड़की से शादी’.

सदैव को अपने मांबाप से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी, पर अब तो शीरी से शादी कर के वह भी जैसे परेशान ही हो रहा था.

औफिस में शीरी का बढ़ता हुआ कद और फिर लड़की पैदा होने पर अपने घर वालों द्वारा कोसे जाने से तो सदैव परेशान था ही कि इसी समय एक घटना और हो गई.

शीरी के चचेरे भाई हर्ष का उस की पत्नी से घरेलू विवाद के चलते तलाक हो गया, जिस के चलते शीरी परेशान थी, तो सदैव ने कहा, ‘‘तलाक के मामले हम लोगों में बहुत कम होते हैं, जबकि तुम लोगों में तो बातबात में तलाक हो जाता है.’’

सदैव की इस बात पर शीरी ने एतराज जताते हुए ‘हम लोग’ और ‘तुम लोग’ जैसे शब्दों का मतलब पूछा, जिस पर सदैव ने ‘हम लोग’ का मतलब ऊंची जाति और ‘तुम लोग’ का मतलब नीची जाति बताया.

शीरी को सम?ा में आ रहा था कि सदैव भले ही अच्छी नौकरी कर रहा था, देखने में भी अच्छा था, पर उस की सोच बहुत छोटी थी और वह उस सोच से ऊपर भी नहीं बढ़ पा रहा था.

न जाने कितनी बार शीरी ने सदैव से कहा कि अगर उसे औफिस में तरक्की नहीं मिल पा रही है, तो उसे किसी दूसरे चैनल में नौकरी करनी चाहिए, पर सदैव तो जहां था वहीं पड़े रहना चाहता था, उलटे शीरी की ये बातें उसे बुरी लग जाती थीं, तो वह उस से सीधे मुंह बात नहीं करता था.

2 दिन बाद शीरी का बर्थडे था. शीरी बहुत खुश थी, पर सदैव के चेहरे पर खुशी का कोई नामोनिशान नहीं था. हालांकि, उस ने बेमन से शीरी को विश जरूर किया और औफिस के लिए निकल गया.

शाम को सदैव जल्दी नहीं आया तो पूछने पर उस ने बताया कि वह औफिस में बिजी है. सदैव रात के 10 बजे घर आया. उस ने शराब पी हुई थी. वह सीधा अपने कमरे में चला गया. उस के इस बरताव पर शीरी का सब्र जवाब दे गया था.

शीरी ने सदैव से बात शुरू की, ‘‘मैं ने तो अपनी जाति और अपनी उम्र नहीं छिपाई थी. तुम्हारे परिवार से जो भी दर्द मिला, वह भी मैं ने सब हंस कर सहा, पर शादी के बाद तुम्हारे बरताव और प्यार में जमीनआसमान का फर्क क्यों आया?’’

शीरी आज सबकुछ साफ कर लेना चाहती थी. सदैव ने भी लड़खड़ाती जबान में उसे जवाब दिया, ‘‘दरअसल, तुम से शादी करना मेरा एक कैलकुलेशन था.

‘‘कैसा कैलकुलेशन?’’ शीरी ने पूछा, जिस के बदले में सदैव ने जो बताया उसे सुन कर शीरी चौंक गई थी.

सदैव ने नशे की झांक में शीरी को बताया कि उस ने शीरी से शादी सिर्फ इसलिए की है, क्योंकि आमतौर पर उस जैसी अमीर लड़की से उस की शादी नहीं हो पाती, वह नोएडा में कभी अपना फ्लैट नहीं खरीद पाता. मतलब, सदैव ने शीरी के परिवार के रुतबे और पैसे को देखते हुए सोचासमझा जाल बिछाया और शीरी से शादी की.

शीरी की समझ में आ रहा था कि उस ने सदैव से शादी कर के भारी भूल कर दी है. उस ने तो सदैव से प्यार किया था पर सदैव ने उसे अपना झूठा चेहरा ही दिखाया था.

लेकिन आज सदैव शराब के नशे में था, इसलिए न चाहते हुए भी उस की जबान चल रही थी, ‘‘और सच कहूं तो मुझे लगता है कि यह बच्चा मेरा नहीं है. मुझे तुम्हारे उस कलीग आशु पर शक है. आखिर वह भी तो छोटी जाति काही है.’’

सदैव ने यह बात कह कर एक हिचकी ली, पर उस के इन शब्दों ने मानो शीरी के कानों में पिघला सीसा उड़ेल दिया था. उसे लगा कि अपने गुस्से को संभालने में उस के शरीर का सारा जोर लगा जा रहा है.

शीरी के नथुने फड़कने लगे थे और पीछे खड़ी उस की मां की आंखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे.

‘‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझ से तुम को समझने में भूल हो गई,’’ शीरी यह कहते हुए उठ खड़ी हुई थी.

अगली सुबह ही शीरी ने सदैव के खिलाफ घरेलू हिंसा और दिमागीतौर पर परेशान का केस दायर कर दिया और सदैव के पास तलाक के कागजात भिजवा दिए.

पहले तो सदैव ने इस बात को हलके में लिया, पर जब उसे लगातार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और केस और वकीलों का खर्चा उठाना पड़ा, तो उस की जेब जवाब देने लगी. अभी तो उसे शीरी का खर्चा देना था और अपनी बेटी को हर महीने तय रकम भी देनी थी… और अब तो उस के हाथ से उस का फ्लैट भी निकल जाएगा.

सदैव ने शीरी से माफी मांग कर समझौता करना चाहा, पर शीरी अपने फैसले पर अडिग थी.

‘‘मैं ने तुम्हें समझने में पहली बार तो भूल कर दी थी, पर दूसरी बार भूल नहीं करूंगी. बड़ी मुश्किल से दूसरा मौका मिला है अपनी जिंदगी को संवारने का,’’ शीरी के चेहरे पर कठोर भाव थे.

शीरी ने ठीक मौके पर सदैव को पहचान लिया था, जिस ने प्रेम का जाल सिर्फ इसलिए फैलाया ताकि शीरी जैसी अमीर लड़की को अपनी पत्नी बना कर उस के पैसे पर ऐश कर सके.

जाति और ऊंचनीच के ढेर में पड़े हुए सदैव को तलाक दे कर शीरी ने खुद की जिंदगी को दूसरा मौका दिया था. Hindi Story

Story In Hindi: 2 नाव की सवारी

Story In Hindi: इम्तियाज की शादी शकीला से बड़ी धूमधाम से हुई थी. शकीला भी कोई ऐसेवैसे घर की लड़की नहीं थी, बल्कि एक अच्छे परिवार की पढ़ीलिखी लड़की थी. भले ही उस का रंग सांवला था, पर उस के चेहरे पर एक अजीब सी कशिश थी.

