आखिर क्या था बेलगाम ख्वाहिश का अंजाम

हमसफर मनपसंद हो तो गृहस्थी में खुशियों का दायरा बढ़ जाता है. जमाने की नजरों में दीपिका और राजेश भी खुशमिजाज दंपति थे. करीब 8 साल पहले  कालेज के दिनों में दोनों की मुलाकात हुई थी. पहले उन के बीच दोस्ती हुई फिर कब वे एकदूसरे के करीब आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. वे सचमुच खुशनसीब होते हैं जिन्हें प्यार की मंजिल मिल जाती है. प्यार हुआ तो खूबसूरत दीपिका ने राजेश के साथ उम्र भर साथ निभाने की कसमें खाईं. दोनों के लिए जुदाई बरदाश्त से बाहर हुई तो परिवार की रजामंदी से दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. एक साल बाद दीपिका एक बेटे की मां भी बन गई.

राजेश का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रायपुर थानाक्षेत्र स्थित तपोवन एनक्लेव कालोनी में रहता था. दरअसल राजेश के पिता प्रेम सिंह राणा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव सबदलपुर के रहने वाले थे, लेकिन बरसों पहले वह उत्तराखंड आ कर बस गए थे. दरअसल वह देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी और राजेश के अलावा 5 बेटियां थीं, जिन में से 2 का विवाह वह कर चुके थे.

सन 2000 में पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला और 3 बेटियों के हाथ पीले किए. राजेश और दीपिका एकदूसरे को चाहते थे इसलिए प्रेम सिंह ने सन 2007 में उन के प्यार को रिश्ते में बदल दिया. आजीविका चलाने के लिए राजेश ने घर के बाहर ही किराने की दुकान कर ली थी. दीपिका का मायका भी देहरादून में ही था. प्रेम सिंह व्यवहारिक व्यक्ति थे. इस तरह बेटाबहू के साथ वह खुश थे.

4 मार्च की दोपहर के समय दीपिका काफी परेशान थी. शाम होतेहोते उस की परेशानी और भी बढ़ गई. जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वह थाना रायपुर पहुंची. उस ने थानाप्रभारी प्रदीप राणा से मुलाकात कर के बताया कि सुबह से उस के पति और ससुर लापता हैं.’’

थानाप्रभारी के पूछने पर दीपिका ने बताया कि आज सुबह वे दोनों अपनी सैंट्रो कार नंबर यूए07एल 6891 से बुलंदशहर जाने की बात कह कर घर से गए थे, लेकिन न तो अभी तक वापस आए और न ही उन का मोबाइल लग रहा है. दीपिका के अनुसार, 65 वर्षीय प्रेम सिंह शहर में रह जरूर रहे थे लेकिन कभीकभी वह बुलंदशहर स्थित गांव जाते रहते थे.

दीपिका से औपचारिक पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति और ससुर की गुमशुदगी दर्ज कर ली. थानाप्रभारी ने भी राजेश और उस के पिता के फोन नंबरों पर बात करने की कोशिश की पर दोनों के फोन स्विच्ड औफ ही आ रहे थे.

उसी रात करीब 2 बजे जब देहरादून के दूसरे थाने डोईवाला की पुलिस इलाके में गश्त पर थी तभी पुलिस को देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर कुआंवाला के पास सड़क किनारे एक कार खड़ी दिखी. पुलिस वाले कार के नजदीक पहुंचे तो पता चला कि कार के दरवाजे अनलौक्ड थे.

कार की पिछली सीट पर नजर दौड़ाई तो उस में 2 लोगों की लाशें पड़ी थीं जो कंबल और चादर में लिपटी हुई थीं. कंबल और चादर पर खून लगा हुआ था. गश्ती दल ने फोन द्वारा यह सूचना थानाप्रभारी राजेश शाह को दे दी. 2 लाशों के मिलने की खबर सुन कर थानाप्रभारी उसी समय वहां आ गए.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की. दोनों की हत्या बेहद नृशंस तरीके से की गई थी. उन के शवों पर चाकुओं के दरजनों निशान थे. दोनों की गरदन और शरीर के अन्य हिस्सों पर अनेक वार किए गए थे. दोनों के गले में रस्सी कसी हुई थी.

थानाप्रभारी ने दोहरे हत्याकांड की सूचना आला अधिकारियों को दी तो एसएसपी स्वीटी अग्रवाल, एसपी (सिटी) अजय सिंह व एसपी (देहात) श्वेता चौबे मौके पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने जब कार का निरीक्षण किया तो कार पर आग से जले के भी निशान मिले. इस से पता चला कि शवों को कार समेत जलाने की कोशिश की गई थी.

निरीक्षण से यह बात भी साफ हो गई थी कि दोनों की हत्या कार में नहीं की गई थी. हत्या किसी अन्य स्थान पर कर के शव वहां लाए गए थे. सुबह होने पर आसपास के लोगों को कार में लाशें मिलने की जानकारी मिली तो तमाम लोग वहां जमा हो गए. पर कोई भी लाशों की शिनाख्त नहीं कर सका. आखिर पुलिस ने शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. पुलिस ने कार के बारे में जानकारी की तो वह दीपिका राणा के नाम पर पंजीकृत निकली जो तपोवन कालोनी में रहती थी.

तपोवन कालोनी शहर के ही रायपुर थाने के अंतर्गत आती थी. इसलिए थानाप्रभारी राजेश शाह ने रायपुर थाने से संपर्क किया. वहां से पता चला कि दीपिका ने अपने पति और ससुर के लापता होने की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. यह भी बताया था कि वे दोनों कार से ही बुलंदशहर के लिए निकले थे.

कार में 2 लाशें मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी प्रदीप राणा को शक हो गया कि कहीं वे लाशें उन्हीं बापबेटों की तो नहीं हैं. उन्होंने खबर भेज कर दीपिका को थाने बुला लिया. थानाप्रभारी प्रदीप राणा दीपिका को पोस्टमार्टम हाउस पर ले गए, जहां लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेजी थीं. दीपिका लाशें देखते ही दहाड़ें मार कर रोने लगी. कुछ देर बाद दीपिका के नातेरिश्तेदार भी एकत्र हो गए.

दोनों शवों की शिनाख्त हो गई. दीपिका इस स्थिति में नहीं थी कि उस से उस समय पूछताछ की जाती, लेकिन हलकी पूछताछ में उस ने किसी से भी अपने परिवार की रंजिश होने से इनकार कर दिया. बड़ा सवाल यह था कि जब उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो उन की हत्या क्यों और किस ने कर दी.

एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इस मामले की जांच में एसपी (क्राइम) तृप्ति भट्ट व एसओजी प्रभारी अशोक राठौड़ को भी लगा दिया. पुलिस की संयुक्त टीम हत्याकांड की वजह तलाशने में जुट गई. जहां कार मिली, वहां आसपास के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि कार वहां पूरे दिन खड़ी रही थी लेकिन किसी ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया था. इस से साफ था कि हत्याएं पहले ही की गई थीं और कार सुबह किसी समय वहां छोड़ दी गई थी.

दोहरे हत्याकांड से पूरे शहर में सनसनी फैल चुकी थी. राजेश की बहन गीता की तहरीर के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने मृतक राजेश व उस की पत्नी दीपिका के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो राजेश के मोबाइल की आखिरी लोकेशन 4 मार्च, 2017 की तड़के लाडपुर क्षेत्र में मिली जोकि कुंआवाला के नजदीक था. इस से पुलिस चौंकी, क्योंकि दीपिका ने उन के जाने का समय सुबह करीब 9 बजे बताया था.

काल डिटेल्स से यह स्पष्ट हो गया कि दीपिका ने पुलिस से झूठ बोला था. इस से वह शक के दायरे में आ गई. पुलिस ने दीपिका से पूछताछ की तो वह अपने बयान पर अडिग रही. इतना ही नहीं, उस ने अपने 8 साल के बेटे नोनू को भी आगे कर दिया. उस ने भी पुलिस को बताया कि पापा को जाते समय उस ने बाय किया था.

पुलिस ने नोनू से अकेले में घुमाफिरा कर चौकलेट का लालच दे कर पूछताछ की तब भी वह अपनी बात दोहराता रहा. ऐसा लगता था कि जैसे उसे बयान रटाया गया हो. शक की बिनाह पर पुलिस ने दीपिका के घर की गहराई से जांचपड़ताल की लेकिन वहां भी कोई ऐसा सबूत या असामान्य बात नहीं मिली जिस से यह पता चलता कि हत्याएं वहां की गई हों. लेकिन पुलिस इतना समझ गई थी कि दीपिका शातिर अंदाज वाली महिला थी.

पुलिस ने दीपिका के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स की फिर से जांच की तो उस में एक नंबर ऐसा मिला जिस पर उस की अकसर बातें होती थीं. 3 मार्च की रात व 4 को तड़के साढ़े 5 बजे भी उस ने इसी नंबर पर बात की थी. पुलिस ने उस फोन नंबर की जांच की तो वह योगेश का निकला. योगेश शहर के ही गांधी रोड पर एक रेस्टोरेंट चलाता था.

योगेश के फोन की काल डिटेल्स जांची तो उस की लोकेशन भी उसी स्थान पर पाई गई, जहां शव बरामद हुए थे. माथापच्ची के बाद पुलिस ने कडि़यों को जोड़ लिया. इस बीच पुलिस को यह भी पता चला कि दीपिका और योगेश के बीच प्रेमिल रिश्ते थे जिस को ले कर घर में अकसर झगड़ा होता था.

इतने सबूत मिलने के बाद पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर से पूछताछ की तो वह सवालों के आगे ज्यादा नहीं टिक सकी. वह वारदात की ऐसी षडयंत्रकारी निकली, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. अपने अवैध प्यार को परवान चढ़ाने और प्रेमी के साथ दुनिया बसाने की ख्वाहिश में उस ने पूरा जाल बुना था. इस के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी योगेश को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई.

दरअसल, राजेश से शादी के बाद दीपिका की जिंदगी आराम से बीत रही थी. दोनों के बीच प्यार भरे विश्वास का मजबूत रिश्ता था. राजेश सीधासादा युवक था जबकि दीपिका ठीक इस के उलट तेजतर्रार व फैशनपरस्त युवती थी. 2 साल पहले योगेश ने रायपुर स्थित स्पोर्ट्स स्टेडियम में ठेके पर कुछ काम किया था. इस दौरान वह एक गेस्टहाउस में रहा. वह गेस्टहाउस राजेश के घर के ठीक पीछे था.

योगेश मूलरूप से हरियाणा के करनाल शहर का रहने वाला था और देहरादून में छोटेमोटे ठेकेदारी के काम करता था. वह राजेश की दुकान पर भी आता था. इस नाते दोनों के बीच जानपहचान हो गई थी. दीपिका जब भी छत पर कपड़े सुखाने जाती तो योगेश उसे अपलक निहारा करता था. पहली ही नजर में उस ने दीपिका को हासिल करने की ठान ली थी. दीपिका को पाने की चाहत में योगेश ने धीरेधीरे राजेश से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती मजबूत होने पर वह उस के घर भी जाने लगा.

इस दौरान उस की मुलाकात दीपिका से भी हुई. कुछ दिनों में ही दीपिका ने योगेश की आंखों में अपने लिए चाहत देख ली. दोनों के बीच दोस्ती हो गई और वे मोबाइल पर बातें करने लगे. राजेश को पता नहीं था कि जिस दोस्त पर वह आंख मूंद कर विश्वास करता है, वह आस्तीन का सांप बन कर उस के घर की इज्जत तारतार करने की शुरुआत कर रहा है.

जब दीपिका योगेश के आकर्षण में बंध गई तो दोनों ने अपने रिश्ते को प्यार का नाम दे दिया. अब दीपिका बहाने से घर से बाहर जाती और योगेश के साथ घूमती. इस बीच योगेश ने तहसील चौक के पास अपना रेस्टोरेंट खोल लिया और खुद गोविंदगढ़ में रहने लगा.

