मसला: तलाक इतना मुश्किल क्यों है कि…

12 जून, 2019. मध्य प्रदेश के मंदसौर की बात है. इस रात जीवागंज इलाके का बाशिंदा चंद्रशेखर अपनी अलग रह रही बीवी मंजू के पास गया और उस के साथ मारपीट की.

पुलिस में की गई अपनी रिपोर्ट में मंजू ने बताया कि शौहर ने यह मारपीट तलाक चाहने के एवज में की थी. पुलिस ने चंद्रशेखर के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया.

* दूसरा मामला फरीदाबाद, हरियाणा का है. 12 जून, 2019 की ही रात को पुलिस को एक औरत झाडि़यों में घायल हालत में मिली थी.

पुलिस ने जब मामले की जांच की तो पता चला कि तृषा नाम की इस औरत पर जानलेवा हमला उस के ही शौहर एनआईटी 3 में रहने वाले राजन अदलखा ने किया था.

राजन ने पुलिस को बताया कि तृषा से उस का तलाक का मुकदमा अदालत में डेढ़ साल से चल रहा है. इस के लिए उसे बारबार अदालत के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिसे ले कर उस के मन में रंजिश आ गई थी, इसलिए बहस हो जाने के बाद उस ने बीवी पर पत्थर व चाकू से हमला किया.

* तीसरा मामला हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले का है. 1 जून, 2019 को आरती शर्मा ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उस का शौहर आएदिन उसे तलाक के लिए मारतापीटता रहता था. उस ने तलाक देने से मना किया तो शौहर ने उस के मुंह में फिनाइल उड़ेल दी.

* चौथा मामला 17 जून, 2019 का है. बिहार के भागलपुर जिले के कसबे नवगछिया में स्वीटी जायसवाल के हाथ की नस उस के शौहर और ससुराल वालों ने इसलिए काट दी कि वह तलाकनामा पर दस्तखत नहीं कर रही थी.

इस बाबत पति व ससुराल वाले कई दिनों से उसे तंग कर रहे थे. पुलिस ने स्वीटी के पति सुमित जायसवाल और दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

दूसरा पहलू

ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब ऐसी खबर नजरों के सामने से हो कर न गुजरती हो, जिस में शौहर ने बीवी पर तलाक के लिए या तो हमला किया, या फिर उस की हत्या ही कर दी हो.

विलाशक पहली नजर में यह शौहरों की बेरहमी ही मानी जाएगी, लेकिन ऐसे मामले और फसाद, जो तेजी से बढ़ रहे हैं, को एक दूसरी नजर से भी देखने की जरूरत है, जिन के चलते औरतों पर जिस्मानी और दिमागी जुल्म ढाए जाते हैं.

यह वजह है तलाक, जो आसानी से नहीं हो जाता. यहां बताए मामलों से 2 बातें उजागर होती हैं कि शौहर तलाक चाहते थे, लेकिन उन्हें अहसास था कि यह शादी की तरह आसान नहीं, जो 2-4 दिन में हो जाए. इस के लिए सालोंसाल अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं. इस कार्यवाही में पैसा भी खूब खर्च होता है, साथ ही साथ परेशानियां, बदनामी भी झेलनी पड़ती हैं और तलाक के मुकदमे के दौरान दूसरी शादी भी नहीं की जा सकती.

दूसरी अहम बात यह उजागर होती है कि तीनों ही मामलों में पिसी और पिटी बीवी ही है, लेकिन शौहरों को भी जेल की हवा खानी पड़ी है, जिन का तलाक का मकसद पूरा नहीं हुआ.

यह मकसद अगर आसानी से पूरा होने लगे, तो जाहिर है कि लाखों बीवियां जुल्मोसितम से बच जाएंगी और लाखों शौहर मुजरिम बनने से बच जाएंगे.

अगर शौहरों को नहीं, बल्कि बीवियों को भी यह गारंटी मिल जाए कि तलाक की अदालती और कानूनी कार्यवाही में दिक्कतें नहीं आएंगी और पेशियों पर पेशियां नहीं लगेंगी, तो विलाशक मियांबीवी बड़ी तादाद में अदालत का रुख करेंगे और तलाक के बाद आजादी और खुशहाली से जिंदगी गुजार सकेंगे.

लकीर का फकीर कानून

तलाक के बढ़ते मामलों पर हर कोई चिंता जताता रहता है. इन में नेता, समाजसेवी और धर्म के ठेकेदारों के साथसाथ मीडिया भी शामिल है. ये लोग नहीं चाहते कि तलाक आसानी से हो. इस के पीछे इन की दलीलें बेहद बासी और बेकार हैं कि यह 2 जिंदगियों का सवाल है. इन लोगों का ध्यान अपनी खुदगर्जी के चलते इस तरफ नहीं जाता कि तलाक न होने पर बीवी यानी औरत ज्यादा सताई जाती है, क्योंकि वह माली और सामाजिक तौर पर शौहर की मुहताज होती है.

औरत को इतना काबिल और मजबूत बनाने की बात कोई नहीं करता कि वह तलाक के बाद अपने पैरों पर खड़ी रह कर सिर उठा कर जी सके.

यह सोचने वाले भी कम ही हैं कि तलाक की कानूनी कार्यवाही इतनी मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि लोग मारपीट, खुदकुशी और हिंसा पर उतारू हो आएं. तलाक के कानून चूंकि धर्म की बिना पर बनते और बिगड़ते हैं. इस से साफ होता है कि धर्म के दुकानदार नहीं चाहते कि तलाक फटाफट हो.

भोपाल के एक नामी वकील की मानें, तो अगर तलाक शादी की तरह 2-4 दिन में होने लगे, तो 50 फीसदी बीवी सस्ते राशन की दुकान की तरह अदालतों में लाइन लगाए नजर आएंगी.

बात गलत कहीं से नहीं है, क्योंकि अदालती लेटलतीफी और मुश्किल कानूनों के चलते मियांबीवी एक छत के नीचे घुटन भरी जिंदगी जी लेते हैं, लेकिन इंसाफ मांगने अदालत की चौखट पर नहीं जाते, क्योंकि उन्हें मालूम है कि वहां जब तक इंसाफ होगा, तब तक वे बूढ़े भी हो सकते हैं.

लाखों मामले देख यह न कहने की कोई वजह नहीं रह जाती कि तलाक में देरी की वजह से मियांबीवी एकदूसरे की जान के दुश्मन बन रहे हैं और कानून टस से मस होने को तैयार नहीं. कानून की धाराओं में बदलाव की पहल न तो संसद करती है और न ही अदालतें करती हैं, तो तय यह भी है कि हिंसा के ये मामले बढ़ते रहेंगे और आज नहीं तो कल कानून बनाने वाले और उन पर अमल करने वालों के माथे पर चिंता की लकीरें पड़ेंगी, लेकिन तब तक करोड़ों मियांबीवी या तो घुटघुट कर जीने को मजबूर होंगे और बीवियां यों ही पिटती रहेंगी.

यहां मंशा कतई शौहरों की वकालत करने की नहीं, बल्कि एक नजर उन वजहों पर भी डालने की है, जिन के चलते वे बीवी से मारपीट कर खुद जेल जा कर जिंदगी बरबाद करना पसंद करते हैं, लेकिन तलाक के लिए अदालत जाने से कतराते हैं, तो बारी कानून से जुड़े लोगों की है कि वे इन हादसों की तह में जा कर कोई हल निकालें, जिस में तलाकशुदा औरतों को भी कोई राहत हो.

