खतरनाक दावत

27 सितंबर की सुबह करीब साढ़े 5 बजे मंदिर के पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने पुजारी लखन दुबे से बताया कि मंदिर के ऊपर जो कमरा है, उस में से धुआं निकल रहा है. कहीं उस में आग तो नहीं लगी है?

मंदिर के ऊपर एक कमरा और एक किचन बना था. वैसे यह कमरा बना तो था पुजारी के रहने के लिए, लेकिन पुजारी लखन दुबे अपने परिवार के साथ गांधीनगर में ही कहीं दूसरी जगह किराए पर रहता था.

मंदिर के ऊपर वाले कमरे में पुजारी का थोड़ाबहुत सामान रखा था. कमरे में जाने का रास्ता मंदिर के मुख्य दरवाजे के पास से था, जिस में अकसर ताला बंद रहता था. उस की चाबी पुजारी के पास रहती थी. पुजारी लखन दुबे को जैसे ही ऊपर के कमरे से धुआं निकलने की जानकारी हुई, वह ताला खोल कर ऊपर जा पहुंचा.

कमरे से सचमुच धुआं निकल रहा था और उस का दरवाजा खुला था. लखन दुबे ने कमरे में झांका तो घबरा कर पीछे आ गया, क्योंकि अंदर एक लाश पड़ी थी. लाश के ऊपर कुछ कपड़े रख कर आग लगा दी गई थी. उसी का धुआं निकल रहा था. लखन दुबे ने 100 नंबर पर फोन कर के इस की सूचना दे दी.

कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोल रूम की वैन गांधीनगर के कैलाशनगर स्थित प्राचीन शिव मंदिर पहुंच गई. चूंकि आग कपड़ों में लगी थी, जो पुलिस के पहुंचने तक खुद ही बुझ गई थी. पुलिस कमरे में पहुंची तो वहां एक आदमी की निर्वस्त्र लाश झुलसी पड़ी थी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह जानकारी थाना गांधीनगर पुलिस को दे दी.

कंट्रोल रूम की सूचना पर थानाप्रभारी विनय मलिक एएसआई पवन और हैडकांस्टेबल संजय के साथ प्राचीन शिव मंदिर जा पहुंचे. वहीं से उन्होंने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने के साथसाथ क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को बुला लिया. इस के बाद एसीपी विक्रम हरिमोहन मीणा के साथ डीसीपी नूपुर प्रसाद भी घटनास्थल पर पहुंच गईं.

अधिकारियों ने मंदिर के पुजारी लखन दुबे से पूछताछ की तो उस ने बताया कि एक दिन पहले रात 9 बजे उस ने जीने का ताला बाहर से बंद कर दिया था. पता नहीं ये लोग कमरे में कैसे पहुंच गए. मंदिर की छत पड़ोसियों की छत से लगी थी. छोटी सी बाउंड्री थी, जिसे पार कर के कोई भी मंदिर की छत पर आ सकता था.

पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन से भी काम की कोई जानकारी नहीं मिल सकी. लाश इस तरह झुलसी हुई थी कि उसे पहचानना मुश्किल था. वहां जितने भी लोग थे, कोई भी उस लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. इस के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को सब्जीमंडी मोर्चरी में रखवा दिया. इस के बाद थानाप्रभारी विनय मलिक ने थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

डीसीपी नूपुर प्रसाद ने इस मामले के खुलासे के लिए एसीपी विक्रम हरिमोहन मीणा की देखरेख में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में थानाप्रभारी विनय मलिक, इंसपेक्टर राजेश कुमार साहा, एएसआई पवन, हैडकांटेबल संजय आदि को शामिल किया गया. टीम ने मामले की जांच शुरू कर दी.

जिस तरह पुजारी के कमरे में लाश मिली थी, उस से पहला शक उसी पर जाता था. लेकिन पुलिस को अभी यह पता करना था कि मरने वाला कौन था और वह वहां पहुंचा कैसे? पुलिस को पता चला कि पुजारी का भाई राम दुबे भी उस के साथ रहता था. इस से पुलिस को पुजारी लखन दुबे पर शक हुआ कि कहीं पुजारी ने छोटे भाई की ही किसी वजह से हत्या तो नहीं कर दी?

इंसपेक्टर राजेश कुमार साहा ने पुजारी से उस के छोटे भाई राम दुबे के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह रोहिणी में किसी के यहां पूजा कराने गया है. उन्होंने उस से राम दुबे का मोबाइल नंबर ले लिया और उसे सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन रोहिणी की नहीं, बल्कि गांधीनगर के ही कैलाशनगर की मिली. उन्होंने राम दुबे को थाने बुला लिया.

पलिस लाश की शिनाख्त कराने के लिए राम दुबे को सब्जीमंडी मोर्चरी ले गई. उस ने उसे तुरंत पहचान कर कहा, ‘‘यह लाश चंद्रशेखर की है, इसे भैयाभाभी ने ही मारा होगा.’’

राम दुबे ने यह बात बड़े आत्मविश्वास के साथ कही थी. पुलिस ने उस से चंद्रशेखर के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चंद्रशेखर मथुरा का रहने वाला था. भाभी से उस के नाजायज संबंध थे.’’

राम दुबे की बातों में पुलिस को दम नजर आया. इस के बाद पुलिस ने लखन दुबे और उस की पत्नी कमलेश (परिवर्तित नाम) को थाने बुला लिया. दोनों से अलगअलग चंद्रशेखर के बारे में पूछताछ की गई तो पहले तो वे किसी चंद्रशेखर को जानने से मना करते रहे, लेकिन जब उन से सख्ती की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि मंदिर के ऊपर बने कमरे में मिली लाश चंद्रशेखर की ही थी. उन्होंने ही उस की हत्या की थी. इस के बाद लखन दुबे ने चंद्रशेखर की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

लखन दुबे मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना गोवर्धन के गांव सुखराई का रहने वाला था. वह वहां गोवर्धन परिक्रमा के रास्ते में बने एक मंदिर में पुजारी था. उस का छोटा भाई था राम दुबे. वह भी मथुरा के किसी मंदिर में पुजारी था.

सन 2009 में दोनों भाइयों की शादी मथुरा के ही एक गांव की रहने वाली सगी बहनों से हुई थी. कमलेश लखन दुबे के साथ ब्याही थी तो छोटी बहन मिथलेश की शादी राम दुबे से हुई थी. पर किसी वजह से मिथलेश की पटरी राम दुबे से नहीं बैठी तो वह उस से लड़झगड़ कर मायके चली गई.

लखन दुबे की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. वह 2 बच्चों का पिता बन चुका था. दिल्ली के गांधीनगर के रहने वाले कारोबारी द्वारका प्रसाद धार्मिक प्रवृत्ति के हैं. उन्होंने गांधीनगर के ही कैलाशनगर में अपने प्लौट में शिव मंदिर बनवा रखा है. वह अकसर मथुरा गोवर्धन परिक्रमा के लिए जाते रहते थे. वहीं उन की मुलाकात लखन दुबे से हुई.

द्वारका प्रसाद के मंदिर में कोई पुजारी नहीं था. उन्होंने लखन दुबे से बात की तो 6 हजार रुपए महीने वेतन, रहने के लिए कमरा और मंदिर में आने वाले चढ़ावे पर वह दिल्ली आने को राजी हो गया.

लखन दुबे बीवीबच्चों को गांव में ही छोड़ कर दिल्ली आ गया और द्वारका प्रसाद के कैलाशनगर स्थित प्राचीन शिव मंदिर पर पुजारी की जिम्मेदारी संभाल ली. मंदिर के ऊपर ही एक कमरा और किचन था. वह अकेला था, इसलिए उसी कमरे में रहने लगा. यह डेढ़, दो साल पहले की बात है.

मंदिर बाजार में था, इसलिए उस में अच्छाखासा चढ़ावा आता था. लखन दुबे दिल्ली आ कर खुश था, क्योंकि यहां उसे वृंदावन के मंदिर से ज्यादा आमदनी हो रही थी. लखन दुबे की आमदनी तो बढ़ गई थी, लेकिन पत्नी से दूर रहने की वजह से उस की गृहस्थी में दरार पैदा हो गई. उस की पत्नी कमलेश के नाजायज संबंध पड़ोसी चंद्रशेखर से बन गए थे.

चंद्रशेखर तो अविवाहित था. लेकिन उस से संबंध बनाने से पहले कमलेश ने यह भी नहीं सोचा कि वह शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों की मां है. उस के सासससुर को जब पता चला कि बड़ी बहू बहक गई है तो उन्होंने उसे समझाया, पर वह कहां मानने वाली थी. सासससुर की बात उस ने एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी.

घर की बदनामी हो रही थी, इसलिए ससुर ने दिल्ली में रह रहे बेटे लखन दुबे को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बदचलनी की बात सुन कर लखन दुबे को बहुत गुस्सा आया. वह दिल्ली से घर पहुंचा और पत्नी की जम कर पिटाई की. कमलेश ने उस से माफी मांग कर वादा किया कि अब वह चंद्रशेखर से कभी नहीं मिलेगी. लखन ने हिदायत दे कर पत्नी को माफ कर दिया.

गांव में 2-4 दिन रह कर लखन दुबे दिल्ली लौट आया. इस बार अपने साथ छोटे भाई राम दुबे को भी ले आया और उस के बैठने की व्यवस्था भी एक मंदिर पर करा दी. लखन केवल मंदिर पर ही रहता था, जबकि राम दुबे लोगों के यहां पूजापाठ भी कराने जाता था. दोनों भाइयों की इलाके में तमाम लोगों से जानपहचान हो गई थी.

गांव से दुबे राम भी दिल्ली आ गया था. अब घर में कमलेश और बूढ़े सासससुर ही रह गए थे. इस के बाद तो कमलेश बेलगाम हो गई. पति से किए वादे को दरकिनार कर वह प्रेमी चंद्रशेखर से खुलेआम मिलने लगी. सासससुर को खाने में नींद की गोलियां दे कर वह उसे अपने घर बुलाने लगी थी.

लखन दुबे को जब पता चला कि कमलेश ने चंद्रशेखर से मिलना नहीं छोड़ा है तो वह गांव गया और पत्नी तथा बच्चों को दिल्ली ले आया. उस ने कैलाशनगर में ही किराए का एक कमरा ले लिया और उसी में पत्नीबच्चों के साथ रहने लगा. राम दुबे पहले बड़े भाई के साथ ही रहता था, पर भाभी के आने के बाद वह दूसरी जगह कमरा ले कर रहने लगा था. इस की वजह यह थी कि कमलेश उसे पसंद नहीं करती थी.

