मैं 12वीं जमात में पढ़ता हूं और पुलिस में जाना चाहता हूं. इस के लिए मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 12वीं जमात में पढ़ता हूं और पुलिस में जाना चाहता हूं. इस के लिए मैं क्या करूं?

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जवाब-

पुलिस में जाने के लिए अच्छी सेहत और कदकाठी की जरूरत होती है. 10वीं पास उम्मीदवार इस में जा सकते हैं. आप इस महकमे में निकलने वाली नई नौकरियों की जानकारी लेते रहें और कामयाब होने के लिए उन लोगों से मिलें जो यह नौकरी हासिल कर चुके हैं.

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चक्रव्यूह: भाग 1

सुबह का अखबार देखते ही मंसूर चौंक पड़ा. धूधू कर जलता ताज होटल और शहीद हुए जांबाज अफसरों की तसवीरें. उस ने लपक कर टीवी चालू किया. तब तक सायरा भी आ गई.

‘‘किस ने किया यह सब?’’ उस ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘वहशी दरिंदों ने.’’

तभी सायरा का मोबाइल बजा. उस की मां का फोन था.

‘‘जी अम्मी, हम ने भी अभी टीवी खोला है…मालूम नहीं लेकिन पुणे तो मुंबई से दूर है…वह तो कहीं भी कभी भी हो सकता है अम्मी…मैं कह दूंगी अम्मी… हां, नाम तो उन्हीं का लगेगा, चाहे हरकत किसी की हो…’’

‘‘सायरा, फोन बंद करो और चाय बनाओ,’’ मंसूर ने तल्ख स्वर में पुकारा, ‘‘किस की हरकत है…यह फोन पर अटकल लगाने का मुद्दा नहीं है.’’

सायरा सिहर उठी. मंसूर ने पहली बार उसे फोन करते हुए टोका था और वह भी सख्ती से.

‘‘जी…अच्छा, मैं कुछ देर बाद फोन करूंगी आप को…जी अम्मी जरूर,’’ कह कर सायरा ने मोबाइल बंद कर दिया और चाय बनाने चली गई.

टीवी देखते हुए सायरा भी चुपचाप चाय पीने लगी. पूछने या कहने को कुछ था ही नहीं. कहीं अटकलें थीं और कहीं साफ कहा जा रहा था कि विभिन्न जगहों पर हमले करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादी थे.

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‘‘आप आज आफिस मत जाओ.’’

इस से पहले कि मंसूर जवाब देता दरवाजे की घंटी बजी. उस का पड़ोसी और सहकर्मी सेसिल अपनी बीवी जेनेट के साथ खड़ा था.

‘‘लगता है तुम दोनों भी उसी बहस में उलझ कर आए हो जिस में सायरा मुझे उलझाना चाह रही है,’’ मंसूर हंसा, ‘‘कहर मुंबई में बरस रहा है और हमें पुणे में, बिल में यानी घर में दुबक कर बैठने को कहा जा रहा है.’’

‘‘वह इसलिए बड़े भाई कि अगला निशाना पुणे हो सकता है,’’ जेनेट ने कहा, ‘‘वैसे भी आज आफिस में कुछ काम नहीं होगा, सब लोग इसी खबर को ले कर ताव खाते रहेंगे.’’

‘‘खबर है ही ताव खाने वाली, मगर जेनी की यह बात तो सही है मंसूर कि आज कुछ काम होगा नहीं.’’

‘‘यह तो है सेसिल, शिंदे साहब का बड़ा भाई ओबेराय में काम करता है और बौस का तो घर ही कोलाबा में है. इसलिए वे लोग तो आज शायद ही आएं. और लोगों को फोन कर के पूछते हैं,’’ मंसूर बोला.

‘‘जब तक आप लोग फोन करते हैं मैं और जेनी नाश्ता बना लेते हैं, इकट्ठे ही नाश्ता करते हुए तय करना कि जाना है या नहीं,’’ कह कर सायरा उठ खड़ी हुई.

‘‘यह ठीक रहेगा. मेरे यहां जो कुछ अधबना है वह यहीं ले आती हूं,’’ कह कर जेनेट अपने घर चली गई. यह कोई नई बात नहीं थी. दोनों परिवार अकसर इकट्ठे खातेपीते थे लेकिन आज टीवी के दृश्यों से माहौल भारी था. सेसिल और मंसूर बीचबीच में उत्तेजित हो कर आपत्तिजनक शब्द कह उठते थे, जेनी और सायरा अपनी भरी आंखें पोंछ लेती थीं तभी फिर मोबाइल बजा. सायरा की मां का फोन था.

‘‘जी अम्मी…अभी वही बात चल रही है…दोस्तों से पूछ रहे हैं…हो सकता है हो, अभी तो कुछ सुना नहीं…कुछ मालूम पड़ा तो जरूर बताऊंगी.’’

‘‘फोन मुझे दो, सायरा,’’ मंसूर ने लपक कर मोबाइल ले लिया, ‘‘देखिए अम्मीजान, जो आप टीवी पर देख रही हैं वही हम भी देख रहे हैं इसलिए क्या हो रहा है उस बारे में फोन पर तबसरा करना इस माहौल में सरासर हिमाकत है. बेहतर रहे यहां फोन करने के बजाय आप हकीकत मालूम करने को टीवी देखती रहिए.’’

मोबाइल बंद कर के मंसूर सायरा की ओर मुड़ा, ‘‘टीवी पर जो अटकलें लगाई जा रही हैं वह फोन पर दोहराने वाली नहीं हैं खासकर लाहौर की लाइन पर.’’

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‘‘आज के जो हालात हैं उन में लाहौर से तो लाइन मिलानी ही नहीं चाहिए. माना कि तुम कोई गलत बात नहीं करोगी सायरा, लेकिन देखने वाले सिर्फ यह देखेंगे कि तुम्हारी कितनी बार लाहौर से बात हुई है, यह नहीं कि क्या बात हुई है,’’ सेसिल ने कहा.

‘‘सायरा, अपनी अम्मी को दोबारा यहां फोन करने से मना कर दो,’’ मंसूर ने हिदायत के अंदाज में कहा.

‘‘आप जानते हैं इस से अम्मी को कितनी तकलीफ होगी.’’

‘‘उस से कम जितनी उन्हें यह सुन कर होगी कि पुलिस ने हमारे लाहौर फोन के ताल्लुकात की वजह से हमें हिरासत में ले लिया है,’’ मंसूर चिढ़े स्वर में बोला.

‘‘आप भी न बड़े भाई बात को कहां से कहां ले जाते हैं,’’ जेनेट बोली, ‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन फिर भी एहतियात रखनी तो जरूरी है सायरा. अब जब अम्मी का फोन आए तो उन्हें भी यह समझा देना.’’

दूसरे सहकर्मियों को फोन करने के बाद सेसिल और मंसूर ने भी आफिस जाने का फैसला कर लिया.

‘‘मोबाइल पर नंबर देख कर ही फोन उठाना सायरा, खुद फोन मत करना, खासकर पाकिस्तान में किसी को भी,’’ मंसूर ने जातेजाते कहा.

मंसूर ने रोज की तरह अपना खयाल रखने को नहीं कहा. वैसे आज जेनी और सेसिल ने भी ‘फिर मिलते हैं’ नहीं कहा था.

सायरा फूटफूट कर रो पड़ी. क्या चंद लोगों की वहशियाना हरकत की वजह से सब की प्यारी सायरा भी नफरत के घेरे में आ गई?

नौकरानी न आती तो सायरा न जाने कब तक सिसकती रहती. उस ने आंखें पोंछ कर दरवाजा खोला. सक्कू बाई ने उस से तो कुछ नहीं पूछा मगर श्रीमती साहनी को न जाने क्या कहा कि वह कुछ देर बाद सायरा का हाल पूछने आ गईं. सायरा तब तक नहा कर तैयार हो चुकी थी लेकिन चेहरे की उदासी और आंसुओं के निशान धुलने के बावजूद मिटे नहीं थे.