नेताओं, मंत्रियों, वकीलों, पत्रकारों और जजों को अब सोचना यह चाहिए कि तलाक के कानून की कार्यवाही इतनी मुश्किल क्यों है कि उस का कहर भी ज्यादातर बीवियों पर टूट रहा है. इस संजीदा मसले पर इन लोगों की खामोशी औरतों के हक में ज्यादती नहीं तो और क्या है?

कॉमेडी फिल्म ‘‘3 शयाने’’ का ट्रेलर व गाने हुए रिलीज

सिनेमा में निरंतर बदलाव आ रहा है. अब कंटेंट प्रधान सिनेमा बनाने वालों का दल लगातार संदेश प्रद फिल्में बनाने में लगा हुआ हैं, इन्हीं में से एक हैं- निर्माता संजय सुंताकर और निर्देशक अनीस बारूदवाले. जो कि एक हास्यप्रद फिल्म ‘‘ 3 शयाने’’ लेकर आ रहे हैं, जिसमें ‘पिंजर’ व ‘तुम बिन’ फेम अभिनेता प्रियांशु चटर्जी के अलावा असरानी, जरीना वहाब, हिमानी शिवपुरी व कबीर बेदी जैसे दिग्गज कलाकार हैं, तो वहीं अर्जुमंद मुगल, निशांत तंवर, कुणाल सिंह राजपूत व हिना पंचाल जैसे नवोदित कलाकार भी हैं.

फिल्म के नायक देव शर्मा और नायिका अनुप्रिया कटोच हैं. यह दोनों कलाकार हिमाचल प्रदेश से हैं. हाल ही में फिल्म ‘‘ 3 शयाने ’’ का ट्रेलर व गाने लांच किए गए. इस अवसर पर फिल्म के सभी कलाकारों के अलावा जूनियर महमूद सहित कई हस्तियां मेहमान के तौर पर उपस्थित थीं. इस अवसर पर फिल्म के संबंध में निर्माता संजय सुन्ताकर ने कहा- ‘‘आज की युवा पीढ़ी जल्दी सफलता पाने के लिए शॉर्टकट रास्ते अपनाती है. हमारी फिल्म ‘ 3 शयाने’ की कहानी ऐसे ही तीन युवाओं की है, जो रातों रात कामयाबी हासिल करने के लिए गलत रास्तों पर चले जाते हैं. बाद में कहानी में क्या मोड़ आता है, उसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी, जो अगले माह मई के अंतिम सप्ताह में सिनेमाघरों में रिलीज होगी. लेकिन हमने इस फिल्म के माध्यम से युवा पीढ़ी को मनोरंजक तरीके से जबरदस्त संदेश दिया है.’’

फिल्म के लेखक निर्देशक अनीस बारुदवाले ने इस अवसर पर कहा- ‘‘फिल्म ‘3 शयाने’ महज हास्य फिल्म नही है, बल्कि इसमें बहुत बड़ा सामाजिक संदेश भी है. हमने अपनी इस फिल्म के द्वारा युवाओं को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जिंदगी में रातों रात दौलतमंद बनने के लिए शॉर्टकट रास्ते नहीं अपनाने चाहिए.’’

फिल्म के निर्माता संजय सुन्ताकर हैं. ए ए देसाई के कांसेप्ट पर बनी फिल्म एसएसएस फिल्म्स इंटरनेशनल -333 के बैनर तले रिलीज के लिए तैयार है. विक्रम तन्हा के लिखे गीतों को विक्रम एन विक्रम ने संगीत से सजाया है. फिल्म के गाने जावेद अली, ऋतु पाठक, बृजेश शांडिल्य और अर्पिता चक्रवर्ती ने गाए हैं.

केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने किया ‘द लाइब्रेरी कैफे’ का उद्घाटन

इन दिनों लोगों में पढ़ने की आदत खत्म सी होती जा रही है. लोगों में पढ़ने की आदत को नए सिरे से विकसित करने के मकसद से मुंबई में ‘‘कार्टर्स ब्लू’’ के मुखिया महबूब खान ने स्ट्रीट फूड के लिए लोकप्रिय मुंबई के बांद्रा पश्चिम में कार्टर रोड पर ‘द लाइब्रेरी कैफे’ शुरू की है, जिसका उद्घाटन केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री रामदास अठावले के हाथों संपन्न हुआ.

ज्ञातब्य है कि महबूब खान मुंबई के स्ट्रीट फूड/सड़क पर बिकने वाले भोजन व्यवसाय को काफी बेहतर तरीके से समझते हैं. महबूब खान का कार्टर रोड, बांदरा, पश्चिम, मुंबई का यह ‘द लाइब्रेरी कैफे’’ एक नए थीम वाला रेस्टोरेंट है.

इस रेस्टोरंट में शानदार फूड्स के साथ ही हर इंसान को विश्व प्रसिद्ध उपन्यास, पत्रिकाएं, कहानी की किताबें व अन्य दिलचस्प साहित्य आदि मुफ्त में पढ़ने के लिए लाइब्रेरी भी उपलब्ध रहेगी. आल ड़े फूड मेन्यू, काफी, टी वेस्टर्न फूड की कई वैरायटी खाने के शौकीन मुंबई वासियों को बहुत पसंद आएगा.

‘‘द लाइब्रेरी कैफे’ और ‘कार्टर्स ब्लू’’ के प्रमुख महबूब खान ने इस अवसर पर कहा- ‘‘इंसान का ज्ञान बढ़े, इसके लिए जरुरी है कि वह अच्छी किताबे, कहानियां, पत्रिकाएं आदि पढ़ता रहे. इसी सोच के साथ हमने ‘द लाइब्रेरी कैफे’ की शुरूआत की है. हमारे ‘द लाइब्रेरी कैफे‘ की थीम में खाने में विविधता के साथ किताबे पढ़ने वालों के लिए काफी कुछ खास है. खाने के शौकीन लोगों के लिए ब्रेकफास्ट मेन्यू, ऑल डे डाइनिंग मेन्यू , इनोवेटिव बेकरी फूड के साथ वैरायटी ऑफ स्वीट का ऑप्शन एक ही जगह पर उपलब्ध कराया जाएगा.

हम लोगों को अंतर्राष्ट्रीय फूड मेन्यू सर्व करेंगे साथ ही ‘द लाइब्रेरी कैफे’ का थीम डिजाइन और ‘सी फेस व्यू’ से लोगों को एक अनोखा अनुभव मिलेगा. इतना ही नही हम युवा वर्ग के लिए इन्नोवेटिव फूड के साथ ही वाय फाय की सुविधा भी उपलब्ध करा रहे हैं.’’

‘‘द लाइब्रेरी कैफे‘‘ के कार्टर रोड बांद्रा के बाद जल्द ही दादर और वरली में भी आउटलेट की शुरुआत की जाएगी. इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा- ‘‘मुझे ‘द लाइब्रेरी कैफे’ का थीम बहुत पसंद आया. मैं महबूब खान जी को इसकी सफलता की अग्रिम बधाई देना चाहता हूँ. यह कैफे अंतरराष्ट्रीय स्तर का हैं. कुछ स्नैक्स का स्वाद मुझे बहुत पसंद आया.’’

ताकझांक: भाग 1- शालू को रणवीर से आखिर क्यों होने लगी नफरत?

वह नई स्मार्ट सी पड़ोसिन तरुण को भा रही थी. उसे अपनी खिड़की से छिपछिप कर देखता. नई पड़ोसिन प्रिया भी फैशनेबल तरुण से प्रभावित हो रही थी. वह अपने सिंपल पति रणवीर को तरुण जैसा फैशनेबल बनाने की चाह रखने लगी थी.

