सौजन्य- सत्यकथा
उस दिन नवंबर, 2020 की 15 तारीख थी. सुबह के यही कोई 8 बज रहे थे. तभी थाना घाटमपुर प्रभारी इंसपेक्टर राजीव सिंह को नरबलि की खबर मिली. यह खबर भदरस गांव के किसी व्यक्ति ने उन के मोबाइल फोन पर दी थी. उस ने बताया कि दीपावली की रात गांव के करन कुरील की 7 वर्षीय बेटी श्रेया उर्फ भूरी की बलि दी गई है. उस की लाश भद्रकाली मंदिर के पास पड़ी है.
खबर पाते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ भदरस गांव पहुंच गए. भद्रकाली मंदिर गांव के बाहर था. वहां भारी भीड़ जुटी थी. दरअसल मासूम बच्ची की बलि चढ़ाए जाने की बात भदरस ही नहीं, बल्कि अड़ोसपड़ोस के गांवों तक फैल गई थी. अत: सैंकड़ों लोगों की भीड़ वहां जमा थी.
भीड़ देख कर राजीव सिंह के हाथपांव फूल गए. क्योंकि वहां मौजूद लोगों में गुस्सा भी था. लोगों ने साफ कह दिया था कि जब तक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर नहीं आएंगे, तब तक वह बच्ची के शव को नहीं उठने देंगे. थानाप्रभारी राजीव सिंह ने यह जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी फिर जांच में जुट गए.
श्रेया उर्फ भूरी की नग्न लाश भद्रकाली मंदिर के समीप नीम के पेड़ के नीचे गन्नू तिवारी के खेत में पड़ी थी. शव के पास मृत बच्ची का पिता करन कुरील बदहवास खड़ा था और उस की पत्नी माया कुरील दहाडें़ मार कर रो रही थी. घर की महिलाएं उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं.
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मासूम का पेट किसी नुकीले व धारवाले औजार से चीरा गया था और पेट के अंदर के अंग दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें तथा किडनी गायब थीं.
मासूम श्रेया के गुप्तांग पर चोट के निशान थे. माथे पर तिलक लगा था और पैर लाल रंग से रंगे थे. देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नरपिशाचों ने बलि देने से पहले मासूम के साथ दुराचार भी किया था. शव के पास ही मृतका की चप्पल, जींस तथा अन्य कपड़े पड़े थे. नमकीन का एक खाली पैकेट भी वहां पड़ा मिला.
थानाप्रभारी सिंह ने वहां पड़ी चीजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. उसी दौरान एसएसपी प्रीतिंदर सिंह, एसपी (ग्रामीण) बृजेश कुमार श्रीवास्तव तथा सीओ (घाटमपुर) रवि कुमार सिंह भी वहां आ गए.
पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा कई थानों की फोर्स बुलवा ली. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित भीड़ को आश्वासन दिया कि जिन्होंने भी इस वीभत्स कांड को अंजाम दिया है, वह जल्द ही पकड़े जाएंगे और उन्हें सख्त से सख्त सजा दिलाई जाएगी.
अधिकारियों के इस आश्वासन पर लोग नरम पड़ गए. उस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मासूम बालिका का शव देख कर पुलिस अधिकारी भी सिहर उठे.
एसएसपी के बुलावे पर डौग स्क्वायड टीम भी घटनास्थल पर पहुंची. डौग स्क्वायड प्रभारी अवधेश सिंह ने जांच शुरू की. उन्होंने नीम के पेड़ के नीचे पड़ी मासूम के खून के अंश व उस की चप्पल खोजी कुतिया को सुंघाई. उसे सूंघने के बाद यामिनी खेत की पगडंडी से होते हुए गांव की ओर दौड़ पड़ी.
कई जगह रुकने के बाद वह सीधे मृतक बच्ची के घर पहुंची. यहां से बगल के घर से होते हुए गली के सामने बने एक घर पर पहुंची. 4 घरों में जाने के बाद गली के कोने में स्थित एक मंदिर पर जा कर रुक गई.
टीम ने पड़ताल की, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. इस के बाद यामिनी गांव का चक्कर लगा कर घटनास्थल पर वापस वह आ गई. यामिनी हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी.
निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतका श्रेया के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय कानपुर भिजवा दिया. मोर्चरी के बाहर भी भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया गया.
उधर नरबलि की खबर न्यूज चैनलों तथा इंटरनेट मीडिया पर वायरल होते ही कानपुर से ले कर लखनऊ तक सनसनी फैल गई.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं इस दुस्साहसिक वारदात को संज्ञान में लिया. मुख्यमंत्री ने मंडलायुक्त, डीएम व एसएसपी प्रीतिंदर सिंह से वार्ता की और तुरंत आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त काररवाई करने का आदेश दिया.
उन्होंने दुखी परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और 5 लाख रुपए आर्थिक मदद देने की घोषणा की. उन्होंने कहा, ‘सरकार इस प्रकरण की फास्टट्रैक कोर्ट में सुनवाई करा कर अपराधियों को जल्द सजा दिलाएगी.’
मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई तो प्रशासन एक पैर पर दौड़ने लगा. आननफानन में 3 डाक्टरों का पैनल गठित किया गया और शव का पोस्टमार्टम कराया गया. मासूम के शव का परीक्षण करते समय पोस्टमार्टम करने वाली टीम के हाथ भी कांप उठे थे. मासूम के पेट के अंदर कोई अंग था ही नहीं. दिल, फेफड़े, लीवर, आंतें, किडनी, स्पलीन और इन अंगों को आपस में जोड़े रखने वाली मेंब्रेन तक गायब थी. मासूम के निजी अंगों में चोट के निशान थे, जिस से दुष्कर्म की पुष्टि हुई थी.
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मासूम के पेट में कुछ था या नहीं, आंतें गायब होने से इस की पुष्टि नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम के बाद श्रेया का शव उस के पिता करन कुरील को सौंप दिया गया.
इधर रात 10 बजे एसडीएम (नर्वल) रिजवाना शाहीद के साथ नवनिर्वाचित विधायक (घाटमपुर क्षेत्र) उपेंद्र पासवान भदरस गांव पहुंचे और मृतका श्रेया के पिता करन कुरील को 5 लाख रुपए का चैक सौंपा. उन्हें 2 बीघा कृषि भूमि का पट्टा दिलाने का भी भरोसा दिया गया.
चैक लेते समय करन व उन की पत्नी माया की आंखों में आंसू थे. उन्होंने नर पिशाचों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की.
चूंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले को वर्क आउट करने में देरी पर नाराजगी जताई थी, इसलिए एसएसपी प्रीतिंदर सिंह व एसपी (ग्रामीण) बृजेश कुमार श्रीवास्तव ने थाना घाटमपुर में डेरा डाल दिया और डीएसपी रवि कुमार सिंह के निर्देशन में खुलासे के लिए पुलिस टीम गठित कर दी.
इस टीम ने भदरस गांव पहुंच कर अनेक लोगों से गहन पूछताछ की. गांव के एक झोलाछाप डाक्टर ने गांव के गोंगा के मझले बेटे अंकुल कुरील पर शक जताया. पड़ोसी परिवार की एक बच्ची ने भी बताया कि शाम को उस ने श्रेया को अंकुल के साथ जाते हुए देखा था.
अंकुल कुरील पुलिस की रडार पर आया तो पुलिस टीम ने उसे घर से उठा लिया. उस समय वह ज्यादा नशे में था. उसे थाना घाटमपुर लाया गया. उस से कई घंटे तक पूछताछ की लेकिन अंकुल नहीं टूटा.
आधी रात के बाद जब नशा कम हुआ तब उस से सख्ती के साथ दूसरे राउंड की पूछताछ की गई. इस बार वह पुलिस की सख्ती से टूट गया और मासूम श्रेया की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.
अंकुल ने जो बताया उस से पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए और मामला ही पलट गया. अंकुल ने बताया कि उस के चाचा परशुराम व चाची सुनयना ने 1500 रुपए में मासूम बच्ची का कलेजा लाने की सुपारी दी थी.
उस के बाद उस ने अपने दोस्त वीरन के साथ मिल कर करन की बेटी श्रेया को पटाखा देने के बहाने फुसलाया. उसे वह गांव से एक किलोमीटर दूर भद्रकाली मंदिर के पास ले गए. वहां दोनों ने उस के साथ दुराचार किया फिर अंगौछे से उस का गला घोंट दिया.
उस के बाद चाकू से उस का पेट चीर कर अंगों को निकाल लिया गया. उस ने कलेजा पौलीथिन में रख कर चाची सुनयना को ला कर दिया. सुनयना और परशुराम ने कलेजे के 2 टुकड़े किए और कच्चा ही खा गए. ऐसा उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए किया था.
सौजन्य- सत्यकथा
इस के बाद वादे के मुताबिक चाची ने 500 रुपए मुझे तथा हजार रुपए वीरन को दिए, फिर हम लोग घर चले गए.
16 नवंबर, 2020 की सुबह 7 बजे पुलिस टीम ने पहले वीरन फिर परशुराम तथा उस की पत्नी सुनयना को गिरफ्तार कर लिया. सुनयना के घर से पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त अंगौछा तथा 2 चाकू बरामद कर लिए. चाकू को सुनयना ने भूसे के ढेर में छिपा दिया था.
उन तीनों को थाने लाया गया. यहां तीनों की मुलाकात हवालात में बंद अंकुल से हुई तो वे समझ गए कि अब झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. अत: उन तीनों ने भी पूछताछ में सहज ही श्रेया की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.
पुलिस ने जब परशुराम कुरील से कलेजा खाने की वजह पूछी तो उस के चेहरे पर पश्चाताप की जरा भी झलक नहीं थी. उस ने कहा कि सभी जानते हैं कि किसी बच्ची का कलेजा खाने से निसंतानों के बच्चे हो जाते हैं. वह भी निसंतान था. उस ने बच्चा पाने की चाहत में कलेजा खाया था.
चूंकि सभी ने जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था. अत: थानाप्रभारी राजीव सिंह ने मृतका के पिता करन कुरील की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली और सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.
