दोस्ती की आड़ में कहीं सैक्स तो नहीं

अंतरा ने जब अपने पिता के ट्रांसफर के कारण नए शहर के एक नए स्कूल में दाखिला लिया तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि उस की खूबसूरती के कारण स्कूल के अधिकांश युवक उस से दोस्ती करना चाहते थे. जिस की वजह से कभी कोई उसे गिफ्ट देता तो कोई चौकलेट. किंतु शहरी लाइफस्टाइल और विपरीतलिंगी दोस्ती के गहरे अर्थों से अनजान अंतरा को यह रहस्य बिलकुल भी पता नहीं था कि इस के पीछे हकीकत क्या है. शुरूशुरू में तो अंतरा को यह सब अच्छा लगता था, क्योंकि उस से दोस्ती करने वालों और उसे चाहने वालों की लाइन जो लगी रहती थी, लेकिन अंतरा वह सब नहीं देख पा रही थी जो असल में इस दोस्ती के पीछे छिपा हुआ था. उस के लिए ऐसी दोस्ती का मतलब केवल बाहर होटल या रेस्तरां में लंच तथा डिनर करना, स्कूल कैंटीन और कौफी हाउस में कोल्डडिं्रक ऐंजौय करना और चौकलेट्स शेयर करना तथा दोस्तों की बर्थडे पार्टियों में केक खाना और मस्ती के साथ नाचगाना करने के रूप में सीमित था.

इन सब पार्टियों के कारण अंतरा अकसर स्कूल से अपने घर बड़ी देर से लौटती थी. उस के मम्मीपापा भी ज्यादा टोकाटाकी नहीं करते थे. इसलिए अंतरा खुल कर इन पलों को जी रही थी, लेकिन अंतरा के साथ एक दिन जो घटा उस की उस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.

संयोग से एक दिन गौरव का बर्थडे था, जिसे अंतरा अपना सब से अच्छा दोस्त समझती थी, उस दिन अंतरा स्कूल के बाद अन्य दोस्तों के साथ गौरव का बर्थडे सैलिब्रेट करने के लिए शहर से कुछ दूर स्थित गौरव के फार्म हाउस गई. वहां केक, मिठाइयों और चौकलेट्स के साथसाथ शराब और बियर की बोतलें भी खुलीं. अंतरा इस से बच न सकी. नशे में बेखबर अंतरा वह सबकुछ कर रही थी, जिस का उसे जरा भी अंदाजा नहीं था.

नशे की हालत में धीरेधीरे उस के दोस्तों ने अंतरा के साथ छेड़खानी शुरू कर दी. पार्र्टी में अंतरा 10-12 दोस्तों के बीच अकेली लड़की थी. अपने बदन पर अपने दोस्तों की छुअन की सिहरन को अंतरा खूब महसूस कर रही थी, लेकिन जब अंतरा को लगा कि उस के साथ जबरदस्ती की जा रही है तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. ऐसे में अपने दोस्तों से उस ने छोड़ने की मिन्नतें कीं, लेकिन वे सभी अंतरा की खूबसूरती के नशे में अंधे हो चुके थे.

अंतरा को जब लगा कि वे ऐसे नहीं मानेंगे तो वह जोरजोर से चिल्लाने लगी और पास में रखी खाली बोतलें खिड़कियों के शीशे पर मारने लगी. कहीं लोग इकट्ठे न हो जाएं इस भय से अंतरा के दोस्तों ने उसे छोड़ दिया. इस जाल से निकलने के बाद अंतरा को नए अनुभव के साथ नई जिंदगी मिली थी, जो उस के लिए बड़ी सीख थी.

सच पूछिए तो अंतरा जैसी निर्दोष और मासूम युवती के जीवन की व्यथा की यह कहानी एक लेखक की कोरी कल्पना हो सकती है, लेकिन वास्तविक दुनिया में इस तरह की सच्ची और कड़वी कहानियों से प्रिंट मीडिया के पेज और टैलीविजन के चैनल्स भरे रहते हैं. यह भी सच है कि इस तरह की घटना का शिकार होने वाली अंतरा वास्तविक जीवन और मौडर्न दुनिया में अकेली नहीं है. अंतरा जैसी कुछ युवतियां परिवार और समाज के भय से या तो आत्महत्या कर लेती हैं या फिर अपने पर किए गए जुल्मों को चुपचाप सह लेती हैं.

अहम प्रश्न यह उठता है कि जिस दोस्ती को मानव जीवन का अनमोल उपहार माना जाता है, आखिर उसी पवित्र रिश्ते को कलंकित करने की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए कौन जिम्मेदार होता है? साइकोलौजी के जनक कहे जाने वाले सिगमंड फ्रायड का यह मानना था कि मानो जीवन की हरेक ऐक्टिविटी केवल 2 उद्देश्यों से प्रभावित होती है, प्रसिद्धि पाने की लालसा और सैक्स. इस तरह सैक्स को मानव जीवन में एक कुदरती आवश्यकता के रूप में शुमार किया जाता है.

सच पूछिए तो किसी युवक और युवती के बीच दोस्ती संबंधों की मर्यादा और उस की पवित्रता का वहन करना कोईर् आसान काम नहीं होता. दोस्ती का यह रिश्ता जिस नाजुक डोर से बंधा होता है वह तनमन की हलकी सी गरमी से भी दरक उठता है. लिहाजा, यदि आप भी तथाकथित दोस्ती के किसी ऐसे बंधन से बंधे हुए हैं तो आप को इस पवित्र रिश्ते को स्वच्छ रखने के लिए अपने मन पर बड़ी कठोरता से नियंत्रण रखने की आवश्यकता है, क्योंकि युवक और युवतियों की दोस्ती के बंधन की उम्र बहुत छोटी होती है. ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की दोस्ती की आड़ में केवल युवक ही सैक्सुअल रिलेशन बनाने की ताक में रहते हैं बल्कि युवतियां भी इस में पीछे नहीं रहतीं.

संस्कार जब एक छोटे से गांव से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर कालेज की पढ़ाई के लिए शहर आया तो उसे शुरू में सबकुछ अजीब सा लगता था. वह बहुत शर्मीले स्वभाव का था और वह युवतियां तो दूर युवकों से भी बड़ी मुश्किल से बात करता था. लेकिन वह बहुत होशियार था और पेरैंट्स उसे एक आईएएस औफिसर के रूप में देखना चाहते थे. वर्षा भी उसी की क्लास में पढ़ती थी और संस्कार के रिजर्व नेचर और होशियार होने के कारण उसे मन ही मन काफी चाहती भी थी, लेकिन वह संस्कार को इस बारे में बता पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी.

संयोग से एक दिन उस के कालेज का एक हिल स्टेशन पर जाने का प्रोग्राम बना और इस दौरान दोनों को बस में एकसाथ बैठने का मौका मिल गया. मौका पा कर वर्षा ने संस्कार के हाथों में हाथ डाल कर अपने मन की बात कह डाली. यह सुन संस्कार के होश उड़ गए और उस ने बिना सोचेसमझे ही उसे मना कर दिया, क्योंकि वह जिस बैकग्राउंड से आया था उस में उस के लिए इन सब चीजों को ऐक्सैप्ट करना संभव नहीं था.

ठीक है, तुम मुझे प्यार नहीं कर सकते तो हम दोनों दोस्त बन कर तो रह ही सकते हैं. क्या तुम मेरी फैं्रडशिप भी ऐक्सैप्ट नहीं करोगे? वर्षा ने प्यार के अंतिम तीर के रूप में जब यह प्रश्न संस्कार के सामने रखा तो संस्कार भावनाओं के सागर में गोते लगाने लगा और इस के लिए उस ने हामी भर दी.

दोस्ती के नाम पर अब वे दोनों साथ घूमतेफिरते, मस्ती करते. वक्त के साथ उन दोनों के बीच दोस्ती और भी गहरी होती गई और धीरेधीरे साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाई जाने लगीं. वैलेंटाइन डे के दिन जब पूरा कालेज डांस और म्यूजिक में बिजी था तो संस्कार और वर्षा फरवरी की उस कुनकुनी ठंड में शहर के एक खूबसूरत पार्क में साथसाथ जीवन जीने के सपने बुन रहे थे.

सूरज डूब चुका था और शाम के साए में रोशनी धीरेधीरे खत्म हो रही थी. वहां से लौटते हुए वर्षा और संस्कार की करीबी में जीवन की सारी मर्यादाओं की रेखा मिट चुकी थी. दोस्ती के बंधन में प्यार और वासना की भूख ने कब सेंध लगा दी, इस का एहसास भी प्रेमी युगल को नहीं हो पाया.

जब इस प्रकार दोस्ती निभाने का प्रश्न उठता है तो ऐसा करना किसी तलवार की धार पर चलने से कम खतरनाक नहीं होता. पहले तो आप इस प्रकार के रिश्ते को अपने परिवार वालों से छिपा कर न रखें. महंगे गिफ्ट्स के ऐक्सचेंज से दूर रहने की कोशिश करें, क्योंकि जब इस प्रकार के महंगे गिफ्ट्स के ऐक्सचेंज की शुरुआत होती है तो एकदूसरे से अपेक्षाओं का दायरा काफी बढ़ जाता है और इस के साथ सब से बड़ी बात यह होती है कि इस प्रकार की अपेक्षाओं की कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होती.