शाम को जब प्रिया बनसंवर कर बालकनी में पड़े झले पर आ बैठती तो तरुण चोरीछिपे उस की हर बात नोटिस करता. कितनी सलीके से साड़ी पहने चाय की चुसकियां लेते हुए किसी किताब में गुम रहती है मैडम. क्या करे मियांजी का इंतजार जो करना है और मियांजी हैं जो जरा भी खयाल नहीं रखते इस बात का. बेचारी को खूबसूरत शाम अकेले काटनी पड़ती है. काश वह उस का पति होता तो सब काम छोड़ फटाफट चला आता.

तरुण का मन गाना गाने को मचलने लगता, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए…’ कितने ही गाने हैं हसीन शाम के ‘ये शाम मस्तानी…’ ‘‘तरु कहां हो… समोसे ठंडे हो रहे हैं,’’ तभी उसे सपनों की दुनिया से वास्तविकता के धरातल पर पटकती उस की पत्नी शालू की आवाज सुनाई दी.

आ गई मेरी पत्नी की बेसुरी आवाज… इस के सामने तो बस एक ही गाना गा सकता हूं कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तेरा रहूंगा ओ मेरी शालू…

‘‘बालकनी में हो तो वहीं ले आती हूं,’’ शालू कपों में चाय डालते हुए किचन से ही चीखी.

‘‘उफ… नहीं, मैं आया,’’ कह तरुण जल्दी यह सोचते हुए अंदर चल दिया, ‘कहां वह स्लिमट्रिम सी कैटरीना कैफ और कहां ये हमारी मोटी भैं…’

तरुण ने कदमों और विचारों को अचानक ब्रेक न लगाए होते तो चाय की ट्रे लाती शालू से टकरा गया होता.

तरुण रोज सुबह जौगिंग पर जाता तो प्रिया वहां दिख जाती. तरुण से रहा नहीं गया. जल्द ही उस ने अपना परिचय दे डाला, ‘‘माईसैल्फ तरुण… मैं आप के सामने वाले फ्लैट…’’

‘‘हांहां, मैं ने देखा है… मैं प्रिया और वे सामने जो पेपर पढ़ रहे हैं वे मेरे पति रणवीर हैं,’’ प्रिया उस की बात काटते हुए बोली.

‘‘कभी रणवीर को ले कर हमारे घर आएं.मैं और मेरी पत्नी शालू ही हैं… 2 साल ही हुएहैं हमारी शादी को,’’ तरुण बोला.

‘‘रियली? आप तो अभी बैचलर से ही दिखते हैं,’’ प्रिया ने तरुण के मजबूत बाजुओं पर उड़ती नजर डालते हुए कहा, ‘‘हमारी शादी को भी 2 ही साल हुए हैं.’’ अपनी तारीफ सुन कर तरुण उड़ने सा लगा.

‘‘रणवीर साहब अपना राउंड पूरा कर चुके?’’

‘‘अरे कहां… जबरदस्ती खींच कर लाती हूं इन्हें घर से… 1-2 राउंड भी बड़ी मुश्किल से पूरा करते हैं.’’

‘‘यहां पास ही जिम है. मैं यहां से सीधा वहीं जाता हूं 1 घंटे के लिए.’’

‘‘वंडरफुल… मैं भी जाती हूं उधर लेडीज विंग में…  ड्रौप कर के ये सीधे घर चले जाते हैं… सो बोरिंग… चलिए आप से मिलवाती हूं शायद आप को देख उन का भी दिल बौडीशौडी बनाने का करने लगे.’’

‘‘हांहां क्यों नहीं? मेरी पत्नी भी कुछ इसी टाइप की है… जौगिंग क्या वाक तक के लिए भी नहीं आती… आप मिलो न उस से. शायद आप को देख कर वह भी स्लिम ऐंड फिट बनना चाहे,’’ तरुण तारीफ करने का इतना अच्छा मौका नहीं खोना चाहता था.

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‘‘कल अपनी वाइफ को भी यहीं पार्क की सैर पर लाइएगा.’’ फिर कल आप के पति से वाइफ के साथ ही मिलूंगा.

‘‘ओके बाय,’’ उस ने अपने हेयरबैंड को ठीक करते हुए बड़ी अदा से थ हिलाया.

‘‘बाय,’’ कह कर तरुण ने लंबी सांस भरी.

तरुण जानबूझ कर उलटे राउंड लगाने लगा ताकि वह प्रिया को बारबार सामने से आता देख पाएगा. पर यह क्या पास आतेआते खड़ूस से पति की बगल में बैठ गई. ‘चल देखता हूं क्या गुफ्तगू, गुटरगूं हो रही है,’ सोच वह झडि़यों के पीछे हो लिया. ऐसे जैसे कुछ ढूंढ़ रहा हो… किसी को शक न हो. वह कान खड़े कर सुनने लगा…

‘‘रणवीर आप तो बिलकुल ही ढीले हो कर बैठ जाते हो. अभी 1 ही राउंड तो हुआ आप का… वह देखो सामने से आ रहा है… अरे कहां गया… कितनी फिट की हुई है उस ने बौडी… लगातार मेरे साथ 5 चक्कर तो हो ही गए उस के अभी भी… हमारे सामने वाले घर में ही तो रहता है… आप ने देखा है क्या सौलिड बौडी है उस की…’’

‘अरे, यह तो मेरे बारे में ही बात कर रही है और वह भी तारीफ… क्या बात है…. तरु तुम तो छा गए,’ बड़बड़ा कर वह सीधा हो कर पीछे हो लिया. ‘खड़ूस माना नहीं… आलसी कहीं का… बेचारी रह गई मन मार कर… चल तरु तू भी चल जिम का टाइम हो गया है’ सोच वह जौगिंग करते हुए ही जिम पहुंच गया.

प्रिया को जिम के पास उतार कर रणवीर चला गया यह कहते हुए, ‘घंटे भर बाद लेने आ जाऊंगा… यहां वक्त बरबाद नहीं कर सकता.’

‘हां मत कर खड़ूस बरबाद… तू जा घर में बैठ और मरनेकटने की खबरें पढ़.’ मन ही मन बोलते हुए तरु ने बुरा सा मुंह बनाया, ‘और अपनी शालू रानी तो घी में तर आलू के परांठे खाखा कर सुबहसुबह टीवी सीरियल से फैशन सीखने की क्लास में मस्त खुद को निखारने में जुटी होंगी.’

दूसरे दिन तरुण शालू को जबरदस्ती प्रिया जैसा ट्रैक सूट पहना कर पार्क में ले आया.1 राउंड भी शालू बड़ी मुश्किल से पूरा कर पाई. थक कर वह साइड की डस्टबिन से टकरा कर गिर गई.

‘‘कहां हो शालू? कहां गई?’’ पुकार लोगों के हंसने की आवाजें सुन तरुण पलटा. शालू की ऐसी हालत देख उस की भी हंसी छूट गई पर प्रिया को उस ओर देखता देख खिसियाई सी हंसी हंसते हुए हाथ का सहारा दे उठा दिया.

प्रिया के आगे गोल होती जा रही शालू को देख तरुण को और भी शर्मिंदगी महसूस होती. घर पर उस ने साइक्लिंग मशीन भी ला कर रख दी पर उस पर शालू 10-15 बार चलती और फिर पलंग पर फैल जाती.

