मुट्ठी भर प्यार- भाग 1

लेखक-सुधा गोयल

मैं उन से एक शब्द भी नहीं बोल पाई. बोल ही कहां पाती…सूचना ही इतनी अप्रत्याशित थी. सुन कर जैसे यकीन ही नहीं आया और जब तक यकीन हुआ फोन कट चुका था. इतना भी नहीं पूछ पाई कि यह सब कैसे और कब हुआ. वे मानें या न मानें पर यह सच है कि जितना हम बूआ के प्यार को तरसे हैं उतनी ही हमारी कमी बूआजी ने भी महसूस की होगी. हमारे संबंधों में लक्ष्मण रेखाएं मम्मीपापा ने खींच दीं. इस में हम दोनों बहनें कहां दोषी हैं. कहते हैं कि मांबाप के कर्मों की सजा उन के बच्चों को भोगनी पड़ती है. सो भोग रहे हैं, कारण चाहे कुछ भी हों. कितनाकितना सामान बूआजी हम दोनों बहनों के लिए ले कर आती थीं. बूआजी के कोई बेटी नहीं थी और हमारा कोई भाई नहीं था. पापा के लिए भी जो कुछ थीं बस, बूआजी ही थीं. अत: अकेली बूआजी हर रक्षाबंधन पर दौड़ी चली आतीं. उमंग और नमन भैया के हम से राखी बंधवातीं और राखी बंधाई में भैया हमें सुंदर ड्रेसें देते, साथ में होतीं मैचिंग क्लिप, रूमाल, चूडि़यां, टौफी और चौकलेट.

हम बूआजी के आगेपीछे घूमते. बूआजी अपने साथ बाजार ले जातीं, आइसक्रीम खिलातीं, कोक पिलातीं, ढेरों सामान से लदे जब हम घर में घुसते तो दादीमां बूआजी को डांटतीं, ‘इतना खर्च करने की क्या जरूरत थी? इन दोनों के पास इतना सामान है, खिलौने हैं, पर इन का मन भरता ही नहीं.’

बूआजी हंस कर कहतीं, ‘मम्मी, अब घर में शैतानी करने को ये ही 2 बच्चियां हैं. घर कैसा गुलजार रहता है. ये हमारा बूआभतीजी का मामला है, कोई बीच में नहीं बोलेगा.’

थोडे़ बड़े हुए तो मुट्ठी में बंद सितारे बिखर गए. बूआजी को बुलाना तो दूर पापाजी ने उन का नाम तक लेने पर पाबंदी लगा दी. बूआजी आतीं, भैया आते तो हम चोरीचोरी उन से मिलते. वह प्यार करतीं तो उन की आंखें नम हो आतीं.

पापामम्मी ने कभी बूआजी को अपने घर नहीं बुलाया. भैया से भी नहीं बोले, जबकि बूआजी हम पर अब भी जान छिड़कती थीं. राखियां खुल गईं. रिश्ते बेमानी हो गए. कैसे इंतजार करूं कि कभी बूआजी बुलाएंगी और कहेंगी, ‘धरा और तान्या, तुम अपनी बूआजी को कैसे भूल गईं? कभी अपनी बूआ के घर आओ न.’

कैसे कहतीं बूआजी? उन के आगे रिश्तों का एक जंगल उग आया था और उस के पार बूआजी आ नहीं सकती थीं. जाने ऐसे कितने जंगल रिश्तों के बीच उग आए जो वक्तबेवक्त खरोंच कर लहूलुहान करते रहे. बूआजी के एक फोन से कितना कुछ सोच गई मैं.

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मैं अतीत से बाहर आ कर अपने कर्तव्य की ओर उन्मुख हुई. तान्या को मैं ने फौरन फोन मिलाया तो वह बोली, ‘‘दीदी, फिलहाल मैं नहीं निकल पाऊंगी. बंगलौर से वहां पहुंचने में 2 दिन तो लग ही जाएंगे. फ्लाइट का भी कोई भरोसा नहीं, टिकट मिले न मिले. फिर ईशान भी यहां नहीं हैं. मैं तेरहवीं पर पहुंचूंगी. प्लीज, आप निकल जाइए,’’ फिर थोड़ा रुक कर पूछने लगीं, ‘‘दीदी, आप को खबर किस ने दी? कैसे हुआ ये सब?’’ पूछतेपूछते रो दी तानी.

‘‘तानी, मुझे कुछ भी पता नहीं. बस, बूआजी का फोन आया था. कितना प्यार करती थीं हमें दादी. तानी, क्या मेरा जाना मम्मीपापा को अच्छा लगेगा? क्या मम्मीपापा भी उन्हें अंतिम प्रणाम करेंगे?’’

‘‘नहीं, दीदी, यह समय रिश्तों को तोलने का नहीं है. मम्मीपापा अपने रिश्ते आप जानें. हमें तो अपनी दादी के करीब उन के अंतिम क्षणों में जाना चाहिए. दादी को अंतिम प्रणाम के लिए मेरी ओर से कुछ फूल जरूर चढ़ा देना.’’

मैं ने हर्ष के आफिस फोन मिलाया और उन्हें भी इस दुखद समाचार से अवगत कराया.

‘‘तुम तैयार रहना, धरा. मैं 15 मिनट में पहुंच रहा हूं.’’

फोन रख मैं ने अलमारी खोली और तैयार होने के लिए साड़ी निकालने लगी. तभी दादी की दी हुई कांजीवरम की साड़ी पर नजर पड़ी. मैं ने साड़ी छुई तो लगा दादी को छू रही हूं. उन का प्यार मुझे सहला गया. दादी की दी हुई एकएक चीज पर मैं हाथ फिरा कर देखने लगी. इतना प्यार इन चीजों पर इस से पहले मुझे कभी नहीं आया था.

आंखें बहे जा रही थीं. दादी की दी हुई सोने की चेन, अंगूठी, टौप्स को देने का उन का ढंग याद आ गया. लौटते समय दादी चुपचाप मुट्ठी में थमा देतीं. उन के देने का यही ढंग रहा. अपना मुट्ठी भर प्यार मुट्ठी में ही दिया.

हर्ष को भी जब चाहे कुछ न कुछ मुट्ठी में थमा ही देतीं. 1-2 बार हर्ष ने मना करना चाहा तो बोलीं, ‘‘हर्ष बेटा, इतना सा भी अधिकार तुम मुझे देना नहीं चाहते. तुम्हें कुछ दे कर मुझे सुकून मिलता है,’’ और इतना कहतेकहते उन की आंखें भर आई थीं.

