Cricket News: खेल पर भारी रहा बेतुका विवाद

Cricket News: क्रिकेट के एशिया कप की शुरुआत इसलिए हुई थी कि एशिया में क्रिकेट खेलने वाली टीमों को एकदूसरे के साथ भिड़ने का मौका मिले और वे मजबूत बनें. वैसे भी कोई भी खेल इसीलिए खेला जाता है कि खिलाडि़यों में खेल भावना पनपे और वे हरजीत से ऊपर उठ कर खेल परंपरा को आगे बढ़ाएं.

पर इस बार क्रिकेट के एशिया कप, 2025 में भारतपाकिस्तान का आपसी विवाद पूरे टूर्नामैंट पर भारी पड़ गया. दूसरी टीमों का जैसे कोई वजूद ही नहीं था. ऐसा लग रहा था कि खेल का मैदान लड़ाई का मैदान बन गया है. हाल ही में भारतपाकिस्तान की सरहद पर हुई झड़प खेल के मैदान पर भी अपना गलत असर दिखाती नजर आई.

28 सितंबर, 2025 को भारत और पाकिस्तान के बीच यूएई में फाइनल मुकाबला हुआ और भारत ने इस रोमांचक मैच को 5 विकेट से जीत भी लिया, पर इन दोनों देशों के बीच खेले गए 3 मैचों में खिलाड़ी गेंदबल्ले से ज्यादा अपनी जबान और इशारों से एकदूसरे से जू झते नजर आए.

फाइनल मुकाबला जीतने के बाद तो विवाद और ज्यादा गहरा गया था. रात को 12 बजे भारत की जीत के बाद प्रैजेंटेशन सैरेमनी तकरीबन सवा घंटे देरी से शुरू हुई, क्योंकि भारतीय टीम ने एशियाई क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष मोहसिन नकवी से एशिया कप ट्रौफी लेने से साफ इनकार कर दिया था. इस से पहले पाकिस्तान टीम के साथ भी हाथ नहीं मिलाया था. मोहसिन नकवी पुरस्कार वितरण समारोह शुरू होने से पहले एक तरफ खड़े थे और भारतीय खिलाड़ी 15 गज के भीतर खड़े थे. उन्होंने अपनी जगहों से हटने से इनकार कर दिया और समारोह में देरी होती गई.

भारतीय टीम मैनेजमैंट ने पहले ही तय कर लिया था कि खिलाड़ी मोहसिन नकवी से ट्रौफी नहीं लेंगे. मोहसिन नकवी जैसे ही स्टेज पर आए तो दर्शकों की ओर से भारतीय फैंस ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने शुरू कर दिए.

इतना ही नहीं, मोहसिन नकवी जैसे ही स्टेज पर आए, उन्हें बताया गया कि भारतीय टीम उन से ट्रौफी नहीं लेगी और वे जबरदस्ती करेंगे तो आधिकारिक विरोध दर्ज किया जाएगा.

मोहसिन नकवी इंतजार करते रहे और अचानक आयोजकों में से कोई ट्रौफी ड्रैसिंग रूम के भीतर ले गया.

मैच खत्म होने के बाद पाकिस्तानी टीम एक घंटे बाद तक ड्रैसिंग रूम से बाहर नहीं आई. सिर्फ पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन नकवी अकेले खड़े हो कर शर्मिंदगी झेलते रहे.

तकरीबन 55 मिनट बाद जब पाकिस्तानी टीम बाहर आई, तो दर्शकों ने ‘इंडिया इंडिया’ के नारे लगाए. भारत के ट्रौफी लेने से इनकार के बाद एसीसी हैड मोहसिन नकवी एशिया कप की ट्रौफी अपने साथ ले कर चलते बने.

चैंपियन बनने के बाद भारतीय टीम को ट्रौफी न मिलने से बीसीसीआई काफी नाराज दिखी और कहा गया कि नवंबर में होने वाली अगली आईसीसी मीटिंग में मोहसिन नकवी के खिलाफ नाराजगी जताई जाएगी.

बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने टीम के इनकार को सही ठहराते हुए कहा कि ऐसे किसी शख्स से भारतीय टीम ट्रौफी नहीं ले सकती जिस के देश ने हमारे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ रहा हो. याद रहे कि मोहसिन नकवी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष होने के साथसाथ अपने देश के गृह मंत्री भी हैं.

एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष और पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से ट्रौफी लेने से इनकार के बाद भारतीय टीम को एशिया कप नहीं दिए जाने पर कप्तान सूर्यकुमार यादव ने कहा, ‘मैं ने ऐसा पहले कभी नहीं देखा कि विजयी टीम को ट्रौफी नहीं दी गई हो. लेकिन मेरे लिए मेरे खिलाड़ी और सहयोगी स्टाफ ही असली ट्रौफी है.’ Cricket News

Exclusive Interview: खिलाड़ी की बायोपिक करना चाहती हूं – सिमरत कौर

Exclusive Interview: साल 2017 में आई एक तेलुगु फिल्म ‘प्रेमथो मी कार्तिक परिचयम’ से अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत करने वाली सिमरत कौर पंजाबी हैं और उन की परवरिश मुंबई में हुई है.

तेलुगु में 4 फिल्में करने के बाद उन्हें साल 2023 में अनिल शर्मा के डायरैक्शन में बनी हिंदी फिल्म ‘गदर 2’ में मुसकान का किरदार निभाने का मौका मिला था.

साल 2024 में वे अनिल शर्मा की ही फिल्म ‘वनवास’ में नजर आई थीं और अब वे विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में भारती बनर्जी के किरदार में दिखाई दी हैं.

पेश हैं, सिमरत कौर से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

आप अपने अब तक के फिल्म सफर को ले कर क्या कहना चाहेंगी?

मेरी परवरिश मुंबई में हुई है और मैं ने कंप्यूटर से बीएससी किया है. मैं कराटे में ब्लैक बैल्ट हूं और गोल्ड मैडलिस्ट भी हूं. सच कहूं तो मैं मन से एक खिलाड़ी हूं और अचानक न चाहते हुए भी ग्लमैर वर्ल्ड यानी ऐक्टिंग जगत में आ गई हूं.

मैं अब तक 4 तेलुगु और 3 हिंदी फिल्में कर चुकी हूं. बीच में कोविड काल के चलते मेरे कैरियर की रफ्तार धीमी रही थी, पर पिछले 2 साल के अंदर मेरी 3 हिंदी फिल्में रिलीज हुई हैं और तीनों फिल्मों को दर्शकों ने अपना प्यार दिया है. ये तीनों फिल्में मैं ने बड़े कलाकारों के साथ की हैं.

आप के कराटे सीखने के पीछे मूल वजह क्या थी?

मैं ने 7 साल की उम्र से कराटे सीखना शुरू किया था. उस वक्त मुझे ज्यादा समझ नहीं थी, पर मां ने कहा तो सीखना पड़ा. 11 साल की उम्र में मैं ने नेपाल जा कर पहली बार कराटे प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. इस प्रतियोगिता में भारत से 23 बच्चे गए थे. हम वहां से ब्रौंज मैडल जीत कर आए थे. मैं भारत की एकमात्र लड़की थी, जो जीत कर आई थी, बाकी 22 बच्चे हार गए थे.

मुझे लगता है कि कराटे सीखने पर आप को अपने शरीर पर कंट्रोल करना आ जाता है. गुस्सा आने पर आप उस पर काबू कर सकते हैं. अपने जज्बात पर कंट्रोल कर सकते है. जिंदगी में अनुशासन आ जाता है. इसी के साथ कराटे से आप अपनी हिफाजत कर सकते हैं. वैसे, मैं ने तो कत्थक डांस भी सीखा है.

आप को कत्थक डांस की क्या उपयोगिता नजर आई?

कत्थक डांस सीखने से चाल में एक लचक आ जाती है, जो हर लड़की में होनी चाहिए. मैं ने अब तक जिस दौर के किरदार निभाए हैं, उस दौर की लड़कियों में यह खूबी कुदरती थी.

फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ के अपने किरदार को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

मैं ने इस फिल्म में यंग भारती का किरदार निभाया है, जबकि पल्लवी जोशी ने मां भारती का किरदार निभाया है. इस तरह का किरदार निभाना आसान नहीं था. भारती के किरदार की शुरुआत ही गर्वनर को गोली मारने से होती है. मुझे असली बंदूक पकड़ाई गई थी, जिस में ब्लैंक बुलेट थी यानी खाली बुलेट, जिस में से आवाज तो पूरी आती है, पर बुलेट निकलती नहीं है.

मैं ठहरी पंजाबी, जबकि भारती बनर्जी तो बंगाली है. तो मुझे भाषा से ले कर रहनसहन, चालढाल, पहनावे पर काम करना पड़ा. मुझे सीखना पड़ा कि बंगाल की लड़कियां किस तरह से साड़ी पहनती हैं.