अंकुल व वीरन के खिलाफ दुराचार तथा पोक्सो एक्ट के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस जांच में एक ऐसे दंपति की कहानी प्रकाश में आई, जिस ने अंधविश्वास में पड़ कर संतान पाने की चाह में एक मासूम के कलेजे की सुपारी दी और उसे खा भी लिया.
उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है घाटमपुर. इस कस्बे से कुछ दूरी पर स्थित है-भदरस गांव. परशुराम कुरील इसी दलित बाहुल्य इस गांव में रहता था. लगभग 10 साल पहले उस की शादी सुनयना के साथ हुई थी. परशुराम के पास कृषि भूमि नाममात्र की थी. वह साबुन का व्यवसाय करता था. वह गांव कस्बे में फेरी लगा कर साबुन बेचता था. इसी व्यवसाय से वह अपने घर का खर्च चलाता था.
भदरस और उस के आसपास के गांव में अंधविश्वास की बेल खूब फलतीफूलती है. जिस का फायदा ढोंगी तांत्रिक उठाते हैं. भदरस गांव भी तांत्रिकों के मकड़जाल में फंसा है. यहां घरघर कोई न कोई तांत्रिक पैठ बनाए हुए है.
बीमारी में तांत्रिक अस्पताल नहीं मुर्गे की बलि, पैसा कमाने को मेहनत नहीं, बकरे की बलि, दुश्मन को ठिकाने लगाने के लिए शराब और बकरे की बलि, संतान के लिए नरबलि की सलाह देते हैं.
इन तांत्रिकों पर पुलिस भी काररवाई से बचती है. कोई जघन्य कांड होने पर ही पुलिस जागती है.
परशुराम और उस की पत्नी सुनयना भी तांत्रिकों के मकड़जाल में फंसे हुए थे. महीने में एक या दो बार उन के घर तंत्रमंत्र व पूजापाठ करने कोई न कोई तांत्रिक आता रहता था.
दरअसल, सुनयना की शादी को 10 वर्ष से अधिक का समय बीत गया था. लेकिन उस की गोद सूनी थी. पहले तो उस ने इलाज पर खूब पैसा खर्च किया. लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो वह अंधविश्वास में उलझ गई और तांत्रिकों व मौलवियों के यहां माथा टेकने लगी.
तांत्रिक उसे मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते. धीरेधीरे 5 साल और बीत गए. लेकिन सुनयना की गोद सूनी की सूनी रही.
सुनयना की जातिबिरादरी के लोग उसे बांझ समझने लगे थे और उस का सामाजिक बहिष्कार करने लगे थे. समाज का कोई भी व्यक्ति परशुराम को सामाजिक काम में नहीं बुलाता था. कोई भी औरत अपने बच्चे को उस की गोद में नहीं देती थी. क्योंकि उसे जादूटोना करने का शक रहता था.
परिवार के लोग उसे अपने बच्चे के जन्मदिन, मुंडन आदि में भी नहीं बुलाते थे, जिस से उसे सामाजिक पीड़ा होती थी. सामाजिक अवहेलना से सुनयना टूट जरूर गई थी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी थी. 10 सालों से उस का तांत्रिकों के पास आनाजाना बना हुआ था. एक रोज वह विधनू कस्बा के एक तांत्रिक के पास गई और उसे अपनी पीड़ा बताई.
तांत्रिक ने उसे आश्वासन दिया कि वह अब भी मां बन सकती है, यदि वह उपाय कर सके.
‘‘कौन सा उपाय?’’ सुनयना ने उत्सुकता से पूछा.
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‘‘यही कि तुम्हें दीपावली की रात 10 साल से कम उम्र की एक बालिका की पूजापाठ कर बलि देनी होगी. फिर उस का कलेजा निकाल कर पतिपत्नी को आधाआधा खाना होगा. बलि देने तथा कलेजारूपी प्रसाद चखने से मां काली प्रसन्न होंगी और तुम्हें संतान प्राप्ति होगी.’’
‘‘ठीक है बाबा. मैं उपाय करने का प्रयत्न करूंगी. अपने पति से भी रायमशविरा करूंगी.’’ सुनयना ने तांत्रिक से कहा.
उन्हीं दिनों परशुराम के हाथ ‘कलकत्ता का काला जादू’ नामक तंत्रमंत्र की एक पुस्तक हाथ लगी. इस किताब में भी संतान प्राप्ति के लिए उपाय लिखा था और मासूम बालिका का कलेजा कच्चा खाने का जिक्र किया गया था.
परशुराम ने यह बात पत्नी सुनयना को बताई तो वह बोली, ‘‘विधनू के तांत्रिक ने भी उसे ऐसा ही उपाय करने को कहा था.’’
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अब परशुराम और सुनयना के मन में यह अंधविश्वास घर कर गया कि मासूम बालिका का कच्चा कलेजा खाने से उन को संतान हो सकती है. इस पर उन्होंने गंभीरता से सोचना शुरू किया तो उन्हें लगा अंकुल उन की मदद कर सकता है.
अंकुल, परशुराम के बड़े भाई गोंगा कुरील का बेटा था. 3 भाइयों में वह मंझला था. वह नशेबाज और निर्दयी था, गंजेड़ी भी. अपने भाईबहनों के साथ मारपीट और हंगामा भी करता रहता था.
अपने स्वार्थ के लिए परशुराम ने भतीजे अंकुल को मोहरा बनाया. अब वह उसे घर बुलाने लगा और मुफ्त में शराब पिलाने लगा. गांजा फूंकने को पैसे भी देता. अंकुल जब हां में हां मिलाने लगा तब एक रोज सुनयना ने उस से कहा, ‘‘अंकुल, तुम्हें तो पता ही है कि हमारे पास बच्चा नहीं है. लेकिन तुम चाहो तो मैं मां बन सकती हूं.’’
‘‘वह कैसे चाची?’’
‘‘इस के लिए तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. आने वाली दीपावली की रात तुम्हें किसी बच्ची का कलेजा ला कर देना होगा. देखो ‘न’ मत करना. यदि तुम मेरा काम कर दोगे तो हमारे घर में खुशी आ सकती है.’’
‘‘ठीक है चाची, मैं तुम्हारे लिए यह काम कर दूंगा.’’
अंकुल राजी हो गया तो उन लोगों ने मासूम बच्ची पर मंथन किया. मंथन करतेकरते उन के सामने भूरी का चेहरा आ गया. श्रेया उर्फ भूरी करन कुरील की बेटी थी. उस की उम्र 7 साल थी. करन परशुराम के घर के समीप रहता था. उस की 3 बेटियों में श्रेया दूसरे नंबर की थी. वह कक्षा 2 में पढ़ती थी. करन किसान था. उसी से जीविका चलाता था.
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वीरन कुरील अंकुल का दोस्त था. पारिवारिक रिश्ते में वह उस का भाई था. वीरन भी नशेड़ी था, सो उस की अंकुल से खूब पटती थी. अंकुल ने वीरन को सारी बात बताई और अपने साथ मिला लिया था. अब अंकुल के साथ वीरन भी परशुराम के घर जाने लगा और नशेबाजी करने लगा.
14 नवंबर, 2020 को दीपावली थी. अंकुल और वीरन शाम 5 बजे परशुराम के घर पहुंच गए. परशुराम ने दोनों को खूब शराब पिलाई. सुनयना ने दोनों को कलेजा लाने की एवज में 1500 रुपए देने का भरोसा दिया.
इस के बाद उस ने अंकुल व वीरन को गोश्त काटने वाले 2 चाकू दिए. इन चाकुओं को पत्थर पर घिस कर दोनों ने धार बनाई. सुनयना ने लाल रंग से भरी एक डब्बी अंकुल को दी और कुछ आवश्यक निर्देश दिए.
शाम 6 बजे अंकुल और वीरन, परशुराम के घर से निकले. तब तक अंधेरा घिर चुका था. वे दोनों जब करन के घर के सामने आए तो उन की निगाह मासूम श्रेया पर पड़ी. वह नए कपड़े पहने पेड़ के नीचे एक बच्ची के साथ खेल रही थी. अंकुल ने भूरी को बुलाया और पटाखों का लालच दिया.
भूरी पर मौत का साया मंडरा रहा था. वह मान गई और अंकुल के साथ चल दी. दोनों भूरी को ले कर गांव के बाहर आए और फिर भद्रकाली मंदिर की ओर चल पड़े. श्रेया को आशंका हुई तो उस ने पूछा, ‘‘भैया, कहां ले जा रहे हो?’’ यह सुनते ही अंकुल ने उस का मुंह दबा दिया और वीरन ने चाकू चुभो कर उसे डराया, जिस से उस की घिग्घी बंध गई.
फिर वे दोनों भूरी को भद्रकाली मंदिर के पास ले गए और नीम के पेड़ के नीचे पटक दिया. उन दोनों ने श्रेया उर्फ भूरी के शरीर से कपड़े अलग किए तो उन के अंदर का शैतान जाग उठा. उन्होंने बारीबारी से उस के साथ दुराचार किया. इस बीच मासूम चीखी तो उन्होंने अंगौछे से उस का गला कस दिया, जिस से उस की मौत हो गई.
इस के बाद सुनयना के निर्देशानुसार अंकुल ने श्रेया के पैरों में लाल रंग लगाया तथा माथे पर टीका किया. फिर चाकू से उस का पेट चीर डाला. अंदर से अंग काट कर निकाल लिए और कलेजा पौलीथिन में रख कर वहां से निकल लिए. रास्ते में पानी भरे एक गड्ढे में बाकी अंग फेंक दिए और कलेजा ला कर परशुराम को दे दिया.
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परशुराम ने कलेजे को शराब से धोया फिर चाकू से उस के 2 टुकड़े किए. उस ने एक टुकड़ा स्वयं खा लिया तथा दूसरा टुकड़ा पत्नी सुनयना को खिला दिया. सुनयना ने खुश हो कर 500 रुपए अंकुल को और 1000 रुपए वीरन को दिए. उस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चले गए.
इधर दीया जलाते समय करन को श्रेया नहीं दिखी तो उस ने खोज शुरू की. करन व उस की पत्नी माया रात भर बेटी की खोज करते रहे. लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला. सुबह गांव के कुछ लोगों ने उसे बेटी की हत्या की जानकारी दी. तब वह वहां पहुंचा. इसी बीच किसी ने घटना की जानकारी थाना घाटमपुर पुलिस को दे दी थी.
