ये घर बहुत हसीन है- भाग 2: उस फोन कॉल ने आन्या के मन को क्यों अशांत कर दिया

लेखक- मधु शर्मा कटिहा

वान्या का मुंह खुला का खुला रह गया. इस से पहले कि वह कुछ और बोलती आर्यन बाथरूम से आ बाहर आ गया. ‘‘किस का फोन है?’’ पूछते हुए उस ने वान्या के हाथ से मोबाइल ले लिया और तोतली आवाज में बातें करने लगा.

निराश वान्या कपड़े हाथ में ले कर बाथरूम की ओर चल दी. ‘किस ने किया होगा फोन? आर्यन भी जुटा हुआ है उस से बातें करने में. क्या आर्यन की पहले शादी हो चुकी है? हां, लगता तो यही है. तलाक हो चुका है शायद. मुझे बताया भी नहीं… यह तो धोखा है.’ वान्या अपनेआप में उलझती जा रही थी.

आधुनिक सुखसुविधाओं से लैस कमरे के आकार का बाथरूम जिस के वह सपने देखती थी, उस की निराशा को कम नहीं कर रहा था. एअर फ्रैशनर की भीनीभीनी खुशबू, हलकी ठंड और गरम पानी से भरा बाथटब, जी चाह रहा था कि अभी आर्यन आ जाए और अठखेलियां करते हुए उसे कहे कि ‘फोन उस के लिए नहीं था, किसी और आर्यन का नंबर मिलाना चाहता था वह बच्चा. मुझे पापा कब बनना है, यह तो तुम बताओगी…’ वान्या फूटफूट कर रोने लगी.

बाहर आई तो डायनिंग टेबल पर नाश्ते के लिए आर्यन उस की प्रतीक्षा कर रहा

था. ऊंची बैक वाली गद्देदार काले रंग की कुरसियां वान्या को कोरी शान लग रही थीं. वान्या के बैठते ही आर्यन उस के बालों से नाक सटा कर लंबी सांस लेता हुआ बोला, ‘‘कौन सा शैंपू लगाया है? कहीं यह खुशबू तुम्हारे बालों की तो नहीं? महक रहा हूं अंदर तक मैं.’’

वान्या को आर्यन की शरारती मुसकान फिर से मोहने लगी. सब कुछ भूल वह इस पल में खो जाना चाहती थी. ‘‘जल्दी से खा लो. अभी प्रेमा सफाई कर रही है. उसे जल्दी से वापस भेज देंगे… अपना बैडरूम तो तुम ने देखा ही नहीं अब तक. कब से इंतजार कर रहा है मेरा बिस्तर तुम्हारा,’’ आर्यन का नटखट अंदाज वान्या को मदहोश कर रहा था.

नाश्ता कर वान्या बैडरूम में पहुंच गई. शानदार कमरे में कदम रखते ही रोमांस की खुमारी बढ़ने लगी. ‘‘मुझे जरूर गलतफहमी हुई है, आर्यन के साथ कोई हादसा हुआ होता तो वह प्यार के लम्हों को जीने के लिए इतना बेताब न दिखता. उस का इजहार तो उस आशिक जैसा लग रहा है, जिसे नईनई मोहब्बत हुई हो.’’ सोचते हुए वान्या बैड पर लेट गई. फोम के गद्दे में धंसेधंसे ही मखमली चादर पर अपना गाल रख सहलाने लगी. प्रेमा और नरेंद्र के जाते ही आर्यन भी कमरे में आ गया. खड़ेखड़े ही झुक कर वान्या की आंखों को चूम मुसकराते हुए उसे अपने बाहुपाश में ले लिया.

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‘‘कैसा है यह मिरर? कुछ दिन पहले ही लगवाया है मैं ने?’’ बैड के पास लगे विंटेज कलर फ्रेम के सात फुटिया मिरर की ओर इशारा करते हुए आर्यन बोला.

दर्पण में स्वयं को आर्यन की बाहों में देख वान्या के चेहरे का रंग भी आईने के फ्रेम सा सुर्ख हो गया.

प्रेमासिक्त युगल एकाकार हो एकदूसरे की आगोश में खोएखोए कब नींद की आगोश में चले गए, पता ही नहीं लगा.

शाम को प्रेमा ने घंटी बजाई तो उन की नींद खुली. ग्रीन टी बनवा कर अपनेअपने हाथों में मग थामे दोनों घर के पीछे की ओर बने गार्डन में रखी बेंत की कुरसियों पर जा कर बैठ गए. वहां रंगबिरंगे फूल खिले थे. कतार में ऊंचेऊंचे पेड़ों की शाखाएं हवा चलने से एकदूसरे के साथ बारबार लिपट रहीं थीं. सभी पेड़ों पर भिन्न आकार के फल टक रहे थे, रंग हरा ही था सब का. वान्या की उत्सुक निगाहों को देख आर्यन बताने लगा, ‘‘मेरे राइट हैंड साइड वाले 4 पेड़ आलूबुखारे के और आगे वाले 3 खुबानी के हैं. अभी कच्चे हैं, इसलिए रंग हरा दिख रहा है. दीदी की बेटी को बहुत पसंद हैं कच्ची खुबानी. हमारी शादी में नहीं आ सकी, वरना खूब ऐंजौय करतीं.’’

‘‘अपने बच्चों को साथ क्यों नहीं लाईं दीदी? वे दोनों आ गए तो बच्चे भी आ सकते थे. दीदी की बेटी का नाम वंशिका है न? सुबह इसी नाम से कौल आई तो मैं ने अटेंड कर ली, पर वह तो किसी और का था. किस बच्चे का साथ बात कर रहे थे तुम?’’ वान्या का मस्तिष्क फिर सुबह वाली घटना में जा कर अटक गया.

‘‘तुम्हें देखते ही शादी को मन मचलने लगा था मेरा. दीदी से कह दिया था कि कोई आ सकता है तो आ जाए, वरना मैं अकेले ही चला जाऊंगा बारात ले कर. सब को लाना पौसिबल नहीं हुआ होगा तो जीजू को ले कर आ गईं देखने कि वह कौन सी परी है जिस पर मेरा भाई लट्टू हो गया.’’

आर्यन का मजाक सुन वान्या मुसकरा कर रह गई.

‘‘एक मिनट… शायद प्रेमा ने आवाज दी है, वापस जा रही होगी, मैं दरवाजा बंद कर अभी आया.’’ वान्या की पूरी बात का जवाब दिए बिना ही आर्यन दौड़ता हुआ अंदर चला गया.

कुछ देर तक जब वह लौट कर नहीं आया तो वान्या उस बच्चे के विषय में सोच

कर फिर संदेह से घिर गई. व्याकुलता बढ़ने लगी तो बगीचे से ऊपर की ओर जाती हुई सफेद रंग की घुमावदार लोहे की सीढि़यों पर चढ़ गई. ऊपर खुली छत थी, जहां से दूर तक का दृश्य साफ दिखाई दे रहा था. ऊंचीऊंची फैली हुई पहाडि़यों पर पेड़ों के झुरमुट, सर्प से बलखाते रास्ते और छोटेबड़े मकान, मकानों की छतों का रंग अधिकतर लाल या सलेटी था. सभी मकान एकदूसरे से कुछ दूरी पर थे. ‘क्या ऐसी ही दूरी मेरे और आर्यन के बीच तो नहीं? साथ हैं, लेकिन एक फसाला भी है. क्या राज है उस फोन का आखिर?’ वान्या सोच में डूबी थी. सहसा दबे पांव आ कर आर्यन ने अपने हाथों से उस की आंखें बंद कर दीं.

‘‘तुम भी न आर्यन… कब आए छत पर?’’

‘‘हो सकता है यहां मेरे अलावा कोई और भी रहता हो और तुम्हें कानोंकान खबर भी न हो.’’ आर्यन शरारत से बोला.

‘‘और कौन होगा?’’ वान्या घबरा उठी.

‘‘अरे कितनी डरपोक हो यार… यहां कौन हो सकता है?’’ वान्या की आंखों से हाथों को हटा उस की कमर पर एक हाथ से घेरा बना कर आर्यन ने अपने पास खींच लिया. ‘‘चलो, छत पर और आगे. तुम्हें यहां से ही कुछ सुंदर नजारे दिखाता हूं.’’

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आर्यन से सट कर चलते हुए वान्या को बेहद सुकून मिल रहा था. उस की छुअन और खुशबू में डूब वान्या के मन में चल रही हलचल शांत हो गईं. दोनों साथसाथ चलते हुए छत की मुंडेर तक जा पहुंचे. देवदार के बड़ेबड़े शहतीरों को जोड़ कर बनाई गई मुंडेर की कारीगरी देखते ही बनती थी. ‘काश, इन शहतीरों की तरह मैं और आर्यन भी हमेशा जुड़े रहें,’ वान्या सोच रही थी.

कोरोनावायरस: यौन संबंध बनाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

सैक्स में खुलापन जरूरी है. जितना इसे मन के अंदर दबाएंगे उतना ही यह उभर कर सामने आएगा. लेकिन सैक्स भी अब संभल कर करना होगा. सैक्स करने से पहले अपने को तैयार करना जरूरी होता है. लेकिन सैक्स के बाद भी आप को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. उन में सब से अहम है सैक्सुअल आइसोलेशन. अकसर हमारे देश में अपने प्राइवेट पार्ट के बारे में लोग नहीं सोचते. आइसोलेशन का महत्त्व नहीं समझते. उन का ध्यान उस तरफ नहीं जाता, क्योंकि ये बातें बचपन में भी नहीं सिखाई जातीं. लेकिन अब वक्त बदल रहा है. ऐसे में आप को सैक्सुअली आइसोलट होना बहुत जरूरी है. पूरा विश्व इस समय कोरोना महामारी की चपेट में है. सोशल डिस्टैंसिंग पर जोर दिया जा रहा है. ऐसे में सैक्स करते समय कैसे सुरक्षित रहें इस पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर मैं सैक्स करता हूं तो क्या मुझे कोरोना हो जाएगा? आप के जेहन में यह बात कई बार आई होगी, लेकिन आप शर्मिंदगी के डर से यह पूछ नहीं पा रहे हैं तो आइए हम आप को बताते हैं कि कैसे बचें कोरोना से सैक्स करते समय.