इस फिल्म में आप का भारती बनर्जी का किरदार कहीं न कहीं बंगाल के एक रियल किरदार से प्रेरित है, जिस ने साल 1936 में गर्वनर को गोली मार दी थी. इस पर आप क्या कहेंगी?

माफ कीजिए, पर यह फिल्म उस लड़की की बायोपिक नहीं है. भारती का किरदार उस लड़की से थोड़ा सा प्रेरित मात्र है. फिल्म के डायरैक्टर विवेक अग्निहोत्री सर ने कहा था कि यह लड़की क्रांतिकारी है और भगत सिंह के विचारों पर यकीन करती है.

अब भगत सिंह के बारे में तो हम सभी जानते ही हैं. मैं ने तो उन पर बनी हुई फिल्में भी देखी हैं. डायरैक्टर ने मुझे बताया था कि भारती के किरदार की शुरुआत भगत सिंह की तरह होगी, जो क्रांतिकारी है, इसलिए वह गर्वनर को गोली मारने से पहले सोचेगी नहीं. मुझे बताया गया था कि भारती पहले भगत सिंह की तरह क्रांति करेगी, उस के बाद वह गांधीजी के रास्ते पर चलेगी.

क्या आप को लगता है कि फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में जोकुछ भी दिखाया है, वह सब सच है?

इतिहास तो वह है, जो घट चुका है. हर किसी ने अपनेअपने हिसाब से इतिहास में चीजें डाल दी हैं, इसलिए इतिहास में जोकुछ दर्ज है, उस के सच या झूठ होने की गारंटी देना मुश्किल है.

आज अगर मैं इंस्टाग्राम पर डाल दूं कि फलां इनसान हमारा भगवान है, तो सौ साल बाद लोग उसे भगवान मानने लगेंगे, क्योंकि उस वक्त हम तो सच बताने के लिए रहेंगे नहीं… लिहाजा, सही या गलत मैं नहीं बता सकती. किसी के लिए कुछ सही है और किसी के लिए कुछ और सही है. एक कलाकार के तौर पर मेरा फर्ज बनता है कि मैं स्क्रिप्ट के मुताबिक अपने काम को अंजाम दूं. मुझे कुछ चीजें नहीं पता थीं, जो कि अब पता चली हैं. पर वे कितनी सच हैं, उस का दावा कम से कम मैं तो नही कर सकती. मैं ही क्यों गूगल या कोई भी इनसान नहीं बता सकता, इसलिए पूरा सच आप कभी नहीं जान सकते.

भविष्य में आप किस तरह के किरदार निभाना चाहती हैं?

मैं एक खिलाड़ी का किरदार निभाना चाहती हूं, क्योंकि मैं ने कराटे चैंपियनशिप में भाग लिया है. मैं किसी बायोपिक में दमदार किरदार निभाना पसंद करूंगी. Exclusive Interview

Bollywood Updates: डिंपल पर लगे गंभीर आरोप

Bollywood Updates: डिंपल हयाती तेलुगु सिनेमा की हीरोइन हैं. वे ‘अतरंगी रे’, ‘खिलाड़ी’, ‘वीरमे वागई सूदम’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी हैं. उन्होंने 2017 में फिल्म ‘गल्फ’ से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत की थी, पर फिलहाल उन की नौकरानी ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

नौकरानी प्रियंका बिबर के मुताबिक, डिंपल हयाती और उन के पति ने मिल कर उस का निर्वस्त्र वीडियो बनाने की कोशिश की और उस के साथ मारपीट भी की. न तो उसे भरपेट खाना दिया जाता है और न ही अच्छे से बरताव किया जाता है. कपल उस से भरभर कर काम कराता है और उस के साथ कुत्तों की तरह बरताव करता है.

हैदराबाद के फिल्मनगर पुलिस स्टेशन ने इस सिलसिले में मामला दर्ज किया है.

रश्मिका मंदाना ने की गुपचुप सगाई

फिल्म ‘पुष्पा’ की हीरोइन रश्मिका मंदाना अब रणबीर कपूर की फिल्म ‘रामायण’ में सीता के किरदार में दिखाई देंगी. लेकिन हाल ही में निजी जिंदगी में उन्होंने किसी हैंडसम हीरो से अपनी उंगली में सगाई की अंगूठी पहन ली है, वह भी बड़े गुपचुप तरीके से.

सूत्रों की मानें तो साउथ फिल्मों के स्टार हीरो विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना ने सगाई कर ली है. यह सगाई उन दोनों के बेहद करीबी लोगों की मौजूदगी में हुई. सबकुछ सही रहा तो वे दोनों अगले साल फरवरी महीने में शादी के बंधन में बंध जाएंगे.

फरहान अख्तर के साथ धोखाधड़ी

हिंदी फिल्म ऐक्टर, डायरैक्टर, सिंगर… और भी न जाने क्याक्या, फरहान अख्तर को उन के किसी करीबी ने लाखों रुपए का चूना लगा दिया है.

दरअसल, हुआ यह कि फरहान अख्तर के घर में काम कर रहे एक ड्राइवर ने उन के साथ पैसों की घपलेबाजी की. बांद्रा पुलिस ने बताया कि फरहान अख्तर की मां हनी ईरानी की मैनेजर दीया भाटिया ने शिकायत दर्ज कराई और बताया कि उस ड्राइवर और पैट्रोल पंप के एक मुलाजिम ने मिल कर पैसों की घपलेबाजी की है और अब तक वे 12 लाख रुपए की धोखाधड़ी कर चुके हैं.

वह ड्राइवर हनी ईरानी की गाड़ियों में पैट्रोल भरवाने के बहाने पैट्रोल पंप जाता और फरहान अख्तर का कार्ड स्वाइप करता था, लेकिन गाड़ी में पैट्रोल भरवाता ही नहीं था. इस के एवज में वह पैट्रोल पंप पर मौजूद उस शख्स को भी उस का हिस्सा देता था.

मुंबई पुलिस ने आरोपी ड्राइवर नरेश रामविनोद सिंह और पैट्रोल पंप के स्टाफ अमर बहादुर सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

ट्विंकल खन्ना का खुलासा

आजकल काजोल और ट्विंकल खन्ना अपने टौक शो ‘टू मच विद काजोल ऐंड ट्विंकल’ में कई सनसनीखेज बातों का खुलासा कर रही हैं खासकर ट्विंकल खन्ना तो अपने बारे में उड़ाई गई अफवाहों का मानो पिटारा ले कर बैठ गई हैं.

हाल ही में अपने गैस्ट वरुण धवन और आलिया भट्ट के सामने एक ऐपिसोड में ट्विंकल खन्ना ने बताया कि किस तरह एक बार ऋषि कपूर द्वारा भेजी गई जन्मदिन की शुभकामनाओं ने उन्हें ‘कपूर खानदान की नाजायज औलाद’ तक बना डाला था.

ट्विंकल खन्ना ने मुसकराते हुए बताया था, ‘‘आलिया के ससुर की वजह से मैं लगभग कपूर बन ही गई थी. एक बार उन्होंने मेरे बर्थडे पर ट्वीट किया कि अरे, पता है, जब तुम अपनी मां (डिंपल कपाड़िया) के पेट में थीं, तब मैं ने उन के लिए गाना गाया था. बस, फिर क्या था. सब को लगा कि मैं उन की नाजायज बेटी हूं. ’’ Bollywood Updates 

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Funny Story In Hindi: साहबजी के श्री चरनन में

Funny Story In Hindi: आदरणीय… परमादरणीय सब से बड़े साहबजी, जयहिंद.

जैसे कि आप को पता ही है कि हम 4 चपरासी पिछले 15 सालों से आप के दफ्तर के दरवाजे पर बैठ कर आप के लिए काम करवाने आने वालों से आप के कहे मुताबिक रेट वसूलते रहे हैं. हम से रेट वसूलवाते हुए पता नहीं आप जैसे कितने बड़े साहब आए और आ कर चले गए, पर हम वहीं के वहीं रहे साहबजी.

हे सब से बड़े साहबजी, हमारे द्वारा वसूला गया रेट ऊपर तक जाता है, जैसा कि हमें बताया गया है. इस में हमें कोई एतराज भी नहीं कि हमारे द्वारा जनता से वसूला गया रेट कहां जाता है? जहां जाता हो, वहां जाता रहे. अपना काम तो बस, काम करवाने आयों से आप के द्वारा तय रेट वसूलने के बाद ही उसे दफ्तर में दाखिल होने की इजाजत देना है और इस काम को पिछले 15 सालों से हम पूरी ईमानदारी से निभाते भी आ रहे हैं.

