नारी दुर्दशा का कारण धर्मशास्त्र और पाखंड

नारी को आज भी दोयम दर्जे का ही नागरिक समझा जाता है.सदियों से इनके ऊपर कई माध्यमों से जुल्म ढाने की परंपरा निरन्तर जारी है. इसमें धर्मशास्त्रों और पण्डे पुजारियों का भी अहम योगदान रहा है.

नारी के ऊपर शोषण और जुल्म में स्वयं नारी लोग ही मददगार की भूमिका में हैं.समाज में रिवाज और धर्म का पाठ पढ़ाकर नारियों को जुल्म के रसातल में डुबो दिया है. धर्म का कानून बनाने वाले मनु ने लिखा है,  ”स्त्री शूद्रों न धीयताम” यानी स्त्री और शूद्र को शिक्षा नहीं देनी चाहिए. अंधभक्त महिलाएं इन्हें ही अपना भगवान का हुक्म मानती हैं.

प्राचीन संत शंकराचार्य ने लिखा है, ”नारी नरकस्य द्ववारम”, यानी नारी नरक का दरवाजा है. लेकिन शायद उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इसी नरक के दरवाजे से तुम भी पैदा हुवे है. तुलसीदास ने जिसे उनकी पत्नी ने दुत्कार दिया था, लिखा है, ”अधम ते अधम, अधम अति नारी’, भ्राता पिता पुत्र उर गारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी.”

“होहिं विकल सक मनहिं न रोकी,जिमि रवि मणि द्रव रविही विलोकि”

अथार्त चाहे भाई हो ,चाहे पिता हो,चाहे पुत्र हो नारी को अच्छा लगने पर वह अपने को रोक नहीं पाती जैसे रविमणि, रवि को देखकर द्रवित हो जाती है, वैसी ही स्थिति नारी की हो जाती है. वह संसर्ग हेतु ब्याकुल हो जाती है.

“राखिअ नारि जदप उर माही।जुबती शास्त्र नृपति बस नाही”

अथार्त स्त्री को चाहे ह्रदय में ही क्यों न रख लो तो भी स्त्री शास्त्र,और राजा किसी के वश में नहीं रहती है. नारी को पीड़ा दिलवाने में तुलसीदास की इस  चौपाई ने आग में घी का काम किया है, ”ढोल गंवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”

धर्मग्रन्थों में नारियों और दलितों के ऊपर शोषण जुल्म के प्रपंचो से पूरा भरा हुआ है.इस साजिश और छल प्रपंच को आज तक दलित और महिलाएं समझ नही पाईं हैं. उनके ही समझाई में आज भी बहुत बड़ी आबादी चलने को विवश है. स्वर्ग नरक पुनर्जन्म भाग्य भगवान की पौराणिकवादी संस्कृति में फंसकर अगला जन्म सुधारने के चक्कर में नारियां स्वयं को पुरुष की दासी समझते हुवे अन्याय कष्ट सहकर भी झूठे गौरव का अनुभव करती है. माता पिता भी बेटियों को पराया धन समझकर कन्यादान करके उन्हें अन्यायपूर्ण जीवन जीने को विवश करते हैं. दहेज,कन्यादान,सतीप्रथा,देवदासी प्रथा, पर्दाप्रथा, योनिशुचिता प्रथा, वैधब्य जीवन आदि नारी विरोधी प्रथाएँ धर्म की देन हैं.

इन प्रथाओं को  ग्रन्थों ने खूब महिमामण्डित किया है.  बेवकूफ अंधविश्वासी पिताओं की सनक पर बेटियों की कुर्बानी को स्वयंबर का नाम दिया गया. जुए के दांव पर नारियां लगाई गईं. बच्चे   पाने के लिए जबरन ऋषियों को सौंपी गईं.

नारियों की सहने से ज्यादा दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने औरतों की पढ़ाई और सामाजिक आजादी के लिए काम किया.

1955-56 में नए हिन्दू कानूनों से भारतीय नारियों का बहुत बड़ा उपकार किया. जिन लोगों ने नारियों की भलाई के लिए काम किया आज की औरतें उनका नाम तक नहीं जानतीं. जिन शास्त्रों और पौराणिकवादी व्यवस्था ने इन पर जुल्म ढाए उनकी ही पूजा अर्चना आज तक महिलायें करती हैं.

पढ़ी लिखी औरतें भी व्रत, उपवास और गोबर तक की पूजा करती आ रही हैं और आज भी बदस्तूर जारी है.

गीता प्रेस की पुस्तक है,  ”गृहस्थ में कैसे रहें”  जिसके लेखक रामसुखदास हैं. इस पुस्तक में प्रश्न उतर के माध्यम से बताया गया है कि हिन्दू महिलाओं को कैसे जीवन जीना चाहिए. उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत कर रहें हैं.

प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए ?

उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न लें जाएं तो वह क्या करें ?

उत्तर: फिर तो उसे पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए. इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है? उसको पति की मार धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए. सहने से पाप कट जाएंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाए. यदि वह पति की मार पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिए और अलग रह कर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुवे एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिए.

इस पुस्तक में सैकड़ों इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर है जिसमें हिंदू परिवारों को दिशा निर्देश दिए गए हैं.

यह पुस्तक सती का समर्थन करती है और महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने की वकालत करती है. हिन्दू वादी संगठनों द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर आवाज उठाई जाती है. अगर यह देश हिंदू राष्ट्र बनता है तो क्या नारियों के ऊपर इसी तरह के कानून लागू किये जायेंगे? पड़ोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश में कट्टरवादी मुस्लिम संगठन भी इसी तरह की सोच रखते हैं. मुस्लिम धर्म में भी तीन तलाक, हलाला और पर्दा प्रथा जैसी दकियानूसी बातें हैं और उसका समर्थन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग करते हैं.इन कुप्रथाओं पर जब सवाल उठाये जाते हैं तो इस्लाम धर्म को मानने वाले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन मौत का फतवा जारी करते हैं. क्या हिंदू राष्ट्र में ऐसा ही होगा?

आज औरतों पर शोषण और जुल्म ढाने का हथियार के रूप में इन धार्मिक पुस्तकों का उपयोग किया जाता है.इसे बढ़ावा देने और प्रचार प्रसार करने में साधू,  महात्मा, पंडे,  पुजारी, मुल्ला लोग लाखों की संख्या में एजेंटों के रूप में कार्य कर रहे हैं.

देश के कोने कोने से महिलाओं के साथ अपने पति द्वारा जुआ में हारने जैसी कुकृत्य, अत्याचार ,अनाचार और बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आते रहती है जिन पर सहज रूप से विश्वास भी नहीं होता.

इस तरह की एक घटना जौनपुर जिला के जफराबाद थाना क्षेत्र के शाहगंज की  है. एक जुआरी शराबी पति ने सारे रुपये हारने के बाद अपने पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया. वह जुए में अपनी पत्नी को हार गया. इसके बाद उसके जुआरी दोस्तों ने उसके पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

दूसरी घटना कानपुर की है. जुआ खेलने के एक शौकीन पति ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. दांव हारने पर उसके चार दोस्तों ने उसके पत्नी पर हक जमाते हुए सामूहिक दुष्कर्म करना चाहा लेकिन बीबी किसी तरह किचन में घुस गई और उसने पुलिस को फोन कर दिया. तत्काल में पुलिस आ जाने की वजह से तारतार हो रही इज्जत बच गई.

महाभारत में द्रौपदी को जुए में हारने की घटना सर्वविदित है. आज भी दीवाली जैसे त्यौहार में संस्कृति और परम्परा के नाम पर जुआ खेलने का रिवाज सभ्य समाज तक में भी बरकरार है. सड़ी गली परम्परा को आज भी हम अपने कंधों पर ढो रहे है.

औरतों के ऊपर शोषण और जुल्म का समर्थन औरतों द्वारा ही किया जाता है. एजेंट के रूप में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

हर गाँव मे धार्मिक गुरुओं  द्वारा शिव चर्चा,  माता की चौकी, जागरण, हवन और प्रवचनों की बाढ़ सी आ गयी है जिसमें महिलाओं की हीउपस्थिति अधिक होती है. शुद्ध घी अपने परिवारवालों को नहीं खिला कर अंधभक्ति में जलाया जा रहा है.

अपने बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करके धार्मिक कर्मकांडों पर अपनी मेहनत की कमाई महिलाएं खर्च कर रही हैं. पूजा पाठ, व्रत उपवास में महिलाएं रोबोटों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं. हवनों, यज्ञों में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है. शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है .

गांव गांव में मंदिर और मस्जिद बन रहे हैं. ज्ञान का केंद्र पुस्तकालय जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में थे मृतप्राय हो गए हैं. आपसी बातचीत भी खत्म होने की कागार पर है.

