Serial Story: स्वप्न साकार हुआ- भाग 2

लेखिका-  साधना श्रीवास्तव

‘डार्लिंग, अभी तो मुझे जाना है. हां, 1 घंटे बाद जब वापस आऊंगा तो उधर से ही सब्जी लेता आऊंगा,’ अरविंद बोले.

‘लेकिन सब्जी तो इसी समय के लिए चाहिए,’ वसुधा बोली, ‘ऐसा कीजिए, बबली को अपने साथ लेते जाइए और सब्जी खरीद कर इसे ही दे दीजिएगा. यह लेती आएगी.’

चाय पीने के बाद अरविंद ने बबली से चलने को कहा तो वह दूसरी तरफ का आगे का दरवाजा खोल कर उन की बगल की सीट पर धम से बैठ गई और जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, अचानक अरविंद के कंधे पर हाथ मार कर बबली बोली, ‘अपन को 1 सिगरेट चाहिए, है क्या?’

अरविंद चौंक से गए. यह कैसी लड़की है? फिर बबली की आवाज कानों में पड़ी, ‘लाओ न बाबूजी, सिगरेट है?’

अरविंद ने गाड़ी रोक दी और उस की तरफ देखते हुए जोर से बोले, ‘बबली, आज तू पागल हो गई है क्या? सिगरेट पीएगी?’

अरविंद की आवाज बबली के कानों में गरम लावे जैसी पड़ी. तंद्रा टूटते ही उसे लगा कि अतीत के दिनों की आदतें उस पर न चाहते हुए भी जबतब हावी हो जाती हैं. अपने को संभालती हुई बबली बोली, ‘अंकल, आज मैं बहुत थकी हुई थी. आप की गाड़ी में हवा लगी तो झपकी आ गई. उसी में पता नहीं कैसेकैसे सपने आने लगे. जैसे कोई सिगरेट पीने को मांग रहा हो. माफ कीजिए अंकल, गलती हो गई.’ हाथ जोड़ कर बबली गिड़गिड़ाई.

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अरविंद को बबली की यह बात सच लगी और वह चुप हो गए. कार आगे बढ़ी. ढेर सारी सब्जियां खरीदवा कर अरविंद ने बबली को घर छोड़ा और अपने काम से चले गए.

अरविंद ने इस घटना का घर पर कोई जिक्र नहीं किया. वह अनुमान भी नहीं लगा सके कि बबली बार बाला है पर उस की कमजोरी को उन्होंने भांप लिया था.

बबली को अपनी इस फूहड़ता पर बड़ी ग्लानि हुई. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतना सावधान रहने पर भी उस से बारबार गलती क्यों हो जाती है. उस ने दृढ़ निश्चय किया कि वह भविष्य में अपने पर नियंत्रण रखेगी ताकि उस का काला अतीत आगे के जीवन में अपनी कालिमा न फैला सके.

बीतते समय के साथ सबकुछ सामान्य हो गया. बबली अपने काम में इस कदर तल्लीन हो गई कि सिगरेट मांगने वाली घटना को भूल ही गई.

एक दिन वसुधा ने बबली को चाबी पकड़ाते हुए कहा, ‘मुझे दोपहर बाद एक सहेली के घर जन्मदिन पार्टी में जाना है, तुम समय से आ कर खाना बना देना. मुझे लौटने में देर हो सकती है. राजन तो आज होस्टल में रुक गया है लेकिन अरविंदजी को समय से खाना खिला देना.’

‘जी, आंटी, लेकिन अगर साहब को आने में देर होगी तो मैं मेज पर उन का खाना लगा कर चली जाऊंगी.’

‘ठीक है, चली जाना.’

शाम को जल्दी आने की जगह बबली कुछ देर से आई तो देखा दरवाजा अंदर से बंद है. उस ने दरवाजे की घंटी बजाई तो अरविंद ने दरवाजा खोला. उसे कुछ संकोच हुआ. फिर भी काम तो करना ही था. सो अंदर सीधे रसोई में जा कर अपने काम में लग गई.

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बरतन व रसोई साफ करने के बाद बबली बैठ कर सब्जी काट रही थी कि अरविंद ने कौफी बनाने के लिए बबली से कहा.

कौफी बना कर बबली उसे देने के लिए उन के कमरे में गई तो देखा, वह पलंग पर लेटे हुए थे और उन्होंने इशारे से कौफी की ट्रे को पलंग की साइड टेबल पर रखने को कहा.

बबली ने अभी कौफी की ट्रे रखी ही थी कि उन्होंने उस का हाथ पकड़ कर खींच लिया. वह धम से उन के ऊपर गिर पड़ी. उसे अपनी बांहों में भरते हुए अरविंद ने कहा, ‘जानेमन, तुम ने तो कभी मौका नहीं दिया, लेकिन आज यह सुअवसर मेरे हाथ लगा है.’

बबली अपने को उन के बंधन से छुड़ाते हुए बोली, ‘छोडि़ए अंकल, क्या करते हैं?’

लेकिन अरविंद ने उसे छोड़ने की जगह अपनी बांहों में और भी शक्ति के साथ जकड़ लिया. अपने बचने का कोई रास्ता न देख कर बबली ने हिम्मत कर के एक जोरदार तमाचा अरविंद के गाल पर जड़ दिया. अप्रत्याशित रूप से पड़े इस तमाचे से अरविंद बौखला से गए.