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प्रेग्नेंसी के बाद मैंने ब्रा पहनना छोड़ दिया है पर डरती हूं कि कहीं स्तन बेडौल न हो जाएं, क्या करूं?

सवाल
मैं 26 वर्षीय शादीशुदा युवती हूं. मुझे 5 महीने का गर्भ है. समस्या यह है कि मेरा पेट तो उतना नहीं बढ़ रहा पर स्तन काफी बढ़ गए हैं. ब्रा भी कसने लगी है. इसलिए मैं ने ब्रा पहनना छोड़ दिया है. पर डरती हूं कि कहीं स्तन बेडौल न हो जाएं. मैं क्या करूं?

जवाब
गर्भावस्था के दौरान स्तनों का आकार बढ़ जाता है, इसलिए आप को अपनी पुरानी ब्रा टाइट होती होगी. बेहतर होगा कि सही आकार की और अच्छी क्वालिटी की ब्रा खरीदें. ब्रा पहनना न छोड़ें वरना स्तन बेडौल हो जाएंगे. अभी स्तनों के आकार को ले कर चिंतित न हों. प्रसूति के बाद और बच्चे को स्तनपान कराने पर स्तन फिर से पहले वाले आकार में आ जाएंगे.

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जब करें इनरवियर का चुनाव

फैशनेबल दिखने के लिए इनरवियर्स का सही चुनाव बहुत जरूरी है, क्योंकि इनरवियर्स ही ड्रैस की फिटिंग को उभारते हैं. यदि सही इनरवियर्स नहीं होंगे तो बौडी शेप भी खराब दिखेगी. लेकिन इनरवियर किसे दिखाने हैं, यह सोच कर लड़कियां अकसर सस्ते इनरवियर खरीद लेती हैं और यहीं हो जाती है उन से फैशन मिस्टेक. जबकि आजकल बाजार में हर ड्रैस के लिए तरहतरह के इनरवियर्स उपलब्ध हैं.

आइए, जानते हैं किस ड्रैस के साथ कौन सा इनरवियर पहनना चाहिए:

– मिनिमाइजर ब्रा स्लिम फिट टौप के लिए है यदि आप अपनी हैवी ब्रैस्ट का साइज कम दिखाना चाहती हैं तो यह ब्रा आप के लिए परफैक्ट है.

– टी शर्ट पहन रही हैं तो टीशर्ट ब्रा ही पहनें. यह ब्रा आप की ब्रैस्ट को सही आकार देगी और टीशर्ट की फिटिंग भी सही आएगी.

– पैडेड ब्रा उन ड्रैसेज के लिए है, जो बहुत ही महीन फैब्रिक मसलन सिल्क, कौटन और लिनेन से बनी होती हैं.

– यदि डीपनैक ड्रैस पहनने जा रही हैं तो डैमी ब्रा पहनना न भूलें. यह ब्रा औफशोल्डर और ट्यूब टौप के नीचे भी पहनी जा सकती है.

– हाल्टरनेक ब्रा को ढीलेढाले स्पोर्टवियर के नीचे पहनना चाहिए. यह न केवल ब्रैस्ट को स्थाई रखती है, बल्कि पसीने को भी सोखती है. यह पसीने को आप के आउटरवियर पर नहीं आने देती.

फैशन ऐक्सपर्ट विनीता कहती हैं, ‘‘ब्रैस्ट और बंप्स महिलाओं के शरीर के बहुत ही अहम हिस्से होते हैं. ये दोनों ही हिस्से महिलाओं को अच्छी फिगर देते हैं और ड्रैस को अच्छी शेप. यदि किसी महिला की ब्रैस्ट का साइज कम है तो उसे आर्टिफिशियली बढ़ाने के लिए पैडेड ब्रा पहनी जा सकती है. ब्रा की ही तरह बंप्स को बढ़ाने के लिए पैडेड पैंटीज भी मिलती हैं.’’

टीनऐजर्स के इनरवियर

दरअसल, आज की युवा पीढ़ी में इनरवियर्स से जुड़ी सही जानकारी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है खासतौर पर जब हम टीनऐजर्स की बात करते हैं, तब यह और भी महत्त्वपूर्ण विषय बन जाता है.

वर्तमान समय में कई तरह के पर्यावरण बदलाव हो रहे हैं, जिन का सीधा असर हमारे शरीर पर पड़ता है. इन बदलावों का ही असर है, जो आज लड़कियों में बहुत से शारीरिक बदलाव देखे जा रहे हैं.

इस की एक बड़ी वजह आजकल का खानपान भी है. मासिकधर्म शुरू होने पर लड़कियों के शारीरिक अंगों में विकास होता है. स्तनों का विकास भी मासिकधर्म पर निर्भर करता है.

इस तरह कम उम्र से ही लड़कियों को ब्रा पहननी होती है. यह एक ऐसी उम्र होती है जब अधिकतर लड़कियों को इस बात का आभास भी नहीं होता कि उन के स्तनों में उभार आ रहा है और वे आकार ले रहे हैं. ऐसे में एक मां ही अपनी बेटी को ब्रैस्ट केयर और ब्रा के सही चुनाव की जानकारी दे सकती है.

पेश है, कुछ खास जानकारी जो मां को अपनी बढ़ती बेटी को जरूर देनी चाहिए:

जब बेटी के स्तन आकार लेने लगें, तो तुरंत अपनी बेटी को इस बदलाव के बारे में समझाएं और उसे ट्रेनिंग या स्पोर्ट ब्रा खरीद कर पहनने को दें.

– विकसित होते स्तन कभीकभी लड़कियों को अवसाद में ले जाते हैं. इस बदलाव को लड़कियां आसानी से स्वीकार नहीं कर पातीं. दरअसल, खुद के शारीरिक अंगों में हो रहे बदलाव के बारे में दूसरों के मुंह से सुनती हैं, तो उन्हें यह परिस्थिति अटपटी लगती है, साथ ही विकसित होते स्तनों की बनावट भी अटपटी सी ही होती है. ऐसे में बेटी को कप्ड ब्रा पहनने का सुझाव दें. ऐसी ब्रा स्तनों के आकार को पौइंटेड दिखाने की जगह गोल आकार देती है. इस ब्रा में लगे अंडरवायर भी स्तनों को अच्छी सपोर्ट देते हैं.

– स्कूल में बहुत सारी ऐक्टिविटीज होती हैं, जिन में शारीरिक क्षमता का बहुत प्रयोग करना होता है. इन गतिविधियों में इस उम्र की लड़कियों को भी हिस्सा लेना होता है. मगर इस से पहले मां का फर्ज बनता है कि वह बेटी को समझाए कि उसे विकसित होते स्तनों का ध्यान रखना है और इस का ध्यान वह एक अच्छी स्पोर्ट ब्रा पहन कर ही रख सकती है. स्पोर्ट ब्रा पहनने से स्तनों के टिशूज पर प्रभाव नहीं पड़ता. इसलिए इस ब्रा को किसी स्पोर्ट में हिस्सा लेते या व्यायाम करते वक्त बेटी को पहनने को कहें.

– सवाल होते हैं. मसलन, फिटिंग, साइज और ब्रा पहनने के बाद कितना सहज महसूस हो सकता है. बेटी के मन में चल रही इस उथलपुथल को एक अच्छी फिटेड ब्रा के साथ मां ही खत्म कर सकती है.

