भारतीय सेना में शामिल हुआ अपाचे हेलिकौप्टर और AK-203 रायफल, दुश्मनों के उड़े होश

भारतीय सेना को मजबूत बनाने के लिए सरकार लगातार बड़े देशों से रक्षा उपकरणों की डील कर रही है. सरकार ने राफेल डील को भी हरी झंडी दे दी है. आज हम बात करेंगे उन हथियारों की जो हाल ही में भारतीय सेना के खेमे में शामिल हुए हैं. इन हथियारों में सबसे अहम है अपाचे लड़ाकू विमान और AK-203 रायफल.

अपाचे विमान क्या है
आधुनिक युद्ध क्षमता वाले अपाचे हेलिकौप्टर को अमरीकी कंपनी बोइंग ने बनाया है. ये हेलिकौप्टर कई तरह के मिशनों में रोल अदा करेगा. इस बात की पुष्टि खुद वायु सेना चीफ बीएस धनोआ ने की. अपाचे हेलिकौप्टर 27 जुलाई को गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस लाया गया था. फिर ट्रायल के बाद इन्हें पठानकोट एयरबेस भेज दिया गया जहां मंगलवार को औपचारिक रूप से इन्हें भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया. वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे. भारतीय वायु सेना ने इस हेलिकौप्टर की पहली उड़ान का वीडियो भी साझा किया था. इस हेलिकौप्टर के लिए भारत ने बोइंग और अमरीकी सरकार से 22 अपाचे हेलिकॉप्टरों का समझौता किया था. पहले आठ हेलिकौप्टर तय समय पर आ गए हैं और बाक़ी मार्च 2020 तक आएंगे.

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अब हम आपको बताते हैं कि इस हेलिकौप्टर की खासियत क्या है
अपाचे हेलिकौप्टर के साइज की बात करें तो ये करीब 16 फुट ऊंचे और 18 फुट चौड़े अपाचे हेलिकौप्टर को उड़ाने के लिए दो पायलट होना जरूरी है. अपाचे हेलिकौप्टर के बड़े विंग को चलाने के लिए दो इंजन होते हैं. इस वजह से इसकी रफ्तार बहुत ज्यादा होती है. इस खास हेलिकौप्टर की रफ्तार की बात करें तो ये 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ता है.

इस हेलिकौप्टर की सबसे खास बात है कि इसको रडार में पकड़ा नहीं जा सकता. असल में अपाचे हेलिकौप्टर का डिजाइन ऐसा है कि इसे रडार पर पकड़ना मुश्किल होता है. इस हेलिकौप्टर को बनाने वाली कंपनी बोइंग के अनुसार, बोइंग और अमरीकी फ़ौज के बीच स्पष्ट अनुबंध है कि कंपनी इसके रखरखाव के लिए हमेशा सेवाएं तो देगी पर ये मुफ़्त नहीं होंगी.

अपाचे की क्षमता का आंकलन आप इसी से लगा लीजिए कि ये 16 एंटी टैंक मिसाइल छोड़ सकती है. हेलिकौप्टर के नीचे लगी राइफ़ल में एक बार में 30एमएम की 1,200 गोलियां भरी जा सकती हैं. इसकी फ्लाइंग रेंज करीब 550 किलोमीटर ये एक बार में पौने तीन घंटे तक उड़ सकता है. दुनिया के 15 देश बोइंग के इस हमलावर अपाचे हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें अमेरिका से लेकर यूके, इजरायल, कुवैत, सऊदी अरब, सिंगापुर, मिस्र जैसे देश शामिल हैं.

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AK- 203 रायफल की खासियत…
पीएम मोदी इस वक्त रूस के दौरे पर हैं. रूस भारत का सदाबहर दोस्त रहा है. 1971 के समय जब भारत-पाकिस्तान का युद्द हुआ था तो दुनिया के दो ताकतवर मुल्क यूके (युनाइटेड किंगडम) और यूएस (अमेरिका) दोनों पाकिस्तान का साथ दे रहे थे. ऐसे में रूस ने भारत की तरफ से परमाणु हथियारों से लैस पोत भारत को भेज दिए थे. तब से ही भारत और रूस के रिश्ते मधुर रहे हैं. भारत और रूस के बीच दशकों से सामरिक साझेदारी रही है. एयर डिफेंस सिस्‍टम्‍स से लेकर न्‍यूक्लियर सबमरीन्‍स तक, रूस ने भारत को कई खतरनाक हथियार एक्‍सपोर्ट किए हैं. AK-203 इस रिश्‍ते को एक नए मुकाम पर ले जाती है.

साल 1994 में भारतीय सेना ने INSAS राइफलों को शामिल किया गया था. AK-203 उसी की जगह लेगी. एके राइफल्‍स की सीरीज में बेसिक फायरिंग मेकेनिज्‍म और इंटरनल्‍स एक जैसे ही रहे हैं. कलाशनिकोव राइफलें गैस-ऑपरेटेड होती हैं. इनमें लौन्‍ग स्‍ट्रोक गैस पिस्‍टन और रोटेटिंग बेल्‍ट होती है. एक राइफल से हर मिनट 600 से 700 राउंड्स के बीच फायर किए जा सकते हैं.

AK-47 को 1947 में डिजाइन किया गया था. इसमें वुडेन स्‍टौक, भारी मैगजीन का इस्‍तेमाल होने की वजह से इसका वजन ज्‍यादा हो गया था. नई सीरीज (AK-103/203) में शुरुआती डिजाइन की कमियों को दूर किया गया है. AK-203 में टौप कवर हिंज को कवर करने के लिए फ्रंट ट्रनियन और रियर साइट बेस को री-डिजाइन किया गया है. लौकिंग मेकेनिज्‍म को टॉप पर रखा गया है. AK-203 में साइड फोल्डिंग, 4 पोजिशंस वाला टेलीस्‍कोपिंग शोल्‍डर स्‍टौक है. इस स्‍टॉक को 40mm अंडरबैरेल ग्रेनेड लौन्‍चर के साथ आराम से इस्‍तेमाल किया जा सकता है.

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बौल टेंपरिंग विवाद के बाद मैदान में लौटते ही स्टीव स्मिथ ने रचा इतिहास

मैनचेस्टर: क्रिकेट के इतिहास में हमने कई ऐसे बल्लेबाजों को देखा जिनके बल्लेबाजी की चर्चा आज भी होती है. ऐसे मैं कुछ खिलाड़ियों के नामों का जिक्र करना चाहूंगा. पहला नाम सर डॉन ब्रैडमैन, विवि रिचर्ड्स, ब्रायन लारा, सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग. ऐसे बल्लेबाजों की फेहरिस्त थोड़ी लंबी है लेकिन यहां नाम मैंने कुछ ही खिलाड़ियों के नाम लिखें हैं. ये खिलाड़ी हर एक एरा महान बल्लेबाजों के नाम हैं. ये सभी खिलाड़ी संन्यास ले चुके हैं. अब हम बता करें मौजूदा ऐसे बल्लेबाजों की जिन्होंने क्रिकेट के मैदान में जलवा बिखेर रखा है. पहले हैं औस्ट्रेलियन बल्लेबाज स्टीव स्मिथ और भारतीय कप्तान विराट कोहली. इन दोनों के सामने हर रिकौर्ड छोटे पड़ते जा रहे हैं.