17 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त अंकुल, वीरन, परशुराम व सुनयना को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन चारों को जिला जेल भेज दिया गया.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
मिलिंद सोमन (Milind Soman) इन दिनो अपनी तस्वीरों की वजह से सुर्खियों में छाये हुए हैं. वह आए दिन अपने फैंस के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते रहते हैं. वह अपने फिटनेस को लेकर काफी चर्चे में रहते हैं.
अब मिलिंद ने अपने मौडलिंग के शुरूआती दिनों को याद किया है. दरअसल सोशल मीडिया पर एक्टर ने अपनी पहली मौडलिंग की दो फोटो शेयर की है. इसके साथ ही उन्होंने मौडलिंग को लेकर अपना अनुभव भी शेयर किया है.
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मिलिंद सोमन ने इन तस्वीरों को शेयर सोशल मीडिया पर शेयर किया है. और इन तस्वीरों के कैप्शन में लिखा है कि ”मेरा पहला विज्ञान कैंपेन 1989. इस कैंपेन से पहले मैं नहीं जानता था कि मौडलिंग एक प्रोफेशन है. एक शख्स ने मुझे फोन किया जिन्होंने मुझे कहीं पर देखा था.
उन्होंने मुझसे कुछ तस्वीरें शूट कराने के लिए कहा. उस समय मैं शर्मीला लड़का था और मैं इस शूट के लिए राजी भी नहीं था. लेकिन जब उन्होंने एक घंटे के लिए मुझे 50 हजार रुपये औफर किया तो मैंने हां कर दिया थैंक्यू रसना बहल.”
इन तस्वीरों में मिलिंद काफी यंग दिखाई दे रहे है. इस तस्वीर को फैंस खूब पसंद कर रहे हैं. वर्क फ्रंट की बात करें तो जल्द ही मिलिंद सोमन वेब सीरीज ‘पौरषपुर’ (Paurashpur) में एक थर्ड जेंडर के किरदार में नजर आएंगे.
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हाल ही में मिलिंद सोमन ने अपने जन्मदिन पर गोवा में समुंदर किनारे न्यूड फोटो खिंचवाया था. उन्होंने इस फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर किया. और इस फोटो पर जमकर विवाद हुआ. इस फोटो को लेकर मिलिंद के खिलाफ FIR तक दर्ज की गई.
भोजपुरी हीरोइन निशा दुबे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी ऐक्टिंग के साथसाथ कातिल अदाओं और अपने हौट ऐंड बोल्ड लुक के जरीए दर्शकों के दिलों पर राज करती हैं. भोजपुरी गायन से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली निशा दुबे आज भोजपुरी सिनेमा की सनसनी बनी हुई हैं. जहां एक ओर उन की सभी फिल्में हिट रहती हैं, वहीं दूसरी ओर उन के गाए गाने रिलीज होते ही सोशल मीडिया और इंटरनैट पर जम कर वायरल होते रहते हैं.
निशा दुबे आज के दौर में फिल्मकारों की पहली पसंद में शामिल हैं. उन से हुई एक मुलाकात में उन के फिल्मी कैरियर को ले कर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं उसी के खास अंश :
अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं?
भोजपुरी सिनेमा में आने की वजह मेरे परिवार में घटी एक घटना थी. यह दुखद घटना तब घटी, जब मैं 15-16 साल की रही होगी. तभी मेरे पिताजी का ऐक्सीडैंट हो गया और वे लकवे के शिकार हो गए. उस समय मैं 10वीं की स्टूडैंट थी.
पिताजी के साथ हुए इस हादसे ने मेरे पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया था. जब परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया तो 16 साल की उम्र में मैं ने नाचने और गाने का फैसला लिया.
मेरे हुनर को लोगों ने बहुत प्यार दिया. ऐसे संघर्षों की बदौलत आज मुझे भोजपुरी सिनेमा में एक मुकाम हासिल हुआ है.
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आप का शुरुआती संघर्ष कैसा रहा? आप ने अपने कैरियर की शुरुआत भोजपुरी गीतों के गायन के साथ की थी, तो देखते ही देखते आप भोजपुरी सिने जगत की सनसनी कैसे बन गईं?
सच कहूं, तो मेरे कैरियर के शुरुआती दौर में संघर्ष ही संघर्ष रहा. जहां एक ओर पिताजी के साथ हुए हादसे के चलते मुझे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर छोटी सी उम्र में मेरे डांस और गाने के चलते परिवार को बहुत ताने सुनने पड़े, लेकिन मैं ने इन सब को नजरअंदाज कर अपने कैरियर में आगे बढ़ने का फैसला ले लिया था.
लोगों ने मेरे गाए गानों और वीडियो अलबम को इतना पसंद किया कि मेरे पास एकएक कर कई फिल्मों में काम करने के औफर आ गए, जिस के बाद मैं ने भोजपुरी फिल्मों में काम करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाया और मुझे फिल्मों में कामयाबी मिलती गई.
आज मेरी झोली में दर्जनों कामयाब फिल्में हैं. जहां तक भोजपुरी सिने जगत में मेरे सनसनी बनने का सवाल है, तो यह मेरे गाने, ऐक्टिंग और ग्लैमरस लुक के चलते ही मुमकिन हो पाया है.
क्या आप ने कभी सोचा था कि भोजपुरी बैल्ट में लोगों के दिलों पर राज करेंगी?
मैंने तो भोजपुरी बैल्ट में राज करने का सपना कभी देखा ही नहीं था. मैं चाहती थी कि पढ़लिख कर प्रशासनिक सेवा में जाऊं, लेकिन पढ़ाई बीच में छूट जाने के चलते मेरी यह हसरत अधूरी ही रह गई. ऐसे में मुझे लगता है कि शायद भोजपुरी सिनेमा में मुझे नौकरी से ज्यादा प्यार मिला है, जिस की बदौलत मैं लोगों के दिलों पर राज करती हूं, जो शायद नौकरी में रहते हुए मुझे हासिल नहीं हो पाता.
एक समय में आप की और अरविंद अकेला कल्लू की जोड़ी खूब हिट हुआ करती थी. फिर अचानक क्या हुआ कि यह चर्चित जोड़ी एकसाथ दिखना बंद हो गई ?
देखिए, अगर आप को जिंदगी में आगे बढ़ना है, तो ढर्रे से उतर कर अलग काम करने की आदत डालनी होगी. यही मैं ने भी किया, क्योंकि मैं ने अरविंदजी के साथ अलबम और फिल्मों में बहुत काम किया.
इस दौरान मुझे लगा कि एक ही कलाकार के साथ काम करने से दर्शकों में ऊब हो सकती है, क्योंकि दर्शक फिल्म और सिनेमा में हर बार कुछ नया देखना चाहता है, इसीलिए मैं ने धीरेधीरे अरविंदजी के साथ काम करना बंद कर दिया. इस चर्चित जोड़ी के एकसाथ न दिखने की महज यही एक वजह है.
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क्या आप की कंटैंट आधारित फिल्मों में काम करने की हसरत पूरी हो पाई है?
सच कहूं, तो मुझे आज तक कोई ऐसा रोल मिला ही नहीं, जिस में मैं खुद की ऐक्टिंग से संतुष्ट हो पाई हूं, क्योंकि अभी तक भोजपुरी में मिलतेजुलते विषय पर ही फिल्में बनती रही हैं.
मैं चाहती हूं कि भोजपुरी में भी ऐसे विषयों पर फिल्में बनें, जिन में हीरोइनों का रोल भी चैलेंजिंग हो और दूसरी भाषाओं की तरह इन्हें भी मल्टीप्लैक्स में देखा जाए.
आप की ऐसी कौन सी फिल्में हैं, जो कोरोना के चलते रिलीज नहीं हो पाईं?
मेरी 3 फिल्में कोरोना के चलते फ्लोर पर ही अटकी हुई हैं, जो जल्द ही पूरी होने वाली हैं. इन फिल्मों में से 2 फिल्में ‘बनारसी पहलवान’ और ‘तकरार’ पूरी हो चुकी हैं.
जब देश में कोरोना के केस तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में फिल्मों की शूटिंग में सुरक्षा के क्या उपाय अपनाए जा रहे हैं?
कोरोना के चलते फिल्मों की शूटिंग के दौरान हम खासा सतर्क हैं. हम लोग क्रू मैंबर के साथ ही पूरी टीम की जांच के बाद सैट पर आते हैं और यहां भी सुरक्षा के उपायों का पूरा खयाल रखा जाता है.
सोशल मीडिया के फौलोअर्स और यूट्यूब पर व्युअर्स के आधार पर आप खुद को कहां पाती हैं?
मैं खुशनसीब हूं कि सोशल मीडिया पर खूब पौपुलर हूं. इस प्लेटफार्म पर मेरे चाहने वालों की तादाद कई लाख में है. फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मुझे फौलो करने वालों की तादाद को अगर जोड़ लिया जाए, तो यह तकरीबन 10 लाख है.
भोजपुरी सिनेमा पर पहले यह आरोप लगता था कि यहां फूहड़ता ज्यादा परोसी जाती है और कंटैंट बेस्ड सिनेमा कम बनता है. पर अब इस के उलट हो रहा है. बौलीवुड में फूहड़ता का बोलबाला बढ़ा है. इसे आप भोजपुरी सिनेमा के नजरिए से कैसे देखती हैं?
आप ने बहुत अच्छी बात कही है. भोजपुरी सिनेमा नाहक ही बदनाम है, जबकि दूसरी भाषाओं में बन रही फिल्मों में फूहड़ता ज्यादा है और रहीसही कसर वैब सीरीज बनाने वालों ने पूरी कर दी है, जो सैंसर के दायरे में न आने से फूहड़ता की हद पार कर रहे हैं.
अगर मैं कहूं कि भोजपुरी सिनेमा में फूहड़ता है ही नहीं, तो गलत नहीं होगा, क्योंकि भोजपुरी अलबम की फूहड़ता के चलते सिनेमा को भी उसी से जोड़ कर देखा जाता है, जबकि ऐसा नहीं है.