– बेटी को डार्क कलर की ब्रा की जगह हलके रंग, हो सके तो स्किन टोन से मैच करते रंग की ब्रा पहनने की सलाह दें. दरअसल, डार्क रंग की ब्रा कपड़ों पर फ्लांट हो सकती है, लेकिन स्किन टोन कलर की ब्रा में यह दिक्कत नहीं आती.

रेप के झूठे मामलों में फंसाए जाने वाले पीड़ितों पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्पेशल स्क्रीनिंग

दीपिका नारायण भारद्वाज और नीरज कुमार द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्पेशल स्क्रीनिंग हाल ही में मुम्बई के बांद्रा स्थित सेंट एंड्रयूज ऑडिटोरियम में संपन्न हुई.

उल्लेखनीय है कि ‘इंडियाज़ सन्स’ कोई आम डॉक्यूमेंट्री फिल्म नहीं है, बल्कि इसमें एक ऐसे मसले को उठाया गया है जिसकी तरफ कोई ध्यान देना पसंद नहीं करता है. इसमें दिखाया गया है कि कैसे बलात्कार से जुड़े कानून का बेजा इस्तेमाल कर शादीशुदा मर्दों को फंसाया जाता है. ऐसे लोग जो सालों सलाखों के पीछे गुज़ारने के बाद निर्दोष करार दिये जाते हैं और बाद में कानूनी रूप से उन्हें रिहा कर दिया जाता है.

इस फ़िल्म का निर्माण शोनी कपूर ने किया है जबकि मुंबई में इस फ़िल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन की संस्थापक किरण श्रीवास्तव की ओर से किया गया था. फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन महिला सशक्तिकरण के लिए काम करनेवाली एक ऐसी संस्था है जो लैंगिक भेदभाव के बग़ैर सभी को समान हक़ और न्याय दिलाने की वकालत करती है.

इस ख़ास स्क्रीनिंग के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. एन. कृष्णा एक विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थे. उन्होंने इस डॉक्यूमेंट्री को देखने के बाद कहा, “यह फिल्म बेहद सटीक ढंग से इस बात को दर्शाती है कि कैसे पैसों की उगाही और बदले की भावना से लोग अपनी निजी हितों को सर्वोपरि रखते हुए क़ानूनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं |  यह इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पुलिस और न्यायपालिका का नज़रिया भी निष्पक्ष नहीं है. बेकसूरों के साथ ग़लत बर्ताव कर  महिलाओं के लिए न्याय की मांग करना ग़लत है |  मैं बलात्कार से जुड़े कानूनों का दूसरा पहलू सशक्त ढंग से पेश करने के लिए डायरेक्टर दीपिका नारायण भारद्वाज और ‘इंडियाज़ सन्स’ की पूरी टीम तारीफ करना चाहता हूं और उन्हें बधाई देता हूं. इस मसले पर हमें गंभीरता के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए क्योंकि ऐसे झूठे मामलों से असली पीड़ितों का भी न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है.”

गौरतलब है कि ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्क्रीनिंग खत्म होने के बाद सभी दर्शकों ने खड़े होकर देर तक तालियां बजाईं और फिल्म की खूब सराहना की. फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन की संस्थापक ने इस मौके पर कहा, “फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन के ज़रिए मैं महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ती हूं और महिला अचीवर्स पर गौरवान्वित भी महसूस करती हूं. मगर इसे विसंगति ही कहेंगे कि आज में देश के बेटों व मर्दों के हक की बात कर रही हूं. यह बात भले ही कितनी भी विसंगतिपूर्ण क्यों ना लगे, मगर एक सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है. ऐसे समय में जब महिलाएं तेज़ी से सशक्तिकरण की ओर बढ़ रही हैं, ऐसी भी कई महिलाएं हैं जो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आती हैं और इसके इसके बारे में बात करना बहुत ज़रूरी है.”

वे आगे कहती हैं, “मैं इस बात में यकीन करती हूं कि जैसे-जैसे किसी शख़्स की ताक़त में इज़ाफ़ा होता है, वैसे वैसी उसकी ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जाती हैं. इसे महज़ स्पाइडरमैन द्वारा कही गयी बात मत समझिए, बल्कि इसका एहसास करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जल्द ही दुनिया को एक ‘स्पाइडर वुमन’ की भी ज़रूरत पड़नेवाली है! ऐसे में ज़रूरी है कि हम महिलाओं की बढ़ती शक्ति के साथ-साथ महिलाओं की ज़िम्मेदारियों पर भी गहन तरीके से विचार-विमर्श करें.”

फ़िल्म ‘इंडियाज़ सन्स’ की डारेक्टर दीपिका नारायण भारद्वाज कहती हैं, “हम अक्सर सभी बेटियों के हक के लिए तो आवाज़ उठाते ही, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अब अपने देश के बेटों को न्याय दिलाने के लिए पहल करें और इस दिशा में अपनी आवाज को बुलंद करें.”

तलाश- भाग 2 : ज्योतिषी ने कैसे किया अंकित को अनु से दूर?

अनु ज्योतिषी की नकल करते हुए बोली, ‘‘बेटी, तुम्हारे भाग्य में 2 शादियां लिखी हैं. पहली शादी के 2 महीने बाद तुम्हारा पति मर जाएगा लेकिन दूसरी शादी के बाद तुम्हारा जीवन सुखी हो जाएगा.’’

कह कर अनु खिलखिला कर हंस पड़ी लेकिन मैं सन्न रह गया. इस बात को कोई तूल न देते हुए वह आगे भी कई बातें बताती गई, पर मैं कुछ न सुन सका.

बचपन से ही दादादादी, मां और पिताजी को ज्योतिषियों पर विश्वास करते देखा था. हमारे घर सुखेश्वर स्वामी हर महीने आया करते थे. वे ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति देख कर जैसा करने को कहते थे, हम वैसा ही करते. ज्योतिष पर मेरा दृढ़ विश्वास था.

अनु की कही बात इतनी गहराई से मेरे मन में उतर गई कि उस रात मैं सो नहीं सका. करवटें बदलते हुए सोचता रहा कि मैं तो अनु के साथ जीना चाहता हूं, मरना नहीं. फिर क्या उस की दूसरी शादी मुझ से होगी? मगर मैं तो शादी ही नहीं करना चाहता था. फिर कैसा तनाव हो गया था, मेरे मस्तिष्क में.

मैं अगले कई दिनों तक अनु का सामना नहीं कर सका. किसी न किसी बहाने उस से दूर रहने की कोशिश करने लगा. मगर 2-3 दिनों में ही वह सबकुछ समझ गई.

एक शाम मैं अपनी बालकनी में बैठा था कि तभी अनु आई और मेरे पास ही चुपचाप खड़ी हो गई. मैं कुछ नहीं बोल पाया. वह काफी देर तक खड़ी रही. फिर पलट कर वापस जाने लगी तो मैं ने पुकारा, ‘‘अनु.’’

‘‘हूं,’’ वह मेरी ओर मुड़ी. उस की भीगी पलकें देख कर मैं भावविह्वल हो उठा, ‘‘अनु, क्या हुआ? तुम…?’’

‘‘मुझ से ऐसी क्या गलती हो गई जो आप मुझ से नाराज हो गए. ये 3 दिन बरसों के समान भारी थे मुझ पर. यों तो एक पल भी आप के बिना…’’ वाक्य पूरा करने से पहले ही उस की आवाज रुंध गई और वह भाग कर बाहर चली गई.