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पार्टी और फंक्शन में अपने फ्रैंड्स के साथ अकेले जाने से परहेज करें, क्योंकि मन के आवेग का कोई भरोसा नहीं होता. यदि ऐसी पार्टियों में जाना निहायत जरूरी हो तो अपने परिवार के किसी सदस्य या फिर कौमन फैं्रड्स के साथ जाएं. ऐसा करने से आप सेफ रहेंगी.

गड़बड़झाला: मुख्यमंत्री और राजपाल पद बिक रहे हैं

मुख्यमंत्री और राजपाल पद बिक रहे हैं आजादी के बाद संवैधानिक रूप से देश में नेताओं का एक ऐसा समूह पैदा हुआ, जो आम जनता के बीच से निकल कर देशसेवा के नाम पर सत्ता का संचालन करने लगा. देशसेवा के नाम पर नेताओं का यह जत्था देशभर में किस तरह माफियागीरी और लूट का दूसरा नाम बन गया है, यह आज दक्षिण भारत की फिल्मों में खासतौर से दिखाया जा रहा है. दरअसल, देश में राजनीति कितनी नीचे गिर गई है, इस की आम जनता कल्पना भी नहीं कर सकती. विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री पद तो बिकते हम देख रहे हैं,

सारी दुनिया देख रही है, यह सब संविधान की आड़ में होता रहा है. नतीजतन, आम जनता भी देख कर कर चुप रह जाती है और देश की सुप्रीम कोर्ट भी, क्योंकि इस मर्ज का इलाज किसी के पास नहीं है. मगर, अब तो हद हो गई है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद भी बिकने लगे हैं. बेवकूफी की हद देखिए कि करोड़ों रुपए खर्च करने के लिए धनपति तैयार हैं. इन में इतनी भी समझ नहीं है कि राज्यपाल जैसा पद, जो सीधेसीधे केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के फैसले पर ही नवाजा जाता है, किसी भी हालात में रुपएपैसे दे कर हासिल नहीं किया जा सकता. यह एक ऐसा पद है, जो कोई भी पार्टी अपने बड़े चेहरों को ही देती आई है. ऐसे में राज्यपाल पद के लिए रुपए लुटाना और ठगी का शिकार हो जाना उदाहरण है कि हमारे यहां कैसेकैसे लोग हैं,

जिन्हें न तो कानून की जानकारी है और न ही जनरल नौलेज. ऐसा एक मामला देश में पहली दफा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने राज्यसभा सीट और राज्यपाल पद दिलाने का झूठा वादा कर लोगों से तथाकथित तौर पर 100 करोड़ रुपए की ठगी की कोशिश करने वाले एक अंतर्राज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ कर इस के 4 बदमाशों को गिरफ्तार किया है. सीबीआई ने इस मामले में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में 7 जगहों पर छापेमारी कर के आरोपियों को धर दबोचा है. अफसरों के मुताबिक, सीबीआई ने महाराष्ट्र के लातूर जिले के रहने वाले कमलाकर प्रेमकुमार बंदगर, कर्नाटक के बेलगाम के रवींद्र विट्ठल नाईक और दिल्ली एनसीआर के रहने वाले महेंद्र पाल अरोड़ा और अभिषेक बूरा को गिरफ्तार कर लिया.

कार्यवाही के दौरान मोहम्मद एजाज खान नामक एक आरोपी फिल्मी स्टाइल में सीबीआई अफसरों पर हमला कर के फरार होने में कामयाब हो गया. फरार आरोपी के खिलाफ जांच एजेंसी के अफसरों पर हमला करने के आरोप में स्थानीय थाने में एक अलग से प्राथमिकी दर्ज कराई गई है और उसे ढूंढ़ा जा रहा है. लगती फिल्म स्क्रिप्ट, मगर है सच किसी को सांसद बनाने का मामला तो समझ में आता है और न जाने कितने लोग सांसद बनाने के लालच में लूटे भी जा चुके हैं, मगर देश में शायद यह पहला मामला है, जब किसी राज्य के राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठाने या नियुक्ति के नाम पर ठगी हुई है. केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मामले के सिलसिले में 5 आरोपियों को प्राथमिकी में नामजद किया है. लेकिन यह भी बात सामने है कि इतनी बड़ी ठगी के बाद भी सीबीआई की एक विशेष अदालत ने एजेंसी द्वारा गिरफ्तार किए गए सभी 4 लोगों को जमानत दे दी है. सवाल है कि क्या सीबीआई की जांच अधूरी है?

क्या इस जांच पर राजनीतिक नजर है? क्या सीबीआई ऐसे बड़े लोगों पर हाथ डाल चुकी है, जिन्हें राजनीतिक सरपरस्ती हासिल है या वे बेकुसूर हैं? यह सब तो निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा, मगर जो तथ्य आज हमारे सामने हैं, उन की बिना पर हम कह सकते हैं कि प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि कमलाकर प्रेमकुमार बंदगर खुद को एक वरिष्ठ सीबीआई अफसर के तौर पर पेश करता था और ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों के साथ अपने ‘संबंधों’ का हवाला देते हुए अभिषेक बूरा, महेंद्र पाल अरोड़ा, मोहम्मद एजाज खान और रवींद्र विट्ठल नाईक से कोई भी ऐसा काम लाने को कहता था, जिसे वे भारीभरकम रकम के एवज में पूरा करवा सकें. प्राथमिकी के मुताबिक, आरोपियों ने राज्यसभा की सीट दिलवाने, राज्यपाल के रूप में नियुक्ति करवाने और केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों के अधीन आने वाली अलगअलग सरकारी संस्थाओं का अध्यक्ष बनवाने का झूठा भरोसा दे कर लोगों से भारीभरकम रकम ऐंठने के गलत इरादे से साजिश रची.

प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि आरोपी 100 करोड़ रुपए के एवज में राज्यसभा की उम्मीदवारी दिलवाने के झूठे वादे के साथ लोगों को ठगने की कोशिशों में जुटे थे. प्राथमिकी के मुताबिक, सीबीआई को सूचना मिली थी कि आरोपी सीनियर नौकरशाहों और राजनीतिक पदाधिकारियों के नाम का इस्तेमाल करेंगे, ताकि किसी काम के लिए उन से संपर्क करने वाले ग्राहकों को सीधे या फिर अभिषेक बूरा जैसे बिचौलिए के जरीए प्रभावित किया जा सके. प्राथमिकी के मुताबिक,

कमलाकर प्रेमकुमार बंदगर ने खुद को सीबीआई के एक बड़े अफसर के तौर पर पेश किया था और अलगअलग पुलिस थानों के अफसरों से अपने परिचित लोगों का काम करने को कहा था और अलगअलग मामलों की जांच को प्रभावित करने की कोशिश भी की थी. सच तो यह है कि ऐसे मामलों में सीबीआई या दूसरी जांच एजेंसियां अपनी कामयाबी की बड़ीबड़ी बातें मीडिया के जरीए देश के सामने रख देती हैं और अपनी इमेज बनाने का काम कर लेती हैं, मगर आखिर में नतीजा यह आता है कि सुबूत न होने के चलते आरोपियों को अदालत बेकुसूर मान कर रिहा कर देती है. ऐसे में जरूरत यह है कि जो सांसद, राज्यपाल, मंत्री, मुख्यमंत्री पद आज देश में बिक रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए कानून के साथसाथ सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों को निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए और चाहे यह काम सत्ता पक्ष करे या विपक्ष, उसे जेल के सींखचों के पीछे भेज देना चाहिए.

मुझे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा है मेरी बातें सुनने वाला कोई नहीं है, मै क्या करूं?

सवाल-

मैं कालेज में पढ़ने वाला युवा हूं. लगता है कि घर से कालेज जाना ही मेरे जीवन में रह गया है. वैसे घर में कोई परेशानी नहीं है. लेकिन कुछ है जो मुझे अंदर ही अंदर कचोट रहा है और जीवन उदासीनता की तरफ बढ़ रहा है.

मातापिता को जैसे मेरे जीवन में कोई रुचि नहीं है. भाईबहन अपने दोस्तों में व्यस्त रहते हैं. दोस्तों को ट्रैंड फौलो करने से फुरसत नहीं, जो मेरा हाल पूछें. अकेलापन मुझे अवसादग्रस्त कर रहा है. मुझे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा है. मेरी बातें सुनने वाला कोई है ही नहीं. क्या मुझे सभी से बात करनी चाहिए, क्या कोई मेरी बात समझेगा?

जवाब-

बदलते समय के साथ रिश्ते बदल चुके हैं, इस में दोराय नहीं है. मातापिता हों या भाईबहन, वे आप को निजी कारणों से समय नहीं देते, जो कि गलत भी है. आप को अपने मातापिता से बात करनी ही चाहिए. हो सकता है कि उन्हें लग रहा हो कि वे आप को स्पेस दे रहे हैं और इसीलिए आप के अकेलेपन को समझ न पा रहे हों. वे बातें कर रहे हों तो आप भी उन के साथ बैठ कर बातें कीजिए, अपना समय भी उन्हें दीजिए.

अकसर भाईबहन एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहते हैं, आप उन की मनपसंद चीजों में रुचि लें तो आप के बीच सौहार्द की और दोस्ती की नई शुरुआत हो सकती है. और रही बात दोस्तों की, तो आप उन्हें अपने डिप्रैशन के विषय में बताइए, वे अवश्य ही आप को समय देना, ट्रेंड फौलो करने से ज्यादा जरूरी समझेंगे. यदि वे ऐसा नहीं करते तो आप खुद ही समझदार हैं कि आप को किन दोस्तों की जरूरत है और किन की नहीं.