लंबे डीलडौल की और ऊंची उठी हुई छातियों की मलिका होने के साथसाथ शकीला की आवाज भी बड़ी मधुर थी. उस के काले घनेलंबे बालों का तो कहना ही क्या था.

बायोलौजी में बीएससी कर शकीला ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्च खुद उठाने के काबिल थी.

इम्तियाज मुंबई के सांताक्रूज इलाके में शकीला के साथ अकेला रहता था. दोनों में बहुत गहरा प्यार था. शकीला इम्तियाज पर जान छिड़कती थी, क्योंकि इम्तियाज भी शकीला के घर के कामों में काफी मदद करता था और उस की हर खुशी का खूब खयाल रखता था.

इम्तियाज एक सौफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन खूबसूरत लड़की देख कर अकसर उस का दिल मचलने लगता था.

शकीला जब पेट हुई तो उस की अम्मी ने शकीला की देखभाल के लिए अपनी छोटी बेटी सानिया को उस के घर भेज दिया.

डिलीवरी होने में अभी एक हफ्ता बाकी था. सानिया ने पहले ही आ कर शकीला के घर की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल ली थी और अपनी बहन शकीला को आराम देने में पूरी मदद करने लगी थी.

इम्तियाज ने जब शकीला की बहन सानिया को देखा तो उस का दिल मचलने लगा और वह उसे पाने के सपने संजोने लगा.

सानिया बला की खूबसूरत थी. एकदम गोरीचिट्टी, बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल और मदमस्त उठी हुई छातियां देख कर इम्तियाज तो उस का ऐसा दीवाना हुआ कि बस उसे पाने के लिए जुगत भिड़ाने लगा.

कुछ दिनों बाद शकीला ने आपरेशन के जरीए एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया. इस वजह से शकीला को एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने को कहा गया.

इम्तियाज ने औफिस से छुट्टी ले ली और शकीला और बच्चे की अच्छी तरह देखभाल करने लगा.

2 दिन तक इम्तियाज ढंग से सो नहीं पाया, तो शकीला बोली, ‘‘आप आज रात घर पर जा कर आराम कर लो. वैसे भी सानिया घर में अकेली है.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘ठीक है, मैं थोड़ा आराम कर के सवेरे जल्दी आ जाऊंगा. तुम अपना खयाल रखना.’’

देर रात घर पहुंच कर इम्तियाज ने डोरबैल बजाई तो सानिया नींद से उठती हुई दरवाजा खोलने आई.

सानिया ने जैसे ही दरवाजा खोला, उस की उभरी हुई छातियां देख कर इम्तियाज के मन में हलचल मचने लगी.

इम्तियाज सानिया से बोला, ‘‘मैं काफी थका हुआ हूं. थोड़ा आराम कर के मुझे सुबह 4 बजे जल्दी अस्पताल जाना है. अगर मेरी आंख नहीं खुली, तो मुझे 4 बजे उठा देना.’’

सानिया ने कहा, ‘‘ठीक है जीजाजी, आप आराम करो. मैं आप को 4 बजे उठा दूंगी,’’ और फिर वह ड्राइंगरूम में ही अपने बिस्तर पर लेट गई.

इम्तियाज बाथरूम जा कर फ्रैश होने लगा. जब वह बाथरूम से निकला, तो ड्राइंगरूम में सानिया को लेटे देख कर उस का मन डोलने लगा.

इम्तियाज काफी देर तक सानिया को यों ही निहारता रहा, फिर धीरे से उस के करीब जा कर उस ने सानिया के उभारों पर अपना हाथ रख दिया और उन्हें सहलाने लगा.

सानिया चौंक कर उठ गई और अपने जीजा से अलग होते हुए बोली, ‘‘यह आप क्या कर रहे हो…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘कुछ नहीं. मै देख रहा हूं कि तुम्हारे इस संगमरमरी बदन को कुदरत ने बड़ी फुरसत से बनाया है. मैं इसे चूमना चाहता हूं. तुम्हारे इस दूधिया बदन से प्यार करना चाहता हूं.’’

सानिया बोली, ‘‘आप को शर्म नहीं आती जीजाजी… आप मेरी सगी बहन के शौहर हैं और आप उन्हें कैसे धोखा दे सकते हैं…’’

इम्तियाज ने कहा, ‘‘मैं शकीला को धोखा नहीं दे रहा हूं. मैं तो बस तुम्हारे साथ कुछ समय गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘यह गलत है. आप मुझ से दूर हो जाओ. मैं अपनी बहन को धोखा नहीं दे सकती,’’ सानिया ने कहा.

‘‘पर मैं तो तुम दोनों को ही अपने साथ जिंदगीभर रखना चाहता हूं,’’ कहते हुए इम्तियाज ने सानिया के रसभरे गुलाबी होंठों को चूमना शुरू कर दिया.

सानिया इम्तियाज से अलग होने के लिए छटपटाने लगी कि तभी इम्तियाज ने उस के उभारों पर अपना हाथ फेरना शुरू कर दिया.

थोड़ी सी नानुकर के बाद सानिया सिसकियां भरने लगी. वह इम्तियाज को अपने ऊपर खींचने लगी, तो इम्तियाज को यह समझते देर न लगी कि सानिया गरम हो चुकी है.

इम्तियाज ने सानिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसे प्यार करने लगा. सानिया भी अब पूरा मजा लेने लगी. कुछ देर तक वे दोनों यों ही एकदूसरे के जिस्म से खेलते रहे, फिर चरमसुख पर पहुंच कर अलग हो गए.

सानिया मुसकराते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप ने तो मुझे वह खुशी दी है, जिस की मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अब मैं आप के बिना नहीं रह सकती. यह खुशी मुझे आप से बारबार चाहिए.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. तुम्हारा जब भी दिल करेगा, मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगा.’’

सानिया ने कहा, ‘‘पर जब कुछ दिनों के बाद मैं यहां से चली जाऊंगी, तब आप मुझे यह खुशी कैसे दोगे?’’

इम्तियाज बोला, ‘‘हम दोनों शादी कर लेंगे, क्योंकि मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

सानिया ने सवाल किया, ‘‘यह कैसे हो सकता है? मैं अपनी ही बहन का घर नहीं उजाड़ सकती.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘तुम फिक्र मत करो. जब तक हम दोनों को शादी करने का मौका नहीं मिलता, हम यों ही एकदूसरे के जिस्म की जरूरत पूरी करते रहेंगे.’’

तभी 4 बज गए. इम्तियाज जल्दी से उठा और फ्रैश हो कर अस्पताल की तरफ भागा.

अस्पताल पहुंच कर इम्तियाज ने देखा कि शकीला गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उस के माथे को चूमा तो उस की आंख खुल गई.