मैं अवाक् सा कुरसी पर बैठा रह गया. मेरे हाथपैरों में इतनी हिम्मत नहीं रह गई थी कि उठ कर उसे रोकता और उस से कह देता, ‘हां अनु, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’

अनु चली गई थी. उस की बातें सुन कर मैं बेचैन हो उठा. वह वास्तव में मुझे चाहती थी, इस बात का मुझे यकीन नहीं हो रहा था.

मैं खानापीना, सोना सब भूल गया. निर्णय लेने की शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी. अनु के इजहार के बाद मैं भी उस से मिलने का साहस नहीं कर पा रहा था.

इस के बाद अनु मुझे बहुत दिनों तक दिखाई नहीं दी. एक दिन अचानक पता चला कि उसे कुछ लोग देखने आ रहे हैं. एकाएक मैं बहुत परेशान हो गया. इस बारे में तो मैं ने सोचा ही नहीं था. लड़का खुद भी अनु को देखने आ रहा था. अनु बहुत गंभीर थी. मेरा उस से सामना हुआ, पर वह कुछ नहीं बोली.

दूसरे दिन पता चला कि उन्होंने अनु को पसंद कर लिया है. अब सगाई की तारीख पक्की करने फिर आएंगे.

सुन कर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी कोई बहुत प्रिय चीज मुझ से छीनी जा रही हो, लेकिन उस वक्त मैं बिलकुल बेजान सा हो गया था, जैसे कुछ सोचने और करने की हिम्मत ही न रह गई हो. सारा दिन अकेले बैठ कर सोचता कि अगर अनु सचमुच मुझे पसंद करती है तो उस ने किसी और से शादी के लिए हां क्यों कर दी. फिर वह इतनी सुंदर भी नहीं जितनी कि मैं चाहता हूं. उस से ज्यादा खूबसूरत लड़की भी मुझे मिल सकती है. फिर अनु ही क्यों? और वह ज्योतिषी वाली बात… 2 शादियां… विधवा…यह सब सोचसोच कर मैं पागल सा हो जाता.

एक हफ्ता यों ही बीत गया. इस बीच अनु जब भी दिखती मैं उस से नजरें चुरा लेता. 7-8 दिन बाद लड़के वाले फिर आए और आगामी माह को सगाई की कोई तारीख पक्की कर के चले गए.

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मैं खोयाखोया सा रहने लगा. सगाई की तारीख पक्की होने के बाद अनु फिर मेरे घर आनेजाने लगी. जब भी आती, मुझ से पहले की तरह बातें करती, पर मैं असामान्य हो चला था. शादी के विषय में न मैं ने उस से कोई बात की थी और न ही बधाई दी थी.

अनु के घर सगाई की तैयारियां शुरू हो गई थीं. सगाई व शादी में

10 दिनों का अंतर था. मैं अपना मानसिक तनाव कम करने के लिए दूसरे शहर अपनी बूआ के घर चला गया था. वहीं पर 20-25 दिनों तक रुका रहा क्योंकि अनु की शादी देख पाना असह्य था मेरे लिए.

जब मैं वापस आया, अनु ससुराल जा चुकी थी. मैं अपना मन काम में लगाने लगा. मगर मेरे दिलोदिमाग पर अनु का खयाल इस कदर हावी था कि उस के अलावा मैं कुछ सोच ही नहीं पाता था.

कुछ दिनों के बाद मेरे घर में भी मेरी शादी की बात छिड़ गई. मां ने कहा, ‘‘अब तेरे लिए लड़की देखनी शुरू कर दी है मैं ने.’’

‘‘नहींनहीं, अभी रुक जाइए. 2-3 महीने…’’ मैं ने मां से कहा.

‘‘क्यों? 27 वर्ष का तो हो गया है. अधेड़ हो कर शादी करेगा क्या? फिर यह 2-3 महीने का क्या चक्कर है? मैं यह सब नहीं जानती. यह देख 3 फोटो हैं. इन में से कोई पसंद हो तो बता दे.’’

मां का मन रखने के लिए मैं ने तीनों फोटो देखी थीं.

‘‘देख, इस के नैननक्श काफी आकर्षक लग रहे हैं. रंग भी गोरा है. कद 5 फुट 4 इंच है.’’

पर मुझे उस में कोई सुंदरता नजर नहीं आ रही थी. फोटो में मुझे अनु ही दिखाई दे रही थी. मैं ने मां से कहा, ‘‘नहीं मां, अभी थोड़ा रुक जाओ.’’

‘‘क्यों? क्या तू ने कोई लड़की पसंद कर रखी है? देर करने का कोई कारण भी तो होना चाहिए?’’

मैं चुप रह गया. क्या जवाब देता, पर मैं सचमुच इंतजार कर रहा था कि कब अनु विधवा हो और कब मैं अपने मन की बात उस से कहूं.

शादी के 2 महीने बाद अनु पहली बार मायके आई तो हमारे घर भी आई. शादी के बाद वह बहुत बदल गई थी. साड़ी में उसे देख कर मन में हूक सी उठी कि अनु तो मेरी थी, मैं ने इसे किसी और की कैसे हो जाने दिया.

‘‘कैसी हो, अनु?’’ मैं ने पूछा था.

‘‘अच्छी हूं.’’

‘‘खुश हो?’’

‘‘हां, बहुत खुश हूं. आप कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हूं. तुम्हारे पति का स्वास्थ्य कैसा है?’’ अचानक ही मैं यह अटपटा सा प्रश्न कर बैठा था.

वह आश्चर्य से मेरी ओर देखते

हुए बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ है,

उन्हें?’’

‘‘नहीं, यों ही पूछा था,’’ मैं ने हड़बड़ा कर बात को संभाला, ‘‘वे तुम्हारे साथ नहीं दिखे. इसलिए…’’

‘‘ओह, लेकिन वे तो मेरे साथ ही आए हैं. घर पर आराम कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा.’’

अनु चली गई. उसे खुश देख कर मेरा मन बुझ गया. मुझ से दूर जा कर जब उसे कुछ महसूस नहीं हुआ तो मैं ही क्यों पागलों के समान उस की राह देखता हूं. अनु के खयाल को मैं ने दिमाग से झटक देना चाहा.

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गिरफ्त: भाग 1- क्या सुशांत को आजाद करा पाई शोभा

Writer- Dr. Kshama Chaturvedi

मनीषा को सामान रखते देख कर प्रिया ने पूछ ही लिया, ‘‘तो क्या, कर ली अजमेर जाने की पूरी तैयारी?’’

‘‘अरे नहीं, पूरी कहां, बस जो सामान बिखरा पड़ा है उसे ही समेट रही हूं. अभी तो एक बैग ले कर ही जाऊंगी, जल्दी वापस भी तो आना है.’’

‘‘वापस,’’ प्रिया यह सुन कर चौंकी थी, ‘‘तो क्या अभी रिजाइन नहीं कर रही हो?’’

‘‘नहीं.’’

मनीषा ने जोर से सूटकेस बंद किया और सुस्ताने के लिए बैड पर आ कर बैठ गई थी.

‘‘बहुत थक गई हूं यार, छोटेछोटे सामान समेटने में ही बहुत टाइम लग जाता है. हां, तो तू क्या कह रही थी. रिजाइन तो मैं बाद में करूंगी, पहले पुणे में जौब तो मिल जाए.’’

‘‘अरे, मिलेगी क्यों नहीं, सुशांत जीजान से कोशिश में लग जाएगा, अब तुझे वह यहां थोड़े ही रहने देगा,’’ प्रिया ने उसे छेड़ा था और मनीषा मुसकरा कर रह गई.