हम ने बिन रेट लिए आप के दफ्तर में आज तक किसी को घुसने नहीं दिया, चाहे वह यमराज ही क्यों न हो. लेकिन हमारी इस ईमानदारी के बाद भी हम वहीं के वहीं बैठे हैं, पर उसी आप के दफ्तर के बाहर वाले स्टूल पर और हम से काम करवाने वाले पता नहीं कहां से कहां पहुंच गए.

कसम बीवीबच्चों की बड़े साहबजी, जो हम ने आज तक जनता से वसूले गए पैसों में से एक पैसा भी अपनी जेब में रखा हो. हम आप के दफ्तर के वे ईमानदार मुलाजिम हैं, जो छोटे बाबू की हथेली में 5 बजने के तुरंत बाद पूरी ईमानदारी से पाईपाई जमा करवाते रहे हैं. हम आप के दफ्तर के सींसियर बंदे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से आसानी से लगाया जा सकता है बड़े साहबजी.

बड़े साहबजी, हमें इस बात का बिलकुल दुख नहीं है कि हम गलत काम करते हैं. वैसे भी सही काम यहां कौन कर रहा है? सभी तो अपनेअपने हिसाब से जनता को खा ही रहे हैं. पैसे ले कर भी उसे उस की फाइलों पर नचा ही रहे हैं. हर दफ्तर में जनता होती ही खाने को है, नचाने को है.

बड़े साहबजी, हम चाहते तो नहीं थे कि आप से गुहार लगाएं, आप को वसूले गए धन में से अपने हिस्से का दर्द सुनाएं, पर क्या करें बड़े साहबजी, अब पानी सिर से ऊपर हो रहा है, इसलिए हम आप से गुहार लगाते हैं कि जितना आप के कहने से हम काम करवाने आने वालों से वसूलते हैं, हमें अभी भी उस में से उतना ही कमीशन मिल रहा है, जितना 15 साल पहले मिला करता था.

आप ने अपने दफ्तर में काम करवाने आने वालों के रेट में तो कमरतोड़ इजाफा कर दिया है, पर हमें आप के लिए पैसे इकट्ठे करने में से 15 साल पहले वाला रेट ही मिल रहा है. उस में से भी 2 परसैंट छोटे बाबू मार जाते हैं.

बुरा मत मानना बड़े साहबजी, पर आप की वजह से जनता की सीधी गालियां कौन सुनता है? हम सुनते हैं साहबजी… हम. जनता से पैसे वसूलने के लिए बदनाम कौन होता है? आप? नहीं बड़े साहबजी, हम होते हैं… हम.

बड़े साहबजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे गालियां सुनने से नीचे से ऊपर तक पता नहीं कितनों की जेबें भरती हैं. पता नहीं आप को पता हो या न हो, पर अब वसूली के इस कमीशन में अपना गुजारा होना बहुत मुश्किल हो गया है बड़े साहबजी, इसलिए आप से सादर निवेदन है कि आप सब के लिए इकट्ठे किए गए पैसों में से हमारा कमीशन भी समय के साथ बढ़ाएं.

ऐसा नहीं है कि अपनी मजबूरी हम ने आज तक किसी से न कही हो. इस बारे हम ने म झले बाबू से कई बार गुहार लगाई, उन के आगे हाथ जोड़े, पर उन्होंने हर बार हमें हड़का कर टाल दिया कि जब तक उन्होंने जो फ्लैट खरीदा है, उस की किस्तें पूरी नहीं हो जातीं, उन का बेटा कौन्वैंट स्कूल से जैंटलमैन बन
कर निकल नहीं जाता, तब तक हमारे कमीशन में कोई इजाफा नहीं किया जा सकता. वे खुद इन दिनों केवल हमारे द्वारा वसूले गए पैसों के हिस्से से रोतेबिलखते पल रहे हैं.

बड़े साहबजी, हमारा पिछले 15 बरसों से कमीशन के तौर पर शोषण हो रहा है. जितना हमें आप के द्वारा कमीशन मिलता है, जनता में हम उस से कहीं ज्यादा बदनाम हो रहे हैं. महल्ले वाले सोचते हैं कि हमारे पास पता नहीं कितनी दौलत है, पर वे यह नहीं जानते कि हमारे द्वारा इकट्ठी की गई दौलत जाती कहांकहां है.

आप से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि आप काम करवाने आने वालों से जो हम से इकट्ठा करवाते हैं, उस में से जो हमें कमीशन के नाम पर देते हैं, उस की परसैंटेज बढ़ाई जाए. पुराने रेट में जनता से पैसा वसूलने में अब हमें बहुत शर्म आने लगी है.

आप को तो आटेदाल के भाव क्या ही पता होंगे बड़े साहबजी, क्यों पता होंगे बड़े साहबजी, आप को यही बता दें कि बाजार में जो आटा पहले 10 रुपए किलो मिलता था, अब वह 40 रुपए किलो हो गया है और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दाल पहले 50 रुपए किलो मिलती थी, अब वह 100 रुपए किलो भी नहीं मिल रही और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दूध पहले 20 रुपए लिटर मिलता था, अब वह 50 रुपए लिटर भी नहीं मिल रहा और जनता से पैसा वसूलने पर हमरा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला. आलूप्याज, सब्जियों के रेट तो आप से क्या ही डिसक्स करें…

बड़े साहबजी से निवेदन है कि परमानैंट सरकारी कमीशन एजेंट होने के नाते हमारे कमीशन में बैक डेट से दोगुना बढ़ोतरी की जाए. हो सके तो इस बीच जो हमारा बकाया बनता है, वह भी हमें एरियर के तौर पर एकमुश्त जारी किया जाए, ताकि हम अपने परिवार के साथ उठनेबैठने लायक बनें.

हम हैं आप के दफ्तर के दरवाजे पर सुबह के 9 बजे से ले कर शाम के 6 बजे तक बिना हिलेडुले जनता से पैसे वसूलने, जनता से 200-400 रुपल्ली लेने के बदले हजारहजार की गालियां सुनने वाले 4 कमीशनिया चपरासी. Funny Story In Hindi

Hindi Romantic Story: प्यार का धागा – कैसे धारावी की डौल बन गई डौली

Hindi Romantic Story: सांझ ढलते ही थिरकने लगते थे उस के कदम. मचने लगता था शोर, ‘डौली… डौली… डौली…’

उस के एकएक ठुमके पर बरसने लगते थे नोट. फिर गड़ जाती थीं सब की ललचाई नजरें उस के मचलते अंगों पर. लोग उसे चारों ओर घेर कर अपने अंदर का उबाल जाहिर करते थे.

…और 7 साल बाद वह फिर दिख गई. मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट. सोचा था कि जब अगली बार मुलाकात होगी, तो वह जरूर मराठी धोती पहने होगी और बालों का जूड़ा बांध कर उन में लगा दिए होंगे चमेली के फूल या पहले की तरह जींसटीशर्ट में, मेरी राह ताकती, उतनी ही हसीन… उतनी ही कमसिन…

लेकिन आज नजारा बदला हुआ था. यह क्या… मेरे बचपन की डौल यहां आ कर डौली बन गई थी.

लकड़ी की मेज, जिस पर जरमन फूलदान में रंगबिरंगे डैने सजे हुए थे, से सटे हुए गद्देदार सोफे पर हम बैठे

हुए थे. अचानक मेरी नजरें उस पर ठहर गई थीं.

वह मेरी उम्र की थी. बचपन में मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे अपने साथ स्कूल ले कर जाती थी. उन दिनों मेरा परिवार एशिया की सब से बड़ी झोपड़पट्टी में शुमार धारावी इलाके में रहता था. हम ने वहां की तंग गलियों में बचपन बिताया था.

वह मराठी परिवार से थी और मैं राजस्थानी ब्राह्मण परिवार का. उस के पिता आटोरिकशा चलाते थे और उस की मां रेलवे स्टेशन पर अंकुरित अनाज बेचती थी.

हर शुक्रवार को उस के घर में मछली बनती थी, इसलिए मेरी माताजी मुझे उस दिन उस के घर नहीं जाने देती थीं.

बड़ीबड़ी गगनचुंबी इमारतों के बीच धारावी की झोपड़पट्टी में गुजरे लमहे आज भी मुझे याद आते हैं. उगते हुए सूरज की रोशनी पहले बड़ीबड़ी इमारतों में पहुंचती थी, फिर धारावी के बाशिंदों के पास.

धारावी की झोपड़पट्टी को ‘खोली’ के नाम से जाना जाता है. उन खोलियों की छतें टिन की चादरों से ढकी रहती हैं.

जब कभी वह मेरे घर आती, तो वापस अपने घर जाने का नाम ही नहीं लेती थी. वह अकसर मेरी माताजी के साथ रसोईघर में काम करने बैठ जाती थी.