कमलेश अब प्रेमी से दूर आ चुकी थी. उस के बिना उस का मन नहीं लग रहा था. चंद्रशेखर भी उस के लिए परेशान था. पत्नी को दिल्ली ला कर लखन दुबे निश्चिंत हो गया था. उसे पूरा विश्वास था कि कमलेश अब चंद्रशेखर को भूल जाएगी. लेकिन यह उस की भूल थी. लखन दुबे सुबह ही तैयार हो कर मंदिर आ जाता था. इस के बाद कमलेश बच्चों के साथ कमरे पर अकेली ही रह जाती थी. इस बीच वह फोन कर के चंद्रशेखर से लंबीलंबी बातें करती थी.

कमलेश ने उसे दिल्ली वाले कमरे का पता बता दिया था. यही नहीं, उस ने उसे यह भी बता दिया था कि उस का पति कितने बजे मंदिर जाता है और कब लौटता है. कमलेश के यह सब बताने के बाद चंद्रशेखर दिल्ली आ गया और कमलेश से मिलने उस के कमरे पर पहुंच गया.

चंद्रशेखर को देख कर कमलेश बहुत खुश हुई. इस के बाद लखन की गैरमौजूदगी में चंद्रशेखर कमलेश से मिलने आने लगा. लेकिन इस तरह चोरीछिपे मिलने का सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. क्योंकि कैलाशनगर में लखन दुबे जहां रहता था, पड़ोसियों ने उसे खबर कर दी कि उस की गैरमौजूदगी में कोई लड़का उस के कमरे पर आता है.

यह जान कर लखन दुबे परेशान हो उठा. उस ने इस बारे में कमलेश से पूछा तो पहले वह झूठ बोलती रही, लेकिन लखन ने जब 2-4 थप्पड़ मारे तो उस ने स्वीकार कर लिया कि चंद्रशेखर ही वहां आता है. इस के बाद लखन ने उस की जम कर पिटाई की. वह बारबार पैरों में गिर कर माफी मांगती रही, पर लखन ने उस की एक न सुनी.

लखन दुबे को लगा कि वह पत्नी को कितनी भी सजा दे, अब वह नहीं मानेगी. उस ने चंद्रशेखर को सजा देने की ठान ली. काफी सोचविचार कर उस ने चंद्रशेखर को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. उस ने योजना भी बना डाली कि उसे किस तरह ठिकाने लगाना है. वह चंद्रशेखर को किसी बहाने से दिल्ली बुला कर योजना को अंजाम देना चाहता था.

इस बारे में लखन दुबे ने पत्नी से बात की तो प्रेमी की हत्या करने की बात सुन कर वह पति को समझाने लगी. उस ने कहा कि उस की हत्या मत करो, क्योंकि वह उस से खुद ही संबंध खत्म कर लेगी. लेकिन लखन ने साफ कहा कि या तो वह किसी बहाने से चंद्रशेखर को यहां कमरे पर बुलाए या फिर वह हमेशा के लिए यहां से चली जाए.

पति के इस फरमान से कमलेश परेशान हो उठी. अंत में उस ने तय कर लिया कि वह पति का घर नहीं छोड़ेगी. पति के कहने पर उस ने 24 सितंबर, 2017 को चंद्रशेखर को फोन कर के कहा, ‘‘पंडितजी 2 दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं, तुम दिल्ली आ जाओ. और हां, अपने साथ नींद की गोलियां भी लेते आना, जो बच्चों को दी जा सकें.’’

प्रेमिका के बुलाने पर चंद्रशेखर खुश हो कर 25 सितंबर, 2017 को दिल्ली आ गया. वह अपने साथ नींद की गोलियां भी ले आया था. पति के कहने पर कमलेश प्रेमी को मंदिर के ऊपर बने कमरे पर ले गई.

प्रेमी से नींद की गोलियां ले कर कमलेश किचन में गई. लखन दुबे पहले से ही वहां दाब लिए छिपा बैठा था. कमलेश ने योजना के अनुसार नशे की सारी गोलियां एक गिलास के पानी में घोल कर वह पानी अपने प्रेमी चंद्रशेखर को पिला दिया. इस के बाद वह उस के पास बैठ कर बातें करने लगी. पानी पीने के कुछ देर बाद ही चंद्रशेखर पर गोलियों का असर होने लगा. कमलेश ने उसे आराम से सो जाने को कहा. उस के सोते ही कमलेश ने किचन में बैठे पति को इशारा कर दिया.

लखन दुबे को इसी का इंतजार था. वह दाब ले कर कमरे में पहुंचा. पहले उस ने रस्सी से चंद्रशेखर का गला घोंटा. कमलेश उस समय उस के पैर पकड़े थी. गला घोंटने के बाद लखन ने दाब से चंद्रशेखर के सिर, कंधे, गरदन आदि पर कई वार किए.

चंद्रशेखर की हत्या कर लखन दुबे उस की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. नवरात्र की वजह से मार्केट में चहलपहल ज्यादा थी, इसलिए वहां से लाश निकालना आसान नहीं था. अत: लाश पर कंबल डाल कर लखन पत्नी को ले कर नीचे आ गया और जीने पर ताला लगा कर अपने कमरे पर चला गया.

अगले दिन सुबह लखन दुबे मंदिर में जा कर बैठ गया. उस दिन भी उसे लाश को ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिला. तीसरे दिन यानी 27 सितंबर को लखन पत्नी के साथ मंदिर की छत पर बने कमरे पर पहुंचा तो गरमी की वजह से लाश से दुर्गंध आने लगी थी. उसे लगा कि लाश यहीं सड़ने लगी तो पड़ोसी पुलिस को फोन कर सकते हैं.

लखन दुबे ने पत्नी से केरोसिन तेल मंगाया और चंद्रशेखर की लाश के सारे कपड़े उतार लिए, ताकि शिनाख्त न हो सके. इस के बाद उस के ऊपर चादर डाल कर मिट्टी का तेल छिड़का और आग लगा दी. यह 27 सितंबर की सुबह के करीब 5 बजे की बात है. आग लगा कर पुजारी लखन दुबे ने जीने का ताला बंद कर दिया. पत्नी कमरे पर चली गई और वह मंदिर में जा कर बैठ गया.

लखन दुबे से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की पत्नी कमलेश से भी पूछताछ की. दोनों की निशानदेही पर पुलिस ने मृतक के कपड़े, हत्या में प्रयुक्त रस्सी और दाब आदि बरामद कर लिया. मृतक का मोबाइल फोन भी उन से बरामद कर लिया गया. पूछताछ के बाद दोनों को पुलिस ने न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच इंसपेक्टर राजेश कुमार साहा रहे हैं.     ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पूजापाठ नहीं मेहनत से पैसा

कुछ साल पहले ‘थ्री इडियट्स’ नाम की एक सुपरहिट फिल्म आई थी जिस में राजू नाम का एक किरदार इम्तिहान में पास होने के लिए होस्टल के कमरे में रखे मूर्तिरूपी बहुत से भगवानों की शरण में जाता है, हाथों की कई उंगलियों में तथाकथित चमत्कारी अंगूठियां पहनता है.

ऐसी बेवकूफी करने वाला वही अकेला नहीं होता है, बल्कि उस फिल्म के और भी कई दूसरे नौजवान छात्र किरदार ऐसा ही करते नजर आते हैं. कोई गाय को चारा देता है, ताकि इम्तिहान नतीजों में बेचारा साबित न हो जाए तो कोई सांप के आगे दूध का कटोरा रखता है, ताकि फेल के बाद इंजीनियर बनाने के बजाय दूध बेचने के लिए तबेला न खोलना पड़ जाए.

वह तो खैर फिल्म थी लेकिन असल जिंदगी में भी आप को बहुत से ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपनी कड़ी मेहनत से ज्यादा पूजापाठ के भरोसे पैसा बनाने की सोच रखते हैं. इस में नई पीढ़ी भी काफी तादाद में शामिल दिखाई देती है. जिस का नतीजा कभीकभार तो इतना खतरनाक हो जाता है जो किसी की जान पर जा कर खत्म होता है.

साल 2017 की बात है. छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले में एक पिता ने जल्द से जल्द अमीर बनने के चक्कर में अपनी 4 साल की मासूम बेटी की बलि दे दी थी.

हत्या की यह वारदात बलौदा बाजार जिले के तिल्दा इलाके की थी जहां आरोपी दीपचंद ने रातोंरात अमीर बनने के लालच में एक तांत्रिक की बातों में आ कर अपनी बेटी लक्ष्मी की बलि चढ़ा दी थी.

पुलिस हिरासत में दीपचंद ने बताया कि उसे गांव के ही एक तांत्रिक ने अमीर बनने के लिए तंत्रमंत्र करने की सलाह दी थी. दीपचंद ने उस के कहने के मुताबिक ही अपनी बेटी का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया था. हत्या के बाद वह भगवान के सामने खड़े हो कर मंत्र जाप करने लगा था.

इस तरह किसी अपने की बलि दे कर जल्दी पैसा बनाने की यह हद ही मानी जाएगी, लेकिन हमारे देश की बहुत सारी आबादी अभी भी अपनी मेहनत के बजाय पूजापाठ के भरोसे ही पैसा बनाने की जुगत भिड़ाती रहती है और अपनी तमाम जिंदगी नकारा गुजार देती है, जिस का फायदा पंडेपुजारी और मुल्लामौलवी उठाते हैं.

हिंदू धर्म में तो पैसे को लक्ष्मी का रूप कह दिया गया है और दिलचस्प बात तो यह है कि वह आप से रूठ भी सकती है. लक्ष्मी के रूठने का यही डर लोगों को भाग्यवादी बनाता है और वे मेहनत से ज्यादा पूजापाठ पर यकीन करने लगते हैं.

पंडेपुजारी इसी बात की ताक में रहते हैं. वे मंदिर में आए ऐसे लोगों को समझाते हैं कि जब तक भाग्य बलवान नहीं होगा तब तक हाथ आया पैसा भी किसी काम नहीं आएगा या काम में बरकत तभी होगी जब इस लक्ष्मी को रूठने से बचा लोगे.

ऐसे ठग लोगों का नैटवर्क इतना बड़ा हो गया है कि वे अब घरमहल्ले से ऊपर उठ कर सोशल साइट्स बना कर लोगों को ठगने के लिए तकनीक का भी सहारा लेने लगे हैं. वे बड़े ही शातिराना ढंग से लोगों की भावनाओं से खेलते हैं, उन्हें चमत्कारी यंत्र और दूसरे सामान का गुणगान कर के इस तरह गुमराह करते हैं कि सामने वाले को लगता है कि अगर उस के पास वही चमत्कारी चीज आ जाएगी तो उस की गरीबी छूमंतर हो जाएगी.

इस चक्कर में वह नासमझ अपनी जेब की गाढ़ी कमाई भी उन को सौंप देता है, जबकि उस की गरीबी में रत्तीभर भी फर्क नहीं आता है.

यह सब शुरू होता है घरघर, महल्लेमहल्ले, गांवगांव, शहरशहर में बने धार्मिक स्थलों से, जहां पहले से ही घर के बड़े लोग नई पीढ़ी के मन में बैठा देते हैं कि कर्म से बड़ा भाग्य होता है और अगर आप का भाग्य अच्छा है तो पैसा बिना मेहनत किए ही छप्पर फाड़ कर बरसता है.

‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम’ जैसी बातों ने ही लोगों को भटकाया है जबकि ऐसा होता तो सीता को बचाने के लिए खुद राम को इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती.

अगर दुनिया के किसी भी अमीर देश को देखेंगे तो पता चलेगा कि वहां के लोगों ने अपनी कड़ी मेहनत से उसे इतना आगे बढ़ाया है.

अमेरिका द्वारा जापान के 2 शहरों पर परमाणु बम के हमले के बाद वह देश काफी पीछे चला गया था, पर वहां के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और ऊपर वाले के बजाय अपने हाथों, पढ़ाईलिखाई, नई तकनीक और कड़ी मेहनत पर भरोसा कर के जापान को दोबारा अमीर देशों में शुमार कर दिया. अगर वे उन हमलों को ऊपर वाले का कहर मान कर उस के चमत्कार के भरोसे बैठे रहते तो आज भी पिछड़े रहते.

दूर क्यों जाते हैं. आजादी के बाद पंजाब ने तरक्की में बाजी मार ली थी, जबकि भारत के हर राज्य के पास ऐसा करने का मौका था. इस की एक बड़ी वजह यह थी कि बंटवारे के बाद वहां सब से पहले तो सोशल सिस्टम टूट गया था. लोग दीनधर्म के चक्कर में न पड़ कर मेहनत पर ज्यादा ध्यान देने लगे थे. उन्हें यह भी साबित करना था कि भारत को मिली यह आजादी कोई खैरात नहीं है बल्कि उन की मेहनत का नतीजा है.

इस बात को उन्होंने अपने खेतों में पसीना बहा कर सच भी कर दिखाया था. और जो काम करता है उस के पास पूजापाठ करने का समय ही नहीं होता है.

इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि मेहनत से बड़ा कोई ऊपर वाला नहीं है. जो इनसान इस बात को जितना जल्दी समझ लेता है, वह हर पल का सही इस्तेमाल कर के समय को ही पैसे में तबदील करने की कला जान जाता है.

आम चुनाव की दस्तक

जैसेजैसे आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस बार बातें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की कम हो रही हैं, विरोधी दलों की चर्चा ज्यादा होने लगी है. सुर्खियों में अब मायावती और अखिलेश का गठबंधन, कांग्रेस, ममता बनर्जी, डीएमके आदि छाने लगे हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री अब सिर्फ उद्घाटनों, शिलान्यासों और सम्मेलनों में भाषण करने की औपचारिकताएं निभाने में लगे हैं. सरकार के कई मंत्रियों और भाजपा अध्यक्ष की बीमारियां जरूर सुर्खियां बनी हैं.

भाजपा ने जो संगठित चेहरा 2014 से 2017 तक दिखाया था, अब बिखरने लगा है. यह अच्छा नहीं है. जनता की पसंद लोकतंत्र में बदलती रहती है पर मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों को हर स्थिति में अपना संतुलन और सामर्थ्य बनाए रखना होता है. यह देश के लिए जरूरी होता है. सत्तारूढ़ पार्टी को अंत तक अपनी हिम्मत नहीं खोनी चाहिए चाहे उस के काम सही हों या गलत.

यह ठीक है जब कई पराजयों का सामना एकसाथ करना पड़े तो लोग हताश होने लगते हैं. पर, फिर भी हजारोंलाखों लोग उस नेता से जुड़े होते हैं और वे मैदान छोड़ कर न भाग जाएं, यह देखना नेताओं का ही काम होता है.

नरेंद्र मोदी ने यह गलती की कि उन्होंने पूरी जिम्मेदारी और सत्ता अपनेआप में केंद्रित कर ली क्योंकि भाजपा 2014 का चुनाव केवल उन के बल पर जीती थी. बाकी सब मोहरे बन कर रह गए थे. यह पार्टी या सरकार चलाने का सब से गलत तरीका है, पर दुनियाभर में ऐसा ही होता है.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन में टेरेसा मे और जरमनी में एंजेला मर्केल की हालत नरेंद्र मोदी की तरह है. इन को कई फ्रंटों पर लड़ना पड़ रहा है और जीत कम ही मिल रही है. ट्रंप मैक्सिको और अमेरिका के बीच वाल बनाने के पीछे ऐसे पड़े हैं जैसे मोदी मंदिर, गाय और जीएसटी के. टेरेसा मे ब्रैक्सिट को ले कर जिद कर रही हैं, एंजेला मर्केल यूरोप में एकछत्र राज चाहती हैं.

बिना चुनौतियों के राज करने या अनायास सत्ता पाने के अवसर ने इन नेताओं से सब से मिल कर चलने का गुण छीन लिया है और इसी वजह से इन के अपने सहयोगी, संगीसाथी इन के साथ मन मार कर काम कर रहे हैं. जो समस्याएं पहले चुटकियों में हल हो जाती थीं, अब विकराल बनने लगी हैं.

इस सब का नुकसान जनता को सहना पड़ता है क्योंकि सरकार ठप हो जाती है. आजकल भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और जरमनी में कोई खास फैसले नहीं लिए जा रहे क्योंकि नेताओं को अपने बचाव से फुरसत नहीं है. इस का असर एकदम न पड़ेगा, पर 4-5 वर्षों बाद इस तरह हुए बीमार नेतृत्व का खमियाजा पूरा देश भुगतेगा, यह पक्का है.

बदली परिपाटी

लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाईलिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुत याद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिसस्टेशन पहुंच कर मैं ने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझानेभर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली.

लोगों को नहीं भाई आर्यन-सारा की बाइक राइड, कर दिया ट्रोल

सारा अली खान और कार्तिक आर्यन इस समय इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल-2 की शूटिंग में व्यस्त है. इन दिनों दिल्ली में इस फिल्म की शूटिंग जोरो-शोरों से चल रही है और आए दिन सेट से इनकी कोई ना कोई तस्वीर और वीडियो सामने आ ही जाते है.

दिल्ली में यूं घूम रहे हैं दोनों…

कुछ घंटे पहले ही सारा और कार्तिक का एक नया वीडियो सामने आया है जो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया. इस वीडियो में सारा कार्तिक के साथ बाइक पर बैठी हुई नजर आ रही है.

लव आज कल-2 की शूटिंग का वीडियो…

अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये वीडियो फिल्म ‘लव आजकल 2’ का ही एक सीक्वेंस होगा. जहां इस जोड़ी के लिए ये वीडियो किसी तोहफे से कम नहीं वहीं कई ऐसे लोग भी है जो इस वीडियो की वजह से सारा को जमकर ट्रोल करने में लगे हुए. दरअसल सारा बाइक पर बिना हेलमेट ही बैठी हुई है, ऐसे में कई फैंस सारा को हिदायत देने में लगे है कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए.

पौपुलर हुई दोनों की जोड़ी…

सारा और कार्तिक को तो फैंस ‘सार्तिक’ नाम दे चुके है. हाल ही में सारा ने करण जौहर के शो में आकर ये इच्छा जताई थी कि वह कार्तिक को डेट करना चाहती है. बस इसी के बाद से इनके चाहने वालों ने तो सोशल मीडिया पर इनके नाम के कई फैन क्लब भी बना दिया.

लव आजकल-2 में नजर आएंगे सैफ…

इम्तियाज की फिल्म ‘लव आजकल’ में सैफ अली खान लीड रोल में नजर आए थे. इस फिल्म में सैफ के अपोजिट दीपिका पादुकोण नजर आई थीं.

सीए की बेवकूफी

सुबह के 10 बज रहे थे. अनिल गुप्ता जल्दीजल्दी कपड़े पहन कर तैयार हो रहे थे. वह ठीक साढ़े 9 बजे तक औफिस के लिए निकल जाते थे, लेकिन उस दिन उन्हें थोड़ी देर हो गई थी.

तैयार हो कर उन्होंने दूसरे कमरे में सवा साल के बेटे करण को दूध पिला रही पत्नी कनिका गुप्ता को आवाज दे कर कहा, ‘‘कनिका, मुझे देर हो रही है. मैं औफिस जा रहा हूं, किसी से जरूरी मीटिंग है. तुम दरवाजा बंद कर लो.’’

‘‘जी, आप जाइए, मैं अभी दरवाजा बंद कर लेती हूं.’’ कनिका ने अंदर से ही जवाब दिया.

अनिल कुछ फाइलें और जरूरी सामान ले कर निकल गए. उन्होंने सारा सामान कार में रखा और औफिस की ओर चल पड़े. उन का औफिस मैहणा चौक पर था. अनिल पेशे से सीए थे, इसलिए औफिस पहुंच कर वह काम ऐसे उलझे कि उन्हें खाना खाने तक की फुरसत नहीं मिली.

दोपहर करीब 3 बजे उन के छोटे साले अनुज ने उन्हें जो बताया, उसे सुन कर अनिल परेशान हो उठे. अनुज ने बताया, ‘‘जीजाजी, जल्दी से घर आ जाइए. किसी ने दीदी की हत्या कर दी है.’’

पत्नी की हत्या की बात सुन कर अनिल गुप्ता के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. अपने आप को जैसेतैसे संभाल कर वह घर की ओर चल पड़े. घर पहुंचे तो वहां का मंजर देख कर वह सन्न रह गए. वहां का दृश्य बड़ा ही भयावह था. कमरे में बैड के पास फर्श पर उन की पत्नी कनिका की खून से सनी लाश पड़ी थी. वहीं पास में बैठा करण रो रहा था.

कोठी के कमरों का सारा सामान इधरउधर बिखरा था. अनिल का साला अनुज रोरो कर कह रहा था, ‘‘जीजाजी, यह सब क्या हो गया, मेरी दीदी के साथ यह किस ने किया?’’

अनिल गुप्ता ने तुरंत फोन द्वारा इस घटना की सूचना थाना कैंट पुलिस को दी. इस के बाद लहूलुहान पत्नी को साले अनुज की सहायता से गाड़ी में डाल कर पावरहाउस रोड पर स्थित मालवा अस्पताल ले गए. कनिका की गंभीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें दाखिल करने के बजाय किसी अन्य अस्पताल ले जाने की सलाह दी. अनिल पत्नी को मोकम अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने जांच के बाद कनिका को मृत घोषित कर दिया.

इस बीच सूचना पा कर थाना कैंट के थानाप्रभारी इकबाल सिंह दलबल के साथ अस्पताल पहुंच गए थे. जब उन्हें पता चला कि कनिका की मौत हो चुकी है तो उन्होंने पहले उस की लाश का मुआयना किया. इस के बाद मृतका के पति अनिल गुप्ता से बात की. अनिल के साले अनुज से भी पूछताछ की.