तभी से हर्ष दादी से मिले रुपयों पर एक छोटा सा फूल बना कर संभाल कर रख देते और मुझे भी सख्त हिदायत थी कि मैं भी दादी से मिले रुपए खर्च न करूं.

मुझे नहीं पता कि मम्मीपापा का झगड़ा दादादादी से किस बात पर हुआ. बस, धुंधली सी याद है. उस समय मैं 6 साल की थी. पापादादी मां से खूब लड़ेझगड़े थे और उसी के बाद अपना सामान ऊपर की मंजिल में ले जा कर रहने लगे थे.

इस के बाद ही मम्मीपापा ने दादी और दादा के पास जाने पर रोक लगा दी. यदि हमें उन से कुछ लेते देख लेते तो छीन कर कूड़े की टोकरी में फेंक देते और दादी को खूब खरीखोटी सुनाते. दादी ने कभी उन की बात का जवाब नहीं दिया.

जब पापा कहीं चले जाते और मम्मी आराम करने लगतीं तो हम यानी मैं और तानी चुपके से नीचे उतर जातीं. दादी हमें कलेजे से लगा लेतीं और खाने के लिए हमारी पसंद की चीजें देतीं. बाजार जातीं तो हमारे लिए पेस्ट्री अवश्य लातीं जिसे पापामम्मी की नजरें बचा कर स्कूल जाते समय हमें थमा देतीं.

मम्मी पापा से शिकायत करतीं. पापा चांटे लगाते और कान पकड़ कर प्रामिस लेते कि अब नीचे नहीं जाएंगे. और हम डर कर प्रामिस कर लेतीं लेकिन उन के घर से निकलते ही मैं और तानी आंखोंआंखों में इशारा करतीं और खेलने का बहाना कर दादी के पास पहुंच जाते. दादी हमें खूब प्यार करतीं और समझातीं, ‘‘अच्छे बच्चे अपने मम्मीपापा का कहना मानते हैं.’’

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मुट्ठी भर प्यार- भाग 3

‘दादाजी, हमें आप की और दादी की याद आ रही है. हमें न तो कोई अपने साथ बाजार ले कर जाता है, न चीज दिलाता है. नानी कहानी भी नहीं सुनातीं. बस, सारा दिन हनी व सनी के साथ लगी रहती हैं. हम क्या करें दादाजी?’

दादाजी रास्ता सुझाते, ‘बेटा, धरा और तानी सुनो, तुम अपने पापा को फोन लगाओ और उन से कहो कि हम आप को बहुत मिस कर रहे हैं. आप आ कर ले जाओ.’

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दादाजी की यह तरकीब काम कर जाती. हम रोरो कर पापा से ले जाने के लिए कहते और अगले दिन पापा हमें ले आते. हम दोनों लौट कर दादी और दादाजी से ऐसे लिपट जाते जैसे कब के बिछुड़े हों.

पापा ने हमें पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया. हम लौटते तो दादाजी और दादी को इंतजार करते पाते. उन की अलमारी हमारे लिए सौगातों से भरी रहती. हाईस्कूल पास करने के बाद दादाजी ने मुझे घड़ी दी थी.

हम बड़े हुए तो पता चला कि दादाजी केवल पेंशन पर गुजारा करते हैं. हमारा मन कहता कि हमें अब उन से उपहार नहीं लेने चाहिए, लेकिन जब दादी हमारी मुट्ठियों में रुपए ठूंस देतीं तो हम इनकार न कर पाते. होस्टल जाते समय लड्डूमठरी के डब्बे साथ रखना दादी कभी न भूलतीं.

दोनों बहनों का कर्णछेदन एकसाथ हुआ तो दादी ने छोटेछोटे कर्णफूल अपने हाथ से हमारे कानों में पहनाए. और जब मेरी शादी पक्की हुई तो दादी हर्ष को देखने के लिए कितना तड़पीं. जब नहीं रहा गया तो मुझे बुला कर बोली थीं, ‘धरा बेटा, अपना दूल्हा मुझे नहीं दिखाएगी.’

‘अभी दिखाती हूं, दादी,’ कह कर एक छलांग में ऊपर पहुंच कर हर्ष का फोटो अलमारी से निकाल दादी की हथेली पर रख दिया था. दादी कभी मुझे तो कभी फोटो को देखतीं, जैसे दोनों का मिलान कर रही हों. फिर बोली, ‘हर्ष बहुत सुंदर है बिलकुल तेरे अनुरूप. दोनों में खूब निभेगी.’

मैं ने हर्ष को मोबाइल मिलाया और बोली, ‘हर्ष, दादी तुम से मिलना चाहती हैं, शाम तक पहुंचो.’

शाम को हर्ष दादी के पैर छू रहा था.

मेरी शादी मैरिज होम से हुई. शादी में पापा ने दादादादी को बुलाया नहीं तो वे गए भी नहीं. विवाह के बाद मैं अड़ गई कि मेरी विदाई घर से होगी. विवश हो मेरी बात उन्हें रखनी पड़ी. मुझे तो अपने दादाजी और दादी का आशीर्वाद लेना था. दुलहन वेश में उन्हें अपनी धरा को देखना था. उन से किया वादा कैसे टालती.

मेरी विदाई के समय दादाजी और दादी उसी प्रकार बाहरी दरवाजे पर खड़े थे जैसे स्कूल जाते समय खड़े रहते थे. मैं दौड़ कर दादी से लिपट गई. दादाजी के पांव छूने झुकी तो उन्होंने बीच में ही रोक कर गले से लगा लिया. दादी ने सोने का हार मेरी मुट्ठी में थमा दिया और सोने की एक गिन्नी हर्ष की मुट्ठी में.

जब भी मायके जाती, दादी से सौगात में मिले कभी रिंग, कभी टौप्स, कभी साड़ी मुट्ठी में दबाए लौटती. दादी ने मुझे ही नहीं तानी को भी खूब दिया. उन्होंने हम दोनों बहनों को कभी खाली हाथ नहीं आने दिया. कैसे आने देतीं, उन का मन प्यार से लबालब भरा था. वह खाली होना जानती ही न थीं. उन के पास जो कुछ अपना था सब हम पर लुटा रही थीं. मम्मीपापा देखते रह जाते. हम ने उन की बातों को कभी अहमियत नहीं दी, बल्कि मूक विरोध ही करते रहे.

‘‘अरे धरा, तुम अभी तक तैयार नहीं हुईं. अलमारी पकड़े  क्या सोच रही हो?’’ हर्ष बोले तो मैं जैसे सोते से जागी.