काम भी क्या… छीलतेछीलते आधा किलो मटर तो वह खुद खा जाती थी. माताजी को वह मेरे लिए बहुत पसंद थी, इसलिए वे उस से बहुत स्नेह रखती थीं.

हम कल्याण के बिड़ला कालेज में थर्ड ईयर तक साथ पढे़ थे. हम ने लोकल ट्रेनों में खूब धक्के खाए थे. कभीकभार हम कालेज से बंक मार कर खंडाला तक घूम आते थे. हर शुक्रवार को सिनेमाघर जाना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था.

इसी बीच उस की मां की मौत हो गई. कुछ दिनों बाद उस के पिता उस के लिए एक नई मां ले आए थे.

ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं और पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चला गया था. कई दिनों तक उस के बगैर मेरा मन नहीं लगा था.

जैसेतैसे 7 साल निकल गए. एक दिन माताजी की चिट्ठी आई. उन्होंने बताया कि उस के घर वाले धारावी से मुंबई में कहीं और चले गए हैं.

7 साल बाद जब मैं लौट कर आया, तो अब उसे इतने बड़े महानगर में कहां ढूंढ़ता? मेरे पास उस का कोई पताठिकाना भी तो नहीं था. मेरे जाने के बाद उस ने माताजी के पास आना भी बंद कर दिया था.

जब वह थी… ऐसा लगता था कि शायद वह मेरे लिए ही बनी हो. और जिंदगी इस कदर खुशगवार थी कि उसे बयां करना मुमकिन नहीं.

मेरा उस से रोज ?ागड़ा होता था. गुस्से के मारे मैं कई दिनों तक उस से बात ही नहीं करता था, तो वह रोरो कर अपना बुरा हाल कर लेती थी. खानापीना छोड़ देती थी. फिर बीमार पड़ जाती थी और जब डाक्टरों के इलाज से ठीक हो कर लौटती थी, तब मुझ से कहती थी, ‘तुम कितने मतलबी हो. एक बार भी आ कर पूछा नहीं कि तुम कैसी हो?’

जब वह ऐसा कहती, तब मैं एक बार हंस भी देता था और आंखों से आंसू भी टपक पड़ते थे.

मैं उसे कई बार समझाता कि ऐसी बात मत किया कर, जिस से हमारे बीच लड़ाई हो और फिर तुम बीमार पड़ जाओ. लेकिन उस की आदत तो जंगल जलेबी की तरह थी, जो मुझे भी गोलमाल कर देती थी.

कुछ भी हो, पर मैं बहुत खुश था, सिवा पिताजी के जो हमेशा अपने ब्राह्मण होने का घमंड दिखाया करते थे.

एक दिन मेरे दोस्त नवीन ने मुझसे कहा, ‘‘यार पृथ्वी… अंधेरी वैस्ट में ‘रैडक्रौस’ नाम का बहुत शानदार बीयर बार है. वहां पर ‘डौली’ नाम की डांसर गजब का डांस करती है. तुम देखने चलोगे क्या? एकाध घूंट बीयर के भी मार लेना. मजा आ जाएगा.’’

बीयर बार के अंदर के हालात से मैं वाकिफ था. मेरा मन भी कच्चा हो रहा था कि अगर पुलिस ने रेड कर दी, तो पता नहीं क्या होगा… फिर भी मैं उस के साथ हो लिया.

रात गहराने के साथ बीयर बार में रोशनी की चमक बढ़ने लगी थी. नकली धुआं उड़ने लगा था. धमाधम तेज म्यूजिक बजने लगा था.

अब इंतजार था डौली के डांस का. अगला नजारा मुझे चौंकाने वाला था. मैं गया तो डौली का डांस देखने था, पर साथ ले आया चिंता की रेखाएं.

उसे देखते ही बार के माहौल में रूखापन दौड़ गया. इतने सालों बाद दिखी तो इस रूप में. उसे वहां देख

कर मेरे अंदर आग फूट रही थी. मेरे अंदर का उबाल तो इतना ज्यादा था कि आंखें लाल हो आई थीं.

आज वह मुझे अनजान सी आंखों से देख रही थी. इस से बड़ा दर्द मेरे लिए और क्या हो सकता था? उसे देखते ही, उस के साथ बिताई यादों के झरोखे खुल गए थे.

मु?ो याद हो आया कि जब तक उस की मां जिंदा थीं, तब तक सब ठीक था. उन के मर जाने के बाद सब धुंधला सा गया था.

उस की अल्हड़ हंसी पर आज ताले जड़े हुए थे. उस के होंठों पर दिखावे की मुसकान थी.

वह अपनेआप को इस कदर पेश कर रही थी, जैसे मुझे कुछ मालूम ही नहीं. वह रात को यहां डांसर का काम किया करती थी और रात की आखिरी लोकल ट्रेन से अपने घर चली जाती थी. उस का गाना खत्म होने तक बीयर की पूरी

2 बोतलें मेरे अंदर समा गई थीं.

मेरा सिर घूमने लगा था. मन तो हुआ उस पर हाथ उठाने का… पर एकाएक उस का बचपन का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने तैर आया.

मेरा बीयर बार में मन नहीं लग रहा था. आंखों में यादों के आंसू बह रहे थे. मैं उठ कर बाहर चला गया. नवीन तो नशे में चूर हो कर वहीं लुढ़क गया था.

मैं ने रात के 2 बजे तक रेलवे स्टेशन पर उस के आने का इंतजार किया. वह आई, तो उस का हाथ पकड़ कर मैं ने पूछा, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम इतने दूर चले गए. पढ़ाई छूट गई. पापी पेट के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो करना ही था. मैं क्या करती?

‘‘सौतेली मां के ताने सुनने से तो बेहतर था… मैं यहां आ गई. फिर क्या अच्छा, क्या बुरा…’’ उस ने कहा.

‘‘एक बार माताजी से आ कर मिल तो सकती थीं तुम?’’

‘‘हां… तुम्हारे साथ जीने की चाहत मन में लिए मैं गई थी तुम्हारी देहरी पर… लेकिन तुम्हारे दर पर मुझे ठोकर खानी पड़ी.

‘‘इस के बाद मन में ही दफना दिए अनगिनत सपने. खुशियों का सैलाब, जो मन में उमड़ रहा था, तुम्हारे पिता ने शांत कर दिया और मैं बैरंग लौट आई.’’

‘‘तुम्हें एक बार भी मेरा खयाल नहीं आया. कुछ और काम भी तो कर सकती थीं?’’ मैं ने कहा.

‘‘कहां जाती? जहां भी गई, सभी ने जिस्म की नुमाइश की मांग रखी. अब तुम ही बताओ, मैं क्या करती?’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हारा मन मैला नहीं है. कल से तुम यहां नहीं आओगी. किसी को कुछ कहनेसम?ाने की जरूरत नहीं है. हम दोनों कल ही दिल्ली चले जाएंगे.’’

‘‘अरे बाबू, क्यों मेरे लिए अपनी जिंदगी खराब कर रहे हो?’’

‘‘खबरदार जो आगे कुछ बोली. बस, कल मेरे घर आ जाना.’’

इतना कह कर मैं घर चला आया और वह अपने घर चली गई. रात सुबह होने के इंतजार में कटी. सुबह उठा, तो अखबार ने मेरे होश उड़ा दिए. एक खबर छपी थी, ‘रैडक्रौस बार की मशहूर डांसर डौली की नींद की ज्यादा गोलियां खाने से मौत.’

मेरा रोमरोम कांप उठा. मेरी खुशी का खजाना आज लुट गया और टूट गया प्यार का धागा.

‘‘शादी करने के लिए कहा था, मरने के लिए नहीं. मुझे इतना पराया सम?ा लिया, जो मुझे अकेला छोड़ कर चली गई? क्या मैं तुम्हारा बो?ा उठाने लायक नहीं था? तुम्हें लाल साड़ी में देखने

की मेरी इच्छा को तुम ने क्यों दफना दिया?’’ मैं चिल्लाया और अपने कानों पर हथेलियां रखते हुए मैं ने आंखें भींच लीं.

बाहर से उड़ कर कुछ टूटे हुए डैने मेरे पास आ कर गिर गए थे. हवा से अखबार के पन्ने भी इधरउधर उड़ने लगे थे. माहौल में फिर सन्नाटा था. रूखापन था. गम से भरी उगती हुई सुबह थी वह. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: मरहम – गुंजन का अनकहा दर्द

Best Hindi Kahani: गुंजन जल्दीजल्दी काम निबटा रही थी. दाल और सब्जी बना चुकी थी. बस, फुलके बनाने बाकी थे. तभी अभिनव किचन में दाखिल हुआ और गुंजन के करीब रखे गिलास को उठाने लगा. उस ने जानबू झ कर गुंजन को हौले से स्पर्श करते हुए गिलास उठाया और पानी ले कर बाहर निकल गया.