इकबाल सिंह ने घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी थी. इस के बाद 2 सिपाहियों को अस्पताल में छोड़ कर वह कमला नेहरू कालोनी स्थित अनिल गुप्ता की कोठी नंबर-301 पर पहुंच गए, जहां यह घटना घटी थी. कुछ ही देर में क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम और डीएसपी गुरजीत सिंह रोमाणा भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल के निरीक्षण से पता चला कि लुटेरे लूट के साथसाथ कोठी में लगे सीसीटीवी कैमरे और रिकौर्डिंग बौक्स भी अपने साथ ले गए थे. कोठी का सामान चैक कर के अनिल गुप्ता ने पुलिस को बताया कि लुटेरे करीब 15 लाख रुपए के सोने के गहने और करीब एक लाख रुपए नकद लूट कर ले गए थे.

बठिंडा के रहने वाले मृतका के भाई अनुज कुमार ने बताया कि सुबह से ही उस के पिता प्रदीप कुमार बहन को फोन मिला रहे थे, पर उस का फोन स्विच्ड औफ बता रहा था. पिता के कहने पर उस ने बहन को वीडियो काल की, पर काल रिसीव नहीं हुई. प्रदीप कुमार को चिंता हुई तो उन्होंने बेटी के बारे में पता करने के लिए अनुज को उस के यहां भेज दिया.

अनुज करीब ढाई बजे कनिका के यहां पहुंचा तो कोठी का मुख्य दरवाजा खुला था. वह अंदर गया तो कमरों के दरवाजे भी खुले मिले. वह कमरे में गया तो कनिका खून से लथपथ बैड पर पड़ी थी. करण बगल में सो रहा था. यह देख कर उस ने शोर मचाया तो पड़ोसी आ गए.

पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो कनिका की गरदन पर तेजधार हथियार के घाव थे और गले में दुपट्टा कसा हुआ था. शायद पहले उस का गला घोंटा गया था, उस के बाद उस की गरदन काटी गई थी.

पूछताछ में पता चला कि घर में लगे सीसीटीवी कैमरे मोबाइल फोनों से जुड़े हुए थे, लेकिन वे आज बंद पड़े थे. लुटेरे जाते समय घर में पड़ा कनिका का मोबाइल फोन भी अपने साथ ले गए थे. थाना कैंट के थानाप्रभारी इकबाल सिंह ने डीएसपी के आदेश पर भादंवि की धारा 302, 396 और 449 के तहत मुकदमा दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी.

डीएसपी गुरजीत सिंह रोमाणा ने इकबाल सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में सीआईए प्रभारी रजिंदर कुमार, एसआई सुरिंदर सिंह, एएसआई इंद्रजीत सिंह, जगमेल सिंह, परमिंदर सिंह, जरनैल सिंह, कांस्टेबल गुरसेवक सिंह, हरमीत सिंह आदि को शामिल किया. डीएसपी ने इस टीम को जल्द से जल्द हत्यारों के बारे में पता लगाने का आदेश दिया.

थानाप्रभारी ने अस्पताल पहुंच कर पंचनामा की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस जांच में सब से पहले इस बात पर ध्यान दिया गया कि कोठी के सभी दरवाजे खुले हुए थे. घटनास्थल पर किसी भी प्रकार की हाथापाई या संघर्ष के निशान नहीं मिले थे.

इस से अंदाजा लगाया गया कि वारदात में किसी भेदी का हाथ हो सकता है. घर का दरवाजा अंदर से खोला गया था तो इस का मतलब यह था कि हमलावरों में से कोई मृतका का परिचित था. लुटेरों को कैमरों के बारे में भी पूरी जानकारी थी, जिस से वे कैमरे व रिकौर्डर भी साथ ले गए थे.

पुलिस टीम ने सब से पहले यह पता किया कि कोठी में कौनकौन आता था. कोठी में काम करने वालों से पूछताछ की गई, पर वे सब निर्दोष पाए गए. शक के आधार पर दरजन भर लोगों को हिरासत में ले कर सख्ती से पूछताछ की गई. इलाके के तमाम अपराधियों को हिरासत में लिया गया, पर नतीजा शून्य रहा. हर तरफ से टीम को निराशा मिल रही थी.

इकबाल सिंह को मृतका के पति अनिल गुप्ता की बातों पर कुछ शक हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपने कुछ खास मुखबिरों को अनिल के पीछे लगा दिया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार कनिका की मौत तेजधार हथियार के वार और दम घुटने से हुई थी.

घटना के 2 दिनों बाद यानी 24 जुलाई को एसएसपी नवीन सिंगला के आदेश पर यह केस स्थानीय थाना कैंट पुलिस से जिला सीआईए स्टाफ इंचार्ज इंसपेक्टर रजिंदर कुमार के हवाले कर दिया गया. उन की मदद के लिए थानाप्रभारी इकबाल सिंह को भी उन के साथ लगा दिया गया.

इंसपेक्टर रजिंदर  कुमार ने सब से पहले अनिल गुप्ता की कोठी पर पिछले दिनों हुई गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाई तो उन्हें पता चला कि इस वारदात से 2-3 दिन पहले अनिल गुप्ता की कोठी में किसी कारपेंटर ने काम किया था.

उन्होंने शक के आधार पर कारपेंटर को हिरासत में ले कर पूछताछ की, पर उस का इस मामले में दूरदूर तक कोई वास्ता नहीं निकला. उस से यह बात जरूर पता चली कि अनिल और उस की पत्नी कनिका के बीच अकसर किसी न किसी बात को ले कर झगड़ा होता रहता था. यही बात जांच में पड़ोसियों ने भी बताई थी. लोगों का कहना था कि अनिल की हरकतों से तंग आ कर कनिका उस से तलाक मांग रही थी. झगड़े की असल वजह किसी को नहीं पता थी.

2 दिनों बाद मुखबिर ने अनिल गुप्ता के बारे में कई चौंकाने वाली सूचनाएं दीं, जिन्हें सुन कर रजिंदर कुमार उसी समय डीएसपी गुरजीत सिंह से मिले. उन के निर्देश पर उन्होंने अनिल गुप्ता को हिरासत में ले लिया.

डीएसपी के सामने जब अनिल गुप्ता से पूछताछ की गई तो हर अपराधी की तरह अनिल भी पहले खुद को अंजान और निर्दोष बताता रहा. पर जब उस से थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने कनिका की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

अनिल गुप्ता का बयान लेने के बाद उसी दिन उस की निशानदेही पर उस के दोस्त राकेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों से पूछताछ में पता चला कि कनिका की हत्या लूटपाट के लिए नहीं की गई थी, इस के पीछे एक खास वजह थी.

रजिंदर कुमार और इकबाल सिंह ने अनिल गुप्ता और राकेश को अदालत में पेश कर के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान दोनों से पूछताछ में कनिका गुप्ता की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

अनिल गुप्ता एक अच्छे चार्टर्ड एकाउंटैंट थे, इसलिए शहर के प्रतिष्ठित लोगों के साथ उन का उठनाबैठना था. वह एकाउंट में इधरउधर कर बिजनैसमैनों के लाखों काले रुपए को सफेद करते थे और अपनी काबिलियत से उन के लाखों रुपए का टैक्स भी बचाते थे. इस के एवज में उन्हें मोटी फीस मिलती थी.

बस, यहीं से अनिल गुप्ता के शौकों को हवा लग गई, जो बाद में उन की आदत और जरूरत बन गए. अपनी कमाई का अधिकांश भाग वह शराब, जुए, अय्याशी आदि में उड़ाने लगे. घर में वह सिर्फ जरूरत भर के ही पैसे देते थे. जुआ खेलते हुए वह कई बार पकड़े गए. उस पर जुए के कई मुकदमे चल रहे थे.

अनिल की इन्हीं आदतों से कनिका दुखी और परेशान थी. इन्हीं बातों को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहता था. कनिका का कहना था कि या तो वह अपनी आदतें सुधार ले या फिर उसे तलाक दे दे, क्योंकि कल को उस का बच्चा बड़ा होगा तो वह क्या सोचेगा.

कनिका की बात अपनी जगह सही थी. अनिल सुधर जाने के वादे तो बहुत करता, पर शाम होते ही शराब पी कर सब भूत जाता. कनिका से अनिल की यह दूसरी शादी थी. पहली पत्नी से भी अय्याशी आदि को ले कर झगड़ा होता रहता था. सन 2007 में वह अनिल को छोड़ कर चली गई थी और सन 2008 में बाकायदा कोर्ट में तलाक ले कर उस ने अनिल से पीछा छुड़ा लिया था.

इस के बाद सन 2015 में अनिल ने बठिंडा निवासी कनिका से शादी की थी. अनिल का दोस्त राकेश भी अमीर बाप की बिगड़ी औलाद था. अनिल और उस की दोस्ती बड़ी पुरानी थी. अनिल की तरह राकेश को भी शराब, जुए और अय्याशी की लत थी. दोनों साथ मिल कर अपने शौक पूरे करते थे.

राकेश ने अनिल से डेढ़ लाख रुपए उधार ले रखे थे. काफी समय बीत जाने के बाद भी वह रुपए दे नहीं पाया था. इन दिनों अनिल रुपए वापस करने के लिए उस पर बहुत दबाव डाल रहा था, लेकिन उस के पास पैसे नहीं थे.

इत्तफाक से घटना से 2-3 दिन पहले कनिका का अनिल से खूब झगड़ा हुआ. उस दिन उन की कोठी पर कारपेंटर काम कर रहा था. उन के झगड़े को कारपेंटर ने भी सुना. उस दिन के झगड़े से अनिल को इतना गुस्सा आया कि उस ने कनिका की हत्या का प्लान बना डाला.

कनिका की हत्या तो वह बहुत पहले ही करना चाहता था, पर उसे इस काम के लिए न तो उचित अवसर मिल रहा था और न ही कोई उचित रास्ता नजर आ रहा था, पर अब उस के दिमाग में एक योजना आ गई.

अनिल ने पत्नी की हत्या करने के लिए राकेश को तैयार किया. उस ने राकेश से कहा, ‘‘राकेश, मैं जानता हूं कि तुम मेरा पैसा वापस नहीं कर सकते, इसलिए अगर तुम मेरा एक काम कर दो तो तुम्हारा डेढ़ लाख रुपए का कर्ज माफ करने के साथ मैं तुम्हें 5 लाख रुपए और दूंगा.’’

इस के बाद अनिल ने उसे काम और योजना बताई तो राकेश तुरंत तैयार हो गया. काम को कैसे अंजाम देना है, यह भी उस ने राकेश को बता दिया. योजना के अनुसार, 22 जुलाई, 2017 को अनिल रोजाना की तरह अपने औफिस चला गया. उस ने राकेश को बता दिया था कि दोपहर साढ़े 12 बजे से ढाई बजे तक कनिका कोठी में अकेली रहती है, इसलिए दोपहर लगभग 1 बजे राकेश अनिल की कोठी पर पहुंच गया.