इंडिया पाकिस्तान के मैच के दौरान क्यों ट्रोलिंग की शिकार हुईं उर्वशी रौतेला

बॉलीवुड एक्ट्रेस उर्वशी रौतेला अपनी फिल्मों से ज्यादा अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर चर्चा में बनी रहती हैं. एक्ट्रेस का नाम इंडियन क्रिकेटर ऋषभ पंत के साथ जोड़ा जाता है. दोनों को लेकर आए दिन बी टाउन में चर्चा होते रहता है.

इसी बीच उर्वशी रौतेला इंडिया  पाकिस्तान के मैच को देखने के लिए दुबई पहुंची, जिसके बाद से ऋषभ और उन्हें लेकर खूब मीम्स बनें. दरअसल, एक बार उर्वशी ने बयान दिया था कि उन्हें मैच देखना नहीं पसंद है. अब जब वो दुबई मैच देखने पहुंची तो लोगों ने उन्हें ट्रोल करने का मौका कैसे छोड़ते.


बता दें कि उर्वशी रौतेला इससे पहले भी कई बार ट्रोल हो चुकी हैं. उर्वशी का नया-नया लुक फैंसस को खूब पसंद आता है. उर्वशी रौतेला अपनी फिल्मों से ज्यादा अपनी नई- नई एक्टिविटी को लकर चर्चा मं बने रहते हैं.

उर्वशी नए- नए फोटोशूट औऱ अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चर्चा में बनी रहती हैं. फैंस को भी उर्वशी के नए पोस्ट का इंतजार रहता है. उर्वशी रौतेला मिस उनीवर्स रह चुकी है. उर्वशी न इसके साथ ही कई सारी हिट फिल्मों में भी काम किया है. उर्वशी कि फिल्मों का इंतजार रहता है.

बता दें कि उर्वशी अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने फोटो शूट और काम को लेकर चर्चा में बनी रहती हैं. उर्वशी की मां भी उनसे कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं.

 

उलझन- भाग 1 : कनिका की मां प्रेरणा किसे देख कर थी हैरान?

‘‘मम्मी, आप को फोटो कैसी लगी?’’ कनिका ने पूछा, ‘‘अभिषेक कैसा लगा, अच्छा लगा न, बताओ न मम्मी… अभिषेक अच्छा है न…’’

कनिका लगातार फोन पर पूछे जा रही थी पर प्रेरणा के मुंह में मानो दही जम गया हो. एक भी शब्द मुंह से नहीं निकल रहा था.

‘‘आप तो कुछ बोल ही नहीं रही हो मम्मी, फोन पापा को दो,’’ कनिका ने तुरंत कहा.

प्रेरणा की चुप्पी कनिका को इस वक्त बिलकुल भी नहीं भा रही थी. उसे तो बस अपनी बात का जवाब तुरंत चाहिए था.

‘‘पापा, अभिषेक कैसा लगा?’’ कनिका ने कहा, ‘‘मैं ने उस के पापा व मम्मी की फोटो ईमेल की थी…आप ने देखी, पापा…’’ कनिका की खुशी उस की बातों से साफ झलक रही थी.

‘‘हां, बेटे, अभिषेक अच्छा लगा है अब तुम वापस इंडिया आ जाओ, बाकी बातें तब करेंगे,’’ अनिकेत ने कनिका से कहा.

कनिका एम. टैक करने अमेरिका गई थी. वहीं पर उस की मुलाकात अभिषेक से हुई थी. दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. 2 साल के बाद दोनों इंडिया वापस आ रहे थे. आने से पहले कनिका सब को अभिषेक के बारे में बताना चाह रही थी.

सच में नया जमाना है. लड़का हो या लड़की, अपना जीवनसाथी खुद चुनना शर्म की बात नहीं रही. सचमुच नई पीढ़ी है.

कनिका जिद किए जा रही थी, ‘‘पापा, बताइए न प्लीज, अभिषेक कैसा लगा…मम्मी तो कुछ बोल ही नहीं रही हैं, आप ही बता दो न…’’

‘‘कनिका, जिद नहीं करते बेटा, यहां आ कर ही बात होगी,’’ अनिकेत ने कहा.

पापा की आवाज तेज होती देख कनिका ने चुप रहना ही ठीक समझा.

‘‘तुम्हें अभिषेक कैसा लगा? लड़का देखने में तो ठीक लग रहा है. परिवार भी ठीकठाक है. इस बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ अनिकेत ने फोन रखते हुए प्रेरणा से पूछा.

‘‘मुझे नहीं पता,’’ कह कर प्रेरणा रसोई में चली गई.

‘‘अरे, पता नहीं का क्या मतलब? परसों कनिका और अभिषेक इंडिया आ रहे हैं. हमें कुछ सोचना तो पड़ेगा न,’’ अनिकेत बोले जा रहे थे.

पर अनिकेत को क्या पता था कि जिस अभिषेक के परिवार के बारे में वे प्रेरणा से पूछ रहे हैं उस के बारे में वह कल रात से ही सोचे जा रही थी.

कल इंटरनैट पर प्रेरणा ने कनिका द्वारा भेजी गई अभिषेक और उस के परिवार की फोटो देखी तो एकदम हैरान हो गई. खासकर यह जान कर कि अभिषेक, कपिल का बेटा है. वह मन ही मन खीझ पड़ी कि कनिका को भी पूरी दुनिया में यही लड़का मिला था. उफ, अब मैं क्या करूं?

अभिषेक के साथ कपिल को देख कर प्रेरणा परेशान हो उठी थी.

‘‘अरे, प्रेरणा, देखो दूध उबल कर गिर रहा है, जाने किधर खोई हुई हो…’’ अनिकेत यह कहते हुए रसोई में आ गए और पत्नी को इस तरह खयालों में डूबा हुआ देख कर उन को भी चिंता हो रही थी.

‘‘प्रेरणा, तुम शायद कनिका की बात से परेशान हो. डोंट वरी, सब ठीक हो जाएगा,’’ कनिका के इस समाचार से अनिकेत भी परेशान थे पर आज के जमाने को देख कर शायद वे कुछ हद तक पहले से ही तैयार थे, फिर पिता होने के नाते कुछ हद तक परेशान होना भी वाजिब था.

अनिकेत को क्या पता कि प्रेरणा परेशान ही नहीं हैरान भी है. आज प्रेरणा अपनी बेटी से नाराज नहीं बल्कि एक मां को अपनी बेटी से ईर्ष्या हो रही थी. पर क्यों? इस का जवाब प्रेरणा के ही पास था.

किचन से निकल कर प्रेरणा कमरे में पलंग पर जा आंखें बंद कर लेटी तो कपिल की यादें किसी छायाचित्र की तरह एक के बाद एक कर उभरने लगीं. प्रेरणा उस दौर में पहुंच गई जब उस के जीवन में बस कपिल का प्यार ही प्यार था.

कपिल और प्रेरणा दोनों पड़ोसी थे. घर की दीवारों की ही तरह उन के दिल भी मिले हुए थे.

छत पर घंटों खड़े रहना. दूर से एकदूसरे का दीदार करना. जबान से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती थी. आंखें ही हाले दिल बयां करती थीं.

निश्चित समय पर आना और अनिश्चित समय पर जाना. न कुछ कहना न कुछ सुनना. अजब प्रेम कहानी थी प्रेरणा और कपिल की. बरसाती बूंदें भी दोनों की पलकें नहीं झपका पाती थीं. एक दिन भी एकदूसरे को देखे बिना वे नहीं रह सकते थे.

 

अपराध: नजदीकी रिश्तों में हत्या

नजदीकी रिश्तों में हत्या कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश विधानपरिषद के सभापति रमेश बाबू यादव के 22 साल के बेटे अभिजीत की हत्या में उस की 55 साल की मां मीरा यादव की गिरफ्तारी की गई थी. एक मां ने अपने सगे बेटे की हत्या क्यों की? वजह थी, बेटे का नशा कर के मां को मारनापीटना. मां भी कहां तक सहन करती. एक दिन उस का गुस्सा भड़क गया और परिवार तबाह हो गया. इस मामले में मां ने बेटे की हत्या की,

क्योंकि वह शराब पीता था और मां से पैसे मांगता था, जो मां के पास थे ही नहीं. इंगलैंड में रहे रहे भारतीय मूल के मुसलिम परिवार की मां ने साल 2010 में 7 साल के बेटे की हत्या केवल इसलिए कर दी थी कि वह कुरान की आयतें याद नहीं कर पा रहा था. गुरदासपुर, पंजाब में नाजायज रिश्ता बनाए रखने के लिए एक औरत ने अपने बेटे की हत्या कर उस की लाश नदी में फेंक दी थी. इसी तरह बहराइच, उत्तर प्रदेश में एक औरत ने अपने बेटे की हत्या कर डाली, क्योंकि वह पहले अपने पति की मौत के बाद प्रेमी के साथ चली गई, पर जब बेटे ने अपना मकान बना लिया तो वह लौट कर रहना चाहती थी. इस अनबन में मां ने अपने प्रेमी की मदद से बेटे की हत्या कर डाली. हरियाणा में रोहतक में एक मां ने अपने छोटे बेटे के साथ मिल कर बड़े बेटे की हत्या कर डाली थी, जो 22 साल का था. उन्होंने उसे घर में ही गड्ढा खोद कर दबा दिया था. हालांकि इस तरह के मामलों में मां को गिरफ्तार कर ही लिया जाता है,

पर केरल हाईकोर्ट के जज ने एक मामले में सजा उलटते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में जो दिखता है, उस से कुछ अलग भी होता है. कोई भी अपने पिता व उस कथित मां की भावनाओं को पूरी तरह नहीं सम झ सकता, जिस ने अपने बेटे की ही हत्या कर डाली है. आमतौर पर औरत के अधकचरे बदलते बयानों, पुलिस की रिपोर्ट, पड़ोसियों के बयानों पर ही फैसले सुना दिए जाते हैं और मां की सही हालत का आकलन नहीं होता है. नशे की लत ने बढ़ाई दूरी अभिजीत यादव के मामले में रमेश यादव खुद 12, कालीदास मार्ग पर बने अपने सरकारी आवास में रहते थे. दारुलशफा में बने आवास में उन का आनाजाना नहीं होता था. रमेश यादव मूलरूप से एटा के रहने वाले थे. वे ज्यादातर समय वहीं गुजारते थे. मीरा का बड़ा बेटा अभिषेक कंस्ट्रक्शन का काम करता था.

