सुप्रीम कोर्ट ने दलितों को जगाया

भारतीय जनता पार्टी बहुत कोशिश कर रही है कि देश में राजनीति पर बात हिंदूमुसलिम को ले कर हो पर उस के वार बेकार जा रहे हैं और बात बारबार जाति पर आ जाती है. जब से सुप्रीम कोर्ट ने शैड्यूल कास्ट और शैड्यूल ट्राइब्स में क्रीमी लेयर बनाने और उन को आपसी कोटे में कोटे का फैसला दिया है, बात जाति पर होने लगी है और वक्फ ऐक्ट हो या सैक्यूलर यूनिफौर्म सिविल कोड पर बात का दही जम ही नहीं रहा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करना सरकारों, खासतौर पर भाजपा सरकारों के लिए मुश्किल होगा. शैड्यूल कास्टों को डिवाइड करना एक टेढ़ी खीर है. हालांकि हरेक को अपनी जातिउपजाति पता है पर सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए अपने को किसी और से कमतर मानने के लिए उस उपजाति के सभी लोग मान जाएंगे, यह नामुमकिन है. इस पर खूब जूते चलेंगे.

आजकल जाति का सर्टिफिकेट लेना आसान हो गया है. 75 सालों से चले आ रहे सिस्टम की खराबियां काफी दूर हो चुकी हैं. कुछ बातें ढकी हुई हैं. ऊंचनीच का भेद मालूम नहीं है और अगर मालूम है तो भी शादी तक ही रह जाता है. अब तहसीलदार को सर्टिफिकेट देना होगा कि कौन किस उपजाति का है. इस से पहले सरकार को तय करना होगा कि कौम की उपजाति दूसरी उपजाति से अलग है.

हमारे यहां कोई इतिहास तो है नहीं जिस में लिखा हो कि कौन ऊंचा, कौन नीचा. पौराणिक ग्रंथ तो एससीएसटी की बात करते तक नहीं हैं. वे शूद्रों की बात करते हैं और यही माना जाता है कि ये शूद्र अछूत नहीं थे और आज की अदर बैकवर्ड क्लासें हैं. कानूनों को सुबूत चाहिए होंगे, जिन की चर्चा न पुराणों में है. न बाद के लिए संस्कृत ग्रंथों में, न मुसलिम इतिहासकारों की किताबों में, उन्हें कैसे परखा जाए?

अंगरेजों ने जनगणना में जाति का नाम लिखा पर कौन ऊंचा, कौन नीचा और नीचों में कौन ज्यादा नीचा इस से उन्हें मतलब नहीं था क्योंकि उन्हें नौकरियां थोड़े ही देनी थीं. अब नौकरियों का सवाल है, ऐसी नौकरियां जो पक्की हैं और जिन में ऊपरी कमाई भरपूर हो. ऊंची जातियों की पहले ही इन नौकरियों पर नजर हैं चाहे वे चपरासी की क्यों न हों. शैड्यूल कास्टों को यह भी डर है कि बिल्ली बिल्ली की लड़ाई में बंदर ही सारा माल हड़प न ले.

कहने को ऊंची जातियां कहती रहें कि जाति है ही कहां जब केंद्रीय मंत्री राहुल गांधी को जाति जनगणना पर जवाब दें कि, ‘जिन्हें अपनी जाति का पता नहीं वे जाति जनगणना की बात कैसे कर सकते हैं.’ तो साफ है कि उन के दिमाग में जाति भरी है. शैड्यूल कास्ट वोटर उसे समझ नहीं पा रहे हों, यह भूल जाएं.

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोकसभा चुनावों ने साफ कर दिया कि जाति का सवाल अभी भी अहम है. इन दोनों राज्यों के ऊंची जातियों के मुख्यमंत्रियों ने भाजपा के सपनों की नाव को डुबाया है क्योंकि वे जाति के नाम पर नाव में खुद चूहे छोड़ रहे थे जो नाव को कुतर रहे थे.

अब सुप्रीम कोर्ट ने सोए दलितों को जगा दिया है. वे अपनी जाति की पोटली संभालने लगेंगे तो ऊंची जातियों में यह बीमारी फैलेगी. ओबीसी भी कोटे में कोटा मांगेंगे. धर्म की देन जाति ने 2000 साल से ज्यादा धर्म को संभाला है. अब यह हाथी डायनासोर न बन जाए.

मल्लिकार्जुन खड़गे : ‘इंडिया’ का कितना मजबूत दलित चेहरा

वोट के लिहाज से देखें, तो ओबीसी के बाद सब से ज्यादा तादाद दलित वोटर की है. यही वजह है कि ‘इंडिया’ गठबंधन लगातार इस कोशिश में था कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को गठबंधन का हिस्सा बनाया जा सके.

इस पर कांग्रेस में 2 विचार थे. राहुल गांधी चाहते थे कि अखिलेश यादव ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा रहें, वहीं प्रियंका गांधी और उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता चाहते थे कि मायावती को ‘इंडिया’ गठबंधन से जोड़ा जाए.

‘इंडिया’ गठबंधन की दिल्ली में मीटिंग के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के अपने नेताओं की मीटिंग भी बुलाई थी. इस मीटिंग में कांग्रेस प्रदेश में अपनी जमीनी हालत देखना चाहती थी. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने 2 बातें प्रमुख रूप से कहीं. पहली यह कि गांधी परिवार के तीनों सदस्य उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ें. दूसरी बात यह कि अखिलेश यादव के मुकाबले मायावती से गठबंधन फायदेमंद रहेगा.

मायावती का अड़ियल रुख

इस मीटिंग से कांग्रेस को लगा कि उत्तर प्रदेश में वह बेहद कमजोर है. बिना गांधी परिवार और गठबंधन के वह आगे नहीं बढ़ना चाहती. मीटिंग में प्रदेश कांग्रेस के एक भी नेता ने यह नहीं कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर सकता है.

कांग्रेस ने जब उत्तर प्रदेश की तुलना तेलंगाना से कर के देखी, तो लगा कि कांग्रेस वहां भी सत्ता से बाहर थी. इस के बाद भी वहां कांग्रेस के पास 6 नेता ऐसे थे, जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी कमजोरी का पता चल गया. मायावती को ले कर दुविधा यह है कि वे खुल कर बात नहीं करतीं. प्रियंका गांधी उन से मिल कर ‘इंडिया’ गठबंधन में उन्हें लाना चाहती थीं, लेकिन मायावती की तरफ से कोई सिगनल नहीं मिला. चुनाव करीब आने और 3 राज्यों में हार के बाद कांग्रेस दबाव में थी. ऐसे में उस ने यह फैसला कर लिया कि अब मायावती वाला चैप्टर बंद कर दिया जाए.

डर क्या है

अब चुनाव के पहले मायावती ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी. मायावती ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर के यह जरूर कहा कि ‘राजनीति में संबंध ऐसे रखने चाहिए कि जरूरत पड़ने पर सहयोग लिया जा सके’.

इस का मतलब यह लगाया जा रहा है कि मायावती चुनाव के बाद सीटों के नंबर के मुताबिक अपना साथी चुन सकती हैं.

मायावती के इस ऊहापोह की वजह समाजवादी पार्टी है. 2 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के स्टेट गैस्ट हाउस कांड की खौफनाक यादें अभी भी उन के मन पर छाई हैं. सामाजिक स्तर पर भी ओबीसी और एससी वोटर के बीच उसी तरह की हालत है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती के बीच सम?ाता हुआ था, पर उस का अंत भी बुरा ही रहा.

मायावती खुद को समाजवादी पार्टी से कमतर नहीं आंकतीं. साल 2019 में जब सपाबसपा गठबंधन हुआ था, तो मायावती ने बसपा के लिए सपा से एक सीट ज्यादा ली थी. ‘इंडिया’ गठबंधन में मायावती के हिस्से सीटें कम आतीं. वे अखिलेश यादव से कमजोर दिखना नहीं चाहतीं. इस वजह से वे ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनीं.

चुनाव बाद के लिए मायावती ने हर समझेते के रास्ते खुले रखे हैं. कहीं न कहीं प्रधानमंत्री पद की इच्छा मायावती के भी मन में है. लिहाजा, मायावती चुनाव के पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहतीं.

मल्लिकार्जुन कितने मजबूत

मायावती के विकल्प के रूप में ‘इंडिया’ गठबंधन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम पीएम फेस के रूप में आगे किया है. यह फैसला जिस रणनीति के तहत हुआ, उस पर मेहनत करना ‘इंडिया’ गठबंधन की जिम्मेदारी है. केवल दलित होने के चलते नाम घोषित होने से दलित वोट नहीं मिलने वाले. पंजाब विधानसभा का चुनाव इस का उदाहरण है.

पंजाब में विधानसभा चुनाव के पहले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस ने सोचा था कि दलित वोट उन को मिल जाएंगे. कांग्रेस ने इस के लिए मेहनत नहीं की. लिहाजा, पंजाब में कांग्रेस चुनाव हार गई.

मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे करने से दलित वोट नहीं मिलेंगे. इस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा. केवल कांग्रेस के चाहने से भी यह नहीं होगा.

यह बात सच है कि कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे की बहुत इज्जत करती है. कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके और सांसद राहुल गांधी हमेशा खुद मल्लिकार्जुन खड़गे की कार में उन के पीछे बैठते हैं, जिस से पार्टी और लोगों को यह संदेश जाए कि खड़गे ‘डमी कैंडिडेट’ नहीं हैं. पार्टी चलाने में वे आजाद हैं.

दिक्कत यह है कि देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस मजबूत नहीं है. ऐसे में वह अपने सहयोगी दलों पर निर्भर है. साल 2024 के आम चुनाव में अगर ‘इंडिया’ गठबंधन सरकार बनाने की हालत में आता भी है, तो राहुल गांधी पीएम नहीं बनेंगे. राहुल गांधी यह सोच कर चल रहे हैं कि अभी उन की उम्र जिस दौर में है, वहां उन के पास पीएम बनने के लिए 10 साल का समय है.

ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे ही पीएम बनेंगे, यह तय है. ‘इंडिया’ गठबंधन तभी सरकार बना पाएगा, जब कांग्रेस के पास अपने 120 से 150 के बीच सांसद आएं. ऐेसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम का चेहरा बनाने से काम नहीं चलने वाला. उस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन और उस में शामिल हर दल को पूरी ईमानदारी से यह सोच कर मेहनत करनी होगी कि मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री बनाना है.

धर्म के अंधे दलित-पिछड़े भाजपा की जीत की गारंटी

रोहित

यह दोहा 14वीं ईसवी में उत्तर प्रदेश के काशी (बनारस) में जनमे संत रविदास का है. वही रविदास, जो अपने तमाम कथनों में धर्म की जगह कर्म पर विश्वास करते थे और पाखंड के खिलाफ थे. आज की भाषा में अगर उन्हें धार्मिक कट्टरवाद और पोंगापंथ के खिलाफ एक मिसाल माना जाए तो गलत नहीं होगा.

इस दोहे में भी रविदास साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मसजिद से, क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है.

रविदास निचली जाति से संबंध रखते थे और जूते सिलने का काम करते थे. उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहां शोषण, अन्याय और गैरबराबरी पर आधारित समाज नहीं होगा, कोई दोयम दर्जे का नागरिक नहीं होगा और न ही वहां कोई छूतअछूत होगा. अपने इस समाज को उन्होंने बेगमपुरा नाम दिया, जहां कोई गम न हो.

समयसमय पर संत रविदास जैसे महापुरुष धर्म पर आधारित सत्ता और पाखंड को चुनौती देते रहे और उन से प्रेरणा लेने वाली दबीशोषित जनता इन पाखंडों के खिलाफ खड़ी होती रही.

जैसे अपनेअपने समय में बुद्ध, कबीर और रविदास ने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी, ऐसे ही आधुनिक काल में अय्यंकाली, अंबेडकर और कांशीराम जैसों ने भेदभाव की सोच को इस तरह खारिज किया, जिस से दलितपिछड़ों की आवाज सुनी और बोली जाने लगी.

इतने सालों की कोशिशों और टकरावों के बाद एक ऐसा समय भी आया, जब भले ही दलितपिछड़ों की हालत में बड़ा बदलाव न आया हो, पर देश की राजनीति से ले कर सत्ता तक इन जातियों के प्रतिनिधि संसद, विधानसभा में तो पहुंचे ही, साथ ही सरकार बनाने में भी कामयाब रहे, लेकिन आज हालात वापस पलटते दिखाई दे रहे हैं.

आज रविदास के बेगमपुरा जाने वाले रास्ते में ब्राह्मणवाद की गहरी खाई खुद गई है और इस खाई को खोदने वाले जितने सवर्ण रहे हैं, उस से कई ज्यादा खुद दलितपिछड़े हो गए हैं.

सवर्णों की बेबाकी की चर्चा तो हमेशा की जाती है, लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि दलितपिछड़ों की चुप्पी और भगवाधारियों पर मूक समर्थन की चर्चा की जाए, क्योंकि आज हालात ये हैं कि दलितपिछड़ों की राजनीति और उस के मुद्दे धार्मिक उन्माद के शोर में दब चुके हैं और इस की वजह भी वे खुद ही हैं.

5 राज्यों के चुनाव

10 मार्च, 2022 को 5 राज्यों के चुनावी नतीजे सामने आए. इन 5 राज्यों में से 4 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भगवाधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत वापसी की, वहीं पंजाब में कुल 117 सीटों में से

92 सीटें जीत कर आम आदमी पार्टी ने राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया.

उत्तर प्रदेश में जहां एक तरफ भाजपा गठबंधन को 403 सीटों में से 273 सीटें, उत्तराखंड में 70 सीटों में से 47 सीटें, मणिपुर में 60 सीटों में से 32 सीटें और गोवा में 40 सीटों में से 20 सीटें मिलीं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इन चुनावों में पूरी तरह से धराशायी हो गया.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने अपने लैवल पर थोड़ीबहुत लड़ाई जरूर लड़ी, पर जिस तरह के कयास भारतीय जनता पार्टी को हराने के लगाए जा रहे थे, वे सब धूल में मिल गए.

उत्तर प्रदेश के अलावा भाजपा न सिर्फ दूसरे 3 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही, बल्कि उत्तर प्रदेश में तो उस का वोट फीसदी गिरने की जगह बढ़ गया और यह सब इसलिए मुमकिन हो पाया कि दलितपिछड़ों के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट दिए.

दलितपिछड़ा वोटर कहां

पहली बार ऐसा हुआ है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा और उस का कोर वोटर इस अनुपात में किसी दूसरी पार्टी में शिफ्ट हुआ.

चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद बसपा मुखिया मायावती ने मीडिया के सामने कहा, ‘‘संतोष की बात यह है कि खासकर मेरी बिरादरी का वोट चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ा रहा. मुसलिम समाज अगर दलित के साथ मिलता तो परिणाम चमत्कारिक होते.’’

यह तो वही बात हुई कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे. मायावती मुसलिमों और सपा पर हार का ठीकरा फोड़ने की जगह अगर इस बात को समझने पर जोर देतीं कि उन का कोर दलित वोटर भाजपा की तरफ कैसे खिसक गया तो शायद उन की जीरो होती राजनीति में यह आगे के लिए एक बेहतर कदम साबित होता. पर अपनी हार का सही विश्लेषण करने की जगह उन की टीकाटिप्पणी यही साबित कर रही है कि वे अभी तक यह नहीं समझ पाई हैं कि जिस तरह से बसपा और मायावती ने भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ मेलजोल बढ़ाया है और जो अभी भी जारी है, उसी का  नतीजा है कि उस के अपने वोटरों ने भी भाजपा के धर्म के इर्दगिर्द जुड़े मुद्दों और पाखंडों से संबंध बना लिए हैं.

इसी का खमियाजा है कि बसपा को इस विधानसभा चुनाव में महज 12.8 फीसदी ही वोट मिले, जो पिछली बार के 22.9 फीसदी से 10 फीसदी कम हैं. जाहिर है कि ये वोट पूरी तरह से भाजपा के साथ गए. यह दिखाता है कि सवर्णपिछड़ा तबके के वोटों का जितना नुकसान सपा ने भाजपा का किया, उस से ज्यादा वोटों की भरपाई भाजपा ने बसपा के दलित वोटों को पाखंड के जाल में फंसा कर कर ली.

यह सब इसलिए हुआ कि जिस सियासी जमीन पर कभी कांशीराम ने दलित हितों के लिए बहुजन समाज पार्टी की बुनियाद रखी थी, मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा जैसी दलितों की वैचारिक दुश्मन संस्थाओं के साथ अपने रिश्तों को बढ़ा कर उस बुनियाद को खोखला करने का काम ही किया, जिस का सीधा नतीजा यह है कि वे दलित, जिन्हें सवर्णों के बनाए पाखंडों को चुनौती देनी थी, वे भी उन पाखंडों में रमते चले गए.

यहां तक कि भगवा भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए जहां बसपा को ताकत लगानी चाहिए थी, उसी बसपा ने 122 सीटों पर ऐसे उम्मीदवार खड़े किए, जिन का सीधा टकराव सपा के उम्मीदवारों से ही था. इन में से 91 मुसलिम बहुल और 15 यादव बहुल सीटें थीं. ये ऐसी सीटें थीं, जिन में सपा की जीत की ज्यादा उम्मीद थी, पर इन 122 सीटों में से 68 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीतीं.

साफ है कि उत्तर प्रदेश में एक नया और बड़ा तबका भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में आया है. इसी तरह समाजवादी पार्टी को पिछड़ों के एक हिस्से ने भाजपा से अलग हो कर वोट जरूर दिया, पर यह इतना नहीं था कि भाजपा को चोट पहुंचा सके.

बसपा के वोट फीसद और सीटों के रुझान को देखें, तो यह पता चलता है कि भाजपा को पड़े और बढ़े वोट दलितों के ही बसपा से शिफ्ट हुए, जो आगे की राजनीति (लोकसभा चुनाव) में भाजपा के लिए वरदान और दलितपिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए चिंता का सबब बनेंगे.

पोंगापंथ में फंसे दलितपिछड़े

5 राज्यों के चुनाव खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव से सीधेसीधे समझ आता है कि दलितपिछड़ों का एक बड़ा तबका भाजपा और संघ के पोंगापंथ में फंस चुका है. वह खुद नहीं समझ पा रहा है कि जिस पार्टी का समर्थन कर रहा है, वह न सिर्फ उस की वैचारिक दुश्मन है, क्योंकि संघ और भाजपा ब्राह्मणवादी संस्कृति से प्रभावित रहे हैं, बल्कि जिस हिंदुत्व के लिए वह भाजपा को समर्थन दे रहा है, उस हिंदुत्व की बुनियाद ही दलितपिछड़ों के शोषण पर टिकी हुई है, जो आज नहीं तो कल सामने आने वाला ही है.

यह बहुत हद तक सामने आने भी लगा है, क्योंकि रामराज्य से खुद को जोड़ रहा दलित समाज सरकारी संपत्तियों के बिकने पर अपने आरक्षण की चढ़ती भेंट को नहीं देख पा रहा है. वह यह नहीं समझ पा रहा है कि मंदिर का मुद्दा उस के किसी काम का नहीं है, यह मुद्दा तो बस उसे पाखंड में शामिल करने को ले कर है, ताकि उस के दिमाग में यह बात फिट कर दी जाए कि सारी इच्छाएं, कष्ट सब मोहमाया है, इनसान तो मरने के लिए जन्म लेता है, आत्मा अजरअमर है, इस जन्म में पिछले जन्म का पापपुण्य भोगना पड़ता है, इसलिए जो भूख और तकलीफ है, वह सब पुराने जन्म के कर्मों का फल है, इसलिए ज्यादा इच्छाएं मत पालो, सरकार से सवाल मत पूछो. बस कर्म करो, फल की चिंता मत करो.