राकेश ने डोरबेल बजाई तो कनिका ने दरवाजा खोल दिया. चूंकि कनिका राकेश को अच्छी तरह जानती थी, इसलिए वह राकेश को ड्राइंगरूम में ले आई. इस के बाद वह रसोई में चाय बनाने चली गई. कनिका के रसोई में जाते ही राकेश अपनी जगह से उठा और दबेपांव उस के पीछे रसोई में पहुंच गया.

रसोई में गैस जला कर कनिका ने चाय के लिए पानी चढ़ा दिया था. क्या होने वाला है, इस बात से अंजान कनिका चाय बना रही थी कि उसी समय राकेश ने पीछे से उसे दबोच लिया.

कनिका ने खुद को राकेश से छुड़ाने का बहुत प्रयास किया, पर वह उस की मजबूत पकड़ से अपने आप को छुड़ा नहीं पाई. राकेश उसे घसीट कर बैडरूम में ले गया और उस का दुपट्टा उठा कर उस के गले में डाल कर तब तक खींचता रहा, जब तक कि उस के प्राण नहीं निकल गए.

कनिका बैड पर गिर पड़ी. कहीं वह जिंदा न रह जाए, यह सोच कर राकेश ने अपने साथ लाए चाकू से उस का गला भी रेत दिया. उसी बैड पर कनिका का मासूम बेटा करण सो रहा था.

कनिका की हत्या करने के बाद अनिल की योजना के अनुसार राकेश ने घर का सामान इधरउधर बिखेर कर लूटपाट का माहौल बनाया और कनिका का फोन तथा सीसीटीवी कैमरे और रिकौर्डर उठा कर चला गया. पुलिस पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि अनिल ने अपने बयान में जो 15 लाख रुपए का सोना और डेढ़ लाख की नकदी लूटे जाने की बात लिखवाई थी, वह गलत थी.

दरअसल, अनिल बड़ा शातिर था. उसे राकेश पर पूरी तरह भरोसा नहीं था. उस ने सोचा कि अगर कनिका की हत्या करने के बाद राकेश उस का सारा माल ले कर फरार हो गया तो वह उस का क्या बिगाड़ लेगा, इसीलिए घटना से एक दिन पहले उस ने सारा माल ले जा कर अपने औफिस में छिपा दिया था. घर पर उस ने मात्र एक लाख रुपए और कुछ आर्टिफिशियल ज्वैलरी ही छोड़ी थी, जिसे राकेश उड़ा ले गया था.

पुलिस ने अनिल और राकेश से 25 तोला सोने के आभूषण, 9 तोला चांदी, एक लाख रुपए नकद और कुछ आर्टिफिशियल ज्वैलरी बरामद करने के अलावा राकेश की निशानदेही पर वह चाकू भी बरामद कर लिया था, जिस से कनिका की हत्या की गई थी.

पुलिस की तमाम काररवाई पूरी होने और रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद 28 जुलाई, 2017 को दोनों एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की भी जमानत नहीं हुई थी.

अनिल अगर अपनी कमाई को गलत आदतों में बरबाद न करता तो उस की पहली पत्नी को ही उस से तलाक लेने की नौबत न आती. उस के समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तभी उस ने उस से तलाक लिया था. चूंकि उस की आमदनी अच्छी थी, इसलिए 7 साल बाद उस का कनिका से विवाह हो गया था.

अनिल ने अपने अतीत से कोई सीख नहीं ली यानी शराब, जुआ, अय्याशी के उस के शौक यथावत रहे. कनिका ने भी उसे वही बात समझाई, जो पहली पत्नी ने समझाई थी, पर उस ने कनिका की सलाह को भी गंभीरता से नहीं लिया, जिस से उन के घर में कलह ने जन्म ले लिया.

इस कलह से छुटकारा पाने के चक्कर में वह अपराध कर बैठा. अनिल ने अपने साथ अपने दोस्त राकेश को भी जेल की हवा खिला दी. काश अनिल को पहले समझ आ गई होती और उस ने अपने गुस्से को काबू किया होता तो न तो कनिका की जान जाती और न ही उसे दोस्त के साथ जेल जाना पड़ता.??

   —पुलिस सूत्रों पर आधारित

भोजपुरी फिल्म ‘शेर-ए-हिंदुस्तान’ इस दिन होगी रिलीज

भोजपुरी सिनेमा सुपरस्टार निरहुआ उर्फ दिनेश लाल यादव की फिल्म ‘शेर-ए-हिंदुस्तान’ 21 मार्च यानि होली पर रिलीज होगी. इस फिल्म में  देश के उन वीरों की कहानी है जो दिनरात एक कर देश की सीमा की रक्षा करते हैं.

इस फिल्म ‘शेर-ए-हिंदुस्तान’ में दिनेशलाल यादव निरहुआ कमांडो की भूमिका में नजर आएंगे. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक यह फिल्म पूरी तरह से व्यवसायिक है और एक लंबे समय के बाद कोई ऐसी फिल्म आ रही है, जिसमें निरहुआ एक नई अभिनेत्री के साथ नजर आएंगे. नीता ढुंगना इस भोजपुरी फिल्म में बतौर अभिनेत्री नजर आएंगी.

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इस फिल्म के निर्देशक मनोज नारायण है जबकि फिल्म में दिनेश लाल यादव, आयुष रिजाल, नीता ढुंगाना, सुनील थापा और अमृत कुमार मुख्य भूमिका में हैं.

रेलवे में नौकरी के नाम पर ठगी

चाय की दुकान हो या नाई की या फिर पान की दुकान हो, ये सब ऐसे अड्डे होते हैं, जहां आदमी को तरहतरह की जानकारी ही नहीं मिलती, बल्कि उन पर विस्तार से चर्चा भी होती है. इंटरनेट क्रांति से पहले इन्हीं अड्डों पर इलाके में घटने वाली घटनाओं की जानकारी आसानी से मिल जाती थी.

अब भले ही दुनिया बहुत आगे निकल गई है, लेकिन आज भी ये दुकानें सूचनाओं की वाहक बनी हुई हैं. बाल काटते या हजामत करतेकरते नाई, चाय की दुकान पर बैठे लोग और पान खाने वाले किसी न किसी विषय पर बातें करते रहते हैं.

उत्तरपश्चिम दिल्ली के सराय पीपलथला के रहने वाले सरफराज की भी सराय पीपलथला में बाल काटने की दुकान थी. यह जगह एशिया की सब से बड़ी आजादपुर मंडी से सटी हुई है, इस मंडी में हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ है. इस वजह से उस की दुकान अच्छी चलती थी. उस की दुकान पर हर तरह के लोग आते थे. उन्हीं में से उस का एक स्थाई ग्राहक था ओमपाल सिंह.

ओमपाल सिंह रोहिणी के जय अपार्टमेंट में अपने परिवार के साथ रहता था. उस ने आजादपुर मंडी में कुछ लोगों को हाथ ठेले किराए पर दे रखे थे. उन से किराया वसूलने के लिए वह रोजाना शाम को मंडी आता था. किराया वसूल कर वह सरफराज की दुकान पर कुछ देर बैठ कर उस से बातें करता था.

बातों ही बातों में सरफराज को पता चल गया था कि ओमपाल पहले दिल्ली में ही मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) औफिस में नौकरी करता था, पर अपना काम ठीक से चल जाने के बाद उस ने रेलवे की नौकरी छोड़ दी थी.

एक दिन ओमपाल ने सरफराज को बताया कि डीआरएम औफिस में भले ही वह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था, पर अधिकारियों से उस की अच्छी जानपहचान थी, जिस का फायदा उठा कर उस ने कई लोगों को रेलवे में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी दिलवाई थी. यह जान कर सरफराज को लगा कि ओमपाल तो काफी काम का आदमी है, क्योंकि न इस से फायदा उठाया जाए.

दरअसल, सरफराज का एक छोटा भाई था राशिद, जो 12वीं तक पढ़ा था. पढ़ाई के बाद उस ने सरकारी नौकरी के लिए काफी कोशिश की. जब नौकरी नहीं मिली तो भाई की दुकान पर काम करने लगा था. सरफराज ने सोचा कि अगर ओमपाल सिंह की मदद से भाई की नौकरी रेलवे में लग जाए तो अच्छा रहेगा.

इस बारे में सरफराज ने ओमपाल से बात की तो उस ने बताया कि वह राशिद की नौकरी तो लगवा देगा, पर इस में कुछ खर्चा लगेगा.

सरफराज ने पूछा, ‘‘कितना खर्चा आएगा?’’

‘‘ज्यादा नहीं, बस 60 हजार रुपए. डीआरएम औफिस में जिन साहब के जरिए यह काम होगा, उन्हें पैसे देने पड़ेंगे. और रही बात मेरे मेहनताने की तो जब राशिद की नौकरी लग जाएगी तो अपनी खुशी से मुझे जो दोगे, रख लूंगा.’’ ओमपाल ने कहा.

आज के जमाने में चतुर्थ श्रेणी नौकरी के लिए 60 हजार रुपए सरफराज की नजरों में ज्यादा नहीं थे. वह जानता था कि अब सरकारी नौकरी इतनी आसानी से मिलती कहां है.

सरकारी विभाग में क्लर्क की जगह निकलने पर लाखों की संख्या में लोग आवेदन करते हैं. लोग मोटी रिश्वत देने को भी तैयार रहते हैं सो अलग. इन सब बातों को देखते हुए सरफराज ने ओमपाल से अपने भाई की रेलवे में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी लगवाने के लिए 60 हजार रुपए देने की हामी भर ली.

‘‘सरफराज भाई, राशिद की नौकरी तो लग ही जाएगी. इस के अलावा तुम्हारे किसी रिश्तेदार या दोस्त का कोई ऐसा बच्चा तो नहीं है, जो रेलवे में नौकरी करना चाहता हो, यदि कोई हो तो बात कर लो. राशिद के साथसाथ उस का भी काम हो जाएगा.’’ ओमपाल ने कहा.

‘‘हां, बच्चे तो हैं. इस के बारे में मैं 1-2 दिन में आप को बता दूंगा.’’ सरफराज ने कहा.

सरफराज के बराबर में गंगाराम की भी दुकान थी. वह दिल्ली के ही स्वरूपनगर में रहते थे. वह सरफराज को अपने बेरोजगार बेटे नीरज के बारे में बताते रहते थे. उस की नौकरी को ले कर वह चिंतित थे. सरफराज ने गंगाराम से उन के बेटे की रेलवे में नौकरी लगवाने के लिए बात की.

सरफराज की बात पर गंगाराम को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि सरकारी नौकरी इतनी आसानी से भला कहां मिलती है. सरफराज ने जब उन्हें पूरी बात बताई तो गंगाराम को यकीन हो गया. तब उन्होंने कहा कि वह उन के बेटे नीरज के लिए भी बात कर ले.