दीपिका पति को धोखा दे कर योगेश के सपने देखने लगी. एक वक्त ऐसा भी आया जब उन के बीच मर्यादा की दीवार गिर गई. इस के बाद तो जब कभी राजेश व प्रेम सिंह बाहर होते तो वह योगेश के साथ अपना समय बिताती. राजेश को पता ही नहीं था कि उस की पत्नी उस से बेवफाई कर के क्या गुल खिला रही है.

अपने नाजायज रिश्ते को प्यार का नाम दे कर योगेश व दीपिका साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. दोनों के रिश्ते भला कब तक छिपते. आखिर एक दिन राजेश के सामने यह राज उजागर हो ही गया. उस ने अपने ही घर में दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया.

पत्नी की बेवफाई पर राजेश को गुस्सा आ गया. उस ने दीपिका की पिटाई कर दी और योगेश को भी खरीखोटी सुना कर अपनी पत्नी से दूर रहने की हिदायत दी.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन बाद में दोनों ने फिर से गुपचुप ढंग से मिलना शुरू कर दिया. पर राजेश से कोई बात छिपी नहीं रही. नतीजतन इन बातों को ले कर घर में आए दिन झगड़ा होने लगा.

दीपिका चाहती थी कि उस पर किसी तरह की बंदिश न हो और वह प्रेमी के साथ खुल कर जिंदगी जिए. वह ढीठ हो चुकी थी. अपनी गलती मानने के बजाए वह पति से बहस करती. राजेश अपना घर बरबाद होते नहीं देखना चाहता था. लिहाजा वह समयसमय पर परिवार और बच्चे का वास्ता दे कर दीपिका को समझाने की कोशिश करता. पर उस के दिमाग में पति की बात नहीं धंसती बल्कि एक दिन तो बेशरमी दिखाते हुए उस ने पति से कह दिया, ‘‘मेरे पास एक रास्ता है कि तुम मुझे तलाक दे कर आजाद कर दो. फिर तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.’’

राजेश को पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह सारी हदों को लांघ गई थी. उस की बात सुन कर उसे गुस्सा आ गया तो उस ने दीपिका की पिटाई कर दी. दीपिका राह से इतना भटक चुकी थी कि वह राजेश को भूल कर योगेश से जुनून की हद तक प्यार करती थी. कई दौर ऐसे आए जब उस ने योगेश को नकद रुपए भी दिए. यह रकम ढाई लाख तक पहुंच चुकी थी.

राजेश मानसिक तनाव से गुजर रहा था. वह इस कदर परेशान हो गया कि उस ने तलाक की बात मान लेने में ही भलाई समझी. दोनों तैयार हुए, लेकिन बेटे को ले कर बात अटक गई. राजेश बेटे को अपने साथ रखना चाहता था जबकि दीपिका उसे देने को भी तैयार नहीं थी. कभीकभी राजेश गुस्से में उस की पिटाई भी कर देता था.

अपनी पिटाई की बात दीपिका जब योगेश को बताती तो योगेश गुस्से में तिलमिला कर रह जाता था. उसे यह कतई पसंद नहीं था कि राजेश उस की प्रेमिका पर हाथ उठाए. रिश्तों की कड़वाहट इस हद तक बढ़ गई कि दीपिका अपने बेटे के साथ बैडरूम में सोती थी, जबकि राजेश ड्राइंगरूम में सोता था.

दीपिका अपना आचरण बदलने को तैयार नहीं थी और राजेश उस की शर्तों पर तलाक नहीं देना चहता था. रिश्तों में नफरत भर चुकी थी. दीपिका तो विवेकहीन हो चुकी थी. वह अब हर सूरत में हमेशा के लिए योगेश की होना चाहती थी. योगेश भी इन बातों से परेशान हो गया था.

राजेश के रहते यह संभव नहीं था इसलिए दोनों ने राजेश को रास्ते से हटाने का खतरनाक फैसला कर लिया. यह काम राजेश के अकेले के वश का नहीं था. उस के रेस्टोरेंट पर पप्पू व डब्बू नामक 2 युवक अकसर आते रहते थे. वे दोनों दबंग प्रवृत्ति के थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. उन के बारे में वह ज्यादा नहीं जानता था. उसे वे काम के मोहरे नजर आए. योजना के अनुसार योगेश ने बहुत जल्द उन से दोस्ताना रिश्ते बना लिए. एक दिन बातोंबातों में योगेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों को लखपति बनाने का एक प्लान है मेरे पास.’’

‘‘क्या?’’ पप्पू ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मेरे लिए तुम्हें एक काम करना होगा जिस के बदले में तुम्हें 5 लाख रुपए मिलेंगे.’’ कहने के साथ ही योगेश ने उन्हें अपने मन की बात बता दी.

पैसों के लालच में दोनों हत्या में उस का साथ देने को तैयार हो गए. अगले दिन उस ने दीपिका से बात की और उस से 50 हजार रुपए ले कर बतौर पेशगी दोनों को दे दिए. इस के बाद दीपिका व योगेश उचित मौके की तलाश में रहने लगे.

उन्होंने 3 मार्च, 2017 की रात हत्या करना तय कर लिया. उस रात प्रेम सिंह अपने कमरे में और राजेश ड्राइंगरूम में नींद के आगोश में थे. लेकिन दीपिका की आंखों से नींद कोसों दूर थी. योगेश ने दीपिका को फोन किया तो उस ने अपने घर का पिछला दरवाजा खोल दिया. फिर रात तकरीबन 12 बजे के बाद घर के पिछले दरवाजे से पप्पू व डब्बू के साथ योगेश घर में दाखिल हुआ. दीपिका तीनों को ड्राइंगरूम तक ले गई. वे अपने साथ गला दबाने के लिए रस्सी भी लाए थे. राजेश उस वक्त गहरी नींद में था.

पप्पू व डब्बू राजेश के गले में रस्सी डाल रहे थे कि उस की आंख खुल गई. मौत का अहसास होते ही वह बचाव के लिए उन से उलझ गया. लेकिन उन सभी ने उसे दबोच लिया. इस बीच दीपिका ने रसोई में से 2 चाकू ला कर उन्हें दे दिए. उन्होंने पहले रस्सी से उस का गला दबाया इस के बाद चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए. दीपिका ने उस के पैर पकड़ लिए थे. योगेश के मन में राजेश के प्रति इसलिए नफरत थी क्योंकि वह दीपिका को पीटता था इसलिए उस ने उस के शरीर पर सब से ज्यादा वार किए.

इस बीच आवाज सुन कर दूसरे कमरे में सो रहे राजेश के पिता प्रेम सिंह वहां आ गए. अपनी आंखों से मौत का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. प्रेम सिंह को देख कर सभी के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं. उन का इरादा प्रेम सिंह की हत्या का नहीं था. चूंकि उन्होंने राजेश की हत्या करते देख लिया था, इसलिए उन की भी हत्या का फैसला कर लिया.

उन्होंने मिल कर प्रेम सिंह को दबोच लिया और चाकुओं से ताबड़तोड़ प्रहार कर के उन की भी हत्या कर दी. पति व ससुर की सांसों की डोर टूटने से दीपिका खुश हुई. इस के बाद पप्पू व डब्बू वहां से चले गए. फिर दीपिका व योगेश ने मिल कर खून साफ किया और दोनों लाशों को चादर व कंबल में बांध कर कार में रख दिया. योगेश ने चाकू और राजेश का मोबाइल भी रख लिया.

तड़के वह कार ले कर वहां से चला गया. रास्ते में लाडपुर के जंगल में उस ने सारा सामान फेंक दिया. इस से पहले उस ने मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिया था. कार उस ने कुंआवाला में सड़क किनारे छोड़ दी. उस ने कपड़े से कार में आग लगाने की कोशिश भी की थी. लेकिन कामयाब नहीं हो सका और इस प्रयास में वह खुद भी जल गया था. इस के बाद उस ने फोन कर के दीपिका को लाशों को ठिकाने लगाने की जानकारी दे दी और अपने घर चला गया.

योजना के अनुसार दीपिका ने अपने मासूम बेटे को अच्छे से रटवा दिया था कि कोई भी पूछे तो बताना है कि उस ने पापा को जाते हुए बाय किया था. शाम ढले दीपिका ने पति व ससुर के बुलंदशहर जाने की झूठी कहानी गढ़ कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अपने घर को भी उस ने पूरी तरह दुरुस्त कर दिया था. यह काम इतनी सफाई से किया था कि घर की तलाशी लेने पर पुलिस भी वहां से कोई सबूत नहीं जुटा पाई.

योगेश की निशानदेही पर पुलिस ने खून से सने चाकू और सोफा के कवर बरामद कर लिए. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन यानी 6 मार्च, 2017 को पुलिस ने दोनों आरोपियों को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) विनोद कुमार की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी.

दीपिका ने बेलगाम ख्वाहिश के चलते प्रेमी के साथ अलग दुनिया बसाने का ख्वाब पूरा करने के लिए जो रास्ता चुना, वह सरासर गलत था. उस ने अपनी ख्वाहिशों को काबू रखा होता और विवेक से काम लिया होता तो एक हंसताखेलता परिवार बरबादी के कगार पर कभी नहीं पहुंचता.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सैक्स जानकार कैसोनोवा और क्लियोपेट्रा

29 वर्षीय प्रिया तंदुरुस्त शरीर की आकर्षक युवती है. उस की शादी हुए 3 साल हो चुके हैं, लेकिन 3 साल में उसे एक भी रात वह यौनसुख प्राप्त नहीं हो पाया, जिस की हर युवती को चाह होती है. दूसरी ओर 28 वर्षीय कामकाजी रत्ना सिंह है जिस की शादी को 2 वर्ष हुए हैं. वह अपने पति की कामुकता से परेशान है. रत्ना थकीहारी अपने काम से आती है तो रात को पति कामवर्धक औषधियों का सेवन कर उस के साथ भी नएनए प्रयोग करता है. दोनों ही स्थितियों में किसी को भी सच्चा सुख नहीं मिलता, इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने यौन जीवन में संतुलन बनाएं. अगर किसी में यौन उत्तेजना सामान्य है तो उसे अतिरिक्त दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए. यदि किसी व्यक्ति की यौन उत्तेजना में कमी है तो वह निम्न लवफूड्स का प्रयोग कर वैवाहिक सुख का आनंद ले सकता है.

एफ्रोडाइस संज्ञा एक ऐसा द्रव्य है जो समुद्र से निकली विशाल घोंघा मछली एफ्रौडाइट से प्राप्त होता है. एफ्रोडाइट को कामुकता का प्रतीक माना जाता है. इस के द्रव्य को एफ्रोडाइस कहते हैं.

एफ्रोडाइस, यौनशक्तिवर्द्धक द्रव्य है जिस से स्त्रीपुरुष में यौनशक्ति या यौन अभिरुचि उत्पन्न होती है.

प्राकृतिक रूप से हम ऐसे कुछ खाद्य पदार्थों से पहले ही परिचित हैं, जो यौन क्षमता बढ़ाते हैं, जिन में ऐसे फल व सब्जियां प्रमुख हैं जिन का आकार स्त्री व पुरुष के गुप्तांगों से मिलताजुलता है. इन फल व सब्जियों के अंदर कुछ ऐसे गुण छिपे होते हैं जो मानव की यौन क्षमता को बढ़ाने में कारगर हैं. ये सभी फल पुरुष की कामुकता से जुड़े हैं, जबकि स्त्री की कामुकता बढ़ाने के लिए चैरी, खजूर, अंजीर, खास प्रकार की मछली और सीप जैसे खाद्य पदार्थ प्रमुख हैं.