‘दो कौड़ी की छोकरी, तेरी यह हिम्मत,’ कहते हुए अरविंद उस पर जानवरों जैसे टूट पड़े थे कि तभी दरवाजे की घंटी बज उठी और उन की पकड़ एकदम ढीली पड़ गई.

बबली को लगा कि जान में जान आई और भाग कर उस ने दरवाजा खोल दिया. सामने वसुधा खड़ी थी. उन से बिना कुछ कहे बबली रसोई में खाना बनाने चली गई.

खाना बनाने का काम समाप्त कर बबली जाने के लिए वसुधा से कहने आई. वसुधा ने देखा खानापीना सबकुछ तरीके से मेज पर सज गया था. उस की प्रशंसा करती हुई वसुधा ने कहा, ‘बबली, मुझे तुम्हारा काम बहुत पसंद आता है. मैं जल्दी ही तुम्हारे पैसे बढ़ा दूंगी.’

इतने समय में बबली ने निश्चय कर लिया कि अब वह इस घर में काम नहीं करेगी. अत: दुखी स्वर में बोली, ‘आंटी, इतने दिनों तक आप के साथ रह कर मैं ने बहुत कुछ सीखा है लेकिन कल से मैं आप के घर में काम नहीं करूंगी. मुझे क्षमा कीजिएगा…मेरा भी कोई आत्म- सम्मान है जिसे खो कर मुझे कहीं भी काम करना मंजूर नहीं है.’

‘अरे, यह तुझे क्या हो गया? मैं ने तो कभी भी तुझे कुछ कहा नहीं,’ वसुधा ने जानना चाहा.

‘आप ने तो कभी कुछ नहीं कहा आंटी, पर मैं…’ रुक गई बबली.

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अब वसुधा का माथा ठनका. वह सीधे अरविंद के कमरे में पहुंचीं और बोलीं, ‘आज आप ने बबली को क्या कह दिया कि वह काम छोड़ कर जाने को तैयार है?’

अरविंद ने अपनी सफाई देते हुए कहा, ‘हां, थोड़ा डांट दिया था. कौफी पलंग पर गिरा दी थी. लेकिन कह दो, अब कभी कुछ नहीं कहूंगा.’

पति की बात को सच मान कर वसुधा ने बबली को बहुतेरा समझाया लेकिन वह काम करने को तैयार नहीं हुई.

Mother’s Day Special: मां का फैसला- भाग 1

रजनीगंधा की बड़ी डालियों को माली ने अजीब तरीके से काटछांट दिया था. उन्हें सजाने में मुझे बड़ी मुश्किल हो रही थी. बिट्टी ने अपने झबरे बालों को झटका कर एक बार उन डालियों से झांका, फिर हंस कर पूछा, ‘‘मां, क्यों इतनी परेशान हो रही हो. अरे, प्रभाकर और सुरेश ही तो आ रहे हैं…वे तो अकसर आते ही रहते हैं.’’ ‘‘रोज और आज में फर्क है,’’ अपनी गुडि़या सी लाड़ली बिटिया को मैं ने प्यार से झिड़का, ‘‘एक तो कुछ करनाधरना नहीं, उस पर लैक्चर पिलाने आ गई. आज उन दोनों को हम ने बुलाया है.’’

बिट्टी ने हां में सिर हिलाया और हंसती हुई अपने कमरे में चली गई. अजीब लड़की है, हफ्ताभर पहले तो लगता था, यह बिट्टी नहीं गंभीरता का मुखौटा चढ़ाए उस की कोई प्रतिमा है. खोईखोई आंखें और परेशान चेहरा, मुझे राजदार बनाते ही मानो उस की उदासी कपूर की तरह उड़ गई और वही मस्ती उस की रगों में फिर से समा गई.

‘मां, तुम अनुभवी हो. मैं ने तुम्हें ही सब से करीब पाया है. जो निर्णय तुम्हारा होगा, वही मेरा भी होगा. मेरे सामने 2 रास्ते हैं, मेरा मार्गदर्शन करो.’ फिर आश्वासन देने पर वह मुसकरा दी. परंतु उसे तसल्ली देने के बाद मेरे अंदर जो तूफान उठा, उस से वह अनजान थी. अपनी बेटी के मन में उठती लपटों को मैं ने सहज ही जान लिया था. तभी तो उस दिन उसे पकड़ लिया.

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कई दिनों से बिट्टी सुस्त दिख रही थी, खोईखोई सी आंखें और चेहरे पर विषाद की रेखाएं, मैं उसे देखते ही समझ गई थी कि जरूर कोई बात है जो वह अपने दिल में बिठाए हुए है. लेकिन मैं चाहती थी कि बिट्टी हमेशा की तरह स्वयं ही मुझे बताए. उस दिन शाम को जब वह कालेज से लौटी तो रोज की अपेक्षा ज्यादा ही उदास दिखी. उसे चाय का प्याला थमा कर जब मैं लौटने लगी तो उस ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया और रोने लगी.

बचपन से ही बिट्टी का स्वभाव बहुत हंसमुख और चंचल था. बातबात में ठहाके लगाने वाली बिट्टी जब भी उदास होती या उस की मासूम आंखें आंसुओं से डबडबातीं तो मैं विचलित हो उठती. बिट्टी के सिवा मेरा और था ही कौन? पति से मानसिकरूप से दूर, मैं बिट्टी को जितना अपने पास करती, वह उतनी ही मेरे करीब आती गई. वह सारी बातों की जानकारी मुझे देती रहती. वह जानती थी कि उस की खुशी में ही मेरी खुशी झलकती है. इसी कारण उस के मन की उठती व्यथा से वही नहीं, मैं भी विचलित हो उठी. सुरेश हमारे बगल वाले फ्लैट में ही रहता था. बचपन से बिट्टी और सुरेश साथसाथ खेलते आए थे. दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. उस की मां मुझे मानती थी. मेरे पति योगेश को तो अपने व्यापार से ही फुरसत नहीं थी, पर मैं फुरसत के कुछ पल जरूर उन के साथ बिता लेती. सुरेश बेहद सीधासादा, अपनेआप में खोया रहने वाला लड़का था, लेकिन बिट्टी मस्त लड़की थी.

