गहरी चाल : भाग 1

बिहार का जिला पूर्णिया. दिन रविवार, तारीखऊ 26 मई, 2019. समय शाम के 7 बजे. पप्पू यादव पूर्णिया की प्रभात कालोनी स्थित घर से अपने गांव चनका जाने के लिए निकला. दरअसल, पप्पू के 2 मकान थे, एक पूर्णिया की प्रभात कालोनी में और दूसरा गांव चनका में.

प्रभात कालोनी में वह पत्नी संगीता और दोनों बच्चों के साथ रहता था. उस की पत्नी संगीता गांव की उपमुखिया थी और अपने बच्चों के साथ ज्यादातर पूर्णिया में रहती थी.

घर से निकल कर पप्पू जब जगैल चौक स्थित राइस मिल के पास पहुंचा, तभी पीछे से तेज गति से आई एक बाइक आई और उस के सामने आ कर रुकी.

अचानक यह होने पर पप्पू की बाइक उस बाइक से टकराने से बालबाल बची. जैसे ही पप्पू ने अपनी बाइक के ब्रेक लगाए, वह जमीन पर फिसल गई. बाइक के गिरते ही पप्पू भी नीचे जा गिरा.

पप्पू के सामने जो बाइक आ कर रुकी थी, उस पर 2 युवक सवार थे. फुरती के साथ दोनों युवक बाइक से नीचे उतरे और पप्पू के सामने जा खड़े हुए. उन दोनों को देख कर पप्पू समझ गया कि इन के इरादे ठीक नहीं हैं.

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खतरा भांप कर पप्पू बाइक को वहीं छोड़ कर विपरीत दिशा में भागा, वे दोनों युवक भी उस के पीछे दौड़े. दौड़तेदौड़ते एक युवक ने कमर से पिस्तौल निकाल कर उस पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं.

उस ने 7 गोलियां चलाईं. जो पप्पू के सिर से ले कर कमर तक लगीं. गोलियां लगते ही पप्पू जमीन पर गिर गया. खून से तरबतर पप्पू कुछ तड़पता रहा फिर उस की मौत हो गई. उस के मरने के बाद बदमाश जिस ओर से आए थे, अपनी बाइक से उसी ओर भाग गए.

दिनदहाड़े बाजार के नजदीक गोलियां चलने से बाजार में भगदड़ मच गई. लोग धड़ाधड़ अपनी दुकानों के शटर गिराने लगे. इसी बीच किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस कंट्रोल रूम को हत्या की सूचना दे दी थी. वह इलाका श्रीनगर थाना क्षेत्र में आता था. पुलिस कंट्रोल रूम ने घटना की सूचना श्रीनगर थाने को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी संजय कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

उपमुखिया का पति था मृतक

मौके पर पहुंच कर पुलिस ने लहूलुहान पड़े शख्स का मुआयना किया. उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही थी, वह मर चुका था. पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त करानी चाही तो भीड़ में से एक युवक ने लाश की पहचान कर ली.

उस ने बताया कि मृतक का नाम पप्पू यादव है. वह चनका पंचायत क्षेत्र की उपमुखिया संगीता का पति है. लाश की शिनाख्त होते ही पुलिस ने थोड़ी राहत की सांस ली और उपमुखिया संगीता से फोन पर संपर्क कर उन्हें दुखद सूचना दे कर मौके पर बुलाया.

संगीता पति की हत्या की सूचना पाते ही दहाड़ें मार कर रोने लगी. घर पर वह जिस अवस्था में थी, उसी में बच्चों को साथ ले कर घटना स्थल पर पहुंच गई. बदमाशों ने पप्पू को गोलियों से छलनी कर दिया था.

सूचना पा कर थोड़ी देर में एसपी विशाल शर्मा और एसडीपीओ (सदर) आनंद पांडेय भी मौके पर आ गए थे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का मुआयना किया. मृतक के शरीर पर गोलियों के कई घाव थे. घटनास्थल से कुछ दूर उस की बाइक जमीन पर गिरी पड़ी थी.

यह देख पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि पप्पू की हत्या बदमाशों ने लूट के लिए नहीं की है. अगर बदमाश लूट के लिए करते तो बाइक अपने साथ ले जाते.

चूंकि हत्या उपमुखिया के पति की हुई थी. इसलिए स्थिति विस्फोटक बन सकती थी, इस से पहले कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेता, एसएसपी ने जरूरी लिखापढ़ी पूरी करवा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल, पूर्णिया भिजवा दी.

अगली सुबह यानी 27 मई को उपमुखिया संगीता के पति पप्पू यादव हत्याकांड को ले कर उपमुखिया के समर्थकों ने शहर में जगहजगह तोड़फोड़ की. वे हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे. एसपी विशाल शर्मा मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लोगों को आश्वासन दिया कि पप्पू यादव के हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

विशाल शर्मा के आश्वासन के बाद आंदोलनकारी शांत हुए. इस के तुरंत बाद थानाप्रभारी संजय कुमार सिंह ने केस की जांच शुरू कर दी. प्रभात कालोनी पहुंच कर उन्होंने संगीता से मुलाकात की और उन से पूछा कि किसी पर कोई शक वगैरह हो तो बताएं.

संगीता ने पति की हत्या में पट्टीदारों की भूमिका पर शक जाहिर किया. वर्षों से दोनों परिवारों के बीच जमीन को ले कर विवाद चल रहा था. संगीता के बयान के आधार पर पुलिस ने पट्टीदारों को हिरासत में ले लिया.

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उन से सख्ती से पूछताछ की गई, लेकिन पप्पू यादव की हत्या में उन की कोई भूमिका नजर नहीं आई तो पुलिस ने कुछ खास हिदायतें दे कर उन्हें छोड़ दिया. इस के अलावा पुलिस ने और भी कई संदिग्धों से पूछताछ की, लेकिन हत्यारों का कोई सुराग नहीं मिल सका.

देखतेदेखते इस घटना को घटे 15 दिन बीत गए. पुलिस जांच जहां से चली थी, वहीं आ कर रुक गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि पप्पू की हत्या किस वजह से हुई और हत्यारा कौन है? इस के बाद थानाप्रभारी ने मृतक पप्पू और उस की पत्नी उपमुखिया संगीता के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा सुरागरसी के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया. दोनों की काल डिटेल्स का पुलिस ने बारीकी से अध्ययन किया.

पुलिस को मिला सुराग

संगीता की फोन की काल डिटेल्स देख कर पुलिस चौंकी. घटना से कुछ देर पहले और घटना से कुछ देर बाद संगीता की एक ही नंबर पर लंबी बातचीत हुई थी. खास बात यह थी कि उस नंबर पर संगीता की कई दिनों से लंबीलंबी बात हो रही थी. यह बातचीत अधिकतर रात के समय ही होती थी. यह बात पुलिस को हजम नहीं हो रही थी.

पुलिस ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो वह मोबाइल नंबर लल्लन कुमार यादव, निवासी भोकराहा, पूर्णिया का निकला. इस जानकारी के बाद पुलिस लल्लन पर नजर रखने लगी. उस के बारे में गोपनीय तरीके से सारी जानकारी एकत्र की जाने लगीं.