केला एक ऐसा फल है, जिस में खनिज द्रव्य और ब्रोमेलिन प्रचुर में उपलब्ध है, जो पुरुष क्षमता को बढ़ाता है और यह फल सर्वसुलभ और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. सस्ता होने के कारण इस का प्रयोग आम लोग भी आसानी से कर सकते हैं.

प्राचीन यूनान में जब अंजीर की फसल की कटाई शुरू होती थी तो रीतिरिवाज के अनुसार रतिक्रीड़ा की जाती थी. क्लियोपेट्रा को भी अंजीर बहुत पसंद थे जिन्हें वह चाव से खाती थी. सब फलों में प्राचीनतम माने गए फल द्राक्ष का संबंध भी कामोत्तेजक गतिविधि से जोड़ा जाता है. वैसे द्राक्ष का फल काफी उत्तेजक है और स्वादिष्ठ होता है.

19वीं शाताब्दी में फ्रांस में सुहागरात से पहले दूल्हे को जो भोजन दिया जाता था उस में शतावरी को विशेष स्थान दिया जाता था, जबकि काफी समय पहले एशिया के मध्यपूर्व देशों के सुलतान व अमीर उमरा गाजर को स्त्रियों की उत्तेजना बढ़ाने में सहायक मानते थे.

कुछ व्यंजनों को भी उत्तेजना बढ़ाने में सहायक माना गया है. उदाहरणस्वरूप चौकलेट. चौकलेट को परंपरागत रूप से उत्तेजक माना गया है. इसलिए सदियों पहले ईसाई पादरियों और ननों को चौकलेट खाने की सख्त मनाही थी. कच्चे घोंघों में प्रचुर मात्रा में जस्ता होता है जिस के सेवन से लंबे समय तक संभोगरत रहने की शक्ति बढ़ सकती है. भूमिगत गुच्छी यानी ट्रफल भी ऐसा ही महंगा व सुगंधित पदार्थ है.

शैंपेन को भी लंबे अरसे से प्यार का पेय माना गया है, जो शादी के अवसर पर या विजयोत्सव मनाते समय भी ऐयाश लोगों में पानी की तरह बहाया जाता है. कहा जाता है कि व्हिस्की पिलाने से औरत बहस करना बंद करती है. बियर से उसे यौन आनंद मिलता है. रम से वह सहयोग करने लगती है. शैंपेन से होश खो बैठने पर कामुक हो उठती है. केवियर एक ऐसी मछली है जो मनुष्य के शरीर में उत्तेजना बढ़ाती है. यद्यपि निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि ऐसा क्यों माना जाता है.

साधारणातया हम कह सकते हैं कि अधिक शक्ति बढ़ाने वाले पदार्थ दुर्लभ हैं और इन का मूल्य भी काफी है, इसी कारण लोग अधिक आनंद लेने के लिए इन के दीवाने हैं. डामैना को चाय की तरह उबाल कर नियमित एक कप पीने से हारमोंस नियंत्रण में रहते हैं और इस से शारीरिक शक्ति भी प्राप्त होती है. एक प्रकार के लालमिर्च के मसाले से एंडोर्फोंस हारमोंस भी बढ़ाता है. गरम सूप या सौस पर मिर्च छिड़क कर प्रतिदिन खाने से भी लाभ होता है. अगर युवक जिनसेंग का प्रयोग करते हैं तो कामोत्तेजना अधिक होती है. अगर युवतियां इस का प्रयोग करती हैं तो उन की भी पिपासा बढ़ जाती है. जिनसेंग प्रसिद्ध चीनी द्रव्य है जो अश्वगंधा जैसा प्रतीत होता है.

भारत और मध्यपूर्व एशियाई देशों में लहसुन जोकि एक अच्छा विषाणुनाशक भी है, सदियों से युवकों की उत्तेजना बढ़ाने के लिए लोकप्रिय है. इस की अप्रिय दुर्गंध से बचाव के लिए खाने के बाद लौंग या छोटी इलायची का प्रयोग कर सकते हैं. प्याज और शहद का मिश्रण भी उपयोगी है. अदरक, लाल रास्फरी के पत्ते और गुड़हल या जाबा कुसुम कामोत्तेजना बढ़ाने के लिए काफी प्रचलित रहे हैं.

शहद से भी यह प्रकट होता है कि इस में भी कामवर्धक गुण हैं, लेकिन ध्यान रहे कि शहद शुद्ध हो. कुछ समाज आज भी  नवविवाहितों को शहद का पान कराते हैं. फिर चांदनी रात हो आशा और अरमानों की अंगड़ाइयां लेती हुई नववधु हो, तत्पश्चात लज्जा और मर्यादा का आवरण धीरेधीरे हट रहा हो और फिर काम और रति का युद्ध शुरू हो, कैसी रोमांटिक कल्पना है? यह भी बता दें कि शहद में विटामिन  ‘बी’ और एमिनो एसिड प्रचुर मात्रा में होने के कारण यह प्राकृतिक रूप से कामोत्तेजक सिद्ध हुआ है.

मिस्र में हड्डियों का सूप यानी पाया का भी काफी चलन है. हलाल की गई भेड़ की टांग की हडिड्यों के साथ ताजा कटी प्याज, लहसुन, पुदीना, लालमिर्च आदि को एकसाथ डाल कर 2 घंटे तक मिश्रण कर जो लुगदी तैयार होती है उस का भक्षण कर न जाने कितने मध्य एशियाई तथा मिस्रवासियों ने महिलाओं पर जुल्म ढाए हैं.

कामसूत्र में नीले सूखे कमल का चूर्ण, घी और शहद एकसाथ मिला कर खाने को कहा गया है, जिस से पुरुषों में खोई हुई शक्ति दोबारा लौट आती है. इसी प्रकार भेड़ा या बकरे के अंडकोश को उबाल कर चीनी डाल कर जो पेय बनता है, इसे पीने से भी अधिक शक्ति मिलती है.

इसी तरह इत्र या सुंगधित तेल की मालिश भी सुख के लिए लाभदायक है. ग्रीष्मऋतु की एक गरम शाम को ठंडी हवा का झोंका और प्रिया का उन्मुक्त्त स्पर्श इस से अधिक उत्तेजक और क्या हो सकता है.

एक कथानुसार साम्राज्ञी नूरजहां को पानी में गुलाब की पंखडि़या मिला कर स्नान करना पसंद था. एक दिन नहाने में देर हो गई तो उस ने देखा कि पानी के ऊपर एक तरल पदार्थ तैर रहा है. वह समझ गई कि यह गुलाब की पंखडि़यों से निकला इत्र है जो दालचीनी, तेल की तरह कामोत्तेजक है. इसी तरह वनिला, चमेली, धनिया और चंदन का लेप या इत्र लगाने से भी स्त्रीपुरुष उन्मुक्त होते हैं.

शराब और नशीले द्रव्यों से कुछ हद तक कामोत्तेजना बढ़ती है, लेकिन इन का नुकसान अधिक है. ये कामोत्तेजना द्रव्य नहीं हैं. इन की छोटी खुराक शुरू की शर्म व संकोच दूर करने में सहायक होती है, लेकिन यदि कोई स्त्री या पुरुष इन का अधिक मात्रा में लंबे समय तक सेवन करता है तो आगे चल कर युवक ढीला हो जाता है तथा युवती में चरमोत्कर्ष के आनंद को ले कर कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं, क्योंकि इन से मस्तिष्क प्रभावित होता है.

इसी प्रकार मारीलुआना व वियाग्रा जैसे पदार्थ भी अस्थायीरूप से यौनसुख की इच्छा या संभोग सुख थोड़ाबहुत बढ़ाते हैं. पर बेहोशी की सी हालत में. आप को  वार्निंग दी जाती है कि कृपया ड्रग्स से दूर रहें, क्योंकि अगर एक बार आप इन के आदी हो गए तो इन से पीछा छुड़ाना मुश्किल है. वियाग्रा जैसी दवाएं डाक्टर के परामर्श के बाद ही प्रयोग करें. युवतियों में भी हारमोंस की कमी को डाक्टर की सहायता से पूरी करें.

फिर आखिरी सवाल यही है कि क्या सचमुच ऐसी दवा यौनशक्ति में वृद्धि करती है. ऐसी दवा केवल तब ही लाभप्रद होती है, जब आदमी का मन भी कामवासना की तृप्ति करने में सहयोग करे.

औषधि निर्माता व विक्रेता केवल जरूरतमंदों का मात्र आर्थिक शोषण करते हैं. अगर इंसान अपने खानपान व व्यायाम पर विशेष ध्यान देते हुए प्रकृति के नियमों का पालन करे तो उस की यौन क्षमता स्वत: ही बनी रहेगी.

राजनेताओं को जनता का सबक

नवंबर दिसंबर में हुए 5 विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हालत पतली होगी, इस का अंदाजा महीनों पहले होने लगा था जब जनता को नोटबंदी, पैट्रोलडीजल के बढ़ते दामों, जीएसटी के शिकंजों, गौभक्तों की हिंसक करतूतों, महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा और भाजपा की हठधर्मी दिखने लगी थी. सरकार और पार्टी को शासनप्रशासन की नहीं, बल्कि मूर्तियों, उद्घाटनों, आरतियों, बाबाओं का आशीर्वाद लेने, अखबारों में बड़ेबड़े विज्ञापन देने की लगी रहती थी.

नरेंद्र मोदी की सरकार और अमित शाह की भाजपा ने ऐसा माहौल बना दिया था कि आमजन की तकलीफों को नजरअंदाज कर के मोदी व शाह के गुणगान किए जाने की आवाज ही सुनाई दे रही थी. पहले गुजरात और फिर कर्नाटक के चुनावों ने साफ कर दिया था कि केवल हिंदूहिंदू चिल्लाने से वोट नहीं मिलने वाले. पर मोदी, शाह और नागपुर (आरएसएस) को इस के अलावा न कुछ सूझता है, न आता है.

फिर भी लग यही रहा था कि पार्टी को कम सीटों के साथ हर राज्य में सफलता मिल ही जाएगी और इसलिए भाजपा दंभ व विश्वास से भरी थी. तभी तो मोदी ने बजाय विकास और आर्थिक मामलों की चर्चा करने के, अपनी रैलियों का इस्तेमाल जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राहुल गांधी की खिंचाई में किया.

दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस ने 1905 से 2014 तक क्या किया, की चर्चा न के बराबर की जबकि लोगों की आज की तकलीफों की चर्चा ज्यादा की. उन्होंने राफेल विमानों के सौदे में हुए घोटाले की बात की जिस की भाजपा ने साफसफाई नहीं दी. चौकीदार को खुले शब्दों में राहुल ने चोर कहा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आजादी से पहले क्या किया या बाद में, भारत में हिंदूमुसलिम बैर किस ने बढ़ाया, की बात की ही नहीं.

समय आया, तो जनता ने फैसला कर दिया. राजनेता इस फैसले से सबक लें, न लें, इस का उन्हें अधिकार है. जाहिर है कि कांग्रेस जनता के ज्यादा करीब रही. कांग्रेस 3 राज्यों में जीत गई. 2 राज्यों में वह नहीं जीती पर भाजपा, जो पूरे जोरशोर से लड़ी थी, इन दोनों राज्यों में तीसरे नंबर पर, कांग्रेस के बाद रही.

कांग्रेस में कोई लाल लगे हों, ऐसा नहीं है, पर कांग्रेस देशवासियों को विभाजित नहीं करती. कांग्रेस का शासन हमेशा भ्रष्टाचार से भरा रहा है, छोटेबड़े घोटाले हुए हैं पर काफी ऐसे काम भी हुए हैं जो अब दिख रहे हैं. भाजपा ने बीते साढ़े 4 साल में या तो पिछले कामों के पूरा होने पर उस का उद्घाटन किया या नामों का शिलान्यास किया. सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनवाने के अलावा कोई काम है ही नहीं उस का कि जिस का गुणगान किया जा सके. वैसे यह कोई काम भी नहीं और यह मूर्ति भी भारतीयों ने नहीं बल्कि चीनियों ने बनाई.