जाहिर है कि भाजपा दलितबहुजनों का इस्तेमाल बस अपने एजेंडे के लिए ही करेगी, बाकी इस के आगे अगर हाथ फैलाए तो रोहित वेमुला हत्याकांड, ऊना, सहारनपुर और हाथरस कांड के उदाहरण भी सब के सामने हैं. रविदास, कबीर, नानक, बुद्ध, अंबेडकर, कांशीराम क्या कह गए, यह भले ही दलितों को पता न चले, पर इन के मंदिर और मूर्तियां बना कर उन्हें ही भगवान बना दो, सब सही हो जाएगा.

भाजपा ने अपना पूरा चुनाव हिंदुत्व और कठोर राजकाज के मुद्दे पर लड़ा. ये दोनों मुद्दे ही किसी लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक हैं. ऐसे में आने वाले समय में हिंदुत्व की गतिविधियां तेज होंगी, जो खुद दलितपिछड़े समाज के लिए घातक होंगी. आज दलितपिछड़े ऐसे रामराज्य का सपना देख रहे हैं, जिस में नुकसान उन्हीं का होना है.

बुराई: नहीं रुक रहा दलितों पर जोर जुल्म का सिलसिला

वेणीशंकर पटेल ‘ब्रज’

23 जनवरी, 2022 को मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा पुलिस थाना क्षेत्र के गांव गनिहारी में दिलीप कुमार अहिरवार की बरात धूमधाम से निकल रही थी कि गांव के दबंगों को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने दलित परिवार की शादी में आए मेहमानों की गाडि़यों पर पथराव कर दिया. बाद में भीम आर्मी और पुलिस के दखल से मामले को रफादफा कराया गया.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में जुलाई, 2019 में ग्राम पंचायत मस्तापुर के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल में अनुसूचित जाति, जनजाति के बच्चों को हाथों में मिड डे मील दिया जा रहा था.

बच्चों ने अपनी आपबीती महकमे के अफसरों को बता कर कहा कि स्कूल में भोजन देने वाले स्वयंसहायता समूह में राजपूत जाति की औरतों को रसोइया रखने के चलते वे निचली जाति के लड़केलड़कियों से छुआछूत रखती हैं और उन्हें हाथ में खाना परोसा जाता है. अगर वे अपने घर से थाली ले जाते हैं, तो उन थालियों को बच्चों को खुद ही साफ करना पड़ता है.

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इसी तरह अगस्त, 2019 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रामपुर प्राइमरी स्कूल में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया था. वहां पर स्कूल में बच्चों को दिए जाने वाले मिड डे मील में जातिगत भेदभाव के चलते दलित बच्चों को ऊंची जाति के दूसरे बच्चों से अलग बैठा कर भोजन दिया जाता था.

रामपुर के प्राइमरी स्कूल में कुछ ऊंची जाति के छात्र खाना खाने के लिए अपने घरों से बरतन ले कर आते थे और वे अपने बरतनों में खाना ले कर एससी, एसटी समुदाय के बच्चों से अलग बैठ कर खाना खाते थे.

दलितपिछड़ों की हमदर्द बनने का ढोंग करने वाली सरकारें पीडि़त लोगों को केवल मुआवजे का ?ान?ाना हाथ में थमा देती हैं.

सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और माली रूप से दलितों पर जोरजुल्म कर बाद में केवल मुआवजा दे कर उन के जख्म नहीं भर सकते. ऐसे में किस तरह यह उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के 74 साल बाद भी अंबेडकर के संविधान की दुहाई देने वाला भारत छुआछूत मुक्त हो पाएगा?

समाज के ऊंचे तबके के लोग आज भी दलितों का मानसिक और शारीरिक शोषण कर उन के हितों से उन्हें वंचित करने का काम कर रहे हैं. गांवदेहात के दलित बेइज्जती और जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

सुनिए दलितों की आपबीती

जातिगत भेदभाव किस तरह दलित तबके के लोगों को मानसिक चोट देता है, इस का आकलन सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर राघवेंद्र चौधरी की आपबीती से किया जा सकता है.

वे अपनी जिंदगी में घटित किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, ‘‘बात उस समय की है, जब मैं 12वीं जमात में पढ़ता था. सरकार की तरफ से 1,100 रुपए का स्कौलरशिप का चैक मुझे मिलना था. अपने दोस्तों के साथ मई के महीने में मैं चैक लेने स्कूल पहुंचा, तो वहां टीचर चैक बांट रहे थे.

‘‘मेरे सभी दोस्तों को चैक मिलने के बाद मु?ो भी चैक देते हुए टीचर बोले कि वाउचर पर पावती के दस्तखत करो, तो मैं ने दस्तखत अंगरेजी में कर दिए. वे बोले कि अपना पूरा नाम लिखो.

‘‘मैं ने अपना नाम लिख दिया. फिर वे बोले कि वह लिखो, जिस के लिए चैक मिल रहा है. मैं सम?ा रहा था कि सर मेरी मूल जाति लिखवाना चाह रहे हैं. फिर उन्होंने गुस्से से तमतमाते हुए अपनी जाति को दोहराया और लिख दिया.

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‘‘जब मेरी नौकरी साल 2003 में संविदा शिक्षक के तौर पर लगी थी, तब वेतन मिलता था 2,500 रुपए. वह भी 3-4 महीने बाद मिलता था. उसी दौरान एक बार मां के बीमार पड़ने पर इलाज के लिए पैसों की जरूरत थी.

‘‘साथी टीचरों से उधार मांगा, तो उन के पास भी पैसे नहीं थे. उन्होंने कहा कि यार, तुम को तो पता है कि 4 महीने से वेतन नहीं मिला.

‘‘फिर हमारे एक साथी शिक्षक ने कहा, ‘घर में कोई सोनेचांदी का गहना हो, तो सुनार के पास गिरवी रख कर मां का इलाज करा लो, जब वेतन मिलेगा तो छुड़ा लेना.’

‘‘मैं ने कहा कि चलो ऐसा ही करते हैं. हम दोनों मां के गले की माला ले कर एक सुनार की दुकान पर पहुंचे. उस ने कहा कि इस को गिरवी रख कर

700 रुपए मिल जाएंगे. मु?ो पैसों की सख्त जरूरत थी. हम दोनों वह माला रखने के लिए राजी हो गए.

‘‘मुनीम ने नाम पूछा. मैं ने अपना नाम बताया. फिर उस ने जाति पूछी. मैं ने अपनी जाति बताई. मेरी जाति सुन कर मुनीम की कलम रुक गई. वह बोला कि आप सेठजी से बात कर लीजिए. सेठजी से मेरे साथी शिक्षक ने बात की, तो उन्होंने कहा कि हमारी दुकान में इस जाति के लोगों का सामान गिरवी नहीं रखते. बाद में मैं ने अपने कुछ दोस्तों की मदद से अपनी मां का इलाज कराया.’’

राजनीति में भी छुआछूत

भले ही हम आधुनिक होने के कितने ही दावे कर लें, मगर दकियानूसी खयालों और परंपराओं से हम बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. आज भी समाज के एक बड़े तबके में फैली छुआछूत की समस्या कोरोना जैसी बीमारी से कम नहीं है.

छुआछूत केवल गांवदेहात के कम पढ़ेलिखे लोगों के बीच की ही समस्या नहीं है, बल्कि इसे शहरों के सभ्य और पढ़ेलिखे माने जाने वाले लोग भी पालपोस रहे हैं. सामाजिक बराबरी का दावा करने वाले नेता भी इन दकियानूसी खयालों से उबर नहीं पाए हैं.

जून, 2020 के आखिरी हफ्ते में मध्य प्रदेश में सोशल मीडिया पर एक खबर ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी. रायसेन जिले के एक कद्दावर भाजपा नेता रामपाल सिंह के घर पर हुए किसी कार्यक्रम का फोटो वायरल हो रहा है, जिस में भारतीय जनता पार्टी के नेता स्टील की थाली में और डाक्टर प्रभुराम चौधरी डिस्पोजल थाली में एकसाथ खाना खाते दिखाई दे रहे थे.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए मंत्री बने डाक्टर प्रभुराम चौधरी अनुसूचित जाति से आते हैं.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस फोटो में कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए डाक्टर प्रभुराम चौधरी, सिलवानी के भाजपा विधायक रामपाल सिंह, सांची के भाजपा विधायक सुरेंद्र पटवा और भाजपा के संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी के साथ भोजन करते हुए दिखाई दे रहे थे.

इस में भाजपा के संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी स्टील की थाली में भोजन खाते हुए दिखाई दे रहे थे, लेकिन उन के सामने बैठे डाक्टर प्रभुराम चौधरी डिस्पोजल थाली में खाना खा रहे थे.

समाज में जातिगत भेदभाव कोई नई बात नहीं है. देश के अलगअलग इलाकों में दलितों से छुआछूत रखने और उन पर जोरजुल्म करने की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं.

आज भी गांवकसबों के सामाजिक ढांचे में ऊंची जाति के दबंगों के रसूख और गुंडागर्दी के चलते दलित और पिछड़े तबके के लोग जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे हैं.

गांवों में होने वाली शादी और रसोई में दलितों को खुले मैदान में बैठ कर खाना खिलाया जाता है और खाने के बाद अपनी पत्तलें उन्हें खुद उठा कर फेंकनी पड़ती हैं.