‘‘हर्ष, मेरी दादी चली गईं, मुट्ठी भरा प्यार चला गया. अब कौन मेरी और तुम्हारी मुट्ठियों में सौगात ठूंसेगा? कौन आशीर्वाद देगा? मैं दादी को निर्जीव कैसे देख पाऊंगी,’’ हर्ष के कंधे पर सिर रख कर रोने लगी.

मैं जब हर्ष के साथ वहां पहुंची तो लगभग सभी रिश्तेदार आ चुके थे. दादी के पास बूआजी तथा अन्य महिलाएं बैठी थीं. मैं बूआजी को देख लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ी. रोतेरोते ही पूछा, ‘‘बूआजी, मम्मीपापा?’’

बूआजी ने ‘न’ में गरदन हिला दी. मैं दनदनाती हुई ऊपर जा पहुंची. मेरा रोदन क्षोभ और क्रोध बन कर फूट पड़ा, ‘‘आप दोनों को मम्मीपापा कहते हुए आज मुझे शर्म आ रही है. पापा, आप ने तो अपनी मां के दूध की इज्जत भी नहीं रखी. एक मां ने आप को 9 महीने अपनी कोख में रखा, आज उसी का ऋण आप चुका देते और मम्मी, जिस मां ने अपना कोख जाया आप के आंचल से बांध दिया, अपना भविष्य, अपनी उम्मीदें आप को सौंप दीं, उन्हीं के पुत्र के कारण आज आप मां का दरजा पा सकीं. एक औरत हो कर औरत का दिल नहीं समझ सकीं. आप आज भी उन्हीं के घर में रह रही हैं. कितने कृतघ्न हैं आप दोनों.

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‘‘पापा, क्या आप अपनी देह से उस खून और मज्जा को नोच कर फेंक सकते हैं जो आप को उन्होंने दिया है. उन का दिया नाम आप ने आज तक क्यों नहीं मिटाया? आप की अपनी क्या पहचान है? यह देह भी उन्हीं के कारण धारण किए हुए हो. यदि आप अपना फर्ज नहीं निभाओगे तो क्या दादी यों ही पड़ी रहेंगी. आप सोचते होंगे कि इस घड़ी में दादाजी आप की खुशामद करेंगे. नहीं, उमंग भैया किस दिन काम आएंगे.

‘‘यदि आज आप दोनों ने अपना फर्ज पूरा नहीं किया तो इस भरे समाज में मैं आप का त्याग कर दूंगी और दादाजी को अपने साथ ले जाऊंगी’’

चौंक पडे़ दोनों. सोचने लगे, तो ऐसी नहीं थी, आज क्या हुआ इसे.

‘‘सुनो धरा, तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था.’’

‘‘क्यों नहीं आती? मेरी दादी गई हैं. उन्हें अंतिम प्रणाम करने का मेरा अधिकार कोई नहीं छीन सकता. आप लोग भी नहीं.’’

‘‘होश में आओ, धरा.’’

‘‘अभी तक होश में नहीं थी पापा, आज पहली बार होश आया है, और अब सोना नहीं चाहती. आज उस मुट्ठी भर प्यार की कसम, आप दोनों नीचे आ रहे हैं या नहीं?’’

धारा की आवाज में चेतावनी की आग थी. विवश हो दोनों को नीचे जाना ही पड़ा.

मुट्ठी भर प्यार- भाग 2

तानी गुस्से से कहती, ‘‘वह आप के पास नहीं आने देते. हम तो यहां जरूर आएंगे. क्या आप हमारे दादादादी नहीं हो? क्या आप के बच्चे आप की बात मानते हैं जो हम मानें?’’

दादी के पास हमारे इस सवाल का कोई उत्तर नहीं होता था.

दादी के एक तरफ मैं लेटती दूसरी तरफ तानी और बीच में वह लेटतीं. वह रोज हमें नई कहानियां सुनातीं. स्कूल की बातें सुनातीं और जब पापा छोटे थे तब की ढेर सारी बातें बतातीं. हमें बड़ा आनंद आता.

दादाजी की जेब की तलाशी में कभी चुइंगम, कभी जैली और कभी टौफी मिल जाती, क्योंकि दादाजी जानते थे कि बच्चों को जेबों की तलाशी लेनी है और उन्हें निराश नहीं होने देना है. उन के मतलब का कुछ तो मिलना चाहिए.

दादी झगड़ती हुई दादाजी से कहतीं, ‘तुम ने टौफी, चाकलेट खिलाखिला कर इन की आदतें खराब कर दी हैं. ये तानी तो सारा दिन चीज मांगती रहती है. देखते नहीं बच्चों के सारे दांत खराब हो रहे हैं.’

दादाजी चुपचाप सुनते और मुसकराते रहते.

तानी दादी की नकल करती हुई घुटनों पर हाथ रख कर उन की तरह कराहती. कभी पलंग पर चढ़ कर बिस्तर गंदा करती.

‘तानी, तू कहना नहीं मानेगी तो तेरी मैडम से शिकायत करूंगी,’ दादी झिड़कती हुई कहतीं.

‘मैडम मुझ से कुछ कहेंगी ही नहीं क्योंकि वह मुझे प्यार करती हैं,’ तानी कहती जाती और दादी को चिढ़ाती जाती. दादी उसे पकड़ लेतीं और गाल चूम कर कहती, ‘प्यार तो तुझे मैं भी बहुत करती हूं.’

सर्दियों के दिनों में दादी हमारी जेबों में बादाम, काजू, किशमिश, पिस्ता, रेवड़ी, मूंगफली कुछ भी भर देतीं. स्कूल बस में हम दोनों बहनें खुद भी खातीं और अपने दोस्तों को भी खिलातीं.

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तानी और मुझे साड़ी बांधने का बड़ा शौक था. हम दादी की अलमारी में से साड़ी निकालतीं और खूब अच्छी सी पिनअप कर के साड़ी बांधतीं हम शीशे में अपने को देख कर खूब खुश होते.

‘दादी, हमारे कान कब छिदेंगे? हम टौप्स कब पहनेंगे?’

‘तुम थोड़ी और बड़ी हो जाओ, मेरे कंधे तक आ जाओ तो तुम्हारे कान छिदवा दूंगी और तुम्हारे लिए सोने की बाली भी खरीद दूंगी.’

दादी की बातों से हम आश्वस्त हो जातीं और रोज अपनी लंबाई दादी के पास खड़ी हो कर नापतीं.

एक बार दादाजी और दादी मथुरा घूमने गए. वहां से हमारे लिए जरीगोटे वाले लहंगे ले कर आए. हम लहंगे पहन कर, टेप चला कर खूब देर तक नाचतीं और वह दोनों तालियां बजाते.

