कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर शेयर की कविता,  ‘मेरी राख को गंगा में मत बहाना’

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत इन दिनों अपने स्टेटमेंट और तस्वीरों की वजह से सुर्खियों में छायी हुई है. अब हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं. जो काफी वायरल हो रहा है.

कंगना रनौत अपने फैमिली के साथ क्वालिटी टाइम बीताती नजर आई. इसी दौरान कंगना ने एक कविता लिखी है. और उन्होंने इस कविता को खुद अपनी आवाज में सोशल मीडिया पर शेयर किया है.

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इस वीडियो में कंगना अपने फैमिली के साथ एंजाय करते नजर आ रही है. कंगना इन खूबसूरत वादियों में  बर्फबारी का लुत्फ उठाती दिखाई दे रही हैं.

उन्होंने अपने इस खूबसूरत अनुभव को शब्दों में बयां किया है. और इन शब्दों के जरिये एक कविता पेश की है. उन्होंने यह कविता ट्विटर किया है.

कंगना ने इस वीडियो को ट्विट करते हुए कैप्शन लिखा है- ‘एक नई कविता लिखी है राख… हाइकिंग के दौरान प्रेरित हुई, जब आपको समय मिले, तो इसे देखें..’ यह कविता कुछ इस तरह है – ‘मेरी राख को गंगा में मत बहाना.. हर नदी सागर में जाकर मिलती है, मुझे सागर की गहराइयों से डर लगता है… मैं आसमान को छूना चाहती हूं, मेरी राख को इन पहाड़ों पे बिखेर देना.. जब सूरज उगे, तब मैं उसे छू सकूं, जब मैं तन्हा हूं तो चांद से बातें करूं… मेरी राख को उस क्षितिज पर छोड़ देना..’

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बता दें हाल ही में कंगना ने एक वीडियो शेयर किया था. इसमें उन्होंने कहा किसानों के बारे में बोलने के बाद से उन्हें रेप की धमकियां मिल रही है. उन्होंने आगे ये भी कहा कि इन पिछले 10-12 दिनों से मुझे इमोशनल और मेंटल आनलाइन लिंचिंग का सामना करना पड़ रहा हैं. मुझे रेप और जान से मारने की धमकी मिली है,  इसलिए मेरा हक बनता है कि मैं अपने देश से कुछ सवाल करूं.

वर्कफ्रंट की बात करें तो हाल ही में कंगना ने फिल्म ‘थलाइवी’ की शूटिंग पूरी की है. इस फिल्म में वह  पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का किरदार में नजर आएंगी. इसके अलावा वब अपकमिंग फिल्म ‘तेजस’ और ‘धाकड़’ में भी नजर आने वाली हैं.

मोबाइल वीडियो एक मजबूत हथियार 

पुलिसके अत्याचारों के खिलाफ आम लोगों के हाथ में आज सब से बड़ा हथियार मोबाइल है. सैकड़ों वीडियो क्लिप्स आज सोशल मीडिया में घूम रही हैं जिन में पुलिस वालों को किसी को बेरहमी से पीटते, किसी से रिश्वत लेते, लोगों से जोरजबरदस्ती करते देखा जा रहा है. इस बीच, पुलिस वाले चौकन्ने हो गए हैं, वे ऐसे मोबाइलों को तोड़ने की कोशिश करने लगे हैं.

मोबाइलों से खींची या बनाई गईं वीडियो क्लिप्स कोई असर डालती हैं, इस बारे में कोई आंकड़ा तो जमा नहीं किया गया पर पुलिस वालों को इस से फर्क जरूर पड़ता है. कई बार जब ये क्लिप्स टीवी चैनलों में पहुंच जाती हैं और चैनल सरकारी भोपू न हों और चुप न रहने की हिम्मत रखते हों, तो पुलिस की आमजन के प्रति क्रूरता जगजाहिर हो जाती है.

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आज युवा ज्यादा उत्साह दिखाते हैं जो गलत बातों का विरोध करते हैं. उन के लिए पुलिस के डंडों से बचने का यह एक उपाय है. पर फ्रांस में एक कानून बनने वाला है जिस में इस तरह की वीडियो बनाना ही अपराध घोषित कर दिया जाएगा. ऐसी एक वीडियो क्लिप हमारे देश भारत में किसान आंदोलन के दौरान एक वृद्ध सिख पर पुलिस वाले का डंडा बरसाने की बनाई गई थी जिस पर राहुल गांधी की टिप्पणी पर भाजपा आईटी सैल ने ट्विटर पर एक अधूरा वीडियो डाला था. ट्विटर कंपनी ने भाजपा के अमित मालवीय के इस प्रतिउत्तर  वाले ट्वीट को गलत ठहराया है. फ्रांस तो उसे पकड़ लेगा जिस ने पुलिस वाले का वीडियो बनाया था. फ्रांस में बन रहे कानून के खिलाफ वहां देशभर में  1 दिसंबर से प्रदर्शन होने लगे हैं. लोग कहते हैं कि उन्हें पुलिस की ज्यादतियों का वीडियो लेने का मौलिक अधिकार है. पुलिस कानून को हाथ में नहीं ले सकती.

वह जबरन किसी को पीट नहीं सकती. नागरिकों के पास अकेला हथियार उस समय उस के साथी या आसपास के लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो ही हैं. पुलिस किस तरह हमारे देश भारत में थानों में अत्याचार करती है, यह जगजाहिर है. दिसंबर के पहले सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सारे थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं ताकि थानों के भीतर पुलिस के अत्याचार कम हो सकें.  ये सीसीटीवी कैमरे लग तो जाएंगे पर पहले ही दिन से खराब रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट हर थाने में थोड़े ही मौजूद रहेगा? वहां तो आरोपी के रिश्तेदार ही होंगे और यदि उन के पास पूछताछ के समय वीडियो बनाने का अधिकार हो तो पुलिस अपनी बर्बरता से उन्हें वीडियो बनाने से रोक सकती है. दुनिया के हर देश को पुलिस की जरूरत है पर हर देश में पुलिस अपनेआप में आपराधिक गिरोह बन जाती है. जो किसी वजह या बेवजह पकड़ा गया, वह पुलिस अत्याचारों का शिकार रहा था या नहीं, यह कभी पता नहीं चल सकता.  सरकारें पुलिस पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि सत्ता में बैठे नेता अपने विरोधियों को इसी पुलिस के सहारे कुचलते हैं.

वैसे, मार खाने वालों में ज्यादातर युवा ही होते हैं, वे चाहे राजनीतिकविरोधी हों या समाज के प्रति असल गुनाहगार. एमेजौन का वर्चस्व  दुनियाभर में नवंबर का आखिरी शुक्रवार औफर्स का मनभावन दिन होता है जब बड़े स्टोर अपना बचा माल बहुत सस्ते दामों पर बेचते हैं. इसे ‘ब्लैक फ्राइडे’ कहते हैं. अमेरिका से शुरू हुआ यह तमाशा अब दुनिया के सभी समृद्ध देशों के स्टोर मनाते हैं और औनलाइन स्टोरों, जैसे एमेजौन आदि ने भी ब्लैक फ्राइडे मनाना शुरू कर दिया है.  इस बार इसी दिन एमेजौन के खिलाफ एक आंदोलन शुरू हुआ है.

ऊपर से तो यही कहा जा रहा है कि एमेजौन अपने कर्मचारियों को पूरे पैसे नहीं देता और बहुत से देशों में टैक्स नहीं देता, पर असली वजह यह है कि लोग इस की बढ़ती मोनोपौली से घबरा रहे हैं. एमेजौन अब आप को अपनी मरजी का सामान बेचता है और जो जरूरत नहीं, वह भी मनमाने दामों में बेच डालता है.  मोबाइल या कंप्यूटर पर खरीदारी एक तरह से जुए की शक्ल लेने लगी है जिस में लोग फोटो या वीडियो देख कर सस्ती चीजों को खरीदते हैं और फिर इंतजार करते हैं कि पासा उन के पक्ष में पड़ा या नहीं. एमेजौन जुआघर बनने लगा है. इस में लोगों को घर बैठे सस्ते सामान का लालच दे कर जुआ खेलने की आदत डाली जा रही है. यह काम आप के घर के करीब की दुकानें नहीं कर सकतीं. एमेजौन छोटे बिजनैसों को हड़प रहा है और आज के या भविष्य के लाखों छोटे व्यापारी अब डिलीवरीमैन बने जा रहे हैं.

एमेजौन ने बुद्धिहीन डिलीवरीमैनों की आर्मी खड़ी कर ली जो एक भाषा, एक सा व्यवहार, एक सी पोशाक पहन रहे हैं. यही नहीं, वे जल्द से जल्द सामान पहुंचाने के लिए ट्रैफिक का वह जोखिम ले रहे हैं जो सीमा पर दुश्मन से लड़ने के लिए सैनिक लेते हैं. आम किसी कंपनी का घरेलू सामान आज बिक ही नहीं सकता अगर एमेजौन का वरदहस्त न हो.

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चीनी कंपनी अलीबाबा भी वैसी ही है, पर एमेजौन तो उस से 8-9 गुना बड़ी है. कोई बड़ी बात नहीं होगी जो कभी रहस्य खुले कि अमेरिकाचीन संबंध एमेजौन के कारण खराब हुए थे जो अलीबाबा को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती. यह संभव है कि आज एक कंपनी अमेरिका और चीन की सरकारों को प्रभावित कर ले.  बहरहाल, शिकार हर हालत में आज के युवा ही होंगे जो या तो फालतू सामान खरीदेंगे या फिर फालतू टिकटौक  पर नाचेंगे.