टीचर मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि गांवों में मजदूरी का काम दलित और कम पढ़ेलिखे पिछड़ों को करना पड़ता है. दबंग परिवार के लोग अपने घर के दीगर कामों के अलावा अनाज बोने से ले कर फसल काटने तक के सारे काम उन से कराते हैं और बाकी मौकों पर छुआछूत रखते हैं. यह छुआछूत बनाए रखने में पंडेपुजारी धर्म का डर दिखाते हैं.

ऊंची जाति के दबंग दिन के उजाले में दलितों को अछूत मानते हैं और मौका मिलने पर रात के अंधेरे में उन की बहनबेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं. यही हाल अपनेआप को श्रेष्ठ सम?ाने वाले पंडितों का भी है, जो दिन में तो कथा, पुराण सुनाते हैं और रात होते ही शराब की बोतलें खोलते हैं.

बढ़ रहे जोरजुल्म के मामले

अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल की अध्यक्षता में हुई एससीएसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की समीक्षा बैठक में अधिकारियों ने जो आंकड़े रखे, वे बेहद ही चौंकाने वाले हैं.

जनवरी से दिसंबर, 2021 तक अकेले मध्य प्रदेश में एससीएसटी समुदाय पर इस अधिनियम के तहत 10,081 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले सालों की तुलना में ज्यादा थे. ये आंकड़े सरकार के उन दावों की पोल खोलते नजर आ रहे हैं, जिस में सरकार दलितों के संरक्षण की बात करती है.

इसी तरह 25 सितंबर, 2019 में मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के भावखेड़ी गांव में 2 दलित मासूम बच्चों की हत्या गांव के दबंगों ने लाठियों से पीटपीट कर इसलिए कर दी, क्योंकि ये मासूम पंचायत भवन के सामने खुले में शौच कर रहे थे.

दलित तबके के मनोज बाल्मीकि के 10 साल के बेटे अविनाश और उस की 13 साल की बहन रोशनी मुंहअंधेरे शौच के लिए निकले थे. गांव के दबंग रामेश्वर और हाकिम यादव ने उन को खुले में शौच करते देखा, तो गुस्से में लाठियों से इस कदर पीटा कि उन की मौके पर ही मौत हो गई.

यह घटना दलितों पर सदियों से होते आ रहे जोरजुल्म की अकेली कहानी नहीं है, बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की असलियत भी बयान करती है.  देश में गरीबों के घर में शौचालय बनवाने के नाम पर करोड़ोंअरबों रुपए खर्च करने के बाद भी उन के हिस्से में शौचालय नहीं आया है.

आएगा भी कैसे…? जब तक अगड़ी जातियों के ये दबंग, पिछड़ों और दलितों के हक पर अपनी दबंगई के दम पर डाका डालते रहेंगे, तब तक लालकिले की प्राचीर से गरीबों के कल्याण के लिए कही गई बातें जुमलेबाजी ही साबित होती रहेंगी.

ये बाल्मीकि समाज के वही लोग हैं, जो दबंगों के घरों के शौचालयों की साफसफाई का काम करते हैं. 21वीं सदी के युग में भी गांव के ये दबंग पुरानी वर्ण व्यवस्था के मुताबिक यही चाहते हैं कि दलित जाति के ये लोग उन के सेवक बन कर जीहुजूरी करते रहें.

मारे गए बच्चों के पिता मनोज बाल्मीकि ने कहा कि उन के 5 भाइयों के परिवार में किसी के पास शौचालय नहीं है. भावखेड़ी ग्राम पंचायत ने उन्हें शौचालय के साथ एक घर की मंजूरी दी थी, लेकिन आरोपियों के परिवार का एक सदस्य गांव की पंचायत का मुखिया था और उस ने यह होने नहीं दिया.

मनोज ने आगे कहा, ‘‘सुबह के साढ़े 6 बजे मेरा ऐकलौता बेटा और उस की बहन शौच करने गए थे, तभी अपने हैंडपंप के पास खड़े रामेश्वर और हाकिम दोनों बच्चों पर चिल्लाए और उन पर लाठी से वार करने लगे, जिस से दोनों बच्चों की वहीं मौत हो गई.

‘‘2 साल पहले सड़क किनारे एक पेड़ से शाखा तोड़ने पर आरोपियों से मेरी तीखी बहस हुई थी. इस पर उन्होंने जातिसूचक गाली देते हुए जान से मारने की धमकी भी दी थी.

‘‘गांव के ये लठैत चाहते हैं कि हम उन के यहां बंधुआ मजदूर बन कर रहें. इन दबंगों के डर से गांव के सरपंच सचिव को शौचालय बनवाने के लिए आवेदन देने के बावजूद भी न तो मेरे परिवार को शौचालय बनवाने का पैसा मिला और न ही किसी दूसरी सरकारी योजना का लाभ.’’

इन लठैतों के डर से गांव के हैंडपंप पर जब तक इन दबंगों के घर के लोग पानी नहीं भर लेते हैं, तब तक इन गरीबों को पीने का पानी भरने का मौका नहीं मिलता है.

ज्योतिबा फुले से सबक लें

भगवा सरकार हिंदूमुसलिम का भेद करा के कट्टरवादी हिंदुत्व की हिमायती तो बनती है, पर हिंदुओं के बीच ही जातिवाद की दीवार तोड़ने और दलितपिछड़े तबके के लोगों पर दबंग हिंदुओं के द्वारा किए जाने वाले जोरजुल्म पर चुप्पी साधे रहती है.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पेशे से वकील मनीष अहिरवार कहते हैं कि इनसानों का दूसरे इनसान के साथ गुलामों की तरह बरताव सभ्यता के सब से शर्मनाक अध्यायों में से एक है. लेकिन अफसोस कि यह शर्मनाक अध्याय दुनियाभर की तकरीबन सभी सभ्यताओं के इतिहास में दर्ज है. भारत में जातिप्रथा के चलते पैदा हुआ भेदभाव आज तक बना हुआ है.

कम पढ़ेलिखे दलित समाज के नौजवान आज भी पंडेपुजारियों की बातों को मान कर हजारों रुपए खर्च कर के कांवड़ यात्रा, कथा, प्रवचन और भंडारे में बरबाद करते हैं. कमोबेश पढ़ेलिखे लोग भी इन आडंबरों से दूर नहीं हैं.

मनीष अहिरवार आगे कहते हैं कि एक बार वे महज 150 रुपए खर्च कर के ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगीरी’ पढ़ लें तो उन की आंखों के चश्मे पर पड़ी धूल साफ हो जाएगी. 1873 में लिखी गई इस किताब का मकसद दलितपिछड़ों को तार्किक तरीके से ब्राह्मण वर्ग की उच्चता के ?ाठे दंभ से परिचित कराना था.

इस किताब के माध्यम से ज्योतिबा फुले ने दलितों को हीनताबोध से बाहर निकाल कर आत्मसम्मान से जीने के लिए भी प्रेरित किया था. इस माने में यह किताब काफी खास है कि यहां इनसानों में परस्पर भेद पैदा करने वाली आस्था को तार्किक तरीके से कठघरे में खड़ा किया गया है.

अंगरेजों के शासन से मुक्ति की इच्छा और संघर्ष के बारे में हमें बहुतकुछ पता है, लेकिन यह भी पता होना चाहिए कि स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान देश का एक बड़ा दलित तबका, अंगरेजों को ब्राह्मणशाही से मुक्तिदाता के तौर पर भी देख रहा था.

भीमराव अंबेडकर और ज्योतिबा फुले जैसे करोड़ों भारतीयों के लिए जातिगत गुलामी का दंश इतना गहरा था कि इस के सामने वे राजनीतिक गुलामी को कुछ नहीं सम?ाते थे.

जिस तरह किसान आंदोलन ने सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर के सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, उसी तरह दलितपिछड़ों को भी अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होना होगा.

दलितपिछड़े नौजवानों को पंडे और पुजारियों की कपोलकल्पित बातों से दूर रह कर केवल सेवक नहीं शासक बनने की दिशा में भी कदम बढ़ाने होंगे, तभी उन पर होने वाले जुल्म कम होंगे और छुआछूत का यह कलंक समाज से दूर होगा.

घुड़चढ़ी- बराबरी का नहीं पाखंडी बनने का हक

रोहित

दरअसल, 24 जनवरी, 2022 को बूंदी जिले में केशवरायपाटन उपखंड के गांव चड़ी में श्रीराम मेघवाल की शादी थी. श्रीराम के परिवार वालों ने कलक्टर से शिकायत कर के कहा था कि लोकल दबंगों ने घोड़ी न चढ़ने की धमकी दी है, जिस के बाद इस शादी के लिए 3 अलगअलग पुलिस थानों के तकरीबन 60 पुलिस वालों को वहां तैनात किया गया और गांव को छावनी में तबदील कर दिया गया.

ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक दलित दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के लिए भी पुलिस की तैनाती करनी पड़ गई. जिले के बंडा थाना क्षेत्र के गांव गनियारी में अहिरवार जाति का कोई दूल्हा कभी घोड़ी पर नहीं चढ़ा था.

23 जनवरी, 2022 को दिलीप अहिरवार की शादी थी. दूल्हे और परिवार की इच्छा थी कि वे लोग बरात की निकासी घोड़ी पर ही करेंगे. पुलिस की निगरानी में शादी तो घुड़चढ़ी के साथ हो गई, लेकिन बरात निकलने के बाद ही दबंगों ने दूल्हे के घर पर पथराव कर दिया.

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ऐसे ही मध्य प्रदेश के रतलाम में भी कुछ साल पहले एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से पहले हैलमैट पहनना पड़ा. दरअसल, दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के चलते ऊंची जाति के दबंगों द्वारा दूल्हे की गाड़ी छीनी गई और पथराव किया गया, जिस के बाद पुलिस ने दूल्हे को हैलमैट पहना दिया, ताकि सिर पर चोट न लगे.