उस ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. छोटा बेटा अभिजीत अपनी पढ़ाई के साथ दूसरे काम करता था, पर वह किसी भी काम में कामयाब नहीं हुआ था. ऐसे में वह नशे का शिकार भी हो गया था. अभिजीत को यह लगता था कि उसे जितना पैसा मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है. ऐसे में उस का मां के साथ झगड़ा होता था. मां के साथ झगड़े में अभिजीत अपने पिता रमेश यादव के साथ की गई शादी को ले कर भी ताने मारता था और उन के चरित्र को ले कर भी सवाल उठाता था. मीरा को ये बातें बुरी लगती थीं. मीरा ने अपने गहने बेच कर बेटे का बिजनैस शुरू कराया, पर वह उस में कामयाब नहीं हो सका. दशहरे के दिन भी अभिजीत ने अपनी मां से पैसे मांगे और न मिलने पर झगड़ा किया. मां को मारापीटा भी था. बारबार पैसे दे कर मीरा भी थक चुकी थीं. लखनऊ के एएसपी पूर्वी सर्वेश कुमार मिश्रा ने बताया कि पुलिस को दिए गए अपने बयान में मीरा ने कहा कि अभिजीत शराब पीने का आदी था.

वह आएदिन शराब पी कर हंगामा करता था. वे रोजरोज के झगड़े से तंग आ चुकी थीं. शनिवार की रात को तकरीबन 11 बजे अभिजीत शराब के नशे में चूर हो कर आया और आते ही गालीगलौज करने लगा. मीरा ने अभिजीत को थप्पड़ मारते हुए धक्का दे दिया, जिस से वह मर गया. ऐसे मामलों में मां को जेल में रखना कानून की तो जरूरत हो सकती है, पर इस का कोई नैतिक आधार नहीं है. बेटे की हत्या पर मां को सजा देना एक गलत बात है. उसे 2 बार सजा दी जा रही है. एक मां के रूप में और एक अपराधी के रूप में. हर इनसान एक ही सजा का पात्र होता है, 2 का नहीं.

अंधविश्वास: जरूरी नहीं है कांवड़ यात्रा कदमों को सही दिशा में ले जाएं

जरूरी नहीं है कांवड़ यात्रा कदमों को सही दिशा में ले जाएं हिंदुओं की धार्मिक किताबों के मुताबिक, शिव के ज्योतिर्लिंग पर गंगा जल चढ़ाने की परंपरा को कांवड़ यात्रा कहा जाता है. यह जल एक पवित्र जगह से अपने कंधे पर ले जा कर शिव को सावन के महीने में चढ़ाया जाता है. इस यात्रा के दौरान कांवडि़ए ‘बम भोले’ के नारे लगाते हुए पैदल यात्रा करते हैं. कहा यह भी जाता है कि कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है.

पर क्या वाकई ऐसा होता है या सिर्फ धार्मिक किताबों का हवाला दे कर किसी मान्यता को पूरा करने के लिए लोगों को भरमाया जाता है? देखा जाए तो हर किसी को कोई भी धर्म अपनाने और उस का पालन करने का हक है और यह उस की निजी पसंद होती है, लेकिन धर्म का दिखावा करना किसी भी लिहाज से सही नहीं है. हिंदू धर्म में तमाम तरह के धार्मिक कर्मकांड हैं और हर कर्मकांड को पूरा करने के बाद लोगों की ऊपर वाले से उम्मीद बंध जाती है कि अब तो सब सही हो जाएगा. इसी बात को सच साबित करने के लिए लोग तरहतरह की धार्मिक यात्राएं करते हैं, जिन में से एक कांवड़ यात्रा भी है. ऐसा नहीं है कि भारत में कांवड़ यात्रा कोई नया चलन है, पर जब से देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है, तब से इस यात्रा का काफी महिमामंडन किया गया है. इसे ऐसा उत्सव बना दिया है कि लोगों में कांवड़ यात्रा करने की होड़ सी मच गई है. दरअसल, जब कोई मान्यता भेड़चाल में बदल जाती है, तो उस से भक्तों को कोई फायदा हो या न हो, पर देश और समाज को काफी नुकसान होता है. साल 2022 की कांवड़ यात्रा पर नजर डालें, तो 13 दिन की इस कांवड़ यात्रा ने शासन और प्रशासन के सारे इंतजाम फेल कर के रख दिए. ऋषिकेश, हरिद्वारदिल्ली हाईवे कांवडि़यों और उन के वाहनों की भीड़ से अटा हुआ था.

इस से दूसरे उन यात्रियों को परेशानी हो रही थी, जो अपने रोजमर्रा के कामों पर घर से निकले हुए थे. शिव मंदिरों पर जल चढ़ाने से एक दिन पहले यानी सोमवार, 25 जुलाई, 2022 को देहरादून से कुमाऊं और उत्तर प्रदेश जाने वाली बसें नेपाली फार्म इलाके तक ही जा सकीं. यात्रा का आखिरी दिन होने के चलते सोमवार को कांवडि़यों की भीड़ से गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से ले कर ज्वालापुर तक 4 किलोमीटर का इलाका पूरी तरह से जाम हो गया था. हरिद्वार से सप्लाई नहीं मिल पाने के चलते देहरादून के तीनों सीएनजी पंपों पर सोमवार को सीएनजी गैस की किल्लत रही थी. सोमवार, 25 जुलाई को 60 लाख शिव भक्तों ने गंगाजल भर कर अपने प्रदेशों के लिए वापसी की थी. अब तक 3 करोड़, 50 लाख, 70 हजार श्रद्धालु वापसी कर चुके थे. इस सब में पुलिस को यातायात व्यवस्था बनाने के लिए पसीना बहाना पड़ा था. इस साल 14 जुलाई, 2022 को कांवड़ यात्रा शुरू हुई थी. यात्रा शुरू होने से पहले ही शिव भक्तों का हरिद्वार और ऋषिकेश पहुंचना शुरू हो गया था. याद रहे कि कोरोना संक्रमण के चलते पिछले 2 साल कांवड़ यात्रा की इजाजत नहीं मिली थी. इस बार शासन और प्रशासन ने बिना किसी पाबंदी के कांवड़ यात्रा करने की इजाजत दे दी थी. पुलिस प्रशासन ने 4 करोड़ कांवडि़यों के आने की उम्मीद जताई थी. 4 करोड़ लोग उस यात्रा पर निकले हुए थे,

जिस का फल उन्हें पता नहीं कब मिलेगा, पर इस से दूसरे लोगों को जो परेशानियां हुईं, वे तो साफ नजर आईं. एक मामले से इसे समझते हैं. रविवार, 24 जुलाई, 2022 को उत्तराखंड में कांवड़ स्पैशल ट्रेन में बम की सूचना से हड़कंप मच गया था. यह ट्रेन दिल्ली से यात्रियों को ले कर हरिद्वार पहुंची थी. पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने आननफानन में यात्रियों को अलर्ट करते हुए स्टेशन में छानबीन की, लेकिन बम कहीं नहीं मिला. जांच में सामने आया कि बम होने की सूचना फर्जी थी. कांवडि़यों का किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था और गाजियाबाद के रहने वाले रिंकू वर्मा ने कंट्रोल रूम में ट्रेन में बम होने की झूठी सूचना दे दी. बाद में पुलिस ने रिंकू वर्मा को गिरफ्तार कर लिया था. वह नशे में था और कांवड़ लेने हरिद्वार आया था. इस बात से यह तो साबित हो गया कि रिंकू वर्मा का कांवड़ यात्रा में आने का कोई धार्मिक मकसद नहीं था और उस की वजह से जो तनाव का माहौल बना उस से दूसरे लोगों की जान सांसत में आ गई थी. इसी तरह कांवड़ यात्रा के बीच उत्तर प्रदेश के बिजनौर में माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई. जानकारी के मुताबिक, भगवा रंग का साफा पहने 2 लोगों ने एक मजार में तोड़फोड़ की. उन दोनों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

बाद में पता चला कि वे दोनों मुसलिम समुदाय से थे. यहां सवाल उठता है कि ऐसी धार्मिक यात्रा से क्या फायदा, जो लोगों की भावनाओं को भड़काने की वजह बने? ऐसे लोगों पर हैलीकौप्टर से फूलों की बारिश करने की क्या तुक है, जो जरा सी बात पर भड़क कर पूरा रोड ही जाम कर दें या मारपीट करने पर उतारू हो जाएं? इसी साल की कांवड़ यात्रा का एक और मामला है. मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव के कांवडि़ए शिवरात्रि की सुबह हरिद्वार से गंगाजल ले कर वापस लौट रहे थे. मंगलौर, उत्तर प्रदेश के पास पानीपत, हरियाणा के गांव चुलकाना के डाक कांवडि़यों के साथ आगे निकलने को ले कर उन की कहासुनी हो गई. इसी दौरान हरियाणा के कांवडि़यों ने लाठीडंडों और चाकुओं से उन पर हमला बोल दिया. नतीजतन, सिर पर लाठी लगने से सिसौली गांव के कार्तिक की मौत हो गई, जबकि कई और लड़के घायल हो गए. कार्तिक सेना में नौकरी करता था. वैसे, हत्या की वारदात के बाद भाग रहे कांवडि़यों को पकड़ लिया गया था.