रही बात भोजपुरी सिनेमा में कंटैंट आधारित फिल्मों के बनने की, तो अब इस की भी शुरुआत हो चुकी है और इस दौरान कई ऐसी फिल्में आ रही हैं, जिन्हें देखने के बाद आप का नजरिया बदल जाएगा.
भोजपुरी सिनेमा में हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं, लेकिन लाइमलाइट में कुछ गिनीचुनी फिल्में ही शामिल हो पाती हैं. इस की क्या वजह हो सकती है?
इस की महज एक ही वजह है, उस फिल्म का विषय, क्योंकि फिल्म के विषय में जितनी जान होगी, वह उतना ही लाइमलाइट में शामिल हो पाएगी.
जब आप ज्यादा बिजी होती हैं, तो क्या अपनी ड्रैसिंग सैंस और मेकअप पर ध्यान दे पाती हैं?
मैं तो बिलकुल ध्यान नहीं देती हूं, क्योंकि अपने घर पर एकदम नौर्मल रहती हूं और मु?ो इस दौरान मेकअप की जरूरत ही नहीं महसूस होती है.
जब मैं खाली रहती हूं और फिल्मों की शूटिंग पर नहीं होती हूं, तो मैं अपने आडियोवीडियो गानों पर काम करती हूं.
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अपने अब तक के कैरियर में आप भोजपुरी इंडस्ट्री में सब से बड़ा बदलाव क्या पाती हैं?
आज के भोजपुरी सिनेमा में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है. आज फिल्में ज्यादा बन रही हैं. सच कहा जाए, तो इस की होड़ सी मची हुई है.
‘बिग बौस 14’ (Bigg Boss 14) में दर्शकों को आए दिन महाट्विस्ट देखने को मिल रहे है. इस शो के मेकर्स हर हफ्ते कुछ ना कुछ नया करते हैं जिससे दर्शकों का भरपूर एंटरटेन हो सके.
शो में हर हफ्ते नए लोगों की एंट्री हो रही हैं. तो इस बीच अच्छी खबर ये आ रही है कि बिग बौस 14 में जल्द ही दिशा परमार (Disha Parmar) की एंट्री होने वाली है. ऐसे में शो के अपकमिंग एपिसोड में गेम और भी मजेदार होने वाला है.
शो के पिछले एपिसोड में राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) ने ‘बिग बौस हाउस में दिशा परमार (Disha Parmar) को प्रपोज किया है, तबसे ये दोनों अपने लव लाइफ को लेकर काफी चर्चे में है.
Looking Gorgeous!! 😻😻
Via @disha11parmar ‘s Story pic.twitter.com/Yh58dRO341— Team Disha Parmar (@DishaParmarFans) December 21, 2020
फैंस भी इन दोनों को साथ में देखना चाहते हैं. तो वहीं दिशा परमार भी ‘बिग बौस 14’ में आने के लिए काफी काफी एक्साइटेड हैं. दरअसल दिशा ने सोशल मीडिया पर अपना नया लुक शेयर किया है.
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हाल ही में दिशा परमार ने नया हेयरकट लिया है. नए हेयरकट के साथ ही दिशा परमार का लुक पूरी तरह से बदल चुका है. दिशा परमार का ये लुक फैंस को काफी पसंद आ रहा है.
खबर ये भी आई थी कि कुछ हफ्ते पहले भी ‘बिग बौस 14’ के मेकर्स ने दिशा परमार को इस शो में आने के लिए इनवाइट किया था. पर उन्होंने शो में में आने से मना कर दिया था.
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दिशा परमार ने ये कहकर मना किया था कि उन्हें लगता है कि वो इस शो के लिए नहीं बनी हैं क्योंकि वो काफी बोरिंग हैं. अब शो के अपकमिंग एपिसोड में दिशा परमार और राहुल वैद्य की केमेस्ट्री देखने को मिलने वाला है.
पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : मलय अकेला आगरा में रहता था. उस की पत्नी अनुराधा अपने बूढ़े सासससुर के साथ गांव में रहती थी, पर वह आगरा जाने को बेताब थी. वहां आगरा में मलय एक लड़की अर्पणा के नजदीक हो गया था. अर्पणा के जन्मदिन की पार्टी थी. अनुराधा ने मलय को फोन किया. फोन अर्पणा ने उठाया. अब पढि़ए आगे…
‘अच्छा, अब समझी. आप की शादी में मैं नहीं आ सकी थी, इसलिए आप से भेंट नहीं हुई. मलय आप को यहां कभी लाया भी नहीं. मैं उस की कलीग अर्पणा बोल रही हूं. आज मेरा जन्मदिन था. अभी वह मेरे यहां ही है. जरा बाथरूम में गया है. आता है तो आप को फोन करने के लिए बोलती हूं. वैसे, आप कैसी हैं?’ अर्पणा ने अनुराधा से पूछा.
‘‘अच्छी हूं. आप को जन्मदिन की बधाई. बाथरूम से लौटने पर मलय से फोन करने के लिए जरूर कहिएगा,’’ अनुराधा बोली.
‘जी जरूर,’ अर्पणा ने कहा और इस के कुछ देर बाद डिस्चार्ज हो कर फोन स्विच औफ हो गया.
बर्थडे फंक्शन के बाद खानेपीने का दौर शुरू हुआ, तो अर्पणा उसी में उलझ गई. उसे याद ही न रहा कि मलय को फोन के बारे में बताना था.
स्विच औफ हो जाने से अनुराधा के फोन के बारे में उसे पता ही न चला. उस के फोन का चार्जर न होने के चलते वह अपना मोबाइल भी चार्ज न कर पाया.
उधर अनुराधा ने मलय द्वारा फोन न करने पर फिर से फोन किया, पर जब उस का फोन स्विच औफ बताने लगा, तब उस की घबराहट और भी बढ़ गई. कई तरह के शक उस के मन में पैदा होने लगे.
जल्दी में अनुराधा उस लड़की का नाम भी पूछना भूल गई थी, जिस ने मलय का फोन रिसीव किया था.
‘पता नहीं, कौन थी वह…? उस का जन्मदिन था भी या झूठ बोल रही थी. दाल में कुछ काला तो नहीं. आखिर मलय ने इस के बाद फोन स्विच औफ क्यों कर दिया? ऐसा तो नहीं कि मलय का उस लड़की से नाजायज रिश्ता हो और उस ने जानबूझ कर मोबाइल स्विच औफ कर दिया हो?
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‘आखिर इतनी देर तक जाड़े की रात में मलय को उस लड़की के घर जाने की क्या जरूरत पड़ गई? अगर वह लड़की सच भी कहती हो, तब भी इतनी रात को बर्थडे में रहने की क्या जरूरत? इस मौसम में रात 9 बजे तक बर्थडे फंक्शन खत्म हो ही जाता है.’
अनुराधा ने सोचा कि अब वह दूसरे दिन सुबह फोन करेगी. वह सोने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. मन बेचैन था.
ऐसा तो होना ही था. आखिर मलय उस का पति था. पति रात में किसी अनजान औरत के घर में हो, तो नईनवेली पत्नी के दिल पर क्या बीतेगी?
अब अनुराधा के मन में यह भी बात घर करने लगी कि यह सब उस के मलय से दूर रहने का नतीजा है. अगर वह मलय के साथ रहती तो ऐसा नहीं होता. उस ने सोचा कि अब उसे आगरा जाना ही होगा. सासससुर की सेवा के लिए वह अपने कैरियर का नुकसान तो कर ही रही थी, अब अपनी शादीशुदा जिंदगी को दांव पर नहीं लगा सकती.
किसी तरह रात कटी. सुबह उठते ही अनुराधा ने मलय को फोन लगाया. उस समय मलय गहरी नींद में सो रहा था. उस ने अर्पणा के घर से आते ही फोन को चार्ज में लगा दिया था, लेकिन उसे औन करना भूल गया था, इसलिए अभी भी मोबाइल स्विच औफ बता रहा था.
अब तो अनुराधा का शक पक्का होने लगा. जरूर मलय उस लड़की के साथ रात बिता रहा होगा और कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे, इसलिए फोन को स्विच औफ कर दिया होगा.
यह तो सच था कि मलय की दोस्ती अर्पणा से बढ़ रही थी और यह भी सही था कि इस को हवा देने का काम अनुराधा का उस के साथ न रहना था, लेकिन यह बिलकुल गलत था कि मलय ने जानबूझ कर अपना मोबाइल स्विच औफ कर दिया था और वह अर्पणा के घर रात में था.
अब मलय फोन रिसीव करता और इस बारे में सफाई भी देता तो अनुराधा शायद उस की बात का यकीन नहीं करती.
हुआ भी यही. जब मलय जगा और उस ने अनुराधा को बताने की कोशिश की कि वह मोबाइल डिस्चार्ज होने के चलते रात में उस से बात नहीं कर पाया, तो उस ने उस की बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं किया और बोली कि वह भी अब आगरा आएगी और सासससुर के लिए कोई न कोई इंतजाम जरूर कर देगी.
मलय उस को मना नहीं कर पाया. हां, इतना जरूर कहा कि वह अगले हफ्ते घर आ रहा है, फिर इस बारे में बात करेगा.
जब मलय ने कह दिया कि वह अगले हफ्ते घर आ रहा है, तब अनुराधा को इस बीच आगरा जाने की कोई जरूरत नहीं थी.
सासससुर गांव छोड़ना नहीं चाहते थे और गांव छोड़ना उन के लिए मुफीद भी नहीं था. अनुराधा जानती थी कि ऐसा करने से दोनों की जिंदगी आसान न रहेगी.
उन्हीं के पड़ोस में एक अधेड़ विधवा माधवी रहती थी. उसे परिवार वालों ने छोड़ दिया था. वह कम उम्र में ही विधवा हो गई थी और घर वाले समझते थे कि उस के घर में आने के बाद से ही उस के पति की तबीयत खराब रहने लगी थी और आखिर में वह बीमारी से ही मर गया, जबकि सचाई यह थी कि उसे दिल की बीमारी थी, जिस का समय पर उचित ढंग से इलाज न होने के चलते उस की मौत हुई थी.