रिलेशनशिप पर असर

अगर आप रिलेशनशिप में हैं और किसी शख्स के साथ रह रहे हैं तो थोड़ी दूरी बना कर रहिए. अगर आप में से किसी को भी कोरोना के लक्षण दिख रहे हैं तो अपने को आइसोलेट कर लेना चाहिए. इस में पार्टनर को बुरा नहीं मानना चाहिए. इस से दोनों सुरक्षित रहेंगे. ध्यान रहे सैक्स का मजा तभी ले पाएंगे जब आप बचे रहेंगे.

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किस पर पाबंदी लगाएं

अब आप को किस करने से पहले सोचना पड़ेगा. पहले तो किस को प्यार की निशानी माना जाता था. लेकिन अब यह एक भयानक बीमारी का रास्ता भी हो सकता है. इस का मतलब यह नहीं कि आप किस करें ही न. किस करें लेकिन वो सांकेतिक होना चाहिए. हां अगर आप में खांसीजुकाम के लक्षण दिखाई देते हैं और आप जानते हैं कि आप ने हाल में ही किसी को किस किया है तो आप को उन्हें यह बात बता देनी चाहिए. अगर आप ने किसी ऐसे को किस किया है जिस में अब लक्षण दिख रहे हैं तो आप को खुद को सैल्फ आइसोलेशन में डाल लेना चाहिए. अगर आप किसी के जननांग छूते हैं तो यह मुमकिन है कि आप ने उसे किस भी किया हो. आप को मालूम है कि यह वायरस सलाइवा से फैलता है. अत: किस करना जोखिम भरा है. ऐसे में जिस पार्टनर के साथ आप रह नहीं रहे हैं उन के साथ कौंटैक्ट मत रखिए.

अच्छी सैक्स लाइफ जीएं

इस महामारी ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि एक अच्छी सैक्स लाइफ क्या है. इस बीमारी के कारण जो लोग आइसोलेशन में हैं वे इस मौके और दूरी का फायदा उठा रहे हैं. वे क्रिएटिव हो गए हैं. अगर आप और आप के पार्टनर को एक ही घर में आइसोलेशन में रहना पड़ रहा है तो इस दौरान आप अपने पार्टनर के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं. एकदूसरे की पसंदनापसंद को समझ सकते हैं. दूर रहिए लेकिन दिल को जोड़े रखिए.

इंटर कोर्स में सावधानी बरतें

कोरोना किसी को पहचानता नहीं. वह तो बस एक रास्ता खोजता है. इंटरकोर्स की वजह से किसी भी तरह के इंफैक्शन का खतरा न रहे इस के लिए आप को सतर्क रहना पड़ेगा. यानी साफसफाई से जुड़ी कुछ बातों को अपनी आदत में शुमार कर लेना चाहिए. सैक्स लाइफ में सैक्सुअल हाइजीन उतनी ही जरूरी है जितना कि हमारे जीवन में साफसफाई. एक सेहतमंद दांपत्य जीवन के लिए यौन संबंधों से पहले और बाद में सफाई रखना जरूरी है. अकसर लोग सैक्सुअल हाइजीन के बारे में कम ही ध्यान देते हैं जिस से यूटीआई यानी यूरिनरी ट्रैक्ट इंफैक्शन का खतरा दोनों ही पार्टनर को बना रहता है. इसलिए साफसफाई का ध्यान रखना चाहिए. सैक्स के बाद आप दोनों को कितनी ही नींद क्यों न आ रही हो लेकिन अगर आप हाइजीन से समझौता करेंगे तो आप को इंफैक्शन होने की आशंका बढ़ जाएगी. यहां यह भी ध्यान देना होगा कि आप को या आप के पार्टनर को सर्दीजुकाम तो नहीं हुआ है. ऐसे में आप को आइसोलेट करना ही होगा क्योंकि थोड़े से मजे के लिए जीवन को खतरे में नहीं डाल सकते.

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सैक्सुअल वाशिंग

सैक्स से पहले और सैक्स के बाद अच्छी तरह से हैंड वाश करना भी बेहद जरूरी है, क्योंकि बैक्टीरिया और कीटाणु आमतौर पर हमारे हाथों से ही फैलते हैं. सैक्स के दौरान अकसर हम अपना या पार्टनर का जैनिटल एरिया पेनिट्रेट करने के लिए हाथों का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अगर आप के हाथ गंदे होंगे तो प्राइवेट पार्ट में बैक्टीरिया ट्रांसफर होने का खतरा बना रहेगा. लिहाजा सैक्स से पहले और इंटरकोर्स के बाद हाथों को अच्छी तरह से रगड़ कर करीब 20 सैकेंड तक साफ करें. यौन संबंध बनाने से पहले और बाद में अपने जननांगो को अच्छी तरह साफ जरूर करें.

संक्रमित प्राइवेट पार्ट

सैक्स के बाद अपने प्राइवेट पार्ट की सफाई करना भी बेहद जरूरी है. किसी भी तरह के बैक्टीरिया को फैलने से रोकने के लिए बेहद जरूरी है कि इंटरकोर्स के बाद पानी से प्राइवेट पार्ट की सफाई की जाए. आप चाहें तो पानी के साथ माइल्ड साबुन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन अगर आप की स्किन सैंसिटिव है तो आप को इरिटेशन की समस्या हो सकती है. प्राइवेट पार्ट की सफाई के लिए फैंसी लोशन या परफ्यूम का इस्तेमाल करने की बजाए कुनकुने पानी से इसे धोएं. पार्टनर संग इंटरकोर्स के बाद जब आप बाथरूम में क्लीनिंग के लिए जाएं तो टौयलेट करना न भूलें. इस का मकसद यह है कि आप का ब्लैडर खाली होना चाहिए क्योंकि अगर सैक्स के दौरान किसी तरह का बैक्टीरिया आप के यूरेथा तक पहुंच गया होगा तो टौयलेट के दौरान वह शरीर से बाहर निकल जाएगा. सैक्स के बाद एक गिलास पानी पी कर मन को शांत कर सकते हैं.

कौंडम ही बचाव है

कोरोना वायरस के कारण दुनिया के कई देशों में लौकडाउन है. कौंडम बनाने वाली कंपनियां भी इस से अछूती नहीं हैं. ऐसे में कौंडम की सप्लाई कम हो रही है दुनियाभर में इस की भारी कमी हो गई है, जिस से बाजार में लोगों को यह नहीं मिल पा रहा है. अगर आप भी इस स्थिति से गुजर रहे हैं तो कामेच्छा पर काबू रखें. लाइफ पार्टनर से खुल कर इस विषय पर बात करें. दोनों मिल कर रास्ता ढूंढ़ें. अगर आप सैक्सुअल अर्ज को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं तो वह कई तरह से इस पर नियंत्रण पाने में आप की मदद कर सकती हैं. अपने विचारों पर काबू करने की कोशिश करें. हर बार यौन संबंधों के बारे में सोचेंगे तो आप की कामेच्छा को काबू करना नामुमकिन हो जाएगा. बेहतर यही है कि जब भी ऐसा कोई खयाल आए तो दिमाग को तुरंत किसी और थौट की ओर डायवर्ट करने की कोशिश करें. सैक्सुअल ऊर्जा को किसी क्रिएटिव कार्य में लगा दें. रोमांस और प्यार का मतलब सिर्फ यौन संबंध ही नहीं होता है.

मोटे पुरुष और महिला दूर ही रहें

कुछ दिनों पहले हुई एक स्टडी से पता चलता है कि पुरुष जिन का वजन अधिक होता है वे ज्यादा सैक्स करते हैं. ऐंगलिया रस्किन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं ने ब्रिटेन के करीब 5 हजार सैक्सुअली ऐक्टिव पुरुषों का विश्लेषण किया है और फिर इस नतीजे पर पहुंचे कि मोटे पुरुष, दुबलेपतले पुरुषों की तुलना में ज्यादा सैक्स करते हैं. सिर्फ पुरुषों में ही नहीं बल्कि महिलाओं में भी यही बात देखने को मिली. अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि ओवरवेट महिलाओं ने भी कम वजन वाली महिलाओं की तुलना में 16 प्रतिशत ज्यादा सैक्स किया. कोरोना के प्रकोप से बचे रहें इसलिए मोटे लोग सैक्स विचारों से बचें.

मेरी खातिर- भाग 1: झगड़ों से तंग आकर क्या फैसला लिया अनिका ने?

‘‘निक्कीतुम जानती हो कि कंपनी के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारियां हैं. मैं छोटेछोटे कामों के लिए बारबार बौस के सामने छुट्टी के लिए मिन्नतें नहीं कर सकता हूं. जरूरी नहीं कि मैं हर जगह तुम्हारे साथ चलूं. तुम अकेली भी जा सकती हो न. तुम्हें गाड़ी और ड्राइवर दे रखा है… और क्या चाहती हो तुम मुझ से?’’

‘‘चाहती? मैं तुम्हारी व्यस्त जिंदगी में से थोड़ा सा समय और तुम्हारे दिल के कोने में अपने लिए थोड़ी सी जगह चाहती हूं.’’

‘‘बस शुरू हो गया तुम्हारा दर्शनशास्त्र… निकिता तुम बात को कहां से कहां ले जाती हो.’’

‘‘अनिकेत, जब तुम्हारे परिवार में कोई प्रसंग होता है तो तुम्हारे पास आसानी से समय निकल जाता है पर जब भी बात मेरे मायके

जाने की होती है तो तुम्हारे पास बहाना हाजिर होता है.’’

‘‘मैं बहाना नहीं बना रहा हूं… मैं किसी भी तरह समय निकाल कर भी तेरे घर वालों के हर सुखदुख में शामिल होता हूं. फिर भी तेरी शिकायतें कभी खत्म नहीं होती हैं.’’

‘‘बहुत बड़ा एहसान किया है तुम ने इस नाचीज पर,’’ मम्मी के व्यंग्य पापा के क्रोध की अग्निज्वाला को भड़काने का काम करते थे.

‘‘तुम से बात करना ही बेकार है, इडियट.’’

‘‘उफ… फिर शुरू हो गए ये दोनों.’’

