Sushant Singh Rajput की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती को यूजर्स ने एक बार फिर किया ट्रोल

बौलीवुड के दिवंगत एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty) रिया चक्रवर्ती की लेटेस्ट फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है.

हाल ही में रिया चक्रवर्ती, रोडीज फेम राजीव लक्ष्मण (Rajiv Lakshman) के साथ पार्टी करती दिखाई दीं. दरअसल इस पार्टी की फोटोज को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है.

 

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बता दें कि सोशल मीडिया पर जैसी ही ये फोटोज सामने आईं तभी कई यूजर्स ने रिया चक्रवर्ती को फिर से ट्रोल करना शुरू कर दिया है.

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लेकिन अब इन फोटोज को सोशल मीडिया से हटा दिया गया है. दरअसल राजीव लक्ष्मण ने रिया के साथ इन फोटोज को शेयर किया था. उन्होंने इन फोटोज को शेयर करते हुए कैप्शन दिया था कि ‘मेरी दोस्त’ लेकिन बाद में उन्होंने सभी फोटो को डिलीट कर दिया.

बता दें कि रिया चक्रवर्ती अपनी दोस्त और वीजे अनुषा दांडेकर (Anusha Dandekar) की बर्थडे पार्टी में गई थीं. राजीव ने फोटोज डिलीट करने के बाद एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने ये कहा कि मुझे लगता है कि मेरी गैर-जिम्मेदाराना पोस्ट की वजह से एक अलग ही मुसीबत खड़ी हो गई है. रिया मेरी पुरानी दोस्त है. और मैं दोबारा उससे मिलकर काफी खुश हुआ. मैं बस यही चाहता हूं कि वो ठीक रहे.

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‘भाभीजी घर पर हैं’ की नई अनीता भाभी ने कहा, इस किरदार से नहीं थी खुश

टीवी का फेमस सीरियल ‘भाबीजी घर पर हैं’ (Bhabiji Ghar Par Hain) में गोरी मेम यानि अनीता भाभी का किरदार  में नेहा पेंडसे (Neha Pendse) नजर आएंगी. इस शो में गोरी मेम के किरदार में सौम्या टंडन (Saumya Tandon) नजर आती थी. और उनके काम को खूब पसंद भी किया गया.

लेकिन अब इस शो में अनिता भाभी  के किरदार में नेहा पेंडसे दिखाई देंगी तो ऐसे में खबर यह आ रही है कि नेहा पेंडसे इस किरदार से खुश नहीं थी. जब उन्हें इस किरदार के बार में बताया गया तो वह बहुत खुश नहीं थीं क्योंकि अनीता भाभी की भूमिका निभाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.

 

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बताया जा रहा है कि नई अनीता भाभी यानि नेहा पेंडसे ने कहा है, जब मुझे एंड टीवी के ‘भाबीजी घर पर है’ में अनीता भाभी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया गया था, तो मैं इस तरह के प्रतिष्ठित किरदार को निभाने के लिए ज्यादा खुश नहीं थी.

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नेहा ने आगे ये भी कहा कि अनीता से सभी प्यार करते हैं और तिवारी जी और विभूति जी के साथ उनकी जो केमिस्ट्री है वो लाजवाब है तो ऐसे में उस किरदार को निभाना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, मगर मैं इस तरह एक कल्ट शो का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित हूं जो छह साल से चल रहा है.

 

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बता दें कि नेहा पेंडसे ने साल 2020 में बिजनेसमैन शार्दुल बस्या से शादी की थी. इस कपल ने पारंपरिक मराठी समारोह में शादी की. शादी की पहली सालगिरह पर, हाल ही में नेहा ने पेंडसे ने एक खूबसूरत तस्वीर शेयर कर अपने पति को विश किया.

इस सीरियल को घर घर में खूब पसंद किया जाता है. बता दें कि गोरी मैम यानी  सौम्या टंडन पांच सालों से इस सीरियल से जुड़ी हुई थी. लेकिन  अगस्त 2020 में उन्होंने इस शो को छोड़ने के फैसला लिया. जिसके बाद  मेकर्स को नई गौरी मैम की तलाश थी.

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बढ़ रहा है कौंट्रैक्ट सैक्स का चलन!

वहां पुलिस का दखल कम होता है, पहचान का खतरा कम होता है, साथ ही साथ किसी भी दूसरे काम के साथ इस को किया जा सकता है.

लाइजिनिंग के धंधे में लगे लोग अपने काम कराने के लिए अब ऐसे गिफ्ट भी देने लगे हैं. यह काम पूरी सावधानी के साथ हो रहा है. ऐस्कोर्ट सर्विस की आड़ में भी ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ को बढ़ावा दिया जा रहा है.

उत्तर प्रदेश में लखनऊ के इंदिरानगर थाना क्षेत्र में लौकडाउन के दौरान सूचना मिली कि पाल गैस्ट हाउस में रोज लड़केलड़कियां आते हैं. कई बार वे लोग रातभर रहते हैं और कई बार 3 से 4 घंटे में ही चले जाते हैं. हर बार नएनए लोग वहां आते हैं.

पुलिस ने गैस्ट हाउस की निगरानी शुरू की. एक दिन पुलिस ने छापा मारा और 4 लड़कियों और 6 लड़कों को पकड़ा. हालांकि पुलिस को उन के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला कि वे किसी तरह के गलत काम में शामिल थे. इस के बाद पुलिस ने थाने ले जा कर निजी मुचलके पर सभी को छोड़ दिया. लड़केलड़कियों ने खुद को दोस्त बताया था. सभी बालिग थे और अपनी मरजी से वहां आए थे.

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के जरीए भले ही सैक्स कारोबार को पुलिस की नजरों से दूर रखने के पुख्ता इंतजाम किए जाते हों, पर पुलिस भी कोई न कोई सुराग लगा ही लेती है.

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कानपुर पुलिस ने कुछ दिन पहले ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ का धंधा करने वालों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया. इन लड़कियों की बुकिंग से ले कर मोबाइल फोन तक की पूरी डीलिंग को रिकौर्ड किया गया.

इस के बाद कानपुर पुलिस ने चकेरी, नौबस्ता और किदवई नगर थाना क्षेत्र के कई महल्लों में छापा मारा. वहां तुर्की की रहने वाली एक लड़की के साथ 20 लोगों को पकड़ा.

पुलिस के मुताबिक, यह धंधा इंटरनैट और मोबाइल फोन पर लड़कियों की बुकिंग के जरीए चलता था. इस रैकेट में कामकाजी औरतें, छात्राएं और विदेशी लड़कियां शामिल थीं. एक लड़की एक रात के लिए कम से कम 25,000 रुपए में बुक होती थी.