बिट्टी का रोना कुछ कम हुआ तो मैं ने पूछ लिया, ‘आजकल सुरेश क्यों नहीं आता?’ ‘वह…,’ बिट्टी की नम आंखें उलझ सी गईं.

‘बता न, प्रभाकर अकसर मुझे दिखता है, सुरेश क्यों नहीं?’ मेरा शक सही था. बिट्टी की उदासी का कारण उस के मन का भटकाव ही था. ‘मां, वह मुझ से कटाकटा रहता है.’

‘क्यों?’ ‘वह समझता है, मैं प्रभाकर से प्रेम करती हूं.’

‘और तू?’ मैं ने उसी से प्रश्न कर दिया. ‘मैं…मैं…खुद नहीं जानती कि मैं किसे चाहती हूं. जब प्रभाकर के पास होती हूं तो सुरेश की कमी महसूस होती है, लेकिन जब सुरेश से बातें करती हूं तो प्रभाकर की चाहत मन में उठती है. तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं. किसे अपना जीवनसाथी चुनूं?’ कह कर वह मुझ से लिपट गई.

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मैं ने उस के सिर पर हाथ फेरा और सोचने लगी कि कैसा जमाना आ गया है. प्रेम तो एक से ही होता है. प्रेम या जीवनसाथी चुनने का अधिकार उसे मेरे विश्वास ने दिया था. सुरेश उस के बचपन का मित्र था. दोनों एकदूसरे की कमियों को भी जानते थे, जबकि प्रभाकर ने 2 वर्र्ष पूर्व उस के जीवन में प्रवेश किया था. बिट्टी बीएड कर रही थी और हम उस का विवाह शीघ्र कर देना चाहते थे, लेकिन वह स्वयं नहीं समझ पा रही थी कि उस का पति कौन हो सकता है, वह किस से प्रेम करती है और किसे अपनाए.

ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट के मंत्र से प्रदेश सरकार कर रही कोरोना का मुकाबला

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना महामारी के विरुद्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में दूसरी लहर का मुकाबला पूरा देश कर रहा है. ‘ट्रेस, टेस्ट व ट्रीट’ का जो मंत्र कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सभी राज्यों को दिया गया है, उसको अपना कर उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेशवासियों को राहत पहुंचाने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि विगत 30 अप्रैल, 2021 की अपेक्षा 77,000 एक्टिव केस कम हुए हैं. पॉजिटिविटी घटी है और रिकवरी दर बढ़ी है. उन्होंने कहा कि वाराणसी मंडल में एक सप्ताह में 9285 एक्टिव केस आए हैं, जिसमें वाराणसी जनपद में 4500 से अधिक केस हैं. कोरोना की पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर काफी तीव्र व संक्रामक रही है.

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का आभार व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि पूरे देश में ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए ऑक्सीजन एक्सप्रेस व इंडियन एयर फोर्स के विमान का इस्तेमाल ऑक्सीजन आपूर्ति में किया गया. इससे कोरोना के मरीजों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में सभी राज्यों को सुगमता हुई.

उन्होंने कहा कि जिस तेजी से कोरोना को संक्रमण बढ़ा, उसी तेजी से ऑक्सीजन की भी डिमांड बढ़ी. वर्तमान में लगभग 1000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में हो रही है. महामारी का मुकाबला सभी के सहयोग से किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रदेश सरकार महामारी का मुकाबला मजबूती से कर रही है. इसके लिए हर स्तर पर संसाधन भी बढ़ाए जा रहे हैं. टीकाकरण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि दो स्वदेशी वैक्सीन अभी फिलहाल लग रही है और तीसरी वैक्सीन के लिए भी सहमति मिल गई है.

उन्होंने कहा कि सभी को टीके के लिए आगे आना चाहिए. आसानी से टीकाकरण किया जा सके, इसके लिए टीकाकरण केन्द्र बनाए गए हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि काशी चिकित्सा के क्षेत्र का हब है. पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित बिहार के लोग चिकित्सा सुविधा यहां प्राप्त करते हैं. 750 बेड के डी0आर0डी0ओ0 की मदद से बनाये गए अस्थायी अस्पताल जिसमें 250 बेड वेंटीलेटर के हंै, से वाराणसी के साथ ही आसपास के जिलों के लोगों को बड़ी राहत होगी. यहां आर्मी मेडिकल कोर के साथ ही बी0एच0यू0, स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा अन्य संसाधनों को समन्वय स्थापित कर मुहैया कराया जाएगा. उन्होंने बताया कि भारत सरकार की ओर से पर्याप्त वैक्सीन मिल रही है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोरोना के सेकंड वेव को रोकने के लिए किये गये कार्यों की सार्थकता दिखाई दे रही है. पॉजिटिविटी घटी है और रिकवरी दर बढ़ी है. लेकिन अभी सतर्कता की जरूरत है. मुख्यमंत्री ने जन सामान्य से अपील की कि वह बिना वजह अपने घरों से बाहर न निकलें और अपने घरों में ही सुरक्षित रहें. जरूरत पड़ने पर घरों से बाहर निकलने पर हर व्यक्ति कोविड नियम का पालन करे. चेहरे पर मास्क लगाएं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हर हालत में करें. हाई रिस्क कैटेगरी के लोग घरों से बाहर कतई न निकलें. वैक्सीन लगवाने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराएं और वैक्सीन अवश्य लगवाएं. उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि ‘कोरोना हारेगा और देश जीतेगा’.