‘‘मम्मा व्हाट द हैल इज दिस? आप लोग सुबहशाम कुछ देखते नहीं… बस शुरू हो जाते हैं,’’ आंखें मलते हुए अनिका ने मम्मी से कहा.

‘‘हां, तू भी मुझे ही बोल… सब की बस मुझ पर ही चलती है.’’

पापा अंदर से दरवाजा बंद कर चुके थे, इसलिए मुझे मम्मी पर ही अपना रोष डालना पड़ा था.

अनिका अपना मूड अच्छा करने के लिए कौफी बना, अपने कमरे की खिड़की के पास जा खड़ी हो गई. उस के कमरे की खिड़की सामने सड़क की ओर खुलती थी, सड़क के दोनों तरफ  वृक्षों की कतारें थीं, जिन पर रात में हुई बारिश की बूंदें अटकी थीं मानो ये रात में हुई बारिश की चुगली कर रही हों. अनिका उन वृक्षों के हिलते पत्तों को, उन पर बसेरा करते पंछियों को, उन पत्तियों और शाखाओं से छन कर आती धूप की उन किरणों को छोटी आंखें कर देखने पर बनते इंद्रधनुष के छल्लों को घंटों निहारती रहती. उसे वक्त का पता ही नहीं चलता था. उस ने घड़ी की तरफ देखा 7 बज गए थे. वह फटाफटा नहाधो कर स्कूल के लिए तैयार हो गई. कमरे से बाहर निकलते ही सोफे पर बैठे चाय पीते पापा ने ‘‘गुड मौर्निंग’’ कहा.

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‘‘गुड मौर्निंग… गुड तो आप लोग मेरी मौर्निंग कर ही चुके हैं. सब के घर में सुबह की शुरुआत शांति से होती पर हमारे घर में टशन और टैंशन से…’’ उस ने व्यंग्यात्मक लहजे में अपनी भौंहें चढ़ाते हुए कहा.

‘‘चलिए बाय मम्मी, बाय पापा. मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है.’’

‘‘पर बेटे नाश्ता तो करती जाओ,’’ मम्मी डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगाते हुए बोली.

‘‘सुबह की इतनी सुहानी शुरुआत से मेरा पेट भर गया है,’’ और वह चली गई.

अनिका जानती थी अब उन लोगों के

बीच इस बात को ले कर फिर से बहस छिड़

गई होगी कि सुबह की झड़प का कुसूरवार

कौन है. दोनों एकदूसरे को दोषी ठहराने पर तुल गए होंगे.

शाम को अनिका देर से घर लौटी. घर जाने से बेहतर उसे लाइब्रेरी में बैठ कर

पढ़ना अच्छा लगा. वैसे भी वह उम्र के साथ बहुत एकांतप्रिय और अंतर्मुखी बनती जा रही थी. घर में तो अकेली थी ही बाहर भी वह ज्यादा मित्र बनाना नहीं सीख पाई.

‘‘मम्मी मेरा कोई छोटा भाईबहन क्यों नहीं है? मेरे सिवा मेरे सब फ्रैंड्स के भाईबहन हैं और वे लोग कितनी मस्ती करती हैं… एक मैं ही हूं… बिलकुल अकेली,’’ अनगिनत बार वह मम्मी से शिकायत कर अपने मन की बात कह चुकी थी.

‘‘मैं हूं न तेरी बैस्ट फ्रैंड,’’ हर बार मम्मी यह कह कर अनिका को चुप करा देतीं. अनिका अपने तनाव को कम करने और बहते आंसुओं को छिपाने के लिए घंटों खिड़की के पास खड़ी हो कर शून्य को निहारती रहती.

घर में मम्मीपापा उस का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. दरवाजे की घंटी बजते ही दोनों उस के पास आ गए.

‘‘आज आने में बहुत देर कर दी… फोन भी नहीं उठा रही थी… कितनी टैंशन हो गई थी हमें,’’ कह मम्मी उस का बैग कंधे से उतार कर उस के लिए पानी लेने चली गई.

‘‘हमारी इन छोटीमोटी लड़ाइयों की

सजा तुम स्वयं को क्यों देती हो,’’ ?पापा ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘किस के मम्मीपापा ऐसे होंगे, जिन के बीच अनबन न रहती हो.’’

‘‘पापा, इसे हम साधारण अनबन का नाम तो नहीं दे सकते. ऐसा लगता है जैसे आप दोनों रिश्तों का बोझ ढो रहे हो. मैं ने भी दादू, दादी, मां, चाची, चाचू, बूआ, फूफाजी को देखा है पर ऐसा अनोखा प्रेम तो किसी के बीच नहीं देखा है,’’ अनिका के कटाक्ष ने पापा को निरुत्तर कर दिया था.

‘‘बेटे ऐसा भी तो हो सकता है कि तुम अतिसंवेदनशील हो?’’

पापा के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उस ने पापा से पूछा, ‘‘पापा, मम्मी से शादी आप ने दादू के दबाव में आ कर की थी क्या?’’

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पापा को 20 साल पहले की अपनी पेशी याद आ गई जब पापा, बड़े पापा और घर के अन्य सब बड़े लोगों ने उन के पैतृक गांव के एक खानदानी परिवार की सुशील और पढ़ीलिखी कन्या अर्थात् निकिता से विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. घर वालों ने उन का पीछा तब तक नहीं छोड़ा था जब तक उन्होंने शादी के लिए हां नहीं कह दी थी.

पापा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटे ऐसी कोई बात नहीं है… 19-20 की जोड़ी थी पर ठीक है. आधी जिंदगी निकल गई है आधी और कट ही जाएगी.’’

‘‘वाह पापा बिलकुल सही कहा आपने… 19-20 की जोड़ी है… आप उन्नीस है और मम्मा बीस… क्यों पापा सही कहा न मैं ने?’’

Crime Story: दो गज जमीन के नीचे

लेखक- रविंद्र शिवाजी दुपारगुडे

लेकिन जब यह बात सुनील की पत्नी तक पहुंची तो स्थिति बदल गई. अंतत: सुनील ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर…

लड़की जब शादी योग्य हो जाती है तो वह अपने भावी जीवन को ले कर सपने बुनने लगती

हैं, कुछ भावी पति के बारे में, कुछ घरपरिवार के बारे में और कुछ अपने लिए. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ज्यादातर मांबाप बचपन से ही बेटी के मन में यह बात बैठाना शुरू कर देते हैं कि शादी के बाद वह पराई हो जाएगी. कौन लड़की कैसे सपने बुनती है, यह उस की व्यक्तिगत और पारिवारिक स्थिति पर निर्भर करता है.

मुंबई के मानखुर्द की रहने वाली रोहिणी गुलाब मोहिते ने भी अपने जीवनसाथी को ले कर तरहतरह के सपने संजोए थे. पिता ने जब उस का विवाह मुंबई के ही अभिजीत घोरपड़े के साथ कर दिया तो अपने दिल में वह तमाम उमंगें लिए ससुराल चली गई.

रोहिणी को मनमुताबिक पति मिला, जिस से वह हर तरह खुश थी. अभिजीत उसे बहुत प्यार करता था. उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी. इसी दौरान रोहिणी एक बच्चे की मां भी बन गई. परिवार में बच्चे के आने से उन की खुशी और बढ़ गई.

लेकिन उन की इस खुशी की उम्र बहुत कम निकली. बच्चा अभी अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पाया था कि अभिजीत की मृत्यु हो गई. पति की मौत के बाद रोहिणी की जिंदगी में अंधेरा छा गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करे. कुछ नहीं सूझा तो वह अपने बच्चे को ले कर मायके आ गई.

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पति की मौत के गम में वह दिन भर सोचती रहती. उसे न खाने की चिंता रहती न पीने की. वह हर समय गुमसुम रहती थी. घर वालों और अन्य लोगों के समझाने पर रोहिणी ने घर से बाहर निकलना शुरू किया. बाहर निकलने से रोहिणी धीरेधीरे सामान्य होती गई. किसी के सहयोग से उसे वाशी नवी मुंबई के एक अस्पताल में कौन्ट्रैक्ट पर नौकरी मिल गई.

वह रोजाना मानखुर्द से वाशी तक लोकल ट्रेन से अपडाउन करती थी. उसी दौरान रोहिणी के गांव के रहने वाले रामचंद्र तुकाराम जाधव के माध्यम से उस की मुलाकात सुनील शिर्के से हुई. सुनील भी उसी अस्पताल में नौकरी करता था, जिस में रोहिणी काम करती थी.

रोहिणी और सुनील अकसर साथसाथ ट्रेन से आतेजाते थे. रोजाना साथ आनेजाने से उन की अच्छी दोस्ती हो गई. सुनील से दोस्ती के बाद रोहिणी खुश रहने लगी थी, क्योंकि वह उस से अपने मन की बात कह लेती थी. उसे सुनील का व्यवहार बहुत अच्छा लगता था. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई.

रोहिणी ने सुनील को अपने अतीत के बारे में सब कुछ बता दिया था. तब सुनील ने उसे भरोसा दिया कि वह उस से शादी कर के जीवन भर उस का साथ निभाएगा. कई सालों तक उन का प्यार उसी तरह चलता रहा.

इस बीच रोहिणी ने उस से कई बार शादी करने को कहा लेकिन वह बातें बना कर उसे टाल देता था. वक्त के साथ 5-6 साल बीत गए लेकिन सुनील ने उस से शादी नहीं की. रोहिणी समझ गई कि वह उस के साथ सिर्फ मौजमस्ती कर रहा है, लिहाजा वह सुनील पर शादी के लिए दबाव डालने लगी.

दूसरी ओर सुनील रोहिणी से इसलिए शादी नहीं कर रहा था, क्योंकि वह पहले से ही शादीशुदा था. उस के 2 बच्चे भी थे. उस की पत्नी को इस बात की भनक तक नहीं थी कि सुनील के किसी दूसरी महिला से अवैध संबंध हैं.

शादी की बात को ले कर सुनील और रोहिणी के बीच झगड़े होने लगे थे. किसी तरह सुनील की पत्नी को पति के अवैध संबंधों की जानकारी मिल गई तो वह घर में क्लेश करने लगी. इस से सुनील दोनों तरफ से घिर गया था. एक ओर पत्नी थी तो दूसरी ओर रोहिणी. दो नावों की सवारी उस के लिए आसान नहीं थी.