पुलिस ने देह धंधे में शामिल इन सभी को देह व्यापार विरोधी कानून ‘पीटा’ के तहत जेल भेज दिया.

पुलिस ने किदवई नगर थाना क्षेत्र के निराला नगर में रतनदीप अपार्टमैंट्स  से शालिनी गुप्ता को पकड़ा. वहां भी  4 और लड़कियां पकड़ी गईं. नौबस्ता थाना क्षेत्र के किराए के मकान से अंजलि को पकड़ा.

लखनऊ के नवल किशोर मार्ग पर ब्यूटी पार्लर में मसाज का काम होता था. पुलिस ने वहां छापा मार कर  4 लड़कियों, 2 ग्राहकों और मसाज पार्लर चलाने वाले  पतिपत्नी को भी पकड़ लिया.

पुलिस ने बताया कि वहां पर मसाज पार्लर चलाने वाले पतिपत्नी लड़कियों को 25,000 रुपए से 40,000 रुपए के पैकेज यानी ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के लिए बुलाते थे. ग्राहक से 5,000 रुपए से 15,000 रुपए तक वसूले जाते थे. सही माने में अपनी मरजी के मुताबिक धंधा करने वालों को पुलिस और कानून के डर से रोका नहीं जा सकता.

देह धंधे का नया रूप

दुनिया का सब से पुराना कारोबार देह का धंधा भी अपने रिवाज बदल रहा है. अब इस धंधे में शामिल होने के लिए न गंदीबदबूदार कोठरियों में रहने की जरूरत है और न अपने समाज को छोड़ कर कालगर्ल बनने की. देह के इस धंधे में अब ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के आधार पर सब किया जा रहा है.

यह कौंट्रैक्ट एक दिन से ले कर एक हफ्ते तक का हो सकता है. देह धंधा करने वाली कौंट्रैक्ट का समय खत्म होते ही इस काम से अलग हो सकती है या फिर नया कौंट्रैक्ट भी कर सकती है.

देह धंधे के इस ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ में न किसी तरह का जोरदबाव है और न ही मजबूरी. नएनए चेहरे और जगह बदलने से पुलिस का डर भी पहले से कम हो गया है. इस नए बदलाव से कीमत भी बढ़ गई है.

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25 साल की प्रिया मुंबई में रहती है. वह यहां पर होटल में काम करती है. यहीं उस की मुलाकात फरदीन से हुई थी. वह उस के साथ ही नौकरी करती थी. कुछ दिनों के बाद वह नौकरी छोड़ कर चली गई. एक साल के बाद होटल में वह गैस्ट बन कर आई थी. प्रिया ने उसे पहचान लिया. दोनों के बीच बातचीत होने लगी. कामकाज और नौकरी की बातचीत में फरदीन ने प्रिया को अपने नए कारोबार के बारे में बताया.

दरअसल, फरदीन देह धंधे से जुड़ गई थी. इस के बाद भी वह इसे देह धंधा नहीं कहती थी. उस ने प्रिया को ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के बारे में बताया. इस में फरदीन महीने के 5 दिन देती थी. वह दिल्ली के एक होटल में काम करती थी. इन 5 दिनों में वह उतना कमा ले रही थी, जितनी उसे 2 महीने की तनख्वाह मिलती थी.

क्या है ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ पूरी तरह से अपनी मरजी पर निर्भर करता है. जो लोग इस तरह का कौंट्रैक्ट करते हैं, वे समय निकलने के बाद कभी भी कोई जोरजबरदस्ती कर के लड़की को रोकना नहीं चाहते हैं.

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ में देह बेचने के बदले तय रकम पहले ही दे दी जाती है. यह रकम लड़की की खूबसूरती, उम्र और बोलचाल पर तय होती है. यह सच है कि कौंट्रैक्ट की रकम देने के बाद कमाने वाले कौंट्रैक्टर अपनी लगाई रकम से ज्यादा कमाना चाहता है. इस के लिए वह लड़की की पूरी तरह से मार्केटिंग करता है. उस की पूरी कोशिश होती है कि लड़की खुश रहे, जिस से उस का ग्राहक पर अच्छा असर पड़े.

दूसरे शब्दों में अगर यह कहें कि देह के इस धंधे ने कारपोरेट शक्ल लेनी शुरू कर दी है, तो कोई गलत बात नहीं होगी.

जानकार लोगों का कहना है कि आमतौर पर 5 दिन से 7 दिन के बीच का कौंट्रैक्ट होता है. वैसे, कम से कम 3 दिन का कौंट्रैक्ट भी हो सकता है.

5 से 7 दिन के ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ में कम से कम लड़की को 30,000 रुपए से 40,000 रुपए तक की कमाई हो जाती है. कौंट्रैक्टर इस से ज्यादा पैसा लड़की से कमा लेता है.

कौंट्रैक्ट की इस मीआद में लड़की अपने कौंट्रैक्टर के पास ही रहती है और उस की बताई जगहों पर जाती है. इस दौरान लड़की को यह हक है कि वह दिन के 8 से 10 घंटे अपने लिए रखती है. इस दौरान वह आराम करती है, खातीपीती है और अपने निजी काम करती है.

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ का यह धंधा खुले नहीं, इसलिए इस को राज रखने के लिए ‘फैमिली टच’ दिया जाता है. सैक्स का कौंट्रैक्ट करने वाली लड़की कौंट्रैक्टर की पत्नी की सहेली बन कर उस के घर में रहती है. जरूरत पड़ने पर ही वह बाहर जाती है.

आसान हो गया काम

ऐसे ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ में आसपास के लोगों को सचाई का पता नहीं चल पाता. अपने काम को छिपाने के लिए ऐसे लोग घर के आसपास रहने वालों से ज्यादा घुलतेमिलते नहीं हैं. ज्यादा लंबे समय तक वे एक जगह न रह कर समयसमय पर अपना ठिकाना बदलते रहते हैं.

कई छोटेबड़े कौंट्रैक्टर एकदूसरे के संपर्क में रहते हैं. जरूरत पड़ने पर वे एकदूसरे से मदद लेते हैं. कई बार अपनी कौंट्रैक्ट की लड़की को दूसरे कौंट्रैक्ट के पास भी भेजते हैं. इन में इन का अपना अलग कमीशन होता है.