अब 2019 के लोकसभा चुनावों का प्रचार शुरू हो गया है. कांग्रेस को यह फायदा है कि अभी जीते तीनों राज्यों में वह कुछ करे या न करे, जनता को तो मई में होने वाला आम चुनाव दिखेगा. नरेंद्र मोदी का सारा समय अब पार्टी की सीटें और साख बचाने में लगेगा. वे अब ज्यादा जोड़तोड़ भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि अब पार्टियों के एनडीए छोड़ने का समय आ गया है, उस से जुड़ कर जोखिम लेने का नहीं, चाहे वह मई 2019 में फिर जीत जाए.

चुनावी परिणामों से भगवा गैंगों से राहत मिलेगी, तो पक्का है. अब ये गैंग उत्तर प्रदेश में ही कुछ कर पाएंगे. पर योगी आदित्यनाथ, जो भाजपा के प्रमुख प्रचारक रहे, अब मुंह छिपाते फिरेंगे और कोई जोखिम न लेंगे, ऐसी उम्मीद है. वैसे, पौराणिक इतिहास ऐसी कहानियों से भरा है जिन में हिंदू राजा अपने पुरोहितों, सहायकों के कहने पर एक के बाद एक गलत काम करते रहे हैं.

शादियों को मातम में बदलती बेहूदगियां 

साल 2008 की बात है. गरमी का मौसम था. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के रामपुर में एक लड़की का शादी समारोह चल रहा था. लड़की को ब्याहने हाजीपुर गांव से बरात आई थी. विवाह का संगीत बज रहा था और बरात के साथ चल रहे लोग फायरिंग कर खुशी का इजहार कर रहे थे.

द्वाराचार के बाद सजाधजा दूल्हा सुनील वर्मा जयमाला कार्यक्रम में जाने की तैयारी में था कि शादी समारोह में फायरिंग कर रहे एक लड़के की लापरवाही से एक गोली दूल्हे के सीने में लग गई. दूल्हे को आननफानन अस्पताल ले जाया गया जहां उस की मौत हो गई.

इसी तरह की एक घटना मध्य प्रदेश के गाडरवारा इलाके में भी हुई थी. इस में जयमाला स्टेज पर दूल्हादुलहन की मौजूदगी में नशे में धुत्त रिश्तेदारों द्वारा पिस्टल से हवाई फायर किए जा रहे थे. इसी हवाई फायर से जयमाला स्टेज पर मौजूद दूल्हे की एक रिश्तेदार आयुषी की गोली लगने से मौत हो गई. 21 साला आयुषी जबलपुर में इंजीनियरिंग की छात्रा थी.

खुशी मनाने के चक्कर में फायरिंग से होने वाली ये घटनाएं बताती हैं कि आज भी हम दिखावे के नाम पर कैसीकैसी बेहूदा परंपराओं को निभा रहे हैं. समाज के हर क्षेत्र में फायरिंग की ऐसी खूनी परंपराएं बंद होने का नाम नहीं ले रही हैं.

मौजूदा दौर में शादीब्याह, लग्न, फलदान, सगाई, जन्मदिन और दूसरे तमाम समारोहों में फायरिंग कर के खुशी का इजहार किया जाता है. इन कार्यक्रमों में नशे में धुत्त रहने वाले लोग जोश में होश खो कर खुशियों के पलों को मातम में बदल देते हैं.

शादीब्याह में फायरिंग का किसी खास धर्म से कोई संबंध नहीं है, बल्कि यह एक सामंती तबके के रीतिरिवाज की तरह है. राजामहाराजाओं के शासनकाल में राज्याभिषेक और स्वयंवर के समय तोप या बंदूक चला कर राजा की खुशामद की जाती थी.

राजामहाराजाओं की शान में किया जाने वाला यह शक्ति प्रदर्शन उन के वंशजों की अगड़ी जातियों में आज के दौर में भी प्रचलित है. आज भी शादीब्याह में दूल्हे को किसी राजा की तरह सजाया जाता है और एक दिन के इस राजा के सम्मान में गए बराती खुशी का इजहार करने के लिए फायरिंग करते हैं.

पत्रकार और साहित्यकार कुशलेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि पहले जब आतिशबाजी का चलन नहीं था तब से बरात में बंदूक से हवाई फायर किए जाते हैं. उसी परंपरा को आज भी कुछ अगड़ी जाति के लोग समाज में अपना रोब गांठने की गरज से अपनाए हुए हैं. फायरिंग के इस खूनी खेल को आज पिस्टल में कारतूस भर कर खेला जाने लगा है. अगड़ी कही जाने वाली कुछ जातियों में तो बाकायदा गन रखने वाले दलित जाति के नौकरचाकर बरात में साथ चलते हैं.

गन चलाने वाले ये सेवक पेशेवर निशानेबाज नहीं होते, बल्कि घरेलू नौकर होते हैं जो अपने कंधे पर बंदूक टांग कर चलते हैं और बरात में अपने मालिक की सेवाखुशामद करने का काम करते हैं.

शादी समारोहों में वीडियोग्राफी का काम करने वाले अश्विनी चौहान बताते हैं कि विवाह मंडप में सजीसंवरी लड़कियों को प्रभावित करने के लिए यही नौजवान डीजे के कानफोड़ू संगीत में डांस करने के साथ फायरिंग कर के खुद को हीरो साबित करने की होड़ में लग जाते हैं.

शादीब्याह के अलावा दशहरा पर्व पर भी शस्त्र पूजन के नाम पर घातक और खूनी हथियारों का सार्वजनिक तौर पर दिखावा किया जाता है और फायरिंग कर गांवनगरों की शांति को भंग किया जाता है. विभिन्न जाति व समुदायों द्वारा निकाली जाने वाली शोभायात्राओं, चल समारोहों के अलावा धार्मिक पर्वों में भी जश्न के नाम पर की जाने वाली यह फायरिंग जानलेवा साबित हो रही है.

ऐसी फायरिंग करने के मामले में राजनीतिक दल भी पीछे नहीं हैं. देश के सभी राज्यों में राजनीतिक दल किसी न किसी बहाने फायरिंग कर लोगों को उकसाने का काम करते हैं. सितंबर, 2018 में जबलपुर में भारतीय जनता युवा मोरचा के एक कार्यक्रम में की गई ऐसी फायरिंग की काफी चर्चा रही थी.

मैरिज पैलेसों पर सख्ती

राज्य सरकारों द्वारा समारोहों में फायरिंग रोकने के लिए नियम तो बनाए गए हैं, पर इन पर अमल होता नहीं दिख रहा. पंजाब सरकार ने नियमों में बदलाव करते हुए प्रावधान किया है कि हथियारों के लाइसैंस बनवाने वाले लोगों को अर्जी में लिखित में देना होगा कि वे किसी भी शादी समारोह या सामाजिक कार्यक्रम में हथियारों का गलत इस्तेमाल नहीं करेंगे.

इस के साथ ही हथियार ले कर मैरिज पैलेस या सामाजिक समारोह में प्रवेश रोकने के लिए मैरिज पैलेसों के प्रवेश द्वार पर मैटल डिटैक्टर लगाने को कहा गया है. इस के लिए मैरिज पैलेसों में कड़े नियम लागू किए हैं.

राज्य सरकार की ओर से कहा गया है कि मैरिज पैलेस में अगर हथियार ले कर किसी शख्स को प्रवेश करने दिया गया तो पैलेस मालिक के खिलाफ केस दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया जा सकता है. इस के साथ ही मैरिज पैलेसों के मुख्य परिसरों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश भी दिए गए हैं.

मध्य प्रदेश में भी किसी शादी, पार्टी या समारोह में फायरिंग की कोई भी घटना होने पर संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारी के खिलाफ कार्यवाही करने का ऐलान किया गया है.

चंबल जोन के आईजी संतोष कुमार सिंह ने यह आदेश जारी करते हुए सभी थाना प्रभारियों से कहा है कि वे सख्ती के साथ ऐसी फायरिंग पर रोक लगाने के लिए हथियारों का प्रदर्शन करने वालों पर कार्यवाही करें. ऐसी फायरिंग और सार्वजनिक जगह पर हथियारों के प्रदर्शन को रोकने के लिए कलक्टर ने धारा 144 लागू की है.

कलक्टर के आदेश में कहा गया है कि जिले में कहीं पर भी कोई भी शख्स समारोह में फायरिंग नहीं करेगा, साथ ही शादी, पार्टी या दूसरे किसी समारोह में कोई भी हथियारों का प्रदर्शन नहीं करेगा.

जागरूकता की जरूरत

मुरैना जिले की एक महिला पार्षद रजनी बबुआ जादौन ने अपने बेटे की शादी के कार्ड पर मेहमानों से किसी भी तरह का नशा, शराब का सेवन न करने के साथ ही फायर न करने का संदेश दे कर समाज में एक अच्छी शुरुआत की है. उन्होंने अपने लड़के मानवेंद्र की शादी के कार्ड के कवर पेज पर ऐसा संदेश दिया.

देश में आज भी सामंती व्यवस्था को पालने वाली सामाजिक बुराइयां वजूद में हैं, जो गरीब और दलितों पर रोब जमाने के साथ उन का शोषण करने का काम कर रही हैं. केवल नकल करने के नाम पर किसी जलसे में अपनी झूठी शान को दिखाने वाली इस तरह की परंपराओं का समाज में विरोध होना चाहिए.

ऐसी फायरिंग जानमाल का नुकसान तो करती ही हैं, साथ ही समाज को मालीतौर पर भी खोखला बनाती हैं.

पेट की भूख और रोजगार की तलाश

तलाश आदमी को बंजारे की सी जिंदगी जीने पर मजबूर कर देती है. यह बात राजस्थान और मध्य प्रदेश के घुमंतू  लुहारों और उन की लुहारगीरी को देखने के बाद पता चलती है.

घुमंतू लुहार जाति के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि 500 साल पहले जब महाराणा प्रताप का राज छिन गया था तब उन के साथ ही उन की सेना में शामिल रहे लुहार जाति के लोगों ने भी अपने घर छोड़ दिए थे. उन्होंने कसम खाई थी कि चितौड़ जीतने तक वे कभी स्थायी घर बना कर नहीं रहेंगे.

आज 500 साल बाद भी ये लुहार घूमघूम कर लोहे के सामान और खेतीकिसानी में काम आने वाले औजार बना कर अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर हैं. जमाना जितना मौडर्न होता जा रहा है, इन घुमंतू लुहारों के सामने खानेपीने के उतने ही लाले पड़ते जा रहे हैं.

सब से ज्यादा परेशानी की बात है रोटी की चिंता. इन के बनाए औजार अब मशीनों से बने सामानों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं. इस की वजह से इन लोगों के लिए रोजीरोटी कमाना मुश्किल हो गया है. सरकार की योजनाओं के बारे में इन्हें जानकारी नहीं है. इस वजह से ये लोग सरकारी योजनाओं का फायदा नहीं उठा पाते हैं.

लुहार जाति से जुड़े सुरमा ने कहा कि हमारी जाति के लोग सड़क किनारे डेरा डाले रहते हैं. कब्जा करने के नाम पर हमें खदेड़ा जाता है. एक ओर जहां दूसरी जातियों को घर बनाने के लिए जमीनें दी जा रही हैं, वहीं हमारे लिए न तो पानी का इंतजाम है, न ही शौचालय का. हमारे समाज की बहूबेटियों को असामाजिक तत्त्वों का डर बना रहता है.

इसी समाज की पानपति बताती हैं, ‘‘हम लोगों ने अपने बापदादा से मेहनत की कमाई से ही खाना सीखा है. हमारे पुरखों ने यही काम किया था और हम अब भी यही कर काम रहे हैं.’’