गांवो में सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों की हालत बहुत चिंतनीय है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ज्ञान का केंद्र जब नेस्तनाबूद होगा तो समाज मे अंधविसश्वास और धार्मिक पाखण्डों का मायाजाल बढ़ेगा ही. धार्मिक पाखण्डों को बढ़ावा देने में केंद्र की सरकार और चारण गाने वाले मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका में है.

छोटी जात की बहू

दिनेश जब से काम के लिए लखनऊ गया है, उस की पत्नी भूरी परेशान है. इस की वजह है भूरी का जेठ सुरेश, जो कई बार उस के साथ गलत हरकत कर चुका है. वह हर वक्त उसे ऐसे घूरता है, मानो आंखों से ही निगल जाएगा. जब देखो तब किसी न किसी बहाने उसे छूने की कोशिश करता है.

आज सुबह तो हद ही हो गई. भूरी नहाने के बाद छत पर धोए हुए कपड़े सुखाने गई तो सुरेश उस के पीछेपीछे छत पर पहुंच गया.

भूरी बालटी से कपड़े निकाल कर रस्सी पर डाल ही रही थी कि सुरेश ने चुपचाप पीछे से आ कर उसे कमर से पकड़ लिया.

भूरी मछली की तरह तड़प कर उस की जकड़ से निकली और उस को धक्का मारते हुए सीढि़यों से नीचे भागी.

रसोई के दरवाजे पर पहुंच कर वह सास के आगे फूटफूट कर रोने लगी.

उस को इस तरह रोते देख सास ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? क्यों रोती है?’’

भूरी बस छत की ओर उंगली उठा कर रह गई, कुछ बोल नहीं पाई.

‘‘अरे बोल न, कौन मर गया?’’

भूरी चुपचाप आंसू पोंछती हुई सास के सामने से हट कर अपनी कोठरी में आ गई. सास से जेठ की शिकायत करना फुजूल था. वह उलटा भूरी पर ही बदचलनी का आरोप लगा देती. फिर दरवाजे पर बैठ कर दहाड़ें मारमार कर सिर पटकती कि बेटे ने निचली जात की औरत से ब्याह कर के खानदान की नाक कटवा दी. देखो, खुद बदन उघाड़े घूमती है और फिर जेठ और ससुर पर इलजाम लगाती है.

इस महल्ले के ज्यादातर लोग इन्हीं लोगों की जात वाले हैं. वे इन्हीं की बातों पर भरोसा करेंगे, भूरी का दर्द कोई नहीं समझेगा. हद तो उस दिन हो गई थी, जब दिनेश पहली बार भूरी को ले कर मंदिर में गया और पुजारी ने भूरी को मंदिर की पहली सीढ़ी पर ही रोक दिया.

पुजारी ने दिनेश से साफ कह दिया कि वह चाहे तो मंदिर आए, मगर अपनी पत्नी को हरगिज न लाए.

पुजारी की बात का दिनेश विरोध भी नहीं कर पाया था, उलटे हाथ जोड़ कर पुजारी से माफी मांगने लगा था. फिर भूरी को सीढि़यों पर छोड़ कर वह मंदिर के भीतर चला गया था.

दिनेश सारे रास्ते भूरी को समझाता आया था कि अभी नईनई बात है, धीरेधीरे सब उसे स्वीकार कर लेंगे. उसे इन बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए.

दरअसल, भूरी का परिवार दिहाड़ी मजदूर था. लखनऊ में दिनेश एक छोटे से रैस्टोरैंट में वेटर का काम करता था. उसी रैस्टोरैंट के सामने वाली मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में काम चल रहा था, जहां भूरी अपने मांबाप और भाइयों के साथ ईंटगारा ढोने का काम कर रही थी. भूरी का पूरा परिवार बिल्डिंग के कंपाउंड में ही तंबू डाल कर रह रहा था. बिल्डिंग का काम अभी कई साल चलना था, इसलिए ठेकेदार ने गांव के कई परिवारों को यहां दिहाड़ी मजदूरी पर रखा हुआ था. इसी में से एक परिवार भूरी का भी था.

काफी समय से रात में रैस्टोरैंट का काम खत्म होने के बाद दिनेश भी इन लोगों के साथ आ कर बैठने लगा था. भूरी के भाई से उस की दोस्ती हो गई थी. दिनेश ने जब भूरी को देखा तो उस का दिल भूरी पर आ गया. भूरी को भी दिनेश अच्छा लगता था. दोनों के बीच प्यार हो गया. 2-4 बार संबंध भी बन गए, जबकि जगह भी सही नहीं थी.

दिनेश भी पूरी तरह से भूरी के लिए कुरबानी करने को तैयार हो गया. दिनेश ने भूरी के बाप से उस का हाथ मांग लिया. भूरी के बाप ने दिनेश को जातपांत समझाई, मगर दिनेश ने यह कह कर उन को चुप करा दिया कि वह ये सब बातें नहीं मानता है. उसे उन लोगों से कोई दानदहेज भी नहीं चाहिए. वे बस भूरी को उस के साथ दो कपड़ों में ब्याह दें.

भूरी के पिता को और क्या चाहिए था. अच्छाखासा लड़का मिल रहा था. पढ़ालिखा था. रैस्टोरैंट में वेटर था और उन से ऊंची जाति का था.

भूरी के परिवार वालों ने दिनेश के परिवार की ज्यादा खोजबीन नहीं की. अपने परिवार के बारे में दिनेश ने जितना बताया, उसी पर यकीन कर लिया.

दिनेश लखनऊ में 4 दोस्तों के साथ एक कमरा शेयर कर के रह रहा था. उस ने भूरी के बाप से कहा कि शादी के बाद वह जल्दी ही लखनऊ में कोई छोटा सा घर ले लेगा, तब तक भूरी को अपने साथ नहीं रख पाएगा. भूरी उन्नाव में उस के घर पर परिवार के साथ रहेगी.

भूरी के पिता राजी हो गए तो दिनेश ने लखनऊ में ही एक मंदिर में भूरी से शादी कर ली. शादी में उस के परिवार से तो कोई नहीं आया, लेकिन उस के रैस्टोरैंट के दोस्त और मालिक जरूर शामिल हुए.

शादी के बाद जब दिनेश भूरी को ले कर अपने घर उन्नाव आया, तो वहां का हाल देख कर भूरी सहम गई. सब ने मिल कर दोनों को खूब खरीखोटी सुनाई. भूरी से उस की जातपांत पूछी. दानदहेज में क्या मिला, यह पूछा. और जब पता चला कि भूरी निचली जाति की है और उस पर खाली हाथ आई है तो सब उस के दुश्मन हो गए.

शादी के बाद बस हफ्तेभर की छुट्टी दिनेश को मिली थी. हफ्ता खत्म हुआ तो वह लखनऊ जाने को तैयार हो गया. भूरी ने लाख मिन्नत की कि वह उसे अपने साथ ले चले, मगर उस ने कहा कि वह यहीं रहे और घर वालों की सेवा करे. मगर इस घर में भूरी किसी की क्या सेवा करती? वह तो यहां किसी चीज को हाथ भी नहीं लगा सकती थी. भूरी को स्वीकार करना तो दूर, यहां तो लोग उस की बेइज्जती पर ही उतर आए.

भूरी का ससुर और जेठ, जो दिन में उस पर ‘नीच जात की औरत’ बोल कर उस के हाथ का पानी भी नहीं पीते हैं, रात के अंधेरे में उस के जिस्म का सुख उठाने के लिए तैयार रहते हैं. उन की लाललाल आंखों से हर वक्त हवस टपकती है.

भूरी को पता है कि उन की इस मंशा में उस की सास की पूरी सहमति है. वे तो चाहती हैं कि भूरी के साथ कोई अनहोनी हो जाए और फिर वे उस पर आरोप लगा कर, उसे बदचलन साबित कर के घर से बाहर का रास्ता दिखा दें.

दिनेश के लखनऊ जाने के बाद तो उन का मुंह खूब खुलता है. खूब ताने मारती हैं, गालीगलौज करती हैं.

भूरी ब्याह कर आई तो सास ने बड़ी हायतोबा मचाई थी. रसोई में कदम नहीं धरने दिया था. तब दिनेश ने भूरी के लिए आंगन के कोने में एक चूल्हा और कुछ राशनबरतन का इंतजाम कर दिया था. तब से भूरी अपना और दिनेश का खाना वहीं बनाती है.

पानी के लिए जहां घर के बाकी लोग नल का इस्तेमाल करते थे, वहीं भूरी गोशाला में लगे हैंडपंप से पानी भरती थी. पिछवाड़े में बने टूटेफूटे शौचालय का भूरी इस्तेमाल करती थी. उस ने कई बार अपने जेठ को इस शौचालय के इर्दगिर्द मंडराते देखा था. वह कोशिश करती थी कि जब जेठ घर पर न हो, तभी उधर जाए.