सोनू सूद को “भगवान” बना दिया! धन्य है भारत देश

चढ़ते सूरज को यहां नमस्कार करने वालों की कमी नहीं, फिर चाहे बाद में वहां गिद्द ही क्यों नहीं मंडलाने लगे. ऐसा ही अजूबा अब फिल्म दुनिया में खलनायक के रूप में मशहूर और स्थापित हो चुके सोनू सूद के मामले में देखने को मिल रहा है.उन्हें भगवान का दर्जा देकर मंदिर बना दिया गया है. और पूजा का ढकोसला चल रहा है. यही नहीं मीडिया भी इसे लताड़ने की जगह महत्व दे रही है. सवाल है क्या हमारे यहां वैसे ही देवताओं की कमी है? या फिर यह कहे कि जितने भी देवता हैं कुछ इसी तरह धीरे-धीरे लोकमान्य होते चले गए हैं! आइए! आज इस महत्वपूर्ण ढोंग और अंधविश्वास के मसले पर विस्तार से चर्चा करते हैं-

कोरोना लॉकडाउन के समय मजदूरों और जरूरतमंदों के लिए सहायक बनकर सामने आए सोनू सूद की अब गरीबों के भगवान बन चुके हैं. तेलंगाना के गांव डुब्बा टांडा के लोगों ने 47 वर्षीय सोनू सूद के नाम पर एक मंदिर बनवाकर उसमें उनकी मूर्ति स्थापित की है. मजे की बात यह है कि श्रीमान सोनू की प्रतिमा सोनू की चिर परिचित पोशाक टी शर्ट पहने हुए है..!

सबसे आश्चर्य की बात यह है कि यह जानकारी मिल रही है की गांव के कुछ खब्तीयों ने इस मंदिर का सिद्दीपेट जिले के कुछ अधिकारियों की मदद से बनवाया है.मंदिर का लोकार्पण बीते रविवार को मूर्तिकार और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में किया गया. और जैसा की नाटक होता है इस दौरान एक आरती भी गाई गई. ट्रेडिशनल ड्रेस में वहां की महिलाओं ने पारंपरिक गीत भी गाए.

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जिला परिषद के सदस्य गिरी कोंडेल का बयान सामने आया है वे कहते हैं कि सोनू सूद ने कोरोना के दौरान गरीब लोगों के लिए अच्छा काम किया है. वहीं, मंदिर निर्माण के योजनाकार संगठन में शामिल रमेश कुमार का कथन है कि सोनू ने अच्छे कामों के चलते भगवान का दर्जा हासिल कर लिया है. तो अब कुल मिलाकर हमारे देश में कोई भी कभी भी किसी के भी कामों के गुण दोष को देखकर उसे भगवान का दर्जा दे सकता है.

सोनू का काबिले तारीफ कार्य

निसंदेह मार्च में जब कोरोना का प्रसार और लाक डाउन की स्थिति निर्मित हुई जब सारे बड़े-बड़े नामचीन लोग घरों में घुस गए सोनू सूद ने बहादुरी का परिचय दिया मानवता और इंसानियत का परिचय दिया.

कोरोना से पहले सोनू सूद एक औसत एक्टर के तौर पर जाने जाते थे जोकि फिल्मों में खलनायक के भूमिका में दिखाई देते हैं. हालांकि कोरोना के दौरान लॉकडाउन में अपनी उदारता और शालीनता से उन्होंने लोगों के दिलों में एक अलग ही जगह बनाई राजनेताओं जोकि समाज सेवा का चोला पहने जाते हैं की असलियत भी जगजाहिर कर दी. लॉकडाउन में सोनू सूद ने छत्तीसगढ़ , उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम और केरल के करीब 25 हजार से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाया था.

इतना ही नहीं, सोनू ने इनके खाने-पीने का भी इंतजाम किया था. छत्तीसगढ़ में बस्तर की एक बालिका को घर बनवा करके भी दिया जो की चर्चा में रहा सोनू सूद ने मानवता का जो परिचय दिया है वह निसंदेह कम ही उदाहरण बन का सामने आता है. उन्होंने अपने काम से यह दिखा दिया कि वे एक संवेदनशील व्यक्ति हैं और प्रत्येक उस व्यक्ति की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा हो जाती है जिसके पास धन दौलत होती है. शायद यही कारण है कि उस दरमियान सोनू सूद की मीडिया में भी खूब तारीफ हुई.

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संतोषी माता और नरेंद्र मोदी भी उदाहरण

देश में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि भगवान कैसे बनते हैं? और किस तरह रातों-रात लोग उनके नाम पर मंदिर बना देते हैं.

यही हमारे देश की खासियत है और यही कमी है. अंधविश्वास के फेर पढ़कर लोग किसी को भी महान गुरु, भगवान का दर्जा दे देते हैं और बाद में धोखा खाते हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का भी एक मंदिर सुर्खियों में रहा. इसी तरह 70 के दशक में जब जय संतोषी मां मूवी रिलीज हुई तो गांव गांव में संतोषी मां के मंदिर बन गए. संतोषी मां की भजन और पूजा सामग्री तैयार होकर बिकने लगी.

Web Series Review – ‘द मिसिंग स्टोन’

रेटिंगः डेढ़ स्टार

निर्माताः श्वेता शिंदे व संजय खंबे

निर्देशक : विशाल भूरिया व आलोक नायक

कलाकारः वरूण सोबती, बिदिता बाग, राशी मल, साकिब अयूब, विट्ठल काले व पल्लवी पाटिल

अवधि : लगभग दो घंटे, पांच एपीसोड

ओटीटी प्लेटफार्म : एमएक्स प्लेअर्स

विशाल भूरिया और आलोक नायक एक रहस्य व रोमांचक वेब सीरीज ‘‘द मिसिंग स्टोन’’लेकर आए हैं.

कहानीः

साहिर(वरूण सोबती) और ध्वनि(बिदिता बाग) सफल वैवाहिक जिंदगी जी रहे हैं. पर ‘मिसकरेज’/ गर्भपात होने के बाद साहिर व ध्वनि के बीच दूरियां बढ़ सी जाती हैं, पर साहिर की दिलचस्पी ध्वनि की छोटी बहन पायल (राशी मल ) में बढ़ जाती है. यूं तो पायल का रोमांस रायन(साकिब अयूब) के साथ भी चल रहा है. ध्वनि के हर जन्मदिन पर उसकी बहन पायल सरप्राइज देती रहती है. इस बार ध्वनि के जन्मदिन से एक सप्ताह पहले ही पायल व रायन लोनावाला के फार्म हाउस गए थे. रायन ने ही खबर दी कि पायल से उसका रिश्ता टूट गया और वह वापस अपने घर आ गया है. जबकि पायल ने फोन करके ध्वनि को बताया कि वह गोवा जा रही है. मगर कुछ देर बाद पायल घबड़ायी हुई ध्वनि को वीडियो फोन करती है. मगर फोन कट जाता है. ध्वनि इस संबंध में साहिर से बात करती है. उसके बाद अपना जन्म दिन मनाने के ध्वनि, साहिर के साथ लोनावाला के फार्म हाउस पहुंचते हैं, मगर वहां पायल नही पहुंचती और न ही पायल का कोई फोन आता है. अब ध्वनि व साहिर, पायल को लेकर चिंतित होते हैं. दोनों का शक फार्म हाउस के केअर टेकर सोमनाथ (विट्ठल काले) पर जाता है. साहिर की गैर मौजूदगी में ध्वनि, सोमनाथ की पत्नी हेमा (पल्लवी पाटिल ) से बातचीत करती है और उसे इस बात का अहसास हो जाता है कि पायल जिंदा नहीं है. उसके बाद वह रायन को फोन करके फार्म हाउस पर बुलाती है. फिर सच सामने आता है.

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लेखन व निर्देशनः

एक बहुत ही पुरानी व घिसी पिटी कहानी है. इस तरह की कहानी पर कई तरह हौरर फिल्में भी बन चुकी हैं. पटकथा बहुत ही सतही स्तर की है. लौक डाउन के माहौल में इसे फिल्माया गया है, पर आकर्षित नहीं करती है.

अभिनयः

वरूण सोबती, बिदिता बाग व विट्ठल काले के अलावा किसी का भी अभिनय प्रभावित नही करता.

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भोजपुरी एक्ट्रेस काजल राघवानी का दुल्हन अवतार हुआ वायरल, देखें तस्वीर

भोजपुरी एक्ट्रेस काजन राघवानी ना सिर्फ अपनी एक्टिंग के लिए फेमस है बल्कि वे अपने फैंशन और अपने बोल्ड लुक्स की वजह से भी काफी पौपुलर हैं. काजल के फैंस उनके हर लुक को काफी प्यार देते हैं और साथ ही उनकी तारीफ करते नहीं थकते.

अब काजल राघवानी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. इन तस्वीरों में एक्ट्रेस दुल्हन के अवतार में दिखाई दे रही हैं.

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दरअसल हाल ही में काजल राघवानी ने ब्राइडल फोटोशूट कराई थी. उन्होंने ये तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. जिसके बाद फैंस उनकी तस्वीर की जमकर तारीफ कर रहे हैं. कई यूजर्स ने उनके तस्वीर पर कमेंट्स किया है.

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इन तस्वीरों में काजल राघवानी बेहद खूबसूरत  नजर आ रही हैं. वह तस्वीर में सेल्फी लेती हुई दिखाई दे रही हैं.

कई यूजर्स  काजल राघवानी का खूबसूरत अंदाज देखकर, उनकी तारीफ में खूबसूरत, माय फेवरेट और गार्जस ब्राइडल जैसे कामेंट कर रहे हैं.

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खेसारी लाल यादव के साथ उनकी जोड़ी को फैंस खूब पसंद करते हैं. बता दें कि काजल राघवानी ने कई भोजपुरी ब्लौकबस्टर फिल्म की है. ‘मैं सेहरा बांध के आऊंगा’, ‘बलम जी आई लव यू’, ‘मेंहदी लगा के रखना’ जैसे फिल्मों  में उन्होंने काम किया है.

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बता दें कि काजल राघवानी ने अब तक 30 से भी ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में काम किया है और इस दौरान उन्होनें भोजपुरी के सुपस्टार खेसारी लाल यादव (Khesarilal Yadav) के साथ भी स्क्रीन शेयर की है. फैंस ने काजल राघवानी के हर लुक, हर किरदार को पसंद किया है और उनपर बेहद प्यार बरसाया है.

Bigg Boss 14 : Salman Khan के बर्थडे पर मेहमान बनकर सरप्राइज देंगी ये हसीनाएं

‘बिग बौस 14 विकेंड का वार’ (Bigg Boss 14 Weekend Ka Vaar) काफी दिलचस्प होने वाला है. जी हां, इस हफ्ते बिग बौस के होस्ट सलमान खान (Salman Khan) का बर्थडे 27 दिसम्बर को है. तो ऐसे में बिग बौस हाउस में खूब धमाल होने वाला है.