सुनील रोहिणी से शादी करना चाहता था लेकिन पत्नी के रहते रोहिणी को घर लाना संभव नहीं था.

दूसरी ओर रोहिणी भी आसानी से मानने वाली नहीं थी. शादी के नाम पर सुनील पिछले 5-6 सालों से उस का शोषण करता आ रहा था. अंतत: उस ने रोहिणी से छुटकारा पाने का फैसला किया. इस संबंध में उस ने अपने दोस्तों रामचंद्र तुकाराव जाधव और विजय सिंह से बात की.

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तीनों ने जब इस मुद्दे पर विचारविमर्श किया तो रोहिणी से छुटकारा पाने का एक ही उपाय नजर आया कि उस की हत्या कर दी जाए. लिहाजा तीनों ने उस की हत्या का फैसला कर लिया. इतना ही नहीं, हत्या कर लाश कहां ठिकाने लगानी है, इस की भी उन्होंने योजना तैयार कर ली.

योजना के अनुसार, 13 नवंबर 2018 को सुनील मुंबई से 129 किलोमीटर दूर रायगढ़ स्थित अपने मूल गांव सिरसाल गया. वहां उस ने अपने घर के करीब एक गहरा गड्ढा खोदा और मुंबई लौट आया.

अब उसे किसी बहाने से रोहिणी को वहां ले जाना था. इसलिए उस ने रोहिणी से कहा, ‘‘रोहिणी, लड़तेझगड़ते बहुत दिन हो गए. अब मैं ने तुम से शादी करने का फैसला कर लिया है. एक वकील मेरे जानकार हैं. हमें उन के पास चलना होगा. वह सारी कानूनी काररवाई कर देंगे. इस के बाद हम दोनों के साथ रहने में कोई समस्या नहीं होगी.’’

सुनील की बात सुन कर रोहिणी खुश हो गई. उस ने सुनील के साथ जाने के लिए हामी भर दी. 14 नवंबर, 2018 को रोहिणी सहेली की शादी में जाने का बहाना कर के अपने घर से निकल गई. सुनील उसे निर्धारित जगह पर मिल गया. उस के साथ रामचंद्र जाधव और विजय सिंह भी थे, जो एमएच23बी के4101 नंबर की कार ले कर आए थे. रोहिणी खुशीखुशी उस कार में बैठ गई.

इस कार से सब लोग 129 किलोमीटर दूर रायगढ़ पहुंचे. गांव पहुंच कर सुनील ने रोहिणी से शादी के बारे में बात की तो वह शादी करने की जिद पर अड़ी रही. सुनील ने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मानी. मानती भी क्यों, सुनील उसे शादी का झांसा दे कर ही तो लाया था.

इस मुद्दे पर बात बढ़ी तो रोहिणी ने यह तक कह दिया कि अब वह चुप नहीं बैठेगी और पुलिस से शिकायत कर देगी. उसे जिद पर अड़ी देख रामचंद्र जाधव ने रोहिणी के सिर पर फावड़े के डंडे से जोरदार प्रहार किया.

प्रहार तेज था, जिस से रोहिणी जमीन पर गिर गई. विजय सिंह मोरे ने उस के दोनों हाथ पकड़ लिए और सुनील व रामचंद्र ने रोहिणी की साड़ी से ही उस का गला घोंट दिया.

रोहिणी की मौत हो जाने के बाद तीनों ने उस की लाश पहले से खोदे गए गड्ढे में दबा दी. लाश ठिकाने लगा कर वे लोग अपने घर लौट आए.

14 नवंबर को रोहिणी सहेली की शादी में जाने की बात कह कर घर से निकली थी. जब वह घर नहीं पहुंची तो उस के घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने अपने सभी परिचितों से रोहिणी के बारे में पूछा. जब कोई पता नहीं चला तो अगले दिन उस के भाई राजेंद्र गुलाब ने उस अस्पताल में जा कर पूछताछ की, जहां रोहिणी काम करती थी.

वहां से पता चला कि पिछले दिन रोहिणी अपनी ड्यूटी पर आई ही नहीं थी. यह जान कर राजेंद्र और ज्यादा परेशान हो गया. अंतत: 16 नवंबर, 2018 को राजेंद्र थाना मानखुर्द पहुंचा और बहन के लापता होने की बात पुलिस को बता दी.

राजेंद्र गुलाब घोरपड़े की शिकायत पर मानखुर्द पुलिस थाने के सीनियर पीआई नितिन बोबड़े ने 28 वर्षीय रोहिणी की गुमशुदगी दर्ज कर के जरूरी काररवाई करनी शुरू कर दी. उन्होंने रोहिणी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, लेकिन उस से कोई खास जानकारी नहीं मिली. जिस अस्पताल में रोहिणी काम करती थी, पुलिस ने वहां जा कर भी जांच की. वहां पता चला कि रोहिणी के उसी अस्पताल में नौकरी करने वाले सुनील शिर्के नाम के युवक से संबंध थे.

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पुलिस ने वक्त न गंवा कर सुनील को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. उस से पूछताछ करने पर भी रोहिणी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उसे छोड़ दिया.

इस के बाद पुलिस ने रोहिणी के रिश्तेदारों आदि से भी पूछताछ की, लेकिन पुलिस को कहीं से भी रोहिणी के बारे में कोई क्लू नहीं मिल रहा था. पुलिस ने रोहिणी के बैंक खातों की जांच की तो पता चला कि रोहिणी के एसबीआई के खाते से एटीएम द्वारा 15 और 16 नवंबर, 2018 को 65 हजार रुपए निकाले गए थे.

ये पैसे किस ने निकाले, जानने के लिए पुलिस ने एटीएम के सीसीटीवी कैमरे को खंगाला तो फोटो पहचानने में नहीं आया. रोहिणी 14 नवंबर को घर से निकली थी, जबकि पैसे 16 नवंबर को निकाले गए थे.

इस से पुलिस को यही लगा कि या तो वह पैसे निकाल कर किसी के साथ भाग गई होगी या फिर उस के साथ कुछ गलत हुआ होगा. पुलिस फिर से एटीएम के सीसीटीवी की उसी धुंधली तसवीर की जांच करने लगी.

पुलिस ने वह तसवीर उस अस्पताल के कर्मचारियों को दिखाई, जहां रोहिणी नौकरी करती थी. इस जांच में पुलिस को नई जानकारी मिली. लोगों ने सीसीटीवी के उस फोटो की पहचान सुनील के दोस्त रामचंद्र तुकाराव जाधव के रूप में की.

पुलिस ने रामचंद्र के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह महाराष्ट्र के सतारा जिले से करीब 60 किलोमीटर दूर वानरवाडी गांव का रहने वाला है और मुंबई में आचरेकर नामक केबल औपरेटर के यहां नौकरी करता है.

पुलिस टीम केबल औपरेटर आचरेकर के औफिस पहुंच गई. आचरेकर से रामचंद्र के बारे में पूछताछ की गई, तो उस ने बताया कि रामचंद्र काफी दिनों पहले अपने गांव जाने की बात कह कर गया था और अभी तक नहीं लौटा है. पुलिस उस के गांव पहुंच गई. रामचंद्र गांव में मिल गया. उसे हिरासत में ले कर पुलिस थाना मानखुर्द लौट आई. इस के साथ ही पुलिस ने सुनील को भी हिरासत में ले लिया.

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पुलिस ने उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने रोहिणी की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उन्होंने यह भी बता दिया कि उन लोगों ने अपने तीसरे साथी विजय सिंह मोरे के साथ मिल कर रोहिणी की हत्या की थी और उस की लाश रायगढ़ जिले के सिरसाल गांव में दफना दी थी.

सीनियर पुलिस इंसपेक्टर नितिन बोबड़े अपने सहयोगी इंसपेक्टर चंद्रकांत लोडगे, एसआई तुकाराम घाडगे, प्रताप देसाई, कृष्णात माने आदि के साथ तीनों आरोपियों को उस जगह ले गए, जहां उन्होंने रोहिणी का शव दफनाया था. माणगांव के तहसीलदार की मौजूदगी में रोहिणी की लाश गड्ढे से निकलवाई गई.

राजेंद्र ने लाश की पहचान अपनी बहन रोहिणी के रूप में की. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भायखला के सर जे.जे. अस्पताल भेज दी.

इस के बाद पुलिस ने हत्यारोपी सुनील शिर्के, रामचंद्र तुकाराव जाधव और विजय सिंह मोरे से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें 6 फरवरी, 2019 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

सजा- भाग 5: तरन्नुम ने असगर को क्यों सजा दी?

शाम को असगर के आने से पहले तरन्नुम ने खूब शोख रंग के कपड़े, चमकदार गहने पहने, गहरा शृंगार किया, असगर उसे तैयार देख कर हैरान रह गया. यह पहरावा, यह हावभाव उस तरन्नुम के नहीं थे जिसे वह सुबह छोड़ कर गया था.

‘‘आप को यों देख कर मुझे लगा जैसे मैं गलत कमरे में आ गया हूं,’’ असगर ने चौंक कर कहा.

‘‘अब गलत कमरे में आ ही गए हो तो बैठने की गलती भी कर लो,’’ तरन्नुम ने कहा, ‘‘क्या मंगवाऊं आप के लिए, चाय, ठंडा या कुछ और,’’ तरन्नुम ने लहरा कर पूछा.

‘‘होश में तो हो,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, आंखें खुल गईं तो होश में ही हूं,’’ तरन्नुम ने जवाब दिया, ‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का बहुत कीमती दिन है. आज मैं ने अपनी हिम्मत से तुम्हारे शहर में बहुत अच्छा घर ढूंढ़ लिया है. उस की खुशी मनाने को मेरा जी चाह रहा है. अब तो अनुबंध की प्रति भी है मेरे पास. देखो, तुम इतने महीने में जो न कर सके वह मैं ने 6 दिन में कर दिया,’’ अपना पर्स खोल कर तरन्नुम ने कागज असगर की तरफ बढ़ाए.