गुंजन की धड़कनें बढ़ गईं. एक नशा सा उस के बदन को महकाने लगा. उस ने चाहत भरी नजरों से अभिनव की तरफ देखा जो उसे ही निहार रहा था. गुंजन की धड़कनें फिर से ठहर गईं. उसे लगा, जैसे पूरे जहान का प्यार लिए अभिनव ने उसे आगोश में ले लिया हो और वह दुनिया को भूल कर अभिनव में खो गई हो.

तभी अम्माजी अखबार ढूंढ़ती हुई कमरे में दाखिल हुईं और गुंजन का सपना टूट गया. नजरें चुराती हुई गुंजन फिर से काम में लग गई.

गुंजन अभिनव के यहां खाना बनाने का काम करती है. अम्माजी का बड़ा बेटा अनुज और बहू सारिका जौब पर जाते हैं. छोटा बेटा अभिनव भी एक आईटी कंपनी में काम करता है. उस की अभी शादी नहीं हुई है और वह गुंजन की तरफ आकृष्ट है.

22 साल की गुंजन बेहद खूबसूरत है और वह अपने मातापिता की इकलौती संतान है. मातापिता ने उसे बहुत लाड़प्यार से पाला है. इंटर तक पढ़ाया भी है. मगर घर की माली हालत सही नहीं होने की वजह से उसे दूसरों के घरों में खाना बनाने का काम करना पड़ा.

गुंजन जानती है कि अभिनव ऊंची जाति का पढ़ालिखा लड़का है और अभिनव के साथ उस का कोई मेल नहीं हो सकता. मगर कहते हैं न कि प्यार ऐसा नशा है जो अच्छेअच्छों की बुद्धि पर ताला लगा देता है. प्यार के एहसास में डूबा व्यक्ति सहीगलत, ऊंचनीच, अच्छाबुरा कुछ भी नहीं सम झता. उसे तो बस किसी एक शख्स का खयाल ही हरपल रहने लगता है और यही हो रहा था गुंजन के साथ भी. उसे सोतेजागते हर समय अभिनव ही नजर आने लगा था.

धीरेधीरे वक्त गुजरता गया. अभिनव की हिम्मत बढ़ती गई और गुंजन भी उस के आगे कमजोर पड़ती गई. एक दिन मौका देख कर अभिनव ने उसे बांहों में भर लिया. गुंजन ने खुद को छुड़ाने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘अभिनवजी, अम्माजी ने देख लिया तो क्या सोचेंगी?’’

‘‘अम्मा सो रही हैं, गुंजन. तुम उन की चिंता मत करो. बहुत मुश्किल से आज हमें ये पल मिले हैं. इन्हें बरबाद न करो.’’

‘‘मगर अभिनवजी, यह सही नहीं है. आप का और मेरा कोई मेल नहीं,’’ गुंजन अब भी सहज नहीं थी.

‘‘ऐसी बात नहीं है गुंजन. मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. प्यार में कोई छोटाबड़ा नहीं होता. बस, मु झे इन जुल्फों में कैद हो जाने दो. गुलाब की पंखुड़ी जैसे इन लबों को एक दफा छू लेने दो.’’

अभिनव किसी भी तरह गुंजन को पाना चाहता था. गुंजन अंदर से डरी हुई थी मगर अभिनव का प्यार उसे अपनी तरफ खींच रहा था. आखिर गुंजन ने भी हथियार डाल दिए. वह एक प्रेयसी की भांति अभिनव के सीने से लग गई. दोनों एकदूसरे के आलिंगन में बंधे प्यार की गहराई में डूबते रहे. जब होश आया तो गुंजन की आंखें छलछला आईं. वह बोली, ‘‘आप मेरा साथ तो दोगे न? जमाने की भीड़ में मु झे अकेला तो नहीं छोड़ दोगे?’’

‘‘पागल हो क्या? प्यार करता हूं. छोड़ कैसे दूंगा?’’ कह कर उस ने फिर से गुंजन को चूम लिया. गुंजन फिर से उस के सीने में दुबक गई. वक्त फिर से ठहर गया.

अब तो ऐसा अकसर होने लगा. अभिनव प्यार का दावा कर के गुंजन को करीब ले आता.

दोनों ने ही प्यार के रास्ते पर बढ़ते हुए मर्यादाओं की सीमारेखाएं तोड़ दी थीं. गुंजन प्यार के सुहाने सपनों के साथ सुंदर घरसंसार के सपने भी देखने लगी थी.

मगर एक दिन वह देख कर भौचक्की रह गई कि अभिनव के रिश्ते की बात करने के लिए एक परिवार आया हुआ है. मांबाप के साथ एक आधुनिक, आकर्षक और स्टाइलिश लड़की बैठी हुई थी.

अम्माजी ने गुंजन से कुछ खास बनाने की गुजारिश की तो गुंजन ने सीधा पूछ लिया, ‘‘ये कौन लोग हैं अम्माजी?’’

‘‘ये अपने अभि को देखने आए हैं. इस लड़की से अभि की शादी की बात चल रही है. सुंदर है न लड़की?’’ अम्माजी ने पूछा तो गुंजन ने हां में सिर हिला दिया.

उस के दिलोदिमाग में तो एक भूचाल सा आ गया था. उस दिन घर जा कर भी गुंजन की आंखों के आगे उसी लड़की का चेहरा नाचता रहा. आंखों से नींद कोसों दूर थी.

अगले दिन जब वह अभिनव के घर खाना बनाने गई तो सब से पहले मौका देख कर उस ने अभिनव से बात की, ‘‘यह सब क्या है अभिनव? आप की शादी की बात चल रही है? आप ने अपने घर वालों को हमारे प्यार की बात क्यों नहीं बताई?’’

‘‘नहीं गुंजन, हमारे प्यार की बात मैं उन्हें नहीं बता सकता.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘क्योंकि हमारा प्यार समाज स्वीकार नहीं करेगा. मेरे मांबाप कभी नहीं मानेंगे कि मैं एक नीची जाति की लड़की से शादी करूं,’’ अभिनव ने बेशर्मी से कहा.

‘‘तो फिर प्यार क्यों किया था आप ने? शादी नहीं करनी थी तो मु झे सपने क्यों दिखाए थे?’’ तड़प कर गुंजन बोली.

‘‘देखो गुंजन, सम झने का प्रयास करो. प्यार हम दोनों ने किया है. प्यार के लिए केवल हम दोनों की रजामंदी चाहिए थी. मगर शादी एक सामाजिक रिश्ता है. शादी के लिए समाज की अनुमति भी चाहिए. शादी तो मु झे घर वालों के कहेनुसार ही करनी होगी.’’

‘‘यानी प्यार नहीं, आप ने प्यार का नाटक खेला है मेरे साथ. मैं नहीं केवल मेरा शरीर चाहिए था. क्यों कहा था मु झे कि कभी अकेला नहीं छोड़ोगे?’’

‘‘मैं तुम्हें अकेला कहां छोड़ रहा हूं गुंजन? मैं तो अब भी तुम ही से प्यार करता हूं मेरी जान. यकीन मानो, हमारा यह प्यार हमेशा बना रहेगा. शादी भले ही उस से कर लूं मगर हम दोनों पहले की तरह ही मिलते रहेंगे. हमारा रिश्ता वैसा ही चलता रहेगा. मैं हमेशा तुम्हारा बना रहूंगा,’’ गुंजन को कस कर पकड़ते हुए अभिनव ने कहा.

गुंजन को लगा जैसे हजारों बिच्छुओं ने उसे जकड़ रखा हो. वह खुद को अभिनव

के बंधन से आजाद कर काम में लग गई. आंखों से आंसू बहे जा रहे थे और दिल तड़प रहा था.

घर आ कर वह सारी रात सोचती रही. अभिनव की बेवफाई और अपनी मजबूरी उसे रहरह कर कचोट रही थी. अभिनव के लिए भले ही यह प्यार तन की भूख थी मगर उस ने तो हृदय से चाहा था उसे. तभी तो अपना सबकुछ समर्पित कर दिया था. इतनी आसानी से वह अभिनव को माफ नहीं कर सकती थी. उस के किए की सजा तो देनी ही होगी. वह पूरी रात यही सोचती रही कि अभिनव को सबक कैसे सिखाया जाए.

आखिर उसे सम झ आ गया कि वह अभिनव से बदला कैसे ले सकती है. अगले दिन से ही उस ने बदले की पटकथा लिखनी शुरू कर दी.

उस दिन वह ज्यादा ही बनसंवर कर अभि के घर खाना बनाने पहुंची. अभि शाम

4 बजे की शिफ्ट में औफिस जाता था. अम्माजी हर दूसरे दिन 12 से 4 बजे तक के लिए घर से बाहर अपनी सखियों से मिलने जाती थीं. पिताजी के पैर में तकलीफ थी, इसलिए वे बिस्तर पर ही रहते थे.

12 बजे अम्माजी के जाने के बाद वह अभिनव के पास चली आई और उस का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘अभिनव, आप की शादी की बात सुन कर मैं दुखी हो गई थी. मगर अब मैं ने खुद को संभाल लिया है. शादी से पहले के इन दिनों को मैं भरपूर एंजौय करना चाहती हूं. आप की बांहों में खो जाना चाहती हूं.’’

अभिनव की तो मनमांगी मुराद पूरी हो रही थी. उस ने  झट गुंजन को करीब खींच लिया. दोनों एकदूसरे की आगोश में खोते चले गए. बैड पर अभि की बांहों में मचलती गुंजन ने सवाल किया, ‘‘कल आप सच कह रहे थे अभिनव, शादी के बाद भी आप मु झ से यह रिश्ता बनाए रखोगे न?’’

‘‘हां गुंजन, इस में तुम्हें शक क्यों है? शादी एक चीज होती है और प्यार दूसरी चीज. हम दोनों का प्यार और शरीर का यह मिलन हमेशा कायम रहेगा. शादी के बाद भी यह रिश्ता ऐसा ही चलता रहेगा,’’ कह कर अभिनव फिर से गुंजन को बेतहाशा चूमने लगा.

शाम को गुंजन अपने घर लौट आई. उसे खुद से घिन आ रही थी. वह बाथरूम में गई और नहा कर बाहर निकली. फिर मोबाइल ले कर बैठ गई. आज के उन के शारीरिक मिलन का एकएक पल इस मोबाइल में कैद था. उस ने बड़ी होशियारी से मोबाइल का कैमरा औन कर के ऐसी जगह रखा था जहां से दोनों की सारी हरकतें कैद हो गई थीं.

काफी देर तक का लंबा अंतरंग वीडियो था. 10 दिन के अंदर उस ने ऐसे

3-4 वीडियो और शूट कर लिए. फिर वीडियोज एडिट कर के बड़ी चतुराई से उस ने अपने चेहरे को छिपा दिया.

कुछ दिनों में अभिनव की शादी हो गई. 8-10 दिनों के अंदर ही उस ने अभिनव की पत्नी से दोस्ती कर ली और उस का मोबाइल नंबर ले लिया. अगले दिन उस ने अम्माजी को कह दिया कि उस की मुंबई में जौब लग गई है और अब काम पर नहीं आ पाएगी. उस दिन वह अभिनव से मिली भी नहीं और घर चली आई.

अगले दिन सुबहसुबह उस ने अपने और अभिनव के 2 अंतरंग वीडियो अभिनव की पत्नी को व्हाट्सऐप कर दिए. 2 घंटे बाद उस ने 2 और वीडियो व्हाट्सऐप किए और चैन से घर के काम निबटाने लगी.

शाम 4 बजे के करीब अभिनव का फोन आया. गुंजन को इस का अंदाजा पहले से था. उस ने मुसकराते हुए फोन उठाया तो सामने से अभिनव का रोता हुआ स्वर सुनाई दिया, ‘‘गुंजन, तुम ने यह क्या किया मेरे साथ? मेरी शादीशुदा जिंदगी की अभी ठीक से शुरुआत भी नहीं हुई थी और तुम ने ये वीडियोज भेज दिए. तुम्हें पता है, माया सुबह से ही मु झ से लड़ रही थी और अभीअभी सूटकेस ले कर हमेशा के लिए अपने घर चली गई. गुंजन, तुम ने यह क्या कर दिया मेरे साथ? अब मैं…’’

‘‘…अब तुम न घर के रहोगे न घाट के. गुडबाय मिस्टर अभिनव,’’ गुंजन ने कहा और फोन काट दिया.

उस ने आज अभिनव से बदला ले लिया था. खुद को मिले हर आंसुओं का बदला. आज उसे महसूस हो रहा था जैसे उस के जख्मों पर किसी ने मरहम लगा दिया हो. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: एक तलाक ऐसा भी – गंगू और मोहिनी का यादगार फैसला

Hindi Family Story: गंगू अपनी पत्नी मोहिनी के साथ पूर्वी दिल्ली की एक कच्ची बस्ती में रहता था. कदकाठी में वह मोहिनी के सामने एकदम बच्चा लगता था, क्योंकि मोहिनी भरेपूरे बदन की औरत थी. उस का कद भी साढ़े 5 फुट था. जब वह गली से गुजरती थी, तो मनचले उस की मटकती कमर और उठे उभारों को देख कर आहें भरने लगते थे.

यह सब देख कर गंगू कुढ़ कर रह जाता था. रहीसही कसर मोहिनी के मोबाइल फोन ने पूरी कर दी थी. गंगू जब भी मोहिनी को फोन से चिपके देखता, तो वह उसे हड़का देता था. एक दिन तो हद हो गई. गंगू जब थकाहरा घर लौटा, तो मोहिनी हंसहंस कर किसी से फोन पर बात कर रही थी. उस की हंसी सुन कर गंगू का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया.

उस ने आव देखा न ताव और एक करारा तमाचा मोहिनी के गाल पर जड़ दिया.  अचानक पड़े तमाचे से मोहिनी बौखला गई और पलट कर उस ने भी गंगू को खींच कर एक तमाचा रसीद कर दिया. अब तो गुस्से के मारे गंगू के नथुने फूलने लगे.

यह देख कर बस्ती के कुछ लोग कहने लगे कि मर्द का अपनी पत्नी से मार खाना खानदान की नाक कटने के बराबर है. वे मानो गंगू के जले पर नमक छिड़क रहे थे. उधर गंगू गुस्से में और भी लालपीला हो रहा था. लिहाजा, मामला और भी बढ़ता चला गया.

इसी तनातनी में उन दोनों के रिश्तेदार दिल्ली आए तो मामला और भी संगीन होता गया और बात धीरेधीरे तलाक पर आ गई. दोनों पक्षों की तरफ से खूब आरोप उछाले गए. गंगू ने मोहिनी को और मोहिनी ने गंगू को बहुत सारी बकवास बातें कहीं. मुकदमा कोर्ट में दर्ज कराया गया. गंगू ने मोहिनी के खिलाफ बदचलनी का, तो मोहिनी ने गंगू के खिलाफ दहेज के नाम पर सताने का आरोप लगाया.

मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चलता रहा. आखिर में 7 साल तक शादीशुदा जिंदगी बिताने और एक बच्ची के मांबाप बनने के बाद आज गंगू और मोहिनी के बीच तलाक हो गया. गंगू और मोहिनी दोनों के हाथ में तलाक की परची थी. वे दोनों चुप थे. चूंकि मुकदमा तकरीबन ढाई साल तक चला था, लिहाजा वे दोनों ढाई साल से अलगअलग रह रहे थे.

गंगू दिल्ली में तो मोहिनी अपने मायके में रह रही थी. दोनों जब सुनवाई पर आते तो एकदूसरे को देख कर जलते, गुस्सा करते और मुंह मोड़ लेते.  तलाक की परची मिलने के बाद दोनों पक्ष के रिश्तेदार और गंगू व मोहिनी कोर्ट के पास के ही एक होटल में ठहरे थे. मोहिनी ने दिल्ली वाले घर में जाने से मना कर दिया था, तो गंगू भी वहीं रुक गया. सब की चाय पीने की इच्छा हुई.

इत्तिफाक से जिस मेज के सामने गंगू बैठा था, उसी मेज के सामने मोहिनी भी आ कर बैठ गई. अब दोनों आमनेसामने बैठे थे. शक्ल से लग रहा था कि उन दोनों के दिल में पछतावा था. दोनों एकदूसरे को काफी देर तक आंखों में आंखें मिला कर देखते रहे.  चाय आई.

दोनों ने कप उठाए, फिर कुछ देर बाद गंगू अपनी आंखों में पछतावे के आंसू ले कर हड़बड़ाती हुई आवाज में मोहिनी से बोला, ‘‘इस बीच जुदाई में मैं तुम्हें बहुत याद करता था.’’

यह सुन कर मोहिनी की भी आंखों में आंसू आ गए और उस ने गंगू के हाथ पर अपना हाथ रख कर धीरे से कहा, ‘‘मैं भी…’’ अब गंगू ने लंबी सांस ली और धीरेधीरे कहने लगा,

‘‘अभी तुम्हें 2 लाख रुपए नकद और 4,000 रुपए भी तो हर महीने देने हैं.

मुझे इस का जल्द ही बंदोबस्त करना पड़ेगा.’’

‘‘अरे… तो दे देना, कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं आप…’’ मोहिनी बोली.