‘‘सायरा बेटी, मुंबई में कोई अपना तो परेशानी में नहीं है न?’’

‘‘मुंबई में तो हमारा कोई है ही नहीं, आंटी.’’

‘‘तो फिर इतनी परेशान क्यों लग रही हो?’’

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साहनी आंटी से सायरा को वैसे भी लगाव था. उन के हमदर्दी भरे लफ्ज सुनते ही वह फफक कर रो पड़ी. रोतेरोते ही उस ने बताया कि सब ने कैसे उसे लाहौर बात करने से मना किया है. मंसूर ने अम्मी से तल्ख लफ्जों में क्या कहा, यह भी नहीं सोचा कि उन्हें मेरी कितनी फिक्र हो रही होगी. ऐसे हालात में वह बगैर मेरी खैरियत जाने कैसे जी सकेंगी?

‘‘हालात को समझो बेटा, किसी ने आप से कुछ गलत करने को नहीं कहा है. अगर किसी को शक हो गया तो आप की ही नहीं पूरी बिल्ंिडग की शामत आ सकती है. लंदन में तेरा भाई सरवर है न इसलिए अपनी खैरखबर उस के जरिए मम्मी को भेज दिया कर.’’

‘‘पता नहीं आंटी, उस से भी बात करने देंगे या नहीं?’’

‘‘हालात को देखते हुए न करो तो बेहतर है. रंजीत ने तुझे बताया था न कि वह सरवर को जानता है.’’

‘‘हां, आंटी दोनों एक ही आफिस में काम करते हैं,’’ सायरा ने उम्मीद से आंटी की ओर देखा, ‘‘क्या आप मेरी खैरखबर रंजीत भाई के जरिए सरवर को भेजा करेंगी?’’

‘‘खैरखबर ही नहीं भेजूंगी बल्कि पूरी बात भी समझा दूंगी,’’ श्रीमती साहनी ने घड़ी देखी, ‘‘अभी तो रंजीत सो रहा होगा, थोड़ी देर के बाद फोन करूंगी. देखो बेटाजी, हो सकता है हमेशा की तरह चंद दिनों में सब ठीक हो जाए और हो सकता है और भी खराब हो जाए, इसलिए हालात को देखते हुए अपने जज्बात पर काबू रखो. आतंकवादी और उन के आकाओं की लानतमलामत को अपने लिए मत समझो और न ही यह समझो कि तुम्हें तंग करने को तुम से रोकटोक की जा रही…’’ श्रीमती साहनी का मोबाइल बजा. बेटे का लंदन से फोन था.

‘‘बस, टीवी देख रहे हैं…फिलहाल तो पुणे में सब ठीक ही है. पापा काम पर गए. मैं सायरा के पास आई हुई हूं. परेशान है बेचारी…उस की मां का यहां फोन करना मुनासिब नहीं है न…हां, तू सरवर को यह बात समझा देना…वह भी ठीक रहेगा. वैसे तू उसे बता देना कि हमारे यहां तो कसूरवार को भी तंग नहीं करते तो बेकसूर को क्यों परेशान करेंगे, उसे सायरा की फिक्र करने की जरूरत नहीं है.’’

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

अपनी धरती अपना देश

‘‘कसम ऊपर वाले की, जो दोबारा कभी यूरोप गया. न तो वहां किसी में सिविक सेंस है और न ही नागरिक अधिकारों के बारे में कोई जागरुकता,’’ वह आज ही यूरोप की यात्रा से लौटे थे और पानी पीपी कर यूरोप को कोसे जा रहे थे.

‘‘लेकिन इन मामलों में तो अंगरेज अग्रदूत माने जाते हैं,’’ मैं ने टोका.

‘‘क्या खाक माने जाते हैं,’’ वह गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छनछना उठे, ‘‘यह बताइए कि सांस लेना और खानापीना मनुष्य का मौलिक अधिकार है या नहीं?’’

‘‘है,’’ मैं ने सिर हिलाया.

‘‘तो फिर उगलना और विसर्जन करना भी मौलिक अधिकार हुआ,’’ उन्होंने विजयी मुद्रा में घोषणा की फिर बोले, ‘‘एक अपना देश है जहां चाहो विसर्जन कर लो. आबादी हो या निर्जन, कहीं कोई प्रतिबंध नहीं, लेकिन वहां पेट भले फट जाए पर मकान व दुकान के सामने तो छोड़ो सड़क किनारे भी विसर्जन नहीं कर सकते.’’

‘‘लेकिन वहां सरकार ने जगहजगह साफसुथरे टायलेट बनवा रखे हैं, उन में जाइए,’’ मैं ने समझाया.

‘‘बनवा तो रखे हैं लेकिन अगर हाजत आप को चांदनी चौक में लगी हो और फारिग होने कनाट प्लेस जाना पड़े तो क्या बीतेगी?’’ उन्होंने आंखें तरेरीं फिर तमकते हुए बोले, ‘‘आप को कुछ पता तो है नहीं. घर से बाहर निकलिए, दुनिया देखिए तब अच्छेबुरे में फर्क करने की तमीज पैदा हो पाएगी. तब तक के लिए फुजूल में टांग घुसेड़ने की आदत छोड़ दीजिए.’’

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मुझे डपटने के बाद शायद उन्हें कुछ रहम आया. अत: थोड़ा मधुर कंठ से बोले, ‘‘यह बताइए कि आप को जुकाम हो और नाक गंदे नाले की तरह बह रही हो तो क्या करेंगे?’’

‘‘जुकाम की दवा खाएंगे,’’ मैं ने तड़ से बताया.

वह पल भर के लिए हड़बड़ाए. शायद मनमाफिक उत्तर नहीं मिला था. अत: अपने प्रश्न को थोड़ा और संशोधित करते हुए बोले, ‘‘डाक्टर की दुकान में घुसने से पहले क्या करेंगे आप?’’

‘‘जेब टटोल कर देखेंगे कि बटुआ है कि नहीं,’’ मैं ने फिर तड़ से उत्तर दिया.

इस बार उन के सब्र का पैमाना छलक गया. वह हत्थे से उखड़ते हुए बोले, ‘‘क्या बेहूदों की तरह नाक बहाते भीतर घुस जाएंगे और सुपड़सुपड़ कर सब के सामने नाक सुड़किएगा?’’

‘‘जी, नहीं, पहले नाक छिनक कर साफ करूंगा फिर भीतर जाऊंगा,’’ मैं ने कबूला. उन का प्रश्न वाजिब था. पर मेरी ही समझ में कुछ विलंब से आया.

‘‘तो गोया कि आप पहले घर जाएंगे और राजा बेटा की तरह नाक साफ करेंगे फिर वापस आ कर डाक्टर की दुकान में जाएंगे,’’ वह रहस्यमय ढंग से मुसकराए.

‘‘खामखां मैं घर क्यों जाऊंगा? वहीं नाक साफ करूंगा फिर डाक्टर से दवा ले कर घर लौटूंगा,’’ इस बार उखड़ने की बारी मेरी थी.

‘‘यही तो…यही तो…मैं सुनना चाहता था आप की जबान से,’’ वह यों उछले जैसे बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो. फिर मेरे कंधों पर हाथ रख भावुक हो उठे, ‘‘वहां जुकाम हो तो सड़क पर नाक नहीं छिनक सकते. कहते हैं रूमाल में पोंछ कर जेब में रख लो. छि…छि…सोच कर भी घिन आती है. उसी रूमाल से मुंह पोंछो, उसी से नाक. दोनों हैं अगलबगल में पर कुदरत ने कुछ सोच कर ही दोनों के छेद अलगअलग बनाए हैं. वह फर्क तो बरकरार रखना चाहिए.’’