कांवड़ यात्रा के कुछ छिपे नुकसान भी होते हैं. सब से पहले तो जो लोग कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं, वे तकरीबन एक महीने तक ऐसा कोई काम नहीं करते हैं, जिस से देश या समाज का कोई ठोस भला हो. बहुत से तो बेरोजगार होते हैं, जबकि कई सारे लोग अपने कामधंधे छोड़ कर इस यात्रा के भागीदार बनते हैं, जिस से उन्हें अपनी कमाई से हाथ धोना पड़ता है. चूंकि इन लोगों में पिछड़े और दलित समाज की भी काफी तादाद होती है, तो उन में से कइयों के घरों में तो फाके तक पड़ जाते हैं, जबकि इन दिनों में अगर वे लोग मेहनतमजदूरी कर के चार पैसे कमाते तो उन्हें ऊपर वाले से कुछ मांगना ही नहीं पड़ता. यह यात्रा मुफ्त में भी नहीं होती है. मतलब, यह आप का खर्चा बढ़ा देती है, क्योंकि चाहे हरिद्वार हो या ऋषिकेश, वहां कोई मुफ्त में तो आप को ठहराएगा नहीं.

लिहाजा, वहां के होटल वगैरह, खाने की चीजें कई गुना महंगी हो जाती हैं. हरिद्वार में इन दिनों में केला 80 से 90 रुपए प्रति दर्जन बिका, तो सेब 100 से 200 रुपए प्रति किलो तक लोगों को खरीदना पड़ा. कांवड़ मेले में जाम और रूट बदलने से फलसब्जी की ढुलाई महंगी हुई. कई फलसब्जी कम मात्रा में उपलब्ध रहे. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि दूसरे राज्यों से फलसब्जी ले कर ज्वालापुर मंडी पहुंचने वाले वाहन 4 दिन से मंडी नहीं पहुंचे थे. जो छोटे वाहन सब्जीफल ले कर आ भी रहे थे, वे घंटों जाम में फंसे रहे थे. कुलमिला कर यही कह सकते हैं कि देश की नौजवान पीढ़ी को सोचसमझ कर ऐसी बातों पर विचार करना चाहिए कि उन के लिए कौन सी बात फायदे की है और कौन सी नुकसान की. ऐसी कांवड़ यात्रा किस काम की, जो किसी देश की ताकत नौजवान पीढ़ी को कमजोर करे? लिहाजा, समय रहते अपने हाथों पर भरोसा करें और कदमों को ऐसी मंजिल की तरफ ले जाएं, जहां एक मेहनतकश तबके को रोजगार से भटकाने की साजिश के लिए कोई जगह न हो.

मसला : नहीं डर कानून का?

भीड़ का गुस्सा भयावह होता जा रहा है. विरोध करने के चक्कर में सार्वजनिक जगहें और दूसरी चीजें निशाना बनती हैं. इस से सवाल उठते हैं कि क्या जनता का न्याय व्यवस्था से मोह भंग होता जा रहा है? क्या पुलिस के प्रति लोगों का विश्वास घटा है? क्या समाज में गिरावट आई है, जिस से लोग अपना आपा खो रहे हैं? क्या जल्दी इंसाफ नहीं मिलने की वजह से कानून को अपने हाथ में लेने की फितरत बढ़ी है? आखिर वे कौन सी वजहें हैं, जिन के चलते कानून के दायरे में रहने वाले कानून के खलनायक बनने लगे हैं? सड़क हादसे में एक बच्चे की मौत हो गई.

गांव वालों को गुस्सा आ गया और बस में आग लगा दी. एक घर में आग लगने पर फायर ब्रिगेड को फोन किया गया. देर से पहुंचने की वजह से घर जल कर खाक हो गया. भीड़ अपने गुस्से पर काबू नहीं रख सकी. उस ने फायर ब्रिगेड की गाड़ी को भी फूंक दिया. राशन की एक दुकान के लगातार बंद रहने पर भीड़ ने दुकान का ताला तोड़ कर दुकान में रखे सामान को लूट लिया. खाद नहीं मिलने पर किसानों द्वारा किए गए चक्का जाम में पुलिस के बल प्रयोग के बाद गुस्साए किसानों ने मुरैना जिले के सबलगढ़ कसबे में जम कर पथराव किया और पुलिस चौकी समेत कुछ दुकानों में आग लगा दी. साथ ही, अनुविभागीय दंडाधिकारी और पुलिस अधिकारों को विश्रामगृह में बंधक बना कर वहां पथराव किया. पुलिस ने बचाव में हवाई फायर किए और आंसू गैस का इस्तेमाल भी किया. मंदिर तोड़े जाने के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित 3 घंटे के चक्का जाम का पूरे देश में व्यापक असर. संघ समर्थकों ने जम कर उपद्रव किया.

उन से निबटने के लिए पुलिस लाठीचार्ज और फायरिंग करनी पड़ी, जिस से कई घायल हुए और कई मौतें हुईं. राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं की गुंडई के विरोध में रेल यात्रियों के साथ छात्रों ने मारपीट की. ‘जय श्रीराम’ का नारा दलितों और मुसलमानों से बुलवाने के चक्कर में हर रोज कहीं न कहीं फसाद खड़ा हो जाता है. सरकारी पार्टी की शह पर लोग और ज्यादा उग्र हो रहे हैं और कानून हाथ में ले रहे हैं. दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष आदेश गुप्ता खुलेआम अपने कार्यकर्ताओं को कह रहे हैं कि घरघर जा कर चैक करो कि वहां बंगलादेशी और रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं, जबकि यह काम सरकार का है और आदेश गुप्ता न मंत्री हैं, न मुख्यमंत्री. भारत में बढ़ते गुस्से के ये वे सीन हैं, जिन का दोहराव हर शहर में अलगअलग रूपों में आएदिन देखने को मिलता है. पूरे देश में आम लोगों को गुस्सा होने का हक दिया जा रहा है. यह तपिश की तरह तेज होता जा रहा है. इस गुस्से में निजी फायदा ही छिपा है और दूसरे का अहित भी. कई गुस्से ऐसे भी हैं, जिन से किसी को कुछ लेनादेना नहीं है, फिर भी भीड़ के भयावह तंत्र का हम और आप सभी एक हिस्सा बन जाते हैं. किसी चौराहे पर बेवजह किसी रिकशे वाले को कोई पुलिस वाला पीटता है, तो अनायास ही अंदर से गुस्सा उबल पड़ता है. मन करता है कि पुलिस के हाथ से डंडा छीन कर उसे ही धुन दें.

कानून को अपने हाथ में लेने की फितरत आखिर क्यों बढ़ रही है? कानून को अपने हाथ में ले कर पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका और राजतंत्र के खिलाफ छापामार लड़ाई छेड़ने के लिए भारत आदी क्यों होता जा रहा है? एक जमाने में यह हालत सिर्फ बिहार की थी, आज पूरे देश में ऐसी ही शासन शैली बन गई है. यह हर प्रदेश में घनी होती जा रही है. भीड़ का हिस्सा और यह भी भयावह बनाने के लिए कौन दोषी है? यह गुस्सा आखिर आता कहां से है? कौन इतना गुस्सा देता है? ये ऐसे सवाल हैं, जिन का जवाब कानून के पास नहीं है और न ही समाज के पास. इन घटनाओं का सीधा सा जवाब है समाज में आई गिरावट और इंसाफ मिलने में हो रही देरी. इस घटना को ही देख लीजिए. मध्य प्रदेश के एक दूल्हे की बरात में नाचगाना कर रहे बरातियों में से 4 लोगों को एक ट्रक ने रौंद दिया.

उस के बाद बरातियों ने कई दुकानें जला दीं और उस ट्रक में आग तो लगाई ही साथ ही सड़क के किनारे खड़े 4-5 दूसरे वाहनों को भी फूंक दिया. पुलिस के आने के पहले तकरीबन घंटाभर तक भीड़ ने आसपास के इलाकों में काफी उत्पात मचाया. राह चलती औरतों और लड़कियों को छेड़ने वाले एक तथाकथित दादा को 20 से ज्यादा लोगों ने उस के घर में धावा बोल कर उस की पिटाई कर दी. उसे लहूलुहान कर दिया. उस के हाथपैर तोड़ डाले. पुलिस से शिकायत करने के बाद भी कोई हल नहीं निकलने पर लोगों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया. कई जगहों में भीड़ तत्काल इंसाफ खुद कर देती है. गौरक्षकों को तो ट्रेनिंग दी जा रही है कि खुद ही मारपीट कर किसी को भी सजा दे दो.