शकीला ने इम्तियाज का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘आ गए आप. मेरी वजह से आप को कितनी तकलीफ हो रही है. आप को बिलकुल भी आराम नहीं मिल रहा है. मैं कितनी खुशनसीब हूं, जो आप जैसा शौहर मुझे मिला.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘खुशनसीब तो मैं हूं जो तुम्हारे जैसी मुहब्बत करने वाली बीवी मुझे मिली है और जिस ने मुझे बाप बनने का नसीब अता किया है. साथ ही, तुम मुझे दिलोजान से प्यार करती हो.’’

शकीला ने कहा, ‘‘आप भी बस कुछ भी बोल देते हो. आप खुद मुझे इतना प्यार देते हो, उस के सामने मेरा प्यार तो कुछ भी नहीं.’’

इस तरह इम्तियाज दो नाव की सवारी करने लगा. उसे जब भी मौका मिलता, वह सानिया के जिस्म के मजे लूटता.

फिर एक दिन ऐसा भी आया जब इम्तियाज की असलियत सब के सामने आ गई.

हुआ यों कि शकीला के घर आने के बाद काफी दिनों तक इम्तियाज को सानिया से मिलने का मौका नहीं मिला, तो एक रात जब शकीला गहरी नींद में सो गई तो इम्तियाज चुपके से उठा और सानिया के कमरे में चला गया.

सानिया पहले तो इम्तियाज को अपने कमरे में देख कर घबरा गई, पर जब इम्तियाज ने उसे अपनी बांहों में पकड़ कर चूमना शुरू किया, तो उस के भी सब्र का बांध टूट गया और उस ने अपनेआप को इम्तियाज के हवाले कर दिया.

इसी बीच अचानक शकीला की आंख खुल गई. आवाज सुन कर जब वह सानिया के कमरे में पहुंची तो इम्तियाज और सानिया का जिस्मानी खेल देख कर उस के होश उड़ गए.

शकीला ने चीख कर इम्तियाज को कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… अपनी बीवी के होते हुए किसी दूसरी लड़की के साथ यह हरकत करते हुए… मैं तुम्हें एक शरीफ इनसान सम?ाती थी, पर तुम तो एकदम घटिया निकले.

‘‘मैं ने तुम पर आंख मूंद कर भरोसा किया और तुम ने मेरी ही छोटी बहन को अपने जाल में फंसा लिया.’’
इम्तियाज बोला, ‘‘मेरी बात तो सुनो मेरी जान.’’

शकीला ने कहा, ‘‘अब क्या रह गया सुनने को. मैं तो तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहती. मुझे नफरत है ऐसे मर्दों से जो अपनी बीवी को धोखा देते हैं.’’

इम्तियाज बोला, ‘‘मैं तुम से भी प्यार करता हूं और सानिया से भी. मैं वादा करता हूं कि तुम दोनों का बहुत खयाल रखूंगा. मैं सानिया से भी निकाह कर के उसे अपने साथ रखूंगा. तुम मुझे सानिया दे दो, मैं तुम्हारे पैर चूमूंगा.’’

शकीला ने इम्तियाज के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बेशर्म इनसान, तुझे शर्म नहीं आती अपनी बीवी के सामने ही उस की छोटी बहन से निकाह करने को कहने की. तू ने ऐसा सोच भी कैसे लिया…

‘‘मैं जा रही हूं अपने बेटे को ले कर तुम्हारी जिंदगी से दूर. मैं इस पर तुम जैसे घटिया बाप का साया भी नहीं पड़ने देना चाहती.’’

डरीसहमी सानिया ने भी अपना सामान पैक किया और शकीला के साथ चलने को तैयार हो गई.

इम्तियाज अपने किए पर पछता रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आइंदा ऐसा कोई काम नहीं करूंगा जिस से तुम्हारा दिल दुखे.’’

शकीला ने कहा, ‘‘मैं अब तुम्हें ऐसा मौका कभी नहीं दूंगी. मेरा तो दिल टूट चुका है तुम्हारी इस हरकत से. तुम ने क्या सोचा था कि एकसाथ दो नाव में सवारी कर के जिंदगी का मजा ले लोगे… यही हरकत अगर मैं करती तो तुम मुझे बदचलन कहते और दुनियाभर के इलजाम लगाते.

‘‘मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो अपने शौहर के जुल्म को बरदाश्त करती है. मैं अगर इज्जत देना जानती हूं, तो सामने वाले से भी इज्जत ही चाहती हूं.

‘‘तुम्हें यह घमंड था कि दोनों बहनों से निकाह कर के उन के जिस्म से खेलते रहोगे और तुम्हें कोई रोकेगा भी नहीं. मैं आज के बाद तुम्हारी सूरत भी नहीं देखूंगी. तुम्हें तलाक का नोटिस मिल जाएगा. अब मैं तुम्हारे साथ एकपल भी नहीं रह सकती.’’

इस तरह शकीला ने इम्तियाज से तलाक ले लिया और जो थप्पड़ उस ने इम्तियाज के मुंह पर मारा, उस का असर इम्तियाज के दिल और जिंदगी पर भी एक गहरी छाप छोड़ गया.

इम्तियाज के दो नाव में सवारी करने के चक्कर में उस के हाथ से सानिया तो गई ही, उसे अपनी बीवी शकीला और बेटे से भी हाथ धोना पड़ा.

शकीला ने अपने शौहर को छोड़ कर यह साबित कर दिया कि औरत किसी से कम नहीं होती. हमें गर्व है शकीला जैसी औरतों पर. Story In Hindi

Family Story In Hindi: फर्क

Family Story In Hindi: गरीब झांझन की छोटी सी दुकान थी. एक वक्त ऐसा था जब अमीर जगदंबा बाबू ने उस की बहन की इज्जत लूट ली थी. पर अब वे लकवे के शिकार हो थे. उन का परिवार दानेदाने को मुहताज था. इसी बात का फायदा उठा कर झांझन ने उन की बेटी से अपनी बहन का बदला लेना चाहा. क्या उस की नीयत में खोट आ गया था?

जब बारिश और सर्द हवाओं ने जनवरी की ठंड का रंग और जमा दिया, तो गांव में सांझ ढले ही सन्नाटा होने लगा. लेकिन झांझन की दुकान काफी देर तक खुली रहती, क्योंकि जरूरतमंद गरीब लोग दिन में मजदूरी कर के आटा, दाल, चावल वगैरह खरीदने वहां पहुंच जाते थे.

झांझन की चांदी हो चली थी. वह भी मनमाने दाम पर चीजें बेच कर वक्त की नजाकत का फायदा उठाता.
धंधे में वह कतई बेमुरब्बत था, इसीलिए लोग कहते कि जगदंबा बाबू के घर एड़ी रगड़ कर भी इसे गरीबी के दुख का एहसास नहीं है. चार दिन से चार पैसे हो गए, तो गरीबों को ही खा जाने की नीयत हो गई.