‘‘तो 2 रूमाल रख लीजिए,’’ मैं ने उन की भीषण समस्या का आसान सा हल सुझाया फिर समझाने लगा, ‘‘सड़क पर एक इनसान गंदगी करता है तो दूसरे को उस की गंदगी साफ करनी पड़ती है. कितनी गलत बात है यह.’’

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‘‘बात गलत नहीं, बल्कि सोच गलत है तुम्हारी,’’ वह शोले से भड़के. फिर मेरी अज्ञानता पर तरस खा शांत स्वर में बोले, ‘‘वैसे देखा जाए तो गलती तुम्हारी नहीं है. गलती तुम्हारी उस शिक्षा की है जो अंगरेजों की देन है.’’

इतना कह कर वह पल भर के लिए ठहरे फिर सांस भरते हुए बोले, ‘‘हम भारतवासी सदा से दयालु रहे हैं. जितना खाते हैं उतना गिराते भी हैं ताकि कीड़ेमकोड़ों और पशुपक्षियों का भी पेट भर सके. लेकिन ये जालिम अंगरेज तो इनसानों का भी भला नहीं सोचते.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं.’’

उन्होंने मुझ पर तरस खाती दृष्टि डाली फिर समझाने की मुद्रा में बोले, ‘‘बरखुरदार, अपने देश में हम लोग परंपरापूर्वक मूंगफली और केला खा कर प्लेटफार्म पर फेंकते हैं, पूर्ण आस्था के साथ पान खा कर आफिस में थूकते हैं. श्रद्धापूर्वक बचाखुचा सामान पार्क में छोड़ देते हैं. इस से समाज का बहुत भला होता है.’’

‘‘समाज का भला?’’

‘‘हां, बहुत बड़ा भला,’’ वह अत्यंत शांत मुद्रा में मुसकराए फिर पूर्ण दार्शनिक भाव से बोले, ‘‘गंदगी मचाने से रोजगार का सृजन होता है क्योंकि अगर गंदगी न हो तो सफाई कर्मचारियों को काम नहीं मिलेगा. बेचारों के परिवार भूखे नहीं मर जाएंगे? लेकिन अंगरेजों को इस से क्या? वे तो हमेशा से मजदूरों के दुश्मन रहे हैं. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी इनसान ने अधिकारों की मांग की है, अंगरेजों ने उसे बूटों तले कुचल डाला है.

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अब दूसरे मुल्कों में उन की हुकूमत तो रही नहीं, इसलिए अपने ही नागरिकों को गुलाम बना लिया. बेचारे अपने ही घर के सामने कूड़ा नहीं फेंक सकते, अपने ही महल्ले में सड़क घेर कर भजनकीर्तन नहीं कर सकते, सुविधानुसार गाड़ी पार्क नहीं कर सकते, अपने ही आफिस में पीक उगलने का आनंद नहीं ले सकते. जरूरत पड़ने पर इच्छानुसार विसर्जन नहीं कर सकते. काहे का लोकतंत्र जहां हर पसंदीदा चीज पर प्रतिबंध हो? सच्चा लोकतंत्र तो अपने यहां है. अपना देश, अपनी धरती. जहां चाहो थूको, जहां चाहो फेंको, जहां चाहो विसर्जन करो, कोई रोकटोक नहीं. इसीलिए तो कहते हैं, मेरा देश महान…’’

वह बोले जा रहे थे और मैं टकटकी बांधे देखे जा रहा था. लग रहा था कि शायद वह सही हैं.

सोशल मीडिया एक्टर नहीं बनाता- देव सिंह

भोजपुरी फिल्मों में नैगेटिव रोल निभा कर कुछ गिनेचुने चेहरों ने ही पहचान बनाने में कामयाबी पाई है. इन्हीं ऐक्टरों में एक नाम है देव सिंह का. मिमिक्री से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले देव सिंह के फिल्मों में आने के पीछे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है, जितनी किसी मसाला फिल्म की कहानी होती है.

एक मुलाकात में उन के फिल्मी सफर को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश:

आप के फिल्मों में आने की कहानी बहुत दिलचस्प रही है. क्या अपने चाहने वालों से इसे सा झा करना चाहेंगे?

मैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का रहने वाला हूं, लेकिन मेरा पालनपोषण पश्चिम बंगाल के आसनसोल में हुआ है. मेरे पिताजी वहां कोयले की खान में काम करते थे. बचपन में मेरा ऐक्टिंग की तरफ कोई रुझान नहीं था, लेकिन ग्रेजुएशन के दौरान अचानक मुझे ऐक्टिंग का शौक लग गया था.

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दरअसल, एक बार मैं आरकैस्ट्रा देखने गया था. मैं वहां सब से पीछे खड़ा था. लेकिन तभी मेरे मन से आवाज आई कि मैं यहां नहीं वहां स्टेज पर रहूं और लोग मुझे देखें. बस, उसी रात से नाम कमाने की भूख ने जन्म ले लिया और ऐक्टिंग की तरफ मेरा रुझान होता गया.

दरअसल, बाद में टेलीविजन पर एक शो देख कर मिमिक्री करने लगा, जो मेरे दोस्तों को बहुत पसंद आई. स्टेज पर आने के शौक को पूरा करने के लिए मैं एक आरकैस्ट्रा टीम में गया. वहां मुझे अमिताभ बच्चन के 38 डायलौग याद कर के बोलने के लिए कहा गया, जिन्हें मैं ने 2 घंटे में ही याद कर लिया था.

एक दोस्त की सलाह पर मैं दिल्ली आ गया. यहां से शुरू हुई जद्दोजेहद कर के एक एक्टर बनने की कहानी. दिल्ली में एक थिएटर ज्वौइन किया, जहां 3 महीने तक पोस्टकार्ड लिखने व चाय पिलाने और ब्रोशर बांटने का काम किया.

अचानक मेरे एक दोस्त ने कहा कि मुंबई जा कर जीरो लैवल से शुरुआत करो. इस के बाद मैं एक्टर बनने की चाहत ले कर सीधा मुंबई पहुंच गया, जहां लोगों ने मेरे भोलेपन का जम कर फायदा उठाया. लोग मेरे ही पैसे खा कर मुझे गलत बोलते थे, जिस की वजह से मैं धीरेधीरे डिप्रैशन में चला गया.

उस डिप्रैशन से निकलने के लिए मैं ने 3,000 रुपए की तनख्वाह पर सेल्समैन की नौकरी भी की. अभी नौकरी किए महीनाभर भी नहीं हुआ था कि मेरी मां की मौत हो गई. मैं निराश हो कर अपने गांव सहतवार आ गया और यहां मैं ने एक कपड़े की दुकान खोल ली.

लेकिन मेरा मन एक्टिंग में लगा रहता था, इसलिए मैं फिर से मुंबई आ गया. इस बार मुझे छोटेमोटे काम मिलने शुरू हो गए थे. फिर मेरी जद्दोजेहद रंग लाई और मुझे भोजपुरी की पहली फिल्म ‘दीवाना’ में काम मिला.

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इस फिल्म में मेरा बस एक ही सीन था, लेकिन उस एक सीन ने यह बताया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, बस सच्ची लगन होनी चाहिए. यही वह समय था, जहां से मेरे लिए फिल्मों के दरवाजे खुल गए.

भोजपुरी के दूसरे कई कामयाब कलाकारों की तरह क्या आप ने भी छोटे परदे पर काम किया है?

छोटा परदा किसी को भी कलाकार बनाने के लिए पहली क्लास है. कलर्स चैनल के सीरियल ‘भाग्य विधाता’ में मेरे किरदार को खूब पसंद किया गया था.