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में 2 दलित आदिवासियों की हत्या मई, 2022 में कर दी गई. उन के इंसाफ करने के तरीके को देख कर लगता है कि सजा देने का कानून पुलिस से जंगल से सीख कर आए हैं. अब हर प्रदेश के शहरों में यह दिखने लगा है. समाज में ये ज्यादातर घटनाएं जाति, वर्ग, धर्म और अंधश्रद्धा से जुड़ी हैं. जब हर शहर में, गांवों में और जिलों में हिंसा को इस रूप में देखा जाता है, तो सहज ही सवाल उठने लगता है कि क्या उन संस्थाओं के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है, जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने और इंसाफ देने का जिम्मा है? किसी पार्टी के नेता को पुलिस ने पीट दिया, तो उस के समर्थक सड़कों पर उतर आते हैं. सभी तरह के गुस्से के मूल में कोई चाह होती है, जो पूरी नहीं होने पर अचानक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ती है. बिजली नहीं मिली, तो लोगों ने गुस्से में आ कर बिजली के सबस्टेशन में आग लगा दी. एक पब में कट्टरपंथियों ने औरतों पर हमला किया. वे इस बात से नाराज थे कि वे औरतें मुसलिम मर्दों के साथ हंसबोल रही थीं और महिलाएं शराब पी रही थीं.

इस मसले पर शिक्षिका डाक्टर संगीता शर्मा कहती हैं, ‘‘हिंसा बीमारी नहीं, सिस्टम खराब होने का लक्षण है, जो बताता है कि सरकारी तंत्र में कहीं खराबी आ गई है. बारबार शिकायत करने के बाद भी सुधार नहीं होने पर खीज कर लोग हिंसक हुए हैं. वैसे भी जनता में अब सहनशीलता दिनोंदिन घटती जा रही है. ‘‘मनोवैज्ञानिकों की नजर में हिंसा कुंठा की उपज है और कुंठा के मूल में होती है अधूरी इच्छा. भारत के लिहाज से देखें तो जब किसी इनसान की रोटी, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाओं में किसी तरह की कमी होती है या पूरी नहीं होती, तो इस से कुंठा जन्मती है और कुंठित आदमी का हिंसक या आक्रामक होना लाजिमी है.’’ भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता. हर भीड़ एकदम से आक्रामक नहीं होती. भीड़ दिमाग से कम भावनाओं से ज्यादा काम लेती है. इस में दोराय नहीं है कि मामले के निदान में निजी कोशिश नाकाम हो जाती है,

तो भीड़ का सामूहिक प्रयास ही कभीकभी समस्या के निदान का कारक बन जाता है, लेकिन यह वजह हमेशा कारगर साबित नहीं होती. लोगों में कानून को हाथ में लेने की फितरत बढ़ने के पीछे कोई एक वजह नहीं है. हमेशा कानून के सहारे रहने से खुशी नहीं मिलती. उषा अवस्थी कहती हैं, ‘‘अगर भीड़ किसी को सजा दे रही है, तो यह साफ संकेत है कि कानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को ले कर लोगों में किस कदर घोर निराशा है. हो सकता है कि कानून हाथ में लेने से निर्भीक अपराधियों में डर पैदा हो और वे अपराध करने से पहले सौ बार सोचें.’’ हम जब ट्रेन या बस में सफर करते हैं, तो किनारे पर लिखा होता है कि यात्री अपने सामान की हिफाजत खुद करें यानी रोडवेज, निजी बस औपरेटर या रेलवे आप के सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेता.

ऐसे में किसी यात्री के सामान को कोई चोर ले कर भाग रहा हो या किसी यात्री को कोई बदमाश चाकू मार रहा हो या फिर कोई लोफर किसी औरत या लड़की को छेड़ रहा हो, तो दूसरे मुसाफिर उस अपराधी को पकड़ कर मारने लगें, तो कानून हाथ में लेना कैसे हो गया? बहुत जगहों पर और मामलों में पुलिस का इंतजार नहीं किया जा सकता और न ही न्याय व्यवस्था का. समाज इसे सामान्य मानेगा, तो वहां कानून को तो हाथ में लिया ही जाएगा. आज देश में भारतवासियों को कई तरह का गुस्सा आता है. पर कई मामले में नहीं भी आता. भ्रष्टाचार, जहरीली शराब से होने वाली मौत, शहर में बढ़ते अपराध, बलात्कार की घटनाएं, रेल दुर्घटना आदि ऐसी घटनाएं हैं,

जिन के होने पर लोगों की धार्मिक या राष्ट्रप्रेम की भावनाएं नहीं जागतीं, इसलिए कि समाज ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है. वह इस बात को मानता है कि कहीं न कहीं हम खुद दोषी हैं. शहर में बढ़ते अपराध पर एक वर्ग इसलिए कुछ नहीं बोलता कि वह पीडि़त नहीं है. रेप की घटनाओं को भी गंभीरता से लोग अब नहीं लेते, तब तक कि जब कोई मासूम पीडि़त न हो या लगातार ऐसी वारदात न हो. जहरीली शराब पर होने वाली मौत पर भी यह कह कर कि शराब जब जहर है, चुप्पी साध लेते हैं. जानते हैं, तो फिर क्यों पी? इसी तरह से नक्सलियों और आतंकवादियों की हरकतों पर गुस्सा कम भड़कता है. संसद भवन को उड़ाने,

मुंबई के ताज होटल और छत्रपति शिवाजी स्टेशन पर आतंकवादियों की दहशत भरी हरकतों पर गुस्सा आता है, लेकिन उस से भी ज्यादा गुस्सा देश की कानून व्यवस्था और राजनीतिक लोगों पर. अब गुस्से को चैनेलाइज कर लिया गया है. फिलहाल यह मुसलिम समाज के खिलाफ है, हिजाब के खिलाफ है, बहुविवाह को ले कर है. पर कल यह गाज किसी पर भी गिर सकती है. जो चंदा न दे, उस पर गिर सकती है. जो सड़क पर चलते हुए कहीं नारे न लगाए, उस पर गिर सकती है. जो विपक्षी दल का है, उस पर गिर सकती है. सामूहिक हिंसा के रूप अलग देखने को मिल रहे हैं. कई बार गलीमहल्ले की घटनाओं में भीड़ उमड़ पड़ती है. उग्र प्रदर्शन भी करती है. ऐसे प्रदर्शन के पीछे बाहरी तत्त्वों का हाथ ज्यादा होता है. कहानी कुछ होती है, लेकिन अंजाम दूसरा निकलता है.

भीड़ को पता भी नहीं होता कि वो किस बात पर उग्र है, लेकिन वह धार्मिक तत्त्वों की वजह से आक्रामक हो जाती है. आक्रामकता दिखाना वीरता नहीं है. वीरता तो सही जगह आक्रामक होने पर है. अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए, साथ ही साथ कर्तव्यों के प्रति भी सचेत रहना चाहिए. हिंसा को मीडिया में ज्यादा जगह मिलने से भी लोग हिंसा के रास्ते पर चल कर चर्चित होने के लिए सड़क की राजनीति को अख्तियार कर लेते हैं. यह सच है कि सड़क की राजनीति किसी भी सरकार की नींद में खलल पैदा करने के लिए काफी है. राजस्थान के गुर्जर आरक्षण के लिए कितना हिंसक हुए जगजाहिर है. भले ही बात उस समय नहीं बनी, लेकिन उन्होंने जो उन्माद दिखाया, वह लोकतंत्रीय व्यवस्था में उचित नहीं है. जिस बात से लोक के तंत्र को नुकसान हो, उसे अंजाम नहीं देना चाहिए, हिंसा से बचना चाहिए.

जीजा के प्यार का रस : भाग 3

‘‘तुम भी न जाने क्यों शक करते हो. तुम से कह चुकी हूं कि मैं सिर्फ तुम्हारी हूं और तुम्हारे अलावा किसी और की ओर देखना भी मेरे लिए अपराध है.’’
‘‘अगर तुम्हारी बातें सच होतीं तो रोना काहे का था. तुम जो यह खेल खेल रही हो, एक न एक दिन खतरनाक साबित होगा.’’ सर्वेश ने पत्नी को समझाने की कोशिश की लेकिन सोनम पर सर्वेश की इन बातों का कोई असर नहीं हुआ.

एक दिन सर्वेश दुकान से थकाहारा घर लौटा. उस ने घर के भीतर कदम रखा तो उस के पैरों तले से जमीन जैसे खिसक गई. भरी दोपहर में सोनम और कमलेश रंगरेलियां मना रहे थे. सर्वेश के तनबदन में आग सी लग गई. उस ने उसी समय सोनम को भला बुरा कहा और कमलेश के सामने उस की बेइज्जती की.