ऐसी कई घटनाएं हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार के अलावा देश के दूसरे राज्यों से हर साल सामने आती रहती हैं, जहां दलित दूल्हे को शादी में घोड़ी चढ़ने के अलावा तलवार रखने से रोका जाता रहा है.

जाहिर है, ऊंचा तबका इन परंपराओं को अपनी बपौती और जन्मजात हक सम?ाता है और निचली जातियों को इन परंपराओं को करने से भी रोकता है, जो कि लोकतांत्रिक और नए भारत में किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता.

पर कुछ सवाल जो दलित समाज को खुद से करने चाहिए कि घुड़चढ़ी में आखिर ऐसा है ही क्या कि आज के समय में भी इस परंपरा को अपनाया जाए? आखिर क्यों वे ऊंची जाति वालों की ऐसी फालतू परंपराओं को ढोने का हक समाज से चाह रहे हैं? क्या ऐसी सामंती परंपराओं को अपना कर दलितपिछड़े समाज का भला हो पाएगा? क्या यह महज ऊंची जाति वालों जैसा बनने या वैसा दिखने की कोशिश भर नहीं है?

पाखंड की घुड़चढ़ी

हिंदू धर्म में शादी को 16 संस्कारों में से एक संस्कार कहा गया है, जिस में तकरीबन 71 रस्मों को निभाया जाता है. इन्हीं रस्मों में एक घुड़चढ़ी भी है, जिसे ले कर ऊंची जाति वालों और दलितों के बीच अकसर विवाद बना रहता है. इस रस्म को ‘निकासी’ या ‘बिंदौरी’ भी कहते हैं. चूंकि ऊंची जाति वाले इस रस्म को केवल अपना हक सम?ाते हैं, इसलिए वे दलितों को उन की शादी में घोड़ी पर चढ़ने नहीं देते.

इस रस्म में दूल्हे को घोड़ी पर बैठा कर गाजेबाजे के साथ गांव या कसबे में घुमाया जाता है. रस्म में दूल्हे के दोस्त, परिचित और रिश्तेदार शामिल होते हैं. इस के बाद दूल्हा मंदिर में जा कर पूजा करता है.

‘निकासी’ के बाद वर वधू को ब्याह कर ही अपने घर लौटता है. इस में एक और रिवाज भी चलन में है, जिस के मुताबिक, जिस रास्ते से ‘निकासी’ होती है, उसी रास्ते से दूल्हा घर वापस नहीं लौटता. बाकी रस्मों की तरह घुड़चढ़ी रस्म भी तमाम ढोंगों से भरी पड़ी है. घुड़चढ़ी में पंडितों को पैसे देने, रिश्तेदारों को नेग देने व घोड़ी वाले को शगुन देने जैसी रीतियां भी शामिल हैं.

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हिंदू धर्म की बाकी रस्मों की तरह ही यह कुछ ऐसी रस्म है, जो दलितों को धार्मिक पाखंडों की ओर ले जा रही है. आज दलितपिछड़ा समाज घुड़चढ़ी जैसे रीतिरिवाजों के पीछे भाग रहा है और इस रस्म के साथ वह हिंदू धर्म के उन पाखंडों में घिरता जा रहा है, जिन्होंने हजारों साल उसे ऊंची जाति वालों का सेवक और गुलाम बना कर रखा. दलितों का इन रस्मों के पीछे भागने का मतलब बताता है कि आखिरकार हिंदू परंपराएं सही हैं, जिन में ऊंचनीच और छुआछूत जैसी व्यवस्था शामिल है.

फुजूल की मान्यताएं

दूल्हे की घुड़चढ़ी को ले कर कई मान्यताएं हैं, जिन में सब से नजदीकी मान्यता के मुताबिक, यह वीरता और शौर्य का प्रतीक है. पौराणिक काल में जाहिर है, घोड़ों की अहमियत बहुत ज्यादा थी, क्योंकि वे मजबूत और तेजतर्रार होते थे. युद्ध के मैदान से ले कर स्वयंवरों में अपनी ताकत दिखाने के लिए राजा घोड़े पर सवार हो कर निकलता था.

ऐसी कई कथाकहानियों में ढेरों राजाओं का जिक्र है, जो घोड़े पर सवार हो कर युद्ध के मैदान में उतरते या स्वयंवर में भाग लेते थे. बहुत बार युद्ध की वजह फलां रानी या राजा की बेटी से स्वयंवर करना होती थी, तो बहुत बार युद्ध में अपने दुश्मन को हरा कर उस की पत्नी या उस की बेटी पर कब्जा जमाना होता था. जाहिर है, दोनों ही सूरत में राजा अपने लिए एक रानी ब्याह लाता था.

अब आज के समय में लोगों को कौन सम?ाए कि ‘भई, न तो तुम किसी युद्ध में भाग लेने जा रहे हो और न तुम्हें घोड़े पर सवार हो कर अपनी होने वाली पत्नी को बाकी प्रतिभागी उम्मीदवारों से लड़ कर जीतना है और न ही तुम्हारी होने वाली पत्नी तुम्हारे घोड़ी पर चढ़ जाने से तुम्हारी ताकत का अंदाजा लगा लेगी. यह तो सोचें कि अगर राजामहाराजाओं के समय कार का आविष्कार हो गया होता, तो ऊंची जाति वाले घोड़ों को छोड़ कर कार पर ही अपना कब्जा जमा चुके होते, क्योंकि कार घोड़े से ज्यादा तेज और मजबूत साधन है.

दूल्हे की घुड़चढ़ी को ले कर इसी तरह की एक और मान्यता कहती है कि घोड़ी ज्यादा बुद्धिमान, चतुर और दक्ष होती है, उसे सिर्फ सेहतमंद व काबिल मर्द काबू कर सकता है. दूल्हे का घोड़ी पर आना इस बात का प्रतीक है कि घोड़ी की बागडोर संभालने वाला मर्द अपनी पत्नी और परिवार की बागडोर भी अच्छे से संभाल सकता है.

अब इस के हिसाब से सोचें तो कौन है, जो परिवार की बागडोर नहीं संभालना चाहता. ऐसा अगर सच में हो रहा होता, तो सब लोग हमेशा घोड़े पर यहांवहां घूमते दिखाई देते. भारत ही क्या विदेशों में भी लोग कारों को छोड़ कर घोड़ों की ही सवारी कर रहे होते. जब परिवार के सब मसलों के हल एक घोड़ी से हो रहे होते, तो किसी दूसरी चीज की क्या जरूरत?

कुछ मान्यताएं यह भी कहती हैं कि पुराणों के मुताबिक, सूर्यदेव की 4 संतानों यम, यमी, तपती और शनि का जन्म हुआ, उस समय सूर्यदेव की पत्नी रूपा ने घोड़ी का रूप धरा था. तब से घुड़चढ़ी की परंपरा चलने लगी. वहीं कुछ का मानना है कि दूल्हे को राजा जैसी इज्जत मिले, इसलिए यह परंपरा वजूद में आई.

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अब मान्यता चाहे जो भी हो, कोई जवाब दे कि देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए डा. भीमराव अंबेडकर क्या इसीलिए संविधान सौंप कर गए कि कल को राजतंत्र और सामंती परंपरा के पीछे भागतादौड़ता दबाकुचला दलित समाज दिखे? वह भी उस हिस्से से उपजी परंपरा, जो जातिवाद बढ़ाने का परिचायक रही हो? क्या यह खुद से पूछा नहीं जाना चाहिए कि अतीत में घोड़ों पर चढ़ कर सवर्णों के शौर्य और वीरता से कौन से जातिवाद का खात्मा किया जा रहा था?

जरूरी क्या है

सवाल यह भी है कि ऐसी प्रथाओं के पीछे भागना ही क्यों है, जिन का न तो कोई मतलब है और न जातिवाद के खात्मे में कोई भूमिका? सवाल यहां बराबरी का नहीं, सवाल है उद्धार का है. सिवा पाखंडी अधिकार हासिल होने के, दलितों को इस परंपरा को अपना कर क्या मिलेगा? अगर ऐसे ही सवर्णों की परंपरा और प्रथाओं को अपना कर दलितों का उद्धार हो सकता तो फिर जनेऊ अपना लेने में ही क्या समस्या है, जिस की पहचान ही जाति के आधार पर श्रेष्ठ हो जाना है, फिर बताते रहें खुद को बाकियों से श्रेष्ठ और पवित्र.

हाल ही में सबरीमाला मंदिर में औरतों के माहवारी के दिनों में घुसने का मामला जोरों से उछला. संविधान में सभी को बराबरी का दर्जा हासिल है तो जाहिर है, औरतों के सबरीमाला मंदिर में जाने की मांग भी उठी, जिस में अपनेआप में कोई बुराई नहीं. इस का संज्ञान ले कर सुप्रीम कोर्ट ने भी मंदिर में घुसने की इजाजत दी.

ऐसे ही आज भी कई मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं दिया जाता, उन के साथ मारपीट की जाती है, उन्हें कहा जाता है कि धर्म के मुताबिक वे मंदिरों में नहीं घुस सकते, पर असल सवाल यह है कि जो धार्मिक ग्रंथ, भगवान और मंदिरों में बैठे धर्म के ठेकेदार मंदिरों में घुसने से रोकते हैं, उन्हें अशुद्ध मानते हैं, वहां घुसना ही क्यों है?

क्या सवाल यह नहीं हो सकता कि आज क्यों इतनी कोशिशों के बाद भी सीवर की सफाई करने, मैला ढोने, सफाई का काम करने, श्मशान में शवों को जलाने वाले ज्यादातर मजदूर निचली जातियों से ही आते हैं? क्यों सरकार इस क्षेत्र में काम करने वालों को सही उपकरण नहीं देती है, उन्हें सुरक्षा नहीं देती है? दबेकुचलों और पिछड़ों को आगे बढ़ने के अवसरों पर काम क्यों नहीं करती है? आखिर क्यों सरकारी नौकरियों को कम किया जा रहा है?

