माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

सन 2002 में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी के बीच कोयले की ठेकेदारी को ले कर भयानक गोलीबारी और लड़ाई हुई, जिस में मुख्तार गैंग के 3 लोग मारे गए और खुद बृजेश सिंह भी जख्मी हो गया. इस लड़ाई के बाद बृजेश सिंह के मरने की अफवाह फैल गई. इस खबर को लोगों ने सच भी मान लिया, क्योंकि महीनों तक किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई और ब्रजेश को किसी ने नहीं देखा.

बृजेश के मरने की खबर ने मुख्तार गैंग को और ज्यादा ताकतवर बना दिया और फिर से चौतरफा उस का वर्चस्व हो गया.

2002 में अचानक कई महीनों बाद बृजेश तब सामने आया जब उत्तर प्रदेश में चले रहे चुनाव में गाजीपुर से बीजेपी के उम्मीदवार कृष्णानंद राय मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी के खिलाफ जबरदस्त तरीके से ताल ठोंक रहे थे.

बृजेश को मिला राजनैतिक संरक्षण

बृजेश सिंह एकाएक सामने आया और कृष्णानंद राय को समर्थन दे कर लोगों से उन के पक्ष में मतदान की अपील की. वास्तविकता तो यह थी कि बृजेश को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत थी. कृष्णानंद राय यूपी से ले कर केंद्र की सियासत तक में जबरदस्त रसूख रखने वाले नेता थे.

इसी राजनीतिक संरक्षण के लिए बृजेश ने कृष्णानंद राय से हाथ मिला कर उन्हें चुनाव में अपना समर्थन दिया था. फलस्वरूप बृजेश की अपील पर इलाके की ठाकुर लौबी राय के पक्ष में खड़ी हो गई.

इस चुनाव में कृष्णानंद राय ने मुख्तार के भाई को हरा दिया. इस के बाद तो हालात ये हो गए कि अब गाजीपुर-मऊ इलाके में पूरी राजनीति हिंदू-मुसलिम के बीच बंट गई. जिस कारण इलाके में सांप्रदायिक लड़ाइयां होने लगीं. ऐसे ही एक मामले में मुख्तार गिरफ्तार हो गया.

मुख्तार अंसारी बृजेश की चोट से अकसर लगातार कमजोर हो रहा था. इसीलिए बृजेश का काला कारोबार संभालने वाले कई लोग मुख्तार गैंग के निशाने पर आ गए. बृजेश का राइट हैंड कहे जाने वाला अजय खलनायक भी उन में से एक था. जिस पर मुख्तार अंसारी ने जानलेवा हमला करा दिया.

मुख्तार अंसारी किसी भी हाल में बृजेश को कमजोर करना चाहता था, इसीलिए उस ने बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की दिनदहाड़े हत्या करवा दी. सतीश की हत्या से पूरा पूर्वांचल दहल गया और इलाके के लोगों में खौफ पैदा हो गया.

सतीश की हत्या को उस वक्त अंजाम दिया गया, जब वह वाराणसी के चौबेपुर में एक दुकान पर चाय पी रहा था. उसी वक्त बाइक पर सवार हो कर पहुंचे 4 लोगों ने उस पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं. जिस की वजह से उस की मौके पर ही मौत हो गई थी.

मुख्तार के साथ चल रही गैंगवार के बीच अपराध जगत में माफिया डौन बन चुका बृजेश सिंह धीरेधीरे अपना कारोबार भी बढ़ाता जा रहा था. पूर्वांचल के साथ उस ने पश्चिम बंगाल, मुंबई, बिहार, और उड़ीसा में अपना ठेकेदारी व शराब कारोबार का जाल फैला दिया था. हालांकि बृजेश तब तक इतना बड़ा अपराधी बन चुका था कि वह अधिकांशत: भूमिगत ही रहता था.

इसी दौर में एक गैंग और तेजी से उभर रहा था, जो त्रिभुवन सिंह के पिता के हत्यारोपी मकनू सिंह और साधू सिंह का गैंग था. बृजेश सिंह के साथी त्रिभुवन सिंह का भाई हैडकांस्टेबल राजेंद्र सिंह वाराणसी पुलिस लाइन में तैनात था. अक्तूबर, 1988 में साधू सिंह ने कांस्टेबल राजेंद्र को मौत की नींद सुला दिया. जिस के बाद हत्या के इस मामले में कैंट थाने पर साधू सिंह के अलावा मुख्तार अंसारी और गाजीपुर निवासी भीम सिंह को भी नामजद किया गया.

त्रिभुवन के भाई की हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह ने पुलिस वाला बन कर गाजीपुर के एक अस्पताल में इलाज करा रहे साधू सिंह को गोलियों से भून डाला. इसी कारण बृजेश का गिरोह उस वक्त इस हत्याकांड की वजह से पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया.

अगलेे भाग में पढ़ें- यूपी सरकार ने रखा ईनाम

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 5

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

बृजेश सिंह का राजनीतिक रसूख और धमक ही कहेंगे कि पिछले 12 साल में उस पर लगे सारे मुकदमे तेजी से हो रही सुनवाई के बाद हटते जा रहे हैं. ज्यादातर मामलों में उस के खिलाफ गवाही देने वाले मुकर गए या कुछ में पुलिस की कमजोर पैरवी और सबूत की कमजोरी के कारण एक के बाद एक मामले तेजी से खत्म होते जा रहे हैं.

चंद छोटे मामलों को छोड़ दें तो उस के खिलाफ चल रहे अधिकांश गंभीर और बड़े मामले अब खत्म हो चुके हैं. कुछ छोटे मामलों की सुनवाई भी अपने अंतिम चरण में है.

लेकिन इस के बावजूद बृजेश सिंह अभी जेल से बाहर नहीं आना चाहता क्योंकि मुख्तार गैंग से दुश्मनी के कारण जान का खतरा अभी भी बरकरार है.

बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी भले ही सलाखों के पीछे हों, लेकिन दोनों की दुश्मनी अभी खत्म नहीं हुई है. दोनों ही अपने भविष्य के लिए एकदूसरे का खात्मा चाहते हैं.