मगर झांझन पर इस का कोई असर नहीं होता. हालांकि उस ने बिना पैसे की दुनिया देखी थी. वह दिनभर जगदंबा बाबू की भैंसें चराता था और एक गिलास मट्ठे के साथ 2 रोटियां खा कर उसे संतोष करना पड़ता था. तब इस दुकान और घर की जगह झोंपड़ी थी, पर चेहरे पर मस्ती थी.

भैंस चराने जाते समय कंधे पर रखी लाठी को झांझन राइफल से कम नहीं समझता था. यह काम वह कभी नहीं छोड़ता, अगर जगदंबा बाबू ने मजदूरी के लिए गई हुई उस की जवान बहन पर हाथ न डाल दिया होता और सबकुछ लुटा कर उस ने पिछवाड़े के पोखर में कूद कर अपनी जान न दे दी होती.

उस दिन के बाद लाख धमकाने, फुसलाने के बाद भी झांझन जगदंबा बाबू के घर काम पर नहीं गया.

जगदंबा बाबू का सर्वनाश देखना उस की जिंदगी की सब से बड़ी तमन्ना हो गई. वह गांव छोड़ कर पंजाब चला गया. मेहनतमजदूरी कर के कुछ रुपए जोड़े और गांव में लौट आया.

गांव आ कर जगदंबा बाबू के बारे में मालूम हुआ कि वे लकवे के शिकार हो कर चारपाई पर पड़े रहते हैं. उन से उठना, बोलना बिलकुल नहीं हो पाता. इस बात ने उसे तसल्ली दी.

दरअसल, जगदंबा बाबू ने जमींदारी जाने के बाद भी अपनी आदतें नहीं छोड़ीं और शराब व ऐयाशी में उन की सफेदी झड़ कर रह गई थी. ऊपर से 4-4 जवान बेटियां. 3 के ब्याहों में खेतीबारी उतनी ही रह गई, जितने से साधारण किसान पेट पाल सकता था.

बेटियों के बाद बेटे मधुकर की शादी में वे खास धूमधड़ाका तो नहीं कर पाए, मगर कर्ज में तकरीबन सारा खेत रेहन हो गया. जेवर वगैरह तो पहले ही साफ हो चुके थे.

मधुकर गांव में ही मजदूरी कर नहीं सकता था, इसलिए वह अंबाला चला गया. वहां से आए मनीऔर्डर से ही पूरे घर की गुजर होती थी.

दुकान बंद करते समय झांझन जगदंबा बाबू के घर की ओर देखता कि गरीबों की जानमाल व इज्जतआबरू पी जाने वाले जगदंबा बाबू कब तक मटियामेट होते हैं. उन के घर की दीवारों के गिरने का उसे बेसब्री से इंतजार था. वैसे तो वह उन्हें साफ ही कर देता, मगर मधुकर और दूसरे पट्टीदारों की कुछ दहशत अभी बाकी थी.

झांझन मन को समझा लेता कि अब तो जगदंबा बाबू खुद अपाहिज हैं, ऐसे को मारना बेकार है.

झांझन को हैरानी होती कि दानेदाने की मुहताजी झेलते दूसरे परिवारों की तरह इस दुष्ट का कोई बरतन तक उस के यहां गिरवी नहीं हुआ. ऐसा हो जाता, तो वह उसे औरों को शान से दिखादिखा कर जगदंबा बाबू को नीचा दिखा सकता.

यही वजह थी कि दुकानदारी निबट जाने के घंटाभर बाद ही वह दुकान बंद करता था, ताकि झूठी शान में बरबाद होने वाले जगदंबा बाबू के परिवार वाले शायद अकेले में ही कुछ गिरवी रख कर आटा वगैरह ले जाएं या फिर उधार ही मांगने आएं.

आखिर एक दिन जगदंबा बाबू की पत्नी सब ग्राहकों के चले जाने के बाद दुकान पर आईं. उन्हें आते देख कर झांझन को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. उस ने आंखें मलीं और जब यकीन हो गया कि वही हैं, तो नोट गिनने लग गया.

जगदंबा बाबू की पत्नी हसरत से नोटों को देखती रहीं कि इतने सारे नोट यह करमजला लिए बैठा है. नोटों की गरमी में ही तो उन्हें देख नहीं रहा.

जब देर तक झांझन ने उन की ओर निगाह नहीं डाली, तो बेइज्जत होने के बावजूद उन्हें बोलना पड़ा, ‘‘झांझन भैया, कुछ मेरी भी सुन लेते.’’

‘‘ओह, आप हैं भाभीजी… बताइए, क्या सौदा दूं?’’ झांझन ने चौंकने का नाटक किया.

‘‘सौदा तो आटा, दाल, तेल, चीनी सबकुछ चाहिए, मगर जेब में पैसे भी तो होने चाहिए,’’ उन्होंने लाचारी बयान की.

‘‘तो कोई जेवर, बरतन वगैरह ही लिए आतीं. दुकानदारी में तो सब काम हिसाब से चलता है,’’ वह उन के अंगअंग को घूरता हुआ बोला.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने रुकरुक कर जो बात कही, उस का मतलब यह था कि घर में बेचने लायक और गिरवी रखने लायक कुछ भी नहीं बचा. 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला और बच्चे भूख से मुरदा जैसे पड़े हैं. पोतापोती दोनों ही बुखार से तप रहे हैं, वरना वे आती ही नहीं.

उन के मुंह से बेबसी में निकल गया, ‘‘अब तो इस देह के सिवा कुछ भी नहीं बचा है.’’

‘‘भाभीजी, अब आप की देह में इतना कसाव नहीं बचा है. बहू या

सरोज को भेज देतीं, वे ही सामान ले जातीं,’’ झांझन की आंखों में शरारत चमक रही थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी सबकुछ सुन कर और समझ कर भी होंठ दाब कर रह गईं. उन से कुछ कहा नहीं गया और धरती पर हाथ लगा कर उठने लगीं.

झांझन ने उन्हें 2 किलो आटा दे दिया और कहा, ‘‘आगे से जरूरत हो, तो आप कतई न आना.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी के जाने के बाद झांझन सरोज के छरहरे बदन और मादक अंगों की कल्पना करता, कभी बहू के उस अनदेखे रूप की, जिस के लिए मधुकर अंबाला कमाने गया था. उस की अपनी पत्नी थी, बच्चे थे, मगर जगदंबा बाबू से बदले की भावना उसे कल्पना की इन गलियों में भटका रही थी. वैसे इधरउधर मुंह मारना उस की आदत भी नहीं थी.