इस के अलावा ‘सीआईडी’, ‘अदालत’, ‘महाराणा प्रताप’, ‘जयजय बजरंग बली’, ‘शपथ’, ‘महिमा शनि देव की’, ‘इम्तिहान’, ‘सावधान इंडिया’ के कई ऐपिसोड में भी मैं ने काम किया है.

कोई नैगेटिव रोल निभाने के दौरान क्या कभी आप के मन में नैगेटिव खयाल भी आते हैं?

मैं फिल्मों में नैगेटिव किरदार में जितना दबंग और खतरनाक नजर आता हूं, असल जिंदगी में उतना ही सहज और मिलनसार हूं. ऐसे में किरदार से बाहर निकलने के बाद कभी भी नैगेटिव खयाल नहीं आते हैं.

आजकल नैगेटिव किरदार से निकल कर कई कलाकार कौमेडी और सीरियस किरदार करते हुए भी नजर आ रहे हैं. इस की क्या वजह है?

कोई भी कलाकार तभी पूरा होता है, जब वह सभी तरह के रोल में खुद को ढाल ले. जहां तक मेरा सवाल है, तो मैं भी वही कर रहा हूं.

आप की हिंदी फिल्म ‘किरकेट’ रिलीज होने वाली है. इस की कहानी कैसी है?

यह फिल्म बिहार में क्रिकेट पर हावी राजनीति पर बनी है. बिहार में क्रिकेट को ‘किरकेट’ कहा जाता है. इस फिल्म में मेरे साथ क्रिकेटर व सांसद रहे कीर्ति आजाद लीड रोल में हैं. फिल्म ‘किरकेट’ में मेरा किरदार एक विकेटकीपर का है. इस रोल के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी थी.

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आप के इस ऊंचाई तक पहुंचने में किस साथी कलाकार का अहम रोल रहा है?

मेरे फिल्मी करियर को आगे बढ़ाने में विशाल तिवारी और अवधेश मिश्र का प्रमुख योगदान रहा है. उन्होंने हर कदम पर मेरी मदद की है. इस के अलावा मैं ने जिन लोगों के साथ काम किया है, मैं उन का भी शुक्रगुजार हूं.

आप अपने किरदार में दम लाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं?

मेरी कोशिश रहती है कि मैं जिस किरदार को कर रहा हूं, उसे पूरी तरह से जी लूं. मैं ने फिल्म ‘विजेता’ के लिए अपने वजन को 14 किलो तक कम किया था, ताकि मैं धावक लगूं. फिल्म ‘छलिया’ के लिए थोड़े मसल्स बढ़ाए, ताकि कड़क दारोगा दिखूं.

आज की नई पीढ़ी सोशल मीडिया पर वीडियो बना कर ऐक्टर बनने का सपना देखती है. इस को ले कर आप का क्या नजरिया है?

सोशल मीडिया से संघर्ष कर के ऐक्टर नहीं बना जा सकता है. अगर ऐसा हो तो घरघर में ऐक्टर ही पैदा होने लगेंगे. ऐक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत और ऐक्टिंग की बारीकियों को सीखने की जरूरत होती है.

सुना है, आप अपनी फिटनैस को ले कर बहुत संजीदा रहते हैं?

आप ने बिलकुल सही सुना है. मैं अपने शरीर पर बहुत ध्यान देता हूं. हर दिन मैं जिम जाता हूं. अगर शूटिंग के लिए किसी छोटे शहर में भी रहता हूं तब वहां भी जिम ढूंढ़ लेता हूं. जहां मुझे जिम नहीं मिल पाता है, उस दिन मैं 4 से 5 किलोमीटर की दौड़ लगाता हूं.

आप अपने चाहने वालों से क्या कहना चाहेंगे?

मेरा यही मानना है कि कभी  झूठ न बोलें, कर्जदार न बनें, किसी की शिकायत या चुगली न करें. इन चीजों से दूर रहना आप की कामयाबी में मील का पत्थर साबित हो सकता है.

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Bigg Boss 13: रश्मि ने की अरहान के साथ शादी की प्लैनिंग, इस कंटेस्टेंट से की दिल की बात

कलर्स टीवी के बेहद पौपुलर रिएलिटी शो बिग बौस का सीजन 13 दर्शकों को खूब एंटरटेन कर रहा है. जहां एक तरफ घर में लड़ाई झगड़े देखने को मिल रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ बिग बौस के घर में प्यार के फूल भी खिल रहे हैं. जी हां, जैसा कि हम सबने देखा कि सोमवार के एपिसोड में 3 वाइल्डकार्ड एंट्रीज हुई हैं जिसमें से विशाल आदित्य सिंह की एक्स गर्लफ्रेंड मधुरिमा तुली, रश्मि देसाई के बेहद करीबी दोस्त अरहान खान और बिग बौस सीजन 13 की ही एक्स कंटेंस्टेंट शेफाली बग्गा का नाम शामिल है.

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अरहान ने किया अपने प्यार का इजहार…

अरहान खान ने घर में एंट्री मारते ही सबसे पहले रशमि देसाई से अपने प्यार का इजहार किया और उन्हें बताया कि वे उनके लिए कुछ लाए हैं. इसके बाद माहिरा के कहने पर अरहान ने रश्मि को अपने घुटनों पर बैठ कर प्रोपोज किया और उन्हें वे रिंग दिखाई जो वे उनके लिए लाए थे. वो बात अलग है कि ना अरहान ने रश्मि को रिंग पहनाई और ना ही रश्मि ने रिंग पहनी पर इतना तो तय है कि रश्मि और अरहान के प्यार की शुरूआत तो हो ही चुकी है.

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आरती सिंह के साथ की प्लैनिंग…

इसी के चलते बीते एपिसोड में रश्मि देसाई अपनी दोस्त आरती सिंह से अपनी शादी की बात करती नजर आईं. आरती सिंह रश्मि देसाई से उनकी शादी की प्लैनिंग के बारे में बात करते हुए पूंछती हैं कि क्या वे गर्मियों में शादी करने वाली हैं तो इसका जवाब देते हुए रश्मि कहती हैं कि फरवरी तक तो हम यहीं बिग बौस के घर में फंसे हुए हैं तो वे इस बारे में घर जाने के बाद ही सोचेंगी. रश्मि अपने दिल की बात आरती सिंह से कहती हैं की वे काफी खुश हैं.

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शादी को लेकर नहीं करेंगी कोई खुलासा…

इसी दौरान जब आरती उनके आगे की प्लैनिंग के बारे में पूंछती हैं तो रश्मि कहती हैं कि वे इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं लेना चाहतीं. रश्मि आरती को बताती हैं कि जो रिंग अरहान लाए हैं वो उनकी बहन ने ही उनके लिए डिजाइन की है. रश्मि के बयान से पता चल रहा है कि अभी वे अपनी शादी को लेकर कोई खुलासा नहीं करना चाहतीं.

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डोसा किंग- तीसरी शादी पर बरबादी: भाग 3

दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- डोसा किंग- तीसरी शादी पर बरबादी: भाग 2

जीवज्योति के मना करने के बाद राजगोपाल का इशारा पा कर उस के 5 साथियों डेनियल, कार्मेगन, हुसैन, काशी विश्वनाथन और पट्टू रंगन ने शांताकुमार को जबरन एक कार में बिठाया और राजगोपाल के के.के. नगर स्थित पुराने गोदाम में ले गए.