जांच में पता चला कि लल्लन यादव उपमुखिया संगीता का दूर के रिश्ते का देवर है. वह संगीता के प्रभातनगर कालोनी स्थित मकान पर अकसर आताजाता था. इसी दरम्यान दोनों के बीच प्रेम हो गया था.

पुलिस को तब और हैरानी हुई, जब पता चला कि लल्लन यादव ने घटना से 2 दिन पहले संगीता के आईडीबीआई बैंक खाते से एक लाख रुपए निकाले थे. यह रुपए संगीता ने लल्लन को नई बाइक खरीदने के लिए दिए थे. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि पप्पू की हत्या में मृतक की पत्नी संगीता और उस के प्रेमी लल्लन यादव का हाथ है. पुलिस ने दोनों के घर दबिश दी तो दोनों ही फरार मिले.

पप्पू यादव हत्याकांड को धीरेधीरे 3 महीने बीत चुके थे. इस दौरान मुखबिर ने पुलिस को इत्तला दी थी कि पप्पू की हत्या मुंगेर जिले के बरियापुर के रहने वाले शार्प शूटर संतोष चौधरी और उस के साथी निशांत यादव ने की थी. शार्प शूटर संतोष चौधरी का नाम सामने आते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि संतोष कौन्ट्रैक्ट किलर था.

पैसे ले कर हत्या करना उस का पेशा था. मुंगेर सहित बिहार के कई जिलों में उस के खिलाफ हत्या और हत्या के प्रयास के कई मुकदमे दर्ज थे. वह पुलिस को चकमा देने में माहिर था. जिले के विभिन्न इलाकों में बड़ी घटनाओं को अंजाम देने के बावजूद वह केवल 1-2 बार जेल गया था.

शार्प शूटर संतोष की हुई तलाश

पुलिस संतोष को पकड़ने की योजना बना ही रही थी कि 31 अगस्त, 2019 की शाम मुखबिर ने थानाप्रभारी संजय कुमार सिंह को एक ऐसी सूचना दी, जिसे सुनते ही उन की बांछे खिल उठीं.

सूचना यह थी कि पप्पू यादव हत्याकांड को अंजाम देने वाला शार्प शूटर संतोष चौधरी अपने दोस्त निशांत यादव के साथ किसी टारगेट को पूरा करने के लिए अगली सुबह यानी पहली सितंबर, 2019 को आ रहा है. मुखबिर की सूचना पर थानाप्रभारी संजय कुमार सिंह ने उसी रात संतोष और निशांत को गिरफ्तार करने की रणनीति बनाई. उन्होंने इस मिशन को इतना गुप्त रखा कि टीम के 7 सदस्यों के अलावा 8वें को खबर तक नहीं लगने दी.

पहली सितंबर, 2019 की सुबह थानाप्रभारी संजय कुमार सिंह अपनी टीम के साथ खुट्टी धुनौल चौकी के पास सादा कपड़ों में दुपहिया वाहनों की चैकिंग में जुट गए. मुखबिर ने बदमाशों को यहीं आना बताया था. सुबह 8 बजे के करीब 2 युवक अपाचे मोटरसाइकिल पर चौकी की ओर आते दिखाई दिए. बाइक पर वही नंबर अंकित था जो मुखबिर ने बताया था.

जैसे ही वे नजदीक आए पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया. तलाशी के दौरान बदमाशों के पास से एकएक लोडेड पिस्तौल, संतोष के पास से 5 जिंदा कारतूस और 2 मोबाइल फोन और निशांत के पास से एक मोबाइल फोन बरामद हुए. नाम पूछने पर दोनों ने अपने नाम संतोष चौधरी और निशांत यादव बताए.

3 महीनों से पुलिस को इन्हीं दोनों बदमाशों की तलाश थी. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाने ले आई और उन से सख्ती से पूछताछ शुरू की तो दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. शूटर संतोष चौधरी ने पुलिस को बताया कि पप्पू की हत्या के लिए उस की पत्नी संगीता देवी ने लल्लन यादव के मार्फत 5 लाख की सुपारी दी थी. पेशगी के तौर पर लल्लन यादव ने उसे सवा लाख रुपए दिए थे. बाकी रुपए काम हो जाने के बाद देने का वादा किया था. जो अब तक नहीं मिला.

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उसी दिन मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने लल्लन यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने लल्लन यादव का सामना जब संतोष चौधरी से कराया तो उस के होश उड़ गए. अंतत: उस ने भी अपना जुर्म कबूलते हुए पुलिस को सब कुछ बता दिया. उस ने प्रेमिका के इशारे पर पप्पू की हत्या का तानाबाना बुना था. पप्पू की हत्या का खुलासा हो चुका था. तीनों आरोपियों लल्लन यादव, संतोष चौधरी और निशांत यादव से पूछताछ के बाद पप्पू यादव की हत्या की जो कहानी सामने आई इस प्रकार थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

गहरी पैठ

कोरोना के कहर में तबलीगी जमात की नासमझी से जो समस्याएं बढ़ी हैं, उन्होंने केंद्र सरकार को फिर से हिंदू मुसलिम करने का कट्टर कार्ड थमा दिया है. देखा जाए तो देश की जनता को आराम से जीने का मौका देने का वादा दे कर जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपना एक और दांव, दंगे चला कर अब घरघर में दहशत का माहौल खड़ा कर दिया है. किसी को भी देश का गद्दार कहने का हक खुद ब खुद लेने के बाद अब उन्होंने जगहजगह गोली मारो गद्दारों को नारा गुंजाना शुरू कर दिया है. बिना सुबूत, बिना गवाह, बिना अदालत, बिना दलील, बिना वकील के किसी को भी गद्दार कह कर उसे मार डालने का हक बड़ा खतरनाक है.

न सिर्फ मुसलमानों को डराया जा सकता है, इस नारे से हर उस को डराया जा सकता है, जिस ने अपनी अक्ल लगा कर भगवा भीड़ की मांग को पूरी करने से इनकार कर दिया हो.

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आज देश का दलित, किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, बलात्कारों से परेशान लड़कियां, छोटे व्यापारी सरकारी फैसलों से परेशान हैं. दलितों के घोड़ी पर चढ़ कर शादी करने पर मारपीट ही नहीं हत्या कर दी जाती है और जिस ने भी उस के खिलाफ आवाज उठाई, उसे गद्दार कह कर गोली मारने का हक ले लिया गया है. अगर किसान कर्ज माफ करने के लिए सरकार के खिलाफ मोरचा खोलें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. अगर व्यापारी नोटबंदी, जीएसटी और बैंकों के फेल होने पर होने वाले नुकसान की बात करें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. नागरिकता कानून ?की फुजूल की बात करने वाले को गद्दार कहने का हक है. छोटीबड़ी अदालतों में वकीलों के झुंड मौजूद हैं जो अपने हकों को मांगने वालों को गद्दार कह कर जज के सामने तक नहीं जाने दे रहे. जजों को गद्दार कह कर उन का रातोंरात तबादला कर दिया जा रहा है.

सारे देश में सरकार डिटैंशन सैंटर बनवा रही है जो आधी जेल की तरह हैं जहां नाममात्र का खाना मिलेगा, नाममात्र के कपड़े मिलेंगे, पर बरसों रहना पड़ सकता है. उन को गुलाम बना कर उन से काम कराया जा सकता है. लड़कियों को बदन बेचने पर मजबूर किया जा सकता है. यह हिटलर ने जरमनी में किया था. स्टालिन ने रूस में किया था. माओ ने चीन में किया था. कंबोडिया में पोलपौट ने किया था.

गद्दार कह कर कैसे सिर फोड़े जा सकते हैं. घरों को जला कर सजा दी जा सकती है. इस का नमूना दिल्ली में दिखा दिया गया. जिन्होंने किया वे आजाद घूम रहे हैं. जो शांति के लिए जिम्मेदार हैं, वे भड़काऊ भाषण देने में लगे हैं.

इस सब से मुसलमानों को तो लूटा जा ही रहा है, दलित और पिछड़े भी लपेटे में आ गए हैं. आज सरकारी नौकरियों में केवल ऊंचों को पद देने का हक एक बार फिर मिल गया है, क्योंकि या तो सरकारी काम ठेके पर दे दिए गए हैं या बंद कर दिए गए हैं. दहशत के माहौल की वजह से कोई बोल नहीं पा रहा. कन्हैया कुमार जो बिहार में भारी भीड़ जमा कर रहा था को अब दिल्ली की अदालतों में बुला कर परेशान करने की साजिश की जा रही है. चंद्रशेखर आजाद को बारबार लंबी जेल में भेज दिया जाता है. हार्दिक पटेल का मुंह बंद कर दिया गया है.

देश को अमन चाहिए, क्योंकि अगर पेट में आधा खाना ही हो, कपड़े फटे हुए हों तो भी अगर चैन हो तो जिंदगी कट जाती है. अब यह चैन भी गद्दार के नारे के नीचे दब रहा है.

पूरी दुनिया कोरोना की महामारी से जूझ रही है. लौकडाउन के बाद जरूरी कीमती सामान से लदे ट्रक जहां थे वहीं खड़े हैं. पहले भी हालात ट्रक ड्राइवरों के पक्ष में कहां थे. देखें तो देश के ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही उबाऊ और खानाबदोशी होती है, उस पर हर नाके पर, हर सड़क पर बैठे खूंख्वारों से निबटना एक आफत होती है. सेव लाइफ फाउंडेशन का अंदाजा है कि ट्रक ड्राइवर हर साल तकरीबन 50,000 करोड़ रुपए रिश्वत में देते हैं. रिश्वत ट्रैफिक पुलिस वाले, टैक्स वाले, नाके वाले, चुंगी वाले, पोल्यूशन वाले तो लेते ही हैं, अब धार्मिक धंधे करने वाले भी जम कर लेने लगे हैं. धार्मिक धंधे वाले ट्रकों और टैक्सियों को रोक कर ड्राइवरों से उगाही करते हैं.

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कोई कह सकता है कि यह रिश्वत तो मालिक की जेब से जाती होगी, पर यह गलत है. बहुत से ट्रकों को लगभग ठेके पर दे दिया जाता है कि ट्रक पहुंचाओ, रास्ते में जो हो, भुगतो और एकमुश्त पैसा ले लो. ड्राइवर को ऐसे में अपने मुनाफे में कटौती नजर आती है. वह कानूनी, गैरकानूनी दोनों रोकटोक पर रिश्वत देने में हिचकिचाता है और अकसर झगड़ा हो जाता है और मारपीट तक हो जाती है तो नुकसान ट्रक ड्राइवर का ही होता है.

ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही बड़ी दुखद है. उन्हें 12 घंटे ट्रक चलाना होता है, इसलिए अकसर वे शराब और दवाओं का नशा करते हैं. देश की सड़कें बेहद खराब हैं जो ट्रक चलाने में ड्राइवर की हड्डीपसली दुखा देती हैं. आमतौर पर सड़कों पर लाइट नहीं होती. अंधेरे में चलाना मुश्किल होता है. भारत में अब तक सुरक्षित ट्रक नहीं बनने शुरू हुए हैं. ड्राइवरों के केबिन एयरकंडीशंड नहीं होते, उन ट्रकों के भी नहीं जिन में खाने के सामान या दवाओं के लिए रेफ्रीजरेटर लगे होते हैं, इसलिए बेहद गरमीसर्दी का मुकाबला करना पड़ता है. बहुत से ड्राइवरों को बदलते साथियों के साथ चलना होता है.

हमारे यहां ड्राइवरों को रास्ते में सोने के लिए ढाबों पर पड़ी चारपाइयां ही होती हैं, जिन पर न गद्दे होते हैं, न पंखे तक.

घरों से दूर रहने की वजह से ड्राइवर राह चलती बाजारू औरतों को पकड़ते हैं, पर वे लूटने की फिराक में रहती हैं. उन के गैंग अलग बने होते हैं जो परेशान करते हैं. ड्राइवरों को बीवियों की चिंता भी रहती है कि उन के पीछे वे औरों के साथ तो नहीं आंखें लड़ा रहीं.

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यही वजह है कि आज 1000 ट्रकों पर 400-500 ड्राइवर ही मिल रहे हैं. ट्रांसपोर्ट उद्योग को ड्राइवरों की कमी की वजह से भारी नुकसान होने लगा है. एक तरफ बेरोजगारी है, पर दूसरी तरफ ट्रेनिंग न मिलने की वजह से ड्राइवरों की कमी है. ट्रेनिंग तो आज सिर्फ जय श्रीराम कह कर मंदिर के धंधे कैसे चलाए जाएं की दी जा रही है.

दान के प्रचार का पाखंड

इतिश्हारी लत ने दीवाना बना दिया,

तसवीर खिंचाने का बहाना बना दिया.

खैरात से भी ज्यादा के ढोल बज गए,

लोगों ने गरीबी को फसाना बना दिया.

गरीबों की मदद के नाम पर बढ़ते प्रचार के बारे में ये लाइनें बड़ी मौजूं लगती हैं. दरअसल, गरीबी की समस्या हमारे देश में आज भी बहुत भयंकर है.

हालांकि आजादी के बाद से ‘गरीबी हटाओ’ का नारा व गरीबों के लिए चली सरकारी स्कीमों में पानी की तरह पैसा बहाया गया है, लेकिन हिस्साबांट के चलते गरीबी बरकरार है. साल 2016 में 37 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे. गांव हों या शहर, गरीब लोग हर जगह बहुत बड़ी तादाद में मिल जाते हैं.

ऐसे में बहुत से लोग पुण्य लूटने की गरज से गरीबों की मदद करते हैं. गरीबों को मुफ्त सामान का लालच दे कर बुलाते व रिझाते हैं और उन्हें सामान देते हुए अपना फोटो खिंचाते हैं. इतना ही नहीं, उन फोटो का इस्तेमाल अपनी दरियादिली के प्रचार में करते हैं.

दरअसल, जिस दान में प्रचार खूब किया जाए वह पाखंड है, जो दानदक्षिणा का माहौल बनाने के लिए किया जाता है. इन में पंडितों के फोटो तो लिए नहीं जाते, क्योंकि पंडित अब दान नहीं लेता. वह तो उलटे दान देने वाले को पुण्य कमाने का मौका व पुण्य लाभ देता है.