इंग्लैंड में एशेज सीरीज खेली जा रही है. पांच मैचों की सीरीज का तीसरा टेस्ट मैच खेला जा रहा है. सीरीज 1-1 से बराबर हो गई है. इस मैच में सबसे ज्यादा किसी ने चौंकाया है तो वो है स्टीव स्मिथ. स्मिथ बौल टेंपरिंग के बाद पहली बार टेस्ट सीरीज में खेलने उतर रहे थे. सीरीज कोई छोटी मोटी नहीं बल्कि एशेज है. एशेज सीरीज इंग्लैंड और औस्ट्रेलिया के लिए विश्व कप से जैसी ही होती है. दोनों एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंदी माने जाते हैं. इस सीरीज में स्मिथ के बल्ले से जो पारियां निकली हैं वो अपने आप में भी नायाब हैं.

आईसीसी ने हाल ही में टेस्ट रैंकिंग जारी की है. रैंकिंग में विराट कोहली पहले स्थान से खिसक कर दूसरे स्थान पर आ गए हैं. कोहली को जमैका टेस्ट में पहली बौल पर आउट होना महंगा पड़ गया. औस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान स्टीव स्मिथ ने टेस्ट रैंकिंग में पहले स्थान पर वापसी की है. स्मिथ के अब रैंकिंग में 904 अंक हैं, जबकि 903 अंकों के साथ विराट कोहली दूसरे स्थान पर आ गए हैं.

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विराट कोहली ने जमैका टेस्ट की पहली पारी में 76 रन बनाए थे, लेकिन दूसरी पारी में जब विराट बैटिंग पर आए तो वह पहली ही गेंद पर केमार रोच का शिकार हो गए. इससे विराट के पौइंट्स में कटौती हुई और एशेज में तीसरा टेस्ट मिस करने वाले औस्ट्रेलियाई बल्लेबाज स्टीव स्मिथ के पास विराट से 1 अंक ज्यादा हो गया, जिससे उन्होंने अगस्त 2018 के बाद पहले स्थान पर वापसी की है.

स्मिथ दिसंबर 2015 से अगस्त 2018 तक लगातार नंबर एक पोजिशन पर कायम थे. इसके बाद मार्च 2018 में उन्हें साउथ अफ्रीका में एक टेस्ट मैच में बौल टैंपरिंग में दोषी पाया गया, जिससे उन पर औस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड ने एक साल का प्रतिबंध लगाया. एशेज टेस्ट के पहले मैच में स्मिथ ने शानदार वापसी की और अभी उन्होंने दो टेस्ट की तीन पारियां ही खेली थीं कि विराट से अपना पहला स्थान हासिल कर लिया.

इन तीन पारियों में स्मिथ ने कुल 378 (144, 142 और 92) रन बनाए. स्मिथ के पास मौजूदा एशेज में अभी दो टेस्ट और हैं यानी उनके पास यह मौका भी होगा कि वह विराट से अपने एक अंक के इस मामूली अंतर को और बढ़ा सकें. लेकिन कोहली के पास अभी ये मौका नहीं होगा क्योंकि वेस्टइंडीज के साथ टेस्ट सीरीज का दूसरा मुकाबला भी खत्म हो गया.

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इतना ही नहीं औस्ट्रेलिया के स्टीवन स्मिथ ने गुरुवार को एक और शतकीय वापसी करते हुए एक और रिकौर्ड अपने नाम किया है. तीसरे एशेज टेस्ट में चोट के कारण नहीं खेल पाए स्मिथ ने ओल्ड ट्रेफर्ड मैदान पर खेले जा रहे चौथे टेस्ट की पहली पारी में शतक जमाया है. यह स्मिथ के टेस्ट करियर का 26वां शतक है और इसी के साथ वह टेस्ट में सबसे तेजी से 26 शतक बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज बन गए हैं.

स्मिथ से पहले नंबर सर डॉन ब्रैडमेन का है, जिन्होंने सिर्फ 69 टेस्ट में 26 शतक लगा दिए थे. स्मिथ इस एशेज सीरीज में सर्वोच्च स्कोर भी बन गए हैं. यह इंग्लैंड के खिलाफ पिछली आठ पारियों में उनका पांचवां शतक है.

चौथे टेस्ट में उन्होंने वापसी की और जहां एक छोर से इंग्लैंड के गेंदबाज विकेट ले रहे थे वहां दूसरा छोर संभाले रखा. मैच के दूसरे दिन भोजनकाल तक स्मिथ ने अपनी शतकीय पारी में 163 गेंदों का सामना कर 101 रन बना लिए हैं. वह 11 चौके लगा चुके हैं. एशेज में सबसे ज्यादा शतक लगाने के मामले में भी स्मिथ तीसरे नंबर पर आ गए हैं. उनके एशेज सीरीज में कुल 11 शतक हो गए हैं. इस मामले में 19 शतकों के साथ ब्रेडमैन पहले स्थान पर हैं तो वहीं जैक होब्स 12 शतकों के साथ दूसरे स्थान पर हैं.

 

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प्लास्टिक के बर्तन और जमीन पर बिछौना, जेल में यूं कटी पी. चिदंबरम की पहली रात

“सदा ऐश दौरां दिखाता नहीं, गया वक्त फिर हाथ आता नहीं…” ये शेर है जनाब मीर हसन साहब का. जिसमें वो बताते हैं कि हमेशा वक्त एक जैसा नहीं होता, जो वक्त गुजर जाता है फिर वो लौटकर नहीं आता.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं. चिदंबरम को तिहाड़ जेल के बैरक नंबर 7 में रखा गया है. कभी इस सेल में उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को भी रखा गया था. पी. चिदंबरम के लिए तिहाड़ जेल की दमघोंटू बैरक में रात-दिन गुजार पाना उतना आसान नहीं रहा जितना गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठकर इसी तिहाड़ जेल का करोड़ों रुपये का बजट पास कराना आसान था. गुरुवार को शाम ढले जेल की देहरी पर पांव रखते ही उन्हें तिहाड़ जेल की खतरनाक हकीकत से दो-चार करा दिया गया. रुह कंपा देने वाला यह मंजर उनके सामने तब आया जेल के अदना से वार्डर ने उनसे कहा, ‘उल्टे हाथ का अंगूठा स्याही में रंगकर कागज पर लगाओ.’

कागज पर अंगूठा लगाने की प्रक्रिया के दौरान जेल की देहरी (ड्यूढ़ी) पर जेल और सीबीआई की टीम दोनों के अधिकारी मौजूद थे. यही वह वक्त था जब विचाराधीन हाईप्रोफाइल कैदी पी. चिदंबरम को सीबीआई की टीम जेल स्टाफ के हवाले करने संबंधी तमाम कानूनी और कागजाती खानापूर्ति कर रही थी. कैदी के लेन-देन के वक्त ही जेल स्टाफ पी. चिदंबरम से उनके परिवार वालों के नाम, पते, उम्र, संपर्क इत्यादि का ब्योरा पूछकर जेल रिकौर्ड में दर्ज किया. जेल में उनसे मिलने कौन-कौन आयेगा? उन तमाम संबंधित नामों की तालिका या ब्योरा भी चिदंबरम को जेल में प्रवेश के वक्त ही देना पड़ा.

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पी. चिदंबरम की उम्र 70 साल से ऊपर है. लिहाजा ऐसे में जेल पहुंचते ही जेल के चिकित्सक द्वारा उनका मेडिकल चैकअप किया गया. साथ ही संभव है कि मामला हाईप्रोफाइल होने के चलते किसी भी आपात स्थिति के लिए रात भर जेल में चिकित्सक को रोक लिया जाए, ताकि रात में रक्तचाप बगैरह की जांच तुरंत की जा सके.”

इसी जेल सूत्र के मुताबिक, “अमूमन पी. चिंदबरम जैसे हाईप्रोफाइल कैदी जब पहली बार जेल पहुंचते हैं तो उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत रक्तचाप की ही अक्सर देखने में आई है. वे पहले से ही जांच एजेंसियों की पूछताछ से थके-हारे होते हैं. रही सही कसर तिहाड़ जेल में पहली बार रात काटने का भय पूरी कर देता है.”

जेल के एक सूत्र ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, “गुरुवार रात जेल पहुंचने के वक्त भी जेल चिकित्सकों ने चिदंबरम का स्वास्थ्य परीक्षण किया था, मगर उस वक्त उन्होंने इस हाईप्रोफाइल कैदी को सोने के लिए लकड़ी के तख्त की संस्तुति नहीं की थी. ऐसे में जेल जाने वाले देश के पहले पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम को जेल की कोठरी में पहली रात जमीन पर कंबलों को सहारे काटनी पड़ी.”

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चिदंबरम की पहली रात जेल में जैसे-तैसे कट गई. सुबह होते ही उन्होंने कोठरी के बाहर निकल कर थोड़े खुले वातावरण में खुली हवा लेने की इच्छा जाहिर की, तो जेल की सुरक्षा में तैनात वार्डन्स ने कोठरी के बाहर निकल कर टहलने की अनुमति उन्हें दे दी.”

चिदंबरम ने शुक्रवार सुबह जेल में बना नाश्ता ही लेने की इच्छा जताई. पूर्वाह्न् में जेल चिकित्सकों ने उनकी दुबारा स्वास्थ्य जांच की. इसी जांच के बाद चिकित्सकों ने जेल प्रशासन को आदेश दिया कि चिदंबरम को सोने के लिए लकड़ी का तख्त मुहैया कराया जाए.” जेल चिकित्सकों की सलाह के मुताबिक आज (शुक्रवार) लकड़ी का तख्त उन्हें (चिदंबरम) उपलब्ध करा दिया गया है.”

फिल्म रिव्यू फेयर इन लव: अच्छी कहानी पर बेजान फिल्म

रेटिंगः एक

निर्माताः आशुतोष मिश्रा

निर्देकः ए. के. मिश्रा

कलाकारः फिरोज खान, कनुप्रिया र्मा, डौली आर्या, श्विन धीर, रूनव शा

अवधिः एक घंटा, 59 मिनट

ए. के. मिश्रा ने कुछ साल पहले बांझपन और बलात्कार पर ज्वलंत सामाजिक मुद्दे पर एक नारी प्रधान उपन्यास ‘‘अल्पना’’ लिखा था. जिसे काफी सराहा गया था. उसी उपन्यास पर अब वह फिल्म ‘‘फेयर इन लव’’ लेकर आए हैं. मगर साहित्यिक कृति का फिल्मीकरण करते समय विषय के साथ साथ फिल्म का भी बंटाधार कर दिया गया है.

कहानीः

फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के महिला कल्याण मंत्री की बेटी अल्पना (कनुप्रिया शर्मा) की है, जिसके लिए अपने आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ भी नहीं है. अल्पना नक्सलवादी संगठन के प्रमुख के बेटे देव (फिरोज खान) से प्रेम विवाह कर लेती है. देव और यश( अश्विन धीर) बचपन के दोस्त हैं. साथ में पढ़े हैं और आज भी दोस्ती बरकरार है. यश अपनी प्रेमिका लीजा (डौली शाह) से शादी करते हैं. अब देव, अल्पना, यश और लीजा के बीच अपनापन है. पर देव के बच्चा पैदा करने में असमर्थता के चलते शादी के ग्यारह साल बाद भी अल्पना बांझ है. उसे ताने दिए जाते हैं. अल्पना व देव के बीच इतना प्यार है कि अल्पना चाहकर भी घर नहीं छोड़ना चाहती.

एक दिन देव के पिता यश को बुलाकर कह देते हैं कि यदि अल्पना मां नही बनी, तो वह उसकी हत्या कर देंगे. तब यश और लीजा मिलकर एक निर्णय लेते हैं, जिससे देव और अल्पना की पारिवारिक जिंदगी बर्बाद न हो. उसके बाद जब एक माह के लिए देव सिंगापुर जाते हैं, तभी एक रात यश चोरों की तरह अल्पना के घर में घुसकर उसे बेहोश कर उसका बलात्कार कर देते हैं. जब सुबह अल्पना होश में आती है, तो उस अपने साथ हुई घटना के लिए क्रोध आता है. वह देव को फोन पर सच बताना चाहती है, पर उसकी सहेली नियति उसे ऐसा करने से मना कर देती है. जिसके बाद अल्पना एक बेटे की मां बन जाती है.

बलात्कारी ने उसकी पारिवारिक जिंदगी को बचाने व उसे मां बनाने के लिए ही उसका बलात्कार किया था. लेकिन अल्पना का जमीर उसे ललकारता रहता है और वह अपने तरीके से पता लगाने की कोशिश करती है कि उसके साथ बलात्कार किसने किया. सच सामने आता है और अंततः यश की भी मौत हो जाती है. मगर तीन साल तक अल्पना अपने बेटे को अपना नही पाती.

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लेखन व निर्देनः

फिल्म के कुछ अच्छे संवादों को यदि दरकिनार कर दिया जाए, तो इसकी पटकथा में खामियां ही खामियां हैं. एक बेहतरीन कथा को बहुत ही घटिया अंदाज में पेश किया गया है. जहां तक निर्देशन का सवाल है, तो फिल्म देखकर लगता है कि यह किसी नौसीखिए ने अपने हाथ की सफाई की है. बतौर निर्देशक किरदार के अनुरूप सही कलाकारों का चयन नहीं किया गया है. फिल्म के एडिटर ने भी अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म का बंटाधार करने में कोई कसर नही छोड़ी. विषयवस्तु को देखते हुए फिल्म का नाम भी गलत है. फिल्म सिर्फ बोर करती है. लेखक व निर्देशक की अपनी कमियों के चलते फिल्म जिस मुद्दे पर बनायी गयी है. वह मुद्दा उभर कर आता ही नही है. फिल्म के सभी गाने जबरन ठूंसे हुए नजर आते हैं.

एक्टिंग

अल्पना के किरदार में कनुप्रिया शर्मा पूरी फिल्म में सिर्फ आंसू बहाते ही नजर आती हैं. कनुप्रिया शर्मा की प्रतिभा को पूरी तरह से जाया किया गया है. डौली आर्या प्रभावित नही कर पाती. फिरोज खान व अश्विन धीर का चयन गलत है. वह अपने अभिनय से निराश ही करते हैं.

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श्वेता तिवारी: बेटी बचाए या पति

टेलीविजन सीरियल ‘कसौटी जिंदगी की’ में प्रेरणा का किरदार निभा कर घरघर में अपनी पहचान बनाने वाली श्वेता तिवारी की निजी जिंदगी में फिर से तूफान आ गया है. वे फिर से तबाही का मंजर देख रही हैं. एक तरफ बेटी है तो दूसरी तरफ दूसरा पति. मां की जिंदगी कशमकश में है कि क्या किया जाए. आखिरकार श्वेता ने फैसला ले ही लिया है और पति की शिकायत समता नगर पुलिस स्टेशन में करा दी.

18 साल की उम्र में कर ली थी शादी

इस पूरे मामले को जानने से पहले यह समझ लें कि श्वेता तिवारी की जिंदगी में पहला भूचाल कब और कैसे आया था. श्वेता तिवारी का जन्म 4 अक्तूबर, 1980 को प्रतापगढ़ में हुआ था. टेलीविजन व फिल्मों की चकाचौंध से प्रभावित हो कर उन्होंने तब के भोजपुरी हीरो राजा चौधरी के साथ महज 18 साल की उम्र में साल 1998 में शादी कर ली थी. 2 साल बाद ही उन से एक बेटी पलक भी पैदा हो गई थी.

 

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A simple smile makes everything beautiful around you😃

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पति राजा चौधरी को दे चुकीं है तलाक

बाद में पता चला कि राजा चौधरी शराब पी कर अपना आपा खो बैठते थे और श्वेता तिवारी के साथ बदतमीजी से बोलने के अलावा मारपीट भी करते थे. वे शराब के नशे में अपनी बेटी पलक को भी जान से मारने की कोशिश करते थे. इन्हीं सब बातों से आजिज आ कर साल 2007 में श्वेता ने राजा चौधरी से तलाक ले लिया था.

अभिनव कोहली से साल 2013 में दूसरी शादी रचाई

 

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Happy Father’s Day !!!

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तलाक मिलने के बाद श्वेता तिवारी को अकेलापन खलने लगा तो तकरीबन 3-4 साल की डेटिंग करने के बाद उन्होंने अभिनव कोहली से साल 2013 में दूसरी शादी रचाई. साल 2016 में इन दोनों के एक बेटा रेयांश भी पैदा हुआ था.

जी हां, यह फिल्मी या टैलीविजन की कहानी नहीं है, पर हकीकत है. अब श्वेता तिवारी ने अपने दूसरे पति अभिनव कोहली पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाया है और उन के खिलाफ 11 अगस्त, 2019 को समता नगर पुलिस थाने में केस दर्ज कराया है.

श्वेता का ये है बयान

 

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Chérie❤️

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श्वेता तिवारी का कहना है कि 19 साला सौतेली बेटी पलक को उन के पति अभिनव कोहली अश्लील मैसेज दिखाते थे. साथ ही, वे पलक के साथ मारपीट भी किया करते थे. श्वेता तिवारी की शिकायत के बाद पुलिस ने अभिनव कोहली को गिरफ्तार कर लिया और उन से 4 घंटे तक पूछताछ की.

तकरीबन 2 साल से श्वेता और पति अभिनव के बीच कई विवाद चल रहे थे. हालांकि उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा, लेकिन एक झगड़े में अभिनव ने श्वेता की बेटी पलक को थप्पड़ मार दिया था, जिस के बाद वे चुप नहीं रहीं.

आरोप है कि 38 साला अभिनव कोहली साल 2017 से श्वेता की बेटी के साथ गंदी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे. कभीकभार मोबाइल पर बेहूदा फोटो भी दिखाते थे. वे बेटी से बराबर पूछते रहते थे कि तुम्हारा किसी से अफेयर चल रहा है क्या? कभीकभी वे बेटी के जिस्म को ले कर भी घटिया कमैंट करते थे.

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बेटी पलक ने बताई ये बातें

 

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❤️❤️❤️❤️ #nanhayatri @palaktiwarii

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11 अगस्त, 2019 को 19 साला बेटी पलक ने ये सब बातें अपनी मां को बताईं. इस के बाद श्वेता तिवारी ने समता नगर पुलिस स्टेशन जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई. बेटी पलक ने पुलिस को विस्तार से सबकुछ बताया कि उस के साथ क्याक्या हो रहा था.पुलिस ने यौन उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस मामले में अभिनव कोहली को पुलिस स्टेशन लाया गया और श्वेता व पलक की मौजूदगी में 4 घंटे तक पूछताछ की गई. बाद में अदालत से अभिनव कोहली को जमानत मिल गई.

पुलिसिया हिरासत में अभिनव कोहली के लिए नया सिरदर्द सौतेली बेटी बनेगी, ऐसा उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा. वहीं अब श्वेता तिवारी फिर उसी दोराहे पर हैं कि वे किस का पक्ष लें, बेटी बचाएं या पति.

स्पेन की राजधानी नार्वे में सम्मानित होंगे बोमन ईरानी

बौलीवुड एक्टर बोमन ईरानी को भारतीय सिनेमा में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए नार्वे में आयोजित होने वाले 17वें बौलीवुड फेस्टिवल में सम्मानित किया जाएगा. इस समारोह का आयोजन 6 सितंबर को ओस्लो में होगा.

बोमन ईरानी इस फेस्टिवल के इंटरैक्टिव सेमिनार का हिस्सा होंगे, जहां पर कुल हजार सिनेमा प्रेमी मौजूद होंगे. यहां वह सिनेमा के प्रति अपने जीवन और जुनून के बारे में बात करेंगे और वह अपने करियर से जुड़े कई ऐसे किस्से जाहिर करेंगे, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं.

बोमन ईरानी ने ट्वीट करके बताया- ‘‘17वें बौलीवुड फेस्टिवल नौर्वे‘‘ में अपने काम के लिए सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत ही गर्व की बात है. मैं उन सभी का शुक्रगुजार हूं, जो सालों से मेरे काम को पसंद करते आ रहे है. ऐसे लोगों ने मेरी सफलता में अमूल्य योगदान भी दिया है. वहां पर मौजूद दर्शकों के साथ बातचीत करने के लिए मैं बहुत उत्सुक हूं.’’

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बोमन ईरानी हमेशा से अपने अद्भुत प्रदर्शन और प्रतिष्ठित किरदारों के लिए पहचाने जाते हैं. मगर बहुत कम लोगों को पता होगा कि बोमन ईरानी ने अपने करियर की शुरूआत बतौर फोटोग्राफर की था. जबकि वह कौलेज के दिनों में थिएटर किया करते थे. फोटोग्राफी करते करते उन्होने कुछ विज्ञापन फिल्में की. विज्ञापन फिल्म के ही चलते बिना किसी प्रयास के उन्हें फिल्म ‘‘डरना मना है’’ में एक होटल मालिक का किरदार निभाने का मौका मिला.

इस फिल्म का एक सीन एडीटिंग रूम में देखकर बोमन ईरानी को 43 साल की उम्र में फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा ने बुलाकर उनके सामने फिल्म ‘‘मुन्नाभाई एम बीबीएस’’ में अभिनय करने का प्रस्ताव रखा था. इतना ही नही विधु विनोद चोपड़ा ने उन्हे इस फिल्म में अभिनय करने के के एवज में दो लाख रूपए दिए थे. ऐसे में अगर यह खबर फैले कि ‘‘मुन्नाभई एमबीबीबएस’ के अगले सीक्वअल में बोमन ईरानी नही होंगे, तो बोमन ईरानी कैसे चुप बैठते. उन्होंने इसी के चलते चार दिन पहले ट्वीट कर अपनी बात कह दी थी.

अब तक लगभग अस्सी फिल्मों में अभिनय कर चुके बोमन ईरानी ने 24 जनवरी 2019 में फिल्म निर्माता बनने का ऐलान करते हुए ट्वीट कर सभी को अपने प्रोडक्शन हाउस का नाम ‘‘ईरानी मूवी टोन’’ रखे जाने की सूचना दे चुके हैं.

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अथ माफिया पुराण

लेखक- प्रभाशंकर उपाध्याय

गुरुदेव ने जब आंखें खोलीं, तो अपने चेले जीवराज को सामने खड़ा पाया. उस के चेहरे की बेचैनी से गुरुजी भांप गए कि आज फिर कोई सवाल चेले को बेचैन किए हुए है.

गुरुजी मुसकराए और पूछा, ‘‘कहो जीवराज, सब ठीक तो है न?’’

‘‘नहीं गुरुदेव, सुबह की घटना से मेरा मन बेचैन है. हुआ यों कि आज भीख मांगने के लिए मैं एक नामीगिरामी सुनार की दुकान पर गया. वहां मैं कुछ देर तक इंतजार करता रहा. दुकानदार मुझे कुछ देने के लिए अपने गल्ले में हाथ डाल ही रहा था कि 2 मोटेतगड़े आदमी वहां आए और बोले, ‘भाई ने सलाम बोला है.’

‘‘उन्हें देख कर वह सुनार कांपने लगा. उस ने फौरन तिजोरी खोली और नोटों की कुछ गड्डियां उन की तरफ बढ़ा दीं, जिन्हें उठा कर वे दोनों हंसते हुए चले गए.

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‘‘हे गुरुदेव, जब मैं ने उस सुनार से भीख देने के लिए दोबारा कहा, तो अपने चेहरे का पसीना पोंछना छोड़ कर उस ने मुझे दुत्कार दिया.

‘‘गुरुदेव, सुनार के इस रवैए से मैं बहुत दुखी हुआ और भीख मांगने के लिए आगे न जा सका. हम साधु लोग एकाध रुपए की भीख के लिए दसियों बार आशीर्वाद देते हैं और बदले में हमें कई बार बेइज्जती का सामना करना पड़ता है. अब तो मुझे इस काम से नफरत होने लगी है…’’ यह कह कर चेले जीवराज ने सवाल किया, ‘‘गुरुजी, कृपा कर के मुझे बताएं कि वे दोनों मोटेतगड़े आदमी कौन थे?’’

चेले जीवराज की बात सुन कर गुरुजी ने कुछ देर ध्यान लगाया, फिर आंखें खोल कर कहने लगे, ‘‘सुन बच्चा, वे दोनों आदमी एक माफिया गिरोह के सदस्य थे, जो हफ्तावसूली के लिए

आए थे. ‘भाई’ उन के सरगना का पद नाम है.’’

यह सुन जीवराज चौंक कर बोला, ‘‘माफिया… हां, यह शब्द मैं ने भी सुना है. क्या यह सच है कि अगर ऊपर वाला भी अपनी फौज ले कर आ जाए तो उस की भी माफिया के मुखिया और उस के गिरोह के सामने नहीं चलेगी?’’

गुरुजी मजाकिया लहजे में बोले, ‘‘पहले तू माफिया की कहानी सुन, उस के बाद ही किसी फैसले पर पहुंचना.

‘‘जीवराज, इटली के सिसली शहर में माफिया का जन्म हुआ. वहां शराबखानों, जुआघरों, कोठों, नशीली दवाओं व हथियारों की तस्करी के

धंधे से जुड़े गिराहों को ‘माफिया’

कह कर पुकारा जाने लगा.

‘‘धीरेधीरे ऐसे गिरोहों के मुखिया को ‘किंग’, ‘डौन’ या ‘गैंगस्टर’ नाम से पुकारा जाने लगा. इस के बाद माफिया ने नए इलाकों में भी पकड़ बढ़ा ली, जैसे जमीन माफिया, पानी माफिया, मकान माफिया, सैक्स माफिया, शिक्षा माफिया, फिल्म माफिया, पर्यटन माफिया, झोंपड़पट्टी माफिया वगैरह. हर बड़े शहर में कम से कम ऐसे 15-20 तरह के माफिया गिरोह होते हैं.

‘‘वत्स, अब आगे ध्यान से सुन. माफिया गिरोह का मुखिया हमेशा वेश बदल कर अपने गैंग को चलाता है. आमतौर पर वह सामाजसेवक, नेता या साधुसंत का रूप धरे रहता है. उस की प्रशासन, राजनीति, इंडस्ट्री, फिल्म और कारोबार जगत में गहरी पैठ होती है. वह इन की हर बात पर असर डालता रहता है. वह देशविदेश में बड़ी आसानी से आजा सकता है और कहीं भी रह कर अपने गिरोह को चलाते हुए जायदाद को संभालता है.

‘‘अब तो इस काम में ‘इंटरनैट’ भी कारगर साबित हुआ है. कुछ माफिया ने तो अपनी ‘वैबसाइट’ भी इंटरनैट पर डाल दी है. गलती से अगर कोई माफिया मुखिया जेल चला जाए, तो उस की बीवी भी गिरोह चलाने की कूवत रखती है.

‘‘हे वत्स, अब मैं माफिया के कामकाज के तरीकों के बारे में बताता हूं. ये गिरोह हमेशा डर का माहौल बना कर काम करते हैं. किसी भी देश की कानून व्यवस्था से अलग इन की अपनी दुनिया होती है, सो इंगलिश में इन्हें ‘अंडरवर्ल्ड’ पुकारा जाता है.

‘‘धौंस दे कर ये गिरोह समाज के अलगअलग तबके से अपनी ‘चौथवसूली’ करते हैं. हत्या की ‘सुपारी’ लेते हैं. इन गिरोहों के सदस्य, जिन्हें ‘शूटर’ कहा जाता है, एक इशारे पर किसी का भी खून कर देते हैं. माफिया की बोली में इस काम को ‘टपका देना’, ‘गेम बजा देना’ या ‘शूटआउट कर देना’ कहते हैं.

‘‘अब इंटरनैट पर भी हत्याओं के लिए सुपारी ली जाने लगी है. आम आदमी को टपका देने के लिए 8-10 लाख रुपए और खास लोगों के लिए

5 करोड़ रुपए तक की सुपारी ली जाती है. जख्मी कर देने की दरें वैबसाइट पर अलग से तय हैं.

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‘‘हे जीवराज, सोना, शराब, नशीली चीजें, हथियार वगैरह की तस्करी, सरकारी या गैरसरकारी जमीन पर कब्जे के अलावा किसी देश या राज्य में आतंक फैलाने, वहां की सरकार को हिला देने, चुनावों में अपनी मनमरजी चलाने, स्कूलकालेजों में दाखिले और डिगरी दिलाने, फिल्म बनाने के लिए फाइनैंस और हीरोहीरोइनों को चुनने का आर्डर देने जैसे काम माफिया गिरोहों द्वारा किए जाते हैं. मीडिया भी इन का गुणगान करने से पीछे नहीं रहता है.

‘‘इन लोगों के कारनामों पर ‘गौडफादर’ नाम का इंगलिश उपन्यास व हिंदी फिल्म ‘गौडमदर’ बन चुकी है.’’

माफिया के बारे में इतना सुन कर जीवराज ने पूछा, ‘‘हे गुरुदेव, सरकारें और पुलिस इन की ऐसी हरकतों पर लगाम क्यों नहीं लगा पातीं?’’

‘‘प्रशासन और पुलिस हमेशा सही समय का इंतजार करती है. मतलब, पाप का घड़ा भरेगा तो फूटेगा. घड़ा कभी भरता नहीं, सो सही समय कभी आता ही नहीं.’’

यह सुन कर चेला तेजी से उठ कर कहीं जाने लगा, तो गुरुदेव ने पूछा, ‘‘अरे वत्स, कहां चल दिए?’’

‘‘गुरुवर, अब मैं यहां एक पल

भी नहीं ठहरूंगा. मैं किसी ताकतवर माफिया गिरोह की तलाश में जा रहा हूं, ताकि उस में शामिल हो कर अपनी जिंदगी कामयाब कर सकूं.’’

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आज भी इतनी सस्ती है दलितों और पिछड़ों की जिंदगी!

दलितों और पिछड़ों की जिंदगी आज भी इतनी सस्ती है कि लोग राह चलते जोड़ों को पकड़ कर जाति पूछ कर उन की लड़की का मजे में रेप कर सकते हैं और देश व समाज की भौंहों पर एक बल भी नहीं पड़ता. कश्मीरकश्मीर चिल्लाने वाले, मंदिर को बचाने वाले न जाने कहां चले जाते हैं जब एक दलित व पिछड़ी जाति की लड़की का बलात्कार दिन में उस के साथी के साथ हो रहा होता है.

राजस्थान के बांसवाड़ा में 13 जुलाई को एक दलित लड़की जो अपने साथी के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही थी, को सुनील, विकास व जितेंद्र नाम के लड़कों ने पकड़ लिया. जाति तो पूछने पर ही पता चली होगी पर जैसे ही पता चली उन्होंने लड़के को भगा दिया और 5 जनों ने बारीबारी से उस लड़की का वहशियाना तरीके से रेप किया क्योंकि उन की समझ में दलित लड़की का रेप तो समाजसम्मत है.

दलित लड़की को इस समाज पर, कानून पर जरा भी भरोसा नहीं था और उस ने अस्पताल में जा कर इलाज तो करा लिया, पर रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. लड़के ने गांव आ कर आत्महत्या कर ली और पुलिस तो लड़की तक आत्महत्या की छानबीन पर पहुंची. फिल्म ‘पद्मावत’ पर होहल्ला मचाने वाले हजारों की भीड़ नदारद थी जब इन लड़कों को पकड़ा गया. कश्मीर पर ढोल बजाने वालों को दलित लड़की के बलात्कार से कोई फर्क नहीं पड़ा था.

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राजस्थान में कहीं भी निर्भया जैसे कैंडल मार्च नहीं निकले क्योंकि लड़की दलित थी. यह लड़की गर्भवती थी और इस बलात्कार से उस का बच्चा मर गया पर पक्की बात है कि 5-10 साल बाद जब फैसला होगा तब तक सारे गवाह मुकर जाएंगे. मोबाइल रिकौर्ड गायब हो जाएंगे. पुलिस वाले बयान बदल चुके होंगे. लड़की की खुली अदालत में 10-15 बार जम कर खिंचाई होगी. उस के घर वालों के मुंह पर 2-4 हजार रुपए मार कर कहा जाएगा कि चुप हो जाओ. धमकियां दी जाएंगी. पति तो मर गया, लड़के व लड़की दोनों के घर वालों को पैसेपैसे के लिए तरसा दिया जाएगा और जब मौका मिलेगा उन की जम कर पिटाई होगी.

आबादी का 70-80 प्रतिशत होते हुए भी दलित पिछड़े आज भी वैसे ही गुलाम हैं. जैसे मुसलमानों व अंगरेजों के जमाने में थे. गुलाम बनाने वाले राजाओं और शासकों ने काजियों व मजिस्ट्रेटों की अदालतें तो बनाई थीं, कोतवाल व पुलिस वाले बनाए थे पर आज के पौराणिक राज में दलित व पिछड़ों को यह भी नसीब नहीं है. उसे कहा जाता है कि वह पिछले जन्म के पापों का फल भुगते. वह सेवा करे. गुलामी करे. अपनी जवान लड़कियों को सौंपे. कुछ पिछड़े अब अपने को ठाकुर कह कर वैसा ही बरताव करने लगे हैं पर उन की पूरी बिरादरी को यह नसीब नहीं. यह तो केवल सत्ता के करीबों को मिल रहा है. इस रेप का नाम कोई रेप कांड नहीं बनेगा क्योंकि यह तो धर्म मान्य है, देश का रिवाज है.

पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों पर बढ़ते मारपीट के मामलों के पीछे ह्वाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक बहुत हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि ये अफवाहों, अश्लीलता, गंदीभद्दी गालियों, जातिसूचक बकवास को दूरदूर तक ले जाते हैं. पहले जो बात गांव की चौपाल के पास के पेड़ के नीचे तक, शहर में महल्ले की चाय की दुकान या कालेज की कैंटीन तक रहती थी, अब मीलों, सैकड़ों मीलों, चली जाती है. यह मानना पड़ेगा कि ऊंची जातियों के पढ़ेलिखों में ऐसे बहुत से सोशल मीडिया लड़ाकू हैं जो तुर्कीबतुर्की जवाब देने में माहिर हैं. वे सैकड़ों में सही साफ बात कहने वाले की खाल उतार देते हैं. उन के पास सच नहीं होता तो वे झूठ पर उतर आते हैं, उन के पास जवाब नहीं होता तो गाली पर उतर आते हैं. वे बारबार पाकिस्तान भेजने की धमकी दे सकते हैं.

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इन सोशल मीडिया बहादुरों ने चाहे कभी मजदूरी न की हो, कोई सामान न ढोया हो, किसी सीमा पर पहरेदारी न की हो, कुछ देश के लिए बनाया न हो, पर ये देशभक्त ऐसे बने रहते हैं मानो भारत इन की वजह से एक है और सैनिक, व्यापारी, किसान, मजदूर, बेरोजगार से ये ज्यादा देश के लिए मर रहे हैं. इन के पास पढ़ेलिखों का मुंह बंद करने की ताकत आ गई है क्योंकि ये शोर मचा कर सही बात को कुचल सकते हैं. इन के पास समय ही समय है इसलिए ये हर तरह की टेढ़ीमेढ़ी बात गढ़ सकते हैं. ये दलितों के अत्याचारों की कहानियां बना सकते हैं. ये मुसलमानों द्वारा की गई हत्याओं की झूठी कहानियों को ऐसे फैला सकते हैं मानो ये वहीं खड़े थे. दलितों की पिटाई पर ये शिकायत करने वाले की खाल खींच सकते हैं.

ये आदतें इन्हें पीढि़यों से मिली हुई हैं. पीढि़यों से उलटीसुलटी कहानियां कहकह कर ही देशभर में झूठ के मंदिर फैले हुए हैं और वहां से इन लोगों को अच्छी आमदनी होती है. वास्तु, भविष्य, टोनेटोटके, कुंडली, हवनपूजन के नाम पर इन की आमदनी पक्की है. चूंकि पढ़ाई में अच्छे होते हैं, किताबें इन के हिसाब से बनती हैं, इन्हीं के साथी परीक्षा लेते हैं, नौकरियां इन को ही मिलती हैं. जो आरक्षण पा कर कुछ ले रहे हैं वे डरेसहमे रहते हैं, चुप रहते हैं, उन के मुंह से बस ‘जी हुजूर’, ‘जय भीम’, ‘जय अंबेडकर’ निकलता है.

वैसे भी पिछड़ों और दलितों के तो मन में गहरे बैठा है कि वे तो पिछले जन्मों के पापों का फल भोग ही रहे हैं, अगर उन्होंने इन लोगों को जवाब दिया तो उन का हाल शंबूक और एकलव्य जैसा होगा, उन्हें मरने के लिए घटोत्कच की तरह आगे कर दिया जाएगा.

वे तो आज भी गंदे सीवर में डूब कर उसे साफ करने भर लायक हैं. वे ट्विटर, फेसबुक, ह्वाट्सएप की तो छोडि़ए एक पोस्टर भी नहीं पढ़ने की हिम्मत रखते. वे क्या मुंहतोड़ जवाब देंगे. और जवाब नहीं दोगे तो बोलने वाले की हिम्मत बढ़ेगी ही, वह मुंह भी चलाएगा और हाथपैर भी चलाएगा ही.

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क्या मायावती उत्तर प्रदेश में विपक्ष को कमजोर करना चाहती हैं?

सैयद फैज़ान मुसन्ना (लखनऊ)

मायावती उत्तर प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी से दोस्ताना उनकी मजबूरी है. उनका फौरी राजनैतिक लक्ष्य यूपी में नंबर दो यानी प्रमुख विपक्षी दल बनना है. ये काम समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस को कमजोर करके ही हो सकता है. यानी मौजूदा समय में बीएसपी के राजनीतिक हमलों की धार सपा और कांग्रेस के खिलाफ ही रहने वाली है.

मायवती ऐसा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दबाव में भी करने को मजबूर हैं. उन्हे भाजपा का विरोध करने का अंजाम भी खूब मालूम है. इसीलिए वह केंद्र सरकार की अर्थिक और कश्मीर नीति तथा अनुच्छेद 370 के हटाये जाने का भी समर्थन कर रहीं है. ऐसे तमाम उदाहरण है जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे कहीं न कहीं दबाव में हैं.

लोकसभा चुनाव से पहले हुए तीन राज्यों छतीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में मायावती की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे. उस वक्त ये आरोप लगा था कि बीएसपी इन राज्यों में भाजपा को जिताने के काम कर रही है. बसपा ने जिस तरह से टिकट बांटे, उससे कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को लाभ मिलना तय था. दरअसल मायावती पर केंद्र का साफ-साफ दबाव है. उनके भाई की आर्थिक मामलों में घेरेबंदी हो चुकी है. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट उनके पीछे है. मायावती अगर भाजपा से ज्यादा विरोध करने लगीं तो सरकार सख्ती कर सकती हैं. भाजपा के धुर विरोधी लालू यादव के बाद चिदम्बरम उनके सामने दूसरा उदाहरण हैं.

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अखिलेश और मायावती की जुगल बंदी का परिणाम…
भाजपा ने यह 2019 में आम चुनावों में उत्तर प्रदेश में अखिलेश और मायवती के गठबंधन से लगे झटकों के बाद मायावती को खासतौर से अपने टारगेट पर ले लिया है. उत्तर प्रदेश ही है, जहां बीजेपी को 9 सीटों का नुकसान हुआ. 2014 में यूपी में बीजेपी को 71 सीटें मिली थीं. इस बार उसकी जीती हुई सीटों की संख्या घटकर 62 रह गईं. वह भी तब जबकि 2017 में यूपी में बीजेपी की सरकार बन चुकी थी. ऐसा सिर्फ इसलिए संभव हुआ क्योंकि सपा-बसपा का गठबंधन था.

इसके बावजूद बसपा की मुखिया मायावती ने न सिर्फ समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ा बल्कि कई मुद्दों पर वे भाजपा के समर्थन में दिखी. ताजा मामला कश्मीर में विपक्षी दलों के दौरे का है, जिसे लेकर मायावती खुलकर भाजपा के साथ खड़ी हो गई हैं. कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन करते हुए उन्होंने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का भी हवाला दे दिया. वे यहीं तक नहीं रुकीं बल्कि भाजपा से ज्यादा कड़ा हमला विपक्षी नेताओं पर किया. मायावती ने कश्मीर की उस जनता के पक्ष में कुछ नहीं कहा जो पिछले कई हफ्ते से घाटी में कैद है.

मायावती पर बीजेपी का दबाव
इसी वजह से मायावती बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं. लोकसभा चुनाव में उनके मूल वोट बैंक का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ जा चुका है. मुस्लिम उनके साथ पूरी ताकत से इसलिए भी था क्योंकि वे सपा के साथ गठबंधन में थी. अब गठबंधन टूटने के बाद मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी की तरफ गया तो बसपा के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा. इसलिए उनके सामने बड़ी चुनौती आने वाले उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को किसी भी तरह शिकस्त देना है.

दरअसल उत्तर प्रदेश में लड़ाई नंबर दो की ज्यादा है. उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में राजनैतिक-सामाजिक समीकरण कौन बेहतर ढंग से बना सकता है. इस पर भी बहुत कुछ निर्भर होगा. बसपा को भाजपा से समर्थन लेने में कोई दिक्कत भी नहीं आनी है. जबकि समाजवादी पार्टी के सामने यह विकल्प नहीं है. उत्तर प्रदेश में बड़ी राजनैतिक लड़ाई फिलहाल सपा और बसपा के ही बीच होनी है.

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अगर मायावती विधानसभा के उप-चुनाव में पूरी ताकत झोंकने जा रही हैं तो हैरान नहीं होना चाहिए. उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार कई मोर्चों पर घिरी हुई है. ऐसे में ये उपचुनाव उसके लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल बन गए हैं. अगर भाजपा किसी विधानसभा क्षेत्र में खुद को कमजोर स्थिति में पायेगी तो बसपा को जरूर फायदा पहुंचाने का प्रयास कर सकती है. इसलिए मायावती ने अगर कश्मीर पर केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया है तो यह अनायास नहीं है. मायावती इस समय भाजपा की मदद कर कांग्रेस पर हमला बोल रही हैं, इसलिए भाजपा भी उनका ध्यान रख रही है.

ऐसे कैसे डिजिटल इंडिया पर पीएम मोदी का सपना होगा साकार

एक ओर तो देश में डिजिटल इंडिया को बढ़ाने की बात की जा रही है वहीं दूसरी ओर ग्राहक की जेब ढीली की जा रही है. कई तरह के औनलाइन ट्रांजिक्शन में हमें ज्यादा रकम देनी पड़ती है. वहीं उपभोक्ता इस तरह के लेन-देन से बचता है और कैश की तरफ ज्यादा होता है. ऐसा ही हुआ औनलाइन टिकट बुकिंग पर.

IRCTC द्वारा जारी किए गए 30 अगस्त के आदेश के अनुसार अब गैर-एसी क्लास के लिए 15 रुपये प्रति टिकट और AC क्लास के लिए 30 रुपये प्रति टिकट सेवा शुल्क वसूला जाएगा. यहां आपको बता दें कि जीएसटी अलग से वसूला जाएगा. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार डिजिटल इंडिया परियोजना के तहत डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए तीन साल पहले सेवा शुल्क वापस ले लिया गया था.

इससे पहले IRCTC नौन-एसी (non AC) ई-टिकट पर 20 रुपये और एसी क्लास के लिए 40 रुपये का सर्विस चार्ज वसूलता था. इस महीने की शुरुआत में, रेलवे बोर्ड ने इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कौरपोरेशन (IRCTC) को औनलाइन टिकट बुक करने वाले यात्रियों से सर्विस चार्ज के फिर से वसूलने के लिए मंजूरी दे दी थी. 30 अगस्त को लिखे पत्र में, रेलवे बोर्ड ने कहा था कि आईआरसीटीसी (रेलवे की पर्यटन शाखा) ने ई-टिकट की बुकिंग पर सेवा शुल्क की बहाली के लिए एक विस्तृत मामला बनाया था और जिसकी जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई थी.

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देश की आजादी के बाद दो बार ऐसा वक्त आया था जिसको इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक फेरबदल कहा जाता है. मेरे अनुसार साल 1975 जब देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी. मोरार जी देसाई उस वक्त प्रधानमंत्री बने थे. हालांकि देसाई पांच साल सरकार नहीं चला पाए.

खैर, दोबारा बड़ा राजनीतिक बदलाव आया साल 2014 को जब पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया और एनडीए पूर्ण बहुमत से केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बनी. पीएम मोदी का पहला भाषण हुआ लाल किले की प्राचीर से. लोगों को बहुत आकांक्षाए थी कि पीएम मोदी क्या करेंगे. खैर इन सब बातों के अलावा अब मैं वो बात बताने जा रहा हूं जिसके लिए इतनी बड़ी भूमिका बांधी गई.

पीएम मोदी जब पीएम बनें तो देश को एक उम्मीद जगी. क्योंकि देश कांग्रेस राज में घोटाले सुन सुनकर थक चुका था. अब वक्त था कि गुजरात मौडल की छवि दिखाकर देश के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी से जनता वही उम्मीद कर रही थी. वो भारत को भी गुजरात के माफिक ही बदलते हुए देखना चाहती थी. पीएम मोदी के तमाम सपनों में एक सबसे बड़ा सपना था डिजिटल इंडिया.

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डिजिटल इंडिया के जरिए पीएम मोदी लेन-देन में पारदर्शिता लाने चाहते थे. इस अभियान के तहत शिक्षा, अस्‍पताल समेत सभी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं और सरकारी दफ्तरों को गांव से देश की राजधानी से जोड़ा जाएगा. जिसके लिए 2019 तक 2.5 लाख गांवों में ब्रौडबैंड सेवा उपलब्ध होगा. जिसके माध्यम से आम आदमी सरकार से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ेगा. इसके अलावा सरकार देशभर में वाई-फाई की सुविधा उपलब्ध कराएगी. ताकि आम आदमी को किसी भी काम के लिए इंतजार न करना पड़े. इसके साथ ही सारे काम औनलाइन होने से कागज की भारी बचत होगी जिससे पर्यावरण को भी फायदा होगा.

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