माधवी अकसर अनुराधा के घर आती थी और उस के काम में हाथ बंटाती थी. अनुराधा के सासससुर भी उस का बहुत खयाल रखते थे और उस को खाना खिलाने के लिए अनुराधा से कहते थे. उस की पैसे से मदद भी किया करते थे.
अनुराधा ने माधवी से बात की, तो वह सासससुर की सेवा और देखभाल करने के लिए तैयार हो गई. इस तरह अनुराधा ने मलय के आने से पहले ही उस की गैरहाजिरी में सासससुर की देखभाल का इंतजाम कर दिया.
अब अनुराधा तय कर चुकी थी कि वह मलय के पास आगरा जाएगी.
अपने वादे के मुताबिक मलय घर आया. अनुराधा के मन में उस के प्रति कई सवाल थे, लेकिन जब तय समय पर मलय आ गया और उसे उम्मीद बंध गई कि अब वह भी उस के साथ आगरा जाएगी, तब उस का डर खत्म हो गया.
अनुराधा ने सासससुर के रहने का इंतजाम तो कर दिया था, लेकिन मलय उसे आगरा ले जाने के पक्ष में नहीं था. उस का कहना था कि माधवी उस के मांबाबूजी का वैसा ध्यान न रख पाएगी, जैसा उन्हें इस उम्र में जरूरत है. लेकिन अनुराधा ने जिद पकड़ ली, तो उसे आगरा ले जाने के लिए तैयार होना ही पड़ा.
सासससुर की जिम्मेदारी माधवी पर डाल दी गई. यह तय हुआ कि उसे हर महीने एक तय रकम दे दी जाएगी. माधवी को इस से ज्यादा चाहिए भी क्या था. रहने का ठौर और खाने का इंतजाम तो यहां था ही, हर महीने खर्चे के लिए कुछ पैसे भी, और वह भी जब तक माधवी चाहे.
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अनुराधा आज पहली बार आगरा आई थी. मलय जिस घर में रहता था, वह एक बिजी महल्ले में था और उस के बैंक से काफी दूरी पर था.
गांव में रहने की आदी अनुराधा को यह भीड़भाड़ वाला महल्ला काफी दमघोंटू लगा. उसे समझ नहीं आया कि बैंक से इतनी दूरी पर मलय ने यह मकान किराए पर क्यों लिया है.
जब अनुराधा ने इस बारे में मलय से पूछा, तो उस ने यह कह कर टाल दिया कि बैंक के नजदीक कोई ढंग का किराए का मकान नहीं मिला, लेकिन इस बात पर अनुराधा को यकीन नहीं हुआ, क्योंकि मलय का बैंक किसी पौश इलाके में नहीं था, जहां किराए पर कोई मकान ही न मिले या इतना महंगा हो कि उस का किराया वह दे न पाए.
पर इस की वजह का पता उसे तब लगा, जब उसी शाम अर्पणा उस से मिलने आई.
‘‘जानती हो भाभी, आज जब तुम्हारे बारे में मलय ने बताया तो तुम से मिलने चली आई. मेरी नानी का एक मकान इसी महल्ले में है. नाना आगरा में ही पहले बिजली महकमे में थे. उन्होंने एक बनाबनाया मकान इसी महल्ले में बड़े ही सस्ते में खरीद लिया था. जब तक नाना जिंदा रहे, उन्होंने आगरा नहीं छोड़ा.
‘‘कई सालों तक रहने के चलते इस शहर से उन का लगाव ही नहीं हो गया था, बल्कि कई लोगों से पारिवारिक संबंध भी बन गए थे.
‘‘नानाजी हमेशा कहते थे कि अपनी जिंदगी की शाम हमेशा परिचितों के बीच ही बितानी चाहिए, वरना अकेलेपन का दंश हमेशा झेलना पड़ेगा.
‘‘लेकिन, नानाजी के मरने के बाद नानी कोलकाता चली गईं, क्योंकि वहीं मामाजी एक कालेज में प्रोफैसर थे. इस के बाद मेरी नौकरी यहीं लग गई, तो मैं उन के ही मकान में रहने लगी,’’ अर्पणा एक ही सांस में सबकुछ कह गई.
‘‘अच्छा तो उस दिन शायद मेरा फोन तुम ने ही रिसीव किया था, जन्मदिन था न तुम्हारा?’’
‘‘हां भाभी, तुम ठीक कहती हो, उस दिन मेरा ही जन्मदिन था. तुम से पहले कभी भेंट नहीं हुई थी, इसलिए तुम मेरी आवाज नहीं पहचान पाई थीं.’’
‘‘तुम से मिल कर खुशी हुई. लेकिन अर्पणा, तुम्हारा तो यहां मकान है, पर मलय इतनी घनी और दमघोंटू जगह में क्यों रहता है?’’
अर्पणा मुसकराई और बोली, ‘‘इसलिए भाभी कि हम दोनों कालेज में एकसाथ पढ़ते थे. यहां रहने से हम लोगों का आपस में मिलनाजुलना होता है और अब तो मैं मलय की ही मोटरसाइकिल से बैंक जाती हूं.’’
यह सुन कर अनुराधा को अच्छा नहीं लगा. अब अच्छा लग भी कैसे सकता था. कौन पत्नी यह चाहेगी कि उस का पति किसी जवान और खूबसूरत लड़की को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर रोज औफिस ले जाए.
यह सुन कर अनुराधा के दिल पर सांप लोट गया, फिर भी वह बनावटी मुसकराहट चेहरे पर लाते हुए बोली, ‘‘अच्छा है, जब अगलबगल ही मकान हैं और दोनों को एक ही औफिस में जाना है, तो एकसाथ जाने में कोई हर्ज नहीं है.’’
लेकिन, अंदर से अनुराधा को मलय पर गुस्सा आ रहा था. यह कोई बात हुई… एक तो बैंक से इतनी दूर किराए का मकान लिया, ऊपर से एक कुंआरी लड़की को लिफ्ट भी देने लगा. क्या अर्पणा उसे पीछे से पकड़ कर नहीं बैठती होगी? लोग क्या कहते होंगे? लेकिन उसे तो मजा मिल रहा है, इस के लिए उसे शर्म क्यों आएगी?
अर्पणा के जाने के बाद अनुराधा ने मलय से पूछा, ‘‘तुम्हारा अर्पणा से क्या संबंध है?’’
‘‘अचानक यह सवाल क्यों पूछ रही हो? पहले तो ऐसा कभी नहीं पूछा?’’ मलय अनुराधा के अचानक हुए इस हमले से घबरा गया.
‘‘इसलिए कि तुम इस महल्ले में सिर्फ अर्पणा के चलते रहते हो. जानते हो, यहां बहुत गंदगी है, फिर भी बैंक से इतनी दूर रहने की क्या वजह है? तुम उसे रोज अपनी मोटरसाइकिल से बैंक ले जाते हो. न तुम्हें अपनी सेहत का खयाल है, न बदनामी का,’’ अनुराधा चाहते हुए भी अपनी भावनाओं को न रोक पाई.
‘‘तुम बहुत ही ज्यादा गलतफहमी की शिकार हो. ऐसी कोई बात नहीं है. बैंक के नजदीक कोई किराए का अच्छा सा मकान नहीं मिल रहा था.’’
‘‘तुम्हारे बैंक का कोई साथी बैंक के अगलबगल नहीं रहता क्या…?’’
‘‘रहता है, लेकिन किसी का मकान अच्छा नहीं है,’’ मलय ने बहाना बनाने की कोशिश की, पर उस की बात भरोसा करने लायक नहीं थी.
अब अनुराधा क्या कहती और कहती भी तो इस से मलय पर क्या फर्क पड़ता, लेकिन उसे यह बात तो समझ में आ ही गई थी कि मलय और अर्पणा के बीच कोई न कोई संबंध जरूर है.
अर्पणा और मलय का संबंध ऐसे ही नहीं बना था और यह 1-2 दिन में नहीं बना था. इस के पीछे हालात भी कम दोषी नहीं थे. हालात ऐसे बने कि अनुराधा को मलय को अकेला छोड़ कर गांव में रहना पड़ा और इस बीच कुंआरी होने के चलते अर्पणा मलय से चिपकती चली गई.
मलय के अकेले होने का फायदा अर्पणा ने बखूबी उठाया और उसी की नजदीकियों के चलते मलय ने अनुराधा को कभी आगरा लाने पर जोर नहीं दिया.
मलय को क्या फर्क पड़ता. उसे गांव आने पर उस की जिस्मानी भूख मिट ही जाती थी. आगरा में रोमांस करने के लिए अर्पणा थी ही, मारी तो अनुराधा जा रही थी. मशीन बन कर रह गई थी वह.
गांव में रातदिन सासससुर की सेवा का फर्ज अनुराधा पर थोप कर मलय निश्चिंत हो गया था. सासससुर भी अनुराधा के सामने ही किसी के आने पर बहू की तारीफ के पुल बांध कर उस के त्याग की जैसे कीमत चुका देना चाहते थे. अनुराधा की भावनाओं का खयाल न मलय को था, न सासससुर को.
अब आगरा में अनुराधा का कोई नहीं था. उसे अकेले ही सारे फैसले लेने थे. सब से पहले तो किसी भी हालत में मलय को अर्पणा से अलग करना था.
इस की शुरुआत क्वार्टर बदलने से करनी थी और इस के लिए मलय तो कोशिश करता नहीं, इसलिए अनुराधा ने उस के साथ औफिस जाने का फैसला किया, ताकि खुद ही उस इलाके में कोई अच्छा सा मकान खोज सके.
शुरू में तो मलय अनुराधा के इस प्रस्ताव से बहुत खीझा. वह बोला, ‘‘तुम बैंक में जा कर क्या करोगी,’’ लेकिन जब अनुराधा ने कहा कि एक बार वह उस के बैंक को देखना चाहती है, पता नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए, तो वह इनकार न कर सका.
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मलय ने फोन कर के अर्पणा को बताया, ‘‘मैं अनुराधा के साथ बैंक जाऊंगा, इसलिए तुम किसी आटोरिकशा से बैंक चली जाना.’’
‘अरे यार, यह बात पहले ही बता देते. इस समय मुझे आटोरिकशा के लिए एक किलोमीटर पैदल जाना पड़ेगा.’