जब कभी पुलिस को इन का पता चलता भी है, तो केवल पहली कड़ी ही खुलती है. आगे की कड़ी का पता कोई भी नहीं बताता है. मुसीबत पड़ने पर यही लोग उसे बचाने का काम करते हैं. पुलिस और कचहरी के मामले निबटाने का काम लोकल कौंट्रैक्टर ही करता है.

इस धंधे में तमाम नियमकानून बने हैं, पर किसी भी तरह की लिखापढ़ी नहीं होती. यहां केवल जबान की ही कीमत होती है.

कानपुर में रहने वाले ऐसे ही एक कौंट्रैक्टर का कहना है, ‘‘इस तरह के काम में आसानी यह है कि हमें कहीं भी किसी को रखने के लिए लंबाचौड़ा इंतजाम नहीं करना पड़ता है. अगर किसी ग्राहक को साउथ इंडियन लड़की चाहिए, तो हम अपने संपर्क के जरीए साउथ इंडियन लड़की का इंतजाम कर देते हैं. इसी तरह से हम विदेशी लड़कियों का भी इंतजाम करते हैं.

‘‘विदेशी लड़कियां घूमने की आड़ में 20-25 दिन के लिए आती हैं. उन में से 5 से 10 दिन वे इस काम के लिए भी निकाल लेती हैं. अभी विदेशी लड़कियों की मांग ज्यादा है. लोगों को लगता है कि विदेशी लड़कियां सैक्स में ज्यादा उपयोगी होती हैं.

‘‘इस के उलट कुछ लोग देशी लड़कियों की मांग करते हैं. वे देशी पर स्मार्ट मौडल सी दिखने वाली लड़कियां चाहते हैं. पहले ऐसे लोग अपने शौक को पूरा करने के लिए दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहर या फिर विदेश की यात्रा करते थे, पर अब कौंट्रैक्ट सैक्स के जरीए अपने शहर में ही मुमकिन होने लगा है. ऐसे में अगर कुछ खर्च ज्यादा हो जाए तो भी कोई परेशानी नहीं होती है.’’

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के लिए दिल्ली से लखनऊ आई एक लडकी को उस के कौंट्रैक्टर ने एक अच्छे होटल में ठहराया. वहां पहले वह 3-4 घंटे आराम करती है. इस के बाद वह ग्राहक के पास चली जाती है. ग्राहक तक पहुंचाने के लिए गाड़ी ग्राहक की ओर से ही आती है.

होटल वाले को केवल यह पता होता है कि कोई लड़की घूमने के लिए आई है. कई बार लड़की पूरी रात बाहर न गुजार कर देर रात 10-11 बजे तक अपने होटल वापस चली आती है. दिन में इस तरह के काम करना आसान होता है. पुलिस का खतरा कम होता है.

लड़कियां बताती हैं कि कई बार ग्राहक अपने औफिस या किसी दूसरी सुरक्षित जगह को ही इस्तेमाल कर लेता है. इस में भारीभरकम चारपहिया गाडि़यों का भी सहारा लिया जाता है.

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हौलीडे और कौंट्रैक्ट सैक्स

कौंट्रैक्ट सैक्स का बड़ा इस्तेमाल हौलीडे ट्रिप में होता है. बड़े शहरों में रहने वाले लोग अपने हौलीडे ट्रिप में ऐसी ही लड़कियों को शामिल कर लेते हैं. पर्यटन स्थलों पर वे घूमने के साथसाथ सैक्स का भरपूर मजा लेते हैं. इस में किसी तरह का कोई खतरा भी नहीं रहता है. हौलीडे ट्रिप लगाने के बाद ये लोग लौट आते हैं. लड़की भी अपने घर लौट जाती है.

‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ के राज को बनाए रखने के लिए लड़की को पुराने ग्राहक के पास कम से कम भेजा जाता है. एक तरह से पूरा धंधा राज और समझदारी पर टिका रहता है.

अभी तक जो लोग इस तरह की मौजमस्ती के लिए विदेशों का सफर करते थे, उन के लिए अब कम पैसे में ऐसी सुविधाएं मिलने लगी हैं. हवाईजहाज के सफर ने छुट्टियों को और भी रोमांचक बना दिया है. बड़े शहरों में ऐसे काम करना खतरनाक होने लगा तो लोगों ने छोटेछोटे पर्यटन स्थलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है.

आगरा में शिल्पग्राम के पास बने एक होटल के मालिक बताते हैं, ‘‘ऐक्सप्रैस हाईवे बन जाने के बाद कम समय में लोग शाम को आगरा घूमने के बहाने आ जाते हैं और यहां एक रात होटल में रह कर सुबह वापस दिल्ली पहुंच जाते हैं.’’

मसूरी के क्लार्क टावर के पास बने एक रिसोर्ट के संचालक का कहना है, ‘‘औफ सीजन में यहां के बहुत सारे होटलों का काम ऐसे लोगों से ही चलता है. दिल्ली और आसपास के लोग यहां ऐसी छुट्टियां मनाने के लिए आते हैं.’’

कई बार कुछ विदेशी लड़कियां भी इस रैकेट में शामिल हो जाती हैं. आगरा ही नहीं, बल्कि खजुराहो के कई होटलों में भी इस तरह के काम खुल कर होते हैं. यहां लोग जोड़ों में घूमने के लिए आते हैं, इस के बाद वापस चले जाते हैं.

पर्यटन स्थलों को दूसरे शहरों के मुकाबले महफूज समझा जाता है. लोग एकदूसरे को जानतेपहचानते नहीं, ऐसे में किस के साथ आए हैं, उसे छिपाना आसान हो जाता है. ऐसे में ‘कौंट्रैक्ट सैक्स’ एक आसान उपाय बन कर उभरा है, जो शायद देह धंधे में शामिल लड़कियों को देह धंधे की खामियों से नजात दिलाने में कामयाब हो सकता है. यहां न रैडलाइट एरिया जैसी बंदिशें हैं और न मजबूरियां. ग्राहकों के लिए भी यह सुरक्षित जरीया है. शायद इसी वजह से यह महंगा होने के बाद भी लोकप्रिय हो रहा है.

(पहचान छिपाने के लिए कई लोगों के नाम बदल दिए गए हैं.)

राशनकार्ड: निठल्ले गैंग ने नरेश की बेटियों के साथ किया बलात्कार

राशनकार्ड: पार्ट 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘‘पापा, सब लोग हम को घर में घुस कर देख क्यों रहे हैं? ऐसा लग रहा है, जैसे वे कोई अजूबा देख रहे हों,’’ नरेश की 22 साला बेटी नेहा बेटी ने पूछा.