जगदंबा बाबू की पत्नी ने उस रात खानेपीने के बाद अकेले में बहू को समझाया, ‘‘कल सब ग्राहकों के चले जाने के बाद तू झांझन की दुकान पर चली जाना… कोई जानेगा भी नहीं.’’

‘‘नहीं अम्मां, मैं इज्जत बेच कर जिंदा नहीं रहना चाहूंगी. ऐसा होने से पहले अपनी जान दे दूंगी,’’ बहू ने बिफर कर कहा.

‘‘तब इज्जत बनी रहेगी, जब तू भूख के मारे हमें बदनाम करेगी. लोग कहेंगे कि पेट की खातिर बहू ने जान दे दी. आखिर यह समय तो हमेशा बना नहीं रहेगा.

‘‘इस समय जान बचाने का सवाल है. तू कहे तो मैं झांझन को यहीं बुला दूंगी… न चोर जानेगा, न साह बताएगा.’’

‘‘चोर जाने या न जाने, मैं यह नहीं कर पाऊंगी. मुझे माफ करो और मायके भेज दो,’’ बहू सुबकने लगी.

‘‘मायके भेजने के लिए 400 रुपए होते, तो यह दिन क्यों देखना पड़ता. तू बैठी रह अपने हठ पर… मर जाने दे गोद के बच्चों को,’’ बड़बड़ाती हुई सास ने बहू को छोड़ बेटी से धीमेधीमे बात करनी शुरू कर दी.

अगले दिन ग्राहक छंट जाने पर कुत्तों से बचने को डंडा लिए हुए जगदंबा बाबू की पत्नी झांझन की दुकान पर आईं.

उन्हें देख कर झांझन के मुंह का जायका बिगड़ गया. दुकान में ताला लगाने की तैयारी कर के वह बोला, ‘‘आप फिर आ गईं?’’

‘‘मैं सौदा लेने नहीं आई हूं,’’ वे बोलीं.

‘‘फिर क्या करने आई हैं?’’ झांझन रुखाई से बोला.

‘‘तुम्हें बुलाने मेरी बेटी यहां आई और किसी ने देख लिया, तो कितनी जगहंसाई होगी.’’

‘‘अच्छा, ठीक है, यही सही. थोड़ा सामान तुम ले जाओ, बाकी मैं ले आऊंगा,’’ झांझन बागबाग था.

‘‘खाली सामान नहीं, 1,000 रुपए की भी जरूरत है. अगर तैयार हो तो बोलो?’’ कह कर वे जैसे चलने को तैयार थीं.

‘‘हां, तैयार हूं. मगर वहां मुझे आना कब है?’’ झांझन ने दिल कड़ा कर के पूछा.

‘‘तुम एक घंटे बाद आना. सरोज की कोठरी दरवाजे के बाएं ही है… दरवाजे खाली भिड़े होंगे,’’ कह कर आटा, दाल उठा कर वे इस तरह चलीं, जैसे रत्नों का ढेर लिए जा रही हों.

झांझन को खुशी के साथसाथ हैरानी भी हो रही थी कि इसी औरत को कभी आटा, दाल तो दूर, घी, दूध को देखने की भी फुरसत नहीं थी. नौकरचाकर जो चाहते, करते. अब यह भूख के लिए सबकुछ करने को तैयार है. अब उस का कलेजा ठंडा होगा, बहन का बदला ले कर.

झांझन ने 1,000 रुपए जेब में रखे और जगदंबा बाबू के घर की ओर कदम बढ़ा दिए.

झांझन जगदंबा बाबू के घर के सामने खड़ा था. सरोज के कमरे से उसे सिसकियों की आवाजें सुनाई दीं. जिस सरोज की अल्हड़ हंसी को ही वह पहचानता था, उस की सिसकियों ने उसे हिला कर रख दिया. उस की बहन की इज्जत से तो जगदंबा बाबू खेले थे, सरोज का क्या कुसूर था? सिर्फ यही न कि सरोज उन की बेटी है.

हो सकता है कि ऐसी ही किसी बेबसी का शिकार उस की बहन भी बनी हो. जब झांझन भी वही करेगा, जो जगदंबा बाबू ने किया, तो दोनों में फर्क ही क्या रह जाएगा.

इसी तरह ब्याह से पहले उस की बहन के अरमान कुचले गए थे. सरोज की भी अभी शादी नहीं हुई है. अगर उस ने भी मजबूरी में अपना सबकुछ सौंप कर परिवार को बचा कर बाद में उस की बहिन जैसा ही किया, तो झांझन की हालत भी क्या जगदंबा बाबू जैसी नहीं हो जाएगी?

झांझन सिहर उठा. उस ने धीरे से सरोज के कमरे का दरवाजा खोला.

सरोज ने सिसकते हुए कहा, ‘‘चले आओ.’’

‘‘नहीं, अपनी अम्मां को बुलाओ,’’ झांझन ने कहा.

‘‘अम्मां क्यों… तुम्हारा मतलब तो मुझ से है न,’’ सरोज ने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘मैं ने कहा न, अम्मां को बुलाओ.’’

जगदंबा बाबू की पत्नी, जो दरवाजे के पास ही खड़ी थीं, पास आ कर बोलीं, ‘‘अब भी कुछ बाकी है झांझन ? अब तो तुम्हारे मन की हो रही है.’’

‘‘बहुतकुछ बाकी है अभी… मैं तो तुम्हें तौल रहा था. यह लो 1,000 रुपए… बुरे दिन तो आदमी पर आते ही रहते हैं, इन्हें हौसले से झेलना चाहिए और धनदौलत पा कर इनसानियत से नहीं खेलना चाहिए,’’ रुपयों की गड्डी जगदंबा बाबू की पत्नी को दे कर वह सीधे अपनी राह चल दिया.

दोनों मांबेटी हैरान हो कर उसे जाते देख रही थीं. Family Story In Hindi

Editorial: मोदी सरकार का मैसेज – वोट का हक भी छीना जा सकता है

Editorial: बिहार में स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन (एसआईआर) का मतलब चुनाव सूचियों से विदेशियों को निकालना नहीं है, बल्कि यह जताने के लिए है कि बिहार के या देश के दूसरे राज्यों के मतदाताओं को मालूम रहे कि वोट का हक तो मोदी सरकार का दिया हुआ है, कभी भी वापस लिया जा सकता है.

भारतीय जनता पार्टी आम जनता को यह अहसास कराना चाहती है कि वोट का हक कोई संवैधानिक नहीं है, यह राशन की तरह, मुफ्त बस सेवा की तरह, सरकारी नौकरी की तरह, शौचालय के लिए अनुदान की तरह, सरकारी स्कूल में पढ़ाई की तरह, सरकारी अस्पताल में इलाज की तरह का हक है जो 2014 के बाद दिया गया है और मोदी सरकार चुनाव आयोग के जरीए जब चाहे वापस ले सकती है.

चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अगस्त में हुई प्रैस कौंफ्रैंस में यही कई बार दोहराया और सुप्रीम कोर्ट में बारबार कहा कि कानून से यह हक मिला है और यह कानून मोदी सरकार जब चाहे जैसे चाहे बदल सकती है.

सदियों से देश का गरीब, शूद्र, अछूत, सवर्णों की औरतें उस सामाजिक कानून के कड़े पहरे में रहे जो पंडितों ने अपने लाभ के लिए बनाए और थोपे. इस से पुजारियों, सरकारी आदमियों और सेठोंको तो जम कर फायदा हुआ, पर आम आदमी हमेशा भूखानंगा रहा. बिहार में तो हाल ज्यादा ही बुरा रहा क्योंकि वहां जाति के सहारे धर्म का जहर गंगा में बुरी तरह घुला हुआ है जिस का पानी हर नदीनाले और कुएं में पहुंचा हुआ है.

वोट के हक ने इस जहरीले पानी को फिल्टर करना शुरू किया था पर बिहार सब से अलग अपवाद रहा जहां वोट का हक आम लोगों को जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के बावजूद पूरी तरह मिल नहीं पाया. इस की एक वजह शायद यह भी थी कि 1757 से 1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने बड़ी गिनती में बिहार के ब्राह्मणों को सेना में भरती किया था और उन्हें अपने ही लोगों को बंदूकों से मारने की ट्रेनिंग दी थी. उस से पहले ब्राह्मण खुद हथियार न उठा कर क्षत्रियों या ऊंचे शूद्रों को इस्तेमाल किया करते थे.

अंगरेजों की फौजों से रिटायर हो कर आए लोगों ने गांवों में अंगरेजी रोबदार वाला राज बिना सरकार के थोप दिया जिसे 1950 के संविधान ने छीना था. उस के बाद जो जमीन संघर्ष चला और आज चल रहा है उस में गरीबों के पास बिहार छोड़ कर भागने के लायक कुछ उपाय नहीं बचा था.

चुनाव आयोग अब इस भगौड़ेपन को फिर से तेज करना चाह रहा है और वोट का हक आम अनपढ़ व अछूतों, शूद्रों, सवर्ण व गैर सवर्ण औरतों से छीनने में मंदिर सरकार को सौंपने का काम कर रहा है. जहां एक बार टीएन शेषन ने हरेक को, चाहे कहीं रह रहा हो, वोट का हक दिया था. ज्ञानेश कुमार इसे छीन कर अपनी ‘महान कृपा’ पर ‘प्रसाद’ की तरह बांट रहे हैं. अफसोस यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस चोरी पर फिक्र नहीं करता दिख रहा और सिवा राहुल गांधी के कांग्रेस या इंडिया ब्लौक वाले भी इस डर को नहीं समझ रहे.

॥॥॥

यह ठीक है कि हमारे गांवों और कसबों में ही नहीं छोटेबड़े शहरों में किसी भी तरह की गाडि़यां चलाने के नियम कोई मानता नहीं और जो जितना गांव से नया ड्राइवर हो वह उतनी मनमानी करता है पर इस का मतलब यह नहीं है कि पुलिस चालान पर चालान करती रहे. इस समय इलैक्ट्रोनिक चालान ही देश में 34,000 करोड़ रुपए के बकाया हैं जो ज्यादातर सीसीटीवी की फुटेज से किए गए थे.

गांवों की जिंदगी आज भी सीधी है. लोग अभी भी बैलगाड़ी के युग से उबरे नहीं हैं जिस में टक्कर लगे तो कुछ खरोंचें ही आती थीं. जब से पैट्रोलडीजल से चलने वाली गाडि़यां, ट्रक, बसें, ट्रैक्टर और भारी मशीनरी आई है, बैलगाड़ी के नियम नहीं चलते. यह समझाना गांवों के अधपढ़ों को मुश्किल है.

गांव की गली में बीच में कहीं भी बैलगाड़ी खड़ी कर दो कोई कुछ नहीं कहेगा, चलती सड़क पर जहां हर मिनट में 10-20 गाडि़यां गुजर रही हैं, किनारे खड़ी गाडि़यां भी आफत हैं. हर साल छोटी पड़ रही सड़कों पर 2-4 मिनट के लिए गाड़ी किनारे खड़ी करना ट्रैफिक जाम कर सकता है.

इसी तरह बैलगाड़ी की स्पीड बढ़ाना चलाने वाले के हाथ में नहीं, बैल के पैरों में है. लेकिन यही चलाने वाला लाइसैंस को किसी तरह हासिल कर के शहर में गाड़ी चलाने लगता है तो स्पीड का मजा आने लगता है. स्पीड अच्छी बात है क्योंकि तभी तो गाड़ी में ताकत है. पर क्या सड़क उस लायक है? जहां कोई साइकिल वाला या राहगीर बिना देखे सड़क पार करना पैदाइशी हक मानता हो वहां बैलगाड़ी से कोई नुकसान चाहे नहीं हो पर गाड़ी से वह जानलेवा हो सकता है.

34,000 करोड़ के चालान असल में गाडि़यों के लिए आफत हैं क्योंकि बहुत से मामलों में इन का भुगतान तब करना पड़ता है जब गाड़ी बेचनी हो. आज चालानों के तार जुड़े हैं और गाड़ी बेचते समय हजारों रुपए का बिल थमा दिया जाता है. गाड़ी मालिक को पता चलता है कि 10-10 साल पुराने चालान बकाया हैं जो देने पड़ेंगे. बहुत सी पुरानी गाडि़यों की कीमत से ज्यादा चालान ही होते हैं.

कमी उस सरकार में है जो न ड्राइवरों को ट्रेनिंग दे पाती है, न सड़कों को मैनेज कर सकती है. सड़कों के रखरखाव में चूक होने पर पुलिस और कौर्पोरेशनों पर भी उसी तरह चालान ठोंके जाने चाहिए जैसे ड्राइवरों और वाहनों पर थोपे जाते हैं. सड़क के किनारे दुकानों को छूट देने, सड़क में गड्ढे होने पर, सड़कों

पर सही निशान न होने के चालान पुलिस और सड़क अफसरों पर होने चाहिए.