अपने ससुर और जेठ से भूरी जैसेतैसे अपनी इज्जत बचाए हुए है. रात को वह अपनी कोठरी का दरवाजा कस के बंद करती है, फिर कमरे में पड़ी लकड़ी की अलमारी खिसका कर दरवाजे से अड़ा देती है. भूरी की जेठानी 2 बच्चों के साथ अपने मायके में ही रहती है.

दरअसल, उस की भी सास से बनती नहीं है. हालांकि वह इन्हीं लोगों की जात की है और सुना है कि बड़ी तेजतर्रार औरत है. जेठ उस से दबता है. महीने के महीने खर्चे के पैसे उसे उस के घर दे कर आता है. जब सुरेश 2-3 दिनों के लिए अपनी ससुराल जाता है, तब भूरी को बड़ा सुकून मिलता है. उस के जिस्म से लिपटी गंदी नजरों की जंजीरें थोड़ी कम हो जाती हैं. ससुर की अभी इतनी हिम्मत नहीं पड़ी है कि उसे छू ले, मगर घूरता जरूर रहता है.

दिनेश ने जाते वक्त भूरी से कहा था कि वह अपने अच्छे बरताव से घर वालों का दिल जीत ले, लेकिन यहां तो हाल ही अलग है. सब नीच कह कर उसे दुत्कारते रहते हैं और उस का उपभोग भी करना चाहते हैं. ऐसे लोगों का वह क्या दिल जीते? ऐसे लोगों को वह क्या अपना समझे? इन से तो वह हर समय डरीसहमी रहती है. पता नहीं, कब क्या कांड कर बैठें.

ऊंची जातियों के लड़के चाहे पिछड़ों की लड़कियों से शादी करें या दलितों की, मुश्किल से ही निभा पाते हैं, क्योंकि कम परिवार ही उन्हें घर में जगह देते हैं. पंडेपुजारियों का जाल चारों ओर इस तरह फैल गया है कि बारबार कुंडली, रीतिरिवाजों की दुहाई दी जाती है. इस में पिछड़ों के लड़केलड़कियां बुरी तरह पिसे हैं. वे मनचाहे से प्रेम नहीं कर सकते, दोस्ती तक करने में जाति आड़े आती है.

जब तक दिल मजबूत न हो और ऊंची या नीची जाति का पति अपने पैरों पर खड़ा न हो, ऐसी शादियों को आज की पंडा सरकार भी कोई बचाव न करेगी, यह तो खुद करना होगा. पिछड़ों का इस्तेमाल तो किया जाएगा, पर उन्हें बराबर की जगह न मिलेगी चाहे पत्नी ही क्यों न बन जाए.

मुसहर : व्यवस्था का दंश झेलता एक समुदाय

42 साल की कबूतरी की आंखें धंसी हुई हैं. इतनी कम उम्र की शहरी महिलाएं जहां लकदक कपङों में फिटफाट दिखती हैं, वहीं कबूतरी की बदन की हड्डियां दिख रही हैं. वह रात में अच्छी तरह देख नहीं पाती. अभी हाल ही में सरकारी अस्पताल गई थी तो हाथगोङ पकङने पर डाक्टर देखने को राजी हुए थे. डाक्टर साहब ने बताया था कि उसे मोतियाबिंद है और औपरेशन करना होगा.

कबूतरी औपरेशन का मतलब समझती है, भले ही वह पढीलिखी नहीं है. वह घबरा गई.

वह बोलने लगी,”न न… बाबू, बरबेशन नै करवैभों. मरिये जैबे हो…” ( न न… साहब, औपरेशन नहीं कराऊंगी. मर ही जाऊंगी)

वह किसी के लाख समझाने पर नहीं मानती, क्योंकि हाल ही में उस के टोला में एक महिला सोनबरसी की मौत डिलीवरी के दौरान हो गई थी. इस से वह डरी हुई थी. सोनबरसी की डिलीवरी कराने बगल के एक गांव की दाई और एक झोला छाप डाक्टर आए थे. पैसा बनाने के लिए शरीर में फुजूल का पानी चढ़ा दिया था. इस से शरीर अचानक से फूला और फिर सोनबरसी की मौत हो गई.

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कबूतरी के घर के पास ही उस के 3 बच्चे नंगधङंग खेल रहे थे. वे मिट्टी में लकङी के कोन से लकीर खिंचते  और फिर उन्हें मिटाते रहते. पति बनवारी काम पर गया था. वह दिहाङी मजदूर है. एक दिन की दिहाङी ₹300 से घर के 5-6 लोगों का पेट चलना मुश्किल होता है, वह भी तब जब काम रोजाना मिलता नहीं. जब काम नहीं मिलता कई दिनों तक तो मन को तो समझा लिया जाता है पर पेट को कैसे समझाएं, वह तो भरी दोपहरी के बाद ही अकुलाने लगता है.

ऐसे में बनवारी और उस के टोले के 4-5 लोग चूहा पकङने खेतों की ओर निकल पकङते हैं. जिस के हिस्से में जितने चूहे आते हैं उस दिन इन की मौज रहती है. पुआल और फूस से बने घर के आगे चूल्हे में चूहा पकाया जाता है और बच्चे इंतजार कर रहे होते हैं. फिर सब नमक डाल कर पके चूहे खाते हैं. अभी बरसात का समय है और इन दिनों मुसहर समाज के लोग चूहे से अधिक जिंदा घोंघा खाते हैं.

गांवों में आमतौर पर आम, पपीते, अमरूद के पेङ लगे होते हैं पर क्या मजाल कि कोई तोङ ले. खेत का मालिक इन्हें देख कर दूर से ही हङकाने लग जाते हैं. मगर खेतों से चूहे पकङने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता, क्योंकि चूहे खेत में लगी फसल को कुतरकुतर कर उखाङ देते हैं और फसल खराब हो जाती है.

गांव के दबंग खेतिहर आज भी इन्हें गिद्ध समझते हैं, जो ले तो कुछ नहीं पाता अलबत्ता देते जरूर हैं. शादीब्याह या अन्य अवसरों पर इन से कमरतोङ काम लिया जाता है, लोग मालपुए उङा रहे होते हैं और ये दूर से बस निहारते रहते हैं. हां, खापी कर फेंके गए कचरे से ये खाने का कुछ ढूंढ़ते हैं और वही खा कर संतोष कर जाते हैं.

इन की ‘किस्मत’ ही यही है. शायद तभी ऊंची जाति के लोग यही कहते हैं कि इन्हें उन के भगवान ने सेवादार बना कर भेजा है. ये दलित कहलाते हैं, ऊपर से सरकार ने इन्हें महादलित का दरजा दे दिया है. लोग इन्हें मुसहर कहते हैं.

*नाम पर जाति दर्ज*

हम बात कर रहे हैं मुसहर जाति का जो भारत की आजादी के दशकों बीत जाने के बाद आज भी चूहे और घोंघे मार कर खा रहे हैं.

आज भी चाहे वह मोची की दुकान हो, कारखाने हों, खेतों में काम करते मजदूर हों, 21वीं सदी के भारत का एक सच यह भी है कि इंसान चूहे खा रहा है और सामाजिक व्यवस्था ने उसे नाम दिया मुसहर.

यह जाति खेतों में, जंगलों में, पहाड़ों में आज भी चूहे ढूंढ़ती मिल जाएगी. यह नए भारत की तसवीर नहीं, दशकों से व्यवस्था का दंश झेलता वह समुदाय है, जिस ने कभी मजबूरी में इसे आहार बनाया होगा मगर आज भी सरकारी दस्तावेजों में उसी के नाम पर उस की जाति दर्ज है, मुसहर यानी जो मूस (चूहे) को खाता है.

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बिहार से ले कर झारखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और नेपाल की तराई में पाई जाने वाली यह एक ऐसी जाति है जिस का आज भी कोई अस्तित्व नहीं. बिहार में विभिन्न जगहों पर यह अलगअलग नामों से जाने जाते हैं. उत्तर बिहार में लोग इन्हें मांझी कहते हैं. मगध क्षेत्र में मांझी को भुइंया बोलते हैं.

*एक था दशरथ मांझी*

मगर हासिए पर रही इस जाति की पङताल कुछ लोगों ने तब शुरू की जब साल 2015 में दशरथ मांझी की जीवनी पर आधारित फिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ प्रदर्शित हुई थी.

यह फिल्म बिहार के गया जनपद के एक गांव में जन्मे दशरथ मांझी की एक सच्ची कहानी पर आधारित थी.

मांझी एक गरीब परिवार का आदमी था. गरीबी में रहते हुए उस ने ईमानदारी नहीं छोङी थी और सब से रोचक बात यह कि वह अपनी बीवी से बेपनाह मुहब्बत करता था.

जब उस की बीवी पेट से हुई तो गांव से शहर जाना दूर इसलिए था कि बीच में एक पहाङ पङता था. मांझी समय पर अपनी बीवी को अस्पताल नहीं ले जा सका और रास्ते में ही उस की बीवी ने दम तोड़ दिया.