‘‘वह… दरअसल, आज हम लोग शहर से आने के बाद क्वारंटीन सैंटर में 14 दिन रहने के बाद अपने घर जा रहे हैं न, इसीलिए सब लोग हमें अजीब नजरों से देख रहे हैं,’’ गांव में नरेश ने अपनी बेटी नेहा को बताया.

नरेश पिछले 20 साल से दिल्ली शहर में रह रहा था. अपनी शादी के कुछ दिनों बाद ही वह अपनी पत्नी के साथ शहर चला गया था.

शहर में कोई काम शुरू करने के लिए नरेश के पास रकम तो थी नहीं, बस थोड़ाबहुत पैसा अपने बड़े भाई से मांग कर ले गया था, जो वहां सामान खरीदने में ही खर्च हो गया.

पर नरेश ने हिम्मत नहीं हारी और महल्ले के लोगों की गाडि़यां साफ करने का काम ले लिया. बस एक बालटी, एक पुराना कपड़ा, कार शैंपू और पानी तो कार वालों के यहां मिल ही जाता था.

जैसेजैसे लोगों के पास गाडि़यां  बढ़ीं, वैसेवैसे नरेश का काम भी बढ़ता चला गया और वह ठीकठाक पैसे कमाने लगा.

शहर में ही नरेश की पत्नी ने 2 बेटियों को जन्म दिया और अब तो बड़ी बेटी नेहा 22 साल की हो चली थी और छोटी बेटी 16 साल की.

नेहा के लिए तो लड़के वालों से बातचीत भी हो गई थी और रिश्ता भी पक्का हो गया था, पर इस लौकडाउन ने तो सभी के सपनों पर पानी ही फेर दिया. बहुत सारे मजदूरों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.

माना कि यह संकट कुछ महीनों में चला जाएगा, पर तब तक नरेश के पास इतनी जमापूंजी तो थी नहीं कि वह हालात सामान्य होने का इंतजार कर ले और वैसे भी बहुत से कार मालिकों ने अब नरेश को काम से हटा दिया था.

इस कोरोना काल में नरेश और उस का परिवार जितना सामान साथ ले सकते थे उतना ले आए और बाकी का सामान उन्हें मजबूरी के चलते शहर में ही छोड़ना पड़ गया था. पर मरता क्या न करता, जान बचाने के आगे भला सामान की चिंता कौन करता.

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गांव में नरेश के बड़े भाई राजू का परिवार था. जब नरेश का परिवार गांव में अपने घर के दरवाजे पर पहुंचा तो सिर्फ राजू ही दरवाजे पर खड़ा था. उस ने उंगली के इशारे से ही नरेश और उस के परिवार को वहीं बाहर वाले कमरे में रुक जाने को कहा. उस कमरे में बरसात के दिनों में जानवरों को बांधा जाता था.

नरेश को पहले तो बहुत बुरा लगा, पर बाद में मन मार कर उस ने उसी कमरे को अपना घर बना लिया.

‘‘मैं ने पहले से ही कुछ दिनों का राशनपानी, एक चूल्हा और ईंधन इसी कमरे में रखवा दिया था, ताकि जब तुम लोग आओ तो दिक्कत का सामना न करना पड़े,’’ राजू ने नरेश से कहा.

‘‘हां भैया, बहुत अच्छा किया आप ने,’’ नरेश ने कहा और मन ही मन सोचने लगा, ‘भैया ने तो पानी भी नहीं पूछा और उलटा हम से अछूतों जैसा बरताव कर रहे हैं.’

नरेश रोज सुबह राजू को बैलों की जोड़ी को हांक कर खेत ले जाते देखता, तो उस का भी मन हो आता कि वह भी इस तरह ही खेती करे.

‘‘हां… तो जाते क्यों नहीं… खेती और मकान में हम लोगों का भी तो हिस्सा होगा न,’’ नरेश की पत्नी संध्या  ने कहा.

‘‘हां… होना तो चाहिए… पर इतने बरसों से इस जमीन की देखभाल भैया ही कर रहे हैं, इसलिए पूछने की हिम्मत नहीं हो रही है,’’ नरेश ने संध्या से कहा.

‘‘पर नहीं पूछोगे, तो यहां गांव में क्या करोगे… किस के सहारे 2 बेटियों को ब्याहोगे… और खुद भी क्या  खाओगे भला,’’ संध्या ने नरेश को समझाते हुए कहा.

जब नरेश को उस कमरे में रहते हुए 15 दिन हो गए, तो एक दिन जब राजू खेत की ओर जा रहा, तो नरेश भी वहां पहुंच गया और बोला. ‘‘भैया वहां गांव के बाहर भी हम सैंटर में 14 दिन रुके थे और अब अपने घर के बाहर भी हम 15 दिन तक पड़े रहे हैं… तो क्या अब हम घर के अंदर आ जाएं?’’

‘‘हां… कोई जरूरत हो तो आ जाना. वैसे, उस कमरे में भी कोई दिक्कत तो होगी नहीं तुम को…’’ राजू ने पूछा.

‘‘नहीं भैया… दिक्कत तो कोई नहीं है… साथ ही, मैं यह बात जानना चाह रहा था कि खेती में हमारा भी तो हिस्सा होगा, तो वह भी बता दीजिए, तो हम

भी अपना धंधापानी शुरू कर दें,’’ नरेश ने कहा.

इतना सुनते ही राजू के तेवर बदल गए. वह घर के अंदर गया. थोड़ी ही देर में वापस आ गया और एक कागज नरेश को दिखाते हुए बोला, ‘‘लो… पहचानो इस कागज को… शहर जाते समय जब तुम्हें पैसे की जरूरत थी, तब तुम्हीं ने तो अपने हिस्से का मकान और खेत सब मेरे नाम कर दिया था. देखो, तुम्हारा ही तो अंगूठा लगा है न?’’

यह सुन कर सन्न रह गया था नरेश… उसे आज भी अच्छी तरह याद था कि शहर जाने के लिए जब उसे कुछ पैसे की जरूरत थी, तब उस ने अपने बड़े भाई से पैसे मांगे थे. तब राजू ने यह कह कर उसे पैसे दिए थे कि वह ये पैसे गांव के चौधरी से ले कर आया है और उसे इस पैसे पर एक निश्चित ब्याज हर महीने देना होगा. इसी बात के इकरारनामे पर अंगूठा लगाया था नरेश ने… अपने ही सगे भाई ने लूट लिया था उसे.