अगर पुलिस और सड़क अफसरों के चालान भी चालानों में शामिल कर लिए जाएं तो लाखोंकरोड़ के हो जाएंगे क्योंकि देश की कोई 5 मील की सड़क ठीक नहीं है. ड्राइवर गलत हैं, माना, पर पुलिस और सड़कों के अफसर कौन से दूध के धुले हैं. Editorial

Success Story: रातोंरात अरबपति हुए 6 मजदूर

Success Story: कभीकभी कुछ ऐसी अनहोनी हो जाती है जो किसी इनसान की जिंदगी को बदल कर रख देती है. ब्राजील के कुछ मजदूरों के साथ भी कुछ ऐसी ही अनहोनी हुई है जिस ने 6 मजदूरों की जिंदगी को ऐसा बदला कि उन की 7 पीढि़यां नाम लेंगी.

यह कहानी 50 साल के मेनुएल नामक मजदूर और उस के 5 साथियों की है जो पहले एक खदान में एक ठेकेदार के यहां दिहाड़ी पर काम करते थे. उन का ठेकेदार उन्हें इतना कम पैसा देता था जिस से उन के परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था. सो, मेनुएल ने उस ठेकेदार का काम छोड़ने का फैसला किया लेकिन दूसरी जगह काम मिलना आसान न था.

मेनुअल कई जगह भटका लेकिन उसे कहीं काम न मिला, तो उस ने एक पुरानी बंद पड़ी खदान में हाथ आजमाने की सोची कि शायद वहां से कुछ मिल जाए.

मेनुएल अकेला ही उस खदान में खुदाई करने लगा. 10 दिनों की मेहनत के बाद भी मेनुएल को वहां से कुछ खास नहीं मिला. लेकिन उसे खुद पर पूरा भरोसा था और वह इस पुरानी खदान में 23 साल काम भी कर चुका था.

लेकिन मेनुएल अकेला यहां से कुछ भी हासिल नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने कुछ साथियों को उस खदान में काम करने की बात बताई तो सभी ने उस का मजाक उड़ाया. लेकिन 5 लोग ऐसे लोग थे जिन्हें मेनुएल पर पूरा भरोसा था, इसलिए वे मेनुएल के साथ उस पुरानी खदान में काम करने को तैयार हो गए.

मेनुएल और उस के साथी लगातार 3 महीने तक उस खदान में काम करते रहे लेकिन उन्हें कुछ हाथ न लगा. एक दिन वे मन बना कर आए थे कि आज आखिरी बार काम करने के बाद वे फिर कभी यहां नहीं आएंगे और उसी दिन उन्हें वह चीज हाथ लग गई जिस ने उन्हें एक ही झटके में मजदूर से महाराजा बना दिया. खुदाई के दौरान उन्हें एक ऐसी चीज मिली जिस के जरीए वे अरबपति बन गए.

इस खुदाई में इन मजदूरों को एक चट्टान का टुकड़ा मिला जिस पर कई पन्ने लगे थे और इस चट्टान की कीमत वर्तमान में 19 अरब, 35 करोड़ रुपए से भी ज्यादा है. आज तक जितनी भी खदानों से पन्ने मिले हैं, उन में यह सब से बड़ा है. इस का वजन तकरीबन 360 किलोग्राम है.

इस चट्टान के टुकड़े के चलते अब इन सभी मजदूरों की जान को खतरा आ पड़ा है, क्योंकि वर्तमान में ब्राजील में अपराध और अपराधियों का काफी बोलबाला है. वैसे, ब्राजील सरकार ने इन मजदूरों की सुरक्षा की गारंटी ली है. साथ ही, इस कीमती खनिज को अपने कंट्रोल में रखा है.

बहिया नामक यह क्षेत्र, जहां से यह पन्ना रत्न जड़ी चट्टान निकली है, की यह खदान कीमती रत्न निकलने के चलते मशहूर थी, लेकिन इसे साल 2006 में ब्राजील सरकार ने बंद कर दिया था. Success Story

Health Problems: गांवों को बीमार करता फास्ट फूड

Health Problems: उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के कुंदरकी थाना क्षेत्र के शेखपुरा गांव में हर साल की तरह इस साल भी फूलडोल मेला लगा. इस में शेखपुरा के अलावा आसपास के और भी कई गांवों वालों ने जम कर चाटपकौड़ी और फास्ट फूड का स्वाद लिया. पर इसी बीच कई लोगों की तबीयत खराब होने लगी.

गांव वालों के मुताबिक, फूड पौइजनिंग के चलते 100 से ज्यादा लोगों में उलटीदस्त और तेज बुखार की शिकायत देखी गई. सब का अस्पताल में इलाज चला.

ऐसा नहीं है कि फूड पौइजनिंग की यह कोई पहली घटना है, पर एक बात जरूर देखी गई है कि हाल के कुछ सालों में शहरों की तरह गांवदेहात में भी फास्ट फूड घुस चुका है. आप को स्कूलकालेज के बाहर सड़क किनारे और भीतर कैंटीन में भी चाऊमीन, मोमो, बर्गर, स्प्रिंग रोल्स जैसी खाने की तलीभुनी चीजों की भरमार दिख जाएगी.

जैसा कि नाम से ही जाहिर है, फास्ट फूड एक ऐसा भोजन है, जो जल्दी तैयार होता है. इस में आमतौर पर नमक, चीनी और वसा की मात्रा ज्यादा होती है, जबकि फाइबर, विटामिन और खनिज जैसे पोषक तत्त्व कम होते हैं.

अगर कम उम्र से ही इसे खाने की आदत पड़ जाए तो बच्चों और नौजवानों में भी मोटापा, दिल से जुड़ी बीमारियों और डायबिटीज के लक्षण दिखने लगते हैं, जो समय के साथसाथ घातक होते जाते हैं.

ऐसा नहीं है कि गांवदेहात में पहले तलीभुनी या ज्यादा चीनी और मैदा की बनी चीजों का सेवन नहीं किया जाता है. तकरीबन हर गांव के आसपास एक छोटे हलवाई की दुकान दिख ही जाती है, जिस में पकौड़ा, समोसा और मिठाई न बनती हो. पर हलवाई को अपना काम करने का सलीका आता है.

हलवाई को पता होता है कि मावा बनाने के लिए दूध कितना काढ़ना है, मिठाई में चीनी कितनी डालनी है और चूंकि सारा सामान उस की दुकान पर बनता है तो खरीदार को भरोसा होता है कि जो सामान वह खरीद रहा है, वह इतना घटिया क्वालिटी का नहीं होगा और ढंग से बनाया हुआ है.

इस के उलट ठेले पर फास्ट फूड बेचने वाले को बर्गर बनाने का सही तरीका आता हो, यह जरूरी नहीं. बहुत बार तो उसे यह भी नहीं पता होता है कि उस में सामान क्या डला है और वह कितना बासी है.

यही वजह है कि यहां बिकने वाले चाऊमीन, मंचूरियन, मोमो और स्प्रिंग रोल्स जैसे फास्ट फूड में खराब सब्जियों का जम कर इस्तेमाल हो रहा है. ग्राहक को इस बात का अंदाजा तक नहीं होता, क्योंकि मसालों और सौस के स्वाद से यह गंध और खराबी छिप जाती है.