इस से दशरथ मांझी को इतना गुस्सा आया कि उस ने केवल एक हथौड़ा और छेनी ले कर 360 फुट लंबी, 30 फुट चौङी और 25 फुट ऊंचे पहाङ को काट कर सङक बना डाली.

इस काम में दशरथ को पूरे 22 साल लगे थे और इस के बाद गांव से शहर की दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया था.

जब लोग उसे पहाङ तोङते देखते तो उसे पागल कहते, हंसते और मजाक उङाते. पर दशरथ जीवट था. सिर्फ दशरथ ही नहीं मुसहर होते ही हैं बेहद जीवट और मेहनती.

मुसहर आमतौर पर दक्षिण बिहार और झारखंड के इलाके में अधिक पाए जाते हैं. देश की आजादी के दशकों बीत जाने के बाद यह आज भी समाज का भूमिहीन मजदूर वर्ग है. इन के पास संपत्ति के नाम कुछ नहीं होता. घर के सभी लोग मजदूरी कर के जीवनयापन करते हैं.

*आज भी हासिए पर*

आज भी मुसहरों में शिक्षा का घोर अभाव है. यों मुसहर जाति बिहार की 23 दलित जातियों में तीसरे स्थान पर है. बिहार में दलितों की कुल जनसंख्या में मुसहरों का प्रतिशत लगभग 14% है. 1871 में जनगणना के बाद पहली बार इस जाति को जनजाति का दरजा दिया गया था. अभी बिहार में इसे महादलित का दरजा दिया गया है.

इतना ही नहीं, आजादी के बाद से अब तक इस समूह का कोई संगठित राजनीतिक स्वरूप भी नहीं रहा है न ही इन का कोई एक सर्वमान्य नेता पैदा हुआ. हां, छिटपुट रूप से कुछ लोग राजनीति में थोड़ी देर के लिए जरूर चमके लेकिन अपनी पहचान नहीं बना पाए या फिर कहें कि राजनीति के खिलाड़ियों ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया.

*मुसहर और राजनीति*

अलबत्ता 1952 की लोकसभा चुनाव में ही पहला और अकेला मुसहर सांसद कांग्रेस के टिकट पर सांसद बना था, नाम था किराई मुसहर. लेकिन इस के बाद कोई मुसहर राजनीति में स्थापित नहीं हो पाया.

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हालांकि उस के बाद इस जाति से कई बड़े नेता सामने आए. सीपीआी के नेता रहे भोलाराम मांझी 1957 में बिहार के जमुई विधानसभा सीट से विधायक बने थे. इस के बाद 1971 में वे लोकसभा के सांसद भी बने.

मुसहरों के एक और बड़े नेता 70-80 के दशक में हुए मिश्री सदा. 1972 में वे राज्य सरकार में मंत्री बने थे.

लेकिन हाल के सालों में सब से अधिक चर्चा हुई जीतन राम मांझी की. वे पहली बार 1985 में बिहार सरकार में राज्यमंत्री बने थे.

जितनी धीमी गति से मुसहरों में राजनीतिक जागरूकता आई उतना ही धीमा उन का शैक्षिणिक व साममाजिक विकास भी रहा. मुसहर समाज में आज भी अंधविश्वासों का बोलबाला है. डायन बता कर मुसहर महिलाओं को प्रताड़ित करने की घटनाएं भी देखनेसुनने को मिलती रही हैं. शायद तभी आज भी मुसहरों में चूहा मारने और घोंघा खाने का प्रचलन बना हुआ है.

आबादी के लिहाज से बिहार के गया, रोहताश, अररिया, सीतामढ़ी मुसहरों की घनी आबादी वाले जिले हैं. इस के अलावा समस्तीपुर, बेगूसराय और खगड़िया के कुछ हिस्सों में भी मुसहर बहुत बड़ी संख्या में हैं.

2010 के बिहार विधानसभा में कुल 9 मुसहर विधायक थे. लेकिन सब से अधिक चर्चा में रहे जीतनराम मांझी. वे 2014 में बिहार के 23वें मुख्यमंत्री बने पर लगभग साल भर तक के लिए ही.

*सिर्फ कठपुतली बने रहे जीतनराम*

जीतनराम ने कई अवसरों पर बताया था कि नीतीश कुमार ने उन का सिर्फ इस्तेमाल किया था. जीतनराम मांझी का मुख्यमंत्री बनना उन लोगों को भी रास नहीं आ रहा होगा जो एक मुसहर को अपना मुख्यमंत्री और नेता मानने से इनकार करते रहे होंगे,

खासकर बिहार जैसे प्रदेश में जहां समाज से ले कर राजनीति तक में जातिवाद का जहर फैला हो और जहां विकास के नाम पर नहीं, जातिगत आधार पर वोट डाले जाते रहे हों.

शिक्षा में कमी की वजह से इस समुदाय में अंधविश्वास का बोलबाला है. अभी हाल ही में गया से सटे मुसहर बस्ती में बच्चों में चेचक महामारी की तरह फैल गया था पर बस्ती के लोग इलाज कराने से अधिक जादूटोने और भगती में यकीन रखते थे. पिछले साल बिहार में फैले चमकी बुखार से भी इस समुदाय के सैकङों बच्चों की जानें गई थीं.

ऐसे में उस बिहार में जहां जातिवाद चरम पर हो और यहां तक कि वोट भी विकास पर नहीं जातिगत आधार पर डाले जाते हों, मुसहरों के दिन फिरेंगे ऐसा दूरदूर तक नजर नहीं आता.

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घोर उपेक्षा के शिकार इस समुदाय पर न तो सरकार का ध्यान गया और न ही समाज के ठेकेदारों का, जो धर्म और जाति के नाम पर मुसहरों से मजदूरी तो कराता है पर उसे घर के अंदर आने की अनुमति आज भी नहीं है.

समाज की पंगु सोच को कंधे पर उठाया

बचपन में जब मैं अपने मामा के गांव रेलगाड़ी से जाता था, तो वे गांव से 3 किलोमीटर दूर पैदल रेलवे स्टेशन पर मुझे और मां को लेने आते थे. इस के बाद हम तीनों पैदल ही गांव की तरफ चल देते थे. पर कुछ दूर चलने के बाद मामा मुझे अपने एक कंधे पर बिठा लेते थे.

चूंकि मामा तकरीबन 6 फुट लंबे थे, तो उन के कंधे से मुझे पतली सी सड़क से गुजरते हुए आसपास की हरियाली और खेतखलिहान दिखते थे. उस सफर का रोमांच ही अलग होता था. खुशी और डर के मारे मेरी आंखें फट जाती थीं.

तब मामा जवान थे और मैं दुबलपतला बालक. मामा को शायद ही कभी मेरा बोझ लगा हो. पर हाल ही में एक ऐसा वाकिआ हुआ है, जिस ने पूरे समाज पर जिल्लत का बड़ा भारी बोझ डाल दिया है.

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मध्य प्रदेश का झाबुआ इलाका आदिवासी समाज का गढ़ है. वहां से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिस में एक औरत को सजा के तौर पर अपने पति को कंधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाना पड़ा. उसे सजा क्यों मिली? दरअसल, उस औरत पर आरोप लगा था कि उस का किसी पराए मर्द के साथ चक्कर चल रहा था.

वीडियो में दिखा कि एक औरत अपने पति को उठा कर चल रही थी और पीछेपीछे गांव वाले. एक जगह जब वह औरत थक गई, तो उसे छड़ी से पीटा भी गया.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी औरत को सरेआम बेइज्जत किया गया हो, वह भी एकतरफा फैसला सुना कर. दुख की बात तो यह थी कि उस औरत का मुस्टंडा पति इस बात की खिलाफत तक नहीं कर पाया.

पिछले साल का जुलाई महीने का एक और किस्सा देख लें. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाइब्रैंट गुजरात के बनासकांठा जिले के दंतेवाड़ा तालुका के 12 गांवों में ठाकोर तबके की खाप पंचायत ने एक अजीबोगरीब प्रस्ताव पास किया था, जिस में ठाकोर समाज की कुंआरी लड़कियों को मोबाइल फोन रखने की मनाही कर दी गई. यह भी ऐलान किया कि जो भी लड़की मोबाइल फोन के साथ पकड़ी जाएगी, उस के पिता पर खाप पंचायत जुर्माना लगाएगी.

सवाल यह है कि मोबाइल फोन रखने की मनाही सिर्फ लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़कों पर यह पाबंदी क्यों नहीं? क्या मोबाइल फोन रखने से सिर्फ लड़कियां ही बिगड़ती हैं?

आज कोरोना महामारी के बाद जब से स्कूल बंद हुए हैं, तब से बहुत से स्कूल बच्चों को औनलाइन क्लास की सुविधाएं दे रहे हैं, ताकि कल को अगर सरकार इम्तिहान लेने का नियम बना देगी, तो बच्चों को परेशानी न हो. ऐसे में स्कूल जाने वाली कुंआरी लड़कियों के पास अगर मोबाइल फोन नहीं होगा, तो क्या वे पढ़ाईलिखाई में पिछड़ नहीं जाएंगी?