कोरोना महामारी पर Kheasri Lal Yadav ने गाया इमोशनल गाना, देखें Video

कोरोना वायरस का दूसरी लहर पूरे देश में तबाही मचा दी है. हर दिन इस बीमारी की वजह से लोग मर रहे हैं. हॉस्पिटल में लोगों को बेड्स नहीं मिल रहे तो वहीं ऑक्सीजन की भी कमी है. ऐसे में लोगों की हालत बिगड़ते जा रही है.

कोरोना वायरस की स्थिति को देखते हुए भोजपुरी इंडस्ट्री के मशहूर स्टार खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) ने काफी इमोशनल गाना गाया है. इस गाने में खेसारी ने कोरोना वायरस से जूझ रहे लोगों की झलक भी दिखाई है.

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आपको बता दें कि इस गाने को अजित हलचल ने लिखा है और खेसारी लाल यादव ने गया है. जबकि इसका म्यूजिक लार्ड जी ने दिया है.

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‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की बबिता ने कही ऐसी बात, यूजर्स ने की गिरफ्तारी की मांग

टीवी के मशहूर कमेडी शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’  में बबीता का किरदार निभाने वाली मुनमुन दत्ता सोशल मीडिया पर इन दिनों काफी एक्टिव है. अब उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. जिसमें उन्होंने ऐसी बात कह दी है. जिससे लोग मुनमुन दत्ता की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं. तो आइए बताते हैं, क्या है पूरा मामला.

दरअसल, एक यू-ट्यूब वीडियो में मुनमुन दत्ता की जुबान फिसली और #ArrestMunmunDutta ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा. मुनमुन दत्ता ने एक मेकअप वीडियो पोस्ट किया था. इसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने मस्कारा, लिप टिंट और ब्लश लगाया है. क्योंकि वो यूट्यूब पर आने वाली हैं और वो अच्छी दिखना चाहती हैं.

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और इस वीडियो में उन्होंने एक जाति का नाम लेकर कहा था कि वो उनकी तरह नहीं दिखना चाहती हैं. एक्ट्रेस के इस बयान के बाद लोगों ने गुस्सा जाहिर किया और उनकी गिरफ्तारी की मांग की.

हालांकि इस विवाद को बढ़ता देख मुनमुन दत्ता ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट की और लोगों से माफी मांगी. एक्ट्रेस ने अपने पोस्ट में ये लिखा कि यह एक वीडियो के संदर्भ में हैं, जिसे मैंने कल पोस्ट किया था. इसमें मेरे द्वारा इस्तेमाल किए गए एक शब्द का गलत अर्थ लगाया गया है.

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उन्होंने आगे कहा कि यह अपमान, धमकी या किसी की भावानओं को चोट पहुंचाने के इरादे से कभी नहीं किया गया था. मेरी भाषा की सीमाओं के कारण, मुझे शब्द के अर्थ को लेकर सही जानकारी नहीं थी. एक बार जब मुझे इस शब्द के बारे में जानकारी दी गई तो मैंने तुरंत उसे वहां से निकाल दिया.

मुनमुन दत्ता ने ये भी लिखा, मैं हर जाति, पंथ और लिंग के व्यक्ति का सम्मान करती हूं और हमारे देश और समाज के निर्माण में उनके योगदान को स्वीकार करती हूं. इस शब्द के उपयोग से जिस किसी का भी दिल दुखा है, मैं उससे माफी मांगती हूं और मुझे इसका वाकई अफसोस है.

वापस अपने गांव जाएगी Imlie तो टूट जाएगा आदित्य का दिल

स्टार प्लस का  सीरियल ‘इमली’ (Imlie)  में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा चल  रहा है, जिससे शो में खूब धमाल हो रहा है. शो के बीते एपिसोड में आपने देखा कि इमली, मालिनी के घर रहने के लिए आई है. और अनु की नजर इमली पर टिकी है. तो आइए जानते हैं, शो के नए अपडेट्स के बारे में.

शो के अपकमिंग एपिसोड में ये दिखाया जाएगा कि आदित्य और मालिनी के बीच पहले की तरह ही वॉर चलेगी तो दूसरी ओर इमली जबसे मालिनी के घर रहने गई है, तबसे अनु की नजर उस पर चौबीस घंटे रहती है.

 

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शो में दिखाया गया कि अनु देखना चाहती है कि घर से निकलने के बाद इमली कहां-कहां जाती है और किस-किससे मिलती है? शो के पिछले एपिसोड में ही दिखाया गया है कि अनु इमली को आदित्य की बाइक पर देख लेती है.

इमली को पता चल जाता है कि आदित्य के कजिन को ब्लड कैंसर है और इसलिए वह आदित्य के घर जाती है. घर पर इमली को देखकर आदित्य की मां को झटका लगता है.