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‘‘अरे, यह तो मैं बड़ा भाई होने का फर्ज निभा रहा हूं जो तुम्हें घर में आने भी दिया है, वरना तो तुम लोग बीमारी फैलाने वाले बम से कम नहीं हो इस समय. देख लो गांव में जा कर, कोई पास भी खड़ा हो जाए तो नाम बदल देना मेरा,’’ राजू बोला.

नरेश चुपचाप वहां से लौट गया. नरेश के पास राशन अब खत्म होने को आया था. पत्नी के साथ बातचीत के बाद उस ने सोचा कि क्यों न गांव में बनी दुकान से कुछ राशन उधार ले आऊं, बाद में कुछ काम जम जाएगा, तो लाला का उधार चुकता कर देगा.

‘‘लालाजी, कुछ राशन चाहिए… पर पैसा अभी नहीं दे पाऊंगा… कुछ दिनों बाद काम जमते ही मैं आप को पूरे पैसे दे दूंगा,’’ नरेश ने लाला के पास जा

कर कहा.

‘‘अरे भैया… खुद हमारे पास ही सामान ज्यादा नहीं बचा है और पीछे से भी आवक बंद है. ऐसे में अगर तुम उधार की बात करोगे, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी… उधार तो नहीं दे पाऊंगा अब. जब तुम्हारे पास पैसे हों… तब गल्ला ले जाना आ कर,’’ लाला की बात सुन कर अपना सा मुंह ले कर रह गया था नरेश.

नरेश अब उलझन में पड़ गया  था. बच्चों का पेट तो भरना ही होगा,  पर कैसे?

राशनकार्ड: पार्ट 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

अब नरेश के पास आखिरी चारा था कि कुछ सामान गिरवी रख दिया जाए, जिस के बदले में जो पैसे मिलें उस से राशन खरीद लिया जाए.

जब नरेश ने यह बात संध्या को बताई, तो वह अपने कान की बालियां ले आई और बोली, ‘‘आप इन्हीं को गिरवी रख दीजिए और जो पैसे मिलें उस से सामान खरीद लाइए.’’

कोई चारा न देख नरेश बालियां ले कर गांव के एक पैसे वाले आदमी के पास पहुंचा, जो गांठगिरवी का काम करता था.

‘‘अरे भैया… ये सारे काम तो हम ने बहुत पहले से ही बंद कर रखे हैं. और अब तो सरकार का भी इतना दबाव है, फिर तुम तो शहर से आए हो… तुम्हारे पास से ली हुई किसी भी चीज से बीमारी लगने का ज्यादा खतरा है…

‘‘भाई, तुम से तो हम चाह कर भी कुछ नहीं ले सकते… हमें माफ करना भाई… हम तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाएंगे,’’ उस आदमी के दोटूक शब्द थे.

इधर नरेश गल्ला और पैसे के लिए परेशान हो रहा था, तो उधर उस की पत्नी संध्या और बेटियां एक दूसरी ही तरह की समस्या से जूझ रही थीं.

दरअसल, गांव की लड़कियों के पहनावे और शहर की लड़कियों के पहनावे में बहुत फर्क होता है. शहरों में किसी भी तबके की लड़की के लिए लोअर, टीशर्ट और जींस पहनना आम बात है, पर गांवों में अभी भी लड़कियां सलवारसूट पहनती हैं और ऊपर से दुपट्टा भी डालती हैं. यही फर्क नरेश की बेटियों के लिए परेशानी का सबब बन रहा था. गांव के लड़के तो लड़के, बड़ी उम्र के लोग भी उन्हें अजीब ललचाई नजरों से देखते थे.

एक दिन की बात है. गांव के नजदीक बहने वाली नदी के पानी में एक निठल्ले गैंग के 5 लड़के पैर डाल कर बैठे हुए थे.

‘‘यार, वह जो परिवार दिल्ली से आया है, उस में माल बहुत मस्त है…’’ पहले लड़के ने कहा.

‘‘लड़कियां तो लड़कियां… उन की मां भी बहुत मस्त है,’’ दूसरा लड़का बोला.

‘‘अरे यार, उन लड़कियों से दोस्ती करवा दो मेरी… मैं हमेशा से ही जींस वाली लड़कियों से दोस्ती करना चाहता था…’’ तीसरा लड़का बोला.

‘‘ठीक है भाई… तू उन लड़कियों  से दोस्ती करना और हम लोग… तो करेंगे प्रोग्राम…’’

‘‘नहींनहीं… भाई ऐसी बात भी मन में मत लाना… वे लोग शहर से आए हैं और अगर उन लड़कियों के साथ प्रोग्राम किया, तो हम लोगों को भी कोरोना हो जाएगा,’’ थोड़ी समझदारी दिखाते हुए एक लड़का बोला, जो मोबाइल और इंटरनैट की कुछ जानकारी रखता था.

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‘‘वह तो सब हो जाएगा… सरकार का कहना है कि अगर हम रबड़ के दस्ताने इस्तेमाल करेंगे, तो इंफैक्शन  का खतरा नहीं होगा,’’ पहले वाले ने ज्ञान बघारा.

‘‘अबे तो फिर क्या तू पूरे शरीर में रबड़ पहनेगा?’’ ठहाका मारते हुए एक लड़का बोला.

उस के बाद सब आपस में प्लान बनाने में बिजी हो गए.

नरेश अपनी उधेड़बुन में परेशान चला आ रहा था… उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब शहर से गांव आ कर कैसे गुजारा करेगा, शहर में होता तो कुछ भी काम कर लेता, पर यहां गांव में न तो काम है और न ही कोई किसी भी तरह से मदद करने को तैयार है.

‘‘चाचाजी, नमस्ते.’’

नरेश ने आवाज की दिशा में सिर घुमाया, तो सामने निठल्ले गैंग का हैड खड़ा था.

नरेश जब से गांव में आया था, तब से सब लोगों की अनदेखी ही झेल रहा था, ऐसे में अपने लिए चाचाजी के संबोधन ने उसे बड़ा अच्छा महसूस कराया.

नरेश के होंठों पर एक मुसकराहट दौड़ गई, ‘‘भैया नमस्ते.’’

‘‘अरे चाचा… क्यों परेशान दिख  रहे हैं… कोई समस्या है क्या?’’ वह लड़का बोला.

‘‘भैया… अब क्या बताऊं… वहां की सारी समस्याएं झेल कर परिवार के साथ अपने गांव में पहुंचा हूं, पर यहां भी राशन खत्म हो गया है. न ही कोई पैसे उधार दे रहा है और न ही कोई गल्ला देने को तैयार है,’’ नरेश ने अपनी लाचारी दिखाते हुए कहा.