सन 2015 में बृजेश सिंह की एमएलसी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और भतीजे विधायक सुशील सिंह ने आरोप लगाया था कि मुख्तार अंसारी ने सेंट्रल जेल में लंबू शर्मा नाम के व्यक्ति को भेज कर बृजेश सिंह की जेल में ही हत्या कराने की साजिश रची थी.

इस के 3 दिन पहले भी बादशाह नाम के व्यक्ति को बनारस सेंट्रल जेल में बृजेश सिंह से मिलने के लिए भेजा गया था.  हालांकि इस मामले में बृजेश सिंह के परिजनों की शिकायत के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया था.

बृजेश सिंह के बारे में कहा जाता है कि सियासत में एंट्री के लिए ही उस ने खुद को दिल्ली पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवाया था. एक अपराधी भले ही कितना भी ताकतवर और रसूख वाला क्यों न हो, लेकिन अंतत: उस का अंत बुरा ही होता है. इसीलिए बृजेश सिंह ने बहुत पहले ही माफिया से माननीय बन कर अपने जीवन को नई दिशा देने की योजना पर काम शुरू कर दिया था.

माफिया से बना माननीय

हालांकि सियासत बृजेश सिंह के खून में रचीबसी थी. स्वर्गवासी पिता खुद इलाके में राजनीति करते थे. भले ही बृजेश का आपराधिक इतिहास उस के पूर्वांचल के बाहुबली होने की छवि की पुष्टि करता है, लेकिन इस के साथ अगर राजनीति में उस के दखल की ओर देखें तो वाराणसी-चंदौली में उस के परिवार का पुराना राजनीतिक प्रभाव साफ नजर आता है.

वाराणसी की एमएलसी सीट पर बृजेश और उस का परिवार पिछली 4 बार से जीतता आ रहा है. पहले 2 बार बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह इस क्षेत्र से एमएलसी रहे. बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल का 2018 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था. चुलबुल सिंह को पंचायत चुनावों का चाणक्य माना जाता था.

पूर्वांचल की राजनीति के जानकार मानते हैं कि चुलबुल सिंह ही वह शख्स थे, जिन्होंने पूरे परिवार का राजनीतिक रसूख कायम किया और पूर्वांचल के तमाम बाहुबली क्षत्रिय नेता इस परिवार के संपर्क में आए. उन्हीं की राजनीतिक धमक के कारण सियासत से बृजेश सिंह को जीवनदान मिलता रहा.

चुलबुल सिंह के लंबे समय तक बीमार रहने के कारण बाद में बृजेश की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह और उस के बाद मार्च 2016 में खुद बृजेश सिंह वाराणसी से एमएलसी बन कर राज्य की विधानसभा में दाखिल हो गया.

निर्दलीय चुनाव लड़ने के बावजूद उस ने रिकौर्ड मतों से जीत हासिल की थी. जिस के बाद माफिया से माननीय बनने का उस का सपना साकार हो चुका है. बृजेश सिंह ने एमएलसी बनने के बाद जब विधानसभा पहुंच कर एमएलसी पद की शपथ ली थी तो राजा भैया, धनंजय सिंह जैसे यूपी के कई क्षत्रिय बाहुबली नेता उस की वेलकम पार्टी में मौजूद थे.

सन 2017 में बृजेश सिंह भारतीय समाज पार्टी से सैयदराजा विधानसभा सीट (चंदौली) से चुनावी समर में उतरा, लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा था.

फिलहाल जेल में बंद बृजेश के परिवार के औपचारिक राजनीतिक चेहरे के तौर पर पहचाने जाने वाले उस के भतीजे सुशील सिंह लगातार तीसरी बार चंदौली से विधायक चुने जा चुके हैं. कभी कृष्णानंद राय से ले कर राजनाथ सिंह जैसे भाजपा नेताओं के करीबी माने जाने वाले बृजेश के भतीजे सुशील भी अब औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

लेकिन राजनीति से इतर जो बात बृजेश को दूसरे बाहुबलियों से अलग करती है वह है अपराध के साथसाथ लगभग फिल्मी तरीके से फैला उस के व्यापार का सिंडिकेट.

पूर्वांचल के साथसाथ बिहार, झारखंड और मुंबई तक फैले बृजेश के व्यापारिक कनेक्शन उसे आर्थिक तौर पर पूर्वांचल के सब से मजबूत माफिया नेताओं में से एक बनाते हैं.

बृजेश ने अपना व्यापार लोहे के स्क्रैप से शुरू किया था. उस के बाद उस ने पहले कोयले के धंधे में पांव जमाया और फिर आजमगढ़ से शराब का व्यापार शुरू किया. बलिया, भदोही, बनारस से ले कर झारखंड, छत्तीसगढ़ तक अपने धंधे को फैलाया. इस के बाद वह जमीन और रियल एस्टेट में आया और अब उस का रेत के खनन का व्यापार भी चल रहा है.

अकसर मीडिया में ऐसी खबरें आती रहती हैं कि बृजेश सिंह वाराणसी सेंट्रल जेल में मिलने के लिए आने वाले मुलाकातियों से मिलने के लिए दरबार लगाता है.

पूर्वांचल के लोगों में इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में बृजेश सिंह अपने दामन पर लगे अपराध के दागों से मुक्ति पा कर सांसद बनने और लोकसभा में जाने की लालसा पाले हुए है. क्योंकि ऐसा होगा तभी बृजेश सिंह का समूचे पूर्वांचल पर कब्जा और अपने कारोबार को बढ़ाने का सपना साकार होगा.

माफिया से माननीय बनने का खूनी सफर: भाग 4

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- सुनील वर्मा

लेकिन बृजेश सिंह ने जब मुंबई के जेजे अस्पताल में एक बड़ा गोलीकांड किया तो वह पूर्वाचंल के सब से खतरनाक माफिया डौन के रूप में स्थापित हो गया.

दरअसल, सितंबर 1992 की एक रात 20 से ज्यादा लोग डाक्टर के लिबास में अचानक बंबई (मुंबई) के जेजे अस्पताल के वार्ड नंबर 18 में घुस आए और बिस्तर पर लेटे शैलेश हलदरकर को गोलियों से छलनी कर दिया. हलदरकर बंबई के अरुण गवली गैंग का सदस्य था और उस की हत्या दाऊद इब्राहीम के रिश्तेदार इस्माइल पारकर की हत्या का बदला लेने के लिए उसी के इशारे पर की गई थी.