बिग बौस 14 में हर त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. फिलहाल घर में क्रिसमस सेलीब्रेट किया जा रहा है. और अब शो के मेकर्स सलमान खान (Salman Khan) के बर्थडे की तैयारियों में जुट जाएंगे.

 

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शो में सलमान खान के बर्थडे को और भी ज्यादा स्पेशल बनाने के लिए जबरदस्त तैयारी की जा रही है. खबर ये आ रही है कि सलमान खान के बर्थडे के खास मौके पर घर में रवीना टंडन, जैकलीन फर्नांडिस, शहनाज गिल और धर्मेश जैसे सितारों की एंट्री होने वाली है. शो में ये सभी मेहमान जमकर डांस करने वाले हैं.

इस हफ्ते बिग बौस 14 के विकेंड के वार में जबरदस्त धमाल होने वाला है. बताया जा रहा है कि शहनाज गिल, सलमान खान के साथ मिलकर अपने फेमस डायलौग ‘त्वाडा कुत्ता कुत्ता साडा कुत्ता टौमी’ को फिर से ताजा करने वाली है. तो वहीं रवीना टंडन और जैकलीन फर्नांडिस सुपरस्टार सलमान खान को एक शानदार गिफ्ट भी देंगी.

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इस हफ्ते बिग बौस 14 वीकेंड के वार का दर्शक बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि घर सलमान खान के बर्थडे पर क्या क्या धमाल होने वाला है.

 

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बता दें  कि कुछ हफ्ते पहले भी ‘बिग बौस 14’ के मेकर्स ने दिशा परमार को इस शो में आने के लिए इनवाइट किया था. पर उन्होंने शो में में आने से मना कर दिया था. दिशा परमार ने ये कहकर मना किया था कि उन्हें लगता है कि वो इस शो के लिए नहीं बनी हैं क्योंकि वो काफी बोरिंग हैं.

सफलता के लिए पढ़ना जरूरी

लेखक-   धीरज कुमार

समय बहुत कीमती होता है. जो समय को भांप गया, सफल हो गया. समय विद्यार्थी जीवन में सफल होने का मौका हरेक को देता है.

रिचा साइंस की स्टूडैंट थी. जब उस का एडमिशन अच्छे कालेज मे हुआ तो वह लगभग रोज ही कालेज जाया करती थी. कालेज में उस की ढेर सारी फ्रैंड्स बन गई थीं. वह रोज नई ड्रैस पहन कर कालेज जाती थी. सहेलियों के साथ वह तरहतरह के वीडियोज बनाती थी, फोटोशूट करती थी, दोस्तों के साथ सैल्फी लेती थी और उन्हें एकदूसरे को शेयर करती  थी. कालेज से घर आते हुए जितने भी रैस्टोरैंट व होटल थे, सभी में वह अलगअलग दिन दोस्तों के साथ डिशेज का स्वाद लेती थी.

परीक्षा में अच्छे मार्क्स के लिए ट्यूशन भी पढ़ रही थी. ट्यूशन से आने के बाद कौपीकिताब एक तरफ रख कर आराम करती थी. इतना कुछ करने के बाद उस के पास एनर्जी नहीं बच पाती थी कि वह घर पर नियमित पढ़ाई कर सके. ट्यूशन व कालेज में पढ़ाई गई बातों को दोहराने का उसे समय नहीं मिल पाता था. थोड़ाबहुत खाली समय मिलने पर मोबाइल से गाने सुनती थी. कुछ समय अपने दोस्तों से मोबाइल पर चैटिंग करती थी. लगभग यही उस की प्रतिदिन की दिनचर्या थी.

चिंता का कारण

जैसे ही परीक्षा का समय आया. वह काफी चिंतित हो गई थी. पढ़ाई पूरी नहीं हुई थी. वह टैंशन में रहने लगी थी. इसीलिए परीक्षा पास नहीं कर पाई. उस की पढ़ाई अधूरी रह गई थी. जब पढ़ने के दिन थे तो दोस्तों के साथ मौजमस्ती करती रही.  यही कारण था कि पढ़ाई में पिछड़ गई थी. सो, स्वाभाविक था कि परीक्षा में  अच्छे अंक नहीं आ पाएंगे. वह फेल हो चुकी थी.

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इस प्रकार वह 2 साल का कीमती समय बरबाद कर चुकी थी. उस की सारी दोस्त अगली कक्षा में जाने के लिए तैयार थीं. उस की कुछ दोस्त अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे की रणनीति बना रही थीं और उस पर काम कर रही थीं. जबकि, रिचा 2 साल व्यर्थ गए समय के बारे में अफसोस कर रही थी. कुछ दिन तो उस के अंदर इतनी हिम्मत नहीं बच पाई थी कि वह फिर से परीक्षा की तैयारी कर सके. लेकिन जब उस के मातापिता और गुरुजनों ने मार्गदर्शन किया तो वह अपनी गलती सुधारने को तैयार हो गई.

नकारात्मक सोच की उत्पत्ति

रिचा की तरह कम स्टूडैंट्स होते हैं जो असफल होने के बाद सफलता के लिए दोबारा मेहनत कर पाते हैं. कुछ स्टूडैंट्स होते हैं जो असफलता से निराश हो कर बीच में पढ़ाई छोड़ चुके होते हैं. कुछ ऐसे भी स्टूडैंट्स होते हैं जो असफलता से निराश हो कर आत्महत्या तक कर लेते हैं. जबकि, आत्महत्या करना किसी भी समस्या का निदान नहीं है.

समय के सदुपयोग के फायदे

12वीं क्लास में पढ़ने वाली श्रुति दिनरात घर पर पढ़ाई कर रही थी. स्कूल से आने के बाद वह नोट्स का घर पर प्रतिदिन रिवीजन करती थी. दिक्कत होने पर ट्यूशन में डिस्कस करती थी. उसे हर विषय में सैल्फ स्टडी के कारण सभी विषयों के कौन्सैप्ट्स क्लीयर रहते थे.

यही कारण था कि वह परीक्षा में 90 प्लस मार्क्स स्कोर कर पाई थी. वह सभी सब्जैक्ट्स को टाइम मैनेजमैंट के हिसाब से पढ़ती थी.

पढ़ाई के दौरान वह मोबाइल से दूर रहती थी. हां, मोबाइल से अपने कठिन विषयों के वीडियोज, स्पीच आदि जरूर सुनती थी और देखती थी. उस के दोस्तों की संख्या सीमित थी. वह उन्हीं दोस्तों से कनैक्ट रहती थी जिन से पढ़ाईलिखाई में मदद मिल सके. वह हंसते हुए बताती है, ‘‘मैं पढ़ाईलिखाई में रुचि नहीं रखने वाले दोस्तों से जल्द ही किनारा कर लेती हूं. मेरे मोबाइल में उन्हीं फ्रैंड्स के नंबर हैं जो पढ़ाईलिखाई में अच्छी हैं और जो मु?ो भी पढ़नेलिखने में मदद कर पाती हैं. फालतू लोगों के नंबर मैं ब्लौक कर देती हूं.’’

फालतू दोस्तों से नुकसान

एक बात तो स्पष्ट है कि पढ़ाईलिखाई के दौरान फालतू दोस्तों से बातें करना समय बरबाद करना ही है. कुछ पढ़ने वाले स्टूडैंट्स की ये शिकायतें जरूर रहती हैं कि पढ़ाईलिखाई के दौरान दोस्तों का जमावड़ा लक्ष्यप्राप्ति में बाधक होता है. पढ़ाईलिखाई के दौरान दोस्तों की संख्या सीमित होनी चाहिए. कुछ दोस्त पढ़ाईलिखाई के बजाय मौजमस्ती की ओर डायवर्ट करने की कोशिश करते रहते हैं, जिस से पढ़ाई में बाधा पहुंचती है.

अनियमित पढ़ाई से सफलता में देरी

बिहार के औरंगाबाद जिला निवासी सतीश कुमार का कहना है कि वे इंटर लैवल यानी एसएससी परीक्षा की तैयारी कई सालों से कर रहे हैं. लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है. उन का कहना है, ‘‘असफलता का मुख्य कारण है प्रतिदिन टाइम मैनेजमैंट के अनुसार पढ़ाई का अभ्यास नहीं कर पाना. मैं विगत 3 सालों से तैयारी कर रहा हूं. अपनी व्यक्तिगत परेशानियों के कारण पढ़ाईलिखाई नियमित नहीं कर पाता हूं. यही कारण है कि अभी तक मुझे सफलता नहीं मिल पाई है. किसी भी परीक्षा की तैयारी करते समय नियमित पढ़ाई करना जरूरी है. व्यक्तिगत परेशानियों में फंसे रह जाने के कारण पढ़ाईलिखाई बाधित हो जाती है, इसीलिए मुझे अभी तक सफलता नहीं मिली है.’’

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सफलता के लिए टाइम मैनेजमैंट जरूरी

यूपीएससी परीक्षा 2019 के टौपर, हरियाणा के सोनीपत जिले के तेवड़ी गांव के निवासी प्रदीप सिंह का कहना था कि वे सफलता के लिए पूरे सप्ताहभर का टाइम मैनेजमैंट तैयार करते थे. अगर किसी कारण किसी दिन तय की गई पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता था तो अगले दिन उस को भी जरूर पूरा करता था. सप्ताह के अंत तक वे बनाए गए टारगेट को पूरा कर लेते थे. तभी उन्हें इतनी बड़ी सफलता मिली. उन्होंने इस सफलता के लिए नियमित पढ़ाई के महत्त्व को स्वीकार किया.

लक्ष्यप्राप्ति के लिए रोज पढ़ें

किसी भी परीक्षा में टाइम मैनेजमैंट का पूरा ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए रोज पढ़ना जरूरी होता है. तभी सफलता की उम्मीद की जा सकती है. अगर आप प्रतिदिन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं तो सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते. सफलता के लिए खुद के पैमाने पर स्टूडैंट्स खुद को तोल लेते हैं. जिस प्रकार से स्टूडैंट्स की तैयारी होती है, उस  के मुताबिक वे सफलता और असफलता का अनुमान खुद ही लगा लेते हैं.