एक और मामला साल 2018 का है. राजस्थान के बूंदी जिले में अंधविश्वास के चलते एक 6 साल की मासूम बच्ची को 9 दिनों तक सामाजिक बहिष्कार का दर्द झेलना पड़ा.

बूंदी जिले के एक गांव हरिपुरा के बाशिंदे हुक्मचंद रैगर ने बताया कि 2 जुलाई को उन की 6 साल की बेटी खुशबू अपनी मां के साथ स्कूल में दाखिले के लिए गई थी. वहां पर दूध पिलाने के लिए बालिकाओं की लाइन लग रही थी. इसी दौरान अचानक खुशबू का पैर टिटहरी नाम के एक पक्षी के अंडे पर पड़ गया, जिस से अंडा फूट गया.

इस घटना को अनहोनी मानने के बाद गांव में तुरंत पंचपटेलों ने बैठक बुलाई और मासूम खुशबू को समाज से बाहर करने का फरमान सुना दिया. खुशबू के अपने घर के अंदर घुसने तक पर रोक लगा दी गई. उसे खाना खाने और पीने के पानी के लिए भी अलग से बरतन दिए गए.

पंचपटेलों के फरमान के चलते पिता 9 दिन अपने बेटी को ले कर घर के बाहर बने बाड़े में रहा था. पिता के मुताबिक, इस दौरान पंचपटेलों ने शराब की बोतल व चने भी मंगवाए थे.

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जब इस मामले की जानकारी तहसीलदार व थाना प्रभारी को मिली, तो उन्होंने पंचपटेलों को इकट्ठा किया. इस के बाद सरकारी अफसरों की मौजूदगी में गांव वालों ने मासूम खुशबू को 9 दिन बाद अपने रीतिरिवाजों को निभाते हुए घर के अंदर दाखिल करवाया. इस से पहले गांव में चने बांटे गए और परिवार के जमाई को तौलिया भेंट किया गया.

कितने शर्म की बात है कि एक मासूम बच्ची को किसी पक्षी का अंडा फोड़ने की इतनी बड़ी सजा दी गई. वह भी तब जब उस लड़की ने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया था. उस से तो जैसे महापाप हो गया. फिर तो उन पंचपटेलों को भी इस पाप का भागीदार होना चाहिए, जिन्होंने लड़की के पिता से शराब की डिमांड की. शराब पीना भी तो एक सामाजिक बुराई है, पर पंचपटेलों को सजा देने का जोखिम कौन उठाए?

समाज में ऐसे किस्सों की कोई कमी नहीं है, जहां नाक के सवाल पर औरतों और मासूम बच्चियों को मर्द समाज के बचकाने फैसलों का शिकार बनना पड़ता है. बचकाने क्या तानाशाही फैसले ही कहिए.

इस में जाति का दंभ बहुत अहम रोल निभाता है. दूसरी जाति की तो बात ही छोड़िए, अपनी जाति के लोग खाप के नाम पर मासूमों पर तरहतरह से जुल्म ढाते हैं. किसी ने परिवार के खिलाफ जा कर प्रेम विवाह क्या कर लिया, उसे मार दिया जाता है. अगर परिवार वाले मान भी जाएं, तो समाज के ठेकेदार उन्हें उकसा कर अपराध करने के लिए मजबूर कर देते हैं. पगड़ी उछलने की दुहाई दे कर उन से अपनों का ही बलिदान मांगते हैं. परिवार वाले गुस्से में कांड कर के जेल पहुंच जाते हैं और जाति के ये सर्वेसर्वा किसी दूसरे शिकार की टोह में निकल पड़ते हैं.

और अगर जाति के साथ दूसरे धर्म का नाता भी जुड़ जाता है, तो फिर बात दंगे तक पहुंच जाती है. उत्तर प्रदेश के जौनपुर में तो 2 समुदायों के बच्चों के बीच मवेशी चराने के दौरान हुए मामूली से झगड़े ने सांप्रदायिक रूप ले लिया था.

भारत में ऐसे विवादों का भुगतभोगी एससी समाज ही रहा है. वह आज भी अपनी पहचान तलाश रहा है. वोटों के लिए तो नेता उन्हें अपने गले से लगा लेते हैं, उन के झोंपड़ों में जा कर रोटी खा लेते हैं, पर जब अपने समाज पर आंच की बात आती है, तो उन को दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक देते हैं.

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एसटी समुदाय भी कमोबेश ऐसे ही हालात में जी रहा है. वह तो भला हो कि झाबुआ वाले कांड में सताई गई औरत आदिवासी समाज से थी, जो अपने तन और मन से बहुत मजबूत होती हैं और इसलिए उस ने अपने पति को कंधे पर बिठा कर पूरा गांव घुमा दिया, वरना किसी शहरी और ऊंची जाति की औरत में ऐसा करने का माद्दा शायद ही दिखता.

आधार कार्ड और पास बुक रख हो रहा व्रत

लेखक- पंकज कुमार यादव

कोरोना महामारी भले ही देश पर दुनिया के लिए त्रासदी बन कर आई है, पर कुछ धूर्त लोगों के लिए यह मौका बन कर आई है और हमेशा से ही ये गिद्ध रूपी पोंगापंथी इसी मौके की तलाश में रहते हैं.

जैसे गिद्ध मरते हुए जानवर के इर्दगिर्द मंडराने लगते हैं, वैसे ही भूखे, नंगे, लाचार लोगों के बीच ये पोंगापंथी उन्हें नोचने को मंडराने लगते हैं. फिर मरता क्या नहीं करता की कहावत को सच करते हुए भूखे लोग, डरे हुए लोग कर्ज ले कर भी पोंगापंथियों का पेट भरने के लिए उतावले हो जाते हैं.

उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उन का बीमार बेटा बीमारी से मुक्त हो जाएगा. उन का पति जो पिछले 5 दिनों से किसी तरह आधे पेट खा कर, पुलिस से डंडे खा कर नंगे पैर चला आ रहा है, वह सहीसलामत घर पहुंच जाएगा. फिर भी उन के साथ ऐसा कुछ नहीं होता है. पर कर्मकांड के नाम पर, लिए गए कर्ज का बोझ बढ़ना शुरू हो जाता है.

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कुछ ऐसी ही घटना कोरोना काल में झारखंड के गढ़वा जिले में घटी है. सैकड़ों औरतों के बीच यह अफवाह फैलाई गई कि मायके से साड़ी और पूजन सामग्री मंगा कर अपने आधारकार्ड और पासबुक के साथ सूर्य को अर्घ्य देने से उन के खाते में पैसे आ जाएंगे और कोरोना से मुक्ति भी मिल जाएगी.

यकीनन, इस तरह की अफवाह को बल वही देगा, जिसे अफवाह फैलाने से फायदा हो. इस पूरे मामले में साड़ी बेचने वाले, पूजन सामग्री, मिठाई बेचने वाले और पूजा कराने वाले पोंगापंथी की मिलीभगत है, क्योंकि इस अफवाह से सीधेसीधे इन लोगों को ही फायदा मिल रहा है.

इस अफवाह को बल मिलने के बाद रोजाना सैकड़ों औरतें इस एकदिवसीय छठ पर्व में भाग ले रही हैं. व्रतधारी सुनीता कुंवर, गौरी देवी, सूरती देवी ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि किस के कहने पर वे व्रत कर रही हैं, पर उन के मायके से उन के भाई और पिता ने साड़ी और मिठाइयां भेजी हैं. क्योंकि गढ़वा जिले में ही उन के मायके में सभी लोगों ने पासबुक और आधारकार्ड रख कर सूर्य को अर्घ्य दिया है.

सब से चौंकाने वाली बात ये है कि इस अफवाह में सोशल डिस्टैंसिंग की धज्जियां उड़ गई हैं. सभी व्रतधारी औरतें एक लाइन से सटसट कर बैठती?हैं और पुरोहित पूजा करा रहे हैं.

सभी व्रतधारी औरतों में एक खास बात यह है कि वे सभी मजदूर, मेहनतकश और दलित, पिछड़े समाज से आती हैं. उन के मर्द पारिवारिक सदस्य इस काम में उन की बढ़चढ़ कर मदद कर रहे हैं.

एक व्रतधारी के पारिवारिक सदस्य बिगुन चौधरी का कहना है कि अफवाह हो या सच सूर्य को अर्घ्य देने में क्या जाता है.

प्रशासन इस अफवाह पर चुप है, जो काफी खतरनाक है, क्योंकि इस व्रत में वे औरतें भी शामिल हुई हैं, जो दिल्ली, मुंबई या पंजाब से वापस लौटी हैं और जिन पर कोरोना का खतरा हो सकता है.

प्रशासन ने भले ही अपना पल्ला झाड़ लिया हो, पर राज्य में जिस तरह से प्रवासी मजदूरों के आने से कोरोना के केस बढ़ रहे हैं तो चिंता की बात है, क्योंकि मानसिक बीमारी भले ही दलितों, पिछड़ों तक सीमित हो पर कोरोना महामारी सभी को अपना शिकार बनाती है.

सच तो यह है कि दिनरात मेहनत कर मजदूर बाहर से पैसा कमा कर तो आते हैं, पर किसी न किसी पाखंड का शिकार वे हमेशा हो जाते हैं, क्योंकि उन की पत्नी पहले से अमीर और बेहतर दिखाने के चक्कर में धार्मिक आयोजन कर अपने पति की गाढ़ी कमाई का पैसा बरबाद कर देती हैं.

उन्हें लगता है कि ऐसा कर के वे घंटे 2 घंटे ही सही सभी की नजर में आएंगी. वे उन पैसों का उपयोग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा पर खर्च करना पैसों की बरबादी समझते हैं.

बदहाली में जी रहे उन के बुजुर्गों को अच्छे कपड़े, लजीज व्यंजन व दवा नसीब नहीं होती है, क्योंकि वे मान कर चलते हैं कि बुजुर्गों को खिलानेपिलाने से, नए कपड़े देने से क्या फायदा, जबकि धार्मिक आयोजनों से गांव का बड़ा आदमी भी उन्हें बड़ा समझेंगे.

ऐसे मौके का फायदा पोंगापंथी जरूर उठाते हैं. मेहनतकश मजदूरों को तो बस यही लगता है कि ऐसे धार्मिक आयोजन उन के मातापिता और पूर्वजों ने कभी नहीं किए. वे इस तरह के आयोजनों से फूले नहीं समाते. पर उन्हें क्या पता कि उन के पूर्वजों को धार्मिक आयोजन करना और इस तरह के आयोजन में भाग लेने से भी मना था.

ज्ञान और तकनीक के इस जमाने में जहां हर ओर पाखंड का चेहरा बेनकाब हो रहा है, वहीं आज भी लोग पाखंड के चंगुल में आ ही जा रहे हैं.

साल 2000 के बाद इस तरह की घटनाओं में कमी आ गई थी, क्योंकि दलितपिछड़ों के बच्चे पढ़ने लगे हैं. उन्हें भी आडंबर, अंधविश्वास और आस्था के बीच फर्क दिखाई देने लगा है.

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पर आज भी इस इलाके के दलितों और पिछड़ों के बच्चे स्कूलों में सिर्फ सरकार द्वारा दिए जा रहे मिड डे मील को खाने जाते हैं और जैसे ही बड़े होते हैं, अपने पिता के साथ कमाने के लिए दिल्ली, मुंबई और पंजाब निकल लेते हैं.

इन के बच्चे इसलिए भी नहीं पढ़ पाते हैं, क्योंकि उन को पढ़ाई का माहौल नहीं मिलता. वे सिर्फ बड़ा होने का इंतजार करते हैं, ताकि कमा सकें.

इसी वजह से आज भी इन इलाकों में प्रवासी मजदूरों की तादाद ज्यादा है. 90 के दशक में इन इलाकों में प्रिटिंग प्रैस वाले सस्ते परचे छपवा कर चौकचौराहे पर आतेजाते लोगों के हाथ में परचे थमा देते थे.

उस परचे पर लिखा होता था कि माता की कृपा से परचा आप को मिला है. आप इसे छपवा कर 200 लोगों में बंटवा दो, तो आप का जीवन बदल जाएगा. और अगर परचा फाड़ा या माता की बात की अनदेखी की तो 2 दिन के अंदर आप की या आप के बच्चे की दुर्घटना हो जाएगी.

डर के इस व्यापार में प्रिंटिंग प्रैस वालों ने खूब कमाई की. फिर मिठाई वाले और साड़ी बेचने वाले कैसे पीछे रह सकते थे. झारखंड के पलामू में इस तरह की घटना कोई नई बात नहीं है, बल्कि बहुत दिनों के बाद इस की वापसी हुई है इस नए रूप में. पर मौके का फायदा उठाने वाले लोग वे खास लोग ही हैं.

धर्म के नाम पर औरतों को भरमाता सोशल मीडिया

हाल ही में भारत ने चीन के मशहूर एप ‘टिकटौक’ पर बैन लगा दिया है. अब इस से भारत को कितना फायदा होगा या नुकसान, यह हमारा मुद्दा नहीं है, बल्कि हम तो उस बात से चिंतित हैं, जो सदियों से भारतीय समाज को धर्म के नाम पर घोटघोट कर पिलाई गई है खासकर औरतों को कि अगर वे अपने पति की सेवा करेंगी तो घर में बरकत होगी, बरकत ही नहीं छप्पर फाड़ कर रुपया बरसेगा. इस पूरे प्रपंच में धन की देवी लक्ष्मी और विष्णु का उदाहरण दिया जाता है और साथ ही उन छोटे देवता रूपी ग्रहों का सहारा लिया जाता है, जो अगर अपनी चाल टेढ़ी कर दें तो अच्छेखासे इनसान की जिंदगी में कयामत आ जाए.

पहले हम सोशल मीडिया के समुद्र में तैर रहे एक छोटे से वीडियो की चर्चा करेंगे, जो देखने में एकदम आम सा लगेगा, पर वह हमारी बुद्धि को भ्रष्ट करने की पूरी ताकत रखता है. एक मजेदार बात यह कि वह अलगअलग लोगों द्वारा अलगअलग घरों और माहौल में बनाया गया है, पर अंधविश्वास का जहर पूरे असर के साथ हमारे दिमाग में भर देता है.

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वीडियो की शुरुआत कुछ इस तरह होती है कि एक साधारण से कमरे में एक पलंग बिछा है और उस पर एक ठीकठाक रूपरंग की शादीशुदा औरत बैठी अपने पति के पैर दबा रही है.

अगर कमरे की बात करें तो यह एक लोअर मिडिल क्लास परिवार का लगता है, जहां उस औरत के बगल में एक टेबल फैन रखा हुआ है और पलंग भी ज्यादा महंगा नहीं है. वह औरत जिस आदमी के पैर दबा रही है उस का चेहरा नहीं दिखाया गया है, पर जिस तरह से वह औरत उस आदमी के पैर दबा रही है, वह एक ‘राजा बाबू’ टाइप आदमी ज्यादा लग रहा है.

अब आप पूछेंगे कि भाई इस वीडियो में खास क्या है? तो खास यह है कि वीडियो में जिस औरत का प्रवचननुमा ज्ञान सुनाई दे रहा है, वह है असली मुद्दे की जड़.

दरअसल, जब वह औरत अपने पति के पैर दबा रही होती है, तो बैकग्राउंड में किसी औरत की आवाज सुनाई देती है, ‘हरेक पत्नी को अपने पति के पैर रोज दबाने चाहिए. इस का कारण यह है कि मर्दों के घुटनों से ले कर उंगली तक का भाग शनि होता है और स्त्री की कलाई से ले कर उंगली तक का भाग शुक्र होता है. जब शनि का प्रभाव शुक्र पर पड़ता है तो धन की प्राप्ति के योग बनते हैं. आप ने अकसर देखा होगा तसवीरों में कि लक्ष्मीजी विष्णुजी के पैर दबाती हैं.’

इसी तरह का एक और वीडियो परखते हैं. यह सीन भी तकरीबन पहले सीन की तरह ही है, पर किरदारों के साथसाथ माहौल बदल गया है और स्क्रिप्ट के संवाद भी. इस सीन में दिखाई गई खूबसूरत औरत ने किसी सैलून से अपने बाल कलर करा रखे हैं और वह मौडर्न कपड़े पहने हुए है. हाथ पर टैटू बना है और कलाई पर स्मार्ट वाच बंधी है. घर भी अच्छाखासा लग रहा है. पर पलंग के बदले पत्नी सोफे पर बैठी अपने पति के पैर दबा रही है.

लगे हाथ बैकग्राउंड से आती आवाज का भी लुत्फ उठा लेते हैं. औरत बोल रही है, ‘मेरे पति हैं मेरा गुरूर. मुझ को अपनी पलकों पर बैठाते हैं, दिनभर मेहनत कर के कमाते हैं, पर मेरी हर फरमाइश पर दोनों हाथों से लुटाते हैं. शाम को जब थकेहारे घर आते हैं, फिर भी मुझे देख कर मुसकराते हैं.’

इन दोनों वीडियो में पत्नी अपने पति के पैर दबा रही है. वैसे, किसी के पैर दबाने में कोई बुराई नहीं है, पर जिस तरह से औरत को मर्द के पैर दबाते दिखाया गया है, वह बड़ा सवाल खड़ा करता है कि आज के जमाने में जहां औरतें किसी भी तरह से मर्दों से कम नहीं हैं, वहां इस तरह के वीडियो बनाने और दिखाने का मकसद क्या हो सकता है?

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दरअसल, यह सब उन पोंगापंथियों की चाल है, जो नहीं चाहते हैं कि औरतों को वाकई मर्दों के बराबर समझा जाए, इसलिए उन्हें धर्म की चाशनी में डुबो कर ज्ञान दिया जाता है कि पुराणों में जो लिखा है वह ब्रह्मवाक्य है और जब धन की देवी लक्ष्मी अपने नाथ विष्णु के पैर दबा कर पूरी दुनिया के धन की मालकिन बन सकती हैं, तो आप भी अपने पति के पैर दबा कर धन के घर आने का रास्ता तो बना ही सकती हैं.

यहां पर लक्ष्मी और विष्णु का ही उदाहरण ही नहीं लिया गया है, बल्कि 2 ग्रहों शनि और शुक्र का भी मेल मिलाया जाता है. हमारे दिमाग में भर दिया गया है कि शनि और शुक्र जैसे तमाम ग्रह बड़े मूडी होते हैं, उन्होंने जरा सी भी चाल टेढ़ी की नहीं, हमारी शामत आ जाएगी. ऐसा भरम फैला दिया गया है कि औरत को लगे अगर वह अपने हाथों से पति परमेश्वर के पैर नहीं दबाएगी तो लक्ष्मी रूठ जाएगी.

पर ऐसा कैसे हो सकता है? अगर हर पत्नी के हाथों में शुक्र की ताकत और उस के पति के पैरों में शनि का वास है और उन के मेल से घर में धनवर्षा होती है, तो फिर सब को शादी के बाद यही काम करना चाहिए. पति पलंग तोड़े और पत्नी अपने हाथों से उस के पैर दबाए. घर की सारी तंगी दूर हो जाएगी. जब पैसा अंटी में होगा तो कोई क्लेश भी नहीं होगा. हर तरफ खुशहाली का माहौल होगा और हर दिन त्योहार सा मनेगा.

दूसरा वीडियो धर्म के अंधविश्वास को तो बढ़ावा नहीं देता है, पर यह दिखाता है कि पति चाहे कैसा भी हो, अगर वह किसी औरत यानी अपनी पत्नी को पाल रहा है तो उस के पैर ही नहीं दबाने हैं, बल्कि उन्हें अपने सिरमाथे पर लगा कर रखना है, जिस से वह हमेशा आप पर दोनों हाथों से रुपए लुटाता रहे.

इन दोनों वीडियो की गंभीरता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि इन में दिखाई गई औरतें पढ़ीलिखी लग रही हैं और शहर में रहती हैं. पक्का मकान है और दूसरी सुखसुविधाएं भी मौजूद हैं. हो सकता है वे खुद भी कमाई करती हों या फिर गृहिणी ही सही, लेकिन देहाती और अनपढ़ तो कतई नहीं हैं.

जब इस तरह की औरतों को ही औरतों की तरक्की का दुश्मन दिखाया जाए तो समझ लीजिए, मामला आप को उलझाने के लिए बुना गया है. जब से धर्म की हिमायती सरकार इस देश में आई है, सनातन के नाम पर उस हर चीज को खूबसूरती के साथ पेश किया जाने लगा है, जो तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं टिकती है. सीधी सी बात है कि आज के महंगाई के जमाने में पत्नी अपने पति के पैर दबा कर या उस के चरण अपने माथे पर लगा कर घर को धनवान या खुशहाल नहीं बना सकती है, पर अगर वह पति की तरह अपने कंधे पर लैपटौप टांग कर किसी मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती है तो परिवार में दोहरी कमाई का सुख जरूर दे सकती है. अगर वह हाउस वाइफ है तो क्या हुआ, घर को सजासंवार कर रख सकती है, घर का हिसाबकिताब अपने हाथ में ले कर पति की चिंता को आधा कर सकती है.

चलो मान लिया कि पति थकाहारा घर आया है और चाहता है कि कोई उस के पैर दबा कर थकान मिटा दे, तो एक अच्छे जीवनसाथी की तरह उस की यह फरमाइश पूरी करने में कोई हर्ज नहीं है. पर अगर ऐसा ही पत्नी चाहती है तो पति को भी अपनी पत्नी के पैर दबाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. इस से शुक्र और शनि जैसे ग्रह नाराज हो जाएंगे, यह तो पता नहीं पर पतिपत्नी का प्यार जरूर बढ़ जाएगा. धनवर्षा न सही प्यार की बारिश जरूर हो जाएगी.

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छुआछूत से जूझते जवान लड़के लड़कियां

भले ही हम आधुनिक होने के कितने ही दाबे कर लें,मगर दकियानूसी ख्याल और परम्पराओं से हम बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. आज भी समाज के एक बड़े तबके में फैली छुआछूत की समस्या कोरोना रोग से कम नहीं है. छुआछूत केवल गांव देहात के कम पढ़े लिखे लोगों के बीच की ही समस्या नहीं है,बल्कि इसे शहरों के सभ्य और पढ़ें लिखे माने जाने वाले लोग भी पाल पोस रहे हैं.सामाजिक समानता का दावा करने वाले नेता भी इन दकियानूसी ख्यालों से उबर नहीं पाए हैं.

जून माह के अंतिम हफ्ते में मध्यप्रदेश में सोशल मीडिया चल रही एक खबर ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी.   रायसेन जिले के एक कद्दावर‌ भाजपा नेता रामपाल सिंह  के घर पर आयोजित किसी कार्यक्रम का फोटो वायरल हो रहा है, जिसमें भाजपा के नेता स्टील की थाली मेंं और डॉ प्रभुराम चौधरी डिस्पोजल थाली में एक साथ खाना खाते दिखाई दे रहे हैं.ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हुए और हाल ही मंत्री बने डॉ प्रभु राम चौधरी अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं हैं. यैसे में सवाल उठ रहे हैं कि प्रभुराम चौधरी को डिस्पोजल थाली में क्यों खाना खिलाया गया. इस घटनाक्रम को मप्र कांग्रेस ने  दलितों का अपमान बताया है.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस फोटो में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए  डॉ प्रभु राम चौधरी, सिलवानी के भाजपा विधायक रामपाल सिंह, सांची के भाजपा विधायक सुरेंद्र पटवा और भाजपा के संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी के साथ भोजन करते हुए दिखाई दे रहे हैं. इसमें बीजेपी के संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी स्टील की थाली में भोजन खाते हुए दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनके सामने बैठे डॉ प्रभु राम चौधरी डिस्पोजेबल थाली में खाना खा रहे हैं.  कांग्रेस के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा का कहना है कि प्रभु राम चौधरी को डिस्पोजेबल थाली में भोजन परोसा जाना अनुसूचित जाति वर्ग का अपमान है. यह  दलितों को लेकर भाजपा की सोच को जाहिर करता है.

समाज में जाति गत भेदभाव कोई नई बात नहीं है. आये दिन देश के अलग-अलग इलाकों में दलितों से छुआछूत रखने और उन पर अत्याचार करने की घटनाएं होती रहती हैं.आज भी गांव कस्बों के सामाजिक ढांचे में ऊंची जाति के दबंगों के रसूख और गुंडागर्दी के चलते दलित और पिछड़े वर्ग के लोग जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे हैं.गांवों में होने वाले शादी और रसोई में दलितों को खुले मैदान में बैठकर खाना खिलाया  जाता है और और खाने के बाद अपनी पत्तलें उन्हें खुद उठाकर फेंकना पड़ता है.शिक्षक मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि गांवों में मज़दूरी का काम दलित और कम पढ़े लिखे पिछड़ो को करना पड़ता है.  दबंग परिवार के लोग अपने घर के दीगर कामों के अलावा अनाज बोने से लेकर फसल काटने तक के सारे काम करवाते हैं और  बाकी मौकों पर छुआछूत रखते हैं. इस छुआछूत बनाये रखने में  पंडे पुजारी धर्म का भय दिखाते हैं.

ऊंची जाति के दबंग दिन के उजाले में दलितों को अछूत मानते हैं और मौका मिलने पर रात के अंधेरे में दलितों की बहन, बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं. यही हाल अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाले पंडितों का भी है,जो दिन में तो कथा,पुराण सुनाते हैं और रात होते ही शराब की बोतलें खोलते हैं.

*कैसे निपटते जवान लड़के लड़कियां*

पुरानी पीढ़ी के लोगों को तो पंडे पुजारियों ने समझा दिया था कि तुम दलित के घर पैदा हुए हो,तो जीवन भर तुम्हें दबंगों की गुलामी करनी होगी. बिना पढे लिखे लोगों ने इसे काफी हद तक स्वीकार कर भी लिया था, लेकिन पढ़ें लिखे जवान लड़के-लड़कियां समाज में  फैली छुआछूत की इस समस्या से ज्यादा जूझ रहे हैं.