इसी तरह सरफराज ने अपने एक और दोस्त अशोक कुमार से बात की, जो शालीमार बाग के बी बी ब्लौक में रहते थे. उन की एक बेटी थी, जो नर्सिंग का कोर्स करने के बाद घर पर बैठी थी. बेटी की रेलवे में स्थाई नौकरी लगवाने के लिए अशोक कुमार ने भी 60 हजार रुपए देने के लिए हामी भर दी.

सरफराज ने ओमपाल सिंह की गंगाराम और अशोक कुमार से मुलाकात भी करा दी. ओमपाल से बात करने के बाद अशोक कुमार व गंगाराम को भी ओमपाल की बातों पर विश्वास हो गया. ओमपाल ने तीनों से पैसों का इंतजाम करने के लिए कह दिया.

तीनों दोस्त इस बात को ले कर खुश थे कि उन के बच्चों की नौकरी लग रही है. इस के बाद 13 जून, 2017 को उन्होंने ओमपाल सिंह को 1 लाख 80 हजार रुपए दे दिए. रुपए लेने के बाद ओमपाल ने उन्हें विश्वास दिलाया कि एकडेढ़ महीने के अंदर उन के बच्चों की नौकरी लग जाएगी.

अशोक, गंगाराम व सरफराज एकएक कर दिन गिनने लगे. विश्वास जमाने के लिए ओमपाल ने फार्म वगैरह भी भरवा लिए थे. जब 2 महीने बाद भी बच्चों की नौकरी नहीं लगी तो ओमपाल सभी को कोई न कोई बहाना बना कर टालने लगा. कुछ दिनों तक वे उस की बातों पर विश्वास करते रहे. बाद में ओमपाल ने सरफराज की दुकान पर आना बंद कर दिया तो सभी को चिंता हुई.

फोन नंबर बंद होने पर सरफराज, गंगाराम और अशोक की चिंता बढ़ गई. इस के बाद एक दिन सरफराज, अशोक और गंगाराम ओमपाल के जय अपार्टमेंट स्थित फ्लैट नंबर 131 पर जा पहुंचे, जहां पता चला कि ओमपाल इस फ्लैट को खाली कर के जा चुका है. यह जान कर तीनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे समझ गए कि बड़े शातिराना ढंग से ओमपाल ने उन के साथ ठगी की है.

उन के पास ऐसा कोई उपाय नहीं था, जिस से वे ओमपाल को तलाश करते. मजबूरन वे उत्तरपश्चिम जिले के डीसीपी मिलिंद एम. डुंब्रे से मिले और अपने साथ घटी घटना की जानकारी विस्तार से दी. डीसीपी ने इस मामले की जांच औपरेशन सेल के एसीपी रमेश कुमार को करने के निर्देश दिए.

एसीपी रमेश कुमार ने इस मामले को सुलझाने के लिए स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर कुलदीप सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में तेजतर्रार एसआई अखिलेश वाजपेयी, हैडकांस्टेबल राहुल कुमार, दिलबाग सिंह, विकास कुमार, कांस्टेबल उम्मेद सिंह आदि को शामिल किया. टीम ने सब से पहले ओमपाल के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

पिछले 6 महीने की काल डिटेल्स का अध्ययन करने के बाद एसआई अखिलेश वाजपेयी ने उन फोन नंबरों को चिह्नित किया, जिन पर ओमपाल की बातें हुई थीं. उन में से कुछ फोन नंबर ओमपाल के रिश्तेदारों के थे.

उन पर दबाव बना कर एसआई अखिलेश वाजपेयी को ओमप्रकाश का वह ठिकाना मिल गया, जहां वह रह रहा था. जानकारी मिली कि वह सोनीपत स्थित टीडीआई कोंडली के सी-3 टौवर में रह रहा था.

ठिकाना मिलने के बाद पुलिस टीम ने 14 नवंबर, 2017 को टीडीआई कोंडली स्थित ओमपाल के फ्लैट पर दबिश दी तो वह वहां मिल गया. उसे हिरासत में ले कर पुलिस दिल्ली लौट आई. स्पैशल स्टाफ औफिस में जब उस से सरफराज, गंगाराम और अशोक कुमार से ठगी किए जाने के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बड़ी आसानी से स्वीकार कर लिया कि उस ने रेलवे में नौकरी लगवाने का झांसा दे कर तीनों से 1 लाख 80 हजार रुपए लिए थे.

सख्ती से की गई पूछताछ में उस ने यह भी स्वीकार कर लिया कि अब तक वह 20 से ज्यादा लोगों से इसी तरह पैसे ले चुका है. इस से पहले भी ठगी के मामले में वह दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है. विस्तार से पूछताछ के बाद इस रेलवे कर्मचारी के ठग बनने की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार है-

उत्तरपूर्वी दिल्ली के मंडोली में रहने वाला ओमपाल सिंह दिल्ली के डीआरएम औफिस में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. उस की यह नौकरी सन 1992 में लगी थी. इस नौकरी से वह अपना घरपरिवार चलाता रहा. जैसेजैसे उस का परिवार बढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे खर्च भी बढ़ रहा था, पर आमदनी सीमित थी, जिस से घर चलाने में परेशानी हो रही थी.

ओमपाल सोचता रहता था कि वह ऐसा क्या काम करे, जिस से उस के पास पैसों की कोई कमी न रहे. ओमपाल की साथ काम करने वाले संदीप कुमार से अच्छी दोस्ती थी. वह उस से अपनी परेशानी बताता रहता था. वह भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. उस की भी यही समस्या थी, पर वह अपनी यह परेशानी किसी को नहीं बताता था. दोनों ही शौर्टकट तरीके से मोटी कमाई करने के तरीके पर विचार करने लगे.

दोनों ने रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी लगवाने के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठने शुरू कर दिए. तमाम लोगों से उन्होंने लाखों रुपए इकट्ठे कर लिए, पर किसी की नौकरी नहीं लगी. जिन लोगों ने इन्हें पैसे दिए थे, उन्होंने इन से अपने पैसे मांगने शुरू कर दिए. तब दोनों कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गए. लोगों ने दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच थाने में भादंवि की धारा 420, 406 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. यह बात सन 2011 की है.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद क्राइम ब्रांच ने ओमपाल और उस के दोस्त को भरती घोटाले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस के बाद रेलवे ने दोनों आरोपियों को बर्खास्त कर दिया. जेल से जमानत पर छूटने के बाद ओमपाल ने रोहिणी में जय अपार्टमेंट में किराए पर फ्लैट ले लिया और आजादपुर मंडी में किराए पर हाथ ठेले देने का धंधा शुरू कर दिया.

इस काम से उसे अच्छी कमाई होने लगी. पर उसे तो चस्का मोटी कमाई का लग चुका था. लिहाजा उस ने फिर से लोगों को रेलवे में नौकरी दिलवाने का झांसा दे कर ठगना शुरू कर दिया. सराय पीपलथला के सरफराज, स्वरूपनगर निवासी गंगाराम और शालीमार बाग के अशोक कुमार ने भी उस के झांसे में आ कर उसे 1 लाख 80 हजार रुपए दे दिए.

पूछताछ में ओमपाल ने बताया कि वह करीब 20 लोगों से रेलवे में नौकरी दिलवाने के नाम पर लाखों रुपए ठग चुका है. उस की निशानदेही पर पुलिस ने रेलवे के आवेदन पत्र, सीनियर डीसीएम, उत्तर रेलवे की मुहर और उन के हस्ताक्षरयुक्त पेपर, रेलवे के वाटरमार्क्ड पेपर आदि बरामद किए.

पूछताछ के बाद ओमपाल को 15 नवंबर, 2017 को रोहिणी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. इस के बाद उसे पुन: न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा संकलन तक अभियुक्त जेल में बंद था. मामले की विवेचना एसआई अखिलेश वाजपेयी कर रहे थे.    -कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

पिया बने परदेसिया घर संभाले बहुरिया

देश के किसी भी हिस्से में जाएं तो चौड़ी, चिकनी सड़कों के किनारे जैसे ही कोई छोटा शहर, कसबा या गांव आता है, वहां पर बहुत सारी चीजें बिकती नजर आती हैं. इन में ज्यादातर हिस्सा उन चीजों का होता है, जो वहां के लोकल यानी स्थानीय फल या खानेपीने की होती हैं. भुने हुए आलू, शकरकंद, नारियल पानी, मेवा और दूसरी बहुत सी चीजें यहां मिल जाती हैं. यहां बात बेचने वाली औरतों से जुड़ी हैं. ये औरतें इस तरह के काम कर के अपने घर का खर्च चलाती हैं.

सड़क किनारे दुकान चलाने के साथ ही साथ ये औरतें अपने छोटेछोटे बच्चों को संभाल रही होती हैं. इन के पति अपने गांवघर से दूर किसी दूर शहर में नौकरी करने गए होते हैं.

लखनऊउन्नाव हाईवे के किनारे अजगैन कसबे के पास अमरूद बेच रही रेहाना बताती है, ‘‘हम रोज 20 से

30 किलो अमरूद सीजन में बेच लेते हैं. 5 से 7 रुपए किलो की बचत भी हो गई तो कुछ घंटों में 150 से 200 रुपए की कमाई हो जाती है.

‘‘सीजन के हिसाब से हम अपने सामान को बदल देते हैं. ऐसे में रोज का खर्च हमारी कमाई से चलता है और जो पैसा पति बाहर कमा रहे हैं वह किसी बड़े काम के लिए जमा हो जाता है.’’

मिल कर संभाल रहे घर

भोजपुर गांव की रहने वाली सितारा देवी के पास गांव में खेती करने के लिए 3 बीघा जमीन थी. घरपरिवार बड़ा हो गया था. सितारा के 3 बेटियां और 2 बेटे थे. इन का खर्च चलाना आसान नहीं था. पति सुरेश भी परेशान रहता था.

भोजपुर गांव का ही रहने वाला प्रदीप मुंबई में कपड़ों की धुलाई का काम करता था. वह सुरेश से मुंबई चलने के लिए कहने लगा.

सुरेश बोला, ‘‘मैं मुंबई कैसे चल सकता हूं. घरपरिवार किस के भरोसे छोड़ कर जाऊं? पत्नी घरपरिवार और बच्चों को अकेले कैसे संभाल पाएगी?’’

यह बात सुरेश की पत्नी सितारा भी सुन रही थी. वह भी सोचती थी कि अगर सुरेश पैसा कमाने घर से बाहर चला जाए तो घरपरिवार का खर्च आसानी से चल जाएगा.

सुरेश और प्रदीप की बातें सुन कर सितारा को लगा कि पति मुंबई इसलिए नहीं जा रहा क्योंकि पत्नी घर का बोझ कैसे उठा पाएगी.

वह बोली, ‘‘तुम घरपरिवार की चिंता मत करो. उस को मैं संभाल लूंगी. तुम बाहर से चार पैसा कमा कर लाओगे तो घर का खर्च चलाना और भी आसान हो जाएगा.’’