सैल्फ स्टडी के फायदे

कंपीटिशन में सफलता के लिए लगातार अभ्यास की आवश्यकता होती है. नियमित अभ्यास से ही सफलता की उम्मीद की जा सकती है. कोचिंग क्लास में स्टूडैंट्स की प्रौब्लम्स को सौल्व किया  जाता है.

सो, वह सहायक हो सकता है, परंतु उसे सफलता की गारंटी नहीं कहा जा सकता. लेकिन अगर आप सैल्फ स्टडी लगातार कर रहे हैं, तो सफलता की उम्मीद कर सकते हैं.

नियमित पढ़ाई जरूरी

आप किसी प्रकार की पढ़ाई कर रहे हों- चाहे सामान्य डिग्री हासिल करना चाहते हों, किसी  कंपीटिशन की तैयारी कर रहे हों, कोई भाषा सीख रहे हों, कानून की पढ़ाई कर रहे हों, मैनेजमैंट की पढ़ाई कर रहे हों, हर पढ़ाई में जरूरी है कि पढ़ाईलिखाई नियमित हो. नियमित पढ़ाई से ही सफलता हासिल होती है.

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पढ़ाईलिखाई में शौर्टकट नहीं

किसी प्रकार के भी कोर्स को पूरा करने के लिए प्रतिदिन पढ़ना जरूरी है. कोर्स की संरचना इस प्रकार से की जाती है कि नियमित पढ़ाई से ही कोर्स पूरा किया जा सकता है. कुछ लोग सफलता के लिए शौर्टकट फार्मूला अपनाने की नाकाम कोशिश करते हैं. जीवन के अन्य क्षेत्रों में शौर्टकट अपनाया जा सकता है किंतु पढ़ाईलिखाई में यह संभव नहीं है. शौर्टकट तरीके से सफलता हासिल नहीं की जा सकती है.

आज के विद्यार्थी प्रतियोगिता के युग में जी रहे हैं. किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता की तैयारी के लिए टफ कंपीटिशन से गुजरना पड़ता है. आज के कौंपिटिटिव एनवायरमैंट में अनियमित पढ़ाई से सफलता मिलना बहुत ही मुश्किल है. विद्यार्थियों को काफी सोचसम?ा कर और रणनीति बना कर तैयारी करने की जरूरत है. विद्यार्थियों को सफलताप्राप्ति के लिए अपना ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित करना पड़ता है. इसलिए अच्छी तैयारी के लिए अच्छी किताबें, कोचिंग सैंटर, गुरुजनों एवं मातापिता के मार्गदर्शन के साथसाथ नियमित पढ़ाई जरूरी है.

दिल वर्सेस दौलत: भाग 3

लेखिका- रेणु गुप्ता

इस के साथ लाली की मां ने पति को वहां से जबरन उठने के लिए विवश कर दिया और फिर बेटी से बोलीं, ‘यह क्या बेवकूफी है, लाली? यह तेरा प्यार पप्पी लव से ज्यादा और कुछ नहीं. अगर तू ने मेरी बात नहीं मानी तो सच कह रही हूं, मैं तु झ से सारे रिश्ते तोड़ लूंगी. न मैं तेरी मां, न तू मेरी बेटी. जिंदगीभर तेरी शक्ल नहीं देखूंगी. सम झ लेना, मैं तेरे लिए मर गई.’ यह कह कर लाली की मां अतीव क्रोध में पांव पटकते हुए कमरे से बाहर चली गईं.

मां का यह विकट क्रोध देख लाली सम झ गई थी कि अब अगर कुदरत भी साक्षात आ जाए तो उन्हें इस रिश्ते के लिए मनाना टेढ़ी खीर होगा. मां के इस हठ से वह बेहद परेशान हो उठी. उस का अंतर्मन कह रहा था कि उसे अबीर जैसा सुल झा हुआ, सम झदार लड़का इस जिंदगी में दोबारा मिलना असंभव होगा. आज के समय में उस जैसे सैंसिबल, डीसैंट लड़के बिरले ही मिलते हैं. अबीर जैसे लड़के को खोना उस की जिंदगी की सब से बड़ी भूल होगी.

लेकिन मां का क्या करे वह? वे एक बार जो ठान लेती हैं वह उसे कर के ही रहती हैं. वह बचपन से देखती आई है, उन की जिद के सामने आज तक कोई नहीं जीत पाया. तो ऐसी हालत में वह क्या करे? पिछली मुलाकात में ही तो अबीर के साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं उस ने. दोनों ने एकदूसरे के प्रति अपनी प्रेमिल भावनाएं व्यक्त की थीं.

पिछली बार अबीर के उस के कहे गए प्रेमसिक्त स्वर उस के कानों में गूंजने लगे, ‘लाली माय लव, तुम ने मेरी आधीअधूरी जिंदगी को कंप्लीट कर दिया. दुलहन बन जल्दी से मेरे घर आ जाओ. अब तुम्हारे बिना रहना शीयर टौर्चर लग रहा है.’

क्या करूं क्या न करूं, यह सोचतेसोचते अतीव तनाव से उस के स्नायु तन आए और आंखें सावनभादों के बादलों जैसे बरसने लगीं. अनायास वह अपने मोबाइल स्क्रीन पर अबीर की फोटो देखने लगी और उसे चूम कर अपने सीने से लगा उस ने अपनी आंखें मूंद लीं.

तभी मम्मा उस का दरवाजा पीटने लगीं… ‘‘लाली, दरवाजा खोल बेटा.’’

उस ने दरवाजा खोला. मम्मा कमरे में धड़धड़ाती हुई आईं और उस से बोलीं, ‘‘मैं ने अबीर के पापा को इस रिश्ते के लिए मना कर दिया है. सारा टंटा ही खत्म. हां, अब अबीर का फोनवोन आए, तो उस से तु झे कुछ कहने की कोई जरूरत नहीं. वह कुछ कहे, तो उसे रिश्ते के लिए साफ इनकार कर देना और कुछ ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं. ले देख, यह एक और लड़के का बायोडाटा आया है तेरे लिए. लड़का खूब हैंडसम है. नामी एमएनसी में सीनियर कंसल्टैंट है. 40 लाख रुपए से ऊपर का ऐनुअल पैकेज है लड़के का. मेरी बिट्टो राज करेगी राज. लड़के वालों की दिल्ली में कई प्रौपर्टीज हैं. रुतबे, दौलत, स्टेटस में हमारी टक्कर का परिवार है. बता, इस लड़के से फोन पर कब बात करेगी?’’

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‘‘मम्मा, फिलहाल मेरे सामने किसी लड़के का नाम भी मत लेना. अगर आप ने मेरे साथ जबरदस्ती की तो मैं दीदी के यहां लंदन चली जाऊंगी. याद रखिएगा, मैं भी आप की बेटी हूं.’’ यह कहते हुए लाली ने मां के कमरे से निकलते ही दरवाजा धड़ाक से बंद कर लिया.

मन में विचारों की उठापटक चल रही थी. अबीर उसे आसमान का चांद लग रहा था जो अब उस की पहुंच से बेहद दूर जा चुका था. क्या करे क्या न करे, कुछ सम झ नहीं आ रहा था.

सारा दिन उस ने खुद से जू झते हुए बेपनाह मायूसी के गहरे कुएं में बिताया. सां झ का धुंधलका होने को आया. वह मन ही मन मना रही थी, काश, कुछ चमत्कार हो जाए और मां किसी तरह इस रिश्ते के लिए मान जाएं. तभी व्हाट्सऐप पर अबीर का मैसेज आया, ‘‘तुम से मिलना चाहता हूं. कब आऊं?’’

उस ने जवाब में लिखा, ‘जल्दी’ और एक आंसू बहाती इमोजी भी मैसेज के साथ उसे पोस्ट कर दी. अबीर का अगला मैसेज एक लाल धड़कते दिल के साथ आया, ‘‘कल सुबह पहुंच रहा हूं. एयरपोर्ट पर मिलना.’’

लाली की वह रात आंखों ही आंखों में कटी. अगली सुबह वह मां को एक बहाना बना एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गई.

क्यूपिड के तीर से बंधे दोनों प्रेमी एकदूसरे को देख खुद पर काबू न रख पाए और दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे. कुछ ही क्षणों में दोनों संयत हो गए और लाली ने उन दोनों के रिश्ते को ले कर मां के औब्जेक्शंस को विस्तार से अबीर को बताया.

अबीर और लाली दोनों ने इस मुद्दे को ले कर तसल्ली से, संजीदगी से विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब जो कुछ करना है उन दोनों को ही करना होगा.

‘‘लाली, इन परिस्थितियों में अब तुम बताओ कि क्या करना है? तुम्हारी मां हमारी शादी के खिलाफ मोरचाबंदी कर के बैठी हैं. उन्होंने साफसाफ लफ्जों में इस के लिए मेरे पापा से इनकार कर दिया है. तो इस स्थिति में अब मैं किस मुंह से उन से अपनी शादी के लिए कहूं?’’ अबीर ने कहा.

‘‘हां, यह तो तुम सही कह रहे हो. चलो, मैं अपने पापा से इस बारे में बात करती हूं. फिर मैं तुम्हें बताती हूं.’’

‘‘ठीक है, ओके, चलता हूं. बस, यह याद रखना मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. शायद खुद से भी ज्यादा. अब तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं.’’

लाली ने अपनी पनीली हो आई आंखों से अबीर की तरफ एक फ्लाइंग किस उछाल दिया और फुसफुसाई, ‘हैप्पी एंड सेफ जर्नी माय लव, टेक केयर.’’

लाली एयरपोर्ट से सीधे अपने पापा के औफिस जा पहुंची और उस ने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया. उस की बातें सुन पापा ने कहा, ‘‘अगर तुम और अबीर इस विषय में निर्णय ले ही चुके हो तो मैं तुम दोनों के साथ हूं. मैं कल ही अबीर के घर जा कर तुम्हारी मां के इनकार के लिए उन से माफी मांगता हूं और तुम दोनों की शादी की बात पक्की कर देता हूं. इस के बाद ही मैं तुम्हारी मां को अपने ढंग से सम झा लूंगा. निश्चिंत रहो लाली, इस बार तुम्हारी मां को तुम्हारी बात माननी ही पड़ेगी.’’