मोहिनी की यह बात सुन कर गंगू की आंखों से और ज्यादा आंसू छलक पड़े और उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अब भी बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘और मैं भी…’’ मोहिनी बोली. ‘‘तुम पर बदचलनी का झूठा आरोप लगाने के लिए मुझे माफ कर दो.’’ यह सुन कर मोहिनी बोली,

‘‘माफी मांगने की क्या जरूरत है… मैं ने भी तो आप पर दहेज के नाम पर सताने का झूठा आरोप लगाया था.’’

अब गंगू ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे बिना बिलकुल अकेला हो जाऊंगा.’’

‘‘और मैं भी,’’ मोहिनी बोली. गंगू डरते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हारे  साथ ही अपनी सारी जिंदगी गुजारना चाहता हूं.’’

‘‘और मैं भी आप के साथ ही रहना चाहती हूं…’’ मोहिनी ने कहा,

‘‘पर…’’ ‘‘पर क्या?’’ गंगू ने पूछा. ‘‘पर, इस तलाक की परची का क्या करोगे?’’ मोहिनी बोली.

‘‘तो इस तलाक की परची को फाड़ कर फेंक देते हैं,’’ गंगू ने कहा.

फिर उन दोनों ने एकदूसरे को देखते हुए अपनीअपनी परची फाड़ कर फेंक दी और ठहाका मार कर हंस पड़े. इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ लिया और कुरसी से उठ कर गले लग गए. दोनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े. देखते ही देखते गंगू और मोहिनी दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर हंसते हुए होटल से बाहर चले गए. यह नजारा देख कर उस होटल में ठहरे उन के रिश्तेदारों के चेहरों पर मुर्दनी छा गई. Hindi Family Story

Best Hindi Story: आखिर कब तक – धर्म बना दीवार

Best Hindi Story: रामरहमानपुर गांव सालों से गंगाजमुनी तहजीब की एक मिसाल था. इस गांव में हिंदुओं और मुसलिमों की आबादी तकरीबन बराबर थी. मंदिरमसजिद आसपास थे. होलीदीवाली, दशहरा और ईदबकरीद सब मिलजुल कर मनाते थे.

रामरहमानपुर गांव में 2 जमींदारों की हवेलियां आमनेसामने थीं. दोनों जमींदारों की हैसियत बराबर थी और आसपास के गांव में बड़ी इज्जत थी.

दोनों परिवारों में कई पीढि़यों से अच्छे संबंध बने हुए थे. त्योहारों में एकदसूरे के यहां आनाजाना, सुखदुख में हमेशा बराबर की सा  झेदारी रहती थी.

ब्रजनंदनलाल की एकलौती बेटी थी, जिस का नाम पुष्पा था. जैसा उस का नाम था, वैसे ही उस के गुण थे. जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. उस की उम्र नादान थी. रस्सी कूदना, पिट्ठू खेलना उस के शौक थे. गांव के बड़े   झूले पर ऊंचीऊंची पेंगे लेने के लिए वह मशहूर थी.

शौकत अली के एकलौते बेटे का नाम जावेद था. लड़कों की खूबसूरती की वह एक मिसाल था. बड़ों की इज्जत करना और सब से अदब से बात करना उस के खून में था. जावेद के चेहरे पर अभी दाढ़ीमूंछों का निशान तक नहीं था.

जावेद को क्रिकेट खेलने और पतंगबाजी करने का बहुत शौक था. जब कभी जावेद की गेंद या पतंग कट कर ब्रजनंदनलाल की हवेली में चली जाती थी, तो वह बिना  ि झ  झक दौड़ कर हवेली में चला जाता और अपनी पतंग या गेंद ढूंढ़ कर ले आता.

पुष्पा कभीकभी जावेद को चिढ़ाने के लिए गेंद या पतंग को छिपा देती थी. दोनों में खूब कहासुनी भी होती थी. आखिर में काफी मिन्नत के बाद ही जावेद को उस की गेंद या पतंग वापस मिल पाती थी. यह अल्हड़पन कुछ समय तक चलता रहा. बड़ेबुजुर्गों को इस खिलवाड़ पर कोई एतराज भी नहीं था.

समय तो किसी के रोकने से रुकता नहीं. पुष्पा अब सयानी हो चली थी और जावेद के चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आने लगी थीं. अब जावेद गेंद या पतंग लेने हवेली के अंदर नहीं जाता था, बल्कि हवेली के बाहर से ही आवाज दे देता था.

पुष्पा भी अब बिना   झगड़ा किए नजर   झुका कर गेंद या पतंग वापस कर देती थी. यह   झुकी नजर कब उठी और जावेद के दिल में उतर गई, किसी को पता भी नहीं चला.

अब जावेद और पुष्पा दिल ही दिल में एकदूसरे को चाहने लगे थे. उन्हें अल्हड़ जवानी का प्यार हो गया था.

कहावत है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. गांव में दोनों के प्यार की बातें होने लगीं और बात बड़ेबुजुर्गों तक पहुंची.

मामला गांव के 2 इज्जतदार घरानों का था. इसलिए इस के पहले कि मामला तूल पकड़े, जावेद को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया गया. यह सोचा गया कि वक्त के साथ इस अल्हड़ प्यार का बुखार भी उतर जाएगा, पर हुआ इस का उलटा.

जावेद पर पुष्पा के प्यार का रंग पक्का हो गया था. वह सब से छिप कर रात के अंधेरे में पुष्पा से मिलने आने लगा. लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. उन की रासलीला की चर्चा आसपास के गांवों में भी होने लगी.

आसपास के गांवों की महापंचायत बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि गांव में अमनचैन और धार्मिक भाईचारा बनाए रखने के लिए दोनोंको उन की हवेलियों में नजरबंद कर दिया जाए.ब्रजनंदनलाल और शौकत अली को हिदायत दी गई कि बच्चों पर कड़ी नजर रखें, ताकि यह बात अब आगे न बढ़ने पाए. कड़ी सिक्योरिटी के लिए दोनों हवेलियों पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात कर दिए गए.

अब पुष्पा और जावेद अपनी ही हवेलियों में अपने ही परिवार वालों की कैद में थे. कई दिन गुजर गए. दोनों ने खानापीना छोड़ दिया था. आखिरकार दोनों की मांओं का हित अपने बच्चों की हालत देख कर पसीज उठा. उन्होंने जातिधर्म के बंधनों से ऊपर उठ कर घर के बड़ेबुजुर्गों की नजर बचा कर गांव से दूर शहर में घर बसाने के लिए अपने बच्चों को कैद से आजाद कर दिया.

रात के अंधेरे में दोनों अपनी हवेलियों से बाहर निकल कर भागने लगे. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली तनाव के कारण अपनी हवेलियों की छतों पर आधी रात बीतने के बाद भी टहल रहे थे. उन दोनों को रात के अंधेरे में 2 साए भागते दिखाई दिए. उन्हें चोर सम  झ कर दोनों जोर से चिल्लाए, पर वे दोनों साए और तेजी से भागने लगे.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली ने बिना देर किए चिल्लाते हुए आदेश दे दिया, ‘पहरेदारो, गोली चलाओ.’

‘धांयधांय’ गोलियां चल गईं और 2 चीखें एकसाथ सुनाई पड़ीं और फिर सन्नाटा छा गया.जब उन्होंने पास जा कर देखा, तो सब के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. पुष्पा और जावेद एकदूसरे का हाथ पकड़े गोलियों से बिंधे पड़े थे. ताजा खून उन के शरीर से निकल कर एक नई प्रेमकहानी लिख रहा था.

आननफानन यह खबर दोनों हवेलियों तक पहुंच गई. पुष्पा और जावेद की मां दौड़ती हुई वहां पहुंच गईं. अपने जिगर के टुकड़ों को इस हाल में देख कर वे दोनों बेहोश हो गईं. होश में आने पर वे रोरो कर बोलीं, ‘अपने जिगर के टुकड़ों का यह हाल देख कर अब हमें भी मौत ही चाहिए.’

ऐसा कह कर उन दोनों ने पास खड़े पहरेदारों से बंदूक छीन कर अपनी छाती में गोली मार ली. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कोई उन को रोक भी नहीं पाया. यह खबर आग की तरह आसपास के गांवों में पहुंच गई. हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी. सवेरा हुआ, पुलिस आई और पंचनामा किया गया. एक हवेली से 2 जनाजे और दूसरी हवेली से 2 अर्थियां निकलीं और उन के पीछे हजारों की तादाद में भीड़.

अंतिम संस्कार के बाद दोनों परिवार वापस लौटे. दोनों हवेलियों के चिराग गुल हो चुके थे. अब ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की जिंदगी में बच्चों की यादों में घुलघुल कर मरना ही बाकी बचा था.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की निगाहें अचानक एकदसूरे से मिलीं, दोनों एक जगह पर ठिठक कर कुछ देर तक देखते रहे, फिर अचानक दौड़ कर एकदूसरे से लिपट कर रोने लगे.