जीवज्योति की आंखों के सामने उस के पति का अपहरण हुआ था. वह इसे कैसे सहन कर सकती थी. उस ने के.के. नगर थाने में राजगोपाल और उस के 5 साथियों के खिलाफ शांताकुमार के अपहरण की नामजद तहरीर दी. लेकिन पुलिस ने उस का मुकदमा दर्ज नहीं किया.जीवज्योति कई दिनों तक थाने के चक्कर काटती रही, लेकिन उस का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ. इस बीच वह अपने स्तर पर पति का पता लगाती रही लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

पति को ले कर जीवज्योति निराश हो गई थी. वह सोचती थी कि पता नहीं राजगोपाल के आदमियों ने शांताकुमार के साथ कैसा सुलूक किया होगा. उस ने पति के जीवित होने की आशा छोड़ दी थी. बस वह यही प्रार्थना करती थी कि वह जहां भी हो, सहीसलामत रहे.

अपहरण के 14वें दिन यानी 12 अक्तूबर, 2001 को शांताकुमार अपहर्ताओं के चंगुल से बच निकला और सीधे पुलिस कमिश्नर के औफिस पहुंच गया. उस ने अपनी आपबीती कमिश्नर को सुना दी.

पुलिस ने बात तो सुनी पर नहीं की ठोस काररवाई

शांताकुमार की पूरी बात सुन कर पुलिस कमिश्नर हतप्रभ रह गए. उन्होंने के.के. नगर थाने के थानेदार को जम कर फटकार लगाई और पीडि़त शांताकुमार का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया. इस के बाद पुलिस को राजगोपाल के खिलाफ मुकदमा लिखना ही पड़ा.

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पी. राजगोपाल और उस के 5 साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद शांताकुमार और जीवज्योति को यकीन हो गया था कि पुलिस दोषियों के खिलाफ कड़ी काररवाई करेगी. इस के बाद वे दोनों अपनी तरफ से यह सोच कर थोड़ा लापरवाह हो गए थे कि मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद राजगोपाल की हेकड़ी कम हो जाएगी, वह दोबारा कोई ओछी हरकत नहीं करेगा.

लेकिन मुकदमा दर्ज होने के बाद पी. राजगोपाल और भी आक्रामक हो गया था. एक अदना सी औरत उस से टकराने की जुर्रत कर रही थी, यह उसे यह बरदाश्त नहीं था. उस ने सोच लिया कि जीवज्योति को इस की सजा मिलनी चाहिए.

2-4 दिन तक जब राजगोपाल की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो शांताकुमार और जीवज्योति को लगा कि अब मामला सुलझ जाएगा.

लेकिन यह उन का भ्रम था. 6 दिन बाद 18 अक्तूबर, 2001 को एक बार फिर से शांताकुमार का अपहरण हो गया. अपहरण राजगोपाल ने ही करवाया था.

शांताकुमार का अपहरण करवाने के बाद पी. राजगोपाल फिर से जीवज्योति पर शादी के लिए दबाव डालने लगा. उस ने फिर से फोन करना शुरू कर दिया. जीवज्योति ने भी साफ कह दिया कि वह मर जाएगी लेकिन शादी के लिए तैयार नहीं होगी.

14 दिनों बाद 31 अक्तूबर, 2001 को कोडैकनाल के टाइगर चोला जंगल में शांताकुमार की डेडबौडी मिली. पति की लाश बरामद होने के बाद जीवज्योति ने थाने जाने के बजाय अदालत की शरण लेना बेहतर समझा. उस का पुलिस से भरोसा उठ चुका था, इसलिए उस ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट का फैसला जीवज्योति के पक्ष में आया और अदालत ने केस दर्ज करने का आदेश दे दिया.

कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने पी. राजगोपाल और उस के 5 साथियों डेनियल, कार्मेगन, हुसैन, काशी विश्वनाथन और पट्टू रंगन के खिलाफ अपहरण, हत्या की साजिश और हत्या का केस दर्ज कर लिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस राजगोपाल की तलाश में जुट गई.

आखिर झुकना पड़ा कानून के सामने

अंतत 23 नवंबर, 2001 को राजगोपाल ने चेन्नई पुलिस के समने सरेंडर कर दिया. उस के सरेंडर करने से पहले पुलिस पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी. करीब डेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद 15 जुलाई, 2003 को पी. राजगोपाल को जमानत मिल गई.

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पी. राजगोपाल के जमानत पर बाहर आते ही जीवज्योति फिर से कोर्ट पहुंच गई. उस समय शांताकुमार का केस बहुचर्चित केस था, सो मामला स्पैशल कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया.

सन 2004 में सेशन कोर्ट का फैसला आ गया. कोर्ट ने अपहरण, हत्या की कोशिश और हत्या के मामले में पी. राजगोपाल और 5 दूसरे लोगों डेनियल, कार्मेगन, हुसैन, काशी विश्वनाथन और पट्टू रंगन को 10-10 साल कैद की सजा सुनाई.

जीवज्योति इस सजा से खुश नहीं थी. उस ने हाईकोर्ट में अपील कर दी. करीब 5 साल तक मामला हाईकोर्ट में चलता रहा और फिर मार्च, 2009 में हाईकोर्ट का फैसला भी आ गया.

19 मार्च, 2009 को हाईकोर्ट के जस्टिस बानुमति और जस्टिस पी.के. मिश्रा की बेंच ने इसे हत्या और हत्या की साजिश का मामला करार देते हुए सभी दोषियों को मिली 10-10 साल की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया. साथ ही पी. राजगोपाल पर 55 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया, जिस में से 50 लाख रुपए जीवज्योति को दिए जाने थे.

जब पी. राजगोपाल और उस के साथियों को हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुना दी तो पी. राजगोपाल ने इस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की.

29 मार्च, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना फैसला सुना दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आदेश दिया कि राजगोपाल को 7 जुलाई, 2019 तक सरेंडर करना होगा.

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पी. राजगोपाल का पासा पलट गया था. अब उस का साथ न तो वक्त दे रहा था और न ही ज्योतिषी. सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद राजगोपाल की आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया. लेकिन वह इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था.

उस ने नया पैंतरा चला. पी. राजगोपाल 4 जुलाई को अस्पताल में दाखिल हो गया. 7 जुलाई को सरेंडर करने की तारीख बीत गई तो उस ने 8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में अपील की. उस ने कहा कि वह गंभीर रूप से बीमार है. उसे थोड़ी और मोहलत दी जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट पर उस की दलीलों का कोई असर नहीं हुआ.

जस्टिस एन.वी. रमन्ना की खंडपीठ ने कहा कि उसे हर हाल में कोर्ट में सरेंडर करना ही होगा. क्योंकि उस ने केस की सुनवाई के दौरान अपनी बीमारी का जिक्र नहीं किया था. इस के बाद 9 जुलाई, 2019 को वह मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा. एक एंबुलेंस उसे कोर्ट ले कर गई थी. नाक में औक्सीजन मास्क लगा हुआ था. कोर्ट के आदेश पर पी. राजगोपाल को जेल भेज दिया गया. 10 दिन जेल में रह कर उस की हालत सचमुच बिगड़ गई.

उसे सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया, जहां 19 जुलाई, 2019 को पी. राजगोपाल का निधन हो गया. राजगोपाल के निधन के बाद केस की काररवाई बंद कर दी गई. बाकी पांचों आरोपी जेल में सजा काट रहे हैं.  – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां

नमामि: भाग 1

लेखिका- मधुलता पारे

अचानक डोरबैल बजी. दरवाजा खोला तो रामवती धड़धड़ाते हुए अंदर घुसी और कल्पना के कुछ बोलने से पहले ही शुरू हो गई, ‘‘क्या करूं बीबीजी, देर हो गई. सोनू का डब्बा जो बनाना था.’’

कल्पना ने पूछा, ‘‘यह सोनू कौन है? तुम्हारा बेटा?’’

रामवती की 2 बेटियां और एक बेटा है.