लाली के पिता ने लाली से किए वादे को पूरा किया. अबीर के घर जा कर उन्होंने अपनी पत्नी के इनकार के लिए उन से हाथ जोड़ कर बच्चों की खुशी का हवाला देते हुए काफी मिन्नतें कर माफी मांगी और उन दोनों की शादी पक्की करने के लिए मिन्नतें कीं.

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इस पर अबीर के पिता ने उन से कहा, ‘‘भाईसाहब, अबीर के ही मुंह से सुना कि आप लोगों को हमारे इस 2 बैडरूम के फ्लैट को ले कर कुछ उल झन है कि शादी के बाद आप की बेटी इस में कहां रहेगी? आप की परेशानी जायज है, भाईसाहब. तो, मेरा खयाल है कि शादी के बाद दोनों एक अलग फ्लैट में रहें. आखिर बच्चों को भी प्राइवेसी चाहिए होगी. यही उन के लिए सब से अच्छा और व्यावहारिक रहेगा. क्या कहते हैं आप?’’

‘‘बिलकुल ठीक है, जैसा आप उचित सम झें.’’

‘‘तो फिर, दोनों की बात पक्की?’’

‘‘जी बिलकुल,’’ अबीर के पिता ने लाली के पिता को मिठाई खिलाते हुए कहा.

बेटी की शादी उस की इच्छा के अनुरूप तय कर, घर आ कर लाली के पिता ने पत्नी को लाली और अबीर की खुशी के लिए उन की शादी के लिए मान जाने के लिए कहा. लाली ने तो साफसाफ लफ्जों में उन से कह दिया, ‘‘इस बार अगर आप हम दोनों की शादी के लिए नहीं माने तो मैं और अबीर कोर्ट मैरिज कर लेंगे.’’ और लाली की यह धमकी इस बार काम कर गई. विवश लाली की मां को बेटी और पति के सामने घुटने टेकने पड़े.

आखिरकार, दिल वर्सेस दौलत की जंग में दिल जीत गया और दौलत को मुंह की खानी पड़ी.

औनलाइन गैंबलिंग यूज फिर मिस यूज   

लेखक- रोहित   

जिस बिंदु की तरफ ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा वह अनप्रोडक्टिव वर्क कल्चर को बढ़ावा दे रहा है. समस्या यह है कि समाज ने उसे नैतिकअनैतिक की बहस में उलझा कर रखा हुआ है, जबकि वह किसी भी तरह से प्रोडक्टिव नहीं है. ‘‘चौराहे पर लगे ट्रैफिक सिगनल यातायात को सुचारु रूप से चलाए रखने के लिए निर्णायक हैं.

अब अगर कुछ बाइकसवार यातायात के बने इन नियमों की अवहेलना करते हुए रैडलाइट जंप कर दें, तो क्या इस अपराध को रोकने के लिए ट्रैफिक सिगनल से रैडलाइट ही हटा देना उचित कदम होगा?’’ यह सवाल करते हुए अशोक ने एक अनबुझ पहेली मेरे सामने रख दी. दरअसल, कुछ दिनों पहले आईपीएल मैच देखते हुए भारत में औनलाइन गैंबलिंग के बढ़ते चलन को ले कर मेरी अपने मित्र अशोक से चर्चा चल रही थी. और यह सवाल उस ने मेरे उस बात के प्रतिउत्तर में दागा था जिस में मैं ने उस से कहा कि गैंबलिंग को वैधानिकता मिलने से इस से जुड़े छिपे गैरकानूनी धंधों में कमी आएगी, सबकुछ सामने होगा और सरकार को टैक्स के तौर पर रैवेन्यू में भारीभरकम रकम प्राप्त होगी.

अशोक का इस मसले पर सीधा सोचना था कि ‘‘अगर गैंबलिंग की वैधानिकता से सरकार को टैक्स का फायदा होता है तो ड्रग्स, कालेधन, स्मगलिंग, ट्रैफिकिंग जैसे दो नंबरी धंधों को कानूनी बना कर उन से भी भारीभरकम टैक्स कमाने में क्या बुराई है, ये धंधे भी वैधानिक कर दिए जाने चाहिए?’’ उस के सवाल तीखे थे, लेकिन जिज्ञासा जगा रहे थे. मैं ने गाजियाबाद में रह रहे अपने एक अन्य मित्र 28 वर्षीय प्रदीप (बदला नाम) को फोन मिलाया. दरअसल, मुझे जानकारी थी कि प्रदीप ने पिछले साल से ही औनलाइन गैंबलिंग में हिस्सा लेना शुरू किया था. वैसे तो इसे सीधेसीधे गैंबलिंग कोई स्वीकार नहीं करता लेकिन प्रदीप ने सीधेतौर पर बताया कि यह एक तरह का सट्टा या जुआ ही है. जो जुआ आप मटका या औफलाइन छिपेतौर पर खेल रहे थे, बस, अब वह पूरी मान्यता के साथ खेला जा रहा है.   प्रदीप लौकडाउन से पहले गुरुग्राम स्थित एक एमएनसी में काम कर रहा था. उस की नौकरी 2 साल पहले लगी थी. उस ने शुरू से ही कंप्यूटर लाइन चुनी थी.

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उस ने पहले बीसीए किया, फिर जौब करते हुए अपनी एमसीए की पढ़ाई भी पूरी की. जिस कंपनी में वह कार्यरत था वहां उसे 25 हजार रुपए प्रतिमाह सैलरी मिलती थी. इसलिए उस ने घर से दूर लेकिन औफिस के नजदीक ही गुरुग्राम में कहीं अपने कुछ सहकर्मियों के साथ किराए के फ्लैट में रहने का फैसला किया था. परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए वह नियमिततौर पर सैलरी का एक हिस्सा घर भिजवाता रहा. वहां रह कर उस ने परिवार की आर्थिक स्थिति को संतुलित किया, और साथ ही अपने लिए कुछ सेविंग्स भी की. लेकिन इस बीच धीरेधीरे वह अपने दोस्तों के साथ औनलाइन गेमिंग की जकड़ में भी फंसता गया. शुरूआत मजे से हुई लेकिन धीरेधीरे यह उस की आदत का हिस्सा बनता चला गया.  देश में तालाबंदी हुई तो शुरुआती डेढ़ महीना वह अपने सहकर्मियों के साथ फ्लैट में ही फंसा रहा. वहां वह अधिकतर खाली समय औनलाइन गेम खेलता रहा. तालाबंदी के तुरंत बाद ही कंपनी ने छंटनी कर उसे काम से निकाल दिया. प्रदीप वापस अपने घर गाजियाबाद में आ तो गया, लेकिन धीरेधीरे वह अपने ही फ्रैंड सर्कल में शौर्टकट तरीके से पैसे कमाने के लिए छोटीछोटी औनलाइन बैट यानी शर्त लगाने लगा. इस बीच, आईपीएल क्रिकेट टूर्नामैंट शुरू होने के बाद उस ने ‘ड्रीम 11’ पर खेलना (बैट लगाना) शुरू किया. हालांकि इस से पिछले साल वह इसे खेल चुका था लेकिन इस साल, उस के कथनानुसार, उस ने अपनी की हुई सेविंग से लगभग 36 हजार रुपए गंवा दिए हैं. लेकिन, उस का मानना है कि औनलाइन गेमिंग से वह इसे जल्द ही रिकवर कर लेगा, अपने नुकसान की भरपाई कर लेगा. वहीं, यूपीएससी की प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे प्रखर लौकडाउन के बाद से ही अपने होमस्टेट बिहार चले गए थे.

वे कम से कम इस साल तो कोरोना के चलते दिल्ली का रुख नहीं करना चाहते. वे कहते हैं, ‘मैं ने पिछले साल से ही आईपीएल पर की जाने वाली औनलाइन सट्टेबाजी में हिस्सा लेना शुरू किया. पिछले साल ‘ड्रीम 11’ पर खेल कर लगभग 2,200 रुपए जीते थे. लेकिन इस साल मैं हारा हूं.’ हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि वे किसी दूसरे औनलाइन गेम से इस नुकसान की भरपाई कर लेंगे.  इस साल के जून माह में ही आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित पंजाब नैशनल बैंक के भीतर एक फोरजरी का मामला सुर्खियों में था. बैंक के कैशियर रवि तेजा ने औनलाइन गेम (रम्मी) में होने वाली गैंबलिंग में फंस कर पहले अपना पैसा बरबाद किया, फिर कर्ज ले कर गेम खेलने लगा. जब कर्ज का बो?ा बढ़ा और कर्ज लेने वाले घर के इर्दगिर्द तकाजा करने लगे, तो उस ने बैंक में जमा लोगों के पैसों को अपने अकाउंट में ट्रांसफर करना शुरू कर दिया. अंत में जब बैंक औडिट हुआ तो पता चला लगभग 1 करोड़ 57 लाख रुपए की कमी पाई गई है. इस की जांच की गई.

जांच में पता चला, यह सारा पैसा कैशियर के अकाउंट में ट्रांसफर हुआ था. फिर वहां से कैशियर द्वारा औनलाइन गेमिंग साइट्स पर ट्रांसफर किया गया. ये ही कुछ मामले नहीं हैं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में औनलाइन गेमिंग के जरिए गैंबलिंग करने के ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं. कई मामले ऐसे हैं जिन में सट्टे की रकम न चुकाने की स्थिति में व्यक्ति द्वारा सुसाइड करने की नौबत आ चुकी है. भारत में गैंबलिंग के अवैध होने के बावजूद सरकार और न्यायालयों के सामने या यों कहें कि उन की परामर्श या मंजूरी के बाद ही इस धंधे का क्षेत्रफल विशालकाय होता जा रहा है.  स्किल और चांस के बीच वैधअवैध का खेल? इस साल आईपीएल में औनलाइन जुआ से संबंधित गेम्स को खूब प्रमोट किया गया. कल तक जिस पेटीएम पर गूगल ने सट्टेबाजी को ले कर प्रतिबंध लगाया था, उसे मात्र 4 घंटे के भीतर ही समझौता कर गूगल ने वापस ले लिया.