‘‘आज थोड़ी तकलीफ उठा लो. पता नहीं, अनुराधा को क्या हो गया है, मुझ पर तुम्हारे साथ संबंधों को ले कर शक करने लगी है,’’ मलय छत पर जा कर बोला. वह नहीं चाहता था कि अनुराधा उस की बातें सुन ले.
अनुराधा ने भी मलय को यह नहीं बताया था कि वह उस के साथ इसलिए जा रही है, ताकि उस के बैंक के आसपास कोई किराए का मकान खोज सके.
अनुराधा बैंक पहुंच कर बोली कि वह अगलबगल कोई किराए का मकान खोजने जा रही है, तब मलय घबराया. वह बोला, ‘‘इस के लिए तुम्हें यहां आने की क्या जरूरत थी. मैं यह काम खुद भी कर सकता था. अगर तुम्हें इसी काम के लिए आना था, तो रविवार तक का इंतजार करना चाहिए था. मैं भी तुम्हारा साथ देता. क्या अनजान जगह में अकेले तुम्हें गलीगली मकान के लिए भटकना अच्छा लगता है?’’
तब अनुराधा को लगा कि उस ने मलय पर अविश्वास कर और उस से झूठ बोल कर गलत किया है. वह शर्मिंदगी से भर उठी. उस ने कहा, ‘‘मैं थोड़ी देर के लिए अर्पणा को साथ ले लेती हूं.’’
‘‘देखो अनुराधा, यह बैंक है. यहां स्टाफ की ऐसे भी कमी है. अगर तुम अर्पणा को साथ ले जाओगी, तो यहां का अकाउंट सैक्शन कौन संभालेगा? बैंक में कस्टमर तुरंत हल्ला मचाना शुरू कर देंगे.’’
उस दिन चाह कर भी अनुराधा बैंक से बाहर नहीं निकल पाई और दिनभर बैठेबैठे बोर होती रही. बैंक में उस का अर्पणा के अलावा किसी से परिचय नहीं था, इसलिए वह उसी के पास बैठी रही.
अर्पणा काम में इतनी बिजी थी कि उसे उस से भी बात करने की फुरसत नहीं थी, फिर भी उस ने उस का काफी खयाल रखा.
मलय अनुराधा के इस बरताव से काफी दुखी था. अर्पणा भी अब जान गई थी कि अनुराधा मलय को उस से अलग करने के लिए उस के साथ बैंक तक आई थी, पर उस ने अपने मन की बात उस से नहीं की.
अर्पणा के इस अच्छे बदलाव ने अनुराधा के मन में उस के प्रति विचार को बदल दिया. अब उसे इस बात का अफसोस था कि उसी के कारण अर्पणा को उस दिन आटोरिकशा से आना पड़ा. अब बैंक से घर लौटने का समय हो रहा था. अनुराधा उस समय अर्पणा के टेबल के पास बैठी थी. मलय किसी जरूरी काम से चीफ ब्रांच मैनेजर के चैंबर में गया हुआ था.
तभी अर्पणा मुसकरा कर बोली, ‘‘मैं कल से अपनी स्कूटी से बैंक आऊंगी. अब तो आप खुश हैं?’’
यह सुन कर अनुराधा को लगा, जैसे किसी ने चाबुक मार कर पीठ पर नीला कर दिया हो. उस से इस का जवाब देते नहीं बना. तभी मलय आता हुआ दिखाई दिया.
‘‘अभी मुझे कुछ काम है, इसलिए घर लौटने में देरी होगी. तुम अर्पणा के साथ घर लौट जाओ,’’ मलय ने अनुराधा से कहा.
‘‘चलो भाभी, इसी बहाने तुम मेरा भी मकान देख लोगी,’’ अर्पणा ने खुशी जाहिर करते हुए कहा.
‘‘लेकिन अर्पणा, मैं तुम से एक बात बताना भूल गई थी. वह कोने में बैठी हुई जो दुबली सी लड़की दिखाई पड़ रही है न, उस से मैं दोपहर में मिली थी. वह बहुत कम उम्र की लग रही थी और मलय के साथ तुम भी काम में लगी थी, तब उस के पास चली गई थी. उस समय वह अपने केबिन में अकेली थी. मैं उस से जानना चाह रही थी कि वह इतनी कम उम्र में सर्विस में कैसे आ गई.
‘‘मैं ने जब उस को अपना परिचय दिया, तब वह बहुत खुश हुई और औफिस के बाद चाय पर अपने घर चलने का न्योता दिया. जब मैं ने उस से किराए के मकान के बारे में पूछा, तब वह बोली कि उस के मकान में 2 कमरे खाली हैं. अब हमें 2 कमरे से ज्यादा की जरूरत तो है नहीं, क्यों न चल कर बात कर लूं.’’
‘‘हां शायद तुम लूसी के बारे में बात कर रही हो. वह ईसाई है और यहां से थोड़ी ही दूरी पर उस के किसी रिश्तेदार का मकान है, वह वहीं रहती है.’’
अभी वे दोनों बातें कर ही रही थीं कि लूसी आ गई. अब वह भी घर जाने की तैयारी कर रही थी.
‘‘आप भैया को भी साथ ले लीजिएगा भाभी. मैं ने अपने रिश्तेदार से बात कर ली है, वे उस फ्लैट को किराए पर देने के लिए तैयार हैं. अभी आप मेरे साथ चल कर देख लीजिए. आप को मकान पसंद आएगा,’’ लूसी मुसकराते हुए बोली
‘‘लेकिन आज तो मुझे बैंक से निकलने में देर हो जाएगी,’’ मलय ने कहा, तो अनुराधा बोली, ‘‘उस से क्या फर्क पड़ता है. आज होटल में डिनर कर लेंगे. रोजरोज इतनी दूर आने से तो फुरसत मिलेगी.’’
मलय ने कहा, ‘‘तुम लूसी के साथ बैठो, मैं थोड़ी देर में अपना काम निबटा कर आता हूं,’’ और वह अपने केबिन में चला गया.
तभी अर्पणा ने कहा, ‘‘आज डिनर मेरे यहां रहेगा भाभी. मैं घर जा कर इस का इंतजाम करती हूं, जब तक तुम लोग लौटोगे, डिनर तैयार मिलेगा.’’
‘‘ठीक है,’’ अनुराधा ने कहा. सुबह जिस अर्पणा को ले कर उसे चिंता सता रही थी, वह भी अब नहीं रही. जिस तरह अर्पणा उस का सहयोग कर रही थी, उस से तो यही लग रहा था कि वह बेवजह उस के और मलय के संबंधों को ले कर इतनी चिंतित थी.
अर्पणा आटोरिकशा से घर लौट गई और डिनर की तैयारी में जुट गई.
इधर मलय ने अपना काम झटपट निबटाया और मोटरसाइकिल को बैंक परिसर में ही गार्ड के हवाले कर अनुराधा और लूसी के साथ उस के मकान पर पहुंचा.
लूसी वहां अपनी मां के साथ रहती थी. उस के पिता एक बीमारी में गुजर गए थे. एक बहन थी जिस की शादी हो गई थी. चेन्नई में उन का एक पुश्तैनी घर था, जिसे उस की मां ने बेच कर रुपए बैंक में जमा करा दिए थे.
अब उस की मां उसी पैसे से आगरा में ही एक फ्लैट खरीदने का मन बना रही थी, लेकिन लूसी का कहना था कि बैंक से उसे बहुत ही कम ब्याज पर लोन मिल जाएगा, इसलिए अब फ्लैट लूसी के नाम से लोन ले कर खरीदने का मन था. ईएमआई बैंक में जमा पैसे के ब्याज से देना था.
मलय लूसी से काफी सीनियर था, इसलिए लूसी उस की काफी इज्जत कर रही थी. आज तो उस की पत्नी भी आई थी. मकान मालिक लूसी का रिश्तेदार ही था, इसलिए मलय को किराए पर मकान देने के लिए राजी करने में उन्हें दिक्कत नहीं हुई.
मलय और अनुराधा को मकान बहुत पसंद आया. यह न हवादार था, बल्कि काफी साफसुथरा भी था. किराए का एडवांस दे कर और चायनाश्ता करने के बाद मलय और अनुराधा सीधे अर्पणा के घर पहुंचे, क्योंकि अब काफी समय हो गया था और अपने क्वार्टर जा कर लौटने में काफी रात हो जाती.
‘‘अगर आप फ्रेश होना चाहते हो तो हो लो, डिनर तैयार है,’’ अर्पणा बोली, तो अनुराधा बाथरूम में चली गई.
मलय ने कहा, ‘‘मुझे बाथरूम जाने की जरूरत नहीं है.’’
‘‘मकान ठीक लगा?’’ अर्पणा ने पूछा.
‘‘हां, कमरे तो 2 ही हैं, लेकिन बड़ेबड़े हैं, हवादार भी.’’
‘‘अच्छा है, भाभी की चिंता खत्म हुई.’’
‘‘लेकिन, अब तुम्हें परेशानी हो गई.’’
अर्पणा कुछ न बोली. तभी अनुराधा आ गई. खाने की मेज पर तीनों बैठे.
‘‘कब तक नए मकान में शिफ्ट होना है?’’ अर्पणा ने पूछा.
‘‘अगले हफ्ते तक. इस बीच मकान में सफाई का काम करवाऊंगा, क्योंकि पिछले 6 महीने से मकान बंद था और पिछले किराएदार ने उस में जगहजगह कीलें गाड़ रखी?हैं. बाथरूम और किचन दोनों गंदे हैं.’’
‘‘जब तक हम नए मकान में शिफ्ट नहीं हो जाते, अर्पणा को अपने साथ ही ले जाना मलय,’’ अनुराधा ने कहा, तो मलय चुप हो गया.
‘‘पर, अब मैं खुद ही मलय के साथ न जाऊंगी भाभी,’’ अर्पणा ने कहा, तो अनुराधा को कुछ कहते न बना. सच तो यही था कि उसी के चलते मलय को दूसरा मकान लेना पड़ा था, वरना जैसे चल रहा था, वैसे ही चलने देती वह, लेकिन औरत सबकुछ बरदाश्त कर सकती है किसी पराई औरत की अपनी शादीशुदा जिंदगी में दखलअंदाजी नहीं.