इस घटना में वार्ड की पहरेदारी कर रहे मुंबई पुलिस के 2 हवलदार भी मारे गए थे. जेजे अस्पताल शूटआउट में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल कर 500 से ज्यादा गोलियां चलाई गई थीं.

यह सवाल जेहन में उठना लाजिमी है कि पूर्वांचल का एक डौन आखिर मुंबई कैसे पहुंचा और उस की दोस्ती आज एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी के रूप में कुख्यात दाऊद इब्राहीम से कैसे हो गई.

दाऊद से हुई दोस्ती

हुआ यूं कि 90 के दशक में जब बृजेश सिंह मुख्तार अंसारी के गैंग पर हमले के बाद छिपता फिर रहा था तो वह पुलिस और मुख्तार के गैंग से बचने के लिए मुंबई चला गया. मुंबई में उस की दाऊद के करीबी सुभाष ठाकुर से मुलाकात हुई. सुभाष के माध्यम से वह दाऊद से मिला. दाऊद के जीजा इब्राहिम कासकर की हत्या हो चुकी थी. दाऊद उस का बदला लेने के लिए कसमसा रहा था. उस ने सुभाष ठाकुर को इस की सुपारी दे दी.

इसी काम के लिए बृजेश का गैंग सुभाष ठाकुर व उस के साथियों के साथ 12 फरवरी, 1992 को डाक्टर बन कर जेजे अस्पताल पहुंचा, जहां डाक्टर बन कर उन्होंने पुलिस पहरे के बीच गवली गैंग के शैलेश हलदरकर समेत वहां तैनात पुलिसकर्मियों को मार दिया.

बृजेश की इस शातिराना चाल को देख कर दाऊद बृजेश के दिमाग का लोहा मान गया. इस के बाद दोनों बेहद करीब आ गए.

लेकिन 1993 में हुए मुंबई बम ब्लास्ट के बाद बृजेश के दाऊद से मतभेद हो गए. बृजेश सिंह मुंबई को दहलाने की दाऊद की योजना से पूरी तरह अनजान था. इस ब्लास्ट में हजारों बेगुनाह मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए.

इस वारदात से बृजेश सिंह को गहरा आघात लगा. दाऊद के इस कदम के बाद दोनों के बीच एक दीवार खड़ी हो गई. माना जाता है कि इसके बाद दोनों एकदूसरे के दुश्मन बन गए.

हालांकि मुंबई ब्लास्ट के पहले ही दाऊद ने देश छोड़ दिया था, लेकिन बृजेश दाऊद को मारने का प्लान बनाने लगा. जिस के लिए उस ने कई बार भेष बदल कर दाऊद तक पहुंचने की कोशिश भी की, लेकिन अपने मनसूबे में सफल नहीं हो पाया.

इस घटना के बाद बृजेश को ‘देशभक्त डौन’, ‘हिंदू डौन’ और पूरब का रौबिनहुड के नाम से जाना जाने लगा.

बहरहाल जेजे हौस्पिटल शूटआउट में कई लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन बृजेश फरार हो गया. अलबत्ता उस पर टाडा के तहत मुकदमा चला और सितंबर 2008 में सबूतों की कमी के कारण छूट गया. लेकिन इस मामले ने बृजेश को पूर्वांचल के एक गैंगस्टर से पूरे देश में एक बड़े डौन के तौर पर स्थापित कर दिया.

बृजेश सिंह पर अब तक चल रहे बड़े मुकदमों में 2001 का गाजीपुर का उसरी चट्टी कांड भी गिना जाता है. इस मामले में बृजेश और मुख्तार की सीधी गैंगवार में 2 लोगों की हत्या हुई थी, जिस में मुख्तार अंसारी घायल हो गया था. घटना के बाद बृजेश के खिलाफ मुकदमा लिखवाते हुए मुख्तार ने उस की गाडि़यों के काफिले पर अचानक हमला करने, उस के गनर की हत्या करने का आरोप लगाया था. इस घटना के बाद बृजेश काफी साल तक फरार रहा.

इसी बीच 2003 में बृजेश सिंह का नाम बिहार के कोल माफिया सूर्यदेव सिंह के बेटे राजीव रंजन सिंह के अपहरण और हत्याकांड में बतौर मास्टरमाइंड सामने आया.

बृजेश सिंह एक के बाद एक जघन्य हत्याकांड और रंगदारी वसूलने के कारण इतना कुख्यात हो चुका था कि कई राज्यों की पुलिस उस के पीछे पड़ चुकी थी. हालांकि इस बीच बृजेश भेष बदल कर इस राज्य से उस राज्य में छिप कर रहता रहा और वहीं से अपने गिरोह के संपर्क में रह कर अपने काले धंधों को संचालित करता रहा.

कई बार जब लंबे समय तक उस की गतिविधियां सुनाई नहीं पड़तीं तो यह भी अफवाह उड़ती कि उस की मौत हो चुकी है. लेकिन जल्द ही उस के अगले कारनामे से उन अफवाहों पर धूल पड़ जाती थी.

यूपी सरकार ने रखा ईनाम

सूर्यदेव सिंह के बेटे के अपहरण व हत्या के मामले में फरारी के बाद बृजेश लंबे समय तक उड़ीसा के भुवनेश्वर में अरुण कुमार बन कर रहा. बृजेश सिंह के आपराधिक इतिहास को देखते हुए तत्कालीन यूपी सरकार ने उस की गिरफ्तारी या सुराग बताने वाले के लिए 5 लाख रुपए का ईनाम घोषित कर दिया था.

दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल भी लंबे समय से उस की गिरफ्तारी के प्रयास में लगी थी. स्पैशल सेल को सन 2008 में बृजेश के भेष बदल कर भुवनेश्वर में छिपे होने की जानकारी मिल गई. यहीं से स्पैशल सेल ने उसे गिरफ्तार किया. जिस के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस बृजेश सिंह को उस के खिलाफ दर्ज मामलों में सुनवाई के लिए यूपी ले गई

जहां से अलगअलग अदालतों में उस की पेशी होती रही.

दिलचस्प बात यह है कि बृजेश की गिरफ्तारी के एक साल बाद सन 2009 में उस के गिरोह की कमान संभालने वाले त्रिभुवन सिंह ने भी एसटीएफ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उस के ऊपर भी 5 लाख का ईनाम था.

वैसे इस बात की हमेशा चर्चा रही कि बृजेश का राजनीतिक रसूख इतना बढ़ चुका था कि उस के भीतर अपराध की राह छोड़ कर राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा जोर मारने लगी थी. इसी कारण दिल्ली पुलिस के जरिए उस की गिरफ्तारी को प्रायोजित कहा जाने लगा.

कहा जाता है कि बडे़ से बड़ा अपराध करने के बाद भी बृजेश सिंह केवल इसलिए पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ता था, क्योंकि वह हाईप्रोफाइल हो कर भी लो प्रोफाइल बन कर रहता था. मीडिया से बात नहीं करता था और मोबाइल फोन व सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करता था.

अपने 3 दशक लंबे आपराधिक जीवन में 30 से ज्यादा संगीन आपराधिक मुकदमों में नामजद बृजेश सिंह पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल औफ आर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट), टाडा (टेररिस्ट ऐंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज ऐक्ट) और गैंगस्टर एक्ट के अलावा हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश रचने से ले कर, दंगाबवाल भड़काने, सरकारी कर्मचारी को इरादतन चोट पहुंचाने, झूठे सरकारी कागजात बनवाने, जबरन वसूली करने और धोखाधड़ी से जमीन हड़पने तक के मुकदमे लग चुके थे.

अगले भाग में पढ़ेंमाफिया से बना माननीय

‘बालिका वधू’ की आनंदी ने बिकनी में दिखाया अपना हौट अंदाज, देखें Photos

‘बालिका वधू’ की आनंदी यानि अविका गौर सोशल मीडिया पर दिनों काफी एक्टिव हैं. अब उन्होंने सोशल मीडिया पर फैंस के साथ हौट अंदाज शेयर किया है. जो काफी वायरल हो रहा है.

हाल ही में अविका गौर ने वेट लौस किया है. उन्होंने वेकेशन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. इन तस्वीरों में अविका गौर का  हौट अंदाज कातिलाना लग रहा है.

 

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बता दें कि अविका ने इस तस्वीर को शेयर करते हुए कैप्शन में कुछ नहीं लिखा है. इस पोस्ट के साथ उन्होंने केवल सनफ्लावर फूल की इमोजी बनाई है.

ये भी पढ़ें- Nora Fatehi करीना कपूर के बेटे तैमूर अली से करना चाहती हैं शादी

 

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कुछ टाइम पहले ही अविका ने अपने इंस्टाग्राम पर अपने वेट लौस की कहानी बताई थी. उन्होंने कहा कि मुझे याद है, करीब साल भर पहले एक रात मैं खुद को आईने में देखकर रो पड़ी. मैं जैसी भी दिख रही थी, मुझे अच्छा नहीं लग रहा था.

अविका ने कहा- मोटी बांह, पैर, और थुलथुल पेट. मैंने काफी नजरअंदाज कर दिया था. यह मेरी किसी बीमारी से हुआ होता तो चलता. क्योंकि तब यह मेरे कंट्रोल से बाहर की बात होती लेकिन ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं कभी भी और कुछ भी खाती थी.

आनंदी ने बताया कि खाती तो थी ही पर मैं कभी वर्कआउट भी नहीं करती थी. हमारे शरीर को अच्छी देखभाल की जरूरत होती है लेकिन मैंने कभी इसकी कद्र नहीं की. नतीजा ये हुआ कि जैसी मैं दिखने लगी वह मुझे अच्छा नहीं लग रहा था.

‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की पुरानी सोनू का हौट अंदाज

यहां तक कि मैं डांस वगैरह भी बिल्कुल इंजाय नहीं करती थी. अविका ने ये बातें बताते हुए यह भी कहा कि मैं खुद को ही जज करने में लगी रहती और खुद में बुरा फील करती रहती. उन्होंने बताया कि बाहर वालों के कुछ कहने के लिए वह मौका ही नहीं छोड़ती थी.

सरकारी अस्‍पतालों में बेटियों का जन्‍मदिन मनाएगी योगी सरकार

उत्‍तर प्रदेश में पहली बार महिलाओं व बेटियों के लिए शुरू किए गए इस वृहद अभियान से उनमें उत्‍साह देखने को मिल रहा है. आधी आबादी को सशक्‍त बनाने के सरकारी प्रयास जमीनी स्‍तर पर रंग ला रहे हैं. प्रदेश की महिलाओं व बेटियों को इस अभियान से न सिर्फ सरकारी योजनाओं की जानकारी मिल रही है बल्कि उनको इन योजनाओं का लाभ भी सीधे तौर पर मिल र‍हा है.

इस दिशा में एक सकारात्‍मक कदम उठाते हुए 22 जनवरी को सरकारी अस्‍पतालों में जन्‍म लेने वाली बेटियों का जन्‍मदिवस मनाए जाने का फैसला लिया गया है जिसके तहत योगी सरकार की ओर से मां व बेटी को उपहार भी दिए जाएंगे.

 गुड्डा- गुड्डी बोर्ड

मिशन शक्ति के तहत बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ मुहिम को बढ़ावा देते हुए यूपी के जनपदों में एक जनवरी से 20 जनवरी तक जन्‍म लेने वाली बेटियों की संख्‍या के बराबर वृक्षारोपण का कार्य भी किया जाएगा. बता दें कि इन वृक्षों के संरक्षण का दायित्‍व पुरूषों को सौंपा जाएगा. बालिकाओं के निम्‍न लिंगानुपात वाले ब्‍लॉकों की सभी ग्राम सभाओं से डिजिटल एनालॉग गुड्डा-गुड्डी बोर्ड की शुरूआत की जाएगी. इसका क्रियान्‍वन करते हुए समस्‍त ग्राम पंचायतों में छह माह के अंदर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के साथ-साथ ग्राम पंचायत विकास योजनाओं में भी इसे शामिल किया जाएगा.

उत्‍तर प्रदेश में लगेगी प्रशासन की पाठशाला

प्रदेश में बेटियों के मनोबल को बढ़ाने के लिए अभियान के जरिए प्रशासन की पाठशला कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा. जिसके तहत उन बालिकाओं और महिलाओं की काउंसलिंग की जाएगी जो विभिन्‍न प्रशासनिक सेवाओं जैसे पुलिस, फौज, एयरफोर्स समेत मेडिकल, इंजीनियरिंग व उद्योग जगत में आगे बढ़ने का सपना देख रहीं हैं. कार्यक्रम में जिलाधि‍कारियों व उच्‍चधिकारियों द्वारा ऑफलाइन व ऑनलाइन कैरियर काउंसलिंग शिविरों का आयोजन कर उनकी काउंसलिंग की जाएगी.

हक की बात जिलाधिकारी के साथ

मिशन शक्ति अभियान के तहत हक की बात जिलाधिकारी के साथ कार्यक्रम का आयोजन प्रदेश स्‍तर पर 24 फरवरी को किया जाएगा. इस बार जिलाधिकारी किशोरियों व महिलाओं से दो घंटें तक संवाद स्थापित कर यौन शोषण, लैंगिक असमानता, घरेलू हिंसा, कन्‍या भ्रूण हत्‍या, कार्यस्‍थल पर लैगिंक हिंसा और दहेज उत्‍पीड़न जैसे मुद्दों पर बात करेंगे. इन मुद्दों पर महिलाओं व बेटियों को संरक्षण, सुरक्षा, सुझाव और सहायता भी देंगें. उत्‍तर प्रदेश के सभी जनपदों के जिलाधिकारी वेबिनार, चौपालों, ऑनलाइन बैठक और वीडियो कान्‍फ्रेंसिंग के जरिए किशोरियों व महिलाओं से रूबरू होगें.

Nora Fatehi करीना कपूर के बेटे तैमूर अली से करना चाहती हैं शादी

बौलीवुड एक्ट्रेस नोरा फतेही, तैमूर अली खान से शादी करना चाहती है. जी हां, ये बात खुद नोरा फतेही ने कहा है.  करीना कपूर खान (Kareena Kapoor Khan) के बेटे तैमूर अली खान (Taimur Ali Khan) से नोरा फतेही ने शादी करने की बात कही है.

दरअसल करीना कपूर खान के चैट शो What Women Want पर नोरा फतेही ने कहा कि वह तैमूर अली खान से शादी करना चाहती हैं. और वो तैमूर के बड़े होने तक वो इंतजार करेंगी.

‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की पुरानी सोनू का हौट अंदाज देखकर यूजर्स ने दिया ये रिएक्शन

नोरा के इस बात पर करीना कपूर खान हैरान हो गई. उन्होंने कहा कि ‘तैमूर अली खान अभी तो सिर्फ 4 साल का ही है. अभी तो काफी लंबा वक्त है. करीना के इस बात पर नोरा फतेही ने कहा,  कोई बात नहीं.. मैं इंतजार करूंगी.

नोरा ने आगे कहा कि मै आशा करती हूं कि जब तैमूर बड़े हो जाएंगे तो हम बीच सगाई या शादी के बारे में सोच सकते हैं. सोशल मीडिया पर तैमूर की फोटोज और वीडियो को काफी ट्रेंड किया जाता है.

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करीना ने चैट शो के दौरान बताया कि वह और उनके पति सैफ अली खान (Saif Ali Khan)  नोरा फतेही के डांस मूव्स के बहुत बड़े फैन हैं. नोरा ने इसके लिए करीना को शुक्रिया कहा. आपको बता दें कि सैफ अली खान और करीना कपूर खान का बेटा तैमूर पैदा होने के बाद से ही पापराज़ी का पसंदीदा रहा है.

वर्कफ्रंट की बात करें तो नोरा फतेही को आखिरी बार रेमो डिसूजा की फिल्म स्ट्रीट डांसर 3 में नजर आई थी. यह फिल्म जनवरी 2020 में रिलीज हुई थी.

मूंछ: दारा और रिनी की शादी के बदले मिली मौत

Serial Story: मूंछ पार्ट 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

दारा नाम था उस का. लंबा शरीर और चौड़ा सीना. देखने में ऐसा लगता था मानो अभी अखाड़े से आ रहा हो. चेहरे पर हमेशा एक मुसकराहट बनी रहती थी.

दारा की मां बचपन में मर गई थीं. गांव में बाबूजी ही बचे थे. वे ग्राम प्रधान का ट्रैक्टर चलाते थे, पर हमेशा यही चाहते थे कि उन का लड़का दारा पुलिस में सिपाही हो जाए, तो सारे गांव का ही नाम रोशन हो जाए और… फिर तो प्रधान भी उन्हें घुड़की नहीं दे पाएगा और उन का जितना भी पैसा दबा कर रखा है, वह सब सूद समेत वापस कर देगा.

पर बेटा गांव में रह जाता तो वह भी मजदूर बन कर ही रह जाता, इसलिए दारा जैसे ही 10 साल का हुआ, वैसे ही उस के बाबूजी ने उसे शहर में उस के मामा के पास भेज दिया और उन से ताकीद की कि हर महीने खर्चापानी उन के पास आता रहेगा. वे बस इतना करें कि दारा को पढ़ालिखा कर किसी तरह पुलिस में भरती करा दें.

दारा के मामा एक ईंटभट्ठे पर काम करते थे. उन्होंने दारा से खूब मेहनत भी कराई थी और उसे यह भी अहसास करा दिया था कि अगर वह दौड़ में आगे रहेगा, तो पुलिस में भरती हो पाएगा, क्योंकि पुलिस में भरती होने के लिए दौड़ पक्की होनी चाहिए, इसलिए दारा खूब दौड़ लगाता, जिम में जा कर पसीना भी बहाता. भरती की प्रक्रिया में भाग भी लिया, पर इस बेरोजगारी के दौर में सरकारी नौकरी पाना इतना आसान नहीं था.

दारा 20 साल को हो चुका था. वह पुलिस में भरती नहीं हो सका, तो अपनी जीविका चलाने के लिए उस ने एक मौल में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर ली.

यह नौकरी भी दारा को इसलिए मिल पाई थी, क्योंकि उस का शरीर लंबाचौड़ा तो था ही, साथ ही उस की लंबीलंबी तलवारकट मूछें उसे और भी रोबीला बनाती थीं.

वैसे तो आजकल शहरों में सभी नौजवानों में दाढ़ीमूंछ बढ़ाने का शौक चला हुआ था, पर दारा को तो मूंछें बड़ी रखने का शौक था और इस के लिए वह बहुत मेहनत भी करता था. बड़ी मूंछों को शैंपू करना और तेलक्रीम लगा कर उन्हें चमकीली बनाए रखना और अपनी मूंछों को सही रखने के लिए पूरे 5 किलोमीटर दूर एक खास सैलून में  जाया करता था.

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मौल में नौकरी मिलना भी खुशी की बात थी. 12 घंटे काम करना था. काम क्या था, बस मौल के अंदरबाहर आतेजाते लोगों पर नजर रखो और साफसुथरी वरदी पहन कर खड़े रहो. 2 बार चाय भी मिलती थी मुफ्त में.

दारा मौल के बाहर खड़ा हो कर पूरी निगरानी रखता और मौल के काउंटर पर रहने वाली एक लड़की रिनी को अपनी प्यारभरी नजरों से घूरा करता.

अगर गोरा होना ही खूबसूरती है, तो वह लड़की बहुत खूबसूरत थी, लंबा शरीर, पतली कमर और कंधे तक झूलते हुए बाल. रिनी डियो का इस्तेमाल खूब करती थी और अपने पीछे खुशबू का एक झोंका छोड़ जाती.

रिनी जब भी मौल में घुसती, तो दारा उस के बदन की खुशबू लेने के लिए बेताब रहता और उस के आटोरिकशा से उतरते ही उसे देख कर तन कर खड़ा हो जाता और रिनी भी उसे देख कर मुसकरा देती.

मौल के गेट पर खड़े दारा के 2 ही पसंदीदा काम थे, एक तो रिनी को ताकते रहना और दूसरा अपनी तलवारकट बड़ी और घनी मूंछों पर ताव देते रहना. दारा की ये बड़ी मूंछें उसे लोगों में एक अलग ही पहचान दिलाती थीं.

‘मौल में रिनी हर आने वाले ग्राहक का बिल काटते हुए मुसकराते हुए बात करती?है, जैसे वह उस का सगा वाला ही हो. शायद यह उस के काम की मजबूरी भी हो सकती है… जैसे मेरा मन भी बैठने को करता है, पर एक सिक्योरिटी गार्ड को तो तन कर खड़ा रहना पड़ता है… घंटों तक… अरे, यह नौकरी तो पुलिस की नौकरी से भी मुश्किल है.’

‘अकसर खड़ेखड़े अपनेआप से बातें किया करता था दारा.

‘वह तो भला हो मौल में आने वाले परिवारों और उन के साथ आए छोटे बच्चों का… कितनी खुशी से आ कर पूरे मौल में घूमतेफिरते हैं… और पूरा मौल ही खरीद डालने की कोशिश में रहते हैं… मेरी शादी होगी तो मैं भी कम से कम 5 बच्चे पैदा करूंगा और उन के लिए खूब सामान खरीदा करूंगा…’

‘‘शादी हो गई है क्या तुम्हारी?’’ चाय देने आए लड़के ने दारा की तंद्रा तोड़ते  हुए पूछा.

‘‘शादी… अभी तो नहीं.’’

‘‘अरे, फिर इतना काहे खोएखोए हो… खुश भी रहो… मजा लो  जिंदगी का.’’

और उस दिन वास्तव में दारा को जिंदगी का मजा मिल ही गया, जब मौल बंद होने के बाद रिनी ने दारा से उसे उस के घर तक छोड़ आने को कहा.

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‘‘दरअसल… दारा, जब मैं अपने महल्ले में पहुंचती हूं, तब वहां नुक्कड़ पर कुछ आवारा लड़के खड़े रहते हैं जो  मुझे छेड़ते हैं, इसलिए मैं चाहती हूं  कि तुम मेरे साथ चलो तो मैं महफूज महसूस करूंगी.’’

रिनी की इस गुजारिश को दारा नहीं टाल सका, क्योंकि जहां किसी लड़की की हिफाजत होती, वहां दारा किसी बौडीगार्ड की तरह अपना किरदार निभाने से पीछे नहीं हटता था.

एक आटोरिकशा को रोक कर दोनों उस में सवार हो गए. दारा रिनी की खुशबू को अपने जेहन में महसूस कर सकता था, कनखियों से रिनी को देख रहा था.

शहर के कई इलाकों से गुजरता हुआ आटोरिकशा रिनी के घर की तरफ जा रहा था, रिनी जाति से ईसाई थी और उस के पापा ने मां से तलाक ले लिया था. उस की मां ने ही उसे पालपोस कर बड़ा किया है. घर में वह एकलौती कमाने वाली है और अब मां बीमार रहती हैं, इसलिए मां की सारी जिम्मेदारी उसी पर है. यह सारी जानकारी रिनी ने दारा को रास्ते में दी.

दारा ने भी उसे अपने बारे में बताया कि उस की मां तो इस दुनिया में नहीं हैं, गांव में सिर्फ उस के बाबूजी ही रहते हैं.

‘‘अरे वाह, आज तुम से बातों में पता ही नहीं चला कि रास्ता कब खत्म हो गया और अब आ गए हो तो चाय पी कर ही जाना,’’ रिनी ने कहा.

Serial Story: मूंछ पार्ट 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

रिनी की इस बात को दारा टाल नहीं सका और वह उस के साथ उस के घर चला गया.

रिनी के घर में एक ही छोटा सा कमरा था. एक कोने में रिनी की बीमार मां लेटी हुई थीं. दारा ने उन्हें नमस्ते किया और उन का हालचाल पूछा.

पहले तो रिनी की मां की आंखों में दारा की तलवारकट मूंछों को देख कर कई सवाल आए, पर जब रिनी ने बताया कि दारा भी उस के साथ ही काम करता है, तो उन की आंखों में निश्चिंतता के भाव आए.

दारा एक बार रिनी के घर क्या गया, फिर तो दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगीं. रिनी दारा के लिए अच्छा खाना बना कर लाती, तो कभी दारा अपना लंच भी रिनी के साथ शेयर करता.

एक दिन दारा रिनी के लिए बाटीचोखा बना कर लाया, जो उस ने अपने मामा से बनाना सीखा था.रिनी अपनी उंगलियां चाटती रह  गई थी.

‘‘अरे, कैसे बना लिया तुम ने इतना टेस्टी खाना… मुझे भी इस की रेसिपी जाननी है,’’ रिनी ने चहकते हुए कहा.

‘‘क्या है मैडम कि इस को बनाने में कई छोटीछोटी चीजों की जरूरत पड़ती है और अगर आप को सच में ही इसे बनाना सीखना है, तो आप को इसे बनता

हुआ देखना होगा और उस के लिए आप को हमारे घर चलना होगा और तब ही आप इस को बनाना सीख पाएंगी.’’

दारा पहले से ही रिनी का यकीन जीत चुका था, इसलिए रिनी को उस के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई.

एक दिन काम के बाद दोनों आटोरिकशा में बैठ कर दारा के घर की तरफ निकल लिए, पर रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई और पूरे रास्ते बारिश होती रही.

दारा के घर की गली के अंदर आटोरिकशा का जाना मुमकिन नहीं था, इसलिए दोनों वहीं उतर गए. कुछ दूरी पर ही दारा का कमरा था. चूंकि बारिश अभी तेज थी और रुकने के कोई आसार नहीं नजर आ रहे थे, इसलिए दारा और रिनी ने पैदल चलना जारी रखा और भीगते हुए वे दोनों दारा के कमरे पर पहुंच गए.

कमरे पर पहुंचने के बाद दारा ने रिनी को सिर पोंछने के लिए तौलिया दिया. रिनी अपने बालों को झटक कर पोंछने लगी, उस का गोरा बदन पानी में भीगने के बाद और भी चमक उठा था. रिनी जब तौलिए को अपने बदन पर रगड़ती, तो जवान दारा का मन मचल उठता.

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दारा ने उपलों की आग जलाई और हाथ सेंकने लगा. रिनी भी उस के पास आ कर बैठ गई. उस की खुशबू दारा को मदहोश कर रही थी, फिर भी उस ने बाटी बनाने की तैयारी शुरू कर दी. इतने में रिनी को पता नहीं क्या सूझा कि उस ने दारा का हाथ पकड़ लिया.

‘‘पता है दारा… मुझे तुम्हारे जैसे मर्द की तलाश थी, जो शरीर से मजबूत होने के साथसाथ मेरा ध्यान रखने वाला भी हो,’’ रिनी एक ही सांस में मन की बात कह गई थी.

रिनी की छुअन ने दारा के जवान जिस्म में आग लगा दी. उस ने रिनी को बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. दोनों अमरबेल की लता की तरह एकदूसरे से लिपट गए. बाहर उपलों की आग तेजी से जल रही थी और 2 जवान दिल अपने दिलों की आग को बुझाने में लगे हुए थे.

एक बार दोनों के बीच शर्म की दीवार गिरी, फिर तो दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध बने, जिस का नतीजा यह हुआ कि रिनी पेट से हो गई.

‘‘सुनो दारा… अब हमें शादी कर लेनी चाहिए, क्योंकि मैं पेट से हो गई हूं.’’

उस की ये बात सुन कर दारा थोड़ा चौंक गया, क्योंकि अभी तक तो उस ने शादी के बारे में सोचा नहीं था और फिर गांव में बाबूजी दूसरे धर्म की लड़की से शादी की इजाजत तो कभी नहीं देंगे और दारा का घूमनाफिरना भले ही रिनी जैसे मौडर्न लड़की के साथ हो, पर अपने जीवनसाथी के तौर पर तो दारा ने गांव की सीधीसादी लड़की के बारे में ही सोचा था.

‘‘पर, मैं तुम से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं दूसरी जाति का हूं और मेरे गांव में तुम से शादी की इजाजत कभी नहीं मिलेगी,’’ दारा ने कहा.

उस की यह बात सुन कर रिनी को बहुत दुख हुआ. वह परेशान हो उठी.

‘‘तो यह तुम ने मेरे शरीर को छूने से पहले क्यों नहीं सोचा था. तुम्हारी वे जातिवादी बातें तब कहां चली गई थीं, जब मेरे होेंठों से अपने होंठों को जोड़ते थे तुम… मैं तुम्हारे बच्चे को ले कर कहां जाऊं?’’ गुस्से में थी रिनी.

ऐसा नहीं था कि दारा रिनी को प्यार नहीं करता था, पर दूसरे धर्म की रिनी से शादी करने की बात बाबूजी को बता कर वह उन के मन पर कुठाराघात नहीं करना चाहता था.

रिनी ने तो दारा से प्यार किया था और उस के प्यार की निशानी उस के पेट में बच्चे के रूप में पल रही थी, आजकल शहर में महिला सशक्तीकरण पर बहुत जोर दिया जा रहा था, जिसे देख और सुन कर रिनी ने भी अपने साथ हुए सुलूक को ले कर आवाज उठानी चाही और वह ‘करीम भाई’ नाम के एक आदमी से जा कर मिली.

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ऐसे तो करीम भाई एक छोटेमोटे नेता थे, पर उन पर कई मर्डर के भी आरोप थे और उन की इमेज एक आपराधिक रिकौर्ड वाले दबंग नेता की भी थी, जो गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करने से पीछे नहीं हटता था.

करीम भाई ने रिनी को पूरी मदद करने का भरोसा दिया और दारा को अपने ठिकाने पर बुलाया और समझाया. पहले तो दारा की लंबी तलवारकट मूंछों की बहुत तारीफ की और फिर बाद में उसे समझाया कि किसी लड़की को प्यार में धोखा देना अच्छी बात नहीं है, इसलिए वह चुपचाप रिनी से शादी कर ले, नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा.

करीम भाई की छिपी हुई धमकी को दारा अच्छी तरह समझ गया था. वह शादी करने को राजी तो हुआ, पर उस नेअपने बाबूजी को इस शादी की सूचना नहीं देने का फैसला किया और दोनों ने चर्च में जा कर शादी कर ली.

Serial Story: मूंछ पार्ट 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

शादी के बाद दारा और रिनी खुश थे, रिनी ने मौल की जौब छोड़ दी और घर में ही रहने लगी. एक बेहतर भविष्य के सपने उस की आंखों में तैर रहे थे.

अभी उन की शादी हुए 15 दिन ही हुए थे कि दारा के पास उस के गांव के प्रधान का फोन आया. उन्होंने बताया कि दारा के बाबूजी की मौत हो गई है.

दारा यह खबर सुन कर परेशान हो उठा. गांव जा कर उसे बाबूजी की अंत्येष्टि करनी होगी और उस के बाद पता नहीं वहां कितना समय लग जाए, यह सोच कर आननफानन में वह रिनी को अपने साथ ले कर गांव की तरफ रवाना हो गया.

दारा का गांव शहर से तकरीबन 400 किलोमीटर दूर था. वह शाम को चला था, तो गांव पहुंचते उसे अगला दिन हो गया.

बस से उतर कर रिनी और दारा गांव तक पहुंचाने वाली सड़क पर तेजी से बढ़ने लगे. गांव के कुछ निठल्ले लड़के, जो अपनेआप को पूरे गांव का ठेकेदार समझते थे, उन्होंने जब एक नई शहरी लड़की को गांव में देखा. तो उस पर फिकरे कसने लगे. उन में से एक, जो सब का मुखिया लग रहा था, वह बोला, ‘‘दोस्तो, यह रसभरी तो अभी पूरी तरह पकी नहीं है… बड़ी गदर है… इस का रस चूसने में बड़ा मजा आएगा.’’

रिनी सन्न रह गई थी. दारा ने यह सुना, तो उस का माथा ठनक गया था. उस की मुट्ठियां भिंच गईं, पर रिनी ने मौके की नजाकत देख कर दारा को अपनी तरफ खींचा और आगे की ओर चलने लगी.

रिनी उन लोगों के भद्दे कमैंट्स पर ध्यान न कर के सिर झुकाए दारा का हाथ पकड़ कर चलती रही.

‘‘अरे, बड़ी जल्दी है तुम लोगों को गांव में जाने की… अरे ओए… तुम्हीं लोगों से कह रहे हैं… ओ तलवारकट मूंछ वाले… जरा बताते तो जाओ… कहां जा रहे हो? किस के यहां जा रहे हो?’’ एक निठल्ले ने पूछा.

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‘‘जी, हमारे पिता का नाम पूरनलाल है और उन का स्वर्गवास हो गया है… हम उन की क्रिया के लिए गांव में आए हैं,’’ दुखी मन से सीधा जवाब दिया दारा ने. इतना कह कर दारा और रिनी वहां से चल दिए.

‘‘अरे… यह पूरनवा का लौंडा है… शहर जा कर कैसा गबरू हो गया है. साला मूंछ तो हम ठाकुरों जैसी रखा है… शहर में नौकरी कर के अपनी औकात भूल गया है… कोई बात नहीं… हम इस को इस की असली औकात बताते हैं,’’ बलवंत नाम का वह लड़का अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर इधरउधर फोन मिलाने लगा.

दारा के घर पर गांव वाले इकट्ठा थे, कुछेक रिश्तेदार भी थे, जो लोग दारा को पहचान पाए, वे उस से लिपट कर रोने लगे.

पिता की मृत देह देख कर दारा का सब्र जवाब दे गया. वह पिता की देह से लिपट कर रोने लगा. रिश्तेदारों ने हिम्मत दी, पर आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘अब कुछ नहीं बचा है बेटा… जितनी देर ये देह पड़ी रहेगी, उतनी देर पूरन की आत्मा फड़फड़ाएगी… इसलिए अब इसे जल्दी से जल्दी फूंकने का इंतजाम करो.’’

गांव वालों ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी. मृत देह को श्मशान ले चलने की तैयारी होने लगी.

बाप की अर्थी को जैसे ही दारा ने कंधा लगाया, बलवंत गांव के लड़कों के साथ वहां आ गया और दारा को देख कर कहने लगा, ‘‘क्या रे… शहर जा कर तू औकात भूल गया… हम ठाकुरों जैसी मूंछें रखता है. तू क्या समझता है कि लंबाचौड़ा शरीर पा कर तू भी ठाकुर हो जाएगा… और ये तलवार जैसी मूंछें रख लेगा, तो हम लोग डर जाएंगे…’’

‘‘बाबूजी… हमें पिता की क्रिया कर लेने दो, फिर आप जो कहोगे हम मान लेंगे,’’ दारा ने कहा.

‘‘वह तो हम अपनेआप मनवा ही लेंगे…’’ एक मुस्टंडे ने पीछे खड़ी रिनी की ओर देख कर कहा.

‘‘पर, तेरी मूंछ तो छोटी और नीचे की ओर होनी चाहिए… तू ने ये तलवारकट मूंछें रख कर हम लोगों की बेइज्जती की है. उस की सजा तो तुझे भुगतनी होगी,’’ इतना कह कर उस लड़के ने दारा के सिर पर एक डंडा मारा, दूसरा डंडा और फिर तीसरा चौथा… 5वां…

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दारा ने बहुत प्रयास किया कि वह पिता की अर्थी को अपने कंधे से न गिरने दे, पर वह नाकाम रहा और दारा के कंधे से उस के बाप की अर्थी एक ओर गिर गई और दूसरी ओर दारा का शरीर निढाल हो कर गिरने लगा.

‘‘अरे ओ बिरजू… जरा अपना उस्तरा निकाल और काट ले इस की ये तलवारकट मूंछें,’’ वह लड़का चीख रहा था.

दारा के सिर से तेजी से खून निकल रहा था. उस की मुंदती हुई आंखें देख पा रही थीं कि बिरजू नाम का वह आदमी उस्तरा ले कर उस की ओर बढ़ रहा है और कुछ लोग रिनी को अपने कंधे पर उठा कर ले जा रहे हैं.

घर के बाहर अब 2 लाशें पड़ी हुई थीं, एक ओर दारा के पिता की लाश, तो दूसरी ओर दारा की लाश… जिस पर अब मूंछ का कोई नामोनिशान नहीं था…

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