‘‘अरे तो इस में क्या दिक्कत है चाचा… सरकार की तरफ से सब लोगों को मुफ्त राशन दिया तो जा रहा है,’’ वह लड़का बोला.

‘‘पर भैया… उस के लिए तो राशनकार्ड होना चाहिए… और हमारे पास राशनकार्ड तो है नहीं,’’ नरेश  ने कहा.

‘‘अरे चाचा तो इस में कौन सी बड़ी बात है… रोज दोपहर यहां स्कूल में राशनकार्ड वाले बाबूजी बैठते हैं, जो गांव आए हुए लोगों का राशनकार्ड बनाते हैं… बस, आप को इतना करना है कि पूरे परिवार समेत कल दोपहर स्कूल पर पहुंच जाना. मेरी बाबूजी से अच्छी पहचान है… मैं उन से कह कर आप का कार्ड बनवा दूंगा, और फिर जितना चाहो उतना राशन भी दिलवा दूंगा आप को,’’ निठल्ले गैंग के हैड ने कहा.

अचानक से अपनी समस्याओं का अंत होते देख कर नरेश बहुत खुश हो गया और घर आ कर कल दोपहर होने का इंतजार करने लगा. वह सोचने लगा, ‘एक बार पेट भरने की समस्या का अंत हो जाए, फिर यही गांव के बाजार में कुछ कामधंधा जमाऊंगा. कुछ पैसा बैंक से लोन ले कर, शहर से सामान ले कर बाजार में बेचा करूंगा और फिर भैया का यह कमरा भी छोड़ दूंगा. फिर आराम से अपनी बेटियों का ब्याह करूंगा,’ बस इसी तरह के भविष्य के सपनों में नरेश की आंख लग गई.

अगले दिन 12 बजने से पहले ही नरेश अपनी दोनों बेटियों और पत्नी  को ले कर स्कूल में बाबू से मिलने चलने लगा.

अचानक से रास्ते में निठल्ले गैंग का हैड नरेश के सामने आ गया और नरेश की पत्नी और लड़कियों को घूरते हुए बोला, ‘‘अरे चाचा, वे राशनकार्ड वाले बाबूजी कह रहे थे कि आप सब लोगों का एक पहचानपत्र भी जरूरी है. क्या उस की कौपी लाए हैं आप लोग?’’

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‘‘नहीं भैया… आप ने तो कल ऐसा कुछ बताया ही नहीं था…’’ अपनी नासमझी पर परेशान हो उठा था नरेश.

राशनकार्ड: पार्ट 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘‘अरे चाचा… आप परेशान हो रहे हो… वे देखो सामने मेरी झोंपड़ी है. उस में इन बच्चों को आराम से बिठा देते हैं. और हम और आप चल कर पहचानपत्र ले आते हैं,’’ लड़के ने कहा.

‘‘हां, ठीक?है… ऐसा है संध्या… जब तक हम लोग अपना पहचानपत्र नहीं ले कर आते, तुम वहीं झोंपड़ी में बैठ जाओ,’’ नरेश ने अपनी पत्नी से कहा.

नरेश उस लड़के के साथ वापस हो लिया, जबकि उस की पत्नी संध्या अपनी दोनों बेटियों के साथ झोंपड़ी में चारपाई पर जा बैठीं.

रास्ते में जब नरेश उस लड़के के साथ आ रहा था, तब एक जगह वह लड़का रुका और बोला, ‘‘चाचा, बड़ी गरमी है. सामने ही मेरे दोस्त का घर है. पहले एक गिलास पानी पी लें, फिर चलते हैं.’’

दोनों के सामने बिसकुट और शरबत आया. शरबत पीते ही नरेश का अपने शरीर पर कोई जोर नहीं रहा और उसे बेहोशी आने लगी. वह वहीं गिर गया.

उधर जिस झोंपड़ी में नरेश अपने परिवार को छोड़ कर आया था, वहां पर 3-4 लड़के एकसाथ आ गए.

‘‘वाह भाई… आज तो हम शहरी माल के साथ सटासट करेंगे… चलो पहले कौन है लाइन में,’’ बेशर्मी से निठल्ले गैंग का एक लड़का बोल रहा था.

संध्या को उन लड़कों की नीयत पर शक हो गया और वह बचाव का रास्ता खोजने लगी.

अचानक एक लड़के ने संध्या के सीने को हाथों से भींच लिया, जिसे देख कर दूसरा लड़का हंसने लगा.

‘‘अरे, जब बछिया पास में हो तो… गाय को काहे को परेशान करना…’’

‘‘अरे, तुझे बछिया के साथ मजे लेने हैं, तो उस के साथ ले… मुझे तो यह गाय ही पसंद आ गई है.’’

दूसरे लड़के ने संध्या को चारपाई पर बांध दिया और इसी तरह जबरदस्ती  उस की दोनों बेटियों के भी हाथमुंह बांध दिए गए.

पूरा निठल्ला गैंग इस परिवार पर टूट पड़ा और लड़के बलात्कार करने में जुट गए, इतने में वहां गैंग का हैड भी आ गया.

‘‘अरे, अकेले ही सब माल मत खा जाना… मेरे लिए भी छोड़ देना.’’

‘‘अरे, लो यार… आज तो 3-3 हैं. जिस के साथ चाहो, उस के साथ  मजे करो.’’

और उस निठल्ले गैंग के पांचों लड़कों ने बारीबारी से और बारबार संध्या और उस की बेटियों का बलात्कार किया और इतना ही नहीं, बल्कि जो लड़का इंटरनैट की जानकारी रखता था, उस ने अपने मोबाइल से अश्लील वीडियो भी शूट किया और जी भर जाने के बाद वहां से भाग गए.

कुछ ही देर में संध्या का सबकुछ लुट चुका था. आज उस के ही सामने उस की बेटियों और उस का बलात्कार हो गया. उसे और कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह पागल सी हो रही थी. अचानक उस ने अपनी दोनों बेटियों को साथ लिया और गांव के नजदीक बहने वाली नदी में छलांग लगा दी.

इधर जब नरेश होश में आया, तो दौड़ कर उस झोंपड़ी में पहुंचा. पर, वहां के हालात तो कुछ और ही बयान कर रहे थे. अब भी उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उस का परिवार कहां चला गया.

तभी नरेश की नजर अंदर बैठे हुए निठल्ले गैंग के लड़कों पर पड़ी, जिन पर मस्ती का नशा अब भी चढ़ा हुआ था. वह उन की ओर लपका.

‘‘ऐ भैया… हम अपनी पत्नी और बेटियों को यहीं छोड़ कर गए थे… अब कहां हैं वे सब… कुछ समझ नहीं आ रहा है हम को.’’

‘‘ओह… तो तू होश में आ गया… ले यह मोबाइल में देख ले और समझ ले कि तेरे बच्चे कहां हैं,’’ उस मोबाइल वाले लड़के ने मोबाइल पर बलात्कार का वीडियो नरेश की आंखों के सामने कर दिया.

अपनी बेटियों और पत्नी का एकसाथ बलात्कार होते देख नरेश का खून खौल गया. उस ने कोने में रखी लाठी उठाई और उन लड़कों पर हमला कर दिया. एक तो नरेश पर नशे का असर अब भी था, ऊपर से वे जवान  5 लड़के.

उन लड़कों ने नरेश के हाथों से लाठी छीन ली और तब तक मारा जब तक वह मर नहीं गया.

इस कोरोना संकट और गांव पलायन ने नरेश की मेहनत से बनाए हुए सपनों के छोटेमोटे घोंसले को बरबाद कर दिया था.

नरेश और उस का पूरा परिवार अब खत्म हो चुका था. अब उसे न तो घर की जरूरत थी, न पैसे की, न नौकरी की, न ही राशन की और न ही राशनकार्ड की…

Crime Story: माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

पूर्वांचल की जमीन को बाहुबलियों की जमीन के नाम से जाना जाता है. ऐसा लगता है कि इस जमीन पर माफिया सरगनाओं की फसल उगती है. सब से

बड़ी बात यह है कि अपराध से शुरू हुआ इन माफिया सरगनाओं का सफर एक दिन पुलिस की गोली खा कर खत्म होता है. लेकिन ऐसे सरगनाओं की भी एक बड़ी फेहरिस्त है, जो अपने इसी बाहुबल के सहारे सियासत की ऊंचाइयों तक पहुंच गए.

पूर्वांचल की धरती पर कई माफियाओं का जन्म हुआ है. कुछ माफिया तो ऐसे हैं, जिन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. राजनीति के गलियारों में इन की धमक अकसर सुनाई देती रहती है. इन माफियाओं ने प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी आतंक का खूनी खेल खेला.

अपराध की संगीन वारदातों को अंजाम दे कर पूर्वांचल की धरती दहलाने वाले इन्हीं माफिया में एक नाम है बृजेश सिंह का, जिन्होंने जुर्म की दुनिया को दहलाने के बाद अब सियासत में अपनी जमीन तैयार कर ली है. लेकिन राजनीति का लबादा ओढ़ने के बाद भी बृजेश सिंह के ऊपर जेल में रह कर रंगदारी वसूलने, ठेके पर हत्या कराने और टेंडर सिंडीकेट चलाने के आरोप लगते रहे हैं.

बृजेश सिंह की कहानी किसी फिल्म की स्टोरी से कम नहीं है. वह एक ऐसा माफिया सरगना रहा, जिस का आतंक उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी देखा  जाता था.

बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह का जन्म वाराणसी के धरहरा गांव में एक संपन्न परिवार में हुआ था. उस के पिता रविंद्र सिंह इलाके के रसूखदार लोगों में गिने जाते थे. सियासी तौर पर भी उन का रुतबा कम नहीं था और इलाकाई राजनीति में सक्रिय रहते थे. बृजेश सिंह बचपन से ही पढ़ाईलिखाई में काफी होनहार था.

सन 1984 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में उस ने बहुत अच्छे अंक हासिल किए थे. उस के बाद बृजेश ने बनारस के यूपी कालेज से बीएससी की पढ़ाई की. वहां भी उस का नाम होनहार छात्रों की श्रेणी में आता था.

बृजेश सिंह के पिता रविंद्र सिंह को अपने होनहार बेटे से काफी लगाव था और इसीलिए वह चाहते थे कि बृजेश पढ़लिख कर अच्छा इंसान बने. समाज में उस का नाम हो.

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. 27 अगस्त, 1984 को वाराणसी के धौरहरा गांव में बृजेश के पिता रविंद्र सिंह की इलाके की राजनीति की रंजिश में हत्या कर दी गई. इस काम को उन के सियासी विरोधी हरिहर सिंह और पांचू सिंह ने साथियों के साथ मिल कर अंजाम दिया था.

राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में पिता की मौत ने बृजेश सिंह के मन में बदले की भावना को जन्म दे दिया. इसी भावना के चलते बृजेश ने जानेअनजाने में अपराध की दुनिया में अपना कदम बढ़ा दिया.

बृजेश सिंह अपने पिता की हत्या का बदला लेने लिए तड़प रहा था. उस ने बदला लेने के लिए एक साल तक इंतजार किया. आखिर वह दिन आ ही गया, जिस का बृजेश को इंतजार था. 27 मई, 1985 को रविंद्र सिंह का हत्यारा बृजेश के सामने आ गया. उसे देखते ही बृजेश का खून खौल उठा और उस ने दिनदहाड़े अपने पिता के हत्यारे हरिहर सिंह को मौत के घाट उतार दिया.

बदले की आग ने बदला जीवन

यह पहला मौका था जब बृजेश के खिलाफ थाने में मामला दर्ज हुआ. लेकिन वारदात के बाद बृजेश सिंह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा बल्कि फरार हो गया. क्योंकि उस का इंतकाम अभी पूरा नहीं हुआ था.

हरिहर को मौत के घाट उतारने के बाद भी बृजेश सिंह का गुस्सा शांत नहीं हुआ, उसे उन लोगों की भी तलाश थी, जो उस के पिता की हत्या में हरिहर के साथ शामिल थे. जल्द ही उसे अपना बदला लेने का मौका मिल गया.

9 अप्रैल, 1986 को चंदौली जिले का सिकरौरा गांव तब गोलियों की आवाज से गूंज उठा, जब बृजेश सिंह ने अपने साथियों के साथ पिता रविंद्र सिंह की हत्या में शामिल रहे गांव के पूर्वप्रधान रामचंद्र यादव सहित उन के परिवार के 6 लोगों को एक साथ गोलियों से भून डाला.

इस वारदात को अंजाम देने के बाद बृजेश सिंह पहली बार गिरफ्तार हुआ. दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में बृजेश पर 32 साल तक मुकदमा चला.

इसे बृजेश का बाहुबल और राजनीतिक रसूख ही मान सकते हैं कि इस घटना में चश्मदीद गवाह होने के बावजूद स्थानीय अदालत ने 32 साल बाद 2018 में गवाहों के बयानों को विरोधाभासी बताते हुए बृजेश को बरी कर दिया.