इसी प्रकार गैंबलिंग से जुड़े गेम्स इस साल काफी बड़े स्तर पर देखने को मिले हैं. इस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल आईपीएल क्रिकेट लीग को ‘ड्रीम 11’ ने स्पौंसर किया. वहीं, माय सर्किल 11, एमपीएल जैसे औनलाइन गैंबलिंग से संबंधित एकसाथ कई ऐसे गेम्स की बाढ़ सी आ गई है. ये खुलेतौर पर लोगों से पैसा लगाने का आह्वान कर रहे हैं. यह आह्वान, खासकर, उन युवाओं को सीधे लुभा रहा है जिन के पास एंड्रौयड फोन है और जो बेरोजगारी के मौजूदा दौर में शौर्टकट तरीके से पैसे कमाने की जुगत में लगे हैं. किंतु इन सारी चीजों के बावजूद बड़ा सवाल यह है कि भारत में जब जुआ या सट्टे से जुड़े कारोबार पर पाबंदी है तो यह खुलेआम इतने बड़े लैवल पर कैसे सुचारु रूप से चल रहा है? भारत में इस समय पब्लिक गैंबलिंग एक्ट 1867 लागू है.

इस के अनुसार, कोई भी घर, जो दीवारों से घिरा या बंद हो और वहां कार्ड्स, डाइस, टेबल और गेम के अन्य यंत्र रखे हों जिन का इस्तेमाल किसी व्यक्ति, फिर चाहे वह मकानमालिक ही क्यों न हो, द्वारा लाभ कमाने की मंशा से किया जा रहा हो, इस कानून की श्रेणी में आता है.’’ इस परिभाषा के अनुसार, किसी गैंबलिंग को गैंबलिंग मानने के लिए 3 चीजों की जरूरत है- संभावना, आपसी सहमति, दांव पर लगने वाली कीमत (गिफ्ट). लेकिन, यह जितना आसान दिखता है उतना है नहीं. इस के भीतर कई उठापटक हैं. इस एक्ट के सैक्शन 12 में यह कहा गया कि जिन गेम्स में संभावना कम और स्किल, हुनर या कौशल की मात्रा अधिक होती है, वे  पनिशेबल नहीं हैं.

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यानी, वे गैंबलिंग की श्रेणी में नहीं आते हैं. यह कानून ब्रिटिश समय से ही भारत में लागू है, इसे ले कर भारतीय न्यायिक मामले में अलगअलग समय 3 डिसीजन लिए गए. पहला 1957 में, जब आरएमडी चमरबउगवाला वर्सेस यूनियन औफ इंडिया के मामले के तहत अपैक्स कोर्ट ने कहा, जिन गेम्स में स्किल्स की जरूरत होती है उन्हें गैंबलिंग से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता. दूसरा 1967 में, आंध्र प्रदेश वर्सेस के सत्यनारायण मामले में जब सुप्रीम कोर्ट ने 13 पत्तों वाले ‘रम्मी गेम’ को यह कहते हुए उन क्लब्स या संस्थाओं में खेलने की आज्ञा दी, जहां यह लाभ कमाने के उद्देश्य से न हो. कथनानुसार, ‘‘रम्मी खेल, तीन पत्ती गेम की तरह ‘गेम औफ चांस’ नहीं है. रम्मी में एक प्रकार का स्किल चाहिए होता है क्योंकि इस में अपने पत्तों को बनाने के लिए कार्ड्स को गिराने, उठाने और सजाने के लिए विशेष ध्यान देना पड़ता है.’’ जिस के बाद इसे ‘गेम औफ स्किल’ कहा गया.

इसी तौर पर तीसरा 1996 में, जहां अपैक्स कोर्ट ने के आर लक्ष्मण वर्सेस स्टेट औफ तमिलनाडु मामले में हौर्स रेसिंग गेम को गैंबलिंग के दायरे से दूर रखते हुए इस में खुली सट्टेबाजी की वैधानिकता प्रदान की. हालांकि, भारत के संविधान, 1950, लिस्ट 2 के 7वें शैड्यूल के एंट्री 34 और 62 में सभी राज्यों को यह ताकत दी गई है कि राज्य विधानसभाएं अपने अधीन गैंबलिंग और बैटिंग के मैटर पर विधेयक बना सकती हैं. इसी के तहत, देश में 3 राज्यों (गोवा, सिक्किम, दमन) को छोड़ कर सभी ने गैंबलिंग या बैटिंग से जुड़े किसी भी प्रारूप पर पाबंदी लगाई हुई है.  गोवा ने भी 1996 में अनुमति दी. इस के बाद दमन एंड दीव ने ‘पब्लिक गैंबलिंग एक्ट 1976’ में संशोधन के बाद पांचसितारा होटलों में इस की अनुमति दी. फिर सिक्किम ने भी तय किया कि सिक्किम रेगुलेशन औफ गैंबलिंग (अमैंडमैंट) एक्ट 2005 के तहत इसे लीगल किया. वर्ष 2013 में  सरकारी आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट आई थी कि अकेले गोवा राज्य में चलने वाले कैसीनों से 2012-13 में 135 करोड़ रुपए का रैवेन्यू सरकार को प्राप्त हुआ. यानी, देखा जाए तो खेलों में होने वाली सट्टेबाजी को 2 कैटेगरी में बांटा गया है, एक- ‘गेम औफ स्किल्स’ दूसरा- ‘गेम औफ चांस’. इसी अनुसार कोई सट्टा वैध है अथवा अवैध, इस की वैधानिकता इस बात पर निर्धारित होती है कि वह कितना स्किल्स पर निर्भर है या कितना संभावना पर.

औनलाइन सट्टेबाजी का बढ़ता चलन देश में चूंकि डिजिटलीकरण के चलते चीजें बहुत तेजी से बदलीं, तो एंड्रौयड फोन और इंटरनैट ने 5-7 सालों के भीतर काफी तेजी से इस इंडस्ट्री पर भी अपना प्रभाव छोड़ा. पहले जो चीजें छिपछिपा कर गैरकानूनी तरीके से डार्क साइड में चला करती थीं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय तौर पर अब पहले की अपेक्षा सुसंगठित करने व नई पहचान देने में डिजिटलीकरण ने भारी योगदान दिया. ‘औनलाइन गेमिंग इन इंडिया 2021’ रिपोर्ट में बताया गया कि भारत का औनलाइन गेमिंग उद्योग जो 2016 में 29 करोड़ डौलर का था वह 2021 तक 1 अरब डौलर तक पहुंच जाएगा. और इस में 19 करोड़ गेम्स शामिल हो जाएंगे. इन यूजर्स में उन लोगों को शामिल किया गया है जो गेम के नाम पर जुआ खेल रहे हैं या फैंटेसी स्पोर्ट के नाम पर उन्हें खिलाया जा रहा है.

वर्ष 2013 में फिक्की ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में यह कहा था कि भारत में गेमिंग इंडस्ट्री से सरकार को लगभग 7,200 करोड़ रुपए का टैक्स प्राप्त होता है. ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितने बड़े स्केल पर आज चल रहा है. औनलाइन रम्मी का प्रचलन पिछले कुछ समय से बढ़ता ही जा रहा है. देश में औनलाइन रम्मी उद्योग के मौजूदा समय में करीब 5 करोड़ खिलाड़ी हैं. और लौकडाउन के दौरान घर में बैठे लोगों के बीच इस का प्रचलन और भी बढ़ा है. फरवरीमार्च में गेमिंग साइट्स और ऐप इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में 24 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस के प्रचलन बढ़ने के साथसाथ बात इस की सेफ्टी पर भी आ गई है. इस साल के अगस्त माह में हैदराबाद कमिश्नर औफ पुलिस और उन की टीम ने ऐसे ही एक बड़े औनलाइन गैंबलिंग घोटाले का भंडाफोड़ किया. पुलिस के अनुसार, पूरे प्रकरण में 1,100 करोड़ रुपए के लेनदेन की बात सामने आई. जिस में पुलिस का कहना था कि कई युवा इस गैंबल घोटाले में अपने लाखों रुपए गंवा चुके हैं. हैरानी वाली बात यह सामने आई कि पुलिस ने कई युवाओं के इस के चलते आत्महत्या करने की बात भी बताई.

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इन मसलों के बाद भारत में सट्टेबाजी और गैंबलिंग को ले कर एक नई बहस छिड़ गई है. यह बहस इसे पूरी तरह से वैधानिकता दिए जाने या इस पर सख्ती से पाबंदी लगाए जाने को ले कर है. इस पूरी बहस में 2 सवाल केंद्रबिंदु बन गए हैं. पहला, क्या इतने पुराने समय से चले आ रहे कानून को बदल कर गैंबलिंग को वैधानिक करने का समय आ गया है? दूसरा, सरकार अगर इस अपराध को रोक नहीं पा रही तो क्या इस के सामने घुटने टेक देना इस का समाधान है? हालांकि, भारत सरकार किसी प्रकार से औनलाइन सट्टेबाजी को ले कर किसी प्रकार का रोडमैप बनाने में फिलहाल असफल रही है, जिस के चलते औनलाइन चलने वाली गैंबलिंग काफी कंफ्यूजन से भरी हुई है. इसे टैक्निकल भाषा में ‘ग्रे एरिया’ कहा जा रहा है. यानी, जिस जगह पर ‘हां और ना’ या ‘काला और सफेद’ दोनों की स्थिति बनी हुई है. जैसा कि देखा सकता है कि एक तरफ कर्नाटक हाईकोर्ट पोकर गेम को ‘गेम और स्किल’ मान रही है, जबकि दूसरी तरफ गुजरात हाईकोर्ट ने इसे ‘गेम औफ चांस’ माना. स्किल-चांस की नैतिकता-अनैतिकता जुआ किसी भी समाज में कभी भी नैतिक तौर पर स्वीकृत नहीं रहा है.