क्या यह एक दलितपिछड़े समाज के युवा के हक का सवाल नहीं, जिस के आरक्षण का मुद्दा बस घोड़ी चढ़ाना और मंदिरों में प्रवेश करना ही रह गया है? आखिर क्यों पिछड़े समाज से आने वाले नेता बेमतलब के मुद्दों में समय और ताकत खराब कर गलत दिशा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?

इस तरह की परंपराएं दलित समाज को पाखंड की भेंट चढ़ाने के लिए काफी हैं, जिस में वे खुद गोते लगाते दिखाई दे रहे हैं. इस से दलितों को अधिकार मिले न मिले, पर पाखंड में जरूर भागीदारी मिल रही है. यही वजह भी है कि दलित समाज से निकलने वाले नेता दलित और पिछड़ा विरोधी दलों के साथ तालमेल बैठाते नजर आ जाते हैं और दलितों के नाम पर मलाई चाटते हैं.

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आज जरूरी है कि दलितों को सब तरह के पाखंड छोड़ने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए, उन्हें ऊंची जाति वालों के लिए बनाई गई परंपराओं को मानने, उन्हें अपनी परंपरा बनाने से बचना चाहिए, वरना वे भेदभाव सहते ही रहेंगे.

जातिवाद के चेहरे को उजागर करता सीसीटीवी कैमरा

सीसीटीवी कैमरा आज आम आदमी को बौना बना रहे हैं और उन को ज्यादा फर्क पड़ने लगा है जिन के पास अगर कुछ है तो थोड़ी सी इज्जत है. देश के गरीब किसानों, मजदूरों, कारीगरों के पास आज बस थोड़ी सी इज्जत होती है, रुपयापैसा नहीं. उन की इस इज्जत की खुली नीलामी होने लगे तो इस से बुरा कुछ न होगा.
मद्रास हाईकोर्ट के एक सिंगल जज ने कहा कि राज्य के हर ब्यूटी पार्लर और मसाज स्पा में सीसीटीवी होना चाहिए ताकि वहां कोई अनैतिक काम न हो. यह हुक्म असल में उस हुक्म की तरह है कि दलित औरतें अपनी छातियों को न ढकें जो कभी केरल में जबरन लागू किया जाता था और बाकी जगह अपनेआप लागू हो जाता था क्योंकि गरीब औरतों के पास 2 जोड़ी तक कपड़े होते ही नहीं थे और नहाते या कपड़े धोते समय उन्हें अपना बदन सब की आंखों के सामने खोलना पड़ता. अंगरेजी में बनी फिल्म ‘गांधी’ में एक सीन यह बड़ी अच्छी तरह दिखाया गया है जब नदी में नहाती एक बिना कपड़ों के गरीब लड़की को गांधी अपनी धोती दे देते हैं.
हाईकोर्ट के फैसले का मतलब है कि इन ब्यूटी पार्लरों और मसाज स्पाओं में काम करने वाली लड़कियां असल में देह बेचती हैं और ऊंची जातियों के लोग खरीदते हैं. वे न ब्यूटी ट्रीटमैंट कराते हैं, न मालिश. यह पूरी जमात को बदनाम करने वाला फैसला है. ब्यूटी पार्लरों व मसाज स्पाओं में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियां निचली जातियों की होती हैं. फाइवस्टार होटलों को भी धर्म के हिसाब से ऊंची कही जाने वाली लड़कियां इन कामों के लिए कम मिलती हैं.
ये लड़कियां अगर देह व्यापार में हैं तो भी क्या? यह उन का हक है. वे मेहनत की कमाई करती हैं. ऊंचे हाईकोर्ट में बैठे जज कमाऊ लड़की की आमदनी को रोकने या उस की इज्जत को खराब करने का हक नहीं रखते. देह व्यापार से जुड़ा सारा कानून असल में देश की दलित व ओबीसी लड़कियों के खिलाफ साजिश है जिस में ग्राहकों को तो बरी कर दिया जाता है पर लड़कियों, उन को घर में रखने वालियों, दलालों, सहायकों पर मुकदमे चलाए जाते हैं जो सब निचली जातियों के होते हैं. हां, ऊंची जातियों के पुलिस वाले, फाइनैंसर, नेता, मकान मालिक, म्यूनिसिपल कमेटी के इंस्पैक्टर वगैरह इन से अच्छी कमाई करते हैं.
गनीमत है कि सिंगल जज के फैसले को 2 जजों की बैंच ने जल्दी ही उलट दिया. 2 जजों ने जाति का मसला तो नहीं लिया, पर उन की चिंता थी ऊंची जातियों के ग्राहकों की, जिन की सीसीटीवी फुटेज ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं और जो निजता के हक का हनन करती हैं. उन्हें भी उन लड़कियों की चिंता नहीं थी जो ब्यूटी ट्रीटमैंट दे रही थीं या मसाज कर रही थीं और सीसीटीवी में आ जातीं.
चाहे ये लड़कियां ज्यादातर दलित और पिछड़ी क्यों न हों, इन को इज्जत से रहने का हक है, पूरा हक है. इन की फोटो ब्यूटी पार्लर या स्पा मालिक या पुलिस वालों के पास नहीं हो सकती. तमिलनाडु सरकार का आदेश कि ब्यूटी पार्लर या मसाज स्पा में घुसने के रास्ते पर सीसीटीवी लगा हो जजों ने बहाल किया है पर वह भी गलत है क्योंकि वह फुटेज वहां काम कर रही लड़कियों की इज्जत को तारतार करती है.    

क्या मंजिल तक पहुंच पाएगी ‘स्वाभिमान से संविधान यात्रा’

दलितों के सिर पर इन दिनों आरक्षण के छिन जाने का एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है. कुछ का अंदाजा है कि भाजपा पहले राम मंदिर बनाने को प्राथमिकता देगी, जबकि कुछ को डर है कि वह पहले आरक्षण खत्म करेगी और उस के तुरंत बाद ही राम मंदिर का काम होगा जिस से संभावित दलित विद्रोह और हिंसा का रुख राम की तरफ मोड़ कर उसे ठंडा किया जा सके.

पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण को ले कर अपनी मंशा यह कहते हुए जाहिर की थी कि आरक्षण विरोधी और समर्थकों को शांति के माहौल में बैठ कर इस मसले पर बातचीत करनी चाहिए, मतलब, ऐसी बहस जिस पर हल्ला मचेगा और यही भगवा खेमा चाहता है.

यह बातचीत हालांकि एकतरफा ही सही, सोशल मीडिया पर लगातार तूल पकड़ रही है जिस में सवर्ण भारी पड़ रहे हैं और इस की अपनी कई वजहें भी हैं.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार दलित बड़े पैमाने पर भाजपा की तरफ झुके थे तो इस की एक बड़ी वजह बतौर प्रधानमंत्री पेश किए गए खुद नरेंद्र मोदी का उस तेली साहू जाति का होना था जिस की गिनती और हैसियत आज भी दलितों सरीखी ही है.

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तब लोगों खासतौर से दलितों को लगा था कि भाजपा केवल सवर्णों की नहीं, बल्कि उन की भी पार्टी है जो उस ने तकरीबन एक दलित चेहरा पेश किया.

इस के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने दलित प्रेम का अपना दिखावा जारी रखा और तरहतरह के ड्रामे किए, जिन में उस के बड़े नेताओं का दलितों के घर जा कर उन के साथ खाना खाना और दलित संतों के साथ कुंभ स्नान प्रमुख थे.

इस का फायदा उसे मिला भी और दलित उसे वोट करते रहे. साल 2019 के चुनाव में आरक्षण मुद्दा बनता लेकिन बालाकोट एयर स्ट्राइक की सुनामी उसे बहा ले गई और राष्ट्रवाद के नाम पर सभी लोगों ने नरेंद्र मोदी को दोबारा चुना.

3 तलाक और कश्मीर में मनमानी थोपने के बाद जैसे ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण का मुद्दा उठाया तो दलित समुदाय बेचैन हो गया, क्योंकि अब राजनीति में उस का कोई माईबाप नहीं है और बसपा प्रमुख मायावती भी भाजपा के सुर में सुर मिला रही हैं.

पिछले 5 साल में भाजपा तकनीकी तौर पर दलितों को दो फाड़ कर चुकी है और ज्यादातर नामी दलित नेता उस की गोद में खेल रहे हैं, जिन्होंने उस की असलियत भांपते हुए इस साजिश का हिस्सा बने रहने से इनकार कर दिया, उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंकने में भी भाजपा ने देर नहीं की. इन में सावित्री फुले और उदित राज के नाम प्रमुख हैं.

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कांग्रेस का दांव

इधर कांग्रेसी खेमे को यह अच्छी तरह समझ आ रहा है कि उस की खिसकती जमीन की अहम वजह परंपरागत वोटों का उस से दूर हो जाना है जिन में मुसलमानों से भी पहले दलितों का नंबर आता है.

अब कांग्रेस भूल सुधारते हुए फिर दलितों को अपने पाले में लाने के लिए ‘स्वाभिमान से संविधान’ नाम की यात्रा निकालने जा रही है. इस बाबत उस का फोकस हालफिलहाल 3 राज्यों हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव हैं.

कुछ दिन पहले ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के नेताओं से मुलाकात कर इस यात्रा को हरी झंडी दे दी है जिस के तहत फिर से दलितों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए युद्ध स्तर पर कोशिशें की जाएंगी.

कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के मुखिया नितिन राऊत की मानें, तो ‘स्वाभिमान से संविधान यात्रा’ के तहत हरेक विधानसभा में एक कोऔर्डिनेटर नियुक्त किया जाएगा जो अपनी विधानसभा में इस यात्रा को आयोजित करेगा.

दलितों को लुभाने का यह दांव कितना कामयाब हो पाएगा, यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे, लेकिन कांग्रेस की एक बड़ी मुश्किल यह है कि उस के पास भी बड़े और जमीनी दलित नेताओं का टोटा है.

इधर सोशल मीडिया पर भगवा खेमा लगातार यह कह रहा है कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव समेत दलितों को सताने के मामले अब कम ही होते हैं. फसाद या बैर की असल जड़ तो आरक्षण है जिस के चलते दलित अपनी काबिलीयत नहीं दिखा पा रहे हैं. सवर्ण तो चाहते हैं कि दलित युवा अपनी काबिलीयत के दम पर आगे आ कर हिंदुत्व की मुख्यधारा से जुड़ें, उन का इस मैदान में स्वागत है.

यह कतई हैरानी की बात नहीं है कि मुट्ठीभर दलित युवा इसे एक चुनौती के रूप में ले रहे हैं और ये वे दलित हैं, जिन्हें अपने ही समुदाय के लोगों की बदहाली की असलियत और इतिहास समेत भविष्य का भी पता नहीं.

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ये लोग भरे पेट हैं, शहरी हैं और यह मान बैठे हैं कि पूरा दलित समुदाय ही उन्हीं की तरह है जिसे आरक्षण की बैसाखी फेंक देनी चाहिए.

यही दलित युवा भाजपा की ताकत हैं जो आरक्षण खत्म होने पर तटस्थ रह कर अपने ही समाज की बरबादी में योगदान देंगे, क्योंकि सवर्ण उन्हें गले लगा कर बराबरी का दर्जा देते हैं. उन के लिए यह साजिश भरी बराबरी ही ऊपर वाले का प्रसाद है.

बारीकी से गौर किया जाए तो भाजपा दलितों को बहलाफुसला कर आरक्षण छोड़ने पर राजी करने की भी कोशिश कर रही है और वही धौंस भी दे रही है जो 3 तलाक और धारा 370 के मुद्दों पर मुसलमानों को दी थी कि यह कोई बदला या ज्यादती नहीं, बल्कि तुम्हारे भले की ही बात है.

अगर सीधे से नहीं मानोगे तो यह काम दूसरे तरीकों से भी किया जा सकता है, लेकिन भाईचारा और भलाई इसी में है कि सहमत हो जाओ.

अब ऐसे में अगर कांग्रेस की यात्रा हवाहवाई बातों और सीबीएससी की बढ़ी हुई फीस जैसे कमजोर मुद्दों में सिमट कर रह गई तो लगता नहीं कि वह मंजिल तक पहुंच पाएगी.

चालान का डर

छोटेछोटे गुनाहों पर भारी रकम वसूल करना आज किसी भी कोने में खड़े वरदीधारी के लिए वैसा ही आसान हो गया है जैसा पहले सूनी राहों में ठगों और डकैतों के लिए हुआ करता था.

ट्रैफिक को सुधारने की जरूरत है, इस में शक नहीं है पर ट्रैफिक सुधारने के नाम पर कागजों की भरमार करना और किसी को भी जब चाहे पकड़ लेना एक आपातकाल का खौफ पैदा करना है. नियमकानून बनने चाहिए क्योंकि देश की सड़कों पर बेतहाशा अंधाधुंध टेढ़ीमेढ़ी गाडि़यां चलाने वालों ने अपना पैदायशी हक मान रखा था पर जिस तरह का जुर्माना लगाया गया है वह असल में उसी सोच का नतीजा है जिस में बिल्ली को मारने पर सोने की बिल्ली ब्राह्मण को दान में देने तक का विधान है.

ट्रैफिक कानून को सख्ती से लागू करना जरूरी था पर इस में फाइन बढ़ाना जरूरी नहीं. पहले भी जो जुर्माने थे वे कम नहीं थे और यदि उन्हें लागू किया जाता तो उन से ट्रैफिक संभाला जा सकता था, पर लगता है नीयत कुछ और है. नीयत यह है कि हर पुलिस कौंस्टेबल एक डर पैदा कर दे ताकि उस के मारफत घरघर में सरकार के बारे में खौफ का माहौल पैदा किया जा सके. यह साजिश का हिस्सा है.

इस की एक दूरगामी साजिश यह भी है कि ट्रक, टैंपो, आटो, टैक्सी, ट्रैक्टर, बस ड्राइवरों को इस तरह गरीब रखा जाए कि वे कभी न तो चार पैसे जमा कर सकें और न ही अपनी खुद की गाडि़यों के मालिक बन सकें. उन्हें आधा भूखा रखना ऐसे ही जरूरी है जैसे सदियों तक देश के कारीगरों को साल में 2 बार अनाज और कपड़े ही वेतन के बदले दिए जाते थे.

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पहले भी गाड़ीवानों, ठेला चलाने वालों, तांगा चलाने वालों, घोड़े वालों को बस इतना मिलता था कि वे घोड़े पाल सकें. मालिक तो कोई और ही होते थे. ये जुर्माने इतने ज्यादा हैं कि अगर सख्ती से लागू किए गए तो देश फिर पौराणिक युग में पहुंच जाएगा. यह गाज आम शहरी पर कम, उन पर ज्यादा पड़ेगी जो दिन में 10-12 घंटे गाडि़यां चलाते हैं.

आजकल इन कमर्शियल ड्राइवरों के लिए गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करना जरूरी हो गया है ताकि ग्राहक मिलते रहें. ट्रैफिक फाइन ज्यादातर उन्हीं से वसूले जाएंगे या फिर हफ्ता चालू कर दिया जाएगा जैसा शराब के ठेकों, वेश्याओं के कोठों, जुआघरों में होता है. एक इज्जत का काम सरकार ने बड़ी चालाकी से अपराध बना दिया है ताकि एक पूरी सेवादायी कौम को गुलाम बना कर रखा जा सके. यही तो हमारे पुराणों में कहा गया है.

दलितों की अनसुनी

देश का दलित समुदाय आजकल होहल्ला तो मचा रहा है कि उस के हकों पर डाके डालने की तैयारी हो रही है पर यह हल्ला सामने नहीं आ रहा क्योंकि न अखबार, न टीवी और न सोशल मीडिया उन की बातों को कोई भाव दे रहे हैं. दलितों में जो थोड़े पढ़ेलिखे हैं वे देख रहे हैं कि देश किस तरफ जा रहा है पर अपनी कमजोरी की वजह से वे वैसे ही कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहे जैसे अमेरिका के काले नहीं कर पा रहे जिन्हें ज्यादातर गोरे आज भी गुलामों की गुलाम सरीखी संतानें मानते हैं. दलितों का हल्ला अनसुना करा जा रहा है.

1947 के बाद कम्यूनिस्ट या समाजवादी सोच के दलितों को थोड़ी जगह देनी शुरू की थी क्योंकि तब गिनती में ज्यादा होने के बावजूद उन का कोई वजूद नहीं था. धीरेधीरे आरक्षण के कारण उन्हें कुछ जगह मिलने लगी तो ऊंची जातियों को एहसास हुआ कि सदियों से जो सामाजिक तौरतरीका बनाया गया है वह हाथ से निकल रहा है.

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उन्होंने मंडल कमीशन लागू करवा कर पिछड़ों को उन गरीब दलितों से अलग किया जो पहले जातिभेद के बावजूद साथ गरीबी में रहते थे और फिर इन पिछड़ों को भगवाई रस पिला कर अपनी ओर मिला लिया. यह काम बड़ी चतुराई और चुपचाप किया गया. लाखों ऊंची जातियों के कर्मठ और अपना पैसा लगाने वाले अलग काम करते हुए, अलग पार्टियों में रहते हुए धीरेधीरे उस समाज की सोच फिर से थोपने लगे जिस में खाइयां सिर्फ गरीबअमीर की नहीं हैं, जाति और वह भी जो जन्म से मिली है और पिछले जन्मों के कर्म का फल है, चौड़ी होने लगीं.

मजे की बात है कि दलितों और पिछड़ों ने इन खाइयों को बचाव का रास्ता मान लिया और खुद गहरी करनी शुरू कर दीं. आज इस का नतीजा देखा जा सकता है कि मायावती को भारतीय जनता पार्टी के पाले में बैठने को मजबूर होना पड़ रहा है और सभी पार्टियों के ऊंची जातियों के लोग बराबरी, आजादी, मेहनत वगैरह के हकों की जगह धर्म का नाम ले कर बहुतों की आवाज दबाने में अभी तो सफल हो रहे हैं.

जातिगत भेदभाव का सब से बड़ा नुकसान यह है कि उस से वे ताकतवर हो जाते हैं जो करतेधरते कम हैं और वे अधपढ़े आलसी हो जाते हैं जिन पर देश बनाने का जिम्मा है. हमारे समाज में खेती, मजदूरी, सेना, कारीगरी हमेशा उन हाथों में रही है जिन के पास न पढ़ाई है, न हक है. आज की तकनीक का युग हर हाथ को पढ़ालिखा मांगता है और जो पढ़ालिखा होगा वह हक भी मांगेगा. दलितों की आवाज दबा कर ऊंची जातियां खुश हो लें पर इस खमियाजा देश को भुगतना होगा. देश के किसान, मजदूर, कारीगर, सैनिक, छोटे काम करने वाले बहुत दिन चुप नहीं रहेंगे. वे या तो देश की जड़ें खोखली कर देंगे या कुछ करने के लिए खुल्लमखुल्ला बाहर आ जाएंगे.

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दलितों की बदहाली

सुप्रीम कोर्ट भी किस तरह दलितों को जलील करता है इस के उदाहरण उस के फैसलों में मिल जाएंगे. देशभर में दलितों को बारबार एहसास दिलाया जाता है कि संविधान में उन्हें बहुत सी छूट दी हैं पर यह कृपा है और उस के लिए उन्हें हर समय नाक रगड़ते रहनी पड़ेगी. महाराष्ट्र म्यूनिसिपल टाउनशिप ऐक्ट में यह हुक्म दिया गया है कि अगर दलित या पिछड़ा चुनाव लड़ेगा तो उस को अपनी जाति का सर्टिफिकेट नौमिनेशन के समय या चुने जाने के 6 महीने में देना होगा.

यह अपनेआप में उसी तरह का कानून है जैसा एक जमाने में दलितों को घंटी बांध कर घूमने के लिए बना था ताकि वे ऊंची जातियों को दूर से बता सकें कि वे आ रहे हैं. यह वैसा ही है जैसा केरल की नीची जाति की नाडार औरतों के लिए था कि वे अपने स्तन ढक नहीं सकतीं ताकि पता चल सके कि वे दलित अछूत हैं. दोनों मामलों में इन लोगों से जी भर के काम लिया जा सकता था पर दूरदूर रख कर.

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कानून यह भी कहता है कि हर समय अपना जाति प्रमाणपत्र रखो. क्यों? ब्राह्मणों को तो हर समय या कभी भी अपना जाति सर्टिफिकेट नहीं चाहिए होता तो पिछड़े दलित ही क्यों लगाएं? क्यों वे कलेक्टर, तहसीलदार से अपना सर्टिफिकेट बनवाएं? उन्होंने किसी आरक्षित सीट के लिए कह दिया कि वे पिछड़े या दलित हैं तो मान लिया जाए. आज 150 साल की अंगरेजी पढ़ाई, बराबरी के नारों के बावजूद भी क्यों जाति का सवाल उठ रहा है? क्या पढ़ेलिखे विद्वानों के लिए 150 साल का समय कम था कि वे जाति का सवाल ही नहीं मिटा सकते थे? जब हम मुगलों और ब्रिटिशों के राज से छुटकारा पा सकते थे तो क्या दलित पिछड़े के तमगों से नहीं निकल सकते थे?

यहां तो उलट हो रहा है. शंकर देवरे पाटिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को सही ठहराया है जिस ने यह जबरन कानून थोप रखा है कि आरक्षित सीट पर खड़े होना है तो सर्टिफिकेट लाओ. यह अपमानजनक है. यह दलितों, पिछड़ों को एहसास दिलाने के लिए है कि वे निचले, गंदे, पैरों की धूल हैं. यह बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ है.

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दलितों और पिछड़ों को जो भी छूट मिले उन्हें बिना किसी प्रमाणपत्र लटकाए मिलनी चाहिए. अगर ऊंची जाति का कोई उस का गलत फायदा उठाए तो उस के लिए सजा हो, दलित पिछड़े के लिए नहीं. वैसे भी ऊंची जाति का कोई दलित पिछड़े को दोस्त तक नहीं बनाता, वह उन की जगह कैसे लेगा? ऊंची जातियों का आतंक इतना है कि नीची जाति वाले तो हर समय चेहरे पर ही वैसे ही अपने सर्टिफिकेट गले में लटकाए फिरते हैं. नरेंद्र मोदी कहते रहें कि हिंदू आतंकवादी नहीं हैं पर लठैतों के सहारे दलितों और पिछड़ों पर जो हिंदू आतंक 150 साल में नई हवा के बावजूद भी बंद नहीं हुआ, वह सुप्रीम कोर्ट की भी मोहर इसी आतंकवाद की वजह से पा जाता है.

दलित दूल्हा घोड़ी नहीं चढ़ेगा

गुरुवार. 13 दिसंबर, 2018. बरात पर पथराव व मारपीट. दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारा गया. राजस्थान के अलवर जिले के लक्ष्मणगढ़ थाना इलाके के गांव टोडा में गुरुवार, 13 दिसंबर, 2018 को दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने और बरात पर पथराव व मारपीट करने का मामला सामने आया.

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, गांव टोडा के हरदयाल की बेटी विनिता की शादी के लिए पास के ही गांव गढ़काबास से बरात आई थी.

बरात ज्यों ही गांव में घुसी, राजपूत समाज के 2 दर्जन से भी ज्यादा लोग लाठियां व सरिए ले कर बरातियों पर टूट पड़े. इस दौरान दर्जनभर लोगों को गंभीर चोटें आईं.

बाद में सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचे पुलिस प्रशासन ने दूल्हे की दोबारा घुड़चढ़ी करा कर शादी कराई.

शादियों के मौसम में तकरीबन हर हफ्ते देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी किसी घटना की खबर आ ही जाती है. इन घटनाओं में जो एक बात हर जगह समान होती है, वह यह कि दूल्हा दलित होता है, वह घोड़ी पर सवार होता है और हमलावर ऊंची जाति के लोग होते हैं.

दलित समुदाय के लोग पहले घुड़चढ़ी की रस्म नहीं कर सकते थे. न सिर्फ ऊंची जाति वाले बल्कि दलित भी मानते थे कि घुड़चढ़ी अगड़ों की रस्म है, लेकिन अब दलित इस फर्क को नहीं मान रहे हैं. दलित दूल्हे भी घोड़ी पर सवार होने लगे हैं.

यह अपने से ऊपर वाली जाति के जैसा बनने या दिखने की कोशिश है. इसे लोकतंत्र का भी असर कहा जा सकता है जिस ने दलितों में भी बराबरी का भाव पैदा कर दिया है. यह पिछड़ी जातियों से चल कर दलितों तक पहुंचा है.

ऊंची मानी गई जातियां इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रही हैं. उन के हिसाब से दूल्हे का घोड़ी पर सवार होना ऊंची जाति वालों का ही हक है और इसे कोई और नहीं ले सकता. वैसे भी जो ऊंची जातियां दलितों के घोड़ी चढ़ने पर हल्ला कर रही हैं, आजादी तक वे खुद घोड़ी पर चढ़ कर शादी नहीं कर सकती थीं.

आजादी के बाद पिछड़ी जातियों के जोतहारों को जमीनें मिल गईं और ऊंची जातियों के लोग गांव छोड़ कर शहर चले गए तो वे जातियां खुद को राजपूत कहने लगी हैं.

लिहाजा, वे इस बदलाव को रोकने की तमाम कोशिशें कर रही हैं. हिंसा उन में से एक तरीका है और इस के लिए वे गिरफ्तार होने और जेल जाने तक के लिए भी तैयार हैं.

देश में लोकतंत्र होने के बावजूद भी ऊंची जाति वालों में यह जागरूकता नहीं आ रही है कि सभी नागरिक बराबर हैं.

जब तक बराबरी, आजादी और भाईचारे की भावना के साथ समाज आगे बढ़ने को तैयार नहीं होगा, तब तक सामाजिक माहौल को बदनाम करने वाली इस तरह की घटनाएं यों ही सामने आती रहेंगी.

ऐसी घटनाएं हजारों सालों की जातीय श्रेष्ठता की सोच का नतीजा है जो बारबार समाज के सामने आता रहता है या यों कहें कि कुछ लोग आजादी समझ कर आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं तो तथाकथित ऊंचे लोगों के अंदर का शैतान खुलेआम नंगा नाच करने को बाहर आ जाता है.

जिस राजस्थान को राजपुताना कहा जाता है वह रामराज्य का समानार्थी सा लगता है. दोनों का गुणगान तो इस तरह किया जाता है कि जैसे दुनिया में इन से श्रेष्ठ सभ्यता कहीं रही ही नहीं होगी, मगर जब इन दोनों की सचाई की परतें खुलती जाती हैं तो हजारों गरीब इनसानों की लाशों की सड़ांध सामने आने लगती है और वर्तमान आबोहवा को दूषित करने लगती है.

रामराज्य के समय के ऋषिमुनियों और राजपुताना के ठाकुरों व सामंतों में कोई फर्क नहीं दिखता. रामराज्य में औरतें बिकती थीं. राजा व ऋषि औरतों की बोली लगाते थे. राजपुताना के इतिहास में कई ऐसे किस्से हैं जहां शादी के पहले दिन पत्नी को ठाकुर के दरबार में हाजिरी देनी होती थी. सामंत कब किस औरत को पकड़ ले, उस के विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती थी.

माली शोषण मानव सभ्यता के हर समय में हर क्षेत्र में देखा गया, मगर दुनिया में दास प्रथा से भी बड़ा कलंक ब्राह्मणवाद रहा है जिस में शारीरिक व मानसिक जोरजुल्म सब से ऊंचे पायदान पर रहा है.

जातियां खत्म करना इस देश में मुमकिन नहीं है. अगर कोई जाति खुद को श्रेष्ठ बता कर उपलब्ध संसाधनों पर अपने एकलौते हक का दावा करती है, तो वह कुदरत के इंसाफ के खिलाफ है. कोई जाति खुद को ऊंची बता कर दूसरी जाति के लोगों को छोटा समझती है, वही जातीय भेदभाव है, जो इस जमाने में स्वीकार करने लायक नहीं है.

सब जातियां बराबर हैं, सब जाति के इनसान बराबर हैं और मुहैया संसाधनों पर हर इनसान का बराबर का हक है, यही सोच भारतीय समाज को बेहतर बना सकती है.

दलितों में इस तरह सताए जाने के मामलों की तादाद बहुत ज्यादा है जो कहीं दर्ज नहीं होते, नैशनल लैवल पर जिन की चर्चा नहीं होती.

दरअसल, एक घुड़चढ़ी पर किया गया हमला सैकड़ों दलित दूल्हों को घुड़चढ़ी से रोकता है यानी सामाजिक बराबरी की तरफ कदम बढ़ाने से रोकता है.

भाजपा सरकार व पुलिस अगर दलितों को घोड़ी पर नहीं चढ़वा सकती तो इस परंपरा को ही समाप्त कर दे. पशुप्रेम के नाम पर किसी भी शादी में घोड़ी पर चढ़ना बंद करा जा सकता है.

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