‘दादी, ऊपर छत पर चलो, खेलेंगे.’

‘मेरे घुटने दुखते हैं. कैसे चढ़ पाऊंगी?’

‘दादी, आप को चढ़ना नहीं पड़ेगा. हम आप को ऊपर ले जाएंगी.’

‘वह कैसे, बिटिया?’ उन्हें आश्चर्य होता.

‘एक तरफ से दीदी हाथ पकड़ेगी, एक तरफ से मैं. बस, आप ऊपर पहुंच जाओगी.’ तानी के ऐसे लाड़ भरे उत्तर पर दादी उसे गोद में बिठा कर चूम लेतीं.

दादी का कोई भी बालपेन तानी न छोड़ती. वह कहीं भी छिपा कर रखतीं तानी निकाल कर ले जाती. दादी डांटतीं, तब तो दे जाती. लेकिन जैसे ही उन की नजर बचती, बालपेन फिर गायब हो जाती. वह अपने बालपेन के साथ हमारे लिए भी खरीद कर लातीं, पर दादी के हाथ में जो कलम होती हमें वही अच्छी लगती.

हम उन दोनों के साथ कैरम व लूडो खेलतीं. खूब चीटिंग करतीं. दादी देख लेतीं और कहतीं कि चीटिंग करोगी तो नहीं खेलूंगी. हम कान पकड़ कर सौरी बोलतीं. दादाजी, इतनी अच्छी तरह स्ट्रोक मारते कि एकसाथ 4-4 गोटियां निकालते.

‘हाय, दादाजी, इस बार भी आप ही जीतेंगे,’ माथे पर हाथ मार कर मैं कहती, तभी तान्या दादाजी की गोटी उठा कर खाने में डाल देती.

‘चीटिंगचीटिंग दादी,’ कहतीं.

‘ओह दादी, अब खेलने भी दो. बच्चे तो ऐसे ही खेलेंगे न,’ सभी तानी की प्यारी सी बात पर हंस पड़ते.

‘दादी, आप के घुटने दबाऊं. देखो, दर्द अभी कैसे भागता है?’ तानी अपने छोटेछोटे हाथों से उन के घुटने सहलाती. वह गद्गद हो उठतीं.

‘अरे, बिटिया, तू ने तो सचमुच मेरा दर्द भगा दिया.’

तानी की आंखें चमक उठतीं, ‘मैं कहती न थी कि आप को ठीक कर दूंगी, अब आप काम मत करना. मैं आप का सारा काम कर दूंगी,’ और तानी झाड़न उठा कर कुरसीमेज साफ करने लगती.

‘दादी, आप के लिए चाय बनाऊं?’ पूछतेपूछते तानी रसोई में पहुंच जाती.

लाइटर उठा कर गैस जलाने की कोशिश करती.

दादी वहीं से आवाज लगातीं, ‘चाय रहने दे, तानी. एक गिलास पानी दे जा और दवा का डब्बा भी.’

तानी पानी लाती और अपने हाथ से दादी के मुंह में दवा डालती.

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एक बार मैं किसी शादी में गई थी. वहां बच्चों का झूला लगा था. मैं भी बच्चों के साथ झूलने लगी. पता नहीं कैसे झूले में मेरा पैर फंस गया. मुश्किल से सब ने खींच कर मेरा पैर निकाला. बहुत दर्द हुआ. पांव सूज गया. चला भी नहीं जा रहा था. मैं रोतेरोते पापामम्मी के साथ घर आई. पापा ने मुझे दादी के पास जाने नहीं दिया. जब पापामम्मी गए तब मैं चुपके से दीवार पकड़ कर सीढि़यों पर बैठबैठ कर नीचे उतरी. दादी के पास जा कर रोने लगी.

उन्होंने मेरा पैर देखा. मुझे बिस्तर पर लिटाया. पैर पर मूव की मालिश की. हीटर जला कर सिंकाई की और गोली खाने को दी. थोड़ी देर बाद दादी की प्यार भरी थपकियों ने मुझे उन की गोद में सुला दिया. कितनी भी कड़वी दवा हम दादी के हाथों हंसतेहंसते खा लेती थीं.

मेरा या तानी का जन्मदिन आता तो दादी पूछतीं, ‘क्या चाहिए तुम दोनों को?’

हम अपनी ढेरों फरमाइशें उन के सामने रखते. वह हमारी फरमाइशों में से एकएक चीज हमें ला देतीं और हम पूरा दिन दादी का दिया गिफ्ट अपने से अलग न करतीं.

बचपन इसी प्रकार गुजरता रहा.

नानी के यहां जाने पर हमारा मन ही न लगता. हम चाहती थीं कि हम दादी के पास रह जाएं, पर मम्मी हमें खींच कर ले जातीं. हम वहां जा कर दादाजी को फोन मिलाते, ‘दादाजी, हमारा मन नहीं लग रहा, आप आ कर ले जाइए.’

‘सारे बच्चे नानी के यहां खुशीखुशी जाते हैं. नानी खूब प्यार करती हैं, पर तुम्हारा मन क्यों नहीं लग रहा?’ दादाजी समझाते हुए पूछते.

Serial Story – मुट्ठी भर प्यार

किसान आंदोलन जातीयता का शिकार

पिछले 2 लोकसभा चुनावों में किसानों में ऊंची जातियों के बड़े वर्ग ने जाति और धर्म के असर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सब से ज्यादा समर्थन दिया, जिस के बाद केंद्र की मोदी सरकार को यह लगा कि कृषि कानूनों के जरीए खेती के निजीकरण का यही सब से सही समय है. जाति और धर्म में फंसा किसान कृषि कानूनों के गूढ़ रहस्यों को समझ नहीं पाएगा. कुछ किसान अगर विरोध पर उतरे भी तो उन की आवाज को दबाना मुश्किल नहीं होगा.

अंगरेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का पालन करते हुए केंद्र सरकार खेती में निजीकरण की आड़ में ईस्ट इंडिया वाले कंपनी राज की वापसी के लिए कदम बढ़ा चुकी है.

केंद्र सरकार के 3 कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन जातीय राजनीति का शिकार हो गया. कृषि कानून पूरे देश में लागू होंगे. इस का असर पूरे देश के किसानों पर पड़ेगा, पर किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वाले किसानों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कृषि कानूनों का असर केवल पंजाब व हरियाणा के किसानों पर पड़ेगा.

समझने वाली बात यह है कि हरियाणा और पंजाब के किसानों ने ही इस आंदोलन में पूरी मजबूती से हिस्सा क्यों लिया? बाकी देश के किसानों की हाजिरी केवल दिखावा मात्र रही.

8 दिसंबर, 2020 को किसान आंदोलन के पक्ष में भारत बंद उन राज्यों में कामयाब रहा, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी. जिन राज्यों में भाजपा की सरकार रही, वहां यह आंदोलन ज्यादा कामयाब नहीं रहा.

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कृषि कानूनों में जो सब से बड़ा डर छिपा है, वह एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य का है. निजी मंडियों के आने से सरकारी मंडियों के बंद हो जाने का खतरा किसानों को दिख रहा है, जिस से यह लग रहा है कि सरकार एमएसपी को धीरेधीरे बंद करने की योजना में है.

नीति आयोग ने साल 2016 में  11 राज्यों में किसानों के बीच एमएसपी को ले कर एक सर्वे किया था, जिस में यह पता चला कि एमएसपी की जानकारी भले ही 81 फीसदी किसानों को हो,  पर इस का फायदा देशभर के केवल 6 फीसदी किसानों को ही मिलता है.

उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में 100 फीसदी किसानों को एमएसपी का पता था. एमएसपी का सब से ज्यादा फायदा पंजाब और हरियाणा के किसानों को ही मिलता रहा है.

1965-66 में जब एमएसपी योजना शुरू  हुई थी, तब यह केवल धान और गेहूं की फसल पर मिलती थी. धीरेधीरे अब 23 फसलों की खरीद पर एमएसपी मिलने लगी है. इन फसलों में ज्वार, कपास, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन और तिल जैसी फसलें शामिल हैं.

एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य का मतलब यह होता है कि अगर फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाए, तब भी सरकार तय एमएसपी पर ही किसानों से फसल खरीदेगी, जिस से किसान को नुकसान न हो.

सरकार के कानून इसलिए फेल नहीं होते कि वे गलत तरह से बने होते हैं, बल्कि वे इसलिए फेल होते हैं, क्योंकि उन का क्रियान्वयन गलत तरह से किया जाता है. एमएसपी और मंडियों के साथ भी यही हो रहा है. सरकार को इस में सुधार करना चाहिए था, न कि इस को बंद करने की दिशा में काम करना चाहिए था.

जातपांत है हावी

राजनीतिक विश्लेषक और जन आंदोलन चलाने वाले प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘लोकसभा के 2 चुनावों साल 2014 और 2019 में किसानों ने बड़ी तादाद में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया था. अगर जातीय आधार पर देखें, तो इन में ऊंची जातियों के किसानों का वोट फीसदी सब से अलग था.

‘‘भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने जब यह सम?ा लिया कि बहुसंख्यक किसान उस के पक्ष में हैं, तो उस ने खेती को प्रभावित करने वाले

3 कानून लागू करने का फैसला कर लिया. उसे यह पता था कि केवल हरियाणा और पंजाब के किसान आंदोलन को लंबे समय तक नहीं चला पाएंगे. इस वजह से यह समय कृषि कानूनों को लागू करने के लिए सब से मुफीद लगा.’’

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में पंजाब के किसानों ने भाजपा की अगुआई वाले राजग को 52 फीसदी वोट दिए. ये वोट भी भाजपा की जगह उस के सहयोगी अकाली दल के चलते मिले थे.

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में ये वोट घट कर 32 फीसदी रह गए. हरियाणा के किसानों ने राजग यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को साल 2014 में 31 फीसदी वोट दिए और साल 2019 में ये वोट बढ़ कर 59 फीसदी हो गए.

बात केवल पंजाब और हरियाणा की नहीं है, बाकी देश के प्रमुख राज्यों में भी किसानों का सब से बड़ा समर्थन राजग को ही मिला.

बिहार में साल 2014 में 37 फीसदी से बढ़ कर 50 फीसदी हो गया. इसी तरह से उत्तर प्रदेश में 42 फीसदी से  54 फीसदी, गुजरात में 55 फीसदी से  62 फीसदी, राजस्थान में 54 फीसदी से 60 फीसदी, उत्तराखंड में 60 फीसदी से 65 फीसदी, मध्य प्रदेश में 55 फीसदी से 59फीसदी, महाराष्ट्र में साल 2014 और 2019 के चुनावों में 54 फीसदी वोट मिले, छत्तीसगढ़ में साल 2014 के लोकसभा चुनावों में किसानों के राजग को 52 फीसदी वोट मिले और 2019 में वे वोट घट कर 46 फीसदी रह गए.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘किसान सम्मान निधि’ के असर से किसानों ने राजग को ज्यादा वोट दिए. इस के साथ ही भाजपा के पक्ष में ऊंची जातियों के होने से राजग को किसानों के वोट ज्यादा मिले.

भारत के ज्यादातर किसान बेहद गरीब हैं. उन के लिए सालाना 6,000 रुपए की बहुत अहमियत होती है.

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पंजाब की किसान राजनीति

भाजपा को पंजाब के किसानों ने कभी भी समर्थन नहीं दिया. राजग के सहयोगी अकाली दल को पंजाब के किसान समर्थन देते थे. भाजपा की केंद्र सरकार ने जब 3 कृषि कानून बनाए तो उस के विरोध में अकाली दल कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

पंजाब में अकाली दल को केवल किसानों का समर्थन ही हासिल नहीं है, बल्कि अकाली दल प्रमुख प्रकाश सिंह बादल का परिवार खेती से ही अपना कारोबार चलाता है. किसानों को अकाली दल का समर्थन इस वजह से मिलता था कि वह किसानों की परेशानियों को हल करने की ताकत रखता था.

भाजपा अब पंजाब में अकाली दल को कमजोर करना चाहती है. ऐसे में वह अकाली दल की बातें नहीं मानना चाहती है. किसान आंदोलन के समझते से बाहर होने के बाद अकाली दल की कीमत किसानों में घट जाएगी.

भाजपा पूरे देश के किसानों को यह संदेश देने में कामयाब रही कि कृषि कानूनों का विरोध केवल पंजाब के किसान ही कर रहे हैं. ऐसे में पूरे देश के किसानों को एकजुट होने से रोक लिया गया.

ऊंची जातियों के किसानों का समर्थन भाजपा के साथ होने से यह बात सम?ाने में भाजपा को आसानी रही. जिन थोड़ेबहुत किसान संगठनों ने आंदोलन को समर्थन देने का काम किया भी, उन को कई तरीकों से दबाव में ले लिया गया.

केंद्र की मोदी सरकार ने पूरे किसानों के मुद्दे को अपने प्रचार तंत्र के बल पर केवल पंजाब व हरियाणा के किसानों तक में सीमित कर के रख दिया. इस वजह से किसान आंदोलन पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं बन सका.

किसान नेता केवल अपनी जाति और बिरादरी के बीच ही अपना असर रखते हैं. उन का कोई देशव्यापी संगठन नहीं है. किसान नेता राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बन कर ही अपनी राजनीति चमकाने का काम करते हैं. 3 कृषि कानूनों के खिलाफ भी केवल 30-40 किसान दल ही एकजुट हुए, तब आंदोलन कर पाए. ज्यादातर किसान दलों की अपनीअपनी राजनीतिक विचारधारा है. ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार को इन के बीच तोड़फोड़ करना आसान हो जाता है.

आंदोलन से डरी सरकार

जब किसानों ने एकजुट हो कर सरकार से लड़ाई लड़ी थी, तब फैसला भी किसानों के पक्ष में आया था. तब राष्ट्रीय राजनीति में किसान और किसान नेताओं का मजबूत दखल होता था. कोई भी सरकार इन को नाराज नहीं करना चाहती थी.

चौधरी चरण सिंह ऐसे नेताओं में सब से प्रमुख थे. वे देश के प्रधानमंत्री भी बने थे. उन्होंने साल 1967 में भारतीय क्रांति दल बनाया था और साल 1974 में वे भारतीय लोकदल के नेता बने थे.

ऊंची जातियों के किसानों पर उन की मजबूत पकड़ थी. किसान राजनीति में वही किसान नेता कामयाब रहा है, जिस की पकड़ ऊंची जातियों के किसानों पर रही है.

चौधरी चरण सिंह ने ही साल 1978 में भारतीय किसान यूनियन यानी बीकेयू का गठन किया था. उन की मौत के बाद किसान राजनीति दरकिनार हो गई.

साल 1987 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन को फिर से संगठित किया. उन्हें पता था कि इस संगठन को राजनीति से दूर रखना है. इस वजह से भारतीय किसान यूनियन गैरराजनीतिक संगठन के तौर पर काम करती रही.

किसान यूनियन की ताकत 80 के दशक में पूरे देश ने देखी थी. देश की राजधानी को बिजली की बढ़ी दरों को वापस लेना पड़ा था. किसानों की उस समय की तमाम मांगों को मान लिया गया था.

पर किसान यूनियन की ताकत चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ ही खत्म हो गई. उत्तर प्रदेश में ही भारतीय किसान यूनियन का असर नहीं रहा. किसान आंदोलन में जब तक पूरे देश के हर वर्ग के किसान शामिल नहीं होंगे, तब तक उस का कामयाब होना मुश्किल है.

भारत के 2 बड़े राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों के पास सब से कम मात्रा में खेत हैं. बिहार में प्रति किसान औसत 0.4 हैक्टेयर जमीन है. उत्तर प्रदेश के किसान के पास औसत 0.7 हैक्टेयर जमीन है.

इन 2 राज्यों से लोकसभा की  120 सीटें हैं. नए कृषि कानूनों का असर सब से ज्यादा इन दोनों राज्यों के किसानों  पर पड़ने वाला है. नए कृषि कानूनों में अमीर किसान और चंद उद्योगपतियों को फायदा होगा.  किसानों को बेहद नुकसान होगा.

देश में इन की संख्या 86 फीसदी है. जातीयता की बिसात पर उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान सरकार का विरोध करने से बच रहे हैं.

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उदासीन होता छोटा किसान

किसी भी कृषि सुधार कानून का फायदा छोटे किसानों को नहीं मिलता. ऐसे में वह सोचता है कि ऐसे कानून उस के लिए नहीं हैं और वह इस से उदासीन हो जाता है. हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति, दोनों का फायदा बड़े किसानों को हुआ.

इस के बाद की जनगणना साल 1971 में हुई थी, तो पता चला कि उन में भूमिहीन किसानों की तादाद बढ़ गई. कौंट्रैक्ट फार्मिंग का बुरा असर भी छोटे किसानों पर पड़ेगा. जिन लोगों के पास जमीन है, वे अपनी खेती कौंट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले लोगों को दे देंगे तो छोटे किसान मजदूर कहां जाएंगे?

देशभर के किसान अभी भले ही कृषि कानूनों का विरोध नहीं कर पा रहे हों या उन को दिक्कतें सम?ा न आ रही हों, पर आने वाले दिनों में वे इस का विरोध जरूर करेंगे.

देश की माली हालत को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि खेती की बेहतरी के साथसाथ किसानों की बेहतरी का भी ध्यान रखा जाए. पंजाब और हरियाणा के किसान महंगे मोबाइल फोन और गाडि़यों को इस वजह से अपने साथ रखते हैं, क्योंकि वे अपने खेतों से कमाई करते हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान मजदूर इन के खेतों पर काम करते हैं.

पंजाब और हरियाणा के किसानों की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान तब तक जागरूक नहीं होंगे, जब तक उन्हें उन का हक नहीं मिल सकेगा.

कृषि कानूनों का फायदा पूरे देश के किसानों को हो, इस बड़ी सोच के साथ ऐसे कानून बनाने होंगे. कानूनों में सुधार की बात को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए, तभी देश और देश की आर्थिक व्यवस्था में सुधार हो सकेगा. किसान और खेती को अलगअलग देखने से किसी तरह के सुधार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

सपना चौधरी ने हरियाणवी गानों को घरघर पहुंचाया- शिवा दहिया

कुछ साल पहले एक हरियाणवी गाने ‘हट जा ताऊ पाछे न…’ ने शादियों के डीजे पर धूम मचा दी थी. लोगों को बेशक इस गाने के बोल समझ नहीं आते थे, पर दिल्ली में भी इस गाने को खूब पसंद किया गया था. फिर आया सपना चौधरी का ठुमके वाला डांस और गाना ‘तेरी आंख्या का यो काजल…’ जो इतना ज्यादा सुपरहिट हुआ कि डीजे पर इस का बजना तकरीबन लाजिमी हो गया. इस के बाद धीरेधीरे और भी कई हरियाणवी गीतों ने खूब धूम मचाई और देखते ही देखते बहुत से गायकगायिका देशभर में फेमस हो गए.

इन्हीं गायकों में एक नाम है शिवा दहिया का जिन का गाया गाना ‘गुंडा’ बहुत चर्चा में रहा है. उन से उन की निजी जिंदगी और हरियाणवी गानों पर लंबी बातचीत की गई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप अपने और अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं?

मेरा पूरा नाम शिवाजीत यादव है और मैं रेवाड़ी के गंगायचा अहीर, बीकानेर गांव का रहने वाला हूं. मेरे दादाजी का नाम डाक्टर महेंद्र कुमार है जो एक डाक्टर हैं और गांव के सरपंच भी रह चुके हैं. मेरी दादीजी का नाम बिमला देवी है. मेरे पिताजी का नाम योगेश कुमार है जो एक बिजनेसमैन हैं और मेरी माताजी का नाम उर्मिला देवी है.

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हालांकि मेरे परिवार में कोई भी पेशे से म्यूजिक से ताल्लुक नहीं रखता है, पर मेरा म्यूजिक में बचपन से ही मन रहा है. मुझे म्यूजिक की प्रोफैशनल दुनिया में आए 4 से 5 साल हो चुके हैं.

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आप ने सिंगर बनने की कैसे सोची? क्या आप ने कहीं से गायन और संगीत की शिक्षा भी ली है?

मैं बचपन से ही संगीत में लगन रखता था. कुछ साल पहले हमारे रेवाड़ी में एक लाइव शो था, जहां पर हरियाणा के तकरीबन सभी कलाकार आए हुए थे, लेकिन उन में रेवाड़ी से कोई नहीं था, तभी मैं ने सोचा कि रेवाड़ी से भी कोई होना चाहिए जो हमारे हरियाणा को अपने काम से आगे ले जाए. वहां से ही मैं ने सिंगर बनने की सोची थी.

मैंने संगीत की शिक्षा बस कलाकारों को देखसुन कर ली है, बाकी मैंने और कहीं जा कर इस की शिक्षा नहीं ली है. मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मुझे इस लाइन में लाने में फौजी करमवीर का सब से बड़ा योगदान रहा है.

एक समय था जब दिल्ली, हरियाणा, पंजाब में शादी या किसी भी प्रोग्राम में हिंदी या पंजाबी फिल्मों के गाने डीजे पर ज्यादा बजते थे. अब हरियाणवी गानों का काफी बोलबाला है. आप इस की क्या खास वजह मानते हैं?

शुरुआती समय में हरियाणा में हरियाणवी रागिनी का दौर था. उस समय डीजे पर केवल हिंदी और पंजाबी गानों का चलन था, फिर हरियाणा के कलाकारों ने इस चीज को समझा और उसी तरह से उन्होंने गाने बनाने शुरू किए.

इस में सब से बड़ा शुरुआती योगदान मैं फौजी करमवीर, केडी, राजू पंजाबी, विकास कुमार, विजय वर्मा, निप्पू नेपेवाला, सुरेंद्र रोमियो व अजय हूडा जैसे लोगों का मानता हूं.

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सपना चौधरी के डांस और गानों ने हरियाणवी गानों को घरघर पहुंचाने में काफी बड़ा रोल निभाया है. क्या आप इस बात से सहमत हैं?

बिलकुल, इस बात में कोई शक नहीं है कि सपना चौधरी ने इस में काफी बड़ा रोल निभाया है, लेकिन सब से बड़ा रोल उन का है जिन के लिखे और गाए गानों पर वे अपने डांस की पेशकश देती हैं.

आप के अब तक कितने गाने आए हैं और उन में से आप का सब से पसंदीदा गाना कौन सा है?

मेरे अभी तक 7 से 8 गाने आ चुके हैं. उन में से मेरा पसंदीदा गाना ‘गुंडा’ है, जिसे परवीन पुनिया पनिहार ने लिखा है.

हरियाणवी गानों में बहुत बार खूनखराबे जैसे शब्द जैसे गुंडा, गोली, बंदूक वगैरह भी खूब आते हैं. क्या इस तरह के शब्दों से नौजवानों और बच्चों पर बुरा असर नहीं पड़ता है?

सब से पहले मैं बताना चाहूंगा कि हर चीज के 2 पहलू होते हैं. ऐसे शब्द केवल लोगों के मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. असली कलाकार वही होता है जो अपनी कला से लोगों का मनोरंजन करे. कुछ लोग होते हैं, जो इन को गलत तरीके से सोचते हैं, बाकी मेरा मानना है कि इन का नौजवानों और बच्चों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है.

आजकल गाने का वीडियो बनाने में खूब तामझाम जैसे खूबसूरत लड़कियां, बड़ी गाड़ियां, अच्छी लोकेशन का इस्तेमाल किया जाता है. उन पर कितना खर्चा होता है या कहें कि एक गाना शूट करने में कितना पैसा लगता है ?

यह बहुत ही अच्छा सवाल है, क्योंकि ज्यादातर लोग इस बारे में जानना चाहते हैं. मैं आप को बताना चाहूंगा कि सबकुछ क्वालिटी पर निर्भर करता है, फिर भी एक से 2 लाख रुपए के बीच में एक बहुत ही अच्छा गाना तैयार हो जाता है.

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आप का नया गाना कौन सा आने वाला है?

मेरे 2 नए गाने ‘जेल 3’ व ‘काले करम’ बहुत ही जल्द आने वाले हैं.

हरियाणवी का कौन सा गायक आप को पसंद है?

वैसे तो बहुत से गायक हैं, लेकिन उन में से मुझे केडी यानी कुलबीर दनोदा सब से ज्यादा पसंद हैं.

ताहिर राज भसीन ने इस फिल्म की शूटिंग को कहा, ‘क्रिसमस के त्यौहार का जश्न’

फिल्म ‘लूप लपेटा’के पहले शिड्यूल की शूटिंग के आखिरी दिन को ताहिर राज भसीन क्रिसमस के त्यौहार का जश्न क्यों बता रहे हैं.

‘कई पोचे’,‘मर्दानी’,‘फोर्स 2’,‘मंटो’और‘छिछोरे’जैसी फिल्मों में अभिनय कर शोहरत बटोर चुके अभिनेता ताहिर राज भसीन इन दिनों अपनी नई फिल्म‘‘लूप लपेटा’’को लेकर काफी उत्साहित हैं.इस फिल्म की शूटिंग अप्रैल माह में शुरू होनी थी,मगर कोरोना महामारी और लाॅक डाउन की वजह से नही हो पायी थी.

अब दिसंबर के पहले सप्ताह में निर्माता अतुल कस्बेकर व निर्देशक आकाश भाटिया ने फिल्म ‘लूप लपेटा’के पहले शिड्यूल की शूटिंग संपन्न की, जिसमें तापसी पन्नू के  संग ताहिर राज भसीन ने भी हिस्सा लिया. ताहिर राज भसीन का दावा है कि तापसी पन्नू के साथ उनकी जोड़ी निश्चित रूप से पर्दे पर धमाल मचाएगी और लोगों को सिनेमा के परदे पर एक नई ताजी केमिस्ट्री नजर आएगी.

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फिल्म के पहले शिड्यूल की शूटिंग खत्म करने के बाद ताहिर राज भसीन ने कहा कि,‘पहले शिड्यूल के आखिरी दिन सेट पर आने वाले फेस्टिवल क्रिसमस का जोश और उत्साह दिखाई दे रहा था.’’

ताहिर राज भसीन कहते हैं-‘‘शूटिंग के आखिरी दिन सेट पर क्रिसमस का बड़ा ही प्यारा माहौल था.सच कहूं तो हमारे निर्माता (अतुल कस्बेकर और तनुज गर्ग)बेहतरीन इसान हैं.यह दोनों ही खाने-पीने के बड़े ही शौकीन हैं और सेट पर हर दिन दावत होती थी.वह सेट पर हर दिन को हम सभी के लिए वाकई बेहद खास बना देते हैं और हम सभी के लिए क्रिसमस केक लाकर तो उन्होंने त्यौहार के सेलीब्रेशन का माहौल बना दिया.

ताहिर आगे कहते है- पूरी टीम इस बात से बेहद खुश थी कि, महामारी के दौर में शूटिंग के सख्त नियमों का पालन करते हुए हमने इस शिड्यूल को आसानी से पूरा किया.हमारे लिए यह मौका बड़ा ही अमेजिंग था.क्योंकि हम सब एक जगह इकट्ठा हुए, और हमने केक काटकर फिल्म के पहले शेड्यूल की शूटिंग खत्म की.हम महामारी के दौर में शूटिंग कर रहे हैं और मेरे ख्याल से हम सभी अपने आप को खुशकिस्मत मानते हैं, क्योंकि हमारी शूटिंग का शेड्यूल वाकई बेहतरीन था,जिसे हमने अच्छी तरह पूरा किया.लेकिन हम सभी ने मास्क पहनने के साथ ही सैनीटाइजर आदि का भी उपयोग किया.

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एक-दूसरे को आने वाले हौलीडे इसके लिए बधाई और शुभकामनाएं देने का अनुभव अमेजिंग था.हम नए साल में जल्द ही उनसे मिलने के लिए तैयार हूं.‘लूप लपेटा’के सेट पर नजर आने वाली एनर्जी वाकई बेमिसाल थी.अच्छी बात यह है कि हम एक बेहद मजेदार फिल्म बना रहे हैं,जो लोगों का भरपूर मनोरंजन करेगी. ज्ञाातब्य है कि फिल्म ‘लूप लपेटा’ 1998 की चर्चित जर्मन फिल्म ‘रन लोला रन’का भारतीयकरण है.

भोजपुरी एक्ट्रेस Prachi Singh का हौट अंदाज देखकर फैंस ने दिया ये रिएक्शन

भोजपुरी इंडस्ट्री की फेमस एक्ट्रेस प्राची सिंह (Prachi Singh) सोशल मीडिया पर इन दिनों काफी एक्टिव रहती हैं. वह  आए दिन सोशल मीडिया पर अपनी फोटोज और वीडियो शेयर करती हैं.

फैंस उनकी फोटोज को खूब पसंद करते हैं. अब एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर बाथटब में नहाते हुए कई फोटोज शेयर किया है.

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प्राची सिंह  ने इंस्टाग्राम पर ये फोटोज शेयर की हैं. इन सभी फोटोज में प्राची सिंह काफी हौट लग रही हैं. एक्ट्रेस ने  ने पहली फोटो के कैप्शन में लिखा है कि भगवान हमेशा एक नए मौके के साथ आपको आशीर्वाद देते हैं. इस बात को कभी मत भूलना. गुड मोर्निंग…

तो वहीं उन्होंने दूसरी फोटो के कैप्शन में लिखा, हर नया दिन जीवन का एक नया अध्याय भी है. सभी के पास उस नए अध्याय को बहुत सुंदर बनाने की शक्ति है.’

 

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प्राची इन फोटोज में काफी रिलैक्स नजर आ रही हैं. फैंस के उनके इस अंदाज को खूब पसंद कर रहे हैं. एक फैंस ने उनके फोटो पर कमेंट करते हुए लिखा है, ‘ठंड लग जाएगी’.

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आपको बता दें कि प्राची सिंह जल्द ही एक रोमांटिक-ड्रामा ‘मेरे प्यार से मिला दे’  में नजर आएंगी. इस फिल्म में प्राची के अलावा निशा दुबे, कनक पांडे, संचित बनर्जी और प्रियंका पंडित जैसे कई कलाकार नजर आने वाले हैं.

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क्या Hrithik Roshan की एक्स वाइफ सुजैन हुई गिरफ्तार, जानिए पूरा मामला

पार्टी के दौरान सुजैन खान ने अपनी गिरफ्तारी पर सफाई दी हैं. खबर ये आ रही है कि मंगलवार को मुंबई पुलिस ने कोरोना प्रोटोकाल का उल्लंघन करने के आरोप में क्रिकेटर सुरेश रैना, सिंगर गुरु रंधावा समेत 34 लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

दरअसल  मुंबई में एयरपोर्ट के पास JW मैरियट होटल के क्लब में ये लोग पार्टी कर रहे थे. और इसी मामले में ऋतिक रोशन की एक्स वाइफ  सुजैन खान ने सफाई दी है और कहा है कि इस खबर में थोड़ी सी भी सच्चाई नहीं है. उनपर लगाए गए आरोप गलत हैं.

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सुजैन खान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया और कहा, मैं एक फ्रेंड की पार्टी में गई थी, जहां पुलिस ने मुझे कुछ कारणों से 3 घंटे तक इंतजार कराया लेकिन मेरी गिरफ्तारी नहीं हुई है. मेरी गिरफ्तारी की खबरों में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है.

तो वहीं सुरेश रैना की टीम भी उनकी गिरफ्तारी को लेकर बयान जारी किया है. सुरेश की टीम ने कहा कि सुरेश रैना शूटिंग के लिए मुंबई आए थे और उन्होंने कोविड-19 प्रोटोकाल से संबंधित कोई जानकारी नहीं थी.

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रैना की टीम ने बताया कि वह देर रात तक शूट पर थे और उसके बाद अपने दोस्त की पार्टी में गए. उन्हें दोस्त की तरफ से इन्वाइट किया गया था. टीम ने साथ ही बताया कि रैना को प्रोटोकाल के बारे में बिलकुल भी पता नहीं था, जिस वजह से उनसे अनजाने में गलती हुई.

रैना को अब अपनी गलती का एहसास हो गया है और वह आगे से सरकार द्वारा जारी किए गए सभी नियमों को पालन करेंगे.

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