सभ्यताओं के बनने से ही जुआ लोगों को लुभाते जरूर रहे हैं, चाहे इस के उदाहरण महाभारत में पाए गए हों या अन्य धार्मिक ग्रंथों में लेकिन जुए में ‘जर, जोरू और जमीन’ गंवाने की मिसाल सदियों से आज तक कायम है. महाभारत में जुए की लत को बहुत ही सरलता से दर्शाया गया. जब युधिष्ठिर, धर्मराज और सचाई के राजा, ने अपने भाइयों की संपत्ति और पत्नी द्रौपदी सहित सबकुछ जुए में खो दिया. कहने वाले कहते हैं, यही संपत्ति का विवाद आगे चल कर धर्मयुद्ध में कन्वर्ट हुआ, जिसे महाभारत कहा गया. जुआ किसी भी समाज में खेलने वालों के प्रति न्यायिक नहीं रहा. एक की हार से ही दूसरे की जीत संभव है.

हालांकि, इस की नकारात्मकता पर बाद में आया जाएगा लेकिन यह तय है कि यह नैतिक तौर पर समाज द्वारा कभी स्वीकृत नहीं हो पाया. फिर क्या यह प्रश्न बन सकता है कि इसे अब तक अवैध किए जाने के पीछे इस की अवांछनीयता रही है? जी हां, एक पल के लिए कानूनों के वैधअवैध ठहराए जाने में कुछ अपवादों को छोड़ कर 2 बातें देखी जा सकती हैं. पहली, हर अनैतिक कार्य अवैध नहीं. दूसरी, हर अवैध कार्य हो सकता है अनैतिक हो. मसलन, झूठ बोलना अनैतिक है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर मामले में अपराध हो.

जब तक किसी कृति का परिणाम अधिसंख्य लोगों को विपरीत प्रभावित न करे तब तक वह अपराध की श्रेणी में नहीं आता. फिर सवाल यह है कि औनलाइन चाहे औफलाइन गैंबलिंग तो यह बड़े हिस्से को प्रभावित करती है, खासकर इस की जकड़ में युवा अधिक संख्या में हैं, तो फिर वह बिंदु कहां छूट रहा है कि जहां राज्य कहे कि ‘अब बस, आप यह कार्य नहीं कर सकते.’ 2017 में सपोर्ट फैंटेसी ‘ड्रीम 11’ के एक प्लयेर वरुण गुम्बर, जो लगभग 50 हजार रुपए इस खेल (बैटिंग) में गंवा चुका था, ने फैसला किया कि इस मामले को ले कर वह पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में शिकायत दर्ज कराएगा. वरुण ने अपनी पिटीशन में चैलेंज किया कि यह फैंटेसी लीग ‘गेम औफ स्किल’ नहीं है. जिस के बाद जस्टिस अमित रावल की सिंगल जज बैंच ने इस मामले को औब्जर्व करते हुए पाया कि इस में यूजर सपोर्ट की जानकारी के साथ ‘‘पिछले परफौर्मैंस, डाटा, प्लेयर की चल रही फौर्म के आधार पर इस में पैसे लगाता है. जिस के बाद निर्णय लिया गया कि यह ‘गेम औफ स्किल’ के भीतर आने वाली गतिविधि है, और वरुण की कंप्लेंट खारिज कर दी गई.

भारत में औनलाइन फैंटेसी के तौर पर चल रहे गेम्स के लिए यह बहुत बड़ी जीत और टर्निंग पौइंट था. यह पहला मामला था जब किसी कोर्ट ने इस तरह के फैंटेसी लीग वाले खेलों को गेम औफ स्किल में डाला. जिस के बाद ‘ड्रीम 11’ के कोफाउंडर और सीईओ हर्ष जैन ने सैल्फ रेगुलेटेड ‘इंडियन फैडरेशन औफ स्पोर्ट्स गेमिंग’ की इसी साल स्थापना की. इस समय ‘ड्रीम 11’ के लगभग साढ़े 4 करोड़ यूजर्स हैं, जिन में से 15 प्रतिशत यूजर्स पैसों के लिए खेलते हैं. यही यूजर्स हैं जो ड्रीम 11 के लिए रैवेन्यू जनरेट करते हैं.

ज यह कंपनी आईसीसी, द बिग बेश, कैरिबियन सुपर लीग, प्रो कबड्डी, एफआईएच इत्यादि की औफिशियल पार्टनर है. यहां तक कि यह देखा जा सकता है कि कंपनी को अपने प्रचार में एम एस धौनी को एंबैसडर बनाया गया जिस का स्लोगन ‘खेलो दिमाग से’ था. हालांकि, इस के बाद भी वरुण गुम्बर ने अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के लिए एप्रोच किया, जिस के बाद सितंबर माह में सुप्रीम कोर्ट के डिविजनल बैंच के जस्टिस रोहितो और जस्टिस संजय किशन कौल द्वारा इस पिटीशन को खारिज कर दिया गया. वैधअवैध के अपनेअपने तर्क में ‘ग्रे एरिया’ सट्टा बाजार, गैंबलिंग या जुआ को वैधअवैध किए जाने को ले कर काफी समय से बहस चली आ रही है. इस के पक्षविपक्ष में लगातार दलीलें दी जाती रही हैं. दोनों तरफ के लोगों की अपनीअपनी दलीलें हैं. इसे वैधानिक किए जाने वाले जानकारों का कहना है कि यूरोप के कई देशों में सट्टेबाजी के लिए कानून बदले जा चुके हैं. कई देशों ने तो इसे पूरी तरह वैधानिक कर दिया है, जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, कनाडा, इत्यादि. वहीं, कुछ देशों ने कुछ शर्तों के साथ अपने कुछ राज्यों को विशेष छूट दी.

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उदाहरण के तौर पर यूएसए है जहां के ‘लास वेगास’ को जाना ही इसी के लिए जाता है.  इस के पक्ष में जो सब से बड़ा तर्क दिया जा रहा है वह अवैध तरीके से होने वाले इस धंधे की दो नंबरी कमाई है, जिस का कोई हिसाब सरकार के सामने नहीं आ पाता. वहीं, इस के अवैध होने के चलते, टैक्स के दायरे में नहीं आने से सरकार की आय का एक बड़ा स्रोत खत्म हो जाता है.

भारत समेत पूरी दुनिया में गैंबलिंग कारोबार (औनलाइन व औफलाइन) पहले ही काफी ज्यादा ग्रोथ पर था, लेकिन लौकडाउन के बाद इस में तेजी से उछाल आया है. आंकड़ों की मानें, तो भारत के 80 प्रतिशत युवा किसी भी रूप के गैंबलिंग में हर साल में कम से कम एक बार जुड़ जाते हैं. इस का पूरा बाजार लगभग 60 बिलियन डौलर का बताया जा रहा है. फिर ऐसे में सवाल इस की कमाई को ले कर होने लगे हैं, यह पैसा कहां लग रहा है, किसे फेसिलिटेट कर रहा है इत्यादि?  इस में एक तर्क इस के 150 साल पुराने हो चुके कानून को ले कर है. यह कहा जा रहा है कि जिन अंगरेजों ने यह कानून बनाया, उन्होंने इसे अपने देश में रैगुलेट कर लिया है.

साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि इस के रैगुलेट होने और वैधानिक किए जाने से इस पूरे प्रोसैस में पारदर्शिता आएगी. इस पर ईसिस्टम के जरिए नजर रखी जा सकती है और ट्रैक किया जा सकता है. इस में खेलने और खिलाने के लिए नियमावली रखी जाए. किंतु इस के विपक्ष में दी जाने वाली दलीलें भी कई हैं. सरकार अगर इस अपराध को रोकने में असफल है, तो इस कारण इसे लीगल किए जाने वाली दलीलें देश के संविधान पर नकारात्मक असर डालेंगी. संवैधानिक तौर पर इस से मिलतेजुलते अपराधों को भी लीगल करने की बात आएगी, जिन्हें सरकार रोक नहीं पा रही.

यही बात ड्रग्स को लीगल करने को ले कर कही जा रही है. वहीं इस के माध्यम से कालेधन को सफेद करने की वैधानिकता प्राप्त हो जाएगी, जिसे रोजगार कहा जा रहा है. तो फिर इस से कई युवा जुए की खराब लत के शिकार होंगे. ऐसे में क्राइम और सुसाइड की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी होगी. इस से खेल की शुद्धता और सुचिता पर भारी खतरा होने की आशंका होगी. ऐसे ही स्पौट फिक्ंसिंग का उदाहरण हम आईपीएल में पीछे देख चुके हैं. 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस के लीगल-इललीगल पर बहस चली, जिस के बाद विधि आयोग को इस पर एग्जामिन कर अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा गया. यह तब जब लोडा कमेटी ने रिकमैंड किया कि बैटिंग को रैगुलेट किया जाना चाहिए. विधि आयोग ने इस पर अपना स्टैंड लेने के बजाय इसे ‘ग्रे एरिया’ में ही रख दिया, यानी इसे ‘इफ एंड बट’ वाली स्थिति पर छोड़ दिया. इस से होने वाले फायदे और नुकसान गिना कर रिपोर्ट सैंट्रल गवर्नमैंट को सौंप दी गई. फिक्की के स्टेक होल्डर ने भी इस पर अपनी राय रखी.

ऐसे में इस क्षेत्र में कमर्शियल पहलू हावी होने लगे हैं. देशीविदेशी कंपनियों का भी इस में बड़ा रोल देखने को मिल रहा है. चूंकि यह एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है तो बड़े पूंजीपतियों और सरकार दोनों ही इस में अपने फायदे तलाश रहे हैं. जाहिर है, इस में बड़ा आरोप इस बात का लग रहा है कि बदलते स्वरूप में इस के वैधानिक होने की बहस का कारण बड़े पूंजीपतियों और कौर्पोरेटरों का संगठित तौर पर इस में मुनाफे के लिए कूद पड़ना है. कई लोगों का तर्क है कि यह गेमिंग के नाम पर चलाए जाने वाला मात्र जुआ है, जो कानून के लूप होल्स के साथ खेला जा रहा है. फिर इस के विपक्ष में एक तर्क यह भी है कि राज्य सरकार की भूमिका ऐसे मामलों में ‘गार्जियन स्टेट’ की होती है. स्टेट को देखना है कि उस की जनता के लिए यह कितना वांछनीय है अथवा कितना नहीं.