सितारा के हिम्मत बंधाने के बाद  सुरेश ने मुंबई जा कर पैसा कमाने का फैसला कर लिया. कुछ ही सालों के बाद दोनों की घर गृहस्थी खुशहाल हो गई.

सुरेश सालभर में एक महीने की छुट्टी ले कर घर आता था तो एकमुश्त पैसा ले कर आता था. इतना पैसा गांव की खेती में कभी नहीं बच सकता था.

गांव के लोगों ने कहना शुरू किया कि सुरेश की कमाई से उस का घरपरिवार सुधर गया तो खुद सुरेश कहता था, ‘‘मेरे घर की खुशहाली में मुझ से ज्यादा मेरी पत्नी सितारा का हाथ है. अगर उस ने हमारे घरपरिवार, खेती को नहीं संभाला होता तो मेरे अकेले की कमाई से क्या हो सकता था.’’

अब सुरेश और सितारा के साथ उन के बच्चे भी खुश थे. बड़ा बेटा भी कुछ सालों में सुरेश के साथ मुंबई कमाई करने चला गया.

परसपुर गांव की रहने वाली हमीदा का पति गांव में कपड़ों की बुनाई का काम करता था. इस के बाद भी उस को इतना पैसा नहीं मिलता था कि घरपरिवार ठीक से चल सके.

हमीदा के मायके में कुछ लोग कपड़ों की बुनाई का काम करने सूरत जाते थे. वहां उन को अच्छा पैसा मिल जाता था.

हमीदा ने अपने पति रहमान से भी सूरत जाने के लिए कहा तो वह कहने लगा, ‘‘मैं सूरत जा तो सकता हूं, पर तुम यहां घर पर अकेले कैसे रहोगी? बूढ़े मांबाप भी हैं.’’

हमीदा बोली, ‘‘तुम हम लोगों की चिंता मत करो. यहां घर की जिम्मेदारी मुझ पर है. तुम केवल परदेस जाओ. जितनी मेहनत तुम यहां करते हो, उतनी मेहनत वहां भी करोगे तो अच्छा पैसा मिल जाएगा जिस से हमारा घरपरिवार सही से रह सकेगा. मांबाप का इलाज भी हो सकेगा.’’

रहमान सूरत चला गया. वहां उस ने मेहनत से कपड़ों की बुनाई का काम किया. मिल का मालिक भी खुश हो गया. उस ने एक साल में ही रहमान की तनख्वाह बढ़ा दी.

रहमान को रहने के लिए मिल में ही जगह दे दी जिस से रहने पर होने वाला खर्च बच गया. इस से रहमान की कमाई में बरकत दिखने लगी. घर वाले भी सही से रहने लगे. मांबाप का इलाज भी शहर के डाक्टरों से होने लगा.

रहमान कहता है, ‘‘यह कमाई उस की नहीं है. इस में पत्नी का भी पूरा सहयोग रहा है. अगर पत्नी ने घरपरिवार की जिम्मेदारी नहीं संभाली होती तो में कमाई करने कभी सूरत नहीं जा पाता.’’

पत्नी बनी सहयोगी

सुरेश और रहमान दोनों का कहना है कि उन की नजर में पत्नी उन की सहयोगी है. इन दोनों के सहयोग से ही घर की गृहस्थी की गाड़ी सही तरह से चलती है. घर में रह कर कुछ पत्नियां अपने हुनर का इस्तेमाल कर के खुद भी कमाई करती हैं और अपने घर को माली सहयोग करने लगती हैं.

मानिकपुर गांव का इकबाल जब कमाने के लिए दिल्ली चला गया तो उस की पत्नी शोभा ने न केवल घर के काम किए, खेती कराई, बल्कि उस ने ठेके पर कपड़े ले कर साड़ी वगैरह में तार की कढ़ाई करने का काम शुरू कर दिया.

एक साड़ी की कढ़ाई करने में शोभा को 10 दिन का समय लगता था. वह हर रोज 2 घंटे इस काम को करती थी. इस के बदले उस को 500 रुपए मिल जाते थे. इस तरह महीने में 50 से 60 घंटे काम कर के शोभा को 1,500 से 2,000 रुपए के बीच पैसे मिलने लगे.

शोभा ने यह पैसे गांव में बने डाकघर में जमा करने शुरू किए. कुछ ही सालों के अंदर शोभा ने खुद अपनी कमाई से हजारों रुपए जुटा लिए.

बीए करने वाली बिन्नो की शादी टूसरपुर गांव में हुई थी. बिन्नो पढ़नेलिखने में बहुत तेज थी. वह नौकरी करना चाहती थी, पर उस को नौकरी नहीं मिली. उस के गांव में ‘शिक्षा मित्र’ की जगह निकली तो गांव के बड़े लोगों ने उस के बजाय दूसरी औरत को नौकरी पर रखवा दिया.

बिन्नो का पति दीपक भी बेरोजगार था. वह कमाने के लिए दिल्ली चला गया. इधर बिन्नो ने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू कर दिया.

शुरुआत में तो गांव के लोगों ने बिन्नो के पास पढ़ने के लिए बच्चे भेजने में आनाकानी की. बिन्नो का घर 2 गांव के बीच था. उस ने दूसरे गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया.

बिन्नो इन बच्चों से 20 रुपए महीना फीस लेती थी. दोनों गांव के बच्चे एक ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे. उस स्कूल में जब छमाही इम्तिहान हुए तो वे बच्चे पढ़ाई में आगे निकल गए जिन को बिन्नो ट्यूशन पढ़ाती थी. इस के बाद तो बिन्नो के पास ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों की तादाद काफी बढ़ गई.

इस तरह घर बैठ कर बिन्नो ने पति का काम भी संभाल लिया और ट्यूशन के जरीए पैसा कमा कर माली मदद भी कर दी.

काम आई समझदारी

बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने गांव के हालात को बहुत खराब कर दिया है. गांव में रहने वाले बहुत से लोगों के पास खेती करने के लिए जमीन नहीं है.  जिन के पास थोड़ीबहुत जमीन है, उन को भी उस से कोई लाभ नहीं मिलता. उन की सारी कमाई दो जून की रोटी का ही इंतजाम करने में खर्च हो जाती है.

बहुत से लोग गांव में ही रह कर मेहनतमजदूरी करते हैं लेकिन उन को वहां ठीक से पैसा नहीं मिलता है. इस के लिए गांव में रहने वाले तमाम लोग कमाई करने शहरों की ओर जाते हैं. गांव में उन की पत्नी और बच्चे रह जाते हैं.

समझदार पत्नियां गांव में रहते हुए अपना घर भी संभाल लेती हैं और कुछ न कुछ काम कर के पैसा जुटाने की कोशिश में लगी रहती हैं.

गांव की ये महिलाएं सिलाई, बुनाई, कढ़ाई जैसे काम करती हैं. कुछ पढ़ीलिखी औरतें बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करती हैं. वहीं दालमोंठ, अचार, पापड़, सेंवई, माचिस, मोमबत्ती, अगरबत्ती जैसे सामान ठेके पर बनाने का काम भी करती हैं जिस से उन की अच्छीखासी कमाई हो जाती है. आसपास के बाजारों में पता करने से इस तरह के कामों का पता चल जाता है.  पत्रपत्रिकाओं के पढ़ने, टैलीविजन और रेडियो के कार्यक्रमों को सुनने से इस तरह की तमाम जानकारियां हासिल हो जाती हैं.

कोशिश यह करें कि लड़कियों को पढ़ाएं जिस से जब वे अपनी गृहस्थी शुरू करें तो कुछ न कुछ काम करने का हुनर उन को पता हो.

आसान नहीं रास्ते

गांव में अकेली रह रही औरतों के लिए परेशानियां भी कम नहीं हैं. जोठरा गांव की रहने वाली प्रेमा का पति हरखू मुंबई में काम करने चला गया था. प्रेमा गांव में अकेली रहती थी. प्रेमा के साथ उस की बीमार सास भी रहती थी, जिस को दिखाई भी नहीं देता था.

प्रेमा का 2 साल का एक बेटा भी था.  वह जंगल में तेंदूपत्ता तोड़ने और मजदूरी का काम करती थी. जब वह मजदूरी करने जाती थी तो अपने बेटे के पांव में रस्सी बांध देती थी जिस से वह बच्चा पास के बने कुएं तक न जा सके.

प्रेमा कहती है कि वह यह काम मजबूरी में करती है. अगर बच्चा सास के सहारे छोड़ जाए तो उन को दिखाई नहीं देता है. बच्चा दूर जा सकता है.  कभी कोई हादसा हो सकता है. अगर वह बच्चे को ले कर मजदूरी करने जाती है तो वहां भी वह परेशान करता है.

इस तरह की तमाम परेशानियां और भी हैं. गांव में रहने वालों की सब से बड़ी परेशानी यह है कि वह किसी दूसरे की तरक्की को देख कर सहज नहीं रहते. जब कोई औरत आगे बढ़ती है तो उस पर तमाम तरह के लांछन भी लगने लगते हैं.

अकेली औरत के दामन पर दाग लगाना आसान होता है इसलिए गांव के लोग औरतों को बदनाम भी करते हैं. कभीकभी अगर पतिपत्नी समझदारी से काम नहीं करते तो उन के बीच झगड़ा भी हो जाता है इसलिए जब कभी इस तरह की गलतफहमी हो तो समझदारी से काम लें.

दुश्चक्र

स्कूल छूटने के बाद मैं साथी शिक्षिकाओं के साथ घर लौट रही थी, तभी घर के पास वाले चौराहे पर एक आवाज सुनाई दी, ‘बहनजी, जरा सुनिए तो.’

पहले तो मैं ने आवाज को अनसुना कर दिया यह सोच कर कि शायद किसी और के लिए आवाज हो लेकिन वही आवाज जब मुझे दोबारा सुनाई दी, ‘बहनजी, मैं आप से ही कह रहा हूं, जरा इधर तो आइए,’ तो इस बार मजबूरन मुझे उस दिशा में देखना ही पड़ा.

मैं ने देखा, चौराहे पर स्थित एकमात्र पान की दुकान वाला मुझे ही बुला रहा था. मुझे भी आश्चर्य हुआ कि पान की दुकान पर भला मेरा क्या काम? साथ की शिक्षिकाएं भी मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगीं, लेकिन जब मुझे स्वयं ही कुछ पता नहीं था तो मैं भला उन से क्या कहती? अत: उन सब को वहीं छोड़ कर मैं पान की दुकान पर पहुंच गई और दुकानदार से कुछ पूछती उस से पहले उस ने स्वयं ही बोलना शुरू कर दिया :

‘‘बहनजी, आप इस महल्ले में अभी नईनई ही आई हैं न?’’

‘‘जी हां, अभी पिछले महीने ही मैं ने गुप्ताजी का मकान किराए पर लिया है,’’ मैं ने उसे जवाब दे दिया फिर भी दुकानदार द्वारा बुलाने का कारण मेरी समझ में नहीं आया.