रामवती के हाथ तेजी से काम करते जा रहे थे. एक सैकंड के लिए हाथ रोक कर कल्पना की ओर देख कर वह बोली, ‘‘नहीं बीबीजी, मेरे बेटे को तो स्कूल में ही खाना मिलता है. सोनू मेरा दामाद है. यहां वह जींस सिलने के कारखाने में काम करता है. वहां उसे 9 बजे तक पहुंचना होता है.’’

कल्पना को देर हो रही थी. सोनू की पहेली में उल झती तो और देर हो जाती. उस ने रामवती से कहा, ‘‘देखो, मु झे देर हो रही है. अभी  झाड़ूपोंछा रहने दो. शाम को कर देना.’’

कल्पना ने जैसेतैसे टिफिन में कुछ नमकीन और बिसकुट रखे. रामवती के बाहर निकलते ही उस ने ताला लगाया और तेज कदमों से बस स्टौप की ओर बढ़ गई. गनीमत थी कि बस मिल गई. थोड़ा सुकून से बैठने को मिला. वह विचारों में खो गई.

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छोटा सा परिवार था कल्पना का. पति राजेश, 2 बच्चे श्रेयस और श्रेया और मांजी. राजेश एक सैंटर सर्विस में काम करते थे. बेटा बैंगलुरु से इंजीनियरिंग कर रहा था और बेटी 12वीं जमात में पढ़ रही थी.

कल्पना स्टेट गवर्नमैंट के औफिस में काम करती थी. अचानक दूर इस शहर में उस का ट्रांसफर हो गया था. पहले तो मन हुआ कि नौकरी छोड़ दे, फिर बच्चों की पढ़ाई और उन के भविष्य की खातिर इस्तीफा देने का विचार छोड़ना पड़ा.

राजेश ने भी कल्पना को सम झाया था, ‘आज के हालात में 300 किलोमीटर की दूरी परिवहन के साधनों के चलते महज कुछ घंटों की रह गई है. छुट्टियों में कभी तुम आ जाना, कभी मैं ही चला आऊंगा. ऐसे ही समय निकल जाएगा.’

बड़ी दीदी ने भी इस गंभीर समस्या को सुल झाने में अपना पूरा सहयोग दिया. राजेश की शादी से ले कर दोनों बच्चों के जन्म के समय बाबूजी के न रहने पर एक दीदी ही थीं, जो हर समय रक्षा कवच बन कर खड़ी रहती थीं. उन के रहते राजेश को कभी किसी बात की चिंता नहीं रहती थी.

राजेश के घर से 2 किलोमीटर की दूरी पर दीदी अपने परिवार के साथ रहती थीं. 2 साल पहले राजेश के जीजाजी नहीं रहे थे. दीदी ने अपने परिवार को बखूबी अनुशासन में बांध कर रखा हुआ था. इस शहर में कल्पना के मकान की समस्या को उन्होंने चुटकी बजाते ही हल कर दिया था.

दरअसल, उन की छोटी बहू के पिताजी के इस शहर में 2 मकान थे. एक में वे रहते थे और एक किराए पर उठाया हुआ था. कुछ दिन पहले ही किराएदार ने मकान खाली किया था. उसी मकान में कल्पना आ गई थी.

अचानक बस रुकी. कल्पना का स्टौप आ गया था. वह जल्दी से उतर कर औफिस पहुंची और काम में लग गई.

शाम को घर पहुंच कर कल्पना पलंग पर निढाल सी लेटी ही थी कि रामवती आ गई.

रामवती सांवले रंग की भरेपूरे बदन की दबंग औरत थी.

‘‘पोंछा लगा दूं क्या?’’ रामवती ने कल्पना से पूछा.

कल्पना ने कहा, ‘‘हां, लगा दे पोंछा और फिर चाय बना देना.’’

कल्पना ने रामवती से पहले ही तय कर लिया था कि वह शाम को तकरीबन 6 बजे आएगी तो वह चाय बना देगी या जो भी काम होगा कर देगी.

चाय पीतेपीते अचानक कल्पना को ध्यान आया और उस ने रामवती से पूछ लिया, ‘‘जैसा कि तुम ने बताया था तुम्हारी बेटियां छोटी हैं, फिर यह दामाद कहां से आ गया?’’

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‘‘अरे बीबीजी, नमामि से सोनू की सगाई की है, तो फिर वह दामाद ही हुआ न.’’

‘‘नमामि तुम्हारी बेटी का नाम है क्या? बड़ा अच्छा नाम है. किस ने रखा है?’’ यह सुन कर रामवती इतमीनान से शुरू हो गई, ‘‘बीबीजी, जब मैं दाखिले के लिए बेटी को स्कूल ले कर गई थी, तब मैडम ने उस का नाम पूछा था. मैं ने बता दिया था कि जरा दबे रंग की है न, तो हम ने उस का नाम काली रख दिया था.

‘‘मैडम ने काली नाम लिखने से मना कर दिया और कहा कि दूसरा नाम बताओ तो मैं ने कहा कि मैडमजी, आप ही कोई अच्छा सा नाम लिख दो.

‘‘मैडमजी ने नमामि नाम रखा और कहा कि इसे आज के बाद से काली नाम से मत बुलाना, तब से हम सब उसे नमामि ही बुलाते हैं.’’

कल्पना ने पूछा, ‘‘दूसरी बेटी का क्या नाम है?’’

रामवती ने कहा, ‘‘शिवानी.’’

‘‘तुम्हारे बेटे का क्या नाम है?’’

‘‘उस का स्कूल में दीपक नाम है और घर में हम राजा बुलाते हैं,’’ रामवती ने कहा.

‘‘नमामि तो अभी नाबालिग है… इतनी जल्दी सगाई कर दी. दामाद सोनू का ध्यान रखना, उस के लिए रोज खाना बनाना… क्या वह तुम्हारे घर में ही रहता है?’’ कल्पना ने पूछा.

कल्पना के सवालों को नजरअंदाज करते हुए रामवती ने बात जारी रखी, ‘‘बीबीजी, 17 साल की तो हो गई है नमामि. जल्दी ही 18 साल की हो जाएगी. उस का पढ़ाई में मन लगता नहीं है. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया था. पिछले साल मेरी भतीजी की शादी थी. सोनू उसी का देवर है. मु झे देखते ही भा गया. एकदम गोराचिट्टा गबरू जवान है. मैं ने मन ही मन उसे नमामि के लिए पसंद कर लिया.

‘‘मैं ने अपने भाई और मां से बात की. उन को भी इस शादी से कोई एतराज नहीं था. फिर हम लोगों ने सोनू के घर वालों से बात की. उन लोगों को भी नमामि पसंद आ गई.

‘‘मैं ने उसी शादी में नमामि की सोनू से सगाई करा दी थी.’’

‘‘पर, तुम ने अभी से उसे अपने घर में क्यों रख लिया?’’ कल्पना ने सवाल दागा.

‘‘अरे बीबीजी, हमारा घर कोई ज्यादा बड़ा तो है नहीं. बस, एक कमरा है. दिनभर घर में कोई न कोई रहता है. एक तरफ किचन का प्लेटफार्म है, जिस पर गैस रखी है. दूसरी टेबल पर टैलीविजन रखा है. बाकी थोड़ी सी जगह है, जिस में हम सब रहते हैं.

‘‘बाहर छोटा सा बरामदा है, जिस में मेरे ससुर की खटिया लगी है. सोनू का कारखाना उस के खुद के घर से 8 किलोमीटर दूर है, पर मेरे घर से 2 किलोमीटर की दूरी पर है.

‘‘दूसरी बात, उसे मेरे हाथ का खाना बहुत पसंद है. जब अपना दामाद है तो उस का डब्बा बनाना मेरा फर्ज बनता है न.

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‘‘बीबीजी, मैं ने उस से कह दिया कि घर में रहना है तो कायदेकानून से रहना पड़ेगा. मेरा बड़ा लिहाज करता है वह.’’

रामवती की बात में दम था. खाना वह सच में बहुत अच्छा बनाती थी. कल्पना की सभी समस्याओं का समाधान हो चुका था. अब तक उस की थकान भी दूर हो चुकी है.

रामवती ने पूछा, ‘‘आप के लिए कुछ बनाऊं क्या?’’

आज कल्पना ने औफिस की कैंटीन में ही खाना खा लिया था. अभी भूख नहीं थी. उस ने सोचा कि भूख लगने पर दलियाखिचड़ी कुछ बना लेगी, इसलिए रामवती के सवाल के जवाब में ‘नहीं’ कहा. साथ ही, उसे दूसरे दिन सुबह 8 बजे आने की याद दिलाई.

रामवती ने ‘हां’ में अपनी सहमति जताई और वहां से चली गई.

कल्पना ने दरवाजा बंद किया और मोबाइल में नंबर डायल करने लगी. रोज शाम को एक बार राजेश से बात कर के मन को बड़ा सुकून मिलता था.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

चौथा चक्कर

लेखिका- डा. नरेंद्र चतुर्वेदी

रामजी एक सरकारी दफ्तर में बड़े साहब थे. सुबह टहलने जाते तो पूरी तरह तैयार हो कर जाते थे. पांव में चमकते स्पोर्ट्स शूज, सफेद पैंट, सफेद कमीज, हलकी सर्दी में जैकेट, सिर पर कैप, कभीकभी हाथ में छड़ी. पार्क में टहलने का शौक था, अत: घर से खुद कार चला कर पार्क में आते थे. वहां पर न जाने क्यों 3 चक्कर के बाद वह बैठ जाते. शायद ही कभी उन्होंने चौथा चक्कर लगाया हो.

उस दिन पार्क में बहस छिड़ गई थी.

कयास लगाने वालों में एक ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘अरे, बामन ने 3 पग में पृथ्वी नाप दी थी तो रामजी साहब 3 चक्कर में पार्क को नाप देते हैं.’’

कुछ दिन पहले पार्क के दक्षिण में हरी घास के मैदान पर सत्संगियों ने कब्जा कर लिया. वे अपने किसी गुरु को ले आए थे. छोटा वाला माइक और स्पीकर भी लगा लिया था. गुरुजी के लिए एक फोल्ंिडग कुरसी कोई शिष्य, जिस का मकान पार्क के पास था, ले आता था.

इस बीच घूमने वाले, अपने घूमने का समय कम कर वहां बैठ जाते थे और गुरुजी मोक्ष की चर्चा में सब को खींचने का प्रयास करते थे. वह बता रहे थे कि थोड़े से अभ्यास से ही तीसरी आंख खुल जाती है और वही सारी शक्तियों का घर है. हमारे गुरु पवित्र बाबा के आश्रम पर आप आइए, मात्र 7 दिन का सत्संग है.

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पता नहीं क्यों, गुरुजी को रामजी साहब की सुंदर शख्सियत भा गई. उन के भीतर का विवेकानंद जग गया. अगर यह सुदर्शन मेरे सत्संग में आ जाए, तो फिर शायद पूरे पार्क के लोग आ जाएं. उन्होंने सावधानी से रामजी साहब की परिक्रमा के समय…जीवन की क्षणभंगुरता, नश्वर शरीर को ले कर, कबीर के 4 दोहे सुना दिए, पर रामजी का ध्यान उधर था ही नहीं.

‘‘खाली घूमने से कुछ नहीं होगा. प्राण शक्ति का जागरण ही योग है,’’ गुरु समझा रहे थे.

रामजी साहब ने अनसुना करते हुए भी सुन लिया…

उन के दूसरे चक्कर के समय, एक शिष्य उन के नजदीक आया और बोला, ‘‘गुरुजी, आप से कुछ बात करना चाहते हैं.’’

‘‘क्यों? मुझे तो फुरसत नहीं है.’’

‘‘फिर भी, आप मिल लें. वह सामने बैठे हैं.’’

‘‘पर वहां तो एक ही कुरसी है.’’

‘‘आप उधर बैंच पर आ जाएं, मैं उधर चलता हूं.’’

शिष्य को यह सब बुरा लगा. फिर भी वह अपने गुरुजी के पास यह संदेश ले गया.

गुरुजी मुसकराते हुए उठे, ‘‘नारायण, नारायण…’’

रामजी साहब ने गुरुजी को नमस्कार किया तो उन का हाथ, आशीर्वाद की मुद्रा में उठा और बोले, ‘‘वत्स, आप का स्वास्थ्य कैसा है?’’

‘‘बहुत बढि़या.’’

‘‘आप रोजाना इस पार्क में टहलने आते हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘पर मैं देखता हूं कि आप 3 ही चक्कर लगाते हैं, क्यों?’’

रामजी साहब हंसे, जैसे लाफिंग क्लब के सदस्य हंसते हैं. गुरुजी और शिष्य उन्हें इस तरह बेबाक हंसता देख अवाक् रह गए.

‘‘तो क्या आप मेरे चक्कर गिना करते हैं?’’ रामजी साहब ने पूछा.

‘‘नहीं, नहीं, ये भक्तगण इस बात की चर्चा करते हैं.’’

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‘‘हां, पर आप ने तो सीधा ही चौथा चक्कर लगा लिया, क्या?’’

गुरुजी समझ नहीं पाए. वह अवाक् से रामजी साहब को देखते रह गए.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए रामजी साहब बोले, ‘‘महाराज, आप को इस कम उम्र में संन्यास की क्या आवश्यकता पड़ गई?’’

‘‘मेरी बचपन से रुचि थी, संसार के प्रति आकर्षण नहीं था.’’

‘‘तो अब भी बचपन की रुचि उतनी ही है या बढ़ गई?’’ रामजी ने पूछ लिया. सवाल तीखा और तीर की तरह चुभने वाला था.

‘‘महाराज एक जातिगत आरक्षण होता है,’’ गुरुजी के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए रामजी आगे बोले, ‘‘उस में कम योग्य भी अच्छा पद पा सकता है, क्योंकि पद आरक्षित है और उस पर बैठने वाले भी कम ही हैं. एक यह ‘धार्मिक’ आरक्षण है, यहां कोई बैठ जाए, उस का छोटामोटा पद सुरक्षित हो जाता है. आप शनि का मंदिर खोल लें. वहां लोग अपनेआप खिंचे चले आएंगे. टीवी पर देखें, सुकुमार संतसाध्वियों की फौज चली आई. फिर आप को इस आरक्षण की क्यों जरूरत हो गई? पार्क में मार्केटिंग की अब क्या जरूरत है?’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है, महाराज तो इंजीनियरिंग गे्रजुएट हैं, वैराग्य ही आप को इधर ले आया,’’ एक भावुक शिष्य बोला.

‘‘महाराज, वही तो मैं कह रहा हूं कि बिना 3 चक्कर चले आप चौथे पर कैसे पहुंच गए?’’

‘‘नहीं, नहीं, मैं ने विद्याध्ययन किया है, स्वाध्याय किया है, गुरु आश्रम में दीक्षा ली है,’’ महाराज बोले.

‘‘पहला चक्कर तो पूरा ही नहीं हुआ और पहले से चौथे पर छलांग और महाराज, जो आप कह रहे थे कि चौथे चक्कर की जरूरत है, तो क्यों? अभी तो नौकरी की लाइन में लगना था?

‘‘बुद्ध के जमाने में दुख था, होगा. हमारे बादशाहों के महल में एक भी वातानुकूलित कमरा नहीं था. आज तो आम आदमी के पास भी अच्छा जीवन जीने का आधार है. घर में गैस है, फ्रिज है, गाड़ी है, घूमने के लिए स्कूटर है. उस की सुरक्षा है. उस के बच्चे स्कूल जाते हैं. घर है. महाराज, आज जीवन जीने लायक हो गया है. बताएं, सब छोड़ कर किस मुक्ति के लिए अब जंगल जाया जाए?’’