ठेले पर चाऊमीन बनाने वाले बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते हैं कि वे जिन नूडल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे कितने दिन पुराने हैं. उन में नमक, सौस, सिरका कितनी मात्रा में डालना है, यह भी उन्हें जानकारी नहीं होती है.

चूंकि ठेले वगैरह पर बिकने वाला फास्ट फूड सस्ता होता है और जल्दी मिल जाता है, तो ग्राहक ज्यादा मीनमेख नहीं निकालता है, पर वह भूल जाता है कि यह उस की सेहत से सरेआम खिलवाड़ है.

फास्ट फूड के ज्यादा सेवन से लिवर में सूजन, गैस की शिकायत, छाती में जलन, छाले, पथरी वगैरह बीमारियां धीरेधीरे जन्म लेने लगती हैं.

हाल की एक स्टडी में पाया गया है कि नौजवानों में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इस के एक प्रमुख कारक के रूप में फास्ट फूड के रोल पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.

फास्ट फूड से नर्वस सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ता है. इस से दिमाग की काम करने की ताकत कम होने से याददाश्त भी कमजोर होती है. सिरदर्द और डिप्रैशन की समस्या बढ़ सकती है.

सब से बड़ी कमी यह है कि गांवदेहात के बच्चे और नौजवान भी अब शारीरिक कामों से दूर रहने लगे हैं. उन के खेत में मजदूर होते हैं और घर के सारे काम बिजली की मदद से पूरे कर दिए जाते हैं. रोजाना कसरत न करने से भी वे मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं. इस पर फास्ट फूड का कहर उन्हें बीमारियों का घर बना देता है, जो बेहद चिंता की बात है. Health Problems

Sexual Health: माहवारी – अपने कोडवर्ड में बताएं हमदर्द को

Sexual Health: तकरीबन 12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक महिलाओं को माहवारी से सामना करना पड़ता है. ऐसे में देशदुनिया में महावारी बताने के कई दिलचस्प ‘कोडवर्ड’ बना दिए गए हैं.

जापान के झंडे को ‘निशोकी’ कहते हैं, जिस का मतलब है ‘सूरज का झंडा’. इसे आमतौर पर ‘हिनोमारू’ भी कहा जाता है यानी ‘सूरज का घेरा’. यह झंडा सफेद बैकग्राउंड पर एक लाल गोले (सूरज का प्रतीक) के साथ बनाया गया है.

पर जब इंगलिश में कहा जाता है कि ‘जापान इज अटैकिंग’ तो यह कोई असल में जापान द्वारा किया गया हमला नहीं है, बल्कि उन लड़कियों या औरतों का कोडवर्ड होता है, जिन्हें माहवारी आई होती है.

यहां पर भी जापान के झंडे को ही सिंबल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, सफेद रंग पर लाल रंग का चढ़ना. मतलब अगर कोई लड़की बोल रही है कि ‘जापान इज अटैकिंग’, तो सुनने वाली समझ जाए कि उसे माहवारी आई है.

किसी लड़की को माहवारी आने का मतलब है कि वह मां बनने की काबिलीयत रखती है और अमूमन 12 साल की उम्र में हर लड़की को पहली माहवारी आ जानी चाहिए. कभीकभार यह उम्र 1-2 साल ऊपरनीचे हो सकती है.

माहवारी है क्या

माहवारी किसी महिला को कुदरत का सब से अनमोल तोहफा है. इसे ‘मासिक धर्म’ या ‘महीना आना’ भी कहते हैं. माहवारी में महिला के शरीर से गंदा खून और ऊतक बाहर निकलते हैं, जिस से महिला का शरीर गर्भधारण करने के लिए तैयार हो जाता है. ऐसा अमूमन महीने में 4-5 दिन होता है और यह चक्र 11-12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक जारी रहता है.

पर भारत जैसे देश में माहवारी को हौआ बना कर रखा गया है. धर्म की जंजीरों में कुदरत की इस नायाब चीज को जकड़ कर रख दिया गया है.

एक सर्वे में सामने आया है कि आज भी 81 फीसदी लड़कियों को पता ही नहीं होता है कि उन्हें जब पहली बार माहवारी आए, तो उसे कैसे हैंडल करना है. उन की मां तक उन्हें इस की जानकारी देने में झिझकती है, क्योंकि उसे खुद अपने समय में अधकचरा ज्ञान दिया गया था. वह खुद इन दिनों में ‘अपवित्र’ हो जाती थी, तो बेटी को किस मुंह से बताए कि वह जिंदगी के ऐसे पड़ाव पर आ गई है, जहां से मां बनने का सुख भोगा जा सकता है.

पर जानकारी तो देनी ही होगी. यह लड़की को किसी सहेली से मिले या बड़ी बहन से या फिर महल्ले की किसी दीदी या फिर आंटी से, उसे अपने आंखकान खुले रखने होंगे.

सब से पहले तो लड़की को अपने शरीर में होने वाले बदलावों को समझना चाहिए. इन हालात में लड़की को अचानक शरीर में मरोड़ सी उठने लगती है. नाजुक अंगों पर बाल आने शुरू हो जाते हैं. आवाज में बदलाव महसूस होता है. चेहरे पर मुंहासे की शुरुआत होने लगती है. छाती में दर्द होता है. लंबाई बढ़ती है.

माहवारी के कोडवर्ड

अगर लड़की को माहवारी की जानकारी मिल भी जाती है, तो इन खास दिनों में उसे कुछ सावधानियां भी बरतनी चाहिए. उस में माहवारी में पैड लगाने और साथ रखने की जागरूकता होनी चाहिए, पर कभीकभार उन्हें जब इस के बारे में आपस में बात करनी होती है, तो बहुत सी लड़कियां कुछ खास शब्दों में बात करती हैं, ताकि सिर्फ उन्हें ही समझ आए, जैसे ‘जापान इज अटैकिंग’.

भारत में लड़कियां माहवारी को ‘पीरियड्स’, ‘मूड स्विंग्स’, ‘एमसी’, ‘महीना’, ‘खास दिन’ कह देती हैं. पर बहुत से देशों में माहवारी को अलगअलग कोडवर्ड में जाहिर किया जाता है, जैसे ‘नियाग्रा इज ब्लीडिंग’, ‘शार्क वीक’, ‘आंटी फ्लो’, ‘इट्स माई टाइम औफ द मंथ’, ‘इट्स माई मून टाइम’, ‘माई रैड वैडिंग’, ‘ब्लडी मैरी’, ‘कोड रैड’ वगैरह. Sexual Health

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