‘‘अच्छा, तो मिस्टर श्याम आप के पति हैं?’’ दुकानदार ने आगे पूछा.

‘‘जी हां, लेकिन आप यह सब पूछ क्यों रहे हैं?’’ अब उस दुकानदार पर मुझे खीज होने लगी थी.

‘‘कुछ खास बात नहीं है, मुझे तो आप को सिर्फ यह बताना था कि सुबह  आप के पति दुकान पर आए थे और सिगरेट के 2 पैकेट, 4 जोड़े पान और कोल्डडिं्रक की 1 बड़ी बोतल ले गए थे. उस वक्त शायद उन की जेब में पैसे नहीं थे या फिर वे अपना पर्स घर पर ही भूल गए थे. उन्होेंने आप का परिचय दे कर आप से रुपए ले लेने के लिए कहा था,’’ दुकानदार ने मुझे बुलाने का अपना प्रयोजन स्पष्ट किया.

मैं ने पर्स खोल कर 100 रुपए का एक नोट दुकानदार की ओर बढ़ा दिया. उस ने पैसे काट कर जो पैसे वापस दिए, उन्हें बिना गिने ही मैं ने पर्स में रखा और वहां से चल दी. रास्ते में सोचने लगी कि इस आदमी ने यहां भी उधार लेना शुरू कर दिया. मेरे कानों में दुकानदार के कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे :

‘कुछ भी हो आदमी वे बड़े दिलचस्प हैं. बातों का तो जैसे उन के पास खजाना है. बड़े काम की बातें करते हैं. दिमाग भी उन्होंने गजब का पाया है. मेरी दुकान की तो बहुत तारीफ कर रहे थे. साथ ही कुछ सुझाव भी दे गए.’

‘दिमाग की ही तो खा रहा है,’ मन ही मन सोचा और शिक्षिकाओं के समूह से आ मिली.

‘‘क्यों? क्या बात हो गई? क्यों बुलाया था दुकानदार ने?’’ रीना मैडम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस यों ही,’’ कहते हुए मैं ने बात को टाल दिया.

वे भी शायद घर पहुंचने की जल्दी में थीं, इसलिए किसी ने भी बात को आगे नहीं बढ़ाया. सब चुपचाप जल्दीजल्दी अपनेअपने घरों की ओर बढ़ने लगीं.

घर पहुंची तो देखा महाशय ड्राइंगरूम में सोफे पर लेट कर सिगरेट फूंक रहे थे. टेलीविजन चल रहा था और एक फैशन चैनल पर आधुनिक फैशन का ज्ञान लिया जा रहा था.

मुझे देखते ही श्याम बोले, ‘‘अच्छा हुआ यार, तुम आ गईं. मैं भी घर पर बैठेबैठे बोर हो रहा था. टेलीविजन भी कोई कहां तक देखे? फिर इस पर भी तो वही सब घिसेपिटे कार्यक्रम ही आते हैं.’’

जवाब में मैं ने कुछ भी नहीं कहा.

मेरी चुप्पी की ओर बिना कोई ध्यान दिए श्याम बोले, ‘‘सुनो, बहुत जोर की भूख लगी है. मैं सोच ही रहा था कि तुम आ जाओ तो साथ में भोजन करते हैं. अब तुम आ गई हो तो चलो फटाफट भोजन लगाओ, तब तक मैं हाथ धो कर आता हूं.’’

मेरा मन तो हुआ कि पूछ लूं, ‘क्या थाली ले कर खा भी नहीं सकते हो. सुबह स्कूल जाने से पहले ही मैं पूरा भोजन बना कर जाती हूं, क्या भोजन परोस कर खाना भी नहीं होता?’ लेकिन फालतू का विवाद हो जाएगा, यह सोच कर चुप रही.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ मुझे चुप देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ मैं ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

अभी मैं आगे कुछ कहती, इस से पहले ही जैसे श्याम को कुछ याद आ गया, वह बोले, ‘‘अरे, हां यार, घर में कुछ पैसे तो रख कर जाया करो. आज तुम्हारे जाने के बाद मुझे सिगरेट के लिए पैसों की जरूरत थी. पूरा घर छान मारा पर कहीं भी एक पैसा नहीं मिला. मजबूरन नुक्कड़ वाली पान की दुकान से मुझे सिगरेट उधार लेनी पड़ी. अभी कुछ रुपए दे देना तो शाम को मैं उस के रुपए चुका आऊंगा.’’

‘‘आप का उधार मैं ने चुका दिया है,’’ मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और भोजन गरम करने में लग गई.

भोजन करते समय श्याम एक बार फिर शुरू हो गए, ‘‘यार, वंदना, यह तो बहुत ही गलत बात है कि सारे पैसे पर्स में रख कर तुम स्कूल चली जाती हो. ए.टी.एम. कार्ड भी तुम्हारे ही पास रहता है. ऐसे में अचानक यदि मुझे रुपयों की जरूरत पड़ जाए तो मैं क्या करूं, किस से मांगूं? जरा मेरी हालत के बारे में भी तो सोचो. मैं यहां पर घर की रखवाली करूं, सारी व्यवस्थाएं करूं, तुम्हारी देखभाल करूं, तुम्हारी सुरक्षा की चिंता करूं. ऐसे में यदि मेरी ही जेब खाली हो तो मैं कैसे ये सबकुछ कर पाऊंगा. पैसों की आवश्यकता तो पगपग पर होती है. अरे, तुम्हारे लिए ही तो मैं यहां पड़ा हूं.’’

‘‘आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. क्या करना है, कैसे करना है, मुझे सब पता है. और हां, रुपयों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई रुपए मांगते हुए यहां घर तक नहीं आएगा. मुझे सब का हिसाब करना आता है,’’ मैं ने तिक्त स्वर में कहा.

पिछला अनुभव मुझे अच्छी तरह याद है कि उधार तो चुकेगा नहीं, उलटे दोबारा भुगतान अलग से करना पड़ जाएगा. रायपुर का एक किस्सा मुझे अच्छी तरह याद है कि किस तरह मुझे दुकानदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता था. किस तरह एक ही बिल का मुझे 2 बार भुगतान करना पड़ता था. एक बार तो एक दुकानदार ने पूछ भी लिया था, ‘मैडमजी, यदि बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकता हूं?’

‘पूछिए, गुप्ताजी क्या पूछना चाहते हैं आप?’ मुझे कहना पड़ा था क्योंकि गुप्ता किराना वाले के मुझ पर बहुत से एहसान थे.

‘मैडम, श्याम भाई कुछ करते क्यों नहीं? आप कहें तो मैं उन के लिए कहीं नौकरी की बात करूं?’ गुप्ताजी ने कुछ संकोच से पूछा था.

‘गुप्ताजी, बेहतर होगा ये सब बातें आप उन्हीं से कीजिए. उन के बारे में भला मैं क्या कह सकती हूं? अपने बारे में वे स्वयं ज्यादा अच्छी तरह से बता पाएंगे,’ कहते हुए मैं ने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए थे.

‘‘कुछ ले नहीं रही हो, तबीयत खराब है क्या?’’ रुके हुए हाथ को देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ विशेष नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है,’’ कह कर मैं किसी तरह थाली में लिया भोजन समाप्त कर के बिस्तर पर आ कर लेट गई. अतीत किसी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था.

मातापिता और भाइयों के मना करने और सब के द्वारा श्याम के सभी दुर्गुणों को बताने के बावजूद मैं ने श्याम से प्रेम विवाह किया था. श्याम ने मुझे भरोसा दिलाया था कि शादी के बाद वह स्वयं को पूरी तरह से बदल लेगा और अपनी सारी बुराइयों को छोड़ देगा.

शादी के बाद जब श्याम ने मुझे नौकरी के लिए प्रोत्साहित किया तो श्याम की सोच पर मुझे गर्व हुआ था. श्याम का कहना था कि यदि हम दोनों नौकरी करेंगे तो हमारी गृहस्थी की गाड़ी और ज्यादा अच्छी तरह से चल निकलेगी. उस समय मुझे श्याम की चालाकी का जरा भी अनुभव नहीं हुआ था…लगा कि श्याम सच ही कह रहा है. यदि मैं पढ़ीलिखी हूं, प्रशिक्षित हूं तो मुझे अपने ज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए. उसे यों ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.

संयोग से हमारी शादी के कुछ दिनों बाद ही केंद्रीय विद्यालय समूह में नौकरी (शिक्षकों) की रिक्तियां निकलीं. श्याम के सुझाव पर मैं ने भी आवेदनपत्र जमा कर दिया. जिस दिन मुझे शिक्षिका की नौकरी मिली उस दिन मुझ से ज्यादा खुश श्याम था.

श्याम की आंखों की चमक ने मेरी खुशियों को दोगुना कर दिया था. मुझे तब ऐसा लगा था जैसे श्याम को पा कर मैं ने जिंदगी में सबकुछ पा लिया. मेरी जिंदगी धन्य हो गई. हां, एक बात मुझे जरूर खटकती थी कि मुझ से वादा करने के बाद भी श्याम ने अपनी सिगरेट और शराब की आदतें छोड़ी नहीं थीं. कई बार तो मुझे ऐसा लगता जैसे वह पहले से कहीं अधिक शराब पीने लगा है.

श्याम की नौकरी लगे मुश्किल से 8 महीने भी नहीं हुए थे कि अचानक एक दिन श्याम के आफिस से उस के निलंबन का पत्र आ गया. कारण था, शराब पी कर दफ्तर आना और अपने सहकर्मियों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करना. दफ्तर का काम न करना, लेकिन श्याम पर जैसे इस निलंबन का कोई असर ही नहीं पड़ा. उलटे उस पत्र के आने के बाद वह और अधिक शराब पीने लगा.

कभीकभी वह शराब के नशे में बड़बड़ाता, ‘करो, जो करना है करो. निलंबित करो चाहे नौकरी से निकालो या और भी कुछ बुरा कर सकते हो तो करो. यहां नौकरी की चिंता किसे है? अरे, चिंता करनी ही होती तो पत्नी को नौकरी पर क्यों लगवाता. चिंता तो वे करें जिन के घर में अकेला पति कमाने वाला हो. यहां तो मेरी पत्नी भी एक केंद्रीय कर्मचारी है. यदि मेरी नौकरी छूट भी गई तो एकदम सड़क पर नहीं आ जाऊंगा. मेरा घर तो चलता रहेगा. मैं नहीं तो पत्नी कमाएगी.’

वह दिन है और आज का दिन है. अकेली मैं कमा रही हूं. मुझे स्वयं ही नहीं मालूम कि कब तक अपने कंधों पर न केवल खुद का बल्कि अपने पति का भार भी ढोना पड़ेगा. अचानक मुझे अपने कंधों में दर्द का अनुभव होने लगा. दर्द के मारे मेरे कंधे झुकते चले गए.

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