25 साला पप्पू लुहार, जो राजस्थान के माधोपुर का रहने वाला है, ने बताया, ‘‘हम लोग पूरे देश में घूमघूम कर यही काम करते हैं. आम लोगों की जरूरत की चीजें खासकर किसानों, मजदूरों के लिए सामान बनाते और बेचते हैं. हम लोगों का यही खानदानी काम है. हमारे पुरखे सदियों से यही काम करते आए हैं. हम दूसरा काम नहीं कर सकते क्योंकि हम पढ़ेलिखे नहीं हैं. हम लोगों को सरकार से कोई फायदा नहीं मिलता है.’’

मध्य प्रदेश के शिवपुरी से आए सूरज लुहार ने बताया, ‘‘हमारे परिवार में कोई पढ़ालिखा नहीं है. हम ने यही काम सीखा है. हमारे बच्चे हम से सीख रहे हैं. सालभर में 2 महीने बरसात के दिनों में हम अपने गांव में तंबू तान कर रहते हैं. हम लोग जहां भी जाते हैं, फुटपाथ पर ही सोते हैं.

‘‘हमें चोर, सांप, बिच्छू और मच्छर जैसी समस्याओं को झेलना पड़ता है. अनजान जगह पर खुले आसमान के नीचे औरतों के लिए सोना कितना मुश्किल काम है, इसे तो वही समझ सकता है जो उस जिंदगी को जी रहा है.’’

25 साला मदन लुहार की इसी साल शादी हुई है. उसे इस बात का अफसोस है कि वह जब चाहे तब अपनी पत्नी के साथ जिस्मानी संबंध नहीं बना सकता क्योंकि खुले आसमान में वह फुटपाथ पर ही सोता है. अगलबगल में उस के मातापिता व परिवार के दूसरे सदस्य भी सोते हैं ताकि रात में कोई औरतों के साथ गलत काम नहीं कर सके. आपस में जिस्मानी संबंध बनाने के लिए अमावस्या या जिस रात को चांद नहीं दिखाई पड़ता, वे दोनों उस रात का इंतजार करते हैं.

इन लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है. औरतें एनीमिया और बच्चे कुपोषण से पीडि़त दिखाई देते हैं. छोटे बच्चे तो जहां रहते हैं वहां पल्स पोलियो की दवा पी लेते हैं, लेकिन दूसरे टीके इन के बच्चों को नहीं लग पाते. इस की मूल वजह यह है कि ये लोग एक जगह रहते नहीं हैं और न ही टीकाकरण के बारे में इन्हें कोई जानकारी है.

आज इन घुमंतू लुहार जाति के लोगों को सरकारी सुविधाए देने की जरूरत है ताकि इन्हें भी घर, कपड़े, पढ़ाईलिखाई और सेहत जैसी दुनिया की सभी सहूलियतें मिल सकें.

मोदी पर बन रही फिल्म में ये करेंगे मोदी का किरदार

देश की राजनीति के लिहाज से 2019 बेहद अहम है. एक ओर इसी साल लोकसभा चुनाव हैं, दूसरी ओर ऐसी कई फिल्में रिलीज होने वाली हैं जो राजनैतिक तौर पर समाज को काफी प्रभावित करेंगी. उरी, दी एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर, ठाकरे इसी कड़ी की फिल्में हैं. इसी क्रम मेंएक और फिल्म जुड़ने वाली है. प्रधानमंत्री मोदी पर एक बायोपिक बनने वाली है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के किरदार में विवेक ओबेरौय निभाएंगे. फिल्म का फर्स्ट लुक 7 जनवरी को सामने आएगा. इसकी शूटिंग भी जनवरी में शुरू होगी.  इस बात की जानकारी ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने ट्वीट कर दी है.

आपको बता दें कि फिल्म का डायरेक्शन ओमंग कुमार करेंगे. वहीं प्रोड्यूसर संदीप सिंह हैं. ओमंग ने इससे पहले वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियन रह चुकी मैरीकौम और सरबजीत पर फिल्म बनाई थी.

biopic for pm modi

आपको बता दें कि विवेक ओबेरौय से पहले परेश रावल नरेंद्र मोदी की भूमिका निभाने वाले थे. पर किंही कारणों से उन्होंने ये फिल्म छोड़ दी. फिल्म की तैयारियां दो महीने पहले ही शुरू हो चुकी हैं. सूत्रों की माने तो लोकसभा चुनाव के पहले तक शूटिंग पूरी कर ली जाएगी.

फिल्म में चाय की दुकान चलाने, गुजरात के रोड ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन की कैंटीन में स्टाफ के तौर पर काम करने, राजनीति में आने, गुजरात का सीएम बनने से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक का सफर दिखाया जाएगा. फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गुजरात में ही की जाएगी.

2019 के फाइनल में कांग्रेस

सत्ता का सैमीफाइनल माने जाने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सब से बड़े 230 सीटों वाले राज्य मध्य प्रदेश में 15 सालों से राज कर रही भारतीय जनता पार्टी के हाथ से सत्ता की डोर तो उसी वक्त फिसलती दिखने लगी थी जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘नमामि देवी नर्मदे’ नाम से नर्मदा यात्रा शुरू की थी. यह यात्रा दिसंबर, 2016 में शुरू हो कर मई, 2017 में खत्म हुई थी.

लंबी और धर्मकर्म वाली इस नर्मदा यात्रा का भाजपा ने ऐसे होहल्ला मचाया था मानो विधानसभा चुनाव में उसे जनता नहीं, बल्कि नर्मदा नदी जिताएगी.

इस यात्रा पर सरकार के कितने करोड़ या अरब रुपए स्वाहा हुए थे, इस का साफसाफ ब्योरा आज तक भाजपा पेश नहीं कर सकी है.

शिवराज सिंह चौहान इस यात्रा की आड़ में जब मंदिरों और घाटों पर पूजापाठ करते और पंडों को दानदक्षिणा देते नजर आए थे, तो लोग मायूस हो उठे थे कि ये कैसी उपलब्धियां हैं जिन में हजारों की तादाद में छोटेबड़े नामी और बेनामी संत दानदक्षिणा से अपनी जेबें भर रहे हैं.

बाद में शिवराज सिंह चौहान ने 4 बाबाओं को मंत्री का दर्जा भी दे दिया था. इस से लोगों में यह संदेशा गया था कि अब साधुसंत सरकार चलाएंगे और दोबारा वर्ण व्यवस्था व ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा. दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में ही 15 सालों से सत्ता वापसी की कोशिश कर रही कांग्रेस आधी लड़ाई उस वक्त जीत गई थी जब कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह को हाशिए पर धकेलते हुए छिंदवाड़ा से सांसद और धाकड़ कांग्रेसी नेता कमलनाथ को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया था और गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनावी मुहिम की कमान सौंपी थी.

इन दोनों नेताओं को आगे लाने का राहुल गांधी का एक मकसद साल 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी अपनी पकड़ बनाने का था. कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना एक समझदारी भरा फैसला था, जिस का फायदा भी कांग्रेस को मिला.

यों बिगड़ा भाजपा का खेल

अकेले मध्य प्रदेश में ही नहीं, बल्कि राजस्थान में भी राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत के साथ युवा सचिन पायलट को भी चुनावी मुहिम में लगा दिया, तो कांग्रेस वहां भी दौड़ में आ गई.

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रह चुके अजीत जोगी को कांग्रेस पहले ही बाहर का रास्ता दिखा चुकी थी जिन की बिगड़ी इमेज नतीजों के आईने में भी दिखी. वहां कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के साथ 2 धाकड़ नेताओं टीएस सिंह देव और चरणदास महंत को भी कांग्रेस ने चुनाव में उतारा.

इन तीनों राज्यों में कांगे्रस शुरू में कहीं गिनती में नहीं थी. एक साल पहले तक यह कहा जा रहा था कि भाजपा इन तीनों राज्यों में फिर से भगवा फहराने में कामयाब हो जाएगी लेकिन महज एक साल में ऐसा कौन सा चमत्कार हो गया कि मध्य प्रदेश में वह 114, राजस्थान में 99 और छत्तीसगढ़ में रिकौर्ड 65 सीटें ले गई? इस का भाजपा के धर्मकर्म और तीनों मुख्यमंत्रियों के कामकाज से गहरा ताल्लुक है.

धर्मकर्म के मामले में न तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पीछे रहे और न ही महारानी के खिताब से नवाजी जाने वाली राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, जो मतगणना वाले दिन सुबह से ही बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने जा कर बैठ गई थीं लेकिन भगवान ने उन की एक न सुनी और राजस्थान में भाजपा को महज 73 सीटों पर लटका कर रख दिया.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तो उस वक्त हद ही कर दी थी, जब भगवा कपड़ों वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार करने के लिए छत्तीसगढ़ पहुंचे थे. तब रायपुर में उन्होंने योगी आदित्यनाथ के पैरों में लोट लगाई थी.

वहां की एक सभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बेतुकी बात यह कही थी कि चूंकि छत्तीसगढ़ रामलला का ननिहाल है, इसलिए यहां भी उन का मंदिर बनना चाहिए.

इस बात से वहां के लोग घबरा उठे थे कि अब हिंदूवादी संगठन जबरन आदिवासियों को पूजापाठ में धकेलने की अपनी कोशिशें तेज करेंगे.

न केवल तीनों मुख्यमंत्रियों, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी ब्लडप्रैशर उस वक्त बढ़ना शुरू हो गया था जब इन राज्यों में राहुल गांधी की रैलियों में भीड़ उमड़ने लगी थी और लोग संजीदगी से उन की बातें सुनने लगे थे.

राहुल गांधी ने चालाकी दिखाते हुए भाजपा के हथियार का उन्हीं पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तो भगवा खेमा और ज्यादा तिलमिला उठा. उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजा और शिव अभिषेक कर उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू किया तो भाजपाइयों ने बारबार वही गलती दोहराई जो राहुल गांधी उन से चाहते थे. हालांकि इस के पहले भी उन के धर्म प्रेम को ले कर काफी हल्ला मच चुका था लेकिन चुनाव के वक्त यह बढ़ा तो भाजपा को लेने के देने पड़ने लग गए.

राहुल गांधी खुद को शिवभक्त और जनेऊधारी ब्राह्मण तो बताते रहे, पर उन्होंने मंदिरों की तारीफ नहीं की. दूसरी तरफ जनसभाओं में उन्होंने पुरजोर तरीके से आम लोगों के हितों से जुड़े मुद्दों पर जोर दिया. तीनों ही राज्यों

में उन्होंने बेरोजगारों, रसोई गैस, पैट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों और किसानों की बदहाली पर खासा फोकस किया, किसी देवीदेवता पर नहीं.

मजा तो तब आया जब भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने भोपाल में राहुल गांधी से उन का गोत्र पूछ डाला. भाजपाइयों से और उम्मीद भी नहीं की जा सकती. सदियों से जातियों का नाम ले कर ही वे अपना काम चलाते रहे हैं.

जवाब में राहुल गांधी ने राजस्थान के मशहूर पुष्कर मंदिर में जा कर पंडित से पूछ कर अपना गोत्र दत्तात्रेय और खुद को कौल ब्राह्मण साबित कर डाला.

इस मंदिर के नीचे झूठ का सदा प्रचार होता है. यहां बड़ेबड़े बोर्ड लगे हैं कि जूते मुफ्त रखें, पर बदले में 500 रुपए की चढ़ावे की डाली खरीदनी जरूरी है जो बोर्डों पर नहीं लिखा होता. हालांकि इस सब से साबित यही हुआ था कि किसी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या तहसीलदार के मुकाबले पंडेपुजारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र लोग ज्यादा सटीक मानते हैं.