ऐसे में दान देने वाला लाभार्थी हो जाता है. वक्त के साथ दान देने के तौरतरीके भी बदल गए हैं. ज्यादा से ज्यादा दान इकट्ठा करने की गरज अब तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी व काशी विश्वनाथ वगैरह बहुत से मंदिरों द्वारा भक्तों के लिए घर बैठे औनलाइन व ईवालेट से दान देने की सहूलियतें मुहैया कराई गई हैं.

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तिरुपति बालाजी जैसे कुछ मंदिरों ने तो अपने डीमैट खाते खोल लिए हैं, ताकि नकदी, सोना व हीरेजवाहरात के अलावा शेयर्स भी लिए जा सकें.

यह कैसी मदद

गरीबों के हक हड़प कर भ्रष्ट नेता, अफसर और मुलाजिम अमीर हो रहे हैं, इसलिए गरीब लोग उन के लिए दूध देने वाली गाय साबित हो रहे हैं.

ऐसे लोग गरीबों को आसान व कारगर औजार बना कर अपना मकसद पूरा करने में लगे रहते हैं. गरीबी से पार पाने के लिए टिकाऊ व मुकम्मल रास्ता दिखाने के बजाय उन्हें मुफ्तखोरी के लिए उकसाते रहते हैं, ताकि वे काम व कोशिश न करें और हाथ में कटोरा थामे पीढ़ी दर पीढ़ी गरीब ही बने रहें.

यही वजह है कि गरीबों की मदद के नाम पर उन की वक्ती जरूरतों की चीजें भोजन, कपड़े व बरतन बांटने की रस्मअदायगी की जाती है.

इस काम में सरकारें भी पीछे नहीं हैं, इसलिए मुफ्त का माल झपटने के चक्कर में अकसर जहांतहां हादसे होते रहते हैं. छीनाझपटी करते वक्त गरीब लोग एकदूसरे को कुचल देते हैं.

पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर शहर में सरकारी कंबल बांटते समय हुई ऐसी ही एक घटना में बहुत से लोग जख्मी हो गए थे.

समाजसेवा का डंका पीटने वाले चालाक लोग गरीबों की मदद के नाम पर थोड़ा पैसा खर्च कर अपना नाम चमकाने व मशहूर होने की जुगत में लगे रहते हैं. वे अकसर कुछ चीजें गरीबों को बांटते हैं और ज्यादा का दिखावा करते हैं, इसलिए हकीकत में काम कम व प्रचार ज्यादा होता है. अखबारों से सोशल मीडिया तक कंबल, खाना व कपड़े वगैरह बांटने वालों के फोटो सुर्खियों में छाए रहते हैं.

कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना

ज्यादातर मामलों में गरीबों को दान इनसानियत दिखाने या राहत पहुंचाने से ज्यादा वाहवाही लूटने व प्रचार पाने की गरज से किए जाते हैं. गरीबों की मदद करने को भी बहुत से लोगों ने अपना धंधा बना लिया है. बहुत सी कागजी संस्थाएं गलीमहल्लों में बढ़ रही हैं.

कई लोग खासकर छुटभैए नेता गरीबों की मदद व समाजसेवा के नाम पर बेहिसाब चंदा इकट्ठा करते हैं और अपना मतलब साधने में लगे रहते हैं. इस में फायदा उन का व नुकसान आम जनता का होता है. जो जना पंडितों के नाम पर गरीबों को थोड़ा सा दान करेगा, वह पंडितों के कहने पर पंडों और मंदिरों को तो मोटा दान करेगा ही.

इनसानियत के नाते मुसीबतजदा, जरूरतमंद अपाहिजों वगैरह की मदद करना सही व सब का फर्ज है. बेसहारा को इमदाद देना अच्छा है, लेकिन किसी मजबूर की असल मदद करना बेहतर है. जिस में दायां हाथ दे और बाएं हाथ को खबर न हो यानी कहीं कोई जिक्र न हो. बात जबान पर आने से लेने वाले को ठेस लगती है.

उस पर अहसान जताने व अपनी दरियादिली के ढोल बजाने से तो गरीब जीतेजी मर जाता है, लेकिन अमीरों को इस से कुछ फर्क नहीं पड़ता.

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वे गरीबों को दिए दान के प्रचार से नाम कमा कर एक तरह से अपने दान की कीमत वसूलते हैं और मुफ्त सामान पाने के लालच में गरीब यह खेल समझ ही नहीं पाते.

तिल का ताड़

गरीबों को दान देने वाले भूल जाते हैं कि दान को बढ़ाचढ़ा कर नहीं बताना चाहिए. दिए गए दान का बारबार बखान करने, अपनी शान व शेखी बघारने, ढिंढोरा पीटने से देने वाले में गुरूर बढ़ता है और लेने वाले का जमीर खत्म हो जाता है.

इस के बावजूद गरीबों की मदद के नाम पर तरहतरह से प्रचार के पाखंड रचे जाते हैं, ताकि समाज में नाम ऊंचा हो व दानवीरता के तमगे मिलें. आजकल यह दिखावा जंगल में आग की तरह फैल रहा है.

गरीबों को मुफ्त चीजें बांटने वाले लोग बड़ी ही बेशर्मी से हंसतेमुसकराते हुए गरदन ऊंची कर के इस तरह से अहसान जताते नजर आते हैं, जैसे कि उन्होंने गरीबों को जागीर सौंप दी हो. फिर गरीबों को सामान देते हुए फोटो खिंचाना, वीडियो बनाना व तारीफ हासिल करने के लिए ह्वाट्सएप और फेसबुक वगैरह पर पोस्ट करना तो आम बात है. इस के अलावा स्मारिकाओं में चिकने कागज पर दानदाताओं के रंगीन फोटो छापे जाते हैं.

इमदाद लेने वाले मजबूर की गरदन तो पहले ही गुरबत, शर्म व अहसान के बोझ से झुकी रहती है, ऊपर से मदद लेते वक्त फोटो खिंचा कर उस की नुमाइश लगाने में उस गरीब की आंखें जमीन में गड़ जाती हैं.

देखा जाए, तो गरीबों को दान दे कर उस का प्रचार करना उन के लिए किसी दिमागी सजा से कम नहीं है. गरीबों को दान कर के अपना प्रचार करने की भूख उन करोड़ों की तरह होती है, जिन की मार गरीबों के बदन पर तो नहीं दिखती, लेकिन उन के भीतर उतर कर उन के यकीन को हिला देती है.

उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में गढ़ रोड पर रंगोली मंडप के पास एक मलिन बस्ती है. इस में आएदिन कई संगठनों के लोग गरीबों को फल, दूध, बिसकुट वगैरह खानेपीने व जूते, कपड़े वगैरह इस्तेमाल की चीजें बांटने के लिए आते रहते हैं. सामान देते वक्त ज्यादा जोर फोटो खिंचवाने पर लगा रहता है, इसलिए अगले दिन अखबारों में खबर के साथ फोटो छपते हैं.

एक संस्था के कर्ताधर्ता का कहना था, ‘‘जिस तरह से बुराइयों को देखसुन कर लोगों पर उन का खराब असर पड़ता है. बहुत से लोग उन्हें अपना लेते हैं, ठीक उसी तरह से लोगों पर नेकियों का अच्छा असर भी पड़ता है.

‘‘अच्छे काम होते देख कर भी लोग उन से सीख व सबक लेते हैं, इसलिए गरीबों की मदद करने वाले कामों का प्रचार करने से उन का सिलसिला आगे बढ़ता है.’’