किसी भी कानून को लाने के लिए सरकार का उद्देश्य यह होता है कि वह कानून राज्यवासियों के लिए कितना उपयोगी है. खेलों में भारी सट्टेबाजी से यह जरूर है कि इस का खेलों पर प्रतिकूल ही असर पड़ेगा. 2013 आईपीएल मैचों के दौरान राजस्थान रौयल्स और सीएसके को 2 साल का बैन उठाना पड़ा है. वहीं उन के मालिकों राजकुंद्रा, मय्यापन, एन श्रीनिवासन पर खेल से दूर रहने की आजीवन पाबंदी लगा दी गई. एन श्रीनिवासन को तो अपनी बीसीसीआई की कुरसी तक गंवानी पड़ी, जिस ने खेल की सुचिता पर बड़े प्रश्न खड़े किए हैं. अनप्रोडक्टिव वर्क कल्चर को बढ़ावा जिस बिंदु की तरफ ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा वह इस के अनप्रोडक्टिव वर्क कल्चर के बढ़ावा होने का है. समस्या यह है कि फिलहाल इसे नैतिकअनैतिक की बहस में उलझ कर रखा हुआ है. जबकि, इस तरह के काम किसी भी तरीके से प्रोडक्टिव नहीं हैं. ‘इस की टोपी, उस के सिर’ के बीच अपना कट लेती कंपनी के मुनाफे का यह सारा खेल सदियों से चल रहा है. ऐसे कामों में ज्यादातर मामले बरबाद होने के ही देखे गए हैं.  समस्या इस के गैरउत्पादन काम को ले कर है. समाज में हर तबका किसी न किसी तरीके से खुद के स्वार्थ को पूरा कर, समाज के हितों की पूर्ति करता है.

उदाहरण के तौर पर, फैक्ट्री में काम करने वाला मजदूर अगर कोई कमीज सिलता है तो उस से वह तनख्वाह पाता है, साथ ही, समाज के किसी व्यक्ति के लिए उत्पादन भी करता है. रोड बनाता है तो दिहाड़ी पाता है और समाज के चलने लायक रास्ता तैयार करता है. वहीं, कोई किसान खेती करता है तो खुद के हित के साथ समाज के हित भी पूरे करता है. इसी तौर पर सर्विस से जुड़े कामों में भी यही बात लागू होती है.  लेकिन जुए से जुड़ा धंधा किसी प्रकार से सामाजिक हितों की पूर्ति नहीं करता. यह प्रोडक्टिव वर्क भी नहीं है. रही बात टैक्स कमाने की, सरकार को ऐसे कामों के पीछे छिप कर टैक्स कमाने की मंशा खुद ही सवालिए निशाने पर ले जाती है.

कल को हवाला के पैसों से भी सरकार भारीभरकम टैक्स कमा सकती है. इस से समाज का नवयुवक तबका न सिर्फ जुए की फंतासी में फंस रहा है, बल्कि साथ ही संभवतया भविष्य में उस के वर्क कल्चर के हैबिट में नकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं.  बिना मेहनत शौर्टकट पैसे कमाने की होड़ और उस से हुए नुकसान से क्रिमिनल ऐक्टिविटी में भी बढ़ावा होने का अंदेशा है. ऐसे कई उदाहरण हमारे आसपास देखने को मिल सकते हैं जब लोगों ने सट्टे, जुए के चक्कर में घर, संपत्ति तक गिरवी रखवा दिए. कानून में यह स्किल और चांस का मायाजाल जरूर बुना गया है लेकिन इसे खेलने वाले लोग भी और खिलाने वाले उद्योगपति भी बखूबी जानते होंगे कि वे क्या कर रहे हैं.

Web Series Review : सैंडविच फार एवर

रेटिंगःएक स्टार

निर्माताः इंद्राणी चैधरी

निर्देशकः रोहण सिप्पी

कलाकार- अतुल कुलकर्णी, लुबना सलीम, अहाना कुमरा, कुणाल राय कपूर, जाकिर हुसेन, दिव्या सेठ शाह

अवधि : 28 से 35 मिनट के पंद्रह एपीसोड

ओटीटी प्लेटफार्मः सोनी लिव

शादी के बाद पति व पत्नी की जिंदगी में दोनों के माता पिता की दखलअंदाजी के चलते किस तरह के हास्य के दृश्य पैदा हो सकते है. उसी पर निर्देशक रोहण सिप्पी हास्य प्रधान वेब सीरीज ‘‘सैंडविच फार एवर’ लेकर आए हैं, जो कि आज यानी 25 दिसंबर से स्ट्रीम हो रही है.

कहानीः 

कहानी मुंबई में रह रहे समीर (कुणाल राय कपूर) व नैना (अहना कुमरा) की है, जो कि एक दूसरे से प्रेम करते हैं और अपने माता पिता की रजामंदी से विवाह के बंधन में बंध जाते हैं. नैना के पिता वी के सरनाइक (अतुल कुलकर्णी) कभी सेना में थे, अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं. उनकी मां मंजरी ज्योतिषी (लुबना सली) हैं.जबकि समीर के माता पिता कानपुर में रहते हैं. समीर के पिता डा. गिरजा शास्त्री (जाकिर हुसेन ) अवकाश प्राप्त कर चुके हैं. और उन्हे साठ हजार रूपए पेंशन मिलती है. जबकि समीर की मां संयुक्ता (दिव्या सेठ शाह) हैं. संयुक्ता और डा. गिरजा के बीच हमेशा अनबन बनी रहती है.

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जब वी के सरनाइक को पता चलता है कि उनकी बेटी समीर उससे विवाह करना चाहती है, तो वह समीर को घर पर मिलने बुलाते हैं. समीर बताता है कि वह किराए के मकान में रहते हैं और उनके माता पिता कानपुर मे रहते हैं. होली व दिवाली के अवसर पर दो चार दिन के लिए वह मुंबई आते हैं. उसके पास कोई नौकरी नहीं है. वह वीडियो गेम डेवलपर है. अपनी बेटी नैना की खुशी के लिए वी के सरनाइक अपने पड़ोसी का घर उनके लिए खरीद देते हैं. पर तभी समीर के माता पिता मुंबई आ जाते हैं. और ऐलान कर देते हैं कि वह अपने बेटे समीर व बहू नैना के ही साथ मुंबई मे रहेंगें. पर समीर व नैना दोनों ऐसा नहीं चाहते. तब वी के सरनाइक समीर के माता पिता के लिए भी अपने दूसरे पड़ोसी का फ्लैट खरीदवा देते हैं. इसके बाद हर एपीसोड में समीर व नैना के माता पिता उनकी बेहतरी के लिए कुछ न कुछ करते हैं, जो कि उन्हे पसंद नहीं आता है और हास्य के क्षण पैदा होते हैं.

मसलन, शादी के बाद समीर की मां व नैना के पिता द्वारा उनके घर के लिए फर्नीचर खरीदकर लाना, हनीमून के लिए शिमला जाने के कार्यक्रम में रोड़ा, रद्द, समीर के हाथ से नैना की जीत हुई बैंडमिंटन ट्राफी का टूटना, समीर के पापा का सियापा, डा.गिरजा वी के सरनाइक का शराब पीना और दोष समीर पर लगना, समीर व नैना द्वारा घर काम के लिए पंद्रह हजार रूपए पर कमला को नौकरानी रखना, समीर का नैना के जन्मदिन पर उपहार न लाना, जैसे घटनाक्रमों के माध्मय से हर एपीसोड में हास्य के क्षण पैदा होते हैं.

लेखन व निर्देशन

हास्य के नाम पर घटिया लेखन की मिसाल है यह सिअकाम वाली वेब सीरीज. इसका एक भी दृष्य हंसाने में कामयाब नही होता. पर फूहड़ता परोसी गयी है.किसी भी एपीसोड का एक भी दृष्य ऐसा नही हैं, जिसे देखकर दर्शक को हंसी आए या उसके चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान आ जाए. मगर हर एपीसोड में पृष्ठभूमि में हंसी के फव्वारे व अविश्सनीय दृश्यों को भरकर दर्शकों को हंसाने का असफल प्रयास किया गया है. हर एपीसोड को पांच सात मिनट के बेतरतीब तरीके के छोटे छोटे कामेडी स्टिक में बांटा गया है. हर कलाकार मूखर्तापूर्ण हरकतें करते हुए हंसाने का असफल प्रयास करता रहता है. समीर बेवजह सेक्सी हरकतें करता रहता है. फूहड़ता की सारी हदें हर किरदार पार करता नजर आता है. अफसोस लेखक व निर्देशक ने इस वेब सीरीज के संग कई बेहतरीन कलाकारों को जोड़ा, मगर लेखक व निर्देशक उनका सही उपयोग नही कर पाए.

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अभिनय

कुणाल राय कपूर ने महज अपने आपको इसमें दोहराया है. उनके अभिनय में कोई नवीनता नहीं है. पता नहीं क्यों उन्हे गलत फहमी है कि लोग उनकी उटपटांग व सेक्सी हरकते करते हुए देखना चाहते हैं. नैना के किरदार में अहना कुमरा महज सेक्सी व सुंदर नजर आयी हैं. जबकि उनमें अभिनय प्रतिभा की कमी नही है, मगर वह पता नही क्यों अपनी अभिनय प्रतिभा की बनिस्बत अपनी सेक्सी अदाओं व कम वस्त्र पहनने को ही अहमियत देती हैं. वी के सरनाइक के किरदार में प्रतिभाशाली अभिनेता अतुल कुलकर्णी को देखकर समझ में नहीं आता कि उन्होंने इस वेब सीरीज से जुड़ने का फैसला क्यों किया ? जिन दर्शकों ने कुछ समय पहले वेब सीरीज ‘बंदिश बैंडिट’ में अतुल कुलकर्णी को देखकार उनके अभिनय के कसीदे पढ़ते हुए नहीं थक रहे थे, वह यकीन नही कर पा रहे हैं कि उन्ही अतुल कुलकर्णी ने ऐसा फूहड़ अभिनय किया है. मंजरी के किरदार में लुबना सलीम के हिस्से भी फूहड़ व अविश्वसनीय दृस्य ही आए हैं.

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