बहरहाल, पिता के हत्यारों को मौत की नींद सुलाने के बाद जब बृजेश सिंह सलाखों के पीछे पहुंचा तो यहीं से उस की जिंदगी की दिशा और दशा बदल गई.

कहते हैं जेल की सलाखों के पीछे एक ऐसी पाठशाला होती है, जहां इंसान की जिंदगी एक नया मोड़ लेती है. जो कैदी यहां आ कर अपने गुनाह का प्रायश्चित करना चाहता है, वह सुधर जाता है. और जिस कैदी की मंजिल अपराध की डगर पर आगे बढ़ने की होती है, वह जेल की सलाखों के पीछे अपराध के नए गुर सीखने और नए साथी बनाने में जुट जाता है.

अगले भाग में पढ़ें- बृजेश का मुख्तार अंसारी से हुआ सामना

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

गिरफ्तारी के बाद बृजेश जब वाराणसी जेल पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव के त्रिभुवन सिंह से हुई. त्रिभुवन सिंह हिस्ट्रीशीटर अपराधी था. बृजेश के हौसलों को देखते हुए त्रिभुवन ने उस से दोस्ती कर ली.

त्रिभुवन सिंह भी अपने भाई व पिता की हत्या का बदला लेने के लिए जरायम की दुनिया में उतरा था. इसीलिए दोनों की दोस्ती हो गई और दोस्ती का एक कारण यह भी था कि दोनों ही ठाकुर समुदाय से थे. कुछ लोग बृजेश के साथ थे तो कुछ त्रिभुवन के साथ. दोनों ने हाथ मिलाया तो जेल से निकलने के बाद साथ मिल कर काम करने लगे.

त्रिभुवन की मंजिल जहां पैसा और शोहरत कमाना था तो बृजेश ने समूचे पूर्वांचल में अपना सिक्का जमा कर अकूत दौलत कमाने का ख्वाब पाल लिया था.

अपराध की दुनिया में एक कहावत यह भी है कि इस दुनिया में ख्वाब उन्हीं के पूरे होते हैं जिन के हौसले और हिम्मत बुलंद होते हैं. बृजेश और त्रिभुवन सिंह की दोस्ती जल्द ही रंग लाने लगी, क्योंकि दोनों के ही हौसले और हिम्मत बुलंद थे. धीरेधीरे इन का गैंग पूर्वांचल में सक्रिय होने लगा.

दोनों ने मिल कर यूपी में शराब, रेशम और कोयले के धंधे में अपने पांव जमाने शुरू कर दिए. दोनों ने अपने बाहुबल से पहले छोटेमोटे काम शुरू किए फिर बड़ेबड़े काम करने लगे.

बृजेश का मुख्तार अंसारी से हुआ सामना

इसी बीच, 1990 के दशक में बृजेश सिंह ने धनबाद के पास झरिया का रुख किया. वह धनबाद के बाहुबली विधायक और कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह के कारोबार की देखभाल करने के लिए उन के शूटर की तरह काम करने लगा. सूर्यदेव सिंह के इशारे पर बृजेश सिंह ने हत्या की 6 वारदातों को अंजाम दिया.

अपने कारनामों और कोयले के काले कारोबार के कारण बृजेश सिंह की दुश्मनी का दायरा भी लगातार बढ़ता जा रहा था. असली खेल तब शुरू हुआ, जब बृजेश सिंह और माफिया डौन मुख्तार अंसारी कोयले की ठेकेदारी को ले कर आमनेसामने आ गए. मुख्तार अंसारी ने शुरुआत में चेतावनी दे कर कोयले के धंधे से दूर रहने की चेतावनी दी. लेकिन बृजेश सिंह को अपने बाहुबल और हौसले पर कुछ ज्यादा ही गुमान हो चला था.

बृजेश ने बाहुबली माफिया डौन मुख्तार अंसारी की ताकत आंकने में गलती कर दी. क्योंकि बृजेश को उस वक्त इस बात का आभास नहीं था कि राजनीतिक तौर पर मुख्तार अंसारी कितना मजबूत है. ठेकेदारी और कोयले के कारोबार को ले कर दोनों गैंगों के बीच कई बार गोलीबारी हुई. दोनों तरफ से जानमाल का नुकसान भी हुआ.

मुख्तार अंसारी के प्रभाव की वजह से बृजेश पर पुलिस और नेताओं का दबाव बढ़ने लगा. बृजेश के लिए कानूनी तौर पर काफी दिक्कतें पैदा होने लगी थीं.

जिस ने भी ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ फिल्म देखी होगी, उसे पता होगा कि ठीक उसी खतरनाक तरीके से काम करने वाले गैंग्स 2009-10 के दौर में बनारस, मऊ, गाजीपुर और जौनपुर में पूर्वांचल की राजनीति पर हावी थे.

ये वो दौर था जब मुख्तार अंसारी का कारवां निकलता था तो लाइन से एक साथ 15-20 एसयूवी गाडियां गुजरती थीं. दिलचस्प बात यह होती थी कि सारी गाडि़यों के नंबर 786 से खत्म होते थे. किसी की क्या मजाल कि पूरे शहर का भारी ट्रैफिक उन्हें 2 मिनट भी रोक सके. इन इलाकों में पान, चाय की दुकान पर बैठे चचा लोग बता देंगे कि मुख्तार अंसारी जब चलता था, तो बौडीगार्ड समेत अपने पूरे गैंग में सब से लंबा दिख जाता था.

दरअसल, पूरा पूर्वांचल मुख्तार अंसारी के खानदान की हिस्ट्री से वाकिफ था. क्योंकि मुख्तार के दादाजी मुख्तार अहमद अंसारी कभी कांग्रेस पार्टी के प्रेसिडेंट रह चुके थे. इन के भाई अफजाल 4 बार कम्युनिस्ट पार्टी से एमएलए रह चुके हैं और एक बार समाजवादी पार्टी से. मुख्तार के अब्बा और दादाजी स्वतंत्रता सेनानी भी रह चुके थे. साथ ही चाचा और दादाजी नेहरू, सुभाषचंद्र बोस और गांधीजी के भी काफी करीब थे.

चाचा हामिद अंसारी अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के वीसी और देश के उपराष्ट्रपति बने थे. अब बात बृजेश सिंह की करते हैं.

अगले भाग में पढ़ें- बृजेश को मिला राजनैतिक संरक्षण

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