‘‘भाभी, अब तुम मलय को संभालो. उसे तुम्हारे प्यार की जरूरत है. मैं तुम्हारी जिंदगी में दखल देना नहीं चाहती.
‘‘अब मैं अपने दिल की बात छिपाऊं, तो तुम्हारे प्रति नाइंसाफी होगी. यह सच है कि मैं मलय से प्यार करने लगी थी. कई बार दिमाग हमें सलाह देता है, क्या करना चाहिए, क्या नहीं, हिदायत देता है, लेकिन दिल उसे अनसुना कर देता है, लेकिन भाभी, जीवन सिर्फ भावनाओं से नहीं चलता. मैं भूल गई थी अपनी हैसियत को, बेवजह मलय की जिंदगी में दखल दे रही थी. माफ कर देना मुझे,’’ यह कहते हुए अर्पणा रो पड़ी.
‘‘ऐसा कुछ भी गलत नहीं हुआ था अर्पणा, जिन हालात में मलय और तुम रह रहे थे, उन में ऐसा होना कोई अजूबा नहीं था. पर मैं भी क्या करती, सासससुर को गांव में बिना किसी सही इंतजाम के छोड़ भी तो नहीं सकती थी.
‘‘एक बार जिद कर यहां आना चाहती थी, लेकिन जानती हो, दिल ने मेरी बात नहीं सुनी और मैं ने अपना विचार बदल दिया.
‘‘पर, बर्थडे के दिन जब मलय के बदले तुम ने फोन रिसीव किया था, तब मैं रातभर न सो पाई. मन किसी डर से बेचैन था और उसी दिन मैं सासससुर की देखभाल के लिए किसी को खोजने लगी.
‘‘और जब कल मैं यहां आई और जाना कि मलय तुम्हें मोटरसाइकिल से बैंक ले जाता है और तुम्हारा साथ पाने के लिए ही वह इतनी दूर इस दमघोंटू महल्ले में रहता है, तब मुझे सच ही बरदाश्त नहीं हुआ और मैं ने तुरंत तय कर लिया कि मलय को इस महल्ले से बाहर निकालना है.’’
‘‘और तुम अपने मिशन में कामयाब हो गई,’’ कह कर मलय मुसकराया.
कुछ तनावग्रस्त हो रहे वातावरण में हलकापन आ गया और जब अर्पणा के आंसू अनुराधा ने अपने रूमाल से पोंछे तब दोनों के दिल स्नेह से भर गए.
जब मलय और अनुराधा अर्पणा से विदा लेने लगे, तब दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया. भटका मन अब वापस आ गया था.
अ‘‘इसलिए कि तुम इस महल्ले में सिर्फ अर्पणा के चलते रहते हो. जानते हो, यहां बहुत गंदगी है, फिर भी बैंक से इतनी दूर रहने की क्या वजह है? तुम उसे रोज अपनी मोटरसाइकिल से बैंक ले जाते हो. न तुम्हें अपनी सेहत का खयाल है, न बदनामी का,’’ अनुराधा न चाहते हुए भी अपनी भावनाओं को न रोक पाई.
‘‘तुम गलतफहमी की शिकार हो. ऐसी कोई बात नहीं है. बैंक के नजदीक कोई किराए का अच्छा सा मकान नहीं मिल रहा था.’’
‘‘तुम्हारे बैंक का कोई साथी बैंक के अगलबगल नहीं रहता क्या…?’’
‘‘रहता है, लेकिन किसी का मकान अच्छा नहीं है,’’ मलय ने बहाना बनाने की कोशिश की, लेकिन उस की बात भरोसा करने लायक नहीं थी.
अब अनुराधा क्या कहती और कहती भी तो इस से मलय पर क्या फर्क पड़ता, लेकिन उसे यह बात तो समझ में आ ही गई थी कि मलय और अर्पणा के बीच कोई न कोई संबंध जरूर है.
अर्पणा और मलय का संबंध ऐसे ही नहीं बना था और यह 1-2 दिन में नहीं बना था. इस के पीछे हालात भी कम दोषी नहीं थे. हालात ऐसे बने कि अनुराधा को मलय को अकेला छोड़ कर गांव में रहना पड़ा और इस बीच कुंआरी होने के चलते अर्पणा मलय से चिपकती चली गई.
मलय के अकेले होने का फायदा अर्पणा ने बखूबी उठाया और उसी की नजदीकियों के चलते मलय ने अनुराधा को कभी आगरा लाने पर जोर नहीं दिया.
मलय को क्या फर्क पड़ता. उसे गांव आने पर उस की जिस्मानी भूख मिट ही जाती थी. आगरा में रोमांस करने के लिए अर्पणा थी ही, मारी तो अनुराधा जा रही थी. मशीन बन कर रह गई थी वह.
गांव में रातदिन सासससुर की सेवा का फर्ज अनुराधा पर थोप कर मलय निश्चिंत हो गया था. सासससुर भी अनुराधा के सामने ही किसी के आने पर बहू की तारीफ के पुल बांध कर उस के त्याग की जैसे कीमत चुका देना चाहते थे. अनुराधा की भावनाओं का खयाल न मलय को था, न सासससुर को.
अब आगरा में अनुराधा का कोई नहीं था. उसे अकेले ही सारे फैसले लेने थे. सब से पहले तो किसी भी हालत में मलय को अर्पणा से अलग करना था.
इस की शुरुआत क्वार्टर बदलने से करनी थी और इस के लिए मलय तो कोशिश करता नहीं, इसलिए अनुराधा ने उस के साथ औफिस जाने का फैसला किया, ताकि खुद ही उस इलाके में कोई अच्छा सा मकान खोज सके.
शुरू में तो मलय अनुराधा के इस प्रस्ताव से बहुत खीझा. वह बोला, ‘‘तुम बैंक में जा कर क्या करोगी,’’ लेकिन जब अनुराधा ने कहा कि एक बार वह उस के बैंक को देखना चाहती है, पता नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए, तो वह इनकार न कर सका.
मलय ने फोन कर अर्पणा को बताया, ‘‘मैं अनुराधा के साथ बैंक जाऊंगा, इसलिए तुम किसी आटोरिकशा से बैंक चली जाना.’’
‘अरे यार, यह बात पहले ही बता देते. इस समय मुझे आटोरिकशा के लिए एक किलोमीटर पैदल जाना पड़ेगा.’
‘‘आज थोड़ा कष्ट उठा लो, पता नहीं अनुराधा को क्या हो गया है, मुझ पर तुम्हारे साथ संबंधों को ले कर शक करने लगी है,’’ मलय छत पर जा कर बोला. वह नहीं चाहता था कि अनुराधा उस की बातें सुन ले.
अनुराधा ने भी मलय को यह नहीं बताया था कि वह उस के साथ इसलिए जा रही है, ताकि उस के बैंक के आसपास कोई किराए का मकान खोज सके.
अनुराधा बैंक पहुंच कर बोली कि वह अगलबगल कोई किराए का मकान खोजने जा रही है, तब मलय घबराया. वह बोला, ‘‘इस के लिए तुम्हें यहां आने की क्या जरूरत थी. मैं यह काम खुद भी कर सकता था. अगर तुम्हें इसी काम के लिए आना था तो रविवार तक का इंतजार करना चाहिए था. मैं भी तुम्हारा साथ देता. क्या अनजान जगह में अकेले तुम्हें गलीगली मकान के लिए भटकना अच्छा लगता है?’’
तब अनुराधा को लगा कि उस ने मलय पर अविश्वास कर और उस से झूठ बोल कर गलत किया है. वह शर्मिंदगी से भर उठी. उस ने कहा, ‘‘मैं थोड़ी देर के लिए अर्पणा को साथ ले लेती हूं.’’
‘‘देखो अनुराधा, यह बैंक है. यहां स्टाफ की ऐसे भी कमी है. अगर तुम अर्पणा को साथ ले जाओगी तो यहां का अकाउंट सैक्शन कौन संभालेगा? बैंक में कस्टमर तुरंत हल्ला मचाना शुरू कर देंगे.’’
उस दिन चाह कर भी अनुराधा बैंक से बाहर नहीं निकल पाई और दिनभर बैठेबैठे बोर होती रही. बैंक में उस का अर्पणा के अलावा किसी से परिचय नहीं था, इसलिए वह उसी के पास बैठी रही.
अर्पणा काम में इतनी बिजी थी कि उसे उस से भी बात करने की फुरसत नहीं थी, फिर भी उस ने उस का काफी खयाल रखा.
मलय अनुराधा के इस बरताव से काफी दुखी था. अर्पणा भी अब जान गई थी कि अनुराधा मलय को उस से अलग करने के लिए उस के साथ बैंक तक आई थी, पर उस ने अपने मन की बात उस से नहीं की.
अर्पणा के इस अच्छे बदलाव ने अनुराधा के मन में उस के प्रति विचार को बदल दिया. अब उसे इस बात का अफसोस था कि उसी के कारण अर्पणा को उस दिन आटोरिकशा से आना पड़ा. अब बैंक से घर लौटने का समय हो रहा था. अनुराधा उस समय अर्पणा के टेबल के पास बैठी थी. मलय किसी जरूरी काम से चीफ ब्रांच मैनेजर के चैंबर में गया हुआ था.
तभी अर्पणा मुसकरा कर बोली, ‘‘मैं कल से अपनी स्कूटी से बैंक आऊंगी. अब तो आप खुश हैं?’’
यह सुन कर अनुराधा को लगा, जैसे किसी ने चाबुक मार कर पीठ पर नीला कर दिया हो. उस से इस का जवाब देते नहीं बना. तभी मलय आता हुआ दिखाई दिया.
‘‘अभी मुझे कुछ काम है, इसलिए घर लौटने में देरी होगी. तुम अर्पणा के साथ घर लौट जाओ,’’ मलय ने अनुराधा से कहा.
‘‘चलो भाभी, इसी बहाने तुम मेरा भी मकान देख लोगी,’’ अर्पणा ने खुशी जाहिर करते हुए कहा.
‘‘लेकिन अर्पणा, मैं तुम से एक बात बताना भूल गई थी. वह कोने में बैठी हुई जो दुबली सी लड़की दिखाई पड़ रही है न, उस से मैं दोपहर में मिली थी. वह बहुत कम उम्र की लग रही थी और मलय के साथ तुम भी काम में लगी थी, तब उस के पास चली गई थी. उस समय वह अपने केबिन में अकेली थी. मैं उस से जानना चाह रही थी कि वह इतनी कम उम्र में सर्विस में कैसे आ गई.