‘‘यही दिन दिखाना बाकी था मुझे. तुम ने मेरे सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया है. मुझ से तरहतरह की कसमें खाती रही हो और यहां अपने यार के साथ मौजमस्ती कर रही हो,’’ वह गुस्से में बोला.
सोनम चुपचाप पति की बातें सुनती रही. सर्वेश ने कमलेश को भी बुराभला कहा, ‘‘भाईसाहब, आप ने भी खूब रिश्तेदारी निभाई. मेरे ही घर में मेरी ही इज्जत पर धब्बा लगा दिया. मेरा नहीं तो अपने बच्चों का खयाल रखते. कल को तुम्हारी बेटी भी बड़ी होगी. उस के साथ कोई ऐसा करे तो तुम्हें कैसा लगेगा.’’
सर्वेश की बातों से कमलेश के तनबदन में आग लग गई. वह बौखला उठा और फिर बुलंद आवाज में सर्वेश को बुराभला कहना शुरू कर दिया, ‘‘मेरी बेटी को बुराभला कहा तो ठीक नहीं होगा.’’
‘‘क्या कर लोगे? दूसरे की औरत के साथ गुलछर्रे उड़ाने से पहले तुम्हें अपनी बेटी का खयाल नहीं आया?’’

उस दिन कमलेश और सर्वेश में जम कर कहासुनी हुई. लेकिन न तो सर्वेश ने इस बात का जिक्र किसी से किया और न ही कमलेश ने यह बात किसी को बताई. अलबत्ता इस घटना के बाद सर्वेश पत्नी पर नजर रखने लगा. जिस दिन उसे पता चलता कि कमलेश घर आया था, उस दिन वह सोनम की पिटाई करता.

अब तक सोनम और कमलेश के अवैध संबंधों की जानकारी सजारी गांव के लोगों को भी हो गई थी. गांव के लोग सर्वेश को अजीब नजरों से देखने लगे थे और फब्तियां भी कसने लगे थे. इन तानों से सर्वेश का सिर उठा कर चलना दूभर हो गया था. उस के घरवाले भी सोनम के चरित्र पर अंगुली उठाने लगे थे.
सोनम मुंहफट थी. इसलिए सास गोमती और ससुर मलखे उस से ज्यादा बात नहीं करते थे. सोनम क्या खाती है, क्या पहनती है, कहां जाती है, इस से उन को कोई मतलब न था. लेकिन जब बहू के नाजायज रिश्तों को ले कर उन की बदनामी होने लगी तो वे चिंतित हो गए.

सास गोमती ने एक रोज सोनम को समझाने का प्रयास किया तो वह फट पड़ी, ‘‘सासूमां, मेरे चरित्र पर अंगुली उठाने से पहले अपने गरेबान में झांक कर देखो. जवानी में तुम ने भी घाटघाट का पानी पिया होगा. कमलेश घर आता है तो आप लोगों की छाती फटती है. वह मेरा जीजा है. जीजासाली का रिश्ता रसीला होता ही है. मैं उस से हंसबोल लेती हूं, हंसीमजाक कर लेती हूं तो इस में हर्ज ही क्या?’’
गोमती जानती थी कि बहू बेलगाम है. इसलिए वह अपनी फजीहत नहीं कराना चाहती थीं. सो उन्होंने अपनी जुबान बंद कर ली और उस से बातचीत करनी बंद कर दी. गोमती ने अब अड़ोसपड़ोस के घरों में जाना भी कम कर दिया. क्योंकि वह जहां भी जातीं, महिलाएं उन की बहू की ही चर्चा करतीं और उस के बहके कदमों को रोकने की बात कहतीं.

पति और घरवालों के विरोध के कारण सोनम सतर्क रहने लगी थी. कमलेश का भी सोनम के घर आना कम हो गया था. अब दोनों की बात मोबाइल फोन पर होती और जिस दिन घर सूना होता, उस
दिन सोनम मिलन के लिए कमलेश को बुला लेती.

लेकिन सावधानी के बावजूद एक दोपहर गोमती ने बहू को रंगरलियां मनाते पकड़ लिया. उस रोज उस के सब्र का बांध टूट गया. उस ने फोन पर बात कर बेटे सर्वेश को बुला लिया. सर्वेश घर आया तो कमलेश दुम दबा कर भाग गया. लेकिन सोनम कहां जाती. सर्वेश ने सोनम
को बुराभला कहा और उस की जम कर पिटाई की.

पत्नी सोनम की बेवफाई से सर्वेश टूट चुका था. वह अपना गम मिटाने के लिए शराब के ठेके पर जाने लगा. उसे सोनम से इतनी नफरत हो गई थी कि उस ने उस से बातचीत तक करनी बंद कर दी थी. वह देर रात शराब के नशे में घर आता और कभी खाना खा कर तो कभी खाए बिना ही सो जाता था. कभीकभी कमलेश को ले कर उस की जम कर तकरार होती थी और नौबत मारपीट तक आ जाती थी.
सोनम कमलेश की दीवानी थी, इसलिए उसे न तो पति की परवाह थी और न ही परिवार की इज्जत की. इसी दीवानगी में एक रोज सोनम ने फोन पर कमलेश से बात की और उसे घर बुलाया. कुछ देर बाद कमलेश सोनम के घर आया तो वह अपनी चारपाई पर लेटी बारबार करवटें बदल रही थी. कमलेश उस की बेचैनी भांप गया था.

 

‘‘सोनम, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है क्या?’’ कमलेश ने पूछा.

सोनम उठ कर बैठ गई. वह पल भर तक कमलेश के चेहरे पर नजर जमाए रही, फिर सपाट शब्दों में बोली, ‘‘जीजाजी, तुम मुझे प्यार करते हो न?’’
‘‘अरे, यह भी कोई पूछने की बात है?’’ कमलेश चारपाई से उठा, ‘‘तुम्हें मेरे प्यार पर यकीन नहीं है क्या? मेरी चाहत में कहीं कोई खामी नजर आई तुम्हें?’’ उस ने सोनम का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया.
‘‘नहीं जीजाजी, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, लेकिन…’’
‘‘लेकिन क्या?’’
‘‘तुम्हारी वजह से मेरा पति मुझे मारतापीटता है और तुम दुम दबा कर भाग जाते हो. आखिर तुम कैसे प्रेमी हो? कुछ करते क्यों नहीं?’’
‘‘घर का मामला है. फिर वह तुम्हारा पति है. तुम पर उसी का हक है. मैं कर ही क्या सकता हूं?’’ कमलेश ने मजबूरी जाहिर की.
‘‘विरोध तो कर सकते हो. फिर भी न माने तो…’’ सोनम बोली.
‘‘तो क्या सोनम?’’ कमलेश ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘उस का गला काट दो, मार डालो उसे, ताकि मैं चैन से रह सकूं.’’ सोनम बोली.
‘‘ठीक है, जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा,’’ कमलेश ने आश्वासन दिया.
‘‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी.’’ सोनम चैन की सांस लेते हुए बोली.

सर्वेश फरनीचर की दुकान पर काम करता था. वह अकसर रात 10 बजे के बाद ही घर आता था. लेकिन 18 फरवरी, 2022 को वह शाम ढलते ही घर आ गया. उस ने साफसुथरे कपड़े पहने और सजसंवर कर सोनम से बोला, ‘‘मैं एक शादी में शामिल होने शहर जा रहा हूं. सुबह ही आ पाऊंगा.’’
पति की बात सुन कर सोनम मन ही मन खुश हुई. सर्वेश चला गया तो सोनम ने मोबाइल फोन पर कमलेश से बात की, ‘‘जीजाजी, सर्वेश एक शादी में शहर गया है. आज की पूरी रात हमारी मिलन की रात है. तुम जल्दी घर आ जाओ.’’
‘‘कहीं सर्वेश रात को घर लौट आया तो..?’’ कमलेश ने शंका जाहिर की.
‘‘तुम्हारी तो कागज से भी ज्यादा कमजोर है जो एकदम फट जाती है. अरे भई, जब वह कह कर गया है कि सुबह ही आ पाएगा. तुम निश्चिंत हो कर आ जाओ,’’ सोनम उसे विश्वास दिलाते
हुए बोली.
‘‘तब ठीक है. मैं जल्द ही आ रहा हूं,’’ कमलेश उत्साह से बोला.
रात लगभग 11 बजे कमलेश सोनम कें घर सजारी आ गया. अब तक सोनम के सासससुर जो भूतल पर रहते थे, सो गए थे. सोनम पहली मंजिल पर रहती थी. कमरे में पहुंचते ही कमलेश ने सोनम को बांहों में जकड़ लिया और फिर रंगरलियां मनाने के लिए बिस्तर पर पहुंच गए.
इधर रात एक बजे सर्वेश घर लौट आया. वह सीढि़यां चढ़ कर अपने कमरे में पहुंचा तो उस की सांसें ठहर गईं. कमलेश और सोनम एकदूसरे में डूबे थे. यह देख कर सर्वेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. बात बरदाश्त के बाहर थी.
वह सोनम पर टूट पड़ा. उस ने जैसे ही सोनम को मारने के लिए हाथ उठाया, कमलेश उस का हाथ पकड़ कर मरोड़ते हुए बोला, ‘‘खबरदार साढ़ू भाई, जो हाथ उठाया. चुपचाप चले जाओ वरना…’’
‘‘वरना क्या?’’ कहते हुए सर्वेश ने सोनम को पकड़ लिया. यह देख कमलेश और सोनम सर्वेश पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से पीटने लगे.

सर्वेश समझ गया कि उन दोनों के इरादे नेक नहीं है. अत: वह जान बचा कर कमरे से भागा, लेकिन कमलेश ने उसे चंद कदम की दूरी पर फिर से दबोच लिया.
इसी समय सोनम पति की छाती पर सवार हो गई और गुस्से से बोली, ‘‘मार डालो इस हरामी के पिल्ले को. यह जिंदा रहेगा तो हम दोनों के बीच बाधक बनता रहेगा.’’
यह सुनते ही कमलेश के हाथ सर्वेश की गरदन पर पहुंच गए. इस के बाद कमलेश और सोनम ने मिल कर सर्वेश का गला घोट दिया.
सर्वेश को मौत की नींद सुलाने के बाद रात 3 बजे दोनों ने मिल कर उस के शव को अपने मकान के पीछे खंडहर में फेंक दिया. फिर सुबह होने के पहले कमलेश फरार हो गया. सोनम भी कमरा दुरुस्त कर सो गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो. सोनम ने पति के मोबाइल को तोड़ कर खंडहर की झाडि़यों में फेंक दिया.

19 फरवरी, 2022 की सुबह पड़ोस का रहने वाला युवक राजू खंडहर में कूड़ा फेंकने गया तो उस ने सर्वेश की लाश देखी. राजू ने इस की खबर उस के घर दी तो घर में कोहराम मच गया. मलखे व गोमती तुरंत वहां पहुंचे और बेटे का शव देख कर फफक पड़े. सोनम भी पहुंची और पति के शव के पास विलाप करने लगी.
इसी बीच मलखे ने सर्वेश की हत्या की सूचना थाना चकेरी पुलिस को दी तो कुछ देर बाद चकेरी थानाप्रभारी मधुर मिश्रा, एएसपी मृगांक शेखर पाठक, एडिशनल डीसीपी (ईस्ट) राहुल मिठास तथा डीसीपी (ईस्ट) प्रमोद कुमार घटनास्थल आ गए.
अधिकारियों ने मौके पर डौग स्क्वायड तथा फोरैंसिक टीम भी बुलवा ली. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. सर्वेश की उम्र 32 साल के आसपास थी. उस के गले पर खरोंच के निशान थे. ऐसा लग रहा था कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी.
फोरैंसिक तथा डौग स्क्वायड टीम ने भी घटनास्थल पर जांच की तथा साक्ष्य जुटाए. निरीक्षण के बाद शव को पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया गया.
घटनास्थल पर मृतक की पत्नी सोनम मौजूद थी. वह छाती पीट कर रो रही थी. डीसीपी प्रमोद कुमार ने उस से पूछताछ की तो सोनम ने बताया, ‘‘किसी से लेनदेन का विवाद था. रात 12 बजे उसी का फोन आया था. उस के बाद यह कह कर घर से चले गए कि कुछ देर बाद वापस आ जाएंगे. कहां जा रहे हैं? किस का फोन था? यह कुछ नहीं बताया.
‘‘मैं रात भर इन का इंतजार करती रही. लेकिन नहीं आए. सुबह इन की मौत की खबर मिली. पता नहीं किस ने मेरा सुहाग उजाड़ दिया. अब मेरे मासूम बच्चों का क्या होगा?’’
पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई और मृतक के पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि सोनम चरित्रहीन है. उस का नाजायज रिश्ता उस के जीजा कमलेश से है.
सर्वेश की हत्या में इन्हीं दोनों का हाथ हो सकता है.
मृतक के मातापिता ने भी दबी जुबान से स्वीकार किया कि उन की बहू सोनम सर्वेश के साथ दगा कर सकती है. सोनम शक के घेरे में आई तो थानाप्रभारी मधुर मिश्रा ने उसे हिरासत में ले लिया और उस का मोबाइल फोन अपने कब्जे में कर लिया.
मधुर मिश्रा ने सोनम के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि एक खास नंबर पर वह घंटों बातचीत करती थी. इस नंबर के संबंध में सोनम से पूछा गया तो उस ने बताया कि यह मोबाइल नंबर उस की फुफेरी बहन दीपिका के पति कमलेश का है.
कमलेश शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उसे नाटकीय ढंग से हिरासत में ले लिया. पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उन दोनों के बीच हर रोज बातें होती थीं. इस के अलावा घटना के समय सोनम और कमलेश के मोबाइल फोन की लोकेशन भी घटनास्थल पर मिली.
इस के बाद थानाप्रभारी मधुर मिश्रा ने सोनम और कमलेश से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों टूट गए और सर्वेश की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. कमलेश ने पूछताछ में बताया कि सर्वेश की पत्नी सोनम से उस का नाजायज रिश्ता बन गया था. सर्वेश अवैध रिश्ते का विरोध करता था.

घटना वाली रात सर्वेश ने उन दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया था. विरोध पर उन दोनों ने मिल कर सर्वेश की गला घोट कर हत्या कर दी और शव को घर के पिछवाड़े खंडहर में फेंक दिया था. सोनम की निशानदेही पर पुलिस ने मृतक
का टूटा हुआ मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया.
चूंकि दोनों ने सर्वेश की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी मधुर मिश्रा ने मृतक के पिता मलखे की तहरीर पर भादंवि की धारा 302, 201 के तहत सोनम व कमलेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.
22 फरवरी, 2022 को पुलिस ने हत्यारोपी सोनम व कमलेश को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. उस के दोनों बच्चों को उन की दादी गोमती संभाल रही थी.

जीजा के प्यार का रस : भाग 1

कानपुर के सजारी गांव का सर्वेश राजपूत देर शाम थकाहारा घर आया तो उस का साढ़ू कमलेश
उस की पत्नी के साथ उस के ही घर में मौजूद था. दोनों हंसीठिठोली कर रहे थे. उन दोनों को इस तरह करीब देख कर सर्वेश का खून खौल उठा. कमलेश साढ़ू को आया देख कर बाहर चला गया.
उस के जाते ही सर्वेश सोनम पर बरस पड़ा, ‘‘तुम्हारे बारे में जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसे सुन कर अपने आप पर शर्म आती है मुझे. मेरी नहीं तो कम
से कम परिवार की इज्जत का तो
ख्याल रखो.’’

‘‘मैं ने ऐसा क्या गलत कर दिया, जो मेरे बारे में सुनने को मिल गया?’’ सोनम तुनक कर बोली.
सर्वेश ताव में बोला, ‘‘तुम्हारे और कमलेश के नाजायज रिश्तों की चर्चा अब पूरे गांव में हो रही है. लोग मुझे अजीब नजरों से देखते हैं. मेरे घर वाले भी कहते हैं कि अपनी पत्नी को संभालो. सुनसुन कर मेरा सिर शर्म से झुक जाता है. आखिर मेरी जिंदगी को तुम क्यों नरक बना रही हो.’’
‘‘नरक तो तुम ने मेरी जिंदगी बना दी है. पत्नी को जो सुख चाहिए, तुम ने कभी दिया है मुझे? तुम अपनी कमाई तो शराब में लुटाते हो और बदनाम मुझे कर रहे हो.’’ सोनम ने मन की बात उगल दी.
सोनम की बात सुन कर सर्वेश का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. वह उसे पीटते हुए बोला, ‘‘साली बदजात, तेरी बहन की… एक तो गलती करती है ऊपर से मुझ से जुबान लड़ाती है.’’

सोनम चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन सर्वेश के हाथ तभी रुके, जब पिटतेपिटते सोनम बेहाल हो गई. पत्नी की जम कर धुनाई करने के बाद सर्वेश बिस्तर पर जा लेटा.
सोनम और उस के बीच आए दिन ऐसा होता रहता था. उन के झगड़े की वजह था सर्वेश का साढ़ू कमलेश. वह अकसर उस के घर आता था और सोनम से बतियाता था. सर्वेश को शक था कि सोनम और कमलेश के बीच नाजायज संबंध हैं.

पत्नी की किसी भी पुरुष से दोस्ती चाहे जायज हो या नाजायज, कोई भी पति बरदाश्त नहीं कर सकता. सर्वेश भी नहीं कर पा रहा था. जब भी उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता, वह बेचैन हो जाता था.
कानपुर शहर के थाना चकेरी अंतर्गत एक गांव है सजारी. इसी सजारी गांव में मलखे राजपूत अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार मे पत्नी गोमती के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा सर्वेश था.
मलखे फरनीचर का अच्छा कारीगर था. उस ने अपने बेटे सर्वेश को भी अपना हुनर सिखा दिया था. सर्वेश अब सजारी की एक फरनीचर की दुकान पर काम करने लगा था.

सर्वेश का विवाह सोनम से हुआ था. खूबसूरत सोनम को पा कर सर्वेश बहुत खुश था. उसे वह जी जान से चाहने लगा. लेकिन सोनम सर्वेश जैसा साधारण पति पा कर खुश नहीं थी.
दरअसल, उस ने अपने मन में जिस पति की कल्पना की थी, सर्वेश वैसा नहीं था. सोनम ने सपना संजो रखा था कि उस का पति हैंडसम और मौडर्न होगा. जबकि सर्वेश उस की अपेक्षाओं से बिलकुल विपरीत था.

वह सांवले रंग का था. साधारण कपड़े पहनता था और शराबी था. यह सब सोनम को पसंद न था. इसी कुंठा ने सोनम को चिड़चिड़ा बना दिया था. परिवार में छोटीछोटी बातों को ले कर झगड़ा करना अब उस की आदत बन गई. आखिर परेशान हो कर सासससुर ने उसे अलग कर दिया.
सोनम अब पति के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगी. अलग होते ही सोनम ने मनमानी शुरू कर दी. सर्वेश सुबह 9 बजे ही घर से काम करने के लिए निकल जाता था. फिर रात गए ही घर लौटता था.

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