फ्लौप हुए मोदी

जब माहौल बिगड़ने लगा और कांग्रेस की हवा तीनों राज्यों में बंधने लगी तो भाजपा को अपने हीरो नरेंद्र मोदी से उम्मीदें बंधीं कि अब वे ही नैया पार लगाएंगे.

अपनी चुनावी सभाओं में राहुल गांधी ने मुख्यमंत्रियों से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. इंदौर की एक सभा में राफेल डील को ले कर उन्होंने ‘चौकीदार’ अपने मुंह से बोल कर और ‘चोर है’ जनता से कहलवाया तो राजनीति के जानकारों का यह अहसास यकीन में बदलने लगा कि राहुल गांधी की ‘पप्पू’ वाली इमेज गए कल की बात हो गई है और भाजपा उन का मजाक बना कर खुद का ही नुकसान कर रही है.

नरेंद्र मोदी के लिए इन राज्यों में चुनाव प्रचार एक चुनौती बन गया था. एक तो उन की सभाओं में पहले की तरह भीड़ नहीं उमड़ रही थी, दूसरे महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी के फैसले पर वे राहुल गांधी के सवालों और हमलों का कोई तसल्ली वाला जवाब नहीं दे पा रहे थे.

जनता नरेंद्र मोदी से उम्मीद कर रही थी कि वे राफेल डील की कीमतों का खुलासा कर के राहुल गांधी के आरोपों का करारा और सटीक जवाब दें, लेकिन वजहें चाहे राष्ट्रहित की हों, 2 देशों के करार की हों या फिर कोई और, उन्होंने ऐसा नहीं किया तो धर्म, जाति और गोत्र के मसले की तरह राहुल गांधी उन पर भारी पड़ते नजर आए और यह सोचने का मौका भी लोगों को मिल ही गया कि आखिरकार नोटबंदी से किसे और क्या हासिल हुआ और जीएसटी से देश कौन सा मालामाल हो गया? इस के उलट व्यापारियों का ही नुकसान हुआ जिन को नरेंद्र मोदी ने यह अहसास करा दिया था कि वे टैक्स चोर हैं.

भारी पड़े ये मुद्दे

न केवल मध्य प्रदेश और राजस्थान के नतीजे हैरान कर देने वाले आए, बल्कि छत्तीसगढ़ के नतीजे तो इस लिहाज से चौंका देने वाले हैं कि वोटर ने यहां कांग्रेस की झोली लबालब भर दी है. लेकिन अगर राजस्थान और मध्य प्रदेश में 1-1 सीट के लिए तरसा कर रख दिया तो इस की वजह लोकल मुद्दों का भारी पड़ना है.

मध्य प्रदेश में तो 2 अप्रैल की दलित हिंसा के बाद ही भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को समझ आ गया था कि बाजी हाथ से जा रही है. एट्रोसिटी ऐक्ट के बवाल से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा जहां के ऊंची जाति वाले भाजपा से नाराज दिखे, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे का खास असर नहीं देखा गया.

गौरतलब है कि इस मुद्दे पर भाजपा संसद में दलितों के आगे झुक गई थी और उस ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल दिया था. इस से सवर्ण खासा नाराज थे. मध्य प्रदेश में तो दलितों के बाद सवर्णों ने भी जम कर बवाल मचाया था और अपनी अलग पार्टी सपाक्स भी बना ली थी.

उम्मीद के मुताबिक सपाक्स भाजपा को नुकसान नहीं पहुंचा पाई तो यह शिवराज सिंह चौहान की खूबी थी जिन्होंने धीरेधीरे पुचकार कर सवर्णों को मना लिया था, लेकिन इतना नहीं कि भाजपा चौथी बार भी बाजी मार ले जाती.

राजस्थान की हालत उलट थी जहां छोटे दल और निर्दलीय 25 सीटें ले गए. यहां नई बनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बराबरी से नुकसान पहुंचाया लेकिन उस से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाया भाजपा के बगावती उम्मीदवारों ने जो टिकट न मिलने पर या तो दूसरी पार्टी से चुनाव लड़े या फिर निर्दलीय मैदान में उतरे.

तीनों विधानसभा चुनाव अपनी इस दिलचस्पी के चलते भी याद किए जाएंगे कि राजस्थान के उलट मध्य प्रदेश में भाजपा के बगावती कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए.

भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में आए पूर्व मंत्री सरताज सिंह होशंगाबाद सीट से विधानसभा अध्यक्ष सीताराम शर्मा के हाथों हारे तो शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह तो कांग्रेस के टिकट पर वारासिवनी सीट से तीसरे नंबर पर रहे.

यह बात भी कम हैरत की नहीं कि मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को लगभग बराबर 41-41 फीसदी वोट मिले लेकिन सीटों के मामले में भाजपा कांग्रेस से 5 सीटों के अंतर से पिछड़ कर सत्ता से बाहर हो गई.

दूरगामी फर्क पड़ेगा

अब यह भाजपा के सोचने की बात और बारी है कि कोई राम, कृष्ण या दूसरा भगवान उसे नहीं जिता सकता, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की चाबी नीचे वाली जनता के हाथ में होती है, ऊपर वाले भगवान के हाथ में नहीं.

राम मंदिर निर्माण का जिन जिंदा कर रही और देश में बड़ीबड़ी मूर्तियां गढ़ रही भाजपा के लिए तीनों राज्यों के नतीजे सबक देने वाले हैं कि अगर उसे साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हिंदीभाषी राज्यों में साल 2014 के मुकाबले आधी सीटें भी चाहिए, तो रामनाम जपना छोड़ना होगा. राहुल गांधी के धर्म, जाति और गोत्र जैसे सवालों को भी छोड़ना होगा, नहीं तो जनता उसे छोड़ देगी.

भाजपा की एक दिक्कत यह भी है कि उस के पास उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए कुछ खास नहीं है. ऐसे में वोट अब वह किस मुद्दे पर मांगेगी, यह बात उस के रणनीतिकार भी शायद ही तय कर पाएं. अमित शाह तय करें, साधुसंत तय करें या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे हिंदूवादी संगठन तय करें, इन सभी को यह समझ आ रहा है कि धर्म का कार्ड 3 अहम भगवा गढ़ों से खारिज हो चुका है.

अब अगर राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को भाजपा हवा देती है या चुनावी मुद्दा बनाती है तो इन नतीजों के मद्देनजर उसे भारी नुकसान होना तय दिख रहा है.

दूसरी तरफ कांग्रेसियों के हौसले बुलंद हैं. कांग्रेसी खेमे में 3 राज्यों की जीत से नया जोश आया है जिस से लोकसभा चुनाव में भी उसे फायदा होगा. कांग्रेस के लिहाज से एक अच्छी बात जो उस की वापसी की वजह बनी, वह उस की एकता है, नहीं तो अब तक इन राज्यों में वह आपसी फूट के चलते ज्यादा हारती रही थी.

तीनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों के चुनाव में थोड़ी कलह दिखी, पर मध्य प्रदेश में कमलनाथ को, राजस्थान में अशोक गहलोत को और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बना दिया गया. यह कलह 4 दिन में शांत हो गई. 2019 के चुनाव परिणाम अभी आने हैं.

इन जीतों का सियासी असर दिखना भी शुरू हो गया है. भाजपा विरोधी दलों को एक आस बंधी है कि भाजपा कोई अपराजेय पार्टी नहीं है. अगर मिलजुल कर लड़ा जाए तो उसे हराया भी जा सकता है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेहद आक्रामक अंदाज में हमलावर हो रहे हैं कि अब उन की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

मजबूत होती कांग्रेस को अब इस बात का फायदा होना तय दिख रहा है कि अगर महागठबंधन बना तो दूसरी पार्टियों को उस की छत के नीचे आना पड़ेगा.

अब बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में सीटों की हिस्साबांटी में उस पर ज्यादा दबाव नहीं बना पाएंगे और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को भी उस के पीछे चलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जहां अमित शाह पहले ही नीतीश कुमार से फिफ्टीफिफ्टी का सौदा कर चुके हैं.

वैसे, कांग्रेस को भी वोटर ने पूरी आजादी नहीं दी है, बल्कि बाउंड्री पर बांध कर रखा है. जाहिर है कि उस के नए मुख्यमंत्रियों को बेहतर प्रदर्शन करना पड़ेगा, नहीं तो जनता का मूड बदलने में अब देर नहीं लगती.

अगर राहुल गांधी यह सोच रहे होंगे कि वे कथित जनेऊधारी ब्राह्मण होने के नाते या फिर देवीदेवताओं के आशीर्वाद से कांग्रेस की वापसी कराने में कामयाब हुए हैं, तो यह उन की गलतफहमी ही साबित होगी.

कांग्रेस की 3 राज्यों में जीत की वजहें पंडावाद और मूर्तिवाद के अलावा इन राज्यों में बढ़ती बेरोजगारी को ले कर नौजवानों की भड़ास और लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही खेतीकिसानी ज्यादा है जिस के चलते किसानों ने इस बार उस से तोबा कर ली.

महंगाई, बढ़ते भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून व्यवस्था से लोग आजिज आ गए थे, पर इन से भी ज्यादा अहम बात जो दिख नहीं रही, वह दलितों और आदिवासियों की बढ़ती बदहाली थी. भाजपा इन तबकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. अब अगर कांग्रेस भी इसी राह पर चलती है, तो एक बात इन्हीं नतीजों से साबित हुई है कि वोटर अब किसी एक पार्टी के खूंटे से बंधा नहीं रह गया है, इसलिए जो भी सत्ता संभालेगा उसे इन तबकों के लिए ठोस काम तो करने ही पड़ेंगे.

किसे महंगी पड़ी दलितों की गैरत

तीनों राज्यों के नतीजों से भाजपा से बड़ा सबक बसपा को मिला है और उस की विदाई भी हो चुकी है. मायावती ने यह कहते हुए तीनों राज्यों में कांग्रेस से गठबंधन ठुकरा दिया था कि कांग्रेस बसपा को खत्म करना चाहती है जिस की अपनी गैरत है. दलितों की गैरत की बात करने वाली मायावती को फायदा तो कुछ नहीं हुआ, पर नुकसान उम्मीद से ज्यादा हुआ है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा 2-2 सीटों पर सिमट कर रह गई जबकि मायावती यह उम्मीद लगाए बैठी थीं कि वे मध्य प्रदेश में अपने दम पर 8-10 सीटें ला कर जीतने वाली पार्टी को बसपा की मुहताज कर देंगी और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के साथ भी यही समीकरण दोहराएंगी लेकिन इन दोनों ही राज्यों में बसपा का वोट 5 फीसदी का आंकड़ा भी नहीं छू पाया.

सौदेबाजी में माहिर मायावती छत्तीसगढ़ में गच्चा खा गईं, जहां बसपा के वोट तो जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ को मिले लेकिन उस के वोट बसपा को नहीं मिले क्योंकि उस का कोई वोट बैंक था ही नहीं. हैरत तो यह देख कर हुई कि अकलतरा से बसपा के टिकट पर लड़ीं अजीत जोगी की बहू रिचा जोगी भी चुनाव हार गईं.

राजस्थान में जरूर बसपा सम्मानजनक सीटें ले गई लेकिन वहां हालात ऐसे बने कि 4 फीसदी वोट और 6 सीटें ले जा कर भी मायावती कांग्रेस की राह का रोड़ा या जरूरत नहीं बन पाईं. इशारा साफ है कि दलित अब बसपा का वोट बैंक नहीं रह गया है.

दलितों की गैरत का दूसरा पहलू भी बड़ा दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश में उस ने गरीब सवर्णों के साथ खड़ा होने से इनकार कर दिया. चुनाव के 3 महीने पहले शिवराज सिंह चौहान ने जिस संबल योजना को लागू किया था, दरअसल वह दलितों को लुभाने की कोशिश थी.

गरीबों के भले वाली इस योजना का दलितों ने फायदा तो उठाया लेकिन यह बात उन्हें रास नहीं आई कि योजना अलग से उन्हीं के लिए क्यों नहीं बनाई गई. पर इस का ढिंढोरा इस तरह पीटा गया मानो दलित तबका मालामाल हो गया हो.

हकीकत तो यह है कि दलित समाज आज भी अपनी झोली खोले खड़ा है. जब उसे समझ आ गया कि भाजपा इस से ज्यादा कुछ नहीं दे पाएगी तो उस ने कांग्रेस का पल्लू थाम लिया, जिस से और ज्यादा खैरात मिले. बात कम हैरत की नहीं जो आगे की राजनीति पर बड़ा फर्क डालेगी कि दलित समुदाय चाहता है कि गरीब सवर्ण और दलित में फर्क कर उस की थाली में दालरोटी डाली जाती रहे. कांग्रेस इस बार उसे मुफीद लगी तो उस ने पाला बदलने में देर नहीं की.

हालांकि एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर भी दलित समुदाय भाजपा से खफा था लेकिन यह मुद्दा वोटिंग के वक्त तक गायब हो चुका था और उस की जगह इस ख्वाहिश ने ली थी कि कौन उसे ज्यादा दे सकता है.

लोकसभा चुनाव 2019 में अब इन बातों के मद्देनजर मायावती पर दलित ज्यादा भरोसा करेगा, ऐसा लग नहीं रहा. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इन नतीजों ने गहरा असर डाला है. अब वहां भी कांग्रेस दलितों को अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी. और हैरानी नहीं होनी चाहिए, अगर मायावती वहां भी देखती रह जाएं, क्योंकि अब वाकई उन के पास दलितों को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं है.

भाजपा की नजर में तो दलितों की गैरत के कभी कोई माने ही नहीं रहे. इस बात का खुलासा उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ ने बीकानेर की एक सभा में यह कहते हुए किया था कि हनुमान दलित थे यानी भाजपा की नजर में दलितों की हैसियत बंदरों सरीखी है.

बरकरार रहा टीआरएस का करिश्मा

119 सीटों वाले तेलंगाना में इस बार भी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव यानी केसीआर का जादू बरकरार है जिन की पार्टी टीआरएस यानी तेलंगाना राष्ट्र समिति 88 सीटें जीत गई. कांग्रेस और तेलुगुदेशम पार्टी का गठबंधन नाकाम साबित हुआ और 21 सीटों पर सिमट कर रह गया. इस से भी बड़ा झटका 2014 में 5 सीटें ले जाने वाली भाजपा को लगा जिसे सिर्फ एक सीट से ही तसल्ली करना पड़ी. ओवैसी की एआईएमएआई ने 7 सीटें जीत कर अपनी साख बरकरार रखी.

तेलंगाना में केसीआर ने विधानसभा भंग करते हुए वक्त से पहले चुनाव कराने पर तवज्जुह दी थी जिस का फायदा भी उन्हें मिला. उन की कल्याणकारी योजनाएं जनता ने पसंद कीं जिस में गरीबों की शादी और मकान के लिए पैसा देने वाली बातें लोगों को खूब पसंद आईं.

तेलंगाना में किसानों को 4,000 रुपए प्रतिमाह प्रति एकड़ देने की योजना टीआरएस की बड़ी जीत की अहम वजह बनी. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी टीआरएस भारी पड़ेगी क्योंकि केसीआर की लोकप्रियता आज भी बरकरार है.

केसीआर वैसे उतने ही अंधविश्वासी हैं जितने 1947 के बाद कांग्रेसी राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल थे या आज मोदीयोगी हैं, पर फिर भी वे दलितमुसलिम विरोधी नहीं हैं.

पंजे से छूटा मिजोरम

हिंदीभाषी राज्यों में पहली सी पैठ बना चुकी कांग्रेस का उत्तरपूर्वी भारत में पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया है. 40 सीटों वाले छोटे से राज्य मिजोरम की सत्ता उस से एमएनएफ यानी मिजो नैशनल फ्रंट ने छीन ली है. यहां कांग्रेस हैरतअंगेज तरीके से 5 सीटों पर सिमट गई जबकि एमएनएफ ने 26 सीटें जीत कर सत्ता हासिल कर ली.

10 साल से राज कर रही कांग्रेस के मुख्यमंत्री लल थनहवला दोनों सीटों से हारे तो साफ हो गया कि मिजोरम में भी सत्ता विरोधी लहर थी. वहां देहाती और बाहरी दोनों इलाकों से कांग्रेस बुरी तरह हारी. भाजपा इस राज्य में भी कुछ हासिल नहीं कर पाई जिस ने बड़ी उम्मीदों से सभी 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत उसे एक सीट पर ही मिली.

भाजपा इस पट्टी में लगातार कामयाब होती रही थी लेकिन मिजोरम के नतीजे उस का असर कम करने वाले साबित हुए.

अमित साध को मिल गया उनका प्यार

‘‘काय पो चे’’,‘‘गुड्डू रंगीला’’, ‘सुल्तान’’, ‘‘रनिंग शादी’’, ‘‘सरकार 3’’ और ‘‘गोल्ड’’ सहित कई फिल्मों में अभिनय कर अपनी एक अलग पहचान बना चुके अभिनेता अमित साध स्पोर्ट्स में भी अच्छी खासी दिलचस्पी रखते हैं. वह हर साल, दो माह के लिए बाइक से पहाड़ों पर यात्रा करने जाते हैं. बाइक प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते हैं. अब खबर है कि उन्होंने अपनी जीवन संगिनी के रूप में मुंबई में रह रही ब्राजीलियन फिटनेस मौडल ऐनाबेल डिसिल्वा को चुन लिया है.

सूत्रों का दावा है कि अमित साध और ऐनाबेल डिसिल्वा के बीच यह प्रेम कहानी पिछले दो वर्षों से चली आ रही थी. अक्टूबर 2018 में अमित साध के साथ अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर डाल कर अपने रिश्ते को लेकर ऐनाबेल डिसिल्वा ने इशारा भी किया था. लेकिन अमित साध इस बात को अब तक छिपाए हुए थे. पर अब क्रिसमस और नए वर्ष की छुट्टियां ऐनाबेल डिसिल्वा के साथ लंदन और पेरिस में मनाने के बाद अमित साध ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि उन दोनों के बीच एक रिश्ता पनप रहा है.

एक खास मुलाकात ने अमित साध ने रिश्ते को स्वीकार करते हुए कहा- ‘‘यह कहना गलत है कि हमारे बीच दो वर्ष से रिश्ता बना हुआ है. पर ऐनाबेल डिसिल्वा से कुछ माह पहले मेरी मुलाकात एक जिम में हुई थी. जहां मैं अपनी एक फिल्म के किरदार के लिए जरूरी ट्रेनिंग ले रहा था. वहीं पर ऐनाबेल डिसिल्वा बौडी बिल्डिंग प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए तैयारी कर रही थीं. हमारे बीच जिम में ट्रेनिंग को लेकर ही बातचीत शुरू हुई थी. पर धीरे धीरे हम दोनों एक दूसरे के नजदीक आ गए. वह हमेशा मुस्कुराती रहने वाली महिला है, जो कि लोगों को हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती हैं. फिलहाल हमें एक दूसरे के साथ रहते हुए खुशी मिलती है. पर हमारा यह रिश्ता आगे कहां तक बढ़ेगा इसको लेकर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. वैसे शादी का मतलब प्यार और साथ में रहना ही होता है. और हम साथ में हैं.’’

बुजुर्गों की हत्या : अपने ही बहा रहे हैं खून

60 साल की विधवा आशा देवी की हत्या करने से पहले हत्यारों ने उन के हाथपैर को बांध दिया था. खून से सनी उन की लाश पेट के बल बिछावन पर पड़ी हुई थी. उन के दोनों हाथ पीछे की ओर कर के रस्सी से बांध दिए गए थे.

लाश को देख कर लगता था कि कातिलों ने पहले उन के सिर पर किसी धारदार हथियार से वार किया था, उस के बाद चेहरे पर. जिस्म के अलगअलग हिस्सों पर चाकू से मारा गया था. उन की दोनों आंखों को भी फोड़ डाला गया था, उस के बाद कातिलों ने गला दबा कर उन्हें पूरी तरह शांत कर दिया था.

10 सितंबर, 2017 को आशा देवी की हत्या करने के बाद हत्यारे उन का मोबाइल फोन साथ ले भागे. उन्हीं के फोन से हत्यारों ने दोपहर के 1 बज कर 57 मिनट पर आशा देवी के मकान में किराए पर रहने वाले छात्र शुभम को फोन कर के बताया कि आंटी सीढि़यों से गिर गई हैं, घर जा कर देख आओ.

इस से पहले हत्यारों ने आशा देवी की छोटी बेटी नीता को फोन किया था, पर उस समय वह काल रिसीव नहीं कर सकी थी. उस के बाद छोटे दामाद अमित कुमार को फोन किया गया, पर वे भी काल रिसीव नहीं कर सके थे.

फोन रिसीव करने के बाद शुभम ने पास में ही रहने वाले आशा देवी के देवर महेंद्र प्रसाद सिंह और उन की बीवी उमा देवी को मामले की जानकारी दी. सभी लोग आशा देवी के घर पहुंचे और पहली मंजिल पर गए.

वहां सीढि़यों पर आशा देवी नहीं मिलीं. उस के बाद सभी आशा देवी के कमरे में पहुंचे, तो देखा कि वे खून से लथपथ पेट के बल बिस्तर पर पड़ी हुई थीं.बुजुर्ग औरत आशा देवी की हत्या के मामले में पुलिस ने पुरानी दाई समेत 3 रिश्तेदारों को हिरासत में लिया. पूछताछ के बाद दाई को छोड़ दिया गया.

पटना के सिटी एसपी डाक्टर अमरकेश ने बताया कि पुलिस की जांच में पता चला है कि हत्यारों ने पटना जंक्शन के पास से आशा देवी की बेटी, दामाद और उन के यहां रहने वाले छात्र शुभम को फोन किया था. आखिरी काल लोकेशन पटना जंक्शन की थी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे बिहार से बाहर फरार हो चुके हैं. आशा देवी के देवर के बयान पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया.

पुलिस को यकीन है कि किसी करीबी ने ही आशा देवी का कत्ल किया है. वे अपने घर के मेन गेट को हमेशा लौक रखती थीं और कोई अपना आता था, तभी गेट खोलती थीं. यह भी हो सकता है कि कोई परिचित ही हत्यारों को साथ ले कर आया हो.

आशा देवी ने अपनी जायदाद को दोनों बेटियों के नाम कर दिया था, इसी बात से गुस्साए किसी करीबी ने ही उन की हत्या कर दी हो. उन के कमरे में रखी अलमारी और बक्से खुले हुए थे, जिस से साफ होता है कि लूट के इरादे से आशा देवी की हत्या की गई थी.

आशा देवी के मकान के ग्राउंड फ्लोर पर शुभम, भानु प्रताप, अभिषेक और आशुतोष किराए पर रहते हैं. सभी बीए के छात्र हैं.

आशा देवी की बड़ी बेटी सुजाता और दामाद रितेश जयपुर में रहते हैं. रितेश बैंक में काम करते हैं. छोटी बेटी नीता अपने पति अमित कुमार के साथ बिहार के ही जमालपुर में रहती हैं. उन के पति रेलवे में इंजीनियर हैं.

आशा देवी ने अपने मकान को 2 हिस्सों में बांट कर दोनों बेटियों के नाम कर दिया था. पुलिस ने आशा देवी की बेटियों से पूछताछ की है. आशा देवी को हर महीने 15 हजार रुपए किराए से मिलते थे और पैंशन की रकम खाते में जमा हो रही थी. उन्होंने अपने सारे गहनों को बैंक के लौकर में जमा कर रखा था.