असगर ने कागज लिए. तरन्नुम ने थरमस से ठंडा पानी निकाल कर असगर की तरफ बढ़ाया. असगर के हाथ कांप रहे थे. उस की आंखें कागज को बहुत तेजी से पढ़ रही थीं. उस ने कागज पढ़े और मेज पर रख दिए. तरन्नुम उस के चेहरे के उतारचढ़ाव देख रही थी लेकिन असगर का चेहरा सपाट था कोरे कागज सा.

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‘‘असगर, तुम ने पूछा नहीं कि मैं ने कागजात में खाविंद का नाम न लिख कर वालिद का नाम क्यों लिखा?’’ बहुत बहकी हुई आवाज में तरन्नुम ने कहा.

असगर ने सिर्फ सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा.

‘‘इसलिए कि मेरे और निकहत कुरैशी के खाविंद का एक ही नाम है और अलबम की तसवीरें कह रही हैं कि हम दोनों बिना जाने ही एकदूसरे की सौतन बना दी गईं. निकहत बहुत प्यारी शख्सियत है मेरे लिए, बहुत सुलझी हुई, बेहद मासूम.’’

‘‘तरन्नुम,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, मैं कह रही थी वह बहुत अच्छी, बहुत प्यारी है. मैं उन का मन दुखाना नहीं चाहती, वैसा कुछ भी मैं नहीं करूंगी जिस से उन का दिल दुखी हो. इसलिए मैं वह घर किराए पर ले चुकी हूं और वहां रहने का मेरा पूरा इरादा है लेकिन उस घर में मैं अकेली रहूंगी. पर एक सवाल का जवाब तुम्हारी तरफ बाकी है, तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?’’

‘‘मुझे तुम बेहद पसंद थीं,’’ असगर ने हकलाते हुए कहा.

‘‘तो?’’

‘‘जब तुम्हें भी अपनी तरफ चाहत की नजर से देखते पाया तो सोचा…’’

‘‘क्या सोचा?’’ तरन्नुम ने जिरह की.

‘‘यही कि अगर तुम्हारे घर वालों को एतराज नहीं है तो यह निकाह हो सकता है,’’ असगर ने मुंह जोर होने की कोशिश की.

‘‘मेरे घर वालों को तुम ने बताया ही कहां?’’ तरन्नुम गुस्से से तमतमा उठी.

‘‘देखो, तरन्नुम, अब बाल की खाल निकालना बेकार है. शकील को सब पता था. उसी ने कहा था कि एक बार निकाह हो गया तो तुम भी मंजूर कर लोगी. तुम्हारी अम्मी ने झोली फैला कर यह रिश्ता अपनी बेटी की खुशियों की दुहाई दे कर मांगा था. वैसे इसलाम में 4 शादियों तक भी मुमानियत नहीं है.’’

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‘‘देखिए, मुझे अपने ईमान के सबक आप जैसे आदमी से नहीं लेने हैं. आप की हिम्मत कैसे हुई निकहत जैसी नेक बीवी के साथ बेईमानी करने की और मुझे धोखा देने की,’’ तरन्नुम ने तमतमा कर कहा.

‘‘धोखाधोखा कहे जा रही हो. शकील को सब पता था, उसी ने चुनौती दे रखी थी तुम से शादी करने की.’’

‘‘वाह, क्या शर्त लगा रहे हैं एक औरत पर 2 दोस्त? आप को जीत मुबारक हो, लेकिन यह आप की जीत आप की जिंदगी की सब से बड़ी हार साबित होगी, असगर साहब. मैं आप के घर में किराएदार बन कर जिंदगी भर रहूंगी और दिल्ली आने के बाद अदालत में तलाक का दावा भी दायर करूंगी. वैसे मेरी जिंदगी में शादी के लिए कोई जगह नहीं थी. शकील ने शादी के बहुत बार पैगाम भेजे, मैं ने हर बार मना कर दिया. उसी का बदला इस तरह वह मुझ से लेगा, मैं ने सोचा भी नहीं था. आज पंचशील पार्क जा कर मुझे एहसास हुआ कि क्यों दिल्ली में घर नहीं मिल रहे? क्यों तुम उखड़ाउखड़ा बरताव कर रहे थे? देर आए दुरुस्त आए.’’

‘‘पर मैं तुम्हें तलाक देना ही नहीं चाहता,’’ असगर ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें अपनी बीवी बनाया है. मैं तुम्हारे लिए दूसरी जगह घर बसाने के लिए तैयार हूं.’’

बहुत खुले दिमाग हैं आप के, लेकिन माफ कीजिए. अब औरत उस कबीली जिंदगी से निकल चुकी है जब मवेशियों की गिनती की तरह हरम में औरत की गिनती से आदमी की हैसियत परखी जाती थी. बच्चों से उन का बाप और निकहत से उस का शौहर छीनने का मेरा बिलकुल इरादा नहीं है और वैसे भी एक धोखेबाज आदमी के साथ मैं जी नहीं सकती. हर घड़ी मेरा दम घुटता रहेगा लेकिन तुम्हें बिना सजा दिए भी मुझे चैन नहीं मिलेगा. इसीलिए तुम्हारे घर के ऊपर मैं किराएदार की हैसियत से आ रही हूं.’’

फिर तेज सांसों पर नियंत्रण करती हुई बोली थी तरन्नुम, ‘‘मैं सामान लेने जा रही हूं. तुम निकहत को कुछ बताने का दम नहीं रखते. तुम बेहद कमजोर और बुजदिल आदमी हो. हम दोनों औरतों के रहमोकरम पर जीने वाले.’’

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असगर के चेहरे पर गंभीरता व्याप्त थी. तरन्नुम अपनी अटैची बंद कर रही थी. वह मन ही मन सोच रही थी…अम्मीअब्बू की खुशी के लिए उसे वहां कोई भी बात बतानी नहीं है. यह स्वांग यों ही चलने दो जब तक वे हैं.’’

जीने की राह- भाग 6: उदास और हताश सोनू के जीवन की कहानी

Writer- संध्या 

‘‘आप जैसा ठीक समझें, पापा,’’ उस ने आत्मीयता से कहा. मैं ने बड़े भैया को रोके की रस्म के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘भैया, मैं सुमन को ले कर मार्केट से हो कर आता हूं.’’ बड़े भैया ने कहा, ‘‘बेटा मन, मुझे भी तो शगुन के रूप में सोनू को कुछ देना है. मुझे भी मार्केट ले चल, या तू ही लेता आ. हां, पैसे मैं दिए देता हूं.’’ मैं ने भैया को रोकते हुए कहा, ‘‘भैया, कुछ लाने की जरूरत नहीं है सोनू के लिए, क्योंकि नीता, रिया के लिए कुछ न कुछ गहने बनवाती रहती थी, अभी जो नया सैट बनवाया था वह घर में ही रखा है, इसी तरह उस ने रिया के लिए साडि़यां भी खरीद रखी थीं. सो सोनू को आप वह ही दे दीजिए.’’ बड़े भैया खुश होते हुए बोले, ‘‘चल, यही ठीक है, तू ने तो एक मिनट में ही मेरी उलझन सुलझा दी. जब घर में सब है ही, तब तू क्यों मार्केट जा रहा है?’’ मैं ने कहा, ‘‘भैया, आप की बहू के लिए तो शगुन का इंतजाम हो गया, किंतु मुझे अपने दामाद के लिए भी तो अंगूठी, चैन, कपड़े लेने हैं. फिर मिठाई, नारियल, पान, सुपारी आदि भी तो लाना है.’’ बड़े भैया बोले, वे बेहद आश्चर्यचकित थे, ‘‘मन बेटा, यह सुमन, तेरा दामाद कैसे हो गया? तू तो इस का छोटा पापा है न?’’ ‘‘भैया, सोनू का कन्यादान मैं करूंगा, वह मेरी रिया है. सोनू के रूप में मुझे मेरी रिया मिल गई है. इस रिश्ते से सुमन मेरा दामाद ही हुआ न. वैसे भैया, उस का छोटा पापा तो मैं सदैव रहूंगा ही.’’ मार्केट जाते समय उत्तम एवं भाभीजी से तय हो गया कि वे दोनों भी आ जाएंगे एवं सोनू को भाभीजी तैयार कर देंगी. हम शाम को सोनू के घर पर पहुंच गए. सोनू को भाभीजी ने बहुत सुंदर ढंग से तैयार किया था. वह आसमान से उतरी परी सी लग रही थी. सुमन भी ब्लू सूट में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था. दोनों की जोड़ी बड़ी प्यारी लग रही थी. सारे कार्यक्रम बड़े ढंग से हो जाने के बाद बड़े भैया ने मेरी तरफ मुखातिब हो कर कहा, ‘‘सोनू के पापा, मैं आप की बेटी सोनू को जल्दी से जल्दी अपनी बहू बना कर अपने घर ले जाना चाहता हूं. इसलिए आप जल्दी से जल्दी शादी का मुहूर्त निकलवाइए.’’

मैं ने भी बड़ी नाटकीयता से जवाब दिया, ‘‘सुमन के पापा, आप एकदम सही फरमा रहे हैं. मैं भी अपनी बेटी सोनू को अपने बेटे सुमन की बहू बना कर जल्दी से जल्दी अपने घर ले आना चाहता हूं,’’ और हम सभी ठहाका लगा कर हंस पड़े. अच्छी बात यह भी रही कि एक हफ्ते बाद का ही मुहूर्त निकल आया. एक छोटे से कार्यक्रम में सोनू और सुमन की शादी कर दी गई. सोनू का कन्यादान मैं ने ही किया. हम दोनों बेहद भावविह्वल हो रहे थे. मुझे सोनू के रूप में बेटी मिल गई थी. उसे उस के मांपापा के स्थान पर मैं मिल गया था. यह घड़ी ही ऐसी थी जिस में हमें अपने नए रिश्ते के साथ, अपने बिछड़े रिश्ते भी बहुत याद आ रहे थे. सोनू मुझ से गले लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. मैं ने उसे संभालते हुए कहा, ‘‘बेटा, खुद को संभालो, अपनी भावनाओं पर काबू रखो, यह रोने का नहीं बल्कि खुशी का समय है. आज हम ने अपने रिश्ते को सार्थक नाम दिया है तथा आज हमारे अपने, जिन्हें हम ने खो दिया है, बेहद खुश होंगे. आज हम ने उन के सपनों को साकार कर उन्हें सही अर्थों में याद किया है, श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं.’’ वह कस कर मेरे गले से लग गई, ठीक रिया की तरह. रिया भी जब बेहद भावुक होती थी, ऐसा ही करती थी. वह धीरे से बोली, ‘‘पापा, आप बहुत अच्छे इंसान हैं, मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही हूं, जो आप मुझे मिले.’’

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सोनू बहू बन कर मेरे घर क्या आई मानो मेरे सूने घर में बहार आ गई. ऐसा महसूस होता मानो मरुस्थल में रिमझिमरिमझिम बारिश हो रही हो. बड़े भैया हमेशा कहते, ‘‘मन बेटा, तू ने मेरा दिल जीत लिया. तू ने मेरे ऊपर इतना बड़ा उपकार किया है, मुझे तू ने इतनी अच्छी बहू दी है, यह एहसान मैं तेरा कैसे चुकाऊंगा.’’ मैं कहता, ‘‘कैसी बातें करते हैं भैया, भला अपनोें पर कोई एहसान करता है. फिर सुमन, जैसा आप का बेटा वैसे ही मेरा भी तो बेटा है. मैं ने अपना भला किया है.’’ वे कहते, ‘‘सच कहता हूं मन, इतनी सुंदर, संस्कारी बहू मुझे मिलेगी, कभी सोचाभी नहीं था.’’ मैं, भैया को छेड़ते हुए कहता, ‘‘भैया, आप को बहू अच्छी मिली है तो मुझे भी लाखों में एक दामाद मिला है. मैं इस रिश्ते से बहुत खुश हूं.’’ वे मेरे साथ खुल कर हंस देते.

घर के बदले हुए वातावरण से मैं काफी उत्साहित था. एकाएक मेरे दिमाग में एक अद्भुत विचार आया, जिस से मेरा मनमयूर नाच उठा.  मैं ने भैया को टटोलते हुए कहा, ‘‘हालांकि मैं ने कोई एहसान नहीं किया है फिर भी आप कहते हैं न कि आप मेरा एहसान कैसे चुकाएंगे. आज मैं आप को सरलतम उपाय बताता हूं जिस से आप मेरे एहसान से उऋण हो जाएंगे. पहले वादा कीजिए ‘न’ नहीं करेंगे.’’ उन्होंने तत्परता से कहा, ‘‘बोल, मन बेटा, जो कहेगा, करूंगा, यह लाला का वादा है. जो कहेगा, दे दूंगा.’’ मैं ने उन की नजरों से नजरें मिलाते हुए कहा, ‘‘भैया, अब यहीं रह जाइए, हम सब साथ रहेंगे.’’ भैया, प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगे. मैं ने कहा, ‘‘आप सोच रहे होंगे, बड़ा लालची निकला, स्वयं अकेला पड़ जाएगा, इसलिए हम सब को यहां रोक लेना चाहता है. ‘‘यह विचार मुझे पहले आया नहीं, वरना मैं आप से अवश्य चर्चा करता. शायद आप दोनों का साथ एवं सोनू की विदाई के भय से मेरे दिमाग में यह विचार उपजा. कहा भी जाता है आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है, सभी के साथ की लालसा ने शायद इस विचार को जन्म दिया.’’

‘‘मन बेटा, तू बहुत नेकदिल इंसान है. तुझे लालची तो मैं समझ नहीं सकता हूं, तू बोल रहा है तो जरूर सब का हित इस में होगा तभी रुकने को कह रहा है. मैं सोच रहा हूं, सुमन की नौकरी और मेरे घर का क्या किया जाए?’’ मैं ने कहा, ‘‘भैया, मैं ने सब के बारे में सोच लिया है. देखिए भैया, सुमन तो कभी भी नौकरी करना नहीं चाहता था, उस का सपना तो हमेशा से कोचिंग इंस्टिट्यूट रहा है. वह ऐसा कोचिंग इंस्टिट्यूट खोलना चाहता है जिस में शिक्षा का उत्तम स्तर होगा तथा वह व्यापार के उद्देश्य से नहीं खोला जाएगा. उस की गुणवत्ता के चलते, इतने स्टूडैंट्स आएंगे कि कम फीस में भी हमारा खर्चा आराम से निकल आएगा. आप की प्यारी बहू नीता भी ट्यूशन चलाती थी, वह छोटे स्तर पर ही यह काम कर रही थी, किंतु इन क्लासेस में उस की जान बसती थी. मैं उस के द्वारा चलाई गई इन क्लासेस को आप लोगों के सहयोग से बड़ा रूप देना चाहता हूं. ‘‘भैया, मैं और उत्तम 6 माह आगेपीछे रिटायर होने वाले हैं. हम दोनों भी इंस्टिट्यूट से जुड़ जाएंगे. पहले कालेज में पढ़ाते रहे हैं, अब कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाएंगे. समझिए कि रिटायर होते हुए भी रिटायर नहीं होंगे. आप भी रिटायर्ड प्रोफैसर हैं, आप को भी पढ़ाने में लगना होगा. अपनी सोनू भी अध्यापिका है वह भी गणित की, वह भी साथ हो जाएगी तथा आवश्यकतानुसार बाहर से शिक्षक ले लेंगे. मैं कई अच्छे प्रोफैसर को जानता हूं, जो खुशीखुशी हमारे साथ जुड़ जाएंगे.’’

भैया बोले, ‘‘मन बेटा, तू ने सोचा तो बहुत सही है. इस तरह सुमन का सपना भी पूरा होगा व मेरी बहू नीता का सपना भी साकार होगा तथा सब से बड़ी बात है कि हम सब एकसाथ रह भी सकेंगे. सच कहूं तो इस बुढ़ापे में तेरे साथ ही रहना चाहता हूं.’’ कोचिंग इंस्टिट्यूट की बात सुन कर सोनू और सुमन बेहद खुश हो गए. सुमन ने कहा, ‘‘छोटे पापा, कल ही तो मैं ने सोनू को अपने दिल की बात बताई थी. उस ने कहा भी था कि आप जब भी इंस्टिट्यूट खोलना चाहेंगे, वह भी उस में पूरा सहयोग करेगी किंतु यह सपना इतनी जल्दी साकार होगा, यह मैं ने नहीं सोचा था.’’ सब ने मिलबैठ कर यही तय किया कि सुमन और सोनू दिल्ली जा कर मकान एवं सुमन की नौकरी का काम निबटा लें. इस बहाने इन का हनीमून भी हो जाएगा तथा घर का काम भी निबट जाएगा. सुमन ने हंसते हुए कहा, ‘‘पापा, हनीमून पर अपनी नौकरी से इस्तीफा देने वाला मैं इकलौता बंदा ही होऊंगा.’’ सुमन की बात को बढ़ाते हुए सोनू ने जोड़ दिया, ‘‘हनीमून पर अपने मकान के लिए किराएदार ढूंढ़ने वाले भी हम पहले नवविवाहित जोड़ा बन जाएंगे.’’

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उन दोनों की चुहलबाजी पर हम सभी हंस पड़े. सोनू और सुमन की शादी को 5 वर्ष हो चुके हैं. हमारे द्वारा खोले गए इंस्टिट्यूट को भी लगभग 5 वर्ष हो रहे हैं. सोनू की सलाह पर इंस्टिट्यूट का नाम नीता इंस्टिट्यूट रखा गया. शहर में नीता इंस्टिट्यूट का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है. बड़े भैया, मैं व उत्तम के साथसाथ मेरे कुछ मित्र भी इस में शामिल हुए हैं. नई पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी के संयुक्त योगदान का अच्छा प्रतिफल विद्यार्थियों को मिल रहा है. सोनू और सुमन की 3 साल की प्यारी सी बिटिया है, जिस का नाम सोनू ने रिया रखा है. आज सोनू और सुमन के सहयोग से मेरे चौबीस घंटे नीता (इंस्टिट्यूट) और रिया (पोती) के साथ व्यतीत होते हैं. मेरा और सोनू का अनोखा रिश्ता हम दोनों के ही जीवन का मजबूत संबल बना रहा. इस कथन पर पूरी तरह विश्वास सा हो गया है कि जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, उम्मीद का एक रास्ता अवश्य खुलता है. हिम्मत करे तो मनुष्य उस के सहारे निराशा से आशा की ओर उन्मुख हो सकता है.     

प्रेम गली अति सांकरी: भाग 6

Writer- जसविंदर शर्मा 

उस ने आहिस्ताआहिस्ता मेरे बदन को यों सहलाया जैसे मैं इस दुनिया की सब से नायाब और कीमती चीज हूं. वह मुझे दीवानगी और कामुकता के उच्च शिखर तक ले गया और फिर वापस लौट आया. मैं इस दुनिया में कहीं बहुत ऊपर तैर रही थी. वह बड़े सधे ढंग से इस खेल का निर्देशन कर रहा था. खुद पर उस का नियंत्रण लाजवाब था. ठीक वक्त पर वह रुका. हम दोनों एकसाथ अर्श पर पहुंचे.

पापा ने मेरी बहन को तो कभी कुछ नहीं कहा मगर जब मेरे लवर से संबंध बने और वह जब अकसर घर आने लगा तो पापा ने एक दिन मुझे आड़े हाथ लिया. बहस होने लगी. मैं विद्रोह की भाषा में बोल पड़ी. पापा की मिस्ट्रैस को ले कर मैं ने कुछ उलटासीधा कह दिया. पापा ने मेरी खूब धुनाई कर दी. प्यार करने वाले तो पहले ही इतने पिटे हुए होते हैं कि उन्हें तो एक हलका सा धक्का ही काफी होता है उन की अपनी नजर से नीचे गिराने के लिए. पापा ने जब मुझे पीटा तब भी मां कुछ नहीं बोलीं. अब वे पूरी तरह से गूंगी हो चुकी थीं. कई बार मैं ने सोचा कि उन्हें किसी बढि़या ओल्डऐज होम में भरती करवा दूं. मां को पैसे की किल्लत न थी.

इस कशमकश में कब मेरे बालों में सफेदी उतर आई, पता ही नहीं चला. मां के गुजर जाने के बाद घर में मैं अकेली ही रह गई. सब लोगों ने अपनेअपने घोंसले बना लिए थे. सब लोग आबाद हो गए थे. एक मेरी और पापा की नियति में दुख लिखे थे.

पापा काफी वृद्ध हो गए थे. अपनी मिस्ट्रैस और उस से हुई बेटी से उन की कम ही बनती थी. पापा कभीकभार हमारे घर आते. अपने औफिस की एक अन्य बूढ़ी औरत के घर में रहते थे. मां के गुजर जाने के बाद पापा की वित्तीय स्थिति काफी मजबूत हो गई थी. मां को जो खर्च देते थे वह भी बच जाता था.

फिर एक दिन पापा भी इस दुनिया से कूच कर गए. मेरी बहन विदेश चली गई थी. पापा की मौत के बारे में सुन कर 1 साल बाद आई. हम ने एकदूसरे को सांत्वना दी. भाई ने तो बरसों पहले ही हम लोगों से नाता तोड़ रखा था. वह बहुत पहले घर को बेचना चाहता था. मगर मैं यहां रहती थी. उस ने सोचा था कि मैं इस मकान को अकेले ही हड़प लूंगी.

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मैं भला मां को छोड़ कर कहां जाती. अपने मकान में मैं जैसी भी थी, सुख से रहती थी. मेरी नौकरी कोई खास बड़ी नहीं थी. दरअसल, अपने इश्क की खातिर मैं ने यह शहर नहीं छोड़ा था, इसलिए मेरी तरक्की के साधन सीमित थे यहां.

मैं अजीब विरोधाभास में थी. अपने आशिक के घर में जा कर नहीं रह सकती थी. मेरे जाने के बाद मां की हालत खराब हो जाती. वह पापा के कारण यहां आने से कतराता था. फिर भी हम ने कहीं दूसरी जगह मिलने का क्रम जारी रखा. हमारे प्यार की इन असंख्य पुनरावृत्तियों में हमेशा एक नवीनता बनी रही. हम ने एकदूसरे से शादी के लिए कोई आग्रह नहीं किया. हमारे इश्क में शिद्दत बनी रही क्योंकि हमारे प्यार की अंतिम मंजिल प्यार ही थी.

उस के सामने मेरी कैफियत उस बच्चे के समान थी जो नंगे हाथों से अंगार उठा ले. उस ने मेरे विचारों, मेरी मान्यताओं और मेरी समझ को उलटपलट कर रख दिया था, जैसे बरसात के दौरान गलियों में बहते पानी का पहला रेला अपने साथ गली में बिखरे तमाम पत्ते, कागज वगैरह बहा ले जाता है.

मैं भी एक पहाड़ी नदी की तरह पागल थी, बावरी थी, आतुर थी. मुझे बह निकलने की जल्दी थी. मुझे कई मोड़, कई ढलान, कई रास्ते पार करने थे. मुझे क्या पता था कि तेजी से बहती हुई नदी जब मैदानों में उतरेगी तो समतल जमीन की विशालता उस की गति को स्थिर कर देगी, लील लेगी. उस के साथ रह कर मुझे लगा कि मैं फिर से जवान हो गई हूं. मेरी उम्र कम हो गई है. फिर उस की उम्र देख कर बोध होता कि मैं गलत कर रही हूं. प्यार तो समाज की धारा के विरुद्ध जा कर ही किया जा सकता है.

मैं डर गई थी समाज से, पापा से, अपनेआप से. कहीं फंस न जाऊं, हालांकि उस से जुदा होने को जी नहीं चाहता था मगर उस के साथ घनिष्ठ होने का मेरा इरादा न था या कहें कि हिम्मत नहीं थी.

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मैं तो उसे दिल की गहराइयों से महसूस कर के देखना चाहती थी. मगर वह तो मेरे प्यार के खुमार में दीवानगी की हद तक पागल था. तभी तो मैं डर कर अजीब परस्पर विरोधी फैसले करती थी. कभी सोचती आगे चलूं, कभी पीछे हटने की ठान लेती. एक सुंदर मौका, जब मैं किसी को अपने दिल की गहराइयों से प्यार करती थी, मैं ने जानबूझ कर गंवा दिया.

मैं ने उसे अपमानित किया. उसे बुला कर उस से मिलने नहीं गई. वह आया तो मैं अधेड़ उम्र के सुरक्षित लोगों से घिरी बतियाने में मशगूल रही. उस की उपेक्षा की. आखिरकार, मैं ने अपनेआप को एक खोल में बंद कर लिया, जैसे अचार या मुरब्बे को एअरटाइट कंटेनरों में बंद किया जाता है. अब मुझे इस उम्र में जब मैं 58 से ऊपर जा रही हूं, उन क्षणों की याद आती है तो मैं बेहद मायूस हो जाती हूं. मैं सोचती हूं कि मैं ने प्यार नहीं किया और अपनी मूर्खता में एक प्यार भरा दिल तोड़ दिया.

Manohar Kahaniya- राम रहीम: डेरा सच्चा सौदा के पाखंडी को फिर मिली सजा- भाग 4

सौजन्य- मनोहर कहानियां

तीसरा गवाह गुरमीत का ड्राइवर खट्टा सिंह था, जिस के सामने रंजीत को मारने की साजिश रची गई थी. हालांकि बाद में खट्टा सिंह अदालत के सामने बयान से मुकर गया था. कई साल बाद खट्टा सिंह फिर से कोर्ट में पेश हो गया और गवाही दी.

रणजीत का साला परमजीत सिंह भी इस मामले में गवाह था, जिस ने सीबीआई के स्पैशल मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज कराए थे. परमजीत ने अदालत को बताया था कि रणजीत की बहन भी जुलाई, 1999 में साध्वी बनी थी.

परमजीत ने कोर्ट के सामने डेरे से जुड़ी घटनाओं की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए बताया कि रणजीत सिंह की साध्वी बहन डेरा प्रमुख की गुफा के बाहर पहरेदारी का काम करती थी. उसी ने अपने भाई को डेरा प्रमुख की गुफा में साध्वियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की बात बताई थी.

जिस के बाद रणजीत सिंह ने डेरा छोड़ दिया और अपने गांव कुरुक्षेत्र चला गया. डेरा प्रमुख को शक था कि साध्वियों को डेरे से भगाने और उन के खिलाफ प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट में चिट्ठी लिखवा कर उसे बदनाम करने का काम रणजीत सिंह ने अपनी साध्वी बहन के जरिए किया है, इसीलिए रणजीत सिंह की हत्या करा दी गई.

चूंकि डेरे में 20 साल तक सेवादार रहे रणजीत सिंह की 2002 में गुमनाम साध्वी का पत्र सामने आने के बाद ही हत्या हुई थी. इसीलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कडि़यां जोड़ते हुए अदालत ने बाबा को उस की हत्या का दोषी माना.

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वैसे साध्वियों से दुष्कर्म, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरे के मैनेजर रणजीत सिंह की हत्या के अलावा भी डेरामुखी राम रहीम के खिलाफ कई संगीन आरोप हैं.

2010 में डेरा के ही एक पूर्व साधु रामकुमार बिश्नोई ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर डेराप्रमुख पर डेरे के पूर्व मैनेजर फकीर चंद की हत्या कराने का आरोप लगाया था.

फकीरचंद की गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग पर अदालत ने सीबीआई को जांच के आदेश तो दिए लेकिन जांच एजेंसी मामले में सबूत नहीं जुटा पाई और क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी. हालांकि बिश्नोई ने क्लोजर रिपोर्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है.

इस के अलावा फतेहाबाद जिले के कस्बा टोहाना के रहने वाले डेरे के एक पूर्व साधु हंसराज चौहान ने जुलाई 2012 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर राम रहीम पर डेरा के 400 साधुओं को नपुंसक बनाए जाने का गंभीर आरोप लगाया था.

अदालत के सामने उन्होंने 166 साधुओं का नाम सहित विवरण प्रस्तुत करते हुए गुरमीत राम रहीम की करतूतों की पोल खोली थी. अदालत ने इस शिकायत की जांच का काम भी सीबीआई को सौंपा, जिस के बाद ये मामला भी अब अदालत में विचाराधीन है.

साधु हंसराज ने बताया कि उस के मातापिता डेरे के अनुयायी थे, इसलिए वह भी साल 1996 में 17 साल की उम्र में डेरे के अनुयायी बन गए थे. जहां डेरामुखी ने यह कहते हुए अनुयायियों को नपुंसक बनाया कि वे अगर खुद नपुंसक बनते हैं तो भगवान को पाने में सफल होंगे.

उन्हें साल 2002 में श्रीगंगानगर स्थित डेरे के अस्पताल में नपुंसक बनने के लिए मजबूर किया गया, जहां उन के अलावा कई अन्य साधु (डेरा अनुयायी) भी थे.

डेरामुखी का मानना था कि नपुंसक बनने के बाद अनुयायी डेरा छोड़ कर नहीं जा सकेंगे. डेरामुखी ऐसे अनुयायियों से खाली कागज पर दस्तखत भी करवा लेता था. उस के बाद उन के नामों पर डेरामुखी को दान की गई जमीन ट्रांसफर करवाता और कुछ समय बाद उस जमीन को डेरा ट्रस्ट के नाम पर ट्रांसफर करवा लिया जाता.

दरअसल, गुरमीत राम रहीम के गलत कामों की कुंडलियां खुलने के बाद ही पता चला कि डेरे का आकार बढ़ाने के लिए उस ने डेरे के आसपास की जमीन हथियाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया हुआ था.

गुरमीत राम रहीम ने 1990 में गद्दीनशीं होने के बाद डेरे के चारों ओर की जमीन हासिल करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए. लोगों को डराधमका कर औनेपौने दामों पर 700 एकड़ जमीन हासिल की. इसी वजह से महज कुछ एकड़ में फैला डेरा आज बड़े शहर में तब्दील हो चुका है.

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गांव शाहपुर बेगू, नेजियाखेड़ा और फूलकां बाजेकां के जिन लोगों ने बाबा को जमीन देने का विरोध किया, उन्हें परेशान करने के लिए बाबा के गुंडों ने पहले उन्हें धमकाया फिर समझाया और जो इस के बाद भी नहीं माना, उस की जमीन को रातोंरात ओपन टौयलेट बना दिया जाता था.

डेरे पर आने वाले हजारों लोग ऐसे लोगों के खेतों और फसल की ऐसी दुर्दशा कर देते थे कि गंदगी की वजह से खेतों के आसपास जाना भी मुश्किल हो जाता था. परेशान हो कर लोग उस जमीन को जमीन बेचने में ही भलाई समझते थे.

अदालत से जिन मामलों में गुरमीत राम रहीम को अपने कुकर्मों की सजा मिल चुकी है, वे तो महज उदाहरण हैं. लेकिन यौन उत्पीड़न से ले कर हत्या और लोगों की संपत्ति हड़पने के ऐसे सैकड़ों गुनाह हैं, जिन की पीडि़तों ने शिकायत ही नहीं की. लेकिन ऐसे तमाम लोग आज इस बात से खुश हैं कि सच्चे डेरे की आस्था को कलंकित करने वाला संत अब सलाखों के पीछे है.

अब मैं समझ गई हूं- भाग 3: रिमू का परिवार इतना अंधविश्वासी क्यों था

रिमू की बेबुनियादी बातें सुन कर मैं लगभग ?ां?ाला सा गया था. वास्तव में इस प्रकार की बातों को ले कर कई बार हम दोनों में बहस हो जाया करती थी. मेरा क्रोध देख कर वह शांत तो हो गई परंतु ऐसा लग रहा था मानो उस के मन में कोई अंर्तद्वंद्व चल रहा है.

एक दिन जैसे ही मैं औफिस से लौटा, रिमू बड़ी मस्ती में गुनगुनाती हुई खाना बना रही थी. आमतौर पर हैरानपरेशान रहने वाली रिमू को इतना खुश देख कर मैं हैरान था, सो पूछा, ‘‘क्या बात है, बड़ी खुश नजर आ रही हो?’’

‘‘आज मम्मी आ रही हैं कुछ दिनों के लिए मेरे पास रहने.’’

‘‘तब तो तुम मांबेटी की ही तूती बोलेगी आज से इस घर में, मैं बेचारा एक कोने में पड़ा रहूंगा.’’

‘‘ऐसा क्यों कहते हो, मेरी मां क्या तुम्हारी मां नहीं है,’’ हलकी सी नाराजगी जताते हुए रिमू ने कहा.

‘‘अरे नहीं बाबा, मैं तो ऐसे ही मजाक कर रहा था. तुम चायनाश्ता लगाओ, मैं फ्रैश हो कर आता हूं,’’ कह कर मैं चेंज करने चला गया.

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2 दिनों बाद रीमा की मां हमारे घर आ गईं. यह कहने में अवश्य अजीब लगेगा परंतु सचाई यही थी कि 60 की उम्र में भी उन्होंने अपनेआप को बहुत फिट रखा था, जिस से वे रीमा की मां कम, बड़ी बहन अधिक लगती थीं. एक से एक आधुनिक परिधान धारण करती थीं वे.

आते ही उन्होंने रीमा को अपना लाइफस्टाइल बदलने और हैल्दी डाइट प्लान बनाने को कहा ताकि उस के दिन पर दिन बढ़ते कमर के घेरे को कम किया जा सके. घर के बदलते रंगढंग को देख कर मैं भी बड़ा खुश था. पर एक दिन जब सुबह मैं औफिस जाने को तैयार हो रहा था तो मांबेटी को एकसाथ तैयार हो कर जाते देख पूछ लिया.

‘‘अरे, इतनी सुबहसुबह कहां जा रही हैं आप दोनों, चलिए कहां जाना है, मैं छोड़ देता हूं?’’

‘‘कहीं नहीं बेटा, यहीं पास के ही मंदिर में जा रहे हैं. पैदल जाएंगे तो वौक भी हो जाएगी. आप औफिस जाइए,’’ सासुमां ने कहा तो मैं आश्वस्त हो कर औफिस रवाना हो गया.

इन दिनों पहले की अपेक्षा रिमू कुछ अधिक शांत और खुश नजर आने लगी थी. मैं इसे मां के आने की खुशी सम?ा रहा था. कुछ दिनों के बाद मु?ो औफिस के काम से ग्वालियर जाना पड़ा. मेरा काम एक दिन पूर्व ही समाप्त हो गया. सो, मैं एक दिन पूर्व ही घर आ गया. जैसे ही घर के द्वार पर पहुंचा तो घर से पंडितों के मंत्रोच्चार की ध्वनि आ रही थी. अंदर जा कर देखा तो रिमू और उस की मां 4 पंडितों से घिरी हवन करवा रही थीं. क्रोध से मेरी आंखें ज्वाला बरसाने लगीं, परंतु मौके की नजाकत को सम?ा कर मैं शांत रहा और अंदर चला गया.

कुछ ही देर में रिमू घबराती हुई मेरे लिए चायनाश्ता ले कर आई तो मैं लगभग चीखते हुए बोला, ‘‘यह सब क्या हो रहा था, जबकि तुम्हें पता है कि मैं इन सब अंधविश्वासों और ढकोसलों को नहीं मानता?’’

‘‘अरे बेटा, जन्मकुंडली का दोष शांत करवाने के लिए यह पूजा करवाना अत्यंत आवश्यक था. अब देखना तुम्हारा गृहस्थ जीवन बहुत अच्छे से चलेगा. बहुत पहुंचे हुए पंडितजी हैं और उन्होंने पूजा भी बहुत अच्छी करवाई है,’’ रिमू के बोलने से पूर्व ही उस की मां ने अपनी सफाई दी.

‘‘मांजी, यह सब मन का वहम है. क्या कमी है आप की बेटी को बताइए, जन्ममृत्यु, हारीबीमारी ये सब तो जीवन के एक हिस्से हैं. आज दुख है तो कल सुख भी आएगा. यदि पंडितजी इतने ही पहुंचे हुए हैं तो क्यों नहीं कोई अच्छी सी नौकरी प्राप्त कर ली, क्यों यजमान ढूंढ़ते फिरते हैं अपनी जीविका को चलाने के लिए.

‘‘आप की और पापाजी की कुंडली में तो 30 गुण मिले थे पर फिर भी आप दोनों हमेशा लड़ते?ागड़ते और एकदूसरे को अपमानित करते रहते हैं. आप तो इतनी आधुनिका हैं, फिर आप अपनी सोच को आधुनिक क्यों नहीं बना पाईं. गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाना पतिपत्नी के हाथ में होता हैं न कि किसी पंडित के हाथ में. जो काम मु?ो पसंद नहीं हैं वे मेरी पत्नी मेरी अनुपस्थिति में करेगी तो कैसे गृहस्थी सुखद हो सकेगी.’’

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मु?ो नहीं पता कि मेरी बातों का उन पर क्या असर हुआ परंतु उस समय उन्होंने वहां से चले जाने में ही अपनी भलाई सम?ा. इस घटना के 2 दिनों बाद जब रीमा की मम्मी को हम स्टेशन छोड़ने गए तो उन में से एक पंडितजी के हमें प्लेटफौर्म पर दर्शन हुए. बढि़या सिगरेट के कश खींचते हुए वे जींसटौप में किसी गुंडा टाइप आदमी के साथ बातचीत कर रहे थे.

मैं ने रिमू से कहा, ‘‘देखो ये हैं तुम्हारे पंडितजी. जिन से तुम अपनी गृहस्थी में शांति करवाने चली थीं.’’

‘‘बाप रे, ये तो सिगरेट पी रहे हैं.’’ उन्हें देख कर रीमा ने दांतों तले उंगली दबा ली. सासुमां को ट्रेन में बैठा कर जब हम घर आए तो हमारे पड़ोसी अपनी बेटी की शादी का कार्ड देने आ गए.

‘‘बेटा, आप लोग अवश्य आइएगा. बड़ी मुशकिल से तय हो पाई हमारी बेटी की शादी. जहां भी जाओ लोग जन्मकुंडली मिलाने की बात करते और न मिलने पर शादी की बात आगे ही नहीं बढ़ पाती थी, पर एक पंडित ने ही हमें इस का तोड़ बता दिया कि पहले लड़के की जन्मपत्रिका ले लो और मैं उसी के अनुसार बेटी की पत्रिका बना दूंगा. हम ने ऐसा ही किया और चट मंगनी पट ब्याह हो गया. क्या करें बेटा कई जगह विवशता में चालाकी करनी पड़ती है,’’ वे अपनी बेटी के विवाह के बारे में बताने लगे.

‘‘क्या ऐसा भी होता है? फिर कुंडली मिलवाने का क्या मतलब?’’ अब तक शांत बैठी रिमू अचरज से बोली.

‘‘हांहां भाभीजी, क्यों नहीं, आजकल सब संभव है. पंडितजी को चढ़ावा चढ़ाओ और असंभव कार्य को भी पंडितजी से संभव करवाओ. दरअसल, भाभीजी यह कुंडली कुछ होती ही नहीं है, यह सब तो पंडितों के चोंचले हैं दानदक्षिणा प्राप्त करने के.

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‘‘अब हमारा तो अंतर्जातीय विवाह हुआ है. आज 35 वर्ष हो गए हमारे दांपत्य जीवन को. हर सुखदुख को हम ने खुशीखुशी ?ोला है. 35 वर्षों में लड़ाई?ागड़ा तो छोडि़ए, किसी भी प्रकार की अनबन तक नहीं हुई हम दोनों में. एकदूसरे को इतना सम?ाते हैं हम दोनों. विवाह तो पतिपत्नी की सम?ादारी से सफल होते हैं, न कि कुंडली से.’’

इस के बाद वे तो चले गए पर रिमू की आंखें अवश्य खोल गए क्योंकि जैसे ही मैं उन्हें बाहर छोड़ कर आया, रिमू मेरे गले लग गई, बोली, ‘‘तुम सच कहते हो, यह कुंडली सिर्फ मन का वहम और पंडितजी के जीने का साधन है. अब मैं सब सम?ा गई हूं.’’

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