मनीषा और प्रिया इस महिला हौस्टल में रूममेट थीं और दोनों यहां गुरुग्राम में जौब कर रही थीं. मनीषा की शादी अगले महीने होनी तय हुई थी, इसलिए वह छुट्टी ले कर जाने की तैयारी में थी.

‘‘बाय द वे,’’ प्रिया ने उसे फिर छेड़ा था, ‘‘तू अब सुशांत के खयालों में उलझी रह और अपनी पैकिंग भी करती रह, मैं नीचे जा रही हूं. क्या तेरे लिए कौफी ऊपर ही भिजवा दूं? अरे मैडम, मैं आप ही से कह रही हूं.’’ प्रिया ने उसे झकझोरा था.

‘‘हां…हां, सुन रही हूं न, कौफी के साथ कुछ खाने के लिए भी भेज देना, मुझे तो अभी पैकिंग में और समय लगेगा,’’ मनीषा बोली.

‘‘मैं सोच रही हूं कि आज रीना के कमरे में ही डेरा जमाऊं, कुछ काम भी करना है लैपटौप पर,’’ प्रिया बोली.

‘‘हां…हां…जरूर,’’ मनीषा के मुंह से निकल ही गया था.

‘‘वह तो तू कहेगी ही, अच्छा है रात को सुशांत से अकेले में आराम से चैट करती रहना.’’ मैं चली. हां, यह जरूर कह देना कि यह सब प्रिया की मेहरबानी से संभव हुआ है.’’

‘‘अरे हां, सब कहूंगी,’’ मनीषा हंस पड़ी थी. प्रिया के जाने के बाद उस ने बचा हुआ सामान समेटा और सोचने लगी, ‘चलो, अब ठीक है. छुट्टी के बाद ही लौटेंगे तो कम से कम सामान तो पैक ही मिलेगा.’

हाथमुंह धो कर उस ने कपड़े बदले. तब तक प्रिया ने कौफी के साथ कुछ सैंडविच भी भिजवा दिए थे. कौफी पी कर वह कमरे के बाहर बनी छोटी सी बालकनी में आ गई थी.

शाम को अंधेरा बढ़ने लगा था पर नीचे बगीचे में लाइट्स जल रही थीं जिस से वातावरण काफी सुखद लग रहा था. झिलमिलाती रोशनी को देखते हुए वह बालकनी में ही कुरसी खींच कर बैठ गई थी.

तो आखिर शादी तय हो ही गई थी उस की. सुशांत को याद करते ही पता नहीं कितनी यादें दिलोदिमाग पर छाने लगी थीं.

पता नहीं उस के साथ लंबे समय तक क्या होता रहा. पापा ने कई लड़के देखे, कहीं लड़का पसंद नहीं आया तो कहीं दहेज की मांग, तो किसी को लड़की सांवली लगती.

चलचित्र की तरह सबकुछ आंखों के सामने घूमने लगा था. हां, रंग थोड़ा दबा हुआ जरूर था उस का पर पढ़ाई में तो वह शुरू से ही अव्वल रही. इंजीनियरिंग कर के एमबीए भी कर लिया. अच्छी नौकरी मिल गई. फिर आत्मनिर्भर होते ही व्यक्तित्व में भी तो निखार आ ही जाता है.

अब तो हौस्टल की दूसरी लड़कियां भी कहती हैं, ‘अरे, रंग कुछ दबा हुआ है तो क्या, पूरी ब्यूटी क्वीन है हमारी मनीषा.’

एकाएक उस के होंठों पर मुसकान खिल गई थी. सुशांत ने तो उसे देखते ही पसंद कर लिया था. फिर उस की मां और मौसी दोनों आईं और शगुन कर गईं.

अब तो 15 दिनों बाद सगाई और शादी दोनों एकसाथ ही करने का विचार था.

तय यह हुआ कि सुशांत का परिवार और रिश्तेदार 2 दिन पहले ही अजमेर पहुंच जाएं. पापा ने उन के लिए एक पूरा रिसौर्ट बुक करा दिया था. घर के रिश्तेदारों के लिए पास के एक दूसरे बंगले में ठहरने का इंतजाम था.

कल ही मां ने फोन पर सूचना दी थी, ‘मनी, सारी तैयारियां हो चुकी हैं. बस, अब तू छुट्टी ले कर आजा. घर पर तेरा ही इंतजार है.’

‘हां मां, आ तो रही हूं, परसों पहुंच जाऊंगी आप के पास,’ मां तो पता नहीं कब से पीछे पड़ी थीं.

‘बहुत कर ली नौकरी, अब घर आ कर कुछ दिन हमारे पास रह. शादी के बाद तो ससुराल चली ही जाएगी. और हां, लड़कियां शादी से पहले हलदीउबटन सब करवाती हैं. तू भी ब्यूटी पार्लर जा कर यह सब करवाना.’

‘चली जाऊंगी मां, 15 दिन बहुत होते हैं अपना हुलिया संवारने को,’ मनीषा बोली.

उस ने बात टाली थी. पर मां की याद आते ही बहुत कुछ घूम गया था दिमाग में. एक माने में मां की बात सही भी थी, अपनी पढ़ाई और फिर नौकरी के सिलसिले में वह काफी समय घर से बाहर ही रही. और अब शादी कर के घर से दूर हो जाएगी तो वे भी चाहती हैं कि बेटी कुछ दिन उन के पास भी रह ले. चलो, अब मां भी खुश हो जाएंगी. कह भी रही थीं कि मेरी पसंद के सारे व्यंजन बना कर खिलाएंगी मुझे.

‘अरे मां, अब तो मैं ज्यादा तलाभुना खाना भी नहीं खाती हूं.’

‘हां…हां, पता है. पर यहां तेरी मनमानी नहीं चलेगी, समझी,’ मां ने उसे प्यारभरी फटकार लगाई.

‘अरे, फोन बज रहा है,’ कमरे में रखा उस का मोबाइल बज रहा था. लो, मां को याद किया तो उन का फोन भी आ गया. इसी को शायद टैलीपैथी कहते हैं. वह तेजी से अंदर गई. अरे, यह तो सुशांत का फोन है, पर इस समय कैसे. अकसर उस का फोन तो रात 10 बजे के बाद ही आता था और अगर पास में प्रिया सो रही हो तो वह बाहर बालकनी में बैठ कर आराम से घंटे भर बातें करती थी पर इस समय, वह चौंकी थी.

‘‘हां सुशांत, बस, मैं कल निकल रही हूं अजमेर के लिए, थोड़ाबहुत सामान पैक किया है,’’ मोबाइल उठाते ही उस ने कहा था.

‘‘मनीषा, मैं ने इसीलिए तुम्हें फोन किया था कि तुम अब अपना प्रोग्राम बदल देना, देखो, अदरवाइज मत लेना पर मैं ने बहुत सोचा है और आखिर इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि मैं अभी शादी नहीं कर पाऊंगा इसलिए…’’

‘‘क्या कह रहे हो सुशांत? मजाक कर रहे हो क्या?’’ मनीषा समझ नहीं पा रही थी कि सुशांत कहना क्या चाह रहा है.

‘‘यह मजाक नहीं है मनीषा, मैं जो कुछ कह रहा हूं, बहुत सोचसमझ कर कह रहा हूं. अभी मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि शादी कर सकूं.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हो सुशांत, हम लोग सारी बातें पहले ही तय कर चुके हैं और अच्छीखासी जौब है तुम्हारी. फिर मैं भी जौब करूंगी ही. हम लोग मैनेज कर ही लेंगे और हां, यह तो सोचो कि शादी की सारी तैयारियां हो चुकी हैं. पापा ने वहां सारी बुकिंग करा दी है. कैटरिंग, हलवाई सब को एडवांस दिया जा चुका है.’’

‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं…’’ सुशांत ने फिर बात काटी थी, ‘‘देखो मनीषा, अभी तो टाइम है, चीजें कैंसिल भी हो सकती हैं और फिर शादी के बाद तंगी में रहना कितना मुश्किल होगा. इच्छा होती है कि हनीमून के लिए बाहर जाएं. बढि़या फ्लैट, गाड़ी सब हों, मैं ने तुम्हें बताया था न कि मेरी एक फ्रैंड है शोभा, उस से मैं अकसर राय लेता रहता हूं. उस का भी यही कहना है, चलो, तुम्हारी उस से भी बात करा दूं. वह यहीं बैठी है.’’

शोभा, कौन शोभा. क्या सुशांत की कोई गर्लफ्रैंड भी है. उस ने तो कभी बताया नहीं… मनीषा के हाथ कांपने लगे. तब तक उधर से आवाज आई. ‘‘हां, कौन, मनीषा बोल रही हैं, हां, मैं शोभा, असल में सुशांत यहीं हमारे घर में पेइंगगैस्ट की तरह रह रहे हैं, तुम्हारा अकसर जिक्र करते रहते हैं. फोटो भी दिखाया था तुम्हारा. बस, शादी के नाम पर थोड़े परेशान हैं कि अभी मैनेज नहीं हो पाएगा. अपने घरवालों से तो कहने में हिचक रहे थे तो मैं ने ही कहा कि तुम मनीषा से ही बात कर लो. वह समझदार है, तुम्हारी तकलीफ समझेगी.’’

गिरफ्त: क्या सुशांत को आजाद करा पाई शोभा

महिलाओं-औरतों के हक जरूरी

लड़कियां जैसे ही बड़ी होती हैं, उन्हें परिवार नियोजन और सेवा के बारे में राय देने की जरूरत होती है, पर सब देने में हिचकिचाते हैं. डाक्टर मांएं तक अपनी बेटियों को यह जानकारी नहीं दे पाती हैं और किशोरियों और जवान लड़कियों को ऐसी जानकारियां खुद ही जमा करनी होती हैं, नहीं तो वे टीनएज में सैक्सुअल टच, सेफ  सैक्स, जाति, धर्म, अमीरीगरीबी, जैंडर असमानता से पीडि़त रहती हैं.

जैंडर इक्वैलिटी, फीमेल एंपावरमैंट, नौजवान राइटर्स और जस्टिस पर बनाए गए कानून को लागू किए जाने पर सब लोग अपना मुंह बंद रखते हैं. इकोनौमिक फोरम की ग्लोबल जैंडर की रिपोर्ट साल 2014 से जारी हुई है. यह देशों की तुलना करती है कि कौन कहां है. कुल 156 देशों की लिस्ट में से भारत का रैंक नीचे से 140वां है.

यह बहुत ही शर्म की बात है. हम ‘मंदिरमंदिर, हिंदूहिंदू’ करते हैं, पर औरतों को भूल जाते हैं. पर हकीकत में तो कट्टर हिंदू होने का मतलब ही औरतों पर जोरजुल्म करने का लाइसैंस पाना है.

कोविड 19 ने दिखाया है कि बीमार औरतें भी बीमार पति की सेवा करती रहें, जबकि मर्द हाथ ?ाड़ कर खड़े हो गए. वैसे भी मर्दों की सेवा औरतें कामकाजी होने के बावजूद करती हैं.

एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 93 फीसदी मर्दों की सेवा औरतें ही करती हैं, जबकि मर्द अपनी जिम्मेदारियां कम सम?ाते हैं और सोचते हैं कि यह तो भगवान की देन है कि औरतें सेवा करें.

कुछ जातियों में तो आज भी पढ़ीलिखी औरतों को पैर की जूती माना जाता है. पिता और भाई ही नहीं, मां, बहन, दादी सब मिल कर जाति की दुहाई देते हुए ‘नाक कट जाएगी’ कह कर औरतों पर जोरजबरदस्ती करते हैं. जब तक मर्द औरतों की सेवा नहीं करेंगे, तब तक समाज और परिवार में तरक्की मुमकिन नहीं.

घरपरिवार में तो माली तौर पर मदद देने के बावजूद ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां औरत और मर्द के कानून अलग हैं, उन्हें आजादी नहीं. उन का खुद का घर या प्रौपर्टी नहीं. उन का आधारकार्ड या पैनकार्ड बना हो तो मर्दों के कब्जे में रहता है.

घर की अर्थव्यवस्था को संभालने वाली कमजोर होती है. औफिस में भी एक जैसे काम करने पर औरतें मर्दों से कम तनख्वाह पाती हैं.

औरतें दिमागी और जिस्मानी दोनों तरफ से जुल्म सहती हैं. इसे पढ़ाईलिखाई के जरीए कम किया जा सकता है और यह पढ़ाईलिखाई सिर्फ स्कूलकालेज तक ही सीमित नहीं है, बाद में भी जरूरी है. फिल्मों व सीरियलों में पट्टी पढ़ाई जाती है कि औरतें सेवा करें. धर्म प्रचारक रातदिन उन की सेवा का गुणगान करते हैं. इसे ठीक करने की शुरुआत घर से होनी चाहिए.

औरतों और मर्दों को समान अधिकार तब मिल पाएंगे, जब लड़कियां समाज, धर्म सभी को बदलेंगी, उन के विचार और सोच बदलेंगी. लड़के और लड़की में भेदभाव न हो, यह मांग करनी होगी. सभी को समान शिक्षा मिले, कन्या भ्रूण हत्या बंद हो. यह समस्या केवल भारत में ज्यादा है. पर हर देश में किसी न किसी रूप में औरतों को सताया जाना जारी है.

हर देश में मंदिर, चर्च, मठ, मसजिद हावी हैं, जो औरतों के हक छीन लेते हैं. लैगिक समानता, औरतों के अधिकार और महिला सशक्तीकरण पर वैसा ही आंदोलन चलाने की जरूरत है, जैसा किसानों ने चलाया था. यूएन को इस बारे में पहल करनी होगी, क्योंकि ज्यादातर देशों की सरकारें अपने पंडेपुजारियों पर निर्भर रहती हैं.

देश के टैक्स से एक  फंड बनाने की जरूरत है, जो सताई गई लड़कियों और औरतों को शैल्टर और लीगल असिस्टैंस दे सकें. गरीबी औरतों में ज्यादा है, इसे ठीक करने के लिए औरतों और लड़कियों को पढ़ते रहना पड़ेगा. उन्हें स्कूल के बाद भी किताबें, पत्रिकाएं पढ़नी चाहिए. इस के अलावा महिला नेतृत्व का बढ़ना जरूरी है. उन्हें राजनीति में आना चाहिए, ताकि औरतों और लड़कियों पर होने वाले जोरजुल्म को रोका जा सके.

यूएन, एनजीओ सिस्टम, प्राइवेट सैक्टर के लोग काफी काम कर रहे हैं. सिविल सोसाइटी इस में प्रमुख हैं. पर यह न भूलें कि धर्म के दुकानदार बहुत तेज हैं और चूंकि उन्हें इन अत्याचारों को थोपने से आदमियों से पैसा और पावर मिलती है, तो वे औरतों को दबा कर रखने वाले सिस्टम को बनाए रखना चाहते हैं.

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