गहरा दुख अपनों से मिल कर रोने से ही हलका होता है. बरसों का आपस का भाईचारा कब तक उन्हें दूर रख सकता था. शायद दोनों को एहसास हो रहा था कि पुरानी पीढ़ी की सोच में बदलाव की जरूरत है. Best Hindi Story

Story In Hindi: पटनिया – एडवैंचर आटोरिकशा ट्रिप

Story In Hindi: बचपन से ही मुझे एडवैंचर ट्रिप पर जाने का शौक रहा है. जान हथेली पर रख कर स्टंट द्वारा लाइफ के साथ लाइफ से खेलने या मजा लेने की इच्छाएं मेरे खून, दिल, गुरदे, फेफड़े वगैरह में उफान मारा करती थीं, लेकिन कमजोर दिल और कमजोर अर्थव्यवस्था के चलते अपने इस शौक को मैं डिस्कवरी चैनल, ऐक्शन हौलीवुड मूवी या रोहित शेट्टी की फिल्में देख कर पूरा कर लिया करता था.

कहते हैं कि जिस चीज की तमन्ना शिद्दत से की जाए तो सारी कायनात उसे मिलाने की साजिश करने लगती है. कुछ इसी तरह की घटना मेरे साथ भी हुई. कुदरत ने मेरी सुन ली और मुझे भी कम खर्च में नैचुरल एडवैंचर जर्नी का सुनहरा मौका मिल ही गया.

पहली बार बिहार की राजधानी पटना जाना हुआ. फिर क्या था, साधारण टिकट ले कर रेलवे के साधारण डब्बे में सेंध लगा कर घुस गया. सेंध लगाना मजबूरी थी, क्योंकि 103 सीट वाली अनारक्षित हर बोगी में तकरीबन 300 पैसेंजर भेड़बकरियों की तरह सीट, लगेज सीट, फर्श, टौयलैट और गेट पर बैठेखड़े, लटके या फिर टिके हुए थे.

मैं भी इमर्जैंसी विंडो के सहारे किसी तरह डब्बे में घुस कर अपने आयतन के अनुसार खड़ा रहने की जगह पर कब्जा कर बैठा. स्टेशनों पर चढ़नेउतरने वाले मुसाफिरों की धक्कामुक्की और गैरकानूनी वैंडरों की ठेलमठेल के बीच खुद को बैलेंस करते हुए 6 घंटे की रोमांचक यात्रा के बाद मैं आखिरकार पटना जंक्शन पहुंच ही गया.

इस के बाद मैं पटना जंक्शन से पटना सिटी के लिए आटोरिकशा की तलाश में बाहर निकला.पटना सिटी के लिए बड़ी आसानी आटोरिकशा मिल गया. ड्राइवर ने उस के पीछे वाली चौड़ी सीट पर 3 लोगों को बैठाया, जबकि आगे की ड्राइवर सीट वाली कम जगह पर अपने अलावा 3 दूसरे पैसेंजर को बड़ी ही कुशलता से एडजस्ट कर लिया.

कमोबेश सभी आटोरिकशा ड्राइवर तीनों पैसेंजर के साथ खुद को सैट कर  टेकऔफ करने के हालात में नजर आ रहे थे. कुछ ड्राइवर ड्राइविंग सीट पर बीच में बैठ कर तो कुछ साइड में शिफ्ट हो कर बैठे थे. समझ लो कि अपनी तशरीफ को 45 डिगरी के कोण पर सैट कर के आटोरिकशा हुड़हुड़ाने को तैयार था.

ड्राइवर समेत कुल 4 सीट वाले आटोरिकशा में 7 लोगों के सफर करने का हुनर देख कर मुझे समझते देर न लगी कि पटनिया आटोरिकशा ड्राइवर बेहतरीन मैनेजर होते हैं. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस तरह का रोमांचक सीन आल इंडिया लैवल पर सिर्फ और सिर्फ पटना की सड़कों पर ही देखा जा सकता है.

पटना की सड़कों पर दोपहिया और चारपहिया के बीच तिपहिया की धूम के आगे रितिक रौशन और उदय चोपड़ा की ‘धूम’ भी फेल है.

पटनिया आटोरिकशा ड्राइवर समय का पक्का होता है. बसस्टैंड से पैसेंजर को बैठाने के चक्कर में ड्राइवर ने भले ही जितनी देरी की हो, पर पैसेंजर सीट फुल होने के बाद वह बाएंदाएं, राइट साइड, रौंग साइड, आटोरिकशा की मैक्सिमम स्पीड और तेज शोर के साथ राकेट की रफ्तार से मंजिल की ओर कूच कर गया.

भले ही इन लोगों के चलते सड़क पर जाम लग जाए, पर लाइन में रह कर समय बरबाद करने मे ये आटोरिकशा वाले यकीन नहीं रखते और अमिताभ बच्चन की तरह अपनी लाइन खुद तैयार कर लेते हैं.

शायद आगे सड़क पर जाम था या पेपर चैकिंग मुहिम चल रही थी, पता नहीं, पर इस बात का ड्राइवर को जैसे ही अंदाजा हुआ, फिर क्या था… उस ने हम सब को पटना की ऐसी टेढ़ीमेढ़ी गलियों में गोलगोल घुमाया, जिन गलियों को ढूंढ़ पाना कोलंबस के वंशज के वश से बाहर था. मुझे समझते देर न लगी कि यहां के आटोरिकशा ड्राइवर आविष्कारक या खोजी सोच के होते हैं.

हम राकेट की रफ्तार से सफर का मजा ले ही रहे थे कि फ्लाईओवर पर पीछे से हुड़हुड़ाता हुआ एक आटोरिकशा काफी तेजी से हमारे आगे निकल गया. शायद सवारियों से ज्यादा मंजिल तक पहुंचने की जल्दी ड्राइवर को थी. इसी मकसद को पूरा करने के लिए वह तीखे मोड़ पर टर्न लेने के दौरान तेज रफ्तार से बिना ब्रेक लिए पलटीमार सीन का लाइव प्रसारण कर बैठा.

हमारे खुद के आटोरिकशा की बेहिसाब स्पीड और रेस में आगे निकल रहे दूसरे आटोरिकशा का हश्र देख कर मेरे कलेजे के अंदर डीजे बजने लगा. समझते देर न लगी कि पटनिया सड़कों पर ड्राइवर के रूप में यमराज के दूत भी मौजूद हैं, जो अपनी हवाहवाई स्पीड और रेस से सवारियों को परिवार या परिचित तक पहुंचाने के साथसाथ अस्पताल से ऊपर वाले के दर्शन तक कराने में भी मास्टर होते हैं.

ऐसा नहीं है कि बिना सैंसर बोर्ड वाले वाहियात भोजपुरी गीत इंडस्ट्री की तरह पटनिया परिवहन बिना ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम वाली है. सौ से सवा सौ मीटर पर यातायात पुलिस वाले मौजूद रहते हैं.

ये पटनिया आटोरिकशा ड्राइवर की औकात से ज्यादा सवारी ढोने और जिगजैग ड्राइविंग जैसे साहसिक कारनामे के दौरान धृतराष्ट्र मोड में, जबकि हैलमैट, सीट बैल्ट, कागजात वगैरह चैक करने के दौरान संजय मोड में अपनी जिम्मेदारी पूरी करते नजर आते हैं.

बातोंबातों में एक बात बताना भूल ही गया कि यहां के आटोरिकशा ड्राइवर किराया मीटर या दूरी के बजाय पैसेंजर की मजबूरी के मुताबिक तय कर लेते हैं. घटतेबढ़ते पैट्रोल के कीमत की तरह समय, स्टैंड पर आटोरिकशा की तादाद और मुसाफिरों के मंजिल तक पहुंचने की जरूरत के हिसाब से ड्राइवर को किराया तय करते देख और सफर के दौरान ब्लूटूथ स्पीकर से सवारियों को भोंड़े भोजपुरी गीत सुनवाने की इन की आदत से मुझे समझते देर न लगी कि यहां के आटोरिकशा ड्राइवर कुशल अर्थशास्त्री और संगीत प्रेमी भी हैं.

अगर आप भी रोहित शेट्टी के प्रोग्राम ‘खतरों के खिलाड़ी’ में नहीं जा सके हों और महंगाई के आलम में जान हथेली पर वाले एडवैंचर ट्रिप के शौक को पूरा करने से चूक गए हैं, तो महज 10 से 20 रुपए में पटनिया टैंपू ट्रैवल एडवैंचर ट्रिप का मजा किसी भी सीजन में ले सकते हैं. मेरी गारंटी है कि इस शानदार ट्रिप में आप को हर पल यादगार रोमांच हासिल होगा. Story In Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें