सास बनी मिसाल, बहू ने किया कमाल

सीकर के रामगढ़ शेखावाटी के ढांढण गांव की रहने वाली कमला देवी एक सरकारी टीचर हैं. उन्होंने 25 मई, 2016 को अपने छोटे बेटे शुभम की शादी सुनीता नाम की एक लड़की से कराई थी. चूंकि सुनीता एक गरीब परिवार से संबंध रखती थी, इसीलिए कमला देवी ने बिना दहेज लिए ही उसे अपने घर की बहू बनाया था.

शुभम को अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करनी थी. लिहाजा, वह शादी के बाद अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेश में किर्गीस्तान चला गया था, लेकिन शादी के 6 महीने बाद ही नवंबर, 2016 में वह इस दुनिया को अलविदा कह गया. ब्रेन स्ट्रोक ने शुभम की जान ले ली थी. कमला देवी पर तो मानो वज्रपात हो गया था.

ये भी पढ़ें : अंधविश्वास: हिंदू धर्म में गोबर की पूजा, इंसानों से छुआछूत

राजस्थान जैसे वैचारिक तौर पर पिछड़े प्रदेश में उन्हें अपने दुख को किसी तरह कम करने के साथसाथ अपनी विधवा बहू सुनीता को भी समाज के तानों से बचाना था. लिहाजा, अब कमला देवी को सुनीता की मां का रोल निभाना था और उन्होंने वही किया भी.

कमला देवी ने अपने जवान बेटे की मौत का सदमा भुला कर सुनीता को एमए, बीएड की पढ़ाई कराई और फिर उसे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया. साल 2021 में कमला देवी की मेहनत और सुनीता की लगन ने रंग दिखाया और वह इतिहास सब्जैक्ट के लैक्चरर पद के लिए चुन ली गई. पर कमला देवी का यही लक्ष्य नहीं था, बल्कि उन के मन में कुछ और ही चल रहा था. शुभम की मौत के 5 साल बाद जब सुनीता की अच्छी सरकारी नौकरी भी लग चुकी थी, तब कमला देवी ने अपनी इस होनहार बेटी की धूमधाम से दूसरी शादी कराई.

ये भी पढ़ें : “नवजात” को बेचने के “अपराधी”

कमला देवी ने मां की तरह अपनी बहू का कन्यादान करते हुए उस की शादी मुकेश नाम के एक लड़के से कराई. ऐसी खबर उस राजस्थान के रीतिरिवाजों पर एक तमाचा है, जहां शादी में दहेज की नुमाइश की जाती है. हाल ही में भरतपुर में एक बरखास्त थानेदार अर्जुन सिंह की बेटी की शादी थी. इस में लोगों के बीच बैठ कर एक करोड़ रुपए से ज्यादा का दहेज दिया गया. हर बराती को 500 रुपए की विदाई भी दी गई.  हैरत की बात यह भी रही कि दहेज में दिए गए करोड़ों रुपए का ऐलान सार्वजानिक रूप से किया गया. इस दौरान विधायक समेत अनेक बड़े पदाधिकारी भी वहां मौजूद थे, मगर पुलिस या प्रशासन ने कार्यवाही करने की हिम्मत तक नहीं जुटाई.

ये भी पढ़ें : जागरूकता: सड़क हादसे

दरअसल, उच्चैन कसबे  की तियापट्टी कालोनी में  23 जनवरी को बरखास्त थानेदार अर्जुन सिंह की बेटी दिव्या कुमारी की शादी थी और करौली के कैमरी से बरात आई थी. अर्जुन सिंह गढ़ी बाजना थाना इलाके का रहने वाला है. तकरीबन  30 साल से वह उच्चैन कसबे में रह रहा है. उसे नवंबर, 2019 में कामां की धिलावटी चौकी से सस्पैंड किया गया था, फिर गैरहाजिर रहने पर जनवरी, 2020 में उसे बरखास्त कर दिया गया था.

अंधविश्वास: हिंदू धर्म में गोबर की पूजा, इंसानों से छुआछूत

लेखक- धीरज कुमार

हिंदू धर्म में पेड़पौधे की पूजा की जाती है. तुलसी के पौधे में रोजाना जल दिया जाता है. पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाया जाता है और पूजा की जाती है.

औरतें बरगद के पेड़ के नीचे पूजा कर के अपने पतियों की लंबी उम्र होने की कामना करती हैं. इस तरह अनेक पेड़पौधे हैं, जिन की पूजा हिंदू धर्म में रीतिरिवाज और श्रद्धा से की जाती है.

इस धर्म में जानवरों की पूजा भी की जाती है. गाय को माता की तरह सम्मान दिया गया है. बैल को भी पूजा जाता है. बैल को भगवान शंकर की सवारी माना जाता है. चूहे को गणेश की सवारी माना जाता है. बंदर को हनुमान का रूप माना जाता है. यहां तक कि विषधर सांपों की भी पूजा नागपंचमी के दिन की जाती है, जिन के काटने से आदमी की तुरंत मौत हो सकती है.

इस धर्म में नदी, तालाब, पोखर, जलाशय की पूजा की जाती है. कुछ नदियों को तो काफी पवित्र माना जाता है, भले ही उन में काफी गंदगी हो.

गंगा, यमुना जैसी नदी को मोक्षदायिनी माना जाता है. पहाड़ों को भी पवित्र माना जाता है और पूजा जाता है, इसीलिए अनेक मंदिर पहाड़ों पर भी बने हैं. लोग वहां भगवान के दर्शन करने  जाते हैं.

ये भी पढ़ें : रिश्ते अनमोल होते हैं

इस तरह से देखा जाए, तो हिंदू धर्म में जानवरों, पशुपक्षियों, कीड़ेमकोड़ों, पेड़पौधों सभी की पूजा की जाती है. पर इनसानों से काफी भेदभाव किया जाता है. सिर्फ भेदभाव ही नहीं किया जाता है, बल्कि लोगों के बीच काफी छुआछूत पनपी है.

रोहतास के डेहरी ब्लौक के विनोद कुमार कुशल कारोबारी हैं. वे हिंदू धर्म पर चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘‘हिंदू धर्म में गाय, बैल, बंदर, चिडि़या, पेड़पौधे, कीड़ेमकोड़े, सांप सब को सम्मान दिया जाता है, पर इनसानों को नफरत से देखा जाता है.

‘‘यहां तक कि हिंदू धर्म में गोबर की पूजा भी की जाती है, पर इनसानों से भेदभाव किया जाता है. हिंदू धर्म में बिना गोबर के पूजा नहीं होती है. सभी पूजा में गोबर की अहमियत है यानी गोबर होना जरूरी है. कुछ तरह की पूजा में तो गाय की बछिया के मूत्र का भी इस्तेमाल किया जाता है. उसे काफी पवित्र माना जाता है. उस से कोई घृणा नहीं करता है.

‘‘पर, यहां आम इनसान की तो कोई अहमियत नहीं है. जिस इनसान से आप अपने खेतों में काम करवाते हैं, मजदूरी करवाते हैं, उस से आप के खेतखलिहान, फसल में छूत नहीं लगती है. लेकिन आप उसे जब अपने घर खाने के लिए देते हैं, तो उसे थाली में नहीं खिलाते हैं, बल्कि पत्तल में खिलाना पसंद करते हैं. उसे छूते ही आप अपवित्र मानने लगते हैं.’’

ओमप्रकाश बाल्मीकि अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में लिखते हैं कि बचपन में उन के मातापिता गांव के भोज, जलसे में फेंकी गई पत्तलों से बचा भोजन इकट्ठा कर घर लाते थे. फिर उसे धूप में सुखा कर रख देते थे. जरूरत पड़ने पर उसे पानी में भिगो कर खाते थे.

ये बातें काल्पनिक नहीं हैं. यह तो सचाई है. यह सब छुआछूत के चलते हालफिलहाल तक चलन में था. लेकिन हिंदू धर्म के ब्राह्मणों, पंडितों, पुजारियों, धर्माचार्यों ने कभी इस का विरोध नहीं किया. कभी भी उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश नहीं की.

ये भी पढ़ें : बौयफ्रैंड पर भरोसा क्राइम नहीं

आज जब गरीब तबके में जागरूकता फैली तो यह काम बंद हो चुका है. लेकिन ऊंचे तबके के लोगों के मन में आज भी इस बात की कसक है कि उन की मरजी से जीने वाले लोग आज अपनी मरजी से जीने लगे हैं. कल तक वे निचले तबके के लोगों पर जुल्म करते थे और आज भी कर रहे हैं. बस थोड़ी कमी आ गई है, क्योंकि आज इन में स्वाभिमान जागने लगा है.

आज भी कुछ गांवों में ऊंचे तबके के लोग निचले तबके के लोगों को जातिसूचक शब्दों से ही संबोधित करते हैं. वे अपने नामों से कम जाने जाते हैं, बल्कि अपने जातिसूचक नामों से ज्यादा जाने जाते हैं.

यही वजह है कि आज भी निचला तबका इन जातियों से दूरी बना कर रहता है. कई बार तो वे हिंदू धर्म में रह कर कुंठा का अनुभव करते हैं, इसीलिए कुछ लोग धर्म परिवर्तन की चाह रखने लगे हैं. उन का कहना है कि जब हिंदू धर्म हम लोगों को जोड़ कर रख नहीं सकता है, तो उस धर्म को अपने माथे पर ढोने से क्या फायदा.

गांव में आज भी ऊंचे तबके वालों के घर भोज, जलसे, जन्ममृत्यु, विवाह जैसे मौकों पर लोगों को भोज खिलाया जाता है, तो सब से पहले ब्राह्मणों को खिलाया जाता है. इस के बाद ऊंची जाति के लोग खाते हैं. इस के बाद निचले तबके के लोगों को खिलाया जाता है. वह भी गलियों या खेतों में जमीन पर बैठा कर खिलाया जाता है, इसीलिए आज निचले तबके के पढ़ेलिखे नौजवान इन के घरों के जलसे, भोज खाने से परहेज करते हैं.

आपसी नफरत का ही नतीजा है कि निचले तबके के लोगों का गांव में घर एक तरफ किनारे होता है, जबकि ऊंची जाति वाले लोगों का घर दूसरी तरफ अलग होता है.

गांव में जाने के बाद इस बात का एहसास हो जाता है कि ऊंची जाति वालों का घर किधर है और निचले तबके वालों का घर किधर है. कोई भी इसे आसानी से पहचान सकता है.

ये भी पढ़ें : अविवाहित लड़कियों पर प्रश्नचिह्न क्यों

यह जातीय नफरत का ही नतीजा है कि आज भी गांव का समाज वैसा के वैसा ही है जैसा आजादी के समय था. गांवों में बिजली आ गई है, सड़कें बन गई हैं, मोबाइल फोन और इंटरनैट का खूब इस्तेमाल हो रहा है, पर अगर नहीं बदला है तो लोगों के विचार, भेदभाव करने का नजरिया, छुआछूत करने की आदत. लोगों को निचले तबके से नफरत करने की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है. आज भी सब जस का  तस है.

किन्नर: समाज के सताए तबके का दर्द

 देवेंद्रराज सुथार

पिछले दिनों कोलकाता पुलिस में इंस्पैक्टर की भरती के इम्तिहान का इश्तिहार निकला, तो पल्लवी ने भी इस इम्तिहान में बैठने का मन बना लिया. जब उस ने आवेदनपत्र डाउनलोड किया, तो उस में जैंडर के केवल 2 ही कौलम थे, एक पुरुष और दूसरा महिला.

पल्लवी को मजबूरन हाईकोर्ट की शरण में जाना पड़ा. अपने वकील के जरीए उस ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और साल 2014 के ट्रांसजैंडर ऐक्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपनी दलील रखी.

ये भी पढ़ें : अंधविश्वास: वैष्णो देवी मंदिर हादसा- भय, भगदड़ और भेड़चाल

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एडवोकेट से इस मामले पर राय पेश करने को कहा. अगली तारीख पर राज्य सरकार के एडवोकेट ने हाईकोर्ट को बताया कि सरकार आवेदन के ड्राफ्ट में पुरुष और महिला के साथसाथ ट्रांसजैंडर कौलम रखने के लिए रजामंद हो गई है.

अब पल्लवी पुलिस अफसर बने या न बने, उस ने भारत के ट्रांसजैंडरों के लिए एक खिड़की तो खोल ही दी है.

ऐसे ही पुलिस में भरती होने वाली देश की पहली ट्रांसजैंडर और तमिलनाडु पुलिस का हिस्सा पृथिका यशनी की एप्लीकेशन रिक्रूटमैंट बोर्ड ने खारिज कर दी थी, क्योंकि फार्म में उस के जैंडर का औप्शन नहीं था. ट्रांसजैंडरों के लिए लिखित, फिजिकल इम्तिहान या इंटरव्यू के लिए कोई कटऔफ का औप्शन भी नहीं था.

इन सब परेशानियों के बावजूद पृथिका यशनी ने हार नहीं मानी और कोर्ट में याचिका दायर की. उस के केस में कटऔफ को 28.5 से 25 किया गया. पृथिका हर टैस्ट में पास हो गई थी, बस 100 मीटर की दौड़ में वह एक सैकंड से पीछे रह गई. मगर उस के हौसले को देखते हुए उस की भरती कर ली गई.

ये भी पढ़ें :  गैंगमैन की  सिक्योरिटी तय हो

मद्रास हाईकोर्ट ने साल 2015 में तमिलनाडु यूनिफार्म्ड सर्विसेज रिक्रूटमैंट बोर्ड को ट्रांसजैंडर समुदाय के सदस्यों को भी मौका देने के निर्देश दिए. इस फैसले के बाद से फार्म के जैंडर में 3 कौलम जोड़े गए.

तमिलनाडु में ही क्यों, राजस्थान में भी यही हुआ था. जालौर जिले के रानीवाड़ा इलाके की गंगा कुमारी ने साल 2013 में पुलिस भरती का इम्तिहान पास किया था. हालांकि, मैडिकल जांच के बाद उन की अपौइंटमैंट को किन्नर होने के चलते रोक दिया गया था. गंगा कुमारी हाईकोर्ट चली गई और 2 साल की जद्दोजेहद के बाद उसे कामयाबी मिली.

ये फैसले बताते हैं कि जरूरत इस बात की है कि समाज के हर शख्स का नजरिया बदले, नहीं तो कुरसी पर बैठा अफसर अपने नजरिए से ही समुदाय को देखेगा.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, हमारे देश में तकरीबन 5 लाख ट्रांसजैंडर हैं. अकसर इस समुदाय के लोगों को समाज में भेदभाव, फटकार और बेइज्जती का सामना करना पड़ता है. ऐसे ज्यादातर लोग भिखारी या सैक्स वर्कर के रूप में अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं.

15 अप्रैल, 2014 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने थर्ड जैंडर को संवैधानिक अधिकार दिए और सरकार को इन अधिकारों को लागू करने का निर्देश दिया. उस के बाद 5 दिसंबर, 2019 को राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद थर्ड जैंडर के अधिकारों को कानूनी मंजूरी मिल गई.

हर तरह के जैंडर पर सभी देशों में चर्चा होती है, उन्हें समान अधिकार और आजादी दिए जाने की वकालत होती है, बावजूद इस के जैंडर के आधार पर सभी को बराबर अधिकार और आजादी अभी भी नहीं मिल पाई है.

ये भी पढ़ें : शख्सियत: आयशा मलिक- पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस

साल 2011 की जनगणना बताती है कि महज 38 फीसदी किन्नरों के पास नौकरियां हैं, जबकि सामान्य आबादी का फीसद 46 है. साल 2011 की जनगणना यह भी बताती है कि केवल 46 फीसदी किन्नर पढ़ेलिखे हैं, जबकि समूचे भारत की पढ़ाईलिखाई की दर 76 फीसदी है.

किन्नर समाज जोरजुल्म का शिकार है. इसे नौकरी और तालीम पाने का अधिकार बहुत कम मिलता है. ऐसे लोगों को अपनी सेहत की सही देखभाल करने में भी दिक्कत आती है.

दक्षिण भारत के 4 राज्यों तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि कुल एचआईवी संक्रमण में से 53 फीसदी किन्नर समुदाय का हिस्सा है.

किन्नर समुदाय भेदभाव के चलते ही अपनी भावनाओं को छिपाता है, क्योंकि वे लोग इस बात से डरे होते हैं कि कहीं वे अपने परिवारों द्वारा घर से निकाल न दिए जाएं.

किन्नरों के परिवारों में कम से कम एक शख्स ऐसा जरूर होता है, जो यह नहीं चाहता कि ट्रांसजैंडर होने के चलते समाज किसी से भी बात करे. किसी के किन्नर होने की जानकारी होने पर

समाज के लोग उस शख्स से दूरी बनाने लगते हैं.

विकास के इस दौर में किन्नर समाज आज भी हाशिए पर खड़ा है. किन्नर समुदाय के विकास की अनदेखी एक गंभीर मुद्दा है. सभी समुदायों के अधिकारों के बारे में चर्चा की जाती है, लेकिन किन्नर समुदाय के बारे में चर्चा तक नहीं होती. हर किन्नर पल्लवी जितने मजबूत मन का भी नहीं होता कि लड़ कर अपना हक ले ले.

सवाल यह है कि आखिर वह समय कब आएगा, जब समाज के सामान्य सदस्यों की तरह इन्हें भी आसानी से इन का हक मुहैया रहेगा? कानून के बावजूद भी उन की समान भागीदारी से बहुतकुछ बदल पाने की उम्मीद तब तक बेमानी है, जब तक कि सामाजिक लैवल पर नजरिया बदलता नहीं. जब तक सामाजिक ढांचे में उन की अनदेखी की जाती रहेगी, तब तक कानूनी अधिकार खोखले ही रहेंगे.

अब यह जरूरी है कि समान अधिकारों के साथसाथ समाज में भी समान नजरिया हो, तभी बदलाव आएगा. कानून एक खास पहलू है, लेकिन समाज के नजरिए को बदलना भी कम खास नहीं है, इसलिए इस जद्दोजेहद का खात्मा कानून के पास होने से नहीं होता, बल्कि यहीं से सामाजिक रजामंदी के लिए एक नई जद्दोजेहद शुरू होती है.

किन्नर ट्रेनों, बसों या सड़क पर लोगों के सिर पर हाथ फेरते हुए दुआ देते हैं और पैसे मांगते हैं. बद्दुआ का डर कुछ लोगों को पैसे देने के लिए मजबूर करता है, लेकिन यह उन की समस्या का हल नहीं है.

किन्नर के रूप में पैदा होने में उन का कोई कुसूर नहीं है. इन की जिंदगी बदलना भी हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन हम अपनी सोच तो कम से कम बदल ही सकते हैं.

हमारी सोच बदलेगी, तो किन्नर भी मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं और बेहतर जिंदगी जी सकते हैं. आईपीएस, आईएएस अफसर ही नहीं, बल्कि सेना में शामिल हो कर देश की हिफाजत के लिए अपनी जान भी लड़ा सकते हैं.

ये भी पढ़ें : बदहाली: कोरोना की लहर, टूरिज्म पर कहर

बदहाली: कोरोना की लहर, टूरिज्म पर कहर

 सावित्री रानी

कोरोना को इस दुनिया में आए 2 साल से ज्यादा का समय हो चुका है. इस की गाज किसकिस पर गिरी, इस ने किसकिस की जिंदगी को तबाह किया, यह जानने के लिए हमें दूर जाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपने और अपने आसपास एक नजर डालना ही काफी है.

हर कोई इस नामुराद वायरस का किसी न किसी तरह से शिकार हुआ है, फिर चाहे वह कोई बच्चा हो या बूढ़ा, नौजवान हो या अधेड़, इस नामाकूल ने किसी में भी फर्क नहीं किया. किसी का स्कूल बंद हुआ, तो किसी का कालेज. किसी की सेहत पर अटैक हुआ, तो किसी के रिश्तों पर. किसी की आजादी दांव पर लगी, तो किसी की नौकरी. सभी ने कुछ न कुछ खोया जरूर है.

आज इस दुनिया में एक भी इनसान ऐसा नहीं ढूंढ़ा जा सकता, जो यह कह सके कि कोरोना ने उस की जिंदगी को कहीं से भी नहीं छुआ है. समाज के जिन क्षेत्रों पर इस ने मालीतौर पर सब से ज्यादा असर डाला है, उन में सब से आगे खड़ा है टूरिज्म. इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को जितनी माली चोट सहनी पड़ी है और अभी तक सह रहे हैं, उस की कोई सीमा नहीं है.

आप कल्पना कीजिए कि आप एक नौकरी करते हैं या फिर कोई भी काम करते हैं, जिस से आप का घर चलता है. उसी कमाई के भरोसे पर आप भविष्य की प्लानिंग करते हैं, घर और गाड़ी का लोन लेते हैं, बच्चों को स्कूल भेजते हैं, अपना बुढ़ापा महफूज करने की योजना बनाते हैं, लेकिन एक सुबह आप को पता चलता है कि आज से आप की कमाई जीरो है, क्योंकि आप का काम टूरिस्ट के आने पर निर्भर करता था और आज से नो फ्लाइट्स, नो टूरिस्ट, नो काम, नो पैसा, सब पर फुल स्टौप.

आप ऐसी हालत में क्या करेंगे? और यह हालत कोई 2-4 दिन या महीनों के लिए नहीं है, यह है सालों के लिए या फिर पता नहीं कब तक के लिए. शायद हमेशा के लिए. सोचिए, अगर आप के सुखसुविधा में पले बच्चे अचानक दूध को तरसने लगें, 1-1 खिलौने के लिए सालों इंतजार का लौलीपौप चूसते रहें, तो क्या करेंगे आप?

मैं ऐसे एक इनसान को बहुत करीब से जानती हूं. प्रखर नाम का यह इनसान मेरे परिवार का ही हिस्सा है. मातापिता की असमय मौत ने इसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया था.

दिनरात की अथक मेहनत से इस स्वाभिमानी लड़के ने हर मुसीबत का सामना किया. नवंबर, 2019 में उस ने एक छोटा सा घर खरीदा और उस के लिए बैंक से लोन लिया. 4 महीने बाद अपनी अभी तक की सारी जमापूंजी लगा कर बहन की शादी की.

वह बहुत खुश था कि उस की बचत बहन की शादी और घर की डाउन पेमेंट दोनों के लिए काफी थीं. उस की 2 सब से बड़ी जिम्मेदारियां सही समय पर पूरी हो गई थीं.

अपनी परफैक्ट प्लानिंग के भरोसे प्रखर काफी हद तक अपने भविष्य को ले कर निश्चिंत था. उस ने सोचा था कि अभी वह सिर्फ 37 साल का है. अगले 10 साल में वह बैंक का लोन उतार देगा. जब तक उस का 7 साल का बेटा यूनिवर्सिटी जाने लायक होगा, तब तक तो वह बाकी सभी देनदारियों से छुटकारा पा चुका होगा. फिर वह आराम से अपने एकलौते बेटे को अच्छी से अच्छी पढ़ाईलिखाई के लिए माली मदद की अपनी जिम्मेदारी को आसानी से निभा सकेगा.

टूरिज्म के क्षेत्र में फ्रीलांस गाइड के तौर पर काम करने वाला प्रखर तब कहां जानता था कि कुदरत कुछ और ही प्लान कर रही है. प्रखर की नन्ही सी प्लानिंग की भला उस के सामने क्या औकात? कुदरत की प्लानिंग के मुताबिक आया एक छोटा सा वायरस और सबकुछ खत्म. सारी मेहनत, सारी काबिलीयत घर की चारदीवारी में बंद हो कर रह गई.

कोरोना की दूसरी लहर में प्रखर का पूरा परिवार चपेट में आ गया था. बड़ी काटछांट कर के, घर और शादी से बचाई गई उस की बचत का आखिरी टुकड़ा भी इस इलाज की भेंट चढ़ गया.

डाक्टर की महंगी फीस और कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी गई दवाओं ने उस के बैंक अकाउंट की आखिरी बूंद तक निचोड़ ली.

फिर भी प्रखर ने सोचा कि चलो जान बची तो लाखों पाए. जान है तो जहान  है. ठीक भी है. लेकिन अब उसी जान को इस बेकारी और बेरोजगारी के कोरोना से कैसे बचाएंगे और कब तक बचा पाएंगे?

कोरोना की मेहरबानी से टूरिस्ट के आने के कोई भी आसार दूरदूर तक नजर नहीं आ रहे हैं. टूरिज्म से जुड़े लाखों लोग, जिन की रोजीरोटी इस क्षेत्र से जुड़ी है, वे बेचारे कहां जाएं? एयरलाइंस, ट्रैवल एजेंसी, टूर औपरेटर, होटल, फ्रीलांस गाइड और हौकर्स इन सभी की जीविका की नैया टूरिस्ट द्वारा खर्च किए गए पैसों की नदी पर ही चलती है. अब पता नहीं इस सूखी नदी में पानी आने की आस कब तक इन की सांसों की डोरी को बांध सकेगी?

टूरिस्ट आते थे, तो सब को काम मिलता था. एयरलाइंस और होटल्स पर जब टूरिस्ट के पैसे की बारिश हो चुकती थी, तो छोटीछोटी बौछारें ट्रैवल एजेंसी और हौकर्स यानी छोटे दुकानदारों तक भी पहुंच जाती थीं. इन बौछारों की नन्हीनन्ही बूंदों से लाखों घरों के चूल्हे जलते थे.

टूरिज्म के क्षेत्र से जुड़े सभी लोग टूरिस्ट सीजन का इंतजार बड़ी बेताबी से करते थे और उसी एक सीजन के भरोसे सारे सीजन काट लेते थे. लेकिन अब कैसा टूरिस्ट सीजन, अब तो बस एक ही सीजन बचा है, वह है कोरोना सीजन.

हौकर्स का असली धंधा अगर करोना खा गया तो बचीखुची कसर औनलाइन शौपिंग ने पूरी कर दी. आगे कुआं पीछे खाई, जाएं तो जाएं कहां?

अनिश्चितता तो पहले भी होती थी. अप्रैल से ले कर अगस्त तक का मौसम इन के लिए औफ सीजन होता था, लेकिन अगस्त से अप्रैल तक तो काम मिलेगा, इसी आस के भरोसे ये लोग औफ सीजन का टाइम काट लिया करते थे.

लेकिन अब तो जैसे सबकुछ निश्चित ही हो गया है. न कोरोना के वैरिएंट खत्म होंगे, न टूरिस्ट आएंगे. अब तो बेकारी का यह तोहफा जैसे हमेशा के लिए इन की जिंदगी से जुड़ गया है. अनिश्चित काल तक जीरो इनकम के साथ भला कोई कैसे निभा सकता है?

टूरिज्म पर आसन लगा कर बैठे इस कोरोना से कोई निबटे भी तो कैसे?    

ऐसी हालत में सरकार की तरफ से कोई मदद या सहारा तो दूर इन की इतनी बड़ी परेशानी को रजामंदी तक नहीं मिल रही है. ये बेचारे अपने लोन की ईएमआई कैसे चुकाते होंगे? अपने बच्चों की  स्कूलों की फीस कैसे देते होंगे, जिन स्कूलों में वे जा भी नहीं रहे हैं? बच्चों को तो औनलाइन खुद ही पढ़ना पड़ता है और मोटेमोटे चैक हर महीने स्कूल के नाम काटने पड़ते हैं, वरना स्कूल से नाम कट जाएगा.

क्या सरकार का अपनी इस जनता के प्रति कोई फर्ज नहीं बनता? जिस से टैक्स वसूलते समय एकएक पाई का हिसाब लिया जाता है, उस घर में चूल्हा जला या नहीं, इस का हिसाब कौन रखेगा?

जो नेता वोट मांगने के समय हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, वे बेकारी के समय कहां चले जाते हैं? कहां जाएं ये बेकारी के मारे? किस से लगाएं अपने लिए रोजगार मुहैया करवाने की गुहार?

कल तक ये लोग देश के लिए डौलर कमाते थे. इन की सर्विसेज विदेशियों को भारत दर्शन का रास्ता दिखाने में अहम भूमिका अदा करती थीं. आज वह समय एक सपना भर रह गया है. जाने कब आएगा वह सावन और कब जाएगा यह रावण?

शख्सियत: आयशा मलिक- पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट को पहली बार कोई महिला जस्टिस मिली है. पाकिस्तान के ज्यूडिशियल कमीशन ने 6 जनवरी, 2022 को 55 साल की जस्टिस आयशा अहेद मलिक के नाम को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के तौर पर मंजूरी दी है.

चीफ जस्टिस गुलजार अहमद की अध्यक्षता वाले पाकिस्तानी न्यायिक आयोग ने आयशा मलिक की बहाली को बहुमत (5 के मुकाबले 4 वोट) के आधार पर मंजूरी दी है. अब उन के नाम पर संसदीय समिति विचार करेगी, जो माना जाता है कि बमुश्किल ही जेसीपी (ज्यूडिशियल कमीशन औफ पाकिस्तान) के खिलाफ जाती है.

हालांकि पिछले साल 9 सितंबर, 2021 को भी जेसीपी ने आयशा मलिक के नाम पर विचार किया था, पर उस दौरान वोट बराबर होने के चलते उन का नाम रिजैक्ट हो गया था, पर इस बार पकिस्तान की न्यायपालिका में आयशा मलिक की बहाली इतिहास बनाने जा रही है.

क्यों जरूरी हैं आयशा मलिक

पाकिस्तान जैसे रूढि़वादी देश के लिए यह किसी बड़ी बात से कम नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में किसी महिला जस्टिस की बहाली को मंजूरी मिली है. पाकिस्तान वैसे भी दक्षिण एशिया का एकलौता ऐसा देश है, जिस ने कभी किसी महिला को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस बहाल नहीं किया है.

पाकिस्तान की मानवाधिकार कमीशन रिपोर्ट 2016 के मुताबिक, पाकिस्तान के हाईकोर्ट के जस्टिसों में केवल 5.3 फीसदी ही महिलाएं हैं, जो महिला नुमाइंदगी के तौर पर तादाद में बेहद कम हैं.

हालांकि वहां का संविधान भारत के संविधान के तर्ज पर यह हक तो देता है कि ‘सभी नागरिक कानून के आगे समान हैं और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा’, पर पाकिस्तान में इसलामिक कट्टरपन के चलते महिलाओं की नुमाइंदगी हमेशा से दरकिनार की जाती रही है. ऐसे में यह कदम पाकिस्तान में मर्दऔरत की बराबरी के नजरिए से जरूरी है.

इस से माना जा रहा है कि पाकिस्तान जैसे देश में सब से बड़ी अदालत में महिला जस्टिस के होने से वहां की महिलाओं को बल मिलेगा और उन से जुड़े बड़े मसलों पर प्रगतिशील बदलाव होंगे. ऐसे में पाकिस्तानी महिलाएं आयशा मलिक से खासा उम्मीदें बांध सकती हैं.

कौन हैं आयशा मलिक

आयशा मलिक का जन्म 3 जून, 1966 को हुआ था. उन की शादी हुमायूं एहसान से हुई है, जिन से उन के 3 बच्चे हैं.

जस्टिस आयशा मलिक ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पैरिस और न्यूयौर्क के स्कूलों से हासिल की है. इस के बाद उन्होंने लाहौर में पाकिस्तान कालेज औफ ला से कानून की पढ़ाई की और लंदन के हौर्वर्ड ला स्कूल व मैसाचुसैट्स से मास्टर डिगरी हासिल की.

आयशा मलिक इस से पहले पाकिस्तान के चीफ इलैक्शन कमिश्नर रह चुके और मशहूर जस्टिस (रिटायर्ड) फखरुद्दीन इब्राहिम की सहयोगी थीं और साल 1997 से साल 2001 के बीच यानी 4 साल तक उन के साथ असिस्टैंट के तौर पर काम कर चुकी थीं.

आयशा मलिक साल 2012 में लाहौर हाईकोर्ट में जस्टिस के तौर पर बहाल हुई थीं. इस से पहले वे एक कौर्पोरेट और कमर्शियल ला फर्म में पार्टनर थीं.

हालांकि आयशा मलिक को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के तौर पर चुने जाने को ले कर पाकिस्तान में वकील संघों ने सीनियर वाले मुद्दे को ले कर अपना विरोध दर्ज किया है, पर अगर आयशा मलिक की सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर बहाली नहीं भी होती, तो भी इस बात की पूरी उम्मीद थी कि वे साल 2026 में लाहौर हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस होतीं, जो खुद में पाकिस्तान के लिए एक ऐतिहासिक बात होती.

आयशा का शानदार कैरियर

जस्टिस आयशा मलिक ने साल 1997 में अपना कानूनी कैरियर शुरू किया था और साल 2001 तक कराची में कानूनी फर्म में फखरुद्दीन इब्राहिम के साथ काम किया था. वे साल 2012 में लाहौर हाईकोर्ट में जस्टिस बन गई थीं.

बाद में वे साल 2019 में लाहौर में महिला जस्टिसों की हिफाजत के लिए बनाई गई समिति की अध्यक्ष बनी थीं. उसी साल जिला अदालतों में वकीलों ने महिला जस्टिसों के प्रति हिंसक बरताव के खिलाफ एक पैनल बनाया था. इतना ही नहीं, वे द इंटरनैशनल एसोसिएशन औफ विमन जज का हिस्सा भी रही हैं, जो एक गैरसरकारी संगठन है. वहां उन्होंने महिलाओं को समानता और इंसाफ दिलाते हुए उन्हें मजबूत बनाने की पहल की थी.

आयशा मलिक अपने अनुशासन के लिए भी जानी जाती हैं. उन्होंने कई प्रमुख संवैधानिक मुद्दों पर अहम फैसले लिए हैं, जिन में चुनावों में संपत्ति की घोषणा, गन्ना उत्पादकों को भुगतान और पाकिस्तान में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता को लागू करना शामिल है.

कुछ खास फैसले

आयशा मलिक ने पिछले साल जनवरी महीने में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. उन्होंने घोषणा की थी कि यौन हमले की सर्वाइवर पर टू फिंगर और हाइमन टैस्ट गैरकानूनी है और इसे पाकिस्तान के संविधान के खिलाफ माना जाएगा.

टू फिंगर और हाइमन टैस्ट पर अपने फैसले में उन्होंने कहा था, ‘‘यह एक अपमानजनक प्रथा है, जो सर्वाइवर पर ही संदेह डालती है और आरोपी व यौन हिंसा की घटना पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जाता है.’’

साल 2016 में उन्होंने पहली बार पंजाब महिला न्यायाधीश सम्मेलन 2016 की शुरुआत की थी और तब से वे इस तरह के 3 सम्मेलनों की अगुआई कर चुकी हैं.

पाकिस्तान में साल 2022 में आयशा मलिक का सुप्रीम कोर्ट में बतौर पहली महिला जस्टिस चुना जाना स्वागत की बात तो है, पर चिंता वाली बात यह भी है कि वहां महिलाओं को अपनी पहली  मौजूदगी दर्ज कराने में आखिर इतने साल कैसे लग गए?

क्रिकेट :  विराट कोहली धुरंधर खिलाड़ी का मास्टरस्ट्रोक

सुनील शर्मा

विराट कोहली ने टैस्ट क्रिकेट टीम की कप्तानी अचानक छोड़ दी है. दक्षिण अफ्रीका से 3 टैस्ट मैचों की सीरीज 2-1 से हारने के बाद उन्होंने 15 जनवरी, 2022 को यह कदम उठाया है.

बता दें कि विराट कोहली का पिछले दिनों वनडे की कप्तानी छीने जाने को ले कर भी बीसीसीआई से विवाद हुआ था. इस के बाद उन्होंने पत्रकारों के सामने सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा था और बीसीसीआई को कठघरे में खड़ा किया था.

अब टैस्ट कप्तानी छोड़ते हुए विराट कोहली ने जो चिट्ठी लिखी है, उस में भी काफी नपेतुले शब्दों में उन्होंने बहुत कम लोगों का जिक्र करते हुए अपनी बात रखी है. कभी के जु झारू खिलाड़ी और कोच रह चुके अनिल कुंबले के साथसाथ किसी और साथी खिलाड़ी को ज्यादा भाव नहीं दिया गया है. हां, रवि शास्त्री और महेंद्र सिंह धौनी का खासतौर पर शुक्रिया अदा किया गया है.

इस में कोई दोराय नहीं है कि विराट कोहली एक आक्रामक बल्लेबाज और जु झारू खिलाड़ी हैं, जिन का गुस्सा उन के बल्ले और जबान से मैदान पर बखूबी दिखता है, पर यह भी एक कड़वा सच है कि बतौर बल्लेबाज वे पिछले तकरीबन 2 साल से जू झ रहे हैं. नवंबर, 2019 से अब टैस्ट कप्तानी छोड़ने तक उन्होंने इंटरनैशनल क्रिकेट में एक भी सैकड़ा नहीं बनाया है.

इस के बावजूद विराट कोहली के अब तक के खेल आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 99 टैस्ट मैचों में उन्होंने 50.4 की औसत से 7,962 रन बनाए हैं. 254 वनडे मैचों में 59.1 की औसत से 12,169 रन बटोरे हैं, जबकि 95 ट्वैंटी20 मैचों में 52.0 की औसत से 3,227 रन अपने नाम किए हैं.

विराट कोहली ने 68 टैस्ट मुकाबलों में भारतीय टीम की कप्तानी की है. इन में से 40 मुकाबलों में टीम को जीत मिली, 17 मुकाबलों में हार मिली और 11 मैच बेनतीजा रहे. कुलमिला कर टीम का जीत फीसदी 58.82 रहा.

विराट कोहली ने 68 टैस्ट मैचों की 113 पारियों में 54.80 की औसत से 5,864 रन बनाए हैं. उन्होंने बतौर कप्तान 20 सैंचुरी जड़ी हैं और 18 हाफ सैंचुरी लगाई हैं.

भले ही टीम इंडिया विराट कोहली की कप्तानी में पहला वर्ल्ड टैस्ट चैंपियनशिप का खिताब जीतने से चूक गई, लेकिन फिर भी टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई सीरीज जीतीं. उन की कप्तानी में भारत ने सब से ज्यादा टैस्ट मुकाबले जीते हैं.

अब सवाल उठता है कि विराट कोहली टीम के लिए बतौर बल्लेबाज जरूरी हैं या कप्तान? आज की तारीख में वे एकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जो सचिन तेंदुलकर के बनाए गए रिकौर्डों की बराबरी करने का माद्दा रखते हैं और फिलहाल चाहे वे अपनी फौर्म से जू झ रहे हैं, पर उन की तकनीक और आक्रामकता आज भी वही है.

विराट कोहली बल्लेबाजी में जितने चाकचौबंद हैं उतने ही चपल फील्डर भी हैं. फिटनैस में कोई उन का सानी नहीं है और मैदान पर वे एक चीते की तरह चौकस दिखाई देते हैं.

एक समय था, जब सचिन तेंदुलकर कप्तानी में सिरे से फेल हो गए थे और वे उस का दबाव  झेलने की हालत में नहीं थे, इसलिए उन्होंने कप्तानी छोड़ते हुए अपनी बल्लेबाजी पर नए जोश के साथ फोकस किया था.

विराट कोहली अभी 33 साल के हैं और उन में कई साल का खेल बचा है. वे सचिन तेंदुलकर को देख कर क्रिकेट की दुनिया में आए हैं, लिहाजा, उन्हें ‘लिटिल मास्टर’ को ही आदर्श मान कर अब कप्तानी के बजाय अपनी बल्लेबाजी पर फोकस करना चाहिए, ताकि वह उन का ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित हो सके.

अंधविश्वास: वैष्णो देवी मंदिर हादसा- भय, भगदड़ और भेड़चाल

सुनील शर्मा

किसी भी जगह पर भगदड़ मचने की सब से बड़ी वजह तो बेकाबू भीड़ ही मानी जाती है, पर अगर गौर से देखा जाए तो ज्यादातर जगहों पर भीड़ पर काबू पाने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होता है.

अगर धार्मिक जगहों की बात करें, तो वहां कुछ खास दिनों और मौकों पर जरूरत से ज्यादा लोग जमा हो कर खुद को ही परेशानी में डाल देते हैं. कोई बड़ा हादसा न भी हो, पर छोटीछोटी मुसीबतें सब को परेशान जरूर कर देती हैं. ऊपर से वहां आपदा प्रबंधन प्राधिकरण या पुलिस प्रशासन के बताए गए नियमों का पालन भी नहीं किया जाता है.

आमतौर पर भगदड़ मचने की 4 वजहें खास होती हैं, जैसे भीड़ की प्रतिबंधित इलाके में घुसने की कोशिश, दम घुटना या फिर धक्कामुक्की, किसी आपदा के चलते डर के हालात बन जाना और अफवाह की वजह से लोगों का डर के मारे भागना.

साल 2022 की शुरुआत कुछ लोगों का अंत साबित हुई. जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर में नए साल के जश्न में शामिल लोगों की भारी भीड़ उन्हीं में से 12 लोगों के लिए जानलेवा बन गई.

इस हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि नए साल के मौके पर वैष्णो देवी के दर्शन करने के लिए बड़ी तादाद में लोग पहुंचे थे. भवन के पास लोगों का इतना ज्यादा जमावड़ा था कि किसी तरह की अनहोनी पर वहां से निकलने तक का कोई रास्ता नहीं था. अचानक किसी तरह की हड़बड़ी में लोग इधरउधर भागने लगे, जिस की वजह से भगदड़ मच गई और यह कांड हो गया.

इस अफरातफरी से 12 लोगों की जान चली गई और कई घायल भी हुए. इस कांड में सब से ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि मरने वालों में ज्यादातर की उम्र 21 से 38 साल के बीच थी. मतलब वे सब नौजवान थे. केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी कहा था कि पहले लोग त्योहारों के दौरान मंदिर जाते थे, पर आजकल युवा न्यू ईयर के दिन मंदिर जाना चाहते हैं.

वैष्णो देवी मंदिर पर उमड़ी भीड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां लोग नए साल पर माता के दर्शन करने के लिए एक दिन पहले ही जा पहुंचे थे.

चश्मदीदों की मानें, तो गर्भगृह के बाहर गेट नंबर 3 पर नौजवानों के 2 गुटों में आपसी कहासुनी के बाद झगड़ा हुआ और फिर झगड़े के बाद लोगों में भगदड़ मच गई. नतीजतन, जो लोग थक कर वहीं जमीन पर सोए हुए थे, उन्हें भीड़ ने कुचल दिया.

अब यह हादसा हो चुका है. मृतकों और घायलों को मुआवजा देने का ऐलान भी कर दिया गया है. बड़े लोगों ने पीडि़त परिवारों के लिए हमदर्दी जता दी है, वैष्णो देवी की यात्रा दोबारा शुरू हो चुकी है, पर लाख टके का सवाल यह कि वैष्णो देवी मंदिर में किस ने लोगों की जान ली?

इस सवाल का एक ही जवाब है कि लोग यह मान लेते हैं कि जो भी दुनिया में हो रहा है, वह उन के पसंदीदा देवीदेवता की मरजी से हो रहा है. जब किसी का सोचा हुआ पूरा हो जाता है, तो वह यह मान लेता है कि ईश्वर ने उस की सुन ली है. लिहाजा, अब ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करना तो बनता है.

इस बात को हम इस हादसे में मारे गए 24 साल के सोनू पांडे के पिता के कथन से समझ सकते हैं. उन्होंने बताया कि 2 महीने पहले सोनू की उंगली में चोट लग गई थी. तब उस ने मन्नत मांगी थी कि उंगली ठीक होने पर वह माता वैष्णो देवी के दर्शन करने जाएगा.

यहां सवाल यह उठता है कि क्या सोनू पांडे की उंगली अपनेआप किसी चमत्कार से ठीक हो गई थी? चूंकि उंगली में ज्यादा ही चोट लगी होगी, तभी तो सोनू ने ऐसी मन्नत मांगी थी. पर वह चोट किसी डाक्टर के इलाज से सही हुई होगी, क्या सोनू के मन में कभी यह खयाल आया कि डाक्टर को जा कर उस का शुक्रिया अदा कर देना चाहिए?

दुनिया में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो पड़ोस में रहने वाले डाक्टर को ठीक होने पर उस का क्रेडिट देने जाते हैं, जबकि इस में उन का कुछ भी खर्च नहीं होता है. पर ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए वे ही लोग अपना समय और अपना पैसा खर्च कर के हजारों किलोमीटर दूर जाने में कतई नहीं हिचकिचाते हैं.

सब से ज्यादा दुख की बात तो यह है कि यह जो ‘मन्नत’ शब्द है, बड़ा ही खौफनाक होता है. समाज ऐसी मन्नतों पर बड़ी टेढ़ी नजर रखता है. मान लो, अगर सोनू पांडे अपनी मन्नत पर ध्यान नहीं देता और उंगली ठीक होने के बाद वैष्णो देवी मंदिर नहीं जाता तो उस के आसपास के लोग ही उसे जीने नहीं देते और ईश्वर के प्रकोप का डर उस के मन में बिठा देते कि तू ने अपनी कही बात पूरी नहीं की, इसलिए माता रानी तुझ पर कोई विपदा ले आएंगी.

सोनू ही क्या भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो एक मन्नत की खातिर सालोंसाल खास दिन पर धार्मिक जगहों पर जाते ही रहते हैं, फिर चाहे दुनिया इधर की उधर ही क्यों न हो जाए. उन के मन में यह डर बैठ चुका होता है कि अगर यह चेन टूट गई तो 7 अरब की इस दुनिया की सारी मुसीबतें उसी पर कहर बन कर टूट जाएंगी. यही चेन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती रहती है.

पिछले 7-8 साल में भारत में धर्म के उन्माद का जिस तरह से प्रचारप्रसार हुआ है, उस की गिरफ्त में नौजवान पीढ़ी ही सब से ज्यादा आई है. सब के दिमाग में यह बात घुसा दी गई है कि सनातन धर्म ही तरक्की का एकमात्र रास्ता है. धार्मिक जगहों को सरकारी खर्च पर पर्यटन स्थलों में बदला जा रहा है. संसद हो या सड़क, हर जगह धार्मिक नारों का चलन बढ़ गया है. सत्ता पक्ष ही क्या विपक्ष भी खुद को धर्म का असली ठेकेदार बनाने और कहलाने पर तुला है.

जब ऐसी धार्मिक चाल में नौजवान पीढ़ी फंसती है, तो देश का भविष्य ही अंधकार की तरफ जाता दिखता है. इसी नौजवान पीढ़ी से एक और सवाल है कि वह किसी धार्मिक जगह पर जा कर आपा ही क्यों खोती है? वैष्णो देवी मंदिर में माता के दर्शन करने से कुछ देर पहले ही 2 गुटों में लड़ाई ही क्यों हुई? क्या माता ने उन्हें इतनी भी सहनशक्ति नहीं दी कि सब्र करो, सब का नंबर बारीबारी से आ जाएगा?

अगर उन 2 गुटों में कहासुनी नहीं होती, तो यह कांड ही नहीं होता. पर हमारे यहां तो हर जगह शौर्टकट मारने का मानो चलन सा बन गया है. मंदिर में भी बैकडोर ऐंट्री मिल जाए, तो क्या हर्ज है. यही वजह है कि देश के हर बड़े मंदिर में परची कटा कर या किसी दूसरे जुगाड़ से जल्दी दर्शन करने की सहूलियत दी गई है.

जनता की इस तरह की चालबाजियों से धर्म के ठेकेदारों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि उन्हें तो मंदिर में आई भीड़ से मतलब होता है, तभी तो इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी वैष्णो देवी मंदिर पर लोगों के हुजूम का आना जारी रहा और आगे भी जारी रहेगा.

धार्मिक जगहों पर  मची भगदड़ का इतिहास : चंद उदाहरण 

14 जुलाई, 2015 को आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर मची भगदड़ में कम से कम 29 लोगों की मौत हो गई थी. वे लोग वहां पवित्र स्नान करने गए थे.

* 25 अगस्त, 2014 को मध्य प्रदेश के सतना जिले में चित्रकूट के कामतनाथ मंदिर में भगदड़ मच गई थी. इस में  11 लोगों की मौत हो गई थी और तकरीबन 60 लोग घायल हुए थे. वहां किसी ने करंट फैलने की अफवाह उड़ा दी थी.

* 25 सितंबर, 2012 को झारखंड के देवघर में ठाकुर अनुकूल चंद की 125वीं जयंती पर एक आश्रम में हजारों की भीड़ जमा हो जाने और सभागार में भारी भीड़ के चलते दम घुटने से 12 लोगों की मौत हो गई थी.

* 8 नवंबर, 2011 को उत्तर प्रदेश के हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर हजारों लोगों के जमा हो जाने के दौरान मची भगदड़ में 16 लोगों की जान चली गई थी.

* 14 जनवरी, 2011 को केरल के इदुक्की में शबरीमाला के नजदीक पुलमेदु में मची भगदड़ में 102 लोग मारे गए थे.

* 4 मार्च, 2010 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में कृपालुजी महाराज आश्रम में प्रसाद बांटने के दौरान मची भगदड़ में 63 लोग मारे गए थे.

* 30 सितंबर, 2008 को राजस्थान के जोधपुर में चामुंडा देवी मंदिर में बम धमाके की अफवाह से मची भगदड़ में 250 लोगों की मौत हो गई थी.

* 3 अगस्त, 2008 को हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश के चलते नैना देवी मंदिर की एक दीवार ढह गई थी. इस हादसे में 160 लोगों की मौत हो गई थी.

* 26 जून, 2005 को महाराष्ट्र के मंधार देवी मंदिर में मची भगदड़ में 350 लोगों की मौत हो गई थी.

सावधानी: चाइनीज मांझे से कटती जिंदगी की डोर

 देवेंद्रराज सुथार  

चाइनीज मांझे से  कटती जिंदगी  की डोर  पूरे देश में चाइनीज मांझे पर बैन है, लेकिन आज भी चाइनीज मांझे की खुलेआम बिक्री हो रही है, जिस के चलते आएदिन हादसे हो रहे हैं.  एक मामला दिल्ली के शाहदरा इलाके से सामने आया है, जहां के 46 साल के विजय शर्मा खेड़ा गांव में रहते हैं. वे नंद नगरी की तरफ जा रहे थे. 212 बसस्टैंड के पास चाइनीज मांझा उन के स्कूटर  चला रहे दोस्त के आगे आया, तो उन्होंने हाथ से पीछे की तरफ कर दिया.  वह मांझा विजय के चेहरे को काटता चला गया. इस से उन की भौंहें, पलकें और नाक बुरी तरह से जख्मी हो गईं.   जीटीबी अस्पताल और दयानंद अस्पताल के डाक्टरों ने पलक पर टांके लगाने में दिक्कत बताई, तो प्राइवेट नर्सिंगहोम में इलाज करवाया. उन के चेहरे पर 23 टांके आए.

34 साल के राधेश्याम दिल्ली के जगतपुरी ऐक्सटैंशन में रहते हैं. 5 जून, 2021 की शाम दुर्गापुरी से आते समय नत्थू कालोनी फ्लाईओवर पर पहुंचे. अचानक ही उन के आगे चाइनीज मांझा आ गया, जिस से उन की गरदन पर  कट लग गया. उन्होंने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और खुद को मांझे से अलग किया. उन के गले का घाव पूरी तरह से भरा नहीं है.

33 साल की गीतांजलि आईएसबीटी की तरफ से स्कूटर पर अपने मायके दिलशाद गार्डन जा रही थीं. वे मार्शल आर्ट की इंटरनैशनल खिलाड़ी हैं और कोचिंग भी करती हैं. जब वे वैलकम फ्लाईओवर से नीचे उतर रही थीं, तो अचानक मांझा उन के आगे आ गया.  उन्होंने तुरंत स्कूटर में ब्रेक लगाए और गरदन को साइड करने की कोशिश की, इसलिए उन की गरदन को साइड की तरफ से मांझा चीरता चला गया. वे 10 दिन तक घर से बाहर नहीं निकल सकीं.

38 साल के वहीद दिल्ली के ब्रह्मपुरी इलाके की गली नंबर 21 में रहते हैं. शास्त्री पार्क फ्लाईओवर पर उन के गले में मांझा उलझ गया. गले में कट लगने से जलन होने लगी, तो उन्होंने हाथ से हटाने की कोशिश की.  मांझे से उन की उंगली भी कट गई. जख्मी हालत में उन्हें जगप्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया, जहां उन की उंगली में 3 टांके आए. चांदनी चौक का चैरिटी बर्ड्स अस्पताल दिल्ली का एकलौता ऐसा अस्पताल है, जहां हर नस्ल के पक्षी  का मुफ्त इलाज किया जाता है. इस अस्पताल में रोजाना तकरीबन 70 से  80 पक्षियों को इलाज के लिए लाया जाता है. दिल्ली के खुले आसमान में उड़ रहे इन परिंदों पर चाइनीज मांझा  कहर बन कर टूट जाता है.  पिछले साल 13, 14 और 15 अगस्त के इन 3 दिनों में चाइनीज मांझे की चपेट में आने से तकरीबन 550 पक्षी घायल हो गए, जिन्हें इस अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया था.  सब से चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि इन 3 दिनों में तकरीबन 200 पक्षियों की चाइनीज मांझे की चपेट में आने से मौत हो गई, जिन में तोता, मैना, कबूतर, चील और दूसरे पक्षी शामिल हैं.  ज्यादातर मामलों में इन बेजबान पक्षियों की गरदन और पंख मांझे की चपेट में आए. सैकड़ों ऐसे पक्षी भी हैं, जो अब कभी खुले आसमान में उड़ नहीं पाएंगे. प्लास्टिक की डोर में पक्षियों के पंख उलझ जाते हैं और वे इस डोर को काट नहीं पाते, जिस के चलते उन की जान चली जाती है.

नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जुलाई, 2017 में खतरनाक चीनी मांझे की बिक्री पर पूरे देश में बैन लगा दिया था. पीपल्स फोर एथिकल ट्रीटमैंट औफ एनिमल यानी ‘पीटा’ की अर्जी पर यह आदेश आया था. इस में कहा गया था कि पतंग उड़ाना देश की परंपरा रही है, लेकिन खतरनाक चीनी मांझे से पशुपक्षी और लोग बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं. मांझा बनाने वाली कंपनियां सुप्रीम कोर्ट गईं, जिन्हें वहां से राहत नहीं मिली. चाइनीज मांझा, जिसे कुछ लोग ‘प्लास्टिक मांझा’ भी कहते हैं, में कुल  5 तरह के कैमिकल और दूसरी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है. इन में सीसा, वजरम नामक औद्योगिक गोंद, मैदा फ्लौर, एल्युमीनियम औक्साइड और जिरकोनिया औक्साइड का इस्तेमाल होता है. इन सभी चीजों को मिला कर कांच के महीन टुकड़ों से रगड़ कर तेज धार वाला चाइनीज मांझा तैयार किया जाता है. सामान्य मांझे की अपेक्षा चाइनीज मांझा सस्ता होने से इस की बिक्री तेजी से होती है. यह मजबूत तो होता ही है, इस में धार भी काफी होती है. इस की डिमांड ज्यादा होती है.

चीनी मांझे की 6 रील की एक चरखी (एक रील में तकरीबन 1,000 मीटर होता है) 500 रुपए की आती है. देशी मांझे की 6 रील की चरखी 1,500 रुपए तक की आती है.  चाइनीज मांझे पर दुकानदारों का मार्जिन ज्यादा है, इसलिए वे इसे चोरीछिपे बेच रहे हैं. जरूरत है कि प्रशासन चाइनीज मांझे की हो रही गैरकानूनी बिक्री को ले कर अपनी कार्यवाही तेज करे. ऐसे दुकानदारों पर तुरंत शिकंजा कसे, जो नियमों की सीमा लांघ कर गैरकानूनी तौर पर चाइनीज मांझे का कारोबार  करते हैं.  पतंगबाजी सामूहिक रूप से किसी खुले मैदान में एक निश्चित समय  सीमा में हो, ताकि इन पक्षियों की हंसतीखिलखिलाती दुनिया सलामत रह सके और इनसान जख्मी होने व अपनी जान से हाथ धोने से बच सकें.

 गैंगमैन की  सिक्योरिटी तय हो

 अली खान

एक रिपोर्ट से यह बात उभर कर सामने आई है कि भीषण सर्दीगरमी, बारिश और कुहरे में रेल मुसाफिरों को महफूज घर पहुंचाने में हर साल औसतन 100 गैंगमैन ट्रेन की पटरियों पर कट कर मर जाते हैं.

आज देश और दुनिया में आधुनिक तकनीकी युग में तकरीबन सभी काम मशीनों से किए जा रहे हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक के बावजूद गैंगमैन ट्रेन सिक्योरिटी की रीढ़ माने जाते हैं.

मौजूदा समय में मशीनों के इस्तेमाल ने काम को आसान जरूर किया है, पर ट्रैक पर काम करने के लिए गरमी, बरसात और ठंड हर मौसम का सामना अभी भी गैंगमैन ही करता है.

जब भी रेलवे की उपलब्धि की बात होती है, तो इन के काम के योगदान की कोई बात नहीं करता है, जबकि रेल को आगे बढ़ाने में ट्रैकमैन व गैंगमैन का अहम रोल होता है. आज भी शीतलहर व हाड़ कंपकंपाती ठंड में खुले आसमान के नीचे जंगल व सुनसान जगहों में रह कर हमारे सफर को सुखद बनाने का कोई काम करता है, तो वे हैं रेलवे ट्रैकमैन व गैंगमैन.

रेलवे में इन का पद भले ही छोटा है, तनख्वाह भी काफी कम है, लेकिन ये लोग जिम्मेदारी काफी बड़ी निभाते हैं. हम ट्रेनों में चैन की नींद लेते हैं, लेकिन ये खुले आसमान के नीचे रेल पटरियों की निगरानी करते हैं. इन की जिंदगी जितनी मुश्किल होती है, उतनी ही जोखिम भरी भी.

पिछले कुछ सालों के आंकड़े बताते हैं कि गैंगमैन हर दिन हादसों के शिकार हो रहे हैं. लिहाजा, गैंगमैन की सिक्योरिटी तय किए जाने की जरूरत है.

यह बेहद दुख की बात है कि भले ही गैंगमैन की जान बचाने के लिए साल 2016 में संसद में उन को सिक्योरिटी के उपकरण देने का ऐलान किया था, लेकिन रेलवे के पास पैसा नहीं होने के चलते 5 साल में 20 फीसदी गैंगमैन को ही ऐसे सिक्योरिटी के उपकरण दिए जा सके हैं. लिहाजा, सिक्योरिटी की कमी में गैंगमैन हादसों के शिकार हो रहे हैं.

रेल मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2021 तक रेल पटरियों की मरम्मत और निगरानी काम के दौरान 451 गैंगमैन ट्रेन से कट कर मारे गए यानी ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन में हर साल औसतन 100 गैंगमैन पटरियों पर दम तोड़ रहे हैं. हालांकि, रेल यूनियन का दावा है कि हर साल औसतन 250 से 300 गैंगमैन हादसों के शिकार होते हैं.

अब सवाल है कि गैंगमैन आखिर हादसों के शिकार क्यों हो जाते हैं? बता दें कि रेलवे की सभी ट्रैक लाइनों (प्रमुख रेल मार्ग) पर क्षमता से ज्यादा 120 से 200 फीसदी सवारी ट्रेन चलाई जाती हैं. लिहाजा, गैंगमैन को पटरी की मरम्मत और रखरखाव के लिए ब्लौक नहीं मिलते हैं. ज्यादातर हादसे डबल लाइन या ट्रिपल लाइन सैक्शन पर होते हैं.

ट्रेन नजदीक आने पर जब वे दूसरी पटरी पर जाते हैं, तभी उस पर भी ट्रेन के आने से गैंगमैन कट कर मर जाते हैं. इस के अलावा काम के दबाव में ट्रेन की आवाज सुनाई नहीं देती है.

देश में कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के हरदोई में रेलवे की लापरवाही से 4 गैंगमैनों की मौत हो गई थी. वे गैंगमैन संडीला और उमरताली के बीच रेलवे ट्रैक पर काम कर रहे थे. उन्हें न तो ट्रेन के आने की कोई सूचना दी गई और न ही संकेत. तेज रफ्तार से आ रही ट्रेन गैंगमैनों के ऊपर से गुजर गई.

वे गैंगमैन रेलवे ट्रैक पर बेधड़क हो कर काम कर रहे थे. उन के काम करने की जगह से कुछ दूरी पर उन्होंने लाल रंग का कपड़ा भी बांध रखा था. तभी वहां अचानक कोलकाता से अमृतसर जा रही ‘अकालतख्त ऐक्सप्रैस’ ट्रेन आ गई और उन सभी गैंगमैनों को रौंदते हुए तेज रफ्तार से निकल गई थी. ऐसे हादसे देश में आएदिन होते रहते हैं.

ऐसे में सवाल मौजूं है कि आखिर गैंगमैन की सिक्योरिटी कैसे तय हो? गैंगमैन को बचाने के लिए हैलमैट, सुरक्षा जूते, सैल टौर्च, बैकपैक टूल जैसे खास उपकरण मुहैया कराए जाने की जरूरत है.

याद रहे कि रेल मंत्री रह चुके सुरेश प्रभु ने साल 2016-17 के रेल बजट भाषण में गैंगमैन को ‘रक्षक’ नामक मौडर्न डिवाइस देने का ऐलान किया था. कमर में पहनने वाली यह डिवाइस गैंगमैन को 400 मीटर से 500 मीटर की दूरी पर ट्रेन के आने पर ‘बीप’ के साथ अलर्ट कर देगी. कुहरे, बारिश व सर्दी के खराब मौसम में ट्रेन नहीं दिखाई पड़ने

पर यह डिवाइस गैंगमैन की जिंदगी बचाएगी.

हालांकि, इस डिवाइस को अभी तक गैंगमैन को मुहैया नहीं करवाया जा सका है. जानकारों का यह भी कहना है कि एक डिवाइस की कीमत तकरीबन 80,000 रुपए है.

सभी गैंगमैन को डिवाइस देने में रेलवे के तकरीबन 240 करोड़ रुपए खर्च होंगे. पैसे की कमी के चलते रेलवे को यह डिवाइस खरीदने में काफी समय लग सकता है.

गौरतलब है कि इस समय भारतीय रेलवे में तकरीबन 3 लाख गैंगमैन काम कर रहे हैं. इतनी बड़ी तादाद में काम कर रहे मुलाजिमों की सिक्योरिटी तय करना रेलवे की जिम्मेदारी है. इस दिशा में तत्काल कदम उठाए जाने की सख्त जरूरत है.

70 की उम्र में भरी सूनी गोद

विज्ञान और तकनीक के जमाने में बांझ औरत की कोख से बच्चे का पैदा होना कोई अजूबा नहीं रहा. लेकिन 70 साल की औरत द्वारा बच्चे को जन्म देना विज्ञान जगत के लिए भी किसी अचंभे से कम नहीं होगा.

जीवुबेन ने पड़ोस में रहने वाली मीराबेन को कराहते हुए आवाज लगाई. उन की आवाज सुनते ही

मीराबेन भागती हुई उन के पास आ कर बोली, ‘‘हां दादी, कोई बात है… कुछ चाहिए क्या?’’

‘‘अरे हां, बहुत दर्द हो रहा बेटा, दर्द वाली दवाई दे दो, वहां ताखे पर रखी होगी,’’ बिछावन पर लेटी जीवुबेन  बोली.

‘‘लेकिन दादी, आप को दर्द की ज्यादा दवा लेने से डाक्टर ने मना किया है. थोड़ा बरदाश्त कर लिया करो… देखो तो तुम्हारा बेटा भी मेरी बात सुन रहा है… कैसा मुसकरा रहा है…’’ मीरा समझाती हुई बोली.

‘‘अभी तक मैं तुम्हारी ही तो बात मानती आई हूं और आगे भी मान… ना… ओह! आह!!’’ जीवुबेन बोलतेबोलते कराह उठी.

‘‘ये दर्द उस दर्द के सामने कुछ भी नहीं है दादी, जो तुम 40 से अधिक सालों से बरदाश्त किए हुए थीं,’’ मीरा बोली.

‘‘तुम तो मेरी भी अम्मादादी बन रही हो. वैसे कह सही रही हो… बेऔलाद होने का दर्द कहीं अधिक बड़ा और तकलीफ देने वाला था. मगर क्या करूं, बरदाश्त नहीं हो रहा है…’’ कहती हुई जीवु करवट बदलने की कोशिश करने लगीं.

ये भी पढ़ें- सफलता के लिए तपना तो पड़ेगा

मीरा ने उन्हें सहारा दे कर उन का मुंह बगल में लेटे बच्चे की ओर कर दिया.

‘‘लो, अब बेटे को देखती रहो. सारा दर्द छूमंतर हो जाएगा.’’ कहती हुई मीरा भी सिरहाने बैठ बगल में लेटे नवजात शिशु को पुचकारने लगी.

2 दिन पहले ही जीवुबेन का सीजेरियन औपरेशन हुआ था. घर में 45 साल बाद किलकारी गूंजी थी. उन का औपरेशन परिवार के सभी सदस्यों से ले कर डाक्टर तक के लिए खास था, कारण उन की उम्र 70 साल की थी.

इस औपरेशन की सफलता से सभी खुश थे. जच्चाबच्चा दोनों सुरक्षित और स्वस्थ थे. केवल औपरेशन के जख्म हरे होने के कारण जीवुबेन को थोड़ी तकलीफ थी. सब के लिए किसी अचंभे से कम नहीं था उन का औपेरशन.

डाक्टर ने बताया था कि अधिक उम्र में औपरेशन होने से उन का जख्म भरने में समय लग सकता है. डाक्टर ने दूसरी एंटीबायोटिक दवाओं के साथसाथ दर्द की दवा भी दी थी, लेकिन दर्द की दवा ज्यादा खाने से मना करते हुए हिदायत भी दी थी. कहा था कि असनीय या तेज दर्द हो तभी वह दवा खाएं, वरना उस का असर सीधे किडनी पर पड़ेगा.

थोड़ी देर बैठने के बाद मीरा वहां से जाने को उठी, तभी जीवु के पति मालधारी आ गए. मीरा सिर पर दुपट्टा संभालती हुई बोली, ‘‘नमस्ते दादाजी.’’

‘‘कैसी है रे तू?’’ मालधारी मीरा से बोले.

‘‘अच्छी हूं, दादाजी. आप अब तो खुश हैं न?’’ मीरा बोली.

‘‘तू खुश रहने की बात बोल रही है, मैं तो इतना खुश हूं कि तुझे बता नहीं सकता… और बेटा तूने जो औलाद की मुराद पूरी करवाई है वह कभी नहीं भूलने वाला उपकार है.’’ बोलतेबोलते मालधारी भावुक हो गए.

‘‘उपकार किस बात का दादाजी, सब ऊपर वाले की मरजी से हुआ है.’’ मीरा बोली.

‘‘कुछ भी कह लो, लेकिन मेरे घर आई औलाद की खुशी बेटा तेरी ही बदौलत मिली है. जो मैं 75 साल की उम्र में बाप बन गया हूं… और देखो जीवु मुझ से कुछ ही साल तो छोटी है…‘‘ मालधारी ने कहा.

‘‘बस दादाजी, बस. मेरी तारीफ और मत करो…’’ मीरा बोली.

‘‘अरे, मैं तेरी तारीफ नहीं कर रहा हूं बल्कि मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि तू ठहरी निपट अनपढ़ औरत, फिर भी इतनी गहरी बात की जानकारी तुझे मिली कैसे? मैं तो वही सोचसोच कर अचरज में हूं.’’ मालधारी काफी दिनों तक मन में दबी जिज्ञासा को और नहीं रोक पाए.

ये भी पढ़ें- New Year 2022: नई आस का नया सवेरा

‘‘अच्छा तो यह बात है. चलो, मैं आज बता ही देती हूं दादादी… मैं जब 2 साल पहले सूरत में काम करने गई थी, तब मुझे एक नर्सिंगहोम में काम मिला था. वहां केवल बच्चा जन्म देने वाली औरतों को ही रखा जाता था. मुझे उन की देखभाल करने की नौकरी मिली थी. वहां और भी कई नर्सें और दाई काम करती थीं. भरती औरतों को समय पर दवाइयां खिलानी होती थी, खानेपीने की देखभाल करनी थी और उन्हें घुमानेफिराने के लिए ले जाना होता था…’’

‘‘तुम भी तो वहां गए थे.’’ बीच में जीवु बोली.

‘‘लगता है, अब दर्द कम हो गया है,’’ मीरा मुसकराती हुई बोली.

‘‘हां, तुम्हारी कहानी सुन कर दर्द चला गया,’’ जीवु गहरी सांस लेती हुई बोली.

‘‘…लेकिन तुम्हें टेस्टट्यूब के बारे में किस ने बताया?’’ मालधारी ने पूछा.

‘‘अरे तुम क्या समझोगे, मैं बताती हूं न सब कि कितने तरह की जांच हुई मेरी. वैसे तुम को भी तो डाक्टर ने बताया ही होगा. तुम्हारी भी तो डाक्टर ने जांच की थी,’’ जीवु बोली.

‘‘मेरी जांच का तो कुछ पता ही नहीं चला. डाक्टर ने सिर्फ बोला कि देखता हूं… अभी कुछ कह नहीं सकता.’’ मालधारी बोले.

‘‘मैं जब मीरा के पास 2 साल पहले गई थी, तब मीरा मुझे एक दिन जहां काम करती थी अपने साथ ले गई थी. वहीं भरती औरतों से मालूम हुआ कि उस के पेट में पलने वाला बच्चा उन का है, जो खुद मांबाप नहीं बन सकते थे. उसे पालने के बदले में पैसे मिले हैं.’’ जीवु बोली.

‘‘उस से क्या हुआ?’’ मालधारी ने पूछा.

‘‘हुआ यह कि जब एक दफा उन को देखने डाक्टर आए तब उन से मीरा ने पूछ लिया कि डाक्टर साहब मेरी दादी ‘मां’ नहीं बन सकती? डाक्टर साहब मुझे देख कर मुसकराए.’’ जीवु बोली.

‘‘..और दादाजी?’’ डाक्टर साहब के मुसकराने का अर्थ मैं समझ गई थी. अगले रोज ही उन के चैंबर में दादी को ले कर चली गई थी. दादी से उन्होंने बहुत देर तक बात की. अब रहने भी दो न दादाजी, वह सब पुरानी बातें हो गईं.’’ मीरा बोली.

‘‘अरे नहीं मीरा, कैसे रहने दूं उन बातों को, जिस से मेरी इस उम्र में औलाद की मुराद पूरी हुई. इस उम्र में कोई बाप बनता है भला! …और इस उम्र में कोई आज तक किसी औरत ने बच्चे को जन्म दिया है क्या? मैं तो अब उस बारे में सब को बताना चाहता हूं… क्या कहते हैं उसे आईवीएफ. उस इलाज के बारे में उन्हें समझाना चाहता हूं, जो बच्चा जन्म के लिए औरत को ही दोषी ठहराते हैं.’’

दरअसल, गुजरात के कच्छ इलाके में रापर तालुका स्थित एक छोटे से गांव मोरा की रहने वाली जीवुबेन रबारी ने सितंबर, 2021 में शादी के 45 साल बाद आईवीएफ तकनीक की बदौलत एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया था.

उस के पति मालधारी को पिता बनने का सौभाग्य तब मिला, जब वह 75 साल के हो गए. इस कारण दोनों मीडिया में चर्चा का विषय बन गए.

बच्चे के जन्म के बाद परिवार और रिश्तेदारों में खुशी की लहर दौड़ गई. बच्चा सीजेरियन से हुआ था. उन को यह उपलब्धि आईवीएफ तकनीक के विशेषज्ञ डा. नरेश भानुशाली की देखरेख से मिली, जो सभी के लिए अचंभे से भरी हुई थी. जिस ने भी सुना, सभी जीवुबेन और मालधारी से मिलने को बेचैन हो गए.

जीवुबेन ने जब इस बारे में डा. नरेश भानुशाली से संपर्क किया था, तब उन्होंने अधिक उम्र में मां बनने की मुश्किलों को ले कर सचेत किया था. डा. भानुशाली ने एक तरह से दंपति को शुरू में तो साफतौर पर पर कहा था कि उम्र अधिक होने के कारण बच्चे को जन्म देना मुश्किल होगा, लेकिन वृद्ध दंपति ने डाक्टर पर विश्वास जताते हुए अपनी मजबूत इच्छाशक्ति का हवाला दिया था. यही वजह रही कि प्रजनन का असंभव और कठिन काम संभव बन गया. यह घटना चिकित्सा जगत के लिए भी किसी चमत्कार से कम नहीं थी. ऐसा कर जीवुबेन और मालधारी ने दुनिया भर में एक मिसाल पेश कर दी. इसे ले कर ही मीडिया ने जीवुबेन द्वारा दुनिया में सब से अधिक उम्र में मां बनने कादावा किया.

ये भी पढ़ें- समस्या: बौयफ्रैंड के साथ कहां करें सैक्स

जीवुबेन विवाह के कई सालों तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं. उन के द्वारा की गई तमाम कोशिशें बेकार गई थीं. कई डाक्टरी इलाज भी चले थे और पतिपत्नी देवीदेवताओं के पूजापाठ से ले कर धार्मिक स्थलों की कठिन से कठिन यात्राएं तक कर चुके थे. फिर भी असफलता ही हाथ लगी थी.

नतीजा यह था कि उन्हें संतान नहीं होने का दंश सताता रहता था. उन्हें जरा सी भी उम्मीद की किरण दिखती थी, वे उस ओर दौड़ पड़ते थे. उस के उपायों और प्रयासों को आजमाने में कोई भी लापरवाही नहीं बरतते थे. एक बार उन्होंने बच्चा गोद लेने की भी सोची थी, जो उन्हें सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर अच्छा नहीं लगा.

इसी तरह से समय गुजरता गया. एक दिन उन की एक रिश्तेदार मीराबेन के माध्यम से आईवीएफ तकनीक के जरिए से नई उम्मीद जागी थी. इस बारे में उन्हें पहली बार जानकारी मिली थी.

जीवुबेन और मालधारी ने टेस्टट्यूब बच्चा और किराए की कोख के बारे में सुन तो रखा था, लेकिन उस बारे में बहुत अधिक नहीं जानते थे. मीरा की बदौलत वे डा. नरेश भानुशाली के संपर्क में आए. वह आईवीएफ तकनीक से गर्भधारण करवाने और बच्चा प्रसव के स्त्रीरोग विशेषज्ञ थे.

जीवु ने जब डा. भानुशाली को अपनी इच्छा जताई, तब वह भी सोच में पड़ गए. पहली बार में ही उन्होंने कहा कि उन की उम्र काफी अधिक हो गई है. ऐसा कहते हुए उन्होंने एक तरह से सीधेसीधे मना ही कर दिया था. समझाया था कि ज्यादा से ज्यादा 50-55 साल की माहिलाएं मेनोपाज के कारण आईवीएफ अर्थात इन विट्रो फर्टिलाइजेशन तकनीक की मदद से गर्भधारण कर सकती हैं, लेकिन उन की उम्र 70 साल के करीब हो चुकी है. इस उम्र में इस की संभावना नहीं के बराबर रहती है.

डाक्टर द्वारा इनकार करने के बावजूद दंपति ने एक बार जांच करने का जोर दिया. दंपति के कहने पर डाक्टर ने चुनौतीपूर्ण काम के लिए तैयारी शुरू की. मालधारी जांच में स्वस्थ पाए गए. उन के स्पर्म की भी जांच हुई.

महत्त्वपूर्ण जांच जीवुबेन की होनी थी, कारण बच्चा उन्हें जन्म देना था, या फिर उन्हें किसी किराए की कोख का इंतजाम करना था. दंपति चाहते थे कि बच्चे का जन्म भी जीवुबेन की कोख से ही हो, ताकि उन के पीछे बच्चे को किसी तरह की सामाजिक या पारिवारिक उपेक्षा का दंश नहीं झेलना पड़े.

डाक्टर ने जीवुबेन की डाक्टरी जांच शुरू की. उन्होंने पाया कि शरीर के भीतरी अंग सही तरह से काम कर रहे हैं. उन में कोई कमी नहीं है सिर्फ उम्र के अनुसार उन की कोख काफी सिकुड़ चुकी है.

पहले उसे दुरुस्त करने के लिए दवाई खिलाई गईं. उसी के साथ मासिक चक्र को नियमित करने के लिए भी दवाइयां दी गईं. कुछ समय में ही उन का सिकुड़ा हुआ गर्भाशय चौड़ा हो गया. उस के बाद उन के अंडों को निषेचित कर प्रजनन की जगह बना दी गई, फिर उस में उन के पति के अलग से निकाल कर रखे गए स्पर्म को डाला गया.

इस तरह से पूरी हुई गर्भधारण की प्रक्रिया के नतीजे अच्छे आने पर डाक्टर आश्वस्त हो गए.

गर्भावस्था के 8 महीने बाद डाक्टरों से जीवुबेन का सी-सेक्शन किया, जिस से उन को पहली संतान की प्राप्ति हुई.

इस सफलता पर डा. भानुशाली ने हर्ष जताते हुए बताया कि इस में जितना योगदान उन का है, उतना ही जीवुबेन का भी है, उन की हिम्मत और नीयत काम कर गई और एकदो नहीं, पूरे 45 साल के इंतजार के बाद 70 साल की उम्र में उन की सूनी गोद भर गई.

बांझ औरत भी बन सकती है आईवीएफ तकनीक से मां

संतानहीनों के लिए वरदान साबित हुआ आईवीएफ तकनीक का चिकित्सा जगत में पूरा वैज्ञानिक नाम इन विट्रो फर्टिलाइजेशन कहा जाता है. इस तकनीक की मदद से पुरुष के शुक्राणु यानी स्पर्म और महिला के अंडाणु को लैब में मिला कर उसे ऐसी महिला के गर्भाशय में डाला जाता है, जो मां बनना चाहती है.

इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए गहन चिकित्सीय सलाह की जरूरत होती है तथा इस का फायदा 5 तरह की शिकायत वालों मिल सकता है. जैसे— किसी महिला की फैलोपियन ट्यूब में ब्लौकेज हो जाना. पुरुष बांझपन यानी स्पर्म की संख्या में कमी का आना. किसी जेनेटिक बीमारी से ग्रसित होना. इनफर्टिलिटी का सही कारण का पता नहीं चलना या फिर महिला को हारमोंस विकार की समस्या से पीसीओएस की समस्या की शिकायत रहना.

इस तकनीक की सफलता भी 5 चरणों में पूरी होती है. जैसे पहले चरण में औरत के कोख को दुरुस्त किया जाता है. यह काम दवाइयों के अलावा माइनर औपरेशन से कर लिया जाता है.

दूसरे चरण में अंडे की पर्याप्त मात्रा को गर्भाशय में डाला जाता है. उस के बाद तीसरे चरण की प्रक्रिया में अंडे के साथ स्पर्म को लैब में अलग से मिला कर फर्टिलाइज करवाया जाता है. उस के बाद बच्चे की चाह रखने वाली महिला के गर्भ में डाल दिया जाता है.

कई बार इसे किसी दूसरी महिला के गर्भ में डाल कर गर्भधारण की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है. कुछ समय बाद अंतिम चरण के अनुसार महिला के गर्भावस्था की जांच की होती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें