Extra Marrital Affair: मुझे शक है कि मेरे पति किसी लड़की के साथ होटल जाते हैं

Extra Marrital Affair: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं रोहतक की रहने वाली हूं और मेरी उम्र 29 साल है. 2 साल पहले ही मेरी शादी हुई है और मेरे पति एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब करते हैं. हमारे घर में मैं, मेरे पति और मेरे सासससुर रहते हैं. मुझे शक है कि मेरे पति का उन के औफिस में किसी लड़की से साथ अफेयर चल रहा है, क्योंकि एक बार उन के फोन में मैं ने एक होटल के रूम की बुकिंग हुई देखी थी. मेरे पूछने पर उन्होंने बताया था कि वह बुकिंग उन्होंने अपने एक दोस्त के कहने पर उस के लिए की थी. मैं उन की बात को सच मान चुकी थी, लेकिन हाल ही में मेरे पति का फोन स्विच औफ था, तो मैं ने उन के औफिस में फोन मिलाया, तो पता चला कि वे उस दिन औफिस ही नहीं गए थे, लेकिन घर से तो वे यही कह कर निकले थे कि वे औफिस जा रहे हैं और उसी शाम वे जिस टाइम औफिस से आते हैं, उसी टाइम घर भी वापस आए. मुझे लग रहा है कि वे किसी लड़की के साथ होटल जाते हैं और मुझे धोखा दे रहे हैं. मैं क्या करूं?

जवाब –

आप की समस्या काफी चिंताजनक है , क्योंकि अगर यह बात सच निकली कि आप के पति का किसी के साथ अफेयर चल रहा है, तो आप की बसीबसाई गृहस्थी उजड़ सकती है. ऐसे में आप को शांत दिमाग से काम लेना है. आप को सब से पहले जिस होटल की बुकिंग आप ने अपने पति के फोन में देखी थी, उस होटल में जा कर पूछताछ करनी चाहिए कि क्या सच में आप के पति उस दिन उस होटल में थे या उन्होंने अपने किसी दोस्त के लिए बुकिंग की थी.

इस के अलावा आप अपने पति से बिना सुबूत के इस बारे में कोई बात मत कीजिए. आप उन के औफिस में अगर किसी को जानती हैं तो उन से बात कर पता लगाइए कि क्या आप का शक सही है. अगर आप का शक सही निकला तो आप अपने पति को प्यार से समझाइए कि वे अपनी शादीशुदा जिंदगी किसी के लिए बरबाद न करें.

आप के पास 2 औप्शन होंगे. या तो आप हिम्मत कर के अपने पति पर फिर से भरोसा कीजिए, ताकि आप की शादीशुदा जिंदगी बरबाद न हो, या फिर आप ऐसे पति से छुटकारा ले लीजिए, जो शादीशुदा होने के बावजूद बाहर मुंह मार रहा है. फैसला आप के हाथों में है.

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Murder Mystery: शादीशुदा आशिकी का खूनी अंजाम

Murder Mystery: आशा पति से जिन संबंधों को छिपा कर उस की नजरों में पाक साफ बनी रहना चाहती थी, प्रेमी की हत्या करने के बाद उन संबंधों के बारे में पति को ही नहीं पूरी दुनिया को पता चल गया…

उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के थाना औरास के अंतर्गत आने वाले गांव गागन बछौली का रहने वाला उमेश कनौजिया बहुत ही हंसमुख और मिलनसार स्वभाव का था. इसी वजह से उस का सामाजिक और राजनीतिक दायरा काफी बड़ा था. उन्नाव ही नहीं, इस से जुड़े लखनऊ और बाराबंकी जिलों तक उस की अच्छीखासी जानपहचान थी. वह अपने सभी परिचितों के ही सुखदुख में नहीं बल्कि पता चलने पर हर किसी के सुखदुख में पहुंचने की कोशिश करता था. उस की इसी आदत ने ही उसे इतनी कम उम्र में क्षेत्र का नेता बना दिया था. मात्र 25 साल की उम्र में वह जिला पंचायत सदस्य बना तो इस उम्र का कोई दूसरा सदस्य पूरे जिले में नहीं था.

नेता बनने की यह उस की पहली सीढ़ी थी. वह और आगे बढ़ना चाहता था, इसलिए उस ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था. वैसे तो उस ने यह चुनाव भाजपा के समर्थन से जीता था, लेकिन उस के संबंध लगभग हर पार्टी के नेताओं से थे. इस की वजह यह थी कि उस की कोई ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं थी कि लोग उसे नेता मान लेते. उस के पिता सूबेदार कनौजिया दुबई में नौकरी करते थे. उमेश भी पढ़लिख कर नौकरी करना चाहता था, लेकिन जब उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली तो वह छुटभैया नेता बन कर गांव वालों की सेवा करने लगा. उसी दौरान उस की जानपहचान कुछ नेताओं से हुई तो वह भी नेता बनने के सपने देखने लगा. उस का यह सपना तब पूरा होता नजर आया, जब जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने पर भाजपा ने उस का समर्थन कर दिया.

उमेश अपनी मेहनत और जनता की सेवा कर के नेता बना था. वह राजनीति में लंबा कैरियर बनाना चाहता था, इसलिए अपने क्षेत्र की जनता से ही नहीं, क्षेत्र के लगभग सभी पार्टी के नेताओं से जुड़ा था. उस का सोचना था कि कभी भी किसी की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में उस के निजी संबंध ही काम आएंगे. इस का उसे लाभ भी मिल रहा था. बसपा के सांसद ब्रजेश पाठक उसे भाई की तरह मानते थे. उन्नाव के विकास खंड औरासा के वार्ड नंबर 2 से जिला पंचायत सदस्य चुने जाने के बाद उमेश ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा था. अपनी कार्यशैली की वजह से ही वह कम समय में लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया था.

उत्तर प्रदेश का जिला उन्नाव लखनऊ और कानपुर जैसे 2 बड़े शहरों को जोड़ने का काम करता है. यह लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर है तो कानपुर से मात्र 20 किलोमीटर दूर. एक तरफ प्रदेश की राजधानी है तो दूसरी ओर कानपुर जैसा महानगर है. इस के बावजूद इस की गिनती पिछड़े जिलों में होती है. शायद यही वजह है कि यहां नशा और अपराध अन्य शहरों की अपेक्षा ज्यादा हैं. जिला भले ही पिछड़ा है, लेकिन कानपुर और लखनऊ की सीमा से जुड़ा होने की वजह से यहां की जमीन काफी महंगी है. इसलिए यहां के लोग अपनी जमीनें बेच कर अय्याशी करने लगे हैं. इस के अलावा गांवों के विकास के लिए पंचायती राज कानून लागू होने की वजह से गांवों में सरकारी योजनाओं का पैसा भी खूब आ रहा है, जिस से पंचायतों से जुड़े लोग प्रभावशाली बनने लगे हैं.

यही सब देख कर युवा चुनाव की ओर आकर्षित होने लगे हैं. वे चुनाव जीत कर समाज और राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं. उमेश कनौजिया भी कुछ ऐसा ही सोच नहीं रहा था, बल्कि इस राह पर उस ने कदम भी बढ़ा दिए थे. लेकिन उस का यह सपना पूरा होता, उस के साथ एक हादसा हो गया. 14 नवंबर, 2013 की सुबह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना मलिहाबाद के गांव गढ़ी महदोइया के लोगों ने गांव के बाहर शारदा सहायक नहर के किनारे एक लाश पड़ी देखी. मृतक यही कोई 25-26 साल का था. वह धारीदार सफेदनीला स्वेटर, नीली जींस और हरे रंग की शर्ट पहने था. उस के दाहिने हाथ में कलावा बंधा था, जिस का मतलब था कि वह हिंदू था. उस के गले पर रस्सी का निशान साफ नजर आ रहा था. जिस से साफ था कि उस की हत्या की गई थी. हालांकि उस के दाहिने गाल से खून भी बह रहा था.

लाश से थोड़ी दूरी पर एक पैशन प्रो मोटरसाइकिल भी पड़ी थी, जिस का नंबर यूपी 32 ईवाई 1778 था. उस में चाबी लगी थी. पहली नजर में देख कर यही कहा जा सकता था कि यह दुर्घटना का मामला है. लेकिन गले पर जो रस्सी का निशान था, उस से अंदाजा साफ लग रहा था कि यह एक्सीडेंट नहीं, हत्या का मामला  है. जिन लोगों ने लाश देखी थी, उन्हें लगा कि यह हत्या का मामला है तो उन्होंने इस बात की सूचना ग्रामप्रधान को दी. उस समय सुबह के यही कोई 7 बज रहे थे. ग्रामप्रधान के पति राजेश कुमार ने नहर के किनारे लाश पड़ी होने की सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दी तो एसएसआई श्याम सिंह सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर उन्होंने लाश की शिनाख्त करानी चाही, तो वहां जमा लोगों में से कोई भी उस की पहचान नहीं कर सका. लाश के कपड़ों की तलाशी में भी ऐसा कोई सामान नहीं मिला, जिस से उस की पहचान हो पाती. मोटरसाइकिल के नंबर से अंदाजा लगाया गया कि मृतक लखनऊ का रहने वाला है, क्योंकि उस पर पड़ा नंबर लखनऊ का ही था. संयोग से मोटरसाइकिल की डिग्गी खोली गई तो उस में से उस के कागजात मिल गए. मोटरसाइकिल उमेश कनौजिया के नाम रजिस्टर्ड थी. उस पर पता एकतानगर, थाना ठाकुरगंज, लखनऊ का था. इस से साफ हो गया कि मारा गया युवक लखनऊ का ही रहने वाला था.

थाना मलिहाबाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मेडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद एसएसआई श्याम सिंह ने घटना की सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को एकता नगर भेज दिया. थाना मलिहाबाद के सिपाहियों ने थाना ठाकुरगंज के एकतानगर पहुंच कर उमेश कनौजिया के बारे में पता किया तो वहां पर उस की मौसी शशिकला मिलीं. पुलिस वालों ने जब उमेश की लाश मिलने की बात उन्हें बताई तो वह बेहोश हो गईं. घर वाले पानी के छींटे मार कर उन्हें होश में ले आए तो उन्होंने बताया, ‘‘उमेश हमारी बहन का बेटा है. वह उन्नाव का रहने वाला है. जब वह मेरे यहां रह कर पढ़ाई कर रहा था, तभी उस ने यह मोटरसाइकिल खरीदी थी. इसीलिए उस के कागजातों में मेरा पता लिखा है.’’

इस के बाद पुलिस वालों ने शशिकला से उमेश के घर वालों का फोन नंबर ले कर उमेश की मौत की सूचना उस के घर वालों को दी. सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद ही उमेश के घर वाले थाना मलिहाबाद पहुंच गए. उमेश के पिता सूबेदार कनौजिया ने उमेश की हत्या किए जाने की बात कह कर 2 लड़कों के नाम भी बताए. लेकिन थाना मलिहाबाद पुलिस का कहना था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाएगा. इस पर उमेश के घर वाले भड़क उठे. धीरेधीरे यह बात फैलने लगी कि जिला पंचायत सदस्य उमेश कनौजिया की हत्या हो गई है और थाना मलिहाबाद पुलिस मुकदमा दर्ज करने में आनाकानी कर रही है. मलिहाबाद उन्नाव की सीमा से जुड़ा है, इसलिए खबर मिलने के बाद मृतक उमेश की जानपहचान वाले थाना मलिहाबाद पहुंचने लगे.

15 नवंबर, 2013 की सुबह से ही हत्या का मुकदमा दर्ज करने के लिए धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. अब तक शव घर वालों को मिल चुका था. घर वालों ने बसपा सांसद ब्रजेश पाठक, भाजपा के पूर्व विधायक मस्तराम, किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह के नेतृत्व में रहीमाबाद चौराहे पर लाश रख कर रास्ता रोक दिया. सांसद ब्रजेश पाठक का कहना था कि समाजवादी पार्टी के राज में पुलिस आम जनता की नहीं सुन रही है, इसलिए ऐसा करना पड़ रहा है. जाम लगने से आनेजाने वाले ही नहीं, रहीमाबाद कस्बे के लोग भी परेशान हो रहे थे. जाम लगाने वाले लोग उमेश कनौजिया के हत्यारों को गिरफ्तार करने, थाना मलिहाबाद के इंसपेक्टर जे.पी. सिंह को निलंबित करने, पीडि़त परिवार को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने और उमेश के छोटे भाई सुधीर को सरकारी नौकरी देने की मांग कर रहे थे. जाम का नेतृत्व कर रहे नेताओं को लग रहा था कि उन के इस आंदोलन से राजनीतिक लाभ मिल सकता है, इसलिए वे आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे.

जाम लगाए लोगों को हटाने के लिए रहीमाबाद चौकी के प्रभारी अनंतराम सिपाही ज्ञानधर यादव, छेदी यादव, अशोक और होमगार्ड श्रीपाल यादव को साथ ले कर वहां पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने अनंतराम और उन के साथ आए सिपाहियों के साथ मारपीट कर के उन्हें भगा दिया. इस बात की सूचना लखनऊ के एसपी (ग्रामीण) सौमित्र यादव, क्षेत्राधिकारी (मलिहाबाद) श्यामकांत त्रिपाठी और इंसपेक्टर (मलिहाबाद) जे.पी. सिंह को मिली तो आसपास के 3 थानों की पुलिस रहीमाबाद भेज दी गई. काफी समझानेबुझाने और भरोसा दिलाने के बाद लगभग 4 घंटे बाद जाम खुला. तब रहीमाबाद के लोगों ने राहत की सांस ली. इस के बाद उमेश के घर वाले उस का शव अंतिम संस्कार के लिए ले कर गांव चले गए. उस समय तो यह खतरा टल गया, लेकिन पुलिस को अंदेशा था कि अगले दिन भी राजनीतिक लोग इस घटना का लाभ उठाने के लिए धरनाप्रदर्शन कर सकते हैं.

इसी बात पर विचार कर के लखनऊ के एसएसपी जे. रवींद्र गौड ने मामले का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए अपने मातहत अधिकारियों पर दबाव बनाया. इस के बाद थाना मलिहाबाद के इंसपेक्टर जे.पी. सिंह ने उमेश के घर वालों से मिल कर यह जानने की कोशिश की कि उन की किसी से रंजिश तो नहीं है. लेकिन घर वालों ने किसी भी तरह की राजनीतिक या पारिवारिक रंजिश से इनकार कर दिया. उमेश के पास इतना पैसा भी नहीं था कि लूटपाट के लिए उस की हत्या की जाती. वह पैसे का भी लेनदेन नहीं करता था. अब पुलिस के पास उमेश हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का एकमात्र सहारा उस का मोबाइल फोन था.

पुलिस ने उमेश के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस के अध्ययन से पता चला कि 13 नवंबर को एक ही नंबर पर उस ने 32 बार फोन किया था. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर जिला उन्नाव के थाना हसनगंज के गांव शाहपुर तोंदा की रहने वाली आशा का निकला. आशा का विवाह थाना मलिहाबाद के अंतर्गत आने वाले गांव सिंधरवा के रहने वाले राजू से हुआ था. राजू दुबई में लांड्री का काम करता था. आशा यहीं रहती थी. पति बाहर रहता था, इसलिए वह ससुराल में कम, मायके शाहपुर तोंदा में ज्यादा रहती थी. उमेश का उस के यहां नियमित आनाजाना  था. जब भी आशा मायके में रहती, उमेश उस से मिलने के लिए दूसरेतीसरे दिन आता रहता था. अगर किसी वजह से वह नहीं आ पाता था तो उसे फोन जरूर करता था.

दरअसल आशा कनौजिया की मां महेश्वरी देवी ने भी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा था. उमेश बिरादरी का नेता माना जाता था, इसलिए महेश्वरी देवी उमेश को अपने साथ रखने लगी थी. उसे लगता था कि उमेश साथ रहेगा तो बिरादरी के वोट उसे मिल जाएंगे. चुनाव महेश्वरी देवी लड़ रही थी, लेकिन उस का पूरा कामकाज पति प्रकाश कनौजिया देखता था. यही वजह थी कि उमेश और प्रकाश में गहरी छनने लगी थी. प्रकाश कनौजिया को भी लगता था कि उमेश के साथ रहने से बिरादरी का सारा वोट उसे ही मिलेगा.

चुनाव के दौरान महेश्वरी देवी के यहां आनेजाने में उमेश की नजर उस की 24 वर्षीया विवाहित बेटी आशा पर पड़ी तो वह उसे भा गई. भरेपूरे बदन वाली आशा पर उमेश की नजरें गड़ गईं. फिर तो जल्दी ही आशा की भी उमंगें हिलोरे लेने लगीं. यही वजह थी कि जल्दी ही दोनों के बीच प्रेमसंबंध बन गए. उमेश स्मार्ट और खुशदिल इंसान था. अपने इसी स्वभाव की बदौलत वह आशा को भा गया था. चुनाव के दौरान अकसर दोनों का एकसाथ आनाजाना होता रहा. उसी बीच एकांत मिलने पर दोनों ने अपने इस प्रेमसंबंध को शारीरिक संबंध में तबदील कर दिया था.

समय के साथ उमेश और आशा के संबंध प्रगाढ़ हुए तो उमेश आशा को अपनी जागीर समझने लगा. जबकि आशा को यह बिलकुल पसंद नहीं था. क्योंकि आशा के संबंध कुछ अन्य लोगों से भी थे. यही बात उमेश को पसंद नहीं थी. वह चाहता था कि आशा उस के अलावा किसी और से संबंध न रखे. इस के लिए उस ने आशा को रोका भी, लेकिन वह नहीं मानी. उस का कहना था कि वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती है, वह उसे रोकने वाला कौन होता है. उमेश के पास आशा के पति राजू का दुबई का फोन नंबर था. कभीकभी राजू की उस से बात भी होती रहती थी. आशा ने उमेश का कहना नहीं माना तो उस ने उसे सबक सिखाने की ठान ली.

एक दिन जब उस के पास राजू का फोन आया तो उमेश ने उस से बता दिया कि यहां आशा के कई लोगों से प्रेमसंबंध हैं. इस के बाद राजू और आशा में जम कर तकरार हुई. उमेश की यह हरकत आशा को बिलकुल पसंद नहीं आई. उस का इस तरह जिंदगी में दखल देना उसे अच्छा नहीं लगा तो उस ने उमेश को फोन कर के कहा, ‘तुम ने हमारे बारे में झूठ बोल कर राजू से मेरी जो लड़ाई कराई है, यह मुझे अच्छा नहीं लगा.’ अब तुम मुझ से न तो मिलने की कोशिश करना और न ही मुझे फोन  करना.

‘‘आशा, तुम मेरी बात का बेकार ही बुरा मान रही हो. मैं तुम्हें प्यार करता हूं, इसलिए चाहता हूं कि तुम मेरे अलावा किसी और से न मिलो.’’ उमेश ने सफाई दी.

‘‘लेकिन राजू से शिकायत कर के तुम ने मुझे उस की नजरों में गिरा दिया. वह मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? शक तो वह पहले से ही करता था. अब उसे विश्वास हो गया कि मैं सचमुच गलत हूं.’’ आशा ने झल्ला कर कहा.

‘‘मैं गुस्से में था, इसलिए मुझ से गलती हो गई. अब ऐसा नहीं होगा. तुम मुझे समझने की कोशिश करो आशा.’’ उमेश ने आशा को समझाने की कोशिश की.

‘‘तुम्हारी यह पहली गलती नहीं है. इस के पहले तुम ने मेरे साथ मारपीट की थी, मैं ने उस का भी बुरा नहीं माना था. लेकिन यह जो किया, अच्छा नहीं किया. यह गलती माफ करने लायक नहीं है. मैं तुम जैसे आदमी से अब संबंध नहीं रखना चाहती.’’ आशा ने कहा.

‘‘आशा, 13 नवंबर को मैं तुम से मिलने आ रहा हूं. तब बैठ कर आराम से बातें कर लेंगे.’’ उमेश ने कहा.

‘‘मैं तुम से बिलकुल नहीं मिलना चाहती, इसलिए तुम्हें यहां आने की जरूरत नहीं है.’’ आशा ने उसे आने से रोका.

‘‘आशा इतना भी नाराज मत होओ बस एक बार मेरी बात सुन लो, उस के बाद सब साफ हो जाएगा. बात इतनी बड़ी नहीं है, जितना तुम बना रही हो.’’

‘‘तुम्हारे लिए भले ही यह बात बड़ी नहीं है, लेकिन मेरे लिए यह बड़ी बात है. मैं अभी तक तुम्हारी हरकतें नजरअंदाज करती आई थी, यह उसी का नतीजा है. लेकिन अब बरदाश्त के बाहर हो गया है.’’ कह कर आशा ने फोन काट दिया.

13 नवंबर को उमेश आशा से मिलने उस के घर जाने वाला था. 14 नवंबर को बाराबंकी में उस के दोस्त पंकज के यहां शादी थी. उमेश ने योजना बनाई थी कि वह आशा से मिलते हुए दोस्त के यहां शादी में चला जाएगा. 13 नवंबर की शाम को यही कोई 7 बजे उमेश ने अपने घर फोन कर के बताया भी था कि वह मलिहाबाद में अपने दोस्त से मिल कर बाराबंकी चला जाएगा. इस के बाद उमेश ने घर वालों से संपर्क नहीं किया. रात में उस के छोटे भाई सुधीर ने उसे फोन किया तो उस का फोन बंद मिला. 13 नवंबर को उमेश ने दिन में 32 बार फोन कर के आशा को मनाने की कोशिश की थी. लेकिन आशा को अब उमेश से नफरत हो गई थी. उमेश ने उस के साथ जो किया था, अब वह उस से उस का बदला लेना चाहती थी.

आशा के संबंध गांव के ही रहने वाले रामनरेश, शकील और हरौनी के रहने वाले छोटे उर्फ पुत्तन से थे. आशा ने इन्हीं लोगों की मदद से उमेश से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाने का निश्चय कर लिया था. शाम को जब उमेश आशा से मिलने उस के घर पहुंचा तो आशा ने उस के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है. उस ने उसे खाना खिलाया और सोने के लिए बिस्तर भी लगा दिया. सोने से पहले उमेश ने शारीरिक संबंध की इच्छा जताई तो थोड़ी नानुकुर के बाद आशा ने उस की यह इच्छा भी पूरी कर दी. आशा की यही अदा उमेश को अच्छी लगती थी. आशा के इस व्यवहार से उमेश को लगा कि वह मान गई है. वह उसे बांहों में लिएलिए ही निश्चिंत हो कर सो गया.

उमेश के सो जाने के बाद आशा उठी और अपने कपड़े ठीक कर के घर के बाहर आई. उस ने गांव का माहौल देखा. गांव में सन्नाटा पसर गया था. उस ने रामनरेश, शकील और छोटे को पहले से ही तैयार कर रखा था. उन के पास जा कर उस ने कहा, ‘‘चलो उठो, वह सो चुका है. गांव में भी सन्नाटा पसर गया है. जल्दी से उसे खत्म कर के लाश ठिकाने लगा दो.’’

रामनरेश और आशा ने उमेश के पैर पकड़े तो छोटे ने हाथ पकड़ लिए. उस के बाद शकील ने गला दबा कर उसे खत्म कर दिया. छोटे महदोइया गांव का ही रहने वाला था, इसलिए उसे गांव की एकएक गली का पता था. सभी ने मिल कर उमेश की लाश को टैंपो नंबर 35 ई 8902 में डाला और ले जा कर गांव से काफी दूर नहर के किनारे फेंक दिया. शकील और छोटे टैंपो के पीछेपीछे उमेश की मोटरसाइकिल ले कर गए थे. उसे भी वहीं डाल दिया था. लाश ले जाने से पहले आशा ने उमेश की पैंट की जेब से मोबाइल और पर्स निकाल लिया था, जिस से उस की पहचान न हो सके.

शकील और छोटे ने उमेश की लाश को नहर के किनारे इस तरह फेंका था कि देखने वालों को यही लगे कि रात में दुर्घटना की वजह से इस की मौत हुई है. अपनी इस योजना में वे सफल भी हो गए थे, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पोल खुल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस की मौत Murder Stories in Hindi गला दबाने से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर के मामले की जांच शुरू की तो हत्यारों तक पहुंचने में उसे देर नहीं लगी. आशा से पूछताछ के बाद पुलिस ने रामनरेश को भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. उस ने भी अपना जुर्म कुबूल लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस शकील और छोटे की तलाश कर रही थी, लेकिन कथा लिखे जाने तक दोनों पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस हत्या के इस मामले में आशा के मांबाप की भूमिका की भी जांच कर रही है. आशा ने जो किया, उस से उमेश का ही नहीं, उस का खुद का भी परिवार छिन्नभिन्न हो गया. जिस पति से वह अपने जिन संबंधों को छिपाना चाहती थी, उमेश की हत्या के बाद पति को ही नहीं, पूरी दुनिया को पता चल गया. अब उस का क्या होगा, यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा.

Romantic Story: ऐ दिल है मुश्किल

Romantic Story: देखने सुनने व पढ़ने वालों को तो यही लगेगा कि मैं कोई चरित्रहीन स्त्री हूं पर मुझे समझ नहीं आता कि क्या मैं इन दिनों सचमुच एक चरित्रहीन स्त्री की तरह व्यवहार कर रही हूं. अपने मनोभाव प्रकट करना, किसी को अपने दिल की बात समझाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. वैसे भी, दिल की मुश्किल बातें समझनासमझाना सब के लिए आसान है क्या? मैं रश्मि, एक विवाहित स्त्री, एक युवा बेटी पलाक्षा की मां और एक बेहद अच्छे इंसान अजय की पत्नी, अगर किसी विवाहित परपुरुष में दिलचस्पी ले कर अपने रातदिन का चैन खत्म कर लूं तो क्या कहा जाएगा इसे?

मुझे अजय से कोई शिकायत नहीं, पलाक्षा से भी बहुत प्यार है. फिर, सोहम के लिए मैं इतनी बेचैन क्यों हूं, समझ नहीं आता. उस की एक झलक पाने के लिए अपने फ्लैट के कोनेकोने में भटकती रहती हूं. वह जहांजहां से दिख सकता है वहांवहां मंडराती रहती हूं रातदिन. अगर कोई ध्यान से मेरी गतिविधियों को देखे तो उसे मेरी हालत किसी 18 साल की प्यार में पड़ी चंचल किशोरी की तरह लगेगी. और मैं शक के घेरे में तुरंत आ जाऊंगी. पर उम्र के इस पड़ाव पर जैसी मैं दिखती हूं, मेरे बारे में कोई यह सोच भी नहीं सकता कि क्या अंतर्द्वंद्व मचा रहता है मेरे दिल में.

मैं बिलकुल नहीं चाहती कि मैं किसी परपुरुष की तरफ आकर्षित होऊं. पर क्या करूं, दिल पर कभी किसी का जोर चला है, जो मेरा चलेगा. लेकिन नहीं, यह भी नहीं कह सकते. सोहम का चलता है न अपने दिल पर जोर. मुझ में रुचि रखने के बाद भी वह कितनी मर्यादा, कितनी सीमा में रहता है. उस की पत्नी है,

2 बच्चे हैं, कितना मर्यादित, संतुलित व्यवहार है उस का. अपने प्रति मेरा आकर्षण भलीभांति जान चुका है वह. अपने औफिस के लिए निकलते समय उस के इंतजार में खिड़की में खड़े मुझे देखा है उस ने. फिर जब वह वापस आता है उस ने वहीं खड़े देखा है मुझे.

अपनी बेचैनियों से मैं कितनी थकने लगी हूं? बाहर से सबकुछ शांत लगता है, पर मेरे भीतर ही भीतर भावनाओं का तूफान उठता है. कभीकभी मेरा मन करता है अजय से कहूं, कहीं और फ्लैट ले लें या हम यहां से कहीं और चले जाएं पर यह बात मेरी जबान पर कभी आ ही नहीं पाती. उलटा, ऐसी बातों के छिड़ने पर मेरे मुंह से झट निकलता है कि मैं तो इस फ्लैट में मरते दम तक रहूंगी. कभी मन करता है कि उस के बारे में सोचने से बचने के लिए लंबी छुट्टियों पर कहीं चली जाऊं. पर कोई लंबा प्रोग्राम बनते ही मैं उसे 3 या 4 दिन का कर देती हूं. मैं कहां रह सकती हूं इतने दिन सोहम को बिना देखे. कभी सोचती हूं अपने बैडरूम की खिड़की पर हमेशा परदा खींच कर रखूं ताकि मेरा ध्यान सोहम की तरफ न जाए. पर होता कुछ और ही है. 6 बजे उठते ही आंखें पूरी तरह खुलने से पहले ही मैं अपने बैडरूम की खिड़की का परदा हटा देती हूं, जिस से सोहम अपने बैडरूम में अपनी पत्नी की, बच्चों की स्कूल जाने में, मदद करता दिख जाए.

मैं ने देखा है वह एक नजर मेरी खिड़की पर डालता है, फिर अपने कामों में लग जाता है. हां, बस एक नजर. मैं ने उसे कभी बेचैनी से मेरी ओर देखते नहीं देखा और मैं आंख खुलने से ले कर रात को बैड पर जाने तक हरपल उसी के बारे में सोचती हूं. वह अपने बच्चों को स्कूल बस में बिठाने के लिए निकलता है, फिर 15 मिनट बाद वापस आता है, फिर उस की पत्नी औफिस जाती है. शाम को पहले घर वही आता है. फिर, अपने बच्चों को ले कर पार्क जाता है. 2 साल पहले मेरी बेचैनियों का यह सिलसिला वहीं से तो शुरू हुआ था. एकदूसरे को देखना, फिर हायहैलो, फिर नाम की जानपहचान. बस, फिर इस के आगे कभी कुछ नहीं.

हैरान हूं मैं अपने दिल की हालत पर, क्यों मैं उस के आगेपीछे किसी बहकी सी पागलप्रेमिका की तरह रातदिन घूमती हूं. क्या हो गया है मुझे? सबकुछ तो है मेरे पास. मुझे उस से कुछ भी नहीं चाहिए. फिर यह क्या है जो उस के सिवा कुछ ध्यान नहीं रहता. हर समय वह अपने वजूद के साथ मुझे अपने आसपास महसूस होता है. उस की मर्यादित चालढाल, उस की बोलती सी आंखें, मुझे देख कर उस की रहस्यमयी मुसकराहट सब हर समय मेरे दिल पर छाई रहती हैं. रात में उस के फ्लैट की लाइट बंद होने तक मेरी नजरें वहीं गड़ी रहती हैं. वह गाना है न, ‘तुझे देखदेख कर है जगना, तुझे देख कर है सोना…’ मुझे अपने ऊपर बिलकुल फिट लगता है. पर इस उम्र में, इस स्थिति में सोहम की तरफ मेरा यों खिंचा जाना.

मेरी तबीयत कभीकभी इस बेचैनी से खराब हो जाती है. अजीब सा तनाव रहने लगता है. दिनभर एक अपराधबोध सालता कि एक परपुरुष की तरफ खिंच कर मैं अपना कितना समय खराब करती हूं. मेरे लिए समाज में रहते हुए उस के नियमों की अवहेलना करना संभव नहीं है. मैं अजय की प्रतिष्ठा भी कभी दांव पर नहीं लगाऊंगी.

पहले मुझे घर के कामों से, अपने सामाजिक जीवन से फुरसत नहीं मिलती थी. अब? अब मैं घर से ही नहीं निकलना चाहती. दोस्तों के बुलाने पर न मिलने के बहाने सोचती रहती हूं. पूरा दिन यह अकेलापन अच्छा लगने लगा है. किसी से बात करने की जरूरत ही नहीं लगती. सोहम के औफिस जाने के बाद मैं अपने काम शुरू करती हूं. उस के आने तक फारिग हो कर अपने फ्लैट से उसे देखने के मौके और जगहों पर भटकती रहती हूं. कभीकभी इधरउधर बेवजह कुछ करते रहने से थक कर बिस्तर पर पड़ जाती हूं. पता नहीं, तब कहां से कुछ आंसू पलकों के कोनों से अचानक बह निकलते हैं. जो घाव किसी को दिखाए भी न जा सकें, वे ज्यादा ही कसकते हैं.

बहुत मुश्किल में हूं. बहुतकुछ कर के देख लिया. सोहम से ध्यान नहीं हटा पाती. क्या करूं, कहां चली जाऊं. कहीं जा कर तो और बेचैन रहती हूं, फौरन लौट आती हूं. क्या करूं जो इस दिल को करार आए. अजय और पलाक्षा तो इसे मेरा गिरता स्वास्थ्य और थकान समझ कर रातदिन मेरा ध्यान रख रहे हैं. तब, मैं और अपराधबोध से भर उठती हूं. दिल की बातें इतनी उलझी हुई, इतनी मुश्किल क्यों होती हैं कि कोई इलाज ही नहीं दिखता और वह भी मेरी उम्र में कि जब किसी भी तरह की कोई उम्मीद ही नहीं है. इस दिल को कब और कैसे करार आएगा, इस अतर्द्वंद्व का कोई अंत कब होगा? और क्या अंत होगा? ऐसा क्या होगा जो मेरा ध्यान सोहम की तरफ से हट जाएगा? कहते हैं कि समय हर बात का जवाब है. अगर ऐसा है तो बस, इंतजार है मुझे उस समय का.

Romantic Story: आधा सच – किरण की किस बात से परेशान हो गई थी रश्मि?

Romantic Story: बहुत दिनों से सोच रही हूं. आज भी जब हवा का एक हलका सा झोंका बदन को छू कर निकलता है तो उस खुशबू का एहसास करा देता है, पर यह खुशबू तो लगातार आ रही है. कुछ देर बैठे रहने के बाद भी उस खुशबू का एहसास रहा. रश्मि ने आसपास झांका, फिर अपने कमरे की खिड़की से झांक कर देखा.

नीचे वाले घर में नए किराएदार अपना सामान रख रहे थे. कुछ मजदूर बाहर खड़े ट्रक से सामान अंदर ला रहे थे. उस ट्रक के पास एक सजीला नौजवान सफेद कमीज और काली पैंट पहने मजदूरों को सामान यथास्थान रखने का निर्देश दे रहा था. ‘इस का मतलब मेरे सपनों का राजकुमार हमारे नीचे वाले घर में किराएदार के रूप में रहने आया है,’ यह सोचते हुए रश्मि के मन में गुदगुदी होने लगी और वह वापस अपने पलंग पर आ गई.

कालेज जाते समय जब रश्मि रास्ता पार कर रही थी तब उस ने उस नौजवान को पहली बार देखा था. उसे देखते ही रश्मि का दिल जोर से धड़कने लगा. फिर तो पिछले 15 दिन में उस ने 3-4 बार उसे अपनी सोसायटी में देखा. जब भी वह आसपास होता तो एक भीनीभीनी सी खुशबू का झोंका रश्मि के मन को सराबोर कर देता.

2-3 दिन से ज्वर के कारण रश्मि कालेज नहीं जा पाई थी, तो उस का हालचाल जानने उस की सहेली कमल उस से मिलने आ गई. रश्मि ने जब कमल को उस युवक के बारे में बताया तो वह भी उसे छेड़ने लगी कि अब तो रोज ऊपरनीचे करते समय सपनों के राजकुमार के दर्शन होते होंगे. बातों ही बातों में कमल ने बताया कि कालेज में अंगरेजी की नई प्रोफैसर आई हैं. इतने में मां जूस के 2 गिलास ले कर आईं और बोलीं, ‘‘इसे पी कर तैयार हो जाओ. दोपहर का खाना हम लोग बाहर खाएंगे, क्योंकि रसोइए ने 3-4 दिन की छुट्टी ली है.’’

सुनते ही रश्मि के होश उड़ गए कि अब तो खाना बाहर खाना पड़ेगा, उसे खुद ही चायनाश्ता अपने व मां के लिए बनाना पड़ेगा, क्योंकि उस की आधुनिक मां को किचन के काम से ऐलर्जी थी. वे तो एक भी बार चाय नहीं बनाती थीं. किचन में काम करना उन्हें बिलकुल भी पसंद नहीं था. किचन में काम करना उन्हें गुलामी जैसा लगता था.

मम्मीपापा और रश्मि तैयार हो कर नीचे आए तो देखा कि एक 25-26 साल की महिला साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे बालों का बेतरतीब ढंग से जूड़ा बांधे सामान इधर से उधर रख रही है, पर वह युवक कहीं नजर नहीं आ रहा है. उस महिला की नजर जैसे ही रश्मि के परिवार पर पड़ी तो उस ने बड़ी शालीनता से नमस्ते किया.

तभी पापा ने हमारा परिचय कराते हुए कहा कि यह मिसेज किरण सूरज हैं. सूरज व किरण हमारे नए किराएदार हैं. मिसेज शब्द रश्मि के दिमाग पर हथौड़े की तरह बजने लगा यानी उस के सपनों का राजकुमार सूरज शादीशुदा है, उस का दिल बैठ गया. हालात पर काबू पाने के लिए वह जल्दीजल्दी कार में जा कर बैठ गई. घर वापस आते ही वह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर के लेट गई. काफी देर सोचने के बाद वह सो गई. जब सो कर उठी तो अपनेआप को उस ने समझा लिया था कि चलो, बात आगे बढ़ने से पहले ही खत्म हो गई.

शाम को उस ने मुंह धोया फिर अपने तथा मम्मी के लिए चाय बनाई. चाय पी कर मम्मी ने कहा, ‘‘थोड़ा नीचे जा कर नए किराएदारों से मिल लो, मैं तो नहीं जा सकती, क्योंकि मेरे सिर में दर्द है. आ कर फिर रात का खाना भी बाहर से और्डर कर देना.’’

मन न होते हुए भी रश्मि नीचे आई तो देखा कि किरण अभी भी उसी साड़ी में वैसे ही सामान कमरे में सजा रही है और उस के रसोईघर से बहुत अच्छी खुशबू आ रही है. खुशबू से रश्मि की भूख जाग गई. उस से दोपहर को भी खाना सही से नहीं खाया गया था.

रश्मि को देखते ही किरण ने दौड़ कर उस का स्वागत किया और उसे ड्राइंगरूम में बैठाया. कुछ ही देर में किरण ने ड्राइंगरूम को बहुत अच्छे ढंग से सजा दिया था. रश्मि को बैठा कर किरण रसोईघर से उस के लिए चाय व नाश्ता ले आई. प्लेट में तले हुए पकौड़े देख कर रश्मि ने मुंह सिकोड़ लिया.

रश्मि नाश्ते के लिए मना करने वाली थी कि किरण ने प्लेट से एक पकौड़ा उठा कर रश्मि के मुंह में यह कह कर डाल दिया कि आप हमारे घर पहली बार आई हैं, कुछ तो खाना ही पड़ेगा.

पकौड़े इतने स्वादिष्ठ थे कि पहला पकौड़ा खाने के बाद रश्मि अपनेआप को रोक नहीं पाई और 5 मिनट में ही उस ने प्लेट खाली कर दी. अपनी व्यस्तता देख कर उसे खुद पर ग्लानि होने लगी. फिर उस ने किरण से कहा कि अगर आप लोगों को किसी चीज की जरूरत हो तो बताइएगा. जल्दीजल्दी सीढ़ी चढ़ कर वह अपने कमरे में आ गई.

शाम को रसोइए के न आने के कारण डिनर का प्रोग्राम बाहर ही था. रेस्तरां में मम्मीपापा के साथ खाना खाते हुए उस ने देखा कि सामने वाली टेबल पर वही युवक यानी सूरज एक स्मार्ट युवती के साथ बैठ कर डिनर कर रहा है.

अपनी तरफ पीठ होने के कारण रश्मि उस युवती का चेहरा तो नहीं देख पाई, लेकिन उस के बालों का जूड़ा बांधने का ढंग तथा उस का स्टाइल देख कर साफ पता चल रहा था कि यह महिला एक आधुनिका है.

अपनी टेबल पर अंधेरा होने के कारण सूरज उस के मम्मीपापा को नहीं देख पाया. अचानक उसे किरण पर बहुत दया आने लगी. रात को वह सूरज के चरित्र के बारे में सोचने लगी. उसे लगा कि उस ने तो अपनेआप को सही समय पर संभाल लिया लेकिन बेचारी किरण का क्या होगा, उसे तो पता भी नहीं कि उस का पति बाहर किस के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है.

अगले दिन रश्मि कालेज जाने के लिए सीढि़यां उतर रही थी तो उस ने देखा कि किरण अपने पति के लिए किचन में नाश्ता व खाना तैयार कर रही है. उस ने सीढि़यों से ही किरण को सुप्रभात कहा और तेजी से कालेज के लिए निकल गई.

कालेज जा कर पता चला कि अंगरेजी की जो नई टीचर आने वाली थीं, वे 2 दिन बाद जौइन करेंगी. क्लास खाली देख कर सभी दोस्तों ने मिल कर शाहरुख खान की नई पिक्चर देखने का प्रोग्राम बनाया.

फिल्म समाप्त होने के बाद जैसे ही रश्मि व उस की सहेलियां बाहर निकलीं तो उस ने देखा कि सूरज भी अपनी उस आधुनिका के साथ फिल्म देखने आया है. हाईहील पहने उस आधुनिका का चेहरा भीड़ के कारण रश्मि नहीं देख पाई, लेकिन इस बार उस ने अपने दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डाला.

घर आ कर उस ने देखा कि नीचे ताला लगा हुआ है. ‘लगता है किरण कहीं बाहर गई है,’ सोचते हुए रश्मि अपने कमरे में आ गई. किरण से अब उस को सहानुभूति हो गई थी. बेचारी अपने पति के लिए कितना काम करती है. अच्छा खाना पकाती है, लेकिन उस का पति किसी आधुनिका के साथ बाहर घूमता रहता है.

आज रसोइया आ गया था, इसलिए उन्हें खाना खाने बाहर नहीं जाना पड़ा. अगले दिन रश्मि तबीयत खराब होने के कारण कालेज नहीं जा पाई. किरण ने जब उस की तबीयत के बारे में सुना तो वह उस के लिए टमाटर का स्वादिष्ठ सूप बना कर उस का हालचाल पूछने घर आई.

सूप पी कर रश्मि को बहुत अच्छा लगा. साथ ही रश्मि ने सोचा कि वह किरण को सूरज की असलियत बता दे ताकि वह किचन की चारदीवारी से बाहर निकल कर खुद को सजाएसंवारे तथा कुछ पढ़लिख ले ताकि सूरज उस आधुनिका के बजाय किरण को साथ ले कर घूमे.

अगले दिन सवेरेसवेरे खटरपटर की आवाज से रश्मि की आंख खुल गई. ‘शायद किरण किचन में अपने पति के लिए खाना बना रही है,’ रश्मि ने सोचा. अब वह स्वस्थ थी. उठ कर वह भी कालेज के लिए तैयार हो गई.

जब वह कालेज के लिए निकली तो देखा कि मां अभी सो कर उठी हैं. उस ने मां को बाय किया और कालेज के लिए निकल गई. नीचे देखा तो ताला लगा हुआ था. सोचा कालेज से आ कर वह किरण से बात करेगी.

आज कालेज में अंगरेजी की नई लैक्चरर की क्लास थी. रश्मि की सीट खिड़की के पास थी, जो कोरिडोर में खुलती थी. खिड़की से उस ने देखा कि मैडम आ रही हैं, ‘‘अरे, यह तो वही हाईहील, जूड़ा बांधने का वही ढंग, वही स्टाइल. अरे, यह तो सूरज की गर्लफ्रैंड है यानी कि हमारी अंगरेजी की नई टीचर.’’

उसे बड़ा गुस्सा आया. उस ने सोचा, ‘चलो, आज इस का चेहरा भी देख लेते हैं,’ लेकिन जैसे ही मैडम ने कक्षा में प्रवेश किया और रश्मि की नजर उस के चेहरे पर पड़ी तो उस के होश उड़ गए… ‘अरे, यह तो किरण है,’ वही आधुनिका जिसे उस ने कई बार सूरज के साथ घूमते देखा, लेकिन उस का चेहरा नहीं देख पाई. फिर उसे ध्यान आया कि किचन में खाना बनाते हुए किरण का चेहरा जो हाथ धो कर अपने पल्लू से पोंछती है, आज वही किरण उस के सामने खड़ी लगातार अंगरेजी में लैक्चर दे रही है. उस के शब्द रश्मि के सिर के ऊपर से निकलते जा रहे थे, लेकिन कानों ने सुनना बंद कर दिया था.

Family Story: निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Family Story: ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं.

Hindi Story: चिड़िया का बच्चा

Hindi Story: ‘टिंग टांग…टिंग टांग’…घंटी बजते ही मैं बोली, ‘‘आई दीपू.’’

मगर जब तक दरवाजा न खुल जाए, दीपू की आदत है कि घंटी बजाता ही रहता है. बड़ा ही शैतान है. दरवाजा खुलते ही वह चहकने लगा, ‘‘मौसी, आप को कैसे पता चलता है कि बाहर कौन है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘पता कैसे नहीं चलेगा.’’

तभी अचानक मेरे मुंह से चीख निकल गई, मैं ने फौरन दीपू को उस जगह से सावधानी से परे कर दिया. वह हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या हुआ, मौसी?’’

मैं आंगन में वहीं बैठ गई जहां अभीअभी एक चिडि़या का बच्चा गिरा था. मैं ने ध्यान से उसे देखा. वह जिंदा था. मैं फौरन ठंडा पानी ले आई और उसे चिडि़या के बच्चे की चोंच में डाला. पानी मिलते ही उसे कुछ आराम मिला. मैं ने फर्श से उठा कर उसे एक डब्बे पर रख दिया. फिर सोच में पड़ गई कि अगर दीपू का पांव इस के ऊपर पड़ गया होता तो? कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठी.

मैं ने ऊपर देखा. पड़ोसियों का वृक्ष हमारे आंगन की ओर झुका हुआ था. शायद उस में कोई घोंसला होगा. बहुत सारी चिडि़यां चूंचूं कर रही थीं. मुझे लगा, जैसे वे अपनी भाषा में रो रही हैं. पशुपक्षी बेचारे कितने मजबूर होते हैं. उन का बच्चा उन से जुदा हो गया पर वह कुछ नहीं कर पा रहे थे.

‘‘करुणा…’’ कमला दीदी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं ने फौरन चिडि़या के बच्चे को उठाया और नल के पास ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षित जगह पर रख दिया.

छुट्टियों में हमारे घर बड़ी रौनक रहती है. इस बार तो मेरी दीदी और उस के बच्चे भी अहमदाबाद से आए थे. इत्तफाक से विदेश से फूफाजी भी आए हुए थे. फूफाजी को सब लोग ‘दादाजी’ कहते थे. यह विदेशी दादाजी हमारे छोटे शहर के लिए बहुत बड़ी चीज थे. सुबह से शाम तक लोग उन्हें घेरे ही रहते. कभी लोग मेहमानों से मिलने आते तो कभी मेहमान लोग घूमनेफिरने निकल जाते.

मेहमानों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर के मैं फिर चिडि़या के बच्चे के पास चली आई. वह अपना छोटा सा मुंह पूरा खोले हुए था. ऐसा लगता था जैसे वह पानी पीना चाहता है. पर नहीं, पानी तो बहुत पिलाया था. मुझे अच्छी तरह पता भी तो नहीं था कि यह क्या खाएगा?

‘‘ओ करुणा मौसी, चिडि़या को पानी में डाल दो,’’ दीपू ने मेरे पास रखी गेंद उठाते हुए कहा.

मैं ने उसे पकड़ा, ‘‘अरे दीपू, सामने जो सफेद प्याला पड़ा है, उसे ले आ. मैं ने उस में दूधचीनी घोल कर रखी है. इसे भूख लगी होगी.’’

मेरी बात सुन कर दीपू जोर से हंसा, ‘‘मौसी, इसे उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कहते हुए वह गेंद नचाते हुए बाहर चला गया.

मैं दूध ले आई, चिडि़या का बच्चा बारबार मुंह खोल रहा था. मैं अपनी उंगली दूध में डुबो कर दूध की बूंदें उस की चोंच में डालने लगी.

‘‘बूआ…’’ मेरी भतीजी उर्मिला की आवाज थी, ‘‘अरे बूआ, यहां क्या कर रही हो?’’ वह करीब आ कर बोली.

मैं ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया. मैं चाहती थी कि मेरी गैरमौजूदगी में उर्मिला जरा उस का खयाल रखे.

‘‘वाह बूआ, वाह, भला चिडि़या के बच्चे के पास बैठने से क्या फायदा?’’ कह कर वह अंदर चली गई. नल के पास बैठे हुए जो भी मुझे देखता वह खिलखिला कर हंस पड़ता. सब के लिए चिडि़या का बच्चा मजाक का विषय बन गया था.

मैं फिर रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद मैं ने बाहर झांका तो देखा कि मेरी भतीजी जूली, उर्मिला और कुछ अन्य लड़कियां नल के पास आ कर खड़ी हो गई थीं. मैं एकदम चिल्लाई, ‘‘अरे, रुको.’’

मैं उन के पास आई तो वे बोलीं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘वहां एक चिडि़या का बच्चा है.’’

‘‘चिडि़या का बच्चा? अरे हम ने सोचा, पता नहीं क्या बात है जो आप इतनी घबराई हुई हैं,’’ वे भी जोरदार ठहाके मारती हुई चली गईं.

मैं खीज उठी और शीघ्र ही ऊपर चली गई. वहां आले में रखे एक घोंसले को देखा,जो इत्तफाक से खाली था. मैं ने उस में चिडि़या के बच्चे को रख कर घोंसले को ऊपर एक कोने में रख दिया.

मैं रसोई में आ गई और सब्जी काटने लगी. तभी पड़ोसन सुषमा बोली, ‘‘आज तो पता नहीं, करुणा का ध्यान कहां है? मैं रसोई में आ गई और इसे पता नहीं चला.’’

‘‘इस का ध्यान चिडि़या के बच्चे में है,’’ नमिता ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया.

‘‘अरे, पक्षी बिना घोंसले के बड़ा नहीं होगा. उसे किसी घोंसले में रखो,’’ सुषमा सलाह देती हुई बोली.

‘‘मैं उसे घोंसले में ही रख कर आई हूं,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

रात को सब लोग खाना खाने के बाद घूमने गए. शायद किशनचंद के यहां से भी हो कर आए थे, ‘‘भई, हद हो गई, किशनचंद की औरत इतनी बीमार है. इतनी छटपटाहट घर के लोग कैसे देख रहे थे?’’ यह दादाजी की आवाज थी.

सब लोग आंगन में बैठे बातचीत कर रहे थे. दादाजी विदेश की बातें सुना रहे थे, ‘‘भई, हमारे अमेरिका में तो कोई इस कदर छटपटाए तो उसे ऐसा इंजेक्शन दे देते हैं कि वह फौरन शांत हो जाए. भारत न तो कभी बदला है और न ही बदलेगा. अभी मैं मुंबई से हो कर ही राजस्थान आया हूं. वहां मूलचंद की दादी की मृत्यु हो गई. अजीब बात है, अभी तक यहां लोग अग्निसंस्कार करते हैं.’’

सुनते ही अम्मां बोलीं, ‘‘आप लोग मृत व्यक्ति का क्या करते हैं?’’

‘‘अरे, बस एक बटन दबाते हैं और सारा झंझट खत्म. अमेरिका में तो…’’ दादाजी पता नहीं कैसी विचित्र बातें सुना रहे थे.

मैं ने सोने से पहले चिडि़या के बच्चे की देखभाल की और फिर सो गई. सुबह उठते ही देखा, चिडि़या का बच्चा बड़ा ही खुश हो कर फुदक रहा था. दीपू ने उस की ओर पांव बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मौसी, रख दूं पैर इस के ऊपर?’’

‘‘अरे, नहीं…’’ मैं उस का पैर हटाते हुए चीख पड़ी. अचानक मैं ने सामने देखा, ‘‘अरे, यह तो वही आदमी है…’’

शायद जीजाजी ने मेरी बात सुन ली थी. वह बाहर ‘विजय स्टोर’ की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘तुम जानती हो क्या उस आदमी को?’’

मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य ताजा हो उठा, ‘‘हां,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह वही आदमी है. एक प्यारा सा कुत्ता लगभग मेरे ही पास पलता था, क्योंकि मैं उसे कुछ न कुछ खिलाती रहती थी. एक दिन वह सामने भाभी के घर से दीदी के घर की तरफ आ रहा था कि इस आदमी का स्कूटर उसे तेजी से कुचलता हुआ निकल गया. कुत्ता बुरी तरह तड़प कर शांत हो गया. हैरत की बात यह थी कि इस आदमी ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा था.’’

जीजाजी पहले तो ठहाका मार कर हंसे फिर जरा क्र्रोधित होते हुए बोले, ‘‘अब कहीं वह फिर तुम्हें नजर आ जाए तो उसे कुछ कह मत देना. हम कुत्ते वाली फालतू बात के लिए किसी से कहासुनी करेंगे क्या?’’

कुछ दिन पहले की ही तो बात है. पड़ोस में शोर उठा, ‘अरे पास वाली झाडि़यों से सांप निकला है,’ सुनते ही मेरा बड़ा भतीजा फौरन एक लाठी ले कर गया और कुछ ही पलों में खुश होते हुए उस ने बताया कि सांप को मार कर उस ने तालाब में फेंक दिया है.

‘‘क्या?…तुम ने उसे जान से मार दिया है?’’ मैं ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मारता नहीं तो क्या उसे घर ले आता? अगर किसी को काट लेता तो?’’

एक दिन दादाजी बालकनी में कुछ लोगों के साथ बैठे कौफी पी रहे थे, बाहर का दृश्य देखते हुए बोले, ‘‘अफ्रीका में सूअर को घंटों खौलते हुए पानी में डालते हैं और फिर उसे पकाने के लिए…’’ दादाजी बोले जा रहे थे और मैं सूअर की दशा की कल्पना मात्र से ही तड़प उठी थी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं चिडि़या के बच्चे को कोई बाहर न फेंक दे.

घोंसले में झांका तो देखा कि बच्चा उलटा पड़ा था. मैं ने डरतेडरते हाथों में कपड़ा ले कर उसे सीधा किया. बिना कपड़ा लिए मेरे नाखून उसे चुभ जाते.

‘‘करुणा मौसी, आप ने चिडि़या के बच्चे को हाथ लगाया?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’ मैं ने उसे आश्चर्य से देखा.

‘‘अब देखना मौसी, चिडि़या के बच्चे को उस की मां अपनाएगी नहीं. मनुष्य के हाथ लगाने के बाद दूसरे पक्षी उस की ओर देखते भी नहीं.’’

‘‘अरे, उठाती कैसे नहीं, आंगन के बीचोबीच पड़ा था. किसी का पांव आ जाता तो?’’ मैं ने कहा और अपने काम में लग गई.

3 दिन गुजर गए. जराजरा सी देर में मैं चिडि़या के बच्चे की देखभाल करती. चौथे दिन बहुत सवेरे ही चिडि़यों के झुंड के झुंड घोंसले के पास आ कर जोरजोर से चींचीं, चूंचूं करने लगे. मुझे लगा जैसे वे रो रहे हों. मैं ने घोंसले के अंदर देखा. चिडि़या का बच्चा बिलकुल शांत पड़ा था. मेरा दिल भर आया. तरहतरह के खयाल मन में उठे. रात को वह बिलकुल ठीक था. कहीं सच में दीपू ने उस के ऊपर पांव तो नहीं रख दिया?

चिडि़या के बच्चे पर किसी तरह के हमले का कोई निशान नहीं था. मगर फिर भी मैं ने दीपू से पूछा, ‘‘सच बता दीपू, तू ने चिडि़या के बच्चे को कुछ किया तो नहीं?’’

पर दीपू ने तो जैसे सोच ही रखा था कि मौसी को दुखी करना है. वह बोला, ‘‘मौसी, मैं ने सुबह उठते ही पहले उस का गला दबाया और फिर सैर करने चला गया.’’

मैं सरला दीदी से बोली, ‘‘दीदी, ऐसा नहीं लगता कि यह आराम से सो रहा है?’’

दीपू ने मुझे दुखी देख कर फिर कहा, ‘‘मौसी, मैं ने इसे मारा ही ऐसे है कि जैसे हत्या न लग कर स्वाभाविक मौत लगे.’’

पता नहीं क्यों, मुझ से उस दिन कुछ खायापिया नहीं गया. संगीतशाला भी नहीं गई. दिल भर आया था. कागजकलम ले कर दिल के दर्द को रचना के जरिए कागज की जमीन पर उतारने लगी. रचना भेजने के बाद लगा कि जैसे मैं ने उस चिडि़या के बच्चे को अपनी श्रद्धांजलि दे दी है.

Romantic Story: एक और कोशिश – रचिता और मोहित का क्या रिश्ता था?

Romantic Story: ‘‘किसे बारबार फोन कर रहे हो मोहित, कोई परेशानी है?’’

‘‘कब से फोन कर रहा हूं मां को, उठा ही नहीं रही हैं.’’

‘‘तो पापा को लगाओ न.’’

‘‘वे भी कहां उठा रहे हैं. कैसे हैं ये लोग, उफ्फ.’’

‘‘हो सकता है दोनों कहीं बाहर घूमने या फिर किसी काम से निकले होंगे और शोरगुल में फोन की आवाज सुन नहीं पा रहे होंगे. आप चिंता मत कीजिए, मिस्ड कौल देखेंगे तो खुद ही फोन करेंगे.’’

‘‘तुम्हें तो पता है न, रचिता, कि दोनों कैसे हैं. एकदूसरे से ठीक से बात तो करते नहीं हैं, घूमने क्या जाएंगे साथ में?’’

‘‘जब से औफिस से आए हो, परेशान दिख रहे हो. कोई बात हो गई, क्या? मेरा मतलब है कि क्या कोई जरूरी बात करनी है आप को मां से? थोड़ी देर में फिर से कोशिश करना, तब तक खाना खा लो.’’

‘‘देखो, अब तो दोनों का फोन स्विच औफ जा रहा है, क्या करूं?’’

‘‘हो सकता है फोन की बैटरी चार्ज न हो. वैसे भी, पटना में बिजली की हालत अच्छी नहीं है.’’ मेरी बातों पर तो मोहित का जरा भी ध्यान नहीं था. बस, बारबार फोन लगाए जा रहे थे. ‘‘दीदी को फोन करो, मोहित.’’

जैसे ही वे दीदी को फोन करने जा रहे थे वैसे ही दीदी का फोन आ गया.

‘‘दीदी, मैं आप को ही फोन कर रहा था. देखो न, कब से मांपापा को फोन कर रहा हूं, लग नहीं रहा है. कुछ पता है आप को?’’ मोहित बकबक किए जा रहे थे और दीदी कुछ बोल ही नहीं रही थीं, ‘‘दीदी सुन रही हो?’’

‘‘तू चुप होगा तब बोलूंगी न, मैं भी कब से फोन कर रही हूं. वैसे, तुम चिंता मत करो, मोहित. तुम्हें पता तो है कि मांपापा कैसे हैं. खुद तो मस्त रहते हैं, दूसरों को टैंशन देते हैं और शुरू से तेरी आदत है बेवजह चिंता करने की, अभी सो जा, सुबह बात हो जाएगी.’’

मोहित ने सोचा शायद दीदी ठीक ही कह रही हैं. पर मम्मीपापा फोन तो उठा ही सकते थे. एक बार और लगा कर देखता हूं, सोचते हुए उस ने फिर फोन लगाया पर अब भी उन्होंने फोन नहीं उठाया.

‘‘ऐसे मत देखो, रचिता, चिंता तो होती है न,’’ लेटी हुई रचिता उसे देख रही थी तो वह झुंझला कर बोला.

‘‘मैं समझती हूं, मोहित.’’

रातभर मोहित ठीक से नहीं सोए. जब भी रात को जाग कर देखा तो जाग ही रहे थे और सुबह भी जल्दी जाग गए. मैं ने कहा, ‘‘अभी तो 4:30 ही बजे हैं, मांपापा सो रहे होंगे’’

‘‘फिर भी फोन कर के देखता हूं, रचिता.’’

मोहित का चेहरा बता रहा था कि अभी भी फोन नहीं उठा रहे थे मांपापा. ‘‘आप मौसीजी को फोन लगाओ फिर से, शायद लग जाए,’’ रचिता ने सुझाया.

‘‘हां, वही करता हूं…क्या, कब हुआ, अभी मां कहां हैं मौसी? आप मां का खयाल रखो, मैं जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करता हूं.

‘‘रचिता, देखो वही हुआ जिस का मुझे डर था, हमें कल ही निकलना पड़ेगा,’’ मोहित सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘मौसी ने क्या बोला, यह तो बताओ.’’ मोहित की बेचैनी बता रही थी कि कुछ तो हुआ है, ‘‘मोहित क्या हुआ?’’

‘‘मां मौसी के घर पर हैं. बहुत झगड़ा हुआ है मांपापा में. मां के सिर पर चोट आई है. डाक्टर को दिखा दिया है मौसी ने, अब मां ठीक हैं. ट्रेन का तत्काल का टिकट करवाते हैं, तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी न?’’

‘‘हां, मिल जाएगी, आप चिंता मत कीजिए.’’

मोहित ट्रेन में भी चुपचाप बैठे रहे. ‘‘मोहित क्या सोच रहे हो? मांपापा इतना लड़ते हैं आपस में तो कभी भी आप ने, दीदी ने, नानानानी ने या फिर मौसी ने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की? बोलो मोहित, मैं कोई बाहर की नहीं हूं. क्या मैं समझा सकती हूं उन दोनों को, मैं कोशिश कर के देखूं?’’

‘‘सब हार गए दोनों को समझासमझा कर, तुम पापा को नहीं जानती. जब कोई कुछ नहीं कर सका तो तुम क्या करोगी? जब से हम भाईबहन ने होश संभाला है तब से दोनों को लड़तेझगड़ते ही देखा है.’’

लगता है रचिता सो गई. मोहित विचारों में खो गया. रचिता क्या सोचती होगी कि कैसे घर में उस की शादी हो गई. हमारा बचपन तो जैसेतैसे ही बीता. याद है मुझे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ा करते रहते थे मांपापा दोनों और धीरेधीरे वह झगड़ा विकराल रूप धारण कर लेता था. डर के मारे हम नानी को फोन कर देते थे और जब वे सब आते, मांपापा को समझाते तो पापा उन की भी बेइज्जती कर देते थे. सो, सब ने हमारे घर आना छोड़ दिया. पापा के परिवार वालों ने भी दोनों के खराब आचरण के चलते आना छोड़ दिया. इन के झगड़ों से पड़ोसी भी परेशान रहने लगे. एक बार पेरैंटटीचर मीटिंग में दोनों का स्कूल जाना अनिवार्य था.

मेरी क्लासटीचर ने कहा, ‘मोहित पढ़ने में तो ठीक है पर स्कूल की किसी भी गतिविधि में भाग नहीं लेना चाहता. क्लास में पीछे की बैंच पर ही बैठता है. कुछ पूछती हूं तो डर जाता है. आप दोनों को जरा ज्यादा ध्यान देना होगा.’

टीचर के इतना कहते ही दोनों एकदूसरे पर आरोप मढ़ने लगे और वहीं शुरू हो गए. मैं शर्म से गड़ा जा रहा था. मैं अपनी टीचर को देख रहा था कि वे क्या सोच रही होंगी. वही दोनों को शांत करने लगीं. वे समझ गई होंगी कि मैं ऐसा क्यों हूं. रास्तेभर लड़ते रहे दोनों. एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

अपर्णा दीदी सही थीं अपनी जगह. 10वीं पास करने के बाद होस्टल चली गईं. मांपापा ने भी जिम्मेदारी से बचने के लिए होस्टल में डाल दिया. काश, मैं भी दीदी की तरह होस्टल जा पाता लेकिन डरता था कि पापा, मां को मार देंगे.

जब नानानानी का आना बंद हो गया तो मां अकसर वहां चली जाया करती थीं और कितनी बार नानाजी कहते थे कि कुछ दिन वहीं रहो. इस बात को ले कर पापा ने नाना के नाम का परचा छपवा दिया और पूरे शहर में बंटवा दिया कि नाना अपनी बेटी को मेरे प्रति भड़काते हैं और हमारा तलाक करवाना चाहते हैं.

मामा और पापा में इस बात को ले कर बहुत लड़ाई हुई थी. जब भी मैं मौसामौसी को हंसते, बातें करते देखता तो लगता था कि काश, मेरे मांपापा भी ऐसे ही होते. दीदी तो ज्यादा नहीं रहीं हमारे साथ, पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर अपने ही पसंद के लड़के के साथ शादी कर के चली गईं. इस बात के लिए भी बहुत बवाल हुआ घर में पर दीदी ने तो शुरू से वही किया जो वे चाहती थीं. अब सोचता हूं कि दीदी अपनी जगह सही थीं. शादी तो मैं ने भी अपनी पसंद की लड़की से की पर मांपापा की मरजी से.

याद है मुझे जब फूफाजी बढ़ैया के मशहूर रसगुल्ले ले कर आए थे. मैं यही मनाता रहा कि इन के सामने ये लोग शुरू न हो जाएं. जैसे ही फूफाजी गए, पापा रसगुल्ले गिनने लगे कि कितने पीस हैं और सख्त हिदायत दी कि कोई भी उन से बिना पूछे रसगुल्ला नहीं खाएगा. तब मैं बच्चा ही था करीब 10-11 साल का, बारबार फ्रिज खोलता पर खाता नहीं था, डर जो था. पर मां तो मां होती है. उन्होंने एक कटोरे में 4 रसगुल्ले निकाल कर मुझे खाने को दे दिए. उस दिन की बातें आज भी मुझे रुलाती हैं. झगड़ा तो बहुत हुआ ही, और मां को मार भी पड़ी थी.

मां भी कहां चुप बैठने वाली थीं. उन्होंने रसगुल्ले का मटका ही तोड़ दिया और गुस्से के मारे सारे रसगुल्लों को अपने पैरों से कुचल दिया और बोला, ‘लो, अब खाओ जितने खाने हैं रसगुल्ले.’ और तब पापा मां के बाल खींचते हुए कमरे में ले गए. मैं रोए जा रहा था. महल्ले वालों ने आ कर बीचबचाव किया और फिर मौसी हमें कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गई थीं. ऐसी कितनी बातें हैं जो मेरे मन में हमेशा के लिए घर कर गई हैं.

‘‘उठ गई रचिता?’’ मैं खयालों से बाहर निकल आया था.

‘‘आप सोए नहीं, तब से क्या सोच रहे हैं? सब ठीक हो जाएगा, मोहित.’’

‘‘अब क्या ठीक होगा, यही सोचता हूं कि कोई भी ऐसी सुखद याद नहीं है बचपन की जिसे सोच कर हम मुसकराएं या किसी के साथ बांटे.’’

जैसे ही हम मौसी के घर पहुंचे, मुझे देखते ही मां रो पड़ीं. सिर पर पट्टी बंधी थी. थोड़ी देर रुक कर, मां को ले कर हम अपने घर चले आए.

‘‘प्रणाम, पापा.’’

‘‘हूं.’’

ठीक से जवाब भी नहीं दिया पापा ने. एक दिन की चुप्पी के बाद मोहित ही बोले, ‘‘पापा, मैं मां को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जा रहा हूं.’’

‘‘हां, हां, ले जाओ, मेरे खिलाफ भड़का रही है मेरे ही बच्चों को, फौज बुलाई है मुझे मरवाने के लिए.’’

मोहित को पापा पर गुस्सा आया, ‘‘चुप रहिए, कब से सुन रहा हूं आप की बकबक. पता भी है कि क्या बोले जा रहे हैं आप? अपने जैसा ही समझ रखा है मुझे. पता नहीं किस भ्रम में जीते आया मैं कि एक न एक दिन आप दोनों सुधर जाओगे. पर नहीं, मैं ही गलत था. शर्म नहीं आती आप दोनों को. उम्र देखी है 70 के होने वाले हो. मुझे शर्म आती है. मेरा भी घर नहीं बसने देंगे आप लोग. वहां हम जीतोड़ मेहनत करते हैं. कभी कुछ मांगा है आप से? बस, शांति दे दीजिए हमें. तभी मैं ने मोहित का हाथ पकड़ लिया और मांपापा दोनों चुप हो कर मुझे ही देख रहे थे.’’

‘‘हफ्तेभर से परेशान हैं मोहित आप दोनों के लिए. रातरातभर ठीक से सो नहीं पा रहे हैं. जहां इन के साथीदोस्त प्रोमोशन के लिए क्याकुछ नहीं कर रहे हैं वहां आप के बेटे आप दोनों की चिंता में घुले जा रहे हैं. मैं ने देखी है इन के आंखों में वह बेचैनी आप दोनों के लिए, बहुत प्यार करते हैं मोहित आप दोनों से. मुंबई में लाखों की भीड़ में रोज ट्रेन पकड़ कर औफिस जानाआना, अगर इन्हें कुछ हो गया तो…हाथ जोड़ती हूं मत कीजिए झगड़ा, कुछ नहीं रखा है प्यार के सिवा जिंदगी में. आप को खुश होना चाहिए कि आप दोनों साथ हैं, तंदुरुस्त हैं और आप के बच्चे समझदार हैं. कभी दूसरों के घरों में झांक कर देखिए, कितनी जद्दोजेहद से अपनी जिंदगी जी रहे हैं लोग. प्लीज, आप दोनों प्यार से रहिए और कुछ नहीं चाहिए हमें.’’

अब बारी मोहित की थी, ‘‘इन्हें मत समझाओ प्यार की भाषा, मैं कहता हूं जब एकदूसरे से बनती ही नहीं है तो अलग हो जाइए न, क्या जरूरत है समाज के सामने पतिपत्नी का ढकोसला करने की. मैं वकील को फोन लगाऊं बोलिए तो.’’

‘‘मोहित, क्या कर रहे हैं आप? पापा, मेरी बात का बुरा मत मानिएगा पर इस उम्र में आ कर तो पतिपत्नी का एकदूसरे के लिए प्यार और बढ़ जाता है. आप को पता है मेरे पापा मेरी मां से बहुत प्यार करते थे. जब मेरी मां को एक लाइलाज बीमारी हो गई तो कहांकहां नहीं इलाज करवाया पापा ने. हालांकि मां फिर भी नहीं बच पाईं. आज मेरे पापा मां की यादों के सहारे ही जिंदा हैं, मां की हर वे चीजें संभाल कर रखे हैं जो मां को बहुत प्रिय थीं. काश, आज मेरी मां जिंदा होतीं तो मेरे पापा दुनिया के सब से खुश इंसान होते. आप दोनों में भी प्यार है, अगर नहीं होता तो इतने सालों तक एकसाथ नहीं रहते. बोलिए मांपापा, क्या जी पाएंगे एकदूसरे के बगैर? नहीं आएगी एकदूसरे की याद? अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिए खुद से.’’

रचिता की बातें सुन कर दोनों चुप थे. रचिता ने मां के सिर पर हाथ रखा तो उन्होंने दोनों हाथों से पकड़ लिया पर बोलीं कुछ नहीं. पिताजी न जाने कहां चले गए. थोड़ी देर में वे आए तो देखा उन के हाथ में 2 गजरे थे, उन्होंने मां के सिरहाने रख दिए और कमरे की खिड़की के पास बाहर खड़े हो कर देखने लगे. आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो अहं पिघल कर बह रहा हो.

भावविभोर हो कर रचिता को मोहित ने मातापिता के सामने ही बांहों में भर कर चूम लिया. उसे अपना वह संसार मिल गया जिसे बचपन से ढूंढ़ रहा था. 

Romantic Story: कायापलट – रोहित को खुद पर क्यों होने लगा पछतावा

Romantic Story: ‘बैस्टकपल’ की घोषणा होते ही अजय ने हर्षा को अपनी बांहों में उठा लिया. हर्षा भी छुईमुई सी उस की बांहों में समा गई. स्टेज का पूरा चक्कर लगा कर अजय ने धीरे से उसे नीचे उतारा और फिर बेहद नजाकत से झुकते हुए उस ने सभी का शुक्रिया अदा किया. पिछले साल की तरह इस बार भी इंदौर के लायंस क्लब में थीम पार्टी ‘मेड फौर ईचअदर’ में वे दोनों बैस्ट कपल चुने गए थे. लोगों की तारीफ भरी नजरें बहुत देर तक दोनों का पीछा करती रहीं.

क्लब से बाहर आ कर अजय गाड़ी निकालने पार्किंग में चला गया. बाहर खड़ी हर्षा उस का इंतजार करने लगी. तभी अचानक किसी ने धीरे से उसे पुकारा. हर्षा मुड़ी पर सामने खड़े इंसान को यकायक पहचान नहीं पाई. लेकिन जब पहचाना तो चीख पड़ी, ‘‘रोहित… तुम यहां कैसे और यह क्या हालत बना ली है तुम ने?’’

‘‘तुम भी तो बिलकुल बदल गई हो… पहचान में ही नहीं आ रही,’’ रोहित की हंसी में कुछ खिन्नता थी, ‘‘यह है मेरी पत्नी प्रीति,’’ कुछ झिझक और सकुचाहट से उस ने पीछे खड़ी पत्नी का परिचय कराया.

सामने खड़ी थुलथुल काया में हर्षा को कुछ अपना सा नजर आया. उस ने आगे बढ़ कर प्रीति को गले लगा लिया, ‘‘नाइस टू मीट यू डियर.’’

तभी अजय गाड़ी ले कर आ गया. हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति से मिलवाया. कुछ देर औपचारिक बातों के बाद अजय ने उन्हें अगले दिन अपने यहां रात के खाने पर आमंत्रित किया.

अजय और हर्षा के घर में घुसते ही डेढ़ वर्षीय आदी दौड़ कर मां की गोदी में आ चढ़ा. हर्षा भी उसे प्यार से दुलारने लगी. 2 घंटे से आदी अपनी दादी के पास था. हर्षा अजय के साथ क्लब गई हुई थी.

हर्षा और अजय की शादी 4 साल पहले हुई थी. खूबसूरत शख्सीयत की मालकिन हर्षा बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थी. इस समय वह पति अजय और अपने डेढ़ साल के बच्चे आदी के साथ खुशहाल और सफल दांपत्य जीवन जी रही थी. लेकिन कुछ साल पहले उस की स्थिति ऐसी न थी. हालांकि तब भी उस की जिंदादिली लोगों के लिए एक मिसाल थी.

90 किलोग्राम वजनी हर्षा अपनी भारीभरकम काया के कारण अकसर लोगों की निगाहों का निशाना बनती थी. लेकिन अपने जानने वालों के लिए वह एक सफल किरदार थी, जो अपनी मेहनत और हौसले के बल पर बड़ी से बड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने की हिम्मत रखती थी. अपने कालेज में वह हर दिल अजीज और हर फंक्शन की जान थी. उस के बगैर कोई भी प्रोग्राम पूरा नहीं होता था.

हर्षा दिखने में भले मोटी थी, पर इस से उस की फुरती व आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आई थी. वह और उस का बौयफ्रैंड रोहित एकदूसरे की कंपनी बहुत पसंद करते थे. बिजनैसमैन पिता ने अपनी इकलौती बेटी हर्षा को बड़े नाजों से पाला था. वह अपने मातापिता की जान थी.

बिस्तर पर लेटी हर्षा रोहित से हुई आज अचानक मुलाकात के बारे में सोच रही थी. थका अजय बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में जा चुका था. हर्षा विचारों के भंवर में गोते खातेखाते 4 साल पहले अपने अतीत से जा टकराई…

‘‘रोहित क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है? क्या तुम मुझ से शादी नहीं करना चाहते?’’ फाइनल ईयर में वेलैंटाइन डे की कालेज पार्टी

में उस ने रोहित को झंझोड़ते हुए पूछा था. दरअसल, उस ने उसी शाम रोहित से बाकायदा अपने प्यार का इजहार कर शादी के बारे में पूछा था. मगर रोहित की नानुकुर से उसे बड़ी हताशा हाथ लगी थी.

‘‘देखो हर्षा, यारीदोस्ती की बात अलग है, क्योंकि दोस्ती कइयों से की जा सकती है, पर शादी तो एक से ही करनी है. मैं शादी एक लड़की से करना चाहता हूं, किसी हथिनी से नहीं. हां, अगर तुम 2-4 महीनों में अपना वजन कम कर सको तो मैं तुम्हारे बारे में सोच सकता हूं,’’ रोहित बेपरवाही से बोला.

हर्षा को रोहित से ऐसे जवाब की बिलकुल उम्मीद नहीं थी. बोली, ‘‘तो ठीक है रोहित, मैं अपना वजन कम करने को कतई तैयार नहीं… कम से कम तुम्हारी इस शर्त पर तो हरगिज नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी दया की मुहताज नहीं हूं, तुम शायद भूल गए कि मेरा अपना भी कोई वजूद है. तुम किसी भी स्लिमट्रिम लड़की से शादी के

लिए आजाद हो,’’ कह बड़ी सहजता से बात को वहीं समाप्त कर उस ने गाड़ी घर की दिशा में मोड़ ली थी.

मगर रोहित को भुलाना हर्षा के लिए आसान न था. आकर्षक कदकाठी और मीठीमीठी बातों के जादूगर रोहित को वह बहुत प्यार करती थी. लोगों की नजरों में भले ही यह एक आदर्श पेयर नहीं था, लेकिन ऐसा नहीं था कि यह चाहत एकतरफा थी. कई मौकों पर रोहित ने भी उस से अपने प्यार का इजहार किया था.

वह जब भी किसी मुश्किल में होता तो हर्षा उस के साथ खड़ी रहती. कई बार उस ने रुपएपैसे से भी रोहित की मदद की थी. यहां तक कि अपने पापा की पहुंच और रुतबे से उस ने कई बार उस के बेहद जरूरी काम भी करवाए थे. तो क्या रोहित के प्यार में स्वार्थ की मिलावट थी? हर्षा बेहद उदास थी, पर उस ने अपनेआप को टूटने नहीं दिया.

अगर रोहित को उस की परवाह नहीं तो वह क्यों उस के प्यार में टूट कर बिखर जाए? क्या हुआ जो वह मोटी है… क्या मोटे लोग इंसान नहीं होते? और फिर वह तो बिलकुल फिट है. इस तरह की सोच से अपनेआप को सांत्वना दे रही हर्षा ने आखिरकार पापा की पसंद के लड़के अजय से शादी कर ली, जो उसी की तरह काफी हैल्दी था.

स्टेज पर उन दोनों की जोड़ी देख किसी ने पीठपीछे उन का मजाक उड़ाया तो किसी ने उन्हें यह कह कर दिली मुबारकबाद दी कि उन की जोड़ी बहुत जम रही है. बहरहाल, अजय से शादी कर हर्षा अपनी ससुराल इंदौर आ गई.

शादी के बाद अजय के साथ हर्षा बहुत खुश थी. अजय उसे बहुत प्यार करता था और साथ ही उस का सम्मान भी. रोहित को वह एक तरह से भूल चुकी थी.

एक दिन अजय को खुशखबरी देते हुए हर्षा ने बताया कि उन के यहां एक नन्हा मेहमान आने वाला है. अजय इस बात से बहुत खुश हुआ. अब वह हर्षा का और भी ध्यान रखने लगा. 10-15 दिन ही बीते थे कि अचानक एक शाम हर्षा को पेट में भयंकर दर्द उठा. अजय उस वक्त औफिस में था. फोन पर हर्षा से बात होते ही वह घर रवाना हो गया.

लेकिन अजय के पहुंचने तक हर्षा का बच्चा अबौर्ट हो चुका था. असीम दर्द से हर्षा वाशरूम में ही बेहोश हो चुकी थी और वहीं पास मुट्ठी भर भू्रण निष्प्राण पड़ा था. अजय के दुख का कोई ठिकाना न था. बड़ी मुश्किल से बेहोश हर्षा हौस्पिटल पहुंचाई गई.

हर्षा के होश में आने के बाद डा. संध्या ने उन्हें अपने कैबिन में बुलाया, ‘‘अजय और हर्षा मुझे बेहद दुख है कि आप का पहला बच्चा इस तरह से अबौर्ट हो गया. दरअसल, हर्षा यह वह वक्त है जब आप दोनों को अपनी फिटनैस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि अभी आप की उम्र कम है. यह उम्र आप के वजन को आप की शारीरिक फिटनैस पर हावी नहीं होने देगी, पर आगे चल कर आप को इस वजह से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए सही यह होगा कि नए मेहमान को अपने घर लाने से पहले आप अपने वजन को न सिर्फ नियंत्रित करें, बल्कि कम भी करें.’’

डा. संध्या ने उन्हें एक फिटनैस ट्रेनर का नंबर दिया. शुरुआत में हर्षा को यह बेहद मुश्किल लगा. वह अपनी पसंद की चीजें खाने का मोह नहीं छोड़ पा रही थी और न ही ज्यादा ऐक्सरसाइज कर पाती थी. थोड़ा सा वर्कआउट करते ही थक जाती. पर अजय के साथ और प्यार ने उसे बढ़ने का हौसला दिया.

कहना न होगा कि संयमित खानपान और नियमित ऐक्सरसाइज ने चंद महीनों में ही अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया. करीब 6 महीनों में दोनों पतिपत्नी का कायापलट हो गया. अजय जहां 75 किलोग्राम का रह गया वहीं हर्षा का वजन 60 किलोग्राम पर आ गया.

हर्षा की खुशी का ठिकाना न था. प्यारी तो वह पहले भी बहुत लगती थी, पर अब उस का आत्मविश्वास और सुंदरता दोगुनी हो उठी. अपनी ड्रैसिंगसैंस और हेयरस्टाइल में चेंज कर वह और भी दमक उठी. डेढ़ साल पहले नन्हे आदी ने उस की कोख में आ कर उस के मातृत्व को भी महका दिया. संपूर्ण स्त्री की गरिमा ने उस के व्यक्तित्व में चार चांद लगा दिए. पर यह रोहित को क्या हुआ, उस की पत्नी प्रीति भी इतनी हैल्दी कैसे हो गई… हर्षा सोचती जा रही थी. नींद अभी भी उस की आंखों से कोसों दूर थी.

सुबह 9 बजे आंख खुलने पर हर्षा हड़बड़ा कर उठी. उफ कितनी देर हो गई, अजय औफिस चले गए होंगे. रोहित और उस की वाइफ शाम को खाने पर आएंगे. अभी वह इसी सोचविचार में थी कि चाय की ट्रे ले कर अजय ने रूम में प्रवेश किया.

‘‘गुड मौर्निंग बेगम, पेश है बंदे के हाथों की गरमगरम चाय.’’

‘‘अरे, तुम आज औफिस नहीं गए और आदी कहां है? तुम ने मुझे जगाया क्यों नहीं?’’ हर्षा ने सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘अरे आराम से भई… एकसाथ इतने सवाल… मैं ने आज अपनी प्यारी सी बीवी की मदद करने के लिए औफिस से छुट्टी ले ली है. आदी दूध पी कर दादी के साथ बाहर खेलने में मस्त है… मैं ने आप को इसलिए नहीं उठाया, क्योंकि मुझे लगा आप देर रात सोई होंगी.’’

सच में कितनी अच्छी हैं अजय की मां, जब भी वह व्यस्त होती है या उसे अधिक काम होता है वे आदी को संभाल लेती हैं. उसे अजय पर भी बहुत प्यार आया कि उस ने उस की मदद के लिए औफिस से छुट्टी ले ली. लेकिन भावनाओं को काबू करती वह उठ खड़ी हुई, शाम के मेहमानों की खातिरदारी की तैयारी के लिए.

सुबह के सभी काम फुरती से निबटा कर मां के साथ उस ने रात के खाने की सूची बनाई. मेड के काम कर के जाने के बाद हौल के परदे, सोफे के कवर वगैरह सब अजय ने बदल दिए. गार्डन से ताजे फूल ला कर सैंटर टेबल पर सजा दिए.

शाम को करीब 7 बजे रोहित और प्रीति आ गए. हर्षा और अजय ने बहुत आत्मीयता से उन का स्वागत किया. दोनों मां और आदी से मिल कर बहुत खुश हुए. खासकर प्रीति तो आदी को छोड़ ही नहीं रही थी. आदी भी बहुत जल्दी उस से घुलमिल गया. हर्षा ने उन दोनों को अपना घर दिखाया. प्रीति ने खुल कर हर्षा और उस के घर की तारीफ की. खाना वगैरह हो जाने के बाद वे सभी बाहर दालान में आ कर बैठ गए. देर तक मस्ती, मजाक चलता रहा. पर बीचबीच में हर्षा को लग रहा था कि रोहित उस से कुछ कहना चाह रहा है.

अजय की मां अपने वक्त पर ही सोती थीं. अत: वे उन सभी से विदा ले कर सोने चली गईं. इधर आदी भी खेलतेखेलते थक गया था. प्रीति की गोद में सोने लगा.

‘‘क्या मैं इसे तुम्हारे कमरे में सुला दूं? प्रीति ने पूछा.

हर्षा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘श्योर.’’

तभी अजय अपनी किसी जरूरी फोनकौल पर ऐक्सक्यूज मी कहते हुए बाहर निकल गया.

रोहित ने हर्षा की ओर बेचारगी भरी नजर डाली, ‘‘हर्षा मैं तुम्हारा गुनहगार हूं, तुम्हारा मजाक उड़ाया, दिल दुखाया. शायद उसी का सिला है कि आज तुम दोनों हमारी तरह हो और हम तुम्हारी तरह. बहुत गुरूर था मुझे अपनी डैशिंग पर्सनैलिटी पर. लेकिन अब देखो मुझे, कहीं का नहीं रह गया. शादी के वक्त प्रीति भी स्लिमट्रिम थी, पर वह भी बाद में ऐसी बेडौल हुई कि अब हम सोशली अपने यारदोस्तों और रिश्तेदारों से कम ही मिलते हैं.’’

कुछ देर रुक कर रोहित ने गहरी सांस ली, ‘‘सब से बड़ा दुख मुझे प्रीति की तकलीफ देख कर होता है. 2 मिस कैरेज हो चुके हैं उस के. डाक्टर ने वजन कम करने की सलाह दी है, मगर हम दोनों की हिम्मत नहीं होती कि कहां से शुरुआत करें. बहुत इतराते थे अपनी शादी के बाद हम, पर वह इतराना ऐसा निकला कि अच्छीखासी हैल्थ को मस्तीमजाक में ही खराब कर लिया और अब… जानती हो घर से दूर जैसे ही इंदौर आने का चांस मिला तो मैं ने झट से हां कह दी ताकि लोगों के प्रश्नों और तानों से कुछ तो राहत मिले.

पर जानते नहीं थे कि यहां इतनी जल्दी तुम से टकरा जाएंगे. कल पार्टी में तुम्हें देख काफी देर तक तो पहचान ही नहीं पाया. लेकिन जब नाम सुना तब श्योर हो गया और फिर बड़ी हिम्मत जुटा कर तुम से बात करने की कोशिश की,’’ रोहित के चेहरे पर दुख की कोई थाह नहीं थी.

रोहित और प्रीति की परेशानी जान हर्षा की उस के प्रति सारी नाराजगी दूर हो गई. बोली, ‘‘रोहित, यह सच है कि तुम्हारे इनकार ने मुझे बेहताशा दुख पहुंचाया था, पर अजय के प्यार ने तुम्हें भूलने पर मुझे मजबूर कर दिया. आज मेरे मन में तुम्हारे लिए तनिक भी गुस्सा बाकी नहीं है.’’

तभी सामने से आ रहे अजय ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘भई कौन किस से गुस्सा है?’’

‘‘कुछ नहीं अजय,’’ कह कर हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति की परेशानी के बारे में बताया.

‘‘अरे तुम दोनों हर्षा के साथ जा कर डा. संध्या से मिल लो. जरूर तुम्हें सही सलाह देंगी,’’ अजय ने कहा. तब तक प्रीति भी आदी को सुला कर आ गई थी.

‘‘हां रोहित, तुम बिलकुल चिंता न करो, मैं कल ही प्रीति और तुम्हें अपनी डाक्टर के पास ले चलूंगी… बहुत जल्दी प्रीति की गोद में भी एक नन्हा आदी खेलेगा,’’ कहते हुए हर्षा ने प्रीति को गले लगा लिया.

उन दोनों के जाने के बाद हर्षा देर तक रोहित और प्रीति के बारे में सोचती रही. वह प्रीति की तकलीफ समझ सकती थी, क्योंकि वह खुद भी कभी इस तकलीफ से गुजर चुकी थी. उस ने तय किया कि वह उन दोनों की मदद जरूर करेगी.

हर्षा इसी सोच में गुम थी कि पीछे से आ कर अजय ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस ने भी हंसते हुए रात भर के लिए अपनेआप को उन बांहों की गिरफ्त के हवाले कर दिया.

Sexual Tension: मैं अपने एक्स बौयफ्रेंड को किस करना चाहती हूं

Sexual Tension: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं और मेरा एक्स एक ही कंपनी में काम करते हैं. मैं उसे जबतब देखती हूं तो मेरा उसे किस करने या उस से गले लगने का मन करता है. वह मुझे देख कर कभीकभी मुसकरा देता है, हायहैलो भी बोल देता है. मुझे लगता है कि मैं उस से बात करना शुरू कर दूं, कुछ भी कर उस के करीब फिर से आ जाऊं. उसे देख कर लगता है कि वह भी यही सब फील करता है. यह सैक्सुअल टैंशन अब मेरे दिमाग पर चढ़ती जा रही है और मुझे सम झ नहीं आ रहा क्या करूं?

जवाब –

पहले तो यह अंदाजा मत लगाइए कि वह भी यही चाहता होगा क्योंकि अंदाजा गलत निकलने पर सिचुएशन काफी बिगड़ जाएगी. आप इनडायरैक्टली उस से बात करने के बहाने यह कन्फर्म कर सकती हैं कि वह भी आप से किसी तरह का रिलेशन चाहता है या नहीं. अगर वह भी यही चाहता हो तो प्रौब्लम कुछ नहीं है. यह जान लें कि एक्स के साथ अकसर चीजें उस पेस पर आगे नहीं बढ़तीं जिस तरह एक समय पर थीं. ऐसे में कुछ भी करने से पहले ध्यान दें कि औफिस आप दोनों के लिए औक्वर्ड हो सकता है.

इस के अलावा यह हो सकता है कि आप सैक्सुअल टैंशन को ही खत्म कर दें. अपने एक्स को देखने के बजाय किसी और लड़के को देखिए, किसी और से बात कीजिए. अपना ध्यान अपने काम पर और अन्य लोगों पर लगाइए. सैक्सुअल टैंशन को डाइवर्ट करना बैस्ट औप्शन है. आप चाहें तो किसी डेटिंग ऐप का यूज भी कर सकती हैं. हो सकता है इस से आप को अपने एक्स को देख कर वह सब फील न हो, जो आजकल हो रहा है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

Exclusive Interview: अब इंस्टाग्राम तो एडल्ट साइट हो गया है – संदीप भोजक

Exclusive Interview: राजस्थान के बीकानेर शहर से निकल कर मुंबई फिल्म नगरी में अपना मुकाम बनाना कोई आसान काम नहीं है, पर संदीप भोजक ने यह कामयाबी हासिल कर ली है. वे अब तक ‘दीया और बाती हम’, ‘परमावतार श्रीकृष्ण’, ‘जय संतोषी मां’, ‘शक्ति’, ‘ये हैं मोहब्बतें’, ‘कुमकुम भाग्य’, ‘कसौटी जिंदगी की 2’ जैसे कई टैलीविजन सीरियलों के अलावा ‘गांधी गोडसे : एक युद्ध’, ‘बैड बौयज’, ‘बैटल औफ सारागढ़ी’, ‘राम राज्य’ जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके हैं.

पेश हैं, संदीप भोजक से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

ऐक्टर बनने की बात आप ने कब सोची?

हम तो बीकानेर के रहने वाले हैं. मेरे पिता विनोद भोजक आकाशवाणी के लिए गाना गाने के अलावा टूरिस्ट गाइड के रूप में काम करते हैं. स्कूल के दिनों से ही मुझे भी थिएटर का चसका लग गया था. पढ़ाई पूरी होने के बाद साल 2010 में मेरा ब्याह हो गया और पिताजी ने मुझे जूते की दुकान खुलवा दी.

जूते की दुकान चलाते हुए मैं थिएटर भी कर रहा था. फिर एक दिन मुझे अहसास हुआ कि कलाकार के तौर पर मुझे अपनेआप को एक मौका देना चाहिए. दुकान में सेल लगा दी. एक ही दिन में सारे जूते बिक गए, तो अपनी पत्नी और पिताजी से बात कर के मैं मुंबई रवाना हो गया. मैं ने उन से वादा किया था कि अगर 6 महीने में ऐक्टर नहीं बना, तो फिर से जूतों की दुकान खोल लूंगा.

साल 2015 में मुंबई पहुंचने के बाद 2-3 दिन थिएटर के दोस्त के साथ गुजारे, फिर मैं ने विरार इलाके में किराए के मकान में रहना शुरू कर दिया था.

मैं ने मुंबई में एकएक रुपए के लिए संघर्ष किया. 50-50 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था, तो लोकल ट्रेन में धक्के खाए. कई बार ऐसा भी हुआ, जब 100 किलोमीटर दूर जाने के लिए रुपए नहीं थे. कई बार औडिशन के लिए पहुंचते तो पता चलता कि औडिशन कहीं और है.

पर 3 महीने के अंदर ही मुझे लोकप्रिय सीरियल ‘दीया और बाती हम’ में काम करने का मौका मिला. इस ने मुझे पहचान दिलाई.

फिल्म ‘बैड बौयज’ तो मिथुन चक्रवर्ती के बेटे और प्रोड्यूसर की बेटी के लिए बनाई गई थी. ऐसे में इस फिल्म से जुड़ने में आप को कोई हिचक नहीं हुई थी?

यह सब तो फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा है. मुझे भी कई बार अफसोस होता है, पर मेरी यह फिल्म यात्रा है. अगर मेरे पिता भी फिल्म प्रोड्यूसर या डायरैक्टर होते, तो मैं ने जो 10 साल स्ट्रगल किया है, वह शायद न करना पड़ता.

कई सीनियर कलाकार हैं, जिन्हें देख कर मैं मोटिवेट होता रहता हूं, मसलन पंकज त्रिपाठी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी वगैरह, जो कामयाबी के मुकाम पर हैं.

जब ‘बैटल औफ सारागढ़ी’ जैसी फिल्में बंद हो जाती हैं, जिन के लिए आप ने अपना 2 साल से ज्यादा का समय भी दिया, तो कैसा लगता है?

सच कहूं तो मैं 3 दिन तक खूब रोया था, लेकिन मुझे सब से ज्यादा दुख डायरैक्टर राज कुमार संतोषी के लिए हो रहा था, जिन्होंने इस सबजैक्ट पर 10 साल तक काम किया था.

क्या कारपोरेट हमारे सिनेमा को बरबाद कर रहा है या हमारे प्रोड्यूसर नासमझ हैं?

हम ने शुरू में ही पढ़ा था कि कंटैंट इज किंग. इसे सभी भुला चुके हैं. कंटैंट पर कोई काम ही नहीं कर रहा. लोग प्रपोजल बना रहे हैं कि इस इस कलाकार को ले कर इतने बजट में फिल्म बना कर इतने में बेच देंगे. मतलब प्रोजैक्ट बन रहा है. जिस दिन ये प्रोजैक्ट बंद हो जाएंगे, कहानी पर काम किया जाएगा, तब सिनेमा का विकास होगा.

फिलहाल तो चंद बड़े कलाकार फिल्म के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा ले जाते हैं और बाकी कलाकारों को अपना मेहनताना पाने के लिए सालभर तक भटकना पड़़ता है. कम लागत की छोटी फिल्में तो बनना ही बंद हो गई हैं.

जब ओटीटी आया था, तो लगा था कि एक बूम आ गया है. इस से फिल्म प्रोड्यूसरों को सपोर्ट मिलेगा, लेकिन अब यह भी फुस हो गया है. अब ओटीटी ने कह दिया है कि पहले अपनी फिल्म को थिएटर में रिलीज करो, उस के बाद ही हम लेंगे.

मल्टीप्लैक्स में टिकटों की दरें इतनी ज्यादा हैं कि एक परिवार सिनेमा देखने जाए, तो उस की जेब में कम से कम 5,000 रुपए होने ही चाहिए. सरकार को टिकट के दाम पर लगाम लगाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए.

जब ‘पुष्पा 2’ जैसी फिल्में रिलीज होती हैं, तब टिकट के दाम और बढ़ा दिए जाते हैं और सिनेमाघर भी हाउसफुल हो जाते हैं. आप इसे कैसे देखते हैं?

दक्षिण के फिल्मकार अपने सिनेमा में कंटैंट पर काफी काम करते हैं. मु?ो तो लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लोग कन्फ्यूज्ड हैं कि किस तरह का सिनेमा बनाना है. यहां की जो फिल्में हिट हुई हैं, वे भी दक्षिण की फिल्मों की नकल या रीमेक ही रही हैं.

यहां अच्छे लेखकों की कमी नहीं है, मगर यहां के फिल्मकार अपने लेखकों को न सम्मान देते हैं और न ही अच्छा पैसा देते हैं. लेखक से ज्यादा पैसे तो लाइटमैन या स्पौटबौय को मिल जाते हैं.

सीरियल ‘जानेअनजाने हम मिले’ में अपने किरदार को ले कर आप क्या कहेंगे?

यह सीरियल रीत और राघव के इर्दगिर्द घूमता है, जिन्हें ‘आटासाटा’ प्रथा के तहत शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है. इस में मैं जो किरदार निभा रहा हूं, उस में काफी शेड्स हैं.

सोशल मीडिया को ले कर आप क्या सोचते हैं?

मुझे लगता है कि सोशल मीडिया सिनेमा को एक अलग ही दिशा में ले जा रहा है. इन दिनों इंस्टाग्राम पर मानो नंगापन परोसा जा रहा है. अब इंस्टाग्राम तो एडल्ट साइट हो गया है.

आप नया क्या कर रहे हैं?

मेरी 2 फिल्में जल्द ही रिलीज होंगी. इन में से एक फिल्म ‘लव स्टोरीज औफ नाइटीज’ है, जिस के डायरैक्टर अमित कंसारिया हैं. दूसरी फिल्म को ले कर सिर्फ इतना कहूंगा कि यह एक बड़े बजट की ऐतिहासिक फिल्म है.

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