‘‘मैं ने जब उस को अपना परिचय दिया, तब वह बहुत खुश हुई और औफिस के बाद चाय पर अपने घर चलने का न्योता दिया. जब मैं ने उस से किराए के मकान के बारे में पूछा, तब वह बोली कि उस के मकान में 2 कमरे खाली हैं. अब हमें 2 कमरे से ज्यादा की जरूरत तो है नहीं, क्यों न चल कर बात कर लूं.’’
‘‘हां शायद तुम लूसी के बारे में बात कर रही हो. वह ईसाई है और यहां से थोड़ी ही दूरी पर उस के किसी रिश्तेदार का मकान है, वह वहीं रहती है.’’
अभी वे दोनों बातें कर ही रही थीं कि लूसी आ गई. अब वह भी घर जाने की तैयारी कर रही थी.
‘‘आप भैया को भी साथ ले लीजिएगा भाभी. मैं ने अपने रिश्तेदार से बात कर ली है, वे उस फ्लैट को किराए पर देने के लिए तैयार हैं. अभी आप मेरे साथ चल कर देख लीजिए. आप को मकान पसंद आएगा,’’ लूसी मुसकराते हुए बोली.
‘‘जरा रुको बहू,’’ सासूजी की आवाज पर अनुराधा रुक गई. सारा जरूरी सामान उस ने रात को ही पैक कर लिया था.
आगरा जाने के लिए सुबह में ट्रेन थी. इस छोटे से स्टेशन पर ट्रेनों का स्टोपेज बहुत कम था. अगर यह ट्रेन छूट गई, तो फिर शाम को मिलती और आगरा पहुंचने पर उसे रात हो जाती.
आगरा के जिस महल्ले में अनुराधा का पति मलय रहता था, उस के बारे में उसे बहुत कम पता था. मलय का टैलीफोन नंबर तो उसे मालूम था, लेकिन वह उस की इच्छा के खिलाफ वहां जा रही थी, इसलिए वह उसे स्टेशन लेने आएगा या नहीं, उसे नहीं पता था.
अनुराधा ने रात में फोन पर मलय को बता दिया था कि अब वह सासससुर के साथ गांव में नहीं रह सकती, क्योंकि उसे कंपीटिशन की तैयारी करनी है और यहां उस का सारा समय सासससुर की देखभाल में ही लग जाता है. उसे पढ़ने का मौका ही नहीं मिलता.
अनुराधा की बात सुन कर मलय चुप हो गया था. उस ने कहा था कि दूसरे दिन वह सुबह वाली ट्रेन पकड़ लेगी. आगरा पहुंचने पर वह उसे फोन करेगी. वह उसे स्टेशन पर आ कर रिसीव कर लेगा.
मलय की चुप्पी ने अनुराधा को असमंजस में डाल दिया था. लेकिन उस ने तय कर लिया था कि अब वह गांव में नहीं रहेगी.
शादी के पहले अनुराधा ने सोचा था कि दिल्ली में रह कर जूडिशियरी सर्विस के लिए इम्तिहान की तैयारी करेगी. जज बनना उस का सपना था और इसीलिए उस ने बीएचयू के ला फैकल्टी से एलएलबी किया था. अभी जूडिशियरी की तैयारी करने के लिए दिल्ली आई ही थी कि पिताजी ने मलय से उस की शादी तय कर दी.
मलय आगरा में एक बैंक में बैंक मैनेजर था. उस समय उस की शादी को ले कर उस के मातापिता काफी चिंतित रहते थे, क्योंकि गांव में ज्यादा उम्र हो जाने पर लोग तरहतरह की बातें करने लगते हैं.
अभी मलय उम्र 27 साल थी, लेकिन गांव के रिवाज के मुताबिक अब यह ज्यादा हो गई थी, इसलिए उस ने शादी का कोई विरोध नहीं किया था.
मलय एकलौता बेटा था और उस के मातापिता काफी बूढ़े हो गए थे, जिन की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.
पिताजी गांव छोड़ना नहीं चाहते थे. उन्हें आगरा में उस का क्वार्टर जेल लगता था. वहां उन का कोई हमउम्र भी नहीं था, इसलिए उन की किसी से बातचीत होती नहीं थी. शहर का अकेलापन उन्हें जानलेवा लगता था.
मलय को बैंक में बहुत काम रहता था, इसलिए वह रात में देर से घर लौटता था, इसलिए जिद कर के वे गांव में ही रहने लगे थे.
मां से अब खाना बनता न था और गांव में कोई नौकरानी मिलती नहीं थी, इसलिए शादी के बाद मलय ने अनुराधा को मातापिता की सेवा और देखभाल के लिए गांव में ही छोड़ दिया था.
इस का अनुराधा ने ही नहीं, बल्कि उस के मांबाबूजी ने भी विरोध किया था. आखिर अपनी बेटी की शादी उन्होंने मलय से केवल सासससुर की सेवा के लिए तो नहीं की थी.
कई सालों की दौड़धूप के बाद उन्होंने मलय से अनुराधा का रिश्ता तय किया था. इस के लिए मलय के पिता को अच्छाखासा तिलक दिया था. कई लोगों से सिफारिश कराई थी, तब जा कर रिश्ता पक्का हुआ था.
उन्हें उस का बात डर था कि कहीं बूढ़े सासससुर की सेवा के लिए मलय उसे गांव में ही न रख दे, लेकिन कइयों ने उन के डर को यह कह कर बेबुनियाद ठहराया था कि मलय इतना बेवकूफ तो नहीं है कि शादी के तुरंत बाद नईनवेली पत्नी को बूढ़े सासससुर के साथ छोड़ कर अकेले आगरा में रहेगा, जबकि उसे मालूम है कि अनुराधा बीएचयू से ला ग्रेजुएट है और उस का सपना जज बनने का है.
अब किस के मांबाप बूढ़े नहीं होते, केवल इस आधार पर तो शादी रद्द नहीं की जा सकती. फिर कौन सासससुर ऐसा होगा, जो अपने फायदे के लिए बहू के कैरियर और बेटे की शादीशुदा जिंदगी बरबाद करेगा.
‘‘जी मांजी,’’ आराधना ने सास की तरफ मुखातिब होते हुए कहा.
‘‘बहू, तुम ने मलय को फोन कर दिया है न, अकेली हो, इतना सामान ले कर जाने में तुम्हें दिक्कत तो नहीं होगी न?’’ सासूजी कुछ चिंतित नजर आ रही थीं.
वे प्राइमरी स्कूल में टीचर थीं. अभी पिछले साल ही रिटायर हुई थीं, लेकिन घुटनों में दर्द के चलते कठिनाई से चलती थीं. वहीं अनुराधा के ससुर स्थानीय ब्लौक में क्लर्क थे. उन्हें रिटायर हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन्हें दमा की बीमारी थी और थोड़ा सा चलने में उन की सांस फूलने लगती थी. साथ ही, कम उम्र में ही उन्हें डायबिटीज की बीमारी हो गई थी. उन्हें नियमित रूप से दवा लेनी पड़ती थी, जिस को समय पर देना अनुराधा के ही जिम्मे था. वह देर से जागते थे और अभी भी सो रहे थे.
चलते वक्त अनुराधा ने ससुरजी से इजाजत नहीं ली थी, क्योंकि उन्हें वह इतनी सुबह जगाना नहीं चाहती थी. सासूजी की आदत सुबह उठने की थी, इसलिए चलने के पहले अनुराधा ने उन का पैर छूते हुए सिर्फ इतना कहा था कि वह मलय के पास आगरा जाना चाहती है, क्योंकि जूडिशियरी का इम्तिहान है. वह गांव में पढ़ नहीं पा रही है.
अनुराधा को सासूजी से इस तरह के जवाब की उम्मीद न थी. वह तो सोच रही थी कि वे उसे घर छोड़ कर न जाने के लिए कहेंगी. उस के सामने गिड़गिड़ाएंगी, अपने घुटनों के दर्द और ससुरजी के सांस और डायबिटीज की बीमारी का वास्ता देंगी कि उस के न रहने पर घर कौन संभालेगा, उस के ससुरजी को समय पर दवा कौन देगा, उन की देखभाल कौन करेगा, लेकिन सासूजी ने तो उस से ऐसा कुछ नहीं कहा. उलटे वे उस की महफूज यात्रा के बारे में सोचने लगी थीं.
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तो क्या सासूजी को अनुराधा की गैरहाजिरी में घर में होने वाली दिक्कतों की चिंता नहीं है? उन्हें अपने और ससुरजी की देखभाल की फिक्र नहीं सता रही है?
अनुराधा तो रातभर इसी चिंता में मरे जा रही थी कि सुबह में चलते वक्त सासूजी ने उस से रुकने के लिए कहा तो वह क्या कह कर अपना बचाव करेगी. मन को ऐसे ही चंचल नहीं कहा जाता. उस के मन में कई बातें एकसाथ आई थीं कि जो वह कह रही है, वह क्या यही है? मलय की इच्छा के खिलाफ बूढ़े, बीमार और लाचार सासससुर को अकेले उन के अपने रहमोकरम पर छोड़ कर इस तरह घर छोड़ना क्या ठीक था? अगर वे उस के मातापिता होते तो क्या वह ऐसा ही करती? क्या सासससुर की जगह मातापिता से कम होती है? लेकिन तुरंत उस के मन में एक दूसरा बवंडर चलने लगा था. स्वार्थ और अपने निजी हित की रक्षा का बवंडर, अंदर से एक उबाल सा आया था.
सासससुर ने तो अपनी जिंदगी जी ली है. अब वे अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर हैं, जहां जिंदगी ढलते सूरज की तरह होती है, उन्होंने अपने अरमान पूरे कर लिए हैं. पर अनुराधा का तो जिंदगी का सफर अभी शुरू ही हुआ है और सारे अरमान पूरे करने बाकी हैं. यह तो सासससुर को खुद मलय से कहना चाहिए था कि वह उसे भी अपने साथ लेता जाए.