कुछ दिन पहले ही उन्होंने 2 लाख रुपए इन्वैस्ट किए थे. इस से पुलिस को शक है कि किसी नजदीकी जानकार ने ही आशा देवी का कत्ल किया है.

पटना के शास्त्रीनगर थाने के शिवपुरी महल्ले के ममता अपार्टमैंट्स के पास आशा देवी का मकान है. वे अपने मकान में अकेली रहती थीं. साल 2014 में आशा देवी के पति रामानंद सिंह की मौत हुई थी. वे शिक्षा विभाग में मुलाजिम थे और कुछ साल पहले ही रिटायर हुए थे.

दौलत और रुपयों की खातिर बुजुर्गों के बेटे, रिश्तेदार, दोस्त वगैरह ही उन का कत्ल करने लगे हैं, जिस से परिवार में भरोसा नाम की चीज खत्म होती जा रही है और अपराध का नया और घिनौना चेहरा सामने आने लगा है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों को देख कर महसूस किया जा सकता है कि रिश्तेदारी और दोस्ती पर दौलत किस कदर भारी पड़ने लगी है.

पुलिस के एक आला अफसर कहते हैं कि ऐसे मामलों में परिवार के सदस्य बड़ी ही सफाई से और मौके का इंतजार कर हत्या को अंजाम देते हैं, जिस से पुलिस को जांचपड़ताल करने में काफी दिक्कतें आती हैं.

ऐसे ज्यादातर मामलों में हत्यारे या हत्या की साजिश रचने वाले ही शिकायत दर्ज कराते हैं. हत्या को अंजाम देने के बाद सुबूतों को पूरी तरह से मिटा कर ही वे थाने में एफआईआर दर्ज कराने पहुंचते हैं.

इतना ही नहीं, वे समयसमय पर पुलिस जांच के बारे में जानकारी भी लेते रहते हैं और पुलिस को गुमराह कर जांच को दिशा से भटकाने में कामयाब हो जाते हैं.

बिहार पुलिस हैडक्वार्टर से मिली रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 से मई, 2016 के बीच पटना जिले में ही 992 हत्याएं हुईं, जिन में से 77 फीसदी मामलों में किसी न किसी तरह से परिवार के किसी सदस्य या पहचान वाले का ही हाथ था.

19 सितंबर, 2017 की सुबह पटना सिटी की पटनदेवी कौलोनी में 78 साल की दौलती देवी की उन के 55 साल के बेटे विजय के साथ पैसों को ले कर अनबन शुरू हुई और गुस्से में विजय ने अपनी मां को जोर से धक्का दे दिया. बूढ़ी दौलती देवी मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ीं और उन के मुंह से खून बहने लगा.

दौलती देवी के छोटे बेटे सुजय ने जख्मी पड़ी मां को उठाया और अस्पताल ले गया. जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि दौलती देवी की मौत हो चुकी है.

मां की मौत होने के बाद गुस्साए सुजय ने घर पहुंच कर विजय पर ईंटपत्थरों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया, जिस से मौके पर ही विजय की भी मौत हो गई.

इस दोहरे हत्याकांड के पीछे रुपए और जमीन का ही झगड़ा था. आसपास के लोगों ने बताया कि दौलती देवी और उन के बेटों के बीच अकसर रुपयों के लेनदेन को ले कर झगड़ा होता रहता था.

दौलती देवी के पति फकीरा महतो सरकारी मुलाजिम थे और रिटायर होने के कुछ दिन बाद ही उन की मौत हो गई थी. उन की पैंशन दौलती देवी को मिलती थी. पैंशन की रकम को ले कर हमेशा मांबेटों में झगड़ा होता था. इस के अलावा ढाई कट्ठा (3350 वर्गफुट) जमीन के कुछ हिस्से में घर बना हुआ था और अगले हिस्से में बने मोटर गैराज वाली जगह को किराए पर दे दिया गया था.

किराए का पैसा छोटे बेटे सुजय को मिलता था. विजय की निगाह पैंशन की रकम पर लगी रहती थी और इसी को ले कर वह झगड़ा करता रहता था. कुछ हजार रुपए के लिए विजय ने अपनी मां की जान ले ली और मांबेटे के रिश्ते को तारतार कर डाला.

जमीन के टुकड़े और कुछ रुपयों को हथियाने के चक्कर में पूरा परिवार तबाह हो गया. दौलती देवी और विजय की तो जान गई ही, सुजय की पूरी जिंदगी अब जेल की काल कोठरी में कट रही है.

विजय की बीवी किरण देवी और उस की 3 बेटियों के साथ सुजय की बीवी रानी की भी जिंदगी तबाह हो चुकी है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2016 में देशभर में बुजुर्गों से जुड़े 18714 मामले अलगअलग पुलिस थानों में दर्ज किए गए और इन मामलों के तहत 19008 बुजुर्ग अपराध के शिकार हुए.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, बुजुर्गों से जुड़े अपराध के सब से ज्यादा 3981 मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए. मध्य प्रदेश में 3438, तमिलनाडु में 2121, आंध्र प्रदेश में 1852, राजस्थान में 1034 और दिल्ली में 1021 मामले पुलिस थानों में दर्ज किए गए.

बिहार में बुजुर्गों की हत्या, लूट और सताने के 496 मामले दर्ज किए गए. इन मामलों में 521 बुजुर्गों को अपराधियों ने निशाना बनाया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि जब पुलिस में हत्या की शिकायत दर्ज कराने वाला ही कातिल हो, तो पुलिस को जांचपड़ताल करने में काफी दिक्कतें आती हैं.

कई मामलों में यह भी देखा गया है कि बुजुर्ग की हत्या के बाद उन के परिवार वाले हत्या को खुदकुशी का भी रूप देने की कोशिश करते हैं, जिस से कानून की आंच से आसानी से बचा जा सके.

इस के साथ ही यह भी देखा गया है कि पेशेवर हत्यारा हत्या करने से पहले सौ बार सोचता है और काफी सोचसमझ कर काम करता है और ज्यादातर मामलों में वह बूढ़ों और बच्चों की हत्या नहीं करता है, पर परिचित या रिश्तेदार अपनी पहचान छिपाने के लिए बेरहमी से बूढ़ों और बच्चों की हत्या कर डालते हैं.

पटना सिविल कोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि घर के बुजुर्ग को परिवार पर बोझ मानने का चलन तेजी से बढ़ा है. बच्चे सोचने लगे हैं कि बूढ़े मांबाप उन के ऊपर बोझ की तरह हैं. उन की वजह से वे अपने बीवीबच्चे के साथ घर छोड़ कर घूमने नहीं जा सकते हैं.

इस के अलावा बेटे उसी दौलत को जल्दी पाने के चक्कर में अपनों का खून कर डालते हैं, जो दौलत कल आसानी से उन्हीं की होने वाली है. अपनों की जान लेने के बाद वे अपनों के साथ दौलत और अपने परिवार को भी खो देते हैं और बाकी जिंदगी जेल में काटते हैं.

पूर्णिया सिविल कोर्ट के वकील संजय कुमार सिन्हा बताते हैं कि साल 2012 में एक परिवार के तिहरे हत्याकांड में सौतेले बेटे ने रिश्तों का खून करते हुए एकसाथ 3 जिंदगी खत्म कर डाली थीं. विसिको के रिटायर्ड क्लर्क गोपाल शरण सिंह पटना के इंद्रपुरी महल्ले में डेढ़ कट्ठा (2000 वर्गफुट) जमीन पर बने मकान में रहते थे, जिस की कीमत उस समय तकरीबन 80 लाख रुपए थी.

इस के अलावा उन की कटिहार के राजपूताना इलाके में 55 कट्ठा जमीन  थी, जिस की कीमत भी करोड़ों रुपए की आंकी गई थी.

गोपाल शरण सिंह का बेटा देवेश चाहता था कि वे अपनी जायदाद का बंटवारा कर दें. वे बंटवारे को तैयार थे, पर देवेश की सौतेली मां अलीना इस के लिए तैयार नहीं थीं. वे चाहती थीं कि उन की बेटी सोनाली और पूर्णिमा की शादी के बाद ही जायदाद का बंटवारा हो.

अलीना ने जमीन और मकान के सारे कागजात अपने कब्जे में कर रखे थे. इस मामले को ले कर घर में अकसर हंगामा होता रहता था.

गोपाल शरण सिंह की पहली बीवी की मौत 20-22 साल पहले हो गई थी. उस के बाद उन्होंने अलीना से दूसरी शादी की थी.

गुस्से से भरे देवेश ने हैवानियत की हद पार कर हथौड़े से मार कर सौतेली मां और उन की 2 बेटियों की हत्या कर डाली. उस की शादी हो चुकी है और हाल ही में वह बाप बना था. जायदाद के लालच में उस ने 3 इनसानों और रिश्तों का कत्ल कर अपनी बीवीबच्चे की जिंदगी भी तबाह कर डाली.

मनोविज्ञानी अजय मिश्र कहते हैं कि दौलत को ले कर घरेलू झगड़ों के बढ़ते मामलों के बीच परिवार वालों को देखनासमझना होगा कि वे ऐसे झगड़ों को तूल न पकड़ने दें और न ही ऐसे मामलों को लटका कर रखें. ऐसे मसलों का जितना जल्दी निबटारा कर दिया जाए, परिवार और परिवार वालों के लिए उतना ही अच्छा रहता है.

बुजुर्ग ये सावधानियां बरतें

* छोटेमोटे घरेलू झगड़ों की कभी भी अनदेखी न करें और न ही उन्हें दबाने की कोशिश करें. परिवार के साथ मिलबैठ कर निबटारा कर लें.

* जब बातचीत से सुलह के सारे रास्ते बंद हो जाएं, तभी अदालत का दरवाजा खटखटाएं.

* अगर बुजुर्ग अकेले रहते हों, तो वे लोकल थाने में अपनी जानकारी दें.

* घर के किसी भी सदस्य से किसी भी तरह का खतरा होने या किसी के धमकी देने के मामले में बुजुर्ग खामोश न रहें. अपने किसी रिश्तेदार, दोस्त, वकील और पुलिस को वे इस के बारे में जरूर बताएं.

* दौलत का बंटवारा बच्चों के बीच कर दें और यह ताकीद कर दें कि उन के मरने के बाद ही सभी बच्चों को उन की दौलत पर बराबरी का हक मिलेगा.

* अपनी वसीयत समय रहते कर दें और बच्चों और परिवार के सभी लोगों को इस की जानकारी दें, ताकि कोई अंधेरे में न रहे. इस मामले में किसी सदस्य का कोई सवाल हो, तो उस का जवाब उसी समय दें, उसे टालें नहीं.

* कई ऐसे मामले देखने में आते हैं कि किसी बच्चे के प्रति मांबाप का ज्यादा झुकाव होता है, जिस से बाकी बच्चों में असुरक्षा की भावना घर कर जाती है कि कहीं पिता अपने लाड़ले बेटे या बेटी को सारी दौलत या दौलत का ज्यादा हिस्सा नहीं दे दें. मांबाप को चाहिए कि वे किसी बच्चे में ऐसी गलत भावना न आने दें.

* बच्चों को भी चाहिए कि वे मांबाप के प्रति जिम्मेदार बनें, ताकि किसी एक बच्चे की ओर उन का ज्यादा झुकाव न हो.

* बुजुर्ग नाराज हो कर अपने बच्चों को बारबार दौलत से बेदखल करने की धमकी न दें.

* किसी बेरोजगार बेटे को कोई धंधा शुरू करने के लिए रुपए दें, तो उसे यह हिदायत भी दें कि रुपए कर्ज के तौर पर दिए जा रहे हैं, जिसे धीरेधीरे वापस करना होगा. इस से बेटा धंधे में पूरा मन लगाएगा और बाकी बच्चों में भी किसी तरह की तरफदारी की भावना पैदा नहीं होगी.

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