 

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Imlie और आदित्य को रंगे हाथ पकड़ेगी अनु, आएगा धमाकेदार ट्विस्ट

आदित्य की मां  इमली से पूछेगी कि आखिर किसकी परमिशन पर वो यहां आई है. ये बात सुनकर इमली को धक्का लगेगा. आदित्य की मां अपना सारा गुस्सा इमली पर ही निकाल देगी. खबर यह भी आ रही है कि इमली अपने गांव पगडंडिया चली जाएगी जिससे आदित्य को धक्का लगेगा.

गोरखधंधा: जनहित याचिकाएं बनाम संघ का एजेंडा

भारतीय जनता पार्टी के नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय आजकल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को देशभर में लागू कराने के लिए सड़क  से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक जोर लगा  रहे हैं. कभी उन्हें हिंदुओं के अल्पसंख्यक हो जाने का डर सताता है, तो कभी मुसलिम ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं, इस बात का शक होने लगता है. कभी वे कोर्ट से राष्ट्रीय औसत के बजाय राज्य में किसी समुदाय की आबादी के आधार पर उसे ‘अल्पसंख्यक’ परिभाषित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की गुजारिश करते हैं, तो कभी वे हिंदुओं की तादाद बचाने के लिए धर्मांतरण को रोकना चाहते हैं.

इतना ही नहीं, कभी वे आबादी पर कंट्रोल के लिए याचिका ले कर कोर्ट पहुंच जाते हैं, तो कभी मुसलिमों में प्रचलित निकाह, हलाला और बहुविवाह प्रथाओं को खत्म करने के लिए याचिका दाखिल कर मांग करते हैं कि मुसलिम समाज में प्रचलित इन प्रथाओं को असंवैधानिक करार दिया जाए.

देश में आबादी के कंट्रोल के लिए  2 बच्चों के मानदंड समेत कुछ उपायों पर अमल के लिए भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. यह याचिका उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की थी. हालांकि इस पर भी कोर्ट ने साफ कह दिया था कि कानून बनाना अदालत का नहीं, बल्कि संसद और विधानमंडल का काम है.

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हालिया याचिका अश्विनी कुमार उपाध्याय ने धर्मांतरण को रोकने के लिए डाली है. उन्हें लगता है कि तरहतरह के लालच और टोनेटोटकों के जरीए हिंदुओं को बहका कर उन का धर्म बदला जा रहा है. दरअसल, ये तमाम परेशानियां वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की कोई निजी परेशानियां नहीं हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा में जितनी बातें हैं, वही उन की ‘जनहित याचिकाओं’ में नजर आती हैं.

वे अदालतों को औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं और चाहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष देश भारत को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इच्छा के मुताबिक एक  हिंदू देश में बदलने के  लिए जो चीजें होनी जरूरी हैं, उन पर देश की सब से बड़ी अदालत अपनी मोहर लगा दे.

गौरतलब है कि ऊंची जाति के हाथों शोषित और मनुवादी व्यवस्था से उकता चुके दलित और आदिवासी लोग बीते कई सालों से बौद्ध, ईसाई या मुसलिम धर्म की ओर खिंच रहे हैं. उन्हें हिंदू धर्म में रोके रखने की कोशिश संघ और भाजपा की है.

यही वजह है कि चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दलितों की ?ांपडि़यों में नजर आने लगते हैं. कहीं उन के पैर पखारते दिखते हैं, तो कहीं उन के साथ पत्तल में खाना खाते नजर आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही दलित फिर उन के लिए अछूत हो जाते हैं.

इन पाखंडों को अब दलित और आदिवासी समाज अच्छी तरह समझने लगा है. बीते कुछ सालों में बड़ी तादाद में दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया है. संघ और भाजपा इस बात को ले कर चिंतित हैं और उन की चिंता का हल निकालने के लिए अश्विनी कुमार उपाध्याय जैसे वकील ‘जनहित याचिका’ के जरीए कोर्ट और सरकार के डंडे का इस्तेमाल कर के हिंदू धर्म को बचाने की बेढंगी कोशिशों में जुटे हैं.

यह कैसी ट्रैजिडी है कि सब से बेहतर धर्म को बचाने के लिए अब सरकारी डंडे की जरूरत आ पड़ी है. कोर्ट से गुजारिश की जा रही है कि वह सरकार को निर्देश दे कि वह हिंदू को हिंदू बनाए रखने के लिए कानून बनाए और सजा का प्रावधान करे, लेकिन क्या ऐसा मुमकिन है? बिलकुल नहीं.

अश्विनी कुमार उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. उन की हालिया याचिका काला जादू, अंधविश्वास और जबरन धर्मांतरण को ले कर थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल, 2021 को यह कह कर खारिज कर दिया कि यह किस तरह की याचिका है?

अश्विनी कुमार उपाध्याय हमेशा उन मुद्दों पर जनहित याचिका दायर करते हैं, जो उन की पार्टी के एजेंडा में सब से ऊपर हैं, जैसे योग, वंदे मातरम, निकाह, हलाला, धर्मांतरण रोकना वगैरह.

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल, 2021 को अश्विनी कुमार उपाध्याय की जो याचिका खारिज की है, उस में उन्होंने कोर्ट से गुजारिश की थी कि केंद्र और राज्यों को काले जादू, अंधविश्वास और धार्मिक रूपांतरण को कंट्रोल करने, धमकाने, धमकी देने और उपहारों और  पैसे से फायदा पहुंचाने के जरीए कंट्रोल करने के लिए निर्देश देने का कष्ट करें, मगर सुप्रीम कोर्ट में 3 जजों जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऋषिकेश रौय की पीठ ने न सिर्फ उन की याचिका खारिज कर दी, बल्कि वह इस से काफी नाखुश भी दिखी और कह बैठी कि यह किस तरह की याचिका है?

अश्विनी कुमार उपाध्याय चाहते थे कि धर्म का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए एक कमेटी बना कर धर्म बदलने से जुड़ा कानून बनाने की संभावना का पता लगाने के लिए निर्देश देने का कष्ट सुप्रीम कोर्ट करे.
उन की याचिका में कहा गया था कि लालच और जोरजबरदस्ती से धर्मांतरण किया जाना न केवल अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे के अभिन्न अंग धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के भी खिलाफ है और जादूटोना, अंधविश्वास और छल से धर्म बदलने पर रोक लगाने में
नाकाम रहे हैं, जबकि अनुच्छेद 51 ए के तहत इस पर रोक लगाना उन की जिम्मेदारी है.

समाज की कुरीतियों के खिलाफ ठोस कार्यवाही कर पाने में नाकामी का आरोप लगाते हुए याचिका में कहा गया कि केंद्र एक कानून बना सकता है, जिस में 3 साल की कम से कम कैद की सजा हो, जिसे 10 साल की सजा तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

अश्विनी कुमार उपाध्याय चाहते हैं कि केंद्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी धार्मिक समूहों के मामलों से निबटने और उन के बीच धार्मिक भेदभाव का गहराई से स्टडी कराने के लिए हक दे.
याचिका में विधि आयोग को जादूटोना, अंधविश्वास और धर्मांतरण पर 3 महीने के भीतर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए निर्देश देने की भी गुजारिश की गई थी. उन का मानना है कि  जनसंख्या विस्फोट और छल से धर्मांतरण के चलते 9 राज्यों और केंद्र शासितप्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और दिनोंदिन हालात और खराब होते जा रहे हैं.

इस याचिका के खारिज होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर अश्विनी कुमार उपाध्याय के खिलाफ कई कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और मिलें भी क्यों न, जिस देश का कानून देश के हर नागरिक को बालिग होने के बाद उस का धर्म और जीवनसाथी चुनने की आजादी देता है, उसे कंट्रोल करने का आदेश भला सुप्रीम कोर्ट कैसे दे सकता है?

माथे पर तिलक लगाने वाले, पत्नी समेत मंदिरमंदिर जा कर पूजा करने वाले, बाबाओं और संतों की संगत करने वाले, उन के आध्यात्मिक विचारों (जिन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता) से प्रभावित रहने वाले भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय किसी दूसरे को उस की आस्था, उस के विश्वास और उस की पसंदनापसंद पर पाबंदी लगाने के लिए कैसे मजबूर कर सकते हैं, यह बात कोर्ट के जेहन में भी जरूर आई होगी.

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दरअसल, अश्विनी कुमार उपाध्याय भाजपा और संघ के एजेंडा को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश में हैं, ताकि भविष्य की राजनीति में उन का सिक्का भी चल निकले, मगर हालिया याचिका पर उन की काफी भद्द पिट रही है.

याचिका खारिज होने के बाद वे अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं, ‘काला जादू, अंधविश्वास और साम, दाम, दंड और भेद द्वारा धर्मांतरण के खिलाफ मेरी पीआईएल खारिज नहीं हुई है, बल्कि मैं ने वापस ली है. मैं अब गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और विधि आयोग को विस्तृत प्रार्थनापत्र दूंगा. अगर 6 महीने में सरकार ने धर्मांतरण के खिलाफ कानून नहीं बनाया, तो मैं फिर सुप्रीम कोर्ट जाऊंगा.’

अश्विनी कुमार उपाध्याय की इस पोस्ट के जवाब में काफी लोगों ने उन की आलोचना की है. सूर्य विक्रम सिंह लिखते हैं, ‘उपाध्यायजी कभी जिंदगी की मूलभूत जरूरतों पर ध्यान दें, तो कितना अच्छा लगे. मगर, सत्ता की तरह आप भी गुमराह करने में लगे हैं.’

दीपक नागर कहते हैं, ‘हां, हम जानते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आप की पीआईएल खारिज कर दी है और कहा है कि 18 साल का बालिग इनसान अपने लिए कोई भी धर्म चुन सकता है, यह उस का मूलभूत अधिकार है और इस तरह की पीआईएल सिर्फ ‘चीप पब्लिसिटी’ (घटिया प्रचार) के लिए की जाती है.’
कोरोना काल में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बिलकुल चरमरा गई है, अस्पतालों में मरीजों के लिए बिस्तर, दवाएं, इंजैक्शन नहीं हैं, श्मशान घाटों पर लाशों के ढेर लग रहे हैं, डाक्टर खुद बीमार हो रहे हैं, क्योंकि खुद
को बचाने के लिए जरूरी सुरक्षा किट नहीं हैं.

यह अश्विनी कुमार उपाध्याय को नहीं दिखता. 10 करोड़ लोगों को वैक्सीन देने के बाद अब वैक्सीन का भी टोटा पड़ने लगा है, बेरोजगारी की मार से जनता कराह रही है, नौकरीकारोबार सब ठप हो चुके हैं, प्लेन चलाने वाला पायलट डिलीवरी बौय बन गया है, शिक्षक मनरेगा में मजदूरी कर रहा है, बड़ीबड़ी पोस्ट पर काम कर चुके लोग सब्जी का ठेला खींच रहे हैं, चाय का खोखा खोलने को मजबूर हैं… आखिर देश को इस गड्ढे से निकालने के लिए सरकार क्या कर रही है, क्या इस पर भी कोई जनहित याचिका अश्विनी कुमार उपाध्यायजी डालेंगे?

क्या सरकार के खिलाफ बोलना गुनाह है ?

देश में सरकार के खिलाफ हर बात कहने वाले के साथ अब वही सुलूक हो रहा है जो हमारी पौराणिक कहानियों में बारबार दोहराया गया है. हर ऋषिमुनि इन कहानियों में जो भी एक बार कह डालता, वह तो होगा ही. विश्वामित्र को यज्ञ में दखल देने वाले राक्षसों को मरवाना था तो दशरथ के राजदरबार में गुहार लगाई कि रामलक्ष्मण को भेज दो. दशरथ ने खूब विनती की कि दोनों बच्चे हैं, नौसिखिए हैं पर विश्वामित्र ने कह दिया तो कह दिया. वे नहीं माने.

कुंती को वरदान मिला कि वह जब चाहे जिस देवता को बुला सकती है. सूर्य को याद किया तो आ गए पर कुंती ने लाख कहा कि वह बिना शादीशुदा है और बच्चा नहीं कर सकती पर सूर्य देवता नहीं माने और कर्ण पैदा हो गया. उसे जन्म के बाद पानी में छोड़ना पड़ा.

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अब चाहे पश्चिम बंगाल हो, कश्मीर का मुद्दा हो, किसानों के कानून हों, जजों की नियुक्ति हो, लौकडाउन हो, नोटबंदी हो, जीएसटी हो, सरकार के महर्षियों ने एक बार कह दिया तो कह दिया. अब तीर वापस नहीं आएगा.

कोविड के दिनों में तय था कि वैक्सीन बनी तो देश को 80 करोड़ डोज चाहिए होंगी पर नरेंद्र मोदी को नाम कमाना था पर लाखों डोज भारतीयों को न दे कर 150 देशों में भेज दी गईं जिन में से 82 देशों को तो मुफ्त दी गई हैं. भारत में लोग मर रहे हैं, वैक्सीन एक आस है पर फैसला ले लिया तो ले लिया.

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यह हर मामले में हो रहा है. पैट्रोल, डीजल, घरेलू गैस के दाम बढ़ रहे हैं तो कोई सुन नहीं रहा.  चुनाव तो हिंदूमुसलिम कर के जीत लिए जाएंगे. नहीं जीते तो विधायकों को खरीद लेंगे जैसे कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश में किया.

जनता की न सुनना हमारे धर्मग्रंथों में साफसाफ लिखा है. राजा सिर्फ गुरुओं की सुनेगा चाहे इस की वजह से सीता का परित्याग हो, शंबूक का वध हो, एकलव्य का अंगूठा काटना हो. जनता बीच में कहीं नहीं आती. यह पाठ असल में हमारे प्रवचन करने वाले शहरों में ही नहीं गांवों में भी इतनी बार दोहराते हैं कि लोग समझते हैं कि राज करने का यही सही तरीका है. भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी ऐसे ही राज करती रही है, ममता बनर्जी भी ऐसे ही करती हैं, उद्धव ठाकरे भी.

यह हमारी रगरग में बस गया है कि किसी की न सुनो. हमारा हर नेता, हर अफसर अपने क्षेत्र में अपनी चलाता है चाहे सही हो या गलत. यह तो पक्का है कि जब 10 फैसले लोगे तो 5 सही ही होंगे. पर 5 जो खराब हैं, गलत हैं, दुखदायी हैं, जनता को पसंद नहीं हैं तो दुर्वासा मुनि की तरह जम कर बैठ जाने का क्या मतलब? आज सरकार लोकतंत्र की देन है, संविधान की देन है, पुराणों की नहीं. पौराणिक सोच हमें नीचे और पीछे खींच रही है. हर जना आज परेशान है. आज धन्ना सेठों को छोड़ कर हर किसान, मजदूर, व्यापारी परेशान है पर वह भी यही सोचता है कि राजा का फैसला तो मानना ही होगा. उस के गले से आवाज नहीं निकलती.

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यह सोच हर गरीब को ले डूबेगी. गरीब हजारों सालों से गरीब रहा क्योंकि वह बोला नहीं. उस ने पढ़ा नहीं, समझा नहीं, जाना नहीं. इंदिरा गांधी ने इस का फायदा उठाया. आज मोदी उठा रहे हैं. जिस अच्छे दिन की उम्मीद लगा रखी थी वह आएगा तो तब जब अच्छा होता क्या है यह कहने का हक होगा और सुनने वाला सुनेगा.

Serial Story: बीवी का आशिक- भाग 4

लेखक- एम. अशफाक

अंदर से क्वार्टर देखा, बहुत अच्छी तरह सजा हुआ था. रसोई तो और भी ज्यादा अच्छी तरह सजी हुई थी. मर्द कितना ही सफाई वाला हो, लेकिन इस तरह रसोई और घर नहीं सजा सकता. एएसएम तो वैसे भी अविवाहित था, मेरी छठी इंद्री जाग गई.

‘‘तुम्हारा खाना कौन पकाता है?’’

‘‘जी, वह पानी वाला पका देता है.’’

मैं ने उस का जवाब एक पुलिस वाले की नजर से उस के चेहरे की ओर देखते हुए सुना. मैं ने देखा उस के चेहरे का रंग बदल रहा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस उजाड़ में तुम्हारा दिल कैसे लगता है?’’

वह बोला, ‘‘बस जी, कोई किताब पढ़ लेता हूं या फिर घूमने निकल जाता हूं.’’

बातें करतेकरते हम घर से बाहर निकले तो क्वार्टर के सामने कुछ झोपडि़यां दिखाई दीं. मैं ने उस से पूछा, ‘‘ये किस की झोपडि़यां हैं?’’

‘‘जी, वे भीलों के झोपडे़ हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘चलो, चल कर देखते हैं.’’

वहां गए तो झोपडि़यों के पास कुछ बकरियां बंधी थीं. हमें देख कर कुत्ते भौंकने लगे. उन की आवाज सुन कर झोपडि़यों से औरतें निकल आईं और हमारी ओर देखने लगीं.

मैं ने झोपडि़यों का चक्कर लगा कर देखा तो वहां औरतें ही नजर आईं, मर्द कोई नहीं था. मैं ने उन औरतों से उन के मर्दों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे थरपारकर (रेगिस्तान की एक जगह) में खेतों पर काम करने जाते हैं.’’

‘‘तुम्हारे मर्द खेतों पर रहते हैं और तुम?’’ सवाल सुन कर एक औरत बोली, ‘‘वे वहां और हम यहां.’’

‘‘तुम क्या काम करती हो?’’

‘‘बकरियों का दूध निकाल कर रेलवे वालों को बेचते हैं.’’ एक औरत ने एएसएम को देख कर कहा, ‘‘ये बाबू तो यहां भी दूध लेने आ जाते हैं.’’

मैं ने उसी औरत से कहा, ‘‘तुम्हारा आदमी कहां है?’’

उस ने कहा, ‘‘बताया था ना थरपारकर में काम करता है.’’

‘‘वह यहां कब आता है?’’

‘‘1-2 महीने बाद आता है.’’

‘‘उसे आए हुए कितने दिन हो गए?’’

‘‘एक महीने से तो उस ने सूरत भी नहीं दिखाई.’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘तुम्हारे आदमी का क्या नाम है?’’

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वह कुछ लजा गई, दूसरी औरत ने बताया, ‘‘शिवाराम नाम है.’’

मैं ने एएसएम का बाजू पकड़ा और उसे स्टेशन पर ले आया. एएसएम का उजाड़ इलाके में क्वार्टर, भीलों की जवान लड़की, वह दूध लेने उन के घर जाता था. निस्संदेह वह कोई फरिश्ता नहीं था. उस समय सुबह 7 बजे थे. मैं ने वहां के थाने से पुलिस इंसपेक्टर को बुलवाया और उस से ऊंटों का इंतजाम करने के लिए कहा. उस ने तुरंत ऊंट बुलवा लिए.

मैं पुलिस इंसपेक्टर और 2 सिपाहियों को ले कर थर पार कर के खेतीबाड़ी वाले इलाके में 20 मील लंबा सफर कर के पहुंच गया. शाम का समय था, कुछ लोग अब भी खेतों पर काम कर रहे थे. ऊंट रुकवा कर मैं उन लोगों की ओर गया. पुलिस की वरदी में देख कर वे सब खड़े हो गए.

मैं ने जाते ही सख्ती से पूछा, ‘‘तुम में शिवा कौन है?’’

वे सब डर गए थे, फिर धीरेधीरे एक आदमी हमारी ओर आया. मैं ने पूछा, ‘‘तुम हो शिवा?’’

‘‘हां, मेरा ही नाम शिवा है.’’ उस की आवाज में जरा भी घबराहट नहीं थी.

‘‘तुम ने हत्या की है. मैं तुम्हें गिरफ्तार करने आया हूं. वह कुल्हाड़ी कहां है, जिस से तुम ने हत्या की है?’’

वह जवाब देने के बजाए एक ओर मुंह घुमा कर देख रहा था, वहां एक झोंपड़ी थी. मेरा हमला उस पर इतना सख्त और जल्दबाजी वाला था कि वह संभल नहीं सका. सूबेदार को अपने एरिए का राजा समझने वाला भील अपने बचाव के बारे में सोच भी नहीं सका.

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शिवा मेरे साथ झोपड़ी में गया और वहां से एक कुल्हाड़ी और खून में सने अपने कपड़े जमीन से खोद कर मेरे हवाले कर दिए. वह बिलकुल शांत था, उस के चेहरे से घमंड साफ दिखाई दे रहा था. वह यही समझ रहा था कि उस ने एक व्यभिचारी एएसएम को अपनी पत्नी को बिगाड़ने का बदला ले लिया है.

लेकिन जिस रात वह एएसएम की हत्या करने के लिए कुल्हाड़ी ले कर उस जगह गया था, जहां एएसएम सोया करता था, वहां वह अफसर सोया हुआ था, जो निरीक्षण के लिए आया हुआ था.

हत्यारे ने अंधेरे में अपने शिकार को पहचाना नहीं, उसे यह पता था कि यहां हर रात वही बाबू सोता था, जिस के क्वार्टर में उस की जवान पत्नी दूध देने जाती थी.

उस के  ऊपर हत्या का भूत सवार था. हत्या करने के बाद उसे 20 मील दूर भी जाना था. उसे जब आजीवन कारावास की सजा हुई तो उसे इस का दुख नहीं था, दुख तो उस की पत्नी के प्रेमी के बच जाने का था.

प्रस्तुति : एस.एम. खान

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