गरीबों को दान दे कर उस के प्रचार का पाखंड रचने वाले लोग भले ही अपने हक में कितनी भी दलीलें दें, लेकिन सच यही है कि दान के प्रचार की लत हमारे समाज में नई नहीं है.

दान के प्र?????चार से ही तो दक्षिणा के लिए माहौल बनता है. नए चेले व चेलियां जाल में फंसते हैं. पुण्य का फायदा हासिल करने की गरज से सदियों से ऐसा होता रहा है. बरसों पुराने मंदिरों व धर्मशालाओं वगैरह में आज भी दीवारों व चबूतरों पर लगे पत्थरों पर दान देने वालों के नाम खुदे हुए देखे जा सकते हैं.

प्रचार की भूख में बहुत से लोग तो अपनी अक्ल को उठा कर ताक पर रख देते हैं. दुनिया से जा चुके अपने मांबाप की याद में फर्श पर लगवाए पत्थरों पर ही उन के नाम खुदवा देते हैं.

फर्श पर लगे पत्थरों के साथसाथ उन पर खुदे मांबाप के नामों पर भी लोग पैर रख कर आतेजाते रहते हैं व दान के चक्कर में फंस कर मांबाप का नाम ऊंचा होने की जगह मिट्टी में मिल जाता है.

सर्दियों के दौरान बड़े शहरों में सड़क किनारे पड़े गरीबों को रजाईकंबल बांटने वालों की बाढ़ सी आ जाती है. कई बार देखा है कि बहुत से गरीबों को दान में दिया गया सामान अगले ही दिन उन गरीबों के पास नहीं होता और वे फिर से अपनी उसी खराब हालत में दिखाई देते हैं, क्योंकि ज्यादातर गरीब बदहाल जिंदगी के आदी हैं, इसलिए कुछ भी मिलने के थोड़ी देर बाद ही वे दान में मिली चीजें औनेपौने दामों पर बाजार में बेच देते हैं. गरीबों को दी गई मदद भी उन के हालात बदलने में नाकाम साबित होती है.

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असली मदद

मुफ्त का खाना सिर्फ 5-6 घंटे को पेट भरता है. अगले वक्त फिर भूख लगती है. दान का कपड़ा भी चंद बरस चलता है, लेकिन अपनी मेहनत व दिमाग से आगे बढ़ने की राह ताउम्र काम आती है, इसलिए गरीबों को दान की बैसाखी देने से बेहतर है उन्हें खुद अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करना. अपनी कोशिश से ऊपर उठ कर जिंदगी संवर कर निखर जाती है. भीख का कटोरा व दूसरों की और ताकना छूट जाता है.

लिहाजा, गरीबों पर तरस खा कर, उन्हें दान दे कर दूसरों के रहमोकरम पर जीने का आदी बनाने से अच्छा है. उन की सच्ची व सही मदद करना, ताकि उन में खुद पर यकीन पैदा हो और वे खुद गरीबी से नजात पाने की कोशिश करें. यह मुश्किल नहीं है.

करोड़ों गरीबों व भिखारियों को कम ब्याज पर 10 अरब डौलर के छोटे कर्ज दिला कर रोजगार में लगाने वाले बंगलादेश के मोहम्मद यूनुस को साल 2006 में नोबल पुरस्कार मिला था. उसी का नतीजा है कि आज बंगलादेश भारत व पाकिस्तान से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है.

माइक्रो फाइनैंसिंग के जरीए गरीबों की मदद करने व कामयाब मुहिम चला कर गरीबों को नई जिंदगी दे कर मिसाल बने मोहम्मद यूनुस का नाम आज दुनियाभर में जाना जाता है.

भारत में भी ऐसे काम होना लाजिमी है. साथ ही, गरीबों की तालीम, हुनर व काबिलीयत बढ़ा कर उन्हें ज्यादा पैसा कमाने के गुर सिखा कर भी निठल्लेपन व नशे जैसी बुराइयों से नजात दिलाना भी उन की मदद करने से कम नहीं है.

गरीबों को माली इंतजाम के उपाय बता कर उन की फुजूलखर्ची घटाई जा सकती है. वे ज्यादा कमा कर बचत करना सीख सकते हैं. जागरूक हो कर धार्मिक अंधविश्वासों से छुटकारा पा सकते हैं. अपनी जेबें हलकी होने से बचा सकते हैं, इसलिए मुफ्त की चीजें देने से अच्छा है कि उन्हें साफसुथरा रह कर बेहतर व सुखी जिंदगी बिताने के तौरतरीके समझाए जाएं.

सही राह दिखाना ही गरीबों की सच्ची मदद करना है. इस से हमारे समाज में सदियों से चली आ रही गरीबी के कलंक से छुटकारा मिल सकता है.

गुरुजी का नया बखेड़ा

झारखंड मुक्ति मोरचा के सुप्रीमो शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी ने राज्य में स्थानीय नीति यानी डोमिसाइल नीति को ले कर एक बार फिर बखेड़ा खड़ा कर दिया है.

उन्होंने यह कह कर नया सियासी बवाल मचा दिया है कि पिछली रघुवर दास सरकार की डोमिसाइल नीति आदिवासी विरोधी है. इस के बाद राज्य में एक नई बहस छिड़ गई है और आदिवासी आंदोलन नए सिरे से गोलबंद होता दिखाई देने लगा है.

इस पर शिबू सोरेन का कहना है कि स्थानीय नीति का आधार साल 1932 का खतियान होना चाहिए. गौरतलब है कि रघुवर दास सरकार ने डोमिसाइल नीति 1985 को कट औफ डेट रखा था.

हिंसक आंदोलनों के बाद साल 2015 में झारखंड की डोमिसाइल नीति जमीन पर उतरी थी. साल 2000 से इस मसले को ले कर भड़की आग ने कई सरकारों की लुटिया डुबो दी थी.

इस के पहले राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी हुए थे. शिबू सोरेन के सुर में सुर मिला कर झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं कि 1985 के आधार पर स्थानीय नीति जायज नहीं है. अब इस नीति को ले कर नए सिरे से विचार किया जाएगा.

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साल 2015 में लागू की गई डोमिसाइल नीति के तहत 30 साल से झारखंड में रहने वाले अब झारखंडी (स्थानीय) करार दिए गए. इस के तहत झारखंड सरकार द्वारा संचालित व मान्यताप्राप्त संस्थानों, निगमों में बहाल या काम कर रहे मुलाजिमों, पदाधिकारियों और उन के परिवार को स्थानीय माना गया है.

झारखंड राज्य और केंद्र सरकार के मुलाजिमों को स्थानीयता का विकल्प चुनने की सुविधा दी गई है. अगर वे झारखंड राज्य को चुनेंगे तो उन्हें और उन की संतानों को स्थानीय नागरिक माना जाएगा.

इस के बाद वे अपने पहले के गृह राज्य में स्थानीयता का फायदा नहीं उठा सकेंगे, वहीं झारखंड को नहीं चुनने की हालत में वे अपने गृह राज्य में स्थानीयता का लाभ ले सकेंगे.

भौगोलिक सीमा में निवास करने वाले वैसे सभी लोग, जिन का खुद या पुरखों का नाम पिछले सर्वे खतियान में दर्ज हो व मूल निवासी, जो भूमिहीन हों, उन के संबंध में उन की प्रचलित भाषा, संस्कृति और परंपरा के आधार पर ग्राम सभा द्वारा पहचान किए जाने पर उन्हें स्थानीय माना गया है.

इस के साथ ही वैसे लोगों को भी स्थानीय माना गया है, जो कारोबार और दूसरी वजहों से पिछले 30 साल या उस से ज्यादा समय से झारखंड में रह रहे हों और अचल संपत्ति बना ली हो. ऐसे लोगों की बीवी, पति और संतानें स्थानीय मानी गई हैं.

गौरतलब है कि राज्य में आदिवासियों की आबादी 26 फीसदी ही है और 74 फीसदी गैरआदिवासी हैं. झारखंड मुक्ति मोरचा के विधायक नलिन सोरेन कहते हैं कि उन की पार्टी शुरू से ही साल 1932 को आधार मान कर स्थानीय नीति बनाने की मांग करती रही है. नई डोमिसाइल नीति से आदिवासियों का हक मारा गया है. इस नीति में आदिवासियों की अनदेखी कर गैरआदिवासियों का ध्यान रखा गया है.

गौरतलब है कि झारखंड सरकार ने 22 सितंबर, 2001 को बिहार के नियम को अपनाया था. संकल्प संख्या-5, विविध-09/2001, दिनांक 22 सितंबर, 2001 द्वारा बिहार के श्रम, नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग के सर्कुलर 3/स्थानीय नीति 5044/81806, दिनांक 3 मार्च, 1982 को आधार बनाया गया. इसी आधार पर खतियान (पिछला सर्वे रिकौर्ड औफ राइट्स) को स्थानीयता का आधार माना गया है.

साल 2000 में बिहार से अलग हो कर नया झारखंड राज्य बनने के बाद राज्य में डोमिसाइल नीति को ले कर आंदोलन चल रहा था. नया झारखंड राज्य बनने के बाद से 2015 तक 10 बार मुख्यमंत्रियों की अदलाबदली हुई, पर हर किसी ने डोमिसाइल नीति पर टालमटोल वाला रवैया ही अपनाया.

बहरहाल, शिबू सोरेन राजनीतिक फायदे को देख कर पाला बदलने और गुलाटी मारने के माहिर खिलाड़ी रहे हैं.

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साल 1980 में वे पहली बार जब सांसद बने, तो उस समय कांग्रेस के साथ थे. 1983 में जनता दल बना तो उन्होंने कांग्रेस को ठेंगा दिखा कर जनता दल का दामन थाम लिया.

2 साल बाद उन्हें लगा कि वहां उन की दाल नहीं गल रही है तो फिर कांग्रेस की गोद में जा बैठे और 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा. 1990 आतेआते कांग्रेस से उन का मन भर गया और उन्होंने फिर से जनता दल का झंडा उठा लिया.

जनता दल के घटक दल के रूप में उन्होंने चुनाव लड़ा. उन की पार्टी झामुमो के 6 उम्मीदवार जीत कर संसद पहुंच गए.

साल 1993 में शिबू सोरेन का माथा फिर घूमा और वे अपने 6 सांसदों के साथ कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव के पक्ष में खड़े हो गए, जिस के लिए वे 3 करोड़ रुपए से ज्यादा की घूस लेने के आरोप में भी फंसे हुए हैं.

इस के कुछ समय बाद ही उन का कांग्रेस से मन उचट गया और वे भाजपा के साथ मिल कर नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम में लग गए.

साल 1996 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो बने, पर सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए और जनता दल टूट गया. तब गुरुजी शिबू सोरेन लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े हो गए.

साल 2000 में जब अलग झारखंड राज्य बना, तो वे मुख्यमंत्री बनने के लोभ में भाजपा की अगुआई वाले राजग में शामिल हो गए. जब भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बना दिया तो शिबू बिदक कर कांग्रेसराजद गठबंधन की छत के नीचे जा बैठे.

साल 2007 में मधु कोड़ा को झारखंड का मुख्यमंत्री बनाने में उन्होंने मदद की और साल 2008 में खुद मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में कोड़ा की सरकार को गिरा दिया था. अब अपनी पार्टी और बेटे की सरकार में वे उलटपुलट बयान दे कर उन के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं.

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14 मार्च, 2020 को एक पत्रकार ने पूछा कि अब झारखंड में आप की सरकार है, तो क्या राज्य का विकास होगा? इस के जवाब में शिबू सोरेन ने कहा, ‘हम विकास का ठेका लिए हुए हैं क्या?’

इस हॉट Model की वजह से हुआ था रश्मि देसाई का तलाक, देखें Photos

टीवी इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेसेस में से एक रश्मि देसाई (Rashmi Desai) अपने फैंस के बीच काफी पौपुलर हैं. हाल ही में रश्मि देसाई ने टीवी के सबसे बड़े रिएलिटी शो बिग बौस के सीजन 13 (Bigg Boss 13) में हिस्सा लिया था जिसमें कि वे टौप 5 फाइनलिस्ट में से भी एक रहीं. रिएलिटी शो बिग बौस (Bigg Boss) में एक्ट्रेस रश्मि देसाई खूब सुर्खियों में रही थीं जिसका एक कारण था उनके पर्सनल रिलेशलशिप्स. रश्मि देसाई अब तक लाखों दिलों की जान बन चुकी हैं और अपनी मेहनत से उन्होनें अपनी कमाल की फैल फौलोविंग (Fan Following) हासिल की है. बिग बौस में भी रश्मि देसाई ने कई लोगों के दिल जीत लिए थे.

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रश्मि देसाई (Rashmi Desai) ने 12 फरवरी 2012 में अपने सीरियल ‘उत्तरन’ (Uttaran) के कोस्टार नंदिश संधू (Nandish Sandhu) के साथ शादी की थी पर उनकी ये शादी सफल ना रही और लगभग 4 साल बाद दोनों ने अपनी राहें एक दूसरे से अलग कर ली. खबरों की माने तो रश्मि देसाई के इस रिश्ते को तोड़ने में अंकिता शौरी (Ankita Shorey) का हाथ था. अंकिता शौरी एक मौडल हैं और उन्होनें साल 2011 में फेमिना मिस इंडिया इंटरनेशनल (Femina Miss India International 2011) का खिताब भी हासिल किया था.

कई इवेंट्स के चलते एक्टर नंदिश संधू (Nandish Sandhu) और मौडल अंकिता शौरी (Ankita Shorey) को एक साथ देखा गया था और तभी से मीडिया में इन दोनों के रिश्ते की खबरें फैलने लगी थीं. रश्मि ने अपने और नंदिश के रिश्ते को संभालने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन अंकिता की वजह से उन्हें बैक-स्टेप लेना पड़ा. ऐसा सुनने में आया था कि नंदिश को रश्मि से दूरियां बढ़ा कर अंकिता के साथ नज़दीकियां बढ़ाना काफी पसंद आ रहा है.

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जैसा कि हमने आपको बताया कि अंकिता शौरी एक खूबसूरत मौडल हैं तो इसी के चलते आए दिन उनकी हॉट और बोल्ड फोटोज वायरल होती ही रहती हैं. असल जिंदगी में भी अंकिता शौरी काफी ग्लैमरस है और इस बात का अंदाजा तो उनकी फोटोज देख कर ही लगाया जा सकता है. शायद यही कारण रहा होगा कि अंकिता ने अपने हॉट अवतार से नंदिश को अपने नजदीक कर लिया और रश्मि से उन्हें दूर करती गईं.

आपको बता दें कि रश्मि देसाई एक बेहतरीन एक्ट्रेस हैं और उन्होंने अब तक कई सीरियल्स में काम कर लोगों का दिल जीता है. ना सिर्फ सीरियल्स में बल्कि रश्मि ने फिल्मों में भी अपनी बेहतरीन एक्टिंग के जलवे बिखेरे हैं.

आपदा बनी सत्ता के लिए एक अवसर

कहा जाता है कि आपदा अपने साथ मौके ले कर आती है. सत्ता साजिशों में कामयाब होती है, तो उन्हें अपने लिए मौकों में तबदील कर लेती है और जनता जागरूक व लड़ाकू होती है तो हालात को अपने मुताबिक ढाल लेती है.

भारत के लिहाज से आज के हालात देखें तो सत्ता इस कोरोना रूपी आपदा को मौके में तबदील करती नजर आ रही है. सरकारों ने लौकडाउन के बीच नियम बनाया कि 33 फीसदी से ले कर 50 फीसदी तक लोग काम कर सकते हैं, मगर साथ में श्रम कानूनों में बदलाव कर के काम के घंटे 8 से बढ़ा कर 12 कर दिए हैं यानी तैयारी ऐसी कि जो मजदूर पलायन कर के जा रहे हैं, उन में से 50 फीसदी के लिए दोबारा आने के दरवाजे बंद हो जाएंगे. कम वेतन में ज्यादा काम करवाने का इंतजाम कर लिया गया है.

भारत में  43 करोड़ मजदूर हैं, जिन में से तकरीबन 39 करोड़ असंगठित क्षेत्र से हैं. मतलब साफ है कि तकरीबन 18 करोड़ मजदूरों की नौकरी जा सकती है. सरकार ने 40,000 करोड़ रुपए मनरेगा के लिए अतिरिक्त आवंटित किए हैं, ताकि कुछ दिनों के लिए मजदूर वहीं लग जाएं और उस समय का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवादी मौडल को दुरुस्त कर लिया जाए.

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विदेशों से लाखों लोग हवाईजहाजों से लाए गए व विभिन्न राज्यों में फंसे पैसे वाले परिवारों के छात्रों को एसी बसों से घर लाया गया, मगर मजदूरों की गांव वापसी की राहों में कांटे बिछा कर डरावना अनुभव करवाया जा रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कह रही हैं कि विपक्ष राजनीति कर रहा है, राज्य सरकारें अतिरिक्त ट्रेनों की मांग क्यों नहीं कर लेतीं? वित्त मंत्री को पता है कि सब से बुरी हालत मध्य प्रदेश, बिहार व उत्तर प्रदेश के मजदूरों की हो रही है और तीनों राज्यों में इन की ही सरकार है, मगर वे विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कह रही हैं कि पलायन करने वालों की पीड़ा पर राजनीति नहीं करनी चाहिए.

सरकार ने बड़ी चतुराई के साथ राहत पैकेज को पूंजीवादी मौडल को दुरुस्त करने की तरफ बढ़ा दिया और बातें किसानमजदूर की हो रही हैं. फिजाओं में स्वदेशी अपनाओ व आत्मनिर्भर सरीखे जुमले फेंक कर विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा दी गई और यहां तक रक्षा उद्योगों तक मे 50 फीसदी से ज्यादा के निवेश की अनुमति दे दी गई यानी अब हमारे लिए रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर मालिकाना हक विदेशियों का होगा.

लाजिम है जो करोड़ों मजदूर शहरों से गांवों में गए हैं तो उन का आर्थिक भार गांवों को ही उठाना होगा और जो मनरेगा में 40,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त दिए हैं, वे कुछ दिन मजदूरों को थामने का लौलीपौप मात्र है. किसानों को अतिरिक्त कर्जे की जो घोषणा हुई है वह किसानों को कर्ज में डुबोने वाली साबित होगी. बड़े लुटेरों के लिए दिवालिए कानून पर एक साल के लिए रोक लगा दी गई, मगर किसानों की जमीनों की कुर्की पर कोई रोक नहीं लगाई गई है. संकेत साफ है कि नई कृषि नीति के तहत कंपनियां किसानों की जमीनों पर खेती के लिए निवेश करेंगी और किसान व जो मजदूर फ्री किए गए हैं, दोनों मिल कर खेतों में मजदूरी करेंगे.

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किसानों व मजदूरों के लिए सत्ता की तरफ से इशारा साफ है कि उद्योगों में कम मैनपावर से ज्यादा श्रम करा कर पूंजी निर्माण करवाया जाएगा और खेतीकिसानी में ज्यादा मजदूर धकेल कर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरीए खेतों पर कब्जा करवाया जाएगा. जब मजदूर व किसान सत्ता की नीतियों से समान रूप से प्रभावित होने जा रहे हैं तो आज अकेले ही मजदूर सड़कों पर क्यों पिट रहे हैं? लुटेपिटे मजदूर आने किसानों के हिस्से में ही हैं तो मजदूरों के साथ अभी किसान एकजुटता दिखाते हुए लड़ क्यों नहीं लेते?

अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि सब्र की भी एक सीमा होती है. गुजरात के राजकोट में मजदूरों के सब्र की सीमा टूट पड़ी और उस की भेंट चढ़ गए मीडिया के लोग. दरअसल, मजदूरों की आवाज न उठाने के चलते लोग मीडिया से भी सख्त नाराज हैं.

Bikini पहन बोल्ड अवतार दिखाने की वजह से ये TV एक्ट्रेसेस हुईं ट्रोल, देखें Photos

फिल्म इंडस्ट्री की कोई एक्ट्रेस हो या फिर टीवी इंडस्ट्री की हर किसी की किस्मत में एक ना एक बार तो ट्रोलर्स के हाथों ट्रोल होना लिखा ही होता है. कोई एक्ट्रेस अपने स्टेटमेंट या एक्टिंग की वजह से तो कोई अपने पहनावे की वजह से सुर्खियों का कारण बन ही जाती हैं और ट्रोलर्स तो जैसे अपना पूरा ध्यान इसी पर टिकाए रहते हैं कि कब वे कौनसी एक्ट्रेस को ट्रोल कर सकें.

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ऐसे में जब ट्रोलर्स किसी भी एक्ट्रेस को ट्रोल करते हैं तो एक्ट्रेसेस भी इन ट्रोलर्स के ट्रोल का करारा जवाब अच्छे से देना जातनी हैं. तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसी ही टीवी इंडस्ट्री से जुड़ी कुछ एक्ट्रेसेस के बारे में जो कि बिकिनी पहनने की वजह से ट्रोलर्स के निशाने का शिकार बनी हैं भले ही बात में इन सबने उन्हें मुंह तोड़ जवाब भी दिया है.

अनेरी वजानी

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इस कड़ी में पहने नाम है एक्ट्रेस अनेरी वजानी (Aneri Vajani) का. अनेरी वजानी अब तक कई टीवी सीरियल्स में काम कर चुकी हैं जैसे की ‘निशा और उसके कसन्स’ (Nisha Aur Uske Cousins), ‘बेहद’ (Beyhadh), ‘सिल्सिला बदलते रिश्तों का’ (Silsila Badalte Rishton Ka), आदी. इस एक्ट्रेस को अपनी इस बिकिनी फोटो की वजह से ट्रोलर्स की खरी खोटी सुननी पड़ी थी जिसके बाद ट्रोलर्स को अनेरी से करारा जवाब भी सुनने को मिला था.

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भूमिका गूरंग

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भूमिका गूरंग (Bhumika Gurung) ने ‘निमिकी मुखिया’ (Nimki Mukhiya) नामक पौपुलर सीरियल में निमकी/नमकीन कुमारी का किरदान निभाया था जो कि उनके फैंस ने काफी पसंद किया था. भूमिका को भी अपनी बोल्ड फोटोज की वजह से काफी ट्रोल्स का शिकार होना पड़ा था.

मौनी रॉय

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मौनी रॉय (Mouni Roy) ने अपने करियर की शुरूआत साल 2006 में सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ (Kyuki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi) से की थी और उसके बाद एक के बाक एक हिट सीरियल्स में काम कर वे सफलते की सीढ़ियां चढ़ती गईं. मौनी रॉय अपने बिकिनी फोटोशूट्स के चलते फैंस की काफी वाहवाही लूटती हैं तो वहीं दूसरी तरफ ट्रोल्स उन्हें ट्रोल करने से बाज़ नहीं आते.

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कविता कौशिक

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सब टीवी के पौपुलर शो ‘एफआईआर’ (FIR) में की चंद्रमुखी चौटाला (Chandramukhi Chautala) उर्फ कविता कौशिक (Kavita Kaushik) भी कई बार अपनी हॉट और बोल्ड फोटोज की वजह से ट्रोलर्स के ट्रोल्स का शिकार हुई हैं.

रूबिना दिलाइक

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पौपुलर एक्ट्रेस रूबिना दिलाइक (Rubina Dilaik) भी पिछले दिनों अपनी हॉट फोटोज के चलते ट्रोलर्स की नजरों में आ गई थीं. रूबिना अपने निभाए गए किरदारों की वजह से फैंस का दिल जीतने में कामयाब रही हैं. रूबिना ने ट्रोलर्स को ये कह कर जवाब दिया था कि अब उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता.

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सारा खान

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सारा खान (Sara Khan) अक्सर ही अपनी बिकिनी फोटोज की वजह से सोशल मीडिया पर धमाल मचाती दिखाई देती हैं और फैंस भी उनके इस बोल्ड अंदाज को काफी पसंद करते हैं लेकिन शायद ट्रोलर्स को उनका ये अंदाज पसंद नहीं आता जिस वजह से वे आए दिन सारा को ट्रोल करते रहते हैं.

Corona : यहां “शिक्षक” नाकेदार हैं 

शिक्षक की हमारे मन में कितनी इज्जत है. कहते हैं शिक्षक दीपक की तरह होता है जो खुद जलकर “रोशनी” फैलाता है. इतिहास में से बढ़कर एक शिक्षक हुए जिन्होंने समाज को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई. मगर छत्तीसगढ़  में शिक्षक स्कूलों में ताले लगाकर सरकारी फरमान का निर्वहन करते  आस-पास के गांव में, पेड़ के नीचे, कहीं धूप में नाकेदार बने हुए हैं और करोना काल में आने जाने वालों का हिसाब किताब रख रहे हैं.

दुनिया भर के देशों में फैली कोरोना महामारी (कोविड 19) का असर  छत्तीसगढ़ में भी फैला हुआ है ऐसे में लाॅक डाउन की स्थिति बनी हुई है गांव गांव में लोगों ने नाके और गेट बना कर आवाजाही को रोक दिया है ताकि कोई अनजान व्यक्ति गांव में प्रवेश न कर सके मगर सरकार ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक फरमान निकाल कर शिक्षकों को गांव गांव के नाको  पर तैनात कर दिया है अब हालात यह है कि स्कूलों में ताले लगे हुए हैं और जो शिक्षक स्कूल में बच्चों को पढ़ाता वह छत्तीसगढ़ सरकार की मेहरबानी से एक अदना सा गेटकीपर बन  कर नाके पर बैठा सरकार की असलियत को उजागर कर रहा है प्रस्तुत है एक खास रिपोर्ट-

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आप हैं हेड मास्टर  राठिया !

और सच  जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती वह सब हमने देखा और आपके लिए लाए हैं वह संपूर्ण  बातचीत वह सारा वीडियो जिसे देख पढ़ कर छत्तीसगढ़ शासन की असलियत को समझ पाएंगे आइए आपको ले चलते हैं छत्तीसगढ़ के जिला रायगढ़ के ग्राम धसकामुड़ा . जहां ग्रामीणों द्वारा बनाए गए  एक नाका दिखाई दे रहा है  यहाँ  एक बुजुर्ग  खड़ा हुआ है. हमने उनसे जानना चाहा आप कौन हैं क्या कर रहे हैं?

उनका जवाब सुनकर हम हैरान रह गए और हमें अपनी व्यवस्था पर शर्म आई. शख्स ने बताया कि वे गांव के प्राथमिक विद्यालय मे हेड मास्टर है.यह है हमारी  नग्न व्यवस्था!  सरकारें शिक्षक के साथ ऐसा ही व्यवहार करती रही है. बुजुर्ग हेड मास्टर ने बताया कि उसका नाम भोजराम राठिया है और वह प्राथमिक शाला धसका  मुड़ा में पदस्थ है. उसके चेहरे के हाव भाव बता रहे थे कि वह अपनी ड्यूटी बड़े ही ईमानदारी से निभा रहा है.हमारा दूसरा प्रश्न  यह था कि  गुरुजी आपको तनख्वाह कितनी मिलती है ? तो उन्होंने बड़े  शालीनता के साथ बताया कि लगभग 74000 हजार  रुपये मासिक वेतन उन्हें मिलता है.

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यह दृश्य यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सरकार हमारे शिक्षकों का कितना ख्याल रख रही है.  और सबसे बड़ी विसंगति यह की उन्हें एक  तहसीलदार के लिखित  आदेश पर नाकेदार की ड्यूटी निभानी पड़ रही है. यह संपूर्ण व्यवस्था यह बयां करती है कि किस तरह कोरोना महामारी संक्रमण काल में जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बारंबार ऑनलाइन पढ़ाई की बात कर रहे हैं करोड़ों रुपए  शासन इस पर खर्च कर रहा है मगर इसका  हश्र क्या है उसकी सच्चाई क्या है यहां जमीन पर दिखाई देती है.

भूपेश बघेल की ऑनलाइन पढाई

एक तरफ छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बारंबार यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि नौनिहालों को ऑनलाइन शिक्षा देने की व्यवस्था छत्तीसगढ़ सरकार ने की है. इस हेतु  आदेश जारी कर दिए गए हैं मगर लगता है कि  ऑनलाइन का यह  अश्वमेघ का घोड़ा  यहाँ आकर ठहर गया है . यहां शिक्षकों को गांव गांव के नाकों में ड्यूटी पर लगा दिया गया है जो  बेहद बेहद शर्मनाक है.

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