गुरुजी चुप रह गए थे.

‘‘सात प्राणायाम, आंख मींचने की कला, गीता पर व्याख्यान, इस से ही काम चल जाए फिर कामधाम की क्या जरूरत है?’’

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रामजी साहब की बात सुन कर शिष्यगण सोच रहे थे, उन्हें क्यों पकड़ लाए.

‘‘फिर भी मानव जीवन का एक उद्देश्य है कि वह इस जीवन में शांति, प्रेम, आनंद को पाए. भारतीय संस्कृति जीवन जीने की कला सौंपती है, उस का भी तो प्रचार करना है,’’ महाराज बोले.

‘‘महाराज, उस के लिए घर छोड़ कर, आश्रम की क्या जरूरत है. आश्रम भी ईंटपत्थर का, यहां घर भी ईंटपत्थर का, भोजन की तो वहां भी जरूरत होती है, रहा सवाल ग्रंथ और पाठ का, तो वह घर पर भी कर सकते थे. आंख मींचना ही ध्यान है, तो आप कहीं भी ध्यान लगा सकते हैं, यह बात दूसरी है जब बेपढ़ेलिखे इस उद्योग में अच्छा कमा रहे हैं, तब पढ़ेलिखे तो बिजनेस चला ही लेंगे? आप ने मुझ से पूछा है, इसीलिए मैं ने भी आप से पूछ लिया, वरना इस चौथे चक्कर के पीछे मैं कभी नहीं पड़ता.’’

‘‘महाराज के गुरुजी के आश्रम तो दुनिया भर में हैं. आज शांति की जरूरत सब को है, जिसे आज पूरा विश्व चाहता है,’’ एक शिष्य बोला.

‘‘हां,’’ महाराज चहके, ‘‘यहां के लोगों में अज्ञान है, यहां विदेशों से लोग आते हैं और ज्ञान लेने में रुचि ले रहे हैं.’’

‘‘आप विदेश हो आए क्या?’’

‘‘अभी नहीं, महाराज का कार्यक्रम बन गया है. अगले माह जा रहे हैं,’’ दूसरा शिष्य चहका.

‘‘वहां क्यों? काम तो यहां अपने देश में बहुत है. गरीबी है, अज्ञान है, अशिक्षा है. महाराज, मुफ्त में विदेश यात्राएं, वहां की सुविधाएं, डालर की भेंट तो यहां नहीं है. पर महाराज यहां भी बाजार मंदा नहीं है.’’

शिष्यगण नाराज हो चले थे. सुबहसुबह जो पार्क में टहलने आए थे वे भी यह संवाद सुन कर रुक गए थे.

‘‘लगता है आप बहुत अशांत हैं,’’ महाराज बोले, ‘‘कसूर आप का नहीं है, कुछ तत्त्व हैं, वे हमेशा धर्म के खिलाफ ही जनभावना बनाते रहते हैं. पर उस से क्या फर्क पड़ा? दोचार पत्रपत्रिकाएं क्या प्रभाव डालेंगी? आज करोड़ों मनुष्य सुबह उठते ही धर्म से जुड़ना चाहते हैं. सारे चैनल हमारी बात कह रहे हैं. कहां क्या गलत है?’’

महाराज ने गर्व के साथ श्रोताओं की ओर देखा. शिष्यों ने तालियां बजा दी थीं.

‘‘आप सही कह रहे हैं, आजादी के समय न इतने बाबा थे, न इतना पाप बढ़ा था. जब आप कर्मफल को मानते हैं तब इन कर्मकांडी व्यापारों की क्या जरूरत है. क्या 10 मिनट को आंख मींचने से, मंदिर की घंटियां बजाने से, यज्ञ करने से, तीर्थयात्रा से कर्मफल कट सकता है? महाराज, शांति तो भांग पी कर भी आ जाती है. मुख्य बात मन का शांत होना होता है और वह होता है, अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने से, पलायन से नहीं.’’

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युवा संन्यासी का चेहरा उतर गया था.

उस ने उठने का संकेत किया.

‘‘महाराज, पहला चक्कर धर्म का था, वह तो पैदा होते ही मिल गया. शिक्षा ग्रहण की, बड़े हुए तो देश का कानून मिल गया, समाज का विधान मिल गया. धन का दूसरा चक्कर लगाया, 30 साल नौकरी की. तीसरा चक्कर गृहस्थी का अभी चल रहा है, चलेगा. इन तीनों चक्करों में महाराज खूब सुख मिला है, मिल रहा है, शांति है.

‘‘महाराज, यह चौथा चक्कर तो नीरस होता है. जब इतना सुख मिल रहा है तो मोक्ष पाने को चौथा चक्कर क्यों लगाएं.

‘‘मृत्यु के बाद आनंद कैसा, आज तक तो कोई बताने आया नहीं. सुख तो देह भोगती है, शांति मन भोगता है, पर महाराज, जब तन और मन दोनों ही नहीं होंगे, तब कौन भोगेगा और कौन बताएगा? जैसे साधारण आदमी की मौत होती है वैसे ही महात्मा रोगशोक से लड़ते हुए मरते हैं.

‘‘महाराज मान लें, इसी जीवन में मोक्ष मिल जाएगा तो महाराज उस की शर्त तो ‘कष्टवत’ हो जाना है, और बाद मरने के मोक्ष मिला तो. महाराज, कल आप कह रहे थे, बूंद समुद्र में मिल जाएगी तो समुद्र का पानी खारा होता है, पीने लायक ही नहीं, उस नीरस जीवन से तो यह सरस जीवन श्रेष्ठ है. हां, धंधे के लिहाज से ठीक है, आप इंजीनियर हैं, कंप्यूटर जानते हैं, इंटरनेट जानते हैं, अच्छी अंगरेजी आती है. कमाएं, पर मुझे बख्शें. हां, यह बात दूसरी है, आज जैसे बालाएं विज्ञापन में बिक रही हैं, बाबा भी बिक रहे हैं, उन का काम धन कमाना है. कोई सुने या न सुने अपनी बात कहने का हक तो है न.

‘‘आप लोग विचारें, मैं तो अपने इन 3 चक्करों में ही संतुष्ट हूं. क्यों अनावश्यक उस चौथे चक्कर के प्रपंच में पड़ कर अपने 3 चक्करों के सुख को खोऊं. सुख तो आप लोग खो रहे हो,’’ रामजी साहब ने भक्तों की ओर देखते हुए कहा.

भक्त लोग अवाक् थे, सोच रहे थे, क्या रामजी ने कुछ गलत कहा है, सोच तो वह भी यही रहे थे, पर कह नहीं पा रहे थे, क्यों?

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मैं जब कभी पढ़ने बैठती हूं तो मुझे तरहतरह की बातें याद आती हैं. मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 19 साल की हूं. मेरा पढ़ने को बहुत मन करता है, लेकिन घर के कामों से फुरसत नहीं मिलती. मैं जब कभी पढ़ने बैठती हूं तो मुझे तरहतरह की बातें याद आती हैं. इस से मैं तनाव में घिर जाती हूं. मैं अपनी पढ़ाई पर कैसे ध्यान दूं, ताकि मेरा भविष्य सुधर सके?

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जवाब-

आप घर के कामों और पढ़ाई के समय में तालमेल बैठाएं. पढ़ाई के दौरान माहौल शांत रखें और दिमाग में इधरउधर की बातें आने पर सोचें कि आप को सिर्फ पढ़ाई करनी है. यह अच्छी बात है कि आप का रुझान पढ़ाई की तरफ है. किसी सहेली के साथ पढ़ेंगी, तो मन इधरउधर नहीं भटकेगा.

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