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छुआछूत की वजह से दलित नौजवान समाज के ऊंची जाति के लोगों से दूरी रखने लगे हैं.शादी, विवाह और दूसरे खुशी के मौके पर बैंड बाजा बजाने वाले बृजेश बंशकार ने बताया कि   हमसे बैंड बजवाकर लोग खुशियां तो मनाते हैं, लेकिन छुआछूत की भावना रखकर हमारे लिए खाना के लिए अंदर नहीं बुलाते हैं,खुले मैदान और गंदी जगह पर बैठा कर  हमें खाना परोसा जाता है.  आड़ेगांव कला के धोबी  का काम कर रहे  युवा सुरेंद्र रजक ने बताया कि हम घर-घर जाकर लोगों के गंदे कपड़ों के धोने के बाद साफ कपड़े लेकर उनके घर जाते हैं तो हमें घृणा की नजरों से देखते हैं.

हरिओम नाई अपने सेलून पर हजामत बनाने का काम  करते हैं. वे कहते हैं कि यदि हम दलित वर्ग के लोगों की दाढ़ी, कटिंग करते हैं,तो ऊंची जाति के लोग हमारी दुकान पर नहीं आते और हमें भला बुरा भी कहते हैं.  प्रदेश की राजधानी भोपाल में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर संतोष अहरवाल ने बताया कि भोपाल ,इंदौर , जबलपुर जैसे शहरों में भी कहीं ना कहीं जातिगत भेदभाव होता है और रूम किराए पर लेने में भी मशक्कत करनी पड़ती है.मकान मालिक यदि किराये के रूम के आजू बाजू रहता है तो वह जाति पूछकर दलितों को  रुम किराये पर देने मना कर देता है. कालेज पढ़ने वाली पिंकी जाटव बताती हैं कि शहर के कालेज में पढ़ने वाली ऊंची जाति की लड़कियां हमें भाव‌ नहीं देती. सजने संवरने की आस में ब्यूटी पार्लर जाने पर भी जातिगत भेद भाव किया जाता है.

अपनी आंखों में नये सपने लिए नौजवानों  ने छुआछूत की बजह कुछ नौजवानों ने अपने परम्परागत काम धंधे छोड़ दिये हैं,तो क‌ई ने गांव कस्बों से पलायन का रास्ता अख्तियार कर लिया है.

अहमदाबाद की डायमंड फैक्ट्री में काम करने वाले सैकड़ों लोग लौक डाउन में वापस गांव आ तो गए, लेकिन छुआछूत की समस्या के चलते कोई काम धंधा नहीं मिल सका. अब वापस जाने ठेकेदारों के फोन आ रहे हैं,तो वे इज्जत की जिंदगी जीने फिर से गांव छोड़ कर जाने तैयार हो रहे हैं. सूरत में ब्यूटी पार्लर चलाने वाली युवती कंचन चौधरी गांव की युवतियों को ब्यूटी पार्लर का काम सिखाने का हुनर रखती है, परन्तु कस्बों की लड़कियां छुआछूत की बजह से सीखना नहीं चाहती.कंचन कहती हैं कि अब वे भी परिवार के साथ वापस सूरत जाकर अपना काम धंधा संभालेंगी.

दरअसल आज भी गांवों में पुस्तैनी काम कर रहे बसोर, मेहतर, मोची, धोबी,नाई लोगों को दूसरे काम करने की इजाजत नहीं है और पुस्तैनी कामों में छुआछूत आड़े आती है. इनसे बचने की जुगत में नौजवान अपने गांव कस्बों से दूर शहर जाकर मनमर्जी का काम करने लगे हैं.

*विसंगतियों के बावजूद न‌ई उम्मीदें भी*

समाज में फैली छुआछूत की बीमारी के बीच कुछ लोग यैसे भी है ं ,जो समाज को उम्मीद की रोशनी भी दिखा रहे हैं.होशंगाबाद के छोटे से गांव पुरैना के मुकेश बसेडिया लगातार दलित आदिवासी समाज की लड़कियों की शादियां रचाकर छुआछूत दूर करने की अनूठी पहल कर रहे हैं. मुकेश दलित लोगों के साथ छुआछूत नहीं बल्कि समता का व्यवहार करते हैं खान-पान से लेकर आने जाने तक और उनकी मदद करने तत्पर रहते हैं. इस बजह से उन्हें उनकी ब्राम्हण समाज के लोगों के कोप का सामना करना पड़ता है.

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लौक डाउन में मुकेश बसेड़िया ने आदिवासी अंचलों के दर्जनों गांवों में रोज ही राशन पानी से लेकर , मच्छरदानी,दबाईयां पहुंचाई हैं और आदिवासी महिला पुरुषों को बिना किसी जाति गत भेदभाव के  उन्हें हर संभव मदद पहुंचाने का काम किया है.

*दलित बच्चों भी होते हैं जुर्म का शिकार* 

दलितों पर उत्पीड़न के मामले रोज ही समाचार पत्र पत्रिकाओं के किस्से बनते हैं. सरकार समानता और समरसता का ढोल पीट रही है , लेकिन हालात यैसे हैं कि दलित अपनी रोजी-रोटी के लिए समाज का यह व्यवहार भी झेलने मजबूर है.

कभी स्कूलों में दलित बच्चों के साथ छुआछूत का व्यवहार  किया जाता है ,तो कभी उन्हे हेंडपंप पर पानी पीने से रोका जाता है. एक यैसा ही मामला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में जुलाई 2019 में आया था ,जहां  ग्राम पंचायत मस्तापुर के प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूल में अनुसूचित जाति,जनजाति के बच्चों को हाथों में मध्याह्न भोजन दिया जा रहा था .छात्रों ने अपनी आपबीती विभाग के अधिकारियों को बताकर कहा था कि स्कूल में भोजन देने वाले स्व.सहायता समूह में राजपूत जाति की महिलाओं को रसोइया रखने के कारण वे  निचली जाति के लड़के लड़कियों से दुआछूत रखती हैं. बच्चों को अछूत मानकर उन्हे हाथ में खाना परोसा जाता है . यदि वे अपने घर से थाली ले जाते हैं ,तो थालियों को बच्चों को खुद ही साफ करना पड़ता है. दलितों को छुआछूत से बचाने बनाये गये तमाम कानून केवल किताबों और भाषणों में सिमटकर रह गये हैं.

इसी प्रकार  अगस्त 2019 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रामपुर प्राइमरी स्कूल में में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया था. यहां पर स्कूल में बच्चों को दिए जाने वाले मिड डे मील में जातिगत भेदभाव के चलते दलित बच्चों को उंची जाति के अन्य बच्चों से अलग बैठाकर भोजन दिया जाता था . रामपुर के प्राइमरी स्कूल में कुछ ऊंची जाति के छात्र खाना खाने के लिए अपने घरों से बर्तन लेकर आते थे और वे अपने बर्तनों में खाना लेकर दलित समुदाय के बच्चों से अलग बैठकर खाना खाते थे . बच्चों के इस भेदभाव का विडियो भी सोशल मीडिया में वायरल हुआ था . महात्मा गांधी की  150 वीं  जयंती मनाने के बाद भी गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों का ढिंढोरा तो सरकारों द्वारा खूब पीटा जा रहा है , परन्तु सामाजिक ताने-बाने में दलितों और ऊंची जाति के ठाकुर, पंडितों में जातिगत भेद भाव की लकीर खिंची हुई है.

दलितों के नाम पर राजनीति करने वाली बसपा , गौड़ वाना गणतंत्र, जैसी सियासी पार्टियां भी केवल सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर खामोश हैं.  यैसे में किस तरह यह उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के 73 साल बाद भी अंबेडकर के संविधान की दुहाई देने वाला भारत छुआछूत मुक्त हो पायेगा . समाज के ऊंची जाति के लोग आज भी दलितों का मानसिक और शारीरिक शोषण कर उनके हितों से उन्हे बंचित रखे हुए हैं. वे नहीं चाहते कि दलितों के बच्चे पढ़ लिख कर कुछ करें, क्योंकि यैसा होने पर दबंगों के घर नौकरों की तरह काम कौन करेगा? लौक डाउन की वजह से शहरों से गांव लौटे दलित और मजदूरों और उनके पढ़ें लिखे बच्चों के साथ गांव कस्बों में  जातिगत भेदभाव किया जा रहा है. गांव देहात के दलित और मजदूरों के परिवार पेट की भूख की खातिर अपमान का घूंट पीकर अपनी जिंदगी जीने मजबूर हैं.

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बड़ा सवाल यह है कि  नागरिकता कानून के बहाने दूसरे देशों के नागरिकों की प्रताड़ना की चिंता करने वाली सरकार अपने देश के दलितों और मजदूरों के इस उत्पीड़न को आखिर कब खत्म कर पायेगी.

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